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UGC NET Paper 2: Sanskrit 14 Oct 2022 Shift 1 (Previous Year Paper)

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Questions & answers

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Question 1

'सिति च' सूत्रेण का सञ्ज्ञा विधीयते?

  1. AOption (a)

    सर्वनामसञ्ज्ञा

  2. BOption (b)

    प्रगृह्यसञ्ज्ञा

  3. COption (c)

    भसञ्ज्ञा

  4. DOption (d)

    पदसञ्ज्ञा

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Correct answer

Answer: (d)D.

पदसञ्ज्ञा

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद: "सिति च"  सूत्र के द्वारा कौन सी संज्ञा होती है?

स्पष्टीकरण: 'सिति च' के द्वारा "पद संज्ञा" होती है। 

मुख्य बिन्दु:

  • "सिति च" सूत्र अष्टाध्यायी के प्रथम अध्याय के चतुर्थ पाद का सौलहवाँ सूत्र है (१.४.१६) |
  • सूत्र का पदच्छेद -  'सिति' (७.१) एवं  'च' (अव्यय) है।
  • सूत्रार्थ - सित् प्रत्यय के परे रहते प्रकृत(पूर्व) की पद संज्ञा होती है। यथा:
  • भवदीय
  • ऊर्णायु
  • यह सूत्र "यचि भम्"(१.४.१८) सूत्र का अपवाद सूत्र है।

अतिरिक्त जानकारी:

  • अष्टाध्यायी में पञ्च सित् प्रत्यय हैं:
  • ​​युस्
  • यस्
  • छस्
  • णस्
  • घस्
  • ​​यह सब भी तद्धित संज्ञक ही हैं।

Question 2

रसविषये समुचितकथने स्तः

(A) रसः वाच्यः भवति

(B) अभिनवगुप्तमतेन रसः व्यङ्ग्यः भवति

(C) महिमभट्टमतेन रसः अनुमेयः भवति

(D) रसः लौकिकः भवति

समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (B) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (D) एवम् (A)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(B) एवम् (C)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : रस के विषय में समुचित कथन क्या हैंं - 

अभिनवगुप्त मत :

  • अभिनवगुप्त ने रस को अलौकिक कहा है। और उसकी इस अलौकिकता का उपपादन करने के लिए निम्नलिखित का ग्राहक प्रमाण भी विभावादि युक्तियाँ दी है। स्वसंवेदन सिद्ध होने से रस इस प्रकार है - 
  • रस न ज्ञाप्य हैं, न कार्यः यह विभावादि जीवितावधि सत्ता वाला है।
  • रसाभिव्यञ्जक विभावादि हेतु लौकिक कारक और ज्ञापक हेतुओं से विलक्षण होते हैं।
  • रस प्रत्यक्षज्ञान, मितयोगि-ज्ञान (सविकल्पक ज्ञान) और परिमितेतरयोगिज्ञान (निर्विकल्पक ज्ञान)-इन तीनों प्रकार के कादिविज्ञान-सदृश होता है-“बाल ज्ञान से भिन्न प्रकार का विलक्षण ज्ञान है।
  • रसानुभूति स्वसंवेदन-मात्र ग्राह्य होती है। रसानुभूति विभावादि का समूहालम्बनात्मक ज्ञान है।
  • अभिनवगुप्त ने रसाभिव्यक्ति को व्यंजना का व्यापार माना है। रस व्यंग्य रूप होने के कारण ही अलौकिक होता है। व्यंजनावृत्ति को सभी आलंकारिक मान्यता देते हैं। अभिव्यक्तिवाद तर्कसंगत व उपयुक्त होने के कारण सर्वमान्य और अन्तिम मत माना जाता है। परवर्ती सभी आलंकारिकों ने इसे ही सर्वमान्य मानकर आदर दिया है। आचार्य मम्मट ने भी इसी मत को सर्वसम्मत मानकर अपने “काव्यप्रकाश” में रस-सूत्र की अन्तिम व्याख्या के रूप में स्थापित किया है।

 

महिमभट्ट मत :

महिमभट्ट के मत में निम्नलिखित बातें द्रष्टव्य हैं-

  • महिमभट्ट ने नट में रस को अनुमेय माना है। अनुमान की सामग्री में, नट में 'चित्रतुरगन्याय' से राम-बुद्धि का प्रतिपादन किया है।
  • 'चित्रतुरग न्याय' से उपस्थित राम रूप नट में यथार्थ स्मितकटाक्षादि नहीं रहते हैं। नट अपने शिक्षा और अभ्यास से कृत्रिम स्मित- कटाक्षादि का प्रदर्शन करता है। उसके द्वारा आनुमानिक रस की प्रतीति होती है।
  • आनुमानिक रस की प्रतीति का आधार भी सामाजिक नहीं होता है। कृत्रिम राम और सोता में रहने वाली रति या रस का सामाजिक को केवल अनुमान होता है।
  • सामान्यतः अनुमान आदि प्रमाणों से होने वाले ज्ञान 'परोक्ष' रूप माने जाते हैं। केवल प्रत्यक्षप्रमाण से ही 'अपरोक्ष' प्रतीति होती है। परन्तु इस रसानुमिति में यह विशेषता है कि वह अनुमिति होने पर भी अन्य अनुमितियों से भिन्न और 'अपरोक्ष' रूप होती है। इसलिए उस अनुमित रस का भी सामाजिक को आस्वाद होता है।
  • सामाजिक के रसास्वाद का कारण उसकी वासना और रसप्रतीति में विलक्षण अपरोक्षता की कल्पना है। वस्तुत अनुमित रस न सामाजिक में रहता है और न कृत्रिम रामादि में रहता है, परन्तु वासना के कारण सामाजिक में न रहने वाले और नट में भी वस्तुतः अविद्यमान किन्तु अनुमीयमान रस का सामाजिक को आस्वाद होता है। इस के हि आधार पर रससूत्र विषयक शंकुक का 'अनुमितिवाद' का सिद्धान्त न्यायमतानुसार है। क्योंकि यह अनुमितिप्रधान है और न्यायशास्त्र भी अनुमिति प्रधान शास्त्र है। न्याय की 'अनुमितिप्रधान' प्रक्रिया के आधार पर ही शंकुक ने इस सिद्धान्त की स्थापना की है।

 

अतः स्पष्ट है, की "(B) एवम् (C)" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 3

ऋग्वेदस्य उपनिषदौ स्तः

(A) तैत्तिरीयोपनिषद्

(B) ऐतरेयोपनिषद्

(C) बृहदारण्यकोपनिषद्

(D) कौषीतकी उपनिषद्

समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (B) एवम् (D)

  2. BOption (b)

    (A) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (B) एवम् (A)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(B) एवम् (D)

Why this answer is correct

भाषानुवाद-ऋग्वेद के उपनिषद हैं ?

स्पष्टीकरण-ऐतरेयऔर कौषितकी उपनिषद ऋग्वेद से संबन्धित है अतःविकल्प (B) एवं (D) सही हैं.

Important Points

  • ऋग्वेद का परिचय : इसमें 10 मंडल (अध्याय) में 1028 सूक्त है जिसमें 11 हजार मंत्र (10580) हैं।
  • शाखाएं - शाकल, वाश्कल, आश्वलायन, शांखायन, मंडूकायन। वैसे इसकी 21 शाखाएं हैं।
  • उपवेद:- ऋग्वेद का उपवेद आयुर्वेद है। आयुर्वेद के कर्ता धन्वंतरि देव हैं।

Key Points

  • ऋग्वेद के उपनिषद:- वर्तमान में ऋग्वेद के 10 उपनिषद पाए जाते हैं। संभवत: इनके नाम ये हैं- ऐतरेय, आत्मबोध, कौषीतकि, मूद्गल, निर्वाण, नादबिंदू, अक्षमाया, त्रिपुरा, बह्वरुका और सौभाग्यलक्ष्मी।
  • ऐतरेयोपनिषद-इसमें तीन अध्याय हैं जिनमें सृष्टिवाद,आदर्शवाद तथा आत्मवाद पर विचार किया गया है
  • इसमें समस्त विश्व को ईश्वर की रचना बतलाया गया है।
  • इसमें मानव शरीर किउपयोगिता का का करमिक वर्णन अपने चरमोत्कर्ष पर है ।
  • महावाक्य- प्रज्ञानं ब्रह्म्  अर्थात् प्रज्ञान ही ब्रह्मा है ,यह ऋग्वेद का महावाक्य है।
  • कौषीतकी उपनिषद- इसमें चार अध्याय हैं
  • प्रथम अध्याय में देवयान तथा पितृयान का विस्तृत वर्णन है।
  • द्वितीय अध्याय में दार्शनिक सिद्धांतों का वर्णन हैं।
  • तीसरे अध्याय में प्रतर्दन इंद्रदेव से ब्रह्म विद्या सीखते हैं,जिसमें प्राणतत्व का विस्तृत वर्णन किया गया है।
  • अन्य वेदों के उपनिषद-
  • यजुर्वेद-
  • शुक्ल यजुर्वेद - ईशावास्योपनिषद ( यह सबसे प्राचीन उपनिषद है ,यह माध्यन्दिन शाखा यजुर्वेद का 40वां अध्याय हैं,कुल 18 मंत्र  हैं ।
  • कृष्णयजुर्वेद - छान्दोग्योपनिषद,मैत्रायणी,कठ,श्वेताश्वेतर,तैतरीय,ब्रिगदारणीक।
  • सामवेद- केनोपनिषद।
  • अथर्ववेद- प्रश्न ,मुंडक,मांडूक्य।

Question 4

शब्दालङ्कारौ स्तः

(A) यमकम्

(B) रुपकम्

(C) उत्प्रेक्षा

(D) अनुप्रासः

समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (D)

  2. BOption (b)

    (C) एवम् (B)

  3. COption (c)

    (B) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (A) एवम् (C)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(A) एवम् (D)

Why this answer is correct

भाषानुवाद- शब्दालङ्कार हैं?

स्पष्टीकरण- यमक और अनुप्रास अलङ्कार दोनो शब्दालङ्कार हैं|अतःविकल्प (A) एवम् (D)सहीहैं|

 Important Points 

अलंकार की व्युत्पत्ति इस प्रकार की जा सकती है- अलंकरोति इति अलंकारः। अर्थात जो विभूषित करता हो वह अलंकार है। अथवा अलंक्रियते अनेन इति अलंकारः। या अन्य शब्दों में कहे तो जिसके द्वारा किसी की शोभा होती है, वह अलंकार है।

अलंकारों के संदर्भ में सर्वप्रथम परिभाषा दण्डी की है-"काव्यशोभकरान् धर्मान् अलंकरान् प्रचक्षते"

  • अलंकारों के भेद-

अलंकारों  के अध्ययन की सुविधा हेतु इन्हें तीन भागों में बांटा गया है-

  1. शब्दालंकार- शब्दालंकारों का सौन्दर्य शब्द के ध्वन्यात्मक अनुरणन, झंकृति और शब्दगत अर्थ पर आश्रित रहता है जैसे- अनुप्रास, यमक, श्लेष, वक्रोक्ति।
  2. अर्थालंकार- अर्थगत अथवाअर्थालंकारका सौन्दर्यवाक्य के अर्थ एवं शब्द के संदर्भगत अर्थ से संबंधित होता है जैसे- उपमा, रुपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, व्यतिरेक, प्रतिवस्तूपमाविरोधाभास आदि।
  3. उभयालंकार- जहां शब्दगत और अर्थगत दोनों प्रकार के चमत्कार प्रधानता प्राप्त कर लेते हैं वे उभयालंकार कहलाते हैं जैसे- संसृष्टि और संकर।

Key Points

अनुप्रास अलंकार: – अनुप्रास शब्‍द: 'अनुप्रआस' शब्द से मिलकर बना है। स्वर वर्णों की विषमता हो समान न हों और व्यंजनों की समानता होने पर अनुप्रास अलंकार होता है।

आचार्यविश्‍वनाथ- ''रसाद्यनुगतत्‍वेन प्रकर्षेण न्‍यासोनुप्रास:'' ।  अर्थात् रसों के अनुकूल वर्णों की रचना का विन्यास करना अनुप्रास कहलाता है।जैसे-

आदाय बकुलगन्‍धान्‍धीकुर्वन पदे पदे भ्रमरान् ।

अयमेति मन्‍दमन्‍दं कावेरीवारिपावन: पवन: ।।

उपर्युक्‍त उदाहरण में ''गन्‍धान्‍धी'' शब्‍द में 'न' 'ध' वर्णो में, 'कावेरीवारि' शब्‍दे 'व' 'र' वर्णो में, पावन: पवन: शब्‍दो में 'प' 'व' 'न' वर्णानां समानता प्राप्‍त होती है जबकि स्‍वर भिन्‍न हैं। सन्ति । अत: यहाँ अनुप्रास अलंकार है ।

अनुप्रास अलंकार के भेद -

अनुप्रास अलंकार के पाँच भेद साहित्‍यदर्पणकार के द्वारा स्‍वीकृत हैं-

1. छेकानुप्रास:, 2. वृत्‍यानुप्रास:, 3. श्रुत्‍यानुप्रास:, 4. अन्‍त्‍यानुप्रास: 5. लाटानुप्रास:। 

 

यमक अलंकार -जिस काव्य में भिन्न भिन्न अर्थों का प्रतिपादन करने वाले शब्दों की एक से अधिक वार आवृत्ति हो वहाँ यमक अलंकार होता

सत्‍यर्थे पृथगर्थाया: स्‍वरव्‍यंजनसंहते: ।

क्रमेण तेनैवावृत्तिर्यमकं विनिगद्यते ।।

ये शब्द कुछ सार्थक कुछ निरर्थक भी हो सकते हैं लेकिन उनकी आवृत्ति अवश्य होती है क्रम से आवृत्ति के अभाव में अनुप्रास अलंकार होता है।

उदाहरण-

नवपलाश-पलाशवनं पुर: स्‍फुटपरागपरागतपंकजम् ।

मृदुलतान्‍तलतान्‍तमलोकयत् स सुरभिं-सुरभिं सुमनोभरै: ।।

अत: क्रमशः 'पलाश' (पलाशपुष्‍प/पत्र), 'पराग' (पुष्‍पपराग/निरर्थक), 'लतान्‍त' (निरर्थक/लता का अन्तिमभाग) और 'सुरभि' (सुगन्धि/वसन्‍तऋतु) शब्‍दों की एक से अधिकवार आवृत्ति है। इस उदाहरण में तीनों भेदों का उदाहरण भी दिया गया है।

यमक अलंकार के भेद -

यमक अलंकार के तीन भेद आचार्य‍ विश्‍वनाथ के द्वारा स्‍वीकृत हैं।

  1. उभयपद सार्थकम्
  2. उभयपदनिरर्थकम्
  3. क्‍वचित् एकं सार्थकम् अन्‍यं निरर्थकं।

Confusion Pointsरूपक और उत्प्रेक्षा अर्थालंकार है।

Question 5

अधोलिखितेषु मीमांसादर्शनस्य आचार्यों न स्तः-

(A) मुरारिमिश्रः

(B) शबरस्वामी

(C) गदाधरः

(D) जगदीशः

समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (C) एवम् (D)

  3. COption (c)

    (B) एवम् (C)

  4. DOption (d)

    (A) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(C) एवम् (D)

Why this answer is correct

भाषानुवाद- निम्नलिखित में से मीमांसा दर्शन के आचार्य नहीं है?

स्पष्टीकरण- गदाधर भट्ट और जगदीश तर्कालंकार न्याय शास्त्र के आचार्य हैं। अतः स्पष्ट है विकल्प(2)सही है। 

Important Points

मीमांसादर्शन- विषय पर गहराई से किए गए विचार-विमर्श को मीमांसा कहते हैं ।  

  • यह छह दर्शनों मे से एक है और यह नास्तिक दर्शन है।
  • इसके प्रणेता जैमिनी आचार्य हैं इनका काल मुख्यतः चतुर्थ शताब्दी ई.पू. है इनके द्वारा रचित द्वादशलक्षणी नामक ग्रंथ पूर्वमीमांसा का मुख्य ग्रंथ है।
  • मीमांसा दर्शन के प्रमुख आचार्य -
  • शबरस्वामी - ये कश्मीर के निवासी  थे, इनके पिता का नाम दीपस्वामी था, यह मैत्रायणी शाखा केअध्येता थे।

मीमांसा सूत्र पर इनका भाष्य आज भी उपलब्ध है, जिसमें 24000 श्लोक हैं।शबरस्वामी के परवर्ती काल में तीन टीकाकारों के मतोंके अनुसार मीमांसा दर्शन के तीन संप्रदाय हुए -प्रभाकरमिश्र,कुमारिलभट्ट और मुरारिमिश्र। प्रभाकरमिश्र का अनुसरणकर्ता प्रभाकर संप्रदाय, कुमारिलभट्ट के अनुसार मानने वाले भाट्टसंप्रदाय और इन दोनों को छोड़कर मुरारि मिश्र का संप्रदाय प्रसिद्ध था। 

  • मुरारिमिश्र- इन्हें मीमांसा दर्शन के तृतीय संप्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है, इन्होंने ने मीमांसा सूत्र की व्याख्या लिखी थी जो आंशिक रूप से उपलब्ध है। इनके पृथक मत मत के करण इनका प्रामाण्यवाद विवेचन है।

अन्य आचार्य - जैमिनी, बोधायन, शबरस्वामी, कुमारिलभट्ट, प्रभाकर मिश्र, मंडन मिश्र, शालिकनाथ मिश्र, वाचस्पति मिश्र, सुचरित मिश्र, पार्थसारथी, भवदेव भट्ट, भवनाथ मिश्र, माधवाचार्य, भट्ट सोमेश्वर आदि ।

Additional Informationगदाधर-नवद्वीप के यशस्वी नैयायिक थे। इन्होंने रघुनाथ की "दीधिति" पर अत्यंत विसतृत और परिष्कृत टीका की रचना की है जो "गादाधरी" नाम से विख्यात है। व्युत्पत्तिवाद, शक्तिवाद आदि उनके अनेक मौलिक ग्रंथ हैं, जिनसे इनके मौलिक चिंत��� की विदग्धता विदित होती है। ये 17 वें शतक में विद्यमान माने जाते हैं।

उन्नींसवीं और बीसवीं शती में भी अनेक उत्कृष्ट नैयायिक प्रादुर्भूत हुए हैं जिनमें राखाल दास न्यायरत्न, कैलाश चंद्र शिरोमणि, सीताराम शास्त्री, धर्मदत्त, बच्चा झा, वामाचरण भट्टाचार्य, बालकृष्ण मिश्र तथा शंकर तर्करत्न के नाम उल्लेखनीय हैं।

जगदीश अपने समय के अत्यंत उच्चकोटि के नैयायिक थे। इन्होंने रघुनाथ की दीधिति पर विस्तृत टीका ग्रंथ की रचना की है जो "जागदीशी" नाम से प्रख्यात है। "तर्कामृत" और "शब्द शक्ति प्रकाशिका" इनके मौलिक ग्रंथ हैं। विद्वानों ने "जगदीशस्य सर्वस्वं शब्दशक्तिप्रकाशिका" कहकर इस ग्रंथ की प्रशंसा की है। इन्हें 17वीं शती में अवस्थित माना जाता है।

Question 6

आङ्गिक-वाचिक-आहार्य-सात्विक-रुपाः भेदा सन्ति-

(A) अनुभावस्य

(B) अभिनयस्य

(C) विभावस्य

(D) सञ्चारिभावस्य

समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (C) एवम् (D)

  2. BOption (b)

    (A) एवम् (B)

  3. COption (c)

    (A) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (B) एवम् (C)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A) एवम् (B)

Why this answer is correct

भाषानुवाद- आङ्गिक-वाचिक-आहार्य-सात्विक-रुप किसके भेद हैं?

स्पष्टीकरण-आङ्गिक-वाचिक-आहार्य-सात्विक-रुप अनुभाव और अभिनय के भेद हैं अतः विकल्प (A)एवं(B) सही हैं।

Important Points

भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र के अष्टम अध्याय में अभिनय कीपरिभाषा और उसके भेदों पर प्रकाश डाला है।

लक्षण- "अभिपूर्वस्तु णीञ धातुराभिमुख्यार्थनिर्णये यस्मात् पदार्थान्नयति तस्मादभिनयः स्मृतः॥"

  • अभि उपसर्गपूर्वक णीञ धातु के साथ एरच् सूत्र से अच्प्रत्यय करने पर यहशब्द सिद्ध् होता है जिसका अर्थ है नाटक मे नटआदि के द्वारा ज्ञा सामाजिकों के सम्मुख कथा में स्थित पात्रों उनके आचारण,व्यवहार तथा अवस्थाओं अनुकरण किया जाता है तब वह अभिनय कहलाता है|
  • अनुभाव- जो भावों के कार्य हैं या जिनके द्वारा रति आदि भावों का अनुभव होता है, उन्हें अनुभाव कहते हैं। भाव के अनु अर्थात पीछे उत्पन्न होने के कारण वह अनुभाव कहा जाता है।इनके चार-भेद हैं-(1) कायिक,(2) वाचिक,(3) आहार्य और(4) सात्विक।

Key Points

भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में अभिनय के चार भेद बताये हैं-आङ्गिक-वाचिक-आहार्य-सात्विक। (आङ्गिको वाचिकश्चैव ह्याहार्यः सात्विकस्तथा)

  • आङ्गिक- इस अभिनय के अन्तर्गत शरीर के अंगों का संचालन एवं मुख के विविध प्रकार की आकृतियोंऔर चेष्टाओं का प्रयोग किया जाता है।
  • सात्विक- सात्विक अभिनय तो उन भावों का वास्तविक और हार्दिक अभिनय है जिन्हें रस सिद्धांतवाले सात्विक भाव कहते हैं और जिसके अंतर्गत, स्वेद, स्तंभ, कंप,अश्रु, वैवर्ण्य, रोमांच, स्वरभंग और प्रलय की गणना होती है। इनमें से स्वेद और रोमांच को छोड़कर शेष सबका सात्विक अभिनय किया जा सकता है।
  • वाचिक- अभिनेता रंगमंच पर जो कुछ मुख से कहता है वह सबका सब वाचिक अभिनय कहलाता है।
  • चिड़ियों ���ी बोली, सीटी देना या ढोरों को हाँकते हुए चटकारी देना आदि सब प्रकार की ध्वनियों को मुख से निकालना वाचिक अभिनय के अंतर्गत आता है। भरत ने वाचिक अभिनय के लिए 63 लक्षणों का और उनके दोष-गुण का भी विवेचन किया है। वाचिक अभिनय का सबसे बड़ा गुण है अपनी वाणी के आरोह-अवरोह को इस प्रकार साध लेना कि कहा हुआ शब्द या वाक्य अपने भाव और प्रभाव को बनाए रखे। वाचिक अभिनय की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यदि कोई जवनिका के पीछे से भी बोलता हो तो केवल उसकी वाणी सुनकर ही उसकी मुखमुद्रा, भावभंगिमा और आकांक्षा का ज्ञान किया जा सके।
  • आहार्य- आहार्य अभिनय वास्तव में अभिनय का अंग न होकर नेपथ्यकर्म का अंग है और उसका संबंध अभिनेता से उतना नहीं है जितना नेपथ्यसज्ज करनेवाले से।

Question 7

षट्कसम्पत्तिषु न स्तः-

(A) मुमुक्षुत्वम्

(B) तितिक्षा

(C) विषयः

(D) उपरतिः

समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (C)

  2. BOption (b)

    (B) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (B) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(A) एवम् (C)

Why this answer is correct

भाषानुवाद -षट्सम्पत्तियों मे से कोई दो नहीं हैं ?

स्पष्टीकरण- मुमुक्षुत्व एवं विषय षट्सम्पत्तियों मे नहीं हैं अतः विकल्प (1)सही है।

Important Points

  • षट्सम्पत्तियों का विवरण वेदान्तसार के साधनचतुष्टय के अंतर्गत प्राप्त होता है।
  • वेदान्तसार के अनुसार  ईश्वर को जानने  की इच्छा रखने वाले को साधनचतुष्टय का पालन आवश्यक है।
  • वेदन्तसार के लेखक सदानंद हैं।
  • जिन्होंने अनुबंध चतुष्टय का वर्णन किया है-विषय,प्रयोजन,अधिकारी,सम्बन्ध।
  • साधनचतुष्टय का पालन करने वाले को अधिकारी कहा जाता है।
  • साधनचतुष्टय-साधनानि नित्यानित्यवस्तुविवेकेहामुत्रफल

                            भोगविरागशमदमादिसम्पत्तिमुमुक्षुत्वानि||८||

    नित्य और अनित्य वस्तु का विचार,इस लोक और परलोक में फल भोगने की इच्छा न करना, शम दम आदि साधनसम्पत्ति ,मुमुक्षुत्व यही साधनचतुष्टय हैं |

Additional Information

षट्सम्पत्ति - शमदमादयस्तु शमदमोपरतितिक्षासमाधानश्रद्धाः||११||

 शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान, और श्रद्धा, इनको शमदमादि नाम से व्यवहार करतें हैं ॥ ११ ॥ 

  • शम-ईश्वरविषयकश्रवण,मनन,निदिध्यासन से भिन्न जो अन्य विषयों से मन हटा लेना|
  • दम-श्रोत्रादि बाह्यइन्द्रियों का ईश्वरविषयक श्रवणादि से भिन्न जो अन्य विषयों से हटा लेना|
  • उपरति- इन्द्रियों का दमन करना|
  • तितिक्षा-शीत,उष्ण,सुख-दुख इत्यादि को सह लेना|
  • समाधान-मन की एकाग्र अवस्था का नाम समाधान है|
  • श्रद्धा-गुरुदेव के वचनों में तथा उपनिषदादि वेदान्तशास्त्र के वाक्यों में विश्वास करना|

Question 8

तत्पुरुषसमासस्य भेदद्वयं किम्?

(A) प्रादिः

(B) उपपदम्

(C) तद्गुणसंविज्ञानः

(D) इतरेतरयोगः

समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (B) एवम् (C)

  2. BOption (b)

    (C) एवम् (D)

  3. COption (c)

    (A) एवम् (B)

  4. DOption (d)

    (A) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(A) एवम् (B)

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प्रश्नानुवाद – तत्पुरुष समास के दो भेद क्या है?

स्पष्टीकरण -    तत्पुरुषसमास के दो भेद है – प्रादि तत्पुरुष एवं उपपद तत्पुरुष।

उत्तरपदार्थप्रधानः तत्पुरुषः- जिस समास में उत्तरपद प्रधान होता है, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं। उदाहरण – राजपुरुषः। राजपुरुषः का विग्रहवाक्य राज्ञः पुरुषः। उक्त उदाहरण में पुर्वपद राज्ञः प्रधान न होकर पुरुषः पद प्रधान हुआ हैं। अतः यह तत्पुरुष समास हैं।

तत्पुरुष समास के दो भेद हैं – प्रादितत्पुरुषसमास एवं उपपदतत्पुरुषसमास। ‘कुगतिप्रादयः’-  तत्पुरुषसमास में जब पूर्वपद उपसर्ग हो उसे प्रादितत्पुरुष समास कहते हैं। प्रादितत्पुरुष समास में प्रथमपद ‘कु’ गति संज्ञक या ‘प्र’ आदि होता है। उदाहरण – कुपुरुषः(कुत्सितः पुरुषः), प्राचार्यः(प्रगतः आचार्यः)।

‘उपपदमतिङ्’ तत्पुरुष समास में जब उत्तरपद कोई क्रिया होते हैं तब उसे उपपदतत्पुरुष कहते हैं।उपपदसमास में प्रथमपद उपपद तथा द्वितीय पद कृदन्त होता है। उदाहरण- कुम्भकारः (कुम्भं करोति)।

 Important Pointsतद्गुणसंविज्ञानः – वैयाकरणों के मत में बहुव्रीहि समास के दे भेद है – तद्गुणसंविज्ञान एवं अतद्गुणसंविज्ञान। “यत्र समस्यमान पदार्थः समासवाच्ये वर्तते स तद्गुणसंविज्ञानः” अर्थात् यहाँपर समासवाच्य अन्यपदार्थे समस्यमान पदार्थ में रहता है वहाँ तद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि होता हैं। उदाहरण – त्रिलोचनः शिवः। प्रस्तुत उदाहरण में लोचन अन्यपदार्थ शिव में रहता हैं।

अतद्गुणसंविज्ञान तद्गुणसंविज्ञान के विपरीत अर्थात् यहाँपर समस्यमान पदार्थ अन्यपदार्थ में नहीं रहता हैं उसे अतद्गुणसंविज्ञान कहते है। उदाहरण – दृष्टसमूद्रः पुरुषः। प्रस्तुत उदाहरण में समस्यमान समूद्र दर्शक पुरुष में विराजमान नहीं हैं।

हुव्रीहि समास के लक्षण हैं – “शेषो बहुव्रीहिः” (2.2.23) । बहुव्रीहि समास में प्रथमान्त समानाधिकरण पद का समास होता है, इसमें अन्यपद प्रधान होता है। बहुव्रीहि समास के दो प्रमुख भेद है – समानाधिकरण बहुव्रीहि एवं व्यधिकरण बहुव्रीहि । परन्तु वैयाकरणगण बहुव्रीहि समास के और दो अन्यभेद भी किये है -  – तद्गुणसंविज्ञान एवं अतद्गुणसंविज्ञान।

 

Important Pointsइतरेतरयोग-  इतरेतर समास द्वन्द्व समास के एक भेद हैं। बहुव्रीहि समास का एक भेद है द्वन्द्व समास। ‘चार्थेद्वन्दः’ यह समास विधायक सूत्र हैं। द्वन्द्व समास में उभय पद का अर्थ प्रधान होता हैं। जैसे – माता च पिता च = पितरौ। इसमें माता एवं पिता उभय पद का अर्थ प्रधान हो। द्वन्दसमास इतरेतरद्वन्द एवं समाहार द्वन्द के भेद से दो प्रकार हैं। चार्थेद्वन्दः सूत्र में चार्थ शब्द से इतरेतरयोग और समाहार का ग्रहण हुआ है। जहाँ द्वन्द्व में आए हुए दोनों  पदों का अपना अलग-अलग अस्तित्व होता है, वहाँ इतरेतरद्वन्द्व समास होता हैं।  उदाहरण: धवखदिरौ– धवश्च खदिरश्च ।  यहाँ धव और खदिर का अलग अलग अस्तित्व है। धव सु खदिर सु यह इसका अलौकिकविग्रह हैं, जिसमें इतरेतर योग अर्थ में विद्यमान धव सु का और खदिर सु का सुबन्त का चार्थे द्वन्दः सूत्र से द्वन्द समास होता है।

Question 9

ध्वनेः प्रकारद्वयं भर्तृहरिमते किम्?

(A) आहार्यम्

(B) वैकृतः

(C) संस्कृतः

(D) प्राकृतः

समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (B) एवम् (D)

  2. BOption (b)

    (A) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (A) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(B) एवम् (D)

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प्रश्नानुवाद – भर्तृहरि के मत में ध्वनि के दो प्रकारभेद क्या क्या हैं?

स्पष्टीकरण –

ध्वनि के दो प्रकार-

द्विविधो ध्वनिः, प्राकृतो वैकृतश्च। तत्र प्राकृतो नाम येन विना स्फोटरूपमनभिव्यक्तं न परिच्छिद्यते। वैकृतस्तु येनाभिव्यक्तं स्फोटरूपं पुनः पुनरविच्छेदेन प्रचिततरकालमुपलभ्यते। (1.75, ब्रह्मकाण्ड, वाक्यपदीयम्) अर्थात् वैयाकरणों ने दो प्रकार के ध्वनि का स्वीकार किया है – प्राकृत एवं वैकृत। जिसके बिना स्फोटरूप अभिव्यक्त नही होता है वह प्राकृत ध्वनि कहलाते है। जिसके द्वारा अभिव्यक्त स्फोटरूप बारम्बार अविच्छिन्न रूप से दीर्घकाल उपलब्ध होता है उसे वैकृत ध्वनि कहते है।

प्रसिद्ध वैयाकरण आचार्य व्याडि की मान्यता है कि स्फोटात्मक शब्द के ग्रहण में प्राकृत ध्वनि हेतु है। स्थिति या वृत्ति के भेद से वैकृत ध्वनि निमित्तक है -

स्फोटस्य ग्रहणे हेतुः प्राकृतो ध्वनिरिष्यते।

स्थितिभेदे निमित्तत्वं वैकृतः प्रतिपद्यते॥

आचार्य वृषभ के प्राकृतध्वनि स्फोटरूप की अभिव्यञ्जक होती है। उस उपलब्ध ध्वनि के उत्तरकाल में होने वाली उपलब्धि प्रबन्ध निमित्तक निरन्तर प्रवाहमयी वैकृत ध्वनि कहलाती है –

“स्फोटः स्वभावाभिव्यंजकः प्राकृतः, उपब्धस्य तूत्तरकालभावी प्रबन्धवृत्तिरूपोलब्धिप्रबन्धनिमित्तं वैकृतः।”

Additional Information

  • सुश्रुत विरचित ‘सुश्रुत संहिता’ में आठ प्रकार के शल्य कार्य का वर्णन है – (1) छेद्य (2) भेद्य (3) लेख्य (4) वेध्य (5) एष्य (6) आहार्य (7) विस्राव्य तथा (8) सीव्य। शल्यक्रियाके विना जिस व्याधि का उपशम नहीं होता था उसे वैद्यकशास्त्रानुसारे आहार्य कहते हैं।
  • योगात्मकभाषा के अन्तर्गत संयोगात्मकबर्गीकरण भाषा है संस्कृत। भारोपीय परिवार के अन्तर्गत संस्कृत भाषा को प्राचीनतम भाषा तथा देवभाषा के नाम से जाने जाते है। भारत के विविध प्राचीन शास्त्र जैसे चारों वेदों तथा उपनिषदादि संस्कृत भाषा में लिखि गयी है। संस्कृत को भारतीय संविधान के आठवी अनुसूची में शामिल किया गया है।

Question 10

शब्दब्रह्मणः शक्तिद्वयं किम्?

(A) अर्थशक्तिः

(B) अभ्यनुज्ञा

(C) प्रतिबन्धः

(D) शब्दशक्तिः

समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (C) एवम् (D)

  3. COption (c)

    (B) एवम् (C)

  4. DOption (d)

    (B) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(B) एवम् (C)

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प्रश्नार्थ - शब्दब्रह्म की दो शक्तियाँ कौन सी है?

स्पष्टीकरण -

वाक्यपदीय - वाक्यपदीयम् व्याकरणशास्त्र का दार्शनिक ग्रंथ है। इसकी रचना भर्तृहरि ने की थी। इसमे तीन काण्ड हैं- ब्रह्मकाण्ड, वाक्यकाण्ड, पद (प्रकीर्ण) काण्ड।

शब्दब्रह्म के कालशक्ति के 'अभ्यनुज्ञा और प्रतिबन्धः' यह दो भेद है। - तं अस्य लोकयन्त्रस्य सूत्रधारं प्रचक्षते। प्रतिबन्धाभ्यनुज्ञाभ्यां तेन विश्वं विभज्यते।। ३.९.४ (वाक्यपदीय, पदकाण्ड, कालसमुद्देश)

अतः उचित पर्याय (B) एवम् (C) होता है।

Question 11

शिक्षाग्रन्थस्य प्रतिपाद्येषु बलं नाम किम्?

(A) स्थानम्

(B) प्रयत्नः

(C) स्वरः

(D) व्यञ्जनम्

समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (C) एवम् (D)

  3. COption (c)

    (B) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (A) एवम् (C)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(A) एवम् (B)

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प्रश्नानुवाद – शिक्षाग्रन्थ में प्रतिपाद्य बल के नाम क्या हैं?

स्पष्टीकरण - शिक्षाग्रन्थ में प्रतिपादित बल के नाम स्थान एवं प्रयत्न।

शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य’ अर्थात् शिक्षा को वेद के घ्राणेनन्द्रिय कहां गया हैं। सायनाचार्य के मत में ‘स्वरवर्णाद्युच्चारणप्रकारो योत्रोपदिश्यते सा शिक्षा’ अर्थात् जिस वेदाङ्ग में स्वर आदि के उच्चारण रीति का उपदेश दिया गया हैं उसे शिक्षा कहते हैं।

शिक्षा ग्रन्थ में वर्ण, स्वर, मात्रा, बल, साम, सन्तान के भेद से छः अङ्गो में विभाजित किये गये हैं। यह भेद सर्वप्रथम तैत्तिरीयोपनिषद में उल्लेख किया गया है - ॐ शीक्षां व्याख्यास्यामः। वर्णः स्वरः। मात्रा बलम्‌। साम सन्तानः। इत्युक्तः शीक्षाध्यायः॥ (तैत्तिरीयोपनिषद,शिक्षावल्ली, द्वितीयोऽनुवाकः, मन्त्रसंख्या 1) 

यहाँ वर्ण अर्थात् स्वर एवं व्यञ्जनवर्ण, स्वर से उदात्त, अनुदात्त, स्वरित स्वर की, मात्रा से ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत की, बल से आभ्यन्तर एवं वाह्यप्रयत्न की, साम से पूर्वोत्तर मात्राओं के सन्धिपरक मात्रा एवं सन्तान से उच्चारण यह वताये गये हैं।

उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितश्च स्वरास्त्रयः।

ह्रस्वो दीर्घः प्लुत इति कालतो नियामा अचि॥– 1.11पाणिनीयशिक्षा

बल-  वर्णो के उच्चारण करने‌ की  जो चेष्टा उसे प्रयत्न कहते हैं । प्रयत्न दो प्रकार का होता है- 1. आभ्यन्तर प्रयत्न एवं 2. बाह्य प्रयत्न। आभ्यन्तर प्रयत्न - आभ्यन्तर का अर्थ है भीतर।

जो वर्णो के उच्चारण के पूर्व मुख के अन्दर होती है उसे आभ्यन्तर  प्रयत्न कहते है। आभ्यन्तर प्रयत्न 5 प्रकार हैं।  

1. स्पृष्ट-  "स्पृष्टं प्रयत्नं स्पर्शानाम्"-  जिस आभ्यन्तर प्रयत्न में जिह्वा- तालु , मूर्धा , दन्त, आदि उच्चारण स्थानों को स्पर्श करती हैं, इस लिए इन्हें स्पर्श वर्ण कहते हैं। इसमें क से म तक वर्ण आते हैं।

2. ईषत् स्पृष्ट-  "ईषत्स्पृष्टम् अन्तःस्थानम्" ईषत् का अर्थ है-यह थोड़ा स्पर्श किया गया। इस प्रयत्न में जिह्वा उच्चारण स्थान को थोड़ा स्पर्श करती है। इसमें य् व् र् ल् ( यण् ) अन्तस्थ वर्ण आते हैं।

3. विवृत- "विवृतं स्वराणाम्"। विवृत का अर्थ है - खुला हुआ अर्थात् जिस उच्चारण में मुंह खोलना पड़ता है। यह प्रयत्न स्वरों का है।

4. ईषत् विवृत- "ईषत् विवृतम् उष्मणाम्" - ईषत् का अर्थ है थोड़ा एवं विवृत का अर्थ है-खुला हुआ । इसमें   जिह्वा को थोड़ा कम उठाना पड़ता है। ये  वर्ण शल् कहलाते हैं जो श् ष्‌ स् ह् हैं। इन चार ऊष्म वर्ण का प्रयत्न ईषत् विवृत होता है।

5. संवृत- "ह्रस्वस्य अवर्णस्य प्रयोगे संवृतम्"संवृत का अर्थ है- ढ़का हुआ । इसमें वायु का मार्ग बंद रहता है। प्रयोग करने अर्थात् उच्चारणावस्था में ह्स्व अ" का प्रयत्न संवृत होता है।

बाह्य प्रयत्न - जब वर्ण  के उच्चारण के समय मुख बाहर निकलने लगते हैं उस समय उच्चारण की जो चेष्टा होती है, उसे  बाह्य प्रयत्न कहते हैं।बाह्य प्रत्यन 11 प्रकार के होते हैं।1. विवार 2. संवार, 3. श्वास, 4. नाद, 5. घोष, 6. अघोष, 7. अल्पप्राण, 8. महाप्राण, 9. उदात्त, 10. अनुदात्त, 11. स्वरित।   विवार श्वास अघोष- "खरो विवारा: श्वास अघोषश्च" खर् (ख्, फ्, छ्, ठ् थ् च्,ट्, त् क्  प् श् ष् स् ) प्रत्याहार के अन्तर्गत आने वाले वर्णो का बाह्य प्रयत्न विवार श्वास अघोष होगा। संवार नाद घोष - "हशः संवारा नादा घोषश्च" हस् (ह्, य्, व्, र् ल्, ञ्, म्, ङ् न् झ्  भ घ ढ ध ज ब ग ड द् )  प्रत्याहार के अन्र्तगत आने वाले वर्णो का बाह्य प्रयत्न संवार नाद घोष होगा। अल्पप्राण - वर्गांणां  प्रथमा तृतीया पंचमा यणश्च अल्पप्राणाः "- अल्पप्राण का अर्थ है- थोड़ा । प्राण का अर्थ  होता है - वायु । जिस वर्ण के उच्चारण के लिए भीतर से कम वायु की आवश्यकता होती है उसे अल्पप्राण कहते हैं। वर्गों के प्रथम , द्वितीय, तृतीयवर्ण और यण् ( य व र ल ) का वाह्य प्रयत्न अल्पप्राण होगा। इस प्रकार १९ व्यंयजन वर्णो का बाह्य प्रयत्न अल्प प्राण होगा।महाप्राण- "वर्गाणां द्वितीय- चतुर्थौ शलश्च महाप्राणाः" -महाप्राण का अर्थ है - अधिक जिस वर्ण को बोलने के लिए भीतर से अधिक वायु के आवश्यिकता पड़े उसे महाप्राणवर्ण कहते हैं। महाप्राण वर्गों के दूसरे व चौथे और शल् (श ष स ह ) का बाह्य प्रयत्न महाप्राण होगा।  इस प्रकार कुल १४ व्यंयजन वर्णो का बाह्य प्रयत्न महाप्राण होगा। उदात्त – ‘उच्चैरुदातः’ मुख के भीतर जो कण्ठ तालु आदि उच्चारण स्थान हैं उनमें उर्द्ध भाग से बोले जाने वाले (स्वर) के उदात्त संज्ञा होती हैं।अनुदात्त- ‘नीचैरनुदातः’-  कण्ठ, तालु आदि उच्चारण स्थान के निम्न भाग उच्चारित अच् या स्वर की  अनुदात्त संज्ञा होती है।स्वरित- ‘समाहारः स्वरितः’ जहाँ उदात्त और अनुदात्त दोनों का समाहार होता है,उस अच् की स्वरित संज्ञा होती है।

Question 12

बौद्धदर्शनस्य आचार्यद्वयम् अस्ति-

(A) उमास्वातिः

(B) उदयनः

(C) उसङ्गः

(D) धर्मकीर्तिः

समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (C)

  2. BOption (b)

    (C) एवम् (D)

  3. COption (c)

    (B) एवम् (C)

  4. DOption (d)

    (B) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(C) एवम् (D)

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प्रश्नानुवाद – बौद्धदर्शन में दोनों आचार्य कौन कौन हैं? 

