भाषानुवाद-असमवायिकारण भी है ?
स्पष्टीकरण- क्रियागुणयोः असमवायिकारण है।
Important Points
कारण का स्वरूप एवं भेद-
'प्रमाकरणं प्रमाणम् ' प्रमाण के लक्षण के प्रसंग में तर्कभाषाकार ने 'करण' पद को स्पष्ट करते हुए 'साधकतमं करणम् ।' कहा है। यहाँ ग्रंथकार ने 'साधक' का अर्थ 'कारण' किया है एवं प्रकृष्ट कारण को करण कहा है— 'अतिशयितं साधकं साधकतमं प्रकृष्टं कारणा मित्यर्थः' (तर्कभाषा पृ० 13-19)
यहाँ जिज्ञास्य है कि 'साधक' एवं 'कारण' समानार्थी होने से कारण के स्वरूपज्ञान के
बिना प्रकृष्ट कारण रूपी करण का ज्ञान सम्भव नहीं होगा, अतः कारण का लक्षण आवश्यक
है। कारण का लक्षण है- 'जिसका कार्य से पूर्व होना नियत है और जो अन्यथा सिद्ध नहीं है
वह कारण है। यथा तन्तु, वेमादि पट के कारण हैं।
'यस्य कार्यात् पूर्वभावो नियतोऽनन्यथासिद्धश्च तत्कारणम्।" (तर्कभाषा, पृ० 19) इस लक्षण में 'यस्य कार्यात् पूर्वभावः' पद द्वारा कारण की कार्य से भिन्नता स्पष्ट की गई है। यह सर्वज्ञात है कि कारण के होने पर ही कार्य होता है, अतः कारण को कार्य से पूर्वभावी कहा गया है। उदाहरणार्थ-पट कार्य है, तन्तु, तुरी, वेमा आदि कारण हैं। पट से पूर्व विद्यमान होने के कारण इस प्रकार कारण पूर्वभावी होता है तथा कार्य पश्चाद्भावी। इससे कार्य-कारण का भेद स्पष्ट ही है। यहां 'यस्य कार्यात् पूर्वभावः' मात्र कारण का लक्षण करने से लक्षण में 'अतिव्याप्तिदोष' की सम्भावना उपस्थित हो जाती, अतः इस दोष के निवारणार्थ कारण के लक्षण में 'नियत तथा अनन्यथासिद्ध' ये दो विशेषण प्रयुक्त हैं। "
'नियत' पद का अर्थ है- नियमपूर्वक अथवा निश्चित रूप से होने वाला 'नियत' पद का सन्निवेश न होने से कार्योत्पत्ति से पूर्व आकस्मिक रूप से उपस्थित सभी वस्तुओं को उस कार्य का कारण स्वीकार करना पड़ेगा- "यद्यपि पटोत्पत्तौ दैवादागतस्य रासभादेः पूर्वभावो विद्यते, तथापि नासी नियतः " (तर्कभाषा, पृ० 20 )
अर्थात् यदि पट की उत्पत्ति से पूर्व संयोगवश गर्दभादि की उपस्थिति हो जाए तो 'कार्यात् पूर्वभावी' होने से गर्दभ को पट का कारण मानना होगा, इससे लक्षण अतिव्याप्ति दोषयुक्त हो जाएगा, किन्तु 'नियत' पद रखने से लक्षण दोषमुक्त रहेगा। लक्षण में 'नियत' पद के सन्निवेश से जो वस्तु कार्य की उत्पत्ति से पूर्व नियमपूर्वक / निश्चितरूपेण उपस्थित होगा वही 'कारण' कहलाएगा। गर्दभ की उपस्थिति सभी पटों की उत्पत्ति से पूर्व निश्चयेन नहीं होती, अतः केवल संयोगमात्र से कार्योत्पत्ति पूर्व विद्यमान गर्दभादि में कारण की अतिव्याप्ति नहीं होगी।
इसी प्रकार 'अनन्यथासिद्ध' विशेषण रखने का प्रयोजन लक्षण का 'तन्तुरूप' आदि में अतिव्याप्ति का वारण है। 