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Question 101

REET 2022• Hindi - II

इनमें से प्रक्षेपक सामग्री नहीं है:

  1. AOption (a)

    स्लाइड प्रोजेक्टर

  2. BOption (b)

    ग्रामोफोन

  3. COption (c)

    ओवरहेड प्रोजेक्टर

  4. DOption (d)

    एपिडाइस्कोप

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Correct answer

Answer: (b)B.

ग्रामोफोन

Why this answer is correct

प्रक्षेपित सहायक सामग्री मशीन का उपयोग करके दिवार या स्क्रीन पर "प्रक्षेपित" होती है। प्रक्षेपित सहायक सामग्री प्रक्षेपण का उपयोग करके एक स्क्रीन पर दर्शाया जाने वाला दृश्यक होता है। 

Key Points

  • ओवर हेड प्रोजेक्टर (OHP) का उपयोग सामान्यतौर स्क्रीन पर छवियों को प्रक्षेपित करने के लिए किया जाता है।
  • अपारदर्शी प्रक्षेपक, स्लाइड, एल.सी.डी. स्क्रीन और टी.वी. पैनल अन्य अनुमानित सहायक सामग्री हैं।
  • ये सहायक सामग्री शिक्षण सामग्री को आसान और रोचक बनाती हैं।

प्रक्षेपित सहायक सामग्री के उदाहरण: परिचित्रदर्शी, स्लाइड प्रक्षेपक, फिल्म, वीडियो, एपिडाइस्कोप, कॉम्पैक्ट डिस्क या सीडी, कंप्यूटर और पावरपॉइंट प्रस्तुति।

Additional Information 

  • ग्रामोफोन: ग्रामोफोन एक श्रव्य सहायक सामग्री है।

Question 102

REET 2022• Hindi - II

मूल्यांकन के पक्ष में सम्मिलित है:

  1. AOption (a)

    मात्रात्मक पक्ष।

  2. BOption (b)

    संरचनात्मक पक्ष।

  3. COption (c)

    ज्ञानात्मक पक्ष।

  4. DOption (d)

    अप्रेरणात्मक पक्ष।

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Correct answer

Answer: (c)C.

ज्ञानात्मक पक्ष।

Why this answer is correct

ब्लूम की टैक्सोनॉमी को तीन-स्तरीय पदा���ुक्रमित मॉडल माना जाता है। ब्लूम के वर्गीकरण के तीन स्तरों पर नीचे चर्चा की गयी है -

  • ज्ञानात्मक पक्ष
  • भावात्मक पक्ष
  • मनोगत्यात्मक पक्ष

ज्ञानात्मक पक्ष- ब्लूम के वर्गीकरण के संज्ञानात्मक क्षेत्र में ज्ञान और बौद्धिक कौशल विकास शामिल है। जटिलता स्तरों के संदर्भ में, संज्ञानात्मक क्षेत्र के छह उप-शीर्ष हैं।

  1. ज्ञान - आवश्यक रूप से समझने, उपयोग करने या बिना परिवर्तन के पहले से संज्ईञान की किसी चीज़ को याद रखना या पहचानना।
  2. समझ - आवश्यक रूप से किसी अन्य चीज़ से संबंधित किए बिना संप्रेषित की जा रही सामग्री को समझना।
  3. अनुप्रयोग - किसी विशेष समस्या को हल करने के लिए सामान्य अवधारणाओं का उपयोग करना।
  4. विश्लेषण - किसी चीज को भागों में तोड़ना।
  5. संश्लेषण - विभिन्न भागों या विचारों को मिलाकर कुछ नया बनाना।
  6. **मूल्यांकन - विषयवस्तु या विधियों के मूल्य को देखते हुए उन्हें किसी विशेष स्थिति में लागू किया जा सकता है।**​

​अतः यह निष्कर्ष निकलता है कि ​ज्ञानात्मक पक्ष में मूल्यांकन के पक्ष सम्मिलित है। 

