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UGC NET Paper 2: Sanskrit 27 Jan, 2025 Shift 2 (Previous Year Paper)

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Question 1

आचार्यकपिलदेवद्विवेदिमतानुसारेण ध्वनिपरिवर्तनस्य आभ्यन्तरकारणानामयं क्रमः विद्यते -

<br>

A. अशिक्षा

B. अनुकरणस्यापूर्णता

C. भावावेशः

D. लघूकरणप्रवृत्तिः

E. शीघ्रभाषणम्

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, C, D, E

  2. BOption (b)

    B, D, A, C, E

  3. COption (c)

    D, B, A, E, C

  4. DOption (d)

    D, C, A, B, E

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Correct answer

Answer: (c)C.

D, B, A, E, C

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- आचार्य कपिलदेव द्विवेदी के अनुसार ध्वनि परिवर्तन के आंतरिक कारणों का क्रम इस प्रकार है:

उत्तर- D, B, A, E, C

Important Pointsध्वनिपरिवर्तन के आभ्यंतर कारणों का क्रम D, B, A, E, C आचार्य कपिलदेव द्विवेदी के मतानुसार निम्नलिखित प्रकार से व्याख्यायित किया जा सकता है:

  • लघूकरणप्रवृत्तिः (D) – यह ध्वनि परिवर्तन का प्रमुख कारण है, जिसमें उच्चारण को सरल और संक्षिप्त करने की प्रवृत्ति देखी जाती है।
  • अनुकरणस्यापूर्णता (B) – जब किसी ध्वनि का अनुकरण पूर्ण रूप से नहीं किया जाता, तो उसमें परिवर्तन की संभावना बढ़ जाती है।
  • अशिक्षा (A) – भाषा और उच्चारण की उचित शिक्षा न होने के कारण ध्वनि परिवर्तन होता है।
  • शीघ्रभाषणम् (E) – अत्यधिक तेजी से बोलने पर ध्वनि में परिवर्तन आ सकता है, जिससे शब्दों का उच्चारण प्रभावित होता है।
  • भावावेशः (C) – जब व्यक्ति अत्यधिक भावनात्मक स्थिति में होता है, तो उसकी ध्वनि में परिवर्तन देखा जाता है।

 

यह क्रम भाषा-विज्ञान और उच्चारण परिवर्तन के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

Question 2

विवेकानन्दविजयकाव्यस्य रचयिता भवति -

  1. AOption (a)

    अम्बिकादत्तव्यासः

  2. BOption (b)

    बी. राघवन्

  3. COption (c)

    श्रीधरभास्करवर्णेकर:

  4. DOption (d)

    विल्हणः

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Correct answer

Answer: (c)C.

श्रीधरभास्करवर्णेकर:

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- विवेकानन्दविजयकाव्य के रचयिता है-

उत्तर- श्रीधरभास्करवर्णेकर:

Important Points

  • विवेकानन्दविजयकाव्य एक महत्वपूर्ण संस्कृत काव्य है, जो स्वामी विवेकानंद के जीवन और उनके कार्यों का वर्णन करता है।
  • इस काव्य के रचयिता श्रीधरभास्करवर्णेकर हैं, जिन्होंने स्वामी विवेकानंद के जीवन के विभिन्न पहलुओं को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया।

श्रीधरभास्करवर्णेकर का योगदान:

  • वे संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध कवि थे, जिन्होंने कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की।
  • उनके काव्य में शैली, भाव और दर्शन का उत्कृष्ट समन्वय देखने को मिलता है।
  • विवेकानन्दविजयकाव्य में स्वामी विवेकानंद के विचारों, उनके जीवन के संघर्षों और उनकी आध्यात्मिक उपलब्धियों को सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
<br>

इस प्रकार, विवेकानन्दविजयकाव्य के रचयिता श्रीधरभास्करवर्णेकर ही हैं।

Question 3

'सिद्ध हैमशब्दानुशासनम्' इति ग्रन्थस्य 'बृहती' इति टीका केन लिखिता ?

  1. AOption (a)

    मेघविजयेन

  2. BOption (b)

    हेमचन्द्रसूरिणा

  3. COption (c)

    विश्वेश्वरसूरिणा 

  4. DOption (d)

    सिद्धेश्वरसूरिणा

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Correct answer

Answer: (b)B.

हेमचन्द्रसूरिणा

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- 'सिद्ध हैमशब्दानुशासनम्' इस ग्रन्थ की 'बृहती' यह टीका किसने लिखी है?

उत्तर- हेमचन्द्रसूरिणा

Important Points'सिद्ध हैमशब्दानुशासनम्' संस्कृत व्याकरण का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसे आचार्य हेमचन्द्र ने रचा था।

इस ग्रंथ की 'बृहती' टीका भी हेमचन्द्रसूरि द्वारा लिखी गई है, जो इस ग्रंथ की व्याख्या और विस्तार प्रदान करती है।

हेमचन्द्रसूरि का योगदान:

  • हेमचन्द्रसूरि जैन परंपरा के महान विद्वान थे, जिन्होंने संस्कृत और प्राकृत व्याकरण पर महत्वपूर्ण कार्य किया।
  • उन्होंने सिद्धहेम व्याकरण की रचना की, जिसमें पाँच अंग होते हैं—मूलपाठ, धातुपाठ, गणपाठ, उणादिप्रत्यय, और लिङ्गानुशासन।
  • उनकी टीका 'बृहती' इस ग्रंथ की गहन व्याख्या करती है और संस्कृत व्याकरण के नियमों को स्पष्ट करती है।

अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • मेघविजय: वे इस ग्रंथ की टीका के लेखक नहीं हैं।
  • विश्वेश्वरसूरि: वे अन्य जैन ग्रंथों से जुड़े हुए हैं, लेकिन 'बृहती' टीका के लेखक नहीं हैं।
  • सिद्धेश्वरसूरि: वे भी इस ग्रंथ की टीका से संबंधित नहीं हैं।

 

इस प्रकार, 'बृहती' टीका के लेखक हेमचन्द्रसूरि ही हैं।

Question 4

देहात्मवादे “स्थूलोऽहं, कृशोऽहं, कृष्णोऽहम्" इत्यादौ कस्योपपत्तिः ?