'अनन्यथासिद्ध' का अर्थ है जो अन्यथासिद्ध न हो अर्थात् जो साक्षात् कारण न हो वह अन्यथासिद्ध है यथा कुम्भकार का पिता। इस प्रकार 'अनन्यथासिद्ध' का तात्पर्य है जो नियतपूर्ववर्ती हो, परन्तु उसकी पूर्ववर्तिता दूसरे पदार्थ की कारणता में या अन्य कार्य के जनक के रूप में परिसमाप्त न हुई हो वह अनन्यथासिद्ध कहलाएगा। यदि इस पद का कारण के लक्षण में सन्निवेश न करें तो लक्षण होगा- 'यस्य कार्यात् पूर्वभावो नियतः ' जो अतिव्याप्ति दोष युक्त है। तन्तु पट का कारण है वह पट से नियतपूर्वभावी है। तन्तु में तन्तुरूप की विद्यमानता है, वह भी नियतपूर्वभावी है, पटोत्पत्ति से नियत पूर्वभावी होने के कारण उक्त लक्षणानुसार तन्तुरूप को भी पट का कारण मानना होगा। इस अतिव्याप्ति दोष के निवारणार्थ कारण के लक्षण में 'अनन्यथासिद्ध' पद का सन्निवेश किया गया है। इससे यह सिद्ध किया जा सकता है कि चूंकि तन्तुरूप-पटरूप के प्रति कारण है, अतः तन्तुरूप की कारणता पटरूप कार्य की उत्पत्ति में ही प्रयुक्त हो गई है, अतः तन्तुरूप-पट के प्रति अन्यथासिद्ध होने से पट का कारण नहीं माना जा सकता।
तन्तुरूप को पट एवं पटरूप दोनों का कारण मानने पर 'कल्पनागौरव' दोष उत्पन्न होता है "तन्तुरूपस्य तु नियतः पूर्वभावोऽस्त्येव किन्त्वन्यथासिद्धः पटरूपजननोपक्षीणत्वात्, पट प्रत्यपि कारणत्वे कल्पनागौरव प्रसङ्गात् ।" (तर्कभाषा, पृ0 21 ) इस प्रकार कारण के लक्षण में 'नियत और अन्यथासिद्ध' दोनों पद आवश्यक है।
इसलिए 'तेनानन्यथासिद्धनियतपूर्वभावित्वं कारणत्वम् ।" यह कारण का लक्षण युक्तियुक्त है।
Key Pointsकारण के तीन भेद हैं- समवायिकारण, असमवायिकारण एवं निमित्तकारण "तच्च कारणं त्रिविधम् समवायि असमवायि निमित्त भेदात् ।" (पृ0 25 )
(1) समवायि कारण का लक्षण है- 'यत्समवेतं कार्यमुत्पद्यते तत्समवायि कारणम्' । ( पृ० 25 ) समवायि कारण वह होता है जिसमें कार्योत्पत्ति समवाय सम्बन्ध से होती है। यथा तन्तु पट का समवायि कारण है, क्योंकि 'पट' कार्य की उत्पत्ति 'तन्तु' कारण से होता है, तन्तु का पट के साथ समवाय सम्बन्ध है। दो अयुतसिद्ध पदार्थों का सम्बन्ध 'समवाय' कहलाता है। (पृ0 26) "अयुतसिद्धयोः सम्बन्धः समवायः" (पृ0 26) सम्बन्ध दो प्रकार के हैं- 'द्विविधः सम्बन्धः संयोगः समवायश्चेति' (पृ0 26 ) पद का तुरी, वेमा, तन्तु आदि अनेक कारणों के साथ सम्बन्ध हैं। तुरी वैमादि कारणों का सम्बन्ध संयोग सम्बन्ध है। तन्तु के साथ पट का समवाय सम्बन्ध है, क्योंकि अयुतसिद्ध पदार्थों का सम्बन्ध ही समवाय होता है अयुतसिद्ध का लक्षण है- "ययोर्मध्ये एकमविनश्यदपराश्रितमेवावतिष्ठते तावयुतसिद्धी" (पृ0 26) अर्थात् जिन दो पदार्थों में से एक, दूसरे के आश्रित होकर ही रहे उससे विभक्त न किया जा सके, वे दोनों अयुतसिद्ध होते हैं। अतः अवयव अवयवी, गुण- गुणी, क्रिया- क्रियावान, जाति और व्यक्ति विशेष एवं नित्यद्रव्य ये पञ्च 'अयुतसिद्ध' स्वीकृत है।
"यथा अवयवावयविना, गुणगुणिनौ, क्रियाक्रियावन्तौ, जातिव्यक्ती, विशेषनित्यद्रव्ये चेति । " तर्कभाषा (पृ0 31)
अयुतसिद्ध के लक्षण में 'अविनश्यत्' पद का प्रयोजन लक्षण में 'अव्याप्ति' दोष का वारण है। यदि केवल 'एकमपराश्रितमेवावतिष्ठते तावयुतसिद्धी' लक्षण किया जाता तो अवयव - अवयवी इत्यादि पंच अयुतसिद्धों में से प्रथम तीन में लक्षण घटित नहीं होता, क्योंकि गुण, क्रिया तथा अवयवी आदि एक काल में निराश्रित भी होते हैं। यथा तन्तु के नाश होने से पट 'विनश्यत्ता' का अर्थ है 'विनाशकारणसामग्रीसान्निध्य "विनश्यत्ता तु विनाशकारणसामग्रीसान्निध्यम् ।" (पृ० 31) अर्थात् जिस काल मात्र में