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UGC NET Paper 2: Sanskrit 27th Dec 2021 Shift 1 (Previous Year Paper)

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Question 1

संयोगानन्तरं पञ्चसन्निकर्षाणामयं क्रमः तर्कभाषायामुपलभ्यते 

A. समवेतसमवायः 

B. विशेष्यविशेषभावः 

C. संयुक्तसमवेत समवायः 

D. समवायः 

E. संयुक्त समवायः 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, C, B, E, D

  2. BOption (b)

    E, C, D, A, B 

  3. COption (c)

    C, A, B, D, E

  4. DOption (d)

    E, C, A, B, D

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Correct answer

Answer: (b)B.

E, C, D, A, B 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : संयोग के अनन्तर पञ्चसन्निकर्षोंं का कौन सा क्रम तर्कभाषा में प्राप्त होता है?

प्रत्यक्ष प्रमाण दो प्रकार का है - 

  • निर्विकल्प
  • सविकल्प

प्रत्यक्ष ज्ञान का हेतु अर्थात् इंद्रिय और पदार्थोंं का संबंध छह प्रकार का है, प्रथम संयोग इस संबंध के बाद इसका क्रम यह है - 

  • E. संयुक्त समवायः
  • C. संयुक्तसमवेत समवायः
  • D. समवायः
  • A. समवेतसमवायः
  • B. विशेष्यविशेषभावः

 

अतः स्पष्ट है, E, C, D, A, B यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 2

कथनद्वयम् अधोलिखितम् - तत् एकम् अभिकथनम् (A), अपरञ्च तस्य कारणम् (R) इति-

अभिकथनम् (A) : 'यो वै एताम् एवं वेद, अपहत्य पाप्मनम्, अनन्ते स्वर्गलोके, ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति.'

कारणम् (R) : 'यतः स जानाति - तपः दमः कर्म इति प्रतिष्ठा, वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम्'

उपर्युक्त - अभिकथन - कारणमाश्रित्य समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    ​(A) एवम् (R) उभावपि सत्यम्, (R) इति उचितं कारणमस्ति (A) इत्यस्य 

  2. BOption (b)

    ​​(A) एवम् (R) उभावपि असत्यम्

  3. COption (c)

    (A) सत्यम्, (R) असत्यम् 

  4. DOption (d)

    (A) असत्यम्, (R) सत्यम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

​(A) एवम् (R) उभावपि सत्यम्, (R) इति उचितं कारणमस्ति (A) इत्यस्य 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर :

अधोलिखित दो कथन हैंं, एक अभिकथन है (A) और दूसरा उसका कारण है (R) - 

अभिकथन (A) : जो इस अंतर्ज्ञान को जानता है वह अपने पाप का उच्छेदन करके उस बृहत्तर लोक एवं अनन्त स्वर्ग में प्रतिष्ठित हो जाता है, अवश्यमेव वह प्रतिष्ठित हो जाता है।

कारणम् (R) : क्योंंकि वह जानता है, कि तप, आत्म-विजय (दम) तथा कर्म इस अंतर्ज्ञान के आधार (प्रतिष्ठा) हैं, 'वेद' इसके सब अंग हैं, सत्य इसका धाम है।

उपर्युक्त दिये हुए अभिकथन और कारण का आश्रय लेकर उचित विकल्प का चयन कीजिए।

स्पष्टीकरण :

  1. तप, आत्म-विजय (दम) तथा कर्म यहींं अंतर्ज्ञान के आधार (प्रतिष्ठा) है। इन्हेंं जानना ही अंतर्ज्ञान है।
  2. जो अंतर्ज्ञान को जानता है, वह स्वर्ग में प्रतिष्ठित हो जाता है। दूसरे शब्दोंं में स्वर्ग में प्रतिष्ठित होने के लिये अंतर्ज्ञान के आधार को जानना आवश्यक है।

(A) और (R) दोनो भी सत्य हैंं, विवेचन से प्रतीत होता है, कि (A) का (R) यह कारण है।

अतः स्पष्ट है, ​'(A) एवम् (R) उभावपि सत्यम्, (R) इति उचितं कारणमस्ति (A) इत्यस्य' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 3

अधोऽङिकतान् वैय्याकरणान् कालक्रमेण प्रदर्शयत-

A. कात्यायनः 

B. नागेशभट्टः 

C. कैय्यटः 

D. पाणिनिः 

E. भर्तृहरिः 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    D, A, E, B, C

  2. BOption (b)

    D, E, B, C, A

  3. COption (c)

    D, A, B, C, E

  4. DOption (d)

    D, E, C, B, A

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Correct answer

Answer: (a)A.

D, A, E, B, C

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : निम्नलिखित वैयाकरणीयोंं को कालक्रम से प्रदर्शित कीजिये।

कालक्रम के अनुसार वैयाकरणीयोंं की तालिका इस प्रकार है - 

वैयाकरणीग्रंथकाल
पाणिनिअष्टाध्यायी४५० ई.पूर्व
कात्यायनवार्तिककार३५० ई.पूर्व
भर्तृहरिःवाक्यपदीय५७५ से ६५०
नागेशभट्टपरिभाषेन्दुशेखर१७३० से १८१० ई.
कैय्यटप्रदीप (महाभाष्य की टीका)१८ शताब्दी

 

अतः स्पष्ट है, D, A, E, B, C यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 4

सर्वप्राचीन रचनायाः प्राथम्येन कालक्रमानुसारमुचितमुत्तरं चिनुत-

A. किरातार्जुनीयम् 

B. कुमारसंभवम् 

C. नैषधीयचरितम् 

D. रामायणम् 

E. स्वप्नवासवदत्तम् 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, C, E, D

  2. BOption (b)

    B, C, D, A, E

  3. COption (c)

    D, E, B, A, C

  4. DOption (d)

    A, B, C, D, E

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Correct answer

Answer: (c)C.

D, E, B, A, C

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : सर्वप्राचीन रचना के प्रथमता से कालक्रम के अनुसार उचित उत्तर चुनिए। 

कालक्रम के अनुसार रचनाओंं का क्रम इस प्रकार है - 

कविकवि का समयरचनाएँ
वाल्मीकि3137 ईसा पूर्वरामायणम्
भासई. प्रथम अथवा द्वितीय शतकस्वप्नवासवदत्तम्
कालिदासई. चौथा अथवा पाँचवा शतककुमारसंभवम्
भारविसातवा शतककिरातार्जुनीयम्
श्रीहर्ष1156 ई. से 1193 ई.नैषधीयचरितम्

 

अतः स्पष्ट है, D, E, B, A, C यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 5

अधोलिखितानां रामायणस्य विषयवस्तुनाम् समुचितः क्रमोऽस्ति 

A. ताटकावधः 

B. दशरथेन यज्ञानुष्ठानम् 

C. मिथिला - प्रस्थानम् 

D. रामजन्म 

E. रामद्वारा धनुर्भङ्गः

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, D, C, E

  2. BOption (b)

    A, B, C, D, E

  3. COption (c)

    B, D, A, C, E

  4. DOption (d)

    B, C, D, A, E

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Correct answer

Answer: (c)C.

B, D, A, C, E

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अधोलिखित रामायण के विषयवस्तु का समुचित क्रम क्या है?

रामायण के कांड :

इसके रचयिता महर्षि वाल्मीकि को 'आदिकवि' भी कहा जाता है। संस्कृत साहित्य परम्परा में रामायण और महाभारत को इतिहास कहा गया है और इनके रचयिता ऋषि होने से इनको आर्षमहाकाव्य भी कहा जाता है। रामायण के सात अध्याय हैं जो काण्ड के नाम से जाने जाते हैं। इसमें कुल लगभग २४,००० श्लोक हैं। रामायण के सर्ग क्रम के अनुसार इस प्रकार हैंं - 

  1. बालकाण्ड
  2. अयोध्याकाण्ड
  3. अरण्यकाण्ड
  4. किष्किन्धाकाण्ड
  5. सुन्दरकाण्ड
  6. युद्धकाण्ड
  7. उत्तरकाण्ड

रामायण के विषयवस्तु का समुचित क्रम  : 

  • B. दशरथेन यज्ञानुष्ठानम्
  • D. रामजन्मः
  • A. ताटकावधः
  • C. मिथिला - प्रस्थानम्
  • E. रामद्वारा धनुर्भङ्गः

 

अतः स्पष्ट है, B, D, A, C, E यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 6

​सांख्याचार्याणां कालक्रमो यथातथं विभावनीयः -

A. कपिलः 

B. ईश्वरकृष्णः 

C. आसुरिः 

D. पञ्चशिखः 

समुचितं विकल्पं चिनुत

  1. AOption (a)

    A, B, C, D

  2. BOption (b)

    C, A, B, D

  3. COption (c)

    A, C, D, B

  4. DOption (d)

    A, C, B, D

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Correct answer

Answer: (c)C.

A, C, D, B

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : सांख्य के आचार्योंं की कालक्रम के अनुसार योजना कीजिए। 

सांख्य की संकल्पना :

गणनार्थक "संख्या" शब्द से भी "सांख्य" शब्द की निष्पत्ति मानी जाती है। महाभारत में सांख्य के विषय में आए हुए एक श्लोक में ये दोनों ही प्रकार के भाव प्रकट किए गए हैं। वह इस प्रकार है-

  • संख्यां प्रकुर्वते चैव प्रकृतिं च प्रचक्षते। तत्त्वानि च चतुविंशद् तेन सांख्या: प्रकीर्तिता:।।
  • इसका शब्दार्थ यह है कि जो संख्या अर्थात् प्रकृति और पुरुष के विवेक ज्ञान का उपदेश करते हैं, जो प्रकृति का प्रभाव प्रतिपादन करते हैं तथा जो तत्वों की संख्या चौबीस निर्धारित करते हैं, वे सांख्य कहे जाते हैं।

Important Points

ईश्वरकृष्ण ने अपने सांख्यकारिका इस ग्रंथ में सांख्य के आचार्योंं की परंपरा इस प्रकार दी है - 

  • एतत्‌ पवित्रमग्रयं मुनिरासुरयेऽनुकम्पया प्रददौ। आसुरिरपि पञ्चशिखाय तेन च बहुधा कृतं तन्त्रम्।।
  • इससे बोध होता है, कि सांख्य के आचार्योंं की परंपरा निम्नलिखित क्रम से है  -
  1. कपिल
  2. आसुरि
  3. पंचशिख
  4. ईश्वरकृष्ण

 

अतः स्पष्ट है, A, C, D, B यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 7

बुद्धचरिते सर्गप्राथम्येन क्रमशः सर्गाणामुचितमुत्तरं चिनुत-

A. संवेग ‐ उत्पत्तिः 

B. अभिनिष्क्रमणम् 

C. स्त्री - निवारणम् 

D. तपोवन प्रवेशः 

E. अन्तःपुर विलाप

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, C, D, E

  2. BOption (b)

    A, C, B, D, E

  3. COption (c)

    B, C, D, E, A 

  4. DOption (d)

    C, D, E, A, B

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Correct answer

Answer: (b)B.

A, C, B, D, E

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : बुद्धचरित में सर्ग के प्राधान्यक्रम से उचित उत्तर चुनिए। 

बुद्धचरित के सर्ग :

इसके रचयिता अश्वघोष हैं। इसकी रचनाकाल दूसरी शताब्दी है। इसमें गौतम बुद्ध का जीवनचरित वर्णित है। इस महाकाव्य का आरम्भ बुद्ध के गर्भाधान से तथा इसकी परिणति बुद्धत्व-प्राप्ति में होती है। बुद्धचरित 28 सर्गों में था जिसमें 14 सर्गों तक बुद्ध के जन्म से बुद्धत्व-प्राप्ति तक का वर्णन है। प्रथम तेरह सर्गों के नाम इस प्रकार हैं -

  1. भगवत्प्रसूति
  2. अन्तःपुरविहार
  3. संवेगोत्पत्तिः
  4. स्त्रीनिवारण
  5. अभिनिष्क्रमण
  6. छन्दकनिवर्तनम्
  7. तपोवनप्रवेशम्
  8. अन्तःपुरविलाप
  9. कुमारान्वेषणम्
  10. श्रेणभिगमनम्
  11. कामविगर्हणम्
  12. आराडदर्शन
  13. मारविजय

 

अतः स्पष्ट है, A, C, B, D, E यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 8

मनुमते उत्तरोत्तरश्रेष्ठानि मान्यस्थानानि सन्ति-

A. बन्धुः 

B. वयः 

C. कर्म 

D. विद्या 

E. वित्तम् 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    D, A, B, E, C

  2. BOption (b)

    A, D, E, B, C

  3. COption (c)

    C, D, B, A, E

  4. DOption (d)

    E, A, B, C, D

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Correct answer

Answer: (d)D.

E, A, B, C, D

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : मनु के मत से उत्तरोत्तर श्रेष्ठ मान्यस्थान कौन कौन से हैंं?

मनुमत :

वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या भवति पञ्चमी।

एतानि मान्यस्थानानि गरीयो यद्यदुत्तरम्।। (मनुस्मृति, २.१३६)

  • अर्थ :
  • धन संपत्ति, सगे संबन्धी, आयु, किये हुए सत्कर्म, और पांचवी विद्या, ये पांच स्थान (साधन) ही मनुष्य को प्रतिष्ठा (सम्मान) दिलाने के साधन हैं। ये क्रमशः एक दूसरे से श्रेष्ठ हैं, अर्थात् धन की तुलना में संबन्धी, संबन्धी की तुलना में मनुष्य की आयु और अन्ततः विद्वत्ता ही सर्वश्रेष्ठ है।
  • स्पष्टीकरण : 
  • इस श्लोक के आधार से उत्तरोत्तर श्रेष्ठ मान्यस्थान इस प्रकार है- 
  • E. वित्तम्
  • A. बन्धुः
  • B. वयः
  • C. कर्म
  • D. विद्या

 

अतः स्पष्ट है, E, A, B, C, D यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 9

तत्पुरुषसमासस्य उदाहरणानीमानि विभक्तिक्रमेण प्रदर्शयत्-

A. धान्यार्थः 

B. राजपुरुषः 

C. सुखप्राप्तः 

D. चोरभयम् 

E. यूपदारु 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    C, A, B, D, E

  2. BOption (b)

    A, D, C, B, E

  3. COption (c)

    C, A, E, D, B

  4. DOption (d)

    A, D, B, E, C

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Correct answer

Answer: (c)C.

C, A, E, D, B

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : तत्पुरुष समास के यह उदाहरण विभक्ति के क्रम से प्रदर्शित कीजिए।

तत्पुरुष समास के उदाहरण क्रम से इस प्रकार प्रदर्शित होंगे - 

सामासिक पदसमास नामलैकिक विग्रह
सुखप्राप्तःद्वितीया तत्पुरुषसुखं प्राप्तः।
धान्यार्थःतृतीया तत्पुरुषधान्येन अर्थः।
यूपदारुचतुर्थी तत्पुरुषयूपाय दारु।
चोरभयम्पंचमी तत्पुरुषचौराद् भयम्।
राजपुरुषःषष्ठी तत्पुरुषराज्ञः पुरुषः।

 

अतः स्पष्ट है, C, A, E, D, B यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 10

​अत्र कथनद्वयं वर्तते- तत्र (A) इत्यभिकथनम्, (R) इति च तस्य कारणम् 

अभिकथनम् (A): न्याय दिशा तु न गुणगुणिनोः समानकालीनं जन्म किन्तु द्रव्यं निर्गुणमेव पश्चात् तत्समवेता गुणा उत्पद्यन्ते 

कारणम् (R) : समानकालोत्पत्तौ तु गुणगुणिनोः समानसामग्रीकत्वाद् भेदो न स्यात्, कारणभेदनियतत्वात् कार्यभेदस्य 

उपर्युक्तम् (A) इत्यभिकथनं (R) इति कारणं चाश्रित्य समुचितं विकल्पं चिनुत:

  1. AOption (a)

    (A) सत्यम् तथा (R) असत्यम् 

  2. BOption (b)

    (A)असत्यम् तथा (R) सत्यम्

  3. COption (c)

    (A) तथा (R) उभयं सत्यम् 

  4. DOption (d)

    (A) तथा (R) उभयं असत्यम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

(A) तथा (R) उभयं सत्यम् 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर :

अधोलिखित दो कथन हैंं, एक अभिकथन है (A) और दूसरा उसका कारण है (R) - 

अभिकथनम् (A) : न्याय दिशानुसार गुण और गुणी की समान काल में उत्पत्ति नहीं होती, किन्तु पहले द्रव्य निर्गुण ही उत्पन्न होता है, बाद में उसमें समवाय सम्बन्ध से रहने वाले गुण उत्पन्न होते हैं। 

कारणम् (R) : अर्थात् यदि गुण तथा गुणी (दोनों) की समान काल में उत्पत्ति होगी तो उनकी कारण सामग्री भी समान होगी, अतः उन दोनों में (यह गुण है, यह गुणी है, इस प्रकार का) भेद न होगा।

स्पष्टीकरण :

  1. क्योंकि कार्य का भेद कारण के भेद से व्याप्त है इसलिए प्रथमक्षण में निर्गुण ही घट उत्पन्न होता है। वह (रूप आदि) गुणों से पूर्वभावी है, इस प्रकार वह गुणों का समवायिकारण होता है।
  2. पहले द्रव्य उत्पन्न होता है, बाद में समवाय सम्बन्ध से रहने वाले गुण उत्पन्न होते हैं। इनकी समान काल में उत्पत्ती नहीं होती है।

 

अतः स्पष्ट है, ​'(A) तथा (R) उभयं सत्यम्' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 11

अत्र कथनद्वये (A) इत्यभिकथनम् (R) इति च कारणम् 

अभिकथनम् (A): पाणिनीय अष्टाध्यायाम् आदौ चतुर्दशसूत्रेषु वर्णोपदेशः विद्यते 

कारणम् (R): वृत्तिसमवायार्थः - अनुबन्धकरणार्थः - इष्टबुद्धर्थश्च

समुचितं विकल्पं चिनुत:

  1. AOption (a)

    (A) इति-अभिकथनम् तथा च (R) इति कारणम् उभयं सत्यम् 

  2. BOption (b)

    (A) इति अभिकथनम् तथा च (R) इति कारणम् उभयम् असत्यम्

  3. COption (c)

    (A) इति अभिकथनम् सत्यम् (R) इति कारणम् असत्यम् 

  4. DOption (d)

    (A) इति अभिकथनम् असत्यम् (R) इति कारणम् सत्यम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

(A) इति-अभिकथनम् तथा च (R) इति कारणम् उभयं सत्यम् 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर :

अधोलिखित दो कथन हैंं, एक अभिकथन है (A) और दूसरा उसका कारण है (R) - 

अभिकथनम् (A) : पाणिनीय अष्टाध्यायी में प्रारंभ के चौदाह सूत्रो में वर्णोपदेश है।

कारणम् (R) : वृत्तिसमवाय के लिये - अनुबन्ध करने के लिये - इष्टबुद्धि के लिये

ऊपर दिये हुए अभिकथन और कारण का आश्रय लेकर उचित विकल्प का चयन कीजिए।

स्पष्टीकरण :

पतंजलि के महाभाष्य में वर्णसमाम्नाय अर्थात् चौदह माहेश्वरी सूत्रोंं के निम्नलिखित प्रयोजन कहेंं हैंं -

  1. वृत्तिसमवाय - वृत्ति का अर्थ है, शास्त्र की प्रवृत्ति। समवाय का अर्थ है, वर्णोंं का क्रम रखना।
  2. अनुबन्धकरण - अनुबंध लगाने के लिये माहेश्वरी सूत्र कहेंं हैंं। इसका उपयोग प्रत्याहार बनाने के लिये होता है।
  3. इष्टबुद्धि - इष्ट वर्णोंं के बोधन के लिये वर्णोपदेश किया है।

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट होता है, कि (A) और (R) दोनोंं सत्य कथन हैंं।

अतः स्पष्ट है, '(A) इति-अभिकथनम् तथा च (R) इति कारणम् उभयं सत्यम्' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 12

कथनद्वयम् अधोलिखितम् - तत्र एकम् अभिकथनम् (A) अपरञ्च तस्य कारण (R) इति -

अभिकथनम् (A) : वितरित गुरुः प्राज्ञे विद्यां तथैव जडे, न तु खलु तयोर्ज्ञाने शक्तिं करोत्यपहन्ति वा भवति हि पुनर्भूयान् भेदः फलं प्रति तद् यथा,

कारणम् (R) : प्रभवति शुचिर्बिम्बग्राहे मणिर्न मृदादयः 

उपर्युक्तं अभिकथन - कारणमाश्रित्य समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) तथा (R) उभावपि असत्यम् 

  2. BOption (b)

    (A) तथा (R) उभावपि सत्यम्

  3. COption (c)

    (A) तथा (R) उभावपि सत्यम् (A) इत्यस्य (R) समुचितं कारणं नास्ति

  4. DOption (d)

    (A) इति सत्यं परं (R) इति असत्यम् 

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A) तथा (R) उभावपि सत्यम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर :

अधोलिखित दो कथन हैंं, एक अभिकथन है (A) और दूसरा उसका कारण है (R) - 

अभिकथनम् (A) : एक शिक्षक अपने सभी शिष्यों को समान रूप से शिक्षा देता है, चाहे वह अधिक बुद्ध��मान् हो या कम। न ही वह किसी एक की सीखने की क्षमता को बढ़ाता या घटाता है। फिर भी उनके परिणाम में अंतर होता है। जैसे -

कारणम् (R) : क्योंकि मणि ही अपने प्रकाश से सबको आलोकित करती है, मिट्टी आदि कोई अन्य वस्तु नहीं।

ऊपर दिये हुए अभिकथन और कारण का आश्रय लेकर उचित विकल्प का चयन कीजिए।

स्पष्टीकरण : 

'उत्तररामचरितम्' का एक प्रसिद्ध श्लोक है - 

वितरति गुरुः प्राज्ञे विद्यां यथैव तथा जडे

न तु खलु तयोर्ज्ञाने शक्तिं करोत्यपहन्ति वा।

भवति हि पुनर्भूयान् भेदः फलं प्रति तद्यथा

प्रभवति शुचिर्बिम्बग्राहे मणिर्न मृदादयः।। (उत्तररामचरितम् / द्वितीयोऽङ्कः - ०४)

श्लोकार्थ - गुरु तीव्र बद्धि एवं मंद बुद्धि वाले दोनों तरह के छात्रों को एक समान शिक्षा प्रदान करता है। दोनों में से किसी को न अलग से समझने की सामर्थ्य प्रदान करता है और न ही किसी को बोध-शक्ति को नष्ट ही करता है। ऐसा होने पर भी परिणाम में बहुत भिन्नता होती है, जैसे कि हीरा, स्फटिक मणि आदि सभी प्रतिबिम्ब ग्रहण करने में समर्थ होते हैं किन्तु मिट्टी आदि पदार्थ प्रतिबिम्ब धारण नहीं कर सकते।

  1. शिक्षा ग्रहण के परिणाम में अंतर होता है, इसका कारण यह है, कि कुछ छात्र मणि जैसे होतेंं हैंं और कुछ मिट्टी जैसे होतेंं हैंं।
  2. मणि ही अपने प्रकाश से सबको आलोकित करती है, मिट्टी आदि कोई अन्य वस्तु नहीं यह (A) का कारण नहीं है। किंतु दोनो भी सत्य वचन हैंं।

 

अतः स्पष्ट है, ​'(A) तथा (R) उभावपि सत्यम्'** यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

अधोलिखितं गद्य - खण्डं पठित्वा प्रश्नानां समीचीनम् उत्तरं चिनुत-

तात! चन्द्रापीड! विदितवेदितव्यस्य अधीत सर्वशास्त्रस्य ते नाल्पमप्युपहेष्टव्यमस्ति केवालश्च निसर्गत एव अभानुभेद्यमरत्नालोकच्छेद्यमप्रदीपप्रभापनेयमतिगहनं तमो यौवनप्रभवम् अपरिणामोपशमो दारुणो लक्ष्मीमदः यौवनारम्भे च प्रायः शास्त्रजलप्रक्षालननिर्मलापि कालुष्यमुपयाति बुद्धिः अनुज्झितधवलतापि सरागवे भवति यूनां दृष्टिं भवादृशा एव भवन्ति भाजनानि उपदेशानाम् अपगतमले हि मनसि स्फटिकमणाविव राजनिकरगभस्तयो विशन्ति सुखेन उपदेशगुणाः सरस्वती परिगृहीतमीर्ष्ययेव नालिङ्गति जनम् गुणवंतमपवित्रमिव न स्पृशति उदारसत्वममङ्गलमिव न बहु मन्यते इति शुकनासोपदेशं श्रुत्वा राजकुमारोऽतितरां धर्जितः

Question 13

Based on Passage: View directions & passage

राजलक्ष्मीः सरस्वतीपरिगृहीतं जनं केन कारणेन न आलिङ्गति

  1. AOption (a)

    ईर्ष्यया 

  2. BOption (b)

    क्रोधेन 

  3. COption (c)

    लोभेन 

  4. DOption (d)

    स्वार्थबुद्ध्या 

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

ईर्ष्यया 

Why this answer is correct

प्रश्न अनुवाद - राजलक्ष्मी सरस्वती के द्वारा स्वीकार किये गये पुरुषों को किस कारण से आलिङ्गन नहीं करती है ?

स्पष्टीकरण -

  • उक्त गद्य शुकनासोपदेश से उद्धृत है।
  • गद्य में उल्लेखित है - सरस्वती परिगृहीतमीर्ष्ययेव नालिङ्गति जनम् गुणवंतमपवित्रमिव न स्पृशति
  • अर्थात् राजलक्ष्मी सरस्वती के द्वारा स्वीकार किये गये विद्वान् पुरुष को मानो ईर्ष्या से आलिङ्गन नहीं करती है। गुणवान व्यक्ति को अपवित्र के समान स्पर्श नहीं करती है।

Important Points

  • गद्य से स्पष्ट है कि राजलक्ष्मी सरस्वती के द्वारा स्वीकार किये गये पुरुषों को ईर्ष्या से आलिङ्गन नहीं करती है।

अत: 'ईर्ष्यया' विकल्प सही है।

Additional Informationशब्दार्थ -

  1. परिगृहीतम् - स्वीकार किये गये
  2. जनम् - पुरुषों को
  3. ईर्ष्यया - ईर्ष्या से (जलन से)
  4. नालिङ्गति - आलिङ्गन नहीं करती

Question 14

Based on Passage: View directions & passage

यूनां बुद्धिः कदा कालुष्यमुपयाति?

  1. AOption (a)

    कुमारावस्ठायाम् 

  2. BOption (b)

    वार्धक्ये 

  3. COption (c)

    राजनीतौ 

  4. DOption (d)

    यौवनारम्भे 

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (d)D.

यौवनारम्भे 

Why this answer is correct

प्रश्न अनुवाद - युवाओं की बुद्धि कब मलिनता को प्राप्त हो जाती है ?

स्पष्टीकरण - 

  • उक्त गद्य शुकनासोपदेश से उद्धृत है।
  • गद्य में उल्लेखित है - यौवनारम्भे च प्रायः शास्त्रजलप्रक्षालननिर्मलापि कालुष्यमुपयाति बुद्धिः अनुज्झितधवलतापि सरागवे भवति यूनां दृष्टिं
  • अर्थात् और युवावस्था के प्रारम्भिक काल में अक्सर शास्त्र रूपी जल द्वारा धोने से स्वच्छ हुयी भी बुद्धि मलिनता को प्राप्त हो जाती है। युवकों की दृष्टि उज्ज्वलता को छोडे बिना भी अनुरागयुक्त हो जाती है।

Important Points

  • गद्य से स्पष्ट है कि युवाओं की बुद्धि युवावस्था के प्रारम्भिक काल में मलिनता को प्राप्त हो जाती है।

अत: 'यौवनारम्भे' विकल्प सही है।

Additional Informationशब्दार्थ -

  1. कालुष्यं - मलिनता को
  2. उपयाति - प्राप्त करती है
  3. अनुज्झितधवलतापि - स्वच्छता को छोडे बिना भी
  4. यूनां - युवकों की

Question 15

Based on Passage: View directions & passage

एष आदेशः कस्मै प्रदीयते?

  1. AOption (a)

    शुकनासाय 

  2. BOption (b)

    तारापीडाय 

  3. COption (c)

    चन्द्रापीडाय 

  4. DOption (d)

    कादम्बर्यै 

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

चन्द्रापीडाय 

Why this answer is correct

प्रश्न अनुवाद - यह उपदेश किसे दिया जाता है ?

स्पष्टीकरण - 

  • उक्त गद्य शुकनासोपदेश से उद्धृत है।
  • शुकनासोपदेश में उल्लेखित है - युवराज पद पर अभिषिक्त किये जाने वाले और कभी दर्शन के लिये आये हुए पहले से भी अत्यधिक विनम्र उस चन्द्रपीड को और अधिक नम्र बनाने की इच्छा से शुकनास ने विस्तार से कहा।
  • उक्त गद्य के प्रारम्भ में शुकनास चन्द्रापीड को उपदेश देते हुए कहता है - तात! चन्द्रापीड! विदितवेदितव्यस्य अधीत सर्वशास्त्रस्य ते नाल्पमप्युपहेष्टव्यमस्ति अर्थात् पुत्र चन्द्रापीड। जानने योग्य विषयों के ज्ञाता, सभी शास्त्रों के अध्येता तुम्हारे लिये थोडा सा भी कहने योग्य नहीं है।

Important Points

  • गद्य से स्पष्ट है कि यह उपदेश शुकनास चन्द्रापीड को देता है।

 

अत: 'चन्द्रापीडाय' विकल्प सही है।

Question 16

Based on Passage: View directions & passage

अस्मिन् गद्यखण्डे कः उपदिशति?

  1. AOption (a)

    तारपीडः 

  2. BOption (b)

    शुकनासः 

  3. COption (c)

    महाश्वेता 

  4. DOption (d)

    शुद्रकः 

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

शुकनासः 

Why this answer is correct

प्रश्न अनुवाद - इस गद्यखण्ड में कौन उपदे��� देता है ?

स्पष्टीकरण - 

  • उक्त गद्य शुकनासोपदेश से उद्धृत है।
  • शुकनासोपदेश में उल्लेखित है - युवराज पद पर अभिषिक्त किये जाने वाले और कभी दर्शन के लिये आये हुए पहले से भी अत्यधिक विनम्र उस चन्द्रपीड को और अधिक नम्र बनाने की इच्छा से शुकनास ने विस्तार से कहा।
  • गद्य में भी उल्लेखित है - इति शुकनासोपदेशं श्रुत्वा राजकुमारो अर्थात् इस शुकनास के उपदेश को सुनकर राजकुमार

Important Points

  • गद्य से स्पष्ट है कि गद्यखण्ड में शुकनास उपदेश देता है।

अत: 'शुकनासः' विकल्प सही है।

Question 17

Based on Passage: View directions & passage

उपदेशाः कस्य मनसि सुखेन प्रविशन्ति?

  1. AOption (a)

    श्रुद्धालुजनस्य मनसि 

  2. BOption (b)

    शिष्यमनसि 

  3. COption (c)

    मलरहिते मनसि 

  4. DOption (d)

    राजकुमारमनसि 

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

मलरहिते मनसि 

Why this answer is correct

प्रश्न अनुवाद - उपदेश किसके मन में सरलता से प्रवेश करते है ?