  1. AOption (a)

    व्यधिकरणस्य

  2. BOption (b)

    सामानाधिकरण्यस्य

  3. COption (c)

    अनधिकरणस्य

  4. DOption (d)

    व्यधिकरणघटितसामानाधिकरण्यस्य

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Correct answer

Answer: (b)B.

सामानाधिकरण्यस्य

Why this answer is correct

उत्तर- सामानाधिकरण्यस्य

Important Pointsदेहात्मवाद और वाक्यविश्लेषण

देहात्मवाद वह दृष्टिकोण है जिसमें शरीर को ही आत्मा माना जाता है। इस मत में व्यक्ति अपने शरीर के गुणों को ही आत्मा के गुण मानता है, जैसे—

"स्थूलोऽहम्" — मैं मोटा हूँ

"कृशोऽहम्" — मैं पतला हूँ

"कृष्णोऽहम्" — मैं काला हूँ

यहाँ "अहम्" (मैं) आत्मा को सूचित करता है, जबकि "स्थूलः", "कृशः", "कृष्णः" आदि शरीर के गुण हैं। फिर भी दोनों को एक ही विभक्ति (प्रथमा) में रखा गया है।

सामानाधिकरण्य का अर्थ

समानाधिकरण्य वह व्याकरणिक संबंध है जिसमें दो या अधिक पद एक ही वस्तु के लिए प्रयुक्त होते हैं और एक ही विभक्ति में होते हैं।

उदाहरण:

"राजा पुरुष:" — राजा ही पुरुष है।

"शुक्लः पटः" — वस्त्र श्वेत है।

इसी प्रकार, "स्थूलोऽहम्" में "स्थूलः" और "अहम्" दोनों प्रथमा विभक्ति में हैं और एक ही व्यक्ति (आत्मा/देह) को सूचित करते हैं — यही है समानाधिकरण्य।

इसलिए, देहात्मवाद में जब व्यक्ति शरीर के गुणों को आत्मा पर आरोपित करता है, तब वह समानाधिकरण्य के व्याकरणिक ढाँचे का उपयोग करता है।

Question 5

ज्ञाततालिङ्गकानुमित्या ज्ञानस्य प्रामाण्यं कः गृह्णाति ?

  1. AOption (a)

    प्रभाकरमिश्रः 

  2. BOption (b)

    मुरारिमिश्रः 

  3. COption (c)

    कुमारिलभट्टः 

  4. DOption (d)

    जयन्तभट्टः

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Correct answer

Answer: (c)C.

कुमारिलभट्टः 

Why this answer is correct

उत्तर- ​कुमारिलभट्टः

यह प्रश्न मीमांसादर्शन के भीतर ज्ञान के प्रामाण्य  की अवधारणा से संबंधित है, विशेषतः यह कि ज्ञान का प्रमाणत्व कैसे सिद्ध होता है।

कुमारिलभट्ट का दृष्टिकोण:

कुमारिलभट्ट भट्टमीमांसासंप्रदाय के प्रमुख आचार्य थे। उन्होंने ज्ञान के प्रामाण्य को ज्ञाततालिङ्गकानुमित्या सिद्ध किया, जिसका अर्थ है:

"ज्ञान की प्रामाण्यता उस ज्ञान से उत्पन्न होने वाली वस्तु की ज्ञातता के लक्षण से अनुमान द्वारा सिद्ध होती है।"

अर्थात्, जब कोई ज्ञान उत्पन्न होता है और वह किसी वस्तु की ज्ञातता (knowability) को उत्पन्न करता है, तो उस ज्ञातता को देखकर हम अनुमान करते हैं कि वह ज्ञान प्रमाण है।

उदाहरण के लिए:

यदि कोई व्यक्ति कहे - "यह अग्नि है," और वह कथन वस्तुतः अग्नि की उपस्थिति को प्रकट करता है, तो उस ज्ञान की प्रामाण्यता इस तथ्य से सिद्ध होती है कि वह वस्तु (अग्नि) वास्तव में ज्ञात हो गई।

अन्य विकल्पों से भिन्नता:

  • प्रभाकरमिश्रः - वे स्वप्रकाशवाद के समर्थक हैं, जिनके अनुसार ज्ञान स्वयं ही अपने प्रमाणत्व को प्रकाशित करता है (स्वतःप्रामाण्यवादी)।
  • मुरारिमिश्रः - वे अनुव्यवसाय (knowledge of knowledge) के माध्यम से ज्ञान के प्रामाण्य को सिद्ध करते हैं।
  • जयन्तभट्टः - वे न्याय दर्शन के विद्वान थे और परतःप्रामाण्य के सिद्धांत को मानते हैं।

निष्कर्ष:

कुमारिलभट्ट ने ज्ञान के प्रामाण्य को ज्ञातता के लक्षण से अनुमान द्वारा सिद्ध किया, जिसे ज्ञाततालिङ्गकानुमित्या प्रामाण्यम् कहा जाता है। अतः उत्तर 3) कुमारिलभट्टः पूर्णतः शास्त्रसम्मत है।

Question 6

अधोलिखितेषु ऊष्माणो न भवन्ति -

A. व

B. र

C. ह

D. भ

E. ष

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, C, D केवलम् 

  2. BOption (b)

    A, B, D केवलम्

  3. COption (c)

    A, D, E केवलम् 

  4. DOption (d)

    B, D, E केवलम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

A, B, D केवलम्

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प्रश्नार्थ- निम्नलिखित में से उष्म नही है-

उत्तर- A, B, D केवलम्

Important Pointsऊष्म ध्वनियाँ और उनका वर्गीकरण:

संस्कृत व्याकरण में ऊष्म ध्वनियाँ वे होती हैं जिनमें उच्चारण के समय वायु का अधिक प्रवाह होता है। ये ध्वनियाँ महाप्राण होती हैं और इनमें घर्षण अधिक होता है।

ऊष्म ध्वनियाँ:

ऊष्म ध्वनियों में निम्नलिखित वर्ण आते हैं:

श, ष, स, ह → ये सभी ऊष्म ध्वनियाँ हैं।

ऊष्माणो न भवन्ति:

अब दिए गए विकल्पों का विश्लेषण करें:

  • A (व) → यह अन्तःस्थ वर्ण है, ऊष्म नहीं।
  • B (र) → यह भी अन्तःस्थ वर्ण है, ऊष्म नहीं।
  • D (भ) → यह स्पर्श वर्ण है, ऊष्म नहीं।

अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • C (ह) → यह ऊष्म वर्ण है, अतः इसे नहीं चुना जाएगा।
  • E (ष) → यह भी ऊष्म वर्ण है, अतः इसे नहीं चुना जाएगा।

 

इस प्रकार, व, र, भ ऊष्म ध्वनियाँ नहीं हैं, और सही उत्तर A, B, D है।

Question 7

सत्कार्यवादसिद्धौ हेतुर्भवति -

  1. AOption (a)

    कारणाभावः

  2. BOption (b)

    उपादानाग्रहणम्

  3. COption (c)

    कारणभावः

  4. DOption (d)

    असत्करणग्रहणम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

कारणभावः

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प्रश्नार्थ- सत्कार्यवादसिद्ध का हेतू होता है-

उत्तर- कारणभावः

Important Pointsसत्कार्यवादसिद्धौ कारणभावः ही मुख्य हेतु होता है। सत्कार्यवाद के अनुसार, कार्य का अस्तित्व पहले से ही कारण में ��िहित होता है। यह सिद्धांत कहता है कि कार्य बिना कारण के उत्पन्न नहीं हो सकता, बल्कि वह कारण में पहले से ही विद्यमान रहता है।

सत्कार्यवाद का तात्पर्य:

  • सत्कार्यवाद यह मानता है कि कार्य का अस्तित्व पहले से ही कारण में होता है।
  • कार्य का प्रकट होना केवल कारण की अभिव्यक्ति है, न कि उसका नया निर्माण।
  • यह सिद्धांत विशेष रूप से सांख्य और वेदान्त दर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

कारणभावः का महत्व:

  • कारणभावः का अर्थ है कि कार्य का अस्तित्व कारण में पहले से ही निहित होता है।
  • यदि कार्य कारण में पहले से निहित न हो, तो उसका उत्पन्न होना असंभव होगा।
  • उदाहरण के लिए, मृत्तिका (मिट्टी) में घट (मटका) का अस्तित्व पहले से ही निहित होता है, और जब उसे आकार दिया जाता है, तो वह प्रकट होता है।

अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • कारणाभावः: यदि कारण का अभाव हो, तो कार्य उत्पन्न नहीं हो सकता। अतः यह विकल्प गलत है।
  • उपादानाग्रहणम्: केवल उपादान (सामग्री) का ग्रहण कार्य की सिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं होता।
  • असत्करणग्रहणम्: असत्करण का ग्रहण सत्कार्यवाद के सिद्धांत के विपरीत है, क्योंकि सत्कार्यवाद कार्य के पूर्व-अस्तित्व को स्वीकार करता है।

 

इस प्रकार, सत्कार्यवादसिद्धि में कारणभावः ही मुख्य कारण होता है, और यही सही उत्तर है।

Question 8

अन्नम्भट्टाभिमतहेत्वाभासभेदानां क्रमं चिनुत -

A. सत्प्रतिपक्षः

B. बाधितः

C. सव्यभिचारः

D. असिद्धः

E. विरुद्धः

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    C, B, D, A, E

  2. BOption (b)

    C, E, A, D, B

  3. COption (c)

    C, E, A, B, D

  4. DOption (d)

    D, B, C, A, E

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Correct answer

Answer: (b)B.

C, E, A, D, B

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- अन्नंभट मत से हेत्वाभास भेद का क्रम चुने-

उत्तर- C, E, A, D, B

Important Pointsहेत्वाभासभेदों का क्रम और उनका विश्लेषण:

अन्नम्भट्ट द्वारा प्रतिपादित हेत्वाभास (तर्क में दोष) के पाँच प्रमुख भेद होते हैं। इनका क्रम निम्नलिखित है:

  • C (सव्यभिचारः) → जब कोई कारण विभिन्न परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न परिणाम उत्पन्न करता है, तो उसे सव्यभिचार कहा जाता है। यह तर्क में अस्थिरता को दर्शाता है।
  • E (विरुद्धः) → जब कोई कारण अपने ही निष्कर्ष का खंडन करता है, तो उसे विरुद्ध कहा जाता है। यह तर्क में विरोधाभास उत्पन्न करता है।
  • A (सत्प्रतिपक्षः) → जब किसी तर्क के विरुद्ध एक समान रूप से मजबूत प्रतिपक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो उसे सत्प्रतिपक्ष कहा जाता है।
  • D (असिद्धः) → जब कोई कारण सिद्ध ही नहीं होता, अर्थात् उसका अस्तित्व प्रमाणित नहीं होता, तो उसे असिद्ध कहा जाता है।
  • B (बाधितः) → जब कोई कारण किसी अन्य प्रमाण द्वारा खंडित किया जाता है, तो उसे बाधित कहा जाता है।

अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • विकल्प 1 (C, B, D, A, E) → इसमें बाधित को सव्यभिचार के तुरंत बाद रखा गया है, जो सही क्रम नहीं है।
  • विकल्प 3 (C, E, A, B, D) → इसमें बाधित को असिद्ध से पहले रखा गया है, जो सही क्रम नहीं है।
  • विकल्प 4 (D, B, C, A, E) → इसमें असिद्ध को पहले रखा गया है, जबकि सव्यभिचार पहले आता है।

 

इस प्रकार, C, E, A, D, B का क्रम हेत्वाभासभेदों के सही क्रम को दर्शाता है।

Question 9

“यस्मात् पुरा ह्यभूच्चैतत् पुराणं तेन तत् स्मृतम्” इति कस्य पुराणस्य वचनम् ?

  1. AOption (a)

    वायुपुराणस्य

  2. BOption (b)

    ब्रह्माण्डपुराणस्य

  3. COption (c)

    ब्रह्मवैवर्तपुराणस्य

  4. DOption (d)

    ब्रह्मपुराणस्य

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Correct answer

Answer: (b)B.