स्पष्टीकरण-

  आचार्य असङ्ग बौद्धाचार्य - आचार्य असंग बौद्ध दर्शन के योगाचार अर्थात् विज्ञानवाद प्रस्थान के प्रवर्तक आचार्य थे। कौशिकगोत्रीय ब्राह्मण आचार्य असङ्ग के माता के परिचय तो मिलता है परन्तु पिता के परिचय के विषय में भिन्न भिन्न तथ्य उपलब्ध होता है। योगाचार (विज्ञानवाद) के विकास के इतिहास में आचार्य असंग का महत्वपूर्ण योगदान है। उनके लेखनशैली आगमों की तरह है और उन्होंने युक्ति से अधिक आगमों का प्रमाण किये है। आचार्य असंग की अनेक कृतियाँ हैं, जिनका संस्कृत वर्तमान में प्राय: अनुपलब्ध है परन्तु भोटभाषा में उनका अनुवाद उपलब्ध होता है एवं वह ग्रन्थः के 'तन-ग्युर' संग्रह में संकलित हैं।

धर्मकीर्ति – धर्मपाल और ईश्वरसेन के शिष्य थे धर्मकीर्ति । मैत्रेयनाथ, असंग और वसुबन्धु की बौद्धदर्शन के कृतियों से जो परम्परा प्रारम्भ हुआ था, उसे आचार्य दिङ्नाग ने अपनी कृतियों में वाद विधि से पृथक् तर्कशास्त्र के रूप में प्रकाश किया।  दिङ्नाग द्वारा प्रवर्तित इस तर्कशास्त्र को धर्मपाल एवं ईश्वरसेन के शिष्य आचार्य धर्मकीर्ति ने (बौद्धन्याय को) 'प्रमाणशास्त्र' के रूप में विकसित किया। आचार्य धर्मकीर्ति के प्रमाणशास्त्र विषयक सात ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं। आचार्य धर्मकीर्ति के सात ग्रन्थ इस प्रकार हैं-

  1. प्रमाणवार्तिक
  2. प्रमाणविनिश्चय
  3. न्यायबिन्दु
  4. हेतुबिन्दु
  5. वादन्याय
  6. सम्बन्धपरीक्षा
  7. सन्तानान्तरसिद्धि

इनके अतिरिक्त प्रमाणवार्तिक के 'स्वार्थानुमान परिच्छेद' की वृत्ति एवं 'सम्बन्धपरीक्षा की टीका' भी स्वयं धर्मकीर्ति ने लिखी है।

 Important Pointsउमास्वातिः – आचार्य उमास्वाति के अपर नाम आचार्य उमास्वामी जो जैन ग्रन्थ, तत्त्वार्थ सूत्र के लेखक है जो कुन्दकुन्दचार्य स्वामी के प्रमुख शिष्य थे। यह माना जाता हैं की आचार्य उमास्वामी दुसरी सदी के गणितज्ञ थे।  वह दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों सम्प्रदाय के मानने वालो में से थे। आचार्य उमास्वामी गृद्धपिच्छाचार्य के नाम से भी प्रसिद्ध थे क्योंकि तत्त्वार्थसूत्र की मूलग्रन्थ के अन्त में प्राप्त होने वाले पद्य में तत्त्वार्थसूत्र के कर्ता गृद्धपिच्छोपलक्षित उमास्वामी की वन्दना किया गया हैं एवं धवलाटीका में भी  तत्त्वार्थसूत्र के कर्ता गृद्धपिच्छोपलक्षित यह उल्लेख मिलता हैं।

             आचार्य गुणधर कृत षट्खण्डागम ग्रन्थ के शौरसेनी प्राकृत भाषा में रचित टीका हैं धवलाटीका।

 Important Points उदयन -  राजा उदयन चंद्रवंश के राजा थे। उनके पिता के नाम सहस्रानीक । वत्सराज्य के राजा थे राजा उनकी राजधानी कौशांबी थी।महाकवि भास ने अपने नाटकों में स्वप्नवासवदत्ता और प्रतिज्ञायौगंधरायण-में उन्हें अपनी कथा का नायक बनाया है। राजा श्रीहर्ष रचित रत्नावली ग्रन्थ का नायक भी राजा उदयन ही है।  वत्सराज की कथा बृहत्कथा और सोमदेव के कथासरित्सागर में भी वर्णित है।

Question 13

यथोचितं मेलनं कुरुत

सूची Iसूची II
A.प्रकृतिभावःI.अग्ने + अत्र
B.सवर्णदीर्घःII.उप + ओषति
C.पुर्वरुपैकादेशःIII.अहो + ईशाः
D.पररुपैकादेशःIV.यदि + इयम्
<br>

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) - (I), (B) - (II), (C) - (III), (D) - (IV)

  2. BOption (b)

    (A) - (IV), (B) - (III), (C) - (II), (D) - (I)

  3. COption (c)

    (A) - (II), (B) - (I), (C) - (IV), (D) - (III)

  4. DOption (d)

    (A) - (III), (B) - (IV), (C) - (I), (D) - (II)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(A) - (III), (B) - (IV), (C) - (I), (D) - (II)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद – सठीक रुप से सूची I के साथ सूची II को मिलाइये।

 स्पष्टीकरण -  प्रकृतिभावः - अहो + ईशाः

सवर्णदीर्घः - यदि + इयम्

पुर्वरुपैकादेशः - अग्ने + अत्र

पररुपैकादेशः - उप + ओषति

      यह चार ही सन्धि के सूत्र है।

 प्रकृतिभावः – ‘प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम्’ यदि कोई वर्ण प्लुत या प्रगृह्य संज्ञक होता है और उसके बाद यदि अच् आता है तो प्लुत और प्रगृह्य संज्ञक होता है। अगर प्रगृह्य संज्ञा होने के बाद यदि अच् आता है तो प्लुत और प्रगृह्य वर्णों का सन्धि नही होता है तव यह प्रकृतिभाव संज्ञा होता है। यथा – हरी + एतौ = हरी एतौ। कवी+आगतौ = कवी आगच्छतः।

         अहो + ईशाः यहाँपर ओ कारान्त अहो शब्द प्लुत संज्ञक है एवं ई कार अर्थात् अच् प्रत्याहार आनेपर यहाँपर प्रकृतिभाव सन्धि हआ है।

 सवर्ण दीर्घ सन्धि – अकः सवर्णे दीर्घः सूत्रानुसारे अक् प्रत्याहार अर्थात् अ इ उ ऋ लृ के आगे यदि सवर्ण स्वर रहता है तव दीर्घ सन्धि होता है। यह एकादश का आदेश होता है। यह एकादश से तात्पर्य है की दो स्वरों के स्थान पर एक ही आदेश । ���दाहरण – दौत्य+अरिः =दैत्यारिः , दधि+इन्द्र = दधीन्द्रः ।

              यदि + इयम् इस उदाहरण में इ के आगे सवर्ण अर्थात् अ वर्ण के रहने पर एकादश आदेश हुआ है एवं यह पर दीर्घ सन्धि होकर यदीयम् हो जायेगा।

 

पुर्वरुपैकादेश – ‘एङः पदान्तादपि’ अर्थात् पद के अन्त में स्थित ए एवं ओ के बाद हस्व अ के रहने पर उस अ का पूर्वेरुपएकादेश हो जाता है। ए/ओ +अ के स्थान पर ए/ओ एकादेश होता है तथा अ के स्थान पर अवग्रह चिन्ह लगा दिया जाता है। उदाहरण – को+अपि= कोSपि , गृहे+अस्मि= गृहेSस्मि ।

      अग्ने + अत्र इस उदाहरण में ए के स्थान पर अ एकादेश हो जायेगा एवं अ के स्थान पर अवग्रह चिन्ह लगा दिया जायेगा। यथा – अग्नेSत्र।

पररुपैकादेश – ‘एङिपररुपम्’ – अ/आ अर्थात् अ वर्णान्त उपसर्ग के पश्चात् ए/ओ से प्रारम्भ होने वाला धातुरुप अगर आये ते दोनों के स्थान पर पररुप अर्थात् बाद वाले वर्ण के एकादश होता है। यथा – अ/आ (उपसर्ग)+ ए/ओ(धातुरुप)=एकादेश। उदाहरण – प्र+एजते=प्रेजते, प्र+एषयति=प्रेषयति

    उप + ओषति इस उदाहरण में अ वर्णान्त उपसर्ग के पश्चात ओ होने पर पररूप वर्ण का अर्थात् ओ का एकादेश हो कर उपोषति हो जायेगा।

Question 14

यथोचितं मेलनं कुरुत

सूची Iसूची II
A.निपातःI.कृत्तद्धितसमासाश्च
B.नामII.भावप्रधानम्
C.आख्यातम्III.सत्त्वप्रधानानि
D.प्रादिपदिकम्IV.उच्चावचेष्वर्थेषु निपतन्ति
<br>

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) - (I), (B) - (II), (C) - (III), (D) - (IV)

  2. BOption (b)

    (A) - (IV), (B) - (II), (C) - (I), (D) - (III)

  3. COption (c)

    (A) - (IV), (B) - (III), (C) - (II), (D) - (I)

  4. DOption (d)

    (A) - (II), (B) - (III), (C) - (I), (D) - (IV)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(A) - (IV), (B) - (III), (C) - (II), (D) - (I)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद - सठीक रुप से सूची I के साथ सूची II को मिलाइये।

स्पष्टीकरण –

निपात – उच्चावचेष्वर्थेषु निपतन्ति

नाम –  सत्त्वप्रधानानि

आख्यातम्- भावप्रधानम्

प्रातिपदिकम् – कृत्तद्धितसमासाश्च

निपात – ‘उच्चावचेष्वर्थेषु निपतन्ति’ । यास्काचार्य के मत में निपात तीन प्रकार के होते हैं - उपमार्थक, कर्मोपसङ्ग्रहार्थक, ��दपूरणार्थक। जैसे – इव, न, चित, नु।

नाम- ‘सत्त्वप्रधानानि नामानि’ अर्थात् नामानि वस्तुप्रधान एवं धातु प्रधान होते है । जो भी क्रिया रूप में प्राप्त होता है वह नाम है। नाम के उल्लेख नैघण्टु के नैगमकाण्ड में मिलते हैं।

आख्यात - ‘भावप्रधानमाख्यातम्’ अर्थात् आख्यात क्रिया प्रधान होते है। आख्यात में सर्वदा धातु के प्रयोग होते हैं। आख्यात के उल्लेख भी नैघण्टु के नैगमकाण्ड में मिलते हैं ।

प्रातिपदिक – ‘कृत्तद्धितसमासाश्च’  अर्थात् कृदन्‍त-प्रत्‍ययान्त जिस शब्द के अन्‍त में हों  एवं  तद्धित प्रत्‍ययान्त शब्द जिस शब्द के अन्‍त में हों तथा समास  के शब्‍दों को भी प्रातिपदिक कहते हैं ।

  • अष्टाध्यायी के तृतीयध्याय में कृदतिङ् ३.१.९३ यह अधिकार सूत्र आता है । कृत प्रत्यय धातुओं के लिये होता है । इनके प्रयोग से विद्यमान कृदन्त शब्द के प्रातिपदिक संज्ञा होते है।यथा-  'रम्' धातु के साथ 'घञ्' प्रत्यय के याग से 'राम' इति कृदन्तशब्द बनता है, यह प्रातिपदिकसंज्ञक हैं।
  • अष्टाध्यायी के चतुर्थ एवं पञ्चमध्याये तद्धिताः ४.१.७६ यह अधिकार सूत्र आता है । तद्धितप्रत्यय के प्रयोग से शब्द के प्रातिपदिक संज्ञा होते है। यथा- 'कृष्ण' शब्द के साथ 'इञ्' इति तद्धितप्रत्यय के योग से 'कार्ष्णि' इति तद्धितान्तशब्द बनता है जो  प्रातिपदिकसंज्ञक है।
  • अष्टाध्यायी के द्वितीयध्याय के प्रथमद्वितीयपादे प्राक्कडारात्समासः २.१.३ यह अधिकार सूत्र मिलता है। यह समासविधायक सूत्र है। इस सूत्र से जो नूतन शब्द बनता है उनका प्रातिपदिक संज्ञा होता है। यथा, 'सीतायाः पतिः'  में सीतापति शब्द बनता है एवं यह प्रातिपदिकसंज्ञक है।

Question 15

यथोचितं मेलनं कुरुत

सूची Iसूची II
A.चित्तभुमिंःI.अस्तेयम्
B.यमःII.रागः
C.नियमःIII.एकाग्रम्
D.क्लेशःIV.तपः
<br>

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) - (III), (B) - (II), (C) - (I), (D) - (IV)

  2. BOption (b)

    (A) - (III), (B) - (I), (C) - (IV), (D) - (II)

  3. COption (c)

    (A) - (I), (B) - (II), (C) - (III), (D) - (IV)

  4. DOption (d)

    (A) - (IV), (B) - (III), (C) - (II), (D) - (I)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A) - (III), (B) - (I), (C) - (IV), (D) - (II)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद -  सठीक रुप से सूची I के साथ सूची II को मिलाइये।

स्पष्टीकरण - 

   चित्तम्– एकाग्रम्

   यमः– अस्तेयम्

   नियमः- तपः

   क्लेशः– रागः

           चित्तम् -  महर्षि पतञ्जलि के योगदर्शन के व्यासभाष्य मे चित्त के पाँच भूमि के सम्बन्ध में वताया गया है – क्षिप्त,मूढ,विक्षिप्त,एकाग्र एवं निरुद्ध। अतः उक्त प्रश्न में एकाग्र का चित्तवृत्ति से सम्बन्ध है । जिससे चित्त अनेक समय पर एक विषय पर टीका रहता है उसे एकाग्र कहते है – ‘एकाग्रे चेतसि सद्भूतमर्थम् प्रद्योतयति’ (योगसूत्र 1.1)।

        यम– “**अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः”(**योगसूत्र 2.30) - अहिंसा, यथार्थ ज्ञान, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह(संग्रह का अभाव) - ये पाँच यम हैं । अस्तेय अर्थात् चोरी न करना। मन, वचन आदि से किसी अपर का वस्तु को अपना न मानना अस्तेय है – “अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्” (योगदर्शन 2/37)

    नियमः  –  “तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग:” (योगसूत्र 2.1) – तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान इन तीन क्रियायोग का एक साथ पालन एवं निर्वचन करना नियम कहलाता हैं। "**कायेन्द्रियशुद्धिरशुद्धिक्षयात् तपसः"(**योगसूत्र-2-43) - सर्दी- गर्मी, भूख- प्यास, लाभ – हानि, जय- पराजय, सुख- दुःख व मान- अपमान  आदि सभी प्रकार द्वन्द्व को सहजता से सहन करना तप है।

 क्लेश – “अविद्याऽस्मिता रागद्वेषभिनिवेशा: पंच क्लेशा: ”(योगसूत्र २.३)। योग दर्शन के अनुसार पाँच क्लेश के सम्बन्ध में बताये गये है – अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष,अभिनिवेश। “ सुखानुशायी रागः” – (योगसूत्र २।७) शरीर के सुखों से उत्पन्न वस्तु के प्रति जो हमारा प्रेम अथवा इच्छा उत्पन्न हो जाती है, वह राग कहलाती है।

              अतः यहाँपर प्रश्न योगसूत्र से सम्बन्धित है।

Question 16

यथोचितं मेलनं कुरुत

सूची I आचार्याःसूची II ग्रन्थाः
A.कालिदासःI.छन्दसूत्रम्
B.केदारभट्टःII.वृत्तरत्नाकरः
C.क्षेमेन्द्रःIII.श्रुतबोधः
D.पिङ्गलःIV.सुवृत्ततिलकम्
<br>

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) - (I), (B) - (II), (C) - (III), (D) - (IV)

  2. BOption (b)

    (A) - (II), (B) - (III), (C) - (IV), (D) - (I)

  3. COption (c)

    (A) - (III), (B) - (II), (C) - (IV), (D) - (I)

  4. DOption (d)

    (A) - (IV), (B) - (II), (C) - (III), (D) - (I)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(A) - (III), (B) - (II), (C) - (IV), (D) - (I)

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स्पष्टीकरण -  कालिदास – श्रुतबोधः

         केदारभट्टः – वृत्तरत्नाकरः

         क्षेमेन्द्रः – सुवृत्ततिलकम्

         पिङ्गलः- छन्दसूत्रम्

कालिदास – संस्कृत साहित्य के महान पण्डित महाकविकालिदास उजैन के विद्वान थे। महाकविकालिदासरचित विविध ग्रन्थो में से एक प्रख्यात ग्रन्थ है श्रुतबोध।  श्रुतबोध का मूल कथानक भोजप्रबन्धसार से गृहित है।प्रस्तुत ग्रन्थ में महाकविकालिदास ने 40 छन्दों का प्रयोग किया है।

केदारभट्टः – केदारभट्ट आनुमानिक 14वी शताब्दी का कवि है यह माना जाता हैं। केदारभट्ट रचित वृत्तरत्नाकर ग्रन्थ छन्दशास्त्र के एक अति प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसमें 6 अध्याय तथा 136 श्लोक है। इसमें छन्द के लक्षण के  रूप में प्रयुक्त पङ्क्ति छन्द के उदाहरण रूप में भी घटित हो जाती है। प्रस्तुत ग्रन्थ के दो टीकाए उपलब्ध है - काशीनिवासी नारायणभट्ट की टीका एवं दूसरी सेतुटीका।

क्षेमेन्द्र – महाकवि क्षेमेन्द्र के औचित्यविचारचर्चा ग्रन्थ के साथ साथ अलङ्कार सम्प्रदायपरक और एक रचना है सुवृत्ततिलकम्। यह ग्रन्थ विन्यास में विभक्त है एवं प्रति विन्यास गुच्छक में विभक्त है।

पिङ्गलः - भारत के प्राचीन गणितज्ञ और छन्दःसूत्र के रचयिता आचार्य पिङ्गल है। इनका समयकाल आनिमानिक ४०० ईपू से २०० ईपू है। जनश्रुति के मत में यह पाणिनि के अनुज थे। छन्दसूत्रम् ग्रन्थ पिङ्गलराव के छन्द विषयक ग्रन्थ है, जो सूत्रशौली में लिखे गये है एवं भाषा भी कठिन है। हलायुध नें छन्दसूत्रम् के उपर मृतसञ्जीवनी भाष्य रचना किये हैं।

   अतः यहपर सारे ग्रन्थ अलङ्कार सम्प्रदाय के है।

Question 17

अर्थशास्त्रे तन्त्रयुक्तीनां विवेचनं कस्मिन् अधिकरणे प्राप्यते?

  1. AOption (a)

    द्वितीये

  2. BOption (b)

    नवमे

  3. COption (c)

    त्रयोदशे

  4. DOption (d)

    पञ्चदशे

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Correct answer

Answer: (d)D.

पञ्चदशे

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प्रश्नानुवाद: अर्थशास्त्र में तंत्रयुक्ति का विवेचन किस अधिकरण में प्राप्त है?

स्पष्टीकरण: कौटिल्य अर्थशास्त्र के १५ वें अधिकरण में तंत्रयुक्तियों का विवेचन किया गया है। 

मुख्य बिन्दु:

  • भारत के सुप्रसिद्ध विद्वान "कौटिल्य" के द्वारा रचित "अर्थशास्त्र" भारतीय शासन व्यवस्था का एक अद्वितीय ग्रन्थ है।
  • राजव्यवस्था, नीति, विधि, न्याय, शासन के महत्वपूर्ण अंगों से परिपूरित विषयवस्तु वाला ग्रन्थ होने से यह उस एक सर्वश्रेष्ठ कृति है।
  • कौटिल्य विरचित "अर्थशास्त्र" कुल १५ अधिकरणों में विभक्त है:
  • विन्याधिकरण
  • अध्यक्षप्रचार
  • धर्मस्थीयाधिकरण
  • कण्टकशोधन
  • वृत्ताधिकरण
  • योन्याधिकरण
  • षाड्गुण्य
  • व्यसनाधिकरण
  • अभियास्यत्कर्माधिकरण
  • संग्रामाधिकरण
  • संघवृत्ताधि��रण
  • आबलीयसाधिकरण
  • दुर्गलंभोपायाधिकरण
  • औपनिषधिकाधिकरण
  • तंत्रयुक्त्याधिकरण
  • तंत्रयुक्ति - इसका आशय उन शास्त्रार्थ करने की विधियों से है जिसके द्वारा परिषदों एवं सभाओ में शास्त्रार्थ किया जाता है।
  • कौटिल्य अर्थशास्त्र में कुल ३२ युक्तियाँ गिनायी गयी हैं।

अतिरिक्त जानकारी:

  • अन्य ग्रंथों के अनुसार युक्तियों की संख्या:
  • चरकसंहिता - ३६ तंत्रयुक्तियाँ
  • अष्टांगहृदय - ३६ तंत्रयुक्तियाँ
  • सुश्रुतसंहिता - ३२ तंत्र युक्तियाँ

Question 18

महाभारतस्य कस्मिन् पर्वणि रामोपाख्यानं वर्तते?

  1. AOption (a)

    वनपर्वणि

  2. BOption (b)

    शान्तिपर्वणि

  3. COption (c)

    भीष्मपर्वणि

  4. DOption (d)

    अनुशासनपर्वणि

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Correct answer

Answer: (a)A.

वनपर्वणि

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प्रश्नानुवाद: महाभारत के किस पर्व में राम उपाख्यान बताया है?

स्पष्टीकरण: महाभारत के वनपर्व में भगवान राम की कथा का वर्णन आता है जिसे की "रामोपाख्यान" कहा जाता है। 

मुख्य बिन्दु:

  • संस्कृत जगत के "आदिकाव्यों" में से सुप्रसिद्ध "महाभारत" अद्बितीय ग्रन्थ है। जिसके रचयिता "कृष्णद्वैपायन वेदव्यास" थे।
  • कुल १८ पर्वों में विभक्त यह ग्रन्थ एक "उपजीविकाव्य" है। अर्थात ऐसा काव्य जिसके आधार पर ही आगे चल करा अन्य बहुत से काव्यों की रचना हुई।
  • महाभारत के भीतर बहुत सी कथाएँ प्राप्त होती है। यथा - "दुष्यंत - शकुंतला", नल-दमयन्ती" एवं श्री राम उपाख्यान सर्वप्रसिद्ध हैं।
  • महाभारत के "वनपर्व" के अध्याय २७३-२९१ में हमें "भगवान् श्री राम" की कथा भी प्राप्त होती है। जिसे की "रामोपाख्यानं" कहा जाता है।
  • यह कथा महर्षि "मार्कण्डेय" द्वारा "युधिष्ठिर" को सुनाई गयी थी।

अतिरिक्त जानकारी:

  • "महाभारत" में कुल चार जगहों पर "रामकथा" का वर्णन प्राप्त होता है। यथा - स्वर्गारोहणपर्व, शान्तिपर्व एवं द्रोणपर्व में "षोडशराजोपाख्यान" और साथ ही जब "भीम" एवं "हनुमान" की भेंट होती है तब भी "हनुमान" भीम को ११ श्लोकों में "श्री राम कथा" सुनते हैं। ​
  • परन्तु, इन सभी में से सबसे अधिक विस्तृत "वनपर्व" का "रामोपख्यान" है।

Question 19

आधुनिकयुगे ब्राह्मीलिपिं सर्वप्रथमं कः पठितुं समर्थः अभवत्?

  1. AOption (a)

    जेम्सप्रिंसमहोदयः

  2. BOption (b)

    चार्ल्समैसनमहोदयः

  3. COption (c)

    बिल्सनमहोदयः

  4. DOption (d)

    बी.बी. लालमहोदयः

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Correct answer

Answer: (a)A.

जेम्सप्रिंसमहोदयः

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प्रश्नानुवाद: आधुनिक युग में ब्राह्मी लिपि सर्वप्रथम कौन पढ़ने में समर्थ हुआ?

स्पष्टीकरण: आधुनिक युग में सर्वप्रथम ब्राह्मी लिपि को पढ़ने में "जेम्सप्रिंसेप" समर्थ हो पाए थे।

मुख्य बिन्दु:

  • "जेम्स प्रिंसेप" ईस्ट इण्डिया कंपनी में एक अधिकारी थे।
  • इन्होंने १८३८ ईस्वी में ब्राह्मी एवं खरोष्ठी लिपि के अध्ययन में सफलता प्राप्त की।
  • उन्होंने सर्वप्रथम "साँची के स्तूप" पर अंकित ब्राह्मी अक्षरों में "दान" शब्द को पढ़ा।
  • इसी शब्द के आधार पर ही "जेम्स प्रिंसेप" ने ब्राह्मी लिपि की वर्णमाला तैयार की।

अतिरिक्त जानकारी:

  • ब्राह्मी लिपि भारत की प्राचीनतम लिपि मानी जाती है। जो की सिंधु घाटी सभ्यता के बाद प्रकाश में आई।
  • सम्राट अशोक ने इसी लिपि में अपने अधिकतर अभिलेखों एवं स्तम्भ लेखों का उद्धरण कराया था।

Question 20

'एको रसोऽङ्गीकर्त्तव्यो वीरः श्रृङ्गार एव वा' इति कस्याचार्यस्योक्तिः ?

  1. AOption (a)

    पण्डितराजस्य

  2. BOption (b)

    धनञ्जयस्य

  3. COption (c)

    विश्वनाथस्य

  4. DOption (d)

    मम्मटस्य

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Correct answer

Answer: (b)B.

धनञ्जयस्य

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प्रश्नानुवाद: "​एको रसोऽङ्गीकर्त्तव्यो वीरः श्रृङ्गार एव वा" यह किस आचार्य की उक्ति है?

स्पष्टीकरण: "एको रसोऽङ्गीकर्त्तव्यो वीरः श्रृङ्गार एव वा" अर्थात "श्रृंगार अथवा वीर रस में से एक अंगी रस करना चाहिए" यह उक्ति "आचार्य धनञ्जय" की है। 

मुख्य बिंदु:

  • १० वीं शताब्दी के एक सुप्रसिद्ध विद्वान "आचार्य धनञ्जय" नाट्यशास्त्र के अद्भुत ज्ञाता थे।
  • "आचार्य धनञ्जय" विरचित "दशरूपकम्" संस्कृत साहित्य का एक सुप्रसिद्ध एवं महत्त्वपूर्ण नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थ है।
  • आचार्य द्वारा "वस्तु, नायक एवं रस" को आधार बना नाट्य के दस भेद किये गए हैं:
  • ​​नाटक
  • प्रकरण
  • भाण
  • व्यायोग
  • समवकार
  • डिम
  • ईहामृग
  • अंक
  • वीथी
  • प्रहसन
  • नाट्य के प्रथम भेद "नाटक" के विषय में बताते हुए आचार्य "नाटक" की मुख्य बिंदुओं की बात करते हैं:
  • ​वस्तु/कथावस्तु - सुप्रख्यात कथा वस्तु होनी चाहिए। ​
  • नायक/नेता - उच्चकोटि का व्यक्ति यथा राजर्षि अथवा देव के समान एवं नायक धीरोदात्त कोटि का होना चाहिए।
  • रस - नाटक में वीर अथवा श्रृंगार रस "अङ्गीरस" होना चाहिए। (अन्य रस केवल गौण)

अतिरिक्त जानकारी:

  • "आचार्य धनञ्जय" के पिता का नाम "विष्णु" था।
  • "धनञ्जय" को "मुंजराज" का सभासद बताया जाता है। जिनका काल ९७४ - ९९५ ईस्वी रहा था।
  • भरतमुनि के "नाट्यशास्त्र" के बींसवें अध्याय "दशरूपविकल्पन" अथवा "दशरूपविधान" को आधार बना "धनञ्जय" ने अपने ग्रन्थ का नाम "दशरूपकम्" रखा।

Question 21

काव्यालङ्कारसूत्रस्य 'कविप्रिया' वृत्तेः रचियता कः?

  1. AOption (a)

    सहदेवः

  2. BOption (b)

    गोपेन्द्रः

  3. COption (c)

    भट्टगोपालः

  4. DOption (d)

    वामनः

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Correct answer

Answer: (d)D.

वामनः

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प्रश्नानुवाद: काव्यालङ्कारसूत्र की "कविप्रिया" वृत्ति के रचयिता कौन हैं?

स्पष्टीकरण: "काव्यालङ्कारसूत्र" ग्रन्थ के रचयिता आचार्य वामन के द्वारा ही इस ग्रन्थ पर "कविप्रिया" नामक वृत्ति लिखी गयी थी। 

मुख्य बिन्दु:

  • "आचार्य वामन" 8 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध - 9 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध के एक प्रसिद्ध अलंकारशास्त्री थे।
  • काव्यालङ्कारसूत्र "आचार्य वामन" विरचित एकमात्र ग्रन्थ है।
  • यह ग्रन्थ सूत्रशैली में लिखा गया है। एवं कुल ५ अधिकरणों में विभक्त है।
  • इस ग्रन्थ के प्रत्येक अधिकरण में भिन्न-भिन्न अध्यय हैं। जिनकी कुल संख्या १२ है।
  • "काव्यालङ्कारसूत्र" पर स्वयं "आचार्य वामन" ने ही "कविप्रिया" नामक वृत्ति की रचना की।
  • कविप्रिया इतनी सटीक टीका मानी जाती है की इस ग्रन्थ पर अन्य किसी टीका की अधिक आवश्यकता पड़ी ही नहीं। जिसके कारण इस ग्रन्थ पर अधिक टीकाएँ आज प्राप्त नहीं होती हैं।

अतिरिक्त जानकारी:

  • "आचार्य वामन" द्वारा "रीति" सम्प्रदाय अथवा सिद्धांत का निर्माण किया गया। जो की काव्य की आत्मा "रीति" को मानते हैं।

Question 22

मन्त्रिपरिषदि यथासामर्थ्यम् अमात्यान् कुर्वीत इति कस्य मतम्?

  1. AOption (a)

    बृहस्पतेः

  2. BOption (b)

    औशनसस्य

  3. COption (c)

    कौटिल्यस्य

  4. DOption (d)

    पराशरस्य

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Correct answer

Answer: (c)C.

कौटिल्यस्य

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प्रश्नानुवाद: मंत्रिपरिषद में सामर्थ्य के अनुसार अमात्यों को रखें। यह किसका मत है?

अमात्योत्पत्तिकौटिलीय अर्थशास्त्र के विनयाधिकारिकम् अधिकरण के चतुर्थ प्रकरण में अमात्योत्पत्ति के बारे में मत दिए गए है-

  • भारद्वाज के अनुसार - राजा ने अपने सहपाठीयों को अमात्य रखना चाहिए, उनका हृदय की पवित्रता और कार्य करने की शक्ति राजाको पता होती है। उनपर भरोसा किया जा सकता है।
  • विशालाक्ष के अनुसार- यह सही नहीं। राजा के साथ वो खेलते थे इसका अर्थ वे राजा की अवज्ञा कर सकते है। जो राजा के आचरण के समान ही आचरण करने वाले हो उन्हीको अमात्य बनाना चाहिए। उनके शील और व्यसन समान होते है और राजा अपने मर्मो को पहचानता है अतः वह राजा के विरुद्ध नहीं जाएंगे।
  • पाराशर के अनुसार - यह दोष दोनों को लागू होता है। उनको भी राजा के मर्म पता है इस दर से राजा को उनके कृत्यों को अनुमती कर देगा। राजा जितने लोगो को अपने मर्म बताता है उतने लोगो पर वह पराधीन होता है। प्राणों पर संकट आने के समय जो रक्षण के लिए आये होंगे उनको अमात्य बनाना चाहिए। क्योंकि उनकी भक्ति का भी परिक्षण हुआ होता है।
  • पिशुन कहते है - यह गलत है। यह राजा के उपर श्रद्धा की परीक्षा है इससे बुद्धिमत्ता की कसोटी नहीं होती। जो दिए गए कार्यो में नियुक्त होकर उनको उचित रीती से पूर्ण करे या अपेक्षित से जादा उत्पन्न करे ऐसे पुरुषोंको अमात्य बनाना चाहिए। क्योंकि इससे बुद्धि की परीक्षा होती है।
  • कौणपदन्त कहते है - यह गलत है। क्योंकि अमात्य को अपेक्षित गुण उनमे नहीं होते वे पितामह के समय से जो काम करते थे उनको अमात्य रखना चाहिए (जिनके पितामह और पिता भी अमात्य थे) क्योंकि उनके आचरण से परिचय होता है। कुछ भी गलत वर्तन से वे छोड़ कर नहीं जाते।
  • वातव्याधी के मत के अनुसार - ऐसे लोग सबकुछ अपना ही है इस विचार से काम करेंगे इससे अच्छा है राजनीति में पारंगत नए मनुष्य को अमात्य करे। वे राजा को यमराज मानते है।
  • बहुदंती कहता है, शास्त्र तो जानना चाहिए किन्तु अनुभवहीन मनुष्य काम से डर जाने का संभव है। कुलीन, बुद्धिमान, शूर, स्वामिभक्त मनुष्य को अमात्य होना चाहीये.

इनके मत के बाद, चाणक्य अपना मत कहते है, - यह सर्व उपपन्न है। कार्य सम्पन्न करने के सामर्थ्य से मनुष्य का सामर्थ्य जाना जाता है।

सामर्थ्यश्च विभज्यामात्य-विभवं देश-कालौ च कर्म च।अमात्याः सर्व एवएते कार्याः स्युर्न तु मन्त्रिणः।। 

सामर्थ्य के अनुसार उनकी वृद्धि, देश, काल और कार्य इनका विवेचन कर इनको अमात्य पद पर नियुक्त करना चाहिए। परन्तु इनको मंत्री पद पर नहीं रखना चाहिए।

अतः 'मंत्रिपरिषद में सामर्थ्य के अनुसार अमात्यों को रखें' यह कौटिल्य का मत है यह स्पष्ट होता है।

Question 23

अधोलिखितेषु कः सामवेदस्य सप्तस्वरेषु न परिगण्यते?

  1. AOption (a)

    ऋृषभः

  2. BOption (b)

    पञ्चमः

  3. COption (c)

    उत्तमः

  4. DOption (d)

    मध्यमः

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Correct answer

Answer: (c)C.

उत्तमः

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प्रश्नानुवाद: अधोलिखित में से कौन सामवेद के सप्तस्वरों में परिगणित नहीं है?

स्पष्टीकरण: सामवेद के सप्तस्वरों में "उत्तम" नामक स्वर परिगणित नहीं है। 

मुख्य बिन्दु:

  • सामवेद भारतीय वैदिक साहित्य के चतुर्वेदों में से एक है साथ ही यह "वेदत्रीय" में भी परिगणित किया जाता है।
  • सामवेद एक "गीत-संगीत" प्रधान वेद है। एवं यह आकार की दृष्टि से सबसे छोटा वेद है।
  • सामवेद में कुल 1875 मन्त्र है। एवं इनमें से 99 मन्त्रों को छोड़ सभी ऋग्वेद के हैं। केवल 17 मन्त्र अथर्ववेद एवं यजुर्वेद के पाए जाते हैं।
  • नारदीय शिक्षा में सामवेद की गायन पद्धति का वर्णन मिलता है जिसे की आधुनिक काल में संगीत के सात सुर/स्वर कहा जाता है।
  • इन सप्त स्वरों का क्रम इस प्रकार है:
  1. षडज्
  2. ऋषभ
  3. गांधार
  4. मध्यम
  5. पंचम
  6. धैवत
  7. निषाद

अतिरिक्त जानकारी:

 अन्य विकल्पों के स्वर:

  • ऋषभ - रे
  • पंचम - प
  • मध्यम - म

Question 24

वर्नरनियमेन मूलभारोपीयभाषायाः कु. त्, प् इत्येते ध्वनयः जर्मनिक भाषासु ह्, थ्, फ् इति कस्यां स्थितौ जायन्ते?

  1. AOption (a)

    यदा तेभ्यः ध्वनिभ्यः अव्यवहितपूर्वम् उदात्तस्वरः भवति ।

  2. BOption (b)

    यदा तेभ्यः ध्वनिभ्यः अव्यवहितपूर्वम् अनुदात्तस्वरः भवति ।

  3. COption (c)

    यदा तेभ्यः ध्वनिभ्यः अव्यवहितपूर्वम् स्वरितस्वरः भवति ।

  4. DOption (d)

    यदा तेभ्यः ध्वनिभ्यः अव्यवहितपूर्वम् एकश्रुतिस्वरः भवति ।

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Correct answer

Answer: (a)A.

यदा तेभ्यः ध्वनिभ्यः अव्यवहितपूर्वम् उदात्तस्वरः भवति ।

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद: वर्नर नियम के द्वारा मूल भारोपीय भाषा के "क्, त्, प्" इन ध्वनियों का जर्मन भाषा में " ह्, थ्, फ्" यह किस स्थिति में होता है?

स्पष्टीकरण: वर्नर नियम के अनुसार जब इन ध्वनियों के से पूर्व में अव्यवहित उदात्त स्वर होता है। तब "क्, त्, प्" का जर्मन भाषा में "ह्, थ्, फ्" स्वर होता है। 

मुख्य बिन्दु:

  • कॉल वर्नर/बर्नर एक जर्मन भाषाशास्त्री थे। एवं इनके द्वारा प्रतिपादित "ध्वनि नियम" को "वर्नर नियम" कहा जाता है।
  • कॉल बर्नर/वर्नर का समय 1846 - 1896 था।
  • वर्नर नियम के अनुसार भारोपीय भाषा शब्दों के "क्, त्, प्" को जर्मनिक भाषाओं में "ह्, थ्, फ्" के रूप में देखा जा सकता है। अगर क्, त्, प् उदात्त स्वर के बाद हो तब उनके जगह पर क्रमशः ग्, द् ब् होते है।
  • इस परिवर्तन का कारण "मूलभाषा" में अव्यवहित पूर्व में कोई उदात्त स्वर होता है। ​

अतिरिक्त जानकारी:

  • भाषा में ध्वनि परिवर्तन के मुख्य-सिद्धांत एवं उनके के प्रतिपादक:
  • याकोबी ग्रिम - ग्रिम नियम
  • हरमन ग्रासमैन - ग्रासमैन नियम
  • कॉल बर्नर/वर्नर - वर्नर नियम

Question 25

अभावविषयकप्रत्यक्षप्रमायां चक्षुरिन्द्रियस्य

अभावपदार्थस्य च मध्ये संन्निकर्षः-

  1. AOption (a)

    समवेतसमवायः

  2. BOption (b)

    संयुक्तसमवेतसमवायः

  3. COption (c)

    समवायः

  4. DOption (d)

    विशेषणविशेष्यभावः

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Correct answer

Answer: (d)D.

विशेषणविशेष्यभावः

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प्रश्नानुवाद- अभावविषयक प्रत्यक्ष प्रमा के चक्षुरिन्द्रिय के अभावपदार्थ के मध्ये सन्निकर्ष है - 

स्पष्टीकरण - अभावविषयक प्रत्यक्ष प्रमा के चक्षुरिन्द्रिय के अभावपदार्थ के मध्ये विशेषणविशेष्यभाव सन्निकर्ष होता है। 

  • विशेषणविशेष्यभावसन्निकर्ष - "**यदा चक्षुपा संयुक्ते मूतले घटाभावो गृह्यते 'इह भूतले घटो नास्ति' इति, तदा विशेषण- विशेष्यभावः सम्बन्धः ।"​ '**घटो नास्ति- इस भूतल में घड़ा नहीं है' इस शब्द से व्यवहृत किया जाता है तब घटाभावरूप अर्थ के साथ चक्षु इन्द्रिय का विशेषणविशेष्यभाव - अर्थात् चतुः संयुक्त- विशेषणता वा चतुःसंयुक्तविशेष्यतारूप सन्निकर्ष होता है क्योंकिं घटाभाव चक्षु से संयुक्त भूतल का विशेषण होता है और भूतल उस विशेषण का विशेष्य होता है। जिस भूतल में घट नहीं होता उस भूतल को घटाभाव घटयुक्त अन्य भूतलों से, विशिष्ट-विलक्षण बना देता है जिससे वह भूतल घटाभाववद् भूतल कहा जाने लगता है।

Extra Points

  • संयुक्तसमवेतसमवाय - "यदा चक्षुरादिना घटगतरूपादिक गृह्यते घटे श्याम रूपमस्तीति, तदा चक्षुरिन्द्रिय, घटरूपमर्थः, अनयोः सन्निकर्षः सयुक्तसमवाय एव चक्षुः- सयुक्ते घटे रूपस्य समवायात् । एव मनसात्मसमवेते सुखादौ गृह्यमाणे अयमेव सन्निकर्पः ।"  जब चक्षु आदि से घट के रूप आदि गुण, कर्म और जाति का ज्ञान होता है जिसे 'घटे श्यामं रूपम् अस्ति—घड़े में श्याम रूप है, 'घटः कम्पते-घड़ा हिलता है, 'घटो द्रव्यम्-घड़ा द्रव्यत्व जाति का आश्रय है' इन शब्दो से व्यवहुत किया जाता है, तत्र चक्षु इन्द्रिय होता है, घट में रहने वाला रूप आदि गुण, कर्म और जाति अर्थ होता है, संयुक्त- समवाय इन्द्रियार्थसन्निकर्ष होता है । इसी प्रकार आत्मा में समवेत समवाय सम्बन्ध से रहने वाले सुख, दुःख, ज्ञान, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न इन गुणों का तथा आत्मत्व, द्रव्यत्व और सत्ता इन जातियों का मन से प्रत्यक्ष होने में भी यही - संयुक्त- समवाय ही इन्द्रियार्थसन्निकर्ष होता है क्योंकि मन- इन्द्रिय से संयुक्त आत्मा में सुख आदि गुणो का तथा आत्मत्व आदि जातियो का समवाय सम्बन्ध होता है ।
  • समवेतसमवायसन्निकर्ष - "यदा शब्दसमवेतं शब्दत्वादि- सामान्यं श्रोत्रेन्द्रियेण गृह्यते तदा श्रोत्रमिन्द्रियं शब्दत्वादिसामान्यमर्थः । अनयोः सन्निकर्षः समवेतसमवाय एव, श्रोत्रसमवे ते शब्दे शब्दत्वस्य समवायात्।" जब शब्द में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली शब्दत्व आदि जातियों का श्रोत्र से प्रत्यक्ष होता है। तत्र श्रोत्र इन्द्रिय होता है, शब्दत्व आदि जातिया अर्थ होती हैं और जातियों के साथ श्रोत्र का समवेतसमवाय सन्निकर्ष होता है क्योंकि क्षेत्र में समवेत होता है शब्द और उसमें समवेत होता है शब्दत्व, अतः शब्दत्व के साथ श्रोत्र के समवेतसमवाय सम्बन्ध के होने में कोई बाधा नहीं होती ।
  • समवायसन्निकर्ष -  "यदा श्रोत्रेन्द्रियेण शब्दो गृह्यते तदा श्रोत्र- मिन्द्रियं शब्दोऽर्थः, अनयोः सन्निकर्षः समवाय एव । कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नं नभः श्रोत्रम् | श्रोत्रस्याकाशात्मकत्वाच्छब्दस्य चाकाशगुणत्वाद् गुणगुणिनोश्च समवायात् ।" जब श्रोत्र-कान से शब्द का ग्रहण-श्रवण होता है तब श्रोत्र इन्द्रिय होता है, शब्द अर्थ होता है और शब्द के साथ श्रोत्र का समवाय सन्निकर्ष होता है क्योंकि कर्णशष्कुली से अवच्छिन्न अर्थात् कान के मध्यभाग में स्थित आकाश ही श्रोत्र कहा जाता है अतः क्षेत्र आकाशस्वरूप है और शब्द आकाश का गुण है एवं गुण और गुणी के साथ समवाय सम्बन्ध होता है।

Question 26

'घनश्यामः' इत्यत्र समासविधायकं सूत्रं वर्तते-

  1. AOption (a)

    विशेषणं विशेष्येण बहुलम्

  2. BOption (b)

    उपमानानि सामान्यवचनैः

  3. COption (c)

    उपमितं व्याघ्रदिभिः सामान्यप्रयोगे

  4. DOption (d)

    मयूरव्यंसकादयश्च

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Answer: (b)B.

उपमानानि सामान्यवचनैः

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प्रश्नानुवाद - घनश्यामः - यहाँपर समासविधायक सूत्र क्या है? 

