Previous Year Paper

UGC NET Paper 2: Sanskrit 14th June 2023 Shift 2 (Previous Year Paper)

Held in 2023

100 questions120 minutes
With answers
Free

Paper last updated:

Practise under exam conditions

Take this paper as a timed mock test. Review your answers after you submit.

Attempt timed test

Questions & answers

Read the paper at your pace. Open an explanation when you need it.

Question 1

तर्कभाषायाः टीका 'तर्कभाषाप्रकाशिका' केन विरचिता ?

  1. AOption (a)

    पक्षधरमिश्रेण

  2. BOption (b)

    गोवर्धनमिश्रेण

  3. COption (c)

    वाचस्पतिमिश्रेण

  4. DOption (d)

    पार्थसारथिमिश्रेण

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

गोवर्धनमिश्रेण

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : तर्कभाषा की टीका 'तर्कभाषाप्रकाशिका' की रचना किसने की है?

स्पष्टीकरण :

तर्कभाषा इस प्रकरणग्रन्थ के रचयिता विद्यासमृद्ध वंश के मैथिल विद्वान् केशव मिश्र है। इस ग्रंथ में वैशेषिकसम्मत सप्तपदार्थप्राधान्य को अङ्गीकार कर न्याय-वैशेषिक-प्रस्थान की परिकल्पना को अत्यन्त सरलता किन्तु दृढ़ता के साथ प्रतिपादित किया है। तर्कभाषा प्र निम्नलिखित टीकाग्रंथ लिखे गए हैंं - 

टीकाग्रंथरचयिता
उज्ज्वलागोपीनाथ
तर्कभाषाभावरोमबिल्ववेंकटबुद्ध
न्यायसंग्रहरामलिंग
सारमंजरीमाधवदेव
परभाषादर्पणभास्करभट्ट
युक्तिमुक्तावलीनागेशभट्ट
तत्वप्रबोधिनीगणेशदीक्षित
न्यायप्रदीपविश्वकर्मा
तर्कभाषाप्रकाशिकागोवर्धनमिश्र

 

अतः स्पष्ट है, की प्रस्तुत प्रश्न का उत्तर "गोवर्धनमिश्रेण" यह है।

Question 2

भाषाविज्ञानदृष्ट्या अर्धस्वरो भवति - 

  1. AOption (a)

    इ

  2. BOption (b)

    य

  3. COption (c)

    अ

  4. DOption (d)

    अः

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

य

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : भाषाविज्ञान की दृष्टि से अर्धस्वर कौन सा है?

अर्धस्वर :

भाषाविज्ञान के अनुसार य, व, र, ल इन वर्णोंं की गणना अर्धस्वरोंं में होती है। इनकी उत्पत्ति इस प्रकार है - 

पूर्ववर्णउत्तरवर्णउत्पन्न वर्ण
इविजातीय स्वरय
उविजातीय स्वरव
ऋविजातीय स्वरर
लृविजातीय स्वरल

 

अतः स्पष्ट है, 'य**' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 3

मनुस्मृतौ प्रतिपादितान् एतान् विषयान् यथाक्रमं योजयत -

A. राजधर्मः

B. आपद्धर्मः

C. संस्कारविधिः

D. प्रायश्चित्तम्

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (B), (C), (A), (D)

  2. BOption (b)

    (C), (A), (B), (D)

  3. COption (c)

    (A), (D), (B), (C)

  4. DOption (d)

    (C), (B), (D), (A)

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

(C), (A), (B), (D)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : मनुस्मृति में प्रतिपादित इन विषयोंं की क्रम के साथ योजना कीजिए।

स्पष्टीकरण -

  • मनुस्मृति भारतीय आचार-संहिता का विश्वकोश है, मनुस्मृति में बारह अध्याय तथा दो हजार पाँच सौ श्लोक हैं, जिनमें सृष्टि की उत्पत्ति, संस्कार, नित्य और नैमित्तिक कर्म, आश्रमधर्म, वर्णधर्म, राजधर्म व प्रायश्चित आदि विषयों का इस क्रम से उल्लेख है -
  • जगत् की उत्पत्ति
  • संस्कारविधि, व्रतचर्या, उपचार
  • स्नान, दाराघिगमन, विवाहलक्षण, महायज्ञ, श्राद्धकल्प
  • वृत्तिलक्षण, स्नातक व्रत
  • भक्ष्याभक्ष्य, शौच, अशुद्धि, स्त्रीधर्म
  • गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थ, मोक्ष, संन्यास
  • राजधर्म
  • कार्यविनिर्णय, साक्षिप्रश्नविधान
  • स्त्रीपुंसधर्म, विभाग धर्म, धूत, कंटकशोधन, वैश्यशूद्रोपचार
  • संकीर्णजाति, आपद्धर्म
  • प्रायश्चित्त
  • संसारगति, कर्म, कर्मगुणदोष, देशजाति, कुलधर्म, निश्रेयस।

 

अतः स्पष्ट है, की प्रस्तुत प्रश्न का उत्तर "(C), (A), (B), (D)" यह है।

Question 4

नाट्यशास्त्रानुसारं नाट्यमण्डपः कतिविधः भवति ? 

  1. AOption (a)

    द्विविधः

  2. BOption (b)

    पञ्चविधः

  3. COption (c)

    दशविधः

  4. DOption (d)

    त्रिविधः

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (d)D.

त्रिविधः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : नाट्यशास्त्र के अनुसार नाट्यमंडप कितने प्रकार का होता है?

स्पष्टीकरण - 

  • भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र के द्वितीय अध्याय में तीन प्रकार के प्रेक्षागृहों का विधान किया है -
  • विकृष्ट (लंबा आयताकार),
  • चतुरस्त्र (वर्गाकार)
  • त्र्यस्त्र (तिकोना)।
  • ये तीनों भी परिणाम के अनुसार तीन प्रकार के होते हैं -
  • ज्येष्ठ,
  • मध्यम
  • अवर/अधम (कनीयस या कनिष्ठ)।
  • इनमें से ज्येष्ठ (विकृष्ठ, चतुरस्त्र तथा त्र्यस्त्र) 108 हाथ लंबा होता है और कनिष्ठ (विकृष्ट, चतुरस्त्र तथा त्र्यस्त्र) 32 हाथ लंबा होता है। इनमें से ज्येष्ठ देवताओं का, मध्यम राजाओं का और कनीयस या छोटा साधारण लोगों का होता है।
  • भरतमुनि ने इन तीनों प्रकार के प्रेक्षागृहों में मध्यम (विकृष्ट, चतुरस्त्र तथा त्र्यस्त्र) को ही प्रशस्त माना है क्योंकि उसमें पाठ्य और गेय सब कुछ अत्यंत सुविधा के साथ स्पष्ट सुनाई पड़ता है। हाथ की नाप का क्रम यह है - 8 अणु का रज, 8 रज का बाल, 8 बल का लिक्षा, 8 लिक्षा का यूक, 8 यूक का यव, 8 यव का अंगुल, 24 अंगुल का हाथ (लगभग डेढ़ फुट) और चार हाथ का दंड होता है। इस नाप के अनुसार तीनों प्रकार के प्रेक्षागृह इस प्रकार होंगे :
  • विकृष्ट ज्येष्ठ प्रेक्षागृह 108 और 54 हाथ
  • विकृष्ट मध्यम प्रेक्षागृह 64 और32 हाथ
  • विकृष्ट कनिष्ठ प्रेक्षागृह 32 और 16 हाथ
  • चतुरस्त्र ज्येष्ठ प्रेक्षागृह 108 और 108 हाथ
  • चतुरस्त्र मध्यम प्रेक्षागृह 64 और 64 हाथ
  • चतुरस्त्र कनिष्ठ प्रेक्षागृह 32 और  32 हाथ
  • त्र्यस्त्र ज्येष्ठ प्रेक्षागृह बीच से 108 हाथ लंबा
  • त्र्यस्त्र मध्यम प्रेक्षागृह बीच से 64 हाथ लंबा
  • त्र्यस्त्र कनिष्ठ प्रेक्षागृह बीच से 32 हाथ लंबा
  • भरतमुनि के अनुसार 64 हाथ (96 फुट) लंबा और 32 हाथ (48 फुट) चौड़ा विकृष्ट मध्यम प्रेक्षागृह ही बनाना चाहिए।

 

अतः स्पष्ट है, की प्रस्तुत प्रश्न का उत्तर "त्रिविधः" यह है।

Question 5

काव्यलक्षणविचारे 'स्ववचनविरोधादेवापास्तम्' इति धिया विश्वनाथेन कस्य मतं निराकृतम् ?

  1. AOption (a)

    आनन्दवर्धनस्य

  2. BOption (b)

    मम्मटस्य

  3. COption (c)

    वामनस्य

  4. DOption (d)

    भोजराजस्य

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

आनन्दवर्धनस्य

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : काव्यलक्षणविचार में 'स्ववचनविरोधादेवापास्तम्' ऐसा कहकर विश्वनाथ ने किसके मत का निराकरण कर दिया है?

स्पष्टीकरण - 

  • साहित्यदर्पण के प्रथम परिच्छेद अनुसार - 
  • ध्वनिकार आनंदवर्धन ने यह जो कहा है की - 
  • अर्थः सहृदयश्लाघ्यः काव्यात्मा यो व्यवस्थितः। वाच्यप्रतीयमानाख्यौ तस्य भेदावुभौ स्मृतौ॥
  • "सहृदयों से श्लाध्य जो अर्थ काव्य का आत्मा व्यवस्थापित किया है, उसके दो भेद होते हैं - एक वाक्य और दूसरा प्रतीयमान"।
  • इस कारिका में वाक्यार्थं को काव्य का आत्मा बतलाना उनके 'काम्यस्यात्मा ध्वनिः' इस अपने कथन से ही विरुद्ध होने के कारण (स्ववचनविरोधादेवापास्तम्) निरस्त समझना चाहिये।
  • एक में केवल ध्वनि को काव्य का आत्मा बतलाना और दूसरे में वाच्य को भी आत्मा कहना परस्पर विरुद्ध है।

 

अत: स्पष्ट है, की "आनन्दवर्धनस्य" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 6

अधस्तनेषु निरुक्तग्रन्थानुसारेण शाकटायनस्य द्वे मते स्तः -

A. नामाख्यातयोस्तु कर्मोपसंयोगद्योतका भवन्ति ।

B. इन्द्रियनित्यं वचनम् ।

C. न निर्बद्धा उपसर्गा अर्थान्निराहुः ।

D. उच्चावचा पदार्था भवन्ति ।

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम् 

  2. BOption (b)

    A, C केवलम्

  3. COption (c)

    B, C केवलम्

  4. DOption (d)

    C, D केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

A, C केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : निरुक्त के अनुसार शाकटायन के मत क्या है?

स्पष्टीकरण - 

  • आचार्य यास्क ने महर्षि शाकटायन के मत को निरुक्तशास्त्र सादर प्रस्तुत किया है -
  • 'न निर्बद्धा उपसर्गा अर्थान्निराहुरिति शाकटायनः ।
  • नामाख्यातयोस्तु कर्मोपसंयोग द्योतका भवन्ति। 
  • यहाँ शाकटायन का कहना है कि उपसर्ग नाम और आख्यात पदों के अर्थों के द्योतक होते हैं, इनसे पृथक् रहकर उपसर्गों का कोई अर्थ नहीं होता अर्थात् ये नाम और आख्यात पदों के पूर्व प्रयुक्त होकर उनके अर्थवैशिष्ट को द्योतित करते हैं। शाकटायन का मानना है कि नामाख्यात से निर्बद्धा - पृथक् किये उपसर्गों का भी अपना कोई अर्थ नहीं रहता, अर्थात् यह निश्चय ही कहना अनुपयुक्त होगा कि अमुक उपसर्ग स्वतन्त्र रूप से अपना निजी अमुक अर्थ रखता है।
  • लेकिन उनके ही सद्यः परवर्तीकालिक आचार्य गार्ग्य को आचार्य शाकटायन द्वारा उपसगों की द्योतकता का मत कथमपि स्वीकार्य नहीं रहा है, वे इन्हें वाचक मानकर उपसर्गों के सार्थकत्व को संस्थापित करते हैं। 'उच्चावचाः पदार्थाः भवन्तीति गार्ग्यः' अर्थात् उपसर्गों के विभिन्न अर्थ होते हैं और भी आगे लिखते हैं कि 'तद् य एषु पदार्थः प्राहुरिमे तं नामाख्यातयोरर्थविकरणम्' अर्थात् उनका चाहे कोई भी अर्थ हो, वे उस अर्थ को अभिव्यक्त करते हैं, जो नाम और आख्यात के अर्थ में विकार परिवर्तन को ले जाते हैं।
  • आचार्य यास्क ने दोनोंं मतोंं को निरुक्त में स्थान दिया है, किन्तु वे शाकटायन क मत स्वीकार नही करते और गार्ग्य के मत को उत्तर पक्ष के रूप में प्रस्तुत करते है।

​

अत: स्पष्ट है, की "A, C केवलम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 7

आचार्यकौटिल्यमते दूतस्य द्वौ प्रकारौ स्तः-

A. शासनहरः

B. बुद्धिमान्

C. परिमितार्थः

D. आहार्यबुद्धिः

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम् 

  2. BOption (b)

    A, C केवलम् 

  3. COption (c)

    B, C केवलम्

  4. DOption (d)

    C, D केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

A, C केवलम् 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : आचार्य कौटिल्य के मत से दूतोंं के दो प्रकार कौन से हैंं?

स्पष्टीकरण - 

उद्धृतमन्त्रो दूतप्रणिधि:। अमात्यसम्पदोपेतो निस्सृष्टार्थः। पादगुणहीनः परिमितार्थः। अर्धगुणहीनः शासनहरः। (प्रथम अधिकरण, अध्याय १६)

  • निःसृष्टार्थ -
  • निःसृष्टार्थ यह दूत अमात्य के समान होता है। निःसृष्टार्थ वह दूत होता है जिससे आवश्यकता पड़ने पर राजा अपने प्रशासनिक उद्देश्य की भी पूर्ति कर सके। तात्पर्य यह है कि निसृष्टार्थ दूत इतना योग्य होना चाहिये कि समय आने पर वह मंत्री का भी कार्य कर सके। मंत्री के अभाव में राजा उससे यथेच्छ विचार विमर्श कर सके तथा परामर्श ले सके।
  • परिमितार्थ -
  • परिमितार्थ यह दूत अमात्य के गुणोंं से एक चौथाई गुणहीन होता है। परिमितार्थ वह दूत होता है, जो सीमित रूप में शासकीय प्रयोजन का साधक होता है। इसकी योग्यता अमात्य की योग्यताओं से कम होती तथापि उसे अपने कार्य का पर्याप्त परिज्ञान होता है तथा वह अपने कार्य के प्रति सतत जागरूक रहता है, जिस कार्य के लिये नियुक्त किया है, उस कार्य के लिये ही अपना उत्तरदायित्व निभाता है।
  • शासनहर -
  • शासनहर यह दूत अमात्य के गुणोंं से आधा गुणहीन होता है। शासनहर वह दूत होता है जो अपने राजा के संदेश को अन्य राजा के पास ले जाता है तथा विधिपूर्वक अन्तर्राज्यीय सम्बन्धों का संचालन करते हुये दूत कार्य की भूमिका का निर्वाह करता है।

 

​अतः स्पष्ट है, की "A, C केवलम् " यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 8

अधस्तनेषु समीचीनं कथनमस्ति-

A. याज्ञवल्क्यस्मृतौ द्वादशाध्यायाः सन्ति ।

B. कौटिल्यमते नवविधाः गूढपुरुषाः भवन्ति ।

C. मनुस्मृतो अष्टादशविवादपदानि वर्णितानि।

D. विष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्' महाभारतस्य वनपर्वणि वर्णितमस्ति ।

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, C केवलम्

  2. BOption (b)

    B, C केवलम्

  3. COption (c)

    C, D केवलम्

  4. DOption (d)

    B, D केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

B, C केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : समीचीन कथन कौन सा है?

स्पष्टीकरण - 

  • याज्ञवल्क्य स्मृति में तीन कांड (अध्याय) हैं-
  • आचारकाण्ड - इसमें तेरह प्रकरण हैं।
  • व्यवहारकाण्ड - इसमें पचीस प्रकरण हैं।
  • प्रायश्चितकाण्ड - इसमें छः प्रकरण हैं।
  • कौटिल्य ने गुप्तचरों के लिये गूढपुरुष इस संज्ञा का प्रयोग किया है। इन के नौ भेद हैंं - 
  • कापटिक, उदास्थित, गृहपतिक, वैदेह्क, तापस, सत्री, तीक्ष्ण, रसद और भिक्षुकी।
  • मनुस्मृति में १८ विवादपद कहे गये हैंं - 
  • ऋणादान - निक्षेप - अस्वामिविक्रय - सम्भूयसमुत्थान - दत्ताप्रदानिक - अभ्युपेत्याशुश्रूषा वेतनस्यानपाकर्म - स्वामिपालविवाद - संविद्व्यतिक्रम - विक्रीयासम्प्रदान - सीमाविवाद - पारुष्य - साहस - स्त्रीसंग्रहण - स्त्रीपुंधर्म - विभाग - द्यूतसमाह्वय प्रकीर्णकाख्यानि।
  • विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का उल्लेख महाभारत के अनुशासन पर्व में हुआ है। जब भीष्म पितामह मृत्यु शैया पर होते हैं तब उन्होंने युधिष्ठिर को भगवान विष्णु के दिव्य एक हजार नामों से युक्त इस कल्याणकारी स्तोत्र का उपदेश किया था।

 

अतः स्पष्ट है, की प्रस्तुत प्रश्न का उत्तर "B, C केवलम्" यह है।

Question 9

ऋग्वेदप्रातिशाख्यानुसारेण रक्तसंज्ञा कस्य भवति ? 

  1. AOption (a)

    यकारस्य

  2. BOption (b)

    मकारस्य

  3. COption (c)

    चकारस्य

  4. DOption (d)

    दकारस्य

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

मकारस्य

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : ऋग्वेद प्रातिशाख्य के अनुसार रक्तसंज्ञा किसकी है?

ऋग्वेदप्रातिशाख्य :

  • इस प्रातिशाख्य का संबंध ऋग्वेद संहिता से है।
  • परंपरा के अनुसार इसको ऋग्वेदीय शाकल शाखा की अवांतर शैशिरीय शाखा से संबंधित बताया जाता है। प्रातिशाख्यों में यह सबसे बड़ा प्रातिशाख्य है और कई दृष्टियों से विशेषपूर्ण है। ऋग्वेद का केवल यह प्रातिशाख्य उपलब्ध है।
  • इसमें छह-छह पटलों के तीन अध्याय हैं। यह प्रातिशाख्य सूत्र शैली में हैं, क्वचित् पद्यों में भी इसका निर्माण दिखता है। पर व्यख्याकारों ने पद्यों को टुकड़ों में विभक्त कर सूत्ररूप में ही उनकी व्याख्या की है।
  • इस प्रातिशाख्य के प्रथम 1-15 अध्यायों में शिक्षा और व्याकरण से संबंधित विषयों (वर्णविवेचन, वर्णोच्चारण के दोष, संहितागत वर्णसंधियाँ, क्रमपाठ आदि) का प्रतिपादन है और अंत के तीन (16-18) अध्यायों में छंदों की चर्चा है।
  • छंदों के विषय का प्रतिपादन इसे छोडकर किसी अन्य प्रातिशाख्य में नहीं है। क्रमपाठ का विस्तृत प्रतिपादन (अध्याय 10 और 11 में) भी इस प्रातिशाख्य का एक उल्लेखनीय वैशिष्ट्य है।
  • इस प्रातिशाख्य पर प्राचीन उव्वटकृत भाष्य प्रसिद्ध है।
  • ऋग्वेद प्रातिशाख्य में विविध संज्ञाओंं का विश्लेषण आता है। इस में रक्तसंज्ञा का अर्थ अनुनासिक स्पष्ट होता है।

​अतः स्पष्ट है, 'मकारस्य' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

प्रातिशाख्य ग्रंथ :

  • प्रातिशाख्यों का संबंध वैदिक मंत्रों के शुद्ध उच्चारण, वैदिक संहिताओं और उनके पदपाठों आदि के सधिप्रयुक्त वर्णपरिवर्तन अथवा स्वरपरिवर्तन के पारस्परिक संबंध और कभी कभी छंदोविचार जैसे विषयों से है।
  • 'शाखा' से संबंध रखनेवाला शास्त्र अथवा अध्ययन प्रातिशाख्य कहलाता है।
  • यास्काचार्य के निरुक्त में कहा गया है :
  • 'पदप्रकृति: संहिता। पदप्रकृतिनि सर्व चरणानां पार्षदानि।' (निरुक्त १.१७)
  • अर्थात्‌, पदों के आधार पर संहिता रहती है और सब शाखाओं के प्रतिशाख्यों की प्रवृत्ति पदों को ही संहिता का आधार मानकर हुई है।
  • सभी वेदशाखाओंं के अपने अपने प्रातिशाख्य होतेंं हैंं। इन में से निम्नलिखित प्रातिशाख्य उपलब्ध हैं - 
  • शौनकाचार्यकृत ऋग्वेद प्रातिशाख्य
  • कात्यायनाचार्य कृत वाजसनेयि प्रतिशाख्य
  • तैत्तिरीय प्रातिशाख्य
  • अथर्ववेद प्रातिशाख्य अथवा शौनकीय चतुराध्यायिका

Question 10

अद्वैतवेदान्तमते अज्ञानमस्ति -

A. भावरूपम्

B. अभावरूपम्

C. त्रिगुणात्मकम्

D. चिदात्मकम्

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम्

  2. BOption (b)

    B, C केवलम्

  3. COption (c)

    A, C केवलम्

  4. DOption (d)

    A, D केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

A, C केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अद्वैतवेदान्तमत से अज्ञान क्या है?

स्पष्टीकरण - 

  • अज्ञानं तु सदसद्भ्यामनिर्वचनीयं त्रिगुणात्मकं ज्ञानविरोधि भावरूपं यत्किञ्चिदिति वदन्त्यहमज्ञ इत्याद्यनुभवात् 'देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्' ( श्वेत. उ. 1/3) इत्यादिश्रुतेश्च। (वेदांतसार ११-१८)
  • व्याख्या :
  • अज्ञान तो सत् तथा असत् इन दोनों रूपों में अनिर्वचनीय है, त्रिगुणात्मक है, ज्ञानविरोधी है, भावरूप है, यत्किञ्चित् है ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं। क्योंकि मैं अज्ञ हूँ, ऐसा अनुभव होता है तथा देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् देव की आत्मशक्ति उसके अपने ही गुणों से निगूढ है, इस प्रकार से श्रुति श्वेताश्वतर उपनिषत् की पंक्ति भी प्रमाण के रूप में प्राप्त होती है।

 

अतः स्पष्ट है, की "A, C केवलम् " यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 11

प्रभाकरमते कति पदार्थाः ? 

  1. AOption (a)

    अष्टौ

  2. BOption (b)

    नव

  3. COption (c)

    दश

  4. DOption (d)

    षोडश

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

अष्टौ

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : प्रभाकर मत से कितने पदार्थ हैंं?

स्पष्टीकरण - 

  • न्याय वैशेषिक दर्शन के समान प्रभाकर भी जगत् की सत्ता को वास्तविक तथा इन्द्रिय द्वारा गम्य मानते हैं। तत्व विचार की पुष्टि से प्रभाकर भी अनेकतत्ववादी, वास्तववादी एवं व्यावहारवादी कहे जा सकते हैं।
  • प्रभाकर आठ पदार्थों की सत्ता मानते हैं -
  • द्रव्य,
  • गुण,
  • कर्म,
  • सामान्य,
  • समवाय (परतंत्रता),
  • शक्ति सादृश्य एवं
  • संख्या।
  • इनमें द्रव्य, गुण और कर्म का लक्षण एवं भेद प्राय: वैशेषिक दर्शन के समान है। सामान्य (अथवा जाति) की सत्ता व्यक्तियों से पृथक् नहीं मानी जा सकती है। वह व्यक्तियों में ही रहता है। परतत्रंता वैशेषिक दर्शन का समवाय है।
  • यह जाति और व्यक्ति के बीच विद्यमान सम्बन्ध है। यह नित्य नहीं है, क्योंकि अनित्य पदार्थों में भी रहता है। शक्ति भी एक स्वतंत्र पदार्थ है, जैसे- अग्नि की दाहकता, जिसके रहने पर अग्नि दहन करती है और जिसके अवरुद्ध हो जाने पर अग्नि दाह नहीं कर पाती।
  • इस तरह द्रव्य, गुण, कर्म आदि से कार्य उत्पन्न करने की शक्ति है, जो एक स्वतंत्र पदार्थ है। इसी प्रकार सादृश्य और संख्या को भी प्रभाकर ने स्वतंत्र पदार्थ माना है। वैशेषिक दर्शन में शक्ति प्रतिबन्धकाभाव रूप है और सादृश्य एवं संख्या गुण के अंतर्गत आ जाते हैं।

 

अतः स्पष्ट है, की प्रस्तुत प्रश्न का उत्तर "अष्टौ" यह है। 

Additional Information

  • प्रभाकर मिश्र एक महान् दार्शनिक, जिसे अनेक विद्वानों ने अपने मतानुसार कुमारिल भट्ट का शिष्य स्वीकार किया है। इनका समय ई. 7वीं शती है। प्रभाकर मिश्र मीमांसा क्षेत्र में 'गुरुमत' के संस्थापक हैं। इनके गुरु कुमारिल भट्ट ने इन्हें 'गुरु' की उपाधि से अलंकृत किया था। प्रभाकर मिश्र ने अपनी दो महत्त्वपूर्ण टीकाओं की भी रचना की हैं - 
  • बृहती या निबन्धन-
  • यह शबर भाष्य की व्याख्या है और वास्तविक अर्थ में इसे टीका कहा जा सकता है, क्योंकि इसमें सर्वत्र भाष्य की व्याख्या ही की गई है, कहीं भी उसकी आलोचना नहीं की गई है।
  • लघ्वी या विवरण-
  • यह ग्रन्थ प्रकाशित नहीं है। माधव सरस्वती के सर्वदर्शनकौमुदी के अनुसार लघ्वी में 6000 श्लोक हैं और बृहती में 12000 श्लोक। इन दोनों ग्रन्थों पर शानिकनाथ मिश्र ने टीकाएं (पंचिका) लिखकर गुरुमत की पुष्टि की है। ऋजुविमलापंचिका बृहती की टीका है और दीपशिखापंचिका लघ्वी की टीका है। शालिकनाथ ने उक्त दो पंचिकाओं से अलग प्रकरणपंचिका नामक एक स्वतंत्र ग्रन्थ लिखकर प्रभाकर के मत का प्रतिपादन किया है।

Question 12

ब्राह्मी लिपिः लिख्यते-

  1. AOption (a)

    दक्षिणतो वामम्

  2. BOption (b)

    वामतो दक्षिणम्

  3. COption (c)

    ऊर्ध्वात् अधः

  4. DOption (d)

    अध्स्तात् ऊर्ध्वम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

वामतो दक्षिणम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : ब्राह्मी लिपि किस प्रकार लिखी जाती है?