ब्रह्माण्डपुराणस्य

Why this answer is correct

उत्तर- ब्रह्माण्डपुराणस्य

वाक्य:

“यस्मात् पुरा ह्यभूच्चैतत् पुराणं तेन तत् स्मृतम्”

इसका अर्थ है: “क्योंकि यह (ग्रंथ) पहले उत्पन्न हुआ था, इसलिए इसे ‘पुराण’ कहा गया।”

यह वचन ब्रह्माण्डपुराण में प्राप्त होता है।

  • इस श्लोक के माध्यम से पुराण शब्द की व्युत्पत्ति और उसकी प्राचीनता को स्पष्ट किया गया है।
  • “पुरा” (पूर्वकाल में) + “ण” प्रत्यय = पुराणम् — अर्थात् जो प्राचीनतम ज्ञान है।

ब्रह्माण्डपुराण का परिचय:

  • ब्रह्माण्डपुराण अष्टादश महापुराणों में से एक है।
  • इसमें सृष्टिक्रम, ब्रह्माण्ड की रचना, मन्वंतर, वंशावली, तीर्थ, योग, और देवीमाहात्म्य जैसे विषयों का विस्तृत वर्णन है।
  • यह पुराण ब्रह्मा द्वारा प्रतिपादित ज्ञान को व्यास द्वारा संकलित रूप में प्रस्तुत करता है।

इस वचन का महत्व:

  • यह श्लोक केवल नाम की व्युत्पत्ति नहीं बताता, बल्कि यह भी दर्शाता है कि पुराणों की उत्पत्ति वेदों के समकालीन या पूर्ववर्ती मानी जाती है।
  • यह दृष्टिकोण पुराणों की प्रामाणिकता और प्राचीनता को वैदिक साहित्य के समकक्ष स्थापित करता है।

Question 10

परस्परं समुचितं मेलयत-

A.बाह्यार्थानुमेयवादःI.आर्हतः
B.बाह्यार्थप्रत्यक्षवादःII.वैशेषिकः
C.अनेकान्तवादःIII.सौत्रान्तिकः
D.आरम्भवादःIV.वैभाषिकः
<br>

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - II, B - IV, C - III, D - I

  2. BOption (b)

    A - I, B - III, C - IV, D - II

  3. COption (c)

    A - III, B - I, C - II, D - IV

  4. DOption (d)

    A - III, B - IV, C - I, D - II

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Correct answer

Answer: (d)D.

A - III, B - IV, C - I, D - II

Why this answer is correct

उत्तर- A - III, B - IV, C - I, D - II

अब आइए प्रत्येक दर्शन और उसके सिद्धांत का समुचित मेल विस्तार से समझते हैं:

A. बाह्यार्थानुमेयवादः - III. सौत्रान्तिकः

सौत्रान्तिक बौद्ध मत के अनुसार बाह्य वस्तुएँ प्रत्यक्ष नहीं होतीं, बल्कि अनुमान से जानी जाती हैं। अतः वे बाह्यार्थानुमेयवादी कहलाते हैं।

B. बाह्यार्थप्रत्यक्षवादः - IV. वैभाषिकः

वैभाषिक बौद्ध मत के अनुसार बाह्य वस्तुएँ प्रत्यक्ष रूप से जानी जाती हैं, अर्थात् वे बाह्यार्थप्रत्यक्षवादी हैं। वे चित्त के बाहर वस्तुओं की स्वतंत्र सत्ता को स्वीकार करते हैं।

C. अनेकान्तवादः - I. आर्हतः

अनेकान्तवाद जैन दर्शन का मूल सिद्धांत है, और आर्हतः शब्द जैनाचार्यों के लिए प्रयुक्त होता है। यह सिद्धांत कहता है कि वस्तु अनेक दृष्टियों से जानी जा सकती है, अतः यह आर्हतः मत से मेल खाता है।

D. आरम्भवादः - II. वैशेषिकः

वैशेषिक दर्शन के अनुसार कार्य की उत्पत्ति हेतु कारण का आरम्भ आवश्यक है, जिसे आरम्भवाद कहा जाता है। यह सिद्धांत कहता है कि कार्य का आरम्भ कारण से होता है, न कि पूर्वसिद्ध सत्ता से।

इस प्रकार, विकल्प 4) A - III, B - IV, C - I, D - II ही पूर्णतः शास्त्रसम्मत और युक्तियुक्त उत्तर है।

Question 11

'विष्णुपदगिरिः' कस्याः नद्याः सन्निकटे विद्यते ?

  1. AOption (a)

    मन्दाकिन्याः

  2. BOption (b)

    यमुनायाः

  3. COption (c)

    विपाशायाः

  4. DOption (d)

    कावेर्य्याः

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Correct answer

Answer: (c)C.

विपाशायाः

Why this answer is correct

उत्तर- विपाशायाः

विष्णुपदगिरिः एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है, जो विपाशा नदी (वर्तमान में ब्यास नदी) के निकट स्थित है।

  • विष्णुपदगिरिः का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व:
  • यह स्थान हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है और विष्णु भगवान से जुड़ा हुआ है।
  • किंवदंतियों के अनुसार, भगवान विष्णु ने इस स्थान पर अपने चरण चिह्न छोड़े थे, जिससे इसे "विष्णुपदगिरिः" नाम प्राप्त हुआ।
  • विपाशा नदी के तट पर स्थित होने के कारण यह क्षेत्र धार्मिक अनुष्ठानों और तीर्थयात्राओं के लिए प्रसिद्ध है।

विपाशा नदी का उल्लेख:

  • विपाशा नदी, जिसे आज ब्यास नदी के नाम से जाना जाता है, भारत के हिमाचल प्रदेश और पंजाब राज्यों में प्रवाहित होती है।
  • यह नदी ऋग्वेद और अन्य प्राचीन ग्रंथों में भी वर्णित है, जहाँ इसे पवित्र और जीवनदायिनी नदी के रूप में दर्शाया गया है।

निष्कर्ष:

विष्णुपदगिरिः का विपाशा नदी के निकट स्थित होना इसे धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है। यह स्थल श्रद्धालुओं के लिए एक प्रमुख तीर्थ स्थान है, जहाँ वे भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करते हैं

Question 12

सांख्याभिमतविपर्ययभेदानां क्रमं चिनुत-

A. महामोहः

B. अन्धतामिस्रम् 

C. तामिस्रम्

D. तमः

E. मोहः

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    C, B, E, A, D

  2. BOption (b)

    B, D, C, E, A

  3. COption (c)

    D, E, A, C, B

  4. DOption (d)

    D, B, C, A, E

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Correct answer

Answer: (c)C.