Additional Information

  • भावात्मक पक्ष- भावात्मक पक्ष सीखने के उद्देश्यों का वर्णन करता है जो एक भावना स्वर, एक भावना, या स्वीकृति या अस्वीकृति के स्तर पर जोर देता है। भावात्मक क्षेत्र के पाँच उपशीर्ष हैं।
  • प्राप्त करना- कुछ विचारों, सामग्री, या घटनाओं के अस्तित्व के प्रति जागरूक या संवेदनशील होना और उन्हें सहन करने के लिए तैयार होना है। उदाहरणों में अंतर करना, स्वीकार करना, सुनना (के लिए), जवाब देना शामिल हैं।
  • सक्रिय रूप से प्रतिक्रिया करने से जुड़े विचारों, सामग्रियों या घटनाओं के लिए कुछ छोटे उपाय में प्रतिक्रिया देना प्रतिबद्ध है। उदाहरण अनुपालन करना, अनुसरण करना, प्रशंसा करना, स्वयंसेवा करना, खाली समय बिताना, प्रशंसा करना आदि हैं।
  • कुछ विचारों, सामग्रियों या घटनाओं को महत्व देने के रूप में दूसरों द्वारा माना जाने के लिए तैयार है। उदाहरणों में मापी गई दक्षता को बढ़ाना, हटाना करना, कम करना, समर्थन करना, बहस करना शामिल हैं।
  • संगठन को मूल्य को उन लोगों से जोड़ना है जो पहले से ही आयोजित हैं और इसे एक सामंजस्यपूर्ण और आंतरिक रूप से सुसंगत दर्शन में लाते हैं। उदाहरण चर्चा करना, सिद्धांत बनाना, तैयार करना, संतुलन बनाना, जांचना है।
  • मूल्य या मूल्य समुच्चय द्वारा अभिलक्षणन उन मूल्यों के अनुसार लगातार कार्य करना है जिन्हें उसने आंतरिक रूप दिया है। उदाहरणों में संशोधित करना, आवश्यकता करना, मूल्य में उच्च दर्जा देना, बचना, विरोध करना, प्रबंधन करना, समाधान करना शामिल हैं।
  • मनोगत्यात्मक पक्ष- मनोगत्यात्मक पक्ष उन उद्देश्यों को संदर्भित करता है जो प्रतिवर्ती क्रियाओं, व्याख्यात्मक गतिविधियों और विवेकपूर्ण शारीरिक कार्यों के लिए विशिष्ट हैं। मनोगत्यात्मक पक्ष के छह उप-शीर्ष हैं।
  • प्रतिवर्ती गतिविधि - ऐसी क्रियाएं जो किसी उद्दीपक के जवाब में अनैच्छिक रूप से होती हैं।
  • बुनियादी मौलिक गतियां - प्रतिवर्त गतिविधियों के संयोजन से बनने वाले सहज आंदोलन स्वरूप।
  • अवधारणात्मक क्षमताएं - इंद्रियों के माध्यम से प्राप्त उद्दीपकों का उपयुक्त गतिविधियों में अनुवाद।
  • शारीरिक क्षमताएँ - बुनियादी गतियाँ और क्षमताएँ जो अधिक उच्च कुशल गतिविधियों के विकास के लिए आवश्यक हैं।
  • कुशल गतिविधियाँ - अधिक जटिल गतिविधियों के लिए एक निश्चित डिग्री दक्षता की आवश्यकता होती है।
  • गैर-विवेकपूर्ण गतिविधियाँ - शरीर की गति के माध्यम से संवाद करने की क्षमता।

Question 103

REET 2022• Hindi - II

मानसिक योग्यता का परीक्षण किया जाता है :

  1. AOption (a)

    उपलब्धि परीक्षण में।

  2. BOption (b)

    बुद्धि परीक्षण में।

  3. COption (c)

    व्यक्तित्व परीक्षण में।

  4. DOption (d)

    इनमें से कोई नहीं।

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Correct answer

Answer: (b)B.

बुद्धि परीक्षण में।

Why this answer is correct

बुद्धि उन गतिविधियों को करने की क्षमता है जिसे कठिनाई, जटिलता, अमूर्तता, किफ़ायत, किसी लक्ष्य के लिए अनुकूलता, सामाजिक मूल्य और मूल के उद्भव द्वारा वर्णित की जाती है, और ऐसी गतिविधियों को उन स्थितियों में बनाए रखना जो ऊर्जा की एकाग्रता और भावनात्मक प्रतिरोध की मांग करती हैं।