स्पष्टीकरण - घनश्यामः - यहाँपर उपमानानि सामान्यवचनै सूत्रानुसारे समास हुआ हैं। 

 उपमानानि समान्यवचनै यह कर्मधारय समास का सूत्र हैं। उपमानानि समान्यवचनै  सूत्रानुसारे जब  किसी वस्तु से उपमा दी जाती है, तो वह वस्तु जिससे उपमा दी जाती और वह गुण जिसकी उपमा हो वह मिल कर कर्मधारय समास होंगे और इस समास का नाम उपमानपूर्वपद कर्मधारय। पूर्वनिपात विषय के नियन्त्रण के लिये यह सूत्र बनाया गया हैं। कर्मधारय समास तीन प्रकार के होता हैं -

  • उपमान कर्मधारय
  • उपमित कर्मधारय एवं
  • रूपक कर्मधारय।

तुलना करने के लिये तीन विषय की आवश्यकता है -

  • उपमेय,
  • उपमान एवं
  • सामान्यधर्म अथवा सादृश्य वाचक शब्द।
  • घनश्यामः इस उदाहरण का समासविग्रह होगा घन इव श्यामः । उदाहरण में किसी वस्तु की बादल से उपमा दी गई है और यह बतलाया गया है कि वह वस्तु ऐसी चमक रहाँ है जैसे बादल।  प्रस्तुत उदाहरण में कृष्ण के साथ तुलना की गयी है, अतएव कृष्ण उपमेय है। जिसके साथ तुलना की जाये वह उपमान है। अतः घन यहाँपर उपमान हैं। उपमेय एवं उपमान के बीच जो साधारण बैशिष्ट्य है वह सामान्य धर्म है। जैसे - श्यामः । श्यामत्व कृष्ण एवं बादल दोनों के लिये साधारण हैं।​

Question 27

'चैतन्यं पुरुषस्य स्वरुपम्', 'प्रतिषिद्धवस्तुधर्मा निष्क्रियः पुरुषः' तिष्ठति वाणः' - इत्यादिकम् उदाहरणम् अस्ति-

  1. AOption (a)

    स्मृतिवृत्तेः

  2. BOption (b)

    प्रमाणवृत्तेः

  3. COption (c)

    विकल्पवृत्तेः

  4. DOption (d)

    विपर्ययवृत्तेः

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Answer: (c)C.

विकल्पवृत्तेः

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भाषानुवाद-'चैतन्यं पुरुषस्य स्वरुपम्', 'प्रतिषिद्धवस्तुधर्मा निष्क्रियः पुरुषः' तिष्ठति वाणः' - इत्यादि उदाहरण हैं?

स्पष्टीकरण- 'चैतन्यं पुरुषस्य स्वरुपम्', 'प्रतिषिद्धवस्तुधर्मा निष्क्रियः पुरुषः' तिष्ठति वाणः' - इत्यादि विकल्पवृत्ति के उदाहरण हैं।

Important Points

  • योगदर्शन छः आस्तिक दर्शनों (षड्दर्शन) में से एक है। इसके प्रणेता पतञ्जलि मुनि हैं। यह दर्शन सांख्य दर्शन के 'पूरक दर्शन' के नाम से प्रसिद्ध है।
  • इसका प्रारम्भ पतञ्जलि मुनि के योगसूत्रों से होता है। योगसूत्रों की सर्वोत्तम व्याख्या व्यास मुनि द्वारा लिखित व्यासभाष्य में प्राप्त होती है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार मनुष्य अपने मन (चित) की वृत्तियों पर नियन्त्रण रखकर जीवन में सफल हो सकता है और अपने अन्तिम लक्ष्य निर्वाण को प्राप्त कर सकता है।
  • योगसूत्र में पांच चित्त-वृत्तियां वर्णित हैं । ये हैं – प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति।

Key Points

"प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतय:"

पतंजलि योग सूत्र के अनुसार चित्तवृत्ति पांच प्रकार की होती है–

  1. प्रमाण वृत्ति- वास्तविक घटनाओं का ज्ञान कराने वाली वृत्ति प्रमाण वृत्ति हैं। पतञ्जलि कहते हैं कि प्रमाण तीन प्रकार के होते हैं (प्रत्यक्षानुमानागमा: प्रमाणानि) – 

(१)प्रत्यक्ष–जो इन्द्रियों से वर्तमान में ग्रहण हो रहा हो । 

(२)अनुमान–जो पूर्व प्रत्यक्ष किए विषय के व्यवहार से हम अन्य विषयों के बारे में – उनके व्यवहार को देखे बिना – जान सकते हैं । जैसे – एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचने के लिए किसी पदार्थ में गति होना आवश्यक है, यह जानकर हम किसी भी स्थानान्तरण में गति का अनुमान लगा सकते हैं । 

(३)आगम–जो आप्त, ज्ञानी लोगों ने देखा और अनुमान लगाया है, उसका शब्दों में उपदेश ।

विपर्यय वृत्ति-  पतञ्जलि कहते हैं कि यह मिथ्याज्ञान है, जिससे हम जैसे को तैसा नहीं समझते, कुछ और ही समझ बैठते हैं (विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥१।८॥) । जैसे – जीवात्मा समझता है कि वह यह शरीर है, जबकि वह है कुछ और । यदि हम सूत्र २।५ में दी अविद्या की परिभाषा (अनित्याशुचिदु:खानात्मासु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ॥२।५॥) – अनित्य में नित्य, अशुचि में शुचि, दु:ख में सुख, अनात्मा में आत्मा – से मिलाएं, तो यह विपर्यय-वृत्ति अविद्या-क्लेश के बराबर ही है, क्योंकि दोनों ही मिथ्याज्ञान हैं । यहां तक कि “ध्यानहेयास्तद्वृत्तय: (२।११)” में पतञ्जलि क्लेशों को वृत्तियां ही कहते हैं । लेकिन पुन:, ज्ञान तो चित्त-वृत्ति नहीं है – वह तो मस्तिष्क में बैठी कुछ स्मृतियां है ! वस्तुत:, यह विपर्यय ज्ञान चित्त-वृत्ति तब बनता है, जब इस ज्ञान के आधार पर हम कुछ व्यवहार करते हैं । जैसे – शरीर पर चोट लगने से हम दु:ख का अनुभव करते हैं । यहां चोट तो प्रकृति से बने इस जड़ शरीर को लगी, लेकिन कष्ट हम अपने में अनुभव करते हैं । सो मिथ्याज्ञान के कारण, प्रत्यक्ष, आदि, में दु:ख-सुख, राग-द्वेष, आदि, करना, अर्थात् emotions, विपर्यय-वृत्ति हैं । मिथ्या ज्ञान को विपर्यय वृत्ति कहा जाता है । किसी घटना के बारे में गलत ज्ञान होना ही  विपर्यय वृत्ति हैं।

 विकल्प वृत्ति- पतञ्जलि कहते हैं – यह वह वृत्ति है जो शब्दों में ही बसी होती है – जो वस्तु-स्थिति नहीं होती है, उसको कहती है (शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्प: ॥१।९॥) किसी वस्तु के उपस्थित नहीं होने पर भी उस वस्तु के होने का ज्ञान या कल्पना करना ही विकल्प वृति है।

4. निद्रा वृत्ति- पतञ्जलि मुनि कहते हैं कि इस वृत्ति में इन्द्रियों से प्राप्त होने वाले ज्ञान का अभाव होता है (अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ॥१।१०॥ ) जब ज्ञान का अभाव होता है , तथा व्यक्ति का संबंध बाह्य जगत से टूट जाता है । निंद्रा वृत्ति होती है।

5. स्मृति वृत्ति- पतञ्जलि कहते हैं कि जिन अनुभूत विषयों को हम अपने चित्त में कैद करके रखते हैं, भूलने नहीं देते हैं, वे स्मृति हैं (अनुभूतविषयासम्प्रमोष: स्मृति: ॥ १।११॥ ) । पूर्व में अनुभव किए गए संस्कारों तथा विषयों का बार-बार स्मरण होना है स्मृति वृत्ति है।

Question 28

असमवायिकारणत्वम् एव अस्ति-

  1. AOption (a)

    द्रव्यसामान्ययोः

  2. BOption (b)

    अभावसमवाययोः

  3. COption (c)

    क्रियागुणयोः

  4. DOption (d)

    विशेषसमाहारयोः

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Correct answer

Answer: (c)C.

क्रियागुणयोः

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भाषानुवाद-असमवायिकारण भी है ?

स्पष्टीकरण- क्रियागुणयोः असमवायिकारण है।

Important Points

कारण का स्वरूप एवं भेद-

'प्रमाकरणं प्रमाणम् ' प्रमाण के लक्षण के प्रसंग में तर्कभाषाकार ने 'करण' पद को स्पष्ट करते हुए 'साधकतमं करणम् ।' कहा है। यहाँ ग्रंथकार ने 'साधक' का अर्थ 'कारण' किया है एवं प्रकृष्ट कारण को करण कहा है— 'अतिशयितं साधकं साधकतमं प्रकृष्टं कारणा मित्यर्थः' (तर्कभाषा पृ० 13-19)

यहाँ जिज्ञास्य है कि 'साधक' एवं 'कारण' समानार्थी होने से कारण के स्वरूपज्ञान के

बिना प्रकृष्ट कारण रूपी करण का ज्ञान सम्भव नहीं होगा, अतः कारण का लक्षण आवश्यक

है। कारण का लक्षण है- 'जिसका कार्य से पूर्व होना नियत है और जो अन्यथा सिद्ध नहीं है

वह कारण है। यथा तन्तु, वेमादि पट के कारण हैं।

'यस्य कार्यात् पूर्वभावो नियतोऽनन्यथासिद्धश्च तत्कारणम्।" (तर्कभाषा, पृ० 19) इस लक्षण में 'यस्य कार्यात् पूर्वभावः' पद द्वारा कारण की कार्य से भिन्नता स्पष्ट की गई है। यह सर्वज्ञात है कि कारण के होने पर ही कार्य होता है, अतः कारण को कार्य से पूर्वभावी कहा गया है। उदाहरणार्थ-पट कार्य है, तन्तु, तुरी, वेमा आदि कारण हैं। पट से पूर्व विद्यमान होने के कारण इस प्रकार कारण पूर्वभावी होता है तथा कार्य पश्चाद्भावी। इससे कार्य-कारण का भेद स्पष्ट ही है। यहां 'यस्य कार्यात् पूर्वभावः' मात्र कारण का लक्षण करने से लक्षण में 'अतिव्याप्तिदोष' की सम्भावना उपस्थित हो जाती, अतः इस दोष के निवारणार्थ कारण के लक्षण में 'नियत तथा अनन्यथासिद्ध' ये दो विशेषण प्रयुक्त हैं। "

'नियत' पद का अर्थ है- नियमपूर्वक अथवा निश्चित रूप से होने वाला 'नियत' पद का सन्निवेश न होने से कार्योत्पत्ति से पूर्व आकस्मिक रूप से उपस्थित सभी वस्तुओं को उस कार्य का कारण स्वीकार करना पड़ेगा- "यद्यपि पटोत्पत्तौ दैवादागतस्य रासभादेः पूर्वभावो विद्यते, तथापि नासी नियतः " (तर्कभाषा, पृ० 20 )

अर्थात् यदि पट की उत्पत्ति से पूर्व संयोगवश गर्दभादि की उपस्थिति हो जाए तो 'कार्यात् पूर्वभावी' होने से गर्दभ को पट का कारण मानना होगा, इससे लक्षण अतिव्याप्ति दोषयुक्त हो जाएगा, किन्तु 'नियत' पद रखने से लक्षण दोषमुक्त रहेगा। लक्षण में 'नियत' पद के सन्निवेश से जो वस्तु कार्य की उत्पत्ति से पूर्व नियमपूर्वक / निश्चितरूपेण उपस्थित होगा वही 'कारण' कहलाएगा। गर्दभ की उपस्थिति सभी पटों की उत्पत्ति से पूर्व निश्चयेन नहीं होती, अतः केवल संयोगमात्र से कार्योत्पत्ति पूर्व विद्यमान गर्दभादि में कारण की अतिव्याप्ति नहीं होगी।

इसी प्रकार 'अनन्यथासिद्ध' विशेषण रखने का प्रयोजन लक्षण का 'तन्तुरूप' आदि में अतिव्याप्ति का वारण है। 'अनन्यथासिद्ध' का अर्थ है जो अन्यथासिद्ध न हो अर्थात् जो साक्षात् कारण न हो वह अन्यथासिद्ध है यथा कुम्भकार का पिता। इस प्रकार 'अनन्यथासिद्ध' का तात्पर्य है जो नियतपूर्ववर्ती हो, परन्तु उसकी पूर्ववर्तिता दूसरे पदार्थ की कारणता में या अन्य कार्य के जनक के रूप में परिसमाप्त न हुई हो वह अनन्यथासिद्ध कहलाएगा। यदि इस पद का कारण के लक्षण में सन्निवेश न करें तो लक्षण होगा- 'यस्य कार्यात् पूर्वभावो नियतः ' जो अतिव्याप्ति दोष युक्त है। तन्तु पट का कारण है वह पट से नियतपूर्वभावी है। तन्तु में तन्तुरूप की विद्यमानता है, वह भी नियतपूर्वभावी है, पटोत्पत्ति से नियत पूर्वभावी होने के कारण उक्त लक्षणानुसार तन्तुरूप को भी पट का कारण मानना होगा। इस अतिव्याप्ति दोष के निवारणार्थ कारण के लक्षण में 'अनन्यथासिद्ध' पद का सन्निवेश किया गया है। इससे यह सिद्ध किया जा सकता है कि चूंकि तन्तुरूप-पटरूप के प्रति कारण है, अतः तन्तुरूप की कारणता पटरूप कार्य की उत्पत्ति में ही प्रयुक्त हो गई है, अतः तन्तुरूप-पट के प्रति अन्यथासिद्ध होने से पट का कारण नहीं माना जा सकता।

तन्तुरूप को पट एवं पटरूप दोनों का कारण मानने पर 'कल्पनागौरव' दोष उत्पन्न होता है "तन्तुरूपस्य तु नियतः पूर्वभावोऽस्त्येव किन्त्वन्यथासिद्धः पटरूपजननोपक्षीणत्वात्, पट प्रत्यपि कारणत्वे कल्पनागौरव प्रसङ्गात् ।" (तर्कभाषा, पृ0 21 ) इस प्रकार कारण के लक्षण में 'नियत और अन्यथासिद्ध' दोनों पद आवश्यक है।

इसलिए 'तेनानन्यथासिद्धनियतपूर्वभावित्वं कारणत्वम् ।" यह कारण का लक्षण युक्तियुक्त है।

Key Pointsकारण के तीन भेद हैं- समवायिकारण, असमवायिकारण एवं निमित्तकारण "तच्च कारणं त्रिविधम् समवायि असमवायि निमित्त भेदात् ।" (पृ0 25 )

(1) समवायि कारण का लक्षण है- 'यत्समवेतं कार्यमुत्पद्यते तत्समवायि कारणम्' । ( पृ० 25 ) समवायि कारण वह होता है जिसमें कार्योत्पत्ति समवाय सम्बन्ध से होती है। यथा तन्तु पट का समवायि कारण है, क्योंकि 'पट' कार्य की उत्पत्ति 'तन्तु' कारण से होता है, तन्तु का पट के साथ समवाय सम्बन्ध है। दो अयुतसिद्ध पदार्थों का सम्बन्ध 'समवाय' कहलाता है। (पृ0 26) "अयुतसिद्धयोः सम्बन्धः समवायः" (पृ0 26) सम्बन्ध दो प्रकार के हैं- 'द्विविधः सम्बन्धः संयोगः समवायश्चेति' (पृ0 26 ) पद का तुरी, वेमा, तन्तु आदि अनेक कारणों के साथ सम्बन्ध हैं। तुरी वैमादि कारणों का सम्बन्ध संयोग  सम्बन्ध है। तन्तु के साथ पट का समवाय सम्बन्ध है, क्योंकि अयुतसिद्ध पदार्थों का सम्बन्ध ही समवाय होता है अयुतसिद्ध का लक्षण है- "ययोर्मध्ये एकमविनश्यदपराश्रितमेवावतिष्ठते तावयुतसिद्धी" (पृ0 26) अर्थात् जिन दो पदार्थों में से एक, दूसरे के आश्रित होकर ही रहे उससे विभक्त न किया जा सके, वे दोनों अयुतसिद्ध होते हैं। अतः अवयव अवयवी, गुण- गुणी, क्रिया- क्रियावान, जाति और व्यक्ति विशेष एवं नित्यद्रव्य ये पञ्च 'अयुतसिद्ध' स्वीकृत है।

"यथा अवयवावयविना, गुणगुणिनौ, क्रियाक्रियावन्तौ, जातिव्यक्ती, विशेषनित्यद्रव्ये चेति । " तर्कभाषा (पृ0 31)

अयुतसिद्ध के लक्षण में 'अविनश्यत्' पद का प्रयोजन लक्षण में 'अव्याप्ति' दोष का वारण है। यदि केवल 'एकमपराश्रितमेवावतिष्ठते तावयुतसिद्धी' लक्षण किया जाता तो अवयव - अवयवी इत्यादि पंच अयुतसिद्धों में से प्रथम तीन में लक्षण घटित नहीं होता, क्योंकि गुण, क्रिया तथा अवयवी आदि एक काल में निराश्रित भी होते हैं। यथा तन्तु के नाश होने से पट 'विनश्यत्ता' का अर्थ है 'विनाशकारणसामग्रीसान्निध्य "विनश्यत्ता तु विनाशकारणसामग्रीसान्निध्यम् ।" (पृ० 31) अर्थात् जिस काल मात्र में विनाश के सम्पूर्ण कारण उपलब्ध हो जाएं वह 'विनश्यत्ता काल' है। विनश्यत्ता काल में रूपादि गुण निराश्रित होता है; परन्तु 'अविनश्यत्' काल में दूसरे पर आश्रित ही रहते हैं। अतः स्पष्ट है कि 'अयुतसिद्ध' वह है जो अविनश्यदवस्था में पराश्रित रहे 'विनश्यत्ता काल' में पराश्रित होना अपेक्षित नहीं है क्योंकि गुण क्रिया आदि विनश्यत्ता काल' में निराश्रित रहते हैं; तथापि अविनश्यत्ता काल में तो अपराश्रित ही रहते हैं। 

(2) असमवायिकारण का लक्षण है- “यत्समवायिकारणप्रत्यासन्नमवधृतसामध्य तदसमवायिकारणम् ।" (पृ0 36 )

अर्थात् जो समवायि कारण में प्रत्यासन्न (निकटतः स्थित) होता है एवं कार्योत्पत्ति में जिसका सामर्थ्य निश्चित हो, वह असमवायि कारण है असमवायि कारण के लक्षण में दो पर विशेष रूप से ध्यातव्य हैं- (1) समवायिकारण प्रत्यासन्नम् (2) अवधृतसामर्थ्यम् । यथा- तन्तु संयोग पट का असमवायिकारण है। तन्तुसंयोग गुण है, वह पट के समवायिकारण तन्तु नाम्ना गुणी में समवाय सम्बन्ध से स्थित है। अतः तन्तुसंयोग पट के समवायि कारण से निकटतः सम्बद्ध है एवं वह अनन्यथासिद्ध पूर्वभावी होने से पट के प्रति कारण है।उसी प्रकार तन्तुरूप पटरूप का असमवायिकारण है। असमवायिकारण के लक्षण में निर्दिष्ट है कि समवायिकारण से निकटता के साथ सम्बन्ध रखने वाला एवम् अनन्यथासिद्धनियतपूर्वभावी धर्म असमवायि कारण होगा। अतः पटरूप का असमवायिकारण पटगत कोई धर्म होना चाहिए, क्योंकि तन्तुरूप तो तन्तु का गुण होने से तन्तु में रहता है पट मैं न��ीं।प्रश्न उपस्थित होता है कि तन्तुरूप को पटरूप का असमवायि कारण कैसे कहा जा सकता है? इसका समाधान ग्रन्थकार देते हैं कि असमवायिकारण के लक्षण में 'समवायिकारणप्रत्यासन्नम् में  जो प्रत्यासत्ति कथित है वह दो प्रकार की होती है- "समवायिकारणसमवायिकारणप्रत्यासन्नस्यापि परम्परयासमवायिकारणप्रत्यासत्रत्वात"

तुरी पटाश्रिवावतिष्ठतेनापि पटस्तुयश्रितः । अतस्तयोः सम्बन्धः संयोग एवं तदेव तन्तुसमवतः पटः।" (पृ० 32 )

असमवायिकारण का लक्षण है- "यत्समवायिकारणप्रत्यासन्नमवधृतसामर्थ्यं तदसमवायिकारणम् ।" (पृ0 36)

अर्थात् जो समवायि कारण में प्रत्यासन्न (निकटतः स्थित) होता है एवं कार्योत्पत्ति में जिसका सामर्थ्य निश्चित हो, वह असमवायि कारण है। असमवायि कारण के लक्षण में दो पर विशेष रूप से ध्यातव्य हैं- (1) समवायिकारण प्रत्यासन्नम् (2) अवधृतसामर्थ्यम्। यथा- तन्तु संयोग पट का असमवायिकारण है। तन्तुसंयोग गुण है, वह पट के समवायिकारण तन्तु नाम्ना गुणी में समवाय सम्बन्ध से स्थित है। अतः तन्तुसंयोग पट के समवायि कारण से निकटतः सम्बद्ध है एवं वह अनन्यथासिद्ध पूर्वभावी होने से पट के प्रति कारण है।

( 3 ) निमित्त कारण- जो कारण समवायि एवं असमवायि कारण से व्यतिरिक्त हैं, वे निमित्त कारण कहलाते हैं। निमित्त कारण का ग्रंथकार लक्षण करते हैं- "यन्न समवायिकारणं, नाप्यसमवायिकारणम्। अथ च कारणम् तन्निमित्तकारणम् ।" ( पृ० 39 ) अर्थात् जो न समवायिकारण है एवं न ही असमवायिकारण है, परन्तु निश्चयेन कारण है

अर्थात् जिसका स्वरूप 'अनन्यथासिद्धनियतपूर्वभावित्वम्' रूप है, वह निमित्त कारण है।

Question 29

'यतो वा इमानि भृतानि जायन्ते ______' इतीयं श्रुतिः विषयवाक्यम् अस्ति-

  1. AOption (a)

    जन्माद्यधिकरणस्य

  2. BOption (b)

    जिज्ञासाधिकरणस्य

  3. COption (c)

    शास्त्रयोनित्वाधिकरणस्य

  4. DOption (d)

    आनन्दमयाधिकरणस्य

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Correct answer

Answer: (a)A.

जन्माद्यधिकरणस्य

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भाषानुवाद- यतो वा इमानि भृतानि जायन्ते" यह श्रुति वाक्य है?

स्पष्टीकरण -यह श्रुति वाक्य ब्रह्मसूत्र के जन्माद्यधिकरण से है। अतः विकल्प (1) सही है।

Important Points

  • वेदान्तदर्शन (ब्रह्मसूत्र) ग्रंथ के जन्माद्यधिकरण के प्रथम अध्याय के प्रथम पाद में सूत्र "जन्माद्यस्य यतः" जन्म उत्पत्ति आदि जिससे है अर्थात ब्रह्मा के अस्तित्व को समझाने के लिए इस सूत्र का निर्देश है क्योंकि किसी वस्तु के अस्तित्व को लक्षण एवं प्रमाण के द्वारा सिद्ध किया जाता है।

यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन जातानि जीवन्ति ।

यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद् ब्रह्मेति ॥ - तैत्तिरीयोपनिषत् ३-१-३

अर्थात निश्चित ही ये प्राणि- अप्राणि रुप भौतिक जगत में जिससे उत्पन्न होते हैं ,उत्पन्न किए जाकर जिसके सहयोग व आश्रय से जीवित रहते हैं ,और जिसके द्वारा लीन होते अथवा कारणरुप में प्रवेश पाते हैं,उसको जानने की इच्छा करो ,वह ब्रह्��ा है। इससे स्पष्ट होता है कि जगत के उत्पत्ति स्थिति प्रलय का करण ब्रह्मा है। व्यवहाररुप में ब्रह्मा की सत्ता को इसी आधार पर जाना जा सकता है ।

Additional Information

  • ब्रह्मसूत्र, वेदान्त दर्शन का आधारभूत ग्रन्थ है।
  • इसके रचयिता महर्षि बादरायण हैं।
  • इसे वेदान्त सूत्र, उत्तर-मीमांसा सूत्र, शारीरक सूत्र और भिक्षु सूत्र आदि के नाम से भी जाना जाता है।
  • इस पर अनेक आचार्यां ने भाष्य भी लिखे हैं।
  • ब्रह्मसूत्र में उपनिषदों की दार्शनिक एवं आध्यात्मिक विचारों को साररूप में एकीकृत किया गया है।
  • वेदान्त के तीन मुख्य स्तम्भ माने जाते हैं - उपनिषद्, श्रीमद्भगवद्गीता एवं ब्रह्मसूत्र।
  • इन तीनों को प्रस्थानत्रयी कहा जाता है। इसमें उपनिषदों को श्रुति प्रस्थान, गीता को स्मृति प्रस्थान और ब्रह्मसूत्रों को न्याय प्रस्थान कहते हैं।
  • ब्रह्मसूत्रों को न्याय प्रस्थान कहने का अर्थ है कि ये वेदान्त को पूर्णतः तर्कपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करता है। (न्याय = तर्क)
  • ब्रह्मसूत्र में चार अध्याय हैं जिनके नाम हैं - समन्वय, अविरोध, साधन एवं फल। प्रत्येक अध्याय के चार पाद हैं।
  • कुल मिलाकर इसमें ५५५ सूत्र हैं।

Question 30

'स नः पितेव सूनवे _______ ' इति मन्त्रांशः कस्मिन् सूक्ते वर्तते?

  1. AOption (a)

    अग्निसूक्ते

  2. BOption (b)

    वरुणसूक्ते

  3. COption (c)

    इन्द्रसूक्ते

  4. DOption (d)

    पुरुषसूक्ते

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Correct answer

Answer: (a)A.

अग्निसूक्ते

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : “स नः पितेव सूनवेऽग्ने” इस मंत्र से संबंधित देवता कौन हैं?

मन्त्रः

स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव। सचस्वा नः स्वस्तये॥ (ऋग्वेद, १.१.९)

  • सूक्त - अग्निसूक्त
  • देवता - अग्निः
  • छन्द - विराड्गायत्री;
  • ऋषि - मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः।
  • मंत्र का भावार्थ -
  • इस मन्त्र में श्लेषालंकार हैं। जैसे परमेश्वर के सामर्थ्य से रचे हुए पदार्थ नित्य ही सुशोभित होते हैं, वैसे ही जो ईश्वर का रचा हुआ भौतिक वायु हैं, उसकी धारणा से भी सब पदार्थों की रक्षा और शोभा तथा जैसे जीव की प्रेमभक्ति से की हुई स्तुति को सर्वगत ईश्वर प्रतिक्षण सुनता हैं, वैसे ही भौतिक वायु के निमित्त से भी जीव शब्दों के उच्चारण और श्रवण करने को समर्थ होता हैं।
<br>

अतः स्पष्ट हैं की 'अग्निसूक्ते' इस प्रश्न का सही उत्तर हैं।

Question 31

व्याकरणशब्दस्य सूत्रमिति अर्थे स्वीकृते भाष्यकारेण के द्वे विप्रतिपत्ती उपस्थापिते?

(A) भवार्थस्य असंगतिः

(B) षष्ठ्यर्थस्य अनुपन्नता

(C) प्रोक्तार्थस्य अनिष्पन्नता

(D) शब्दानामप्रतिपत्तिः

समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (D)

  2. BOption (b)

    (A) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (B) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (B) एवम् (C)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(B) एवम् (D)

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ - व्याकरण शब्द का सूत्र इस अर्थ स्वीकृत करने पर भाष्यकार नी कौन सी दो विप्रतिपति स्थापित है-

उत्तर- (B) एवम् (D) अर्थात षष्ठ्यर्थस्य अनुपन्नता एवं शब्दानामप्रतिपत्तिः।

महाभाष्य - संस्कृत वैयाकरणाचार्यों में कालक्रम की दृष्टि से त्रिमुनियों में पाणिनि तथा कात्यायन के बाद महाभाष्यकार प्रणेता पतञ्जलि का वर्णन प्राप्त होता है।

Important Pointsमहाभाष्य में व्याकरण शब्द का सूत्र अर्थ मानने पर - 

  • षष्ठ्यर्थस्य अनुपन्नता- 
  • सूत्र को व्याकरण मानने पर षष्ठी विभक्ति का अर्थ उपपन्न नहीं हो सकता क्योंकि सूत्र के अतिरिक्त कुछ व्याकरण है जिसका वह सूत्र होगा।
  • शब्दानामप्रतिपत्तिः -
  • सूत्रों को ही व्याकरण मानने पर शब्दों का प्रतिपादन भी नहीं हो सकता हा, व्याकरण से शब्दों का प्रतिपादन करते है। सूत्रों से शब्दों का प्रतिपादन नहीं हो सकता।
  • व्याख्यानतश्च-
  • वह सूत्र विगृहीत होकार व्याख्यान होता है। केवल चर्चित पद वृद्धि, आद्, ऐच् आदि ही व्याख्यान नहीं होते। उदाहरण प्रत्युदाहरण वाक्य का अध्याहार, सब मिलकर व्याख्यान होता है।

परन्तु सूत्र में व्याकरणत्व का स्वीकार करने पर दो आपत्तियाँ कही गयी है-

षष्ठ्यर्थस्य अनुपन्नता और शब्दानामप्रतिपत्तिः 

  • षष्ठी विभक्ति का प्रयोग वही हो सकता है जहां दो पृथक वस्तुओं का निर्देश हो क्योंकि यह विभक्ति दो पदार्थों का सम्बन्ध बताने में प्रयुक्त होती है। परन्तु व्यवहार में सूत्र और व्याकरण इन दोनों ही पदों द्वारा अष्टाध्यायी का प्रतिपादन किया जाता है। अतः सूत्र और व्याकरण में अभिन्नता होने के कारण भेदसम्बन्धबोधिका षष्ठी विभक्ति का प्रयोग नहीं हो सकता। सामान्य तथा व्याकरण शब्द से अष्टाध्यायी का ग्रहण होने पर इस प्रयोग में कोई विरोध प्रतीत नहीं होता। और भी जब अष्टाध्यायी के एक भाग को सूत्र शब्द के द्वारा अभिहित किया जाये तो "राहोः शिरः" इत्यादि प्रयोगों के समान इसकी सङ्गति दिखाई जा सकती है ।
  • इसी पक्ष में दूसरी प्रापत्ति यह है कि केव्लमात्र सूत्र को ही व्याकरण मानने पर शब्दों का सम्यक् प्रतिपादन नहीं हो सकता, उदाहरण, प्रत्युदाहरण तथा सूत्रान्तरों में श्रूयमाण पदों का अध्याहार कर सूत्र के सम्पूर्ण अर्थ को स्पष्ट करके ही शब्दप्रतिपत्ति सम्भव हो पाती है।

अतः व्याकरण शब्द का सूत्र इस अर्थ स्वीकृत करने पर भाष्यकार ने षष्ठ्यर्थस्य अनुपन्नता और शब्दानामप्रतिपत्तिः यह दो विप्रतिपति स्थापित है।

Question 32

अधोलिखितेषु वर्णेषु कौ सोष्माणौं स्तः?

(A) क्

(B) ख्

(C) न्

(D) ढ्

समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (B) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (B) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(B) एवम् (D)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद - नीचे लिखे गये वर्णों में सोष्म वर्ण कौन सा है? 

स्पष्टीकरण- ख् एवं ढ् सोष्मवर्ण है। 

सोष्मवर्ण - 

  • “युग्मौ सोष्माणौ ” अर्थात् प्रत्येक वर्ग के सम वर्ण (द्वितीय तथा चतुर्थ) सोष्मसंज्ञक होते हैं।
  • उव्वटभाष्य के अनुसार- 'बर्गे-वर्गे च द्वितीय-चतुर्थो वर्णों सोष्माणी वेदितव्यी' अर्थात्- ख्, घ्, छ्, झ्, ठ्, ढ्, थ्, ध्, फ् तथा भ् वर्ण सोष्मवर्ण हैं।

 

इस प्रकार पर्याय क्र. 4 (B) एवम् (D) यह उत्तर उचित है। 

Additional Information

  • क वर्ण अघोष अल्पप्राण यम संज्ञक है एवं न रक्त वर्ण है।

Question 33

अलङ्कारसम्प्रदायस्य आचार्यौ स्तः-

(A) भामहः दण्डी च

(B) उद्भटः रुय्यकः च

(C) रुद्रटः आनन्दवर्धनः च

(D) रुय्यकः मम्मटः च

समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (B) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (A) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(A) एवम् (B)

Why this answer is correct

भाषानुवाद-अलंकार सप्रदाय के आचार्य हैं? 

स्पष्टीकरण-भामह दण्डी और उद्भट रुय्यक अलंकार सप्रदाय के आचार्य है। अतः विकल्प (1)सही है।

Important Points

अलंकारसंप्रदाय के आचार्य

  1. आचार्य भामह : अलंकार सिद्धांत के प्रवर्तक आचार्य भामह है जिन्होने इसे सिद्धांत रूप में निरूपित किया। इनका प्रमुख ग्रंथ "काव्यालंकार" है। आचार्य भामह ने काव्य को परिभाषित करते हुए लिखा है कि "शब्दार्थों सहितौ काव्यम्"। शब्द और अर्थ के सहित भाव को काव्य कहते हैं। अतः भामह काव्य का शरीर शब्द और अर्थ को मानते हैं। अलंकार के कारण काव्यशरीर (शब्दगत और अर्थगत) में चारूता सौन्दर्य भाव उत्पन्न होता है। आचार्य भामह इस काव्य शरीर में अलंकारत्व का मूल हेतु 'वक्रोक्ति' को मानते हैं। वक्रता के बिना काव्य में अर्थ का विभावन, प्रस्फुटन नहीं होता।अलंकारों के प्रयोगार्थ वक्र शब्दार्थ ही आवश्यक हैं।
  • भामह कथन को दो वर्गों में विभाजित करते हैं - (1) अनलंकृत कथन अथवा वार्ता (2) अलंकृत कथन अर्थात् काव्य । निर्भूष ( अलंकार विहीन) कथन काव्य की श्रेणी में नहीं आते हैं।
  • भामह अलंकार और अलंकार्य में भेद नही करते। आचार्य भामह की दृष्टि काव्य के अभिव्यक्ति गत सौन्दर्य तक ही सीमित रही। इन्होंने लगभग 35 अलंकारों का उल्लेख किया है जिसमें उपमा, रूपक, श्लेष आदि अलंकार प्रमुख है। भामह ने शब्दालंकार पर विशेष बल दिया है।
  1. दण्डी : आचार्य दण्डी का महत्वपूर्ण ग्रंथ काव्यादर्श है जिसमें उन्होंने अपनी अपनी काव्यशास्त्रीय मान्यताओं का विवेचन किया है। अलंकार को काव्य का शोभाकारक धर्म मानते हुए दण्डी ने रस, रीति, गुण काव्यतत्वों के साथ संधि, संध्याग, वृत्ति, लक्षण आदि नाट्य तत्वों को भी अलंकार में समाहित कर लिया। इस प्रकार दण्डी अलंकार को व्यापक अर्थ में व्याख्यायित करते हैं। वे अलंकार को काव्य से सम्बंधित समग्र सौन्दर्य विधान का कारक या धर्म मानते हैं। दण्डी ने "काव्य शोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते" (काव्यादर्श) में अलंकार को शोभाकारक धर्म कहकर काव्य के साथ उसकी अभिन्नता बताई है। अर्थात् अलंकार वह धर्म है जो काव्य में स्वभाविक रूप से सौन्दर्य सृष्टि करता है।
  2. उद्भट : इनका प्रसिद्ध ग्रंथ "काव्यालंकार सार संग्रह है। अलंकार शास्त्र में इस ग्रंथ का महत्व इसलिए रहा कि उद्भट ने भामह की अलंकार सम्बंधी मान्यताओं का इसमें विवेचन किया है। उद्भट भामह के अनुयायी आचार्यों में से हैं। इनका अलंकार विवेचन भामह के अनुरूप है। आचार्य उद्भट की मौलिक उद्भावना यह थी कि वे अलंकार और गुण दोनों को महत्वपूर्ण मानते थे साथ ही गुण और अर्थालंकार दोनों का शब्दार्थ के साथ अनिवार्य सम्बंध स्वीकार करते हैं।
  3. रूद्रट- रूद्रट के ग्रंथ का नाम 'काव्यालंकार' है। आचार्य रुद्रट ने सर्वप्रथम अलंकारों का वैज्ञानिक वर्गीकरण प्रस्तुत किया। इन्होंने अर्थालंकारों के चार वर्ग- वास्तव, औपम्य, अतिशय तथा श्लेष में विभाजित किया। रुद्रट के अनुसार कवि प्रतिभा से उद्भुत अभिधान अर्था विशेष का नाम अलंकार है। काव्य में रूद्रट ने अलंकार और रस इन दोनों का नियोजन आवश्यक माना है
  4. आचार्य वामन- वामन रीति सम्प्रदाय के सम्प्रदाय के प्रवर्तक हैं। इनके ग्रंथ का नाम 'काव्यालंकार सूत्रवृत्ति है वामन गुण और अलंकार में भेद मानते हैं। वामन ने गुण को काव्य का नित्य धर्म और अलंकार को अनित्य धर्म माना है। काव्य शोभायाः कर्तारो धर्मा गुणाः ।' उनके कथनानुसार गुण यदि काव्य के शोभाकारक धर्म हैं तो अलंकार उस शोभा के वर्धक है और रस गुणों की कांति इस प्रकार वामन की दृष्टि में अलंकार का महत्व गुणों की अपेक्षा कम हो गया।
  5. आचार्य कुंतक: वक्रोक्तिवादी आचार्य कुंतक को अलंकार सम्प्रदाय से प्रभावित माना जा सकता है। वे वक्रोक्ति को काव्य की आत्मा सिद्ध करते हैं: "वक्रोक्ति ही शब्द तथा अर्थ दोनों का अलंकार है। साथ ही यह भी स्वीकार किया है कि अलंकार सहित शब्दार्थ की ही काव्यता होती है। अतः अलंकार की स्थिति काव्य में अनिवार्य है। अलंकार वादियों ने 'अलंकार मूला वक्रोक्ति को काव्य की आत��मा माना तो वहीं कुंतक काव्य के सारे तत्वों-रीति, अलंकार, ध्वनि, रस आदि को वक्रोक्ति में समाविष्ट किया है।
  6. भोजराज- इनका महत्वपूर्ण ग्रंथ "सरस्वती कंठा भरण तथा शृंगार प्रकाश हैं 'सरस्वतीकरण भरण में अलंकार विवेचन वृहद रूप से किया गया हैं। भोज भी रीति और गुण को अलंकारों के अंतर्गत मानते हैं। वे अलंकार को महत्वपूर्ण मानते थे
  7. मम्मट- इनका प्रमुख ग्रंथ "काव्य प्रकाश है। मम्मट ने काव्य को सालंकार माना । परन्तु काव्य में अलंकार की अनिवार्यता को महत्व नही दिया- "अनलंकृति पुनः क्वापि ।" उन्होने अलंकार को काव्य का अस्थिर धर्म माना। मम्मट रसवादी आचार्य थे। अतः वे काव्य में रस को प्रधान तथा अलंकार को उसके अलंकार को उसके अंग रूप में ग्रहण किया है।
  8. रूय्यक - रूय्यक ने अलंकारिक आचार्यों भामह से लेकर "व्यक्तिविवेककार (महिमभट्ट) तक के मतों का विवेचन, विश्लेषण किया है। अलंकार विषम पर उनकी महत्वपूर्ण कृति “अलंकार सर्वस्व" है
  9. जयदेव -जयदेव का 'चन्द्रालोक' अलंकार शास्त्र का अत्यन्त लोकप्रिय ग्रंथ है। जयदेव ने एक बार फिर अलंकार सम्प्रदाय की पुनर्स्थापना का प्रयत्न किया। जब मम्मट जैसे आचार्यों द्वारा अलंकार के महत्व को कम किया गया तब जयदेव ने काव्य के लिए अलंकार को अनिवार्य माना। मम्मट द्वारा प्रतिपादित काव्य लक्षण शब्दार्थावन लंकृती पुनः क्वापि का खण्डन हुए जयदेव कहते हैं- जो व्यक्ति अलंकार रहित - काव्य को काव्य मानते हैं, वे विद्वावान अग्नि को उष्णता रहित क्यों नही मान लेते?

Question 34

यथोचितं मेलनं कुरुत

सूची Iसूची II
A.भुङ्कतेःI.व्यक्तवाचां समुच्चारणे
B.भुनक्तिII.अभ्यवहारे
C.सम्प्रवदन्तेIII.पालनार्थे
D.सम्प्रवदन्तिIV.अव्यक्तवाचां समुच्चारणे
<br>

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) - (III), (B) - (I), (C) - (II), (D) - (IV)

  2. BOption (b)

    (A) - (I), (B) - (II), (C) - (IV), (D) - (III)

  3. COption (c)

    (A) - (IV), (B) - (III), (C) - (II), (D) - (I)

  4. DOption (d)

    (A) - (II), (B) - (III), (C) - (I), (D) - (IV)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(A) - (II), (B) - (III), (C) - (I), (D) - (IV)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यथोचित मेलन कीजिए।

सूत्रोंं का स्पष्टीकरण :

व्यक्तवाचां समुच्चारणे (१.३.४८)

  • स्पष्टवाणीवालों के एक साथ उच्चारण करने अर्थ में वर्त्तमान वद् धातु से आत्मनेपद हो जाता है। उदाहरणार्थ -
  • सम्प्रवदन्ते ब्राह्मणाः। (ब्राह्मण परस्पर मिलकर उच्चारण करते हैं।)
  • संप्रवदन्ते क्षत्रियाः। (क्षत्रिय परस्पर मिलकर उच्चारण करते हैं।)
  • यहाँ से 'व्यक्तवाचां समुच्चारणे' यह सूत्र १.३.५० तक जायेगा।
  • एकसाथ उच्चारण जब नहीं होता है, तो परस्मैपद में प्रयोग होगा। संप्रवदन्ति क्षत्रियाः।

भुजोऽनवने (१.३.६६)

  • अनवन अर्थात् पालन न करने अर्थ में भुज् पालनाभ्यवहारयोः इस धातु से आत्मनेपद होता है। उदा -
  • भुङ्क्ते (खाता है)। परि० १.३.६४ के समान ही भुङ्क्ते की सिद्धि जानें।
  • ​इसी प्रकार पालन करने के अर्थ से परस्मैपद होता है। भुनक्ति (खाता है)।

​

​अतः स्पष्ट है, की "(A) - (II), (B) - (III), (C) - (I), (D) - (IV)" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 35

यथोचितं मेलनं कुरुत

सूची Iसूची II
A.स्पर्श-संघर्षीI.ट्
B.संघर्षीII.च्
C.स्पर्शःIII.ष्
D.अर्धस्वरःIV.य्
<br>

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) - (I), (B) - (IV), (C) - (III), (D) - (II)

  2. BOption (b)

    (A) - (II), (B) - (III), (C) - (I), (D) - (IV)

  3. COption (c)

    (A) - (II), (B) - (I), (C) - (III), (D) - (IV)

  4. DOption (d)

    (A) - (III), (B) - (I), (C) - (IV), (D) - (II)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A) - (II), (B) - (III), (C) - (I), (D) - (IV)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यथोचित मेलन कीजिए।

स्पर्श संघर्षी व्यंजन :

  • 'च, छ, ज, झ' स्पर्श संघर्षी व्यंजन हैं।  जिन व्यंजनों के उच्चारण में स्पर्श का समय अपेक्षाकृत अधिक होता है और उच्चारण के बाद वाला भाग संघर्षी हो जाता है, वे स्पर्श संघर्षी कहलाते हैं। च, छ, ज, झ स्पर्श-संघर्षी व्यंजन हैं।

संघर्षी व्यंजन :

  • संघर्षी व्यंजन (fricative consonant) ऐसा व्यंजन वर्ण होता है जिसमें मुँह के दो उच्चारण स्थानों को पास लाकर एक बहुत ही तंग खोल से हवा को बाहर धकेला जाए। मसलन निचले होंठ को ऊपर के दाँत से जोड़ने से "फ़" की ध्वनि या जिह्वा के पिछ्ले हिस्से को मुँह की छत के पिछले हिस्से से जोड़ने से "ख़" की ध्वनि (ध्यान दें कि बिना बिन्दु वाला ख एक संघर्षी व्यंजन नहीं है)। इसी तरह श, ष, थ़ (बिन्दु वाला), झ़ (बिन्दु वाला) और ज़ भी संघर्षी व्यंजन हैं। संघर्षी व्यंजनों कि विशेषता है कि उनकी ध्वनि को वायु-प्रवाह जारी रखकर लम्बे समय तक बिना रुके शुद्ध रूप से जारी रखा जा सकता है।

स्पर्शी व्यंजन :

  • जिन व्यंजनों के उच्चारण में फेफ़ड़ों से आई वायु किसी अवयव को स्पर्श करके निकले, उन्हें स्पर्शी कहते हैं। क, ख, ग, घ, ट, ठ, ड, ढ, त, थ, द, ध, प, फ, ब, भ स्पर्शी व्यंजन हैं।

अर्धस्वर :

  • य, व, र, ल यह अर्धस्वर हैं, स्वरोंं से इनकी उत्पत्ति होती है, इसलिए इन्हेंं अर्धस्वर यह संज्ञा है। यह ईषत/अंत:स्थ व्यंजन अथवा अर्ध स्वर व्यंजन भी कहलाते है।

​

​​अतः स्पष्ट है, की "(A) - (II), (B) - (III), (C) - (I), (D) - (IV)" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 36

ऋणादाने वृद्धिः कतिविधा?