ब्राह्मी लिपि :

  • ब्राह्मी लिपि एक प्राचीन लिपि है जिससे कई एशियाई लिपियों का विकास हुआ है। प्राचीन ब्राह्मी लिपि के उत्कृष्ट उदाहरण सम्राट अशोक (असोक) द्वारा ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में बनवाये गये शिलालेखों के रूप में अनेक स्थानों पर मिलते हैं। नये अनुसंधानों के आधार 6 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के लेख भी मिले है। ब्राह्मी भी खरोष्ठी की तरह ही पूरे एशिया में फैली हुई थी।
  • अशोक ने अपने लेखों की लिपि को 'धम्मलिपि' का नाम दिया है; उसके लेखों में कहीं भी इस लिपि के लिए 'ब्राह्मी' नाम नहीं मिलता। लेकिन बौद्धों, जैनों तथा ब्राह्मण-धर्म के ग्रंथों के अनेक उल्लेखों से ज्ञात होता है कि इस लिपि का नाम 'ब्राह्मी' लिपि ही रहा होगा।
  • बौद्ध ग्रंथ 'ललितविस्तर' में 64 लिपियों के नाम दिए गए हैं। इनमें पहला नाम 'ब्राह्मी' है और दूसरा 'खरोष्ठी'। इन 64 लिपि-नामों में से अधिकांश नाम कल्पित जान पड़ते हैं।
  • 668 ई. में लिखित एक चीनी बौद्ध विश्वकोश 'फा-शु-लिन्' में ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का उल्लेख मिलता है। इसमें लिखा है कि, 'लिखने की कला का शोध दैवी शक्ति वाले तीन आचार्यों ने किया है; उनमें सबसे प्रसिद्ध ब्राह्मी है, जिसकी लिपि बाईं ओर से दाहिनी ओर को पढ़ी जाती है।'

 

अतः स्पष्ट है, 'वामतो दक्षिणम्**' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 13

अत्र कथनद्वयमस्ति । एकम् अभिकथनम् (A) अपरञ्च तस्य कारणम् (R) इति ।

अभिकथनम् (A): केनोपनिषदि हैमवती उमोपाख्यानं वर्णितमस्ति।

कारणम् (R) : न तत्र चक्षुर्गच्छति' इति केनोपनिषद्वचनमस्ति।

उपर्युक्तम् अभिकथनं कारणञ्चाश्रित्य समुचितं विकल्पं चिनुत ।

  1. AOption (a)

    अभिकथनम् (A), कारणम् (R) उभयं सत्यम्। किन्तु कारणम् (R), अभिकथनम् (A) इत्यस्य समुचिता व्याख्या अस्ति ।

  2. BOption (b)

    अभिकथनम् (A), कारणम् (R) उभयं सत्यम् । किन्तु कारणम् (R). अभिकथनम् (A) इत्यस्य समुचिता व्याख्या नास्ति।

  3. COption (c)

    अभिकथनम् (A) सत्यम्, कारणम् (R) असत्यम्।

  4. DOption (d)

    अभिकथनम् (A) असत्यम्. कारणम् (R) सत्यम् ।

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

अभिकथनम् (A), कारणम् (R) उभयं सत्यम् । किन्तु कारणम् (R). अभिकथनम् (A) इत्यस्य समुचिता व्याख्या नास्ति।

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यहाँँ दो कथन है। एक अभिकथन है और दूसरा उसका कारण है। 

अभिकथनम् (A): केनोपनिषद में हैमवती उमोपाख्यान का वर्णन है।

कारणम् (R) : न तत्र चक्षुर्गच्छति' यह केनोपनिषद का मंत्र है।

उपर्युक्त अभिकथन और कारण का आश्रय लेकर समुचित विकल्प चुनिए।

स्पष्टीकरण - 

  • "केनोपनिषद् को तवलकार एवं जैमिनीय उपनिषद् भी कहते हैं। यह चार खण्डों में विभाजित है, प्रथम दो खण्ड पद्यात्मक एवं शेष दो गद्यात्मक है। तृतीय एवं चतुर्थ खण्ड में "उमा हैमवती का उपाख्यान वर्णित है।
  • केनोपनिषद् में यह मंत्र आता है -

न तत्र चक्षुर्गच्छति, न वाग्गच्छति नो मनो

न विमा न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् ।

अन्यदेव तद्विदितादघो अविदितादवि

इति शुश्रूम् पूर्वेषां ये नस्तद्वयाच चक्षिरे॥

  • अर्थात न वहाँ चक्षु जा सकता है, न वाणी पहुँचती है तथा न मन (इसलिए उसको) न जानते हैं, न जान सकती हैं, जिससे उसका उपदेश किया जा सके। वह ज्ञात वस्तुओं से पृथक है और अज्ञात से भिन्न है। ऐसा पूर्वाचार्यों से सुनते हैं जिन्होंने उस 'परतत्व' की हमारे बोध के लिए व्याख्या की है।
  • किन्तु यह मंत्र हैमवती उमोपाख्यान से संबंधित नहीं है।

 

अतः स्पष्ट है, की "अभिकथनम् (A), कारणम् (R) उभयं सत्यम् । किन्तु कारणम् (R). अभिकथनम् (A) इत्यस्य समुचिता व्याख्या नास्ति।​ " यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 14

अधस्तनेषु नाटकेषु विदूषको नास्ति -

A. उत्तररामचरितम्

B. मालविकाग्निमित्रम्

C. महावीरचरितम् 

D. विक्रमोर्वशीयम् 

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    B, D केवलम्

  2. BOption (b)

    A, D केवलम्

  3. COption (c)

    B, C केवलम्

  4. DOption (d)

    A, C केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (d)D.

A, C केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : इन नाटकोंं में विदूषक नहीं है - 

स्पष्टीकरण - 

  • "विशेषेण दूषयतीति विदूषकः" जो दूषणकला में दक्ष हो, उसे विदूषक कहते हैं। यह कथानायक का सर्वाकालिक मित्र होता है जो शारीरिक चेष्टाओं तथा बातों से हँसी उत्पन्न करता है।
  • यह अन्तःपुर में लड़ाई लगाने वाला, मुँह देखी बातें करने वाला तथा पेटू होता है।
  • विदूषक में विदूषण सम्बन्धी शारीरिक, मानसिक एवं वाचिक क्रियाओं का सामंजस्य होता है। शरीर से वह प्रायः बौना, दंतैल, कुबड़ा, टेढ़े मुँह वाला, गंजे सिर वाला तथा पीली आँखों वाला होता है।
  • आचार्य भरत के अनुसार -
  • वामनो दन्तुरः कुब्जो द्विजिहवो विकृताननः। खलति पिङ्गलाक्षश्च स विधेयो विदूषकः।। (नाट्यशास्त्र -35/57):
  • विदूषक कथानायक का सार्वकालिक मित्र होता है। उसका प्रमुख उद्देश्य अपने कार्यों, वेषभूषाओं, शारीरिक चेष्टाओं तथा बातों से हास्य की सृष्टि करना होता है। अन्तःपुर के वातावरण में वह प्रायः कलह कराने में भी रुचि लेता है। इसी प्रकार पेटूपन, स्वार्थभाव तथा मुँहदेखी बात करना भी विदूषक की विशेषता है।
  • मालविकाग्निमित्रम् में राजा के मित्र और विदूषक गौतम के प्रयासों से राजा अग्निमित्र और नायिका मालविका दोनों का मिलन होता है।
  • विक्रमोर्वशीयम्  के नायक के सहायक के रूप में माणवक नाम का एक ही व्यक्ति है, जो नाटक में विदूषक की भूमिका निभाता है।

 

अत: स्पष्ट है, की "A, C केवलम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 15

ऋक्प्रातिशाख्यकारः कः अस्ति ?

  1. AOption (a)

    शूरवीरः

  2. BOption (b)

    आगस्त्यः

  3. COption (c)

    आचार्यः शौनकः

  4. DOption (d)

    महर्षिव्यासः

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

आचार्यः शौनकः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : ऋक्प्रातिशाख्यकार कौन है?

स्पष्टीकरण - 

  • ऋक्प्रातिशाख्य ऋग्वेद का एकमात्र उपलब्ध प्रातिशाख्य है। इसके रचियता आचार्य `शौनक' है जो कि स्वयं ऋग्वेद की 'शैशिरीय' शाखा के अनुयायी थे।
  • ऋक्प्रातिशाख्य के उपोद्धात में शौनक ने प्रतिज्ञा की है कि वह शैशिरीय शाखा के उच्चारण सम्बंधी सम्पूर्ण ज्ञान के लिये इस प्रातिशाख्य शास्त्र का कथन करेंगे।
  • इससे यह प्रतीत होता है कि वर्तमान ऋक्प्रातिशाख्य. शैशिरीय शाखा का है।
  • शैशिरीय शाखा शाकल शाखा के अंतर्गत एक उपशाखा है परंतु इसकी संहिता उपलब्ध नहीं है। इसीलिये वर्तमान ऋक्प्रातिशाख्य. को शाकल शाखा का माना जाता है।
  • अनुष्टुप. त्रिष्टुप् और जगती छन्दों में निबद्ध यह प्रातिशाख्य अध्याय पटल वर्ग और श्लोक के क्रम में प्राप्त है।
  • निष्कर्षतः विद्वानों के मतानुसार कहा जा सकता है कि वैदिक व्याकरण में सबसे पहले हुए ऋक् प्रातिशाख्य के समय की उच्चतम सीमा यास्क के समय 700 ई.पू. है और निम्नतम सीमा पाणिनि का समय 500 ई. पू. है। यह कहा जा सकता है कि प्रातिशाख्यों का समय यास्क के बाद तथा पाणिनि से पूर्व में है।
  • विद्वानों के प्रमाण युक्त मतों का आश्रय लेकर ऋक्प्रातिशाख्य को 700 ई. पू. और 500 ई. पू के मध्य में ही माना गया है।

 

अतः स्पष्ट है, की प्रस्तुत प्रश्न का उत्तर "आचार्यः शौनकः" यह है।

Question 16

'वाच्य एव वाक्यार्थः” इति मतं प्रतिपादयन्ति - 

  1. AOption (a)

    सर्वे मीमांसकाः 

  2. BOption (b)

    अभिहितान्वयवादिनः

  3. COption (c)

    कुमारिलभट्टानुयायिनः

  4. DOption (d)

    अन्विताभिधानवादिनः

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (d)D.

अन्विताभिधानवादिनः

Why this answer is correct

**प्रश्न का हिंदी भाषांतर : '**वाच्य एव वाक्यार्थः” यह मत कौन प्रतिपादित करतेंं हैंं?

स्पष्टीकरण - 

  • जो पदों में स्वतन्त्र अर्थ मानते हुए उनके अन्वित होने पर तात्पर्यवृत्ति द्वारा पूरे वाक्य का अलग अर्थ मानते हैं, वह अभिहितान्वयवादी कहलाते हैं -
  • अभिहितानां पदार्थानामाभि- धायिनां वा पदार्थानामन्वय इति ये वदन्ति ते अभिहितान्धयवादिनः।
  • प्रभाकर मत के अनुयायी अन्विताभिधानवादी शब्दों के स्वतन्त्र अर्थ में विश्वास नहीं करते, उनका कथन है कि श्रोता 'गाय लायो', 'गाय ले जायो' और 'गाय बाँधो' शब्दों के प्रादेशों को सुनकर दूसरे के व्यवहार से गाय पद का अर्थ जान लेता है, इसी प्रकार 'गाय लायो', 'घोड़ा लायो', 'पुस्तक लायो' प्रादि में प्रयुक्त 'लायो' पद का सामान्य अर्थ उसके मस्तिष्क में उपस्थित हो जाता है।
  • इस सामान्य ज्ञान से विशिष्ट 'लाना' क्रिया का व्यक्तिगत अर्थ वह सम्पादित करता है । 'गाय लाओ' आदि शब्दों का स्वतन्त्र रूप से कोई अर्थ-बोध नहीं, वाक्य में अन्वित रहने पर ही उनका अभिधान (प्रतिपाद्य अर्थ) हो सकता है। इस प्रकार दोनों ही किसी- न-किसी रूप में से एक सम्मिलित या पूर्ण वाक्यार्थ को मानते हैं किन्तु एक (अभिहितान्वयवादी) शब्दों में स्वतन्त्र रूप से शक्ति मानते हुए तात्पर्यवृत्ति द्वारा और दूसरे (अन्विताभिधानवादी) वाक्य में प्रन्वित पदों में ही अर्थ-बोध की शक्ति मानते हुए स्वतन्त्र रूप से अर्थात् वाच्यार्थ द्वारा ही-(वाच्य एव वाक्यार्थः)-पूरे वाक्य का अर्थ-बोध मानते हैं।
  • उनका कथन है कि वाक्य में अन्वित पद ही (स्वतन्त्र रूप से नहीं) अर्थ-बोध कराते हैं अर्थात् अर्थ-बोध वाक्यार्थ द्वारा पूरे-पूरे वाक्य का स्वयं ही होता है, इसीलिए वे अन्विताभिधानवादी कहलाते है-'अन्वितानामेवपदार्थानामभिधानं शब्दैःप्रति पादनमिति ये वदन्ति ते अन्धिताभिधानवादिनः । इनके अनुकूल वाक्य से अलग होकर पद कोई अर्थ नहीं रखते हैं ।
  • ये लोग वाक्य को ही विचार की इकाई (Unit of Thought) मानते हैं । वाक्यों में प्रयोग द्वारा विश्लिष्ट होकर पदों का अर्थ जाना जाता है । पदों से वाक्य का अर्थ नहीं बनता वरन् वाक्य द्वारा ही पदों का अर्थ व्यवहार से ज्ञात होता है।

 

अतः स्पष्ट है, की प्रस्तुत प्रश्न का उत्तर "अन्विताभिधानवादिनः" यह है।

Question 17

अधोलिखितान् काव्यशास्त्रकारान् क्रमेण योजयत

A. जगन्नाथः

B. वामनः

C. मम्मटः

D. भामहः

समुचितं विकल्पं चिनुत -

  1. AOption (a)

    D, C, B, A

  2. BOption (b)

    A, D, C, B

  3. COption (c)

    D, B, C, A

  4. DOption (d)

    D, A, B, C

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

D, B, C, A

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : काव्यशास्त्रकारोंं की क्रम से योजना कीजिए।

स्पष्टीकरण - 

  • आचार्य भामह संस्कृत भाषा के प्रमुख आचार्य थे, किन्तु उनके जीवनकाल का निर्धारण अन्य पूर्ववर्ती आचार्यों के काल के साथ विवादित है। तथापि कई प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि आचार्य भामह का काल लगभग 300 ईसी पूर्व से 600 ईसी के बीच में था। उन्होंने अपने काव्य अलंकार ग्रंथ के अंत में अपने पिता का नाम रकृतगोविन दर्शाया है। आचार्य भामह, आचार्य भरतमुनि के बाद, काव्यशास्त्र पर काव्यालंकार नामक ग्रंथ के लेखक माने जाते हैं, और यह ग्रंथ अलंकार शास्त्र का पहला उपलब्ध ग्रंथ है, जिसे विंशति (20वीं) शताब्दी के आरंभ में प्रकाशित किया गया था। वे अलंकार संप्रदाय के महान आचार्य माने जाते हैं।
  • आचार्य वामन (८वीं शताब्दी का उत्तरार्ध - ९वीं शताब्दी का पूर्वार्ध) प्रसिद्ध अलंकारशास्त्री थे। उनके द्वारा प्रतिपादित काव्यलक्षण को रीति-सिद्धान्त कहते हैं। वामन द्वारा रचित काव्यालङ्कारसूत्र, काव्यशास्त्र का दर्शन निर्माण का प्रथम प्रयास है। यह ग्रन्थ सूत्र रूप में है। वे रीति को काव्य की आत्मा कहते हैं।
  • मम्मट अपने शास्त्रग्रंथ काव्यप्रकाश के कारण प्रसिद्ध हुए। कश्मीरी पंडितों की परंपरागत प्रसिद्धि के अनुसार वे नैषधीय चरित के रचयिता कवि श्रीहर्ष के मामा थे। उन दिनों कश्मीर विद्या और साहित्य के केंद्र था तथा सभी प्रमुख आचार्यों की शिक्षा एवं विकास इसी स्थान पर हुआ। मम्मट भोजराज के उत्तरवर्ती माने जाते है। इस प्रकार से उनका काल 10वीं सदी का लगभग उत्तरार्ध है। ऐसा विवरण भी मिलता है कि उनकी शिक्षा-दीक्षा वाराणसी में हुई। वे कश्मीरी थे ऐसा उनके नाम से भी पता चलता है लेकिन इसके अतिरिक्त उनके विषय में बहुत कम जानकारी मिलती है।
  • जगन्नाथ पण्डितराज (जन्म : १६वीं शती के अन्तिम चरण में, मृत्यु : १७वीं शदी के तृतीय चरण में), उच्च कोटि के कवि, समालोचक, साहित्यशास्त्रकार तथा वैयाकरण थे। कवि के रूप में उनका स्थान उच्च कोटि के उत्कृष्ट कवियों में कालिदास के अनंतर, कुछ विद्वान् रखते हैं। "रसगंगाधर"कार के रूप में उनके साहित्यशास्त्रीय पांडित्य और उक्त ग्रंथ का पंडितमंडली में बड़ा आदर है।

 

अतः स्पष्ट है, की "D, B, C, A" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 18

‘वास्तव्यः' इत्यत्र वस्-धातोः 'तव्यत्’-प्रत्ययः कस्मिन्नर्थे भ��ति ?

  1. AOption (a)

    भावे

  2. BOption (b)

    कर्मणि

  3. COption (c)

    स्वार्थे

  4. DOption (d)

    कर्तरि

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (d)D.

कर्तरि

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : ‘वास्तव्यः' में वस्-धातु से तव्यत्’-प्रत्यय किस अर्थ में होता है?

वस् + तव्यत् :

  • सूत्र - तव्यत्तव्यानीयरः (३.१.९६) 
  • इस सूत्रानुसार धातु से परे तव्यत्, तव्य और अनीयर् प्रत्यय होते हैं। भाववाच्य में प्रत्यय विहित होने के कारण स्वाभाविक एकवचन और नपुंसकलिङ्ग होता है।
  • वार्तिक - "वसेस्तव्यत् कर्तरि णिच्च वास्तव्यः।"
  • वास्तव्यः पद में वस् धातु तव्यत् प्रत्यय कर्त्ता के अर्थ में होता है।

 

अतः स्पष्ट है, की "कर्तरि " यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 19

यथोचितं मेलनं कुरुत-

सूची Iसूची II
(A)परोक्षकृताःI.अहं धनानि संजयामि शाश्वतः।
(B)प्रत्यक्षकृताःII.इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्र वोचम्।
(C)आध्यात्मिक्यःIII.इन्द्राय साम गायत।
(D)अथापि स्तुतिरेव भवति नाशीर्वादःIV.कण्वा अभि प्रगायत।
  1. AOption (a)

    A - III, B - IV, C - I, D - II

  2. BOption (b)

    A - I, B - II, C - III, D - IV

  3. COption (c)

    A - II, B - I, C - IV, D - III

  4. DOption (d)

    A - II, B - III, C - I, D - IV

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

A - III, B - IV, C - I, D - II

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यथोचित मेलन कीजिए।

स्पष्टीकरण - 

  • निरुक्त के अनुसार मंत्र तीन प्रकार के होतें हैंं - 
  • परोक्षकृताः -
  • यह मंत्र सभी विभक्तियोंं में तथा प्रथम पुरुष में रहतेंं हैंं, जैसे - 
  • इन्द्रो दिव इन्द्र ईशे पृथिव्याः।
  • इन्द्रमिद् गाथिनो बृहत्।
  • इन्द्रेणैते तृत्सवो वेविषाणाः।
  • इन्द्राय साम गायत।
  • नेन्द्रादृते पवते धाम किंचन।
  • इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्र वोचम्।
  • इन्द्रे कामा अयंसत।
  • स्तोतव्य परोक्ष होतें है।
  • प्रत्यक्षकृताः - 
  • यह मंत्र मध्यम पुरुष में "त्वं" सर्वनाम का प्रयोग करके रहतेंं हैंं, जैसे - 
  • त्वमिन्द्र बलादधि।
  • वि न इन्द्र मृधो जहि।
  • मा चिदन्यद्वि शंसत।
  • कण्वा अभि प्र गायत।
  • उप प्रेत कुशिकाश्चेतयध्वम्।
  • स्तुती करनेवाले प्रत्यक्ष होतें है।
  • आध्यात्मिक्यः - 
  • यह मंत्र उत्तम पुरुष में "अहं" सर्वनाम का प्रयोग करके रहतेंं हैंं, जैसे - 
  • अहं धनानि संजयामि शाश्वतः।
  • अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः।
  • अथापि स्तुतिरेव भवति नाशीर्वादः।
  • कहींं कहींं देवता की केवल स्तुती होती है, कामना का वर्णन नहीं, जैसे - 
  • ​इन्द्रस्य॒ नु वीर्याणि प्र वोचम्।

 

अतः स्पष्ट है, की प्रस्तुत प्रश्न का उत्तर "A - III, B - IV, C - I, D - II" यह है।

Question 20

काण्वसंहिताया भाष्यकारौ स्तः-

A. आचार्यसायणः

B. उव्वटः

C. हलायुधः

D. गोविन्दः

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम् 

  2. BOption (b)

    A, C केवलम्

  3. COption (c)

    B, C केवलम्

  4. DOption (d)

    A, D केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

A, C केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : काण्वसंहिता के भाष्यकार कौन हैंं?

स्पष्टीकरण - 

  • सायणाचार्य  
  • सायण एक सर्वोच्च भाष्यकार हैं। इन्होंने चारोवेदों पर भाष्य लिखा। यह सबसे प्रसिद्ध वेद भाष्यकार है। इन के भाष्य इस प्रकार हैंं - 
  • ऋग्वेद संहिता भाष्य
  • काण्वसंहिता भाष्य
  • तैत्तिरीय संहिता भाष्य
  • सामवेद संहिता भाष्य
  • अथर्ववेद संहिता भाष्य
  • ऐतरेय उपनिषद् दीपिका
  • सामप्रातिशाख्य
  • हलायुध           
  • हलायुध ने यजुर्वेद की काण्व संहिता पर अपना 'ब्राह्मणसर्वस्व' नामक भाष्य लिखा। ये बंगाल नरेश - लक्ष्मण सेन के दरबार में धर्म अधिकारी थे। इनके अन्य ग्रंथ इस प्रकार हैंं - 
  • मीमांसासर्वस्व
  • वैष्णवसर्वस्व
  • शैवसर्वस्व
  • पंण्डितसर्वस्व

 

अत: स्पष्ट है, की "A, C केवलम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 21

दशरूपकानुसारेण रूपकाणां भेदकौ स्तः-

A. वस्तु

B. अलङ्कारः

C. छन्दः

D. नेता

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, C केवलम्

  2. BOption (b)

    A, D केवलम् 

  3. COption (c)

    C, D केवलम

  4. DOption (d)

    A, B केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

A, D केवलम् 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : दशरूपक के अनुसार रूपकोंं के भेदक तत्व क्या हैंं?

स्पष्टीकरण - 

  • रूपक के दस भेद हैं -
  • नाटक, प्रकरण, भाण, व्यायोग, समवकार, डिम, ईहामृग, अंक, वीथी और प्रहसन।
  • उपरूपक के 18 भेद है -
  • नाटिका, त्रोटक, गोष्ठी, सदृक, नाट्यरासक, प्रस्थान, उल्लासटय, काव्य, प्रेक्षणा, रासक, संलापक, श्रीगदित, शिंपल, विलासीका, दुर्मल्लिका, परकणिका, हल्लीशा और भणिका।
  • इन सभी रूपकों तथा उपरूपकों का परस्पर भेद वस्तु (कथावस्तु), नेता (नायक) तथा रस के आधार पर किया जाता है।
  • ये तीनों रूपक के भेदक तत्त्व हैं जिसके लिए दशरूपककार आचार्य धनंजय ने लिखा है -
  • वस्तुनेतारसस्तेषां भेदकः वस्तु।
  • इतिवृत्त अर्थात् कथा, कहानी। किसी एक रूपक प्रकार की कथावस्तु, उसका नायक, नायक की प्रकृति तथा उसका प्रतिपाद्य-रस उसे अन्य रूपक प्रकारों से भिन्न करता है।

 

अत: स्पष्ट है, की "A, D केवलम् " यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 22

कौटिलीयेऽर्थशास्त्रे कति अधिकरणानि ? 

  1. AOption (a)

    दश

  2. BOption (b)

    एकादश

  3. COption (c)

    द्वादश

  4. DOption (d)

    पञ्चदश

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (d)D.

पञ्चदश

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : कौटिलीय अर्थशास्त्र में कितने अधिकरण है?

कौटिलीय अर्थशास्त्र के अधिकरण :

कौटिलीय अर्थशास्त्र में 15 अधिकरण, 150 अध्याय, 180 उपविभाग तथा 6,000 श्लोक हैं।

कौटिलीय अर्थशास्त्र में 15 अधिकरण इस प्रकार है - 

  1. विनयाधिकरण
  2. अध्यक्षप्रचार
  3. धर्मस्थीयाधिकरण
  4. कंटकशोधन
  5. वृत्ताधिकरण
  6. योन्यधिकरण,
  7. षाड्गुण्य,
  8. व्यसनाधिकरण,
  9. अभियास्यत्कर्माधिकरणा,
  10. संग्रामाधिकरण
  11. संघवृत्ताधिकरण,
  12. आबलीयसाधिकरण,
  13. दुर्गलम्भोपायाधिकरण,
  14. औपनिषदिकाधिकरण
  15. तंत्रयुक्त्यधिकरण

 

अतः स्पष्ट है, ''पञ्चदश'**' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 23

निम्नलिखितेषु कुन्तकानुसारं वक्रतायाः भेदौ न भवतः -

A. प्रकरणवक्रता

B. रसवक्रता

C. वाक्यवक्रता

D. अर्थविन्यासवक्रता

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, C केवलम् 

  2. BOption (b)

    B, D केवलम् 

  3. COption (c)

    C, B केवलम्

  4. DOption (d)

    D, A केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

B, D केवलम् 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : इन में से कुन्तक के अनुसार वक्रता के कौन से दो भेद नहीं हैंं?

स्पष्टीकरण - 

  • वक्रोक्ति दो शब्दों 'वक्र' और 'उक्ति' की संधि से निर्मित शब्द है। इसका शाब्दिक अर्थ है- ऐसी उक्ति जो सामान्य से अलग हो। टेढा कथन अर्थात जिसमें लक्षणा शब्द शक्ति हो। भामह ने वक्रोक्ति को एक अलंकार माना था। उनके परवर्ती कुन्तक ने वक्रोक्ति को एक सम���पूर्ण सिद्धान्त के रूप में विकसित कर काव्य के समस्त अंगों को इसमें समाविष्ट कर लिया। इसलिए कुन्तक को वक्रोक्ति संप्रदाय का प्रवर्तक आचार्य माना जाता है।
  • आचार्य कुन्तक ने वक्रोक्ति के छः भेद किए हैं -
  • वर्णविन्यासवक्रता,
  • पद-पूर्वार्ध वक्रता,
  • पद- परार्धवक्रता,
  • वाक्य वक्रता,
  • प्रकरण वक्रता
  • प्रबन्ध वक्रता।

 

अतः स्पष्ट है, की प्रस्तुत प्रश्न का उत्तर "B, D केवलम् " यह है।

Question 24

ज्ञानयज्ञस्य कर्ता कः?