स्पष्टीकरण -

  • उक्त गद्य शुकनासोपदेश से उद्धृत है।
  • गद्य में उल्लेखित है - अपगतमले हि मनसि स्फटिकमणाविव राजनिकरगभस्तयो विशन्ति सुखेन उपदेशगुणाः।
  • अर्थात् आप जैसे व्यक्ति ही उपदेशों के पात्र योग्य होते है क्योकिं उपदेश के गुण निर्मल अन्त:करण (मलरहित) में उसी प्रकार अनायास प्रवेश करते है। जैसे - स्फटिक मणि में सूर्य की किरणें।

Important Points

  • गद्य से स्पष्ट है कि उपदेश के गुण निर्मल (मलरहित) मन में सरलता से प्रवेश करते है।

अत: "मलरहिते मनसि" विकल्प सही है।

Additional Informationशब्दार्थ -

  1. अपगतमले मनसि - निर्मल (मलरहित) मन में
  2. स्फटिकमणौ - स्फटिक मणि
  3. सुखेन - सरलता से
  4. विशन्ति - प्रवेश करते है

गद्यांश अनुवाद -

पुत्र चन्द्रापीड! जानने योग्य विषयों के ज्ञाता, सभी शास्त्रों के अध्येता तुम्हारे लिए थोडा सा भी कहने योग्य नहीं है। किन्तु युवावस्था के प्रभाव से उत्पन्न घना अन्धकार सूर्य के प्रकाश से भी दूर नहीं हो सकता, मणियों की चमक से भी दूर नहीं किया जा सकता और दीपक के प्रकाश से भी दूर नहीं हो सकता। धन से उत्पन्न अभिमान रूपी मद बहुत ही भंयकर तथा वृद्धावस्था में भी शान्त नहीं होता। और युवावस्था के प्रारम्भिक काल में अक्सर शास्त्र रूपी जल द्वारा धोने से हुयी बुद्धि मलिनता को प्राप्त हो जाती है। युवकों की दृष्टि उज्ज्वलता को छोडे बिना भी अनुरागयुक्त हो जाती है। आप जैसे व्यक्ति ही उपदेशों के पात्र होते है। क्योकिं उपदेश के गुण निर्मल अन्त:करण में उसी प्रकार अनायास प्रवेश करते है, जैसे - स्फटिक मणि में सूर्य की किरणें। राजलक्ष्मी सरस्वती के द्वारा स्वीकार किये गये विद्वान् पुरुष को मानो ईर्ष्या से आलिङ्गन नहीं करती है। गुणवान व्यक्ति को अपवित्र के समान स्पर्श नहीं करती है। उदार ह्यदय वाले व्यक्ति का अशुभ के समान आदर नहीं करती है। इस शुकनास के उपदेश को सुनकर राजकुमार बहुत दुखी हुये।

अधोलिखितं परिच्छेदं पठित्वा प्रश्नानामुत्तरं देयम्:

षट्सु वेदाङ्गेषु शिक्षा हि प्रथमम् वर्णानां यथातथम् उच्चारणं शिक्षितुमावश्यकमेतदङ्गम् येन स्वजनः श्वजनो मा भूत् नैके दोषा वर्णोच्चारणे दृश्यन्ते अतः 'शब्दोहीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशतुः स्वरतोऽपराधात्' इत्याहुराचार्याः उपलब्धानां शिक्षाग्रन्थानां संख्या शताधिका वर्तते, तेषु 40 ग्रन्थास्तु प्रायः प्रकाशिता एव आपिशलशिक्षा सर्वप्रथमं लाहौरतः प्रकाशिता पाणिनीय शिक्षाया श्लोकात्मकं चेति पाठद्वयमुपलभ्यते सूत्रात्मकपाठस्तु 'वर्णोच्चारणशिक्षा' इति नाम्ना प्रकाशिता पाणिनीशिक्षाया लघुपाठो बृहत्पाठोऽपि लभ्यते बौद्धवैयाकरणस्य चन्द्रगोमिनः चान्द्रशिक्षाऽपि सुतरां प्रतिष्ठिता

Question 18

Based on Passage: View directions & passage

​चान्द्रशिक्षायाः प्रणेता वर्तते-

  1. AOption (a)

    शैवः 

  2. BOption (b)

    प्राकृतभाषाया वैयाकरणः 

  3. COption (c)

    बौद्धवैयाकरणः 

  4. DOption (d)

    जैनवैयाकरणः 

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Correct answer

Answer: (c)C.

बौद्धवैयाकरणः 

Why this answer is correct

प्रश्न अनुवाद - चान्द्रशिक्षा के प्रणेता है ?

स्पष्टीकरण -

  • चान्द्रशिक्षा के प्रणेता बौद्ध वैयाकरण चन्द्रगोमिन् है।
  • गद्यांश में उल्लेखित है - बौद्धवैयाकरणस्य चन्द्रगोमिनः चान्द्रशिक्षाऽपि सुतरां प्रतिष्ठिता।
  • अर्थात् बौद्ध वैयाकरण चन्द्रगोमिन् का चान्द्रशिक्षा भी इसीलिये सुप्रसिद्ध है।

Important Points

  • चंद्रगोमिन्‌ प्रसिद्ध बौद्ध वैयाकरण थे।
  • ये 'चांद्र व्याकरण' के प्रवर्तक थे।
  • इनके अन्य नाम थे 'चंद्र' और 'चंद्राचार्य'।
  • वाक्य पदीय में बताया गया है कि पंतजलि को शिष्यपरंपरा में जो व्याकरण नष्टभ्रष्ट हो गया था, उसे चंद्राचार्यादि ने अनेक शाखाओं में पुन-प्रणीत किया -

य: पंतजलिशिष्येभ्यो भ्रष्टो व्याकरणागम:। 

सनीतो बहुशाखत्वं चंद्राचार्यादिभि: पुन:।। 

  • गद्यांश से स्पष्ट है कि चान्द्रशिक्षा के प्रणेता बौद्ध वैयाकरण चन्द्रगोमिन् है।

 

अत: 'बौद्धवैयाकरणः' विकल्प सही है।

Additional Information

गद्यांश अनुवाद -

छ: वेदाङ्गों में शिक्षा का ही प्रथम वर्ण का सही तौर पर उच्चारण शिक्षा प्राप्त करने के लिये आवश्यक अङ्ग है। जिससे स्वजन श्वजन न हो जाये इसके वर्णोच्चारण के दोष को देखते है। इसलिये अशुद्ध उच्चारण किया शब्द उस अर्थ को नहीं कहता, जिसके लिये प्रयोक्ता ने उसका उच्चारण किया है। वह वाणी वज्ररूप होकर यजमान का नाश कर देती है। जैसे - स्वर के अपराध से इन्द्रशत्रु शब्द। अनेक आचार्या के उपलब्ध शिक्षाग्रन्थों की संख्या सौ से अधिक है। उन पर लगभग 40 ग्रन्थ जो प्रकाशित है। आपिशलशिक्षा ही सबसे पहले लाहौर में प्रकाशित हुई और पाणिनीय शिक्षा श्लोकों में दो पाठ में पाया जाता है। ये सूत्रात्मक पाठ 'वर्णोच्चारण शिक्षा' इस नाम से प्रकाशित है। पाणिनीशिक्षा से लघुपाठ और बृहत्पाठ भी प्राप्त होता है। बौद्�� वैयाकरण चन्द्रगोमिन् का चान्द्रशिक्षा भी इसीलिये सुप्रसिद्ध है।

Question 19

Based on Passage: View directions & passage

'वर्णोच्चारणशिक्षा' इत्यस्याः प्रणेता वर्तते-

  1. AOption (a)

    आपिशलिः 

  2. BOption (b)

    इन्द्रः 

  3. COption (c)

    पाणिनिः 

  4. DOption (d)

    चन्द्रगोमी 

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

पाणिनिः 

Why this answer is correct

प्रश्न अनुवाद - 'वर्णोच्चारणशिक्षा' के प्रणेता है ?

स्पष्टीकरण -

  • 'वर्णोच्चारणशिक्षा' के प्रणेता पाणिनि है।
  • गद्यांश में भी उल्लेखित है - पाणिनीय शिक्षाया श्लोकात्मकं चेति पाठद्वयमुपलभ्यते सूत्रात्मकपाठस्तु 'वर्णोच्चारणशिक्षा' इति नाम्ना प्रकाशिता पाणिनीशिक्षाया लघुपाठो बृहत्पाठोऽपि लभ्यते।
  • पाणिनि शिक्षा के नाम से दो ग्रन्थ - श्लोकात्मक और सूत्रात्मक उपलब्ध होते है।
  • श्लोकात्मक पाणिनीय शिक्षा के दो पाठ प्रसिद्ध है - पहला लघु पाठ जिसमें 35 श्लोक है और दूसरा बृहत् पाठ जिसमें 60 श्लोक है।

Important Points

  • छ: वेदाङ्गों में शिक्षा का स्थान प्रथम है।
  • "स्वरवर्णाद्युच्चारणप्रकारो यत्र शिक्ष्यते सा शिक्षा" अर्थात् जिस शास्त्र में स्वर, वर्णादि के उच्चारण की पद्धति सिखायी जाती है, उसे शिक्षा कहते है।
  • वर्णोच्चारण का व्याकरण में बहुत महत्व है। वर्णोच्चारण से ही स्वजन और श्वजन में अन्तर स्पष्ट होता है।
  • वर्णोच्चारण ठीक न होने पर वक्ता अपनी बात को श्रोता तक पहुंचाने में असमर्थ रहता है अथवा श्रोता वक्ता के अभिप्राय को ठीक रूप से ग्रहण करने में असमर्थ रहता है।
  • उदाहरण - वक्ता कहना चाहता है - "स: मम स्वजनोऽस्ति" अर्थात् वह मेरा सम्बन्धी है। किन्तु उच्चारण करते समय 'स्वजन' के स्थान पर 'श्वजन' बोल दिया। अब वाक्य का अर्थ होगा - "स मम श्वजनोऽस्ति" अर्थात् वह मेरे कुत्ते का बच्चा है। यहां वाक्य अनर्थकारी हो गया। इसीलिये ही वर्णोच्चारण से ही स्वजन और श्वजन में अन्तर स्पष्ट होता है।
  • वाणी को शुद्ध करने वाला होने से शिक्षा शास्त्र को छह वेदांगो में प्रथम स्थान पर रखा गया है।

 

अत: 'पाणिनिः' विकल्प सही है।

Question 20

Based on Passage: View directions & passage

कति शिक्षाग्रन्थाः प्रकाशिताः सन्ति-

  1. AOption (a)

    चत्वारिंशत् 

  2. BOption (b)

    शताधिकाः 

  3. COption (c)

    त्रयः 

  4. DOption (d)

    दश 

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

चत्वारिंशत् 

Why this answer is correct

प्रश्न अनुवाद - कितने शिक्षाग्रन्थ  प्रकाशित है ?

स्पष्टीकरण -

  • गद्यांश में उल्लेखित है - उपलब्धानां शिक्षाग्रन्थानां संख्या शताधिका वर्तते, तेषु 40 ग्रन्थास्तु प्रायः प्रकाशिता
  • अर्थात् उपलब्ध शिक्षाग्रन्थों की संख्या सौ से अधिक है। उन पर लगभग 40 ग्रन्थ जो प्रकाशित है।

Important Points

  • गद्यांश से स्पष्ट है कि लगभग 40 (चत्वारिंशत्) शिक्षाग्रन्थ जो प्रकाशित है।

अतः 'चत्वारिंशत्' विकल्प सही है।

Additional Informationअन्य विकल्प -

  1. शताधिकाः - सौ से अधिक
  2. त्रयः - तीन
  3. दश - दस

Question 21

Based on Passage: View directions & passage

स्वरतोऽपराधस्य किमुदाहरणमंत्र वर्तते-  

  1. AOption (a)

    वाग्वज्रः 

  2. BOption (b)

    श्वजनः 

  3. COption (c)

    यजमानम् 

  4. DOption (d)

    इन्द्रशत्रुः 

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (d)D.

इन्द्रशत्रुः 

Why this answer is correct

प्रश्न अनुवाद - स्वर के अपराध के लिये क्या उदाहरण मन्त्र है ?

स्पष्टीकरण -

  • गद्यांश में स्वर के अपराध के लिये उदाहरण मन्त्र है -

शब्दोहीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह। 

स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशतुः स्वरतोऽपराधात्।। 

  • अर्थात् अशुद्ध उच्चारण किया शब्द उस अर्थ को नहीं कहता, जिसके लिये प्रयोक्ता ने उसका उच्चारण किया है। वह वाणी वज्ररूप होकर यजमान का नाश कर देती है। जैसे - स्वर के अपराध से इन्द्रशत्रु शब्द।

Important Points

  • गद्यांश से स्पष्ट है कि स्वर के अपराध के लिये इन्द्रशत्रु शब्द उदाहरण मन्त्र है।

अत: 'इन्द्रशत्रुः' विकल्प सही है।

Question 22

Based on Passage: View directions & passage

कस्याः शिक्षायाः लघुपाठो बृहत्पाठश्च विद्यते-

  1. AOption (a)

    चान्द्रशिक्षायाः 

  2. BOption (b)

    पाणिनीयशिक्षायाः 

  3. COption (c)

    आपिशलि शिक्षायाः 

  4. DOption (d)

    वर्णोच्चारणशिक्षायाः 

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

पाणिनीयशिक्षायाः 

Why this answer is correct

प्रश्न अनुवाद - किस शिक्षा में लघुपाठ और बृहत्पाठ है ?

स्पष्टीकरण -

  • 'पाणिनीय शिक्षा' में लघुपाठ और बृहत्पाठ है।
  • गद्यांश में भी उल्लेखित है - पाणिनीशिक्षाया लघुपाठो बृहत्पाठोऽपि लभ्यते।
  • अर्थात् पाणिनीशिक्षा से लघुपाठ और बृहत्पाठ भी प्राप्त होता है।

Important Points

  • पाणिनि शिक्षा के नाम से दो ग्रन्थ - श्लोकात्मक और सूत्रात्मक उपलब्ध होते है।
  • श्लोकात्मक पाणिनीय शिक्षा के दो पाठ प्रसिद्ध है - पहला लघु पाठ जिसमें 35 श्लोक है और दूसरा बृहत् पाठ जिसमें 60 श्लोक है।
  • गद्यांश से स्पष्ट है कि 'पाणिनीय शिक्षा' में लघुपाठ और बृहत्पाठ है।

 

अत: 'पाणिनीयशिक्षायाः' विकल्प सही है।

Question 23

कथनद्वयम् अधोलिखितम् - तत्र एकम् अभिकथनम् (A) अपरञ्च तस्य कारणम् (R) इति 

अभिकथनम् (A) : रामादिवत् वर्तितव्यं न रावणादिवत् 

कारणम् (R) : दुश्चारित्र्यम् अपकीर्तेः कारणं भवति 

उपर्युक्त - अभिकथन - कारणमाश्रित्य समुचितं विकल्पं चिनुत

  1. AOption (a)

    (A) तथा (R) उभावपि असत्यम् 

  2. BOption (b)

    (A) तथा (R) उभावपि सत्यम्, (R) इति उचितं कारणमस्ति (A) इत्यस्य

  3. COption (c)

    (A) तथा (R) उभावपि सत्यम् किन्तु (R) इति उचितं कारणं नास्ति (A) इत्यस्य

  4. DOption (d)

    (A) सत्यम्, (R) असत्यम् 

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

(A) तथा (R) उभावपि सत्यम्, (R) इति उचितं कारणमस्ति (A) इत्यस्य

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर :

अधोलिखित दो कथन हैंं, एक अभिकथन है (A) और दूसरा उसका कारण है (R) - 

अभिकथनम् (A) : रामादि लोगोंं के जैसा वर्तन करना चाहिये, रावणादि लोगोंं के जैसा नहीं

कारणम् (R) : दुष्ट चारित्र्य अपकीर्ति का कारण बनता है

उपर दिये हुए अभिकथन और कारण का आश्रय लेकर उचित विकल्प का चयन कीजिए।

स्पष्टीकरण : 

  1. यदि राम जैसे लोगोंं के समान व्यवहार किया, तो चारित्र्य शुद्ध होगा, और अपकीर्ति नहीं होगी।
  2. किंतु रावणादि लोगोंं का दुष्ट चारित्र्य होता है, इनके जैसा व्यवहार किया तो अपकीर्ति होगी। यह दुष्ट चारित्र्य ही अपकीर्ति का कारण होता है, और रावणादि लोगोंं का जैसा व्यवहार ही दुष्ट चारित्र्य है।

(A) और (R) दोनो भी सत्य हैंं, विवेचन से प्रतीत होता है, कि (A) का (R) यह कारण है।

अतः स्पष्ट है, ​'(A) एवम् (R) उभावपि सत्यम्, (R) इति उचितं कारणमस्ति (A) इत्यस्य' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 24

सांख्यकारिकायां द्विविधः सर्गः (भौतिको बौद्धिकश्च) एतन्नामाख्यो वर्तते-

A. तन्मात्राख्यः 

B. लिङ्गाख्यः 

C. सत्त्वरजस् - तमसाख्यः 

D. भावाख्यः 

समुचितं विकल्पं चिनुत

  1. AOption (a)

    A एवं C 

  2. BOption (b)

    A एवं B 

  3. COption (c)

    B एवं D 

  4. DOption (d)

    C एवं D 

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Correct answer

Answer: (c)C.

B एवं D 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : सांख्यकारिका में दो प्रकार के सर्गों के नाम क्या हैं?

सर्ग - निर्माण :

प्रकृति और पुरुष का संयोग होने से सृष्टि अर्थात् सर्ग का निर्माण होता है। सर्गोंं का प्रकार इस तरह से बताया जा सकता है - 

न विना भावैर्लिङ्गं न विना लिङ्गेन भावनिर्वृत्ति:।

लिङ्गाख्यो भावाख्यस्तस्माद् द्विविध: प्रवर्तते सर्ग:।। (सांख्यकारिका ५२) 

  • अर्थ - धर्म, अधर्म, ज्ञान, अज्ञान, वैराग्य, अवैराग्य, ऐश्वर्य, अनैश्वर्य इन आठ भावोंं के विना सूक्ष्मशरीर उत्पन्न नहीं हो सकता, और तन्मात्रा से उत्पन्न सूक्ष्मशरीर के विना भावोंं की उत्पत्ति नहीं होती, एक-दूसरे के विना दोनोंं का स्वरूप सर्वथा असंभव है। अतः लिंगाख्य और भावाख्य दोनोंं प्रकार की सृष्टि अथवा सर्ग आवश्यक है।
  • स्पष्टीकरण : प्रत्ययसर्ग ही बौद्धिक सृष्टि होती है। इसे ही भावसर्ग नाम है। भौतिक सृष्टि को लिंगसर्ग कहा गया है। इन का विभाजन इस प्रकार है -

बौद्धिक सृष्टि :

यह आठ भावोंं से परिपूर्ण होती है, जो बुद्धि के परिणाम है। यह विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि, सिद्धि के रूप में परिणत होतेंं हैं। 

भौतिक सृष्टि :

आठ प्रकार की दैव सृष्टि, पाँँच प्रकार की तिर्यक् सृष्टि, एक प्रकार की मनुष्य सृष्टि यह भौतिक सृष्टि का विवरण है।

 अतः स्पष्ट है, लिङ्गाख्यः तथा भावाख्यः यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 25

अधोलिखितेषु द्वावेतौ सिद्धान्तरुपेण बौद्धदर्शने स्विक्रियेते-

A. शब्दनित्यतावादः 

B. प्रतीत्यसमुत्पादः 

C. सप्तभङ्गीनयः 

D. क्षणिकवाद

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A एवं C 

  2. BOption (b)

    B एवं D 

  3. COption (c)

    B एवं C 

  4. DOption (d)

    C एवं D 

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Correct answer

Answer: (b)B.

B एवं D 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : इन में से कौन से दो सिद्धांत बौद्ध दर्शन में स्वीकार किये हैंं?

बौद्ध दर्शन के मूल सिद्धांत :

प्रतीत्यसमुत्पाद :

  • प्रतीत्यसमुत्पाद से सर्वप्रथम कर्मवाद की स्थापना होती है।
  • यह सिद्धांत ही बुद्ध के उपदेशों का सार एवं बौद्ध धर्म का मूल मंत्र है।
  • प्रतीत्य समुत्पाद का शाब्दिक अर्थ है-
  • किसी वस्तु के होने पर (प्रतीत्य), किसी दूसरी वस्तु की उत्पत्ति होती है। (समुत्पाद)
  • जीवन के सारे कार्य, जैसे- जन्म, मरण, दुःख, खुशी आदि कार्य एवं कारण पर निर्भर करते है।
  • यही अनीश्वरवाद है।

क्षणभंगवाद (क्षणिकवाद/अनित्यवाद)

  • संसार की प्रत्येक वस्तु की उत्पत्ति विशिष्ट परिस्थितियों के कारण होती है और उसका जीवन अस्थायी होता हैं अर्थात् यह संसार नित्य नहीं है। यह संसार निरंतर परिवर्तनशील और क्षणभंगुर हैं।
  • अनित्यवाद शाश्वत और उच्छेदवाद का मध्यमार्ग हैं।
  • क्षणिकवाद अनित्यवाद का ही विस्तार है।

अतः स्पष्ट है, प्रतीत्यसमुत्पादः तथा क्षणिकवादः यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 26

अर्थसंग्रहानुसारं देशसामान्यं स्थानम्, तच्च द्विविधं, किं तत्?

A. पाठसादेश्यम् 

B. अनुष्ठानसादेश्यम् 

C. यथासंख्यसादेश्यम् 

D. मीमांसासादेश्यम् 

समुचितं विकल्पं चिनुत

  1. AOption (a)

    A एवं B 

  2. BOption (b)

    A एवं C 

  3. COption (c)

    B एवं C 

  4. DOption (d)

    C एवं D 

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Correct answer

Answer: (a)A.

A एवं B 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अर्थसंग्रह के अनुसार देशसामान्य स्थान दो प्रकार का है, वह क्या है?

अर्थसंग्रह के अनुसार वेद के भाग :

अर्थसंग्रह में वेदोंं के पाँच विभागोंं का वर्णन किया है -

  • अपौरुषेयंं वाक्यं वेदः। स च विधिमंत्रनामधेयनिषेधार्थवादभेदात्पञ्चविधः। 
  • अर्थ - अपौरुषेय वाक्य को वेद कहते है। विधि, मंत्र, नामधेय, निषेध, और अर्थवाद यह वेद के पाँच भाग है।

**विधि :**विधि का लक्षण इस प्रकार है - 

  • अज्ञातार्थज्ञापको वेदभागो विधिः।
  • अर्थ - अज्ञात अर्थ का बोध देनेवाला वेदोंं का भाग विधि है।

विधि का विभाजन तीन प्रकार से हो सकता है - 

  • प्रधान, गुण, विशिष्ट
  • उत्पत्ति, विनियोग, प्रयोग, अधिकार
  • नियम, परिसंख्या

विनियोग :

विनियोगविधि का लक्षण इस प्रकार है - 

  • अङ्गप्रधानसम्बन्धोबोधको विधिः विनियोगविधिः।
  • अर्थ - अंग और प्रधान का संबंध दर्शानेवाला विधि विनियोगविधि है।

विनियोग विधि के छह प्रमाण है।

  • श्रुति, लिंग, वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्या।

स्थान :

स्थान प्रमाण का लक्षण इस प्रकार है - 

  • देशसामान्यं स्थानम्।
  • अर्थ : दो अथवा उस से अधिकोंं का समान देश अथवा स्थान होना, इसे देशसामान्य कहते हैंं।

इसके दो विभाग होतें हैं - 

  • पाठसादेश्य - वेदोंं में अथवा ब्राह्मणग्रंथोंं में किसी अनुवाक में एकसाथ मंत्र पठित होतेंं हैंं, तब उन मंत्रपाठोंं से दृष्टि से समान देश होता है। पाठसादेश्य के यथासंख्यपाठ और सन्निधिपाठ इस प्रकार विभाग होतेंं हैं।
  • अनुष्ठानसादेश्य - वह मंत्र अन्यत्र कहा पठित हो, फिर भी किसी अनुष्ठान में उनका एकत्र प्रयोग हो, तब अनुष्ठान की दृष्टि से उनका समान देश होता है।

अतः स्पष्ट है, पाठसादेश्यम् तथा अनुष्ठानसादेश्यम् यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Shortcut Trick : 

अतिरिक्त जानकारी :

स्थान प्रमाण को ही क्रम कहा गया है।

  • क्रम का लक्षण : तत्र क्रमो नाम विततिविशेषः पौर्यापर्यरूपो वा।
  • अर्थ : अंगोंं की व्याप्ति में कौन का अंग प्रथम होना चाहिये, इसे क्रम कहा गया है।
  • क्रम के छह प्रमाण है।
  • श्रुति, अर्थ, पाठ, स्थान, मुख्य, प्रवृत्ति।

Question 27

वेदान्तसारे चतुर्विधस्थूलशरीरेषु द्वे इमे स्तः 

A. कायजम् 

B. जरायुजम् 

C. अण्डजम् 

D. तोजयम् 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A एवं C 

  2. BOption (b)

    B एवं C 

  3. COption (c)

    A एवं D 

  4. DOption (d)

    B एवं D 

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Correct answer

Answer: (b)B.

B एवं C 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : वेदांतसार में चार प्रकार के स्थूलशरीर में इन में से दो कौन से हैंं?

वेदांतसार में स्थूलशरीर का वर्णन :

चतुर्विध शरीराणि तु जरायुज-अण्डज-स्वेदज-उद्भिज्ज-आख्यानि। (वेदांतसार २.१०५)

  • अर्थ - चार प्रकार के स्थूलशरीर होतेंं हैंं। जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज।

स्पष्टीकरण : 

  • जरायुज - माता के गर्भ से जन्म लेने वाले मनुष्य, पशु जरायुज कहलाते हैं।
  • अण्डज - अण्डों से उत्पन्न होने वाले प्राणी अण्डज होतें हैंं।
  • स्वेदज - मल, मूत्र, पसीना आदि से उत्पन्न क्षुद्र जन्तु स्वेदज कहलाते हैं।
  • उद्भिज - पृथ्वी से उत्पन्न प्राणियों को उदि्भज वर्ग में शामिल किया गया है।

​अतः स्पष्ट है, जरायुजम् तथा अण्डजम् यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 28

"अन्धं तमः प्रविशन्ति ये असम्भूतिमुपासते 

ततो भूय इव ते तमः य उ सम्भूत्यां रताः" अत्र मन्त्रे 'असम्भूति-सम्भूति' - पदयोः अर्थौ कौ?

A. विकृत��ः 

B. प्रकृतिः 

C. कार्यब्रह्म 

D. अविनाशः

  1. AOption (a)

    A एवं B 

  2. BOption (b)

    B एवं C 

  3. COption (c)

    C एवं D 

  4. DOption (d)

    A एवं D 

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Correct answer

Answer: (b)B.

B एवं C 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : "अन्धं तमः प्रविशन्ति ये असम्भूतिमुपासते। ततो भूय इव ते तमः य उ सम्भूत्यां रताः।।" इस मंत्र में 'असम्भूति-सम्भूति' इन दो पदोंं का अर्थ क्या है?

मंत्र का विवरण :

मंत्र :

"अन्धं तमः प्रविशन्ति ये असम्भूतिमुपासते।

ततो भूय इव ते तमः य उ सम्भूत्यां रताः।।**" (यजुर्वेद ४०.९)

अन्वय :

  • ये असम्भूतिमुपासते तेऽन्धन्तमः प्रविशन्ति, ये सम्भूत्यां रतास्त उ ततो भूय इव तमः प्रविशन्ति।

भावार्थ - 

  • जो लोग सकल जड़ जगत् के अनादि नित्य कारण प्रकृति को उपास्य समझते हैं, वे अविद्या को प्राप्त करके सदा दुःखी रहते हैं। और जो उस कारण प्रकृति से उत्पन्न हुए पृथिव्यादि स्थूल, कार्य-कारण रूप सूक्ष्म अनित्य संयोग से उत्पन्न कार्य जगत् को अपना इष्ट उपास्य देव मानते हैं, वे गाढ़ अविद्या को प्राप्त करके उससे अधिक घोर अंधःकार में प्रवेश कर के दुःखी रहते हैं।

स्पष्टीकरण :

  • असम्भूति का अर्थ अनादि, अनुत्पन्न, प्रकृति नामक सत्व, रज, तम गुणमय जड़ वस्तु होता है। तथा सम्भूति का अर्थ कारण से उत्पन्न हुए कार्यरूपी पृथिवी आदि भूत, पाषाण और वृक्षादि अवयव और मनुष्यादि के शरीर होता है। जो मनुष्य असम्भूति की उपासना करते हैंं, वह सदा दुःखी रहते हैं। किंतु सम्भूति की उपासना करने वाले मनुष्य अधिक दुःखी रहते हैं। अतः चिदानंदस्वरूप ब्रह्म की ही उपासना करनी चाहिये।

अतः स्पष्ट है, **'प्रकृतिः' तथा 'कार्यब्रह्म' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 29

अनैकान्तिकहेत्वाभासस्य कौ द्वौ प्रकारौ वर्तेते तर्कभाषायाम् 

A. साधारणः 

B. सत्प्रतिपक्षः 

C. असाधारणः 

D. आश्रयासिद्धः 

समुचितं विकल्पं चिनुत

  1. AOption (a)

    A एवं B 

  2. BOption (b)

    A एवं C 

  3. COption (c)

    B एवं D 

  4. DOption (d)

    C एवं D 

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Correct answer

Answer: (b)B.

A एवं C 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अनैकान्तिकहेत्वाभास के कौन से दो प्रकार तर्कभाषा में हैंं?

अनैकान्तिकहेत्वाभास :

तर्कभाषा में अनैकान्तिकहेत्वाभास दो प्रकार का बताया है - 

  • सव्यभिचारोऽनैकान्तिकः द्विविधः साधारणानैकान्तिकोऽसाधारणानैकान्तिकश्चेति। सव्यभिचार हेतु।
  • अर्थ - सव्यभिचार हेतु को अनैकान्तिक (हेत्वाभास) कहतेंं हैंं। वह दो प्रकार का है -

 साधारण अनैकान्तिक :

  • पक्ष, सपक्ष तथा विपक्ष में रहने वाला साधारण अनैकान्तिक है। जैसे -
  • शब्द नित्य है (प्रतिज्ञा), क्योंकि वह आकाश के समान प्रमेय है (हेतु)।
  • यहाँ प्रमेयत्व हेतु है जो नित्य (पक्ष या सपक्ष) एवं अनित्य (विपक्ष) दोनों में रहता है।

असाधारण अनैकान्तिक :

  • जो सपक्ष तथा विपक्ष (दोनों) से व्यावृत्त होकर केवल पक्ष में ही रहता है वह असाधारण अनैकान्तिक ( हेत्वाभास) है। जैसे-
  • भूमि नित्य है (प्रतिज्ञा), क्योंकि यह गन्ध वाली है ( हेतु)।
  • यहाँ गन्धत्व (हेतु) है, वह सपक्ष (नित्य) से तथा विपक्ष (अनित्य) से व्यावृत्त है जो केवल पृथ्वी में रहता है।

अतः स्पष्ट है, साधारणः तथा असाधारणः यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 30

अधोऽङिकतेषु भाषाविज्ञानानुसारम् अर्धस्वरौ स्तः-

A. अ 

B. य् 

C. इ 

D. व् 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A एवं D 

  2. BOption (b)

    B एवं D 

  3. COption (c)

    C एवं D 

  4. DOption (d)

    A एवं C 

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Answer: (b)B.

B एवं D 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : भाषाविज्ञान के अनुसार कौन से दो अर्धस्वर हैंं? 

भाषाविज्ञान के अनुसार अर्धस्वर :

य्, व्, र्, ल् इन्हे अंतस्थ व्यंजन कहा गया है। यह अवर्गीय व्यंजन हैंं। भाषाविज्ञान के अनुसार इन का विभाजन इस प्रकार है - 

  • य्, व् - अर्धस्वर
  • र् - लुण्ठित व्यंजन
  • ल् - पार्श्विक व्यंजन

य्, व् की उत्पत्ति इस प्रकार है - 

  • इ/ई + विजातीय स्वर = य्
  • उ/ऊ + विजातीय स्वर = व्

अतः स्पष्ट है, य् तथा व् यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 31

वाक्यपदीयानुसारं शब्दब्रह्नविषये के कथने उचिते स्तः?

A. नादैराहितबीजायाम् 

B. अनादि निधनं ब्रह्न 

C. बुद्धौ शब्दोऽवधार्यते 

D. एकमेव यदाम्नातं भिन्नं शक्तिव्यपाश्रयात् 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A एवं B 

  2. BOption (b)

    B एवं C 

  3. COption (c)

    B एवं D 

  4. DOption (d)

    C एवं D 

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Answer: (c)C.

B एवं D 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : वाक्यपदीय अनुसारं शब्दब्रह्न के विषय में कौन से दो कथन उचित हैंं?

वाक्यपदीय के अनुसार शब्दब्रह्म की संकल्पना :

वाक्यपदीय के प्रथम कांड, ब्रह्मकांड में निम्नलिखित पंक्तियाँँ आती है - 

  • अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् । विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः।।
  • एकमेव यदाम्नातं भिन्नं शक्तिव्यपाश्रयात् । अपृथक्त्वेऽपि शक्तिभ्यः पृथक्त्वेनेव वर्तते।।
  • अर्थात् शब्द रूपी ब्रह्म अनादि, विनाश रहित और अक्षर (नष्ट न होने वाला) है तथा उसकी विवर्त प्रक्रिया से ही यह जगत भासित होता है। शब्द रूपी ब्रह्म एकमेव है। भिन्न प्रकार की शक्ति होने से वह अभिन्न होकर भी भिन्न प्रतीत होता है।

अतः स्पष्ट है, अनादि निधनं ब्रह्न तथा एकमेव यदाम्नातं भिन्नं शक्तिव्यपाश्रयात् यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 32

महाभाष्यानुसारं कयोर्द्वयोरुचितः सम्बन्धोऽस्ति?

A. दुष्टः शब्दः 

B. गुणो नाम सः 

C. कर्मण्यण् 

D. विभक्तिं कुर्वन्ति 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A एवं C 

  2. BOption (b)

    B एवं D 

  3. COption (c)

    A एवं B 

  4. DOption (d)

    A एवं D 

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Answer: (d)D.

A एवं D 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : महाभाष्य के अनुसार किन दो शब्दोंं में उचित संबंध है?