  1. AOption (a)

    द्विविधा

  2. BOption (b)

    त्रिविधा

  3. COption (c)

    चतुर्विधा

  4. DOption (d)

    पञ्चविधा

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Correct answer

Answer: (c)C.

चतुर्विधा

Why this answer is correct

​प्रश्नानुवाद: ऋण दान में वृद्धि कितने प्रकार की होती है ?

स्पष्टीकरण: याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार ऋण दान में वृद्धि चार प्रकार की होती है। 

मुख्य बिन्दु:

  • याज्ञवल्क्य स्मृति भारतीय साहित्य का एवं संस्कृत साहित्य का एक अनूठा धर्मशास्त्र ग्रन्थ है।
  • इस पर लिखी गयी मिताक्षर टीका आज भी भारतीय न्यायालयों में एक प्रमाण स्वरूप मानी जाती है।
  • यह ग्रन्थ १००३ श्लोकों एवं ३ अध्यायों में विभक्त है: 
  • आचारकाण्ड
  • व्यवहारकाण्ड
  • प्रायश्चित्तकाण्ड
  • याज्ञवल्क्य स्मृति के द्वितीय अध्याय व्यवहारकाण्ड के ३ प्रकरण "ऋणदान" में ऋणदान के विषय में विस्तृत रूप से विवेचन किया गया है।
  • ऋणदान प्रकरण में "ऋणदान में चार प्रकार की वृद्धि" का उल्लेख किया गया है। श्लोक संख्या ३७ के अनुसार "ऋणदान" में "वृद्धि"  इस प्रकार है:
  • ब्राह्मण - २ प्रतिशत
  • क्षत्रिय - ३ प्रतिशत
  • वैश्य - ४ प्रतिशत
  • शूद्र - ५ प्रतिशत
  • यह वृद्धि प्रत्येक माह में 80% की वृद्धि के साथ होती थी एवं चार वर्णों के क्रम से चार प्रकार की होती थी।

अतिरिक्त जानकारी:

  • इसकी रचना लगभग विक्रम पूर्व शती से लेकर तीसरी शती के मध्य की मानी जाती है।
  • इस स्मृति का सम्बन्ध "शुक्लयजुर्वेद" की परम्परा से माना जाता है।

Question 37

'आर्स पोएतिका' (Ars Poetica) इति ग्रन्थस्य कर्त्ता कः?

  1. AOption (a)

    सैमुअल टेलर कोलरिजमहोदयः

  2. BOption (b)

    मैथ्यू आर्नल्डमहोदयः

  3. COption (c)

    ईवर आर्मस्ट्रोंग रिचर्ड्समहोदयः

  4. DOption (d)

    होरेस महोदयः

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Correct answer

Answer: (d)D.

होरेस महोदयः

Why this answer is correct

​प्रश्नानुवाद: "आर्स पोएतिका' (Ars Poetica)" इस ग्रन्थ का कर्ता कौन है?

स्पष्टीकरण: "आर्स पोएतिका' (Ars Poetica)" नामक कविता का रचनाकार रोमन लेखक "होरेस" था। 

मुख्य बिन्दु:

  • रोम के सुप्रसिद्ध लेखक अथवा कवि "होरेस" का पूर्ण नाम कुइंतुस होरतुइस फ़्लैक्स था।
  • होरेस का जीवन काल ६५ - ८ ईसा पूर्व का माना जाता है। यह रोमन राजा अगस्तस सीज़र के शासन काल के दौरान थे।
  • होरेस द्वारा लिखी गयी रचनाओं में सबसे प्रसिद्ध "आर्स पोएतिका" है। जिसका शाब्दिक अर्थ है "काव्य की कला" |
  • इसे पत्र के रूप में लिखा गया था। एवं इसके तीन भाग हैं:
  • ​​पोएसिस (poesis)
  • पोएमा (Poema)
  • पोएटा (Poeta)
  • अंग्रेजी भाषा में इसका सर्वप्रथम अनुवाद "बेन जॉनसन" द्वारा किया गया था।

अतिरिक्त जानकारी:

  • होरेस की अन्य रचनाएँ:
  • ​​स्टायर - १, २
  • इपॉड्स
  • ऑड्स
  • एपिस्टलस

Question 38

'रसः सुखदुःखात्मकः भवति' इति मान्यता अस्ति-

  1. AOption (a)

    भरतस्य

  2. BOption (b)

    धनिक - धनञ्जययोः

  3. COption (c)

    रामचन्द्र-गुणचन्द्रयोः

  4. DOption (d)

    मम्मट-विश्वनाथयोः

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Correct answer

Answer: (c)C.

रामचन्द्र-गुणचन्द्रयोः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद: "रस सुख-दुखात्मक होता है" यह मान्यता है-

स्पष्टीकरण: रामचंद्र एवं गुणचन्द्र की मान्यता में "रस" को "सुख-दुखात्मक" माना गया है। 

मुख्य बिंदु:

  • "आचार्य रामचंद्र एवं आचार्य गुणचन्द्र" के द्वारा सम्मिलित रूप से "नाट्यशास्त्र" के प्रसिद्ध ग्रन्थ "नाट्यदर्पण" की रचना की गयी।
  • ये दोनों आचार्य "हेमचन्द्र" के शिष्य थे।
  • इनका कार्यकाल गुजरात के "सिद्धराज, कुमारपाल एवं अजयपाल" तीनों राजाओं के शासन काल में रहा।
  • "आचार्य गुणचन्द्र एवं रामचंद्र" रस के व्याख्यान में स्पष्ट करते हुए कहते है की "सुखदु:खात्मको रस:" अर्थात रस सुख-दुखात्मक होता है।

अतिरिक्त जानकारी:अन्य आचार्यों के मत में रस:

  • भरतमुनि - "विभावानुभावव्यभिचारि संयोगाद्रसनिष्पत्ति:"।
  • धनञ्जय - विभावैरनुभावैश्च सात्विकैर्घ्य भिचारिभिः। आनीयमानः स्वाद्यत्व स्थायी भावो रस: स्मृतः।।
  • मम्मट - व्यक्तः स तैर्विभावद्यौ: स्थायी भावो रस: स्मृतः।
  • विश्वनाथ - वाक्यं रसात्मकं काव्यम्।

Question 39

साम्ना दानेन भेदेन समस्तैरथवा पृथक्।

विजेतुं प्रयतेताऽरीन् न युद्धेन कदाचन।।

इति श्लोकः कस्माद् ग्रन्थात्?

  1. AOption (a)

    याज्ञवल्क्यस्मृतेः

  2. BOption (b)

    अर्थशास्त्रात्

  3. COption (c)

    नारदस्मृतेः

  4. DOption (d)

    मनुस्मृतेः

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Correct answer

Answer: (d)D.

मनुस्मृतेः

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प्रश्नानुवाद: "साम्ना दानेन भेदेन समस्तैरथवा पृथक्। विजेतुं प्रयतेताऽरीन् न युद्धेन कदाचन।।" यह श्लोक किस ग्रन्थ से है?

स्पष्टीकरण: "साम्ना दानेन भेदेन समस्तैरथवा पृथक्। विजेतुं प्रयतेताऽरीन् न युद्धेन कदाचन।।" यह श्लोक मनुस्मृति के सातवें अध्याय का 198 वा श्लोक है। 

मुख्य बिन्दु:

  • संस्कृत धर्मशास्त्र के सर्वप्रमुख ग्रंथों में "मनुस्मृति" एक अति महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है।
  • मनुस्मृति में कुल २५०० श्लोक हैं। एवं पूर्ण ग्रन्थ कुल १२ अध्यायों में विभक्त है।
  • मनुस्मृति के 7 वें अध्याय जिसका नाम "राजधर्म" है। बहुत सी राजव्यवस्था एवं राजनीति सम्बंधित तथ्य संजोय हुए है।
  • मनुस्मृति के सप्तम अध्याय का 198 वा श्लोक " साम्ना दानेन भेदेन समस्तैरथवा पृथक्। विजेतुं प्रयतेताऽरीन् न युद्धेन कदाचन।।" कहता है कि: "(राजा को) साम, दाम एवं भेद के द्वारा एक साथ अथवा इनका पृथक-पृथक प्रयोग कर शत्रुओं को जीतना चाहिए। पहले युद्ध में न जाएं।"

अतिरिक्त जानकारी:

  • मनुस्मृति अंग्रेजी में अनुवाद होने वाले प्रथम संस्कृत ग्रंथों में से एक था। जिसका अनुवाद १७७६ में ब्रिटिश फिलॉजिस्ट "विलियम जोन्स" द्वारा किया गया था।

Question 40

ऋृक्प्रातिशाख्यानुसारेण 'रक्तसंज्ञा' कस्य भवति?

  1. AOption (a)

    अनुनासिकस्य

  2. BOption (b)

    अनुस्वारस्य

  3. COption (c)

    विसर्जनीयस्य

  4. DOption (d)

    जिह्वामूलीयस्य

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Correct answer

Answer: (a)A.

अनुनासिकस्य

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : ऋग्वेदप्रातिशाख्य के अनुसार रक्तसंज्ञा किसकी है?

ऋग्वेदप्रातिशाख्य :

  • इस प्रातिशाख्य का संबंध ऋग्वेद संहिता से है।
  • परंपरा के अनुसार इसको ऋग्वेदीय शाकल शाखा की अवांतर शैशिरीय शाखा से संबंधित बताया जाता है। प्रातिशाख्यों में यह सबसे बड़ा प्रातिशाख्य है और कई दृष्टियों से विशेषपूर्ण है। ऋग्वेद का केवल यह प्रातिशाख्य उपलब्ध है।
  • इसमें छह-छह पटलों के तीन अध्याय हैं। यह प्रातिशाख्य सूत्र शैली में हैं, क्वचित् पद्यों में भी इसका निर्माण दिखता है। पर व्यख्याकारों ने पद्यों को टुकड़ों में विभक्त कर सूत्ररूप में ही उनकी व्याख्या की है।
  • इस प्रातिशाख्य के प्रथम 1-15 अध्यायों में शिक्षा और व्याकरण से संबंधित विषयों (वर्णविवेचन, वर्णोच्चारण के दोष, संहितागत वर्णसंधियाँ, क्रमपाठ आदि) का प्रतिपादन है और अंत के तीन (16-18) अध्यायों में छंदों की चर्चा है।
  • छंदों के विषय का प्रतिपादन इसे छोडकर किसी अन्य प्रातिशाख्य में नहीं है। क्रमपाठ का विस्तृत प्रतिपादन (अध्याय 10 और 11 में) भी इस प्रातिशाख्य का एक उल्लेखनीय वैशिष्ट्य है।
  • इस प्रातिशाख्य पर प्राचीन उव्वटकृत भाष्य प्रसिद्ध है।
  • ऋग्वेद प्रातिशाख्य में विविध संज्ञाओंं का विश्लेषण आता है। इस में रक्तसंज्ञा का अर्थ अनुनासिक स्पष्ट होता है।

​अतः स्पष्ट है, 'अनुनासिकः' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

प्रातिशाख्य ग्रंथ :

  • प्रातिशाख्यों का संबंध वैदिक मंत्रों के शुद्ध उच्चारण, वैदिक संहिताओं और उनके पदपाठों आदि के सधिप्रयुक्त वर्णपरिवर्तन अथवा स्वरपरिवर्तन के पारस्परिक संबंध और कभी कभी छंदोविचार जैसे विषयों से है।
  • 'शाखा' से संबंध रखनेवाला शास्त्र अथवा अध्ययन प्रातिशाख्य कहलाता है।
  • यास्काचार्य के निरुक्त में कहा गया है :
  • 'पदप्रकृति: संहिता। पदप्रकृतिनि सर्व चरणानां पार्षदानि।' (निरुक्त १.१७)
  • अर्थात्‌, पदों के आधार पर संहिता रहती है और सब शाखाओं के प्रतिशाख्यों की प्रवृत्ति पदों को ही संहिता का आधार मानकर हुई है।
  • सभी वेदशाखाओंं के अपने अपने प्रातिशाख्य होतेंं हैंं। इन में से निम्नलिखित प्रातिशाख्य उपलब्ध हैं - 
  • शौनकाचार्यकृत ऋग्वेद प्रातिशाख्य
  • कात्यायनाचार्य कृत वाजसनेयि प्रतिशाख्य
  • तैत्तिरीय प्रातिशाख्य
  • अथर्ववेद प्रातिशाख्य अथवा शौनकीय चतुराध्यायिका

Question 41

'तस्य परमाणू समवायिकारणम्, तत्संयोगः असमवायिकारणम्, अदृष्टादि निमित्तं कारणम्' - अत्र 'तस्य' इति पदेन परामर्शः भवति-

  1. AOption (a)

    मनसः

  2. BOption (b)

    निर्विकल्पकबुद्धेः

  3. COption (c)

    द्व्यणुकस्य

  4. DOption (d)

    कर्मणः

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Correct answer

Answer: (c)C.

द्व्यणुकस्य

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद - 'तस्य परमाणू समवायिकारणम्, तत्संयोगः असमवायिकारणम्, अदृष्टादि निमित्तं कारणम्' - यहाँ पर तस्य पद का क्या अर्थ है?

स्पष्टीकरण-  तस्य परमाणू समवायिकारणम्, तत्संयोगः असमवायिकारणम्, अदृष्टादि निमित्तं कारणम् में तस्य पद का अर्थ है द्व्यणुक अर्थात् द्व्यणुक का परमाणू समवायिकारण, द्व्यणुक के संयोग असमवायिकारण एवं द्वण्युक के अदृष्टादि अर्थात् दिखाइ न देना निमित्त कारण है। 

  • द्व्यणुक - एक परमाणु दुसरे परमाणु से मिलकर द्व्यणुक बनता है । दो परमाणुओं के संयोग से एक द्व्यणुक का निर्माण होता है। दोनों परमाणु उस द्व्यणुक के समवायिकारण होते हैं। इन दोनों परमाणुओं का संयोग असमवायिकारण तथा अदृष्ट आदि निमित्त कारण होते हैं। यह परमाणुकारणवाद का सिद्धान्त है जो वैशेषिक दर्शनाधारित है।
  • समवायिकारण - 'यत्समवेतं कार्यमुत्पद्यतेतत्समवायिकारणम् '। यथा-तन्तवः पटस्य, पटश्च स्वगतरूपादेः ।जिस कारण में जो कार्य समवायसम्बन्ध से रहता है, वह कारण समवायिकारण कहलाता है। जैसे तन्तु से पट का निर्माण होता है और जब तक पट रहे तब तक तन्तु रहता ही है अथवा जब तक तन्तु रहे तब तक पट रहता है। इस तरह पट रूप कार्य अपने कारण तन्तुओं में नित्यसम्बन्ध से रहता है। इसलिए तन्तु यहाँ पर पट का समवायिकारण है।
  • असमवायिकारण- 'कार्येण कारणेन वा सहैकस्मिन्नर्थे समवेतं सत् कारणम् असमवायिकारणम् । यथा तन्तु संयोगः पटस्य, तन्तुरूपं पटगतरूपस्य च।'  कार्य अथवा कारण के साथ एक पदार्थ में समवायसम्बन्ध से रहने वाला जो कारण है, वह असमवायिकारण है।  कार्य के साथ एक पदार्थ में समवाय सम्बन्ध से विद्यमान रहता हुआ जो कारण है, वह असमवायिकारण है। यथा तन्तुसंयोग, पटात्मक कार्य के साथ एक पदार्थ तन्तु में समवाय सम्बन्ध से रहता हुआ कारण है और इसमें तन्तुओं का संयोग जो कारण है, वही असमवायिकारण।
  • निमित्तकारण- तदुभयभिन्नं कारणं निमित्तकारणम्, यथा-तुरीवेमादिकं पटस्य । तदेत्त्रिविधकारणमध्ये यदसाधारणं कारणम् तदेव करणम्।  समवायिकारण और असमवायिकारण इन दोनों कारणों से जो भिन्न कारण है, उसे निमित्तकारण कहते हैं। जैसे तन्तु बनाने में सहायक यन्त्र तुरी, वेमा आदि ये निमित्तकारण है।

Extra Points

  • मनसः - सुखाद्युपलब्धिसाधनमिन्द्रियं मनः । तच्च प्रत्यात्मनियतत्वादनन्तं परमाणुरूपं नित्यञ्च। अर्थात् सुख-दुःख आदि के साधन इन्द्रिय मन है। वह प्रत्येक आत्मा में नियत होने के कारण अनन्त है, परमाणुरूप तथा नित्य है।
  • निर्विकल्पक बुद्धि - न्याय-वैशेषिक मत में प्रकार का अर्थ विशेषण होता है, अतः प्रकारता का अर्थ 'विशेषणता' है। जो ज्ञान विशेषणता से रहित होता है वह निर्विकल्पक कहलाता है। निर्विकल्पक शब्द की व्युत्पत्ति है 'निर्गतः विकल्पो यस्मात् स निर्विकल्पकः' अर्थात् जिससे समस्त विकल्प निकल गए हों वह निर्विकल्पक कहलाता है। निर्विकल्पक पद में प्रयुक्त 'विकल्प' का अर्थ है 'नामजात्याद्ययोजना'। किसी ज्ञान में प्रतीत होने वाले नाम, जाति, गुण आदि को ही विकल्प कहा जाता है । जिस ज्ञान में नाम, जाति इत्यादि की प्रतीति नहीं हुआ करती है वही निर्विकल्पक ज्ञान कहलाता है।
  • कर्म - चलनात्मकं कर्म अर्थात् चलने का नाम है कर्म। कर्म केवल मूर्तद्रव्य में रहता है। कर्म के पाँच भेद है -1.उत्क्षेपण 2. अपक्षेपण, 3. आकुञ्चन 4. प्रसारण एवं 5. गमन - तच्च उत्क्षेपण- अपक्षेपण-आकुञ्चन-प्रसारण-गमन भेदात् पञ्चविधम्।

Question 42

प्रकृतिः उपादानम्, कालः भागः - इत्येते प्रभेदाः भवन्ति-

  1. AOption (a)

    आभ्यन्तरतुष्टेः

  2. BOption (b)

    बाह्यतुष्टेः

  3. COption (c)

    मोहमहामोहयोः

  4. DOption (d)

    अशक्तेः

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Correct answer

Answer: (a)A.

आभ्यन्तरतुष्टेः

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प्रश्नानुवाद - प्रकृति के उपादान, काल भाग - यह सारे प्रभेद कौन सी प्रभेद है?

स्पष्टीकरण - आभ्यन्तरतुष्टि के भेद है उपादान है।

आभ्यन्तरतुष्टि -  प्रकृति से भिन्न आत्मा के विषय में अध्यवसायात्मिक जो सन्तोष वृत्तियाँ होती हैं उन्हें आध्यात्मिक (आभ्यन्तर) कहते हैं। प्रकृति, उपादान, काल और भाग्य ये है आख्याय (नाम) जिनकी ऐसी आध्यात्मिक तुष्टि रुप वृत्तियाँ चार हैं। 

  • प्रकृति-  प्रकृतिः मोक्षदा इति सन्तोषः
  • उपादान-  उपादानमेय मोक्षदम् इति सन्तोष

आध्यात्मिकयश्वत प्रकृतुपादानकालभागाख्याः ।

बाह्या विषयोपरमात् पञ्च नवतुष्टयोऽभिमताः । 1.50 ।। 

Extra Points

बाह्यतुष्टि- बाह्य तुष्टियाँ शब्द, स्पर्श आदि विषयों में वैराग्य हो जाने से पांच प्रकार की हैं। अनात्मभूत प्रकृति, महत्, अहंकार आदि को आत्मा मानने वाले पुरुष को शब्दादि बाह्य विषयों में वैराग्य हो जाने पर जो तुष्टियाँ होती हैं, वे बाह्य तुष्टियाँ हैं, क्योंकि आत्मज्ञान न होने पर अनात्म जड़वर्ग को आत्मा मानकर होने वाली प्रवृत्ति से बाह्य तुष्टियाँ ही होती हैं।

मोहमहामोहयो- विपर्यय के पाँच भेद में से महामोह एक भेद है। दिव्यादि भेद से दस प्रकार के शब्दादि विषयों में उपादेय बुद्धि होने के कारण राग होना ही महामोह है।

अशक्ते - प्रत्ययसर्ग के एक भेद है अशक्ति। अशक्ति के अट्ठाइस भेद हैं। 11 इन्द्रियवध – बहरापन, कुष्ठ, अन्धापन, स्वादों का ज्ञान न होना, गन्ध का ज्ञान न होना, गूंगापन, हाथ का टूटा होना, लंगडापन, नपुंसकत्व, गुदादोष तथा मनःस्तब्धता है।बुद्धि के भावों में जो 9 तुष्टि और अष्ट सिद्धियाँ होती है। उनका अभाव तथा अभिभव, कुल मिलाकर, इस तरह से ये 28 अशक्तियाँ हैं।

Question 43

कर्तृत्वभोक्तृत्वसुखित्वदुः खित्वाद्यभिमानित्वेन इहलोकपरलोकगामी व्यावहारिकः जीवः-

  1. AOption (a)

    मनोमयकोशावच्छिन्नः चिदात्मा

  2. BOption (b)

    प्राणमयकोशावच्छिन्नः चिदात्मा

  3. COption (c)

    विज्ञानमयकोशावच्छिनः चिदात्मा

  4. DOption (d)

    आनन्दमयकोशावच्छिन्नः चिदात्मा

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Correct answer

Answer: (c)C.

विज्ञानमयकोशावच्छिनः चिदात्मा

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : कर्त्ता, भोक्ता, सुखी एवं दुःखी, व्यावहारिक जीव क्या कहलाता है?

कोशत्रय :

  • विज्ञानमयकोश-
  • ज्ञानेन्द्रियों से युक्त बुद्धि को विज्ञानमय कोश कहते हैं। इसी विज्ञानमय कोश से युक्त चैतन्य (जीव) अपने आपको कर्त्ता, भोक्ता, सुखी एवं दुःखी समझता है, अतः इस जीव को स्वर्गादिलोकों की प्राप्ति होती है।
  • इयं बुद्धिर्ज्ञानेन्द्रियैः सहिता विज्ञानमयकोशो भवति। अयं कर्तृत्वभोक्तृत्वसुखित्वदुःखित्वाद्यभिमानत्वेनेहलोकपरलोकगामी व्यावहारिको जीव इत्युच्यते ।
  • मनोमयकोश -
  • मन से युक्त ज्ञानेन्द्रियों के सहित मनोमयकोश कहलाता है। दृष्टा जब चक्षुरादि इन्द्रियों से लौकिक वस्तुओं का प्रत्यक्ष आदि करके 'यह वस्तु वही है या अन्य कोई' - इस प्रकार का संकल्प-विकल्प' करता है, तो इस प्रकार की सङ्कल्पविकल्पात्मक युक्त क्रिया मनोमय कोश में होती है।
  • मनस्तु ज्ञानेन्द्रियैः सहितं सन्मनोमयकोशो भवति।
  • प्राणमयकोश -
  • प्राण, अपान, व्यान, उदान, और समान इन पञ्च वायु तथा वाक्, हस्त, पाद, पायु तथा उपस्थ इन पंच कर्मेन्द्रियों से युक्त प्राणमय कोश होता है।
  • इदं प्राणादिपञ्चकं कर्मेन्द्रियैः सहितं सत्प्राणमयकोशो भवति।

​

सूक्ष्म शरीर :

  • उपर्युक्त कौशत्रयों में से विज्ञानमयकोश ज्ञान-शक्ति से युक्त है अतः कर्त्ता कहलाता है ।
  • मनोमयकोश इच्छा-शक्तिसम्पन्न है अतः विवेक का करण साधन है तथा प्राणमयकोश गमनादि क्रिया-सम्पन्न है, अतः कार्य स्वरूप है।
  • अर्थात् किसी भी कार्य के सम्पादन के लिए कोशत्रय में स्थित तीनों शक्तियों का समन्वय अत्यन्त अपेक्षित है, क्योंकि किसी भी कार्य का साधक पहले विज्ञानमय कोश की प्रक्रिया से किसी साध्य के संबंध में ज्ञान करता है।
  • तदुपरान्त मनोमयकोश की प्रक्रिया से उसे प्राप्त करने की इच्छा करता है तथा इच्छाशक्ति से प्रेरित होकर, प्राणमयकोश की प्रक्रिया से वागादि कर्मेन्द्रियों से अपनी इच्छा को कार्यरूपता प्रदान करता है।
  • इन तीनों में अलग-अलग इन तीनों बातों की योग्यता है; अतः अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार ही इनका कर्त्ता, करण तथा कार्य इन नामों से विभाग किया गया है। ये तीनों मिलाकर सूक्ष्म शरीर कहलाते हैं -
  • एतेषु कोशेषु मध्ये विज्ञानमयो ज्ञानशक्तिमान् कर्तृरूपः। मनोमय इच्छाशक्तिमान् करणरूपः, प्राणमयः क्रियाशक्तिमान् कार्यरूपः । योग्यत्वादेवमेतेषां विभाग इति वर्णयन्ति। एतत्कोशत्रयं मिलितं सत्सूक्ष्मशरीरमित्युच्यते।।

 

अतः स्पष्ट है, की "विज्ञानमयकोशावच्छिनः चिदात्मा" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 44

'यद्विषयकत्वेन ज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वं तत्वम्'- अनेन वाक्येन कस्य लक्षणं प्रस्तूयते?

  1. AOption (a)

    उपमितिव्यापारस्य

  2. BOption (b)

    हेत्वाभाससामान्यस्य

  3. COption (c)

    वैशिष्ट्यावगाहिज्ञानस्य

  4. DOption (d)

    विरुद्धार्थापत्तः

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Correct answer

Answer: (b)B.

हेत्वाभाससामान्यस्य

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भाषानुवाद-'यद्विषयकत्वेन ज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वं तत्वम्'- इस वाक्य से किसका लक्षण  प्रस्तुत किया गया है?

स्पष्टीकरण-'यद्विषयकत्वेन ज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वं तत्वम्'- इस वाक्य से हेत्वाभाससामान्य का लक्षण  प्रस्तुत किया गया है,अतः विकल्प (2) सही हैं।

Important Points

  • तर्क का विवरण न्यायदर्शन के अंतर्गत प्राप्त होता है।
  • "नीयते विवक्षितार्थः अनेन इति न्यायः " अर्थात जिस साधन के द्वारा हम अपने विवक्षित (ज्ञेय) तत्त्व के पास पहुँच जाते हैं, उसे जान पाते हैं, वही साधन न्याय है।
  • न्याय दर्शन के प्रणेता अक्षपाद गौतम हैं।
  • न्यायदर्शन में पदार्थों के तत्व ज्ञान से निःश्रेयस् की सिद्धि बतायी गयी है।

Key Points 

  • न्यायसिद्धांतमुक्तावली के अनुसार हेत्वाभास-

अनैकान्तो विरुद्धश्चाप्यसिद्धः प्रतिपक्षितः।

कालात्ययापदिष्टश्च हेत्वाभासास्तु पञ्चधा । । ७१ ।।

भाषानुवाद - अनैकान्त (व्यभिचार), विरुद्ध, असिद्ध, सत्प्रतिपक्षित तथा कालात्ययापदिष्ट (बाध) इस प्रकार पाँच हेत्वाभास होते हैं।

मुक्तावली के अनुसार -हेतुप्रसङ्गाद्धेत्वाभासान् विभजते अनैकान्त इत्यादि । तल्लक्षणं तु यद्विषयकत्वेन ज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वं तत्त्वम् । तथा हि-व्यभिचारादि-

विषयकत्वेन ज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वात्ते दोषाः ।यद्विषयकत्वञ्च यादृशविशिष्टविषयकत्वं तेन बाघभ्रमस्यानुमिति- विरोधित्वेऽपि न क्षतिः, तत्र पर्वतो वह्न्यभाववानिति विशिष्टस्याप्रसिद्धत्वान हेतुदोषः ।

भाषानुवाद – हेत्वाभासों का सामान्यलक्षण इस प्रकार किया गया है— जिसका ज्ञान अनुमिति का प्रतिबन्धक होता है वह हेत्वाभास कहलाता है। उदाहरणार्थ व्यभिचार का ज्ञान अनुमिति का विरोधी होता है, अतः व्यभिचार हेत्वाभास है। व्यभिचारज्ञान में अनुमिति के प्रति प्रतिबन्धकता व्यभिचार- विषयकत्वेन होती है, अर्थात् ज्ञान का विषय व्यभिचार होने से ही वह ज्ञान अनुमिति के प्रति प्रतिबन्धक होता है। (यहाँ यह ज्ञातव्य है कि हेत्वाभास के लक्षण में प्रविष्ट 'अनुमिति' पद का अर्थ केवल 'पक्षः साध्यवान्' यही नहीं है, अपितु लाक्षणिक अर्थ स्वीकार किया गया है। तदनुसार 'पक्ष: साध्यवान् साध्यव्याप्यहेतुमांश्च' इस प्रकार की समूहालम्बनात्मक अनुमिति विवक्षित है।

इस अनुमिति के प्रति व्याप्ति-अंश में व्यभिचार ज्ञान प्रतिबन्धक होता है) इस प्रकार ज्ञान यद्विषयकत्वेन अनुमिति का प्रतिबन्धक होता है उस विषय को हेत्वाभास कहा जाता है। इस लक्षण के संदर्भ में यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि 'पर्वतो बह्निमान्' इस अनुमिति के प्रति वह्न्यभाव एवं पर्वत-विषयक 'वयभाववान् पर्वत:' इस प्रकार का बाघभ्रम भी प्रतिबन्धक होता है। उस बाघभ्रम की विषयता वह्न्यभाव एवं पर्वत में आने से उनमें हेत्वाभासलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायेगी। ('यत्' पद से वहवभाव एवं पर्वत, यद्विषयकज्ञान= 'वह्न्यभाववान् पर्वत:' इस प्रकार का बाघभ्रम, वह 'पर्वतो वह्निमान् इस अनुमिति के प्रति प्रतिबन्धक होता है। 'तत्त्व' वह्न्यभाव एवं पर्वत पर आने से अतिव्याप्ति होगी।)

इस प्रश्न के समाधानार्थ ग्रन्थकार ने 'यद्विषयक' पद का अर्थ 'यादृशविशिष्टविषयक' किया है। अर्थात् जिस विशिष्ट का ज्ञान अनुमिति का प्रतिबन्धक होता है वह विशिष्ट हेत्वाभास होता है। प्रस्तुत प्रसंग में वह्न्यभावविशिष्ट पर्वत का भ्रम अनुमिति के प्रति प्रतिबन्धक होता है, किन्तु वह्न्यभाववत् पर्वतरूप विशिष्टपदार्थ अप्रसिद्ध होने से अतिव्याप्ति का परिहार हो जाता है।

Question 45

महाभारते 'भारतभावदीपः' इति टीका केन रचिता?

  1. AOption (a)

    नीलकण्ठेन

  2. BOption (b)

    देवबोधेन

  3. COption (c)

    विमलबोधेन

  4. DOption (d)

    नारायणभट्टेन

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Correct answer

Answer: (a)A.

नीलकण्ठेन

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद: महाभारत पर "भारतभावदीप" यह टीका किसके द्वारा रचित है?

स्पष्टीकरण: महाभारत पर "भारतभावदीप" नामक टीका के रचनाकार नीलकण्ठ चतुर्धर हैं। 

मुख्य बिन्दु:

  • १७ वीं शताब्दी के "नीलकण्ठ चतुर्धर" संस्कृत साहित्य के एक सुप्रसिद्ध टीकाकार रहे।
  • नीलकण्ठ चतुर्धर का जन्म "महाराष्ट्र" के अहमदनगर जिले के कर्पूर गाँव में हुआ था जो आधुनिक काल में कोपर गाँव के नाम से जाना जाता है।
  • नीलकण्ठ जी के द्वारा अनेकों कृतियां की गयी परन्तु, उनकी अमर कीर्ति का आधार उनके द्वारा महाभारत पर रचित "भारतभावदीप" टीका बनी।
  • यह टीका सम्पूर्ण महाभारत के १८ पर्वों पर लिखी गयी है। जिसे की महाभारत के विषय में सबसे उपयोगी टीका का माना जाता है।

अतिरिक्त जानकारी:

  • नीलकण्ठ चतुर्धर की अन्य कृतियाँ:
  • मंत्रकाशीखंडटीका
  • मन्त्र-रामायण
  • मन्त्र-भागवत
  • वेदान्तशतक
  • शिवताण्डव-व्याख्या
  • षटतंत्रीसार
  • गणेशगीता-टीका
  • हरिवंश-टीका
  • सौरपौराणिक मत समर्थन
  • विधुराधानविचार
  • अचार प्रदीप

Question 46

'ब्रह्मावर्त' किं प्रचक्षते?

  1. AOption (a)

    सरस्वतीदृषद्वत्योः यदन्तरम्

  2. BOption (b)

    सरस्वतीयमुनयोः यदन्तरम्

  3. COption (c)

    गंगादृषद्वत्योः यद्न्तरम्

  4. DOption (d)

    गंगासरस्वत्योः यदन्तरम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

सरस्वतीदृषद्वत्योः यदन्तरम्

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद: "ब्रह्मावर्त" कहाँ देखा जाता है?

स्पष्टीकरण: "ब्रह्मावर्त" नामक क्षेत्र "सरस्वती" एवं "दृषद्वती" नदी के प्रवाहित क्षेत्र को कहते हैं। 

मुख्य बिन्दु:

  • धर्मशास्त्रीय ग्रन्थ "मनुस्मृति" में "ब्रह्मावर्त" को भारत में "सरस्वती और दृषद्वती" नदियों के मध्य का क्षेत्र कहा गया है।
  • ब्रह्मवर्त से अभिप्राय "ब्रह्म का क्षेत्र" अर्थात उस स्थान के रूप में किया गया जहाँ "अच्छे" लोग निवास करते थे इसलिए इसका एक पर्याय देवभूमि के रूप में भी किया गया है।
  • एलैन डेनियलोउ - एक फ़्रांसिसी इंडोलॉजिस्ट जिन्होंने बाद में हिन्दू धर्म अपना लिया था उनके मत में "ऋग्वेद" इस क्षेत्र का वर्णन ब्रह्मवर्त करता है। जिसे आर्य समुदाय के हृदय स्थल के रूप में जाना जाता है।
  • उनके मत में ऋग्वेद के परवर्ती ग्रन्थ यह इंगित करते हैं की बाद में यह क्षेत्र धार्मिक गतिविधियों का केंद्र न रहकर समीपवर्ती क्षेत्र से "दक्षिण-पूर्व" में स्थित " ब्रह्मऋषिदिशा" नामक क्षेत्र में चला गया था।

अतिरिक्त जानकारी:

  • ऋग्वेद काल में सरस्वती एवं दृषद्वती नदी के मध्य का यह भाग आधुनिक काल में "राजस्थान" के नाम से जाना जाता है।

Question 47

'सामदण्डौ प्रशंसन्ति नित्यं राष्ट्रभिवृद्धये।'

इति श्लोकांशः कस्माद् उद्धृतः?

  1. AOption (a)

    मनुस्मृतेः

  2. BOption (b)

    याज्ञवल्क्यस्मृतेः

  3. COption (c)

    नारदस्मृतेः

  4. DOption (d)

    अर्थशास्त्रात्

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Correct answer

Answer: (a)A.

मनुस्मृतेः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद: "सामदण्डौ प्रशंसन्ति नित्यं राष्ट्रभिवृद्धये।" यह श्लोकांश कहाँ से उद्धृत है?

स्पष्टीकरण: 'सामदण्डौ प्रशंसन्ति नित्यं राष्ट्रभिवृद्धये।' यह श्लोकांश "मनुस्मृति" के सप्तम अध्याय के 109 वे श्लोक से उद्धृत है। 

मुख्य बिन्दु:

  • मनुस्मृति भारतीय धर्मशास्त्र का एक अति महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। एवं साथ ही सबसे अधिक प्रसिद्ध भी है।
  • यह ग्रन्थ कुल १२ अध्यायों में विभक्त है जिसके अंतर्गत कुल २५००-२६८४ श्लोक है। किंचित संस्करणों में यह संख्या २९६४ भी है।
  • "मनुस्मृति" के सप्तम अध्याय के १०९ वे श्लोक से प्रस्तुत "सामदण्डौ प्रशंसन्ति नित्यं राष्ट्रभिवृद्धये।" उद्धृत किया गया है। जिसका पूर्ण श्लोक इस प्रकार है:
  • ​सामदीनां उपायानां चतुर्णां अपि पण्डितः। सामदण्डौ प्रशंसन्ति नित्यं राष्ट्रभिवृद्धये।।​ (७.१०९)
  • इस श्लोक का अर्थ है की - सामादि चारों उपायों में पंडित भी राष्ट्र के अभिवृद्धि में साम और दण्ड की प्रशंसा करते है(अथवा मानते हैं)।

अतिरिक्त जानकारी:

  • किंचित मतों में इस श्लोक को मूल रूप से "मनुस्मृति" का श्लोक नहीं माना जाता है। अपितु, इस श्लोक को एक "प्रक्षिप्त" श्लोक कहा जाता है।

Question 48

'सोऽयमात्मा चतुष्पात्' इति कस्याम् उपनिषदि वर्तते?

  1. AOption (a)

    मुण्डकोपनिषदि

  2. BOption (b)

    माण्डूक्योपनिषदि

  3. COption (c)

    केनोपनिषदि

  4. DOption (d)

    कठोपनिषदि

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Correct answer

Answer: (b)B.

माण्डूक्योपनिषदि

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद: "​सोऽयमात्मा चतुष्पात्" यह किस उपनिषद में बताते हैं?

स्पष्टीकरण: "सोऽयमात्मा चतुष्पात्" अर्थात यह आत्मा चार पाद वाली है। इस प्रकार का वर्णन "माण्डूक्योपनिषद" में प्राप्त होता है। 

मुख्य बिन्दु:

  • अथर्ववेद शाखा से सम्बंधित "माण्डूक्योपनिषद" प्रथम दस उपनिषदों में से एक है।
  • "माण्डूक्योपनिषद" में केवल १२ मन्त्र ही हैं। आकार की दृष्टि से सबसे छोटा उपनिषद है परन्तु, अपनी विषयवस्तु के कारण इसका महत्त्व बहुत ही अधिक है।
  • इस उपनिषद की विशेषता इसमें प्रतिपादित "आत्मा की चार अवस्थाओं" का वर्णन है।
  • आत्मा के चार पाद अथवा अवस्थाएँ इस प्रकार है:
  • जाग्रत - जिसमे आत्मा को वैश्वानर कहा गया है। इस रूप में सब नर एक योनि से दूसरी योनि में प्रवेश करते हैं। एवं इस अवस्था में जीवात्मा बहिर्मुखी होकर "सप्तांगों" तथा इन्द्रियादि के द्वारा "१९ मुखों" से स्थूल विषयों का ग्रहण करता है। यह अवस्था "बहिष्प्रज्ञ" कही जाती है।
  • स्वप्नावस्था - इस अवस्था को "तेजस" भी कहा जाता है। जिसमें जीव "अन्तः प्राज्ञ" होता है। इस अवस्था में "सप्ताङ्गों" एवं "१९ मुखी" द्वारा जाग्रत अवस्था के अनुभूत विषयों का मन के स्फुरण द्वारा "बुद्धि" पर पड़े हुए विभिन्न संस्कारों का शरीर के भीतर भोग करता है।
  • सुषुप्ति - यह अवस्था "प्रगाढ़ निद्रा" में विद्यमान होती है। इस अवस्था में जीवात्मा की स्थिति आन्दमय ज्ञान स्वरूप हो जाती है। एवं इस अवस्था में बाहरी तत्त्वों के ग्रहण का अभाव होता है। यह अवस्था अंतर्मयी होती है एवं पूर्व  अवस्थाओं से उच्च है।
  • तुरीय - यह अवस्था "चतुष्पादों" में सबसे उच्च स्वरूप है। इस अवस्था में आत्मा ना तो "अन्तःप्रज्ञ" है न ही "बहिष्प्रज्ञ" और ना ही दोनों अवस्थाओं के संघात स्वरूप। ना "प्रज्ञानघन", ना "प्रज्ञ", ना "अप्रज्ञ" | अतः यह अवस्था "अदृष्ट, अव्यवहार्य, आग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य, अव्यपदेश, एकात्मप्रत्ययसार, शांत, शिव, एवं अद्वैत" है।

अतिरिक्त जानकारी:

  • "माण्डूक्योपनिषद" में ब्रह्म के स्वरूप को "ॐ कार" के द्वारा भी बताया गया है जिसमें:
  • "ॐ" के "अकार" से वाणी का आरम्भ होता है। और अकार वाणी में व्याप्त है। यह जाग्रत अवस्था है।
  • "ॐ" के "उकार" से "स्वप्नावस्था" स्थानीय का वर्णन।
  • "ॐ"(कार) के  "मकार" के द्वारा "सुषुप्ति" का वर्णन किया गया है।
  • सभी मात्राओं  से रहित स्वरूप "अद्वैत ब्रह्म" है। अथवा तुरीय है।

Question 49

मैक्समूलरमहोदयेन ऋग्वेदस्य का संहिता सम्पादिता?

  1. AOption (a)

    शाकलसंहिता

  2. BOption (b)

    वाष्कलसंहिता

  3. COption (c)

    शांखायनसंहिता

  4. DOption (d)

    माण्डूकायनसंहिता

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Correct answer

Answer: (a)A.

शाकलसंहिता

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- मैक्समूलर ने ऋग्वेद की किस संहिता का संपादन किया था?