  1. AOption (a)

    आचार्यसायणः

  2. BOption (b)

    भट्टभास्करमिश्रः

  3. COption (c)

    गोविन्ददेवः

  4. DOption (d)

    अनन्तदेवः

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

भट्टभास्करमिश्रः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : ज्ञानयज्ञ का कर्ता कौन है?

स्पष्टीकरण - 

  • भट्टभास्कर ने तैत्तिरीय संहिता पर ज्ञानयज्ञ नामक भाष्य लिखा। यह भाष्य बहुत से तथ्यों द्वारा समृद्ध है।
  • प्रमाणपुरःसर कतिपय वैदिक ग्रन्थों के मन्त्रों के उद्धरण इस भाष्य में उपस्थापित हैं।
  • विद्वान् भट्टभास्कर ने लुप्तनिघण्टुग्रन्थ के उद्धरण संगृहीत किये। उसने मन्त्रों के अर्थप्रदर्शन के समय विभिन्न आचार्यों के मत भी प्रदर्शित किये।
  • इस भाष्य में न केवल यज्ञपरक अर्थ का निर्देशन है, अपितु अध्यात्म और अधिदैव पक्षों के अर्थ का भी प्रदर्शन किया गया है।

 

अत: स्पष्ट है, की "भट्टभास्करमिश्रः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 25

मनुमते दुर्गे कतिविधिम्?

  1. AOption (a)

    द्विविधम्

  2. BOption (b)

    पञ्चविधिम्

  3. COption (c)

    षड्विधम्

  4. DOption (d)

    सप्तविधम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

षड्विधम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : मनु के मत से दुर्ग कितने प्रकार के हैंं?

स्पष्टीकरण -  

धन्वदुर्गं महीदुर्गं दुर्गं वार्क्षं एव वा।

नृदुर्गं गिरिदुर्गं वा समाश्रित्य वसेत् पुरम्*॥* (मनुस्मृति, ७.७०)

मनु छह प्रकार के दुर्ग बतातेंं हैंं - 

  • धनुदुर्ग, जिसके चारों ओर निर्जल प्रदेश हो,
  • महीदुर्ग, जिसके चारो ओर टेढ़ी मेढ़ी जमीन हो,
  • जलदुर्ग (अब्दुर्ग), जिसके चारों ओर जल हो,
  • वृक्ष दुर्ग, जिसके चारो ओर घने बृक्ष हों,
  • नरदुर्ग जिसके चारों ओर सेना हो और
  • गिरिदुर्ग, जिसके चारों ओर पहाड़ हो या जो पहाड़ पर हो।

 

​अतः स्पष्ट है, की "षड्विधम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 26

न हि रसादृते कश्चिदर्थः प्रवर्तते इति कस्मिन् ग्रन्थे मूलतः प्राप्यते ?

  1. AOption (a)

    दशरूपके

  2. BOption (b)

    नाट्यशास्त्रे

  3. COption (c)

    काव्यादर्शे

  4. DOption (d)

    साहित्यदर्पणे

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

नाट्यशास्त्रे

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : "न हि रसादृते कश्चिदर्थः प्रवर्तते" यह किस ग्रंथ से प्राप्त होता है?

स्पष्टीकरण - 

  • मूल पंक्ति - 
  • तत्र रसानेव तावदादावभिव्याख्यास्यामः। न हि रसादृते कश्चिदर्थः प्रवर्तते । तत्र विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः। (नाट्यशास्त्र, षष्ठ अध्याय)
  • भाषांतर - 
  • अब हम रस की व्याख्या करेंगे। अर्थात् रस के बिना किसी अर्थ का प्रवर्तन काव्य में नहीं होता। विभाव,अनुभाव और व्यभिचारी भावोंं के संयोग से रसनिष्पत्ति होती है।

​

अत: स्पष्ट है, की "नाट्यशास्त्रे" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 27

यथोचितं मेलनं कुरुत-

सूची Iसूची II
(A)दिक्I.त्वक्
(B)वायुःII.चक्षुः
(C)सूर्यःIII.रसना
(D)वरुणःIV.श्रोत्रम्
  1. AOption (a)

    A - III, B - IV, C - I, D - II

  2. BOption (b)

    A - I, B - II, C - III, D - IV

  3. COption (c)

    A - IV, B - I, C - II, D - III

  4. DOption (d)

    A - II, B - IV, C - I, D - III

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

A - IV, B - I, C - II, D - III

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यथोचित मेलन कीजिए। 

स्पष्टीकरण - 

  • सांख्य ने कर्म करनेवाले अवयवों को इंद्रिय मानकर इद्रियों के दो विभाग किए हैं - ज्ञानेंद्रिय और कर्मेंद्रिय। ज्ञानेंद्रिय वे हैं जिनसे केवल विषयों के गुणों का अनुभव होता है । ये पाँच है चक्षु (जिससे रूप का ज्ञान होता है), श्रोत्र (जिससे शब्द का ज्ञान होता है ।), नासिका (जिससे गंध का ज्ञान होता है), रसना (जिससे स्वाद का ज्ञान होता है) और त्वचा (जिससे स्पर्श द्वारा कड़े और नरम आदि का ज्ञान होता है) ।
  • इसी प्रकार कर्मेंद्रियाँ भी, जिनके द्वारा विविध कर्म किए जाते हैं, पाँच हैं - वाणी (बोलने के लिये), हाथ (पकड़ने के लिये) पैर (चलने के लिये), गुदा (मलत्याग करने के लिये), उपस्थ (मूत्रत्याग करने के लिये) । इसके अतिरिक्त उभयात्मक अंतरेंद्रिय 'मन' भी माना गया है जिसके मन, बुद्धि, अहंकार और .चित चार विभाग करके वेदांतियों ने कुल १४ इंद्रियाँ मानी हैं।
  • इनके पृथक् पृथक् देवता कल्पित किए हैं, जैसे, कान के देवता दिशा, त्वचा के वायु, चक्षु के सूर्य, जिह्वा के प्रचेता, नासिका के अश्विनीकुमार, वाणी के अग्नि, पैर के विष्णु, हाथ के इंद्र, गुदा के मित्र, उपस्थ के प्रजापति, मन के चंद्रमा, बुद्धि के ब्रह्मा, चित्त के अच्युत, अहंकार के शंकर।

 

अतः स्पष्ट है, की "A - IV, B - I, C - II, D - III" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 28

अधस्तनेषु निरुक्तग्रन्थानुसारेण उपमार्थको निपातौ स्तः-

A. परि

B. नु

C. इव

D. च

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम्

  2. BOption (b)

    B, C केवलम्

  3. COption (c)

    C, D केवलम

  4. DOption (d)

    A, C केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

B, C केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : निरुक्तग्रन्थ के अनुसार उपमार्थक निपात कौन से हैंं?

स्पष्टीकरण - 

  • यास्क ने प्रयोगों के आधार पर निपातों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया है।
  • उपमार्थक निपात
  • अर्थोपसंग्रहार्थक निपात
  • पादपूरक निपात
  • उपमार्थक निपातों का प्रयोग किसी उपमान की उपमेय से उपमा देने के लिये होता है। अर्थोपसंग्रहार्थक निपात वे होते हैं जो किसी दूसरे अर्थ का संग्रह करते हैं। पादपूरक वे निपात हैं जो वेद में मन्त्रों में पादों की पूर्ति के लिये प्रयुक्त होते हैं।
  • उपमार्थक निपात का निरूपण करते हुए यास्क लिखते हैं कि "तेषामेते चत्वार उपमार्थे भवन्ति अर्थात् इव, न, चित् और नु इन चार निपातों का प्रयोग वेद में उपमा के अर्थ में किया गया है।

 

अतः स्पष्ट है, की "B, C केवलम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 29

याज्ञवल्क्यस्मृतौ व्यवहाराध्यायस्य प्रकरणेषु द्वे प्रकरणे स्तः-

A. दानप्रकरणम्

B. साहसप्रकरणम्

C. स्नातकधर्मप्रकरणम्

D. ऋणादानप्रकरणम्

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, D केवलम्

  2. BOption (b)

    A, C केवलम्

  3. COption (c)

    B, D केवलम्

  4. DOption (d)

    B, C केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

B, D केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : याज्ञवल्क्यस्मृति के व्यवहाराध्याय के दो प्रकरण कौन से हैंं?

स्पष्टीकरण - 

  • याज्ञवल्क्य स्मृति में तीन कांड (अध्याय) हैं-
  • आचारकाण्ड - इसमें तेरह प्रकरण हैं।
  • उपोद्घात-प्रकरणं, ब्रह्मचारिप्रकरणं, विवाह-प्रकरणं, वर्णजातिविवेक-प्रकरणं, गृहस्थ-प्रकरणम्, स्नातवह-प्रकरणम्, भक्ष्याभक्ष्य-प्रकरणम्, द्रव्यशुद्धि प्रकरणम्, दान-प्रकरणम्, श्राद्ध्-प्रकरणम्, गणपति कल्पप्रकरणम्, ग्रहशान्ति-प्रकरणम्, राजधर्म-प्रकरणम्।
  • व्यवहारकाण्ड - इसमें पच्चीस प्रकरण हैं।
  • व्यवहाराध्याये साधाराव्यवहारमातृका, ऋणादानो-पनिधि-साक्षी-लेख्य-दिव्य-दायविभाग-सीमाविवाद-स्वामिपालविवाद-अस्वामिविक्रय-दत्ताप्रदानिक क्रीतानुशया-अभ्युपेत्याशुश्रूषा-संविदव्यतिक्रम्-वेतनादानद्यूत समाह्वय -वाक् पारुष्य-दण्डपारुष्य-साहसविक्रीयासम्प्रदानसम्भूय समुत्थान-स्तेय-स्त्रीसंग्रहण-प्रकरण।
  • प्रायश्चितकाण्ड - इसमें छः प्रकरण हैं।
  • शौचप्रकरणम्, आपद्धर्मप्रकरणम्, वानप्रस्थप्रकरणम्, यति-धर्मप्रकरणम्, प्रायश्चित्त-प्रकरणम्, प्रकीर्ण-प्रयश्चित्तानि।

 

अतः स्पष्ट है, की "B, D केवलम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 30

यथोचितं मेलनं कुरुत-

सूची Iसूची II
(A)प्रमाणसमुच्चयःI.धर्मकीर्तिः
(B)प्रमाणवार्त्तिकम्II.दिङ्नागः
(C)माध्यमिककारिकाIII.शान्तरक्षितः
(D)तत्त्वसङ्ग्रहःIV.नागार्जुनः
  1. AOption (a)

    A - I, B - III, C - IV, D - II

  2. BOption (b)

    A - II, B - I, C - IV, D - III

  3. COption (c)

    A - III, B - IV, C - I, D - II

  4. DOption (d)

    A - IV, B - I, C - III, D - II

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

A - II, B - I, C - IV, D - III

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यथोचित मेलन कीजिए।

स्पष्टीकरण - 

  • प्रमाणसमुच्चय बौद्ध दार्शनिक दिङ्नाग द्वारा रचित ग्रंथ है। इसका मूल संस्कृत ग्रन्थ अप्राय है, केवल इसका तिब्बती अनुवाद मिलता है। इस पर जिनेन्द्रबुद्धि द्वारा रचित टीका मिलती है जो तिब्बती भाषा में ही है। प्रमाणसमुच्चय में कुल छः परिच्छेद और कुल २५७ श्लोक हैं। परिच्छेदों के नाम ये हैं-
  • प्रत्यक्ष-परीक्षा
  • स्वार्थानुमान-परीक्षा
  • परार्थानुमान-परीक्षा
  • दृष्टान्त-परीक्षा
  • अपोह-परीक्षा
  • जाति-परीक्षा
  • प्रमाणवार्त्तिक धर्मकीर्ति द्वारा रचित प्रसिद्ध न्यायशास्त्रीय ग्रन्थ है। इसमें चार परिच्छेद हैं-
  • स्वार्थानुमान
  • प्रामाण्यवाद
  • प्रत्यक्ष
  • परार्थानुमान
  • माध्यमिककारिका यह ग्रंथ माध्यमिक मत अथवा शून्यवाद के प्रवर्तक नागार्जुन की रचना है। यह ग्रंथ नागार्जुन के पांडित्य, व्यापक दार्शनिकता, उद्भट तार्किकता तथा नवीन कल्पना का भांडागार है, जिसे आचार्य भव्य कृत प्रज्ञाप्रदीप - तथा आचार्य चंद्रकीर्ति रचित "प्रसन्नपदा" जैसी प्रौढ़ वृत्तियों के द्वारा अलंकृत होने का गौरव प्राप्त है। 27 प्रकरणों में विभक्त यह ग्रंथ कारिकाओं में ही निबद्ध है। यह प्रसन्नपदा के साथ मूल अनुवाद में लेनिनग्राद से नागराक्षरों में प्रकाशित भी हुआ है।
  • शान्तरक्षित (७२५-७८८) ८वीं सदी के भारतीय बौद्ध ब्राह्मण तथा नालन्दा के मठाधीश थे। शान्तरक्षित ने योगाचार-स्वतान्त्रिक-माध्यमिक दर्शन का प्रवर्तन किया, जिससे नागार्जुन के माध्यमिक सम्प्रदाय, असंग के योगाचार सम्प्रदाय तथा धर्मकीर्ति के सिद्धान्तों का एकीकरण किया। उन्होने तिब्बत में बौद्ध धर्म तथा सर्वस्तिवादिन परम्परा का भी श्रीगणेश किया। तत्त्वसङ्ग्रह यह इनकी रचना है।

​

अतः स्पष्ट है, की "A - II, B - I, C - IV, D - III​ " यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 31

विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः' इति रससूत्रे प्रयुक्तस्य निष्पत्ति' शब्दस्य उत्पत्तिरित्यर्थः अधोलिखितेषु केन स्वीकृतः ?

  1. AOption (a)

    भट्टनायेकन 

  2. BOption (b)

    शङ्कुकेन 

  3. COption (c)

    भट्टलोल्लटेन

  4. DOption (d)

    अभिनवगुप्तेन

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

भट्टलोल्लटेन

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः इस रससूत्र में प्रयुक्त "निष्पत्ति" इस शब्द का उत्पत्ति यह अर्थ किस ने स्वीकृत किया है?

स्पष्टीकरण - 

  • रस-सिद्धांत के आदि प्रवर्तक आचार्य भरतमुनि प्रणीत नाट्यसूत्र के परवर्ती व्याख्याता  आचार्यों ने चार रस-सिद्धांतों को विकसित किया -
  • उत्पत्तिवाद,
  • अनुमितिवाद,
  • भुक्तिवाद
  • अभिव्यक्तिवाद।
  • आचार्य भरतमुनि के सूत्र- विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः में प्रयुक्त निष्पत्ति शब्द के चार अर्थ – उत्पत्ति, अनुमिति, भुक्ति और अभिव्यक्ति परवर्ती व्याख्याताओं ने किए। वे आचार्य क्रमशः भट्टलोल्लट, शंकुक, भट्टनायक और अभिनवगुप्त हैं।

 

अतः स्पष्ट है, की "भट्टलोल्लटेन " यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 32

वाल्मीकि रामायणस्य टीकाकारौ स्तः-

A. नीलकण्ठः

B. रामवर्मा

C. विमलबोधः 

D. गोविन्दराजः

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, C केवलम्

  2. BOption (b)

    B, D केवलम्

  3. COption (c)

    C, D केवलम्

  4. DOption (d)

    B, C केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

B, D केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : वाल्मीकि रामायण के टीकाकार कौन है?

स्पष्टीकरण - 

वाल्मीकि रामायण पर निम्नलिखित टीकाएँँ प्रसिद्ध है - 

टीका का नामटीकाकार
रामानुजीयम्-
सर्वार्थसार-
रामायणदीपिका-
बृहदविवरण-
लघुविवरण-
रामायणतत्वदीपिका (महेश्वरतीर्थी)महेश तीर्थ
भूषण (गोविन्दराजीय )गोविन्दराज
वाल्मीकिहृदयअहोबल
अमृतकतकमाधवयोगी
रामायणतिलक-
रामायणशिरोमणि-
मनोहर-
धर्माकूतम्त्र्यम्बक मखिन्
तनिश्लोकीपेरियर वाचाम्बिल्लै
विषमपदविवृति-
रामायणभूषणप्रबल मुकुन्दसूरि

इस के अपरोक्त रामवर्मा लिखित अंग्रेजी टीका भी प्रसिद्ध है। 

अतः स्पष्ट है, की "B, D केवलम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 33

तैत्तिरीयारण्यके कति प्रपाठकाः सन्ति?

  1. AOption (a)

    20

  2. BOption (b)

    10

  3. COption (c)

    24

  4. DOption (d)

    15

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

10

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : तैत्तिरीयारण्यक में कितने प्रपाठक हैंं?

स्पष्टीकरण - 

  • कृष्ण यजुर्वेदीय आरण्यक
  • ब्रह्म सम्प्रदाय कृष्ण यजुर्वेद के 86 शाखाओं में से कुछ ही शाखाओं पर आरण्यक उपलब्ध हैं, यथा- (क) तैत्तिरीय आरण्यक, (ख) मैत्रायणी आरण्यक ।
  • तैत्तिरीय आरण्यक यह कृष्ण यजुर्वेदीय तैत्तिरीय शाखा का आरण्यक है। इसमें 10 प्रपाठक (अरण) या परिच्छेद हैं।
  • प्रपाठकों के उपविभाग अनुवाक हैं।
  • प्रपाठकों का नामकरण उनके प्रथम पद के आधार पर किया गया है।
  • 10 प्रपाठकों के नाम इस प्रकार हैं -
  1. भद्र
  2. सह वै
  3. चिति
  4. युञ्ज ते
  5. देव वै
  6. परे
  7. शिक्षा
  8. ब्रह्मविद्या
  9. भृगु
  10. नारायणीय।
  • प्रथम प्रपाठक 'भद्रं कर्णेभिः' मन्त्र से प्रारम्भ हुआ है, अतः इस प्रपाठक का नाम 'भद्र' है। इसी प्रकार अन्य प्रपाठकों के नाम हैं।

 

​अतः स्पष्ट है, की "10" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 34

भारतस्य सिंहमूर्तियुतस्य अशोकचिह्नस्य ग्रहणं कुतः?

  1. AOption (a)

    सारनाथाभिलेखात्

  2. BOption (b)

    गिर���ारशिलालेखात्

  3. COption (c)

    सोपाराशिलालेखात्

  4. DOption (d)

    ब्रह्मगिरिशिलालेखात्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

सारनाथाभिलेखात्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : भारत के सिंहमूर्तियुक्त अशोकचिह्न का ग्रहण कहाँँ से किया गया है?

स्पष्टीकरण - 

  • सारनाथ भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के वाराणसी ज़िले के मुख्यालय, वाराणसी, से लगभग 10 किलोमीटर पूर्वोत्तर में स्थित प्रमुख बौद्ध एवम हिन्दू तीर्थस्थल है। ज्ञान प्राप्ति के पश्चात भगवान बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश यहीं दिया था जिसे "धर्म चक्र प्रवर्तन" का नाम दिया जाता है और जो बौद्ध मत के प्रचार-प्रसार का आरंभ था। यह स्थान बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थों में से एक है। अन्य तीन हैं - लुम्बिनी, बोधगया और कुशीनगर।
  • सारनाथ में मुख्य मंदिर से पश्चिम की ओर एक अशोककालीन प्रस्तर-स्तंभ है जिसकी ऊँचाई प्रारंभ में 17.55 मी. (55 फुट) थी। वर्तमान समय में इसकी ऊँचाई केवल 2.03 मीटर (7 फुट 9 इंच) है। स्तंभ का ऊपरी सिरा अब सारनाथ संग्रहालय में है। नींव में खुदाई करते समय यह पता चला कि इसकी स्थापना 8 फुट X16 फुट X18 इंच आकार के बड़े पत्थर के चबूतरे पर हुई थी। इस स्तंभ पर तीन लेख उल्लिखित हैं। पहला लेख अशोक कालीन ब्राह्मी लिपि में है जिसमें सम्राट ने आदेश दिया है कि जो भिछु या भिक्षुणी संघ में फूट डालेंगे और संघ की निंदा करेंगे: उन्हें सफ़ेद कपड़े पहनाकर संघ के बाहर निकाल दिया जाएगा। दूसरा लेख कुषाण-काल का है। तीसरा लेख गुप्त काल का है, जिसमें सम्मितिय शाखा के आचार्यों का उल्लेख किया गया है।
  • अशोक का चतुर्मुख सिंहस्तम्भ धर्मचक्र प्रवर्तन की घटना का स्मारक था और धर्मसंघ की अक्षुण्णता बनाए रखने के लिए इसकी स्थापना हुई थी। यह चुनार के बलुआ पत्थर के लगभग 45 फुट लंबे प्रस्तरखंड का बना हुआ है। धरती में गड़े हुए आधार को छोड़कर इसका दंड गोलाकार है, जो ऊपर की ओर क्रमश: पतला होता जाता है। दंड के ऊपर इसका कंठ और कंठ के ऊपर शीर्ष है। कंठ के नीचे प्रलंबित दलोंवाला उलटा कमल है। गोलाकार कंठ चक्र से चार भागों में विभक्त है। उनमें क्रमश: हाथी, घोड़ा, सांढ़ तथा सिंह की सजीव प्रतिकृतियाँ उभरी हुई है। कंठ के ऊपर शीर्ष में चार सिंह मूर्तियाँ हैं जो पृष्ठत: एक दूसरी से जुड़ी हुई हैं। इन चारों के बीच में एक छोटा दंड था जो 32 तिल्लियों वाले धर्मचक्र को धारण करता था, जो भगवान बुद्ध के 32 महापुरूष लक्षणों के प्रतीक स्वरूप था | अपने मूर्तन और पालिश की दृष्टि से यह स्तंभ अद्भुत है। इस समय स्तंभ का निचला भाग अपने मूल स्थान में है। शेष संग्रहालय में रखा है। धर्मचक्र के केवल कुछ ही टुकड़े उपलब्ध हुए। चक्ररहित सिंह शीर्ष ही आज भारत गणतंत्र का राज्य चिह्न है।

 

अतः स्पष्ट है, की "सारनाथाभिलेखात्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 35

मनुस्मृतेः टीकाकारौ स्तः-

A. विज्ञानेश्वरः

B. कुल्लूकभट्टः

C. मेधातिथिः

D. विश्वरूपः

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, C केवलम्

  2. BOption (b)

    B, C केवलम्

  3. COption (c)

    C, D केवलम्

  4. DOption (d)

    A, D केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

B, C केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : मनुस्मृति के टीकाकार कौन हैंं?

स्पष्टीकरण - 

  • मनुस्मृति पर कई टीकाएँ प्रचलित हैं-
  • मेधातिथि कृत भाष्य;
  • कुल्लूक भट्ट द्वारा रचित मन्वर्थमुक्तावली टीका;
  • नारायण कृत मन्वर्थ विवृत्ति टीका;
  • राघवानन्द कृत मन्वर्थ चन्द्रिका टीका;
  • नन्दन कृत नन्दिनी टीका;
  • गोविन्दराज कृत मन्वाशयानसारिणी टीका आदि।
  • मनु के अनेक टीकाकारों के नाम ज्ञात हैं, जिनकी टीकाएँ अब लुप्त हो गई हैं, यथा - असहाय, भर्तृयज्ञ, यज्वा, उपाध्याय ऋजु, विष्णुस्वामी, उदयकर, भारुचि या भागुरि, भोजदेव धरणीधर आदि।

 

अतः स्पष्ट है, की "B, C केवलम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 36

'अद्वैतसिद्धिः ग्रन्थः केन विरचितः?

  1. AOption (a)

    ब्रह्मानन्दसरस्वतिना

  2. BOption (b)

    मधुसुदनसरस्वतिना

  3. COption (c)

    सदानन्दपरिव्राजकेन

  4. DOption (d)

    चित्सुखाचार्येण

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

मधुसुदनसरस्वतिना

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'अद्वैतसिद्धिः' ग्रंथ की रचना किस ने की है?

स्पष्टीकरण - 

  • श्रीमधुसूदनसरस्वतिस्वामिलिखित अद्वैतसिद्धि ग्रंथ अद्वैतवेदान्त में प्रसिद्ध पञ्चसिद्धिग्रन्थोंं में से एक है। अन्य सिद्धि ग्रंथ इस प्रकार हैंं - 
  • श्रीसुरेश्वराचार्य कृत’नैष्कर्म्यसिद्धिः’
  • श्रीमण्डनमिश्र कृत ’ब्रह्मसिद्धिः’
  • श्रीविमुक्तात्म कृत ’इष्टसिद्धिः’
  • श्रीगङ्गाधरेन्द्रसरस्वती कृत ’स्वाराज्यसिद्धिः’।

 

अत: स्पष्ट है, की "मधुसुदनसरस्वतिना" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 37

'धातुपारायणम्' इति व्याकरणग्रन्थस्य रचयिता अस्ति-

  1. AOption (a)

    विनयसागरसूरिः

  2. BOption (b)

    नागेशभट्टः

  3. COption (c)

    कैय्यटः

  4. DOption (d)

    हेमचन्द्रसूरिः

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (d)D.

हेमचन्द्रसूरिः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'धातुपारायणम्' इस व्याकरणग्रन्थ का रचयिता कौन है?

स्पष्टीकरण - 

  • आचार्य हेमचन्द्र (1145-1229) कलिकाल सर्वज्ञ महान गुरु, समाज-सुधारक, धर्माचार्य, गणितज्ञ एवं अद्भुत प्रतिभाशाली मनीषी थे। भारतीय चिंतन, साहित्य और साधना के क्षेत्र में उनका नाम अत्यन्त महत्वपूर्ण है। साहित्य, दर्शन, योग, व्याकरण, काव्यशास्त्र, वाङ्मय के सभी अंङ्गो पर नवीन साहित्य की सृष्टि तथा नये पंथ को आलोकित किया। संस्कृत एवं प्राकृत पर उनका समान अधिकार था।
  • संस्कृत के मध्यकालीन कोशकारों में हेमचन्द्र का नाम विशेष महत्व रखता है। वे महापण्डित थे और 'कलिकालसर्वज्ञ' कहे जाते थे। वे कवि थे, काव्यशास्त्र के आचार्य थे, योगशास्त्रमर्मज्ञ थे, जैनधर्म और दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान् थे, टीकाकार थे और महान कोशकार भी थे। वे जहाँ एक ओर नानाशास्त्रपारंगत आचार्य थे वहीं दूसरी ओर नाना भाषाओं के मर्मज्ञ, उनके व्याकरणकार एवं अनेकभाषाकोशकार भी थे। व्याकरण के क्षेत्र में इनका सिद्धहेमशब्दानुशासन, सिद्धहेमलिङ्गानुशासन एवं धातुपारायण ग्रन्थ उपलब्ध हैं।

 

अतः स्पष्ट है, की "हेमचन्द्रसूरिः " यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 38

बाह्यार्थानुमेयवादी कः?

  1. AOption (a)

    सौत्रान्तिकः

  2. BOption (b)

    वैभाषिकः

  3. COption (c)

    योगाचारः

  4. DOption (d)

    माध्यमिकः

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

सौत्रान्तिकः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : बाह्यार्थानुमेयवादी कौन है?