महाभाष्य के अनुसार व्याकरण के गौण प्रयोजन : 

महाभाष्य के अनुसार व्याकरण के गौण प्रयोजन १३ बताये हैंं - 

  • तेऽसुराः। दुष्टः शब्दः। यदधीतम्। यस्तु प्रयुङ्क्ते। अविद्वांसः। विभक्तिं कुर्वन्ति। यो वा इमाम्। चत्वारि। उत त्वः। सक्तुमिव। सारस्वतीम्। दशभ्यां पुत्रस्या। सुदेवो असि वरुणेति। 
  • दुष्टः शब्दः।
  • स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह। स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्र शत्रुः स्वरतोऽपराधात्। । 
  • अर्थ - 'स्वर' किंवा वर्ण की दृष्टि से अशुद्ध शब्द ठीक तरह से प्रयुक्त न करने के कारण वह योग्य अर्थ का प्रतिपादन नहीं करता है। ऐसा शब्द वज्र के समान होता है ,और जिस तरह 'इन्द्रशत्रुं' शब्द ने स्वर प्रमाद से प्रत्यक्ष यजमान का ही नाश किया, उसी तरह यह शब्द भी यजमान का नाश करता है।
  • विभक्तिं कुर्वन्ति।
  • याज्ञिकाः पठन्ति- प्रयाजाः –
  • सविभक्तिकाः कार्याः इति न चान्तरेण व्याकरणं प्रयाजा सविभक्तिकाः शक्याः कर्तुम् । ।  
  • अर्थ - प्रयाजाः शब्द से वेदमन्त्र का ग्रहण किया गया है। इससे स्पष्ट होता है, कि वेद मन्त्रों से यज्ञ होना आवश्यक है। इस लिये विभक्ति आदि का ज्ञान आवश्यक है।

अतः स्पष्ट है, दुष्टः शब्दः तथा विभक्तिं कुर्वन्ति यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 33

अधोऽङिकतेषु कयिर्द्वयोः सम्बन्धोऽस्ति?

A. बभूवे 

B. नेर्विशः 

C. समवप्रविभ्यः स्थः 

D. भावकर्मणोः 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A एवं B 

  2. BOption (b)

    A एवं C 

  3. COption (c)

    B एवं C 

  4. DOption (d)

    A एवं D 

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Answer: (d)D.

A एवं D 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : इन में से कौन से दो शब्दोंं में संबंध है?

भावे और कर्मणि प्रयोग में आत्मनेपद के प्रत्ययोंं का विधान :

लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः इस सूत्र से कर्तरि, कर्मणि तथा भावे प्रयोग में लकार होतेंं है। भावकर्मणोः इस सूत्र से भावे और कर्मणि प्रयोग में आत्मनेपद के प्रत्यय होतेंं हैंं। उदाहरण - 

  • कर्मणि प्रयोग - रामेण विद्यालयः गम्यमानः अस्ति ।
  • यहाँँ गम् - धातु को आत्मनेपद का 'मान' प्रत्यय लगता है।
  • भावे प्रयोग - वृक्षेण पत्यते ।
  • यहाँँ पत् - धातु को आत्मनेपद का 'ते' प्रत्यय लगता है।
  • इस प्रकार भू-भव् धातु का कर्मणि लिट् लकार (परोक्ष भूतकाल) का रूप बभूवे होता है।

​​तङानावात्मनेपदम् इस सूत्र से  त-आताम्-झ-थास्-आथाम्-ध्वम्-इड्-वहि-महिङ् तथा शानच्-कानच् इन प्रत्ययोंं को 'आत्मनेपद' संज्ञा होती है।

अतः स्पष्ट है, बभूवे तथा भावकर्मणोः यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 34

अधस्तनेषु कयोर्द्वयोः सम्बन्धः?

A. पतञ्जलिः महाभाष्यकारः 

B. कालिदासः 

C. गोनर्दीयः 

D. शबरस्वामी 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A एवं C 

  2. BOption (b)

    B एवं C 

  3. COption (c)

    C एवं D 

  4. DOption (d)

    B एवं D 

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Answer: (a)A.

A एवं C 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : इन में से कौन से दो शब्दोंं में संबंध है?

महाभाष्यकार भगवान पतंजलि :

पतंजलि प्राचीन भारत के एक मुनि थे जिन्हे संस्कृत के अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों का रचयिता माना जाता है। इनमें से योगसूत्र उनकी महानतम रचना है जो योगदर्शन का मूलग्रन्थ है। भारतीय साहित्य में पतंजलि द्वारा रचित ३ मुख्य ग्रन्थ मिलते हैं। योगसूत्र, अष्टाध्यायी पर भाष्य और आयुर्वेद पर ग्रन्थ। भगवान पतंजलि को इन नामोंं से जाना जाता है - 

  • गोनर्दीयः - गोनर्द पाली ग्रंथ 'सुत्तनिपात' के अनुसार विदिशा तथा उज्जयिनी के मार्ग के बीच में स्थित एक नगर था। इस नगर को शुंग काल के उद्भट विद्वान् पंतजलि का जन्म स्थान माना जाता है। इसलिये गोनर्दीयः यह पतंजलि का संबोधन है।
  • गोणिकापुत्रः - माता का नाम गोणिका होने से यह नाम है।
  • नागनाथः, अहिपति, फणि, फणिभृत्, शेषः, शेषराजः, शेषाहिः - शेषनाग का अवतार होने से यह नाम है।
  • चूर्णिकारः - चूर्णिनीयभाष्य के कर्ता होने से यह नाम है।
  • पदकारः - महाभाष्य का कर्ता होने से यह नाम है।

​अतः स्पष्ट है, पतञ्जलिः महाभाष्यकारः तथा गोनर्दीयः यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 35

एतद् नाटकद्वयं महाकवि भवभूति विरचितं नास्ति

A. विक्रमोर्वशीयम् 

B. उत्तररामचरितम् 

C. मृच्छकटिकम् 

D. मालतीमाधवम् 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A एवं D 

  2. BOption (b)

    A एवं B 

  3. COption (c)

    B एवं C 

  4. DOption (d)

    A एवं C 

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Correct answer

Answer: (d)D.

A एवं C 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : कौन से दो नाटक भवभूतिविरचित नहीं है?

भवभूति की रचनाएँँ :

भवभूति की यह तीन कृतियाँ मानी जाती है - 

  • उत्तररामचरितम् - 
  • उत्तररामचरितम् यह करुणरस प्रधान ७ अंकोंं का नाटक है। इसमें रामराज्यमिषेक के पश्चात् जीवन का लोकोत्तर चरित वर्णित है जो महावीरचरित का ही उत्तर भाग माना जाता है। जनापवाद के कारण राम न चाहते हुए भी सीता का परित्याग कर देते हैं। सीतात्याग के बाद विरही राम की दशा का तृतीय अंक में करुण चित्र प्रस्तुत किया गया है, जो काव्य की दृष्टि से इस नाटक का आत्मा है। भवभूति ने इस दृश्यकाव्य में दांपत्य प्रणय के आदर्श रूप को अंकित किया है।
  • महावीरचरितम् -
  • इस नाटक में राम के पूर्वार्ध जीवन का वर्णन है। यह वीररस प्रधान नाटक है, जिस में ६ अंक है।
  • मालतीमाधवम् - 
  • ​यह १० अंकों का प्रकरण है जिसमें मालती और माधव की कल्पनाप्रसूत प्रेमकथा है। युवावस्था के उन्मादक प्रेम का इसमें उत्कृष्ट वर्णन है। इसमें स्थान स्थान पर प्रकृति का विशेष वर्णनचित्र प्राप्त होता है। मालतीमाधव की पुरातन प्रति में यह पंक्तियाँँ प्राप्त होती है -
  • 'भट्ट श्री कुमारिल शिष्येण विरचितमिदंं प्रकरणम्‌'
  • 'भट्ट श्री कुमारिल प्रसादात्प्राप्त वाग्वैभवस्य उम्बेकाचार्यस्येयं कृति'
  • इस उल्लेख से ज्ञात होता है कि श्रीकंठ अर्थात् भवभूति के गुरु कुमारिल थे जिनका 'ज्ञाननिधि' भी नाम था। इस से कवि भवभूति की अधिक जानकारी प्राप्त होती है, जो मालतीमाधवम् का विशेष योगदान है।

 

अतः स्पष्ट है, विक्रमोर्वशीयम् तथा मृच्छकटिकम् यह इस भवभूतिविरचित नाटक नही है।

Question 36

एतौ काव्यशास्त्रप्रणेतारौ आचार्यौ स्तः-

A. वाल्मीकिः 

B. भामहः 

C. क्षेमेन्द्रः 

D. कालिदासः 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A एवं B 

  2. BOption (b)

    B एवं C 

  3. COption (c)

    B एवं D 

  4. DOption (d)

    A एवं C 

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Correct answer

Answer: (b)B.

B एवं C 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : काव्यशास्त्र के प्रणीत दो आचार्य कौन से है?

काव्यशास्त्र के सिद्धांत :

काव्यशास्त्र के प्रमुख सिद्धांत और उन के प्रवर्तक आचार्य इस प्रकार है - 

  • रस संप्रदाय :
  • रस संप्रदाय के के मुख्य आचार्य भरत मुनि हैं (द्वितीय शताब्दी) जिन्होंने नाट्यरस का ही मुख्यत: विश्लेषण किया और उस विवरण को अवान्तर आचार्यों ने काव्यरस के लिए भी प्रामाणिक माना।
  • अलंकार संप्रदाय :
  • अलंकार संप्रदाय के प्रमुख आचार्य भामह (छठी शताब्दी का पूर्वार्ध), दंडी (सातवीं शताब्दी), उद्भट (आठवीं शताब्दी) तथा रुद्रट (नवीं शताब्दी का पूर्वार्ध) हैं। इस मत में अलंकार ही काव्य की आत्मा माना जाता है। इस शास्त्र के इतिहास में यही संप्रदाय प्राचीनतम तथा व्यापक प्रभावपूर्ण अंगीकृत किया जाता है।
  • रीति संप्रदाय :
  • रीति संप्रदाय के प्रमुख आचार्य वामन (अष्टम शताब्दी का उत्तरार्ध) हैं जिन्होंने अपने "काव्यालंकारसूत्र" में रीति को स्पष्ट शब्दों में काव्य की आत्मा माना है (रीतिरात्मा काव्यस्य)। दण्डी ने भी रीति के उभय प्रकार वैदर्भी तथा गौड़ी की अपने "काव्यादर्श" में बड़ी मार्मिक समीक्षा की थी, परन्तु उनकी दृष्टि में काव्य में अलंकार की ही प्रमुखता रहती है।
  • वक्रोक्ति संप्रदाय : 
  • वक्रोक्ति संप्रदाय की उद्भावना का श्रेय आचार्य कुन्तक को (१० वीं शताब्दी का उत्तरार्ध) है जिन्होंने अपने "वक्रोक्तिजीवित" में "वक्रोक्ति" को काव्य की आत्मा (जीवित) स्वीकार किया है।
  • ध्वनि संप्रदाय :
  • ध्वनि संप्रदाय का प्रवर्तन आनन्दवर्धन (नवम शताब्दी का उत्तरार्ध) ने अपने युगान्तरकारी ग्रंथ "ध्वन्यालोक" में किया तथा इसका प्रतिष्ठापन अभिनव गुप्त (१०वीं शताब्दी) ने ध्वन्यालोक की लोचन टीका में किया। मम्मट (11 वीं शताब्दी का उत्तरार्ध), रुय्यक (12 वीं शताब्दी का पूर्वार्ध), हेमचन्द्र (12 वीं शताब्दी का उत्तरार्ध), पीयूषवर्ष जयदेव (13वीं शताब्दी का उत्तरार्ध), विश्वनाथ कविराज (14 वीं शताब्दी का पूर्वार्ध), पंडितराज जगन्नाथ (17 वीं शताब्दी का मध्यकाल) इसी संप्रदाय के प्रतिष्ठित आचार्य हैं।
  • औचित्य संप्रदाय :
  • औचित्य संप्रदाय के प्रतिष्ठाता क्षेमेन्द्र (११ वीं शताब्दी का मध्यकाल) ने भरत, आनन्दवर्धन आदि प्राचीन आचार्यों के मत को ग्रहण कर काव्य में औचित्य तत्त्व को प्रमुख तत्त्व अंगीकार किया तथा इसे स्वतंत्र संप्रदाय के रूप में प्रतिष्ठित किया। अलंकारशास्त्र इस प्रकार लगभग दो सहस्र वर्षों से काव्यतत्वों की समीक्षा करता आ रहा है।

आचार्य भामह अलंकार संप्रदाय के प्रमुख आचार्य है तथा आचार्य क्षेमेन्द्र औचित्य संप्रदाय के प्रतिष्ठाता है। 

अतः स्पष्ट है, भामहः और क्षेमेन्द्रः यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 37

एते महाकविकालिदासप्रणीते महाकाव्ये स्तः 

A. रघुवंशम् 

B. मेघदूतम् 

C. अभिज्ञान शाकुन्तलम् 

D. कुमार संभवम् 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A एवं B 

  2. BOption (b)

    B एवं D 

  3. COption (c)

    A एवं D 

  4. DOption (d)

    B एवं C 

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Correct answer

Answer: (c)C.

A एवं D 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : महाकवि कालिदासप्रणीत महाकाव्य कौन से है?

 संस्कृत साहित्य के महाकाव्य :

संस्कृत साहित्य में पंचमहाकाव्य प्रसिद्ध है। इन में से कालिदास के महाकाव्य को छोडकर शेष किरातार्जुनीयम्, नैषधीयचरितम् और शिशुपालवधम् की गणना बृहत्त्रयी में होती है। महाकाव्योंं का विवरण इस प्रकार है -   

महाकाव्यरचनाकारसर्गसंख्याविषय
रघुवंशम्कालिदास१९रघु के कुल में उत्पन्न २९ राजाओं का इक्कीस प्रकार के छन्दों का प्रयोग करते हुए वर्णन
कुमारसंभवम्कालिदास१७शिव पार्वती का विवाह और कुमार कार्तिकेय के जन्म पर आधारित
किरातार्जुनीयम्भारवि१८अर्जुन की शंकर से पाशुपतास्त्र प्राप्ति से संबंधित
नैषधीयचरितम्हर्ष२२महाभारत के नलोपाख्यान पर आधारित
शिशुपालवधम्माघ२०कृष्ण द्वारा शिशुपाल के वध की कथा का वर्णन

कालिदास की सप्तकलाकृतियाँ

काव्यकाव्यप्रकारविभागविषय
रघुवंशम्महाकाव्य१९ सर्गरघु के कुल में उत्पन्न २९ राजाओं का इक्कीस प्रकार के छन्दों का प्रयोग करते हुए वर्णन
कुमारसंभवम्महाकाव्य१७ सर्गशिव पार्वती का विवाह और कुमार कार्तिकेय के जन्म पर आधारित
अभिज्ञानशाकुन्तलम्नाटक७ अंकराजा दुष्यन्त तथा शकुन्तला के प्रणय, विवाह, विरह, प्रत्याख्यान तथा पुनर्मिलन की कथा
मालविकाग्निमित्रम्नाटक५ अंकमालवदेश की राजकुमारी मालविका तथा विदिशा के राजा अग्निमित्र का प्रेम और उनके विवाह का वर्णन
विक्रमोर्वशीयम्नाटक५ अंकराजा पुरुरवा तथा उर्वशी का प्रेम और उनके विवाह की कथा
मेघदूतम्खंडकाव्य२ खंडयक्ष द्वारा अपनी पत्नी तक मेघ द्वारा संदेश पहुँचाने का वर्णन
ऋतुसंहारम्खंडकाव्य६ सर्गग्रीष्म से आरंभ कर वसंत तक की छह ऋतुओं का सुंदर प्रकृतिचित्रण

अतः स्पष्ट है, रघुवंशम् तथा कुमारसंभवम् इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 38

एतयोः अलंकारयोः उपमान-उपमेयौ भवतः 

A. रूपकम् 

B. विभावना 

C. उत्प्रेक्षा 

D.विशेषोक्तिः 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A एवं C 

  2. BOption (b)

    A एवं B 

  3. COption (c)

    A एवं D 

  4. DOption (d)

    B एवं C 

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Correct answer

Answer: (a)A.

A एवं C 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : कौन से दो अलंकारोंं में उपमान-उपमेय होता है?

रूपक अलंकार :

रूपक अलंकार का विवरण इस प्रकार है - 

  • लक्षण : 
  • तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः। 
  • अर्थ - जब रूप-गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय पर उपमान का भेदरहित आरोप होता है तो उसे रूपक अलंकार कहते हैं। रूपक अलंकार में उपमेय और उपमान में भिन्नता नहीं रहती।
  • उदाहरण :
  • अनलङ्कृतशरीरोऽपि चन्द्रमुख आनन्दयति मम हृदयम्।
  • स्पष्टीकरण - इस वाक्य में प्रयुक्त 'चन्द्रमुख' शब्द में मुख पर चन्द्रमा का आरोप होने से रूपक अलंकार है। प्रस्तुत पुस्तक के तृतीय पाठ की अधोलिखित पंक्ति में रूपक अलङ्कार है-
  • अन्य उदाहरण : 
  • ​जात ! पश्या��ि ते मुखपुण्डरीकम्। 
  • स्पष्टीकरण - यहाँ 'मुखपुण्डरीक' शब्द में मुख पर पुण्डरीक (कमल) का आरोप होने से रूपक अलंकार है।

उत्प्रेक्षा अलंकार :

उत्प्रेक्षा अलंकार का विवरण इस प्रकार है - 

  • लक्षण :
  • भवेत् सम्भावनोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य परात्मना। 
  • अर्थ - उपमान के द्वारा प्रकृत (उपमेय) की सम्भावना ही उत्प्रेक्षा अलङ्कार है।
  • उदाहरण :
  • पतितैः पतमानैश्च पादपस्थैश्च मारुतः। कुसुमैः पश्य सौमित्रे ! क्रीडन्निव समन्ततः।।
  • स्पष्टीकरण - यहाँ पर वायु के द्वारा पुष्पों के साथ की जाने वाली क्रीडा की सम्भावना की गई है। इसलिये उत्प्रेक्षा अलंकार है।

उत्प्रेक्षावाचक शब्द :

उत्प्रेक्षावाचक शब्द हैं -

  • मन्ये, शङ्के, ध्रुवम्, प्राय:, नूनम्, इव आदि।
  • इनमें इव का प्रयोग उपमा में भी होता है। अन्तर यह है कि इव शब्द जब उत्प्रेक्षा का वाचक होता है तब क्रिया के साथ प्रयुक्त होता है और जब उपमा का वाचक होता है तब संज्ञा के साथ।

अतः स्पष्ट है, रूपकम् तथा उत्प्रेक्षा यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 39

अस्मिन् श्लोके अलंकार - छन्दसोः स्थितिरियम् वर्त्तते 'श्रियः कुरुणामधिपस्य पालनीं, प्रजासु वृत्तिं यमयुङ्क्त वेदितुम् स वर्णिलिङ्गी विदितः समाययौ युधिष्ठिरं द्वैतवने वनेचरः' 

A. उपमा 

B. वृत्त्यनुप्रासः 

C. मालिनि 

D. वंशस्थम् 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A एवं C 

  2. BOption (b)

    B एवं D 

  3. COption (c)

    C एवं D 

  4. DOption (d)

    A एवं B 

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Answer: (b)B.

B एवं D 

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​प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 

श्रियः कुरुणामधिपस्य पालनीं, प्रजासु वृत्तिं यमयुङ्क्त वेदितुम्। स वर्णिलिङ्गी विदितः समाययौ युधिष्ठिरं द्वैतवने वनेचरः।। 

इस श्लोक में अलंकार और छंद की स्थिति क्या है?

प्रस्तुत श्लोक भारवि विरचित किरातार्जुनीयम् के प्रथम सर्ग का प्रथम श्लोक है। किरातार्जुनीयम् के प्रथम सर्ग के ४४ श्लोक वंशस्थ वृत्त में है। महाकाव्योंं के प्रसिद्ध टीकाकार आचार्य मल्लिनाथ इस श्लोक में  वृत्त्यनुप्रास अलंकार मानते हैंं।

वंशस्थ वृत्त :

लक्षण -

  • जतौतुवंशस्थमुदीरितंजरौ।

स्पष्टीकरण :

  • इस प्रत्येक चरण में १२ वर्ण होते हैं । एवं क्रमशः ज त ज र गण होते है।

उदाहरण :

गजाननं भूतगणाधिसेवितं,

कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्।

उमासुतं शोकविनाशकारकम्

नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्।।

अनुप्रास अलंकार :

अनुप्रास अलंकार का लक्षण -

  • "अनुप्रासः शब्दसाम्यं वैषम्येऽपि स्वरस्य यत्।"

स्पष्टीकरण :

  • स्वर की विषमता होने पर भी शब्दसाम्य (वर्ण या वर्णसमूह की आवृत्ति) को अनुप्रास अलंकार कहते है।

अनुप्रास अलंकार के भेद :

  • छेकानुप्रास अलंकार - एक या अनेक वर्णों की केवल एक बार आवृत्ति।
  • वृत्यानुप्रास अलंकार - एक या अनेक वर्णों की अनेक बार आवृत्ति।
  • लाटानुप्रास अलंकार - एक शब्द और अर्थ की आवृत्ति। लाट शब्द शब्दसमूह दर्शाता है।
  • अन्त्यानुप्रास अलंकार - पंक्तियोंं के अंत में समान अक्षर अथवा वर्ण होता है।
  • श्रुत्यानुप्रास - एक ही वर्ग के अक्षर की आवृत्ति।

अतः स्पष्ट है, वृत्त्यनुप्रासः तथा वंशस्थम् यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 40

याज्ञवल्क्यस्मृतेः व्यवहाराध्यायस्य प्रकरणे स्तः 

A. उपनिधिप्रकरणम् 

B. उपोद्धातप्रकरणम् 

C. साहसप्रकरणम् 

D. स्नातकधर्मप्रकरणम् 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A एवं B 

  2. BOption (b)

    B एवं C 

  3. COption (c)

    A एवं C 

  4. DOption (d)

    C एवं D 

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Answer: (c)C.

A एवं C 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : याज्ञवल्क्यस्मृति के व्यवहाराध्याय के कौन से दो प्रकरण हैंं?

याज्ञवल्क्य स्मृति :

याज्ञवल्क्य स्मृति में १००३ श्लोक हैं। इसपर विरचित मिताक्षरा टीका हिंदू धर्मशास्त्र के विषय में भारतीय न्यायालयों में प्रमाण मानी जाती रही है। याज्ञवल्क्य स्मृति और कौटिलीय अर्थशास्त्र में विशेष साम्य पाया जाता है। इसी स्मृति में सर्वप्रथम स्त्रियोंं के संपत्ती के अधिकार का विधान किया गया है।

याज्ञवल्क्य स्मृति की रचना :

याज्ञवल्क्य स्मृति में तीन कांड (अध्याय) हैं-

  • आचारकाण्ड -
  • इसमें तेरह प्रकरण हैं।
  • उपोद्घात-प्रकरणं, ब्रह्मचारिप्रकरणं, विवाह-प्रकरणं, वर्णजातिविवेक-प्रकरणं, गृहस्थ-प्रकरणम्, स्नातवह-प्रकरणम्, भक्ष्याभक्ष्य-प्रकरणम्, द्रव्यशुद्धि प्रकरणम्, दान-प्रकरणम्, श्राद्ध्-प्रकरणम्, गणपति कल्पप्रकरणम्, ग्रहशान्ति-प्रकरणम्, राजधर्म-प्रकरणम्
  • व्यवहारकाण्ड -
  • इसमें पचीस प्रकरण हैं।
  • व्यवहाराध्याये साधाराव्यवहारमातृका, ऋणादानो-पनिधि-साक्षी-लेख्य-दिव्य-दायविभाग-सीमाविवाद-स्वामिपालविवाद-अस्वामिविक्रय-दत्ताप्रदानिक क्रीतानुशया-अभ्युपेत्याशुश्रूषा-संविदव्यतिक्रम्-वेतनादानद्यूत समाह्वय -वाक् पारुष्य-दण्डपारुष्य-साहसविक्रीयासम्प्रदानसम्भूय समुत्थान-स्तेय-स्त्रीसंग्रहण-प्रकरण
  • प्रायश्चितकाण्ड -
  • इसमें छह प्रकरण हैं।
  • शौचप्रकरणम्, आपद्धर्मप्रकरणम्, वानप्रस्थप्रकरणम्, यति-धर्मप्रकरणम्, प्रायश्चित्त-प्रकरणम्, प्रकीर्ण-प्रयश्चित्तानि

अतः स्पष्ट है,  उपनिधिप्रकरणम् तथा साहसप्रकरणम् यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 41

कौटिलीयमते धर्मोपधशुद्धान् अमात्यान् स्थापयेत् 

A. धर्मस्थानीयेषु 

B. सन्निधातृनिचयकर्मसु 

C. कण्टकशोधनेषु 

D. ब्राह्यभ्यन्तरविहाररक्षासु 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A एवं B 

  2. BOption (b)

    B एवं C 

  3. COption (c)

    A एवं C 

  4. DOption (d)

    A एवं D 

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Correct answer

Answer: (c)C.

A एवं C 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : कौटिलीय मत के अनुसार धार्मिक उपायोंं के द्वारा कहाँँ दो अमात्योंं की स्थापना करनी चाहिये?

कौटिलीय अर्थशास्त्र : 

कौटिलीय अर्थशास्त्र प्राचीन भारतीय राजनीति का प्रसिद्ध ग्रंथ है, जिसके रचनाकर विख्यात अर्थशास्त्रज्ञ आचार्य चाणक्य हैंं। इस ग्रंथ का स्वरूप इस प्रकार है - 

  • कौटिलीय अर्थशास्त्र की शैली उपदेशात्मक और सलाहात्मक है।
  • इस में न केवल धर्म, अर्थ और काम का प्रणयन और पालन के बारे में कहा है, पर अधर्म, अनर्थ तथा अवांछनीय के शमन का भी विधान किया है।
  • आचार्य चाणक्य ने चंद्रगुप्त के प्रशासकीय उपयोग के लिए इस ग्रंथ की रचना की थी।
  • कौटिलीय अर्थशास्त्र में १५ अधिकरण, १५० अध्याय, १८० उपविभाग तथा ६००० श्लोक हैंं।
  • प्राचीन अर्थशास्त्रज्ञोंं का भी नामनिर्देश इस ग्रंथ में आता है।

कौटिलीय अर्थशास्त्र में अमात्य विधान :

कौटिल्य का कहना है - 

  • अमात्यों का परीक्षण धर्म, अर्थ, काम और भय के विषय में अच्छे ढंग से करने पर यदि वे ईमानदार और शुद्ध चरित्रवाले सिद्ध हों, तब उनको नियुक्त करना चाहिए; परंतु मंत्रियों के विषय में उनका आग्रह है कि जो व्यक्ति समस्त परीक्षणों के द्वारा परीक्षित होने पर राज्यभक्त तथा विशुद्धशय प्रमाणित किया जाए, वही मंत्री के पद के लिए योग्य समझा जाता है। (अर्थशास्त्र १.१०)
  • कौटिलीय अर्थशास्त्र में धार्मिक उपायोंं के द्वारा दो जगहोंं पर अमात्योंं की नियुक्ती होनी चाहिये।
  • ​​धर्मास्थानीय न्यायालय - इसके अंतर्गत सामान्य समस्याओंं का निराकरण किया जाता था।
  • कंटकशोधन न्यायालय - इसके अंतर्गत अपराध संबंधी समस्याओंं का निराकरण होता था।

​अतः स्पष्ट है, धर्मस्थानीयेषु तथा कण्टकशोधनेषु यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 42

अधस्तनेषु के द्वे शैवविषयक पुराणे स्तः 

A. भागवतपुराणम् 

B. मत्स्यपुराणम् 

C. गरुडपुराणम् 

D. ब्रह्माण्डपुराणम् 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A एवं B 

  2. BOption (b)

    B एवं D 

  3. COption (c)

    B एवं C 

  4. DOption (d)

    A एवं D 

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Correct answer

Answer: (b)B.

B एवं D 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : निम्नलिखित पुराणोंं से कौन से दो शैवविषयक पुराण हैंं?

पुराण ग्रंथोंं का परिचय :

पुराण और इतिहास इनका महत्व वेदोंं के समान होता था, इसके यह प्रमाण हैंं - 

  • अथर्ववेद के अनुसार -
  • "ऋच: सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह।" (११.७.२)
  • अर्थात् पुराणों का आविर्भाव ऋक्, साम, यजुस् औद छन्द के साथ ही हुआ था।
  • शतपथ ब्राह्मण (१४.३.३.१३) में तो पुराणसाहित्य को वेद ही कहा गया है।
  • छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार' - 
  • "इतिहास पुराणं पञ्चमंं वेदानांवेदम्।" (७.१.२)
  • पुराण पंचम और वेदोंं का वेद है।
  • बृहदारण्यकोपनिषद् तथा महाभारत में कहा गया है कि- 
  • "इतिहास पुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत्।"**
  • अर्थात् वेद का अर्थविस्तार पुराण के द्वारा करना चाहिये।

पुराण के लक्षण :

अमरकोष आदि प्राचीन कोशों में पुराण के पाँच लक्षण माने गये हैं : सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (प्रलय, पुनर्जन्म), वंश (देवता व ऋषि सूचियां), मन्वन्तर (चौदह मनु के काल), और वंशानुचरित (सूर्य चन्द्रादि वंशीय चरित)।

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।

वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम्।।

  • सर्ग - पंचमहाभूत, इन्द्रियगण, बुद्धि आदि तत्त्वों की उत्पत्ति का वर्णन,
  • प्रतिसर्ग - ब्रह्मादिस्थावरान्त संपूर्ण चराचर जगत् के निर्माण का वर्णन,
  • वंश - सूर्यचन्द्रादि वंशों का वर्णन,
  • मन्वन्तर - मनु, मनुपुत्र, देव, सप्तर्षि, इन्द्र और भगवान् के अवतारों का वर्णन,
  • वंशानुचरित - प्रति वंश के प्रसिद्ध पुरुषों का वर्णन।

पुराणोंं की संख्या :

पुराणों की संख्या प्राचीन काल से अठारह मानी गयी है। देवीभागवत में नाम के आरंभिक अक्षर के निर्देशानुसार १८ पुराणों की गणना इस प्रकार की गयी हैं:

​​मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम्।

​​अनापलिंगकूस्कानि पुराणानि पृथक्पृथक्।।

  • म-२ 
  • मार्कण्डेय पुराण, मत्स्य पुराण
  • भ-२
  • भागवत पुराण -- (भिन्न मत से - देवीभागवत पुराण), भविष्य पुराण
  • ब्र-३
  • ब्रह्म पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण
  • व-४
  • वराह पुराण, वायु पुराण (भिन्न मत से - शिव पुराण), विष्णु पुराण (उत्तर भाग - विष्णुधर्मोत्तर), वामन पुराण
  • अ-१
  • अग्नि पुराण
  • ना-१
  • नारद पुराण
  • प-१
  • पद्म पुराण
  • लिं-१
  • लिङ्ग पुराण
  • ग-१
  • गरुड पुराण
  • कू-१
  • कूर्म पुराण
  • स्क-१
  • स्कन्द पुराण​

पुरा���ोंं का गुण के अनुसार विभाजन :

​पद्मपुराण तथा भविष्यपुराण के अनुसार पुराणोंं के सात्विक, राजसी और तामसी इन प्रकारोंं में भेद किये हैंं। यह विभाजन इस प्रकार है - 

सात्विक पुराण (वैष्णव पुराण)राजसी पुराण (ब्राह्म पुराण)तामसी पुराण (शैव पुराण)
विष्णु पुराणब्रह्मांड पुराणमत्स्य पुराण
नारद पुराणब्रह्मवैवर्त पुराणलिंग पुराण
भागवत पुराणमार्कंडेय पुराणकूर्म पुराण
गरुड पुराणभविष्य पुराणशिव पुराण
पद्म पुराणवामन पुराणस्कंद पुराण
वराह पुराणब्रह्म पुराणअग्नि पुराण

 

Confusion Points

ब्रह्मांड पुराण में शिवचरित्र आने के कारण इसे शैव पुराण भी माना गया है। 

अतः स्पष्ट है, मत्स्यपुराणम् तथा ब्रह्माण्डपुराणम् यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 43

किष्किन्धाकाण्डे कौ विषयौ वर्णितौ स्तः 

A. अशोकवनिका - ध्वंसनम् 

B. सीतान्वेषणम् 

C. विभीषेणन दूतवधनिषेधः 

D. सम्पाति कथा 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A एवं B 

  2. BOption (b)

    B एवं C 

  3. COption (c)

    B एवं D 

  4. DOption (d)

    C एवं D 

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Answer: (c)C.

B एवं D 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किष्किन्धाकाण्ड में कौन से दो विषय वर्णित हैंं?