उत्तर- शाकलसंहिता

मैक्समूलर-

  • मैक्समूलर एक जर्मन भाषाविद, वेद तथा प्राच्य विद्या विशारद था।
  • संस्कृत भाषा की श्रेष्ठता और उसके साहित्य की गरिमा को अनुभव कर मैक्समूलर को लैटिन और ग्रीक के क्लासिकल साहित्य से विरक्ति हो गई और इस विश्वविद्यालय के संस्कृत प्रोफेसर ब्रोकहाउस के मार्गदर्शन में उन्होंने संस्कृत पढ़ना आरम्भ कर दिया।
  • आरम्भ में उनका अध्ययन कालिदास के नाटक अभिज्ञानशाकुन्तलम् तथा ऋग्वेद के कुछ अंश तक सीमित रहा । २० वर्ष की आयु में उन्होंने “हितोपदेश'' का जर्मन अनुवाद किया।
  • १८४३ में दर्शनशास्त्र में डाक्टरेट करने के पश्चात् उन्होंने भाषा विज्ञान और दर्शनशास्त्र विषयक अपने अध्ययन को जारी रखने के लिये १८४४ में बर्लिन में प्रवेश लिया । यहां तुलनात्मक भाषा विज्ञान के संस्थापक फ्रत्ज बॉप तथा दार्शनिक फीडरिश फान रोलिंग के मार्गदर्शन में कार्य किया।
  • प्राचीन ग्रन्थों की प्रतिलिपियां प्राप्त करने तथा संस्कृत के मूल ग्रन्थों की पाण्डुलिपियाँ एकत्र करने के सिलसिले में वे १८४६ में इंगलैंड गये और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में संस्कृत के प्रथम बाँडेन प्रोफेसर एच० एच० विल्सन ने उनकी इस कार्य में सहायता की।
  • विल्सन की सिफारिश से ही १८४८ में उनकी नियुक्ति ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में हुई जहाँ रह कर उसने १८४९-१८७४ की अवधि में छः खण्डों में ऋग्वेद के संस्करण का सम्पादन और प्रकाशन किया।
  • विशेष रूप से उन्होंने ऋग्वेद में स्थित शाकलसंहिता का संपादन किया था।

 

इस प्रकार मैक्समूलर ने ऋग्वेद की शाकलसंहिता का संपादन किया था।

Question 50

तर्कस्य स्वरुपम् अस्ति-

  1. AOption (a)

    व्यापकारोपेण व्याप्यारोपः

  2. BOption (b)

    समव्याप्त्यारोपेण विषमव्याप्त्यारोपः

  3. COption (c)

    विशेषणारोपेण विशेप्यारोपः

  4. DOption (d)

    व्याप्यारोपेण व्यापकारोपः

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Correct answer

Answer: (d)D.

व्याप्यारोपेण व्यापकारोपः

Why this answer is correct

भाषानुवाद- तर्क का स्वरूप है?

स्पष्टीकरण-"व्याप्यारोपेण व्यापकारोपः" अर्थात व्यापी पदार्थ का आरोपण करके व्यापकपदार्थ का आरोपण करना तर्क है।

  • तर्क का विवरण न्यायदर्शन के अंतर्गत प्राप्त होता है।
  • "नीयते विवक्षितार्थः अनेन इति न्यायः " अर्थात जिस साधन के द्वारा हम अपने विवक्षित (ज्ञेय) तत्त्व के पास पहुँच जाते हैं, उसे जान पाते हैं, वही साधन न्याय है।
  • न्याय दर्शन के प्रणेता अक्षपाद गौतम हैं।
  • न्यायदर्शन में पदार्थों के तत्व ज्ञान से निःश्रेयस् की सिद्धि बतायी गयी है।

Key Points

  • तर्क का स्वरूप-

"व्याप्यरोपेण व्यापकारोस्तर्कः"अर्थात् व्यापी पदार्थ का आरोपण करके व्यापकपदार्थ का आरोपण करना तर्क है।

(यदि अग्नि का अभाव होता है तो धूम का भी अभाव हो जाता है ऐसा कहना तर्क है इसमें अग्नि का अभाव व्यापी है जिसका आरोपण हुआ है, उसी के आधार पर् व्यापक-धूमाभाव का भी आरोपण हुआ।)

पर्वत में धूम देखकर कोई व्यक्ति उक्त तर्क की सहायता से अनुमान प्रमाण के द्वारा अग्नि का निश्चय कर ले सकता है। यही कारण है कि तर्कको प्रमाणों का सहायक मानते हैं।

तर्क के भेद- "स चैकादशविधः" ये ग्यारह प्रकार के हैं। 

व्याघात, आत्माश्रय, इतरेतराश्रय, चक्रकाश्रय, अनवस्था, प्रतिबंधी की कल्पना, कल्पनालाघव, कल्पनागौरव, उपसर्ग, अपवाद और वैजात्य।

Question 51

सांख्यमतानुमतं कथनद्वयं चिनुत

(A) प्रकृतिः आत्मना आत्मानं बध्नाति

(B) प्रकृतिः आत्मना आत्मनां न बध्नाति

(C) प्रकृतिः पुरुषं बध्नाति

(D) प्रकृतिः आत्मानं प्रकाश्च विनिवर्तते

समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (C)

  2. BOption (b)

    (A) एवम् (D)

  3. COption (c)

    (B) एवम् (C)

  4. DOption (d)

    (B) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A) एवम् (D)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- साख्यमतानुसारे दो कथन को चुनियें? 

स्पष्टीकरण - यहाँपर कथन A एवं कथन D सत्य है। 

Important Pointsप्रकृते: सुकुमारतरं न किञ्चिदस्तीति मे मतिर्भवति ।

या दृष्टाऽस्मीति पुनर्न दर्शनमुपैति पुरुषस्य ॥ १.६१ ॥- सांख्यकारिका 

स्पष्टीकरण- सांख्यकारिका के  इस कारिका अनुसार स्वरूपमती प्रकृति बन्धन तथा मोक्ष के घेरे में घूमती रहती है । यह अपने ही सप्तस्वरूपों-धर्म, अधर्म, वैराग्य, अवैराग्य, ऐश्वर्य, अनैश्वर्य तथा अज्ञान से अपने को बन्धन में डाल लेती है तथा पुरुष के प्रयोजन के ईश्वरकृष्ण के शब्दों हेतु एक ज्ञान को छोड़ देती है, जिसके माध्यम से पुरुष अपने व प्रकृति के स्वरूप का सम्यक् दर्शन करके भ्रममुक्त हो जाता है या प्रकृति अपने को मुक्त कर लेती है-

रूपै: सप्तभिरेव तु बध्नात्यात्मानमात्मना प्रकृति: ।

सैव च पुरुषार्थं प्रति विमोचयत्येकरूपेण ॥१. ६३ ॥- सांख्यकारिका

Question 52

अधोलिखितेषु के द्वे आत्मनेपदविधायकसूत्रे स्तः?

(A) पूर्ववत्सनः

(B) परेर्मृषः

(C) समवप्रविभ्यः स्थः

(D) उपाच्च

समुचितमुत्तरं चिनुत -

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (C)

  2. BOption (b)

    (B) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (A) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(A) एवम् (C)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- नीचे लिखे गये दो आत्मनेपदविधायक सूत्र क्या है? 

स्पष्टीकरण - पूर्ववत्सनः एवं समवप्रविभ्यः स्थः यह दो आत्मनेपदविधायक सूत्र है।

Important Points

  • पूर्ववत्सनः - 
  • पदच्छेदः- पूर्ववत् सनः
  • अनुवृत्तिः- आत्मनेपदम्
  • सूत्रप्रकार- अतिदेशसूत्रम्
  • सूत्रार्थः- पूर्ववत् यह अव्यय पद है  एवं सन पञ्चमी-एकवचन है। यह आत्मनेपद विधायक सूत्र है। जिस धातु के पूर्व में सन् प्रत्यय रहता है वहाँ पर आत्मनेपद होता है।
  • यथा- एदिधिषते । शिशयिषते । निविविक्षते ।
  • समवप्रविभ्यः स्थः- 
  • पदच्छेदः- सम्-अव-प्र-विभ्यः
  • अनुवृत्तिः- आत्मनेपदम्
  • अनुवृत्तिसहितं सूत्रम् - सम्-अव-प्र-विभ्यः स्थः आत्मनेपदम्
  • सूत्रार्थः- 'सम् ' / 'अव' / 'प्र' / 'वि' उपसर्गात् 'स्था' धातोः आत्मनेपदस्य प्रत्ययाः भवन्ति । अर्थात सम्-अव-प्र-विभ्य आदि उपसर्ग के साथ स्था धातु के योग से आत्मनेपद होता है।
  • यथा - संतिष्ठते ('समाप्तं भवति' इत्यर्थः), अवतिष्ठते ('अस्ति, स्थिरः भवति' इत्यर्थः) , प्रतिष्ठते ('स्थापना भवति / निर्गच्छति' इत्यर्थः) , वितिष्ठते ('स्थिरः भवति' इत्यर्थः) ।

       

Additional Information

  • परेर्मृषः एवं उपाच्च दोनोंं ही परस्मैपद विधायक सूत्र है।

Question 53

अधोलिखितेषु कौ द्वौ क्यप् प्रत्ययान्तौ?

(A) आदृत्यः

(B) आहत्यः

(C) शप्यम्

(D) जुष्यः

समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (B) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (B) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (A) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(A) एवम् (D)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अधोलिख में से कौनसे दों क्यप् प्रत्ययान्त है?

स्पष्टीकरण - 

सूत्र - एतिस्तुशास्वृदृजुषः क्यप् (३.१.१०९)

सूत्र स्पष्टीकरण - इण्, स्तु, शास्, वृ, दृ, तथा जुष् धातुओं से क्यप् प्रत्यय होता है।

स्पष्टीकरण -

  • क्यप् में ककार की 'लशक्वतद्धिते' से इत्संज्ञा और पकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा और दोनों का 'तस्य लोप:' से लोप होकर केवल 'य' शेष बचता है।

Important Points

उदाहरण -

  1. इण् + क्यप् - इत्यः
  2. वृ + क्यप् - वृत्यः
  3. स्तु + क्यप् - स्तुत्यः
  4. शास् + क्यप् - शिष्यः
  5. आ + दृ + क्यप् - आदृत्यः/आदृत्यम्/आदृत्���ा
  6. जुष् + क्यप् - जुष्यः/जुष्यम्/जुष्या
  7. कृ + क्यप् - कृत्यः/कृत्यम्/कृत्या

​अतः स्पष्ट है, 'आदृत्यः' और 'जुप्यः' इसमें क्यप् प्रत्यय होता है।

Question 54

रसादिध्वनौ अन्तर्भवतः-

(A) वस्तुध्वनिः

(B) अलङ्कारध्वनिः

(C) रसध्वनिः

(D) भावध्वनि

समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (B) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (A) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(C) एवम् (D)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : रसादिध्वनि में किसका अंतर्भाव होता है?

ध्वनि के व्युत्पत्त्यर्थ :

व्यंग्य (अर्थ) ध्वनित होता है अथवा शब्द, अर्थ, व्यापार भी ध्वनन व्यापार है। इस प्रकार समुदाय शब्द अर्थ-वाच्य (व्यंजक) अर्थ और व्यंग्य अर्थ तथा शब्द और अर्थ का व्यापार ध्वनि है। अतः लोचनकार द्वारा दी गयी इस व्याख्या के आधार पर ध्वनि के पाँच व्युत्पत्यर्थ स्वीकार किए गए है -

  1. ध्वनति ध्वनयति इति वा ध्वनि -
  • जो ध्वनित करे व कराए, वह ध्वनि है। यह शब्द के लिए आता है। वाचक, लक्षक, व्यंजक तीनों प्रकार के शब्द जब किसी व्यंग्य अर्थ के व्यंजक होते हैं, तो ध्वनि कहे जाते हैं।
  1. ध्वन्यत इति ध्वनि -
  • जो ध्वनित हो वह ध्वनि है। इस कर्मप्रधान व्युत्पत्ति से ध्वनि शब्द रसादि व्यंग्यों का वाचक होता है। वस्तु, रसादि और अलंकार ध्वनित होते हैं। ये सब ध्वनि है।
  1. ध्वन्यते अनेन इति ध्वनि -
  • जिस कारण अर्थात् शब्द व्यापार या शब्द शक्ति द्वारा ध्वनि की उत्पत्ति होती है, वह ध्वनि है। इस प्रकार करण प्रधान ध्वनि शब्द से व्यंजना आदि शक्तियों का बोध होता है। प्रत्येक शब्द और अर्थ के बीच सम्बन्ध स्थापित करने वाली एक-एक शक्ति होती है जो शब्द से अर्थ की उपस्थिति कराती है जिसका वर्णन क्रमशः अभिधा, लक्षणा और व्यंजना के नाम से हो चुका है।
  1. ध्वननं ध्वनि -
  • ध्वनित होना ध्वनि है। इस रूप में यह भाववाचक संज्ञा है। इससे वस्तु अलंकार और रसादि की सूचना समझी जाती है। अभिव्यंजन, ध्वनन, सूचन इसके समानार्थक शब्द है।
  1. ध्वन्यत अस्मिन्निति ध्वनि -
  • जिसमें वस्तु, अलंकार, रसादि ध्वनित हो, ध्वनि है। यह ध्वनि पद अधिकरण प्रधान है। यह शब्द गुणवाची विशेषण होकर काव्य शब्द के साथ समधिव्याव्हृत होता है। यह ध्वनि काव्य है, ऐसा व्यवहार इसी विग्रह पर अवलम्बित है।

इस प्रकार ध्वनि का प्रयोग पाँच अर्थों में होता है -

  • व्यंजक शब्द,
  • व्यंजक अर्थ,
  • व्यंग्य शब्द,
  • व्यंग्य अर्थ (व्यंजना-व्यंजना व्यापार)
  • व्यंग्य प्रधान काव्य।

संक्षेप में ध्वनि का अर्थ है व्यंग्य, परन्तु पारिभाषिक रूप में यह व्यंग्य वाच्यातिशयी होना चाहिए। इस अतिशय्य अथवा प्राधान्य का आधार है चारुत्व अर्थात् रमणीयता का उत्कर्ष। अतएव वाच्यातिशयी का अर्थ हुआ वाच्य से अधिक रमणीय और ध्वनि का संक्षिप्त लक्षण हुआ-वाच्य से अधिक रमणीय व्यंग्य को ध्वनि कहते है।

Question 55

औचित्य-भेदौ स्तः-

(A) अभिप्रायः स्वभावश्च

(B) कालः देशश्च

(C) ध्वनिः रीतिश्च

(D) पदं वर्णश्च

समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (B) एवम् (C)

  2. BOption (b)

    (C) एवम् (D)

  3. COption (c)

    (D) एवम् (A)

  4. DOption (d)

    (A) एवम् (B)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(A) एवम् (B)

Why this answer is correct

भाषानुवाद - औचित्य के भेद है ?

स्पष्टीकरण - अभिप्राय, स्वभाव और काल, देश औचित्य के भेद है। अतः विकल्प (a) और (b) सही है। 

Important Points

  • क्षेमेंद्र ने अपनी कृति "औचित्यविचारचर्चा" में 'औचित्य' तत्व को रससिद्ध काव्य का जीवित या आत्मभूत घोषित कर एक नए सिद्धान्त की स्थापना की थी।
  • जो औचित्यवाद के नाम से प्रसिद्ध है। “औचित्यं रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम्”
  • आचार्य क्षेमेन्द्र औचित्य को ही रस का प्राण मानते हैं। औचित्य को परिभाषित करते हुए वे लिखते हैं-

उचितं प्राहुराचार्याः सदृशं किल यस्य यत्। (औचित्यविचारचर्चा)

उचितस्य च यो भावस्तदौचित्य प्रचक्षते॥

  • अलंकार और गुण की योजना जब तक उचित नहीं होगी, काव्य चमत्कारी नहीं हो सकेगा। इस बात को ही क्षेमेंद्र ने अपनी कृति में स्पष्ट घोषित करते हुए कहा था, "औचित्य के बिना न अलंकार ही रुचि पैदा करते हैं, न गुण ही।"
  • वक्रोक्तिजीवितकार कुंतक ने भी काव्य के दो प्रधान गुणों में एक औचित्य माना है, दूसरा है सौभाग्य।
  • वस्तुतः औचित्य कुछ नहीं, कवि के मूल भाव के अनुरूप गुण, अलंकार, रीति, शब्दशय्या, छंदरचना, विभावादी की योजना आदि का समुचित विन्यास है।
  • इस प्रकार औचित्य सिद्धांत काव्य की समग्रता को ध्यान में रखकर स्थापित उद्भावना है। कहा भी जाता है कि ध्वनि, रस, काव्यार्थानुमिति, गुण, अलंकार, रीति तथा वक्रोक्ति सभी वस्तुतः औचित्य का ही अनुधावन करते हैं।

Key Points

  • क्षेमेंद्र ने इस तत्व को काव्य की आत्मा घोषित कर इसके २७ भेद माने हैं -
  • भाषा विषयक - पद, वाक्य, क्रिया, कारक, लिंग, वचन, विशेषण, उपसर्ग, निपात और काल।
  • काव्यशास्त्र विषयक - प्रबंधार्थ, गुण, अलंकार और रस। इनके अतिरिक्त ‘नाम’ को परिकर अलंकार और ‘अभिप्राय’ को ‘व्यंग्यार्थ’ का पर्याय मानते हुए इन दोनों को भो इसी वर्ग में रख सकते है।
  • वर्ण्य विषयक - देश, कुल, व्रत, तत्व, सत्व, स्वभाव, सारसंग्रह, प्रतिभा, अवस्था(वय:), विचार और आशीर्वाद(आशीर्वचन)।

Question 56

यथोचितं मेलनं कुरुत

सूची Iसूची II
A.पदमञ्जरीI.नागेशभट्टः
B.सारस्वतव्याकरणम्II.हरदत्तमिश्रः
C.शब्दकौस्तुभःIII.अनुभूतिस्वरुपाचार्य
D.बृहच्छब्देन्दुशेखरःIV.भट्टोजिदीक्षितः
<br>

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) - (II), (B) - (IV), (C) - (I), (D) - (III)

  2. BOption (b)

    (A) - (II), (B) - (III), (C) - (IV), (D) - (I)

  3. COption (c)

    (A) - (I), (B) - (IV), (C) - (II), (D) - (III)

  4. DOption (d)

    (A) - (IV), (B) - (III), (C) - (II), (D) - (I)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A) - (II), (B) - (III), (C) - (IV), (D) - (I)

Why this answer is correct

पदमञ्जरी – हरदत्तमिश्रः

       सारस्वतव्याकरणम् –अनुभूतिस्वरुपाचार्य

      शब्दकौस्तुभः – भट्टोजिदीक्षितः

     बृहच्छब्देन्दुशेखरः - नागेशभट्टः

पदमञ्जरी- आनुमानिक 11 शताब्दी के कवि हरदत्तमिश्र के रचित भाष्य है पदमञ्जरी, यह काशिकावृत्ति के भाष्य है। यह ग्रन्थ बनारस से प्रकाशित है । हरदत्तमिश्र ने आपदस्तम्ब के धर्मसूत्र का भी भाष्य लिखा है।

 सारस्वतव्याकरणम्  – 12वी सदी के सारस्वत सम्प्रदाय के व्याकरण के आचार्य थे  अनुभूतिस्वरुपाचार्य। पाणिनि के समय के बाद विविध व्याकरण सम्प्रदाय के     

प्रवर्तन हुआ था जिनमें सारस्वतव्याकरण एक अन्यतम्।

 शब्दकौस्तुभः -  शब्दकौस्तुभ ग्रन्थ अष्टाध्यायीग्रन्थ के एक प्रसिद्ध टीका।शब्दकौस्तुभ ग्रन्थ के रचयिता भट्टोजिदीक्षित महाराष्ट्र के निवासी थे। पिता के नाम लक्ष्मीधर था। प्रौढमनोरमा,सिद्धान्तकौमुदी ग्रन्थ के रचना इन्होनें ही किये हैं।

 बृहच्छब्देन्दुशेखरः - नागेशभट्ट रचित एक व्याकरण ग्रन्थ हैं। नागेशभट्ट योगशास्त्र तथा अलङ्कार शास्त्रे प्रमुख विद्वान् थे। यह सिद्धन्तकौमुदी ग्रन्थ के टीका हैं।

        अतः यहाँ समस्त ग्रन्थ व्याकरण सम्बन्धित हैं।

Question 57

केन सह कस्य सम्बन्धः?

सूची I काव्यशास्त्रकृतयःसूची II टीकाकाराः
A.अलङ्कारसर्वस्वम्I.अनन्तदासः
B.काव्यादर्शःII.केशवभट्टारकः
C.चित्रमीमांसाIII.जयरथः
D.साहित्यदर्पणम्IV.धरानन्दः
<br>

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) - (I), (B) - (II), (C) - (III), (D) - (IV)

  2. BOption (b)

    (A) - (II), (B) - (III), (C) - (IV), (D) - (I)

  3. COption (c)

    (A) - (III), (B) - (II), (C) - (IV), (D) - (I)

  4. DOption (d)

    (A) - (III), (B) - (II), (C) - (I), (D) - (IV)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(A) - (III), (B) - (II), (C) - (IV), (D) - (I)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यथोचित मेलन कीजिए।

अलंकारसर्वस्व :

  • अलंकारसर्वस्व 12वीं- 13 वीं शती विक्रमी के काव्यशास्त्री 'राजानक रुय्यक' की संस्कृत-कृति है जिसमें अलंकारों का विस्तृत विवेचन है।
  • आचार्य रुय्यक के अलंकारसर्वस्व ग्रंथ पर मंखक ने वृत्ति लिखी थी।
  • अलंकारसर्वस्व को अलंकारसूत्र भी कहा जाता है।
  • समुद्रबंध आदि दक्षिण के विद्वान् टीकाकारों ने मंखक को ही 'अलंकारसर्वस्व' का भी कर्ता माना है। किंतु मंखक के ही भतीजे, बड़े भाई श्रृंगार के पुत्र जयरथ ने, जो 'अलंकारसर्वस्व' के यशस्वी टीकाकार हैं, उसे आचार्य रुय्यक की कृति कहा है।

 

काव्यादर्श :

  • काव्यादर्श अलंकारशास्त्राचार्य दंडी (६ठी - ७वीं शती ई.) द्वारा रचित संस्कृत काव्यशास्त्र संबंधी प्रसिद्ध ग्रंथ है।
  • काव्यादर्श के प्रथम परिच्छेद में काव्य के तीन भेद किए गए हैं– (१) गद्य, (२) पद्य तथा (३) मिश्र।। गद्य पुन: 'आख्यायिका' और 'कथा' शीर्षक दो उपभेदों में विभाजित है। परंतु उक्त दोनों के लक्षणों में किसी मौलिक अंतर का निर्देश नहीं किया गया है। कृतिकार ने संस्कृत गद्य साहित्य की भी चार कोटियाँ मानी हैं– 'संस्कृत', 'प्राकृत', 'अपभ्रंश' तथा 'मिश्र'। 'वैदर्भी' और 'गौड़ी' नामक दो शैलियों तथा १० गुणों का परिचय भी इसी परिच्छेद में है। रचयिता ने अनुप्रास के भेद गिनाकर उनमें से प्रत्येक के लक्षण एवं उदाहरण भी दिए हैं। 'श्रुत', 'प्रतिभा' तथा 'अभियोग' को दंडी ने कवि मात्र के तीन नियामक गुण माने हैं।
  • द्वितीय परिच्छेद में अलंकार की परिभाषा, लक्षण और उद्देश्य देने के उपरांत स्वभावोक्ति, उपमा, रूपक, दीपक, आवृत्ति, आक्षेप, अर्थातरन्यास, व्यतिरेक, विभावना, समासोक्ति, अतिशयोक्ति, उत्प्रेक्षा, हेतु, सूक्ष्म, लेश, क्रम (यथासंख्य), प्रेयस्, रसवत्, ऊर्जस्वी, पर्यायोक्त, समाहित, उदात्त, अप्ह्रति, श्लेष, विशेषोक्ति, तुल्ययोगिता, विरोध, अप्रस्तुतप्रशंसा, व्याजस्तुति, निदर्शन, सहोक्ति, परिवृत्ति, आशी, संसृष्टि (संकीर्ण) तथा भाविक इत्यादि ३५ अलंकारों के लक्षण, भेद एवं उदाहरण प्रस्तुत किए गए हैं।
  • तृतीय परिच्छेद में 'यमक' का सांगोपांग विवेचन है। साथ ही, चित्रकाव्य, गोमूत्रिका, अर्धभ्रम, सर्वताभेद्र, स्वरनियम, स्थाननियम, वर्णनियम तथा प्रहेलिका इत्यादि के लक्षण एवं उदाहरण भी दे दिए गए हैं। ग्रंथा के अन्त में काव्यदोषों का परिचय है।

 

चित्रमीमांसा :

  • चित्रमीमांसा यह श्रीमदप्पयदीक्षितप्रणीत अलंकारशास्त्र का ग्रंथ है। अलंकार ग्रंथोंं में यह प्रौढ माना जाता है। इसमें ध्वनि, गुणीभूतव्यङ्ग्यः,काव्यचित्र, अर्थालङ्कार इनका प्रतिपादन किया गया है। इस ग्रंथ पर तीन टीकाएँँ प्रसिद्ध है - 
  • धरानन्द की सुधा।
  • बालकृष्ण पायगुण्ड की गूढार्थप्रकाशिका।
  • चित्रालोक (इनके कर्ता का ज्ञान नही है)।

​

साहित्यदर्पण :

  • साहित्यदर्पण संस्कृत भाषा में लिखा गया साहित्य विषयक ग्रन्थ है जिसके रचयिता पण्डित विश्वनाथ हैं। विश्वनाथ का समय १४वीं शताब्दी ठहराया जाता है। मम्मट के काव्यप्रकाश के समान ही साहित्यदर्पण भी साहित्यालोचना का एक प्रमुख ग्रन्थ है। काव्य के श्रव्य एवं दृश्य दोनों प्रभेदों के सम्बन्ध में इस ग्रन्थ में विचारों की विस्तृत अभिव्यक्ति हुई है। इसक विभाजन 10 परिच्छेदों में है। वह इस प्रकार है - 
  • प्रथम परिच्छेद में काव्य प्रयोजन, लक्षण आदि प्रस्तुत करते हुए ग्रंथकार ने मम्मट के काव्य लक्षण "तददोषौ शब्दार्थों सगुणावनलंकृती पुन: क्वापि" का खंडन किया है और अपने द्वारा प्रस्तुत लक्षण वाक्यं रसात्मकं काव्यम् को ही शुद्धतम काव्य लक्षण प्रतिपादित किया है। पूर्वमतखंडन एवं स्वमतस्थापन की यह पुरानी परंपरा है।
  • द्वितीय परिच्छेद में वाच्य और पद का लक्षण कहने के बाद शब्द की शक्तियों - अभिधा, लक्षणा, तथा व्यंजना का विवेचन और वर्गीकरण किया गया है।
  • तृतीय परिच्छेद में रस-निष्पत्ति का विवेचन है और रसनिरूपण के साथ-साथ इसी परिच्छेद में नायक-नायिका-भेद पर भी विचार किया गया है।
  • चतुर्थ परिच्छेद में काव्य के भेद ध्वनिकाव्य और गुणीभूत-व्यंग्यकाव्य आदि का विवेचन है।
  • पंचम परिच्छेद में ध्वनि-सिद्धांत के विरोधी सभी मतों का तर्कपूर्ण खंडन और इसका समर्थन है।
  • छठें परिच्छेद में नाट्यशास्त्र से संबन्धित विषयों का प्रतिपादन है। यह परिच्छेद सबसे बड़ा है और इसमें लगभग 300 कारिकाएँ हैं, जबकि सम्पूर्ण ग्रंथ की कारिका संख्या 760 है।
  • ��प्तम परिच्छेद में दोष निरूपण।
  • अष्टम परिच्छेद में तीन गुणों का विवेचन।
  • नवम परिच्छेद में वैदर्भी, गौड़ी, पांचाली आदि रीतियों पर विचार किया गया है।
  • दशम परिच्छेद में अलंकारों का सोदाहरण निरूपण है जिनमें 12 शब्दालंकार, 70 अर्थालंकार और रसवत् आदि कुल 89 अलंकार परिगणित हैं।

 

​अतः स्पष्ट है, की "(A) - (III), (B) - (II), (C) - (IV), (D) - (I)" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 58

वर्गाणां पञ्चवर्णैः युक्तो हकारो भवति-

  1. AOption (a)

    कण्ठ्यः

  2. BOption (b)

    औरस्यः

  3. COption (c)

    जिह्वामूलीयः

  4. DOption (d)

    मूर्धन्यः

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Correct answer

Answer: (b)B.

औरस्यः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद: वर्गों के पाँचवें वर्ण से युक्त हकार होता है-

स्पष्टीकरण: वर्गों के पञ्चम वर्ण से युक्त हकार को "औरस्यः" कहते हैं। 

मुख्य बिन्दु:

  • संस्कृत वर्णमाला में पंच वर्गों द्वारा विभाजित कुल २५ वर्ण होते हैं।
  • संस्कृत वर्णमाला के इन्हीं २५ वर्णों को आठ उत्पत्ति स्थानों के रूप में भी विभाजित किया गया है:
  • कण्ठः
  • तालु
  • मूर्धा
  • दन्ताः
  • औष्ठः
  • जिह्वामूलम्
  • नाशिका
  • उरः
  • "उरः" उत्पत्ति स्थान के अंतर्गत पंचम वर्णों से युक्त हकार आते हैं। जिन्हें की औरस्यः स्थान जन्य वर्ण कहते हैं। यह हकार इस प्रकार हैं:
  • ह्ण
  • ह्न
  • ह्म
  • ह्यः
  • ह्र
  • ह्ल
  • ह्व

अतिरिक्त जानकारी:

  • संस्कृत वर्णमाला में पंच वर्गों में विभक्त २५ वर्णों(व्यंजनों) के अतिरिक्त कुछ व्यंजनों को अवर्गीय व्यंजन के रूप में भी विभक्त किया गया है।
  • अवर्गीय व्यंजन कुल आठ + ळ हैं। जिनमें से "ळ" व्यंजन केवल वेदों में ही आता है।

Question 59

'चत्वारि हस्तशतानि वीशदुत्तराण्यायतेन एतावन्त्येव विस्तीर्णेन पञ्चसप्ततिहस्तानवगाढेन भेदेन निःसृतसर्वतोयं मरुधन्वकल्पमतिभृशं दुर्दर्शनमासीत्'-

इति कस्माद् अभिलेखाद् वर्तते ?

  1. AOption (a)

    रुद्रदाम्नः गिरनारभिलेखात्

  2. BOption (b)

    यशोधर्मणः मन्दसौरभिलेखात्

  3. COption (c)

    समुद्रगुप्तस्य स्तम्भलेखात्

  4. DOption (d)

    खारवेलस्य हाथीगुम्भाभिलेखात्

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Correct answer

Answer: (a)A.

रुद्रदाम्नः गिरनारभिलेखात्

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद: "चत्वारि हस्तशतानि वीशदुत्तराण्यायतेन एतावन्त्येव विस्तीर्णेन पञ्चसप्ततिहस्तानवगाढेन भेदेन निःसृतसर्वतोयं मरुधन्वकल्पमतिभृशं दुर्दर्शनमासीत्" यह किस अभिलेख से है?

स्पष्टीकरण: "चत्वारि हस्तशतानि वीशदुत्तराण्यायतेन एतावन्त्येव विस्तीर्णेन पञ्चसप्ततिहस्तानवगाढेन भेदेन निःसृतसर्वतोयं मरुधन्वकल्पमतिभृशं दुर्दर्शनमासीत्" यह रुद्रदामन के गिरिनार अभिलेख से उद्धृत है। 

मुख्य बिन्दु:

  • रुद्रदामन का अभिलेख गुजरात के "जूनागढ़" जिले में गिरिनार पर्व��� पर प्राप्त हुआ था।
  • यह अभिलेख ब्राह्मी लिपि एवं संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण है जो की अभी तक का सबसे प्राचीन संस्कृत अभिलेख है।
  • इसकी तिथि ७२ ईस्वी शकसंवत मानी गयी है।
  • इस अभिलेख में रुद्रदामन के वंश, विजय, व्यक्तित्व और शासन पर प्रकाश डालते हुए सुदर्शन झील के "जीर्णोद्धार" का वर्णन किया गया है।
  • इस अभिलेख पर उद्धृत प्रस्तुत लेख "चत्वारि हस्तशतानि वीशदुत्तराण्यायतेन एतावन्त्येव विस्तीर्णेन पञ्चसप्ततिहस्तानवगाढेन भेदेन निःसृतसर्वतोयं मरुधन्वकल्पमतिभृशं दुर्दर्शनमासीत्" का अर्थ कुछ इस प्रकार है-
  • "४२० हाथ लम्बी एवं उतनी ही चौड़ी ७५ हाथ गहरी दरार पड़ने से समस्त जल निकल जाने से मरुभूमि के समान अत्यंत दुर्दर्शन"।

अतिरिक्त जानकारी:

  • रुद्रदामन महाक्षत्रप स्वामी चेष्टन का पौत्र था।
  • इनके पिता का नाम राजा क्षत्रप जयदामन था।

Question 60

पदपूर्वार्धवक्रतायाः भेदेषु अस्ति-

  1. AOption (a)

    कारकवैचित्र्यवक्रता

  2. BOption (b)

    क्रियावैचित्र्यवक्रता

  3. COption (c)

    पुरुषवैचित्र्यवक्रता

  4. DOption (d)

    संख्यावैचित्र्यवक्रता

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Correct answer

Answer: (b)B.

क्रियावैचित्र्यवक्रता

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प्रश्नानुवाद: "पदपूर्वार्धवक्रता" के भेदों में है?

स्पष्टीकरण: "पदपूर्वार्धवक्रता" के आठ भेदों में से एक "क्रियावैचित्र्यवक्रता" है। 

मुख्य बिन्दु:

  • काव्यात्म के रूप में काव्यशास्त्र के छः मतों में से एक "वक्रोक्ति सम्प्रदाय" है। जिसके जनक "आचार्य कुन्तक" थे।
  • आचार्य कुन्तक द्वारा "वक्रोक्ति" के छः भेद किये गए:
  • ​​वर्णविन्यासवक्रता
  • पदपूर्वार्धवक्रता
  • पदपरार्धवक्रता
  • वाक्यवक्रता
  • प्रकरणवक्रता
  • प्रबंधवक्रता
  • "पदपूर्वार्धवक्रता" का अर्थ  - पद के पूर्वार्द्ध अर्थात प्रकृति/प्रातिपदिक पर आधारित वक्रता। जिसके पुनः आचार्य द्वारा अष्ट भेद किये गए:
  • रूढिवैचित्र्यवक्रता
  • पर्यायवक्रता
  • उचारवक्रता
  • विशेषणवक्रता
  • संवृतिवक्रता
  • वृत्तिवक्रता
  • लिंगवैचित्र्यवक्रता
  • क्रियावैचित्र्यवक्रता
  • "क्रियावैचित्र्यवक्रता" से अभिप्राय "क्रिया की विचित्रता के कारण" होने वाली "वक्रता" |

अतिरिक्त जानकारी:

अन्य विकल्प:

  • कारक वक्रता, पुरुष वक्रता एवं संख्या वक्रता "पदपरार्धवक्रता" के भेद हैं।

Question 61

'वास्तव-औपम्य - अतिशय - श्लेषाः' इति रुपेण अलङ्काराणां चतुर्धा विभाजनं करोति-

  1. AOption (a)

    दण्डी

  2. BOption (b)

    रुद्रटः

  3. COption (c)

    वामनः

  4. DOption (d)

    हेमचन्द्रः

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Correct answer

Answer: (b)B.

रुद्रटः

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​प्रश्नानुवाद: "​वास्तव-औपम्य - अतिशय - श्लेषाः" इस प्रकार से अलंकारों के चार विभाजन करते है -

स्पष्टीकरण: आचार्य रुद्रट द्वारा अलंकारों का "वास्तव-औपम्य - अतिशय - श्लेष" के रूप में चार प्रकार से विभाजन किया गया। 

मुख्य बिन्दु:

  • काव्य के प्रमुख अंगों में से एक "अलंकार" है। अलंकार को काव्य की शोभा वर्धन के रूप में आचार्यों द्वारा माना गया है।
  • अलंकार के प्रकारों के रूप में विद्वानों द्वारा इनके निम्न प्रकार से विभाजन किये गए है। यथा - "शब्दालंकार, अर्थालंकार, रसालंकार, भावालंकार, मिश्रालंकार, उभयालंकार, संसृष्टि तथा संकर"।
  • इसी प्रकरण में विभिन्न आचार्यों द्वारा अलंकारों के भिन्न-भिन्न वर्गीकरण किये गए हैं।
  • परन्तु, सर्वप्रथम वैज्ञानिक रीती से अलंकारों के वर्गीकरण का श्रेय "आचार्य रुद्रट" को जाता है जिन्होंने अलंकारों को चार भागों में विभाजित किया:
  • ​वास्तव - वस्तु के स्वरूप का वर्णन जिन अलंकारों से किया वह वास्तव अलंकार कहलाते हैं। इसके अंतर्गत २३ अलंकारों का वर्णन किया गया है।
  • औपम्य - किसी वस्तु के स्वरूप की किसी अप्रस्तुत से तुलना करके स्पष्टतापूर्वक उसे उपस्थित करने पर "औपम्य मूलक" अलंकार कहा जाता है। ऐसे २१ अलंकार माने गए हैं।
  • अतिशय - अर्थ एवं धर्म के नियमों के विपर्यय में अतिशयमूलक अलंकार होते हैं। इस प्रकार के १२ अलंकार होते हैं।
  • श्लेष - अनेक अर्थों के अर्थ वाले पद से एक ही अर्थ का बोध कराने वाले श्लेष मूलक अलंकार कहलाते हैं। ऐसे विभाग वाले १० अलंकार माने गए हैं।

अतिरिक्त जानकारी:

  • अंततः सर्वसम्मति से अलंकारों को तीन प्रमुख भेदों में विभाजित किया गए हैं: 
  • शब्दालंकार
  • अर्थालंकार
  • उभयालंकार
  • अलंकारों की स्थिति "दो रूपों" में की गयी है: "रूप एवं मिश्रित" जिसमे से मिश्रित के दो भेद किये गए:
  • संकर
  • संसृष्टि

Question 62

'ओदनं भुञ्जानो विषं भुङ्कते' इत्यस्मिन् वाक्ये 'विषम' इति पदे द्वितीयाविभक्तिः केन सूत्रेण भवति?

  1. AOption (a)

    तथायुक्तं चानीप्सितम्

  2. BOption (b)

    कर्तुरीप्तिसततमं कर्म

  3. COption (c)

    कर्मणि द्वितीया

  4. DOption (d)

    कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया

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Correct answer

Answer: (c)C.

कर्मणि द्वितीया

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प्रश्नानुवाद: "ओदनं भुञ्जानो विषं भुङ्क्ते" इस वाक्य में "विषम्" इस पद में द्वितीय विभक्ति किस सूत्र द्वारा होती है?

स्पष्टीकरण: "तथायुक्तं चानीप्सितम्(९.४.२०)" इस सूत्र के द्वारा "ओदनं भुञ्जानो विषं भुङ्क्ते" इस वाक्य के "विषम्" पद में द्वितीय विभक्ति का विधान किया जाता है जो की कर्मणि द्वितीया इस सूत्र से होती है। 

मुख्य बिन्दु:

  • द्वितीया विभक्ति वाक्य में "कर्म" पद में होती है। एवं इसके विभिन्न प्रकार के नियम होते हैं।
  • इन विभिन्न नियमों के चलते विभिन्न प्रकार के भिन्न-भिन्न सूत्रों का विधान भी किया जाता है।
  • यथा प्रस्तुत उदाहरण "ओदनं भुञ्जानो विषं भुङ्क्ते" में "तथायुक्तं चानीप्सितम्"(९.४.२०) सूत्र का प्रयोग। सूत्र का अर्थ है कि "जब कोई पदार्थ कर्ता द्वारा अत्याधिक ईप्सित ना हो अथवा अत्याधिक चाहा ना हो तो उस पदार्थ में भी कर्म कारक होता है। तथा कर्म कारक होने से द्वितीया विभक्ति का प्रयोग भी होता है।"
  • यहाँ क्रिया के माध्यम से कर्ता का ईप्सिततम् कर्म माना जाता है। जहाँ पर कर्म के लिए क्रिया होती है वहाँ कर्म "ईप्सित" के साथ ही "अनीप्सित" भी कर्म हो जाता है।
  • "ओदनं भुञ्जानो विषं भुङ्क्ते" अर्थात 'भात खाता हुआ विष को भी खा जाता है।' यहाँ विष का सम्बन्ध भात खाने को "विष" ईप्सित नहीं है। अपितु "भुङ्क्ते" (खाने) क्रिया के साथ "विष" का अत्यधिक संबंध है।
  • इस लिए विष की कर्म संज्ञा तथा कर्मणि द्वितीया से द्वितीया विभक्ति होती है।

अतिरिक्त जानकारी: अन्य विकल्पों(सूत्रों) का प्रयोग:

  • कर्तुरीप्तिसततमं कर्म(१.४.४९) - यह अधिकार सूत्र है। जो कहता है कि: कर्ता अपनी क्रिया द्वारा जिस पदार्थ को सर्वाधिक प्राप्त करने की इच्छा रखता है। उसकी (कारक) की "कर्म" संज्ञा होती है।
  • कर्मणि द्वितीया(२.३.२) - अनुक्त कर्म में द्वितीया विभक्ति होती है।
  • कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया(२.३.८) - कर्मप्रवचनीय के योग में द्वितीया विभक्ति होती है। यह सूत्र "तृतीया" विभक्ति विधायक सूत्र "हैतौ" का अपवाद है। जो "तृतीया विभक्ति" को बाधित करता है।

Question 63

'सुधां क्षीरनिधि मथ्नाति' इत्यत्र अधोरेखाङ्कितपदे सूत्रेण द्वितीया विभक्तिः भवति?

  1. AOption (a)

    कर्मणि द्वितीया

  2. BOption (b)

    अकथित च

  3. COption (c)

    कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया

  4. DOption (d)

    उभयप्राप्तौ कर्मणि

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Correct answer

Answer: (a)A.

कर्मणि द्वितीया

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- 'सुधां क्षीरनिधि मथ्नाति' - यहाँ पर रेखाङ्कित पद पर किस सूत्र से द्वितीया विभक्ति हुआ है? 