स्पष्टीकरण - 

  • 'सौत्रांतिक मत हीनयान परंपरा का बौद्ध दर्शन है। इसका प्रचार भी लंका में है। इस मत के अनुसार पदार्थों का प्रत्यक्ष नहीं, अनुमान होता है।
  • अत: उसे बाह्यानुमेयवाद कहते हैं। सौत्रान्तिक पाठशाला की शुरुआत बौद्ध मुनि कुमारलात से मानी जाती है।
  • ये बाह्यार्थ को अनुमेय मानते हैं। यद्यपि बाह्यजगत की सत्ता दोनों स्वीकार करते हैं, किन्तु दृष्टि के भेद से एक के लिए चित्त निरपेक्ष तथा दूसरे के लिए चित्त सापेक्ष अर्थात् अनुमेय सत्ता है। सौत्रान्तिक मत में सत्ता की स्थिति बाह्य से अन्तर्मुखी है।

 

अत: स्पष्ट है, की "सौत्रान्तिकः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 39

अधोलिखितं कथनद्वयम् आश्रित्य समुचितम् उत्तरं चिनुत-

अभिकथनम् (I) : कलञ्जं न भक्षयेत् इति नित्यकर्म ।

अभिकथनम् (II) स्वर्गकामो यजेत् इति नैमित्तिककर्म।

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    उभये (I) & (II) कथने सत्ये स्तः ।

  2. BOption (b)

    उभये (I) & (II) कथने असत्ये स्तः ।

  3. COption (c)

    प्रथमं कथनम् (I) सत्यं किन्तु द्वितीयं कथनम् (II) असत्यम् अस्ति।

  4. DOption (d)

    प्रथमं कथनम् (I) असत्यं किन्तु द्वितीयं कथनम् (II) सत्यम् अस्ति ।

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (d)D.

प्रथमं कथनम् (I) असत्यं किन्तु द्वितीयं कथनम् (II) सत्यम् अस्ति ।

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अधोलिखित दो कथनोंं के आधार पर उचित उत्तर चुनिए।

स्पष्टीकरण - 

नित्यानि अकरणे प्रत्यवायसाधनानि सन्ध्यावन्दनादीनि। नैमित्तिकानि पुत्रजन्माद्यनुबन्धीनि जातेष्ट्यादीनि। प्रायश्चित्तानि पापक्षयसाधनानि चान्द्रायणादीनि*।* (वेदांतसार)

  • अभिकथनम् (I) : "कलञ्जं न भक्षयेत् इति नित्यकर्म।" - नित्यकर्म वे दैनिक या नियमित कर्म होते हैं जिन्हें हर दिन करना आवश्यक होता है। "कलञ्जं न भक्षयेत्" का अर्थ है "कला (मांस) को नहीं खाना चाहिए।" यह एक नियमित नैतिक नियम हो सकता है, लेकिन इसे नित्यकर्म नहीं माना जाता है, क्योंकि नित्यकर्म पूजा-पाठ या सन्ध्या-वन्दन जैसे दैनिक अनुष्ठान होते हैं।
  • अभिकथनम् (II) : "स्वर्गकामो यजेत् इति नैमित्तिककर्म।" - नैमित्तिककर्म वे कर्म होते हैं जो किसी विशेष उद्देश्य या कामना की पूर्ति के लिए किए जाते हैं। "स्वर्गकामो यजेत्" (स्वर्ग की कामना वाला यज्ञ करे) एक विशेष उद्देश्य की पूर्ति (स्वर्ग प्राप्ति) के लिए किया गया कर्म है, इसलिए यह सही है कि यह नैमित्तिककर्म है।

इस प्रकार, सही उत्तर होगा:

अतः स्पष्ट है, की "प्रथमं कथनम् (I) असत्यं किन्तु द्वितीयं कथनम् (II) सत्यम् अस्ति ।​ यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 40

‘पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम् इति अधोलिखितेषु कस्य कवेः उक्तिः ?

  1. AOption (a)

    भासस्य

  2. BOption (b)

    कालिदासस्य

  3. COption (c)

    शूद्रकस्य 

  4. DOption (d)

    अश्वघोषस्य

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

कालिदासस्य

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : "‘पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्" यह किस कवि की उक्ति है?

स्पष्टीकरण - 

  • संपूर्ण उक्ति - 
  • पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्। सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः॥ (मालविकाग्निमित्रम्, प्रथम ank)
  • भाषांतर -
  • ना तो सब पुराना अच्छा होता हैं और ना ही नूतन होने से कोई कविता बुरी तथा हेय होती हैं। विवेकशील व्यक्ति अपनी बुद्धि से परीक्षा करके श्रेष्ठकर वस्तु को अंगीकार कर लेते हैं और मूढ़ इन्सान दूसरों द्वारा बताने पर ग्राह्य अथवा अग्राह्य का निर्णय करता हैं।

 

अत: स्पष्ट है, की "कालिदासस्य" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 41

संस्कृतस्य शतम्' इति पदस्य कृते 'सतम्' इति पदं कस्यां भाषायां प्रयुज्यते ?

  1. AOption (a)

    ग्रीक भाषायाम्

  2. BOption (b)

    फारसीभाषायाम्

  3. COption (c)

    ईरानी भाषायाम्

  4. DOption (d)

    अवेस्ताभाषायाम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (d)D.

अवेस्ताभाषायाम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : संस्कृत के 'शतम्' इस पद के लिए 'सतम्' यह पद किस भाषा में प्रयुक्त होता है?

स्पष्टीकरण - 

  • भारोपीय (भारत+यूरोप) कुल की भाषाएँ नाम के अनुसार ही प्रायः संपूर्ण यूरोप, ईरान, अफ़ग़ानिस्तान तथा उत्तर-भारत में बोली जाती हैं।
  • अस्कोली के कंठ्य ध्वनियों के विकास (परिवर्तन) के आधार पर इन भाषाओं को दो समूहों -'शतम्' और 'केंतुम्' -  में विभक्त किया जाता है।
  • शतम् समूह में उन शाखाओं की भाषाएँ रखी गईं जिनकी कंठ्य ध्वनियाँ (क, ख आदि) अपने मूल रूप में विद्यमान रहीं। वहीं शतम् या सतम् समूह में उन शाखाओं की भाषाएँ रखी गईं जिनमें कंठ्य ध्वनियाँ (क, ख आदि) संघर्षी ध्वनियों (श, स आदि) में परिवर्तित हो गईं।
  • इस वर्गीकरण को 'सौ' (hundred) के सजातीय अर्थ (cognate) से भली-भाँति समझा जा सकता है। जैसे - लैटिन में सौ को केंतुम (centum), वैदिक (संस्कृत) में 'शतम्' और अवेस्ता (ईरानी) में 'सतम्' कहते हैं।
  • वस्तुतः अस्कोली ने अवेस्ता के 'सतम्' और लैटिन के 'केन्तुम्' को ही अपने सिद्धांत का आधार बनाया। हालांकि शतम् शब्द का प्रयोग वैदिक संस्कृत में किया गया है और ऐसा माना जाता है कि शतम् से सतम् का रूप विकसित हुआ होगा न कि सतम् से शतम् का। हालांकि एक उदाहरण के आधार पर भाषाओं के वर्गीकरण को भी कुछ भाषाविद अनुचित मानते हैं।

 

अतः स्पष्ट है, की "अवेस्ताभाषायाम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 42

अधोलिखितं कथनद्वयम् आश्रित्य समुचितम् उत्तरं चिनुत ।

अभिकथनम् (I) : व्रीहीन् अवहन्ति' इत्यत्र प्रयोगविधिरस्ति ।

अभिकथनम् (II) : 'दध्ना जुहोति' इत्यत्र विनियोगविधिरस्ति।

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    उभये (I) & (II) कथने सत्ये स्तः।

  2. BOption (b)

    उभये (I) & (II) कथने असत्ये स्तः ।

  3. COption (c)

    प्रथमं कथनम् (I) सत्यं किन्तु द्वितीयं कथनम् (II) असत्यम् अस्ति।

  4. DOption (d)

    प्रथमं कथनम् (I) असत्यं किन्तु द्वितीयं कथनम् (II) सत्यम् अस्ति ।

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (d)D.

प्रथमं कथनम् (I) असत्यं किन्तु द्वितीयं कथनम् (II) सत्यम् अस्ति ।

Why this answer is correct

अधोलिखित दो कथनोंं का आश्रय लेके समुचित उत्तर चुनिए। 

अभिकथनम् (I) : व्रीहीन् अवहन्ति' यहाँँ प्रयोगविधि है।

अभिकथनम् (II) : 'दध्ना जुहोति' यहाँँ विनियोगविधि है।

स्पष्टीकरण - 

  • नियमविधि 
  • पक्ष में अप्राप्त को प्राप्त कराने वाले विधि को नियमविधि कहते है। नियम विधि का उदाहरण है- 'व्रीहीनवहन्ति' अर्थात् व्रीहीन् का अवहनन करना चाहिए। दर्शपूर्णमासादि जैसे बड़े यज्ञों में पुरोडाश के निर्माण के लिए तण्डुलनिष्पत्ति (चावल का छिलका निकालना) एक प्रमुख कर्म होता है। क्योंकि यज्ञ में चावल (धान) की ऐसे ही आहुति नहीं दी जाती अतः तण्डुलनिष्पत्ति आवश्यक है। ऐसी अवस्था में तण्डुलनिष्पत्ति के लिए मुख्य रूप से दो साधन प्राप्त होते हैं -
  • नखविदलन,
  • अवहनन।
  • इस अवस्था में अवहनन साधन की अपेक्षा नखविदलन कर्म को प्रमुखता देते हुए यज्ञकर्ता तण्डुलनिष्पत्ति के लिए प्रवृत्त होता है किन्तु नखविदलन द्वारा तण्डुलनिष्पत्ति करना शास्त्रीय विधि से सही नहीं है इसलिए नियम विधि द्वारा अप्राप्त होने पर भी अवहनन विधि द्वारा तण्डुलनिष्पत्ति का विधान किया जाता है। यहाँ ध्यान देने योग्य है कि नखविदलन रूप एक साधन के प्राप्त होने पर भी अवहनन रूप अप्राप्त साधन को शास्त्रीय विधि से सही होने पर विधान कर देना नियम विधि का ही कार्य है।
  • विनियोग विधि
  • मीमांसा दर्शन द्वारा निर्देशित चतुर्विध विधियों में द्वितीय एवं प्रमुख विधि विनियोग विधि है। यह अंग एवं अंगी के मध्य होने वाले सम्बन्ध को बताती है यह द्रव्यदेवतादि अंगों एवं होमादि अंगी के मध्य के सम्बन्ध का बोध कराती है - अप्रधानसम्बन्धबोधकोविधिर्विनियोगविधिः'। इ���का उदाहरण है - दध्ना जुहोति अर्थात् दधि से होम करता है। यहाँ दध्ना में तृतीया के द्वारा दधि अंग का तथा जुहोति से अंगी (अग्निहोत्र जुहोति) के सम्बन्ध का विधान किया गया है - सा हि तृतीयया प्रतिपन्नाङ्गभावस्य दघ्नो होमसम्बन्धं विधत्ते दध्ना होमं भावयेदिति। इसलिए यहाँ विनियोग विधि है। विनियोग विधि जिनकी सहायता से अंगत्व का बोध कराती है वे संख्या में छ प्रमाण हैं - 1. श्रुति 2. लिंग 3. वाक्य 4. प्रकरण 5 स्थान एवं 6 समाख्या।

 

इस से स्पष्ट होता है, की "व्रीहीन् अवहन्ति" यह प्रयोगविधि का उदाहरण नहीं है, अपितु नियमविधि का उदाहरण है। तथा "दध्ना जुहोति" यह विनियोगविधि का उदाहरण है।

अतः स्पष्ट है, की "प्रथमं कथनम् (I) असत्यं किन्तु द्वितीयं कथनम् (II) सत्यम् अस्ति।" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 43

अर्थविस्तारोदाहरणेषु एतौ शब्दो परिगणितौ भवतः -

A. गवेषणा

B. वेदना

C. प्रवीणः

D. भार्या

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत

  1. AOption (a)

    C, B केवलम् 

  2. BOption (b)

    B, A केवलम्

  3. COption (c)

    A, C केवलम्

  4. DOption (d)

    A, D केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

A, C केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अर्थविस्तार के उदाहरणोंं में कौन से दो शब्दोंं की गणना होती है?

स्पष्टीकरण - 

  • अर्थ परिवर्तन की दिशाएँ
  • अर्थ का विकास अथवा परिवर्तन की मुख्यतः तीन दिशाओँ में होता है-
  • अर्थ विस्तार (expansion of meaning)
  • वे शब्द जो पहले सीमित अर्थ में प्रयोग होते हों, लेकिन बाद में उनके अर्थ में विस्तार देखने को मिलता है और उनका अर्थ व्यापक हो जाता है। इसे ही अर्थ विस्तार कहते हैं। प्रवीण का अर्थ पहले केवल वीणा बजानेवाले के लिए प्रयुक्त होता था किंतु धीरे-धीरे इस शब्द का अर्थ विस्तार हुआ और बाद में चल कर किसी भी काम में निपुण व्यक्ति को प्रवीण कहा जाने लगा। गवेषणा का अर्थ हुआ गायों को ढूंढना। गोशाला में लाने से पूर्व गउओं का पूरी संख्या में लौटना ज़रूरी होता था इसलिए गोधूलीवेला से पूर्व गवेषणा एक आवश्यक अनुशासन था। गोशाला में आने के बाद गायो को गिना भी जाता था सो गवेषणा में शोध और गणना दोनों भाव समाहित हैं। बाद में गवेषणा शब्द में निहित शोध या खोज का भाव प्रमुख हो गया और उसमें से गो लुप्त होती चली गई। इसी प्रकार कुशल शब्द का अर्थ था 'कुश लाने वाला', लेकिन बाद में यह 'चतुर' का पर्याय बन गया।
  • अर्थ संकोच (contraction of meaning)
  • जिस प्रकार अर्थ का विस्तार होता है उसी प्रकार कई बार व्यापक अर्थ वाले शब्दों के अर्थों में संकोच भी होता है। जैसे- जलज अर्थ होता है 'जल से उत्पन्न' पर जल से उत्पन्न होने वाली सभी चीजों को जलज नहीं कहेंगे, यह शब्द कमल के अर्थ में रूढ़ हो चुका है।
  • अर्थादेश (transference of meaning)
  • अर्थ विस्तार और अर्थ संकोच के अलावा कई बार शब्द के अर्थ बिल्कुल बदल भी जाते हैं। जैसे असुर शब्द देवता का वाचक था पर आज वह दैत्यों का वाचक हो गया है। इसी तरह आकाशवाणी का अर्थ देववाणी था पर अब वह भारतीय रेडियो के लिए इस्तेमाल होता है।
  • इसके साथ अर्थोत्कर्ष (elevation of meaning) और अर्थापकर्ष (deterioration of meaning) भी अर्थ परिवर्तन की दिशा निर्धारित करते हैं। अर्थोत्कर्ष में निकृष्ट अर्थ में प्रयुक्त होने वाला शब्द उत्कृष्ट अर्थ का बोधक हो जाता है। जैसे - साहस, मुग्ध आदि। पहले साहसी उसे कहा जाता था जो चोर-डकैत और जघन्य अपराध में लिप्त हो, लेकिन आगे चलकर वही धीरता और वीरता का परिचायक बन गया। वैसे ही मुग्ध पहले मूर्ख का बोधक था बाद में वही मोहित होने के अर्थ में परिवर्तित हो गया।

 

अतः स्पष्ट है, की प्रस्तुत प्रश्न का उत्तर "A, C केवलम्" यह है।

Question 44

अशोकशिलालेखेषु 'गिरनारशिलालेखाः' कुत्र प्राप्यन्ते?

  1. AOption (a)

    महाराष्ट्रे

  2. BOption (b)

    सौराष्ट्रे

  3. COption (c)

    बंगप्रान्ते

  4. DOption (d)

    उत्कलप्रदेशे

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

सौराष्ट्रे

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अशोक के शिलालेखोंं से गिरनारशिलालेख कहाँँ प्राप्त होता है?

स्पष्टीकरण - 

  • गिरनार गुजरात अथवा सौराष्ट्र में जूनागढ़ के निकट स्थित पहाड़ियाँ हैं।
  • इन पहाड़ियों पर मौर्य सम्राट अशोक का 'चतुर्दश शिलालेख' अकिंत है।
  • पहाड़ियों की दूसरी ओर शक क्षत्रप रुद्रदामन का भी अभिलेख (150ई.) है।
  • रुद्रदामन के जूनागढ़ लेख से ज्ञात होता है कि, सम्राट अशोक के समय 'तुशाष्प' नामक अधीनस्थ यवन राज्यपाल के रूप में सौराष्ट्र पर शासन करता था।
  • इन दो महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रमाणों के आस-पास की पहाड़ियों पर सोलंकी वंश (961-1242) के राजाओं द्वारा बनवाए गए कई जैन मंदिर भी स्थित हैं।

 

अतः स्पष्ट है, की "सौराष्ट्रे" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 45

यथोचितं मेलनं कुरुत-

सूची Iसूची II
(A)नागानन्दम्I.आख्यायिका
(B)विक्रमोर्वशीयम्II.प्रकरणम्
(C)हर्षचरितम्III.नाटकम्
(D)मृच्छकटिकम्IV.त्रोटकम्
  1. AOption (a)

    A - I, B - II, C - III, D - IV

  2. BOption (b)

    A - III, B - IV, C - I, D - II

  3. COption (c)

    A - II, B - I, C - III, D - IV

  4. DOption (d)

    A - I, B - II, C - IV, D - III

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

A - III, B - IV, C - I, D - II

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यथोचित मेलन कीजिए -

स्पष्टीकरण - 

  • नागानन्द (नागों का आनन्द) राजा हर्षवर्धन (606 C.E. - 648 C.E.) द्वारा रचित संस्कृत नाटक है। यह संस्कृत के सर्वश्रेष्ठ नाटकों में से एक है। यह नाटक पाँच अंकों में है। इसमें गरुड़ देवता को खुश करने के लिये नागों की बलि देने को रोकने के लिये राजकुमार जीमूतवाहन द्वारा अपना शरीर त्याग की कहानी है।
  • विक्रमोर्वशीयम् कालिदास द्वारा रचित पाँच अंकों का एक त्रोटक है। इसमें राजा पुरुरवा तथा अप्सरा उर्वशी की प्रणय कथा वर्णित है। विक्रमोर्वशीयम् में श्रृंगार रस की प्रधानता है, पात्रों की संख्या कम है। इसकी कथा ऋग्वेद तथा शतपथ ब्राह्मण से ली गयी है।
  • हर्षचरितम् , बाणभट्ट द्वारा रचित हर्षवर्धन का जीवनचरित है। इसलिए यह आख्यायिका है । बाणभट्ट, हर्ष के दरबारी कवि थे। हर्षचरित, बाणभट्ट की प्रथम रचना है। यह संस्कृत में ऐतिहासिक ग्रन्थ लेखन का आरम्भ करने वाला ग्रन्थ भी है।
  • मृच्छकटिकम् (अर्थात्, मिट्टी का खिलोना या मिट्टी की गाड़ी) संस्कृत नाट्य साहित्य में सबसे अधिक लोकप्रिय रूपक है। इसमें 10 अंक है। इसके रचनाकार महाराज शूद्रक हैं। नाटक की पृष्टभूमि पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) है। भरत के अनुसार दस रूपों में से यह 'मिश्र प्रकरण' का सर्वोत्तम निदर्शन है। इसकी कथावस्तु तत्कालीन समाज का पूर्ण रूप से प्रतिनिधित्त्व करती है। यह केवल व्यक्तिगत विषय पर ही नहीं,अपितु इस युग की शासन-व्यवस्था एवं राज्य-स्थिति पर भी प्रचुर प्रकाश डालता है। साथ- ही-साथ वह नागरिक-जीवन का भी यथावत् चित्र अंकित करता है।

 

अतः स्पष्ट है, की "A - III, B - IV, C - I, D - II" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 46

बौद्धदर्शनस्य प्रतीत्यसमुत्पादे परिगणितौ निदानौ स्तः-

A. उपादानम्

B. निमित्तम्

C. विज्ञानम्

D. निदानम्

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, D केवलम्

  2. BOption (b)

    A, C केवलम्

  3. COption (c)

    B, C केवलम्

  4. DOption (d)

    C, D केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

A, C केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : बौद्धदर्शन के प्रतीत्यसमुत्पाद में परिगणित निदान क्या है?

स्पष्टीकरण - 

द्वितीय आर्य सत्य है दुःख समुदाय। दुःख समुदाय के 12 अंग हैं, अतः इसे द्वादश निदान भी कहा जाता हैं। यह इस प्रकार है - 

  1. अविद्या
  2. संस्कार
  3. विज्ञान
  4. नामरूप
  5. षड़ायतन
  6. स्पर्श
  7. वेदना
  8. तृष्णा
  9. उपादान
  10. भव
  11. जाति
  12. जरामरण

 

अतः स्पष्ट है, की "A, C केवलम् " यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 47

कालक्रमेण समुचितं विकल्पं चिनुत-

A. तत्त्वचिन्तामणिः

B. शब्दशक्तिप्रकाशिका

C. न्यायकुसुमाञ्जलिः

D. दीधितिः

समुचितं विकल्पं चिनुत –

  1. AOption (a)

    A, C, B, D

  2. BOption (b)

    C, A, D, B

  3. COption (c)

    D, B, A, C

  4. DOption (d)

    B, D, C, A

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

C, A, D, B

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : कालक्रम से समुचित विकल्प चुनिए।

स्पष्टीकरण - 

  • न्यायकुसुमांजलि, भारतीय न्यायदर्शन का प्रसिद्ध ग्रन्थ है जिसके रचयिता उदयनाचार्य हैं। इसमें आस्तिकता के पक्ष में बहुत सबल तर्क दिये गये हैं।  ये अक्षपाद गौतम से आरंभ होनेवाली ��्राचीन न्याय की परंपरा के अंतिम प्रौढ़ न्याययिक माने जाते हैं। इनका आविर्भावकाल दशम शतक का उत्तरार्ध है।
  • तत्त्वचिन्तामणि, गंगेश उपाध्याय द्वारा रचित नव्यन्याय का प्रसिद्ध ग्रन्थ है। तत्त्वचिन्तामणि के पश्चात् जितने न्यायग्रंथ लिखे गए वे सब नव्यन्याय के नाम से प्रख्यात हैं। अनुमान किया जाता है कि गंगेश उपाध्याय १३वीं शती में हुए थे और मिथिला निवासी थे।
  • शब्दशक्तिप्रकाशिका यह जगदीश तर्कालङ्कार भट्टाचार्य रचित नव्यन्याय का ग्रंथ है।  १६ वी शती जगदीश तर्कालङ्कार का समय बताया जाता है।
  • दीधिति यह रघुदेव न्यायालंकार लिखित तत्त्वचिन्तामणि इस ग्रंथ की टीका है। १७ वी शती रघुदेव न्यायालंकार का समय बताया जाता है।

​

अतः स्पष्ट है, "C, A, D, B" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है

Question 48

अधोनिर्दिष्टेषु प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम्' इति वार्त्तिकस्य उदाहरणे स्तः-

A. समेनैति

B. कन्दुकेन क्रीडति

C. द्विचक्रिकया

D. सुखेन याति

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    B, D केवलम्

  2. BOption (b)

    A, C केवलम्

  3. COption (c)

    A, D केवलम्

  4. DOption (d)

    C, D केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

A, D केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम्' इस वार्तिक के उदाहरण क्या है?