D, E, A, C, B

Why this answer is correct

उत्तर- D, E, A, C, B

 यह सांख्य दर्शन में वर्णित विपर्यय (अज्ञान) के पाँच भेदों का क्रम है, जो तमोगुण की विभिन्न अवस्थाओं को दर्शाते हैं। आइए प्रत्येक को क्रमशः समझते हैं:

1. तमः (D)

  • यह मूलतम अज्ञान है — जहाँ न कोई विवेक है, न ही किसी वस्तु का स्पष्ट ज्ञान।
  • यह अंधकार की स्थिति है, जिसमें चेतना सुप्तावस्था में होती है।

2. मोहः (E)

  • जब तमः थोड़ा विकसित होता है, तब मोह उत्पन्न होता है — अर्थात् वस्तु का स्वरूप विकृत रूप में जाना जाता है।
  • यह भ्रम की अवस्था है, जहाँ सत्य और असत्य में भेद नहीं हो पाता।

3. महामोहः (A)

  • यह गहन मोह की अवस्था है, जहाँ व्यक्ति अपने अज्ञान को ही ज्ञान मानने लगता है।
  • यह आत्मवंचना की स्थिति है, जिसमें विवेक का पूर्ण अभाव होता है।

4. तामिस्रम् (C)

  • जब व्यक्ति को यह अनुभव होता है कि वह सुख से वंचित है, और इसका कारण दूसरों को मानता है, तब तामिस्र उत्पन्न होता है।
  • यह ईर्ष्या और द्वेष की अवस्था है।

5. अन्धतामिस्रम् (B)

  • यह विपर्यय की चरम अवस्था है, जहाँ व्यक्ति को मृत्यु का भय सताता है।
  • यह अत्यंत अंधकारपूर्ण मानसिक स्थिति है, जिसमें आत्मा स्वयं को शरीर मानकर भयभीत होती है।

क्रम का सारांश:

क्रमविपर्यय भेदविशेषता
1तमःमूल अज्ञान
2मोहःभ्रम
3महामोहःगहन भ्रम, आत्मवंचना
4तामिस्रम्ईर्ष्या, द्वेष
5अन्धतामिस्रम्मृत्यु का भय, अंधकार की चरम अवस्था

 

यह पाँचों अवस्थाएँ तमोगुण की विभिन्न गहराइयों को दर्शाती हैं और सांख्य दर्शन में बंधन के कारणों को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

Question 13

‘परेर्मृषः' इति सूत्रे कस्य गणस्य मृषधातोः ग्रहणम् ?

  1. AOption (a)

    दिवादिगणस्य

  2. BOption (b)

    भ्वादिगणरय

  3. COption (c)

    चुरादिगणस्य

  4. DOption (d)

    तनादिगणस्य

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Correct answer

Answer: (a)A.

दिवादिगणस्य

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- ‘परेर्मृषः' इस सूत्र में मृष धातु का ग्रहण किस गण में किया जाता है?

उत्तर- दिवादिगणस्य

Important Points

  • ‘परेर्मृषः' (1.3.82) सूत्र में मृष धातु का ग्रहण दिवादिगण में किया जाता है।
  • दिवादिगण के धातुओं में श्यन् विकरण प्रत्यय लगाया जाता है, जिससे धातु का रूप परिवर्तित होता है।
  • इस सूत्र में मृष धातु का प्रयोग तितिक्षा (सहन करने) के अर्थ में होता है। जब परि उपसर्ग के साथ मृष धातु का प्रयोग होता है, तब यह परस्मैपदी रूप में आता है, जैसे— परिमृष्यति (वह सहन करता है)।
  • दिवादिगण के धातुओं में कर्तरि शप् (3.1.68) के स्थान पर श्यन् (3.1.69) प्रत्यय लगाया जाता है, जिससे धातु का रूप विशेष प्रकार से परिवर्तित होता है। यह नियम कर्तरि शप् का अपवाद है, क्योंकि दिवादिगण के धातुओं में श्यन् प्रत्यय अनिवार्य रूप से लगता है।

 

इस प्रकार, ‘परेर्मृषः' सूत्र में मृष धातु का ग्रहण दिवादिगण में किया जाता है, और इसका प्रयोग परिमृष्यति जैसे रूपों में होता है।

Question 14

क्रोधात् जायमानानां व्यसनानामयं क्रमः मनुना सूचितः -

A. द्रोहः

B. असूया

<br>

C. साहसम्

D. ईर्ष्या

E. अर्थदूषणम्

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    C, A, D, B, E

  2. BOption (b)

    C, B, D, A, E

  3. COption (c)

    E, B, D, C, A

  4. DOption (d)

    A, C,E, B, D

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Correct answer

Answer: (a)A.

C, A, D, B, E

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- मनु द्वारा क्रोध से उत्पन्न होने वाले व्यसनों का योग्य क्रम चुने-

उत्तर- C, A, D, B, E

मनु द्वारा क्रोध से उत्पन्न होने वाले व्यसनों का क्रम C, A, D, B, E (साहस, द्रोह, ईर्ष्या, असूया, अर्थदूषण) बताया गया है। इस क्रम का विस्तृत विवेचन इस प्रकार है:

साहसम् (C)

  • क्रोध से सबसे पहले साहस उत्पन्न होता है, जिसका अर्थ है बिना सोचे-समझे जोखिम उठाना।
  • यह व्यक्ति को आवेग में गलत निर्णय लेने के लिए प्रेरित करता है।

द्रोहः (A)

  • साहस के बाद द्रोह उत्पन्न होता है, जो विद्रोह और प्रतिशोध की भावना को दर्शाता है।
  • यह व्यक्ति को दूसरों के प्रति शत्रुता रखने और हानि पहुँचाने की प्रवृत्ति विकसित करता है।