  • बिने के अनुसार, 'बुद्धि का अर्थ अच्छी तरह से न्याय करने, अच्छी तरह से तर्क करने और अच्छी तरह से समझने की क्षमता है।'
  • टर्मन के अनुसार, 'बुद्धि का अर्थ अमूर्त विचारों के संदर्भ में सोचने की क्षमता है।'
  • वेचस्लेर के अनुसार, 'बुद्धि का अर्थ उद्देश्यपूर्ण रूप से कार्य करने, तर्कसंगतता रूप से सोचना और अपने वातावरण का प्रभावी रूप से सामना करने की व्यक्ति की समग्र या वैश्विक क्षमता होती है।'

बुद्धि परीक्षण की सहायता से व्यक्ति की मानसिक योग्यता का परीक्षण किया जाता है।

Key Points 

  • बुद्धि परीक्षण को संज्ञानात्मक कार्यों और बौद्धिक क्षमता के सामान्य स्तर का मूल्यांकन करने के लिए एक परीक्षण के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।
  • बुद्धि परीक्षणों को कई आधारों पर वर्गीकृत किया जाता है: व्यक्तिगत और समूह परीक्षण (लक्ष्य) और शाब्दिक और अशाब्दिक परीक्षण।
  • बुद्धि पैमाने के कई प्रकार हैं:
  • स्टैनफोर्ड-बिने परीक्षण
  • वेश्लर बुद्धि पैमाना

अतः, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि बुद्धि परीक्षण में मानसिक योग्यता का परीक्षण किया जाता है।

Additional Informationउपलब्धि परीक्षण- हिंदी शिक्षण के दौरान बच्चों के भाषा ज्ञान संबंधी उपलब्धि की जांच उपलब्धि परीक्षण से की जाती है।

व्यक्तित्व परीक्षण:

  • आकलन इस धारणा पर आधारित है कि प्रत्येक व्यक्ति व्यक्तित्व लक्षणों के संबंध में दूसरे से भिन्न होता है। यहां तक कि अगर वे एक ही लक्षण के अधिकारी हैं, तो उनका व्यवहार अलग-अलग स्थितियों में उनके अनुभवों के संदर्भ में अलग-अलग होगा और इस प्रकार एक व्यक्तित्व मूल्यांकन यह स्पष्ट कर देगा कि वास्तव में इस अंतर में क्या योगदान देता है और किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के विशिष्ट क्या हैं।

Question 104

REET 2022• Hindi - II

“मूल्यांकन की प्रक्रिया की व्यापकता – छात्र के समस्त व्यक्तित्व पर अपने प्रसार का उल्लेख करती है, न कि केवल उसकी बौद्धिक उपलब्धि का।” उपर्युक्त कथन किसका है ?

  1. AOption (a)

    टारगर्सन का।

  2. BOption (b)

    एडम्स का।

  3. COption (c)

    रेमर्स एवं गेज का।

  4. DOption (d)

    क्विलिन का।

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Correct answer

Answer: (c)C.

रेमर्स एवं गेज का।

Why this answer is correct

मूल्यांकन- किसी वस्तु के मूल्य, गुणवत्ता, महत्व, राशि, डिग्री या स्थिति का मूल्यांकन या परीक्षण या मूल्यांकन करने का कार्य या परिणाम है। मूल्यांकन सही, सुधार, परिवर्तन, रेटिंग या मूल्य निर्धारण के दृष्टिकोण से किया जाता है।

Important Points मूल्याङ्कन के क्षेत्र- 

  • मूल्यांकन का क्षेत्र बहुत व्यापक हैं।
  • आर. एस. वर्मा के अनुसार," मूल्यांकन से हमारा अभिप्राय उन क्षेत्रों से हैं जिनमें व्यवहारगत परिवर्तन हो सकते हैं। दूसरे शब्दों में, किसका मूल्यांकन किया जाय-प्रश्न का उत्तर ही मूल्यांकन का क्षेत्र निर्धारित करना हैं। मूल्यांकन द्वारा हम व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों का पता लगाते हैं। ये आयाम शारीरिक, बौद्धिक, संवेगात्मक, सामाजिक एवं नैतिक क्षेत्रों से संबंधित हो सकते हैं।"
  • संक्षेप में मूल्यांकन का संबंध केवल छात्र की बौद्धिक उपलब्धि से न होकर उसके संपूर्ण व्यक्तित्व से हैं जैसा कि रेमर्स तथा गेज ने कहा है कि ," मूल्यांकन की प्रक्रिया की व्यापकता-छात्र के समस्त व्यक्तित्व पर अपने प्रसार का उल्लेख करती हैं, न की सिर्फ उसकी बौद्धिक उपलब्धि का।"