प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम् :

वार्तिक - प्रकृत्‍यादिभ्‍य उपसंख्‍यानम् 

अर्थ - 

  • प्रकृतिगण के शब्दोंं के साथ तृतीया विभक्ति होती है।
  • प्रकृतिगण में प्रकृति, प्राय, गोत्र, सम(सीधी), विषम(टेढी), द्विद्रोण, पंचक, सहस्र, सुख, दु:ख यह शब्द आते हैंं।

उदाहरण - 

  • प्रकृत्‍या चारु: - स्‍वभाव से सुन्‍दर।
  • प्रायेण याज्ञिक: - प्राय: याज्ञिक।
  • समेनैति - सीधा जाता है।
  • विषमेनैति - टेढा जाता है।
  • द्विद्रोणेन क्रीणाति - दो द्रोण से धान खरीदता है।
  • सुखेन दु:खेन वा याति - सुख या दुख पूर्वक जाता है।
  • सरलतया पठति - सुख से जीता है।

​

अतः स्पष्ट है, 'A, D केवलम्**' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 49

अत्र कथनद्वयमस्ति। एकम् अभिकथनम् (A) अपरञ्च तस्य कारणम् (R) इति ।

अभिकथनम् (A): आपरितोषाद् विदुषां न साधु मन्ये प्रयोगविज्ञानम्।

कारणम् (R) : बलवदपि शिक्षितानाम् आत्मन्यप्रत्ययं चेतः ।

<br>

उपर्युक्तम् अभिकथनं कारणञ्चाश्रित्य समुचितं विकल्पं चिनुत ।

  1. AOption (a)

    अभिकथनम् (A), कारणम् (R) उभयं सत्यम् । किन्तु कारणम् (R). अभिकथनम् (A) इत्यस्य समुचिता व्याख्या अस्ति ।

  2. BOption (b)

    अभिकथनम् (A), कारणम् (R) उभयं सत्यम् । किन्तु कारणम् (R). अभिकथनम् (A) इत्यस्य समुचिता व्याख्या नास्ति ।

  3. COption (c)

    अभिकथनम् (A) सत्यम्. कारणम् (R) असत्यम् ।

  4. DOption (d)

    अभिकथनम् (A) असत्यम्. कारणम् (R) सत्यम् ।

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

अभिकथनम् (A), कारणम् (R) उभयं सत्यम् । किन्तु कारणम् (R). अभिकथनम् (A) इत्यस्य समुचिता व्याख्या अस्ति ।

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : उपर��युक्त अभिकथन और कारण का आश्रय लेकर समुचित विकल्प चुनिए।

स्पष्टीकरण - 

संपूर्ण उक्ति - 

आपरितोषाद् विदुषां न साधु मन्ये प्रयोगविज्ञानम्।

बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेत:।। (अभिज्ञानशाकुन्तलम्, १.२)

  • सूत्रधार कहता है, जब तक विद्वानों को पूर्ण संतुष्टि न हो जाए तब तक मैं अपने नाट्याभिनय (अभीष्टकार्य) के विशिष्टज्ञान को सब तरह से सफल नहीं मानता। क्योंकि नाट्यकला में विशेष योग्यता प्राप्त विद्वानों का भी मन अपने विषय में अविश्वासी (विश्वास न करने वाला) होता है।

 

अभिकथन और कारण दोनो सत्य है, और कारण अभिकथन की समुचित व्याख्या है।

अतः स्पष्ट है, की "अभिकथनम् (A), कारणम् (R) उभयं सत्यम् । किन्तु कारणम् (R). अभिकथनम् (A) इत्यस्य समुचिता व्याख्या अस्ति।" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 50

यथोचितं मेलनं कुरुत-

सूची Iसूची II
(A)ज्ञानम्I.वचनमात्रे
(B)तटीII.परिमाणमात्रे
(C)द्रोणो व्रीहिःIII.लिङ्गमात्राद्याधिक्ये
(D)बहुवःIV.प्रातिपदिकार्थमात्रे
  1. AOption (a)

    A - I, B - III, C - IV, D - II

  2. BOption (b)

    A - IV, B - III, C - II, D - I

  3. COption (c)

    A - II, B - I, C - III, D - IV

  4. DOption (d)

    A - III, B - IV, C - I, D - II

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

A - IV, B - III, C - II, D - I

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यथोचित मेलन कीजिए।

स्पष्टीकरण - 

  • सूत्र - प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा॥
  • वृत्ति - नियतोपस्थितिकः प्रातिपदिकार्थः। मात्रशब्दस्य प्रत्येकं योगः। प्रातिपदिकार्थमात्रे लिङ्गमात्राद्याधिक्ये परिमाणमात्रे संख्यामात्रे च प्रथमा स्यात्। प्रातिपदिकार्थमात्रे - उच्चैः। नीचैः। कृष्णः। श्रीः। ज्ञानम्। लिङ्गमात्रे - तटः, तटी, तटम्। परिमाणमात्रे - द्रोणो व्रीहिः। वचनं संख्या। एकः, द्वौ, बहवः॥
  • भाषांतर : 
  • शब्द का अर्थ बतलाने (प्रातिपदिकार्थ), लिंग बताने के लिए, परिमाण या वचन बताने के लिए कर्ता-कारक प्रथमा विभक्ति का उपयोग होता है।
  • प्रातिपदिकार्थ - गोविन्दः, रामः, ज्ञानम्
  • लिङ्ग - उच्चैः, नीचैः; लिङ्गमात्राद्याधिक्ये - तटः, तटी, तटम्
  • परिमाणमात्रे - एक किलो गेहूँ (मात्रा), द्रोणो व्रीहिः
  • वचनमात्रे (संख्या) - एक, द्वौ बहवः
  • नियतोपस्थितिकः प्रातिपदिकार्थः - किसी शब्द के उच्चारण करने पर जिस का निश्चित अर्थ उपस्थित होने की प्रचिती होती है उसे प्रातिपदिकार्थ कहते है।

 

अतः स्पष्ट है, की "A - IV, B - III, C - II, D - I" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 51

यथोचितं मेलनं कुरुत-

सूची Iसूची II
(A)विवाहसूक्तम्I.ऋग्वेदे
(B)नासदीयसूक्तम्II.शुक्लयजुर्वेदे
(C)शिवसङ्कल्पसूक्तम्III.शतपथब्राह्मणे
(D)वाङ्गनस आख्यानम्IV.अथर्ववेदे
  1. AOption (a)

    A - I, B - II, C - III, D - IV

  2. BOption (b)

    A - IV, B - I, C - II, D - III

  3. COption (c)

    A - III, B - II, C - I, D - IV

  4. DOption (d)

    A - II, B - III, C - I, D - IV

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

A - IV, B - I, C - II, D - III

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यथोचित मेलन कीजिए।

स्पष्टीकरण - 

  • विवाह सूक्त -
  • ऋग्वेद संहिता के दशम मण्डल के 85वें सूक्त को विवाहसूक्त नाम से जाना जाता है। अथर्ववेद में भी विवाह के दो सूक्त हैं। इस सूक्त में सूर्य की पुत्री 'सूर्या तथा सोम के विवाह का वर्णन है। अश्विनी कुमार इस विवाह में सहयोगी का कार्य करते हैं। यहां स्त्री के कर्तव्यों का विस्तार से वर्णन है। उसे सास-ससुर की सेवा करने का उपदेश दिया गया है। परिवार का हित करना उसका कर्तव्य है। साथ ही स्त्री को गृहस्वामिनी, गृहपत्नी और 'साम्राज्ञी' कहा गया है। अतः स्त्री को परिवार में आदरणीय बताया गया है।
  • नासदीय सूक्त -
  • ऋग्वेदसंहिता के दशम मण्डल के 129वें सूक्त को 'नासदीय सूक्त या 'भाववृत्तम सूक्त' कहते हैं। इसमें सृषिट की उत्पत्ति की पूर्व अवस्था का चित्रण है और यह खोजने का यत्न किया गया है कि जब कुछ नहीं था तब क्या था। तब न सत था, न असत, न रात्रि थी, न दिन था; बस तमस से घिरा हुआ तमस था। फिर सर्वप्रथम उस एक तत्त्व में 'काम उत्पन्न हुआ और उसका यही संकल्प सृषिट के नाना रूपों में अभिव्यक्त हो गया। पर अन्त में सन्देह किया गया है कि वह परम व्योम में बैठने वाला एक अध्यक्ष भी इस सबको जानता है या नहीं। अथवा यदि जानता है तो वही जानता है और दूसरा कौन जानेगा?
  • शिवसंकल्पसूक्त - 
  • छह मन्त्रों वाला शिवसंकल्पसूक्त शुक्ल यजुर्वेद का अंश (अध्याय ३४, मन्त्र १-६) है । यह छह मन्त्र अपनी संरचना और संदेश में इतने सारगर्भित व भावपूरित है कि इन्हें स्वतंत्र रूप से एक उपनिषद् की मान्यता भी दी गई है । इस प्रकार शिवसंकल्पसूक्त को शिवसंकल्पोपनिषद् के नाम से भी जाना जाता है । यहाँ शिव संकल्प से तात्पर्य शुभ संकल्प, श्रेष्ठ एवं कल्याणकारी संकल्प से है। इन मन्त्रों में मनुष्य को ईश्वर से प्राप्त मन नामक दिव्य ऊर्जा के अद्भुत सामर्थ्यों का वर्णन है।
  • वाङ्मनस् आख्यान - 
  • वाङ्मनस् विषयक आख्यान शतपथ ब्राह्मण (१.४.५.८-१३) के प्रथम काण्ड के चतुर्थ प्रपाठक के अन्तर्गत पाँचवें ब्राह्मण में मन्त्र संख्या आठ से तेरह पर्यन्त प्राप्त होता है । यह आख्यान संवादशैली में है । इसका सारसंक्षेप निम्नवत् है - एक बार वाणी और मन के बीच विवाद हो गया । मन ने कहा - 'मैं तुमसे श्रेष्ठ हूँ क्यूॅंकि मैं जो जानता हूॅं तुम वही बोलती हो । जो मैं नहीं जानता उस विषय में तुम नहीं बोल सकती । इस तरह तुम मेरा अनुकरण करने के कारण मुझसे श्रेष्ठ कैसे हो सकती हो ? अतः मैं ही तुमसे श्रेष्ठ हूँ'। तब वाणी बोली - 'मैं तुमसे श्रेष्ठ हूॅं‚ क्योंकि जो तुम जानते हो उसे मैं ही विज्ञापित और प्रकाशित करती हूॅं'। इस प्रकार से झगड़ते हुए वे दोनों प्रजापति के पास पहुँचे और निर्णय करने को कहा । प्रजापति ने वाणी को संकेतित करते हुए कहा कि मन ही तुमसे श्रेष्ठ है। तुम मन का ही अनुसरण करने वाली हो। अनुकर्ता छोटा और क्षुद्र होता है । इस तरह से प्रजापति से प्रतिकूल निर्णय सुनकर वाणी ने उद्विग्न होकर गर्भ त्याग दिया और प्रजापति से बोली‚ मैं तुमसे हविद्रव्य प्राप्ति का अधिकार छीनती हूँ। अब से तुम अहव्यवाट् ही रहो अर्थात् हवि प्राप्ति के अनधिकारी ही रहो क्यूँकि मैं तुम्हारे द्वारा निन्दित और विनिपातित हूँ । तब से यज्ञ में प्रजापति के लिये जो कुछ भी करते हैं वह उपांशु ही किया जाता है। भगवती व���ग् के द्वारा गलित और पतित वही गर्भ अत्रि हुए । इसीलिये तभी से आज तक गलितगर्भा रजस्वला स्त्री को आत्रेयी कहा जाता है।

 

अतः स्पष्ट है, की "A - IV, B - I, C - II, D - III " यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 52

अनन्तभट्टविरचितभाष्यस्य नाम किमस्त��?

  1. AOption (a)

    मातृवेदः

  2. BOption (b)

    स्वरप्रकाशः

  3. COption (c)

    पदार्थबोधः

  4. DOption (d)

    पदार्थप्रकाशकः

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (d)D.

पदार्थप्रकाशकः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अनन्तभट्टविरचित भाष्य का नाम क्या है?

स्पष्टीकरण - 

  • शुक्ल यजुर्वेद के वाजसनेयि - प्रातिशाख्य के रचयिता महर्षि कात्यायन हैं। यह आठ अध्यायों में विभक्त है।
  • इसमें मुख्य रूप से वर्ण, स्वर, सन्धि, पदपाठ, क्रमपाठ आदि विषयों का प्रतिपादन किया गया है।
  • इस प्रातिशाख्य के अनेक सूत्र तथा पारिभाषिक शब्द पाणिनीय व्याकरण में यथावत् प्रयुक्त हुए हैं। इस प्रातिशाख्य पर उब्वट का मातृवेद तथा अनन्त भट्ट का पदार्थ-प्रकाशक, ये दो भाष्य उपलब्ध होते हैं।

 

​अतः स्पष्ट है, की "पदार्थप्रकाशकः " यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 53

अधस्तनेषु समुचितसिद्धान्तौ स्तः-

A. काव्यस्य प्रयोजनं नैतिकसुधारः शिक्षा च - लॉन्जाइनस

B. काव्यस्य प्रयोजनद्वयं ज्ञानार्जनम् आनन्दश्च – अरस्तू

C. सत्यस्य पञ्चभेदाः - अरस्तू

D. उत्कृष्टाभिव्यक्तेः सशक्तमाध्यमः उत्कृष्टविचार एव - लॉन्जाइनस

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, D केवलम् 

  2. BOption (b)

    C, D केवलम् 

  3. COption (c)

    B, D केवलम्

  4. DOption (d)

    A, C केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

B, D केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : समुचित सिद्धांत कौन से है?

स्पष्टीकरण - 

अरस्तू प्राचीन यूनानी दार्शनिक व बहुश्रुत थे। अरस्तू के सिद्धांत है - 

  • काव्यस्य प्रयोजनद्वयं ज्ञानार्जनम् आनन्दश्च।
  • काव्य के दो प्रयोजन है, ज्ञानार्जन और आनन्द।
  • उत्कृष्टाभिव्यक्तेः सशक्तमाध्यमः उत्कृष्टविचार एव।
  • उत्कृष्ट अभिव्यक्ति का सशक्तमाध्यम उत्कृष्ट विचार ही है।

​

अत: स्पष्ट है, की "B, D केवलम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 54

विश्वनाथानुसारं गुणीभूतव्यङ्ग्स्य कति भेदाः सन्ति?

  1. AOption (a)

    अष्टौ

  2. BOption (b)

    त्रयः

  3. COption (c)

    द्वौ

  4. DOption (d)

    चत्वारः

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

अष्टौ

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : विश्वनाथ के अनुसार गुणीभूतव्यङ्ग्य काव्य के कितने भेद होतें हैंं?

स्पष्टीकरण - 

  • गुणीभूतव्यंग्यकाव्य के लक्षण का निरूपण करके विश्वनाथ इसके भेदों का बताते हैं-

तत्र स्यादितराङ्गं काक्वाक्षिप्तं च वाच्यसिद्ध्यङ्गम् । ।13 । ।

सन्दिग्धप्राधान्यं तुल्यप्राधान्यमस्फुटमगूढम् । व्यङ्ग्यमसुन्दरमेवं मेदास्तस्योदिता अष्टौ ।।14।।

  • गुणीभूतव्यंग्यकाव्य में व्यंग्य की प्रायः आठ स्थिति देखी जाती है. इन आठ स्थितियों में व्यंग्यार्थ की वाच्यार्थ से प्रधानता नहीं रहती. इस दृष्टि से यह गुणीभूतव्यग्यकाव्य आठ प्रकार का हो जाता है, जो निम्न है -
  1. इतराङ्ग
  2. काक्वाक्षिप्त
  3. वाच्यसिद्ध्यङ्ग
  4. सन्दिग्धप्राधान्य
  5. तुल्यप्राधान्य
  6. अस्फुट
  7. अगूढ
  8. असुन्दर।

 

अतः स्पष्ट है, की "अष्टौ " यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 55

मनुमतानुसारं वर्णितेषु राज्ञः षड्गुणेषु अन्यतमो विद्यते-

  1. AOption (a)

    जयः

  2. BOption (b)

    पराजयः

  3. COption (c)

    विग्रहः

  4. DOption (d)

    आचारः

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

विग्रहः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : मनुमतानुसार वर्णित राजा के छह गुणोंं में से एक कौन सा है?

स्पष्टीकरण - 

  • कौटिलीय अर्थशास्त्र के समान मनुस्मृति के सप्तम अध्याय में राजा के छह गुणोंं का वर्णन आता है -
  • संधि-विग्रह-आसन-यान-संश्रय-द्वैधी-भावाः षाड्गुण्यम्। (७.५८)
  • राजा के छह गुण है -  संधि, विग्रह, आसन, यान, संश्रय, द्वैधीभाव।

​

​अतः स्पष्ट है, की "विग्रहः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 56

चित्तभूमीनां विकल्पं क्रमेण योजयत-

A. निरुद्धः

B. एकाग्रः

C. क्षिप्तम्

D. मूढः

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    B, C, D, A

  2. BOption (b)

    C, D, B, A

  3. COption (c)

    A, B, D, C

  4. DOption (d)

    C, A, D, B

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

C, D, B, A

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : चित्तभूमि के विकल्पों की क्रम से योजना कीजिए।

चित्तभूमि :

चित्त का अर्थ होता है जहां हमारे विचार जन्मते हैं, बनते हैं और जमे रहते हैं संस्कारों के रूप में। चित्त एक प्रकार की भूमि है जहां विचार जन्मते हैं और यह चित्त रूपी भूमि भी पांच प्रकार की होती है।

  1. क्षिप्त - क्षिप्त का अर्थ है-मन की चंचल स्थिति, चंचल अवस्था।
  2. मूढ़ - जब तमोगुण का प्रभाव अधिक होता है, तब मूढ़ अवस्था उत्पन्न होती है। मूर्च्छा जैसी, थोड़ी नशीली, नशे जैसी अवस्था या तमोगुणी अवस्था मूढ़़ता प्रधान अवस्था है।
  3. विक्षिप्त - विक्षिप्त अवस्था में सत्त्वगुण प्रभावशील होता है, सत्त्व गुण प्रधान होता है। लेकिन बीच-बीच में रजोगुण और तमोगुण स्थिति को बिगाड़ते रहते हैं।
  4. एकाग्र - इसमें पूरा सत्त्वगुण का प्रभाव होता है।
  5. निरुद्ध - यह एकाग्र अवस्था से भी और ऊंची अवस्था है। इसमें भी मन पर पूरा नियंत्रण होता है।

 

अतः स्पष्ट है, 'C, D, B, A**' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 57

कालक्रमानुसारं निम्नलिखितग्रन्थानां क्रमं चिनुत-

A. महाभाष्यम्

B. परिभाषेन्दुशेखरः

C. प्रौढमनोरमा

D. काशिका

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    D, A, B, C

  2. BOption (b)

    A, C, B, D

  3. COption (c)

    A, D, C, B

  4. DOption (d)

    B, D , A, C

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

A, D, C, B

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : कालक्रम से निम्नलिखितग्रन्थोंं का क्रम चुनिए।

स्पष्टीकरण - 

  • पतंजलि ने पाणिनि के अष्टाध्यायी के कुछ चुने हुए सूत्रों पर भाष्य लिखी जिसे व्याकरणमहाभाष्य का नाम दिया गया। इसकी रचना ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी की मानी जाती है। महाभाष्यकार "पतंजलि" का समय असंदिग्ध रूप में ज्ञात है। पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल में पतंजलि वर्तमान थे। महाभाष्य के निश्चित साक्ष्य के आधार पर विजयोपरांत पुष्यमित्र के श्रौत (अश्वमेध यज्ञ) में संभवतः पतंजलि पुरोहित थे। यह (इह पुष्यमित्रं याजयाम:) महाभाष्य से सिद्ध है। साकेत और माध्यमिका पर यवनों के आक्रमणकाल में पतंजलि विद्यमान थे। अत: महाभाष्य और महाभाष्यकार पतंजलि - दोनों का समय ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी निश्चित है। द्वितीय शताब्दी ई.पू. में मौर्यों के ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुंग - मौर्य वंशी बृहद्रथ को मारकार गद्दी पर बैठे थे। नाना पंडितों के विचार से 200 ई.पू. से लेकार 140 ई.पू. तक महाभाष्य की रचना का मान्य काल है।
  • काशिकावृत्ति, पाणिनीय "अष्टाध्यायी" पर 7वीं शताब्दी ई. में रची गई प्रसिद्ध वृत्ति। इसमें बहुत से सूत्रों की वृत्तियाँ और उनके उदाहरण पूर्वकालिक आचार्यों के वृत्तिग्रंथों से भी दिए गए हैं। केवल महाभाष्य का ही अनुसरण न कर अनेक स्थलों पर महाभाष्य से भिन्न मत का भी प्रतिपादन हुआ है। काशिका में उद्धृत वृत्तियों से प्राचीन वृत्तिकारों के मत जानने में बड़ी सहायता मिलती है, अन्यथा वे विलुप्त ही हो जाते। इसी प्रकार इसमें दिए उदाहरणों प्रत्युदाहरणों से कुछ ऐसे ऐतिहासिक तथ्यों की समुपलबिध हुई है जो अन्यत्र दुष्प्राप्य थे। इस ग्रंथ की एक विशेषता यह भी है इसमें गणपाठ दिया हुआ है जो प्राचीन वृत्तिग्रंथों में नहीं मिलता।
  • भट्टोजी दीक्षित १७वीं शताब्दी में उत्पन्न संस्कृत वैयाकरण थे जिन्होंंने प्रक्रिया कौमुदी के आधार पर सिद्धान्तकौमुदी की रचना की। इस ग्रंथ पर उन्होंने स्वयं प्रौढमनोरमा टीका लिखी।
  • नागेश भट्ट या नागोजि भट्ट (1730–1810) संस्कृत के नव्य वैयाकरणों में सर्वश्रेष्ठ है। पाणिनीय परम्‍परा में वरदराज के बाद इन्‍हीं का नाम लिया जाता है। इन्‍होंने व्‍याकरण पर ही प्रायः 10 से अधिक ग्रन्‍थ लिखे। व्‍याकरण के साथ ही साहित्य, धर्मशास्त्र, दर्शन, योग तथा ज्योतिष विषयों में भी इनकी अबाध गति थी। नागेश के नाम पर रसमञ्जरी टीका, लघुशब्देन्दुशेखर, बृहच्छब्देन्दुशेखर, परिभाषेन्दुशेखर, मञ्जूषा, लघुमञ्जूषा, परमलघुमञ्जूषा, स्फोटवाद, महाभाष्य-प्रत्याख्यान-संग्रह और पतंजलिकृत महाभाष्य पर उद्योत नामक टीकाग्रंथ पाए जाते हैं।

 

अतः स्पष्ट है, की "A, D, C, B" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 58

याज्ञवल्क्यस्मृत्यनुसारं व्यवहारस्य चतुष्पादान् यथाक्रमं योजयत -

A. साध्यसिद्धिपादः

B. भाषापादः

C. उत्तरपादः

D. क्रियापादः

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    C, A, B, D

  2. BOption (b)

    A, D, B, C

  3. COption (c)

    B, C, D, A

  4. DOption (d)

    A, C, B, D

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

B, C, D, A

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : याज्ञवल्क्यस्मृति के अनुसार व्यवहार के चतुष्पादोंं की यथाक्रम योजना कीजिए।

स्पष्टीकरण - 

"चतुष्पाद्व्यवहारोऽयं विवादेषूपदर्शितः ।"

"तत्र प्रत्यर्थिनोऽग्रतोलेख्यं इति भाषापादः प्रथमः । श्रुतार्थस्योत्तरं लेख्यम् इत्युत्तरपादो द्वितीयः। ततः अर्थी लेखयेत्सद्यः इति क्रियापादस्तृतीयः। तत्सिद्धौसिद्धिमाप्नोति इति साध्यसिद्धिपादष्चतुर्थ।"

  • अभियोगों का निर्णय धर्मशास्त्र ग्रन्थों में चार चरणों के आधार पर किया गया है। प्रथम किसी व्यक्ति से सूचना प्राप्त करना, द्वितीय में उस सूचना को व्यवहारपदों के अनुकूल किसी एक में रखना, तृतीय दोनों दलों की बहस एवं साक्षियों पर विचार करना, चतुर्थ चरण में विवादों का निर्णय करना । याज्ञवल्क्यस्मृति में इन चरणों को चतुष्पाद की संज्ञा दी है।  याज्ञवल्क्य ऋषि ने इन चार पादों की व्याख्या नहीं की. किन्तु मिताक्षरा टीका में विज्ञानेश्वर ने इस की व्याख्या दी है।
  • व्यवहार पदों या विवादों में चतुष्पाद अर्थात् चतुरंश की कल्पना से व्यवहार वर्णित होता है । ये चार पाद हैं -
  • भाषा पाद ,
  • उत्तर पाद ,
  • क्रियापाद, और
  • साध्यसिद्धिपाद ।
  • जैसा अर्थी ने आवेदन किया है वौसा प्रत्यर्थी के सामने लिखे । लेख पर वर्ष,मास ,पक्ष, दिन, नाम, जति आदि लिखे -यह भाषापाद है। वादि के वाद को सुनने के बाद प्रतिवादी प्रतिवादी द्वारा सुने गये विषय - अभियोग का उत्तर पहले के आवेदक के सामने लिखना चाहिए -यह उत्तरपाद है। प्रतिवदी का उत्तर सुनने के बाद वादी को तुरन्त प्रतिज्ञात अर्थ या लगाये गये अभियोग का साधन-प्रमाण लिखना चहिए - यह "क्रियापाद" है। उस साधन या प्रमाण की सिद्धि होने पर वादी सिद्धि या विजय प्राप्त करता है और् उसके विपरीत होता है अर्थात् पराजीत हो जाता है -यह है साध्यसिद्धिपाद '| इस प्रकार उक्त विवादों में यह चतुष्पाद व्यवहार कहा जाता है।

 

अतः स्पष्ट है, की "B, C, D, A" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 59

निम्नलिखितेषु शब्दप्रादुर्भावस्योदाहरणमस्ति-

  1. AOption (a)

    अनुविष्णु

  2. BOption (b)

    इतिहरि

  3. COption (c)

    अतिन्द्रम्

  4. DOption (d)

    अनुरुपम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

इतिहरि

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : निम्नलिखित शब्दोंं में शब्दप्रादुर्भाव का क्या उदाहरण है?

स्पष्टीकरण - 

  • सूत्र - ‘अव्ययं विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्यृद्धि-अर्थाभाव-अत्यय-असम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चात्-यथा-आनुपूर्व-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्य-अन्तवचनेषु।
  • अर्थ - विभक्ति, सामीप्य, समृद्धि, व्यृद्धि (ऋद्धि का अभाव), अर्थाभाव, अत्यय (अतीत होता), असम्पति (वर्तमान काल में यक्त न होना), शब्द प्रादुर्भाव (प्रसिद्धि), पश्चात् यथार्थ, आनुपर्थ्य (अनुक्रम), यौगपद्य (एक ही समय में होना), सादृश्य, सम्पत्ति (आत्मानुरूपता), साकल्य (सम्पूर्णता) और अन्त इन अर्थों में से किसी भी अर्थ में वर्तमान अव्यय का समर्थ सुबन्त के साथ समास होता है।
  • उदाहरण -
  • विभक्ति- अधिहरि = हरौ इति
  • समीप - उपकृष्णम् = कृष्णस्य समीपम्
  • समृद्धि - सुमद्रम् = मद्राणां समृद्धि
  • व्यृद्धि - दुर्गवदिकम् = गवदिकानाम् ऋद्धेरभावः
  • अर्थाभाव - निर्मक्षिकम् = मक्षिकाणाम् अभाव
  • अत्यय - अतिहिमम् = हिमस्य अत्ययः
  • असम्प्रति - अतिनिद्रम् = निद्रा सम्प्रति न युज्यते
  • शब्दप्रादुर्भाव - इतिहरि = हरि शब्दस्य प्रकाशः
  • पश्चात् - अनुरामम् = रामस्य पश्चात्
  • यथा - अनुरूपम् = रूपस्य योग्यम्
  • आनुपूर्व - अनुज्येष्ठम् = ज्येष्ठस्य आनुपूण
  • यौगपद्य - सहर्षम् = हर्षेण युगपत्
  • सादृश्य - सवर्णम् = सदृशः वर्णेन
  • सम्पत्ति - सुक्षत्रम् = क्षत्राणां संपत्तिः
  • साकल्य - सतृणम् = तृणम् अपि अपरित्यज्य
  • अन्तवचन - साग्नि = अग्नि पर्यन्तम्

 

अतः स्पष्ट है, की "इतिहरि" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 60

ऋग्वेदस्य भाष्यकारः कः?

  1. AOption (a)

    स्कन्दस्वामी

  2. BOption (b)

    माधवः

  3. COption (c)

    भरतस्वामी

  4. DOption (d)

    गुणविष्णुः

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

स्कन्दस्वामी

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : ऋग्वेद के भाष्यकार कौन है?

स्कन्दस्वामी :

  • आचार्य स्कन्द स्वामी का कौन सा काल था इस विषय में निश्चय से नहीं कहा जा सकता। परवर्ती ग्रन्थों में इसके नामोल्लेख से इसके आविर्भाव का काल सूचित होता है। यह शतपथ ब्राह्मण के विख्यात भाष्यकार हरि स्वामी के गुरु थे। अतः इनका समय सातवीं शताब्दी निश्चिय से कह सकते हैं।
  • ऋग्वेद का स्कन्द स्वामी ने सुविस्तृत तथा विलक्षण भाष्य किया। इस भाष्य में प्रत्येक सूक्तों के आरम्भ में उस सूक्त के ऋषि और देवता का उल्लेख किया गया है। उसके बोधक प्राचीन अनुक्रमणि ग्रन्थों के श्लोक भी उद्धृत है। निघण्टु निरुक्त आदि वैदिक अर्थ के उपबोधक ग्रन्थों से उपयुक्त प्रमाण भी वहाँ सङ्कलित किये गये हैं।
  • यह भाष्य अतीव सरल और अल्पाक्षर है। यहाँ संक्षेप से व्याकरण-विषयक तथ्यों का उल्लेख है। सायण भाष्य के प्रथमाष्टक के समान व्याकरण का अतिविस्तार से यहाँ प्रदर्शन नहीं किया गया है। सायणकृत ऋगभाष्य के ऊपर स्कन्द स्वामी के भाष्य का स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है। इसके अनेक उदाहरण हैं। स्कन्द स्वामी का भाष्य ऋग्वेद के चतुर्थाष्टक पर्यन्त ही उपलब्ध होता है।

 

अतः स्पष्ट है, **'स्कन्दस्वामी' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 61

'उत्पातेन ज्ञापिते च' इति वार्तिकस्योदाहरणमस्ति-

  1. AOption (a)

    मुक्���ये हरिं भजति

  2. BOption (b)

    भक्तिर्ज्ञानाय कल्पते

  3. COption (c)

    वाताय कपिला विद्युत्

  4. DOption (d)

    ब्राह्मणाय हितम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

वाताय कपिला विद्युत्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'उत्पातेन ज्ञापिते च' इस वार्तिक का उदाहरण क्या है?