रामायण की रचना : 

रामायण में सात काण्ड हैं -

  • बालकाण्ड, अयोध्यकाण्ड, अरण्यकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, लंकाकाण्ड और उत्तरकाण्ड।

इस में २४,००० श्लोक है, अनुष्टुप् छंद में रचना है और रामायण का प्रमुख रस करुण रस माना जाता है।

रामायण की कांड के अनुसार सर्ग संख्या इस प्रकार है - 

कांडसर्गसंख्या
बालकाण्ड७७ सर्ग
अयोध्यकाण्ड११९ सर्ग
अरण्यकाण्ड७५ सर्ग
सुन्दरकाण्ड,६७ सर्ग
किष्किन्धाकाण्ड६८ सर्ग
लंकाकाण्ड१२८ सर्ग
उत्तरकाण्ड१११ सर्ग

किष्किंधाकांड :

रामायण के किष्किन्धाकाण्ड में इस प्रकार विषय आतेंं हैंं - 

  • राम ऋष्यमूक पर्वत के निकट आतेंं हैंं। उस पर्वत पर अपने मन्त्रियों सहित सुग्रीव रहता था। सुग्रीव ने, इस आशंका में कि कहीं बालि ने उसे मारने के लिये उन दोनों वीरों को न भेजा हो, हनुमान को राम और लक्ष्मण के विषय में जानकारी लेने के लिये ब्राह्मण के रूप में भेजा। यह जानने के बाद कि उन्हें बालि ने नहीं भेजा है हनुमान ने राम और सुग्रीव में मित्रता करवा दी। सुग्रीव ने राम को सान्त्वना दी कि जानकी जी मिल जायेंगीं और उन्हें खोजने में वह सहायता देगा साथ ही अपने भाई बालि के अपने ऊपर किये गये अत्याचार के विषय में बताया। राम ने बालि का वध कर के सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य तथा बालि के पुत्र अंगद को युवराज का पद दे दिया।
  • राज्य प्राप्ति के बाद सुग्रीव विलास में लिप्त हो गया और वर्षा तथा शरद् ऋतु व्यतीत हो गई। राम की नाराजगी पर सुग्रीव ने वानरों को सीता की खोज के लिये भेजा। सीता की खोज में गये वानरों को एक गुफा में एक तपस्विनी के दर्शन हुये। तपस्विनी ने खोज दल को योगशक्ति से समुद्रतट पर पहुंचा दिया जहां पर उनकी भेंट सम्पाती से हुई। सम्पाती ने वानरों को बताया कि रावण ने सीता को लंका अशोकवाटिका में रखा है। जाम्बवन्त ने हनुमान को समुद्र लांघने के लिये उत्साहित किया।

अतः स्पष्ट है, सीतान्वेषणम् तथा सम्पाति कथा यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 44

कौटिलीयमते लुब्धवर्गस्य के द्वे लक्षणे-

A. मानकाम 

B. आत्मसंभावितः 

C. व्यसनी 

D. अत्याहितव्यवहारः 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A एवं B 

  2. BOption (b)

    B एवं C 

  3. COption (c)

    C एवं D 

  4. DOption (d)

    A एवं D 

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Correct answer

Answer: (c)C.

C एवं D 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : कौटिलीय मत के अनुसार धार्मिक उपायोंं के द्वारा कहाँँ दो अमात्योंं की स्थापना करनी चाहिये?

कौटिलीय अर्थशास्त्र :

कौटिलीय अर्थशास्त्र प्राचीन भारतीय राजनीति का प्रसिद्ध ग्रंथ है, जिसके रचनाकर विख्य���त अर्थशास्त्रज्ञ आचार्य चाणक्य हैंं। इस ग्रंथ का स्वरूप इस प्रकार है - 

  • कौटिलीय अर्थशास्त्र की शैली उपदेशात्मक और सलाहात्मक है।
  • इस में न केवल धर्म, अर्थ और काम का प्रणयन और पालन के बारे में कहा है, पर अधर्म, अनर्थ तथा अवांछनीय के शमन का भी विधान किया है।
  • आचार्य चाणक्य ने चंद्रगुप्त के प्रशासकीय उपयोग के लिए इस ग्रंथ की रचना की थी।
  • कौटिलीय अर्थशास्त्र में १५ अधिकरण, १५० अध्याय, १८० उपविभाग तथा ६००० श्लोक हैंं।
  • प्राचीन अर्थशास्त्रज्ञोंं का भी नामनिर्देश इस ग्रंथ में आता है।

भेद नीति का प्रयोग करनेंं योग्य वर्ग :

कौटिलीय अर्थशास्त्र में भेद नीति का प्रयोग करने के लिये योग्य ऐसे चार वर्ग कहेंं हैंं - 

  • क्रुद्धवर्ग - 
  • जिसकी स्त्री को जबरदस्ती से छीन लिया हो, दूसरे के कहने से जिसको दंड मिला हो, प्रतिज्ञा करके जिसको धन न दिया हो, ऐसे सभी लोग क्रुद्धवर्ग में आते हैंं।
  • लुब्धवर्ग - 
  • जिनका धन और वैभव नष्ट हुआ हो, और जो कायर, व्यसनी, अपव्ययी हो, ऐसे लोगोंं के वर्ग को लुब्धवर्ग कहतेंं हैंं।
  • मानीवर्ग - 
  • खुद को महान समझने वाला, आत्मश्लाघी, नीच लोगोंं के द्वारा प्रशंसित वर्ग को मानीवर्ग कहतेंं हैंं।
  • भीतवर्ग - 
  • किसी लोभ के कारण हिंसा करके जो दूषित हुआ हो, अपने समान अपराधी को दंडित देखकर घबराया हो, उसे भीतवर्ग कहतेंं हैंं।

अतः स्पष्ट है, व्यसनी तथा अत्याहितव्यवहारः यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 45

​केन सह कस्य सम्बन्धः?

तालिका IतालिकाII
A. ऋग्वेदI. आदित्यः
B. यजुर्वेदःII. अङ्गिराः
C. सामवेदःIII. अग्निः
D. अथर्ववेदःIV.  वायुः

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - IV, B - III, C - II, D - I 

  2. BOption (b)

    A - III, B - IV, C - I, D - II 

  3. COption (c)

    A - II, B - I, C - III, D - IV 

  4. DOption (d)

    A - I, B - II, C - IV, D - III 

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Correct answer

Answer: (b)B.

A - III, B - IV, C - I, D - II 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किसका किसके साथ संबंध है?

वैदिक साहित्य का अवलोकन :

वेदउपवेदआचार्यदेवताऋत्विक
ऋग्वेदआयुर्वेदपैलअग्निहोता
यजुर्वेदधनुर्वेदवैशंपायनवायुअध्वर्यु
सामवेदगांधर्ववेदजैमिनीआदित्यउद्गाता
अथर्ववेदसर्पवेदसुमन्तुअंगिराब्रह्मा

चरणव्यूह के अनुसार "ऋग्वेद" का उपवेद "आयुर्वेद" है किन्तु सुश्रुत के अनुसार आयुर्वेद अथर्ववेद का उपवेद है।

अतः स्पष्ट है, A - III, B - IV, C - I, D - II यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 46

'अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्' अत्र मन्त्रांशे आगतानां पदानामर्थं सायणमनुसृत्य मेलयत-

तालिका Iतालिका II
A. अहम्I. ईश्वरी
B. राष्ट्रीII. मुख्या
C. संगमनीIII. आम्भृणी वाक्
D. प्रथमाIV. प्रापयित्री

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - II, B - IV, C - I, D - III 

  2. BOption (b)

    A - IV, B - III, C - II, D - I 

  3. COption (c)

    A - III, B - I, C - IV, D - II 

  4. DOption (d)

    A - I, B - II, C - III, D - IV 

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Correct answer

Answer: (c)C.

A - III, B - I, C - IV, D - II 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्' इस मंत्र में आये हुए पदोंं का अर्थ सायण के अर्थोंं के अनुसार मिलाये।

आत्मसूक्त :

भगवती पराम्बा के अर्चन-पूजनमे यह देवी सूक्त बहुत महत्व रखता हैं । ऋगवेद के दशम मण्डल का १२५ क्रमांक का  वाक्-सूक्त है । इसे आत्मसूक्त भी कहते हैं ।

  • इसमें अम्भृण ऋषि की पुत्री वाक् उसे ब्रह्मसाक्षात्कार से आत्मज्ञान प्राप्त होने के कारण सर्वात्मदृष्टि को अभिव्यक्त कर रही हैं ।
  • संपूर्ण मंत्र : 
  • अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्। तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम्।।
  • मंत्र का अर्थ : 
  • मैं ही राष्ट्री अर्थात् सम्पूर्ण जगत् की ईश्र्वरी हूँ। मैं उपासकोंको उनके अभीष्ट वसु-धन प्राप्त करानेवाली हूँ। जिज्ञासुओंके साक्षात् कर्तव्य परब्रह्मको अपनी आत्माके रुपमें मैंने अनुभव कर लिया है। जिनके लिये यज्ञ किये जाते हैं, उनमें मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ। सम्पूर्ण प्रपञ्चके रुपमें मैं ही अनेक-सी होकर विराजमान हूँ। सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरमें जीवनरुपमें मैं अपने-आपको ही प्रविष्ट कर रही हूँ। भिन्नभिन्न देश, काल, वस्तु और व्यक्तियोंमें जो कुछ हो रहा है, किया जा रहा है, वह सब मुझमें मेरे लिये ही किया जा रहा है। सम्पूर्ण विश्वके रुपमें अवस्थित होनेके कारण जो कोई जो कुछ भी करता है, वह सब मैं ही हूँ।

समुचित तालिका इस प्रकार है - 

तालिका Iतालिका II
A. अहम्III. आम्भृणी वाक्
B. राष्ट्रीI. ईश्वरी
C. संगमनीIV. प्रापयित्री
D. प्रथमाII. मुख्या

अतः स्पष्ट है, A - III, B - I, C - IV, D - II यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 47

केन सह कस्य सम्बन्धः 

तालिका Iतालिका II
A. आगमग्रन्थाःI. आचार्यशङ्करः
B. त्रिपिटकसाहित्यम्II. जैनदर्शनम्
C. न्यायसिद्धान्तमुक्तावलीIII. बौद्धसाहित्यम्
D. निर्विशेषाद्वैतवादःIV. विश्वनाथपञ्चाननः

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - II, B - III, C - IV, D - I 

  2. BOption (b)

    A - I, B - II, C - IV, D - III 

  3. COption (c)

    A - III, B - I, C - II, D - IV 

  4. DOption (d)

    A - IV, B - II, C - I, D - III 

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Correct answer

Answer: (a)A.

A - II, B - III, C - IV, D - I 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किसका किसके साथ संबंध है?

आगम ग्रंथ :

जैन-साहित्य का प्राचीनतम भाग ‘आगम’ के नाम से कहा जाता है। ये आगम 46 हैं-

  • 12 अंग : आयारंग, सूयगडं, ठाणांग, समवायांग, भगवती, नायाधम्मकहा, उवासगदसा, अंतगडदसा, अनुत्तरोववाइयदसा, पण्हवागरण, विवागसुय, दिठ्ठवाय।
  • 12 उपांग : ओवाइय, रायपसेणिय, जीवाभिगम, पन्नवणा, सूरियपन्नति, जम्बुद्दीवपन्नति, निरयावलि, कप्पवडंसिया, पुप्फिया, पुप्फचूलिया, वण्हिदसा।
  • 10 पइन्ना : चउसरण, आउरपचक्खाण, भत्तपरिन्ना, संथर, तंदुलवेयालिय, चंदविज्झय, देविंदत्थव, गणिविज्जा, महापंचक्खाण, वोरत्थव।
  • 6 छेदसूत्र : निसीह, महानिसीह, ववहार, आचारदसा, कप्प (बृहत्कल्प), पंचकप्प।
  • 4 मूलसूत्र : उत्तरज्झयण, आवस्सय, दसवेयालिय, पिंडनिज्जुति। नंदि और अनुयोग।

त्रिपिटक साहित्य :

त्रिपिटक बौद्ध धर्म का प्रमुख ग्रंथ है जिसे सभी बौद्ध सम्प्रदाय (महायान, थेरवाद, बज्रयान, मूलसर्वास्तिवाद आदि) मानते है। यह बौद्ध धर्म के प्राचीनतम ग्रंथ है जिसमें भगवान बुद्ध के उपदेश संगृहीत है। यह ग्रंथ पालि भाषा में लिखा गया है और विभिन्न भाषाओं में अनुवादित है। इस ग्रंथ में भगवान बुद्ध द्वारा बुद्धत्त्व प्राप्त करने के समय से महापरिनिर्वाण तक दिए हुए प्रवचनों को संग्रहित किया गया है। त्रिपिटक को तीन भागों में विभाजित किया गया है -

  • विनयपिटक
  • सुत्तपिटक
  • अभिधम्म पिटक।

न्यायसिद्धांतमुक्तावली : 

भाषापरिच्छेद, विश्वनाथ न्यायपञ्चानन कृत (1634 ई) एक दार्शनिक ग्रंथ है जिसे 'कारिकावली' या 'न्यायकारिकावली' भी कहते हैं। यह न्याय-वैशेषिक दर्शन का ग्रन्थ है। इस पर उन्होने स्वयं 'न्यायसिद्धान्तमुक्तावली' नाम से स्वयं भाष्य लिखा है।

निर्विशेषाद्वैतवाद :

निर्गुण, निर्विशेष और निरुपाधिक ब्रह्म कहलाता है। यह विचार शंकराचार्य ने रखा है। शंकराचार्य मानते हैं कि संसार में ब्रह्म ही सत्य है, जगत् मिथ्या है, जीव और ब्रह्म अलग नही हैं। जीव केवल अज्ञान के कारण ही ब्रह्म को नहीं जान पाता जबकि ब्रह्म तो उसके ही अंदर विराजमान है। उन्होंने अपने ब्रह्मसूत्र में "अहं ब्रह्मास्मि" ऐसा कहकर अद्वैत सिद्धांत बताया है।

सुमिलित तालिका इस प्रकार है - 

तालिका Iतालिका II
A. आगमग्रन्थाःII. जैनदर्शनम्
B. त्रिपिटकसाहित्यम्III. बौद्धसाहित्यम्
C. न्यायसिद्धान्तमुक्तावलीIV. विश्वनाथपञ्चाननः
D. निर्विशेषाद्वैतवादःI. आचार्यशङ्करः

 

अतः स्पष्ट है, A - II, B - III, C - IV, D - I यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 48

केन सह कस्य सम्बन्धः?

तालिका Iतालिका II
A. तथायुक्तं चानीप्सितम्I.अनु हरिं सुरा
B.हीनेII.गोषु दुह्यमानासु गतः
C.कर्तुकर्मणोः कृतिIII.ग्रामं गच्छंस्तृणं स्पृशति
D.यस्य च भावेन भावलक्षणम्IV.जगतः कर्ता कृष्ण

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - I, B - III, C - IV, D - II 

  2. BOption (b)

    A - II, B - IV, C - III, D - I 

  3. COption (c)

    A - IV, B - I, C - III, D - II 

  4. DOption (d)

    A - III, B - I, C - IV, D - II 

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Correct answer

Answer: (d)D.

A - III, B - I, C - IV, D - II 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किसका किसके साथ संबंध है?

तथायुक्तं चानीप्सितम्। 

  • अर्थ - कुछ पदार्थ ऐसे भी होते हैं जो कर्ता को अनीप्सित (अप्रिय)  होते हुए भी ईप्सित (प्रिय) की तरह क्रिया से सम्बद्ध रहते हैं, अतः उनकी भी कर्म संज्ञा होती है।
  • उदाहरण - ग्रामं गच्छन् तृणं स्पृशति। (गाँव जाते हुए तिनके को छूता है)
  • स्पष्टीकरण - इस वाक्य में गाँव जाना कर्ता को ईप्सित है अत: गाँव कर्म संज्ञक है, परन्तु तिनके को छूना कर्ता को ईप्सित नहीं है, फिर भी तिनका कर्म संज्ञक है।

हीने।  

  • अर्थ - हीन अर्थ का द्योतक अनु कर्मप्रवचनीय संज्ञक होता है।
  • उदाहरण - अनु हरिं सुरा।
  • स्पष्टीकरण - यहाँँ अनु शब्द की कर्मप्रवचनीय संज्ञा हुई है। हरि शब्‍द की द्वितीया विभक्ति हुई है। हरि देवताओंं से श्रेष्ठ है, यह अर्थ प्रतीत होता है।

कर्तुकर्मणोः कृति।

  • अर्थ - कृत् - प्रत्‍ययान्‍त शब्‍दों के योग में उनके कर्ता और कर्म में षष्‍ठी विभक्ति होती है।
  • उदाहरण - जगतः कर्ता कृष्ण। ((कृष्‍ण ने संसार को बनाया)

यस्य च भावेन भावलक्षणम्।

  • अर्थ - जिस क्रिया से अन्‍य क्रिया का होना लक्षित होता है उस क्रिया तथा उसके कर्ता और कर्म में सप्‍तमी विभक्ति होती है।
  • उदाहरण - गोषु दुह्यमानासु गतः। (जब गायें दुही जा रहीं थीं तब वह गया)

 

अतः स्पष्ट है, A - III, B - I, C - IV, D - II यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 49

केन सह कस्य संबन्धः?

तालिका Iतालिका II
A. त्रिविक्रमभट्टःI. मृच्छकटिकम्
B. भट्टनारायणःII. मुद्राराक्षसम्
C. विशाखदत्तःIII. वेणीसंहारम्
D. शूद्रकःIV. नलचम्पू

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - III, B - II, C - I, D - IV 

  2. BOption (b)

    A - IV, B - III, C - II, D - I 

  3. COption (c)

    A - I, B - II, C - III, D - IV 

  4. DOption (d)

    A - II, B - III, C - IV, D - I 

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Correct answer

Answer: (b)B.

A - IV, B - III, C - II, D - I 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किसका संबंध किस के साथ है?

समुचित तालिका इस प्रकार है - 

तालिका Iतालिका II
A. त्रिविक्रमभट्टःIV. नलचम्पू
B. भट्टनारायणःIII. वेणीसंहारम्
C. विशाखदत्तःII. मुद्राराक्षसम्
D. शूद्रकःI. मृच्छकटिकम्

 

अतः स्पष्ट है, A - IV, B - III, C - II, D - I यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 50

सा केन सह कस्य सम्बन्धः 

तालिका Iतालिका II
A. सङ्कल्पकम्I. सिद्धिः
B. नवधाII. मनः
C. अष्टधाIII. तामिस्रः
D. अष्टादशधाIV. तुष्टिः

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - II, B - IV, C - I, D - III 

  2. BOption (b)

    A - I, B - III, C - II, D - IV 

  3. COption (c)

    A - II, B - I, C - III, D - IV 

  4. DOption (d)

    A - III, B - II, C - I, D - IV 

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Correct answer

Answer: (a)A.

A - II, B - IV, C - I, D - III 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किसका किसके साथ संबंध है?

मन :

उभयात्मकमत्र मन: सङ्कल्पमिन्द्रियं च साधर्म्यात्।

गुणपरिणामविशेषान्नानात्वं बाह्यभेदाश्च।। (सांख्यकारिका २७)

  • अर्थ - दोनो प्रकार का रूप (कर्मेंद्रिय और ज्ञानेंद्रिय) होनेवाला मन यह इंद्रिय है। वह संकल्प करने वाला है, और बाकी के इंद्रियोंं के समान इसका धर्म होने के कारण इसे इंद्रिय कहा है। धर्म और अधर्म इस प्रकार गुणोंं के परिणाम भिन्न भिन्न होने के कारण जैसे बाह्य भेद होतेंं हैंं, वैसे यहाँँ अनेकत्व का संभव होता है।

तुष्टि :

आध्यात्मिक्यश्चतस्र: प्रकृत्युपादानकालभाग्याख्या:।

बाह्या विषयोपरमात् पञ्च च नव तुष्टयोऽभिमता:।। (सांख्यकारिका ५०)

  • अर्थ - प्रकृति, उपादान, काल और भाग्य यह चार आध्यात्मिक तुष्टि और शब्दादि विषयोंं के वैराग्य से उत्पन्न चार बाह्य तुष्टि, इस प्रकार तुष्टि की संख्या नौ है।

सिद्धि :

उह: शब्दोऽध्ययनं दु:खविघातास्त्रय: सुह्रत्प्राप्ति:।

दानं च सिद्धयोऽष्टौ सिद्धे: पूर्वोऽङ्कुशस्त्रिविध:।।  (सांख्यकारिका ५१)

  • अर्थ - ऊह, शब्द, अध्ययन, तीन दुःखो का परिहार, सुहृत्प्राप्ति और दान यह आठ सिद्धि हैंं।

तामिस्र :

भेदस्तमसोऽष्टविधो मोहस्य च दशविधो महामोह:।

तामिस्रोऽष्टादशधा तथा भवत्यन्धतामिस्र:।।  (सांख्यकारिका ४८)

  • अर्थ - तम और मोह के भेद १८ है, महामोह १० प्रकार का है। तामिस्र और अंधतामिस्र १८ प्रकार का है।

समुचित तालिका इस प्रकार है - 

तालिका Iतालिका II
A. सङ्कल्पकम्II. मनः
B. नवधाIV. तुष्टिः
C. अष्टधाI. सिद्धिः
D. अष्टादशधाIII. तामिस्रः

 

अतः स्पष्ट है, A - II, B - IV, C - I, D - III यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 51

केन सह कस्य सम्बन्धः?

तालिका Iतालिका II
A. संस्कृत भाषाI. श्लिष्ट वियोगात्मक
B. हिन्दी भाषाII. अश्लिष्ट मध्यमयोगात्मक
C. तिब्बती भाषाIII. अयोगात्मक
D. सन्थाली भाषाIV. श्लिष्ट संयोगात्मक

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - I, B - II, C - IV, D - III 

  2. BOption (b)

    A - III, B - II, C - IV, D - I 

  3. COption (c)

    A - IV, B - I, C - III, D - II 

  4. DOption (d)

    A - II, B - IV, C - III, D - I 

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Correct answer

Answer: (c)C.

A - IV, B - I, C - III, D - II 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किसका किसके साथ संबंध है?

भाषाओंं का आकृतिमूलक वर्गीकरण :

  • योगात्मक भाषा उसे कहते हैं, जिसमें हर शब्द अलग- अलग अपनी सत्ता रखता है, उसमे दूसरे शब्दों के कारण कोई विकार या परिवर्तन नहीं होता। प्रत्येक शब्द की अलग-अलग संबंधतत्व या अर्थतत्व को व्यक्त करने की, शक्ति होती है। और उन शब्दों का परस्पर संबंध केवल वाक्य में उनके स्थान से ज्ञात होता है।
  • अयोगात्मक भाषाओं का सर्वोत्तम उदाहरण चीनी भाषाओं में मिलता है। इनमें हर एक शब्द की अलग-अलग स्थिति रहती है, किसी के प्रभाव से दूसरे में परिवर्तन नहीं होता और उन शब्दों का परस्पर संबंध पदक्रम में जान पड़ता है। कोई शब्द संज्ञा है या क्रिया या विशेषण यह सब वाक्य में प्रयोग में आने से ही ज्ञात होता है, अन्यथा नहीं।
  • श्लिष्ट उन योगात्मक भाषाओं को कहते हैं, जिनमें संबंधतत्व को जोड़ने के कारण अर्थतत्व वाले भाग में भी कुछ विकार उत्पन्न हो जाता है। तथापि संबंधतत्व का ज्ञान अलग से होता है।
  • अश्लिष्ट भाषाएँँ प्रत्ययप्रधान होती हैंं। इन में संबंध बताने के लिये प्रकृति अर्थात् अर्थतत्व को प्रत्यय जोडना आवश्यक होता है।

समुचित तालिका इस प्रकार है - 

तालिका Iतालिका II
A. संस्कृत भाषाIV. श्लिष्ट संयोगात्मक
B. हिन्दी भाषाI. श्लिष्ट वियोगात्मक
C. तिब्बती भाषाIII. अयोगात्मक
D. सन्थाली भाषाII. अश्लिष्ट मध्यमयोगात्मक

 

अतः स्पष्ट है, A - IV, B - I, C - III, D - II  यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 52

केन सह कस्य सम्बन्धः?

तालिका Iतालिका II
A. भारविःI. सर्वः कान्तमात्मीयं पश्यति
B. माघःII. गुरुपदेशश्च नाम पुरुषाणामखिलमलप्रक्षालनक्षममजलं स्नानम्
C. कालिदासःIII. सहसा विदधीत न क्रियाम्
D. बाणभट्टःIV. ग्रहीतुमार्यान् परिचर्यया मुहुर्महानुभावा हि नितान्तमर्थिनः

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - III, B - I, C - II, D - IV 

  2. BOption (b)

    A - IV, B - III, C - I, D - II 

  3. COption (c)

    A - III, B - IV, C - I, D - II 

  4. DOption (d)

    A - I, B - II, C - IV, D -III 

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Correct answer

Answer: (c)C.

A - III, B - IV, C - I, D - II 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किसका संबंध किस के साथ है?

समुचित तालिका इस प्रकार है - 

तालिका Iतालिका II
A. भारविःIII. सहसा विदधीत न क्रियाम्
B. माघःIV. ग्रहीतुमार्यान् परिचर्यया मुहुर्महानुभावा हि नितान्तमर्थिनः
C. कालिदासःI. सर्वः कान्तमात्मीयं पश्यति
D. बाणभट्टःII. गुरुपदेशश्च नाम पुरुषाणामखिलमलप्रक्षालनक्षममजलं स्नानम्

 

अतः स्पष्ट है, A - III, B - IV, C - I, D - II यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 53

केन सह कस्य सम्बन्धः?

तालिका Iतालिका II
A. शैवI. अग्निपुराणम्
B. वैष्णवII. पद्मपुराणम्
C. ब्राह्मIII. मार्कण्डेयपुराणम्
D. आग्नेयIV. गरुडपुराणम्

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - III, B - IV, C - II, D - I 

  2. BOption (b)

    A - IV, B - II, C - I, D - III 

  3. COption (c)

    A - II, B - I, C - IV, D - III 

  4. DOption (d)

    A - I, B - III, C - II, D - IV 

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Correct answer

Answer: (a)A.

A - III, B - IV, C - II, D - I 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किस से किसका संबंध है?

पुराण ग्रंथोंं का परिचय :

पुराण और इतिहास इनका महत्व वेदोंं के समान होता था, इसके यह प्रमाण हैंं - 

  • अथर्ववेद के अनुसार -
  • "ऋच: सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह।" (११.७.२)
  • अर्थात् पुराणों का आविर्भाव ऋक्, साम, यजुस् औद छन्द के साथ ही हुआ था।
  • शतपथ ब्राह्मण (१४.३.३.१३) में तो पुराणसाहित्य को वेद ही कहा गया है।
  • छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार' - 
  • "इतिहास पुराणं पञ्चमंं वेदानांवेदम्।" (७.१.२)
  • पुराण पंचम और वेदोंं का वेद है।
  • बृहदारण्यकोपनिषद् तथा महाभारत में कहा गया है कि - 
  • "इतिहास पुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत्।"**
  • अर्थात् वेद का अर्थविस्तार पुराण के द्वारा करना चाहिये।

पुराणोंं की संख्या :

पुराणों की संख्या प्राचीन काल से अठारह मानी गयी है। देवीभागवत में नाम के आरंभिक अक्षर के निर्देशानुसार १८ पुराणों की गणना इस प्रकार की गयी हैं:

​​मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम्।

​​अनापलिंगकूस्कानि पुराणानि पृथक्पृथक्।।

  • म-२ 
  • मार्कण्डेय पुराण, मत्स्य पुराण
  • भ-२
  • भागवत पुराण -- (भिन्न मत से - देवीभागवत पुराण), भविष्य पुराण
  • ब्र-३
  • ब्रह्म पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण
  • व-४
  • वराह पुराण, वायु पुराण (भिन्न मत से - शिव पुराण), विष्णु पुराण (उत्तर भाग - विष्णुधर्मोत्तर), वामन पुराण
  • अ-१
  • अग्नि पुराण
  • ना-१
  • नारद पुराण
  • प-१
  • पद्म पुराण
  • लिं-१
  • लिङ्ग पुराण
  • ग-१
  • गरुड पुराण
  • कू-१
  • कूर्म पुराण
  • स्क-१
  • स्कन्द पुराण​

Important Points 

उचित तालिका

तालिका Iतालिका II
A. शैवIII. मार्कण्डेयपुराणम्
B. वैष्णवIV. गरुडपुराणम्
C. ब्राह्मII. पद्मपुराणम्
D. आग्नेयI. अग्निपुराणम्

 

अतः उचित पर्याय 'A - III, B - IV, C - II, D - I' होता है।

Question 54

केन सह कस्य सम्बन्धः

तालिका Iतालिका II
A. कापटिकःI. कृषको वृत्तिक्षीणः प्रज्ञाशौचयुक्तः
B. उदास्थितःII.वाणिजको वृत्तिक्षीणः प्रज्ञाशौचयुक्तः
C. गृहपतिकःIII. प्रव्रज्याप्रत्यवासितः प्रज्ञाशौचमुक्तः
D. वैदेहकःIV. परमर्मज्ञः प्रगल्भश्छात्रः

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - III, B - I, C - II, D - IV 

  2. BOption (b)

    A - II, B - IV, C - III, D - I 

  3. COption (c)

    A - IV, B - III, C - I, D - II 

  4. DOption (d)

    A - III, B - II, C - IV, D - I 

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Correct answer

Answer: (c)C.

A - IV, B - III, C - I, D - II 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किसका संबंध किस के साथ है?

कौटिलीय अर्थशास्त्र में आयि हुई परिभाषाएँँ :

कौटिलीय अर्थशास्त्र के प्रथम अधिकरण में निम्नलिखित परिभाषाएँँ आती हैंं - 

  • परमर्मज्ञः प्रगल्भः छात्रः कापटिकः।
  • प्रव्रज्याप्रत्यवासितः प्रज्ञाशौचयुक्त उदास्थितः।
  • कर्षको वृत्तिक्षीणः प्रज्ञाशौचयुक्तो गृहपतिकव्यञ्जनः।
  • वैदेहकः सार्थवाहो नैगमो वाणिजो वणिक्।

 

इससे स्पष्ट होता है, कि A - IV, B - III, C - I, D - II यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 55

काण्वसंहितायाः भाष्यकारान् कालक्रमेण योजयत?

A. मुरारिमिश्रः 

B. कालनाथः 

C. आनन्दबोधः 

D. अनन्ताचार्यः 

E. सायणः 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, C, D, B, E

  2. BOption (b)

    C, B, A, E, D 

  3. COption (c)

    B, E, A, C, D 

  4. DOption (d)

    D, A, B, E, C

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Correct answer

Answer: (c)C.

B, E, A, C, D 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : काण्वसंहिता के भाष्यकारोंं की कालक्रम से योजना कीजिए। 

काण्वसंहिता के भाष्यकारोंं का कालक्रम :

  • कालनाथ - 
  • संवत् 1250 के लगभग इनका समय माना जाता हैं। कालनाथ के ग्रन्थ का नाम यजुर्मञ्जरी है। इसमें 250 मन्त्रों का भाष्य है।
  • सायण -
  • सायण का समय 1317-1387 ई. के आस-पास माना जाता हैं। सायणाचार्य ने 5 संहिताओं के भाष्य तथा 13 ब्राह्मण आरण्यकों की व्याख्या लिखी है। सायण ने अपने ऋग्वेदभाष्य का नाम 'वेदार्थ-प्रकाश' रखा है।
  • मुरारिमिश्र -
  • मुरारिं मिश्र भारतीय दार्शनिक थे। उन्हें मीमांसा दर्शन में तृतीय सम्प्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है। इन्होंने 'मीमांसा-सूत्र' की व्याख्या लिखी हैं।
  • आनन्दबोध -
  • जातवेद भट्टोपाध्याय के पुत्र आनन्दबोध ने सम्पूर्ण काण्व संहिता पर 'काण्डवेदमंत्र-भाष्य-संग्रह' की रचना की है।
  • अनन्ताचार्य - 
  • इन की स्थित काल 16 वीं शती माना जाता है। इन्होंने 'मार्षिक-सूत्र-भाष्य' 'यजुः प्रातिशाख्य-भाष्य' और शतपथ ब्राह्मण भाष्य भी लिखा है।

 

​अतः स्पष्ट है, B, E, A, C, D यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 56

तैत्तरीय-संहितायाः भाष्यकारान् कालक्रमेण योजयत?

A. भवस्वामी 

B. क्षुरः 

C. कुण्डिनः

D. सायणः

E. कौशिकः भट्ट - भास्कर - मिश्रः 

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, C, D, B, E 

  2. BOption (b)

    C, A, E, B, D 

  3. COption (c)

    D, C, B, A, E 

  4. DOption (d)

    E, B, D, C, A 

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Correct answer

Answer: (b)B.

C, A, E, B, D 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : तैत्तिरीय संहिता के भाष्यकारोंं की कालक्रम से योजना कीजिए। 

तैत्तिरीय संहिता में ७ काण्ड, ४४ प्रपाठक, तथा ६३१ अनुवाक हैं जिसका वर्ण्यविषय यज्ञीय कर्मकाण्ड (पौरोडास, याजमान, वाजपेय, राजसूय इत्यादि नाना यागानुष्ठान) का विशद वर्णन है। वेदों के एकमात्र सर्वातिशायी भाष्यकार सायण तैत्तिरीय शाखा के ही अनुयायी थे। तैत्तिरीय संहिता के भाष्यकारोंं की कालक्रम से योजना इस प्रकार है - 

  1. कुण्डिनः
  2. भवस्वामी
  3. कौशिकः भट्ट - भास्कर - मिश्रः
  4. क्षुरः
  5. सायणः

 

अतः स्पष्ट है, C, A, E, B, D यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 57

'अक्षैर्मा दीव्य कृषिमित् कृषस्व वित्ते रमस्व बहु मन्यमानः' अस्य मन्त्रस्य देवता का?

  1. AOption (a)

    अक्षाः 

  2. BOption (b)

    कितवः अक्षाश्च

  3. COption (c)

    कृषिः 

  4. DOption (d)

    कवषः

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Correct answer

Answer: (c)C.

