किस पुल्लिंग शब्द का लिंग परिवर्तन सही नहीं है ?
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नायक - नायिका
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सेवक - सेविका
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अनुज - अनुजा
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संचालक - संचारिका
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Correct answer
नायक - नायिका
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Browse complete papersकिस पुल्लिंग शब्द का लिंग परिवर्तन सही नहीं है ?
नायक - नायिका
सेवक - सेविका
अनुज - अनुजा
संचालक - संचारिका
Correct answer
नायक - नायिका
निम्न में से कौन सा शब्द स्त्रीलिंग नहीं है?
यामा
योजना
भिक्षा
संबल
Correct answer
यामा
'जीवन धन' का समानार्थी शब्द है-
यमराज
पति (स्वामी)
आदमी
महीपति
Correct answer
यमराज
निम्न में से कौन सा शब्द तत्सम नहीं है ?
अग्नि
चतुर्दश
वत्स
फूल
Correct answer
अग्नि
निम्न में से शलाका का तद्भव रूप है :
श्लेष
सलाई
सलाका
सिलाई
Correct answer
श्लेष
प्रस्तुत गद्यांश को पढ़िए और उचित विकल्पों का चयन | करके उत्तर दीजिये:
रास्ते पर खड़ा ये आम का पेड़, सदा से ठूंठ नहीं है। दिन थे जब वह हरा भरा था और उस जनसंकुल चौराहे पर । अपनी छतनार डालियों से बटोहियों की थकान अनजाने दूर करता था। पर मैंने उसे सदा ठूंठ ही देखा है। पत्रहीन, शाखाहीन, निरवलंब, जैसे पृथ्वी रूपी आकाश से सहसा निकलकर अधर में ही टंग गया हो। रात में वह काले भूत-सा लगता है, दिन में उसकी छाया इतनी गहरी नहीं हो पाती जितना काला उसका जिस्म है और अगर चितेरे। को छायाचित्र बनाना हो तो शायद उसका-सा 'अभिप्राय' और न मिलेगा। प्रचंड धूप में भी उसका सूखा शरीर उतनी ही गहरी छाया ज़मीन पर डालता जैसे रात की उजियारी चांदनी में जब से होश संभाला है, जब से आँख खोली है, देखने का अभ्यास किया है, तब से बराबर मुझे उसका निस्पंद, नीरस, अर्थहीन शरीर ही दिख पड़ा है।
पर पिछली पीढ़ी के जानकार कहते हैं कि एक जमाना था जब पीपल और बरगद भी उसके सामने शरमाते थे और उसके पत्तों से, उसकी टहनियों और डालों से टकराती हवा की सरसराहट दूर तक सुनाई पड़ती थी। पर आज वह नीरव है, उस चौराहे का जवाब जिस पर उत्तर- दक्षिण, पूरब पश्चिम चारों ओर की राहें मिलती हैं और जिनके सहारे जीवन अविरल बहता है। जिसने कभी जल को जीवन की संज्ञा दी, उसने निश्चय जाना होगा कि | प्राणवान जीवन भी जल की ही भांति विकल, अविरल बहता है । सो प्राणवान जीवन, मानव संस्कृति का उल्लास उपहार लिए उन चारों राहों की संधि पर मिलता था जिसके एक कोण में उस प्रवाह से मिल एकांत शुष्क आज वह ठूंठ खड़ा है। उसके अभाग्यों की परंपरा में संभवतः एक ही सुखद अपबाट है उसके अंश का
शाखाहीन, रसहीन, शुष्क वृक्ष को क्या कहा गया है?
नीरस वृक्ष
जड़ वृक्ष
ठूंठ वृक्ष
हीन वृक्ष
Correct answer
नीरस वृक्ष
प्रस्तुत गद्यांश को पढ़िए और उचित विकल्पों का चयन | करके उत्तर दीजिये:
रास्ते पर खड़ा ये आम का पेड़, सदा से ठूंठ नहीं है। दिन थे जब वह हरा भरा था और उस जनसंकुल चौराहे पर । अपनी छतनार डालियों से बटोहियों की थकान अनजाने दूर करता था। पर मैंने उसे सदा ठूंठ ही देखा है। पत्रहीन, शाखाहीन, निरवलंब, जैसे पृथ्वी रूपी आकाश से सहसा निकलकर अधर में ही टंग गया हो। रात में वह काले भूत-सा लगता है, दिन में उसकी छाया इतनी गहरी नहीं हो पाती जितना काला उसका जिस्म है और अगर चितेरे। को छायाचित्र बनाना हो तो शायद उसका-सा 'अभिप्राय' और न मिलेगा। प्रचंड धूप में भी उसका सूखा शरीर उतनी ही गहरी छाया ज़मीन पर डालता जैसे रात की उजियारी चांदनी में जब से होश संभाला है, जब से आँख खोली है, देखने का अभ्यास किया है, तब से बराबर मुझे उसका निस्पंद, नीरस, अर्थहीन शरीर ही दिख पड़ा है।
पर पिछली पीढ़ी के जानकार कहते हैं कि एक जमाना था जब पीपल और बरगद भी उसके सामने शरमाते थे और उसके पत्तों से, उसकी टहनियों और डालों से टकराती हवा की सरसराहट दूर तक सुनाई पड़ती थी। पर आज वह नीरव है, उस चौराहे का जवाब जिस पर उत्तर- दक्षिण, पूरब पश्चिम चारों ओर की राहें मिलती हैं और जिनके सहारे जीवन अविरल बहता है। जिसने कभी जल को जीवन की संज्ञा दी, उसने निश्चय जाना होगा कि | प्राणवान जीवन भी जल की ही भांति विकल, अविरल बहता है । सो प्राणवान जीवन, मानव संस्कृति का उल्लास उपहार लिए उन चारों राहों की संधि पर मिलता था जिसके एक कोण में उस प्रवाह से मिल एकांत शुष्क आज वह ठूंठ खड़ा है। उसके अभाग्यों की परंपरा में संभवतः एक ही सुखद अपबाट है उसके अंश का
आम के वृक्ष के सामने पीपल और बरगद के शरमाने का कारण कौन सा नहीं है ?