​अतः यह निष्कर्ष निकलता है कि ​“मूल्यांकन की प्रक्रिया की व्यापकता – छात्र के समस्त व्यक्तित्व पर अपने प्रसार का उल्लेख करती है, न कि केवल उसकी बौद्धिक उपलब्धि का ।” यह  कथन रेमर्स एवं गेज का है। 

Additional Information

  • क्विलेन तथा हन्नाके अनुसार,” विद्यालय द्वारा हुए बालक के व्यवहार परिवर्तन के विषय में साथियों के संकलन तथा उनकी व्याख्या करने की प्रक्रिया ही मूल्यांकन है।“
  • टोरगेर्सन तथा एडम्स के अनुसार,” मूल्यांकन का अर्थ है किसी वस्तु या प्रक्रिया का मूल्य निश्चित करना। इस प्रकार शैक्षिक मूल्यांकन से तात्पर्य है शिक्षण प्रक्रिया तथा सीखने की क्रियाओं से उत्पन्न अनुभवों की उपयोगिता के बारे में निर्णय देना।“

Question 105

REET 2022• Hindi - II

उपचारात्मक शिक्षण के संबंध में सत्य कथन है :

  1. AOption (a)

    विद्यार्थी को अधिगम कठिनाई में सहायता प्रदान करने के लिए उपचारात्मक शिक्षण की निश्चित एवं निर्धारित प्रक्रिया होती है।

  2. BOption (b)

    उपचारात्मक शिक्षण पूरी कक्षा के लिए समान होता है।

  3. COption (c)

    उपचारात्मक शिक्षण संस्था प्रधान और अभिभावकों की देखरेख में होता है।

  4. DOption (d)

    उपचारात्मक शिक्षण व्यक्तिगत अधिक होता है।

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Correct answer

Answer: (d)D.

उपचारात्मक शिक्षण व्यक्तिगत अधिक होता है।

Why this answer is correct

उपचारात्मक शिक्षण- उपचारात्मक शिक्षण से तात्पर्य बच्चों की शिक्षण संबंधी कमजोरियों/कठिनाइयों को दूर करते हुए शिक्षण करने से है। यह विद्यार्धियों की त्रुटियों का संसोधन करने से समबन्धित है। यह निदानात्मक शिक्षण से जुड़ा हुआ है और विद्यार्थियों की शिक्षण संबंधी कमियों का सही अवलोकन करने में मदद करता है वहीं उपचारात्मक शिक्षण द्वारा उन कमियों और त्रुटियों को दूर करने का प्रयास किया जाता है।

  • साधारणतौर पर देखा जाये तो अधिगम के दौरान प्रत्येक बालक की सीखने की क्षमता भिन्न होती है तथा बालक भिन्न प्रकार की समस्याओं का सामना करते हैं।
  • अधिगम के दौरान आने वाली कठिनाई का निदान कर उनका व्यक्तिगत रूप से समाधान करना ही उपचारात्मक शिक्षण का लक्ष्य होता है।
  • इस विधि में बालक के अभिरूचि के अनुरूप शिक्षण विधि अपनायी जाती है।

Important Points  उपचारात्मक शिक्षण के प्रकार- उपचारात्मक शिक्षण के मुख्यतः दो प्रकार/विधि  है जो निम्नलिखित है-

  1. व्यक्तिगत विधि- 
  • ​​​प्रत्येक समस्यात्मक बालक पर व्यक्तिगत ध्यान देकर उनकी समस्याओं का व्यक्तिगत समाधान किया जाना चाहिए।
  • उपचार करते समय परिस्थितियों और वातावरण को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
  • प्रेम और सहानुभूति के साथ व्यक्तिगत उपचार किया जाना चाहिए।
  1. सामूहिक विधि- ​​
  • ​​​यदि अनेक बालको में एक ही प्रकार की समस्या दिखाई पड़ती है तो उस स्तिथि में बालको के समूह बनाकर उनके समस्या को दूर किया जाना चाहिए।
  • इनमे समस्याओं का सामूहिक उपचार करने से सभी छात्रों को लाभ पहुँचता है।
  • इस विधि में छात्र एक-दूसरे की सहायता भी करते है।

अतः यह निष्कर्ष निकलता है कि उपचारात्मक शिक्षण व्यक्तिगत अधिक होता है। उपचारात्मक शिक्षण के संबंध में सत्य कथन है।

Question 106

REET 2022• Hindi - II

उपचारात्मक शिक्षण कितने प्रकार का होता है ?