कृषिः 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'अक्षैर्मा दीव्य कृषिमित् कृषस्व वित्ते रमस्व बहु मन्यमानः' इस मंत्र की देवता कौन है?

स्पष्टीकरण - प्रस्तुत मंत्र ऋग्वेद के दशम मंडल के ३४ वे सूक्त में आया है। यह सूक्त अक्षसूक्त नाम से जाना जाता है। 

  • संपूर्ण मंत्र :
  • अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित्कृषस्व वित्ते रमस्व बहु मन्यमानः। तत्र गावः कितव तत्र जाया तन्मे वि चष्टे सवितायमर्यः॥ (ऋग्वेद १०.३४.१३)
  • मंत्र का अर्थ :
  • हे द्यूतक्रीडक, जुआ कभी मत खेलो, कृषि जैसे उत्पादक कार्य करो, इस प्रकार प्राप्त धन को ही पर्याप्त मानकर संतुष्ट रहो, इसी से पत्नी और गोधन की प्राप्ति होगी, ऐसा परामर्श हमेंं साक्षात् सवितादेव ने दिया है।

अक्षसूक्त

  • इस सूक्त में कुल १४ मंत्र है।
  • इनमें १, ७, ९ और १२ वीं ऋचा पासे की स्तुतिपरक है और १३ वीं कृषि की स्तुति में है। शेष ऋचाऔ में जुए का खेल और जुआड़ियों की स्थिति का अंकन किया गया है।
  • इस से यह स्पष्ट होता है, कि १, ७, ९ और १२ क्रमांक के मंत्र की देवता अक्ष समूह; १३ वे मंत्र की कृषि और शेष मंत्रोंं की देवता अक्ष कितव है।
  • प्रस्तुत मंत्र १३ वा मंत्र होने के कारण और इस में कृषि की स्तुति होने के कारण कृषि यह इस मंत्र की देवता है।

अतः स्पष्ट है, 'कृषिः' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

अतिरिक्त

वैदिक शब्दों का अर्थबोध होने के लिए ऋषि, देवता, विनियोग और छंद का ज्ञान होना आवश्यक है। ऐसा कहा जाता है, 

ऋषिच्छन्दो दैवतानि ब्राह्मणार्थं स्वराद्यपि

अविदित्वा प्रयुञ्जानो मन्त्रकण्टक उच्यते।

अविदित्वा ऋषिं छन्दो दैवतं योगमेव च

योऽध्यापयेज्जपेद् वापि पापीयाञ्जायते तु स:।। (बृहद्देवता ८.१३६)

  • अर्थ - जो व्यक्ति मन्त्रों के ऋषि, छन्द, देवता और अर्थानुसारी विनियोग को विना जाने वेदमन्त्रों का अध्यापन अथवा जप करता है, वह पापी होता है।

ऋषि :

साक्षात्कृतधर्माणः ऋषयो बभूवुः ते अवरेभ्यः।

असाक्षात्कृतधर्मेभ्य उपदेशेन मन्त्रान् संप्रादुः।।  (निरुक्तम् १.२०)

  • ऋषि’ शब्द की व्युत्पत्ति ऋष् धातु से इन्, कित् प्रत्यय के योग से होती है। इसका अर्थ है- एक अन्तः स्फूर्ति से रचना करता है, ऐसा कवि या मुनि, मन्त्रद्रष्टा, पुण्यात्मा मुनि, संन्यासी, विरक्त योगी। ऋषि मंत्रोंं के कर्ता नहीं, किंतु द्रष्टा है। उपदेश से वह लोगोंं तक वेदार्थ पहुँँचाते है।

देवता :

यत्काम ऋषिर्यस्यां देवतायामार्थपत्यमिच्छन् स्तुतिं प्रयुङ्क्ते तद्दैवतः स मन्त्रो भवति। (निरुक्तम् ७.१.)

  • ऋषि मंत्र में किस देवता की स्तुति करना चाहेंं, वही उस मंत्र की देवता होती है।

अथवा

तेन वाक्येन यत्प्रतिपाद्यं वस्तु सा देवता। (बृहद्देवता १.६) 

  • वाक्य से जो प्रतिपादित की गई वस्तु होती है, वह इस वाक्य की देवता होती है।

छंद : 

छन्दांसि छादनात्।छादयन्ति ह वा एनं छन्दांसि पापात्कर्मण। (ऐ.आ. २.५) 

  • छंद यह शब्द छद् धातु से उत्पन्न हुआ है, जो छेद अर्थात् नाश करते हैंं, वे छंद हैंं। वे पापकर्म का छेदन करतेंं हैंं।

Question 58

अथर्ववेदीय-राष्ट्राभिवर्धन-सूक्तस्य देवता का?

  1. AOption (a)

    राष्ट्रम् 

  2. BOption (b)

    अथर्वा 

  3. COption (c)

    ब्रह्मणस्पतिः 

  4. DOption (d)

    राष्ट्राभिवर्धनम् 

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Correct answer

Answer: (c)C.

ब्रह्मणस्पतिः 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अथर्ववेद के राष्ट्राभिवर्धन-सूक्त की देवता कौन है?

राष्ट्राभिवर्धन सूक्त

  • अथर्ववेद का राष्ट्राभिवर्धन-सूक्त सपत्नयक्षण सूक्त के नाम से भी जाना जाता है।
  • यह अथर्ववेद के प्रथम कांड का २९ वा सूक्त है।
  • इस सूक्त में राष्ट्र के वृद्धि और शत्रुहीनता की कामना की है। उसके लिए मणिबंधन का भी संदर्भ इस सूक्त के चौथे मंत्र में आता है।
  • इस सूक्त में कुल ६ मंत्र आते है।
  • राष्ट्राभिवर्धन सूक्त के ऋषि वसिष्ठ, देवता अभिवर्तमणि, ब्रह्मणस्पति और छंद अनुष्टुप है।

अतः स्पष्ट है, 'ब्रह्मणस्पतिः' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

अतिरिक्त

वैदिक शब्दों का अर्थबोध होने के लिए ऋषि, देवता, विनियोग और छंद का ज्ञान होना आवश्यक है। ऐसा कहा जाता है, 

ऋषिच्छन्दो दैवतानि ब्राह्मणार्थं स्वराद्यपि

अविदित्वा प्रयुञ्जानो मन्त्रकण्टक उच्यते।

अविदित्वा ऋषिं छन्दो दैवतं योगमेव च

योऽध्यापयेज्जपेद् वापि पापीयाञ्जायते तु स:।। (बृहद्देवता ८.१३६)

  • अर्थ - जो व्यक्ति मन्त्रों के ऋषि, छन्द, देवता और अर्थानुसारी विनियोग को विना जाने वेदमन्त्रों का अध्यापन अथवा जप करता है, वह पापी होता है।

देवता

यत्काम ऋषिर्यस्यां देवतायामार्थपत्यमिच्छन् स्तुतिं प्रयुङ्क्ते तद्दैवतः स मन्त्रो भवति। (निरुक्तम् ७.१.)

  • ऋषि मंत्र में किस देवता की स्तुति करना चाहेंं, वही उस मंत्र की देवता होती है।

अथवा

तेन वाक्येन यत्प्रतिपाद्यं वस्तु सा देवता। (बृहद्देवता १.६) 

  • वाक्य से जो प्रतिपादित की गई वस्तु होती है, वह इस वाक्य की देवता होती है।

Question 59

'अग्निर्वै देवानां मुखम्' इति कथम्?

  1. AOption (a)

    हविर्भक्षणात् 

  2. BOption (b)

    भोजनपाचनात् 

  3. COption (c)

    वनदहनात् 

  4. DOption (d)

    प्रकाशन-साधनात् 

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Correct answer

Answer: (a)A.

हविर्भक्षणात् 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'अग्निर्वै देवानां मुखम्' यह कैसे स्पष्ट किया जा सकता है?

  • प्रस्तुत पंक्ति का अर्थ - अग्नि देवताओंं का मुख है।
  • संदर्भ - शतपथ ब्राह्मण : कांड ३, अध्याय ९, ब्राह्मण १, मंत्र ६.
  • अग्नि यज्ञ में आहुती ग्रहण करके देवताओं तक पहुँँचाता है। देवताएँँ अग्नि के द्वारा अपने आहुती का भक्षण करतेंं हैंं।
  • पुरुषसूक्त में भी अग्नि की उत्पत्ति विराटपुरुष के मुख से बताई गई है। पुरुष सूक्त के अनुसार अग्नि और इन्द्र जुडवां भाई हैं।
  • मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च।

अतः आहुती भक्षण करने के कारण यह स्पष्ट है, 'हविर्भक्षणात्' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

अग्नि देवता :

  • अग्नि शब्द “अगि गतौ” (भ्वादि. ५.२) धातु से बना है। गति के तीन अर्थ हैं – ज्ञान, गमन और प्राप्ति। इस प्रकार विश्व में जहाँ भी ज्ञान, गति, ज्योति, प्रकाश, प्रगति और प्राप्ति है, वह सब अग्नि के ही रूप है, अथवा यह सब अग्नि के प्रभाव से मिलता है।
  • ​देवताओं में अग्नि का सबसे प्रमुख स्थान है और इन्द्र के पश्चात अग्नि देव का ही पूजनीय स्थान है। अग्निदेव नेतृत्व शक्ति से सम्पन्न, यज्ञ की आहुतियों को ग्रहण करने वाले तथा तेज एवं प्रकाश के अधिष्ठाता हैं। मातरिश्वा भृगु तथा अंगिरा इन्हें भूतल पर लाये। अग्नि पार्थिव देव हैं। यज्ञाग्नि के रूप में इनका मूर्तिकरण प्राप्त होता है। अतः ये ही ऋत्विक, होता और पुरोहित हैं।अग्नि द्यावापृथ्वी के पुत्र हैं।
  • अग्नि दो अरणियों के संघर्षण से उत्पन्न होते हैं। इनके लिए अन्य की आवश्यकता नहीं है। इसका अभिप्राय यह है कि अग्नि का जन्म, अग्नि से ही हुआ है।
  • अग्नि की पीठ घृत से निर्मित है- घृतपृष्ठ।  इनका मुख घृत से युक्त है - घृतमुख। इनकी जिह्वा द्युतिमान् है। दाँत स्वर्णिम, उज्ज्वल तथा लोहे के समान हैं। केश और दाढी भूरे रंग के हैं। जबडे तीखें हैं, मस्तक ज्वालामय है। इनके तीन सिर और सात रश्मियाँ हैं। इनके नेत्र घृतयुक्त हैं। इनका रथ सुनहरा और चमकदार है जिसे दो या दो से अधिक घोडे खींचते हैं। अग्नि अपने स्वर्णिम रथ में यज्ञशाला में बलि (हवि) ग्रहण करने के लिए देवताओं को बैठाकर लाते हैं। वे अपने उपासकों के सदैव सहायक हैं।
  • सँख्या की दृष्टि से इंद्र (२५०श्लोक) के बाद अग्नि (२००श्लोक) का ही स्थान है, किन्तु महत्ता की दृष्टि से अग्नि का सर्वप्रमुख स्थान है। स्वतन्त्र रूप से अग्नि का २०० सूक्तों में स्तवन किया गया है। सामूहिक रूप से अग्नि का २४८३ सूक्तों में स्तवन किया गया है। अग्नि पृथ्वी स्थानीय देवता है। इनका पृथ्वी लोक में प्रमुख स्थान है।
  • अग्नि का प्रयोजन दुष्टात्माओं और आक्रामक, अभिचारों को समाप्त करना है। अपने प्रकाश से राक्षसों को भगाने के कारण ये रक्षोंहन् कहे गए हैं। देवों की प्रतिष्ठा करने के लिए अग्नि का आवाहन किया जाता है।

Question 60

अर्थसंग्रहे कतिधा वेद उच्यते-

  1. AOption (a)

    पञ्चविधः 

  2. BOption (b)

    चतुर्विधः 

  3. COption (c)

    अष्टविधः 

  4. DOption (d)

    दशविधः 

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Correct answer

Answer: (a)A.

पञ्चविधः 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अर्थसंग्रह में वेद कितने प्रकार के हैंं?

  • अर्थसंग्रह में वेदोंं के पाँच विभागोंं का वर्णन किया है -
  • अपौरुषेयंं वाक्यं वेदः। स च विधिमंत्रनामधेयनिषेधार्थवादभेदात्पञ्चविधः। 
  • अर्थ - अपौरुषेय वाक्य को वेद कहते है। विधि, मंत्र, नामधेय, निषेध, और अर्थवाद यह वेद के पाँच भाग है।

​अतः स्पष्ट है, 'पञ्चविधः' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। ​

अर्थसंग्रह के अनुसार पाँच विभागोंं के लक्षण :

  • विधि :
  • लक्षण - तत्र अज्ञातार्थज्ञापकोवेदभागो विधिः।
  • अर्थ - अज्ञात अर्थ का ज्ञापन करने वाले वेदभाग को विधि कहते हैंं।
  • मंत्र :
  • लक्षण - प्रयोगसमवेतार्थस्मारका मन्त्राः।
  • अर्थ - मंत्र प्रयोग समवेत अर्थ का स्मरण कर देनेवाले होतें हैंं।
  • नामधेय :
  • लक्षण - नामधेयानांं विधेयार्थपरिच्छेदकतयार्थवत्त्वम्।
  • अर्थ - जो याग करना है, उसका महत्व बताने के लिये जो नाम बताया जाता है, वह नामधेय होता है।
  • निषेध :
  • लक्षण - पुरुषस्य निवर्तकंं वाक्यं निषेधः।
  • अर्थ - पुरुष को अनिष्ट कार्य से प्रवृत्त करनेवाला वाक्य निषेध होता है।
  • अर्थवाद :
  • लक्षण - प्राशस्त्यनिन्दान्यतरपरं वाक्यमर्थवादः।
  • अर्थ - विधि की स्तुति और निषेध की निंदा करनेवाला वाक्य अर्थवाद होता है।

Question 61

सदानन्दप्रणीते वेदान्तसारे 'तत्वमसि' अत्र अखण्डार्थबोधकेषु त्रिषु संबन्धेषु अयं नास्ति

  1. AOption (a)

    पदयोः सामानाधिकरण्यम्

  2. BOption (b)

    पदार्थयोर्विशेषणविशेष्यभावः 

  3. COption (c)

    अयुतसिद्धसम्बन्धः 

  4. DOption (d)

    प्रत्यगात्मलक्षणयोर्लक्ष्यलक्षणभावः 

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Correct answer

Answer: (c)C.

अयुतसिद्धसम्बन्धः 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : सदानंदप्रणीत वेदांतसार में 'तत्वमसि' यहाँँ अखंडार्थबोधक तीन संबंधोंं में क्या नहीं है?

  • सदानंदप्रणीत वेदांतसार इस ग्रंथ में चार वेदोंं से संकलित महावाक्य दिये है। इस में ही 'तत्वमसि' (छान्दोग्य उपनिषद ६/८/७- सामवेद) इस महावाक्य का विश्लेषण दिया है। 
  • समानाधिकरण्यञ्च विशेषणविशेष्यता। लक्ष्यलक्षणसम्बन्धः पदार्थप्रत्यगात्मनाम्।।
  • अर्थ - 'तत्वमसि' यह महावाक्य तीन संबंधोंंद्वारा अखंडार्थबोधक होता है। पदोंं में समानाधिकरण्य, पदार्थोंं में विशेषण विशेष्यभाव तथा आंतरिक आत्मलक्षण पदोंं में लक्ष्यलक्षण भाव यह तीन संबंध हैंं।

अतः स्पष्ट है, 'अयुतसिद्धसम्बन्धः' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

अतिरिक्त :

  • अयुतसिद्धसंबंध वैशेषिक दर्शन की संज्ञा है।
  • समवाय सम्बन्ध अयुतसिद्ध दो पदार्थों के बीच रहता है। अयुतसिद्ध का आशय है-
  • जो न कभी संयुक्त सिद्ध किये जा सकें, और न विभाजित।
  • ऐसे युग्मों के आधार पर अयुतसिद्ध सम्बन्ध पाँच प्रकार का माना गया है-
  • अवयव और अवयवी में,
  • गुण (रूप) और गुणी में
  • क्रिया और क्रियावान् में,
  • जाति (घटत्व) और व्यक्ति (घट) में
  • विशेष और अधिकरण नित्य (आकाश, परमाणु आदि) द्रव्य में।
  • जिस सम्बन्ध के कारण अवयवों में अवयवी, व्यक्ति में जाति आदि का बोध होता है, वह समवाय कहलाता है।

Question 62

केशवमिश्रानुसारं संयुक्तसमवायसन्निकर्षस्योदाहरणमस्ति-

  1. AOption (a)

    चक्षुः - घटम् 

  2. BOption (b)

    चक्षुः - घटरूपम् 

  3. COption (c)

    श्रोतम् - शब्दत्वम् 

  4. DOption (d)

    चक्षुः - घटत्वम् 

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Correct answer

Answer: (b)B.

चक्षुः - घटरूपम् 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : केशवमिश्र के अनुसार संयुक्तसमवायसन्निकर्ष का उदाहरण क्या है?

  • केशवमिश्र के अनुसार चक्षु के द्वारा घट के रूप के समवेत रूप का ग्रहण होता है।
  • जब रूप का ग्रहण होता है, तब चक्षु इंद्रिय है। रूप अर्थ अथवा विषय है। इन दोनोंं का सन्निकर्ष संयुक्त समवाय है।
  • चक्षु संयुक्त घट में रूप समवेत समवाय संबंध से रहता है।
  • चक्षुरादिना घटरूपादिकंं गृह्यते, घटेश्यामंं रूपमस्तीति, तदा चक्षुरिन्द्रियं, घटरूपमर्थः अनयोः सन्निकर्षः संयुक्त समवाय एव।
  • ​अतः स्पष्ट है, 'चक्षुः - घटरूपम्' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 63

सांख्यकारिकायां 'संघात परार्थत्वात्' अनेन हेतुना साध्यते-

  1. AOption (a)

    पुरुषः 

  2. BOption (b)

    अव्यक्तम् 

  3. COption (c)

    महत् 

  4. DOption (d)

    अहङ्कारः 

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Correct answer

Answer: (a)A.

पुरुषः 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : सांख्यकारिका में 'संघात परार्थत्वात्' इस हेतु से क्या सिद्ध होता है?

पुरुष - प्रकृति सिद्धांत :

यह जगत प्रकृति के तीनो गुणों से निर्मित हैं और जड़, अचेतन है। यह जगत साधन रूप है। इसका साध्य कोई जड़ पदार्थ नहींं हो सकता। इसलिए इसका साध्य वही हो सकता है जो चेतन हो तथा इस जगत को भोगने का सामर्थ्य रखता हो। अतः सांख्य के पुरुष के स्वरूप के अनुसार इस प्रयोजन की पूर्ति केवल पुरुष ही कर सकता है। 

पुरुष की सत्ता :

ईश्वरकृष्ण सांख्यकारिका में पुरुष की सत्ता सिद्ध करने हेतु पाँच तर्क देते हैंं - 

"संघात परार्थत्वात् त्रिगुणादि विपर्ययादधिष्ठानात्। 

पुरूषोऽस्ति भोक्तृभावात् कैवल्यार्थ प्रवृत्तेश्च।।” (सांख्यकारिका १७)

  • संघात परार्थत्वात् -
  • संघात इस शब्द का अर्थ एकसाथ आकर कार्य करनेवाले तत्व यह होता है। पुरुष तीन गुणोंं से भिन्न, अविवेकी, अविषय, असामान्य, चेतन और अपरिणामी होना चाहिये। पुरुष संघात से भिन्न इस प्रकार अभिप्रेत है। इस प्रकार वही पुरुष है, यह सिद्ध होता है।
  • त्रिगुणादिविपर्ययात् -
  • प्रकृति अपने स्वरूप में त्रिगुणात्मक तथा परिणामी है तो तार्किक दृष्टि से त्रिगुण निर्गुण की ओर संकेत करता है परिणामी अपरिणामी की ओर।यह निर्गुण तथा अपरिणामी तत्व पुरुष है।यह पुरुष की सत्ता सिद्धि का एक प्रमाण यह है।
  • अधिष्ठानात् -
  • त्रिगुणात्मक पदार्थोंं का आधार होना आवश्यक है। सुखदुःखमोहरूप पदार्थोंं को आधार होना चाहिये, जो त्रिगुणादिकोंं से भिन्न आत्मा है।
  • भोक्तृभावात् -
  • प्रकृति और उससे उत्पन्न पदार्थ जड़ होने के कारण भोग्य है, अतः इसे भोगने के लिए भोक्ता होना चाहिए।और यह भोक्ता वही हो सकता है जो चेतना से युक्त हो।  चेैतन्य होने के कारण पुरुष इस प्रकृति का भोक्ता है। अत: भोक्तृभाव होने से पुरुष  का अस्तित्व सिद्ध होता है।
  • कैवल्यार्थप्रवृत्तेश्च -
  • प्रकृति का साध्य कैवल्य है। अब यह प्रश्न उठता है, कि कैवल्य की प्राप्ति  किससे होगी। पुरुष की सत्ता का वास्तविक बोध होने पर ही प्राणि कैवल्य अर्थात् मोक्ष प्राप्त कर सकतें हैं।

यह पाँच कारण पुरुष के अस्तित्व को सिद्ध करते है। अतः स्पष्ट है, 'पुरुषः' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 64

अधोऽङिकतेषु नागेशभट्टस्य ग्रन्थो नास्ति

  1. AOption (a)

    बृहत्-शब्देन्दुशेखरः 

  2. BOption (b)

    लघु-शब्देन्दुशेखरः 

  3. COption (c)

    प्रदीपोद्योतः 

  4. DOption (d)

    माधवीयधातुवृत्तिः 

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Correct answer

Answer: (d)D.

माधवीयधातुवृत्तिः 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : निम्नलिखित विकल्पोंं में से नागेशभट्ट का कौन सा ग्रंथ नहीं है?

नागेशभट्ट का सामान्य परिचय :

नागेशभट्ट नव्य वैयाकरणों में सर्वश्रेष्ठ माने जाते है। 1730–1810 यह नागेशभट्ट का काल है, इस पर विद्वानोंं का एकमत है।

  • महाराष्ट्र के ब्राह्मण होने के साथ वह सिद्धांतकौमुदी के रचनाकार भट्टोजि दीक्षित के पौत्र थे।
  • इनके पिता का नाम शिव भट्ट और माता का नाम सतीदेवी था।
  • पाणिनीय परंपरा में वरदराज के बाद नागेशभट्ट का नाम लिया जाता है। इन्‍होंने व्‍याकरण पर १० से भी अधिक ग्रंथ लिखें हैं।
  • व्‍याकरण के साथ ही साहित्य, धर्मशास्त्र, दर्शन, योग तथा ज्योतिष विषयों में भी इनका योगदान है।
  • श्रृंगवेरपुर के राजा रामसिंह इनके आश्रयदाता थे।

नागेशभट्ट की ग्रंथसंपदा :

नागेशभट्ट की विस्तृत ग्रंथसंपदा इस प्रकार है - 

  • लघुशब्देन्���ुशेखर - भट्टोजि दीक्षित कृत प्रौढमनोरमा की क्रमशः व्‍याख्‍या।
  • बृहच्छब्देन्दुशेखर - भट्टोजि दीक्षित कृत प्रौढमनोरमा की विस्‍तृत व्‍याख्‍या।
  • प्रदीपोद्योत - पतंजलिकृत महाभाष्य पर कैय्यट की 'प्रदीप' नामक टीका और नागेशभट्ट की उद्योत नाम की टीका।
  • वैयाकरण-सिद्धांत-मंजूषा, मञ्जूषा, लघुमञ्जूषा, परमलघुमञ्जूषा - व्याकरण के दार्शनिक ग्रंथ।
  • स्‍फोटवाद - स्‍फोटवाद का विवेचनग्रंथ।
  • रसमंजरी टीका - भानुदत्त की रसमंजरी पर टीका।

अतः स्पष्ट है, 'माधवीयधातुवृत्तिः' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 65

पाणिनीय शिक्षानुसारम् अधमपाठकस्य दोषोऽस्ति 

  1. AOption (a)

    धैर्यम् 

  2. BOption (b)

    सुस्वरः 

  3. COption (c)

    गीती 

  4. DOption (d)

    माधुर्यम् 

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Correct answer

Answer: (c)C.

गीती 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : पाणिनीय शिक्षा के अनुसार अधमपाठक का दोष क्या है?

पाणिनीय शिक्षा का सामान्य परिचय :

शिक्षा शास्त्र का समावेश वेदांगोंं में होता है। यह शास्त्र वर्णोच्चारण से संबंधित है।

  • पाणिनीय शिक्षा ऋग्वेदी परंपरा से संलग्न वेदोच्चारण संबंधी पद्यात्मक ग्रंथ है, जिस मेंं कुल ६० श्लोक हैं।
  • पाणिनी के अनुयायी लोगोंं ने इस ग्रंथ की रचना की, ऐसा माना जाता है।
  • शिक्षा शास्त्र को वेदपुरुष की नासिका माना गया है -

छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते।

ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते ।।

शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्।

तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते।। (पाणिनीय शिक्षा ४२)

  • अर्थ - छन्द को वेदों के पैर, कल्प को हाथ, ज्योतिष को नेत्र, निरुक्त को कान, शिक्षा को नाक और व्याकरण को मुख कहा गया है। इस प्रकार अंग के साथ वेदाध्यायन करने पर ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।​

**अधम पाठक के लक्षण :**पाणिनीय शिक्षा में अधम पाठक के छह लक्षण इस प्रकार आतें हैंं - 

गीती शीघ्री शिरःकम्पी तथा लिखितपाठकः।

अनर्थज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः ।। (पाणिनीय शिक्षा ३२)

  • अर्थ - गाकर पढनेवाला, तेजी से पढनेवाला, पढते समय सिर हिलानेवाला, पाठ के अर्थ को नहीं जाननेवाला और कम आवाज होनेवाला यह छह अधम पाठक हैं।

उत्तम पाठक के लक्षण :

पाणिनीय शिक्षा में उत्तम पाठक के छह लक्षण इस प्रकार आतें हैंं - 

माधुर्यमक्षरव्यक्तिः पदच्छेदस्तु सुस्वरः।

धैर्यं लयसमर्थं च षडेते पाठका गुणाः।।  (पाणिनीय शिक्षा ३३)

  • अर्थ - मधुरता, स्पष्ट बोलना, बडे-बडे शब्दों को तोडना, सुंदर स्वर (मीठे स्वर) में बोलना, धैर्यपूर्वक बोलना, लय सहित बोलना, ये पाठकों के छह गुण हैं। ​

अतः स्पष्ट है, 'गीती' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 66

ग्रिमस्य नियमानुसारं ग्, द्, ब् (घोष अल्प प्राण) ध्वनिनां परिवर्तनक्रमः कः?

  1. AOption (a)

    ​ग्  → घ् ; द्  → ध् ; ब् → भ्

  2. BOption (b)

    ग्  → ख् ; द् → थ् ; ब्  → फ़्

  3. COption (c)

    ग्  → क् ; द्  → त् ; ब्  → प्

  4. DOption (d)

    ग्  → क् ; द्  → थ् ; ब्  → फ़्

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Correct answer

Answer: (c)C.

ग्  → क् ; द्  → त् ; ब्  → प्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : ग्रिम के नियम अनुसार ग्, द्, ब् (घोष अल्प प्राण) ध्वनियोंं के परिवर्तन का क्रम क्या है?

ग्रिम, ग्रासमन और वर्नर यह नियम भारोपीय भाषा परिवार से संबंधित हैं। इन नियमोंं में मूल ध्वनियोंं के परिवर्तन का वर्णन आता है।

**ग्रिम नियम :**यह ध्वनि नियम प्रा. याकोब ग्रिम के नाम से प्रसिद्ध है। इनका समय १७८५ से १८६३ यह है। मूलतः यह नियम ध्वनि परिवर्तन नियम इस नाम से प्रसिद्ध था, प्रा. मैक्समूलर ने इसे ग्रिम नियम यह संज्ञा दी। ग्रिम नियम के अनुसार मूल भारतीय भाषा की निम्नलिखित ध्वनियोंं का अंग्रेजी और जर्मन भाषा के निम्नलिखित ध्वनियोंं में परिवर्तन होता है - 

  • प्रथम ध्वनि का द्वितीय ध्वनि में परिवर्तन :
अघोष अल्पप्राण मूल ध्वनिपरिवर्तन
क्ख् (ह्)
त्थ्
प्फ्
  • चतुर्थ ध्वनि का तृतीय ध्वनि में परिवर्तन  :
महाप्राणपरिवर्तन
घ्ग्
ध्द्
भ्ब्
  • तृतीय ध्वनि का प्रथम ध्वनि में परिवर्तन  :
घोष अल्पप्राण मूल ध्वनिपरिवर्तन
ग्क्
द्त्
ब्प्

अतः स्पष्ट है, 'ग्  → क् ; द्  → त् ; ब्  → प्' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 67

​अधोऽङिकतासु भारोपीय परिवारानुसारं कतमा भाषा शतम् वर्गेऽस्ति?

  1. AOption (a)

    तोखारी 

  2. BOption (b)

    ग्रीक 

  3. COption (c)

    आर्मीनी 

  4. DOption (d)

    कोल्टिक 

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Correct answer

Answer: (c)C.

आर्मीनी 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : निम्नलिखित विकल्पोंं में से कौन सी भाषा भारोपीय परिवार के अनुसार शतम् वर्ग में है?

भारोपीय भाषा परिवार :

भारत से लेकर प्रायः सारे यूरोप तक बोले जाने के कारण इस भाषा परिवार को भारोपीय परिवार कहते हैं। इस भाषा परिवार की प्रमुख भाषाएँ संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, हिन्दी, बंगाली, फ़ारसी, ग्रीक, लेटिन, अंग्रेज़ी, रूसी, जर्मन, पुर्तग़ाली और इतालवी इत्यादि हैं। मूल रूप की दृष्टि से यह परिवार श्लिष्ट योगात्मक रूप का है।

  • भारोपीय परिवार की विशेषताएँँ :
  • इस परिवार की सारी भाषाएँँ प्रारंभ में योगात्मक थी, पर बाद में एक दो छोड के बाकी सारी भाषाएँँ वियोगात्मक हो गई।
  • शब्द-रूप शब्द के अन्त में प्रत्यय द्वारा बनाये जाते है। इस परिवार में प्रत्ययोंं की संख्या सभी परिवार से अधिक है।
  • समास रचना की शक्ति यह इस परिवार की विशेषता है।
  • साथ ही प्रत्ययोंं को अपना स्वतंत्र अर्थ होना और बाद में प्रत्यय की अर्थपूर्णता का लोप होकर आधुनिक रूप शेष रहना, यह परिवर्तन इस भाषा परिवार में दिखाई देता है।
  • हिन्द यूरोपीय शाखाओं को मुख्यतः दो वर्गों में रखा जाता है :
  • केन्तुम वर्ग।
  • शतम्  वर्ग।

केन्तुम् वर्ग :

  • इस वर्ग की प्राचीन भाषाओं में आदि-हिन्द-यूरोपीय भाषा के व्यंजन वैसे ही परिरक्षित रहे हैं। जैसे - 
  • क्व, ग्व और घ्व
  • आदि-हिन्द-यूरोपीय भाषा के व्यंजनोंं में इस प्रकार परिवर्तन हुआ - 
  • क्य, ग्य और घ्य, यह व्यंजन क, ग और घ में विलीन हो गये।
  • इनमें इटैलिक, यूनानी, कोल्टिक और जर्मनिक शाखा आती हैं।

शतम् वर्ग :

  • इस वर्ग की प्राचीन भाषाओं में आदि-हिन्द-यूरोपीय भाषा के व्यंजन, क्य, ग्य और घ्य, स्पर्श-संघर्षी या संघर्षी व्यंजनों में बदल गये। जैसे - च, ज, स और श।
  • साथ ही साथ, आदि-हिन्द-यूरोपीय भाषा के व्यंजन, क्व, ग्व और घ्व, यह क, ग और घ इनमें विलय हो गये।
  • इनमें बाल्टिक, स्लाव, हिन्द ईरानी, अरमेनियाई और अल्बानियाई शाखा आती हैं। संस्कृत इसी वर्ग में आती है।
  • आर्मीनी भाषा भारोपीय भाषा परिवार के शतम् वर्ग में आती है।

अतः स्पष्ट है, आर्मीनी यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

आर्मीनी भाषा :

यह श्लिष्ट योगात्मक भाषा है। इसका स्वरूप ग्रीक और भारत ईरानी के बीच का है। इस भाषा में ईसाई साहित्य अधिकरूप से मिलता है। आर्मीनी भाषा के वर्तमान समय में दो रूप है -

  • स्तम्बूल - यह युरोप प्रदेश में बोली जाती है।
  • अरारट - यह एशिया प्रदेश में बोली जाती है।

Question 68

'स एकस्त्रीणि जयति जगन्ति कुसुमायुधः 

हस्ताऽपि तनुं यस्य शंभुना न हृतं बलम्'

इत्यस्मिन् पद्ये कः अलंकारो वर्त्तते?

  1. AOption (a)

    विशेषोक्तिः 

  2. BOption (b)

    विभावना

  3. COption (c)

    निदर्शना 

  4. DOption (d)

    तुल्ययोगिता 

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Correct answer

Answer: (a)A.