आम के वृक्ष का अधिक हरा-भरा और सघन होना ।
आम की टहनियों से टकराती हवा की सरसराहट की आवाज दूर तक सुनाई देना ।
पीपल और बरगद की मज़बूती और सघनता आम के विशाल वृक्ष की तुलना में फीकी पड़ना ।
पीपल और बरगद के सामने ही आम के पेड़ का ठूंठा हो जाना ।
Correct answer
आम के वृक्ष का अधिक हरा-भरा और सघन होना ।
प्रस्तुत गद्यांश को पढ़िए और उचित विकल्पों का चयन | करके उत्तर दीजिये:
रास्ते पर खड़ा ये आम का पेड़, सदा से ठूंठ नहीं है। दिन थे जब वह हरा भरा था और उस जनसंकुल चौराहे पर । अपनी छतनार डालियों से बटोहियों की थकान अनजाने दूर करता था। पर मैंने उसे सदा ठूंठ ही देखा है। पत्रहीन, शाखाहीन, निरवलंब, जैसे पृथ्वी ��ूपी आकाश से सहसा निकलकर अधर में ही टंग गया हो। रात में वह काले भूत-सा लगता है, दिन में उसकी छाया इतनी गहरी नहीं हो पाती जितना काला उसका जिस्म है और अगर चितेरे। को छायाचित्र बनाना हो तो शायद उसका-सा 'अभिप्राय' और न मिलेगा। प्रचंड धूप में भी उसका सूखा शरीर उतनी ही गहरी छाया ज़मीन पर डालता जैसे रात की उजियारी चांदनी में जब से होश संभाला है, जब से आँख खोली है, देखने का अभ्यास किया है, तब से बराबर मुझे उसका निस्पंद, नीरस, अर्थहीन शरीर ही दिख पड़ा है।
पर पिछली पीढ़ी के जानकार कहते हैं कि एक जमाना था जब पीपल और बरगद भी उसके सामने शरमाते थे और उसके पत्तों से, उसकी टहनियों और डालों से टकराती हवा की सरसराहट दूर तक सुनाई पड़ती थी। पर आज वह नीरव है, उस चौराहे का जवाब जिस पर उत्तर- दक्षिण, पूरब पश्चिम चारों ओर की राहें मिलती हैं और जिनके सहारे जीवन अविरल बहता है। जिसने कभी जल को जीवन की संज्ञा दी, उसने निश्चय जाना होगा कि | प्राणवान जीवन भी जल की ही भांति विकल, अविरल बहता है । सो प्राणवान जीवन, मानव संस्कृति का उल्लास उपहार लिए उन चारों राहों की संधि पर मिलता था जिसके एक कोण में उस प्रवाह से मिल एकांत शुष्क आज वह ठूंठ खड़ा है। उसके अभाग्यों की परंपरा में संभवतः एक ही सुखद अपबाट है उसके अंश का
प्रस्तुत गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक हो सकता है-
निस्पंद और नीरस वृक्ष
नीरस एवं अर्थहीन जीवन
ठूंठा आम
जंगल के वृक्ष
Correct answer
निस्पंद और नीरस वृक्ष
प्रस्तुत गद्यांश को पढ़िए और उचित विकल्पों का चयन | करके उत्तर दीजिये:
रास्ते पर खड़ा ये आम का पेड़, सदा से ठूंठ नहीं है। दिन थे जब वह हरा भरा था और उस जनसंकुल चौराहे पर । अपनी छतनार डालियों से बटोहियों की थकान अनजाने दूर करता था। पर मैंने उसे सदा ठूंठ ही देखा है। पत्रहीन, शाखाहीन, निरवलंब, जैसे पृथ्वी रूपी आकाश से सहसा निकलकर अधर में ही टंग गया हो। रात में वह काले भूत-सा लगता है, दिन में उसकी छाया इतनी गहरी नहीं हो पाती जितना काला उसका जिस्म है और अगर चितेरे। को छायाचित्र बनाना हो तो शायद उसका-सा 'अभिप्राय' और न मिलेगा। प्रचंड धूप में भी उसका सूखा शरीर उतनी ही गहरी छाया ज़मीन पर डालता जैसे रात की उजियारी चांदनी में जब से होश संभाला है, जब से आँख खोली है, देखने का अभ्यास किया है, तब से बराबर मुझे उसका निस्पंद, नीरस, अर्थहीन शरीर ही दिख पड़ा है।