स्पष्टीकरण - 

  • वार्तिक - 
  • उत्पातेन ज्ञापिते च।
  • वार्तिकार्थ -
  • उत्पात के द्वारा ज्ञापित वस्तु के वाचक शब्द में चतुर्थी विभक्ति होती है।
  • उदाहरण -
  • 'वाताय कपिला विद्युत्' (भूरे रंग की बिजली आँधी का सूचक है)। इस कथन में वात की सूचना कपिला विद्युत् से मिल रही है। उत्पात के द्वारा वात का ज्ञान होता है। अतः वात में प्रकृत वार्तिक के द्वारा चतुर्थीविभक्ति होकर वाताय कपिला विद्युत् वाक्य सम्पन्न हो जाता है।

 

अतः स्पष्ट है, की "वाताय कपिला विद्युत् " यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 62

चित्तवृत्तिषु न परिगण्येते-

A. विपर्ययः

B. तपः

C. प्रमाणम्

D. स्वाध्यायः

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम्

  2. BOption (b)

    A, C केवलम्

  3. COption (c)

    B, D केवलम्

  4. DOption (d)

    B, C केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

B, D केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : चित्तवृत्तियोंं में किसकी परिगणना नहीं होती है?

चित्तवृत्ति :

योगसूत्र - 

  • प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतय:। (१।६)
  • योगदर्शन में पांच चित्त-वृत्तियां वर्णित हैं । ये हैं -
  • प्रमाण - जिस साधन के द्वारा हमें किसी भी पदार्थ या वस्तु का यथार्थ ( असली , सही ) ज्ञान प्राप्त होता है वह प्रमाण कहलाता है। बिना प्रमाण के किसी भी पदार्थ या वस्तु के वास्तविक स्वरूप को नही समझा जा सकता है। अतः प्रमाण वास्तविक ज्ञान प्राप्त करवाने का साधन है।
  • विपर्यय - विपर्यय का अर्थ है मिथ्या या झूठा ज्ञान। जिस वृत्ति से हमें किसी पदार्थ का सही ज्ञान न होकर उसके विपरीत ज्ञान होता है तब उसे विपर्यय कहा है।
  • विकल्प - जब किसी पदार्थ या वस्तु के सामने उपस्थित न होने पर भी उस वस्तु का विचार करना विकल्प कहलाता है। यह शब्द से उत्पन्न होता है।
  • निद्रा - शरीर की जागृत व स्वप्न्न अवस्था से रहित जो स्थिति होती है उसे निद्रा कहते हैं।
  • स्मृति - भूतकाल में अनुभव किए गए विषयों ( घटनाओं ) को पुनः स्मरण ( याद ) करना स्मृति वृत्ति कहलाती है।

 

अतः स्पष्ट है, की "B, D केवलम् " यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 63

पद्मपुराणे पञ्च खण्डाः सन्तिः, क्रमेण योजयत -

सूची Iसूची II
(A)प्रथमखण्डःI.स्वर्गखण्डः
(B)द्वितीयखण्डःII.सृष्टिखण्डः
(C)तृतीयखण्डःIII.पातालखण्डः
(D)चतुर्थखण्डःIV.भूमिखण्डः
  1. AOption (a)

    A - IV, B - II, C - I, D - III

  2. BOption (b)

    A - I, B - III, C - IV, D - II

  3. COption (c)

    A - II, B - IV, C - I, D - III

  4. DOption (d)

    A - II, B - I, C - IV, D - III

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

A - II, B - IV, C - I, D - III

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : पद्मपुराण में पांच खंड है, क्रम से योजना कीजिए।

स्पष्टीकरण - 

  • महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित संस्कृत भाषा में रचे गए अठारह पुराणों में से एक पद्मपुराण है। सभी अठारह पुराणों की गणना के क्रम में ‘पद्म पुराण’ को द्वितीय स्थान प्राप्त है।
  • श्लोक संख्या की दृष्टि से भी यह द्वितीय स्थान पर है। पहला स्थान स्कन्द पुराण को प्राप्त है। पद्म का अर्थ है- ‘कमल का पुष्प’। चूँकि सृष्टि-रचयिता ब्रह्माजी ने भगवान् नारायण के नाभि-कमल से उत्पन्न होकर सृष्टि-रचना संबंधी ज्ञान का विस्तार किया था, इसलिए इस पुराण को पद्म पुराण की संज्ञा दी गयी है।
  • इस पुराण में भगवान् विष्णु की विस्तृत महिमा के साथ भगवान् श्रीराम तथा श्रीकृष्ण के चरित्र, विभिन्न तीर्थों का माहात्म्य शालग्राम का स्वरूप, तुलसी-महिमा तथा विभिन्न व्रतों का सुन्दर वर्णन है।
  • पद्मपुराण के पांच खण्ड प्रसिद्ध हैं:
  • सृष्टि खण्ड
  • भूमि खण्ड
  • स्वर्ग खण्ड
  • ब्रह्म खण्ड
  • पाताल खण्ड

 

​अतः स्पष्ट है, की "A - II, B - IV, C - I, D - III " यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 64

यथोचितं मेलनं कुरुत-

सूची Iसूची II
(A)विज्ञानेश्वरःI.वीरमित्रोदयः
(B)मित्रमिश्रःII.अपरार्कः
(C)अपरादित्यःIII.मिताक्षरा
(D)शूलपाणिःIV.दीपकलिका
  1. AOption (a)

    A - III, B - I, C - II, D - IV

  2. BOption (b)

    A - II, B - III, C - I, D - IV

  3. COption (c)

    A - III, B - II, C - IV, D - I

  4. DOption (d)

    A - I, B - II, C - III, D - IV

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

A - III, B - I, C - II, D - IV

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यथोचित मेलन कीजिए।

स्पष्टीकरण :

  • वीरमित्रोदयः मित्रमिश्र (इ. स.1610-1640) लिखित याज्ञवल्क्यस्मृति पर टीकाग्रंथ है।
  • शिलाहार राजा अपरादित्य अथवा अपरार्क याज्ञवल्क्यस्मृति के प्रसिद्ध टीकाकारोंं में से एक था। यह भाष्य अपरार्कपारा से विख्यात है।
  • मिताक्षरा संस्कृत भाषा में धर्मशास्त्र का प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसका प्रणयन 'विज्ञानेश्वर' ने किया था, जो चालुक्यों की राजधानी कल्याणी में विक्रमादित्य चालुक्य (1076-1126 ई.) के राज्य काल में रहता था। बंगाल तथा आसाम के अतिरिक्त शेष भारत में हिन्दू क़ानून के विषय में 'मिताक्षरा' को प्रमाण माना जाता है।
  • दीपकलिका यह ग्रंथ शूलपाणि लिखित याज्ञवल्क्यस्मृति का टीकाग्रंथ है।

​

अतः स्पष्ट है, की प्रस्तुत प्रश्न का उत्तर "A - III, B - I, C - II, D - IV" यह है।

Question 65

ब्राह्मणं नाम कर्मणस्तन्मन्त्राणां च व्याख्यानग्रन्थः' इति कस्य मतमस्ति ?

  1. AOption (a)

    भट्टभास्करस्य

  2. BOption (b)

    आचार्यसायणस्य 

  3. COption (c)

    दुर्गाचार्यस्य

  4. DOption (d)

    अनन्ताचार्यस्य

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

भट्टभास्करस्य

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : ब्राह्मण का अर्थ 'कर्मणस्तन्मन्त्राणां च व्याख्यानग्रन्थः' यह किसका मत है?

ब्राह्मण शब्द का अर्थ :

  • ब्राह्मण शब्द "ग्रन्थ" का वाचक है और यह नपुंसकलिङ्ग में होता है,
  • "ब्राह्मणं ब्रह्मसंघाते वेदभागे नपुंसकम्।" (मेदिनी कोश)।
  • "एतद् ब्राह्मणान्येव पञ्च हवींषि ।" (तैत्तिरीय-संहिता, ३.७.१.१)।
  • ब्राह्मण शब्द में ब्रह्मन् मूल शब्द है, इससे अण् प्रत्यय करके ब्राह्मण शब्द बनता है। ग्रन्थ अर्थ में "ब्राह्मण" शब्द की तीन प्रकार से व्युत्पत्ति दिखाई जाती है - 
  • शतपथ-ब्राह्मण (७.१.१.५) के अनुसार "ब्राह्मण" शब्द का अर्थ "मन्त्र" है, "ब्रह्म वै मन्त्रः"। अतः वेदमन्त्रों की व्याख्या और विनियोग प्रस्तुत करने वाले ग्रन्थ को "ब्राह्मण" कहते हैं।
  • शतपथ-ब्राह्मण (३.१.४.१५) के अनुसार ब्राह्मण शब्द का दूसरा अर्थ "यज्ञ" है, "ब्रह्म यज्ञः"। अतः यज्ञों की व्याख्या और विवरण प्रस्तुत करने वाले ग्रन्थ को "ब्राह्मण" कहते हैं।
  • ब्रह्मन् शब्द का एक अन्य अर्थ है, पवित्र ज्ञान या रहस्यात्मक विद्या। अतः जिन ग्रन्थों में वैदिक रहस्यों का उद्घाटन किया गया है, उन्हें "ब्राह्मण" कहते हैं। इन ग्रन्थों में यज्ञों का आध्यात्मिक, आधिदैविक और वैज्ञानिक स्वरूप प्रस्तुत किया गया है।
  • सत्यव्रत सामश्रमी के अनुसार ब्राह्मण शब्द से प्रोक्त (कथित, वर्णित) अर्थ में अण् प्रत्यय करके ब्राह्मण शब्द बनता है। (ऐतरेयालोचन) इसका अभिप्राय है कि ब्राह्मणों द्वारा यज्ञ-विषयक व्याख्यारूप में निर्मित ग्रन्थों को "ब्राह्मण" कहते हैं, "ब्राह्मणं नाम कर्मणस्तन्मन्त्राणां च व्याख्यानग्रन्थः।" (भट्ट-भास्कर का भाष्य, तैत्तिरीय संहिता १.५.१)

  

अतः स्पष्ट है, की "भट्टभास्करस्य " यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 66

त्वयि दृष्ट एव तस्या निर्वाति मनो भवज्ज्वलितम्।

आलोके हि हिमांशोर्विकसति कुसुमं कुमुद्वत्याः ॥

इत्यत्र कोऽलङ्कारः ?

  1. AOption (a)

    उत्प्रेक्षा 

  2. BOption (b)

    समासोक्तिः

  3. COption (c)

    दृष्टान्तः

  4. DOption (d)

    निदर्शना

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

दृष्टान्तः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : प्रस्तुत श्लोक में कौन सा अलंकार है?

स्पष्टीकरण - 

  • दृष्टान्तः पुनरेतेषां सर्वेषां प्रतिबिम्बनम्
  • जहाँ उपमेय और उपमान के साधारण धर्म में बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव दिखाया जाए, वहाँ दृष्टान्त अलंकार होता है।
  • या जहाँ दो सामान्य या दोनों विशेष वाक्यों में बिम्ब प्रतिबिम्ब भाव होता हो वहाँ पर दृष्टान्त अलंकार होता है। इस अलंकार में उपमेय रूप में कहीं गई बात से मिलती-जुलती बात उपमान रूप में दुसरे वाक्य में होती है। यह अलंकार उभयालंकार का भी एक अंग है।
  • उदाहरण - 
  • त्वयि दृष्ट एव तस्या निर्वाति मनो भवज्ज्वलितम्। आलोके हि हिमांशोर्विकसति कुसुमं कुमुद्वत्याः ॥
  • अर्थ - कामसंतप्त उस नायिका का मन तुम्हारे दर्शन से हि संतुष्ट होता है, जैसे चंद्रमा को देखने मात्र से कुमुदिनी विकसित होती है।
  • यहाँ नायक - चन्द्रमा, नायिका -कुमुदिनी और मन -कुसुम का मनोभव सन्तप्तत्व तथा सूर्यसंतप्तत्व का निर्वाण और विकास का बिम्ब प्रतिबिम्ब भाव होने के कारण दृष्टांत अलंकार हुआ है।

 

अतः स्पष्ट है, की प्रस्तुत प्रश्न का उत्तर "दृष्टान्तः" यह है।

Question 67

कौटिलीयार्थशास्त्रानुसारेण राज्यस्य द्वे अङ्गे स्तः -

A. दूतः

B. अमात्यः

C. कोषः

D. पुरोहितः

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    B, C केवलम्

  2. BOption (b)

    A, B केवलम्

  3. COption (c)

    B, D केवलम्

  4. DOption (d)

    C, D केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

B, C केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : कौटिलीयार्थशास्त्रानुसार राज्य के दो अंग है - 

सप्तांग राज्य :

  • कौटिलीय अर्थशास्त्रानुसार सप्ताङ्गराज्य है -
  • 'स्वान्यमात्यजनपददुर्गकोशदण्डमित्राणि प्रकृतयः "
  • कौटिल्य के अनुसार राजा को इन सात प्रकृतियों से युक्त माना गया है - 
  • स्वामी,
  • अमात्य,
  • जनपद,
  • दुर्ग,
  • कोश,
  • दण्ड
  • मित्र।

 

अतः स्पष्ट है, की "**B, C केवलम् " यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Additional Information

  • अमात्य - 
  • 'विभज्यामात्यविभवं देशकालौ च कर्म च अमात्याः सर्व अवेस्त एवैते कार्याः स्युर्न तु मन्त्रिणः।।'
  • कौटिल्य के अनुसार राजा को चाहिए कि वह सहपाठी आदि की भी सर्वथा 'अवहेलना न करे। उसके लिए वह परमावश्यक है कि वह विद्या, बुद्धि, साहस, गुण, दोष, देश, काल और पात्र का विचार अर्थ है करके ही अमात्यों की नियुक्ति करे 'किन्तु उन्हें अपना मंत्री कदापि न बनाये।
  • कोष -
  • 'कोशमकोशः प्रत्युत्पन्नार्थंकृच्छ्रः संगृह्णीयात्।
  • अर्थात् खजाने के कम हो जाने या अकस्मात् ही अर्थसङ्कट उपस्थित हो जाने पर राजा को कोष सञ्चय करना चाहिए।

Question 68

यथाक्रमं भावविकारान् योजयत -

A. वर्द्धते

B. विपरिणमते

C. अस्ति

D. जायते

समुचितं विकल्पं चिनुत -

  1. AOption (a)

    D, C, B, A

  2. BOption (b)

    A, B, C, D

  3. COption (c)

    A, B, D, C

  4. DOption (d)

    B, C, A, D

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

D, C, B, A

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यथाक्रम से भावविकारोंं की योजना कीजिए।

भावविकार : 

  • भाव शब्द भू धातु से घञ् प्रत्यय लगाने से बना है, भाव का अर्थ है क्रिया। भाव में सभी क्रियायें (धातुएंं) आ जाती हैं, परन्तु आचार्य वार्ष्यायणि ने छः प्रकार के भाव निश्चित किये हैं - षडभावविकाराः भवन्तीति जायतेऽस्तिविपरिणमतेवर्धतेऽपक्षीयतेविनश्यतीति' (निरुक्त १.१२)।
  • निरुक्तकार ने क्रिया के लिये आख्यात शब्द का प्रयोग किया है तथा इसकी परिभाषा 'भावप्रधानमाख्यातम् अर्थात् जिसमें भाव की प्रधानता हो यह आख्यात है। भाव के अन्तर्गत क्रिया की उत्पत्ति से लेकर अवसानपर्यन्त छ भाव आते हैं इस सन्दर्भ में उन्होंने वार्ष्यायणि के षड्भावविकारों की चर्चा की है। वे इस प्रकार हैं -
  • जायते - षड्भावविकारों में प्रथम भावविकार जायते का अर्थ है 'उत्पन्न होना 'जायत इति पूर्वभावस्यादिमाचष्टे नापरभावमाचष्टे न प्रतिषेधति' (नि. 1.2) यह क्रिया के आरम्भ भाव को कहती है यह न तो परवर्ती क्रिया को कहती है, न उसका निषेध करती है। उत्पन्न होने की प्रक्रिया में न तो यह कह सकते हैं कि यह इस वस्तु की सत्ता है और न ही यह कह सकते हैं कि यह इसकी सत्ता नहीं है।
  • अस्ति - 'अस्तीत्युत्पन्नस्य सत्वस्यावधारणम्' (नि. 1.2) उत्पन्न वस्तु की निश्चयात्मक स्थिति को अस्ति कहते हैं। वैयाकरणों के अनुसार अपने आपको धारण करने का व्यापार अस्ति है। 'आत्मानम् आत्मना विम्रद् अस्तीति व्यपदिश्यते ।' (वा. प. 3.7)
  • विपरिणमते - 'विपरिणमत इत्यप्रच्यवमानस्य तत्त्वाद्विकारम्, वर्धत इति स्वाङ्गाभ्युचयं सांयोगिकानां वाऽर्थानाम्' (नि. 1.2 ) इसका अभिप्राय है परिवर्तित होना। इसमें क्रिया अपनी मूल प्रकृति को नहीं छोड़ती तथा न ही अपनी परवर्ती क्रिया वर्धते को कहती है न मना करती है। जैसे मानव शरीर में अनेक परिवर्तन हो सकते हैं परंतु वह स्वभाव को नहीं छोड़ता । -
  • वर्धते - 'वर्धते विजयेनेति वा वर्धते शरीरेणेति वा (नि. 12) वर्धते का अर्थ है वृद्धि । वृद्धि दो प्रकार की होती है। शरीर से वृद्धि होना या संयुक्त अर्थों से जैसे- धनेन वर्धते, विजयेन वर्धते, इत्यादि से भी वृद्धि हो सकती है।
  • अपक्षीयते - अपक्षीयते ह्रास या अपक्षय को कहते हैं। इसके भी वृद्धि के समान दो भेद हैं। शरीर का ह्रास पदार्थों का ह्रास ।
  • विनश्यति - यह अन्तिम भाव विकार है जब पाँचवां भाव विकार अपनी चरम सीमा को प्राप्त करता है तब विनाश कहलाता है। वार्ष्यायणि के अनुसार इन छः विकारों के अतिरिक्त जितने भी ज्ञातविकार प्राप्त होते हैं उन्हें इन्हीं के अन्तर्गत मान लेना चाहिये।

 

अतः स्पष्ट है, 'D, C, B, A' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 69

कौटिलीयार्थशास्त्रानुसारम् अनन्यां पृथिवीं कः भुङ्क्ते ?

  1. AOption (a)

    शक्तिसम्पन्नो राजा 

  2. BOption (b)

    विद्याविनीतो राजा 

  3. COption (c)

    तीक्ष्णदण्डो राजा

  4. DOption (d)

    सचिवायत्तो राजा

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

विद्याविनीतो राजा 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : कौटिलीयार्थशास्त्रानुसार चिरकाल तक पृथिवी का शासन कौन करता है?

स्पष्टीकरण - 

कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार -

विद्याविनीतो राजा हि प्रजानां विनये रतः।

अनन्यां पृथिवीं भुङ्क्ते सर्वभूतहिते रतः*।।* (१.१८)

  • अर्थात जो विद्वान् राजा प्राणिमात्र की हितकामना में लगा रहता है और प्रजा के शासन तथा शिक्षण में तत्पर रहता है, वह चिरकाल तक पृथिवी का निर्बाध शासन करता है।

 

अतः स्पष्ट है, 'विद्याविनीतो राजा ' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 70

निरुक्तग्रन्थस्य टीकाकारौ स्तः-

A. दुर्गाचार्यः

B. गर्गः:

C. स्कन्दस्वामी

D. वररुचिः

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, C केवलम्

  2. BOption (b)

    A, B केवलम्

  3. COption (c)

    B, C केवलम्

  4. DOption (d)

    C, D केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

A, C केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : निरुक्त के टीकाकार कौन है?

निरुक्त के टीकाकार : 

  • निरुक्त के इस समय उपलब्ध टीकाओं में स्कंदस्वामी की टीका सबसे प्राचीन है। शुक्लयजुर्वेदीय शतपथ ब्राह्मण के भाष्य में हरिस्वामी ने स्कंदस्वामी को अपना गुरु कहा है। देवराज यज्वा द्वारा रचित एक व्याख्या का प्रकाशन गुरुमंडल ग्रंथमाला, कलकत्ता से 1952 में हुआ है। ग्रंथ के प्रारंभ में इन्होंने एक विस्तृत भूमिका लिखी है।
  • निरुक्त पर व्याख्या रूप एक वृत्ति दुर्गाचार्य रचित उपलब्ध है। इन्होंने अपनी वृत्ति में निरुक्त के प्राय: सभी शब्दों का विवचन किया है। इसका प्रकाशन आनंदाश्रम संस्कृत ग्रंथमाला, पूना से 1926 में और खेमराज श्रीकृष्णदास, बंबई से 1982 वै., में हुआ है।

 

अतः स्पष्ट है, 'A, C केवलम्' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 71

संस्कृतनाटकेषु एतौ विदूषकौ स्तः-

A. माधवः

B. मैत्रेयः

C. माधव्यः

D. चन्द्रापीडः

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    B, C केवलम् 

  2. BOption (b)

    A, B केवलम्

  3. COption (c)

    C, D केवलम्

  4. DOption (d)

    A, C केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

B, C केवलम् 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : संस्कृत नाटकोंं  में विदूषक कौन है?

संस्कृत नाटक के विदूषक :

मैत्रेय :

  • मृच्छकटिकम् में विदूषक का नाम मैत्रेय है। वह जाति का ब्राह्मण है। हाथ में एक टेढ़ी लकड़ी लिये रहता है। वह चारुदत्त का घनिष्ठ मित्र है।
  • उसका प्रधान सहायक भी है। जब चारुदत्त धनी था उस समय वह उसके घर खूब खाता-पीता था। जब से चारुदत्त निर्धन हो गया तब से वह इधर-उधर भोजन करके केवल निवास के लिए उसके घर जाता है। वह उसका साथ नहीं छोड़ता। चारुदत्त भी उससे प्रेम करता है।
  • प्रथम अंक में वह कहता है- 'अये! सर्वकालमित्र मैत्रेयः प्राप्तः' इत्यादि । विदूषक सदा चारुदत्त को ऋद्धि की कामना करता है। वह किसी प्रकार भी चारुदत्त को दुःखी नहीं करना चाहता। वह रदनिका के अपमान का समाचार उसको नहीं बतलाता। वह समझता है कि ऐसा करने से उसे मानसिक कष्ट होगा। यह चारुदत्त की बदनामी नहीं चाहता।
  • प्रथम अंक में दीपक जलाने के तेल के अभाव की बात वह चारुदत्त के कान में कहता है वह नहीं चाहता कि वसन्तसेना यह जाने कि चारुदत्त दरिद्र है। वह चारुदत्त को इतना प्रेम करता है कि उसके मरने पर स्वयं भी जीवित रहना नहीं चाहता।

माधव्य :

  • अभिज्ञान शाकुन्तल के विदूषक का नाम माधव्य है। यह राजा का मित्र भी है। राजा इससे हर प्रकार की बातें करता है।
  • यह ब्राह्मण जाति का तथा उम्र में राजा से छोटा है, इसीलिए वह अपने को राजा का अनुज तथा युवराज भी कहता है। इसके हाथ में विद्यमान डंडा भी टेढ़ा-मेढ़ा है। इसकी सारी बातें हास्य-प्रमोद भरी होती है, अतएव राजा उसको अपने मनोविनोद के लिए सर्वदा अपने साथ रखते है, किन्तु भीरु स्वभाव का यह विदूषक आखेट आदि के समय राजा के साथ नहीं रहना चाहता है।
  • उसको सर्वाधिक प्रियकर्म मिष्ठान्न भोजन है। अतएव वह अन्य बातों के प्रसङ्ग में भी बार-बार भोजन का प्रसङ्ग ला देता है।
  • अभिज्ञान शाकुन्तल में विदूषक के दो बार दर्शन होते हैं। पहली बार तो वह द्वितीय अङ्क में सहृदयों के समक्ष आता है और दूसरी बार वह षष्ठाङ्क में राजा के मनोरञ्जनार्थ उपस्थित होता है।
  • षष्ठाङ्क में विदूषक राजा के चित्रकर्म में सहायक होकर उनका मनोरञ्जन करता है।
  • मातलि राजा को उत्तेजित करने के उद्देश्य से माधव्य को अदृश्य होकर पीड़ित करते हैं तो विदूषक के चिल्लाने की आवाज सुनकर राजा स्वयं धनुष-वाण लेकर दौड़ पड़ते हैं और माधव्य को बचाने के लिए अदृश्य सत्व का विनाश करने वाले अस्त्र को धनुष पर चढ़ाते हैं ।
  • इस घटना से प्रतीत होता है कि विदूषक राजा का अत्यन्त प्रिय ब्राह्मणबटु, नर्मसखा तथा नाटक का हास्यपात्र है।

 

अतः स्पष्ट है, 'B, C केवलम्' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 72

यथोचितं मेलनं कुरुत-

सूची Iसूची II
(A)जिघत्सतिI.यङ्लुगन्तक्रियापदम्
(B)नरीनृत्यतेII.नामधातुक्रियापदम्
(C)राजानतिIII.यन्नन्तक्रियापदम्
(D)बोभवीतिIV.यङन्तक्रियापदम्
  1. AOption (a)

    A - II, B - III, C - I, D - IV

  2. BOption (b)

    A - I, B - II, C - IV, D - III

  3. COption (c)

    A - III, B - IV, C - II, D - I

  4. DOption (d)

    A - IV, B - II, C - I, D - III

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

A - III, B - IV, C - II, D - I

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यथोचित मेलन कीजिए। 

स्पष्टीकरण - 

  • जिघत्सति - यन्नन्तक्रियापदम्।
  • सः स्यार्धधातुके 
  • सकारादि आर्धधातुक के परे होने पर सकार के स्थान पर तकार आदेश होता है। यह सूत्र वहीं पर लगता है जहाँ पर पूर्व में सकार ही हो और पर में भी सकार ही हो, किन्तु पर सकार आर्धधातुक संज्ञक हो अर्थात् सकार आदि में स्थित आर्धधातुक परे हो। घस् में स् ऐसी स्थिति में इससे तकार आदेश होता है। जैसे- जिघत्सति। अद् भक्षणे धातु से 'धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा' सूत्र से इच्छति अर्थ में सन् प्रत्यय होता है।
  • नरीनृत्यते - यङन्तक्रियापदम्
  • "पुनः पुनः अतिशयेन वा नृत्यते"
  • बार-बार व अतिशय नृत्य करना। यहां 'नृती गात्रविक्षेपे' धातु से पुनः पुनरतिशयेन वा नृत्यते अर्थ में नृत् से 'धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ्' सूत्र के द्वारा यङ् प्रत्यय हुआ।
  • राजानति - नाम��ातुक्रियापदम्
  • "राजा इव आचरति राजानति"।
  • राजन् इस कर्ता प्रातिपदिक से सर्वप्रातिपदिकेभ्यः क्विव्वा वक्तव्यः इस वार्तिक से विवप् प्रत्यय करके सर्वापहारलोप करने पर ' राजन्' बना। 'सनाद्यन्ता धातवः' सूत्र से धातुसंज्ञा हुई तथा 'अनुनासिकस्य क्विझलोः विद्धति' सूत्र से प्रत्यक्षलक्षणेन' क्वि पर मानकर अनुनासिकान्त उपधा नकारोत्तरवर्ती अकार को दीर्घ हुआ राजन बना।
  • बोभवीति - यङ्लुगन्तक्रियापदम्
  • 'यडोऽचि च'
  • अच् प्रत्यय के परे होने पर यड् का लुक् हो जाता है। चकारात् अच् के बिना भी कहीं-कहीं इसका लुक् होता है।

 

अतः स्पष्ट है, 'A - III, B - IV, C - II, D - I' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 73

असम्प्रज्ञातसमाधिः कतिविधः?