  1. AOption (a)

    चार

  2. BOption (b)

    तीन

  3. COption (c)

    दो

  4. DOption (d)

    एक

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Correct answer

Answer: (c)C.

दो

Why this answer is correct

उपचारात्मक शिक्षण- उपचारात्मक शिक्षण से तात्पर्य बच्चों की शिक्षण संबंधी कमजोरियों/कठिनाइयों को दूर करते हुए शिक्षण करने से है। यह विद्यार्धियों की त्रुटियों का संसोधन करने से समबन्धित है। यह निदानात्मक शिक्षण से जुड़ा हुआ है और विद्यार्थियों की शिक्षण संबंधी कमियों का सही अवलोकन करने में मदद करता है वहीं उपचारात्मक शिक्षण द्वारा उन कमियों और त्रुटियों को दूर करने का प्रयास किया जाता है।

Important Points उपचारात्मक शिक्षण के प्रकार- उपचारात्मक शिक्षण के मुख्यतः दो प्रकार/विधि  है जो निम्नलिखित है-

  1. व्यक्तिगत विधि- 
  • ​​​प्रत्येक समस्यात्मक बालक पर व्यक्तिगत ध्यान देकर उनकी समस्याओं का व्यक्तिगत समाधान किया जाना चाहिए।
  • उपचार करते समय परिस्थितियों और वातावरण को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
  • प्रेम और सहानुभूति के साथ व्यक्तिगत उपचार किया जाना चाहिए।
  1. **सामूहिक विधि- **​​
  • ​​​यदि अनेक बालको में एक ही प्रकार की समस्या दिखाई पड़ती है तो उस स्तिथि में बालको के समूह बनाकर उनके समस्या को दूर किया जाना चाहिए।
  • इनमे समस्याओं का सामूहिक उपचार करने से सभी छात्रों को लाभ पहुँचता है।
  • इस विधि में छात्र एक-दूसरे की सहायता भी करते है।

अतः यह निष्कर्ष निकलता है कि उपचारात्मक शिक्षण दो प्रकार का होता है।

Question 107

REET 2022• Hindi - II

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्न के उत्तर दीजिए :

क्रोध शांति भंग करने वाला मनोविकार है। एक का क्रोध दूसरे में भी क्रोध का संचार करता है। जिसके प्रति क्रोध प्रदर्शन होता है वह तत्काल अपमान का अनुभव करता है और इस दुःख पर उसकी भी त्योरी चढ़ जाती है। यह विचार करने वाले बहुत थोड़े निकलते हैं कि हम पर जो क्रोध प्रकट किया जा रहा है वह उचित या अनुचित । इसी से धर्म, नीति और शिष्टाचार तीनों में क्रोध के निरोध का उपदेश पाया जाता है। संत लोग तो खलों के वचन सहते ही हैं, दुनियादार लोग भी न जाने कितनी ऊँची-नीची पचाते रहते हैं। सभ्यता के व्यवहार में भी क्रोध नहीं, क्रोध के चिह्न दबाये जाते हैं । इस प्रकार का प्रतिबंध समाज की सुख-शांति के लिए बहुत आवश्यक है । पर इस प्रतिबंध की भी सीमा है। यह परपीड़कोन्मुख क्रोध तक नहीं पहुँचता। क्रोध के निरोध का उपदेश अर्थपरायण और धर्मपरायण दोनों देते हैं । पर दोनों में जिसे अति से अधिक सावधान रहना चाहिए वही कुछ भी नहीं रहता। बाकी रुपया वसूल करने का ढंग बताने वाला चाहे कड़े पड़ने की शिक्षा दे ��ी दे, पर धज के साथ धर्म की ध्वजा लेकर चलने वाला धोखे में भी क्रोध को पाप का रूप ही कहेगा । क्रोध रोकने का अभ्यास ठगों और स्वार्थियों को सिद्धों और साधकों से कम नहीं होता।

'सुख-शांति' शब्द में कौन सा समास है ?

