प्रश्न का हिंदी भाषांतर : योगदर्शन के अनुसार निम्नलिखित विकल्पोंं से वृत्ति क्या है?
- पतंजलि चित्त की वृत्तियों को चंचल होने से रोकना, इसे ही योग मानते हैं।
- योगः चित्तवृत्तिनिरोधः।
- योग दर्शन के समाधि पाद अर्थात् प्रथम पाद में चित्त वृत्तियोंं की संख्या पाँँच है -
- प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः। (योगसूत्र १.६)
- इस में से जाग्रत तथा स्वप्नावस्था की वृत्तियों के अभाव कारण तमोगुण को विषय बनाने वाली वृत्ति निद्रा कहलाती है।
अतः स्पष्ट है, 'निद्रा' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।
**योग दर्शन का स्वरूप :**योग दर्शन में चार पाद है -
- प्रथम पाद - समाधि पाद
- द्वितीय पाद - साधना पाद
- तृतीय पाद - विभूति पाद
- चतुर्थ पाद - कैवल्य पाद
समाधि पाद :
पतंजलि योग सूत्र के चार पादों में पहला पाद है समाधिपाद। इस प्रथम पाद में मुख्य रूप से समाधि तथा उसके विभिन्न भेदों का वर्णन किया गया है। अतः इसका नाम समाधि पाद है, इसमें साधकों के लिए समाधि के वर्णन के साथ-साथ योग के विभिन्न साधनों का भी समावेश किया गया है। इस पाद में योग के शुद्धतम स्वरूप, उसके फल, वृत्तियों के प्रकार तथा उनके ठीक ठीक स्वरूप, वैराग्य के भेद,अभ्यास और वैराग्य से वृत्ति निरोध, ईश्वर के सच्चे स्वरूप , योग साधना के मार्ग में आने वाली बाधाओं का विवेचन, जप अनुष्ठान की विधि एवं मनोनिरोध हेतु विविध उपायों का वर्णन, प्रसन्नचित्त रहने के उपाय,समापत्ति के स्वरूप तथा ऋतंभरा प्रज्ञा के लक्षण आदि का वर्णन किया गया है।
साधना पाद :
इस द्वितीय पाद में प्रारंभिक साधक के लिए योग के साधनों का वर्णन किया गया है अर्थात वे उपाय जिनसे योग मार्ग प्रशस्त होता है। अतः इसका नाम साधन पाद है। इस द्वितीय पाद में क्रिया योग और उसका फल अविद्या आदि क्लेश एवं उनका स्वरूप और उनके नाश के उपाय, क्लेश मूल कर्माशय और उसका फल, विवेकी के लिए सबकुछ दुख ही है और उसको हटाने के उपाय, दृश्य का स्वरूप, योग के आठ अंग और उनके फल, प्राणायाम का लक्षण तथा उसके भेद और फल तथा प्रत्याहार का स्वरूप आदि विषयों पर संक्षिप्त रूप में सूत्रकार ने समझाया है।
विभूति पाद :
योग साधनों के श्रद्धापूर्वक किये गए अनुष्ठान से प्राप्त होने वाली विविध प्रकार की सिद्धियों अर्थात विभूतियों का वर्णन इस तृतीय पाद में मुख्य रूप से किया गया है इसी कारण इस पाद का नाम विभूति पाद है। इस पद में धारणा,ध्यान एवं समाधि संयम त्रय के लक्षण तथा उनका शास्त्रीय पारिभाषिक नाम, उनकी सिद्धि का फल तथा विभिन्न स्तरों में विनियोग,मोक्ष प्राप्ति में सभी सिद्धियाँ या विभूतियाँ बाधक हैं इस बात की प्रतिष्ठापना, संयम के अनुष्ठान से विविध ऐश्वर्य की प्राप्ति, विवेक से उत्पन्न ज्ञान का प्रादुर्भाव एवं उसका परिणाम आदि विषयों पर इस पाद में प्रकाश डाला गया है।
कैवल्य पाद :
कैवल्य का अर्थ होता है केवलता अर्थात केवली भाव। आत्मा का अपने शुद्धतम स्वरूप में स्थिति अर्थात अचेतन तत्वों से सर्वथा पृथक, शुद्ध चैतन्य में स्थिति। पांच प्रकार से सिद्धियों को प्राप्त करने के उपाय, चार प्रकार के कर्मों का उल्लेख, कर्माशय के अनुरूप वासनाओं का प्रकटीकरण, स्मृति एवं संस्कार एक रूप होते हैं, संस्कार अनादि हैं, चार प्रकार से संस्कारों (वासनाओं) का संचय, जीवात्मा का अपरिणामित्व,आत्मभाव भावना एवं उसकी निवृत्ति, धर्ममेघ समाधि का स्वरूप एवं फल, प्रतिप्रसव योग जैसे विषयों की विस्तृत व्याख्या की गई है।