ईर्ष्या (D)

  • द्रोह के बाद ईर्ष्या उत्पन्न होती है, जिसमें व्यक्ति दूसरों की सफलता से जलता है।
  • यह नकारात्मक भावनाओं को बढ़ावा देता है और मानसिक अशांति का कारण बनता है।

असूया (B)

  • ईर्ष्या के बाद असूया आती है, जो दूसरों की अच्छाइयों को स्वीकार न करने की प्रवृत्ति है।
  • यह व्यक्ति को दूसरों की उपलब्धियों को कमतर आंकने और उन्हें नीचा दिखाने के लिए प्रेरित करता है।

अर्थदूषणम् (E)

  • अंत में अर्थदूषण होता है, जिसमें व्यक्ति अपने क्रोध और नकारात्मक भावनाओं के कारण धन और संसाधनों का गलत उपयोग करता है।
  • यह आर्थिक और सामाजिक पतन का कारण बन सकता है।

 

इस प्रकार, मनु ने क्रोध से उत्पन्न होने वाले व्यसनों का क्रमिक प्रभाव बताया है, जो व्यक्ति को मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से हानि पहुँचा सकता है।

Question 15

यदा सामन्तादीनां लिङ्गादीनां च वृक्षादीनामभावः तदा विवादितभूमेः सीमानिर्धारणे कः प्रवर्तकः भवति ?

  1. AOption (a)

    प्राचीनाभिलेखादिः 

  2. BOption (b)

    मन्त्रिपरिषत्

  3. COption (c)

    भूमेः स्वामिनी

  4. DOption (d)

    राजा स्वयम्

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Correct answer

Answer: (d)D.

राजा स्वयम्

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प्रश्नार्थ- विवादित भूमि के सीमांकन का प्रवर्तक कौन होता था?

उत्तर-राजा स्वयम्

विवादित भूमि के सीमानिर्धारण में राजा की भूमिका:

प्राचीन भारतीय शासन व्यवस्था में राजा को सर्वोच्च न्यायिक और प्रशासनिक अधिकार प्राप्त था। जब किसी भूमि की सीमा विवादित होती थी और सामन्त, लिङ्ग (चिह्न), वृक्ष आदि के आधार पर सीमांकन संभव नहीं होता था, तब राजा स्वयं इस विवाद को सुलझाने के लिए प्रवर्तक (निर्णायक) बनता था।

राजा द्वारा सीमानिर्धारण के कारण:

  • सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकार → राजा राज्य की भूमि का संरक्षक होता था और उसकी सीमा निर्धारण का अंतिम अधिकार राजा के पास होता था।
  • न्यायिक निर्णय → यदि भूमि विवाद उत्पन्न होता था, तो राजा स्वयं या उसके प्रतिनिधि न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से सीमा निर्धारित करते थे।
  • स्थानीय साक्ष्यों का अभाव → जब पुराने अभिलेख, वृक्ष, लिङ्ग या अन्य चिह्न उपलब्ध नहीं होते थे, तब राजा अपने प्रशासनिक अधिकारियों के माध्यम से भूमि का सीमांकन करता था।
  • राज्य की स्थिरता → भूमि विवादों को सुलझाने से राज्य में शांति और स्थिरता बनी रहती थी, जिससे कृषि और व्यापार प्रभावित नहीं होते थे।

अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • प्राचीन अभिलेख (1) → यदि अभिलेख उपलब्ध होते, तो उनका उपयोग किया जाता, लेकिन जब वे अनुपलब्ध होते हैं, तब राजा स्वयं निर्णय करता है।
  • मन्त्रिपरिषद (2) → मन्त्रिपरिषद राजा को सलाह देती थी, लेकिन अंतिम निर्णय राजा स्वयं करता था।
  • भूमि की स्वामिनी (3) → भूमि की स्वामिनी का अधिकार सीमांकन पर नहीं होता था, बल्कि वह राजा के निर्णय का पालन करती थी।
<br>

इस प्रकार, राजा स्वयं विवादित भूमि के सीमांकन का प्रवर्तक होता था।

Question 16

परस्परं समुचितं मेलयत-

A.तनुयाताम्I.लुट्
B.तनितास्थII.लोट्
C.तनुताम्III.आशीर्लिङ्
D.तन्यास्ताम्IV.विधिलिङ्
<br>

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - IV, B - II, C - I, D - III

  2. BOption (b)

    A - III, B - I, C - II, D - IV

  3. COption (c)

    A - III, B - II, C - I, D - IV

  4. DOption (d)

    A - IV, B - I, C - II, D - III

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Correct answer

Answer: (d)D.

A - IV, B - I, C - II, D - III

Why this answer is correct

उत्तर- 4) A - IV, B - I, C - II, D - III

यह प्रश्न "तन्" धातु (अर्थ: फैलाना, विस्तारण करना) के विभिन्न लकाररूपों से संबंधित है। आइए प्रत्येक रूप और उसके लकार का समुचित मेल विस्तार से समझते हैं:

A. तनुयाताम् - IV. विधिलिङ्

यह रूप विधिलिङ् लकार का द्विवचन, प्रथम पुरुष रूप है।

प्रयोग: "वे फैलाएँ (चाहिए)" - संभावना, आदेश या इच्छा के अर्थ में।

B. तनितास्थ - I. लुट्

  • यह रूप लुट् लकार का द्विवचन, मध्यम पुरुष रूप है।
  • प्रयोग: "तुम दोनों फैलाओगे" - अनद्यतन भविष्यकाल में।

 

C. तनुताम् - II. लोट्

  • यह लोट् लकार का एकवचन, प्रथम पुरुष रूप है (आत्मनेपद)।
  • प्रयोग: "मैं फैलाऊँ (आज्ञा या प्रार्थना)"

 

D. तन्यास्ताम् - III. आशीर्लिङ्

  • यह आशीर्लिङ् लकार का द्विवचन, प्रथम पुरुष रूप है।
  • प्रयोग: "वे फैलाएँ - ऐसा शुभ हो!"

Question 17

”कस्मै देवाय हविषा विधेम" इति मकुटपादः कस्मिन् सूक्ते प्राप्यते?

