पाठ्यपुस्तक के दो पक्ष होते हैं- अंतः पक्ष तथा बाह्य पक्ष
- अंतः पक्ष- पाठ्य-पुस्तक का अध्ययन पक्ष अथवा अंतः पक्ष पाठय-पुस्तक में दी जाने वाली विषय-सामग्री की ओर संकेत करता है। इसके अंतर्गत विषय-सामग्री सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
- बाह्य पक्ष- पाठ्य पुस्तक के बाहय अथवा रूपात्मक पक्ष में पाठ्य पुस्तक का स्वरूप, अच्छी जिल्द, आवरण पृष्ठ, मुद्रण, शीर्षक अध्ययन-पक्ष का मूल संदर्भ पाठ्यसामग्री से है।
अतः हम कह सकते हैं कि जिल्द पाठ्यपुस्तक के आन्तरिक रूप में सम्मिलित तत्त्व नहीं है।
Additional Information
आंतरिक गुण या आंतरिक विशेषताएँ :- पाठ्यपुस्तक के आंतरिक गुण ही उत्तम पुस्तक के मानदण्ड होते हैं, जो निम्न है-
विषयवस्तु- ज्ञान का विकास, बोधगम्यता, मौलिकता, साहित्यिक रसानुभूति, साहित्यिक रुचि का विकास एवं वांछित अभिवृत्तियों का पोषण करने वाली विषय सामग्री का चयन पाठ्यपुस्तक का आंतरिक गुण है।
भाषा- पाठ्यपुस्तक की भाषा छात्रों के स्तर के अनुकूलन होनी चाहिए। किसी भी स्थिति में पाठ्यपुस्तक की भाषा इतनी विलष्ट होनी चाहिए की छात्र उसे समझ ही ना सके।
- भाषा व्याकरण की दृष्टि से शुध्द होनी चाहिए।
- भाषा सरल व सुबोध होनी चाहिए।
- पाठ्यपुस्तक की भाषा ऐसी होकी सरल से कठिन व ज्ञान से अज्ञान के क्रम में छात्रों का शब्द एक सूक्ति-भंडार विकसित हो।
शैली- पाठ्यपुस्तक की लेखन शैली भी पाठ्यपुस्तक को आकर्षक बनाने में सहायक होती है शैली की प्राप्ति से निम्न बातो को ध्यान देने योग्य है।
- पाठ्यपुस्तक की शैली छात्रो के स्तरानुकुल होनी चाहिए।
- पाठ्यपुस्तक की शैली में विविधता होनी चाहिए। इसमें पाठ्यपुस्तक में एकरसता हो जाती है।
- शैली में माधुर्य, ओज एवं प्रसाद गुण आवश्यक है।
- शैलियों में संतुलन भी होना चाहिए
व्याख्या एवं सामग्री- पाठ्यपुस्तक की सामग्री के प्रत्येक पाठ में कुछ नवीन शब्द अवन वाक्वंश प्रयुक्त होती है जिसकी व्याख्या करना आवश्क होता है।
- प्रत्येक पाठ के अंत में या पुस्तक के अंत में पाठों के क्रमकसार उन पाठो में आए कठिन शब्दों ,सूक्तियो तथा मुहावरों का अर्थ स्पष्ट करना चाहिए।
- शब्दों को व्याख्या के साथ-साथ पाठ में आए नवीन नामों, वस्तुओ , स्थानों एंव तथ्यों आदि को टिप्पणी देकर स्पष्ट करनी चाहिए।
- पाठ में आए पारिभाषिक शब्दों को स्पष्ट करना चाहिए।
- चित्र- बच्चों चित्र देखने में बहुत रूचि लेते है अंत प्रत्येक पाठ में पाठ्यवस्तु से सम्बन्धित श्वेत-श्याम या रंगीन चित्र का भी समावेश करना चाहिए।
- अभ्यासार्थ प्रश्न- प्रत्येक पाठ के अंत में अभ्यास करने के लिए विभिन्न प्रकार के वस्तुपरक , लघु-उत्तर एवं निश्न्धात्मक प्रश्न दिए जाने चाहिए | इससे छात्र पाठ को पढ़ने के उपरांत अपना मुल्यांकन कर सकेंगे पाठ को दोहराने में भी सहायता मिलेगी