विशेषोक्तिः 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'स एकस्त्रीणि जयति जगन्ति कुसुमायुधः। हस्ताऽपि तनुं यस्य शंभुना न हृतं बलम्।।' इस पद में कौन सा अलंकार है?

पद का हिंदी भाषांतर :

  • फूलोंं के अस्त्रवाला यह कामदेव अकेले ही तीनोंं लोकोंं पर विजय प्राप्त करता है, इसके शरीर का तो महादेव ने हरण किया, इसके शक्ति का नहीं।

भामह विरचित काव्यलंकार के अनुसार यह विशेषोक्ति अलंकार का उदाहरण है।

विशेषोक्ति अलङ्कार की परिभाषा :

एकदेशस्य विगमे या गुणान्तरसंस्थितिः ।

विशेषप्रधानायासौ विशेषोक्तिर्मता यथा।। (काव्यलंकार ३.२३)

  • अर्थ - एक ही विषय में अथवा गुणोंं के रूपांतरण की स्थिति में जब विशेष अर्थ का प्राधान्य होता है, तब विशेषोक्ति अलंकार होता है।

अन्य प्रकार से भी विशेषोक्ति को स्पष्ट किया जा सकता है - 

सति हेतौ फलाभावे विशेषोक्तिस्‍तथा द्विधा।

  • अर्थ - संपूर्ण कारणों के होने पर भी फल का न कहना विशेषोक्ति है।

स्पष्टीकरण

यहाँँ कामदेव का शरीर महादेव ने नष्ट किया है, फिर भी कामदेव का प्रभाव अबाधित है। प्रभाव दर्शाने के लिये शरीर जो साधन होता है, वह कामदेव के पास नहींं है। यह कारण होते हुए भी कामदेव अकेले ही तीनोंं लोकोंं पर विजय प्राप्त करता है।

अतः स्पष्ट है, **'विशेषोक्तिः' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 69

'जाबालेः नास्तिकमतस्य रामेण खण्डनम्' इति विषयः रामायणस्य कस्मिन् काण्डे वर्णितोऽस्ति?

  1. AOption (a)

    बालकाण्डे 

  2. BOption (b)

    अयोध्याकाण्डे 

  3. COption (c)

    अरण्यकाण्डे 

  4. DOption (d)

    किष्किन्धाकाण्डे 

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Correct answer

Answer: (b)B.

अयोध्याकाण्डे 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'जाबालि के नास्तिकमत का राम द्वारा खंडन' यह विषय रामायण के कौन से खंड में आया है?

रामायण और महाभारत को ऋषि के द्वारा रचना होने पर आर्षमहाकाव्य कहा गया है। रामायण की रचना ७ कांड और २४,००० श्लोकोंं में की गई है। रामायण के अयोध्याकांड में राम - जाबालि संवाद आता है।

ऋषि जाबालि का नास्तिकमत : 

  • राम-भरत के मिलाप के समय यह संवाद आता है। श्रीराम इस बात पर जोर देते हैं कि वे अपने स्वर्गीय पिता को दिये गये वचन को तोड़कर उनकी आत्मा को कष्ट नहीं दे सकते। ऋषि जाबालि श्रीराम को समझाते हैं कि उन वचनों की अब कोई सार्थकता नहीं रह गयी और उन्हें व्यावहारिक उपयोगिता तथा जनसमुदाय की भावना को महत्त्व देना चाहिए। दोनों के बीच चल रहे तर्क-वितर्कों के दौरान एक समय ऋषि जाबालि कहते हैं -
  • मनुष्य दिवंगत आत्माओं के प्रति भ्रमित रहता है। वह भूल जाता है कि मृत्यु पर जीवधारी अपने समस्त बंधनों को तोड़ देता है। उसकी मृत्यु के साथ ही सबके संबंध समाप्त हो जाते हैं। न कोई किसी का पिता रह जाता है और न ही कोई किसी का पुत्र। संसार में छूट चुके व्यक्ति के कर्म दिवंगत आत्मा के लिए अर्थहीन हो जाते हैं। उन कर्मों से न उसे सुख हो सकता है और न ही दुःख ।

अष्टकापितृदेवत्यमित्ययं प्रसृतो जनः।

अन्नस्योपद्रवं पश्य मृतो हि किमशिष्यति ।।

यदि भुक्तमिहान्येन देहमन्यस्य गच्छति ।

दद्यात् प्रवसतां श्राद्धं तत्पथ्यमशनं भवेत् ।। (वाल्मीकिरामायण, अयोध्याकांड, सर्ग - १०८, श्लोक १४ - १५)

  • अर्थ - अष्टकादि श्राद्ध पितर-देवों के प्रति समर्पित हैं यह धारणा व्यक्ति के मन में व्याप्त रहती है, इस विचार के साथ कि यहां समर्पित भोग उन्हें उस लोक में मिलेंगे। यह तो सरासर अन्न की बरबादी है। भला देखो यहां किसी का भोगा अन्नादि उनको कैसे मिल सकता है वे पूछते हैं, और तर्क बताते हैं - वास्तव में यदि यहां भक्षित अन्न अन्यत्र किसी दूसरे के देह को मिल सकता तो अवश्य ही परदेस में प्रवास में गये व्यक्ति की वहां भोजन की व्यवस्था आसान हो जाती। यहां उसका श्राद्ध कर दो और वहां उसकी भूख शांत हो जाये।
  • आगे जाबालि के इस नास्तिक मत का राम खंडन करते हुए अपने पिता के प्रति कर्तव्योंं का महत्व प्रतिपादित करतें हैंं।

अतः स्पष्ट है, **'अयोध्याकाण्डे' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 70

महाभारतस्य मंगलश्लोके कस्य ग्रन्थस्य निर्देशोऽस्ति?

  1. AOption (a)

    जयग्रन्थस्य

  2. BOption (b)

    विजयग्रन्थस्य

  3. COption (c)

    भारतग्रन्थस्य

  4. DOption (d)

    महाभारतग्रन्थस्य 

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Correct answer

Answer: (a)A.

जयग्रन्थस्य

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : महाभारत के मंगलश्लोक में किस ग्रंथ का निर्देश है?

श्लोक - जयोनामेतिहासोऽयं श्रोतव्यो विजिगीषुणा।

  • महाभारत इस आर्षमहाकाव्य का मूल रूप जयग्रंथ इस नाम से प्रसिद्ध था। महाभारत में वर्णन आता है, कि यह जय नाम का इतिहास विद्वान श्रोतागणोंं ने सुनना चाहिये। इससे स्पष्ट होता है, की 'महाभारत' इस नाम से पूर्व इस ग्रंथ के लिये 'जय' यह नाम प्रचलित था।

जयग्रंथ का मंगलाचरण :

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्।।

  • अर्थ - अंतर्यामी नारायणरूप भगवान श्रीकृष्ण, उनके सखा नररत्न अर्जुन, उनकी लीला प्रकट करने वाली देवी सरस्वती और उनके वक्ता भगवान व्यास को नमस्कार करके आसुरी संपत्तियों का नाश करके अंत:करण पर विजय प्राप्त कराने वाले जयग्रंथ का पाठ करना चाहिए।

अतः स्पष्ट है, 'जयग्रन्थस्य' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

जयग्रंथ का विस्तार :

  • जयग्रंथ व्यास ने वैशंपायन को सुनाया था। इसकी रचना कुल ८००० श्लोकोंं में हुई थी।
  • इस ग्रंथ का विस्तारित रूप भारतग्रंथ था, जिसमेंं २४००० श्लोक थेंं। भारतग्रंथ का निरूपण वैशंपायन ने व्यास महर्षि के आदेश पर जनमेजय के सामने नागयज्ञ के अवसर पर किया था।
  • इसका विस्तार महाभारत नाम से हुआ, जिसमेंं एक लाख से भी अधिक श्लोकोंं का समावेश था। इसी कारण से महाभारत को शतसाहस्त्री संहिता कहा जाता है। महाभारत १८ पर्वोंं में विभक्त है और भारतवर्ष के विश्वकोश के रूप में जाना जाता है।

Question 71

सरविलियमजोन्समहोदयः ब्राह्मीलिपेरुत्पत्तिः मन्यते-

  1. AOption (a)

    सेमेटिकलिपितः 

  2. BOption (b)

    ​फिनिशिअनलिपितः मिसराक्षरेभ्यः वा 

  3. COption (c)

    ​​फिनिशिअनलिपेः अस्माइक-अक्षरेभ्यः

  4. DOption (d)

    फिनिशिअनतः सेबूअन् (हिमिअरेटिक्) लिपितः

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Correct answer

Answer: (a)A.

सेमेटिकलिपितः 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : सर विलियम जोन्स महोदय ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति किस से मानते हैंं?

ब्राह्मी लिपि :

ब्राह्मी लिपि एक प्राचीन लिपि है जिससे कई एशियाई लिपियों का विकास हुआ है। ब्राह्मी भी खरोष्ठी की तरह ही पूरे एशिया में फैली हुई थी। सम्राट अशोक अपने लेखों की लिपि को 'धम्मलिपि' का नाम देता है। उसके लेखों में कहीं भी इस लिपि के लिए 'ब्राह्मी' नाम नहीं मिलता। लेकिन बौद्धों, जैनों तथा ब्राह्मण-धर्म के ग्रंथों के अनेक उल्लेखों से ज्ञात होता है कि इस लिपि का नाम 'ब्राह्मी' लिपि ही रहा होगा।

ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति :

ब्राह्मी लिपि के उत्पत्ति के विषय में अनेक सिद्धांत प्रस्तुत किये गये हैंं। इन सिद्धांतों को दो मुख्य धाराओं में विभक्त किया जा सकता हैं।

  • विदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त ,
  • बृहद भारत की स्वदेशी उत्पति का सिद्धान्त

विदेशी उत्पति के सिद्धान्त को मनाने वाले पुनः दो भागों में एवं तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है।

  • यूनानी मूल से ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति - इस सिद्धान्त के पोषक अल्फ्रेड म्यूलर हैं।
  • सेमेटिक उत्पत्ति का सिद्धांत - विलियम जोन्स इस सिद्धांत के मुख्य प्रतिपादक हैं। इसे भी तीन भागों में विभक्त किया है -
  • फिनीशीयान मूल
  • दक्षिण सेमेटिक मूल
  • उत्तर सेमेटिक मूल

ब्राह्मी लिपि के उद्भव के स्वदेशी सिद्धान्त को भी दो भागों में विभक्त किया जाता है-

  • दक्षिण मूल
  • आर्य मूल

अतः स्पष्ट है, 'सेमेटिकलिपितः' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 72

यशोधर्मणः मन्दसौरस्तम्भलेखानुसारं यशोधर्मा कस्य देवस्य समर्चनां करोति-

  1. AOption (a)

    शिवस्य 

  2. BOption (b)

    विष्णोः 

  3. COption (c)

    गणेशस्य 

  4. DOption (d)

    कृष्णस्य 

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Correct answer

Answer: (a)A.

शिवस्य 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यशोधर्मा के मन्दसौरस्तम्भलेख के अनुसार यशोधर्मा किस देव की अर्चना करता है?

यशोधर्मा राजा :

यशोधर्मा राजा का सामान्य परिचय इस प्रकार है - 

  • यशोधर्मा यह राजा विष्णुवर्धन के नाम से भी जाना जाता है।
  • इस राजा ने निम्नलिखित उपाधियाँँ धारण की थी - 
  • राजाधिराज
  • परमेश्वर
  • सम्राट
  • इस राजा की तुलना मांधाता, अलर्क, भरत और मनु से की जाती थी।

मन्दसौर शिलालेखयह शिलालेख एक अज्ञात पानी के कुएँ की मरम्मत के दौरान गलती से खोजा गया था। पहली बार जे. एफ. फ्लीट द्वारा पढ़ा गया। उसने अनुमान लगाया कि यह मूल कुआँ हो सकता है।

  • मन्दसौर शिलालेख मध्य प्रदेश के मन्दसौर में स्थित यशोधर्मा का एक शिलालेख है जो संस्कृत भाषा एवं गुप्त लिपि में है।
  • इसका लेखनकाल लगभग 532 ईसाकाल माना गया है।
  • यह लेख 2 फुट चौड़े तथा 1.5 फुट ऊँचे एवं 2.5 इंच मोटे पत्थर पर अंकित है।
  • यह लेख ॐ से आरम्भ होता है, जिसके पश्चात शिव का मंगलाचरण है।
  • इसके अन्त में लिपिकार का 'दक्ष' यह नाम भी अंकित है। यह विभिन्न छन्दों में है।
  • मन्दसौर शिलालेख का मंगलाचरण - 
  • सिद्धं स जयति जगतां पतिः पिनाकी स्मितरवगीतिषु यस्य दन्तकान्तिः। द्युतिर् इव तडितां निशि स्फुरन्ती तिरयति च स्फुटयत्य् अदश् च विश्वं।।
  • यहाँँ 'पिनाकी' इस शब्द से शिव का बोध होता है।  पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाला अर्थात् शिव, इसलिये पिनाकी शब्द प्रयुक्त है।

अतः स्पष्ट है, **'शिवस्य' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 73

कौटिलीयार्थशास्त्रानुसारं के राजानमुत्तिष्ठमानमनूत्तिष्ठन्ते?

  1. AOption (a)

    शिष्याः 

  2. BOption (b)

    शत्रवः 

  3. COption (c)

    भृत्याः 

  4. DOption (d)

    पौरजनाः 

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Correct answer

Answer: (c)C.

भृत्याः 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : कौटिलीय अर्थशास्त्र के अनुसार कौन राजा के पास रहतेंं हैंं?

भृत्यविधान :

कौटिलीय अर्थशास्त्र के अनुसार राजा के समवेत सदा भृत्य अर्थात् सेवक होने चाहिये। उनका विवरण इस प्रकार है - 

  • राजा को अपनी, अपने जनपद की तथा दुर्ग की क्षमता और शक्ति के अनुसार भृत्य रखने चाहिये।
  • भृत्योंं पर राजकीय आय का चौथाई भाग खर्च करना चाहिये इसे ही भृति कहा गया है।
  • यह भृति इस परिमाण में होनी चाहिये की भृत्य कार्य करने में समर्थ हो, उसका संरक्षण हो, उसके लाभ की हानि न पहुँँचे, और उसके द्वारा अपने धर्म का अतिक्रमण न हो।
  • सामान्य रूप से राजा भृत्योंं १२०० से ८००० पणोंं तक व्यय करता है।

अतः स्पष्ट है, **'भृत्याः' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

कौटिलीय अर्थशास्त्र :

कौटिलीय अर्थशास्त्र प्राचीन भारतीय राजनीति का प्रसिद्ध ग्रंथ है, जिसके रचनाकर विख्यात अर्थशास्त्रज्ञ आचार्य चाणक्य हैंं। इस ग्रंथ का स्वरूप इस प्रकार है - 

  • कौटिलीय अर्थशास्त्र की शैली उपदेशात्मक और सलाहात्मक है।
  • इस में न केवल धर्म, अर्थ और काम का प्रणयन और पालन के बारे में कहा है, पर अधर्म, अनर्थ तथा अवांछनीय के शमन का भी विधान किया है।
  • आचार्य चाणक्य ने चंद्रगुप्त के प्रशासकीय उपयोग के लिए इस ग्रंथ की रचना की थी।
  • कौटिलीय अर्थशास्त्र में १५ अधिकरण, १५० अध्याय, १८० उपविभाग तथा ६००० श्लोक हैंं।
  • प्राचीन अर्थशास्त्रज्ञोंं का भी नामनिर्देश इस ग्रंथ में आता है।

Question 74

अशोकस्य शाहबाज़गढ़ी - शिलालेखस्य लिपिरस्ति-

  1. AOption (a)

    ब्राह्मी 

  2. BOption (b)

    देवनागरी 

  3. COption (c)

    खरोष्ठी 

  4. DOption (d)

    शारदा 

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Correct answer

Answer: (c)C.

खरोष्ठी 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अशोक का शाहबाज़गढ़ी के शिलालेख की लिपि क्या है?

अशोक के पुराभिलेख :

  • मौर्य सम्राट अशोक के इतिहास की संपूर्ण जानकारी उसके अभिलेखों से मिलती है। इनकी विशेषता इस प्रकार है -
  • यह माना जाता है कि, अशोक को अभिलेखों की प्रेरणा ईरान के शासक 'डेरियस' से मिली थी।
  • अशोक के लगभग ४० अभिलेख प्राप्त हुए हैं। ये ब्राह्मी, खरोष्ठी और आर्मेइक-ग्रीक लिपियों में लिखे गये हैं।
  • सम्राट अशोक के ब्राह्मी लिपि में लिखित सन्देश को सर्वप्रथम एलेग्जेंडर कनिंघम के सहकर्मी जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा था।
  • अशोक के अभिलेखों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-
  • शिलालेख
  • स्तम्भलेख
  • गुहालेख
  • सम्राट अशोक का इतिहास इन लेखोंं से प्राप्त होता है। अशोक के १४ शिलालेख मिलतेंं हैंं।
  • अशोक का तक्षशिला एवं लघमान, अफगाणिस्तान का शिलालेख आर्मेइक-ग्रीक लिपि में है।
  • शाहबाज़गढ़ी के अतिरिक्त अन्य सारे शिलालेख ब्राह्मी लिपि में है। शाहबाज़गढ़ी का लेख खरोष्ठी लिपि में उत्कीर्ण है।

अतः स्पष्ट है, 'खरोष्ठी' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 75

शतपथब्राह्मणस्य प्रथमकाण्डस्य विषयौ कौ?

A. अग्निहोत्रम् 

B. सोमयागः 

C. राजसूयः 

D. पिण्डपितृयज्ञः

  1. AOption (a)

    A एवं B 

  2. BOption (b)

    B एवं C 

  3. COption (c)

    C एवं D 

  4. DOption (d)

    A एवं D 

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Correct answer

Answer: (d)D.

A एवं D 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : शतपथब्राह्मण के प्रथम कांड के कौन से दो विषय है?

शतपथ ब्राह्मण शुक्ल यजुर्वेद का ब्राह्मणग्रन्थ है। समस्त ब्राह्मण-ग्रन्थों में शतपथ ब्राह्मण सर्वाधिक बडा है। शतपथ ब्राह्मण, शुक्लयजुर्वेद की दोनों शाखाओं में उपलब्ध है। दोनों ही शाखाओं की प्रतिपाद्य विषय-वस्तु समान है, केवल क्रम में कुछ भिन्नता है।

माध्यन्दिन शतपथ ब्राह्मण :

माध्यन्दिन शतपथ ब्राह्मण में १४ काण्ड, १०० अध्याय, ४३८ ब्राह्मण तथा ७६२४ कण्डिकाएँ हैं।

१४ काण्डों के नाम -

  1. हविर्यज्ञम् - दर्श और पूर्णमास इष्टियों का प्रतिपादन।
  2. एकपदिप - अग्न्याधान, पुनराधान, अग्निहोत्र, उपस्थान, प्रवत्स्यदुपस्थान, आगतोपस्थान, पिण्डपितृयज्ञ, आग्रयण, दाक्षायण तथा चातुर्मास्यादि यार्गो की मीमांसा।
  3. अध्वरम् - दीक्षाभिषवपर्यन्त सोमयाग का वर्णन।
  4. ग्रहनाम - सोमयोग के तीनों सवनों के अन्तर्गत किये जाने वाले कर्मों का, षोडशीसदृश सोमसंस्था, द्वादशाहयाग तथा सत्रादियागों का प्रतिपादन।
  5. सवम् - वाजपेय तथा राजसूय यागों का वर्णन।
  6. उपासम्भरणम् - उषासम्भरण तथा विष्णुक्रम का विवेचन।
  7. हस्तिघटक - चयन याग, गार्हपत्य चयन, अग्निक्षेत्र-संस्कार तथा दर्भस्तम्बादि के दूर करने तक के कार्यों का विवेचन।
  8. चितिः - प्राणभृत् प्रभृति इष्टकाओं की स्थापनाविधि का वर्णन।
  9. संचितिः - शत्रुद्रिंंय होम, धिष्ण्य चयन, पुनश्चिति: तथा चित्युपस्थान का निरूपण।
  10. अग्निरहस्यम् - चिति-सम्पत्ति, चयनयाग स्तुति, चित्यपक्षपुच्छ-विचार, चित्याग्निवेदि का परिमाण, उसकी सम्पत्ति, चयनकाल, चित्याग्नि के छन्दों का अवयवरूप, यजुष्मती और लोकम्पृणा आदि इष्टकाओं की संस्था, उपनिषदरूप से अग्नि की उपासना, मन की सृष्टि, लोकादिरूप से अग्नि की उपासना, अग्नि की सर्वतोमुखता तथा सम्प्रदायप्रवर्तक ॠषिवंश प्रभृति का विवेचन।
  11. अष्टाध्यायी (संग्रह) - आधानकाल, दर्शपूर्णमास तथा दाक्षायणयज्ञों की अवधि, दाक्षायण यज्ञ, पथिकृदिष्टि, अभ्युदितेष्टि, दर्शपूर्णमासीय द्रव्यों का अर्थवाद, अग्निहोत्रीय अर्थवाद, ब्रह्मचारी के कर्त्तव्य, मित्रविन्देष्टि, हवि:-समृद्धि, चातुर्मास्यार्थवाद, पंच महायज्ञ, स्वाध्याय-प्रशंसा, प्रायश्चित्त, अंशु और अदाभ्यग्रह, अध्यात्मविद्या, पशुबन्ध-प्रशंसा तथा हविर्याग के अवशिष्ट विधानों पर विचार।
  12. मध्यमम्(सौत्रामणी) - सत्रगत दीक्षा-क्रम, महाव्रत, गवामयनसत्र, अग्निहोत्र-प्रायश्चित्त, सौत्रामणीयाग, मृतकाग्निहोत्र तथा मृतकदाह प्रभृति विषयों का निरूपण।
  13. अश्वमेधम् - अश्वमेध, तदगत प्रायश्चित्त, पुरुषमेध, सर्वमेध तथा पितृमेध का विवरण।
  14. बृहदारण्यकम् - प्रवर्ग्यकर्म, धर्म-विधि महावीरपात्र, प्रवर्ग्योत्सादन, प्रवर्ग्यकर्तृक नियम, ब्रह्मविद्या, मन्थ तथा वंश इत्यादि का प्रतिपादन हुआ है। इसी काण्ड में बृहदारण्यक उपनिषद भी है।

**काण्व शतपथ ब्राह्मण :**काण्व शतपथ में १७ काण्ड, १०४ अध्याय, ४३५ ब्राह्मण तथा ६८०६ कण्डिकाएं हैं।

  1. एकपात्-काण्डम् - आधान-पुनराधान, अग्निहोत्र, आग्रयण, पिण्डपितृयज्ञ, दाक्षायण यज्ञ, उपस्थान तथा चातुर्मास्य संज्ञक यागों का विवेचन।
  2. हविर्यज्ञ काण्डम् - पूर्णमास तथा दर्शयागों का प्रतिपादन।
  3. उद्धारि काण्डम् - अग्निहोत्रीय अर्थवाद तथा दर्शपूर्णमासीय अर्थवाद का विवेचन।
  4. अध्वरम् - सोमयागजन्य दीक्षा का वर्णन है।
  5. ग्रहनाम - सोमयाग, सवनत्रयाग कर्म, षोडशी प्रभृति सोमसंस्था, द्वादशाहयाग, त्रिरात्रहीन दक्षिणा, चतुस्त्रिंशद्धोम और सत्रधर्म का निरूपण।
  6. वाजपेय काण्डम् - वाजपेययाग का विवेचन।
  7. राजसूय काण्डम् - राजसूय का विवेचन।
  8. उखासम्भरणम् - उखा-सम्भरण का विवेचन।
  9. हस्तिघट काण्डम् - विभिन्न चयन-याग का निरूपण।
  10. चिति काण्डम् - विभिन्न चयन-याग का निरूपण।
  11. साग्निचिति - विभिन्न चयन-याग का निरूपण।
  12. अग्निरहस्यम् - विभिन्न चयन-याग का निरूपण।
  13. अष्टाध्यायी - आधान काल, पथिकृत इष्टि, प्रयाजानुयामन्त्रण, शंयुवाक्, पत्नीसंयाज, ब्रह्मचर्य, दर्शपूर्णमास की शेष विधियों तथा पशुबन्ध का निरूपण।
  14. मध्यमम् - दीक्षा-क्रम, पृष्ठयाभिप्लवादि, सौत्रामणीयाग, अग्निहोत्र-प्रायश्चित्त, मृतकाग्निहोत्र आदि का वर्णन।
  15. अश्वमेध काण्डम् - अश्वमेध।
  16. प्रवर्ग्य काण्डम् - सांगोपाङ्ग प्रवर्ग्यकर्म।
  17. बृहदारण्यकम् - ब्रह्मविद्या का विवेचन।

अतः स्पष्ट है, **'अग्निहोत्रम्' तथा 'पिण्डपितृयज्ञः' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 76

सामवेदस्य ब्राह्मणग्रन्थौ कौ स्तः?

A. ऐतरेय - ब्राह्मणम् 

B. पञ्चविंश - ब्राह्मणम् 

C. शांखायन - ब्राह्मणम् 

D. वंश ब्राह्मणम्

  1. AOption (a)

    A एवं B 

  2. BOption (b)

    B एवं C 

  3. COption (c)

    B एवं D 

  4. DOption (d)

    C एवं D 

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

B एवं D 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : सामवेद के दो ब्राह्मणग्रंथ कौन से हैंं?

ब्राह्मणग्रंथ :

यज्ञों एवं कर्मकाण्डों के विधान एवं इनकी क्रियाओं को भली-भांति समझने के लिए ही इस ब्राह्मण ग्रंथ की रचना हुई। 'ब्रह्म' का शाब्दिक अर्थ हैं- यज्ञ अर्थात् यज्ञ के विषयों का अच्छी तरह से प्रतिपादन करने वाले ग्रंथ ही 'ब्राह्मण ग्रंथ' कहे गये। ब्राह्मण ग्रन्थों में सर्वथा यज्ञों की वैज्ञानिक, अधिभौतिक तथा अध्यात्मिक मीमांसा की गयी है। 

**ब्राह्मणग्रंथोंं के प्रतिपाद्य विषय :**ब्राह्मणग्रन्थों का मुख्य विषय यज्ञ का सर्वांगपूर्ण निरूपण है। इस के साथ ही निम्नलिखित विषय ब्राह्मणग्रन्थों में आतेंं हैंं -

  • विश्वोत्पत्ति
  • गूढ कथाएँँ और उनका यज्ञ के विधि में प्रयोजन
  • पुनर्जन्म का विवेचन
  • तीन लोकोंं का वर्णन
  • आत्मास्वरूप का वर्णन

संहितानुसार ब्राह्मणग्रंथोंं का विभाजन इस प्रकार है -

संहिताब्राह्मणग्रंथ
ऋग्वेद- ऐतरेयब्राह्मण-(शैशिरीयशाकलशाखा) - कौषीतकी (शांखायन) ब्राह्मण (बाष्कल शाखा)
यजुर्वेद- शुक्ल यजुर्वेद : - शतपथब्राह्मण-(माध्यन्दिनीय वाजसनेयि शाखा) - शतपथब्राह्मण-(काण्व वाजसनेयि शाखा) - कृष्णयजुर्वेद : - तैत्तिरीयब्राह्मण - मैत्रायणीब्राह्मण - कठब्राह्मण - कपिष्ठलब्राह्मण
सामवेद- प्रौढ(पंचविंश) ब्राह्मण - षडविंश ब्राह्मण - आर्षेय ब्राह्मण - मन्त्र (या छांदोग्य) ब्राह्मण - जैमिनीय ब्राह्मण - वंश ब्राह्मण
अथर्ववेद- गोपथब्राह्मण (पिप्पलाद शाखा)

अतः स्पष्ट है, 'पंचविंश ब्राह्मण' और 'वंश ब्राह्मण' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 77

सामवेदस्य शाखे स्तः?

A. वाधूल - संहिता 

B. शाट्यायनीय - संहिता 

C. कपिष्ठल - कठ - संहिता 

D. जैमिनीय - संहिता

  1. AOption (a)

    A एवं C 

  2. BOption (b)

    B एवं D 

  3. COption (c)

    B एवं C 

  4. DOption (d)

    C एवं D 

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Correct answer

Answer: (b)B.

B एवं D 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : सामवेद की कौन सी दो शाखाएँ हैंं?

वेदशाखाओंं का विवरण :

वेद से निकले हुए विभाग अथवा अंग को शाखा कहते हैं। पतंजलि ने ऋग्वेद की २१, यजुर्वेद की १००, सामवेद की १००० तथा अथर्ववेद की ९ शाखाएँ बताई हैं। शाखाओं का विवरण शौनक के चरणव्यूह और पुराणों में विस्तारित रूप से मिलता है। वैदिक शाखाओं का विवरण इस प्रकार है - 

संहिताशाखा
ऋग्वेद- शाकल - बाष्कल - आश्वलायन - शांखायन - मांडूकायन
यजुर्वेद- शुक्ल यजुर्वेद : - माध्यन्दिनीय वाजसनेयि शाखा - काण्व वाजसनेयि शाखा - कृष्ण यजुर्वेद : - तैत्तिरीय - मैत्रायणी - चरक - कठ - कपिष्ठल – कठ - वाधूल - हारिद्रवीय
सामवेद- कौथुम - राणायनीय - जैमिनीय - शाट्यायनीय - छागलेय
अथर्ववेद- पिप्पलाद शाखा - शौनक

अतः स्पष्ट है, **'शाट्यायनीय - संहिता' तथा 'जैमिनीय - संहिता' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 78

अथर्ववेदस्य शाखे स्तः?

A. हारिद्रवीय - संहिता 

B. शौनक - संहिता 

C. छागलेय - संहिता 

D. पैप्पलाद - संहिता

  1. AOption (a)

    A एवं C 

  2. BOption (b)

    A एवं D 

  3. COption (c)

    B एवं D 

  4. DOption (d)

    C एवं D 

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Correct answer

Answer: (c)C.

B एवं D 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अथर्ववेद की कौन सी दो शाखाएँ हैंं?

वेदशाखाओं का विवरण :

वेद से निकले हुए विभाग अथवा अंग को शाखा कहते हैं। पतंजलि ने ऋग्वेद की २१, यजुर्वेद की १००, सामवेद की १००० तथा अथर्ववेद की ९ शाखाएँ बताई हैं। शाखाओं का विवरण शौनक के चरणव्यूह और पुराणों में विस्तारित रूप से मिलता है। वैदिक शाखाओं का विवरण इस प्रकार है - 

संहिताशाखा
ऋग्वेद- शाकल - बाष्कल - आश्वलायन - शांखायन - मांडूकायन
यजुर्वेद- शुक्ल यजुर्वेद : - माध्यन्दिनीय वाजसनेयि शाखा - काण्व वाजसनेयि शाखा - कृष्ण यजुर्वेद : - तैत्तिरीय - मैत्रायणी - चरक - कठ - कपिष्ठल – कठ - वाधूल - हारिद्रवीय
सामवेद- कौथुम - राणायनीय - जैमिनीय - शाट्यायनीय - छागलेय
अथर्ववेद- पैप्पलाद शाखा - शौनक

अतः स्पष्ट है, 'शौनक - संहिता' तथा **'पैप्पलाद - संहिता' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 79

योगदर्शनानुसारं सार्वभौमव्रतेषु कस्य गणना न भवति?

  1. AOption (a)

    ईश्वरप्रणिधानस्य 

  2. BOption (b)

    सत्यस्य 

  3. COption (c)

    अस्तेयस्य 

  4. DOption (d)

    अपरिग्रहस्य 

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Correct answer

Answer: (a)A.

ईश्वरप्रणिधानस्य 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : योगदर्शन के अनुसार सार्वभौम व्रत में किसकी गणना नहीं होती है?

सार्वभौम व्रत

  • योगदर्शन के अष्टांग यह माने गये हैंं - 
  • यम
  • नियम
  • आसन
  • प्राणायाम
  • प्रत्याहार
  • धारणा
  • ध्यान
  • समाधि
  • इन में से "यम उपरमे" धातु से उत्पन्न यम शब्द का अर्थ होता है, निवृत्त होना। इस तरह यम निवृत्तिमूलक है।
  • यम में निम्नलिखित व्रतोंं की गणना होती है - 
  • सत्य
  • अहिंसा
  • अस्तेय
  • ब्रह्मचर्य
  • अपरिग्रह
  • भगवान पतंजलि उपरोक्त व्रतोंं को सार्वभौम व्रतोंं की संज्ञा देते हैंं।

अतः स्पष्ट है, **'ईश्वरप्रणिधानस्य' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

अतिरिक्त :

  • नियम प्रवृत्तिमूलक साधन माने जाते हैं, जो पाँच है -
  • शौच
  • संतोष
  • तप
  • स्वाध्याय
  • ईश्वरप्रणिधान

इस में से ईश्वरप्रणिधान का अर्थ ईश्वर के प्रति सब कर्मों का समर्पण करना होता है।

Question 80

योगदर्शनानुसारं 'संयमः' इत्यनेन कस्य निर्देशः?