स्पष्टीकरण - रेखाङ्कित पद में कर्मणि द्वितीया सूत्र से द्वितीया विभक्ति हुआ हैं। 

  • कर्मणि द्वितीया (2.3.2)-
  • कर्मणि द्वितीया इस सूत्र के अनुसार अनुक्त कर्म में द्वितीया विभक्ति होती है। द्वितीया विभक्ति किस अर्थ में होती है यह प्रतिपादित करने के लिये 'कर्मणि द्वितीया' यह सूत्र बना हैं। यह विधि सूत्र है।
  • अतः यह सूत्र द्वितीया का विधान करता है। इस सूत्र में दो पद हैं। कर्मणि यह सप्तमी एकवचनान्त पद है। द्वितीया यह प्रथमा एकवचनान्त पद है। अनभिहिते यह अधिकार यहां आ रहा है।
  • यहां कर्मणि इसका कर्म अर्थ में यह अर्थ है। द्वितीया इसका द्वितीया विभक्ति यह अर्थ है। अनभिहिते इसका अनुक्त यह अर्थ है। जिस अर्थ में कोई प्रत्ययादि होता है वह अर्थ उक्त होता है और जिस अर्थ में कोई प्रत्ययादि नहीं होता है, वह अर्थ अनुक्त होता है और यहां किसके द्वारा अनुक्त है ऐसी जिज्ञासा होने पर कहा जाता है- तिङ, कृत, तद्धित और समास के द्वारा अनुक्त।अनभिहित कर्म में द्वितीया होती है यह वाक्य योजना है।
  • यहां अनभिहिते इसका अर्थ अनुक्त यह है। कर्मणि इसका कर्म अर्थ में यह अर्थ है। द्वितीया इसका द्वितीया विभक्ति यह अर्थ है। अतः सूत्रार्थ होता है अनुक्त कर्म में द्वितीया विभक्ति होती है।
  • सुधां क्षीरनिधि मथ्नाति' इस उदाहरण में रेखाङ्कित पद हैं सुधा। यहाँपर सुधा शब्द में कर्मणि द्वितीया सूत्रानुसारे द्वितीया विभक्ति हुआ हैं।

  

**Important Point :**यहाँ पर ध्यान देने योग्य विषय है की यदि मन्थाति शब्द रेखाङ्कित होता तब अकथितञ्च सूत्रानुसारे द्वितीया विभक्ति होता (मथ् धातु), कर्मणि द्वितीया के अनुसार नहीं।अकथितं च  (1.4.51)

  • सूत्र व्याख्या यह संज्ञा सूत्र है। यह सूत्र कारक संज्ञा व कर्म संज्ञा करता है। इस सूत्र में दो पद हैं। अकथितम् यह प्रथमा एकवचनान्त पद है। च यह अव्यय पद है। कारकम् इसका अधिकार यहां आता है। अकचितम् इसका अविवक्षित यह अर्थ है।
  • अकथित कारक कर्मसंज्ञक होता है यह वाक्य योजना है। यहां अकथितम् इसका अविवक्षित यह अर्थ है। अविवक्षित का अर्थ प्रकरण वश यहां अपादानादि से विशेष रूप से अविवक्षित है। अपादानत्वादि से विशेष रूप से अविवक्षित होता हुआ जो दुहादि सोलह धातुओं व उनके वाच्य के मुख्य कर्म से सम्बद्ध होता है उनका कर्म संज्ञक होता है।  'अकथितं च' सूत्र से जिसकी कर्म संज्ञा होती है वह गौण कर्म कहलाता है। यह सोलह धातुएँ निम्नरुप है -

दुह्याच्पच्दण्डुरुधिप्रच्छिचिब्रूशासुजिमथमुषाम् ।

कर्मयुक् स्यादकथितं तथा स्यान्नीहृकृष्वहाम् ।।

उदाहरण- गोपः गां पयः दोग्धि । वामनः बलिं वसुधां याचते। विनीतः अविनीतं विनयं याचते । पाचकः तण्डुलान् ओदनं पचति । राजा गर्गान् शतं दण्डयति। गोपः व्रजं गाम् अवरुणद्धि। पथिकः माणवक पन्थानं पृच्छति। बालकः वृक्षं फलानि अवचिनोति । गुरुः शिष्यं धर्मं श्रुते । गुरुः शिष्यं धर्मः शास्ति । देवदत्तः यज्ञदत्तं शतं जयति देवः क्षीरनिधिं सुधां मध्नाति । चारः देवदत्तं शतं मुष्णाति । गोपः ग्रामम् अजां नयति । गोप: ग्रामम् अजां हरति। गोपः ग्रामम् अजां कृपति। गोपः ग्रामम् अजां वहति ।

कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया-

(2.3.8) -  कर्मप्रवचनीय संज्ञा उन पदों को दी जाती है, जो न तो किसी विशेष क्रिया के द्योतक हों, न किसी षष्ठीविभक्ति के सम्बन्ध के हों और न अन्य किसी क्रियापद को लक्षित करने वाले हो परन्तु विभक्ति विधायक हो जाते हैं।

उभयप्राप्तौकर्मणि-

(२।३।६६ ) जहाँ कर्ता धौर कर्म दोनों आये हों, वहाँ कृदन्त के योग में कर्म में ही षष्ठी विभक्ति होता हैं।

उदाहरण - आश्चर्यो गवां दोहोsगोपेन।

Question 64

अधोलिखितेषु कः ध्वनिः स्पर्शवर्गे नास्ति?

  1. AOption (a)

    प्

  2. BOption (b)

    स्

  3. COption (c)

    त्

  4. DOption (d)

    क्

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Correct answer

Answer: (b)B.

स्

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद - नीचे लिखे गये शब्द में से कौन सी ध्वनि स्पर्शवर्ग नहीं है? 

स्पष्टीकरण- यहाँ पर स् वर्ग केवल स्पर्शवर्ग नही है।

स्पर्शवर्ग - जिनव्यञ्जनों के उच्चारण में कण्ठ से लेकर ओष्ठपर्यन्त सम्बन्धित स्थानों का स्पर्श करती है,उन्हें स्पर्शवर्ग कहते है।  कण्ठ से लेकर ओष्ठपर्यन्त स्पर्श करने वाला व्यञ्जन वर्ग है कवर���ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, तथा पवर्ग।

  • कवर्ग - क्, ख्,ग्, घ्,ङ्।
  • च वर्ग - च्,छ्,ज्,झ्,ञ्
  • टवर्ग - ट्,ठ्,ड्,ढ्,ण्
  • तवर्ग- त्,थ्,द्,ध,न्
  • पवर्ग- प्,फ्,ब,भ्,म्

Question 65

अधोलिखितेषु ध्वनिपरिवर्तनस्य कारणं नास्ति-

  1. AOption (a)

    भावावेशः

  2. BOption (b)

    शीघ्रभाषणम्

  3. COption (c)

    एकान्तवार्ता

  4. DOption (d)

    कृत्रिमता

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Correct answer

Answer: (c)C.

एकान्तवार्ता

Why this answer is correct

भाषानुवाद-निम्नलिखित में से ध्वनि परिवर्तन का करण नहीं हैं?

स्पष्टीकरण- एकांतवार्ता ध्वनि परिवर्तन का कारण नहीं हैं, अतः विकल्प (3) सही है। 

Important Points

ध्वनि परिवर्तन- 

भाषा में ध्वनियों का परिवर्तन होने के कुछ कारण अवश्य रहते हैं क्योंकि कोई भी कार्य बिना किसी कारण के नहीं होता है। भाषा क्योंकि अनुकरण से सीखी जाती है अतः अनुकरण की अपूर्णता से ध्वनि परिवर्तन हो सकता है। संसार में सभी मनुष्यों की अनुकरण करने की शक्ति बुद्धि एक समान नहीं है साथ ही सभी के उच्चारण अवयव भी एक जैसे नहीं है यही कारण है कि उच्चरित ध्वनियों में अन्तर उपस्थित हो जाता है।

Key Points

ध्वनि-परिवर्तन के कारणों को हम दो वर्गों में रख सकते हैं:-

(क) आभ्यन्तर कारण- आभ्यन्तर कारण वे हैं जो व्यक्ति के भीतर निहित रहते हैं,ध्वनि-परिवर्तन के संबंध में वक्ता और श्रोता से संबंधित कारणों को आभ्यंतर या आंतरिक कारण कहते हैं। इस वर्ग के कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार हैं-

  • मुखसुख- इसे प्रयत्नलाघव भी कहते हैं। यह कारण उच्चारण सुविधा से जुड़ा है। मनुष्य अल्प श्रम से अधिक से अधिक कार्य संपन्न करना चाहता है। इसी प्रवृत्ति के अनुसार मनुष्य कम से कम उच्चारण से स्पष्ट तथा प्रभावशाली अभिव्यक्ति करना चाहता है। ऐसे में उच्चारण-सुविध के अनुसार अनेक क्लिष्ट ध्वनियाँ सरल रूप में परिवर्तित हो जाती है। इस प्रयत्न में अनेक प्रकार के ध्वनि-परिवर्तन होते हैं। 
  • मुख-सुख ध्वनि-परिवर्तन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारण है। इसमें कभी आगम होता है, तो कभी लोप। समीकरण विषमीकरण, घोषीकरण तथा अघोषीकरण आदि परिवर्तन प्राय: मुख-मुख के कारण होते हैं।
  • भावावेष- प्रेम, क्रोध आदि संदर्भों के भावावेश में उच्चरित शब्दों की ध्वनियों में परिवर्तन हो जाता हैं प्राय: देखा गया है कि प्रेम और क्रोध में सीध नाम न लेकर उसे तोड़-मरोड़ कर प्रयोग किया जाता हैयथा-रामेश्वर > रामे, रामसुरा, रामसर या राम श्याम > शामू, शामुआ, शमुआँ, शामों।i
  • अशिक्षा- अशिक्षा या अज्ञानता के कारण शब्दों का उचित ज्ञान नहीं होता, इससे उनकी ध्वनियों में परिवर्तन हो जाता है। ऐसे व्यक्ति जब शब्दों का शुद्ध उच्चारण नहीं कर पाते, तब भी ध्वनि-परिवर्तन हो जाता है। इस प्रकार से होने वाले परिवर्तन है-गार्ड > गारद, कंपाउंडर > कंपोडर, टाइम > टेम।
  • शीघ्रभाषणम्- शीघ्रता से बोलने के कारण भी शब्दों की ध्वनियों में परिवर्तन होता है। ऐसे में प्राय: शब्द की मध्य ध्वनियाँ लुप्त हो जाया करती है। इस प्रक्रिया में शब्दों की लम्बाबाई भी कम हो जाती है यथा-उपामयाय > ओझा > झा, भ्रातृजाया > भौजी, तब ही > तभी, कब ही > कभी। शीघ्र उच्चारण में कभी-कभी कुछ का कुछ हो जाता है। यथा-दाल-चावल > दावल चाल, दाल-भात > दात-भाल आदि।
  • बलाघात- जब बाद की किसी विशेष ध्वनि पर बल दिया जाता है, तो श्वास का अधिकांश भाग उसी के उच्चारण में लगता है। इसके परिणामस्वरूप शेष ध्वनियाँ निर्बल हो जाती हैं। ऐसे में कुछ ध्वनियाँ लुप्त हो सकती हैं यथा-अभ्यंतर > भीतर, निम्ब > नीम, बिल्ब > बेल।
  • कलागत स्वातंत्र्य(कृत्रिमता)- काव्य-रचना में कवि शब्दों को तोड़-मरोड़ कर प्रयोग करता है क्योंकि उसे छंद के नियमों का पालन करना पड़ता है। जिसके कारण ध्वनि-परिवर्तन होता है यथा-सुग्रीव > सुग्रीवा, चरण > चरन, प्रमाद > प्रमादा, रघुराज > रघुरार्इ आदि।
  • अनुकरण की अपूर्णता- भाषा अनुकरण के आधार से सीखी जाती है। जब किन्हीं कारणों से अनुकरण अपूर्ण होता है। तब ध्वनि में परिवर्तन हो जाता है यथा-कोर्ट साहब > कोट साहब, कानूनगो > कानी गोह, बंदूक, > दंबूक, लिफाफा। अनुकरण की अपूर्णता प्रमाद, आलस्य या लड़कपन के कारण होती है। बच्चों के उच्चारण में ऐसे परिवर्तन प्राय: देखने को मिलते हैं यथा-अमरूद > अरमूत, जलेबी > जबेली।
  • सहजीकरण- दूसरी भाषा के कठिन शब्दों को सरल बनाने के लिए यदा-कदा उनकी ध्वनियों में परिवर्तन कर देते हैं यथा-टेकनीक + तकनीक, ट्रेजडी > त्रासदी, > ऐकडमी > अकादमी। ऐसे परिवर्तन से गृहीत (विदेशी) शब्दों में अपनी भाषा की सहजता आ जाती है।
  • लिपि-दोष- लिपि की अपूर्णता के कारण भी शब्द का शुद्ध उच्चारण कठिन हो जाता है। ऐसे में ध्वनि-परिवर्तन होना स्वाभाविक ही है। अंग्रेजी की लिपि-रोमन के प्रभाव से गुप्त का गुप्ता, मिश्र का मिश्रा, राम का रामा, कृष्ण का कृष्णा उच्चारण हो गया है, क्योंकि अंग्रेजी में हृस्व और दीर्घ के भिन्न रूप नहीं है। किसी उच्चारण को आसान बनाने के लिए भी ध्वनि में परिवर्तन किया जाता है यथा-एकेडमी के लिए अकादमी, टैकनीक के लिए तकनीक।

(ख) ध्वनि परिवर्तन के बाह्य कारण- ये कारण बाहर से ध्वनि को प्रभावित करते है। ध्वनि-परिवर्तन के बाह्य कारण मुख्यत: हैं-

  1. व्यक्तिगत भिन्नता- प्रत्येक व्यक्ति की वागेंद्रिय तथा श्रवणेंद्रिय अन्य व्यक्ति से भिन्न होती हैं। एक व्यक्ति किसी ध्वनि को जिस प्रकार बोलता है, दूसरा व्यक्ति पूर्ण प्रयत्न करने पर भी वैसा नहीं बोल सकता है। वाग्यंत्र की भिन्नता के ही कारण किन्हीं दो व्यक्तियों के उच्चारण में पूर्ण समानता नहीं हो सकती है। यह भिन्नता कभी सामान्य होती है, तो कभी रेखांकन योग्य होती है यथा-अंग्रेज ‘तुम’ को टुम कहता है। हम बच्चे के मुख से रोटी को ‘लोटी’ और हाथी को ‘आती’ सुनते ही हैं। इस प्रकार वागद्रिय भिन्नता और श्रवण की अपूर्णता से अनेक ध्वनियों ��ें परिवर्तन हो जाता है।
  2. भौगोलिक कारण- ध्वनि-उच्चारण पर भौगोलिक परिस्थिति का विशेष प्रभाव पड़ता है। एक भाषा की विभिन्न ध्वनियों का उच्चारण भिन्न भौगोलिक वातावरण के दूसरे भाषा-भाषियों के द्वारा संभव नहीं है। शीत-प्रधन वातावरण के व्यक्ति प्राय: बातचीत में मुख सीमित खोलते हैं। इस कारण ऐसे वातावरण के व्यक्ति दंत्य ध्वनियों का स्पष्ट उच्चारण नहीं कर पाते हैं। वे प्रायः त, थ, द को क्रमश: ट, ठ, ड बोलते हैं। आवागमन के साधन से रहित या ऐसे शिथिल साधन वाले भौगोलिक भाग की भाषाओं में ध्वनि-परिवर्तन अत्यंत मंद होता है।, जबकि उर्वर, समतल, आवागमन से मुक्त भू-भाग की भाषाओं की ध्वनियों में सतत-तीव्र गति से परिवर्तन होता रहता है।
  3. सामाजिक परिस्थिति- सामाजिक उन्नति तथा अवनति का भाषा पर विशेष प्रभाव पड़ता हैं सामाजिक उन्नति पर भाषा का शुद्ध रूप प्रयुक्त होता है, तो अवनति पर उसके परिवर्तित रूप का ही अधिक प्रयोग होना स्वाभाविक है। इस प्रकार सामाजिक स्थिति के कारण शब्दों में ध्वनि-परिवर्तन की प्रक्रिया चलती रहती है। यजमान > जजमान, फरोहित > उपरेहित, वियरिग > बैंरग, वाराणसी > बनारस।
  4. अन्य भाषाओं का प्रभाव- एक भाषा-क्षेत्र में जब किसी अन्य भाषा का प्रयोग होने लगता है, तो उनकी ध्वनियाँ वहाँ की भाषा को प्रभावित करती हैं। मुसलमानों के भारत आगमन के पश्चात अरबी तथा फारसी भाषा का यहाँ प्रयोग होने लगा है। अरबी-फारसी के प्रभाव से हिंदी में क, ख़्, ग़, ज़्, फ आदि ध्वनियाँ बोली तथा लिखी जाने लगी हैं। अंग्रेजी के प्रभाव से हिंदी में ऑ ध्वनि का प्रयोग होने लग गया हैयथा-डॉक्टर, बॉल आदि।

Question 66

सिद्धान्ते 'वैश्वदेवेन यजेत' इत्यत्र 'वैश्वदेव पदं यागनामधेयम् अस्ति-

  1. AOption (a)

    उत्पत्तिशिष्टगुणबलीयस्त्वात्

  2. BOption (b)

    तत्प्रख्यशास्त्रात्

  3. COption (c)

    तद्व्यपदेशात्

  4. DOption (d)

    वाक्यभेदभयात्

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Correct answer

Answer: (b)B.

तत्प्रख्यशास्त्रात्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : सिद्धांत में 'वैश्वदेवेन यजेत' इस वाक्य में वैश्वदेव यह पद याग का नामधेय किस कारण से है?

उत्तर- तत्प्रख्यशास्त्रात्

नामधेय निमित्त :

उत्पत्तिशिष्टगुणबलीयस्त्वमपि पञ्चमं नामधेयनिमित्तमिति केचित्। यथा ‘वैश्वदेवेन यजेते‘त्यादौ। अत्रोत्पत्तिशिष्टाग्नयादीनां बलीयस्त्वाद्वैश्वदेवशब्दस्य विश्वदेवदेवताभिधायकत्वं संभवतीति कर्मनामधेयत्वम्। वस्तुतस्तु तत्प्रख्यशास्त्रादेवास्य कर्मनामधेयत्वं प्रकृतयागे विश्वदेवरूपगुणसंप्रतिपन्न- शास्त्रस्यार्थवादरूपस्यैव सत्त्वात्। यद्विश्वेदेवाः समयजन्त तद्वैश्वदेवस्य वैश्वदेवत्वम्' इति। (अर्थसंग्रह)

व्याख्या -

  • कुछ लोगों ने नामधेय होने में पाँचवें निमित्त को भी माना है। इस निमित्त को 'उत्पत्तिगुणबलीयस्त्व' कहते हैं किन्तु सिद्धान्त इसे अतिरिक्त निमित्त नहीं मानता हैं। इसको स्पष्ट करते हुए ग्रंथकार कहते है कि कुछ लोगों के मत में उत्पत्तिविधि से विहित गुण के अपेक्षाकृत अधिक बलवान् होने से यह भी नामधेयों में पञ्चम निमित्त हैं।
  • यथा 'वैश्वदेवेन यजेत' इस विधि वाक्य में 'वैश्वदेव' का देवतावाचक होना सम्भव नहीं है, क्योंकि उत्पत्तिविधि में विहित अग्नि आदि देवता प्रबल होने के कारण। अतः 'वैश्वदेव' पद याग का नामधेय है।
  • किन्तु सैद्धान्तिक मत यह है कि यहाँ भी तत्प्रख्यशास्त्ररूप कारण से 'वैश्वदेव' याग विशेष का नाम होता है, किसी अन्य पाँचवें निमित्त से नहीं।
  • प्रकृत याग में विश्वदेव रूप गुण का प्रकाशक अर्थवाद शास्त्र इस प्रकार है -
  • 'यद् विश्वेदेवाः समयजन्त तद् वैश्वदेवस्य वैश्वदेवत्वम्, अतः 'वैश्वदेवेन यजेत' में 'वैश्वदेव' पद याग का नामधेय है।

 

अतः स्पष्ट है, की "तत्प्रख्यशास्त्रात्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 67

यथोचितं मेलनं कुरुत

सूची Iसूची II
A.प्रत्यक्षप्रमाणम्I.अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिः
B.अनुमानम्II.प्रख्याप्रवृत्तिस्थितिशीलम्
C.चित्तम्III.विशेषावधारणप्रधाना वृत्तिः
D.निद्राIV.सामान्यावधारणप्रधाना वृत्तिः
<br>

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) - (IV), (B) - (III), (C) - (I), (D) - (II)

  2. BOption (b)

    (A) - (II), (B) - (I), (C) - (III), (D) - (IV)

  3. COption (c)

    (A) - (III), (B) - (IV), (C) - (II), (D) - (I)

  4. DOption (d)

    (A) - (I), (B) - (II), (C) - (IV), (D) - (III)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(A) - (III), (B) - (IV), (C) - (II), (D) - (I)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यथोचित मेलन कीजिए।

निद्रा वृत्ति : 

  • अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा। (योगसूत्र, १.१०)
  • सोकर जागने पर नींद की स्मृति आने से निद्रा को को भी महर्षि पतंजलि ने वृत्ति कहा है। व्यास भाष्य में पूछा गया कि निद्रा कैसे एक विशेष ज्ञान है? तो वेदव्यास जी कहते हैं कि- मुझे अच्छी नींद आई, मेरा मन प्रसन्न और हल्का सा महसूस हो रहा है अथवा मेरे अंग भारी लग रहे हैं, तमस और चंचलता मन मे छा रही है, पूरा शरीर अलसाया है, रात्रि को नींद अच्छे से नहीं आई, इस प्रकार का ज्ञान निद्रा से जागने के बाद बिना अनुभव के नहीं हो सकता।
  • इसलिए निद्रा को एक प्रकार की वृत्ति कहा है।
  • अक्लिष्ट और क्लिष्ट के भेद से यह वृत्ति भी वरण एवं निराकरण योग्य है।
  • शास्त्रों में चेतना के अनुसार मनुष्य की चार अवस्थाएं होती हैं|
  • जाग्रत
  • स्वप्न
  • सुषुप्ति
  • एवं तुरीय
  • जाग्रत अवस्था: जाग्रत वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति पूरी तरह जागा हुआ होकर अपने सभी कर्म विवेकपूर्वक सम्पन्न करता है, बोधपूर्वक करता है। भला और बुरे में भेद करके जीता है।
  • स्वप्नावस्था: स्वप्नावस्था वह है जिसमें व्यक्ति कुछ कुछ जगा हुआ और कुछ सोया हुआ, जाग्रत अवस्था में किये घे कर्मो एवं उन कर्मो से निर्मित संस्कारो के वशीभूत होकर विभिन्न विषयों को अनुभव करता है और स्वप्न देखता है।
  • सुषुप्ति: जब न तो व्यक्ति जगा हुआ होता है और न ही सोया हुआ वह तमोगुण आश्रित अवस्था सुषुप्ति की होती है। इस अवस्था में रजस गुण का अधिकतम अभाव होता है और सत्त्व का एक सहज प्रवाह होता है जिसके कारण अचंचल निद्रा, अविचलित निद्रा के प्रभाव से व्यक्ति कहता है कि आज मैं सुखपूर्वक सोया।

प्रमाण :

  • प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि। (योगसूत्र, १.७)
  • योगदर्शन में प्रमाण के तीन प्रकार कहे गए हैं।
  • प्रत्यक्ष
  • अनुमान
  • आगम (शब्द प्रमाण)
  • जिस साधन या उपाय के माध्यम से किसी भी वस्तु के स्वरूप, एवं स्थिति की स्पष्टता का ठीक ठीक ज्ञान होता है उसे प्रमाण कहते हैं। महर्षि पतंजलि ने 5 वृत्तियों में सबसे पहले प्रमाण को ही वृत्ति कहा है। ये पांच वृत्तियों का एक क्रम है।
  • प्रमाण
  • विपर्यय
  • विकल्प
  • निद्रा
  • स्मृति
  • प्रत्यक्षप्रमाणम् यथार्थ ज्ञान (प्रमाण-प्रत्यक्ष,अनुमान और आगम) से प्रांरम्भ होकर गलत, मिथ्या या उल्टा ज्ञान (विपर्यय) फिर केवल आभासी ज्ञान, बनावटी ज्ञान जो केवल शब्दों तक सीमित है वास्तव में उसका कोई अस्तित्व नहीं है (विकल्प) और सब प्रकार के ज्ञान जो जाग्रत एवं स्वप्न में होते हैं उस ज्ञान का अभाव होने पर भी जो एक नई अनुभूति होती है (निद्रा) और अंत में पूर्व में अनुभव किये गए विषयों (देखे गए, सुने गए, समझे गए, स्वाद लिए गए, बोले गए, किये गए, स्पर्श किये गए एवं गंध महसूस किए गए) का फिर से स्मरण (स्मृति) यह वृत्ति का एक विशेष क्रम है जिसमें से साधक को दुख देने वाली (क्लिष्ट) वृत्तियों को रोकने का निरंतर अभ्यास एवं वैराग्यपूर्वक विशेष प्रयत्न करना ही होता है।

 

महत्वपूर्ण परिभाषाएँँ :

  • विशेषावधारणप्रधाना वृत्तिः प्रत्यक्षप्रमाणम् - विशेष ज्ञान धारण करने की जो वृत्ति है, उसे प्रत्यक्ष प्रमाण कहते हैंं।
  • सामान्यावधारणप्रधाना वृत्तिः अनुमानम् - सामान्य ज्ञान धारण करने की जो वृत्ति है, उसे प्रत्यक्ष प्रमाण कहते हैंं।
  • प्रख्याप्रवृत्तिस्थितिशीलम् चित्तम् - चंचल वृत्ति को स्थिर करने का शील हि चित्त है।
  • अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिः निद्रा - सब प्रकार के ज्ञान जो जाग्रत एवं स्वप्न में होते हैं उस ज्ञान का अभाव होने पर भी जो एक नई अनुभूति होती है, उसे निद्रा कहते हैंं।

​

​​अतः स्पष्ट है, की "(A) - (III), (B) - (IV), (C) - (II), (D) - (I)" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 68

'वितर्कितः पुरा बुद्धया कचिदर्थे निवेशितः' इत्यत्र पुराबुद्धया वितर्कितः कः?

  1. AOption (a)

    ध्वनिरुपः शब्दः

  2. BOption (b)

    स्फोटरुपः बौद्धशब्दः

  3. COption (c)

    बाह्योऽर्थः

  4. DOption (d)

    पूर्वोक्तेषु न कोऽपि

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Correct answer

Answer: (b)B.

स्फोटरुपः बौद्धशब्दः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'वितर्कितः पुरा बुद्धया कचिदर्थे निवेशितः' यहाँँ पर पहली बुद्धि से वितर्कित कौन होता है?

स्पष्टीकरण - 

वितर्कितः पुरा वुद्ध्या कचिदर्थे निवेशितः।

कारणेभ्यो विवृत्तेन ध्वनिना सोऽनुगृह्यते॥ (वाक्यपदीय, ब्रह्मकांड, ४७)

  • उच्चारणके पहले ही बुद्धि (अन्तःकरणकी वृत्ति) से शब्द और अर्थ में अभेदाध्यास कर का किसी एक अर्थ में विचारा गया और उसी अर्थसे तादात्म्य प्राप्त शब्द (स्फोट) फिर बोध कराने की इच्छा से स्थान और प्रयत्नोंके द्वारा स्वयं अविकारी होकर विकृत धर्मोंं में भासमान होता है।
  • तात्पर्य यह है कि इस प्रकार बौद्ध शब्द के ज्ञान के लिए ध्वनि उत्पन्न हुई, बौद्ध शब्दका ध्वनि निमित्त है और बौद्ध-शब्द ध्वनिका प्रकाशक है।

​

अतः स्पष्ट है, की "स्फोटरुपः बौद्धशब्दः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 69

यथोचितं मेलनं कुरुत

सूची Iसूची II
A.नागेशःI.विवरणपञ्जिका
B.कैय्यटःII.प्रदीपः
C.जिनेन्द्रबुद्धिःIII.लघुशब्देन्दुशेखरः
D.पतञ्जलिःIV.इष्टिः
<br>

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) - (III), (B) - (IV), (C) - (II), (D) - (I)

  2. BOption (b)

    (A) - (I), (B) - (III), (C) - (II), (D) - (IV)

  3. COption (c)

    (A) - (III), (B) - (II), (C) - (I), (D) - (IV)

  4. DOption (d)

    (A) - (IV), (B) - (I), (C) - (II), (D) - (III)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(A) - (III), (B) - (II), (C) - (I), (D) - (IV)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यथोचित मेलन कीजिए।

कैय्यट - प्रदीप टीका :

  • कैयट पतंजलि के व्याकरण भाष्य की 'प्रदीप' नामक टीका के रचयिता है।
  • उनके पिता का नाम जैयटोपाध्याय था (महामाष्यार्णवाऽवारपारीणंविवृतिप्लवम्। यथागमं विधास्येहं कैयटो जैयटात्मज)। अनुमान है कि वे कश्मीर निवासी थे। पीटर्सन ने कश्मीर की रिपोर्ट में कैयट (और उव्वट) को प्रकाशक ऽर मम्मट का भाई और जैयट का पुत्र कहा है। काव्यप्रकाश की 'सुधासागर' नामक टीका में १८वीं शती के भीमसेन ने भी कैयट और औवट शुक्लयजुर्वेद को सम्मट के भाष्यकार को मम्मट का अनुज और शिष्य बताया है। पर यजुर्वेदभाष्य पुष्पिका में औवट (या उव्वट) के पिता का नाम वज्रट कहा गया है।
  • काश्मीरी ब्राह्मणपंडित��ं के बीच प्रचलित अनुश्रुति के अनुसार कैयट पामपुर (या येच) गाँव के निवासी थे। महाभाष्यांत पाणिनि व्याकरण को वे कंठस्थ ही पढ़ाया करते थे। आर्थिक स्थिति दयनीय होने के कारण उदरपोषण के लिये उन्हें कृषि आदि शरीरश्रम करना पड़ता था। एक बार दक्षिण देश से कश्मीर आए हुए पंडित कृष्ण भट्ट ने कश्मीरराज से मिलकर तथा अन्य प्रयत्नों द्वारा कैयट के लिए एक गाँव का शासन और धनधान्य संग्रह किया और उसे लेकर जब वे उसे समर्पित करने उनके यहाँ पहुँचे तो उन्होने भिक्षा दान ग्रहण करना अस्वीकार कर दिया। वे कश्मीर से पैदल काशी आए और शास्त्रार्थ मे अनेक पंडितों को हराया। वहीं प्रदीप की रचना हुई। इस टीकाग्रंथ के संबंध में उन्होने लिखा है कि उसका आधार भर्तृहरि (वाक्यपदीयकार) की भाष्यटीका है जो अब पूर्णरूप से अप्राप्य है)। प्रदीप में स्थान स्थान पर पतंजलि और भर्तृहरि के स्फोटवाद का अच्छा दार्शनिक विवेचन हुआ है।

 

नागेश - लघुशब्देन्दुशेखर :

  • नागेश भट्ट या नागोजि भट्ट (1730–1810) संस्कृत के नव्य वैयाकरणों में सर्वश्रेष्ठ है। इनकी रचनाएँ आज भी भारत के कोने-कोने में पढ़ाई जाती हैं। ये महाराष्ट्र के ब्राह्मण थे। ये भट्टोजि दीक्षित के पौत्र थे। इनके पिता का नाम शिव भट्ट और माता का नाम सतीदेवी था। पाणिनीय परम्‍परा में वरदराज के बाद इन्‍हीं का नाम लिया जाता है। इन्‍होंने व्‍याकरण पर ही प्रायः 10 से अधिक ग्रन्‍थ लिखे। व्‍याकरण के साथ ही साहित्य, धर्मशास्त्र, दर्शन, योग तथा ज्योतिष विषयों में भी इनकी अबाध गति थी।
  • नागेश दार्शनिक वैयाकरण हैं। मौलिक रचनाओं के साथ-साथ इनकी प्रौढ़ टीका रचनाएँ भी पाई जाती हैं। इनके सभी ग्रन्थ छप गए हैं और व्यापक रूप से पढ़े-पढ़ाए जाते हैं। ग्रंथों में नई-नई उद्भावनाएँ की गई हैं। नवीन तर्क एवं उक्तियों का प्रयोग है, परन्तु महाभाष्यकार की सीमा में सब समाहित हो गया है।
  • नागेश के नाम पर रसमञ्जरी टीका, लघुशब्देन्दुशेखर, बृहच्छब्देन्दुशेखर, परिभाषेन्दुशेखर, मञ्जूषा, लघुमञ्जूषा, परमलघुमञ्जूषा, स्फोटवाद, महाभाष्य-प्रत्याख्यान-संग्रह और पतंजलिकृत महाभाष्य पर उद्योत नामक टीकाग्रंथ पाए जाते हैं। इन ग्रंथों की छाया में प्रचुरग्रंथों की सृष्टि हुई है। टीका और टिप्पणियों की भरमार है।
  • वैयाकरण-सिद्धांत-मंजूषा नागेश का व्याकरणदर्शनग्रन्थ है। इसका निर्माण उद्योत और परिभाषेन्दुशेखर से पूर्व हुआ है। मञ्जूषा, लघुमञ्जूषा, परमलघुमञ्जूषा ये तीनों ही व्‍याकरण के दार्शनिक ग्रन्‍थ हैं।
  • परिभाषेन्‍दुशेखर, पाणिनीयव्‍याकरण का व्‍याख्‍याग्रन्‍थ है। इसका अध्ययन व्यापार बहुत बड़ा है। अतएव इस यशस्वी ग्रन्थ पर अनेक टीकाएँ उपलब्ध हैं। लघुशब्देन्दुशेखर और बृहच्छब्देन्दुशेखर भट्टोजि दीक्षित कृत प्रौढमनोरमा की क्रमशः व्‍याख्‍या एवं विस्‍तृत व्‍याख्‍या हैं।

 

पतंजली - इष्टि वाक्य

  • महर्षि पाणिनि के लगभग दो सौ साल बाद कात्यायन महर्षि ने लगभग बारह सौ सूत्रों पर वार्तिक लिखे। पाणिनि पर यही सबसे पुरानी टीका आज उपलब्ध है।
  • इन वार्तिकों में सूत्रार्थ की चर्चा, कहीं मंडन और कभी-कभी खंडन भी किया गया है। फिर छ: सौ साल के बाद पतंजलि ने पाणिनि के सूत्रों का विवेचन करने वाली एक विस्तृत टीका लिखी। यही टीका 'व्याकरण महाभाष्य' के नाम से प्रसिद्ध है। जिन सूत्रों पर कात्यायन के वार्तिक हैं, उन सबका और जिन पर वार्तिक नहीं हैं, ऐसे लगभग 400 सूत्रों का इसमें विवेचन है। इसमें उन्होंने पाणिनीय सूत्रों तथा उन पर लिखे गये वार्त्तिकों का विवेचन किया, और साथ ही साथ अपने इष्टि-वाक्यों का भी समावेश किया।
  • महाभाष्य में 86 आहिनक हैं। 'आहिनक' शब्द का अर्थ है एक दिन में अधीत अंश। पातञ्जल-महाभाष्य के 83 आहिनक विद्यार्थियों को पढ़ाए गये 86 दिन के पाठ हैं। महर्षि पतञ्जलि ने अपने समय के समस्त संस्कृत-वाङ्मय का आलोडन किया था, अत: उनसे व्याकरण का कोई भी विषय अछूता नहीं रहा। उनकी निरूपण-पद्धति सर्वथा मौलिक और नैयायिकों तर्कशैली पर आधारित है।
  • पतञ्जलि के हाथों पाणिनीय शास्त्र का इतना गहन और व्यापक विस्तार हुआ कि अन्य व्याकरणों की परम्परा लगभग समाप्त हो गई और चारों ओर पाणिनीय व्याकरण की ही पताका फहराने लगी। अष्टधयायी के 1689 सूत्रों पर पतञ्जलि ने भाष्य लिखा। इसमें उन्होंने कात्यायन एवं अन्य आचार्यों के वार्त्तिकों की भी समीक्षा की है, साथ ही चार सौ से अधिक ऐसे सूत्रों पर भाष्य लिखा, जिन पर वार्त्तिक उपलब्ध नहीं थे। पतञ्जलि ने कात्यायन के अनेक आक्षेपों से पाणिनि की रक्षा की जहाँ उन्हें वार्त्तिककात का मत ठीक दिखाई दिया वहाँ उसे स्वीकार भी कर लिया। यही इष्टि वाक्योंं का स्वरूप है।

​ 

जिनेन्द्रबुद्धि - विवरणपंचिका :

  • ​कात्यायन के वार्तिकों पर पतंजलि (ई. पू. 150) ने महाभाष्य की रचना की। महाभाष्य आकर ग्रंथ है। इसमें प्राय: सभी दार्शनिक वादों के बीज हैं। इसकी शैली अनुपम है। इसपर अनेक टीकाएँ मिलती हैं जिनमें भर्तृहरि की त्रिपदी, कैयट का प्रदीप और शेषनारायण का "सूक्तिरत्नाकर" प्रसिद्ध हैं।
  • सूत्रों के अर्थ, उदाहरण आदि समझाने के लिए कई वृत्तिग्रंथ लिखे गए थे जिनमें काशिका वृत्ति (छठी शताब्दी) महत्वपूर्ण है।
  • जयादित्य और वामन नाम के आचार्यों की यह एक रमणीय कृति है। इसपर जिनेंद्रबुद्धि (लगभग 650 ई.) की काशिकाविवरणपंजिका (न्यास) और हरदत्त (ई. 1200) की पदमंजरी उत्तम टीकाएँ हैं। काशिका की पद्धति पर लिखे गए ग्रंथों में भागवृत्ति (अनुपलब्ध), पुरुषोत्तमदेव (ग्यारहवीं शताब्दी) की भाषावृत्ति और भट्टोजि दीक्षित (ई. 1600) का शब्दकौस्तुभ मुख्य हैं।

 

​अतः स्पष्ट है, की "(A) - (III), (B) - (II), (C) - (I), (D) - (IV)" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 70

'रिटोरिक' इति ग्रन्थस्य कर्त्ता कः?

  1. AOption (a)

    प्लेटोमहोदयः

  2. BOption (b)

    अरस्तुमहोदयः

  3. COption (c)

    बेनेदितो क्रोचेमहोदयः

  4. DOption (d)

    होरेसमहोदयः

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Correct answer

Answer: (b)B.

अरस्तुमहोदयः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद: "रिटोरिक" यह ग्रन्थ का कर्ता कौन है?

स्पष्टीकरण: "रिटोरिक" नामक ग्रन्थ की रचना का श्रेय यूनानी विद्वान "अरस्तु" को जाता है। 

मुख्य बिन्दु:

  • यूनानी विद्वान "प्लेटो" के शिष्य रहे "अरस्तु" का नाम पाश्चात्य विद्वानों एवं विचारकों में बड़े ही सम्मान से लिया जाता है।
  • अरस्तु के काल के रूप में विद्वान उन्हें ३८४/७४ - ३२२ ईसा पूर्व के मानते हैं। अरस्तु को राजनैतिक विज्ञान का जनक भी माना जाता है।
  • अपने जीवन काल में अरस्तु के द्वारा गणित को छोड़ "प्राकृतिक विज्ञान एवं मानव विज्ञान" के लगभग हर क्षेत्र पर कार्य करते हुए कुल ४०० ग्रंथों की रचना की थी।
  • परन्तु, काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ के रूप में "अरस्तु" द्वारा केवल दो ही रचनाएँ प्राप्त होती हैं जिन्हे सौंदर्यशास्त्रीय भाग में रखा गया है:
  • भाषण शास्त्र - "रिटोरिक"
  • काव्यशास्त्र - परिपोइटिकेस (जिसे पोएटिक्स भी कहा जाता है।)

​ 

अतिरिक्त जानकारी:

  • ​ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा अरस्तु की ४०० रचनाओं को १२ खण्डों में प्रकाशित किया।
  • अरस्तु की सभी कृतियों को ४ चार भागों में विभक्त किया गया है:
  • ​​तार्किक
  • वैज्ञानिक
  • सौंदर्यशास्त्रीय
  • दार्शनिक

Question 71

याज्ञवल्क्यानुसारं प्रत्यभियोगं केषु विवादेषु कर्तुं शक्यते?

  1. AOption (a)

    साहसेषु

  2. BOption (b)

    ऋणादानेषु

  3. COption (c)

    वेतनादानेषु

  4. DOption (d)

    सम्भूयसमुत्थानेषु

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Correct answer

Answer: (a)A.

साहसेषु

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद: याज्ञवल्क्य के अनुसार प्रत्यभियोग किस विवाद में कर सकते हैं?

स्पष्टीकरण: याज्ञवल्क्य के अनुसार "कलह एवं साहस" में प्रत्यभियोग किया जा सकता है। 

मुख्य बिन्दु:

  • वैदिक काल  ऋषि याज्ञवल्क्य एक बहुत ही दार्शनिक रहे थे।
  • याज्ञवल्क्य स्मृति भारतीय धर्मशास्त्र का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। एवं अपने तरह का एक सुव्यवस्थित ग्रन्थ भी है।
  • इसमें कुल तीन काण्ड हैं:
  • आचारकाण्ड
  • व्यवहारकाण्ड
  • प्रायश्चित्तकाण्ड
  • याज्ञवल्क्य स्मृति के द्वितीय काण्ड के "आसाधारणव्यवहारमातृका प्रकरण" में "प्रत्याभियोग" के विषय में बताते हुए कहा गया है की "कलह एवं साहस" में प्रत्याभियोग कर सकते हैं।

अतिरिक्त जानकारी:

  • याज्ञवल्क्य स्मृति में कुल १००३ श्लोक हैं।
  • इसके सभी श्लोक "अनुष्टुप छंद" में विरचित हैं।
  • इसकी रचना लगभग प्रथम से तृतीय शताब्दी के मध्य की मानी जाती है।

Question 72

'षड् + सन्तः = षट्त्सन्तः' इत्यत्र कः आगमो भवति?

  1. AOption (a)

    धुट्

  2. BOption (b)

    तुट्

  3. COption (c)

    दुट्

  4. DOption (d)

    तुक्

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Correct answer

Answer: (a)A.

धुट्

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद - 'षड् + सन्तः = षट्त्सन्तः' में कौन सी आगम हुआ है

स्पष्टीकरण - 'षड् + सन्तः = षट्त्सन्तः' में धुट् आगम है। 

  • ङ सि धुट् सूत्रानुसारे ड् वर्ण से, परवर्ती 'स्' को स विकल्प से धुट् आगम होता है।
  • यदि 'ड्' वर्ण के बाद व्यवधान रहित 'स' हो तो विकल्प से 'स' का अवयव धुट् आगम होता है।
  • सूत्र में '' पञ्चम्यन्त है अतः 'तस्मादित्युत्तरम्य' के अनुसार 'ड' से अव्यवहित पर को धुट हो, यह अर्थ होता है।
  • 'सि' सप्तम्यन्त है अतः 'तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य' के अनुसार स् से अव्यवहित पूर्व को धुट् हो यह अर्थ होता है। दोनों में कौन माना जाये? 'उभयनिर्देशे पञ्चमी निर्देशों बलीयान' अर्थात् जहाँ सप्तमी और पंचमी दोनों का निर्देश हो वहाँ पंचमी निर्देश बलवान होता है।
  • इस नियमानुसार 'तस्मादित्युत्तरस्य' का नियम ही यहाँ माना जाता है। सूत्र में जब पञ्चम्यन्त के बाद सप्तम्यन्त पद हो तब सप्तम्यन्त को षष्ठयन्त मानकर अर्थ किया जाता है, यह भी एक नियम है।
  • 'षड् + सन्तः इस उदाहरण में ड् के वाद स कार होनेपर स कार के विकल्प से धुट् आगम होकर षट्त्सन्तः ऐसा रूप बना है।
  • आगम अर्थात् किसी को हटाकर नहीं होता बल्कि वह अपने स्थानपर (जिसे आगम होता है) का अवयव हो जाता है जैसे स को धुट् अगम् होने पर धुट स के साथ उसका अवयव होकर रहता है।
  • तुट - सायम्-चिरम्-प्राह्णे-प्रगे-अव्ययेभ्यः ५/३ ट्यु-ट्युलौ १/२ तुट् १/१ च  इस सूत्रानुसारे सायम्-चिरम्-प्राह्णे-प्रगे आदि शब्दे अथवा कालवाचक अव्यय मे  एवं  ट्यु-ट्युलौ प्रत्यय में तुट आगम होता है। उदाहरण - परुत् + त्न → परुत्त्न

Extra Points

  • दुट् - तरतेरूः स्यात्तस्य दुट्  इस सूत्रानुसारे दुट् आगम होता है।
  • तुक्  - छे च सूत्रानुसारे पदान्त ह्रस्व स्वर छकार के परे होने पर तुक आगम होता है। यथा - ममछात्रः।

Question 73

सम्यग्दर्शनादिगुणजनितक्षयोपशमनिमित्तमवच्छिन्नविषयं ज्ञानम्-

  1. AOption (a)

    श्रुतम्

  2. BOption (b)

    मतिः

  3. COption (c)

    अवधिः

  4. DOption (d)

    मनः पर्यायः

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Correct answer

Answer: (c)C.

अवधिः

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भाषानुवाद-सम्यक् दर्शन आदि गुणों से उत्पन्न क्षय या उपशम का कारण हो तथा विषयों  को व्याप्त करने वाला ज्ञान होता है ?

