निर्देशः दिए गए गद्यांश को पढ़िए और उसके बाद पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
'लोक साहित्य के अध्ययन द्वारा हमें सम्बंधित जाति, समाज तथा राष्ट्र की सांस्कृतिक परम्पराओं तथा उनसे सम्बंधित परिवेश को समझने में सहायता मिलती है अर्थात लोक-साहित्य युग-बोध का एक अत्यंत महत्वपूर्ण साधन है। संस्कृति के उत्थान-पतन का जैसा वास्तविक चित्र लोक साहित्य में उपलब्ध होता है, अन्यत्र दुर्लभ है। लोक साहित्य वस्तुतः संस्कृति के स्वरूप की स्थापना करने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण साधन है।उदाहरण के लिए कागज़ के नोट के प्रति लोक-मानस की क्षोभ-मिश्रित वेदना की यह अभिव्यक्ति समस्त परिवेश को सजीव रूप में प्रस्तुत करती दिखाई देती है, यथा- “ भाभी चल्यो छेद को पईसा, जाय तू नार में लटकाय लीजो” या “तू काहे को बनवाबेगी हमेल, रुपैया है गयो कागज कौ?” लोक साहित्यकार अपने व लोक के जीवन में जो कुछ देखता-भोगता है उसको तथा उससे उत्पन्न प्रतिक्रियाओं को सहज स्वाभाविक रूप में अभिव्यक्त कर देता है। इसी कारण लोक साहित्य में स्थानों, रीति-रिवाज. व्रत-त्यौहार उत्सव-परम्पराओं आदि की सहज अभिव्यक्ति होती है। यथा- ब्रज के लोक साहित्य में महल, अटा, अटारी,चौमहला भवनों आदि का उल्लेख मिलता है।भोजन के सन्दर्भ में तरह-तरह की मिठाइयों, अचारों, मुरब्बों आदि के नाम के अतिरिक्त कभी-कभी तो खाद्य-सामग्री की, भोज्य-पदार्थों की एक लम्बी तालिका ही उपलब्ध हो जाती है, वस्त्राभूषण के सन्दर्भ में अनेक प्रकार के वस्त्रों, गहनों, अंजन, बिंदी, टिकुली आदि के उल्लेख मिलते हैं। पारिवारिक जीवन के विविध पक्ष,आज्ञापालक सुत, सेवारत पत्नी, सास-ससुर की लाडली बहू, सास-बहू के झगड़े, नन्द-भौजाई की कहा-सुनी, देवरानी-जेठानी की नोक-झोंक आदि देखने को मिलती है।
लोक साहित्य में मनोरंजन के साधनों - चौसर, शतरंज से लेकर लोक-नाट्यों के आयोजन, चिड़ी-उड़ान, गेंद, चकई, पतंग, गिल्ली-डंडा, आँख-मिचौनी, सांझी, टेसू, झैझी आदि लोक जीवन के खेलों का वर्णन मिलता है| सांस्कृतिक-जीवन के अत्यंत महत्वपूर्ण पक्षों की अभिव्यक्ति- लोक-विश्वासों, रूढ़ियों, मान्यताओं, पौराणिक मान्यताओं और जादू-टोने सम्बन्धी विश्वासों की भी जानकारी मिलती है। लोक साहित्य वस्तुतः लोक जीवन का दर्पण है। यह कथन सर्वथा समीचीन प्रतीत होता है कि 'लोक-साहित्य लोकसंस्कृति की आत्मा है और लोक-संस्कृति उसकी काया।"
लोक साहित्य को लोक जीवन का दर्पण क्यों कहा गया है?
- AOption (a)
क्योकिं लोक साहित्य संस्कृति के स्वरुप की स्थापना करने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण साधन है
- BOption (b)
क्योकिं 'लोक-साहित्य लोक-संस्कृति की आत्मा है
- COption (c)
क्योकिं लोक-साहित्यकार अपने जीवन में जो कुछ देखता-भोगता है उसको सहज स्वाभाविक रुप में अभिव्यक्त करता है।
- DOption (d)
क्योकिं लोक साहित्य में उस समाज की, संस्कृति, उत्थान पतन, परम्पराओं, रहन-सह��, खान-पान, मनोरंजन के साधनों, सामाजिक विश्वासों आदि को ज्यों का त्यों अभिव्यक्त करता है।
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Correct answer
क्योकिं लोक साहित्य में उस समाज की, संस्कृति, उत्थान पतन, परम्पराओं, रहन-सह��, खान-पान, मनोरंजन के साधनों, सामाजिक विश्वासों आदि को ज्यों का त्यों अभिव्यक्त करता है।
Why this answer is correct
सही उत्तर है- क्योकिं लोक साहित्य में उस समाज की, संस्कृति, उत्थान पतन, परम्पराओं, रहन-सहन, खान-पान, मनोरंजन के साधनों, सामाजिक विश्वासों आदि को ज्यों का त्यों अभिव्यक्त करता है।
Key Pointsगद्यांश के अनुसार-
- लोक साहित्य के अध्ययन द्वारा हमें सम्बंधित जाति, समाज तथा राष्ट्र की सांस्कृतिक परम्पराओं तथा उनसे सम्बंधित परिवेश को समझने में सहायता मिलती है,
- अर्थात लोक-साहित्य युग-बोध का एक अत्यंत महत्वपूर्ण साधन है।
- संस्कृति के उत्थान-पतन का जैसा वास्तविक चित्र लोक साहित्य में उपलब्ध होता है, अन्यत्र दुर्लभ है।
- लोक साहित्य वस्तुतः संस्कृति के स्वरूप की स्थापना करने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण साधन है।
- सांस्कृतिक-जीवन के अत्यंत महत्वपूर्ण पक्षों की अभिव्यक्ति- लोक-विश्वासों, रूढ़ियों, मान्यताओं, पौराणिक मान्यताओं और जादू-टोने सम्बन्धी विश्वासों की भी जानकारी मिलती है।
- लोक साहित्य वस्तुतः लोक जीवन का दर्पण है।
- यह कथन सर्वथा समीचीन प्रतीत होता है कि 'लोक-साहित्य लोकसंस्कृति की आत्मा है और लोक-संस्कृति उसकी काया।