  1. AOption (a)

    अहिंसा - सत्य - अस्तेयानि 

  2. BOption (b)

    धारणा - ध्यान - समाधयः 

  3. COption (c)

    यम - नियम - प्रत्याहारः 

  4. DOption (d)

    शौच - संतोष - तपांसि 

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Correct answer

Answer: (b)B.

धारणा - ध्यान - समाधयः 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : योगदर्शन के अनुसार 'संयम' से किसका निर्देश किया गया है?

  • पतंजलि के योग सूत्रोंं में निम्नलिखित संदर्भ आता है - 
  • ‌त्रयमेकत्र संयमः। (योगसूत्र ३.४)
  • अर्थ - अष्टांग योग के अंतिम तीन अंगों (धारणा, ध्यान व समाधि) का किसी एक ही विषय में अभ्यास करना संयम कहलाता है।

 योगसूत्र का तृतीय पाद :

  • इस पाद का नाम विभूति पाद है।
  • इस पाद में यह विषय आते हैंं -
  • धारणा,ध्यान एवं समाधि संयम त्रय के लक्षण
  • उनका शास्त्रीय पारिभाषिक नाम
  • उनकी सिद्धि का फल
  • विभिन्न स्तरों में विनियोग,मोक्ष प्राप्ति में सभी साधक-बाधक सिद्धियाँ या विभूतियाँ
  • संयम के अनुष्ठान से विविध ऐश्वर्य की प्राप्ति
  • विवेक से उत्पन्न ज्ञान का प्रादुर्भाव एवं उसका परिणाम

अतः स्पष्ट है, 'धारणा - ध्यान - समाधयः' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

**अतिरिक्त:**योगसूत्र के तृतीय पाद में संयम के लाभ स्पष्ट किये हैं। उदाहरणार्थ - 

  • सूत्र - शब्दार्थप्रत्ययानामितोसराध्यासात् संक्रस्तत्प्रविभागसंयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम्।
  • भावार्थ - शब्द, अर्थ और ज्ञान का निरंतर अभ्यास हो जाने के कारण मिश्रण होता है। उसके विभाग में संयम करने संपूर्ण प्राणियों के वाणी का ज्ञान हो जाता है।
  • सूत्र - संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम्।
  • भावार्थ - संयम से अपने संस्कारों का साक्षात्कार करने पर पूर्वजन्म का ज्ञान हो जाता है।
  • सूत्र - प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम्।
  • भावार्थ - संयम से दूसरे के चित्त का साक्षात्कार करने पर उसके चित्त का ज्ञान हो जाता है।

अतः धारणा, ध्यान व समाधि के परिणाम से प्राप्त संयम से योगी को अतीत और अनागत का साक्षात्कार होता है।

Question 81

योगदर्शनानुसारमधोऽङिकतेषु वृत्तिर्वर्तते

  1. AOption (a)

    अहिंसा 

  2. BOption (b)

    हिंसा 

  3. COption (c)

    निद्रा 

  4. DOption (d)

    ब्रह्मचर्यम् 

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Correct answer

Answer: (c)C.

निद्रा 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : योगदर्शन के अनुसार निम्नलिखित विकल्पोंं से वृत्ति क्या है?

  • पतंजलि चित्त की वृत्तियों को चंचल होने से रोकना, इसे ही योग मानते हैं।
  • योगः चित्तवृत्तिनिरोधः।
  • योग दर्शन के समाधि पाद अर्थात् प्रथम पाद में चित्त वृत्तियोंं की संख्या पाँँच है -
  • प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः। (योगसूत्र १.६)
  • इस में से जाग्रत तथा स्वप्नावस्था की वृत्तियों के अभाव कारण तमोगुण को विषय बनाने वाली वृत्ति निद्रा कहलाती है।

अतः स्पष्ट है, 'निद्रा' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

**योग दर्शन का स्वरूप :**योग दर्शन में चार पाद है - 

  • प्रथम पाद - समाधि पाद
  • द्वितीय पाद - साधना पाद
  • तृतीय पाद - विभूति पाद
  • चतुर्थ पाद - कैवल्य पाद

समाधि पाद :

पतंजलि योग सूत्र के चार पादों में पहला पाद है समाधिपाद। इस प्रथम पाद में मुख्य रूप से समाधि तथा उसके विभिन्न भेदों का वर्णन किया गया है। अतः इसका नाम समाधि पाद है, इसमें साधकों के लिए समाधि के वर्णन के साथ-साथ योग के विभिन्न साधनों का भी समावेश किया गया है। इस पाद में योग के शुद्धतम स्वरूप, उसके फल, वृत्तियों के प्रकार तथा उनके ठीक ठीक स्वरूप, वैराग्य के भेद,अभ्यास और वैराग्य से वृत्ति निरोध, ईश्वर के सच्चे स्वरूप , योग साधना के मार्ग में आने वाली बाधाओं का विवेचन, जप अनुष्ठान की विधि एवं मनोनिरोध हेतु विविध उपायों का वर्णन, प्रसन्नचित्त रहने के उपाय,समापत्ति के स्वरूप तथा ऋतंभरा प्रज्ञा के लक्षण आदि का वर्णन किया गया है।

साधना पाद :

इस द्वितीय पाद में प्रारंभिक साधक के लिए योग के साधनों का वर्णन किया गया है अर्थात वे उपाय जिनसे योग मार्ग प्रशस्त होता है। अतः इसका नाम साधन पाद है। इस द्वितीय पाद में क्रिया योग और उसका फल अविद्या आदि क्लेश एवं उनका स्वरूप और उनके नाश के उपाय, क्लेश मूल कर्माशय और उसका फल, विवेकी के लिए सबकुछ दुख ही है और उसको हटाने के उपाय, दृश्य का स्वरूप, योग के आठ अंग और उनके फल, प्राणायाम का लक्षण तथा उसके भेद और फल तथा प्रत्याहार का स्वरूप आदि विषयों पर संक्षिप्त रूप में सूत्रकार ने समझाया है।

विभूति पाद :

योग साधनों के श्रद्धापूर्वक किये गए अनुष्ठान से प्राप्त होने वाली विविध प्रकार की सिद्धियों अर्थात विभूतियों का वर्णन इस तृतीय पाद में मुख्य रूप से किया गया है इसी कारण इस पाद का नाम विभूति पाद है। इस पद में धारणा,ध्यान एवं समाधि संयम त्रय के लक्षण तथा उनका शास्त्रीय पारिभाषिक नाम, उनकी सिद्धि का फल तथा विभिन्न स्तरों में विनियोग,मोक्ष प्राप्ति में सभी सिद्धियाँ या विभूतियाँ बाधक हैं इस बात की प्रतिष्ठापना, संयम के अनुष्ठान से विविध ऐश्वर्य की प्राप्ति, विवेक से उत्पन्न ज्ञान का प्रादुर्भाव एवं उसका परिणाम आदि विषयों पर इस पाद में प्रकाश डाला गया है।

कैवल्य पाद :

कैवल्य का अर्थ होता है केवलता अर्थात केवली भाव। आत्मा का अपने शुद्धतम स्वरूप में स्थिति अर्थात अचेतन तत्वों से सर्वथा पृथक, शुद्ध चैतन्य में स्थिति। पांच प्रकार से सिद्धियों को प्राप्त करने के उपाय, चार प्रकार के कर्मों का उल्लेख, कर्माशय के अनुरूप वासनाओं का प्रकटीकरण, स्मृति एवं संस्कार एक रूप होते हैं, संस्कार अनादि हैं, चार प्रकार से संस्कारों (वासनाओं) का संचय, जीवात्मा का अपरिणामित्व,आत्मभाव भावना एवं उसकी निवृत्ति, धर्ममेघ समाधि का स्वरूप एवं फल, प्रतिप्रसव योग जैसे विषयों की विस्तृत व्याख्या की गई है।

Question 82

संस्कृत व्याकरणानुसारं 'भवति' इत्यस्य का स​ञ्ज्ञा भवति? 

  1. AOption (a)

    सर्वनामस्थानम् 

  2. BOption (b)

    भ 

  3. COption (c)

    निष्ठा 

  4. DOption (d)

    पदम् 

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Correct answer

Answer: (d)D.

पदम् 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : संस्कृत व्याकरण के अनुसार 'भवति' की क्या संज्ञा होती है?

संस्कृत व्याकरण में वर्ण, शब्दोंं का लघुरूप दर्शाने के लिये और व्याकरण के नियमोंं में संक्षिप्तता लाने के लिये संज्ञाओंं का निर्माण किया है। इन में से एक पदसंज्ञा है। 

  • पदसंज्ञा विधायक सूत्र : सुप्तिङन्तं पदम्।
  • अर्थ - सुप्-प्रत्ययान्त शब्द और तिङ्-प्रत्ययान्त शब्द पदसंज्ञक होतेंं हैंं।

सुप् प्रत्यय :

यह प्रातिपदिकोंं को लगने वाले प्रत्यय हैंं।

  • सूत्र - सुँ-औ-जस्-अम्-औट्-शस्-टा-भ्याम्-भिस्-ङे-भ्याम्-भ्यस्-ङसिँ-भ्याम्-भ्यस्-ङस्-ओस्-आम्-ङि-ओस्-सुप्। 
  • इस सूत्र से २१ सुप्-प्रत्यय स्पष्ट होतेंं हैंं। यह सारे प्रत्यय प्रातिपदिकोंं के अंत में लगते हैंं। इन के प्रयोग से पदनिर्माण होता है। केवल प्रातिपदिक की पदसंज्ञा नहीं हो सकती। जैसे -
  • राम (प्रातिपदिकम्) + सुँ (प्रथम सुप्-प्रत्यय) = रामः (पद)।

**तिङ् प्रत्यय :**यह धातुओंं को लगने वाले प्रत्यय हैंं।

  • सूत्र - तिप्-तस्-झि-सिप्-थस्-थ-मिप्-वस्-मस्-त-आताम्-झ-थास्-आथाम्-ध्वम्-इड्-वहि-महिङ्। 
  • इस सूत्र से १८ तिङ्-प्रत्यय स्पष्ट होतेंं हैंं। यह सारे प्रत्यय धातु के अंत में लगते हैंं। इन के प्रयोग से भी पदनिर्माण होता है। केवल धातु की पदसंज्ञा नहीं हो सकती। जैसे -
  • यथा - भू - भव् (धातु) + तिप् (प्रथम तिङ्-प्रत्यय) = भवति (पद)।

अतः स्पष्ट है, 'पदम्' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

भवति इस रूप की सिद्धि :

भू सत्तायाम् (भ्वादिः  परस्मैपदी  अकर्मकः  सेट्) का भवति यह कर्तरि लट्लकार का प्रथमपुरुष एकवचन है। 

  • भू - भूवादयो धातवः (१.३.१)
  • भू - लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः (३.४.६९)
  • भू+लँट् - वर्तमाने लट् (३.२.१२३)
  • भू+लँट् - लस्य (३.४.७७)
  • भू+लँट् - हलन्त्यम् (१.३.३)
  • भू+लँ - तस्य लोपः (१.३.९)
  • भू+लँ - उपदेशेऽजनुनासिक इत् (१.३.२)
  • भू+ल् - तस्य लोपः (१.३.९)
  • भू+तिप् - तिप्तस्झिसिप्थस्थमिब्वस्मस्तातांझथासाथांध्वमिड्वहिमहिङ् ३.४.७८)
  • भू+तिप् - लः परस्मैपदम् (१.४.९९)
  • भू+तिप् - तिङस्त्रीणि त्रीणि प्रथममध्यमोत्तमाः (१.४.१०१)
  • भू+तिप् - तान्येकवचनद्विवचनबहुवचनान्येकशः (१.४.१०२)
  • भू+तिप् - शेषे प्रथमः (१.४.१०८)
  • भू+तिप् - तिङ्शित्सार्वधातुकम् (३.४.११३)
  • भू+शप्+तिप् - कर्तरि शप्‌ (३.१.६८)
  • भू+शप्+तिप् - तिङ्शित्सार्वधातुकम् (३.४.११३)
  • भू+शप्+तिप् - लशक्वतद्धिते (१.३.८)
  • भू+अप्+तिप् - तस्य लोपः (१.३.९)
  • भू+अप्+तिप् - हलन्त्यम् (१.३.३)
  • भू+अ+ति - तस्य लोपः (१.३.९)
  • भो+अ+ति - सार्वधातुकार्धधातुकयोः (७.३.८४)
  • भव्+अ+ति - एचोऽयवायावः (६.१.७८)

भवति।

Question 83

स्त्री प्रत्ययानुसारमधोऽङिकतेषु 'ङीष्' प्रत्ययान्तः शब्दोऽस्ति-

  1. AOption (a)

    पचन्ती 

  2. BOption (b)

    देवी 

  3. COption (c)

    भवानी 

  4. DOption (d)

    कुरुचरी 

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Correct answer

Answer: (c)C.

भवानी 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : स्त्री प्रत्ययोंं के अनुसार निम्नलिखित विकल्पोंं में ङीष् प्रत्ययान्त शब्द कौन सा है?

स्त्रीलिंग में ङीष्, ङीप् और ङीन् प्रत्यय लगते हैंं। ङीष् इस प्रत्यय में ङ् और ष् की इत्संज्ञा होकर केवल ई शेष रहता है।

ङीप्-प्रत्यय विधायक सूत्र -  टिड्ढाणञ्द्वयसज्दघ्नञ्मात्रच्तयप्ठक्ठञ्कञ्क्वरपः (४.१.१५)।

  • अर्थ - टित्-शब्द, ढकारादिप्रत्ययान्तशब्द, और 'अण्, अञ्, द्वयसच्, दघ्नच्, मात्रच्, तयप्, ठक्, ठञ्, कञ्, क्वरप्'  इन में से कौन सा भी प्रत्यय शब्द के अंत में होता है, तब स्त्रीत्व दर्शाने के लिये ङीप्-प्रत्यय होता है।

पचन्ती :

सूत्र - उगितश्च। 

  • पच् धातु को शतृँ-प्रत्यय लगकर पचत् यह प्रातिपदिक सिद्ध होता है।
  • इस प्रातिपदिक का स्त्रीत्व बताने के लिये उगितश्च इस सूत्र से ङीप्-प्रत्यय का विधान होता है।
  • बाद में प्रक्रिया में शप्श्यनोर्नित्यम् (७.१.८१) इस सूत्र से नुमागम भी होता है, जिस से पचन्ती यह रूप सिद्ध होता है।

देवी :

सूत्र - नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः (३.१.१३४)

  • इस सूत्र से पचादिगण में होनेवाले चरट्, मोदट्, देवट् इत्यादि प्रातिपदिकोंं में इत्संज्ञक टकार का अस्तित्व होने के कारण टिड्ढाणञ्द्वयसज्दघ्नञ्मात्रच्तयप्ठक्ठञ्कञ्क्वरपः इस सूत्र से स्त्रीलिंग के विवक्षा में ङीप्-प्रत्यय का विधान होगा। जैसे - 
  • दीव्यति सा
  • दिवुँ क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिगतिषु (धातुपाठ ४.१)
  • दिव् + अच् - नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः (३.१.१३४) 
  • ​इस सूत्र से पचादि गण में अच् प्रत्यय होता है।
  • देवट् + ई - टिड्ढाणञ्द्वयसज्दघ्नञ्मात्रच्तयप्ठक्ठञ्कञ्क्वरपः (४.१.१५)
  • दिव्-धातु का अच्-प्रत्ययान्त रूप देवट् है। यहाँँ टित् होने के कारण ङीप् प्रत्यय लगा।
  • देव् + ० + ई - यस्येति च (६.४.१४८)
  • इस सूत्र से देव के अकार का लोप हुआ।
  • देवी

कुरुचरी :

सूत्र - चरेष्टः (३.२.१६)

  • इस सूत्र से चर्-धातु सुबन्त उपपद होने के कारण उस को ट-प्रत्यय लगा। प्रत्यय टित् होने के कारण स्त्रीत्व दर्शाने के लिये ङीप् प्रत्यय का विधान हुआ। जैसे - 
  • कुरुषु चरति सा
  • चरँ गतौ भक्षणे च (धातुपाठ १.६४०)
  • कुरुषु + चर् + ट + ङीप् - चरेष्टः (३.२.१६), टिड्ढाणञ्द्वयसज्दघ्नञ्मात्रच्तयप्ठक्ठञ्कञ्क्वरपः (४.१.१५) 
  • सप्तम्यन्त उपपद में ट-प्रत्यय हुआ। स्त्रीत्वं दर्शाने के लिये ङीप् प्रत्यय हुआ।
  • कुरु + चर् + अ + ई - टकारस्य चुटू (१.३.७)
  • टकार की इत्संज्ञा हुई।
  • तस्य लोपः (१.३.९) इस सूत्र से टकार का लोप हुआ।
  • उपपदमतिङ् (२.२.१९) इस सूत्र से  उपपदसमास हुआ।
  • कृत्तद्धितसमासाश्च (१.२.४६) इस सूत्र से  प्रातिपदिकसंज्ञा हुई।
  • सुपो धातुप्रातिपदिकयोः (२.४.७१) इस सूत्र से सुप् का लुक् अर्थात् लोप हुआ।
  • कुरु + चर् + ० + ई - यस्येति च (६.४.१४८)
  • इस सूत्र से अकार का लोपः हुआ।
  • कुरुचरी
  • कुरुषु चरति सा कुरुचरी

इस विवेचन से यह स्पष्ट होता है, कि पचन्ती, देवी और कुरुचरी इन शब्दोंं में ङीप् प्रत्यय प्रयुक्त है।

अतः स्पष्ट है, 'भवानी' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

**भवानी :**​सूत्र - इन्द्रवरुणभवशर्वरुद्रमृडहिमारण्ययवयवनमातुलाचार्याणामानुक्।

  • अर्थ - इन्द्र-वरुण-भव-शर्व-रुद्र-मृड-हिम-अरण्य-यव-यवन-मातुल-आचार्य इन शब्दोंं के स्त्रीलिंग के लिये ङीष् प्रत्यय प्रयुक्त होता है।

उदाहरण -

  • इन्द्र - इन्द्राणी
  • वरुण - वरुणानी।
  • भव - भवानी।
  • शर्व - शर्वाणी।
  • रुद्र - रुद्राणी।
  • मृड -मृडानी।
  • हिम - हिमानी।
  • अरण्य - अरण्यानी।
  • यव - यवानी।
  • यवन - यवनानी।
  • उपाध्याय - उपाध्यायी।
  • मातुल - मातुलानी, मातुली।
  • आचार्य - आचार्यानी, आचार्या।

Question 84

'उचितं प्राहुराचार्याः सदृशं किल यस्य तत्' इति वचनं वर्तते-

  1. AOption (a)

    आनन्दवर्धनस्य 

  2. BOption (b)

    क्षेमेन्द्रस्य 

  3. COption (c)

    भामहस्य 

  4. DOption (d)

    विश्वनाथस्य 

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Correct answer

Answer: (b)B.

क्षेमेन्द्रस्य 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'उचितं प्राहुराचार्याः सदृशं किल यस्य तत्' यह किसका वचन है?

औचित्यवाद यह काव्य के सिद्धांंतोंं में से एक प्रमुख सिद्धांत है।

  • संपूर्ण पंक्ति :
  • उचितं प्राहुराचार्याः सदृशं किल यस्य यत्। उचितस्य च यो भावस्तदौचित्य प्रचक्षते।।
  • अर्थ - 
  • उचित स्थान पर विन्यस्त होने पर ही अलंकार तथा गुण काव्य की शोभा और उत्कर्षवर्धन में समर्थ होते हैंं। उचित स्थान पर होने से ही काव्य की शोभा बढती है।

औचित्यवाद :

  • उचित स्थान को महत्व होने से ही इस संप्रदाय को औचित्यसंप्रदाय अथवा इस मत को औचित्यवाद, औचित्यमत कहते हैंं।
  • औचित्यवाद के प्रवर्तक आचार्य अभिनवगुप्त के शिष्य आचार्य क्षेमेंद्र है।
  • आचार्य क्षेमेन्द्र औचित्य को ही रस का प्राण और काव्य का जीवित मानते हैं। 
  • औचित्यं रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम्।
  • इस के साथ ही वह अनौचित्य के अतिरिक्त रसभंग का दूसरा कोई कारण नहीं है, ऐसा मानते हैंं।
  • अनौचित्यादृते नान्यद् रसभङ्गस्य कारणम्।
  • क्षेमेंद्र ने इस तत्व को काव्य की आत्मा घोषित कर इसके २७ भेद माने हैं -
  • पद, वाक्य, प्रबंधार्थ, गुण, अलंकार, रस, क्रिया, कारक, लिंग, वचन, विशेषण, उपसर्ग, निपात, काल, देश, कुल, व्रत, तत्व, सत्व, अभिप्राय, स्वभाव, सारसंग्रह, प्रतिभा, अवस्था, विचार, नाम तथा आशीर्वाद।

अतः स्पष्ट है, 'क्षेमेन्द्रस्य' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 85

'वाक्यं स्याद्योग्यताकांक्षासत्तियुक्तः पदोच्चयः'

इदं वाक्यस्वरुपं प्रतिपादितमाचार्येण अनेन-

  1. AOption (a)

    आचार्य - मम्मटेन

  2. BOption (b)

    आचार्य - आनन्दवर्धनेन 

  3. COption (c)

    आचार्य - विश्वनाथेन 

  4. DOption (d)

    आचार्य - वामनेन 

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Correct answer

Answer: (c)C.

आचार्य - विश्वनाथेन 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर - 'वाक्यं स्याद्योग्यताकांक्षासत्तियुक्तः पदोच्चयः' इस प्रकार वाक्यस्वरूप का प्रतिपादन किस आचार्य ने किया है?

पंक्ति का अर्थ - 

  • आकांक्षा, योग्यता और आसक्ति के युक्त पदसमूह हो वाक्य कहा गया है।

आकांक्षा, योग्यता और आसक्ति :

यह उक्ति आचार्य विश्वनाथ कृत साहित्यदर्पण में लिखित है।

  • योग्यता -
  • योग्यता पदार्थानांं परस्परसम्बन्धेे बाधाभावः। 
  • पदार्थोंं के परस्पर संबंंधोंं में बाधा उत्पन्न न होना, यह योग्यता है।
  • आकांक्षा -
  • आकांक्षा**प्रतीतिपर्यवसानविरहः। 
  • प्रतीति का अवसान न होना आकांक्षा है। अर्थात् अर्थज्ञान पूर्ति की जिज्ञासा आकांक्षा है।
  • आसक्ति - 
  • आसक्तिर्बुद्ध्यविच्छेदः। 
  • बुद्धि का विच्छिन्न न होना, समय और पदार्थ में अव्यवधान होना आसक्ति है।

अतः स्पष्ट है, 'आचार्य - विश्वनाथेन' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 86

'यथा हिरण्यं शुचिधातुमध्ये मेरुर्गिरीणां सरसां समुद्रः' 

इदं वचनं कस्मिन काव्ये विलसति?

  1. AOption (a)

    मुद्राराक्षसे 

  2. BOption (b)

    उत्तररामचरिते 

  3. COption (c)

    किरातार्जुनीये 

  4. DOption (d)

    बुद्धचरिते 

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Correct answer

Answer: (d)D.

बुद्धचरिते 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'यथा हिरण्यं शुचिधातुमध्ये मेरुर्गिरीणां सरसां समुद्रः' यह वचन किस काव्य में है?

संपूर्ण पंक्ति :

'यथा हिरण्यं शुचिधातुमध्ये मेरुर्गिरीणां सरसां समुद्रः।

तारास्तु चन्द्रस्तपतां च सूर्यः पुत्रस्तथा ते द्विपदेषु श्रेष्ठः।।'

  • अर्थ - जिस प्रकार धातुओंं में सोना, पर्वतोंं में मेरु, जलाशयोंं में समुद्र, ताराओंं में चंद्र और अग्नियोंं में सूर्य श्रेष्ठ हैंं, उस प्रकार तुम्हारा पुत्र मानवोंं में श्रेष्ठ है।

प्रस्तुत पंक्ति बुद्धचरित में आती है। अतः स्पष्ट है, 'बुद्धचरिते' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

बुद्धचरित :

बुद्धचरित यह अश्वघोष की रचना है। इस काव्य का रचनाकाल दूसरी शताब्दी माना जाता है। 

  • बुद्धचरित २८सर्गों में था जिसमें १४ सर्गों तक बुद्ध के जन्म से बुद्धत्व-प्राप्ति तक का वर्णन है। किन्तु बुद्धचरितम् मूल रूप में अपूर्ण ही उपलब्ध है। 28 सर्गों में विरचित इस महाकाव्य के दूसरे सर्ग से लेकर तेरहवें सर्ग तक पूर्ण रूप से तथा पहला एवं चौदहवाँ सर्ग के कुछ अंश ही मिलते हैं।
  • प्रथम सर्ग के प्रारम्भ के सात श्लोक और चतुर्दश सर्ग के बत्तीस से एक सौ बारह तक (81 श्लोक) मूल में नहीं मिलते हैं।
  • संक्षेप में इस महाकाव्य में बुद्ध के जन्म से लेकर महानिर्वाण तथा बुद्ध के सिद्धांतोंं का वर्णन आता है।

Question 87

मनुमते स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो किमिदं व्यञ्जयन् प्रादुरासीत्?

  1. AOption (a)

    ज्ञानमिदम् 

  2. BOption (b)

    अज्ञानमिदम् 

  3. COption (c)

    जगदिदम् 

  4. DOption (d)

    तममिदम् 

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Correct answer

Answer: (c)C.

जगदिदम् 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : मनुमत के अनुसार स्थूल रूप में प्रकट न होने वाला स्वयंभू भगवान इन में से किसे प्रकटावस्था में लाते हुए प्रकट हुआ?

मनुमत :

ततः स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम्। महाभूतादि वृत्तौजाः प्रादुरासीत्तमोनुदः*।।* (मनुस्मृति, १.६)

  • शब्दार्थ - 
  • स्वयंभू - अपने कार्यों को करने में स्वयं समर्थ
  • अव्यक्तः - स्थूल रूप में प्रकट न होने वाला
  • तमोनुदः - ‘तम’ रूप प्रकृति का प्रेरक, प्रकटावस्था की ओर उन्मुख करने वाला
  • महाभूतादि वृत्तौजाः - अग्नि, वायु आदि महाभूतों को आदि शब्द से महत् अहंकार आदि को भी उत्पन्न करने की महान! शक्तिवाला
  • भगवान् - परमात्मा
  • व्यंजयन् - प्रकटावस्था में लाते हुए ही
  • प्रादुरासीत् - प्रकट हुआ।
  • भावार्थ - तब अपने कार्यों को करने में स्वयं समर्थ, किसी दूसरे की सहायता की अपेक्षा न रखने वाला, स्थूल रूप में प्रकट न होने वाला, ‘तम’ रूप प्रकृति का प्रेरक, प्रकटावस्था की ओर उन्मुख करनेवाला, अग्नि, वायु आदि महाभूतों को आदि शब्द से महत् अहंकार आदि को भी उत्पन्न करने की महान शक्तिवाला, परमात्मा, इस समस्त संसार को प्रकटावस्था में लाते हुए ही प्रकट हुआ।

अतः स्पष्ट है, 'जगदिदम्' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

संभ्रमबिंदु :

इस श्लोक में जगत् का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है। शब्दसादृश्य के कारण 'तममिदम्' इस विकल्प में संभ्रम हो सकता है। किंतु यहाँँ ध्यान रखना चाहिये, कि परमात्मा तम रूप प्रकृति का प्रेरक है और समस्त संसार को प्रकटावस्था में लाने वाला है।

Question 88

'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः'- इति मन्त्रांशे 'यज्ञम्' इति पदस्य भाष्यकार- सायणानुसारमर्थोऽस्ति?

  1. AOption (a)

    प्रजापतिम् 

  2. BOption (b)

    हविर्यज्ञम् 

  3. COption (c)

    श्रौतयज्ञम् 

  4. DOption (d)

    सद्वृत्त

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Correct answer

Answer: (a)A.

प्रजापतिम् 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः' इस मंत्र में 'यज्ञम्' इस पद का भाष्यकार सायणाचार्य के अनुसार क्या अर्थ है?

  • संपूर्ण मंत्र : 
  • ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् I ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाःII (ऋ. १०.७०.१६)
  • मंत्र का अर्थ : 
  • देवताओं ने (पूर्वोक्त रूप से) यज्ञ के द्वारा यज्ञस्वरूप परम्-पुरुष का यजन (आराधन, यज्ञ) किया। इस यज्ञ से सर्व प्रथम धर्म उत्पन्न हुए। उन धर्मों के आचरण से वे देवता महान महिमावाले हो कर उस स्वर्गलोक का सेवन करते हैं, जहां प्राचीन साध्य-देवता निवास करते हैं। (अत: हम सभी सर्वव्यापी जड़-चेतनात्मकरूप विराट् पुरुष की करबद्ध स्तुति करते हैं।)

सायणाचार्य, सायणभाष्य में 'यज्ञम्' को 'यज्ञं यथोक्तयज्ञस्परूपं प्रजापतिम्' अर्थात् यज्ञ को जनन और पोषण करनेवाले प्रजापति देवता के रूप में मानते हैंं।

अतः स्पष्ट है, **'प्रजापतिम्' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

अतिरिक्त :

  • प्राचीन काल में वशिष्ठ, शक्ति, पराशर, वेदव्यास, जैमिनी, याज्ञवल्क्य, कात्यायन इत्यादि ऋषियों को वेदों के अच्छे ज्ञाता माना जाता है।
  • मध्यकाल में रचित व्याख्याओं में सायणाचार्य रचित चतुर्वेदभाष्य "माधवीय वेदार्थदीपिका" सर्वश्रुत है। सायणाचार्य को वेदों का प्रसिद्ध भाष्यकार माना जाता है।  उन्होंने ही प्रथम बार वेदों के भाष्य या अनुवाद में देवी-देवता, इतिहास और कथाओं का उल्लेख किया जिसको आधार मानकर महीधर और अन्य भाष्यकारों ने अपनी व्याख्या की। महीधर और उव्वट इसी श्रेणी के भाष्यकार थे।
  • आधुनिक काल में राजा राममोहन राय का ब्रह्म समाज और दयानन्द सरस्वती का आर्य समाज लगभग एक ही समय में वेदों के सबसे बड़े प्रचारक बने। दयानन्द सरस्वती ने यजुर्वेद और ऋग्वेद का लगभग सातवें मंडल के कुछ भाग तक भाष्य किया। सामवेद और अथर्ववेद का भाष्य पं. हरिशरण सिद्धान्तलंकार ने किया है।
  • वैदिक संहिताओं के प्रसिद्ध अनुवाद इस प्रकार है -
  • रमेशचंद्र दत्त - बंगाली
  • रामगोविन्द त्रिवेदी एवं जयदेव वेदालंकार - हिन्दी
  • श्रीधर पाठक - मराठी

इसके बाद गायत्री तपोभूमि के श्रीराम शर्मा आचार्य ने भी वेदों के भाष्य प्रकाशित किये हैं। इनके भाष्य सायणाधारित हैं। अन्य भी वेदों के अनेक भाष्यकार हैं।

Question 89

'सा नो दधातु भद्रया प्रिये धामनिधामनि' अत्र स्तूयमाना देवी का?

  1. AOption (a)

    उषस् 

  2. BOption (b)

    भूमिः 

  3. COption (c)

    वाक् 

  4. DOption (d)

    सरस्वती 

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Correct answer

Answer: (b)B.

भूमिः 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'सा नो दधातु भद्रया प्रिये धामनिधामनि' इस मंत्र में स्तुत देवी कौन है?

  • संपूर्ण मंत्र : 
  • यस्यां कृष्णमरुणं च संहिते अहोरात्रे विहिते भूम्यामधि । वर्षेण भूमिः पृथिवी वृतावृता सा नो दधातु भद्रया प्रिये धामनिधामनि।।
  • अर्थ :
  • ईश्वरनियम से जिस प्रकार दिन-रात मिले हुए हैं और पृथिवी मेघमण्डल से छायी है, वैसे ही मनुष्य पृथिवी पर उत्तम बुद्धि के साथ रहकर सब स्थानों में आनन्द करें।​

भूमि सूक्त :

  • प्रस्तुत मंत्र अथर्ववेद के १२ वे कांड का प्रथम सूक्त से लिया है।
  • अथर्ववेद का यह सूक्त भूमि सूक्त के नाम से भी जाना जाता है।
  • इस सूक्त में समस्त प्राणियोंं का जीवन सु���मय और मंगलमय हो, ऐसी कामना की है। चर-अचर जीव, पर्यावरण, भूमि का महत्व इस का भी वर्णन इस सूक्त में आता है।
  • इस सूक्त में कुल ६३ मंत्र आते है। यह इस सूक्त का ५२ वा मंत्र है।
  • भूमि सूक्त के ऋषि अथर्व, देवता भूमि और छंद त्रिष्टुप् है।

अतः स्पष्ट है, 'भूमिः' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

अतिरिक्त :

वैदिक शब्दों का अर्थबोध होने के लिए ऋषि, देवता, विनियोग और छंद का ज्ञान होना आवश्यक है। ऐसा कहा जाता है, 

ऋषिच्छन्दो दैवतानि ब्राह्मणार्थं स्वराद्यपि

अविदित्वा प्रयुञ्जानो मन्त्रकण्टक उच्यते।

अविदित्वा ऋषिं छन्दो दैवतं योगमेव च

योऽध्यापयेज्जपेद् वापि पापीयाञ्जायते तु स:।। (बृहद्देवता ८.१३६)

  • अर्थ - जो व्यक्ति मन्त्रों के ऋषि, छन्द, देवता और अर्थानुसारी विनियोग को विना जाने वेदमन्त्रों का अध्यापन अथवा जप करता है, वह पापी होता है।

देवता :

यत्काम ऋषिर्यस्यां देवतायामार्थपत्यमिच्छन् स्तुतिं प्रयुङ्क्ते तद्दैवतः स मन्त्रो भवति।  (निरुक्तम् ७.१.)