  1. AOption (a)

    द्विविधः

  2. BOption (b)

    चतुर्विधः

  3. COption (c)

    त्रिविधः

  4. DOption (d)

    पञ्चविधः

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

द्विविधः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : असम्प्रज्ञातसमाधि कितने प्रकार की होती है?

समाधि :

समाधि दो प्रकार की होती है -

  • सम्प्रज्ञात
  • असम्प्रज्ञात
  • 'विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः।'-
  • सभी वृत्तियों के अस्त हो जाने पर चित्त का निरोध संस्कारमात्र शेष निरोध- असम्प्रज्ञात समाधि है।
  • असम्प्रज्ञात समाधि के दो भेद है - 
  • भावप्रत्यय
  • उपायप्रत्यय

​

​अतः स्पष्ट है, 'द्विविधः**' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 74

अत्र कथनद्वयमस्ति । एकम् अभिकथनम् (A) अपरञ्च तस्य कारणम् (R) इति ।

अभिकथनम् (A): उच्चैः, नीचैः, कृष्णः, श्रीः, ज्ञानम् इत्यत्र प्रथमा विभक्तिः जायते।

कारणम् (R) : लिङ्गमात्राद्याधिक्यात् ।

उपर्युक्तम् अभिकथनं कारणञ्चाश्रित्य समुचितं विकल्पं चिनुत ।

  1. AOption (a)

    अभिकथनम् (A), कारणम् (R) उभयं सत्यम् । किन्तु कारणम् (R), अभिकथनम् (A) इत्यस्य समुचिता व्याख्या अस्ति ।

  2. BOption (b)

    अभिकथनम् (A), कारणम् (R) उभयं सत्यम् । किन्तु कारणम् (R), अभिकथनम् (A) इत्यस्य समुचिता व्याख्या नास्ति ।

  3. COption (c)

    अभिकथनम् (A) सत्यम्, कारणम् (R) असत्यम् ।

  4. DOption (d)

    अभिकथनम् (A) असत्यम्. कारणम् (R) सत्यम् ।

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

अभिकथनम् (A) सत्यम्, कारणम् (R) असत्यम् ।

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यहाँँ दो कथन है। एक अभिकथन है और दूसरा उसका कारण है। 

अभिकथनम् (A): उच्चैः, नीचैः, कृष्णः, श्रीः, ज्ञानम् यहाँँ प्रथमा विभक्ति होती है।

कारणम् (R) : लिङ्गमात्राद्याधिक्य से।

उपर्युक्त अभिकथन और कारण का आश्रय लेकर समुचित विकल्प चुनिए।

Important Pointsस्पष्टीकरण - 

"प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा”

  • उच्चैः (ऊँचा), नीचैः (नीचा), कृष्णः (वासुदेव), श्री: (लक्ष्मी) तथा ज्ञानम् (ज्ञान) इन सभी उदाहरणों में प्रातिपदिकार्थ मात्र में प्रथमा विभक्ति हुई। उच्चैः, नीचैः अव्यय होने के कारण अलिङ्ग (लिङ्ग रहित) शब्द है तथा कृष्णः (पु.) श्रीः (स्त्री.), ज्ञानम् (नपु.) नियतलिङ्ग शब्द है। अलिङ्ग एवं नियतलिङ्ग शब्द ही प्रातिपदिकार्थमात्र के उदाहरण होते हैं।
  • कारण (R) सत्य नहीं है क्योंकि 'लिङ्गमात्र' केवल तटः, तटी, तटम् उदाहरण की पुष्टि करता है ।

इस प्रकार उच्चैः, नीचैः, कृष्णः, श्रीः, ज्ञानम् यहाँँ प्रथमा विभक्ति प्रातिपदिकार्थमात्र से हुई है यह विधान उचित है, परन्तु लिङ्गमात्राद्याधिक्य से यह विधान उचित नही है। 

अतः स्पष्ट है, की "अभिकथनम् (A) सत्यम्, कारणम् (R) असत्यम् । " यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 75

वीररसप्रधानौ ग्रन्थौ स्तः-

A. अभिज्ञानशाकुन्तलम्

B. मुद्राराक्षसम्

C. वाल्मीकिरामायणम् 

D. शिशुपालवधम्

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम् 

  2. BOption (b)

    B, C केवलम्

  3. COption (c)

    B, D केवलम्

  4. DOption (d)

    C, D केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

B, D केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : वीररसप्रधान ग्रंथ कौन से हैंं?

अभिज्ञानशाकुन्तलम् :

  • "अभिज्ञानशाकुन्तलम्" भारतीय महाकवि कालिदास द्वारा लिखा गया एक महत्वपूर्ण संस्कृत नाटक है। यह एक प्रेमकाव्य नाटक है जिसमें काव्यिक और नृत्यात्मक अंश हैं। स्पष्ट है, की यह शृंगाररसप्रधान साहित्यकृति है। इस नाटक की कहानी महाकवि कालिदास के "अभिज्ञानशाकुन्तलम्" एक देवकन्या शाकुन्तला की प्रेमकथा पर आधारित है, जिन्होंने एक महर्षि दुर्वाससा के आश्रम में उनके प्रेम का स्मरण हरण कर लिया होता है। इस काव्य की प्रमुख कविताएँ और प्रसंग उसके प्रेम, प्राकृत्य और नृत्य की अद्वितीय व्यक्ति तथा रस-सिद्धांत को दिखाते हैं। यह काव्य भारतीय साहित्य के महत्वपूर्ण कृतियों में से एक है और कालिदास की महाकाव्य रचनाओं में से सबसे प्रमुख है।

मुद्राराक्षसम्

  • मुद्राराक्षस संस्कृत का प्रसिद्ध ऐत��हासिक नाटक है। चौथी शती के उत्तरार्ध एवं पांचवी शती ई. के पूर्वार्द्ध में विशाखदत्त द्वारा इसकी रचना की गई थी। इस नाटक में इतिहास और राजनीति का सुन्दर समन्वय प्रस्तुत किया गया है। विशाखदत्त ऐतिहासिक प्रवृत्ति के लेखक थे। इनके नाटक वीर रस प्रधान हैं। 'मुद्राराक्षस' में प्रेमकथा, नायिका, विदूषक आदि का अभाव है तथा इस दृष्टि से यह संस्कृत साहित्य में अपना अलग स्थान रखता है। इस ग्रंथ के चरित्र-चित्रण में विशेष निपुणता का प्रदर्शन मिलता है।

वाल्मीकिरामायणम्

  • वाल्मीकि रामायणम्, भारतीय साहित्य का महत्वपूर्ण भाग है और एक प्रमुख हिन्दू धर्मिक काव्य है। यह काव्य महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखा गया था और इसमें भगवान राम के जीवन के घटनाएं और कथाएँ वर्णित हैं। यह काव्य संस्कृत में है और भाषा के दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है। वाल्मीकि रामायणमें भगवान राम की जीवन की कई महत्वपूर्ण घटनाएं जैसे कि उनका जन्म, उनके बचपन की कथाएँ, सीता हरण, लंका दहन, और उनके अयोध्या वापस आगमन इत्यादि वर्णित हैं। यह काव्य धर्म, नैतिकता, परमात्मा के प्रति श्रद्धा, और भक्ति के महत्वपूर्ण सिद्धांतों को प्रस्तुत करता है और मानव जीवन के मूल्यों को प्रदर्शित करता है। यह करुणरसप्रधान काव्य है।

शिशुपालवधम्

  • शिशुपालवध महाकवि माघ द्वारा रचित संस्कृत काव्य है। २० सर्गों तथा १८०० अलंकारिक छन्दों में रचित यह ग्रन्थ संस्कृत के छः महाकाव्यों में गिना जाता है। इसमें कृष्ण द्वारा शिशुपाल के वध की कथा का वर्णन है। यह वीररसप्रधान काव्य है।

​

अतः स्पष्ट है, 'B, D केवलम्**' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 76

न्यायमतानुसारं प्रमेयेषु परिगणितौ स्तः-

A. आत्मा

B. संशयः

C. तर्कः

D. बुद्धिः

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, D केवलम्

  2. BOption (b)

    A, B केवलम् 

  3. COption (c)

    A, C केवलम्

  4. DOption (d)

    B, C केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

A, D केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : न्यायमत के अनुसार प्रमेय में किस की गणना होती है?

स्पष्टीकरण - 

  • न्यायमत के अनुसार जो प्रमाण से सिद्ध होता है, वह प्रमेय (प्रकृष्ट - सर्वश्रेष्ठ, मेय-ज्ञेय - प्रमेय) कहलाता है। यह बारह प्रकार के कहे गए हैं - 
  • आत्मा
  • शरीर
  • इन्द्रिय
  • अर्थ
  • बुद्धि
  • मन
  • प्रवृत्ति
  • दोष
  • प्रेत्यभाव
  • फल
  • दु:ख
  • अपवर्ग

 

अतः स्पष्ट है, की "A, D केवलम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 77

जैनदर्शने गुणस्थानानां संख्या-

  1. AOption (a)

    त्रयोदश

  2. BOption (b)

    पञ्चदश

  3. COption (c)

    चतुर्दश

  4. DOption (d)

    षोडश

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

चतुर्दश

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : जैनदर्शन में गुण स्थानों की संख्या क्या है?

स्पष्टीकरण - 

जैनदर्शन में गुण स्थानों की संख्या इस प्रकार है - 

  1. मिथ्या दृष्टि
  2. सासादन सम्यक्-दृष्टि
  3. मिश्र दृष्टि
  4. अविरत सम्यक्-दृष्टि
  5. देश-विरत
  6. प्रमत्त संयत
  7. अप्रमत्त संयत
  8. अपूर्वकरण
  9. अनिवृतिकरण (उन्नत सोच)
  10. सूक्ष्म-साम्पराय
  11. उपशान्तमोह
  12. क्षीण मोह (भ्रम का विनाश)
  13. सयोगकेवली (योग सहित केवल ज्ञान)
  14. अयोग केवली

 

अतः स्पष्ट है, की "चतुर्दश" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 78

सामवेदेन सम्बद्धे स्तः-

A. गोपथब्राह्मणम्

B. देवताध्यायब्राह्मणम्

C. बौधायनधर्मसूत्रम्

D. लाट्यायनश्रोतसूत्रम्

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, C केवलम्

  2. BOption (b)

    B, D केवलम्

  3. COption (c)

    A, D केवलम् 

  4. DOption (d)

    C, D केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

B, D केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : सामवेद से क्या संबंधित है?

संहिता और ब्राह्मणग्रंथ तथा श्रौतसूत्र :

संहिता और ब्राह्मणग्रंथ : 

संहिताब्राह्मणग्रंथ
ऋग्वेद- ऐतरेयब्राह्मण-(शैशिरीयशाकलशाखा) - कौषीतकी (शांखायन) ब्राह्मण (बाष्कल शाखा)
यजुर्वेद- शुक्ल यजुर्वेद : - शतपथब्राह्मण-(माध्यन्दिनीय वाजसनेयि शाखा) - शतपथब्राह्मण-(काण्व वाजसनेयि शाखा) - कृष्णयजुर्वेद : - तैत्तिरीयब्राह्मण - मैत्रायणीब्राह्मण - कठब्राह्मण - कपिष्ठलब्राह्मण
सामवेद- प्रौढ(पंचविंश) ब्राह्मण - षडविंश ब्राह्मण - देवताध्याय ब्राह्मण - आर्षेय ब्राह्मण - मन्त्र (या छांदोग्य) ब्राह्मण - जैमिनीय ब्राह्मण
अथर्ववेद- गोपथब्राह्मण (पिप्पलाद शाखा)

 

संहिता और श्रौतसूत्र :

संहिताशाखा
यजुर्वेद- शुक्ल यजुर्वेद : - कात्यायन श्रौतसूत्र - कृष्ण यजुर्वेद : - बौधायन श्रौतसूत्र - आपस्तम्ब श्रौतसूत्र - हिरण्यकेशी अथवा सत्याषाढ श्रौतसूत्र - वैखानस श्रौतसूत्र - वाधूल श्रौतसूत्र - भारद्वाज श्रौतसूत्र - मानव श्रौतसूत्र - वाराह श्रौतसूत्र - काठक श्रौतसूत्र
सामवेद- लाट्यायन श्रौतसूत्र - द्राह्यायण श्रौतसूत्र - जैमिनीय श्रौतसूत्र

 

अतः स्पष्ट है, 'B, D केवलम्**' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 79

अधस्तनेषु रामायणाश्रिते महाकाव्ये स्तः-

A. सेतुबन्धः

B. किरातार्जुनीयम् 

C. भट्टिकाव्यम्

D. नैषधीयचरितम्

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    B, C केवलम्

  2. BOption (b)

    A, D केवलम् 

  3. COption (c)

    A, C केवलम्

  4. DOption (d)

    C, D केवलम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

A, C केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अधोलिखित महाकाव्योंं में रामायणाश्रित महाकाव्य कौन से हैंं?

स्पष्टीकरण - 

  • सेतुबन्ध 
  • सेतुबन्ध प्राकृत भाषा का एक महाकाव्य है। यह 'रावणवहो' (रावणवधः) इस नाम से भी जाना जाता हैं। इस में १५ आश्वास (काण्ड) हैं।
  • भट्टिकाव्य
  • "भट्टिकाव्यम्" भारतीय संस्कृत साहित्य का महत्वपूर्ण काव्य है, जिसे भट्टि नामक एक प्रसिद्ध कवि ने लिखा था। इसका वास्तविक नाम 'रावणवध' है। इसमें भगवान रामचंद्र की कथा जन्म से रावण के वध तक वर्णित है। भट्टि का उद्देश्य अष्टाध्यायी के अध्ययन को आसान बनाने वाला साधन निर्मित करना था। भट्टिकाव्य में व्याकरण के उदाहरण रामकथा के माध्यम से सादर किए है।

​

अतः स्पष्ट है, की "A, C केवलम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 80

'गगनारविन्दं सुरभिः अरविन्दत्वात् अत्र कः हेत्वाभासः ? 

  1. AOption (a)

    सत्प्रतिपक्षः

  2. BOption (b)

    बाधः

  3. COption (c)

    आश्रयासिद्धः

  4. DOption (d)

    स्वरुपासिद्धः

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

आश्रयासिद्धः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'गगनारविन्दं सुरभिः अरविन्दत्वात् यहाँँ कौन सा हेत्वाभास है?

स्पष्टीकरण - 

  • तर्कसंग्रहकार आचार्य अन्नम्भट्ट ने असिद्ध हेत्वाभास का कोई लक्षण प्रस्तुत नहीं किया है। असिद्धि का अर्थ है सिद्धि का न होना अर्थात् साध्य व्याप्य हेतु का पक्ष में न रहना। असिद्ध हेत्वाभास के तीन भेद हैं - 
  • आश्रयासिद्ध,
  • स्वरूपासिद्ध
  • व्याप्यत्वासिद्ध।
  • आश्रयासिद्ध हेत्वाभास का लक्षण है 'यस्य हेतो: आश्रयः न अवगम्यते स आश्रयासिद्धः' अर्थात् जिस हेतु का आश्रय (पक्ष) निश्चित न हो, उसे आश्रयासिद्ध कहते हैं।
  • उदाहरण - '
  • गगनारविन्दं सुरभिः, अरविन्दत्वात्, सरोजारविन्दवत्।
  • कमल होने के कारण, सरोवर में उत्पन्न कमल के समान आकाशकुसुम सुगन्धित होता है।
  • इस अनुमानवाक्य में गगनारविन्द पक्ष (आश्रय) है, सुरभित्व साध्य, अरविन्दत्व हेतु तथा सरोजारविन्द दृष्टान्त है।
  • यहाँ पर गगनारविन्द आश्रय है जिसकी वस्तुतः कोई सत्ता ही नहीं होती है। इस कारण आश्रय (पक्ष) के न होने से 'अरविन्दत्वात् यह हेतु आश्रयासिद्ध हेत्वाभास है।

 

अतः स्पष्ट है, की प्रस्तुत प्रश्न का उत्तर "आश्रयासिद्धः" यह है।

Question 81

समुद्रगुप्तस्य प्रयागस्तम्भलेखात् ज्ञायते यत् सः आर्यावर्तस्य निम्नाङ्कितसंख्याकान् शासकान् पराजितवान्-

  1. AOption (a)

    पञ्च

  2. BOption (b)

    षट्

  3. COption (c)

    नव

  4. DOption (d)

    दश

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

नव

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : समुद्रगुप्त के प्रयागस्तम्भलेख से समझता है, की उस ने आर्यावर्त के कितने शासकोंं को पराजित किया था?

स्पष्टीकरण - 

  • प्रयाग प्रशस्ति गुप्त राजवंश के सम्राट समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिसेन द्वारा रचित लेख था। इस लेख को समुद्रगुप्त द्वारा २०० ई में कौशाम्बी से लाये गए अशोक स्तंभ पर खुदवाया गया था।  इसमें उन राज्यों का वर्णन है जिन्होंने समुद्रगुप्त से युद्ध किया और हार गये तथा उसके अधीन हो गये।
  • इसके अलावा समुद्रगुप्त ने अलग अलग स्थानों पर एरण प्रशस्ति गया ताम्र शासन लेख, आदि भी खुदवायें थे। इस प्रशस्ति के अनुसार समुद्रगुप्त ने अपने साम्राज्य का अच्छा विस्तार किया था।
  • प्रयागराज के अभिलेखों से पता चलता है कि समुद्रगुप्त ने अपनी विजय यात्रा का प्रारम्भ उत्तर भारत के आर्यावर्त के 9 शासकों को परास्त करने के साथ किया जिसमें नागसेन, अच्युत, गणपति आदि थे।
  • इन विजयों के द्वारा समुद्र गुप्त ने मध्य प्रदेश या गंगा यमुना दोआब पर अपनी सत्ता स्थापित की। उसने इन 9 शासकों का पूर्ण उन्मूलन किया क्योंकि केंद्रीय प्रदेश के स्पर्धी राज्यों को बिना पूर्णतः परास्त और उन्मूलन किया उसके लिए आगे बढ़ना संभव नहीं था।

 

अतः स्पष्ट है, की प्रस्तुत प्रश्न का उत्तर "नव" यह है।

Question 82

एषु पाठकस्य अन्यतमी गुणो वर्तते-

  1. AOption (a)

    अक्षरव्यक्तिः

  2. BOption (b)

    शीघ्री

  3. COption (c)

    गीती

  4. DOption (d)

    शिरःकम्पी

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

अक्षरव्यक्तिः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : इसमें से कौन सा पाठक का गुण है?

स्पष्टीकरण - 

माधुर्यमक्षरव्यक्तिः पदच्छेदस्तु सुस्वरः।

धैर्यं लयसमर्थं च षडेते पाठका गुणाः॥ (पाणिनीय शिक्षा, ३३)

  • अनुवाद - 
  • मधुरता, स्पष्ट बोलना, बड़े-बड़े शब्दों को तोड़ना, सुंदर स्वर (मीठे स्वर) में बोलना, धैर्यपूर्वक बोलना, लय सहित बोलना, ये पाठकों के छः गुण हैं।

 

अतः स्पष्ट है, की "अक्षरव्यक्तिः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 83

अधस्तनेषु विकृतिपाठान् यथाक्रमं योजयत -

A. माला

B. शिखा

C. जटा

D. रेखा

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, C, D

  2. BOption (b)

    A, C, B, D

  3. COption (c)

    C, A, B, D

  4. DOption (d)

    C, D, A, B

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

C, A, B, D

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अधोलिखित विकृतिपाठ को क्रम से चुनिए। 

स्पष्टीकरण - 

जटा माला शिखा रेखा ध्वजो दण्डो रथो घनः। अष्टौ विकृतयः प्रोक्ताः क्रमपूर्वा महर्षिभिः॥

  • जटा, माला, शिखा, रेखा, ध्वज, दंड, रथ, घन यह आठ विकृतियाँँ है।
  • इससे यह स्पष्ट होता है कि महर्षियों ने क्रमपाठ एवं विकृतिपाठों का दर्शन करने के अनन्तर उनका उपदेश किया। मधुशिक्षा के अनुसार जटापाठ के ऋषि व्याडि, मालापाठ के ऋषि वसिष्ठ, शिखापाठ के ऋषि भृगु, रेखापाठ के ऋषि अष्टावक्र, ध्वजपाठ के ऋषि विश्वामित्र, दण्डपाठ के ऋषि पराशर, रथपाठ के ऋषि कश्यप और घनपाठ के ऋषि अत्रि हैं।

 

अतः स्पष्ट है, की "C, A, B, D " यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 84

एषु कर्मसंज्ञाविधायके सूत्रे स्तः-

A. कर्मणि द्वितीया

B. कर्तुरीप्सिततमं कर्म

C. कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया

D. अकथितं च

उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, C केवलम्

  2. BOption (b)

    A, B केवलम्

  3. COption (c)

    A, D केवलम्

  4. DOption (d)

    B, D केवलम् 

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (d)D.

B, D केवलम् 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : कर्मसंज्ञाविधायक सूत्र कौन से है?

कर्मसंज्ञाविधायक सूत्र :

कर्तुरीप्सिततमं कर्म -

  • कर्ता अपनी क्रिया के द्वारा जिस पदार्थ को सबसे अधिक प्राप्त करना चाहता है, उसकी कर्मसंज्ञा होती है।
  • जैसे - सः हरिंं भजति। (वह हरि को भजता है।)
  • यहाँँ हरि शब्द की कर्मसंज्ञा होगी।

​

अकथितं च -

  • जहां अपादानादि कारक विशेष अविवक्षित होते हैं, वहां कर्मसंज्ञा होती है। संस्कृत भाषा में सोलह धातुएं ऐसी है जिनमें वक्ता स्वतंत्रहैं। वह चाहे तो करण, सम्प्रदान इत्यादि का प्रयोग करे अथवा इनके स्थान पर कर्म का प्रयोग करे।
  • द्विकर्मक सोलह धातुएं इस प्रकार है-

दुह्याचापच्दण्डुधिप्रच्छिचिब्रू शासुजिमथ्मुषाम् ।

कर्मयुक् स्यादकथितं तथा स्यान्नीहृकृष्वहाम् ।।

  • दुह् (दुहना), याच् (माँगना), पच् (पकाना), दण्ड् (दण्ड देना), रुध् (रोकना, घेरना), प्रच्छ् (पूछना, चि (चुनना, चयन करना), ब्रू (कहना, बोलना), शास् (शासन करना), जि (जीतना), मथ् (मथना), मुष् (चुराना), नी (ले जाना), हृ (हरण करना), कृष् (खींचना), वह (ढोकर ले जाना)। इन 16 धातुओं में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है।

 

अतः स्पष्ट है, 'B, D केवलम्** ' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 85

वेदान्तमते सूक्ष्मशरीरे कति अवयवाः?

  1. AOption (a)

    पञ्चदश

  2. BOption (b)

    षोडश

  3. COption (c)

    सप्तदश

  4. DOption (d)

    एकादश

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

सप्तदश

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : वेदांतमत से सूक्ष्मशरीर में कितने अवयव हैंं?

स्पष्टीकरण - 

  • सूक्ष्मशरीराणि सप्तदशावयवानि लिङ्गशरीराणि । अवयवास्तु ज्ञानेन्द्रियपञ्चकं बुद्धिमनसी कर्मेन्द्रियपञ्चकं वायुपञ्चकं चेति।
  • व्याख्या :
  • सूक्ष्म शरीर ही लिङ्ग शरीर है, जिसके सत्रह अवयव हैं। ये सत्रह अवयव हैं पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, बुद्धि तथा मन एवं पाँच प्राण।
  • विशेष :
  • अद्वैतवेदान्त में सूक्ष्म शरीर की अवधारणा स्वीकार की जाती है।
  • इस सूक्ष्म शरीर के सत्रह अवयव हैं, सत्रह घटक हैं पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, बुद्धि तथा मन। अवयव शब्द के दो अर्थ होते हैं एक तो समवायिकारण को अवयव कहा जाता है। न्याय वैशेषिक परम्परा में इसी अर्थ में अवयव शब्द का प्रयोग प्रमुख रूप से प्राप्त होता है।
  • उदाहरण के रूप में घट का अवयव होता है कपाल तथा पट का अवयव होते हैं तन्तु । यहाँ पर यह ध्येय है कि घट तथा कपाल दोनों में अत्यन्त भेद होता है, दोनों अलग-अलग होते हैं। तन्तु तथा पट भी भिन्न-भिन्न होते हैं।
  • उसी रीति से यहाँ पर भी इन सत्रहों को सूक्ष्म शरीर का अवयव नहीं समझा जा सकता है क्योंकि सूक्ष्म शरीर इन सत्रह से पृथक नहीं है।
  • इस कारण यहाँ पर अवयव का अर्थ है घटक । इस अर्थ में अवयव शब्द का प्रयोग न्याय वैशेषिक परम्परा में भी प्राप्त होता है। जैसे न्यायवाक्य के घटक पाँच वाक्यों को पाँच अवयववाक्य कहा जाता है। इस कारण यहाँ पर यही अर्थ समझना चाहिए कि ये सत्रह सूक्ष्म शरीर के घटक हैं, सूक्ष्म शरीर इन सत्रह से अलग कुछ नहीं है।

 

अतः स्पष्ट है, की प्रस्तुत प्रश्न का उत्तर "सप्तदश" यह है।

Question 86

काव्यप्रयोजनानि काव्यप्रकाशानुसारं यथाक्रमं योजयत -

A. अर्थकृते

B. यशसे

C. व्यवहारविदे

D. शिवेतरक्षतये

समुचितं विकल्पं चिनुत -

  1. AOption (a)

    A, C, B, D

  2. BOption (b)

    B, A, C, D

  3. COption (c)

    C, D, A, B

  4. DOption (d)

    A, C, D, B

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

B, A, C, D

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : काव्यप्रकाशानुसार काव्य]प्रयोजनोंं की यथाक्रम योजना कीजिए।

काव्यप्रयोजन :

आचार्य मम्मट के अनुसार काव्य के छः प्रयोजन हैं-

“काव्यं यशसे अर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।

सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे॥”

  • काव्य यश के लिये, धन के लिये, व्यवहार ज्ञान के लिये, अमंगल के नाश के लिये, शीघ्र ही परमानन्द की प्राप्ति के लिये और कान्ता सम्मित उपदेश के लिये होता है।

इन छः प्रयोजनों पर विचार करते हुये इन्हें तीन वर्गों में बांटा जा सकता है -

कविगत (कवि के लिए)पाठकगत (पाठक के लिए)उभयगत (कवि और पाठक दोनों के लिए)
यश, धनव्यवहार ज्ञान, कान्तासम्मित उपदेशपरमानंद की प्राप्ति, अमंगल का नाश

 

अतः स्पष्ट है, 'B, A, C, D**' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 87

ऋग्वेदप्रातिशाख्यानुसारेण अधस्तनेषु सन्ध्यक्षरमस्ति-

  1. AOption (a)

    अ

  2. BOption (b)

    इ

  3. COption (c)

    ओ

  4. DOption (d)

    उ

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

ओ

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : ऋग्वेदप्रातिशाख्यानुसार सन्ध्यक्षर कौन सा है?