  1. AOption (a)

    अव्ययीभाव समास

  2. BOption (b)

    तत्पुरुष समास

  3. COption (c)

    द्वंद्व समास

  4. DOption (d)

    द्विगु समास

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Correct answer

Answer: (c)C.

द्वंद्व समास

Why this answer is correct

'सुख-शांति' शब्द में समास है-  'द्वंद्व समास' 

  • 'सुख-शान्ति' का विच्छेद करने पर 'सुख और शान्ति' होगा। यहाँ 'द्वंद्व समास' है।
  • जिस समास में समस्तपद के दोनों पद प्रधान हों या दोनों पद सामान हों एवं दोंनों पदों को मिलाते समय ‘और’, ‘अथवा’, ‘या’, ‘एवं’ आदि योजक लुप्त हो जाएँ, वह समास द्वंद्व समास कहलाता है।
  • उदाहरण-
  • अपना-पराया = अपना और पराया

Key Pointsद्वंद्व समास के कुछ अन्य उदाहरण:- 

  • खरा-खोटा = खरा या खोटा
  • राधा-कृष्ण = राधा अथवा कृष्ण
  • राजा-प्रजा = राजा एवं प्रजा
  • गुण-दोष = गुण और दोष

Additional Information

अव्ययीभाव समास:- - जिस समास में पहला या पूर्वपद अव्यय होता है और उसका अर्थ प्रधान होता है। - अव्यय के संयोग से समस्तपद भी अव्यय बन जाता है। इसमें पूर्वपद प्रधान होता है उसे समास अव्ययीभाव समास कहलाता है। - अव्ययीभाव समास के पहले पद में अनु, आ, प्रति, यथा, भर, हर आदि आते है। उदाहरण- - आजीवन = जीवन भर - यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार तत्पुरुष समास:- - तत्पुरुष समास वह होता है, जिसमें उत्तरपद प्रधान होता है, अर्थात प्रथम पद गौण होता है एवं उत्तर पद की प्रधानता होती है व समास करते वक़्त बीच की विभक्ति का लोप हो जाता है। - इस समास में आने वाले कारक चिन्हों को, से, के लिए, से, का/के/की, में, पर आदि का लोप होता है। उदाहरण- - रसोईघर = रसोई के लिए घर - शोकाकुल = शौक से आकुल द्विगु समास:- - वह समास जिसका पहला पद संख्यावाचक विशेषण होता है तथा समस्तपद किसी समूह या फिर किसी समाहार का बोध करता है तो वह द्विगु समास कहलाता है। उदाहरण- - नवरात्र = नौ रात्रियों का समूह - त्रिलोक = तीन लोकों का समाहार

Question 108

REET 2022• Hindi - II

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्न के उत्तर दीजिए :

क्रोध शांति भंग करने वाला मनोविकार है। एक का क्रोध दूसरे में भी क्रोध का संचार करता है। जिसके प्रति क्रोध प्रदर्शन होता है वह तत्काल अपमान का अनुभव करता है और इस दुःख पर उसकी भी त्योरी चढ़ जाती है। यह विचार करने वाले बहुत थोड़े निकलते हैं कि हम पर जो क्रोध प्रकट किया जा रहा है वह उचित या अनुचित । इसी से धर्म, नीति और शिष्टाचार तीनों में क्रोध के निरोध का उपदेश पाया जाता है। संत लोग तो खलों के वचन सहते ही हैं, दुनियादार लोग भी न जाने कितनी ऊँची-नीची पचाते रहते हैं। सभ्यता के व्यवहार में भी क्रोध नहीं, क्रोध के चिह्न दबाये जाते हैं । इस प्रकार का प्रतिबंध समाज की सुख-शांति के लिए बहुत आवश्यक है । पर इस प्रतिबंध की भी सीमा है। यह परपीड़कोन्मुख क्रोध तक नहीं पहुँचता। क्रोध के निरोध का उपदेश अर्थपरायण और धर्मपरायण दोनों देते हैं । पर दोनों में जिसे अति से अधिक सावधान रहना चाहिए वही कुछ भी नहीं रहता। बाकी रुपया वसूल करने का ढंग बताने वाला चाहे कड़े पड़ने की शिक्षा दे भी दे, पर धज के साथ धर्म की ध्वजा लेकर चलने वाला धोखे में भी क्रोध को पाप का रूप ही कहेगा । क्रोध रोकने का अभ्यास ठगों और स्वार्थियों को सिद्धों और साधकों से कम नहीं होता।

'अनुचित' शब्द में उपसर्ग है

  1. AOption (a)

    अन

  2. BOption (b)

    अनु

  3. COption (c)

    अन्

  4. DOption (d)

    अ

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Correct answer

Answer: (c)C.