स्पष्टीकरण- सम्यक् दर्शन आदि गुणों से उत्पन्न क्षय या उपशम का कारण हो तथा विषयों  को व्याप्त करने वाला ज्ञान "अवधि"होता है । अतः विकल्प (3) सही है।

 Important Points

  • जैन' शब्द की व्युत्पत्ति ‘जिन’ से मानी गई है, जिसका अर्थ होता है- विजेता अर्थात् वह व्यक्ति जिसने इच्छाओं (कामनाओं) एवं मन पर विजय प्राप्त करके हमेशा के लिए संसार के आवागमन से मुक्ति प्राप्त कर ली है।
  • इन्हीं जिनो के उपदेशों को मानने वाले जैन तथा उनके साम्प्रदायिक सिद्धान्त जैन दर्शन के रूप में प्रख्यात हुए।
  • जैन दर्शन ‘अर्हत दर्शन’ के नाम से भी जाना जाता है। जैन धर्म में चौबीस तीर्थंकर  (महापुरूष, जैनों के ईश्वर) हुए जिनमें प्रथम ऋषभदेव तथा अन्तिम,महावीर (वर्धमान) हुए।सम्यक् ज्ञान की चर्चा जैन दर्शन के अंतर्गत वर्णित है ।
  • सम्यग्ज्ञान- यथाऽवस्थिततत्त्वानां संक्षेपाद्विस्तरेण वा

                        योऽवबोधस्तमत्राहुः सम्यग्ज्ञानं मनीषिणः||

  • अर्थात जिस स्वभाव से रुप में जीव आदि पदार्थ अवस्थित है उसी रुप में मोह और भ्रम से रहित होकर उन्हें जानना ही सम्यग्ज्ञान है। जैसा कि कहा है "तत्त्वों का उनकी अवस्था के अनुरूप संक्षेप या विस्तार से जो बोध होता है उसे हि विद्वान लोग सम्यग्ज्ञान कहते हैं।

 Key Points

  • "तज्जज्ञानं पञ्चविधं मतिश्रुतावधिमनःपर्याय केवलभेदेन।" अर्थात यह ज्ञान पाँच प्रकार के हैं - मति ,ध्रुव, अवधि,मनः पर्याय और केवल ज्ञान।
  • "अवधि" ज्ञान के पाँच प्रकारों में से एक हैं ।

"सम्यग्दर्शनादिगुणजनितक्षयोपशमनिमित्तमवच्छिन्नविषयं अवधिज्ञानम्"अर्थात सम्यक् दर्शन आदि गुणों से उत्पन्न क्षय या उपशम का कारण हो तथा विषयों  को व्याप्त करने वाला ज्ञान "अवधि" होता है।

साधारण शब्दों में जिसे मर्यादित कर दिया जाए कि यह वस्तु ऐसी है वह वस्तु वैसी है वही अवधि ज्ञान है।

  • अवधिज्ञान से विषयों का द्रव्य,स्थान,काल आदि जानते हैं यही सविकल्प ज्ञान है।
  • इसी ज्ञान के कारण देवता लोग नीचे सातवें नरक तक देख पाते हैं। 

Additional Information

  • ज्ञान के अन्य प्रकार-
  • मति - ज्ञान के आवरण का क्षय या उपशम हो जाने पर इंद्रिय और मन को आगे  रखकर उनकी सहायता से युक्त होकर पदार्थ का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना मति हैं।
  • श्रुत- ज्ञान के आवरण का उपशम हो जाने पर मति ज्ञान से उत्पन्न स्पष्ट ज्ञान को श्रुतज्ञान  कहते है।
  • मनः पर्याय- ज्ञान के आवरण के रुप में जो ईर्ष्या आदि विध्न हैं उनका क्षय या उपशम हो जाने पर दूसरे व्यक्तियों के मन की बात को स्पष्ट रुप से व्याप्त करने वाले ज्ञान को मनः पर्याय कहते हैं।
  • केवल- जिसके लिए तपस्वी लोग विशेष प्रकार की तपस्या करते हैं तथा जो अन्य किसी ज्ञान से पृथक हैं वही केवल ज्ञान हैं

Question 74

पाणिनिः यङ्प्रत्ययं विदधाति-

(A) कौटिल्येऽर्थे

(B) भावगर्हायाम् अर्थे

(C) इच्छायाम् अर्थे

(D) वेदनायाम् अर्थे

समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (C) एवम् (D)

  2. BOption (b)

    (A) एवम् (B)

  3. COption (c)

    (A) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (B) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A) एवम् (B)

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प्रश्नानुवाद - पाणिनिने यङ् प्रत्यय का विधान किया है-

स्पष्टीकरण - भगवान पाणिनि ने कौटिल्य एवं भावगर्हायाम् अर्थ में यङ् प्रत्यय का विधान किया है।

Important Points

  • कौटिल्येऽर्थे - 
  • पदच्छेदः- नित्यम् कौटिल्ये गतौ
  • अनुवृत्तिः- यङ्, नित्यम्
  • सूत्रार्थ- "नित्यं कौटिल्ये गतौ ३।१।२३" इस सूत्रानुसारे कुटिल के अर्थ में यङ् प्रत्यय का विधान पाणिनि ने किया है।
  • यथा - कुटिलं व्रजति।
  • भावगर्हायाम्- 
  • पदच्छेदः- लुप-सद-चर-जप-जभ-दह-दश-गॄभ्यः भावगर्हायाम्
  • अनुवृत्तिः- यङ्, नित्यम्
  • सूत्रार्थ- लुपसदचरजपजभदहदशगॄभ्यो भावगर्हायाम्॥३.२.२४ इस सूत्रानुसारे लुप, सद, चर, जप, जभ, दह, दश इत्यादि भावग्राहक धातु में यङ् प्रत्यय होता है।
  • यथा - साधु जपति।

Additional Information

  • इच्छायाम् अर्थे - ३.१.७ धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा सूत्रानुसारे इषि कर्मक धातु में सन् प्रत्यय होता है।
  • यथा - प्रकर्तुमैच्छत् = प्राचिकीर्षत्

Question 75

पक्षतायाः लक्षणम् अस्ति-

  1. AOption (a)

    सिषाधयिषावत्त्वाभावः पक्षता

  2. BOption (b)

    सिषाधयिषाविरहसिद्धिः पक्षता

  3. COption (c)

    सिषाधयिषाविरहविशिष्टसिद्ध्यभावः पक्षता

  4. DOption (d)

    सिषाधयिषाविरहविशिष्टसिद्धिः पक्षता

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Correct answer

Answer: (c)C.

सिषाधयिषाविरहविशिष्टसिद्ध्यभावः पक्षता

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भाषानुवाद-पक्षता का लक्षण क्या है?

स्पष्टीकरण- सिषाधयिषाविरहविशिष्टसिद्ध्यभावः पक्षता का लक्षण हैं।

Important Points

  • पक्��� का विवरण न्यायदर्शन के अंतर्गत प्राप्त होता है।
  • "नीयते विवक्षितार्थः अनेन इति न्यायः " अर्थात् जिस साधन के द्वारा हम अपने विवक्षित (ज्ञेय) तत्त्व के पास पहुँच जाते हैं, उसे जान पाते हैं, वही साधन न्याय है।
  • न्याय दर्शन के प्रणेता अक्षपाद गौतम हैं।

**पक्ष-**उस स्थान अथवा वस्तु को पक्ष कहा जाता है, जहाँ किसी अज्ञात धर्म की सिद्धि होती है। जैसे—पर्वत पर अनुमान के द्वारा वह्नि की सिद्धि के समय पर्वत पक्ष होता है।

  • पक्ष का सर्वथा ज्ञात होना अथवा पूर्वतः सिद्ध होना अत्यन्त अनिवार्य है।
  • उक्त प्रकरण में पर्वत प्रत्यक्षसिद्ध होने के कारण पक्ष कहा जाता है, किन्तु पक्ष की पक्षता तभी तक है जब तक उस पर साध्य का निश्चय न हो, अर्थात् पर्वत पर वह्नि का अनुमान के द्वारा निश्चय होने के पूर्व तक ही पर्वत को पक्ष कहा जाता है।

Key Points

न्यायसिद्धांतमुक्तावली के अनुमानखण्ड के अनुसार -

सिषाधयिषा शून्या सिद्धिर्यत्र न विद्यते 

स पक्षस्तत्र वृत्तितत्वज्ञानाद् अनुमितिर्भवेत्।। 70।।

  • सिषाधयिषा अर्थात् अनुमिति-विषयक इच्छा से रहित सिद्धि अर्थात् साध्य का निश्चय जहाँ नहीं रहता है उसे पक्ष कहते हैं। उस पक्ष में हेतु की वृत्तिता के ज्ञान से अनुमिति उत्पन्न होती है।
  • 'व्याप्यस्य पक्षवृत्तित्व इस कारिका के द्वारा परामर्श का लक्षण किया गया है।
  • इस लक्षण में 'पक्षवृत्तित्व' इस शब्द में घटक पक्षत्व अर्थात् पक्षता के स्वरूप का निरूपण किया जा रहा है।
  • कारिका में कथित विवरण के आधार पर सिषाधयिषा से रहित सिद्धि के अभाव को पक्षता कहा जाता है तथा पक्षता का आश्रय पक्ष होता है।
  • केवल सिषाधयिषा को पक्षता नहीं माना जा सकता, क्योंकि जहाँ घनगर्जन से मेघ की अनुमिति होती है वहाँ सिषाधयिषा के बिना ही अनुमिति उत्पन्न होती है। अतः व्यभिचरित होने के कारण सिषाधयिषामात्र को पक्षता नहीं माना जा सकता।
  • इसी आपत्ति के कारण साध्यसंदेह को भी पक्षता नहीं माना जा सकता (प्राचीन नैयायिक साध्यसंदेह को पक्षता मानते हैं), क्योंकि उपर्युक्त स्थल में ही साध्यसंदेह के बिना ही मेघ की अनुमिति देखी जाती है। केवल सिद्ध्यभाव को यदि पक्षता माना जाये तो जहाँ सिद्धि एवं सिषाधयिषा दोनों विद्यमान हों वहाँ सिद्ध्यभाव रूप कारण के न होने से अनुमिति की उत्पत्ति न हो ऐसी आपत्ति प्रसक्त हो जायेगी, किन्तु उक्त स्थिति में अनुमिति अनुभवसिद्ध है।
  • अतः सिषाधयिषा का अभाव सिद्धि में विशेषण के रूप में प्रविष्ट किया गया है। उक्त स्थल में सिद्धि के रहते हु भी सिषाधयिषाविशिष्ट-सिद्धि होने के कारण अनुमिति का प्रतिबन्ध नहीं होता है।
  • इस प्रकार सिषाधयिषा एवं सिद्धि के अस्तित्व एवं अनस्तित्व को लेकर ४ अवस्थायें सम्भव हैं।
  • जिनमें से ३ अवस्थाओं में अनुमिति की उत्पत्ति होती है तथा एक अवस्था में नहीं होती है-

जहाँ सिद्धि नहीं है तथा सिषाधयिषा विद्यमान है वहाँ अनुमिति उत्पन्न होती है।

जहाँ सिद्धि नहीं है तथा सिषाधयिषा भी नहीं है वहाँ अनुमिति उत्पन्न होती है।

जहाँ सिषाधयिषा है तथा सिद्धि भी है वहाँ अनुमिति उत्पन्न होती है।

किन्तु जहाँ सिद्धि है तथा सिषाधयिषा नहीं है वहाँ अनुमिति उत्पन्न नहीं होती है।

Question 76

अधोलिखितानां काव्यलक्षणानां पूर्वापरक्रम नियोजयत-

(A) शब्दार्थी काव्यम्

(B) रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्

(C) तददोषौ शब्दाथौं सगुणावनलङ्कती पुनः क्वापि

(D) सहृदयहृदयाह्लादि शब्दार्थमयत्वमेव काव्यलक्षणम्

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (C), (D), (A), (B)

  2. BOption (b)

    (B), (A), (C), (D)

  3. COption (c)

    (D), (B), (C), (A)

  4. DOption (d)

    (A), (D), (C), (B)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(A), (D), (C), (B)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अधोलिखित काव्यलक्षणोंं को पूर्वापर क्रम से नियोजित कीजिए।

काव्यलक्षण :

  • आचार्य भामह ने काव्य को इस प्रकार परिभाषित किया है -

  • 'शब्दार्थी सहितौ काव्यम्।" (काव्यलंकार १.१६)

  • अर्थात, शब्द और अर्थ के सम्मिलित रूप को काव्य कहते हैं।

  • आचार्य आनन्दवर्धन ने काव्य-लक्षण में शब्द और अर्थ के समन्वित रूप के साथ-साथ भावक को आनन्द प्रदान करने की शर्त जोड़कर मौलिकता का परिचय दिया - 

  • 'सहृदयहृदयाहलादि शब्दार्थमयत्वमेव काव्यलक्षणम्। (ध्वन्यालोक, १.१)

  • आचार्य मम्मट ने काव्य-प्रकाश में काव्य लक्षण की चर्चा करते हुए कहा है - 

  • तद्दोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृति पुनः क्वापि (काव्यप्रकाश १.४)

  • अर्थात दोष रहित, गुणसहित और कभी-कभार अनलंकृत शब्द और अर्थमयी रचना काव्य है। इस परिभाषा में हम पाते हैं कि इसमें दोषों के अभाव और गुणों के भाव को प्रधानता दी गई है। इसमें अलंकारों को बहुत आवश्यक नहीं माना गया है।

  • पण्डितराज जगन्नाथ ने काव्य का लक्षण इस प्रकार प्रस्तुत किया है -

  • 'रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम् । (रसगंगाधर, पृ. 2)

  • जो रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करे वह शब्द काव्य होता है।

​अतः स्पष्ट है, की "(A), (D), (C), (B)" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 77

'नृ + पाहि = नृँ = पाहि' इत्यत्र प्रवृत्तानाम् अधोलिखितसूत्राणाम् उचितमनुक्रमं चिनुत-

(A) अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा

(B) नृन् पे

(C) विसर्जनीयस्य सः

(D) कुप्वोः ≍\asymp क ≍\asymp पौ च

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A), (B), (C), (D)

  2. BOption (b)

    (B), (A), (D), (C)

  3. COption (c)

    (C), (D), (A), (B)

  4. DOption (d)

    (B), (A), (C), (D)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(B), (A), (C), (D)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'नृ + पाहि = नृँ = पाहि' यहाँँ पर प्रवृत्त सूत्रोंं का उचितक्रम लिखिए।

नृृन् पाहि- रुपसिद्धि :

  • नॄन्-शब्द के अन्तिम-नकार के पकार के परे संहिता होने पर विकल्प से रुत्व होता है।
  • नॄरुँ पाहि [नॄन् पे ८.३.१० इस सूत्र से नृ-शब्द के पकार परे होने पर विकल्प से रुत्व।]
  • नॄँरुँ पाहि / नॄंरुँ पाहि [अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा ८.३.२ इस सूत्र से रुँ-इस वर्ण के पूर्ववर्ण का विकल्प से अनुनासिक। अनुनासिक न होने पर अनुनासिकात् परोऽनुस्वारः ८.३.४ इस सूत्र से  अनुस्वार]
  • नॄँः पाहि / नॄंः पाहि [खरवसानयोर्विसर्जनीयः ८.३.१५ इस सूत्र से विसर्गनिर्माण]
  • नॄँःपाहि / नॄंःपाह�� / नॄँः≍पाहि / नॄंः≍पाहि [कुप्वोः ≍क ≍पौ च ८.३.३७ इस सूत्र से विकल्प से उपध्मानीयः]
  • यहाँँ विकल्प से  'नॄन्पाहि' यह रूप भी सिद्ध होता है।

 

​अतः स्पष्ट है, की "(B), (A), (C), (D)" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 78

'शिव + छाया = शिवच्छाया' इत्यत्र प्रवृत्तानाम् अधोलिखितसूत्राणाम् उचितमनुक्रमं चिनुत

(A) खरि च

(B) छे च

(C) झलां जशोऽन्ते

(D) स्तोः श्चुना श्चुः

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A), (B), (D), (C)

  2. BOption (b)

    (B), (A), (C), (D)

  3. COption (c)

    (B), (C), (D), (A)

  4. DOption (d)

    (D), (C), (A), (B)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(B), (C), (D), (A)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'शिव + छाया = शिवच्छाया' यहाँँ पर प्रवृत्त सूत्रोंं का उचितक्रम लिखिए।

शिवच्छाया - रुपसिद्धि :

  • शिवस्य छाया [षष्ठी २.२.८ इस सूत्र से षष्ठीतत्पुरुषसमास]
  • शिव छाया [कृत्तद्धितसमासाश्च १.२.४६  इस सूत्र से प्रातिपदिकसंज्ञा । सुपो धातुप्रातिपदिकयोः २.४.७१  इस सूत्र से सुप्-प्रत्यय का लोप]
  • शिवत् छाया [छे च ६.१.७३  इस सूत्र से  तुगागम]
  • शिवद् छाया [झलां जशोऽन्ते ८.२.३९  इस सूत्र से जश्त्वम्]
  • शिवज् छाया [स्तोः श्चुना श्चुः ८.४.४०  इस सूत्र से श्चुत्वम् ]
  • शिवच् छाया [खरि च ८.४.५५  इस सूत्र से चर्त्वम् । आगे चोः कुः ८.२.३० इस सूत्र से कुत्व नहीं होता।]
  • शिवच्छाया

​

​अतः स्पष्ट है, की "(B), (C), (D), (A)" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 79

अधोलिखितं कथनद्वयम् आश्रित्य समुचितम् उत्तरं चिनुत-

कथनम् (I) : सत्वं लघु प्रकाशकम्।

कथनम् (II) : उपष्टम्भकं चलं च तमः।

यथोचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (I) तथा (II) उभे अपि सत्ये

  2. BOption (b)

    (I) तथा (II) असत्ये

  3. COption (c)

    (I) सत्यं परन्तु (II) असत्ये

  4. DOption (d)

    (I) असत्यम्, (II) सत्यम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

(I) सत्यं परन्तु (II) असत्ये

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अधोलिखित कथनो के आधार पर समुचित उत्तर का चयन कीजिए।

कथनम् (I) : सत्व हल्का अतएव प्रकाशक।

कथनम् (II) : अतएव प्रेरक या प्रवर्तक ऐसा तम है।

स्पष्टीकरण - 

सत्वं लघुप्रकाशकमिष्टमुपष्टम्भकं चलं च रजः।

गुरु वरणकमेव तमः प्रदीपवच्चार्थतो वृत्तिः।।

  • प्रस्तुत कारिका में सत्यादि गुणों के स्वरूप का विवेचन किया गया है। सत्वादि गुणों के क्रमशः प्रकाशन, प्रवृत्ति एवं नियमन ये तीन प्रयोजन होते हैं। सम्प्रति इन गुणों तथा इसके प्रयोजनो�� का सकारण उपस्थापन किया जा रहा है।
  • अर्थ :
  • सत्व हल्का अतएव प्रकाशक (सत्वं लघुप्रकाशकम्). रजस् क्रियाशील (चंचल )अतएव प्रेरक या प्रवर्तक (रजः चलं उपष्टम्भकं च) एवं तमस् भारी अतएव अवरोधक (नियामक) माना गया है (तमः गुरु वरणकमेव) प्रयोजनवश अर्थात् कार्य की सिद्धि के लिए (अर्थतः) ये गुण दीपक के समान (प्रदीपवत्) व्यवहार या कार्य करते हैं।
  • व्याख्या :
  • प्रकृति में तीन गुण सन्निहित हैं सत्व, रजस् एवं तमस् । इनमें सत्व गुण का कार्य प्रकाशन है. रजोगुण का कार्य प्रवर्तन है, जबकि तमोगुण नियमन का कार्य करता है। सत्यादि गुणों के प्रकाशनादि कार्यों या प्रयोजनों का विशेष कारण है। यतः सत्वगुण हल्का होता है, अतः यह प्रकाशित करने वाला है। रजोगुण क्रियाशील है. अतः इसका मुख्य प्रयोजन प्रेरित करना या प्रवर्तन करना है। तमोगुण भारी होता है. अतः यह अवरोध उत्पन्न करने वाला या नियमन करने वाला है।
  • विशेष :
  • सांख्यतत्वकौमुदी में सत्य आदि गुणों के प्रकाशनादि प्रयोजनों का सकारण निरूपण किया गया है। वाचस्पति मिश्र का अभिमत है कि सत्वगुण लाघव स्वरूप वाला है, जो ऊर्ध्वगमन का हेतु एवं मन्दता का प्रतिद्वन्द्वी होता है। इससे ही अग्नि का ऊपर की ओर जलना संभव होता है -
  • सत्वमेव लघुप्रकाशमिष्टं सांख्याचार्यैः। तत्र कार्योंद्गमने हेतुर्धर्मो लाघवं गौरवप्रतिद्वन्द्वि यतोऽग्नेरुं वज्वलनं भवति।
  • सत्य एवं रजस् स्वभावतः क्रियाहीन हैं। रजस् गुण के कारण ही वे प्रेरित अथवा उत्साहित किए जाते हैं, अतः रजोगुण को प्रेरक या प्रवर्तक माना जाता है -
  • सत्वतमसी स्वयमक्रियतया स्वकार्यप्रवृत्तिः प्रत्यवसीदती रजसोपष्टम्येते अवसादात्, प्रच्याव्य स्वकार्ये उत्साह प्रयत्नं कार्येते तदिदमुक्तम्- "गुरु वरणकमेव तमः इति।
  • रजोगुण से चलायमान होने पर भी तमोगुण अपने भारीपन के कारण उसके प्रेरकत्व का प्रतिबन्धी बन जाता है, फलतः रजोगुण यत्र-तत्र ही प्रवृत्त कराने में सफल हो पाता है। इसीलिए तमोगुण को नियामक या अवरोधक स्वीकार किया जाता है -
  • रजसात्तु चलतया परितस्त्रैगुण्यं चालयत् गुरुणाऽऽवृण्वता च तमसा तत्र तत्र प्रवृतिप्रतिबन्धकेन ववचिदेय प्रवर्तयत इति ततस्ततो व्यावृत्त्या तमो नियामकमुक्तम्- "गुरुचरणकमेव तमः" इति।

​

​कथन  I सत्य है, किन्तु कथन II असत्य है,  प्रेरक या प्रवर्तक रूप रजोगुण का है, तमोगुण का नहींं।

​​अतः स्पष्ट है, की "(I) सत्यं परन्तु (II) असत्ये" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 80

समुचितं मेलनं कुरुत

सूची Iसूची II
A.उणादिकोषI.भट्टोजिदीक्षितः
B.प्रौढमनोरमाःII.हेमचन्द्रः
C.महाभाप्यदिपिकाIII.पाणिनिः
D.हैमशब्दानुशासनम्IV.भर्तृहरिः
<br>

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) - (III), (B) - (I), (C) - (IV), (D) - (II)

  2. BOption (b)

    (A) - (I), (B) - (II), (C) - (III), (D) - (IV)

  3. COption (c)

    (A) - (IV), (B) - (II), (C) - (III), (D) - (I)

  4. DOption (d)

    (A) - (II), (B) - (IV), (C) - (III), (D) - (I)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(A) - (III), (B) - (I), (C) - (IV), (D) - (II)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यथोचित मेलन कीजिए।

उणादि कोष :

  • उणादिकोष पाणिनि के पाँच उपदेशों का एक भाग माना जाता है। आचार्य पाणिनि के ५ उपदेश इस प्रकार है -
  • अष्टाध्यायी
  • धातुपाठ
  • उणादिकोष
  • गणपाठ
  • लिङ्गानुशासनम्
  • उणादिसूत्र का अर्थ है : 'उण्' से प्रारम्भ होने वाले कृत् प्रत्ययों का ज्ञापन करनेवाले सूत्रों का समूह। 'कृवापाजिमिस्वदिसाध्यशूभ्य उण्' यह उणादि का प्रारंभिक सूत्र है।
  • उणादिसूत्र ५ पादों (भागों) में विभक्त हैं। नारायण भट्ट के अनुसार उणादिसूत्रों की कुल संख्या 765 है। यह संख्या श्वेतस्वामी की संख्या से 12 अधिक है। उणादिसूत्रों के अनेक प्रसिद्ध टीकाकार हुए हैं जिनमें उज्ज्वलदत्त (इनका समय 1250 ई. के लगभग माना जाता है), भोज और नारायण भट्ट आदि प्रमुख हैं।

  

प्रौढमनोरमा :

प्रौमनोरमा भट्टोजि दीक्षित 17वीं शताब्दी में उत्पन्न संस्कृत वैयाकरण थे जिन्होंने सिद्धान्त कौमुदी की रचना की। इस ग्रन्थ पर उन्होंने स्वयं श्रीमनोरमा टीका लिखी। पाणिनीय सूत्रों पर अष्टाध्यायी क्रम से एक अपूर्ण व्याख्या शब्दकौस्तुभ तथा वैयाकरणभूषण कारिका भी इनके अन्य हैं। इनकी सिद्धान्तकौमुदी लोकप्रिय है।

 

महाभाष्यदीपिका :

महाभाष्यदीपिका यह आचार्य भर्तृहरि की महाभाष्य पर विस्तृत तथा व्याख्या है। अनेक उद्धरणों से अनुमान होता है कि उन्होंने पूरे महाभाष्य पर दीपिका नामक टीका लिखी। इस महाभाष्य की रचनापीठिका का निर्देश करते हुए वाक्यपदीयकार "भर्तृहरि" ने बताया है कि जब व्याकरण के पाठक संक्षेपरुचि और अल्पविद्यापरिग्रह बन गए, "संग्रह" ग्रंथ (जिसके कर्ता परंपरा के अनुसार व्याडि हैं) अस्त हो गया तब तीर्थदर्शी गुरु पतंजलि ने महाभाष्य की रचना की, जिसमें सभी न्यायबीजों का भी निबंधन है।

 

हेमशब्दानुशासनम् :

आचार्य हेमचंद्र ने समस्त व्याकरण साहित्य का अनुशीलन कर शब्दानुशासन एवं अन्य व्याकरण ग्रंथोकी रचना की। पूर्ववतो आचार्यों के ग्रंथो का सम्यक अध्ययन कर सर्वाङ्ग परिपूर्ण उपयोगी एवं सरल व्याकरण की ‍रचना कर संस्कृत और प्राकृत दोनों ही भाषाओं को पूर्णतया अनुशासित किया है।

 

​अतः स्पष्ट है, की "(A) - (III), (B) - (I), (C) - (IV), (D) - (II)" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 81

अधोलिखितं कथनद्वयमाश्रित्य समुचितमुत्तरं चिनुत-

कथनम् (I) : परिसंख्या त्रिदूषणा

कथनम् (II) : श्रुतहानात्

अश्रुतकल्पनात्

प्राप्तबाधात्

यथोचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (I) तथा (II) उभे अपि सत्ये

  2. BOption (b)

    (I) तथा (II) उभे अपि असत्ये

  3. COption (c)

    (I) सत्यम् परन्तु (II) असत्ये

  4. DOption (d)

    (I) असत्यं परन्तु (II) सत्यम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

(I) तथा (II) उभे अपि सत्ये

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अधोलिखित कथनो के आधार पर समुचित उत्तर का चयन कीजिए।

कथनम् (I) : परिसंख्या में तीन प्रकार के दोष होतें हैंं।

कथनम् (II) : श्रुतहानि से।

स्पष्टीकरण :

  • 'पञ्च पञ्चनखा भक्ष्याः इस वाक्य से 'पञ्चनख वाले पाँच पशुओं का भक्षण करना चाहिए का व्यावर्तन कर पञ्चनख वाले पाँच जीवों एवं उनसे अतिरिक्त अन्य जीवों का भक्षण नहीं करना चाहिए यह अर्थ लक्षणा से ही ग्राह्य है। अतः उक्त अर्थ वाक्य का वाच्यार्थ न होकर कल्पित अर्थ है इसीलिए यहाँ तीन दोष प्राप्त होते हैं -
  • श्रुतहानि
  • अश्रुतकल्पना एवं
  • प्राप्तबाध

श्रुतार्थस्य परित्यागावश्रुतार्थकल्पनात्।

प्राप्तस्य बाधादित्येवं परिसंख्या त्रिदूषणा ।।

  • श्रुतहानि दोष -
  • विधिघटितवाक्यस्य हि विधानं व्यापारः स त्यजत इति श्रुतहानिः अर्थात् वाक्य द्वारा जो व्यापार विहित किया जाता है उसका त्याग करना श्रुतहानि दोष है। प्रस्तुत वाक्य पञ्च पञ्चनखा भक्ष्याः से पञ्चनख वाले पाँच जीवों के भक्षण का विधान प्राप्त हो रहा है लेकिन लक्षणा करने पर जो अर्थ ज्ञात होता है अर्थात् पञ्चनख वाले पाँच जीवों का भक्षण नहीं करना चाहिए, इससे उस अर्थ का परित्याग करना पड़ता है अतः यहाँ श्रुतहानि नाम का प्रथम दोष है-
  • 'श्रुतस्य शब्दस्य प्रतिपन्नार्थस्य हानः परित्यागः।
  • अश्रुतकल्पना दोष
  • दर्जनोधनञ्च नघटितवाक्यस्य व्यापारः सोऽत्र स्वीक्रियत इति अन्यार्थस्य कल्पना इति अश्रुतकल्पना अर्थात् वाक्यार्थ में वर्जनपरक बोध एवं नत्रयुक्त व्यापार होकर अन्य अर्थ की कल्पना की जाती है वहाँ अश्रुतकल्पना नाम का दोष होता है। जैसे- 'पञ्च पञ्चनखा भक्ष्याः' वाक्य में पञ्चनख वाले पाँच जीवों एवं उनसे अतिरिक्त अन्य जीवों के मांसभक्षण की निवृत्ति अश्रुतकल्पना है क्योंकि प्रस्तुत वाक्य से इस प्रकार के अर्थ की कोई कल्पना ही नहीं होती है -
  • 'अश्रुतस्य शब्दाप्रतीतार्थस्य कल्पना'।
  • प्राप्तबाध दोष -
  • रागतः प्राप्त अपञ्चनख जीवों के मांसभक्षण का निषेध कर देना प्राप्तबाध नाम का तृतीय दोष है। पञ्च पञ्चनखा भक्ष्याः इस वाक्य में किसी भी जीव के मांसभक्षण का निषेध प्राप्त नहीं है लेकिन रागत, शास्त्रत एवं प्रमाणान्तर से प्राप्त पञ्चनखभक्षण एवं अपञ्चनखभक्षण का बाघ लक्षणा की कल्पना से प्राप्त होता है- प्राप्तस्य च अपञ्चपञ्चनखभक्षणस्य बाधनात्। श्रुतहानि एवं प्राप्तबाध दोष समान नहीं हैं दोनों में अन्तर है जैसे- श्रुतहानि में वाक्य द्वारा अभिधा से जो अर्थ प्राप्त होता है। उसका परित्याग किया जाता है किन्तु प्राप्तबाध में रागतः अथवा प्रमाणान्तर से प्राप्त का परित्याग होता है- प्राप्तस्य प्रमाणविशेषेण कर्त्तव्यतया प्रतीतस्य बाधो व्यवहारव्यावर्तनमित्यर्थः । पञ्चनख अथवा अपञ्चनख जीवों का भक्षण तो मनुष्य को रागत एवं शास्त्रतः प्राप्त है इसमें प्रवृत्ति के लिए किसी अन्य विधिवाक्य की आवश्यकता नहीं पड़ती। किन्तु इनका भक्षण नहीं करना चाहिए यह बतलाने के लिए 'पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या' यह वाक्य प्रवृत्त होता है। इस नियम से पञ्चनख वाले पाँच जीवों से अतिरिक्त अन्य सभी पञ्चनख जीवों एवं अपञ्चनख जीवों के भक्षण का बाघ कर दिया गया है। 
  • रागतः प्राप्तस्य अपञ्चनखभक्षणस्य बाधनं क्रियत इति प्राप्तबाधः"

​

​​​अतः स्पष्ट है, की "(I) तथा (II) उभे अपि सत्ये" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 82

अधोलिखितं कथनद्वयमाश्रित्य समुचितमुत्तरं चिनुत-

कथनम् (I) : उत्पत्तिविधौ कर्मणः करणत्वेन अन्वयः।

कथनम् (II) : उत्पत्तिविधौ कर्मणः साध्यत्वेन अन्वयः।

यथोचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (I) तथा (II) उभे अपि सत्ये

  2. BOption (b)

    (I) तथा (II) उभे अपि असत्ये

  3. COption (c)

    (I) सत्यम् परन्तु (II) असत्यम्

  4. DOption (d)

    (I) असत्यं परन्तु (II) सत्यम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

(I) सत्यम् परन्तु (II) असत्यम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अधोलिखित कथनो के आधार पर समुचित उत्तर का चयन कीजिए।

कथनम् (I) : उत्पत्तिविधि में कर्म के अपेक्षा से करण हो जाता है।

कथनम् (II) : उत्पत्तिविधि में कर्म साध्य होने पर करण हो जाता है।

स्पष्टीकरण - 

  • जो केवल कर्म के स्वरूप का बोध प्राप्त कराता है, वह उत्पत्तिविधि है। जैसे -
  • अग्निहोत्रंं जुहोति।
  • यहाँँ पर विधि-कर्म के करणरूप होने से उत्पत्तिविधि हुआ है, विधि का साध्यत्व यहाँँ पर महत्वपूर्ण नहीं।

 

​​अतः स्पष्ट है, की "(I) सत्यम् परन्तु (II) असत्यम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 83

अधोलिखितं कथनद्वयमाश्रित्य समुचितमुत्तरं चिनुत-

कथनम् (I) : रुपकेषु नाटकं पूर्वमुच्यते; यतः

कथनम् (II) : अन्येषां प्रकृतित्वात्, भृयः रसपरिग्रहात सम्पूर्णलक्षणत्त्वात्

  1. AOption (a)

    (I) तथा (II) उभे अपि सत्ये

  2. BOption (b)

    (I) तथा (II) उभे अपि असत्ये

  3. COption (c)

    (I) सत्यम् परन्तु (II) असत्यम्

  4. DOption (d)

    (I) असत्यं परन्तु (II) सत्यम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

(I) तथा (II) उभे अपि सत्ये

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अधोलिखित कथनो के आधार पर समुचित उत्तर का चयन कीजिए।

कथनम् (I) : रुपकोंं में नाटक प्रथम माना जाता है।

कथनम् (II) : अन्य रूपकों का कारण होने से और रस ग्रहण करने में सम्पूर्ण लक्षण घटित होने से।

स्पष्टीकरण -

 'रूपक तत्समारोपात्' अर्थात् रूपकों में नाटक सबसे प्रथम कहा गया है।

नाटकं सप्रकरणं माणः प्रहसनं डिमः।

व्यायोगसमकारों वीथ्यङ्केहामृगा इति।।

  • दशरूपक नाटक अन्य रूपकों का कारण होने से और रस ग्रहण करने में सम्पूर्ण लक्षण घटित होने से नाटक रूपकों में प्रथम स्थान पर होता है।

 

​​अतः स्पष्ट है, की "(I) तथा (II) उभे अपि सत्ये" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

दशरूपक :

रूपक - भेद :

नाटकमथ प्रकरणं भाणव्यायोगसमवकार डिमाः।

इहामृगाङ्कवीथ्यः प्रहसनमिति रूपकाणि दश।। (साहित्यदर्पण 6/3)

  • महामुनि भरत, दशरूपककार धनंजय तथा साहित्यदर्पणकार विश्वनाथ ने रूपकों के नाटक, प्रकरण, भाण, व्यायोग, समवकार, डिम, ईहामृग, अंक, वीथी, प्रहसन प्रभृति दस भेद माने हैं।

उपरूपक -

  • रूपक के साथ ही उपरूपक के 18 भेद है -
  • नाटिका, त्रोटक, गोष्ठी, सदृक, नाट्यरासक, प्रस्थान, उल्लासटय, काव्य, प्रेक्षणा, रासक, संलापक, श्रीगदित, शिंपल, विलासीका, दुर्मल्लिका, परकणिका, हल्लीशा और भणिका।
  • रूपक भेदक तत्व - 
  • इन सभी रूपकों तथा उपरूपकों का परस्पर भेद वस्तु (कथावस्तु), नेता (नायक) तथा रस के आधार पर किया जाता है।
  • ये तीनों रूपक के भेदक तत्त्व हैं जिसके लिए दशरूपककार आचार्य धनंजय ने लिखा है -
  • वस्तुनेतारसस्तेषां भेदकः वस्तु।
  • इतिवृत्त अर्थात् कथा, कहानी। किसी एक रूपक प्रकार की कथावस्तु, उसका नायक, नायक की प्रकृति तथा उसका प्रतिपाद्य-रस उसे अन्य रूपक प्रकारों से भिन्न करता है।

Question 84

अधोलिखितं कथनद्वयमाश्रित्य समुचितमुत्तरं चिनुत-

कथनम् (I) : आन्वीक्षकीत्रयीवार्तानां योगक्षेमसाधनो दण्डः

कथनम् (II) : दुष्प्रणीतः क्रामक्रोधाभ्यामज्ञानाद् वानप्रस्थपरिव्राजकान् अपि कोपयति।

यथोचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (I) तथा (II) उभे अपि सत्ये

  2. BOption (b)

    (I) तथा (II) उभे अपि असत्ये

  3. COption (c)

    (I) सत्यं परन्तु (II) असत्यम्

  4. DOption (d)

    (I) असत्यं परन्तु (II) सत्यम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

(I) तथा (II) उभे अपि सत्ये

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अधोलिखित कथनो के आधार पर समुचित उत्तर का चयन कीजिए।

कथनम् (I) : आन्वीक्षकी, त्रयी और वार्ता, इन सभी विद्याओं की सुख-समृद्धि दण्ड पर निर्भर है। ।

कथनम् (II) : अज्ञानतापूर्वक अनुचित रीति से प्रयुक्त किया हुआ दण्ड, वानप्रस्थ और परिव्राजक जैसे निःस्पृह व्यक्तियों को भी कुपित कर देता है।

स्पष्टीकरण :

  • आन्वीक्षिकीत्रयोवार्तानां योगक्षेमसाधनो दण्डः। तस्य नीति- इंण्डनीतिः। अलब्धलाभार्था; लब्धपरिरक्षणी; रक्षितविवर्धनी; तीर्थेषु प्रतिपादनी च। (कौटिलीय अर्थशास्त्र, १.३)
  • आन्वीक्षकी, त्रयी और वार्ता, इन सभी विद्याओं की सुख-समृद्धि दण्ड पर निर्भर है। दण्ड ( शासन ) को प्रतिपादित करने वाली नीति ही दण्डनीति कहलाती है। वही अप्राप्त वस्तुओं को प्राप्त कराती है; प्राप्त वस्तुओं की रक्षा करती है; रक्षित वस्तुओं की वृद्धि करती है और वही संर्वाद्धत वस्तुओं को समुचित कार्यों में लगाने का निर्देश करती है। उसी पर संसार की सारी लोकयात्रा निर्भर है। इस लिए लोक को समुचित मार्ग पर ले चलने की इच्छा रखने वाला राजा सदा ही उद्यतदण्ड ( दण्ड देने के लिए प्रस्तुत ) रहे।
  • दुष्प्रणीतः कामक्रोधाभ्यामज्ञानाद्वानप्रस्थपरिव्राजकानपि कोप- यति, किमङ्ग पुनगृहस्थान् । अप्रणीतो हि मात्स्यन्यायमुद्भावयति । बलीयानबलं हि ग्रसते दण्डधराभावे । तेन गुप्तः प्रभवतीति।(कौटिलीय अर्थशास्त्र, १.३)
  • भली भांति सोच-समझ कर प्रयुक्त दण्ड प्रजा को धर्म, अर्थ और काम में प्रवृत्त करता है काम-क्रोध के वशीभूत होकर अज्ञानतापूर्वक अनुचित रीति से प्रयुक्त किया हुआ दण्ड, वानप्रस्थ और परिव्राजक जैसे निःस्पृह व्यक्तियों को भी कुपित कर देता है; फिर गृहस्थलोगों पर ऐसे दण्ड की क्या प्रतिक्रिया होगी, सोचा ही नहीं जा सकता है ! इसके विपरीत, यदि दण्ड से व्यवस्था सर्वथा ही तोड़ दी जाय तो उसका कुप्रभाव यह होगा कि जैसे छोटी मछली को बड़ी मछली या जाती है, वैसे ही बल- वान् व्यक्ति, निर्वल व्यक्ति का रहना दूभर कर देगा । दण्ड-व्यवस्था के अभाव में सर्वत्र ही अराजकता फैल जाती है और निर्बल को बलवान् सताने लगता है; किन्तु दण्डधारी राजा से रक्षित दुर्बल भी बलवान् बना रहता है।

 

​​अतः स्पष्ट है, की "(I) तथा (II) उभे अपि सत्ये" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 85

व्यवहारस्य पादान् क्रमेण नियोजयत-

(A) उत्तरपादः

(B) क्रियापदः

(C) सिद्धिपादः

(D) भाषापादः

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (D), (A), (B), (C)

  2. BOption (b)

    (D), (C), (B), (A)

  3. COption (c)

    (C), (B), (D), (A)

  4. DOption (d)

    (A), (B), (C), (D)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(D), (A), (B), (C)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यथोचित मेलन कीजिए।

व्यवहार-पाद :

  • धर्मशास्त्रों ने 'व्यवहार शब्द का अर्थ अनेक प्रकार से किया गया है। लेन-देन, झगड़ा या मुकद्दमा, लेन-देन से सम्बन्धित कानूनी सामर्थ्य व किसी विषय का निश्चय करने के साधन रूप विभिन्न अर्थो में प्रयुक्त हुआ यह शब्द अपनी महत्ता को दर्शाता है।
  • सामान्यतः व्यवहार शब्द झगड़ा या मुकद्दमा अर्थ में ही ग्रहण किया गया है हालांकि याज्ञवल्क्य स्पष्ट रूप से व्यवहार की कोई परिभाषा नहीं देते परन्तु टीकाकार विज्ञानेश्वर का कहना है कि एक ही विषय में दो पक्षों में विवाद होने पर निर्णय तथा उसके लिए प्रयुक्त प्रक्रिया ही व्यवहार है।
  • सामान्य रूप से व्यवहार के 4 अंग माने जाते है। याज्ञवल्क्य ने भी इसे चतुष्पाद अर्थात् चार पादों वाला माना है।
  • याज्ञवल्क्य ने इन चारों पदों के नाम का उल्लेख नहीं किया है, परन्तु मिताक्षरा टीका में इन्हें निम्नलिखित नाम से उद्धृत किया गया है - 
  • भाषापाद,
  • उत्तरापाद,
  • क्रियापाद
  • साध्यासिद्धपाद

 

​अतः स्पष्ट है, की "(D), (A), (B), (C)" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

अधोलिखित परिच्छेद पठित्वा प्रश्नानाम् उत्तराणि देयानि-

देव ! मयापि परिभ्रमता विन्ध्याटव्यां कोऽपि कुमारः क्षुधा तृषा च क्लिश्यन्नक्लेशार्हः क्वचित्कृपाभ्यासेऽष्टवर्षदेशीयो दृष्टः । स च त्रासगद्गदमगदत् – महाभाग ! क्लिष्टस्य में क्रियतामार्य ! साहाय्यकम् । अस्य मे प्राणापहारिणीं पिपासां प्रतिकर्तुमुदकयुदन्निह कूपे कोऽपि निष्कलो ममैकशरणभूतः पतितः । तमलमस्मि नाहमुद्धर्तम् इति । यथाहमभ्येत्य व्रतत्या क्यापि वृद्धमुत्तार्य, तं च बालं वंशनालीमुखोद्धृताभिरद्भिः फलैश्च पञ्चषैः शरक्षेपोच्छितस्य लकुचवृक्षस्य शिखरात् पाषाणपातितैः प्रत्यानीतप्राणवृत्तिमापाद्य, तरुतलनिषण्णस्तं जरन्तम् अब्रवम् ।

Question 86

एष गद्यांश कस्मिन् काव्ये प्राप्यते?

  1. AOption (a)

    दशकुमारचरिते

  2. BOption (b)

    हर्षचरिते

  3. COption (c)

    कादम्बर्याम्

  4. DOption (d)

    नलचम्पूकाव्ये

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Correct answer

Answer: (a)A.

दशकुमारचरिते

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यह गद्यांश किस काव्य में प्राप्त होता है?