सन्ध्यक्षर संज्ञा :

  • 'ततश्चत्वारि सन्ध्यक्षराण्युत्तराणि'
  • बाद के चार अक्षर सन्ध्यक्षर संज्ञक होते हैं- ए, ओ, ऐ, औ ।

​

समानाक्षर संज्ञा :

  • 'अष्टौ समानाक्षराण्यादितः (
  • अर्थात् प्रारम्भ के आठ अक्षर समानाक्षर संज्ञक होते हैं- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ ऋ।

​

सोम संज्ञा :

  • 'युग्मौ सोष्माणौ'
  • अर्थात् प्रत्येक वर्ग में सम वर्ण सोष्म सञ्ज्ञक होते हैं - खघ, छझ, ठढ, थघ, फभ।

​

अघोष संज्ञा

  • 'अन्त्याः सप्त तेषामघोषाः'
  • अर्थात् ऊष्म वर्णों में अन्तिम सात वर्ण अघोष सञ्ज्ञक होते हैं - श, ष, स, अ:, जिव्हामूलीय, उपध्मानीय, अं।

​

​अतः स्पष्ट है, 'ओ**' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। ​

ऋग्वेद प्रातिशाख्य :

ऋग्वेद प्रातिशाख्य महर्षि शौनक की कृति है। इसमें 18 पटल हैं। इस प्रातिशाख्य में सञ्ज्ञा, परिभाषा, स्वर, सन्धि, उच्चारणदोष आदि का वर्णन है। इसमें मुख्यतया इन विषयों का वर्णन है -

  • पारिभाषिक शब्दों के लक्षण,
  • विभिन्न सन्धियों का विवेचन,
  • क्रमपाठ का विवरण
  • पद-विभाग और व्यञ्जनों के स्वरूप का विचार,
  • वर्णोच्चारण त्रुटियों का उल्लेख,
  • वेद पारायण पद्धति,
  • अन्तिम तीन अध्यायों में छन्दः शास्त्र का उल्लेख |

Question 88

यथोचितं मेलनं कुरुत-

सूची Iसूची II
(A)रससम्प्रदायःI.भामहः
(B)रीतिसम्प्रदायःII.आनन्दवर्द्धनः
(C)अलङ्कारसम्प्रदायःIII.भरतमुनिः
(D)ध्वनिसम्प्रदायःIV.वामनः
  1. AOption (a)

    A - III, B - IV, C - I, D - II

  2. BOption (b)

    A - II, B - III, C - IV, D - I

  3. COption (c)

    A - I, B - II, C - III, D - IV

  4. DOption (d)

    A - IV, B - I, C - II, D - III

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

A - III, B - IV, C - I, D - II

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यथोचित मेलन कीजिए।

स्पष्टीकरण - 

  • संस्कृत साहित्य के संप्रदाय निम्न प्रकार के हैं - 
  • रस सम्प्रदाय - भरतमुनि (रचना - नाट्यशास्त्र)
  • अलंकार संप्रदाय’ - भामह  (रचना - काव्यालंकार)
  • रीति संप्रदाय’ - वामन  (रचना - काव्यादर्श)
  • ध्वनि संप्रदाय’ - आनंदवर्धन (रचना - ध्वन्यालोक)
  • वक्रोक्ति संप्रदाय’ - कुंतक  (रचना - वक्रोक्ति काव्यजीवितम्)
  • औचित्य संप्रदाय’ - क्षेमेन्द्र  (रचना - औचित्य विचारचर्चा)

 

अतः स्पष्ट है, की "A - III, B - IV, C - I, D - II" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

अधोलिखितं परिच्छेदं पठित्वा अधस्तनप्रश्नस्य उत्तरं देयम् -

यौवनारम्भे च प्रायः शास्त्रजलप्रक्षालननिर्मलापि कालुष्यमुपयाति बुद्धिः। अनुज्झितधवलतापि सरागैव भवति यूनां दृष्टिः । अपहरति च वात्येव शुष्कपत्रं समुद्भूतरजोभ्रान्तिरतिदूरम् आत्मेच्छया यौवनसमये पुरुषं प्रकृतिः। इन्द्रियहरिणहारिणी च सततमतिदुरन्तेयमुपभोगमृगतृष्णिका नवयौवनकषायितात्मनश्च सलिलानीव तान्येव विषयस्वरूपाण्यास्वाद्यमानानि मधुरतराण्यापतन्ति मनसः । नाशयति च दिङ्गोह इवोन्मार्गप्रवर्तकः पुरुषमत्यासङ्गो विषयेषु । भवादृशा एव भवन्ति भाजनानि उपदेशानाम्। अपगतमले हि मनसि स्फटिकमणाविव रजनिकरगभस्तयो विशन्ति सुखेन उपदेशगुणाः।

Question 89

प्रकृतिः कमतिदूरम् अपहरति ?

  1. AOption (a)

    शुष्कपत्रम्

  2. BOption (b)

    रजः

  3. COption (c)

    पुरुषम्

  4. DOption (d)

    रजोभ्रान्तिम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

पुरुषम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : प्रकृति किसे अत्यंत दूर खींच ले जाती है?

स्पष्टीकरण - 

  • उत्तर के लिए महत्वपूर्ण पंक्ति - 
  • अपहरति च वात्येव शुष्कपत्रं समुद्भूतरजोभ्रान्तिरतिदूरम् आत्मेच्छया यौवनसमये पुरुषं प्रकृतिः।
  • भाषांतर - 
  • जवानी के समय रजोगुण से उत्पन्न भ्रान्ति वाली (वात्या-पक्ष में-धूलों के चक्कर से युक्त ) प्रकृति पुरुष को उसी प्रकार अपनी इच्छा से अत्यन्त दूर (अर्थात् विवेक से परे; बात्या  पक्ष में सुदूर स्थान में) खींच ले जाती है जैसे वात्या ( बवंडर) सूखे पत्ते को।

​

अतः स्पष्ट है, की "पुरुषम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Additional Information

गद्यांश का हिंदी भाषांतर :

  • युवावस्था के प्रारम्भ में ( मनुष्य की) बुद्धि शास्त्र रूपी जल से धुल कर निर्मल होने पर भी प्रायः कलुषित हो जाती है। युवकों की दृष्टि स्वच्छता का त्याग न करने पर भी राग (लालिमा या अनुराग ) से युक्त ही रहती है। जवानी के समय रजोगुण से उत्पन्न भ्रान्ति वाली (वात्या-पक्ष में-धूलों के चक्कर से युक्त ) प्रकृति पुरुष को उसी प्रकार अपनी इच्छा से अत्यन्त दूर (अर्थात् विवेक से परे; बात्या  पक्ष में सुदूर स्थान में) खींच ले जाती है जैसे वात्या ( बवंडर) सूखे पत्ते को। अत्यन्त दुःखद परिणाम वाली यह (विषयों के) उपभोग रूप मृगतृष्णा सर्वदा इन्द्रिय रूपी हरिणों का विनाश करने वाली है। नव यौवन द्वारा परिवर्तित (अर्थात् राग-द्वेषादि से युक्त किये हुए) मन को जल की भाँति वे ही भोग्य वस्तुएँ आस्वादित होने पर मधुर प्रतीत होती हैं (अर्थात् जैसे जल मधुर न होने पर भी कषायरसयुक्त जिह्वा को मधुर प्रतीत होता है उसी तरह भोग्य वस्तुएँ मधुर न होने पर भी अनुरक्त मन को मधुर लगती हैं)। दिग्भ्रम की तरह कुपथ पर चलाने वाली विषयों की अत्यन्त प्रासक्ति मनुष्य को विनष्ट कर देती है। आप जैसे ( व्यक्ति ) ही उपदेशों के पात्र होते हैं। क्योंकि उपदेश के गुण निर्मल अन्तःकारण में उसी तरह अनायास प्रवेश करते हैं जैसे स्फटिक मणि में सूर्य की किरणें।

अधोलिखितं परिच्छेदं पठित्वा अधस्तनप्रश्नस्य उत्तरं देयम् -

यौवनारम्भे च प्रायः शास्त्रजलप्रक्षालननिर्मलापि कालुष्यमुपयाति बुद्धिः। अनुज्झितधवलतापि सरागैव भवति यूनां दृष्टिः । अपहरति च वात्येव शुष्कपत्रं समुद्भूतरजोभ्रान्तिरतिदूरम् आत्मेच्छया यौवनसमये पुरुषं प्रकृतिः। इन्द्रियहरिणहारिणी च सततमतिदुरन्तेयमुपभोगमृगतृष्णिका नवयौ��नकषायितात्मनश्च सलिलानीव तान्येव विषयस्वरूपाण्यास्वाद्यमानानि मधुरतराण्यापतन्ति मनसः । नाशयति च दिङ्गोह इवोन्मार्गप्रवर्तकः पुरुषमत्यासङ्गो विषयेषु । भवादृशा एव भवन्ति भाजनानि उपदेशानाम्। अपगतमले हि मनसि स्फटिकमणाविव रजनिकरगभस्तयो विशन्ति सुखेन उपदेशगुणाः।

Question 90

'मधुरतराण्यापतन्ति' इत्यत्र 'आपतन्ति' इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किमस्ति?

  1. AOption (a)

    सलिलानि

  2. BOption (b)

    विषयरुपाणि

  3. COption (c)

    मधुरतराणि

  4. DOption (d)

    आस्वाद्यमानानि

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

विषयरुपाणि

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'मधुरतराण्यापतन्ति' यहाँँ 'आपतन्ति' इस क्रियापद का कर्ता कौन है?

स्पष्टीकरण - 

  • उत्तर के लिए महत्वपूर्ण पंक्ति - 
  • इन्द्रियहरिणहारिणी च सततमतिदुरन्तेयमुपभोगमृगतृष्णिका नवयौवनकषायितात्मनश्च सलिलानीव तान्येव विषयस्वरूपाण्यास्वाद्यमानानि मधुरतराण्यापतन्ति मनसः।
  • भाषांतर - 
  • अत्यन्त दुःखद परिणाम वाली यह (विषयों के) उपभोग रूप मृगतृष्णा सर्वदा इन्द्रिय रूपी हरिणों का विनाश करने वाली है। नव यौवन द्वारा परिवर्तित (अर्थात् राग-द्वेषादि से युक्त किये हुए) मन को जल की भाँति वे ही भोग्य वस्तुएँ आस्वादित होने पर मधुर प्रतीत होती हैं।
  • (अर्थात् जैसे जल मधुर न होने पर भी कषायरसयुक्त जिह्वा को मधुर प्रतीत होता है उसी तरह भोग्य वस्तुएँ मधुर न होने पर भी अनुरक्त मन को मधुर लगती हैं।)

​

अतः स्पष्ट है, की "विषयरुपाणि" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 91

यौवनारम्भे यूनां दृष्टिः प्रायः कीदृशी भवति?

  1. AOption (a)

    रागयुक्ता

  2. BOption (b)

    कालुष्ययुक्ता

  3. COption (c)

    अनुज्झिता

  4. DOption (d)

    धवला

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

रागयुक्ता

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : युवावस्था के प्रारम्भ में युवकों की दृष्टि कैसी होती है?

स्पष्टीकरण - 

  • उत्तर के लिए महत्वपूर्ण पंक्ति - 
  • यौवनारम्भे च प्रायः शास्त्रजलप्रक्षालननिर्मलापि कालुष्यमुपयाति बुद्धिः। अनुज्झितधवलतापि सरागैव भवति यूनां दृष्टिः।
  • भाषांतर - 
  • युवावस्था के प्रारम्भ में ( मनुष्य की) बुद्धि शास्त्र रूपी जल से धुल कर निर्मल होने पर भी प्रायः कलुषित हो जाती है। युवकों की दृष्टि स्वच्छता का त्याग न करने पर भी राग (लालिमा या अनुराग ) से युक्त ही रहती है।

​

अतः स्पष्ट है, की "रागयुक्ता" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 92

'अपगतमले हि मनसि स्फटिकमणाविव' इत्यत्र कोऽलङ्कारो वर्तते ?

  1. AOption (a)

    रूपकम्

  2. BOption (b)

    यमकम्

  3. COption (c)

    उपमा

  4. DOption (d)

    दृष्टान्तः

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

उपमा

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'अपगतमले हि मनसि स्फटिकमणाविव' इस पंक्ति में कौन सा अलंकार है?

 

स्पष्टीकरण - 

  • उपमा अलंकार - 
  • साधर्म्यमुपमा भेदे। 
  • दो वस्तुओं में भेद रहने पर भी, जब उनकी समानता का प्रतिपादन किया जाता है, तब वहाँ उपमा अलंकार होता है।
  • उपमा अलंकार में चार उपादान होते हैं
  • उपमान (जिससे उपमा दी जाय), जैसे - कमलम्
  • उपमेय (जिसकी उपमा दी जाय), जैसे - मुखम्
  • समान धर्म जैसे मनोज्ञं (मनोज्ञता, सुन्दरता )
  • उपमानवाची शब्द जैसे इव (यथा, वत्, तुल्य, सम आदि)
  • जहाँ इन चारों का स्पष्ट उल्लेख हो वह पूर्णोपमा कहलाती है, जैसे उपर्युक्त उदाहरण में। जहाँ इनमें से कुछ लुप्त रहते हैं वह लुप्तोपमा कहलाती है। उपमा के भेद प्रभेद अनेक हैं।
  • 'अपगतमले हि मनसि स्फटिकमणाविव' इस पंक्ति का अर्थ है , उपदेश के गुण निर्मल अन्तःकारण में उसी तरह अनायास प्रवेश करते हैं जैसे स्फटिक मणि में सूर्य की किरणें। सूर्य की किरणोंं की उपमा यहाँँ  उपदेश के गुणोंं को दी गई है।

   

अतः स्पष्ट है, की "उपमा" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 93

'दिङ्मोह इवोन्मार्गप्रवर्तकः' इत्यत्र उन्मार्गप्रवर्तकः कः?

  1. AOption (a)

    उपदेशः

  2. BOption (b)

    कालः

  3. COption (c)

    पुरुषः

  4. DOption (d)

    अत्यधिकानुरागः

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (d)D.

अत्यधिकानुरागः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'दिङ्मोह इवोन्मार्गप्रवर्तकः' यहाँँ उन्मार्गप्रवर्तक यह शब्द किस के लिए है?

स्पष्टीकरण - 

  • उत्तर के लिए महत्वपूर्ण पंक्ति - 
  • नाशयति च दिङ्गोह इवोन्मार्गप्रवर्तकः पुरुषमत्यासङ्गो विषयेषु।
  • भाषांतर - 
  • दिग्भ्रम की तरह कुपथ पर चला��े वाली विषयों की अत्यन्त आसक्ति मनुष्य को विनष्ट कर देती है।

​

अतः स्पष्ट है, की "अत्यधिकानुरागः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 94

अधस्तनेषु भाषाविज्ञानदृष्ट्या संघर्षी ध्वनिः कः?

  1. AOption (a)

    ट

  2. BOption (b)

    श

  3. COption (c)

    ल

  4. DOption (d)

    र

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

श

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : भाषाविज्ञान की दृष्टि से संघर्षी ध्वनि कौन सा है?

स्पष्टीकरण - 

  • संघर्षी ध्वनियों के उच्चारण में दो उच्चारण अवयव एक दूसरे के इतने निकट आ जाते हैं कि दोनों के मध्य से निकलने वाली वायु आराम से ना निकलकर घर्षण करती हुई बाहर निकलती है । इस प्रकार उत्पन्न होने वाली ध्वनियों को संघर्षी ध्वनियाँ कहा जाता है।
  • संघर्षी व्यंजनों कि विशेषता है कि उनकी ध्वनि को वायु-प्रवाह जारी रखकर लम्बे समय तक बिना रुके शुद्ध रूप से जारी रखा जा सकता है।
  • फ, व, स, ज, श, ख, ग, ह आदि संघर्षी व्यंजन ध्वनियाँ हैं।

 

अतः स्पष्ट है, की "श" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

अधोलिखितं परिच्छेदं पठित्वा अधस्तनप्रश्नस्य उत्तरं देयम्-

अनुमितौ व्याप्तिज्ञानं करणं, परामर्शो व्यापारः। तथाहि येन पुरुषेण महानसादौ धूमे वह्नेर्व्याप्तिर्गृहीता, पश्चात् स एव पुरुषः क्वचित् पर्वतादावविच्छिन्नमूलां धूमरेखां पश्यति, तदनन्तरं 'धूमो वह्निव्याप्य इत्येवं रूपं व्याप्तिस्मरणं तस्य भवति, पश्चाच्च वह्निव्याप्यधूमवानयमिति ज्ञानं, स एव परामर्श इत्युच्यते। तदनन्तरं पर्वतो वह्निमानित्यनुमितिर्जायते। अत्र प्राचीनास्तु व्याप्यत्वेन ज्ञायमानं लिङ्गमनुमितिकरणमिति वदन्ति तद्दूषयति- ज्ञायमानमिति । लिङ्गस्यानुमित्यकरणत्वे युक्तिमाह - अनागतादीति। यद्यनुमितौ लिङ्गं करणं स्यात्, तदाऽनागतेन लिङ्गेन, विनष्टेन, चाऽनुमितिर्न स्यात्. अनुमितिकरणस्य लिङ्गस्य तदानीमभवादिति ।

Question 95

पर्वतो वह्निमानिति ज्ञानं कथ्यते -

  1. AOption (a)

    अनुमितिः

  2. BOption (b)

    उपमितिः

  3. COption (c)

    अनुपलब्धिः

  4. DOption (d)

    व्याप्तिः

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

अनुमितिः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : "पर्वतो वह्निमान्" (पर्वत वह्नि युक्त है) यह ज्ञान क्या कहलाता है?

स्पष्टीकरण - 

  • पर्वत वह्नि युक्त है यह ज्ञान अनुमिति कहलाता है। 'जहाँ धूम होता है, वहाँ अग्नि होती है 'अनुमान के द्वारा जो इस प्रकार की अनुमिति अभीष्ट है कि यहाँ पर्वत में अग्नि है। यह तृतीय लिङ्ग ज्ञान ही लिङ्ग परामर्श कहलाता है। इससे 'यहाँ पर्वत में अग्नि है" इस प्रकार की अनुमिति होती है। अतः यह अनुमिति का कारण है और अनुमिति का करण ही अनुमान कहलाता है।

 

अतः स्पष्ट है, की "अनुमितिः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Additional Information

  • अनुमितौ व्याप्तिज्ञानं करणं - 
  • यहाँ पर "अनुमिति" का अर्थ है अनुमान या आलोचना करना। इस वाक्य में यह कहा जा रहा है कि जब कोई व्यक्ति किसी घटना को देखकर उसका कारण और परिणाम करता है, तो वह व्याप्ति (यानी संबंध) की ज्ञान करता है। इससे व्यक्ति की बुद्धि में ज्ञान उत्पन्न होता है।
  • परामर्शो व्यापारः -
  • यहाँ "परामर्श" का अर्थ है सुझाव या आलोचना करना। इस वाक्य में कहा जा रहा है कि जब व्यक्ति किसी घटना को विचार करता है और इसके परिणाम का अनुमान लगाता है, तो वह व्यापार (यानी संबंध) का परामर्श कर रहा है।
  • लिङ्गमनुमितिकरणम्: -
  • "लिङ्गमनुमितिकरणम्" का अर्थ है कि यदि किसी लिङ्ग (चिह्न) के द्वारा व्यक्ति किसी घटना का अनुमान लगाता है, तो वह उस घटना को जानता है। इसमें लिङ्ग का अर्थ हो सकता है किसी प्रकार का संकेत या परामर्श।
  • अनागतादीति: -
  • इस अंश में यह कहा जा रहा है कि यदि अनुमिति के माध्यम से व्यक्ति किसी घटना का अनुमान लगाता है, तो उसके बाद किसी भविष्यकाल में वह अनुमिति से नष्ट हो जाता है, तो वह अनुमिति अब विनष्ट नहीं हो सकती है।

Question 96

परामर्शस्य स्वरुपमस्ति-

  1. AOption (a)

    'वह्विव्यापकधूमवानयम्' इति ज्ञानम्

  2. BOption (b)

    'धूमव्यापकवह्निमानयम्' इति ज्ञानम्

  3. COption (c)

    'वह्निव्याप्यधूमवानयम्' इति ज्ञानम्

  4. DOption (d)

    'धूमव्याप्यवह्निमानयम्' इति ज्ञानम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

'वह्निव्याप्यधूमवानयम्' इति ज्ञानम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : परामर्श का स्वरूप क्या है?

स्पष्टीकरण - 

  • परामर्श का स्वरूप है, धूम से युक्त यह पर्वत अग्नियान है। व्याप्ति बल से कराया जाने वाला ज्ञानकरण तृतीय परामर्श कहा जाता है।
  • जब व्यक्ति किसी घटना को विचार करता है और इसके परिणाम का अनुमान लगाता है, तो वह व्यापार (यानी संबंध) का परामर्श कर रहा है।
  • 'लिङ्ग परामर्शोऽनुमानम् लिङ्ग परामर्श को अनुमान कहते हैं। "तस्य तृतीयं ज्ञानं परामर्शः" उस लिङ्ग का तृतीय ज्ञान परामर्श कहा जाता है।

 

अतः स्पष्ट है, की "'वह्निव्याप्यधूमवानयम्' इति ज्ञानम्*"* यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 97

अनुमितौ कः व्यापारः?

  1. AOption (a)

    पक्षधर्मताज्ञानम्

  2. BOption (b)

    व्याप्तिज्ञानम्

  3. COption (c)

    परामर्शः

  4. DOption (d)

    व्याप्तिस्मरणम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

परामर्शः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अनुमिति में व्यापार क्या है?

स्पष्टीकरण - 

  • अनुमिति में परामर्श व्यापार है। न्याय दर्शन का दूसरा प्रमाण अनुमान प्रमाण है। 'लिङ्ग परामर्शोऽनुमानम् लिङ्ग परामर्श को अनुमान कहते हैं। "तस्य तृतीयं ज्ञानं परामर्शः" उस लिङ्ग का तृतीय ज्ञान परामर्श कहा जाता है। यथा, प्रथम तो पाकशाला आदि में, बार बार धूम को देखता हुआ पुरुष अग्नि को देखता है। इस बार दर्शन में धूम और अग्नि के स्वाभाविक सम्बन्ध का निश्चय करता है। यही परामर्श है।

 

अतः स्पष्ट है, की "परामर्शः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 98

व्याप्तिस्मरणस्य स्वरुपं भवति-

  1. AOption (a)

    पर्वत वह्निः

  2. BOption (b)

    पर्वतो वह्निमान्

  3. COption (c)

    पर्वतो धूमवान्

  4. DOption (d)

    धूमो वह्निव्याप्यः

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (d)D.

धूमो वह्निव्याप्यः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : व्याप्तिस्मरण का स्वरूप क्या होता है?

स्पष्टीकरण - 

  • व्याप्ति स्मरण का स्वरूप है, आग धुंए से व्याप्त है। व्याप्ति का तात्पर्य होता है “एक के होने पर दूसरे का होना” यथा - “यत्र यत्र धूमः तत्र वहिः'। जहाँ जहाँ धूआँ हैं वहाँ वहाँ आग है। धूंंए के होने पर आग का होना निश्चित है। यही साहचर्य नियम व्याप्ति कहा जाता है। व्याप्ति के बल से जिनका स्वरूप प्रकट होता है उसे लिङ्ग कहते हैं।

 

अतः स्पष्ट है, की "धूमो वह्निव्याप्यः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 99

अनुमितौ व्याप्तिज्ञानं भवति-

  1. AOption (a)

    व्यापारः

  2. BOption (b)

    फलम्

  3. COption (c)

    करणम्

  4. DOption (d)

    लिङ्गम्

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

करणम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अनुमिति में व्याप्तिज्ञान क्या होता है?

स्पष्टीकरण - 

  • व्याप्ति ज्ञान को द्वितीय लिंगपरामर्श के रूप में अनुमिति का कारण कहा गया है। अनुमिति में व्याप्ति ज्ञान करण से होता है। न्याय दर्शन में चार प्रमाण माने गये हैं।
  • करण ती प्रकार के होते हैं -
  • इन्द्रिय
  • इन्द्रियार्थ
  • ज्ञान।

 

अतः स्पष्ट है, की "करणम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 100

व्याकरणाध्ययनस्य प्रयोजनं यथाक्रमं योजयत-

A. लघुः

B. आगमः

C. ऊहः

D. रक्षा

समुचितं विकल्पं चिनुत -

  1. AOption (a)

    D, C, B, A

  2. BOption (b)

    C, D, A, B

  3. COption (c)

    B, C, D, A

  4. DOption (d)

    A, B, D, C

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

D, C, B, A

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ - व्याकरण अध्ययन का प्रयोजन यथाक्रम लिखे-

व्याकरण - अध्ययन के प्रयोजन :

पतंजलि ने व्याकरण अर्थात् शब्दानुशासनशास्त्र के प्रयोजन को दो भागों में विभाजित किया है।

  • मुख्यप्रयोजन
  • गौणप्रयोजन।

मुख्यप्रयोजन में पाँच प्रयोजन है -

रक्षोहागमलघ्वसन्देहाः प्रयोजनम्।

  1. रक्षा - वेद शास्त्र की रक्षा के लिये व्याकरणाध्ययन आवश्यक है क्योंकि वेद की रक्षा वही कर सकता है जो लोप तथा आगम का ज्ञान रखता हो।
  2. ऊह - ऊह अर्थात् विभक्तियों का विपरिणाम भी शब्दशास्त्र के अध्ययन का प्रयोजन है वेद में प्रयुक्त शब्दों की विभक्तियों, वचनों आदि का ज्ञान आवश्यक है, जो व्याकरण से ज्ञात होता है।
  3. आगम - ब्राह्मण को बिना किसी दृष्ट कारण की अपेक्षा किये छः अङ्गों से युक्त वेद का धर्म मान कर अध्ययन और अर्थज्ञान प्राप्त करना चाहिए, ऐसी श्रुति है। वेद के उन छः अङ्गों में मुख्य अङ्ग व्याकरण ही है और मुख्य के विषय में किया गया प्रयत्न ही फलदायक होता है। अतः आगम भी एक प्रयोजन है।
  4. लघु - कम शब्दों से ज्यादा अर्थ का ज्ञान करना ही व्याकरण का प्रयोजन है।
  5. असन्देह - असन्देह के लिये भी व्याकरण का अध्ययन आवश्यक है।

इस प्रकार रक्षा, ऊह, आगम, लघु और असन्देह यह व्याकरण अध्ययन के प्रयोजन का क्रम है।

Additional Information

इस के अतिरिक्त १३ आनुषंगिक अथवा गौण प्रयोजन इस प्रकार हैंं -  

इमानि च भूयः शब्दानुशानस्य, प्रयोजनानि-

  1. तेऽसुराः।
  2. दुष्टः शब्दः।
  3. यदधीतम्।
  4. यस्तु प्रयुङ्क्ते।
  5. अविद्वांसः।
  6. विभक्तिं कुर्वन्ति।
  7. यो वा इमाम्।
  8. चत्वारि।
  9. उत त्वः।
  10. सक्तुमिव।
  11. सारस्वतीम्।
  12. दशभ्यां पुत्रस्या।
  13. सुदेवो असि वरुणेति।

इत्यादिना।

100 questions in the full paper