अन्

Why this answer is correct

'अनुचित' शब्द में उपसर्ग है- 'अन्'

  • अन् +  उचित = अनुचित
  • 'अन्' (नहीं/बुरा) उपसर्ग और 'उचित' (ठीक) मूलशब्द |
  • अर्थ: जो उचित न हो, नामुनासिब, बेजा।
  • विलोम शब्द - 'उचित'
  • विशेषण शब्द

Key Points

  • उपसर्ग शब्द के शुरू में जुड़ता है।

Additional Informationकुछ महत्वपूर्ण उपसर्ग शब्द:-

  • अन् (नहीं/बुरा) - अनन्त, अनुपयोगी, अनुपयुक्त, अनागत, अनिष्ट, अनुपम।
  • अन (नही) - अनबन, अनपढ़, अनजान, अनहोनी, अनमोल, अनचाहा।
  • अनु (पीछे)-  अनुचर, अनुज, अनुकरण, अनुकूल, अनुनाद, अनुभव।
  • अ (नही) -  अहिंसा, अलौकिक, अखंड, अनशन, अकाल, अकर्षक,अकारण।
  • सम् (अच्छी तरह) - सन्तोष, संगठन,संलग्न, संकल्प, संशय, संरक्षा।

Question 109

REET 2022• Hindi - II

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्न के उत्तर दीजिए :

क्रोध शांति भंग करने वाला मनोविकार है। एक का क्रोध दूसरे में भी क्रोध का संचार करता है। जिसके प्रति क्रोध प्रदर्शन होता है वह तत्काल अपमान का अनुभव करता है और इस दुःख पर उसकी भी त्योरी चढ़ जाती है। यह विचार करने वाले बहुत थोड़े निकलते हैं कि हम पर जो क्रोध प्रकट किया जा रहा है वह उचित या अनुचित । इसी से धर्म, नीति और शिष्टाचार तीनों में क्रोध के निरोध का उपदेश पाया जाता है। संत लोग तो खलों के वचन सहते ही हैं, दुनियादार लोग भी न जाने कितनी ऊँची-नीची पचाते रहते हैं। सभ्यता के व्यवहार में भी क्रोध नहीं, क्रोध के चिह्न द��ाये जाते हैं । इस प्रकार का प्रतिबंध समाज की सुख-शांति के लिए बहुत आवश्यक है । पर इस प्रतिबंध की भी सीमा है। यह परपीड़कोन्मुख क्रोध तक नहीं पहुँचता। क्रोध के निरोध का उपदेश अर्थपरायण और धर्मपरायण दोनों देते हैं । पर दोनों में जिसे अति से अधिक सावधान रहना चाहिए वही कुछ भी नहीं रहता। बाकी रुपया वसूल करने का ढंग बताने वाला चाहे कड़े पड़ने की शिक्षा दे भी दे, पर धज के साथ धर्म की ध्वजा लेकर चलने वाला धोखे में भी क्रोध को पाप का रूप ही कहेगा । क्रोध रोकने का अभ्यास ठगों और स्वार्थियों को सिद्धों और साधकों से कम नहीं होता।

'स्वार्थियों' शब्द का एकवचन होगा:

  1. AOption (a)

    स्वार्थित

  2. BOption (b)

    सुआर्थी

  3. COption (c)

    सूआर्थी

  4. DOption (d)

    स्वार्थी

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Correct answer

Answer: (d)D.