स्पष्टीकरण :

  • यह गद्यांश दशकुमारचरितम् के उत्तरपीठिका के अष्टमोच्छ्वास से संगृहीत है।
  • दशकुमारचरित, दंडी (षष्ठ या सप्तम शताब्दी ई.) द्वारा प्रणीत संस्कृत गद्यकाव्य है। इसमें दश कुमारों का चरित वर्णित होने के कारण इसका नाम "दशकुमारचरित" है।
  • दशकुमारचरित के हस्तलिखित तथा प्रकाशित संस्करणों में प्रायः तीन भाग हैं-
  • आरंभिक अथवा भूमिका भाग, जिसमें पाँच उच्छ्वास हैं, पूर्वपीठिका के नाम से प्रसिद्ध हैं;
  • मध्यम भाग, जिसमें आठ उच्छ्वास हैं, दशकुमारचरित के नाम से जाना जाता है।
  • अंतिम अथवा परिशिष्ट भाग, जो उत्तरपीठिका के नाम से प्रसिद्ध है।

 

​​अतः स्पष्ट है, की "दशकुमारचरिते" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

गद्यांश का हिंदी भाषांतर :

देव, विंध्य के वन में विचरते समय मैंने आठ वर्ष के एक बालक को किसी कुएँँ के पास देखा जो भूख-प्यास से तड़प रहा था और कष्टी था। और वह भय से कांपकर बोलने लगा, “महाभाग ! मैंं त्रस्त हूंं, मेरी सहायता करो। मेरी ही प्राणघातक प्यास बुझाने के लिए पानी लाने के लिए जो गया वह इस कुएँ में गिर गया है, वह मेरा एकमात्र आश्रय बन गया है। मैं छोटा हूँ और मुझ से वह ऊपर उठाया नहीं जा रहा है। जैसे ही मैं पास आया और किसी व्रत का पालन करने वाले बूढ़े व्यक्ति को उठा लिया, और एक लकड़ी के पेड़ के ऊपर से फेंके गए पत्थरों से बच्चे को जीवित कर दिया, जिसे एक तीर से काट दिया गया था, मैंने जमीन पर बैठे बूढ़े व्यक्ति से बात की।

Question 87

कुमारस्य वयः किम् आसीत्?

  1. AOption (a)

    अष्टादशवर्षीयः

  2. BOption (b)

    अष्टवर्षीयः

  3. COption (c)

    सप्तवर्षीयः

  4. DOption (d)

    अष्टशतवर्षीयः

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Correct answer

Answer: (b)B.

अष्टवर्षीयः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : कुमार का वय क्या था?

गद्यांश की महत्वपूर्ण पंक्ति - 

  • देव ! मयापि परिभ्रमता विन्ध्याटव्यां कोऽपि कुमारः क्षुधा तृषा च क्लिश्यन्नक्लेशार्हः क्वचित्कृपाभ्यासेऽष्टवर्षदेशीयो दृष्टः।
  • देव, विंध्य के वन में विचरते समय मैंने आठ वर्ष के एक बालक को किसी कुएँँ के पास देखा जो भूख-प्यास से तड़प रहा था और कष्टी था।

​

​​अतः स्पष्ट है, की "अष्टवर्षीयः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 88

'क्वचित्कूपाभ्यासे' इत्यत्र अभ्यासपदस्य कः अर्थः?

  1. AOption (a)

    द्वित्त्वम्

  2. BOption (b)

    नैरन्तर्यम्

  3. COption (c)

    सामीप्यम्

  4. DOption (d)

    प्रवृत्तिः

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Correct answer

Answer: (c)C.

सामीप्यम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'क्वचित्कूपाभ्यासे' इस शब्द में अभ्यासपद का क्या अर्थ है?

गद्यांश की महत्वपूर्ण पंक्ति - 

  • देव ! मयापि परिभ्रमता विन्ध्याटव्यां कोऽपि कुमारः क्षुधा तृषा च क्लिश्यन्नक्लेशार्हः क्वचित्कृपाभ्यासेऽष्टवर्षदेशीयो दृष्टः।
  • देव, विंध्य के वन में विचरते समय मैंने आठ वर्ष के एक बालक को किसी कुएँँ के पास देखा जो भूख-प्यास से तड़प रहा था और कष्टी था।

​

​​अतः स्पष्ट है, की "सामीप्यम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 89

'कोऽपि निष्कलो ममैकशरणभूतः पतितः' इत्यत्र 'निष्कलः' शब्द अर्थस्य परामर्शकः?

  1. AOption (a)

    कलारहितस्य

  2. BOption (b)

    विद्यारहितस्य

  3. COption (c)

    वृद्धस्य

  4. DOption (d)

    कलहरहितस्य

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Correct answer

Answer: (c)C.

वृद्धस्य

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर :'कोऽपि निष्कलो ममैकशरणभूतः पतितः' इस वाक्य में 'निष्कलः' इस शब्द का क्या अर्थ है?

गद्यांश की महत्वपूर्ण पंक्ति - 

  • अस्य मे प्राणापहारिणीं पिपासां प्रतिकर्तुमुदकयुदन्निह कूपे कोऽपि निष्कलो ममैकशरणभूतः पतितः।
  • मेरी ही प्राणघातक प्यास बुझाने के लिए पानी लाने के लिए जो गया वह इस कुएँ में गिर गया है, वह मेरा एकमात्र आश्रय बन गया है।

​

​​अतः स्पष्ट है, की "वृद्धस्य" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 90

'पाषाणपतितैः प्रत्यानीतप्राणवृत्तिमापाद्य' इत्यस्मिन् कः अलङ्कारः?

  1. AOption (a)

    छेकानुप्रासः

  2. BOption (b)

    वृत्यनुप्रासः

  3. COption (c)

    लाटानुप्रासः

  4. DOption (d)

    यमकः

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Correct answer

Answer: (b)B.

वृत्यनुप्रासः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'पाषाणपतितैः प्रत्यानीतप्राणवृत्तिमापाद्य' यहाँँ कौन सा अलंकार है?

वृत्यनुप्रास अलंकार :

  • अनुप्रास अलंकार के चार भेद होते हैं।
  • छेकानुप्रास
  • वृत्यानुप्रास
  • श्रुत्यानुप्रास
  • अन्त्यानुप्रास
  • वृत्यानुप्रास अलंकार की परिभाषा - जहाँ एक या अनेक वर्णों की एक से अधिक बार आवृत्ति हो, वहाँ वृत्यानुप्रास अलंकार होता है, जैसे -
  • ‘विरति विवेक विमल विज्ञानी।’
  • इस काव्य पंक्ति में ‘व’ वर्ण की आवृत्ति अनेक बार हुई है, अतः यहाँ वृत्यानुप्रास है।
  • 'पाषाणपतितैः प्रत्यानीतप्राणवृत्तिमापाद्य' 
  • इस काव्य पंक्ति में ‘प’ वर्ण की आवृत्ति अनेक बार हुई है, अतः यहाँ वृत्यानुप्रास है।

​

​​अतः स्पष्ट है, की "वृत्यनुप्रासः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

अधोलिखितं परिच्छेदं पठित्वा प्रश्नानाम् उत्तराणि देयानि-

गौः शुक्लः चलो डित्थ इत्यादौ चतुष्टयी शब्दानां प्रवृत्तिः इति महाभाष्यकारः । परमाण्वादीनां तु गणपाठमध्यपाठात् पारिभाषिकं गुणत्वम् । गुणक्रियायदृच्छानां वस्तुतः एकरूपाणामप्याश्रयभेदाद् भेद एव लक्ष्यते । यथैकस्य मुखस्य खड्गमुकुरतैलाद्यालम्बनभेदात् हिमपयःशङ्खाद्याश्रयेषु परमार्थतो भिन्नेषु शुक्लादिषु यद्वशेन शुक्लः शुक्ल इत्यादिरभिन्नाभिधानप्रत्ययोत्पत्तिस्तच्छुक्लत्वादि सामान्यम��� । गुडतण्डुलादिपाकादिप्वेमेव पाकादित्वम् । बालवृद्धशुकाद्युदीरितेषु डित्यादिशब्देषु च प्रतिक्षणं भिद्यमानेषु डित्थाद्यर्थेषु वा डित्थादित्वमस्तीति सर्वेषां शब्दानां जातिरेव प्रवृत्तिनिमित्तमित्यन्ये । तद्वानपोहो वा शब्दार्थः कैश्चिदुक्त इति ग्रन्थगौरवभयात् प्रकृतानुपयोगाच्च न दर्शितम् ।

Question 91

उपर्युक्तगद्यांशे कः सिद्धान्तः वर्तते?

  1. AOption (a)

    स्फोटसिद्धान्तः

  2. BOption (b)

    शक्तिग्रहसिद्धान्तः

  3. COption (c)

    रससिद्धान्तः

  4. DOption (d)

    व्यञ्जनसिद्धान्तः

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Correct answer

Answer: (b)B.

शक्तिग्रहसिद्धान्तः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : उपर्युक्तगद्यांश में कौन सा सिद्धांत कहा गया है?

शक्तिग्रहसिद्धांत :

  • अर्थग्रहण की प्रक्रिया को 'शक्ति ग्रह' के नाम से कहा गया है। इसके आठ साधन माने गये हैंं - 
  • व्याकरण,
  • उपमान,
  • कोष,
  • यथार्थ पुरुष की वाणी,
  • व्यवहार,
  • विवरण,
  • ज्ञात पद की समीपता
  • वाक्य शेष
  • उपर्युक्तगद्यांश में शब्दार्थग्रहण की प्रक्रिया के बारे में विवेचन है।

​

​​​अतः स्पष्ट है, की "शक्तिग्रहसिद्धान्तः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

गद्यांश का हिंदी भाषांतर :

  • महाभाष्यकार कहते हैं कि गौ, शुक्ल, चलो, डित्था आदि चार शब्द सम्मिलित हैं। हालाँकि, परमाणुओं और अन्य में समूह पाठ के मध्य पाठ से एक निश्चित गुण होता है। गुण, कर्म और संयोग वास्तव में एक ही रूप होते हुए भी उनकी निर्भरता में भिन्नता के कारण भिन्नता देखी जाती है। जिस प्रकार हिम, दूध, शंख आदि के मुख से तलवार, बीज, तेल आदि के निलंबन में जो अन्तर है, वह भिन्न-भिन्न प्रकार की सफेदी आदि भावों को उत्पन्न करता है। गुड़, चावल और अन्य खाद्य पदार्थों को पकाने के बारे में भी यही सच है। दूसरों का तर्क है कि सभी शब्दों की जाति वृत्ति का कारण है, क्योंकि बच्चों, बूढ़ों, सूअरों आदि द्वारा बोले गए शब्दों में या डित्थ जैसे अर्थों में घिनौनापन होता है, जो हर पल अलग होता है। यह नहीं दिखाया गया है, ग्रन्थगौरवभय से और इसके स्वाभाविक अनुप्रयोग के लिए, कि शब्द का अर्थ कुछ लोगों द्वारा शब्दार्थ का तद्वानपोह किया गया है।

अधोलिखितं परिच्छेदं पठित्वा प्रश्नानाम् उत्तराणि देयानि-

गौः शुक्लः चलो डित्थ इत्यादौ चतुष्टयी शब्दानां प्रवृत्तिः इति महाभाष्यकारः । परमाण्वादीनां तु गणपाठमध्यपाठात् पारिभाषिकं गुणत्वम् । गुणक्रियायदृच्छानां वस्तुतः एकरूपाणामप्याश्रयभेदाद् भेद एव लक्ष्यते । यथैकस्य मुखस्य खड्गमुकुरतैलाद्यालम्बनभेदात् हिमपयःशङ्खाद्याश्रयेषु परमार्थतो भिन्नेषु शुक्लादिषु यद्वशेन शुक्लः शुक्ल इत्यादिरभिन्नाभिधानप्रत्ययोत्पत्तिस्तच्छुक्लत्वादि सामान्यम् । गुडतण्डुलादिपाकादिप्वेमेव पाकादित्वम् । बालवृद्धशुकाद्युदीरितेषु डित्यादिशब्देषु च प्रतिक्षणं भिद्यमानेषु डित्थाद्यर्थेषु वा डित्थादित्वमस्तीति सर्वेषां शब्दानां जातिरेव प्रवृत्तिनिमित्तमित्यन्ये । तद्वानपोहो वा शब्दार्थः कैश्चिदुक्त इति ग्रन्थगौरवभयात् प्रकृतानुपयोगाच्च न दर्शितम् ।

Question 92

'हिमपयः शङ्खाद्याश्रयेषु परमार्थतो भिन्नेषु शुक्लादिषु यद्वशेन शुक्लः शुक्ल इत्यादिरभिन्नाभिधानप्रत्ययोत्पत्तिस्तच्छुक्लत्वादि सामान्यम्। इत्यस्मिन् गद्यांशे केषां सिद्धान्तंः अस्ति।

  1. AOption (a)

    नैयायिकानाम्

  2. BOption (b)

    बौद्धानाम्

  3. COption (c)

    मीमांसकानाम्

  4. DOption (d)

    वैयाकरणानम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

मीमांसकानाम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'हिमपयः शङ्खाद्याश्रयेषु परमार्थतो भिन्नेषु शुक्लादिषु यद्वशेन शुक्लः शुक्ल इत्यादिरभिन्नाभिधानप्रत्ययोत्पत्तिस्तच्छुक्लत्वादि सामान्यम्। इस गद्यांश में किनका सिद्धांत है?

स्पष्टीकरण - 

  • यह मीमांसकोंं का मत है। अर्थात 'जाति और अन्य' अर्थात् वर्ण, गुण, क्रिया और संयोग इन चारों के स्थान पर केवल जाति की ही शक्ति या संकेतग्रह निर्माण होता है। अर्थात् जाति ही ध्वनि की वृत्ति का कारण है। जाति शब्द की तरह गुणों की क्रिया के लिए भी यादृच्छिक शब्दों के लिए जाति उपयुक्त प्रतीक है।
  • एकरसता की धारणा का कारण 'सामान्य' शब्द या 'जाति' शब्द से वर्णित है गुणवत्ता-क्रिया यादृच्छिक शब्दों की प्रजाति हो सकती है। इस प्रयोजन के लिए मम्मट कहता हैं - जिस प्रकार हिम, दूध, शंख आदि के मुख से तलवार, बीज, तेल आदि के निलंबन में जो अन्तर है, वह भिन्न-भिन्न प्रकार की सफेदी आदि भावों को उत्पन्न करता है। गुड़, चावल और अन्य खाद्य पदार्थों को पकाने के बारे में भी यही सच है। दूसरों का तर्क है कि सभी शब्दों की जाति वृत्ति का कारण है।

​

​​​अतः स्पष्ट है, की "मीमांसकानाम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 93

'सर्वेषां शब्दानां जातिरेव प्रवृत्तिनिमित्तमित्यन्ये' इत्यस्मिन् वाक्यांशे 'अन्ये' इति शब्दः कस्य परामर्शकः अस्ति?

  1. AOption (a)

    नैयायिकानाम्

  2. BOption (b)

    बौद्धानाम्

  3. COption (c)

    मीमांसकानाम्

  4. DOption (d)

    वैयाकरणानाम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

मीमांसकानाम्

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर :'सर्वेषां शब्दानां जातिरेव प्रवृत्तिनिमित्तमित्यन्ये'  इस वाक्यांश में इति शब्द किसका परामर्श है?

स्पष्टीकरण - 

  • यह मीमांसकोंं का निर्देश करता है। अर्थात 'जाति और अन्य' अर्थात् वर्ण, गुण, क्रिया और संयोग इन चारों के स्थान पर केवल जाति की ही शक्ति या संकेतग्रह निर्माण होता है। अर्थात् जाति ही ध्वनि की वृत्ति का कारण है। जाति शब्द की तरह गुणों की क्रिया के लिए भी यादृच्छिक शब्दों के लिए जाति उपयुक्त प्रतीक है।
  • एकरसता की धारणा का कारण 'सामान्य' शब्द या 'जाति' शब्द से वर्णित है गुणवत्ता-क्रिया यादृच्छिक शब्दों की प्रजाति हो सकती है। इस प्रयोजन के लिए मम्मट कहता हैं - जिस प्रकार हिम, दूध, शंख आदि के मुख से तलवार, बीज, तेल आदि के निलंबन में जो अन्तर है, वह भिन्न-भिन्न प्रकार की सफेदी आदि भावों को उत्पन्न करता है। गुड़, चावल और अन्य खाद्य पदार्थों को पकाने के बारे में भी यही सच है। दूसरों का तर्क है कि सभी शब्दों की जाति वृत्ति का कारण है।

​

​​​अतः स्पष्ट है, की "मीमांसकानाम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 94

'तद्वान्' इति पदे अभिव्यक्तसिद्धान्तस्य विषये असत्यं कथनमस्ति-

  1. AOption (a)

    अत्र 'तत्' पदांशः 'सामान्यमि' ति अर्थस्य परामर्शकः अस्ति।

  2. BOption (b)

    अत्र 'वान्' इति पदांशः 'व्यक्तिः' इति अर्थस्य परामर्शकः अस्ति।

  3. COption (c)

    अस्मिन् पदांशे 'जातिविशिष्टव्यक्तौ संकेतः गृह्यते' इति मन्यते।

  4. DOption (d)

    अयं सिद्धान्तः बौद्धानाम् अस्ति।

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Correct answer

Answer: (d)D.

अयं सिद्धान्तः बौद्धानाम् अस्ति।

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'तद्वान्' इस पद में अभिव्यक्तसिद्धान्त के विषय में असत्य कथन क्या है?

अभिव्यक्तसिद्धांत :

  • अनेकता में एकत्व व्यवहार भाषा की प्रवृत्ति का मूल है और इसी को तात्विक दृष्टि से सामान्य कहा जाता है। भाषा ही नहीं, ज्ञान के क्षेत्र में भी सामान्य का महत्व है क्योंकि यदि एक ज्ञान को दूसरे ज्ञान से पृथक्‌ माना जाए तो एक ही वस्तु के अनेक ज्ञानों में परस्पर कोई संबंध नहीं हो सकेगा। अतएव सामान्य या जाती को अनेक व्यक्तियों में रहनेवाली एक नित्य सत्ता माना गया है। यही सत्ता भाषा के व्यवहार का कारण है और भाषा का भी यही अर्थ है।
  • 'तद्वान्' इस पद में तत् पद से सामान्य का निर्देश किया गया है, वान् यह पद व्यक्तिनिर्देश करता है, इस वाक्य में जातिविशिष्ट व्यक्ति अनुरूप संकेतग्रहण किया गया है, और यह मीमांसकोंं का सिद्धांत है।

​

​​​​अतः स्पष्ट है, की "अयं सिद्धान्तः बौद्धानाम् अस्ति।" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 95

बौद्धानां सिद्धान्त कः?

  1. AOption (a)

    वयक्तिवादः

  2. BOption (b)

    जातिवादः

  3. COption (c)

    अपोहवादः

  4. DOption (d)

    जातिविशिष्टव्यक्तिवादः

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Correct answer

Answer: (c)C.

अपोहवादः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : बौद्ध सिद्धांत क्या है?

अपोहवाद :

  • बौद्ध दर्शन में सामान्य का खंडन करके नामजात्याद्यसंयुत अर्थ को ही शब्दार्थ माना गया है। न्यायमीमांसा दर्शनों में कहा गया है कि भाषा सामान्य या जाती के बिना नहीं रह सकती। प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग शब्द हो तो भाषा का व्यवहार नष्ट हो जाएगा।
  • अनेकता में एकत्व व्यवहार भाषा की प्रवृत्ति का मूल है और इसी को तात्विक दृष्टि से सामान्य कहा जाता है। भाषा ही नहीं, ज्ञान के क्षेत्र में भी सामान्य का महत्व है क्योंकि यदि एक ज्ञान को दूसरे ज्ञान से पृथक्‌ माना जाए तो एक ही वस्तु के अनेक ज्ञानों में परस्पर कोई संबंध नहीं हो सकेगा। अतएव सामान्य या जाती को अनेक व्यक्तियों में रहनेवाली एक नित्य सत्ता माना गया है। यही सत्ता भाषा के व्यवहार का कारण है और भाषा का भी यही अर्थ है।
  • बौद्धों के अनुसार सभी पदार्थ क्षणिक हैं अत: वे सामान्य की सत्ता नहीं मानते। यदि सामान्य नित्य है तो वह अनेक व्यक्तियों में कैसे रहता है? यदि सामान्य नित्य है तो नष्ट पदार्थ में रहनेवाले सामान्य का क्या होता है? अत: वह किसी अन्य वस्तु से संबंधित न होकर अपने आपमें ही विशिष्ट एक सत्ता है जिसे स्वलक्षण कहा जाता है।
  • अनेक स्वलक्षण पदार्थों में ही अज्ञान के कारण एकता की मिथ्या प्रतीति होती है और चूंकि लोकव्यवहार के लिए ऐसी प्रतीति की आवश्यकता है इसलिए सामान्य लक्षण पदार्थ व्यावहारिक सत्य तो हैं किंतु परमार्थत: वे असत्‌ हैं। शब्दों का अर्थ परमार्थत: सामान्य के संबंध से रहित होकर ही भासित हाता है। इसी को 'अन्यापोह' या 'अपोह' कहते हैं।
  • अपोह सिद्धांत के विकास के तीन स्तर माने जाते हैं।
  • दिंनाग के अनुसार शब्दों का अर्थ अन्याभाव मात्र होता है।
  • शांतरक्षित ने कहा कि शब्द भावात्मक अर्थ का बोध कराता है, उसका अन्य से भेद ऊहा से मालूम होता है।
  • रत्नकीर्ति ने अन्य के भेद से युक्त शब्दार्थ माना। ये तीन सिद्धांत कम से कम अन्य से भेद को शब्दार्थ अवश्य मानते हैं। यही अपोहवाद की विशेषता है।

   

​​​अतः स्पष्ट है, की "अपोहवादः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 96

निरुक्ते प्रतिपादितान् भावविकारान् क्रमेण नि��ोजयत-

(A) अस्ति

(B) वर्धते

(C) जायते

(D) अपक्षीयते

(E) विपरिणमते

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (D), (B), (E), (A), (C)

  2. BOption (b)

    (E), (A), (D), (B), (C)

  3. COption (c)

    (C), (A), (E), (B), (D)

  4. DOption (d)

    (A), (B), (C), (D), (E)

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

(C), (A), (E), (B), (D)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : निरुक्त में प्रतिपादित भावविकारोंं का क्रम से नियोजन कीजिए।

षड्भावविकार :

  • भाव शब्द भू धातु से घञ् प्रत्यय लगाने से बना है, भाव का अर्थ है क्रिया । भाव में सभी क्रियायें (धातुयें) आ जाती हैं, परन्तु आचार्य वार्ष्यायणि ने छः प्रकार के भाव निश्चित किये हैं- षड्भावविकाराः भवन्तीति वार्ष्यायणिः । जायतेऽस्तिविपरिणमते वर्धते ऽपक्षीयते विनश्यतीति (नि. 1.2)।
  • निरुक्तकार ने किया के लिये आख्यात शब्द का प्रयोग किया है तथा इसकी परिभाषा 'भावप्रधानमाख्यातम् अर्थात् जिसमें भाव की प्रधानता हो वह आख्यात है। भाव के अन्तर्गत क्रिया की उत्पत्ति से लेकर अवसानपर्यन्त छः भाव आते हैं इस सन्दर्भ में उन्होंने वार्ष्यायणि के षड्भावविकारों की चर्चा की है। वे इस प्रकार हैं-
  • जायते
  • प्रथम भावविकार जायते का अर्थ है उत्पन्न होना "जायत इति पूर्वभावस्यादिमाचष्टे नापरभावमाचष्टे न प्रतिषेधति (नि. 1.2) यह क्रिया के आरम्भ भाव को कहती है यह न तो परवर्ती क्रिया को कहती है, न उसका निषेध करती है। उत्पन्न होने की प्रक्रिया में न तो यह कह सकते हैं कि यह इस वस्तु की सत्ता है और न ही यह कह सकते है कि यह इसकी सत्ता नहीं है।
  • अस्ति
  • अस्ति अस्तीत्युत्पन्नस्य सत्वस्यावधारणम् (नि. 12) उत्पन्न वस्तु की निश्चयात्मक स्थिति को अस्ति कहते हैं। वैयाकरणों के अनुसार अपने आपको धारण करने का व्यापार अस्ति है। 'आत्मानम् आत्मना विम्रद् अस्तीति व्यपदिश्यते।
  • विपरिणमते
  • विपरिणमत इत्यप्रच्यवमानस्य तत्त्वाद्विकारम् वर्धत इति स्वाङ्गाभ्युचयं सांयोगिकानां वाऽर्थानाम् (नि 1.2 ) इसका अभिप्राय है, परिवर्तित होना। इसमें क्रिया अपनी मूल प्रकृति को नहीं छोड़ती तथा न ही अपनी परवर्ती क्रिया वर्धते को कहती है न मना करती है। जैसे मानव शरीर में अनेक परिवर्तन हो सकते हैं परंतु वह स्वभाव को नहीं छोड़ता।
  • वर्धते
  • वर्धते वर्धते विजयेनेति वा वर्धते शरीरेणेति वा (नि. 12) वर्धते का अर्थ है वृद्धि वृद्धि दो प्रकार की होती है। शरीर से वृद्धि होना या संयुक्त अर्थों से जैसे- धनेन वर्धते. विजयेन वर्धते इत्यादि से भी वृद्धि हो सकती है।
  • अपक्षीयते
  • अपक्षीयते ह्रास या अपक्षय को कहते हैं।
  • विनश्यति।
  • विनश्यति यह अन्तिम भाव विकार है जब पाँचवा भाव विकार अपनी चरम सीमा को प्राप्त करता है तब विनाश कहलाता है। वार्ष्यायणि के अनुसार इन छः विकारों के अतिरिक्त जितने भी ज्ञातविकार प्राप्त होते है उन्हें इन्हीं के अन्तर्गत मान लेना चाहिये।

 

​अतः स्पष्ट है, की "(C), (A), (E), (B), (D)" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 97

महाभारतस्य पर्वनामानि क्रमेण लिखत-

(A) आदिपर्व

(B) विराट्पर्व

(C) सभापर्व

(D) वनपर्व

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (C), (B), (D), (A)

  2. BOption (b)

    (B), (A), (D), (C)

  3. COption (c)

    (A), (C), (D), (B)

  4. DOption (d)

    (D), (B), (A), (C)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(A), (C), (D), (B)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : महाभारत के पर्वोंं के नाम क्रम से लिखिए।

महाभारत के पर्वोंं और उपपर्वोंं में विभाग :

पर्वशीर्षकउप-पर्व संख्याउप-पर्व सूचीअध्याय एवम श्लोक संख्याविषय-सूची
१आदिपर्व१-१९- अनुक्रमणिका पर्व - पर्वसंग्रह पर्व - पौष्य पर्व - पौलोम पर्व - आस्तीक पर्व - अंशावतार पर्व - सम्भाव पर्व - जतुगृह पर्व - हिडिम्बवध पर्व - बकवध पर्व - चैत्ररथ पर्व - स्वयंवर पर्व - वैवाहिक पर्व - विदुरागमन राज्यलम्भ पर्व - अर्जुनवनवास पर्व - सुभद्राहरण पर्व - हरणाहरण पर्व - खाण्डवदाह पर्व - मयदर्शन पर्व२२७/७९००- परिचय, - राजकुमारों का जन्म और
लालन-पालन
२सभापर्व२०-२८- सभाक्रिया पर्व - लोकपालसभाख्यान पर्व - राजसूयारम्भ पर्व - जरासन्धवध पर्व - दिग्विजय पर्व - राजसूय पर्व - अर्घाभिहरण पर्व - शिशुपालवध पर्व - द्यूत पर्व - अनुद्यूत पर्व७८/२५११- दरबार की झलक और द्यूत क्रीड़ा - इंद्रप्रस्थ का निर्माण और पाण्डवों का वनवास
३आरण्यकपर्व२९-५०- अरण्य पर्व - किर्मीरवध पर्व - अर्जुनाभिगमन पर्व - कैरात पर्व - इन्द्रलोकाभिगमन पर्व - नलोपाख्यान पर्व - तीर्थयात्रा पर्व - जटासुरवध पर्व - यक्षयुद्ध पर्व - निवातकवचयुद्ध पर्व - अजगरपर्व - मार्कण्डेयसमस्या पर्व - द्रौपदीसत्यभामा पर्व - घोषयात्रा पर्व - मृगस्वप्नोद्भव पर्व - ब्रीहिद्रौणिक पर्व - द्रौपदीहरण पर्व - जयद्रथविमोक्ष पर्व - रामोपाख्यान पर्व - पतिव्रतामाहात्म्य पर्व - कुण्डलाहरण पर्व - आरणेय पर्व२६९/११६६४- प���ण्डवो का वनों में १२ वर्ष का जीवन
४विराटपर्व५१-५५- पाण्डवप्रवेश पर्व - समयपालन पर्व - कीचक वध पर्व - गोहरण पर्व - वैवाहिक पर्व६७/२०५०- राजा विराट के राज्य में अज्ञातवास
५उद्योगपर्व५६-६५- सेनोद्योग पर्व - संजययान पर्व - प्रजागर पर्व - सनत्सुजात पर्व - यानसन्धि पर्व - भगवद्-यान पर्व - सैन्यनिर्याण पर्व - उलूकदूतागमन पर्व - रथातिरथसंख्या पर्व - अम्बोपाख्यान पर्व१८६/६६९८- युद्ध की तैयारी
६भीष्मपर्व६६-६९- जम्बूखण्डविनिर्माण पर्व - भूमि पर्व - श्रीमद्भगवद्गीता पर्व - भीष्मवध पर्व११७/५८८४- महाभारत युद्ध का पहला भाग - भीष्म कौरवों के सेनापति
७द्रोणपर्व७०-७७- द्रोणाभिषेक पर्व - संशप्तकवध पर्व - अभिमन्यु वध पर्व - प्रतिज्ञा पर्व - जयद्रथ वध पर्व - घटोत्कच वध पर्व - द्रोणवध पर्व - नारायणास्त्रमोक्ष पर्व१७०/८९०९- युद्ध जारी, द्रोण सेनापति बने
८कर्णपर्व७८- कर्णपर्व७९/४९६४- युद्ध जारी, कर्ण सेनापति बना
९शल्यपर्व७९-८०- ह्रदप्रवेश पर्व - गदा पर्व५९/३२२०- युद्ध का अंतिम भाग - शल्य सेनापति
१०सौप्तिकपर्व८१- ऐषीक पर्व१८/८७०- अश्वत्थामा द्वारा पाण्डव सेना का सोये हुए में वध
११स्त्रीपर्व८२-८४- जलप्रादानिक पर्व - विलाप पर्व - श्राद्ध पर्व२७/७७५- गान्धारी का मृत लोगों के लिये शोक
१२शांतिपर्व८५-८७- राजधर्मानुशासन पर्व - आपद्धर्म पर्व - मोक्षधर्म पर्व३३९/१४७३२- युधिष्ठिर का राज्याभिषेक - भीष्म के दिशा-निर्देश
१३अनुशासनपर्व८८-८९- दान-धर्म-पर्व - भीष्मस्वर्गारोहण पर्व१८६/८०००- भीष्म के अंतिम उपदेश
१४अश्वमेधिकापर्व९०-९२- अश्वमेध पर्व - अनुगीता पर - वैष्णव पर्व१०३/३३२०- युधिष्ठिर द्वारा अश्वमेध का आयोजन
१५आश्रम्वासिकापर्व९३-९५- आश्रमवास पर्व - पुत्रदर्शन पर्व - नारदागमन पर्व८२/१५०६- धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती का वन में आश्रम के लिये प्रस्थान"
१६मौसुलपर्व९६- मौसुलपर्व८/३२०- यादवों की परस्पर लड़ाई
१७महाप्रस्थानिकपर्व९७- महाप्रस्थानिकपर्व३/१२३- युधिष्ठिर और उनके भाइयों की सद्‍गति का प्रथम भाग
१८स्वर्गारोहणपर्व९८- स्वर्गारोहणपर्व५/२०७- पांडवों की स्वर्ग यात्रा
खिलभागहरिवंशपर्व९९-१००- विष्णुपर्व - भविष्यपर्व१२०००- इसे महाभारत का खिल भाग भी कहते है, इसमें विशेष कर भगवान श्री कृष्ण के बारे में वर्णन है।

 

अतः स्पष्ट है, "(A), (C), (D), (B)" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 98

विनियोगविधेः प्रमाणानि क्रमशः लिखत-

(A) लिङ्गम्

(B) वाक्यम्

(C) श्रुतिः

(D) प्रकरणम्

(E) स्थानम्

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A), (B), (C), (D), (E)

  2. BOption (b)

    (B), (D), (A), (C), (E)

  3. COption (c)

    (E), (A), (B), (D), (C)

  4. DOption (d)

    (C), (A), (B), (D), (E)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(C), (A), (B), (D), (E)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : विनियोगविधि के प्रमाणोंं को क्रमशः लिखिए।

अर्थसंग्रह के अनुसार वेदोंं के भाग :

अर्थसंग्रह में वेदोंं के पाँच विभागोंं का वर्णन किया है -

  • अपौरुषेयंं वाक्यं वेदः। स च विधिमंत्रनामधेयनिषेधार्थवादभेदात्पञ्चविधः। 
  • अर्थ - अपौरुषेय वाक्य को वेद कहते है। विधि, मंत्र, नामधेय, निषेध, और अर्थवाद यह वेद के पाँच भाग है।

**विधि :**विधि का लक्षण इस प्रकार है - 

  • अज्ञातार्थज्ञापको वेदभागो विधिः।
  • अर्थ - अज्ञात अर्थ का बोध देनेवाला वेदोंं का भाग विधि है।

विधि का विभाजन तीन प्रकार से हो सकता है - 

  • प्रधान, गुण, विशिष्ट
  • उत्पत्ति, विनियोग, प्रयोग, अधिकार
  • नियम, परिसंख्या

विनियोग :

विनियोगविधि का लक्षण इस प्रकार है - 

  • अङ्गप्रधानसम्बन्धोबोधको विधिः विनियोगविधिः।
  • अर्थ - अंग और प्रधान का संबंध दर्शानेवाला विधि विनियोगविधि है।

विनियोग विधि के छह प्रमाण है।

  • श्रुति, लिंग, वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्या।

 

​अतः स्पष्ट है, की "(C), (A), (B), (D), (E)" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 99

ऋग्वेदादिक्रमेण ब्राह्मणनामानि लिखत-

(A) कौषीतकीब्राह्मणम्

(B) सामविधानब्राह्मणम्

(C) तैत्तिरीयब्राह्मणम्

(D) गोपथब्राह्मणम्

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (D), (B), (C), (A)

  2. BOption (b)

    (A), (C), (B), (D)

  3. COption (c)

    (B), (A), (D), (C)

  4. DOption (d)

    (C), (D), (A), (B)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A), (C), (B), (D)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : ऋग्वेदादि क्रम से ब्राह्मणोंं के नाम लिखिए।

संहिता और ब्राह्मणग्रंथ :

संहिताब्राह्मणग्रंथ
ऋग्वेद- ऐतरेयब्राह्मण-(शैशिरीयशाकलशाखा) - कौषीतकी (श���ंखायन) ब्राह्मण (बाष्कल शाखा)
यजुर्वेद- शुक्ल यजुर्वेद : - शतपथब्राह्मण-(माध्यन्दिनीय वाजसनेयि शाखा) - शतपथब्राह्मण-(काण्व वाजसनेयि शाखा) - कृष्णयजुर्वेद : - तैत्तिरीयब्राह्मण - मैत्रायणीब्राह्मण - कठब्राह्मण - कपिष्ठलब्राह्मण
सामवेद- प्रौढ(पंचविंश) ब्राह्मण - षडविंश ब्राह्मण - आर्षेय ब्राह्मण - मन्त्र (या छांदोग्य) ब्राह्मण - जैमिनीय ब्राह्मण
अथर्ववेद- गोपथब्राह्मण (पिप्पलाद शाखा)

 

अतः स्पष्ट हैं की "(A), (C), (B), (D)"** इस प्रश्न का सही उत्तर हैं।

Question 100

अधोलिखितान् साहित्यकारान् कालक्रमेण योजयत-

(A) अम्बिकादत्तव्यासः

(B) पण्डिताक्षमारावमहोदया

(C) श्रीधरभास्करः वर्णेकरः

(D) वी. राघवन्

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A), (B), (C), (D)

  2. BOption (b)

    (A), (B), (D), (C)

  3. COption (c)

    (A), (D), (B), (C)

  4. DOption (d)

    (A), (C), (B), (D)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A), (B), (D), (C)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अधोलिखित साहित्यकारोंं की कालक्रम से योजना कीजिए।

अंबिकादत्त व्यास :

  • अम्बिकादत्त व्यास (सन् १८५८ ई. -- १९०० ई. ) भारतेन्दु मण्डल के प्रसिद्ध कवि थे। वे ब्रजभाषा के कुशल और सरस कवि थे। इन्होंने कवित्त, सवैया की प्रचलित शैली में ब्रजभाषा में रचना की। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के समकालीन हिन्दी सेवियों में पंडित अंबिकादत्त व्यास बहुत प्रसिद्ध लेखक और कवि हैं।
  • कवि अम्बिकादत्त अपनी असाधारण विद्वत्ता तथा प्रतिभा के कारण समकालीन विद्वन्मण्डली में 'भारतभास्कर','साहित्याचार्य', 'व्यास' आदि उपाधियों से भूषित थे इन्हें 19वीं सदी का बाणभट्ट माना जाता है। श्री व्यास जीवनपर्यन्त साहित्याराधना में लीन रहे। आधुनिक संस्कृत रचनाकारों में सर्वाधिक ख्यातिप्राप्त एवं अलौकिक प्रतिभासंपन्न साहित्याचार्य श्री अंबिकादत्त व्यास जी हैं। इन्होंने हिन्दी और संस्कृत दोनों भाषाओं में समान अधिकार के साथ रचनाएं की हैं। इनके द्वारा प्रणीत ग्रथों की संख्या 75 है। व्यासजी ने छत्रपति शिवाजी के जीवन पर 'शिवराजविजयम्' नामक गद्यकाव्य की रचना की है, जो 'कादम्बरी' की शैली में रचित है। पंडित जितेन्द्रियाचार्य द्वारा संशोधित 'शिवराजविजयम्' की, 6 आवृत्तियां प्रकाशित हो चुकी हैं। इनका 'सामवतम्' नामक नाटक 19 वीं शती का श्रेष्ठ नाटक माना जाता है।

 

पंडिता क्षमा राव :

  • पण्डिता क्षमाराव (4 जुलाई 1890 - 22 अप्रैल 1954) एक संस्कृत विदुषी थीं जिन्होंने संस्कृत साहित्य में नूतन विधाओं तथा विषयवस्तु का अवतरण किया। वे गार्गी एवं मैत्रेयी की परम्परा को आगे बढाने वाली संस्कृत कवयित्री हैं। उन्होंने कथाओं को भी पद्य में लिखा। चरित काव्य के अन्तर्गत उन्होंने तुकारामचरित, रामदासचरित तथा ज्ञानेश्वरचरित का ग्रथन किया। गांधी जी के सत्याग्रह से प्रभावित होकर उन्होंने 'सत्याग्रहगीता' नामक महाकाव्य की रचना की जो १९३२ में पेरिस से प्रकाशित हुआ। अपने पिता की जीवनी लेखन से पण्डिता क्षमा ने संस्कृत साहित्य में नई विधा का सूत्रपात किया।
  • पण्डिता क्षमा राव का जन्म 4 जुलाई 1890 को महाराष्ट्र के एक विद्वत्परिवार में हुआ था। दुर्भाग्य से तीन वर्ष की अल्प आयु में ही उनको पितृ-वियोग सहना पड़ा। पिता की मृत्यु के पश्चात् क्षमा का बचपन अपनी चाची के घर घोर कष्टों और अभावों में बीता। प्रतिकूल परिस्थितियों के होते हुए भी मेधाविनी क्षमा 10 वर्ष की आयु से ही संस्कृत और अंग्रेजी में कविताएंँ लिखने लगी थी।
  • संस्कृत साहित्य में पण्डिता क्षमाराव द्वारा रचित प्रमुख नारी चरित्र प्रधान ऐतिहासिक रचनाएँ हैं -
  • मीरा लहरी - इसका प्रकाशन 1944 में हुआ। पण्डिता क्षमाराव द्वारा रचित यह गीतिकाव्य दो खण्डों में विभक्त है जिसमें मीरा की जन्म से लेकर मृत्यु तक की कथा निबद्ध है।
  • वीरभा - इसका प्रकाशन 1954 में 8 भूपेन्द्र वसु, एवन्यू, कोलकाता से हुआ है। इसकी नायिका वीरभा है और इसी के नाम पर इस रूपक का नामकरण किया गया है। वीरभा नामक महिला युवावस्था में ही अपने सम्पूर्ण व्यक्तिगत सुखों को तिलांजलि देकर तपस्विनी के जीवन को स्वीकार करती है। वह अपने राष्ट्र को विदेशी शासकों के क्रूर जाल से मुक्त कराने की अदम्य भावना से महात्मा गांधी द्वारा संचालित सत्याग्रह आन्दोलन में अग्रणी भूमि निभाती है। इसका नेतृत्व करके सभी के मानस में राष्ट्रीय भावना का प्रबल संचार करती है।
  • पण्डिता क्षमाराव की ‘मीरालहरी‘ को उपजीव्य बनाकर लीलाराव दयाल ने ऐतिहासिक कथा प्रधान मीराचारितम् नामक रूपक की रचना की है। मजूंषा पत्रिका अगस्त, 1960 वर्ष-10, अंक 6 में यह प्रकाशित हुई है। 13 दृश्यों में विभक्त इस रूपक में मीरा की बाल्यावस्था से लेकर जीवन भर की हरिभक्ति परक घटनाएँ चित्रित की गई हैं। ससुराल पक्ष के द्वारा अनेकों अत्याचार किए जाने पर भी मीरा अपनी भक्ति को नहीं छोड़ती है और चुपचाप अत्याचारों को सहन करती हुई वह एक दिन कृष्ण में ही अन्तर्लीन हो जाती है।

 

श्रीधर भास्कर वर्णेकर :

  • डॉ श्रीधर भास्कर वर्णेकर (३१ जुलाई १९१८ - १० अप्रैल २०००) संस्कृत के विद्वान तथा राष्ट्रवादी कवि थे। उनका जन्म नागपुर में हुआ था।
  • उन्होंने बहुत से काव्य और श्लोकों की रचना की। 'श्रीशिवराज्योदयम्' उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना है। इस पर १९७४ में उन्हे साहित्य अकादमी पुरस्कार (संस्कृत) प्रदान किया गया था। यह ६८ सर्गो में वर्णित एक महाकाव्य है। यह पुस्तक संघ लोक सेवा आयोग के सिविल सेवा परीक्षा के लिये निर्धारित संस्कृत साहित्य के पाठ्यक्रम में भी सम्मिलित की गयी है। उनकी दूसरी प्रसिद्ध रचना है - 'संस्कृत वाङ्मय कोश', 'भारतरत्नशतकम्' तथा 'स्वातन्त्र्यवीरशतकम्' उनकी अन्य रचनाएँ हैं।

 

वेंकटरमण राघवन :

  • वेंकटरमण राघवन (1908–1979) एक संस्कृत विद्वान तथा संगीतज्ञ थे। उन्हें पद्मभूषण, संस्कृत के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई पुरस्कार प्रदान किये गये थे। उन्होने १२० से अधिक पुस्तकों की रचना की तथा १२०० से अधिक लेख लिखे।
  • इनके द्वारा रचित एक सौन्दर्यशास्त्र भोज श्रृंगार प्रकाश के लिये उन्हें सन् १९६६ में साहित्य अकादमी पुरस्कार (संस्कृत) से सम्मानित किया गया।

 

​अतः स्पष्ट है, की "(A), (B), (D), (C)" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

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