  1. AOption (a)

    वरुणसूक्ते

  2. BOption (b)

    विष्णुसूक्ते 

  3. COption (c)

    पुरुषसूक्ते 

  4. DOption (d)

    हिरण्यगर्भसूक्ते

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Correct answer

Answer: (d)D.

हिरण्यगर्भसूक्ते

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उत्तर- हिरण्यगर्भसूक्ते

"कस्मै देवाय हविषा विधेम" यह प्रसिद्ध वाक्य हिरण्यगर्भसूक्ते में पाया जाता है, जो ऋग्वेद के दशम मंडल के 121वें सूक्त में स्थित है.

हिरण्यगर्भसूक्त का महत्व:

  • हिरण्यगर्भसूक्त सृष्टि के प्रारंभिक स्वरूप और ब्रह्मांड के निर्माण से संबंधित है।
  • इसमें हिरण्यगर्भ (स्वर्ण अंड) को सृष्टि के मूल कारण के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
  • यह सूक्त परमात्मा की सर्वोच्च सत्ता और उसकी व्यापकता को दर्शाता है।

"कस्मै देवाय हविषा विधेम" का अर्थ:

  • इस वाक्य का अर्थ है— हम किस देवता को हवि (यज्ञ सामग्री) अर्पित करें? यह प्रश्न ब्रह्मांड के मूल कारण और परम सत्ता की खोज को दर्शाता है।
  • इस सूक्त में परमात्मा को सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी और सृष्टि का आधार बताया गया है।

सूक्त के कुछ प्रमुख श्लोक:

  • हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे— सृष्टि के प्रारंभ में हिरण्यगर्भ ही विद्यमान था।
  • य आत्मदा ब���दा यस्य विश्व उपासते— जो आत्मा और बल प्रदान करता है, जिसकी उपासना समस्त विश्व करता है।
  • य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः— जो समस्त द्विपद (मनुष्य) और चतुष्पद (पशु) प्राणियों का स्वामी है।

निष्कर्ष:

हिरण्यगर्भसूक्त में परमात्मा की सर्वोच्च सत्ता को स्वीकार करते हुए यह प्रश्न उठाया गया है कि हम किस देवता की उपासना करें? यह सूक्त वेदों में सृष्टि के रहस्य और ब्रह्मांड की उत्पत्ति को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

Question 18

अधोलिखितेषु पौर्णमाससंज्ञकाः यागाः भवन्ति -

A. अग्निषोमीयः 

B. उपांशुयाजः

C. वाजपेयः

D. ऐन्द्रः

<br>

E. आग्नेयः

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, D केवलम्

  2. BOption (b)

    A, C, D केवलम्

  3. COption (c)

    A, D, E केवलम्

  4. DOption (d)

    A, B, E केवलम्

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Correct answer

Answer: (d)D.

A, B, E केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर- A, B, E केवलम्

पौर्णमाससंज्ञक याग क्या होते हैं?

पौर्णमाससंज्ञक याग वे यज्ञ हैं जो पूर्णिमा (पौर्णमासी) के अवसर पर किए जाते हैं और जिनका विधान श्रुति (वेद) में प्रतिपादित है। ये यज्ञ श्रौतयाग की श्रेणी में आते हैं और विशेष रूप से दर्शपौर्णमास यज्ञ के अंतर्गत विभिन्न देवताओं को समर्पित होते हैं।

A. अग्निषोमीयः

  • यह दर्शपौर्णमास यज्ञ का एक प्रमुख अंग है।
  • इसमें अग्नि और सोम देवताओं को आहुति दी जाती है।
  • यह यज्ञ पूर्णिमा और अमावस्या दोनों अवसरों पर किया जाता है।

B. उपांशुयाजः

  • यह भी पौर्णमासेष्टि का एक अंग है।
  • इसमें उपांशु विधि से आहुति दी जाती है, अर्थात् मंत्र का उच्चारण धीमे स्वर में किया जाता है।
  • यह यज्ञ पूर्णिमा के अवसर पर किया जाता है।

E. आग्नेयः

  • यह अग्नि देवता को समर्पित यज्ञ है और पौर्णमासेष्टि में इसका विधान है।
  • यह यज्ञ पूर्णिमा के दिन किया जाता है।

Additional Information 

 C. वाजपेयः

  • यह काम्य यज्ञ है, जो राजसूय की भाँति विशेष अवसरों पर किया जाता है।
  • यह पौर्णमाससंज्ञक नहीं है, बल्कि एक स्वतंत्र सोमयाग है।

D. ऐन्द्रः

  • यह इन्द्र देवता को समर्पित यज्ञ है, परंतु यह पौर्णमाससंज्ञक नहीं है।
  • यह काम्य अथवा नैमित्तिक यज्ञों की श्रेणी में आता है।

Question 19

अष्टाध्यायीक्रमेण सूत्राणि व्यवस्थापयत -

A. भृशादिभ्यो भुव्यच्वेर्लोपश्च

B. काम्यच्च

C. सुपः आत्मनः क्यच् 

D. उपमानादाचारे

E. कर्तुः क्यङ् स लोपश्च

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    B, C, A, D, E

  2. BOption (b)

    C, D, B, E, A

  3. COption (c)

    C, B, D, E, A

  4. DOption (d)

    C, A, E, B, D

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Correct answer

Answer: (c)C.