स्वार्थी

Why this answer is correct

'स्वार्थियों' शब्द का एकवचन होगा- 'स्वार्थी'

  • स्वार्थी = स्व + अर्थी 
  • (अ + अ = आ ) दीर्घ स्वर संधि
  • अर्थ: स्वार्थपरायण, मतलबी, खुदगरज।
  • विलोम शब्द - 'निस्वार्थी'
  • अन्य सभी विकल्प व्याकरण की दृष्टि से गलत है।

Key Pointsएकवचन:-

  • संज्ञा के जिस रूप से किसी व्यक्ति, वस्तु, प्राणी, पदार्थ आदि के एक होने का बोध हो या पता चलता है उसे एकवचन कहते हैं।
  • जैसे- लड़का, गाय, सिपाही घोड़ा, बच्चा, कपड़ा, माला, पुस्तक, स्त्री, टोपी, मोर आदि।

Additional Information बहुवचन:-

  • संज्ञा के जिस रुप से किसी व्यक्ति, वस्तु, प्राणी, पदार्थ आदि के एक से अधिक होने का बोध होता है या पता चलता है उसे बहुवचन कहते हैं।
  • जैसे- लड़के, बच्चे कपड़े पुस्तकें स्त्रियां टोपिया, गाड़ियां, ठेले, नदियां आदि।

Question 110

REET 2022• Hindi - II

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्न के उत्तर दीजिए :

क्रोध शांति भंग करने वाला मनोविकार है। एक का क्रोध दूसरे में भी क्रोध का संचार करता है। जिसके प्रति क्रोध प्रदर्शन होता है वह तत्काल अपमान का अनुभव करता है और इस दुःख पर उसकी भी त्योरी चढ़ जाती है। यह विचार करने वाले बहुत थोड़े निकलते हैं कि हम पर जो क्रोध प्रकट किया जा रहा है वह उचित या अनुचित । इसी से धर्म, नीति और शिष्टाचार तीनों में क्रोध के निरोध का उपदेश पाया जाता है। संत लोग तो खलों के वचन सहते ही हैं, दुनियादार लोग भी न जाने कितनी ऊँची-नीची पचाते रहते हैं। सभ्यता के व्यवहार में भी क्रोध नहीं, क्रोध के चिह्न दबाये जाते हैं । इस प्रकार का प्रतिबंध समाज की सुख-शांति के लिए बहुत आवश्यक है । पर इस प्रतिबंध की भी सीमा है। यह परपीड़कोन्मुख क्रोध तक नहीं पहुँचता। क्रोध के निरोध का उपदेश अर्थपरायण और धर्मपरायण दोनों देते हैं । पर दोनों में जिसे अति से अधिक सावधान रहना चाहिए वही कुछ भी नहीं रहता। बाकी रुपया वसूल करने का ढंग बताने वाला चाहे कड़े पड़ने की शिक्षा दे भी दे, पर धज के साथ धर्म की ध्वजा लेकर चलने वाला धोखे में भी क्रोध को पाप का रूप ही कहेगा । क्रोध रोकने का अभ्यास ठगों और स्वार्थियों को सिद्धों और साधकों से कम नहीं होता।

'परपीड़कोन्मुख' शब्द का सही संधि विच्छेद है:

  1. AOption (a)

    परपीड़ाक + उन्मुख

  2. BOption (b)

    परपीड़ा + ऊन्मुख

  3. COption (c)

    परपीड़क + उन्मुख

  4. DOption (d)

    परपीड़क + ऊन्मुख

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Correct answer

Answer: (c)C.

परपीड़क + उन्मुख

Why this answer is correct

'परपीड़कोन्मुख' शब्द का सही संधि विच्छेद है- 'परपीड़क + उन्मुख'

  • परपीड़क + उन्मुख = परपीड़कोन्मुख (अ + उ = ओ)
  • 'परपीड़कोन्मुख' शब्द में गुण संधि है।
  • अर्थ: दूसरों को कष्ट पहुँचाने के लिए उत्सुक व्यक्���ि।

Key Pointsगुण संधि:-

  • जब संधि करते समय (अ, आ) के साथ (इ, ई) हो तो ‘ए‘ बनता है, जब (अ, आ) के साथ (उ, ऊ) हो तो ‘ओ‘ बनता है,
  • जब (अ, आ) के साथ (ऋ) हो तो ‘अर‘ बनता है तो यह गुण संधि कहलाती है।

उदाहरण-

  • महा + ईश = महेश (आ + ई = ए)
  • ज्ञान + उपदेश = ज्ञानोपदेश (अ + उ = ओ)
  • देव + ऋषि = देवर्षि (अ + ऋ = अर्)