पर पिछली पीढ़ी के जानकार कहते हैं कि एक जमाना था जब पीपल और बरगद भी उसके सामने शरमाते थे और उसके पत्तों से, उसकी टहनियों और डालों से टकराती हवा की सरसराहट दूर तक सुनाई पड़ती थी। पर आज वह नीरव है, उस चौराहे का जवाब जिस पर उत्तर- दक्षिण, पूरब पश्चिम चारों ओर की राहें मिलती हैं और जिनके सहारे जीवन अविरल बहता है। जिसने कभी जल को जीवन की संज्ञा दी, उसने निश्चय जाना होगा कि | प्राणवान जीवन भी जल की ही भांति विकल, अविरल बहता है । सो प्राणवान जीवन, मानव संस्कृति का उल्लास उपहार लिए उन चारों राहों की संधि पर मिलता था जिसके एक कोण में उस प्रवाह से मिल एकांत शुष्क आज वह ठूंठ खड़ा है। उसके अभाग्यों की परंपरा में संभवतः एक ही सुखद अपबाट है उसके अंश का
जनसंकुल का क्या आशय है?
जनसंपर्क -युक्त
भीड़-भाड़ से भरे
जनसमूह से रहित
जनजीवन से हीन
Correct answer
जनसंपर्क -युक्त
प्रस्तुत गद्यांश को पढ़िए और उचित विकल्पों का चयन | करके उत्तर दीजिये:
रास्ते पर खड़ा ये आम का पेड़, सदा से ठूंठ नहीं है। दिन थे जब वह हरा भरा था और उस जनसंकुल चौराहे पर । अपनी छतनार डालियों से बटोहियों की थकान अनजाने दूर करता था। पर मैंने उसे सदा ठूंठ ही देखा है। पत्रहीन, शाखाहीन, निरवलंब, जैसे पृथ्वी रूपी आकाश से सहसा निकलकर अधर में ही टंग गया हो। रात में वह काले भूत-सा लगता है, दिन में उसकी छाया इतनी गहरी नहीं हो पाती जितना काला उसका जिस्म है और अगर चितेरे। को छायाचित्र बनाना हो तो शायद उसका-सा 'अभिप्राय' और न मिलेगा। प्रचंड धूप में भी उसका सूखा शरीर उतनी ही गहरी छाया ज़मीन पर डालता जैसे रात की उजियारी चांदनी में जब से होश संभाला है, जब से आँख खोली है, देखने का अभ्यास किया है, तब से बराबर मुझे उसका निस्पंद, नीरस, अर्थहीन शरीर ही दिख पड़ा है।
पर पिछली पीढ़ी के जानकार कहते हैं कि एक जमाना था जब पीपल और बरगद भी उसके सामने शरमाते थे और उसके पत्तों से, उसकी टहनियों और डालों से टकराती हवा की सरसराहट दूर तक सुनाई पड़ती थी। पर आज वह नीरव है, उस चौराहे का जवाब जिस पर उत्तर- दक्षिण, पूरब पश्चिम चारों ओर की राहें मिलती हैं और जिनके सहारे जीवन अविरल बहता है। जिसने कभी जल को जीवन की संज्ञा दी, उसने निश्चय जाना होगा कि | प्राणवान जीवन भी जल की ही भांति विकल, अविरल बहता है । सो प्राणवान जीवन, मानव संस्कृति का उल्लास उपहार लिए उन चारों राहों की संधि पर मिलता था जिसके एक कोण में उस प्रवाह से मिल एकांत शुष्क आज वह ठूंठ खड़ा है। उसके अभाग्यों की परंपरा में संभवतः एक ही सुखद अपबाट है उसके अंश का
आम की छतनार डालियों के कारण क्या होता था ?
यात्रियों को आम के फल खाने को मिलते थे ।
चारों ओर अँधेरा होता था ।
यात्रियों की थकान मिटती थी और विश्राम मिलता था ।
यात्रियों को प्राणवायु मिलती थी।
Correct answer
यात्रियों को आम के फल खाने को मिलते थे ।