विनाश के सम्पूर्ण कारण उपलब्ध हो जाएं वह 'विनश्यत्ता काल' है। विनश्यत्ता काल में रूपादि गुण निराश्रित होता है; परन्तु 'अविनश्यत्' काल में दूसरे पर आश्रित ही रहते हैं। अतः स्पष्ट है कि 'अयुतसिद्ध' वह है जो अविनश्यदवस्था में पराश्रित रहे 'विनश्यत्ता काल' में पराश्रित होना अपेक्षित नहीं है क्योंकि गुण क्रिया आदि विनश्यत्ता काल' में निराश्रित रहते हैं; तथापि अविनश्यत्ता काल में तो अपराश्रित ही रहते हैं।
(2) असमवायिकारण का लक्षण है- “यत्समवायिकारणप्रत्यासन्नमवधृतसामध्य तदसमवायिकारणम् ।" (पृ0 36 )
अर्थात् जो समवायि कारण में प्रत्यासन्न (निकटतः स्थित) होता है एवं कार्योत्पत्ति में जिसका सामर्थ्य निश्चित हो, वह असमवायि कारण है असमवायि कारण के लक्षण में दो पर विशेष रूप से ध्यातव्य हैं- (1) समवायिकारण प्रत्यासन्नम् (2) अवधृतसामर्थ्यम् । यथा- तन्तु संयोग पट का असमवायिकारण है। तन्तुसंयोग गुण है, वह पट के समवायिकारण तन्तु नाम्ना गुणी में समवाय सम्बन्ध से स्थित है। अतः तन्तुसंयोग पट के समवायि कारण से निकटतः सम्बद्ध है एवं वह अनन्यथासिद्ध पूर्वभावी होने से पट के प्रति कारण है।उसी प्रकार तन्तुरूप पटरूप का असमवायिकारण है। असमवायिकारण के लक्षण में निर्दिष्ट है कि समवायिकारण से निकटता के साथ सम्बन्ध रखने वाला एवम् अनन्यथासिद्धनियतपूर्वभावी धर्म असमवायि कारण होगा। अतः पटरूप का असमवायिकारण पटगत कोई धर्म होना चाहिए, क्योंकि तन्तुरूप तो तन्तु का गुण होने से तन्तु में रहता है पट मैं न��ीं।प्रश्न उपस्थित होता है कि तन्तुरूप को पटरूप का असमवायि कारण कैसे कहा जा सकता है? इसका समाधान ग्रन्थकार देते हैं कि असमवायिकारण के लक्षण में 'समवायिकारणप्रत्यासन्नम् में जो प्रत्यासत्ति कथित है वह दो प्रकार की होती है- "समवायिकारणसमवायिकारणप्रत्यासन्नस्यापि परम्परयासमवायिकारणप्रत्यासत्रत्वात"
तुरी पटाश्रिवावतिष्ठतेनापि पटस्तुयश्रितः । अतस्तयोः सम्बन्धः संयोग एवं तदेव तन्तुसमवतः पटः।" (पृ० 32 )
असमवायिकारण का लक्षण है- "यत्समवायिकारणप्रत्यासन्नमवधृतसामर्थ्यं तदसमवायिकारणम् ।" (पृ0 36)
अर्थात् जो समवायि कारण में प्रत्यासन्न (निकटतः स्थित) होता है एवं कार्योत्पत्ति में जिसका सामर्थ्य निश्चित हो, वह असमवायि कारण है। असमवायि कारण के लक्षण में दो पर विशेष रूप से ध्यातव्य हैं- (1) समवायिकारण प्रत्यासन्नम् (2) अवधृतसामर्थ्यम्। यथा- तन्तु संयोग पट का असमवायिकारण है। तन्तुसंयोग गुण है, वह पट के समवायिकारण तन्तु नाम्ना गुणी में समवाय सम्बन्ध से स्थित है। अतः तन्तुसंयोग पट के समवायि कारण से निकटतः सम्बद्ध है एवं वह अनन्यथासिद्ध पूर्वभावी होने से पट के प्रति कारण है।
( 3 ) निमित्त कारण- जो कारण समवायि एवं असमवायि कारण से व्यतिरिक्त हैं, वे निमित्त कारण कहलाते हैं। निमित्त कारण का ग्रंथकार लक्षण करते हैं- "यन्न समवायिकारणं, नाप्यसमवायिकारणम्। अथ च कारणम् तन्निमित्तकारणम् ।" ( पृ० 39 ) अर्थात् जो न समवायिकारण है एवं न ही असमवायिकारण है, परन्तु निश्चयेन कारण है
अर्थात् जिसका स्वरूप 'अनन्यथासिद्धनियतपूर्वभावित्वम्' रूप है, वह निमित्त कारण है।