  • ऋषि मंत्र में किस देवता की स्तुति करना चाहेंं, वही उस मंत्र की देवता होती है।

अथवा

तेन वाक्येन यत्प्रतिपाद्यं वस्तु सा देवता। (बृहद्देवता १.६) 

  • वाक्य से जो प्रतिपादित की गई वस्तु होती है, वह इस वाक्य की देवता होती है।

Question 90

'सौत्रान्तिकमतम्', 'वैभाषिकमतम्' अनयोः सम्बन्धो वर्तते-

  1. AOption (a)

    बौद्धदर्शनेन 

  2. BOption (b)

    जैनदर्शनेन 

  3. COption (c)

    चार्वाकदर्शनेन 

  4. DOption (d)

    न्यायदर्शनेन 

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Correct answer

Answer: (a)A.

बौद्धदर्शनेन 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'सौत्रान्तिकमतम्', 'वैभाषिकमतम्' इसका संबंध किस से है?

सौत्रान्तिकमतम् और वैभाषिकमतम् का संबंध बौद्ध दर्शन से है। 

सौत्रान्तिक मत :

  • 'सौत्रांतिक मत हीनयान परंपरा का बौद्ध दर्शन है। इसका प्रचार भी लंका में है।
  • इस मत के अनुसार पदार्थों का प्रत्यक्ष नहीं, अनुमान होता है। अत: उसे बाह्यानुमेयवाद कहते हैं।
  • सौत्रान्तिक पाठशाला की शुरुआत बौद्ध मुनि कुमारलात से मानी जाती है।
  • ये बाह्यार्थ को अनुमेय मानते हैं।
  • यद्यपि बाह्यजगत की सत्ता दोनों स्वीकार करते हैं, किन्तु दृष्टि के भेद से एक के लिए चित्त निरपेक्ष तथा दूसरे के लिए चित्त सापेक्ष अर्थात् अनुमेय सत्ता है।
  • सौत्रान्तिक मत में सत्ता की स्थिति बाह्य से अन्तर्मुखी है।

वैभाषिक मत :

  • वैभाषिक मत बाह्य वस्तुओं की सत्ता तथा स्वलक्षणों के रूप में उनका प्रत्यक्ष मानता है।
  • अत: उसे बाह्य प्रत्यक्षवाद अथवा "सर्वास्तित्ववाद" कहते हैं।
  • ये अर्थ को ज्ञान से युक्त अर्थात् प्रत्यक्षगम्य मानते हैं।

अतः स्पष्ट है, 'बौद्धदर्शनेन' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

बौद्ध दर्शन :

  • बौद्ध दर्शन से संबंध उस दर्शन से है जो भगवान बुद्ध के निर्वाण के बाद बौद्ध धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों द्वारा विकसित किया गया है।
  • बुद्ध के उपदेश तीन पिटकों में संकलित हैं। ये सुत्त पिटक, विनय पिटक और अभिधम्म पिटक कहलाते हैं। ये पिटक बौद्ध धर्म के आगम हैं।
  • अनात्मवादी होने के कारण बौद्ध धर्म का वेदांत से विरोध हुआ। अतः जैन और चार्वाक दर्शन के साथ इसकी गणना नास्तिक दर्शन में होती है।
  • सिद्धांतभेद के अनुसार बौद्ध परंपरा में चार दर्शन प्रसिद्ध हैं।
  • वैभाषिक मत - यह बाह्य वस्तुओं की सत्ता तथा स्वलक्षणों के रूप में उनका प्रत्यक्ष मानता है।
  • सौत्रांतिक मत - इस मत के अनुसार पदार्थों का प्रत्यक्ष नहीं, अनुमान होता है।
  • योगाचार मत - यह विज्ञानवाद मानता है।
  • मा��्यमिक मत - विज्ञान भी सत्य नहीं है। सब कुछ शून्य है। शून्य का अर्थ निरस्वभाव, नि:स्वरूप अथवा अनिर्वचनीय है।
  • इनमें वैभाषिक और सौत्रांतिक मत हीनयान परंपरा में हैं। यह दक्षिणी बौद्धमत हैं। इसका प्रचार भी लंका में है। योगाचार और माध्यमिक मत महायान परंपरा में हैं। यह उत्तरी बौद्धमत है।

Question 91

'अध्यात्मम्' अत् कतमः समासः?

  1. AOption (a)

    द्वन्द्वः 

  2. BOption (b)

    अव्ययीभावः 

  3. COption (c)

    तत्पुरुषः 

  4. DOption (d)

    बहुव्रीहिः 

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Correct answer

Answer: (b)B.

अव्ययीभावः 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'अध्यात्मम्' इस शब्द में कौन सा समास है?

'अध्यात्मम्' इस शब्द का अर्थ आत्मा से संबंधित यह होता है।

  • 'अध्यात्मम्' इस शब्द में पूर्वपद में अधि यह अव्यय और उत्तरपद में आत्मन् यह शब्द है।
  • समासविग्रह - आत्मनि अधि।
  • अर्थ - आत्मा में।
  • जहाँ पूर्वपद अव्यय हो उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं।

अतः स्पष्ट है, **'अव्ययीभावः' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

अव्ययीभाव समास :

  • अव्ययीभाव समास विधायक सूत्र - ‘अव्ययं विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्यृद्धि-अर्थाभाव-अत्यय-असम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चात्-यथा-आनुपूर्व-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्य-अन्तवचनेषु’
  • अर्थ - समीप, समृद्धि, वृद्धि का अभाव, अर्थाभाव, नाश (अत्यय), अनुचित (असम्प्रति), शब्द का प्रादुर्भाव, पश्चात्, यथा, क्रमशः, एकसाथ, सादृश्य, सम्पत्ति, संपूर्णता (साकल्य) और अंत आदि अर्थ से मिलनेवाले अव्ययों के साथ समास हो तो वह अव्ययीभाव समास’ होता है।
  • अन्य सहाय्यक सूत्र - प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम्, उपसर्जनं पूर्वम्, कृत्तद्धितसमासाश्च, सुपो धातुप्रातिपदिकयोः।​

'अध्यात्मम्' इस रूप की सिद्धि :

अव्ययीभाव समास नित्य समास है। जिस समास का विग्रह नहीं होता है, अथवा अपने पदों से विग्रह नहीं होता है, वह नित्य समास होता है।

  • 'अध्यात्मम्' इस शब्द का इन दो प्रकारों में विग्रह हो सकता है -
  • आत्मनौ इति - लौकिक विग्रह।
  • आत्मनि अधि - अलौकिक विग्रह।
  • समास बताने वाले सूत्रोंं में प्रथमा विभक्ति में निर्दिष्ट पद की उपसर्जन संज्ञा होती है। अतः यहाँँ अव्यय की उपसर्जन संज्ञा होगी।
  • समास में उपसर्जन का प्रथम प्रयोग होता है।
  • 'अध्यात्मम्' यहाँँ 'अधि' यह शब्द सप्तमी के अर्थ में प्रयुक्त है। अव्ययीभाव समास विधायक सूत्र केवल अलौकिक विग्रह में ही लगेगा।
  • आत्मनि अधि इस पूर्ण समूह को प्रथम कृत्तद्धितसमासाश्च इस सूत्र से प्रातिपदिक संज्ञा होती है।
  • सुपो धातुप्रातिपदिकयोः इस सूत्र से विभक्ति प्रत्यय का लोप होकर केवल आत्मन् शेष रहा। अधि को प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् से उपसर्जन संज्ञा प्राप्त हुई।
  • उपसर्जनं पूर्वम् इस सूत्र से अधि का प्रयोग आत्मन् से पूर्व हुआ।
  • इस समास में पूर्वपद प्रधान होने से और सामासिक पद नित्य नपुंसकलिंगी होने से 'अध्यात्मम्' यह रूप सिद्ध हुआ।

Question 92

नियमपूर्वकविद्याध्ययने अध्यापकः किं संज्ञो भवति?

  1. AOption (a)

    अधिकरणसंज्ञः 

  2. BOption (b)

    कर्मसंज्ञः 

  3. COption (c)

    करणसंज्ञः  

  4. DOption (d)

    अपादानसंज्ञः 

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Correct answer

Answer: (d)D.

अपादानसंज्ञः 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : नियमपूर्वक विद्याध्ययन करने से अध्यापक को क्या संज्ञा होगी?

नियमपूर्वक विद्याध्ययन करने से अध्यापकाद् अधीते इस वाक्य में अध्यापक शब्द की अपादानसंज्ञा होती है।

  • सूत्र - आख्यातोपयोगे। (१.४.२९)
  • अर्थ - आख्याता इस शब्द का अर्थ प्रतिपादयिता यह होता है। अध्यापक, शिक्षक, उपाध्याय अथवा गुरु जिससे नियमपूर्वक और सातत्य से विद्याग्रहण होता है, उसे अपादानसंज्ञा होती है। अपादानसंज्ञक शब्द की पंचमी होती है। उदाहरण - 
  • उपाध्यायाद् आगमयति।
  • उपाध्यायाद् अधीते।

अपादान कारक का बाध :

नियमपूर्वक क्रिया न होने पर कारक को अपादानसंज्ञा न होकर उसकी षष्ठी विभक्ति होती है। उदाहरण - 

  • नटस्य गाथां शृणोति।
  • ग्रन्थिकस्य शृणोति।

अतः स्पष्ट है, **'अपादानसंज्ञः' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 93

'हर्षचरितम्' इत्यस्य रचनाकारः वर्तते-

  1. AOption (a)

    श्रीहर्षः 

  2. BOption (b)

    हर्षदेवः 

  3. COption (c)

    बाणभट्टः

  4. DOption (d)

    भारविः 

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Correct answer

Answer: (c)C.

बाणभट्टः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : हर्षचरितम्  के रचनाकार है-

स्पष्टीकरण : बाणभट्ट संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध गद्यकाव्य रचनाकार है। उनकी दो गद्यरचनाएँँ उपलब्ध है - कादंबरी और हर्षचरितम्। हर्षचरितम् इस काव्य में महाराजा हर्षवर्धन के चरित्र का वर्णन है। अतः स्पष्ट है, 'बाणभट्टः' यह इस प्रश्न का उत्तर है। 

Additional Information 

अन्य विकल्पोंं में दिये गए काव्योंं के रचनाकार - 

  • दशकुमारचरितम् - दण्डी द्वारा रचित गद्यकाव्य
  • महावीरचरितम् - भवभूति द्वारा रचित नाटक
  • उत्तररामचरितम् - भवभूति द्वारा रचित नाटक

Question 94

'श्रूयतां महाभाग विदर्भो नाम जनपदः तस्मिन् भोज वंश भूषणम् ------'

इति गद्यखण्डं कस्यां रचनायां विद्यते?

  1. AOption (a)

    स्वप्नवासवदत्ते 

  2. BOption (b)

    कादम्बर्याम् 

  3. COption (c)

    दशकुमारचरिते 

  4. DOption (d)

    हर्षचरिते 

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Correct answer

Answer: (c)C.

दशकुमारचरिते 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'श्रूयतां महाभाग विदर्भो नाम जनपदः तस्मिन् भोज वंश भूषणम् ------' यह गद्यखंड किस रचना में आता है?

इस पंक्ति में विदर्भ नाम के जनपद का राजा, भोजवंश का भूषण पुण्यवर्मा नामक राजा का वर्णन आया है। प्रस्तुत गद्यखंड दशकुमारचरितम् के उत्तरपीटिका के अष्टमोच्छ्वास से संगृहित है।

अतः स्पष्ट है, **'दशकुमारचरिते' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

दशकुमारचरितम् :

चरित गद्यकाव्य है, जो संस्कृत सा���ित्य के रचनाकार दंडी की रचना है। इसमें दस कुमारों ने अपनी-अपनी यात्राओं के विचित्र अनुभवों तथा पराक्रमों का मनोरंजक वर्णन किया है। विनोद और व्यंग्य के माध्यम से इसमें तत्कालीन समाज का भी चित्रण किया गया है।

  • दशकुमार रचना को दंडी की प्रारम्भिक रचना माना जाता है, अतः दंडी को संस्कृत का पहला गद्यकार भी कहा जाता है।
  • दशकुमारचरित के हस्तलिखित तथा प्रकाशित संस्करणों में प्राय: तीन भाग हैं-
  • आरंभिक अथवा भूमिका भाग, जिसमें पाँच उच्छ्वास हैं, पूर्वपीठिका के नाम से प्रसिद्ध हैं;
  • मध्यम भाग, जिसमें आठ उच्छ्वास हैं, दशकुमारचरित के नाम से जाना जाता है।
  • अंतिम अथवा परिशिष्ट भाग, जो उत्तरपीठिका के नाम से प्रसिद्ध है।
  • दशकुमारों के नाम इस प्रकार है - 
  • राजवाहन
  • सोमदत्त
  • पुष्पोद्भव
  • अपहारवर्मन
  • उपहारवर्मन
  • अर्थपाल
  • प्रमति
  • मित्रगुप्त
  • मंत्रगुप्त
  • विश्रुत
  • संस्कृत साहित्य में दशकुमारचरित का अनुपम स्थान है। वस्तुत: यह संस्कृत गद्यकाव्य आधुनिक उपन्यासों के बहुत निकट है। यह तत्कालीन समाज का सर्वांगीण यथार्थ चित्र उपस्थित करता है। दशकुमारचरित धूर्तता से पूर्ण काव्य कहा जाता है। द्युतक्रीड़ा, सेंध लगाना, चालाकी, धूर्तता, प्रवंचना, हिंसा, हत्या, जालसाजी, अपहरण एवं अवैध प्रेम एक-एक अथवा सामूहिक रूप में सब कथाओं में मिलते हैं। ब्राह्राण, संन्यासी, राजा, राजकुमारियाँ एवं पवित्र साधुओं का उपहास किया गया है। देवताओं को भी अपवाद के रूप में नहीं देखा गया है। परन्तु इसका उद्देश्य अनैतिकता का समर्थन करना नहीं है। लोगों की मिथ्या मान्यताओं का विश्लेषण करके समाज के सम्मुख प्रस्तुत करना ही इनका मुख्य उद्देश्य है।

Question 95

"यौवनारम्भे च प्रायः शास्त्रजलप्रक्षालननिर्मलापि कालुष्यमुपयाति बुद्धिः" इति केनोपदिष्टम्?

  1. AOption (a)

    तारापीडेन 

  2. BOption (b)

    चंद्रापीडेन 

  3. COption (c)

    शुकनासेन 

  4. DOption (d)

    महाश्वेतया 

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Correct answer

Answer: (c)C.

शुकनासेन 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'यौवन के प्रारंभ में शास्त्रजल से प्रक्षालित, निर्मल बुद्धि भी कलुषित होती है' यह उपदेश किसने किया है?

यौवन के प्रभाव का वर्णन करते हुए यह उपदेश शुकनास इस मन्त्री के किया है। शुकनास ने किया हुआ उपदेश 'शुकनासोपदेश' इस नाम से प्रसिद्ध है। 'शुकनासोपदेश' यह बाणभट्ट विरचित कादंबरी ग्रंथ का एक भाग है।

शुकनासोपदेश :

  • शुकनासोपदेश का नायक राजकुमार चन्द्रापीड है, जो सत्व, शौर्य और आर्जव भावों से युक्त है। शुकनास राजा तारापीड के एक अनुभवी मन्त्री हैं जो चन्द्रापीड को राज्याभिषेक के पूर्व वात्सल्यभाव से उपदेश देते हैं। इसे युवावस्था में प्रवेश कर रहे समस्त युवकों को प्रदत्त ‘दीक्षान्त भाषण’ कहा जा सकता है।
  • 'शुकनासोपदेश', कादम्बरी का प्रवेशद्वार माना जाता है। लक्ष्मी, यौवन, उससे उत्पन्न होनेवाला मद, उससेही राजाओंं की भ्रष्ट बुद्धि, इन सब के दोषोंं का वर्णन यह शुकनासोपदेश का प्रमुख विषय है।
  • जन्म से प्राप्त ऐश्वर्य, नई युवावस्था, अनुपम सौंदर्य और अलौकिक शक्ति इन में से एक भी अनर्थ का कारण हो सकता है, तो चार कारण एकसाथ होने से यह अनर्थ की परंपरा है, ऐसा प्रतिपादन शुकनास मन्त्री करता है।
  • राजपुत्र होने के कारण इन चार चीजोंं को सावधानीपूर्वक कैसे संभाला जाय, इसका बोध शुकनास मन्त्री देता है। 'शुकनासोपदेश' का कादंबरी से भी अलग ऐसा, अपना महत्वपूर्ण स्थान संस्कृत साहित्यसृष्टि में है।

अतः स्पष्ट है, **'शुकनासेन' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

कादम्बरी:

  • कादंबरी संस्कृत साहित्य का महान उपन्यास है। इसके रचनाकार बाणभट्ट हैं। यह विश्व का प्रथम उपन्यास है, ऐसा माना जाता है। इसकी कथा सम्भवतः गुणाढ्य द्वारा रचित बृहद्कथा के राजा सुमानस की कथा से ली गयी है। यह ग्रन्थ बाणभट्ट के जीवनकाल में पूरा नहीं हो सका। उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र भूषणभट्ट (या पुलिन्दभट्ट) ने इसे पूरा किया। बाणभट्ट द्वारा लिखित भाग का नाम 'पूर्वभाग' है और भूषणभट्ट  द्वारा लिखित भाग का नाम 'उत्तरभाग' है।
  • संक्षेप में कथा
  • उज्जयिनी में तारापीड नाम का एक राजा था जिसका शुकनास नाम का एक बुद्धिमान मंत्री था। राजा को चन्द्रापीड नाम के एक पुत्र की प्राप्ति हुई और मंत्री के पुत्री का नाम वैशम्पायन था। दिग्विजय के प्रसंग में चन्द्रापीड एक सुन्दर अच्छोदसरोवर पर पहुँचा जहाँ असमय में दिवंगत प्रेमी पुण्डरीक की प्रतीक्षा करती हुई कामपीडित कुमारी महाश्वेता नाम की एक सुन्दरी उसे मिली। महाश्वेता ने अपनी सखी कादम्बरी के विषय में चन्द्रापीड को बताया और उसके कादम्बरी के पास ले गयी। प्रथम दर्शन से ही कादम्बरी और चन्द्रापीड का प्रेम हो गया। तभी चन्द्रापीड के पिता ने उसे वापिस बुलाया और अपनी पत्रलेखा नाम की परिचारिका को कादम्बरी के पास छोड़कर चन्द्रापीड वापस आ गया। पत्रलेखा ने भी कादम्बरी-विषयक सूचना को भेजते हुए चन्द्रापीड को प्रसन्न रखा। बाण की कृति यहाँ समाप्त हो जाती है।
  • रस-प्रवणता, कला-सौन्दर्य, वक्रोक्तिमय अभिव्यंजना-प्रणाली, सानुप्रासिक समासान्तपदावली, दीपक, उपमा और स्वाभावोक्ति की रुचिर योजना, जिसके बीच-बीच में श्लेष, विरोधाभास और परिसंख्या से काव्य को शोभा प्राप्त हुई है, यह बाण के गद्य काव्य की विशेषता है। इसलिये कहा जाता है, बाण सर्वश्रेष्ठ गद्य कवि है।

Question 96

ब्राह्मणग्रन्थेषु वर्णनं नोपलभ्यते?

  1. AOption (a)

    पुनर्जन्मनः 

  2. BOption (b)

    त्रयाणां लोकानाम् 

  3. COption (c)

    आत्मनः 

  4. DOption (d)

    परमाण्वस्त्रस्य 

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Correct answer

Answer: (d)D.

परमाण्वस्त्रस्य 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : ब्राह्मणग्रंथोंं में कौन सा वर्णन उपलब्ध नहीं होता है?

  • यज्ञों एवं कर्मकाण्डों के विधान एवं इनकी क्रियाओं को भली-भांति समझने के लिए ही इस ब्राह्मण ग्रंथ की रचना हुई।
  • 'ब्रह्म' का शाब्दिक अर्थ हैं- यज्ञ अर्थात् यज्ञ के विषयों का अच्छी तरह से प्रतिपादन करने वाले ग्रंथ ही 'ब्राह्मण ग्रंथ' कहे गये।
  • ब्राह्मण ग्रन्थों में सर्वथा यज्ञों की वैज्ञानिक, अधिभौतिक तथा अध्यात्मिक मीमांसा की गयी है।

**ब्राह्मण ग्रंथोंं के प्रतिपाद्य विषय :**ब्राह्मणग्रन्थों का मुख्य विषय यज्ञ का सर्वांगपूर्ण निरूपण है।

इस के साथ ही विश्वोत्पत्ति, गूढ कथाएँँ, उनका यज्ञ के विधि में प्रयोजन इसका विवरण ब्राह्मणग्रंथोंं में आता है।

विकल्पोंं में दिये हुए विषयोंं में से पुनर्जन्म, तीन लोक, आत्मास्वरूप का वर्णन यह विषय ब्राह्मणग्रंथोंं में आतेंं है। 

अतः स्पष्ट है, 'परमाण्वस्त्रस्य' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

Additional Informationप्रत्येक संहिता के अपने ब्राह्मण ग्रंथ होतेंं है। उनका विवरण इस प्रकार है -  

संहिताब्राह्मणग्रंथ
ऋग्वेद- ऐतरेयब्राह्मण-(शैशिरीयशाकलशाखा) - कौषीतकी (शांखायन) ब्राह्मण (बाष्कल शाखा)
यजुर्वेद- शुक्ल यजुर्वेद : - शतपथब्राह्मण-(माध्यन्दिनीय वाजसनेयि शाखा) - शतपथब्राह्मण-(काण्व वाजसनेयि शाखा) - कृष्णयजुर्वेद : - तैत्तिरीयब्राह्मण - मैत्रायणीब्राह्मण - कठब्राह्मण - कपिष्ठलब्राह्मण
सामवेद- प्रौढ(पंचविंश) ब्राह्मण - षडविंश ब्राह्मण - आर्षेय ब्राह्मण - मन्त्र (या छांदोग्य) ब्राह्मण - जैमिनीय ब्राह्मण
अथर्ववेद- गोपथब्राह्मण (पिप्पलाद शाखा)

Question 97

'न ब्राह्मणासो न सुतेकरासः' इति मन्त्रांशे 'सुतेकरासः' इति पदस्य सायणानुसारमर्थोऽस्ति?

  1. AOption (a)

    कृषकाः 

  2. BOption (b)

    सुताः 

  3. COption (c)

    ऋत्विजः 

  4. DOption (d)

    ब्राह्मणाः 

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Correct answer

Answer: (c)C.

ऋत्विजः 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'न ब्राह्मणासो न सुतेकरासः' इस मंत्र के भाग में  'सुतेकरासः' इस पद का सायणाचार्य के अनुसार क्या अर्थ है?

स्पष्टीकरण - यह मंत्र ऋग्वेद के दशम मंडल के ७१ वे सूक्त का नवम मंत्र हैंं।

  • संपूर्ण मंत्र :
  • इमे ये नार्वाङ्न परश्चरन्ति न ब्राह्मणासो न सुतेकरासः। त एते वाचमभिपद्य पापया सिरीस्तन्त्रं तन्वते अप्रजज्ञयः॥
  • अर्थ :
  • जो मनुष्य इस लोक के शास्त्र को नहीं जानते तथा न परलोकशास्त्र अर्थात् अध्यात्मशास्त्र को जानते हैं, वे न ब्राह्मण हैं, न उपासक हैं, किन्तु अज्ञानरूप पाप से युक्त हुए केवल सन्तान वंश का या अपने शरीर का ही विस्तार करते हैं।

इस मंत्र में सुतेकरासः यह शब्द को सायणाचार्य 'ऋत्विजः' अर्थात् उपासना करनेवाला, याग करनेवाला इस प्रकार स्पष्ट करते हैंं।​

Additional Information

  • यह सूक्त ज्ञानसूक्त के नाम से जाना जाता है।
  • सूक्त का विवरण इस प्रकार है - 
  • देवता - ज्ञान
  • ऋषि - बृहस्पति अंगिरस
  • छंद - त्रिष्टुप्, नवम मंत्र : जगति
  • कुल मंत्रसंख्या - ११

Question 98

वाचः काठिन्यमायान्ति भङ्गश्लेषविशेषतः 

नोव्देगस्तत्र कर्त्तव्यो यस्मान्नैको रसः कवेः 

इति पद्यं कस्मिन काव्ये विलसति?

  1. AOption (a)

    दशकुमारचरिते 

  2. BOption (b)

    कादम्बर्याम् 

  3. COption (c)

    शिवराज विजये 

  4. DOption (d)

    नलचम्पू काव्ये 

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Correct answer

Answer: (d)D.

नलचम्पू काव्ये 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'वाचः काठिन्यमायान्ति भङ्गश्लेषविशेषतः। नोव्देगस्तत्र कर्त्तव्यो यस्मान्नैको रसः कवेः।।' यह काव्य किस काव्य में है?

पद्य का हिंदी भाषांतर : 

  • भङ्गश्लेष की विशेषता से, श्लेषालंकार की छटा से वाक्य कठिन हो जाता है। परंतु घबराना नहीं चाहिये, कवि को एक रस रुचिकर नहीं होता।

विशेष :

  • यहाँँ कवि को श्लेषालंकार में अधिक रुचि और रसानुभूति प्रतीत होती है। यह उक्ति नलचम्पू के प्रथम उच्छ्वास में आयी है।

​अतः स्पष्ट है, 'नलचम्पू काव्ये' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।  

नलचम्पूकाव्य :

चम्पूकाव्य यह श्रव्य काव्य का एक भेद है। नलचम्पू का विश्लेषण इस प्रकार हो सकता है - 

  • नलचम्पू एक चम्पूकाव्य है जिसके रचयिता त्रिविक्रम भट्ट हैं। संस्कृत साहित्य में चम्पूकाव्य का प्रथम निदर्शन इसी ग्रन्थ में हुआ है, ऐसा माना जाता है। इसमें चंपू का वैशिष्ट्य स्फुटता यह  व्यक्त किया गया है।
  • दक्षिण भारत के राष्ट्रकूटवंशी राजा कृष्ण (द्वितीय) के पौत्र, राजा जगतुग और लक्ष्मी के पुत्र, इंद्रराज (तृतीय) के आश्रय में रहकर त्रिविक्रम ने इस रुचिर चंपू की रचना की थी।
  • इस कवि का समय दशम शतक माना जाता है।
  • इस चंपू के सात उच्छ्वासों में नल तथा दमयंती की विख्यात प्रणयकथा का बड़ा ही चमत्कारी वर्णन किया गया है। काव्य में सर्वत्र संभग श्लेष का प्रसाद लक्षित होता है।

चम्पूकाव्य का लक्षण :

  • *गद्यपद्यमयं काव्यं चम्पूरित्यभिधीयते। (*साहित्य दर्पण ६ / ३३६)
  • अर्थ - गद्य-पद्य के मिश्रित् काव्य को चम्पू कहते हैं। गद्य तथा पद्य मिश्रित काव्य को "चंपूकाव्य" कहते हैं।

Question 99

याज्ञवल्क्यानुसारं सीमातिक्रमणे दण्डाः प्रोक्ताः-

  1. AOption (a)

    उत्तमसाहसाः 

  2. BOption (b)

    मध्यमसाहसाः 

  3. COption (c)

    उत्तमोत्तमसाहसाः 

  4. DOption (d)

    अधमसाहसाः 

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Correct answer

Answer: (a)A.

उत्तमसाहसाः 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : याज्ञवल्क्य के अनुसार सीमातिक्रमण के लिये कौन से दंड बताये हैंं?

याज्ञवल्क्यस्मृति और उस पर आधारित मिताक्षरा टीका धर्मशास्त्र के परंपरा में अत्यंत प्रसिद्ध है। याज्ञवल्क्यस्मृति में विशेषपूर्ण दंडविधान आता है। 

याज्ञवल्क्यस्मृति के अनुसार दंडविधान :

  • याज्ञवल्क्य दंड का प्रयोग धर्म के नियंत्रण में करना चाहिये, इसका प्रतिपादन करतेंं हैंं। इस प्रकार में दंड का प्रयोग करनेवाला राजा धर्म का मानुष अवतार होता है, और पृथ्वीपर इंद्र का रूप धारण करता है।
  • धनरूप दंड का रूप बताते हुए याज्ञवल्क्य उत्तम, मध्यम और अधम यह तीन प्रकार के साहस बतातेंं हैंं - 
  • उत्तम साहस - एक हजार अस्सी पण।
  • मध्यम साहस - उत्तम साहस से आधा दंड।
  • अधम साहस - मध्यम साहस से आधा दंड।
  • यहाँँ साहस इस शब्द का अर्थ अपराध यह है।
  • सीमा का अतिक्रमण यह अपराध उत्तम साहस में आता है।

अतः स्पष्ट है, 'उत्तमसाहसाः' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 100

ऋग्वेदप्रातिशाख्यानुसारं रक्तसंज्ञोऽस्ति?

  1. AOption (a)

    जिह्वामूलीयः 

  2. BOption (b)

    सन्ध्यक्षरः 

  3. COption (c)

    संयोगः 

  4. DOption (d)

    अनुनासिकः 

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Correct answer

Answer: (d)D.

अनुनासिकः 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : ऋग्वेदप्रातिशाख्य के अनुसार रक्तसंज्ञा क्या है?

ऋग्वेदप्रातिशाख्य :

  • इस प्रातिशाख्य का संबंध ऋग्वेद संहिता से है।
  • परंपरा के अनुसार इसको ऋग्वेदीय शाकल शाखा की अवांतर शैशिरीय शाखा से संबंधित बताया जाता है। प्रातिशाख्यों में यह सबसे बड़ा प्रातिशाख्य है और कई दृष्टियों से विशेषपूर्ण है। ऋग्वेद का केवल यह प्रातिशाख्य उपलब्ध है।
  • इसमें छह-छह पटलों के तीन अध्याय हैं। यह प्रातिशाख्य सूत्र शैली में हैं, क्वचित् पद्यों में भी इसका निर्माण दिखता है। पर व्यख्याकारों ने पद्यों को टुकड़ों में विभक्त कर सूत्ररूप में ही उनकी व्याख्या की है।
  • इस प्रातिशाख्य के प्रथम 1-15 अध्यायों में शिक्षा और व्याकरण से संबंधित विषयों (वर्णविवेचन, वर्णोच्चारण के दोष, संहितागत वर्णसंधियाँ, क्रमपाठ आदि) का प्रतिपादन है और अंत के तीन (16-18) अध्यायों में छंदों की चर्चा है।
  • छंदों के विषय का प्रतिपादन इसे छोडकर किसी अन्य प्रातिशाख्य में नहीं है। क्रमपाठ का विस्तृत प्रतिपादन (अध्याय 10 और 11 में) भी इस प्रातिशाख्य का एक उल्लेखनीय वैशिष्ट्य है।
  • इस प्रातिशाख्य पर प्राचीन उव्वटकृत भाष्य प्रसिद्ध है।
  • ऋग्वेद प्रातिशाख्य में विविध संज्ञाओंं का विश्लेषण आता है। इस में रक्तसंज्ञा का अर्थ अनुनासिक स्पष्ट होता है।

​अतः स्पष्ट है, 'अनुनासिकः' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

प्रातिशाख्य ग्रंथ :

  • प्रातिशाख्यों का संबंध वैदिक मंत्रों के शुद्ध उच्चारण, वैदिक संहिताओं और उनके पदपाठों आदि के सधिप्रयुक्त वर्णपरिवर्तन अथवा स्वरपरिवर्तन के पारस्परिक संबंध और कभी कभी छंदोविचार जैसे विषयों से है।
  • 'शाखा' से संबंध रखनेवाला शास्त्र अथवा अध्ययन प्रातिशाख्य कहलाता है।
  • यास्काचार्य के निरुक्त में कहा गया है :
  • 'पदप्रकृति: संहिता। पदप्रकृतिनि सर्व चरणानां पार्षदानि।' (निरुक्त १.१७)
  • अर्थात्‌, पदों के आधार पर संहिता रहती है और सब शाखाओं के प्रतिशाख्य��ं की प्रवृत्ति पदों को ही संहिता का आधार मानकर हुई है।
  • सभी वेदशाखाओंं के अपने अपने प्रातिशाख्य होतेंं हैंं। इन में से निम्नलिखित प्रातिशाख्य उपलब्ध हैं - 
  • शौनकाचार्यकृत ऋग्वेद प्रातिशाख्य
  • कात्यायनाचार्य कृत वाजसनेयि प्रतिशाख्य
  • तैत्तिरीय प्रातिशाख्य
  • अथर्ववेद प्रातिशाख्य अथवा शौनकीय चतुराध्यायिका

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