C, B, D, E, A

Why this answer is correct

उत्तर- C, B, D, E, A

अष्टाध्यायी में सूत्रों का क्रम अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह संस्कृत व्याकरण के नियमों को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करता है।

विस्तृत व्याख्या:

सुपः आत्मनः क्यच् (C) – यह सूत्र सुप् प्रत्यय से संबंधित है, जो संज्ञाओं की विभक्तियों को निर्धारित करता है।

काम्यच्च (B) – यह सूत्र तद्धित प्रत्ययों से संबंधित है, जो संज्ञाओं से विशेषण बनाने के लिए प्रयुक्त होता है।

उपमानादाचारे (D) – यह सूत्र उपमान और आचार से संबंधित है, जो विशेष अर्थों में प्रयुक्त होता है।

कर्तुः क्यङ् स लोपश्च (E) – यह सूत्र कर्तृ कारक से संबंधित है, जो क्रिया के कर्ता को दर्शाने के लिए प्रयुक्त होता है।

भृशादिभ्यो भुव्यच्वेर्लोपश्च (A) – यह सूत्र भृशादि शब्दों से संबंधित है, जो विशेष संज्ञाओं में प्रयुक्त होता है।

<br>

अष्टाध्यायी में सूत्रों का क्रम इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है कि वे व्याकरण के नियमों को तार्किक रूप से प्रस्तुत करें।

Question 20

अधोलिखितेषु मुखसन्धौ नान्तर्भवन्ति -

A. उपक्षेपः

B. विलोभनम्

C. विलासः

D. विधूतम्

E. वज्रम्

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, D केवलम्

  2. BOption (b)

    C, D, E केवलम्

  3. COption (c)

    B, C, E केवलम्

  4. DOption (d)

    A, D, E केवलम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

C, D, E केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- मुखसन्धि में न आने वाले तत्व कौनसे है?

उत्तर- C, D, E केवलम्

मुखसन्धि और उसका विश्लेषण:

संस्कृत नाट्यशास्त्र में मुखसन्धि (नाटक की प्रारंभिक अवस्था) का विशेष महत्व होता है। यह नाटक के आरंभिक भाग में कथा के बीज को स्थापित करता है और आगे की घटनाओं की भूमिका तैयार करता है।

मुखसन्धि में सम्मिलित तत्व:

मुखसन्धि में निम्नलिखित तत्वों का समावेश होता है:

  • उपक्षेपः → कथा का आरंभिक संकेत।
  • विलोभनम् → दर्शकों को आकर्षित करने वाली घटनाएँ।
  • बीजम् → कथा का मूल तत्त्व।
  • प्रयोजनम् → नाटक का उद्देश्य।

Important Pointsमुखसन्धि में न आने वाले तत्व:

  • C (विलासः) → विलास का अर्थ आनंद और विलासिता से है, जो मुखसन्धि का भाग नहीं होता।
  • D (विधूतम्) → विधूत का अर्थ नष्ट या समाप्त होने से है, जो नाटक के आरंभिक भाग में नहीं आता।
  • E (वज्रम्) → वज्र का अर्थ दृढ़ता या कठोरता से है, जो मुखसन्धि के लक्षणों में नहीं आता।
<br>

इस प्रकार, C, D, E ही सही उत्तर हैं।

Question 21

आरोहक्रमेण मण्डलेषु सूक्तानि भवन्ति -

A. वरुणसूक्तम्

B. पर्जन्यसूक्तम्

C. इन्द्रसूक्तम्

D. उषस्- सूक्तम्

E. नासदीय सूक्तम्

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, D, C, E

  2. BOption (b)

    B, C, D, A, E

  3. COption (c)

    A, C, D, B, E

  4. DOption (d)

    A, D, C, E, B

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Correct answer

Answer: (c)C.

A, C, D, B, E

Why this answer is correct

उत्तर- A, C, D, B, E

यह प्रश्न ऋग्वेद के विभिन्न सूक्तों के मण्डलानुसार आरोहक्रम (ascending order of Mandalas) में क्रमबद्धता से संबंधित है। आइए प्रत्येक सूक्त के मण्डल और क्रम को स्पष्ट करें:

A. वरुणसूक्तम् - ऋग्वेद मण्डल 1

वरुण देवता को समर्पित अनेक सूक्त ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में मिलते हैं। वे ऋत और सत्य के रक्षक माने जाते हैं।

C. इन्द्रसूक्तम् - ऋग्वेद मण्डल 2

इन्द्र देवता ऋग्वेद के सबसे अधिक स्तुत देवता हैं। उनका प्रमुख सूक्त मण्डल 2 में आता है (जैसे 2.12 सूक्त)।

D. उषस् सूक्तम् - ऋग्वेद मण्डल 3

उषस् (प्रभात की देवी) को समर्पित सूक्त ऋग्वेद के तृतीय मण्डल में उपलब्ध हैं, जैसे 3.61।

B. पर्जन्यसूक्तम् - ऋग्वेद मण्डल 5

पर्जन्य देवता (वर्षा के देव) को समर्पित सूक्त पंचम मण्डल में स्थित हैं।

E. नासदीय सूक्तम् - ऋग्वेद मण्डल 10

यह सूक्त ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति पर आधारित है और ऋग्वेद के दशम मण्डल के 129वें सूक्त में स्थित है।

Question 22

'प्रत्यक्षपरोक्षानुमेया हि राजवृत्तिः" इति कस्य वचनम् ?

  1. AOption (a)

    भारद्वाजस्य

  2. BOption (b)

    विशालाक्षस्य

  3. COption (c)

    पाराशराणाम्

  4. DOption (d)

    बार्हस्पत्यानाम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

विशालाक्षस्य

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- 'प्रत्यक्षपरोक्षानुमेया हि राजवृत्तिः' यह किसका वचन है?

उत्तर- विशालाक्षस्य

"प्रत्यक्षपरोक्षानुमेया हि राजवृत्तिः" यह कथन विशालाक्ष का है।

विस्तृत स्पष्टीकरण:

यह कथन राजनीति और प्रशासन के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जिसमें यह बताया गया है कि राज्य की नीतियाँ प्रत्यक्ष, परोक्ष और अनुमान के आधार पर निर्धारित होती हैं।

  • प्रत्यक्ष – जो स्पष्ट रूप से देखा और अनुभव किया जा सकता है।
  • परोक्ष – जो अप्रत्यक्ष रूप से ज्ञात होता है, जैसे गुप्तचरों द्वारा प्राप्त जानकारी।
  • अनुमेय – जो तर्क और विश्लेषण के आधार पर अनुमानित किया जाता है।

 

यह विचार राजनीतिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को दर्शाता है, जिसमें राजा या शासक को विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी का उपयोग करके शासन करना चाहिए

Question 23

रुद्रदाम्नः गिरनाराभिलेखे आहत्य कति वाक्यानि सन्ति ?

  1. AOption (a)

    विंशतिः

  2. BOption (b)

    अष्टौ

  3. COption (c)

    षट्

  4. DOption (d)

    द्वादश

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Correct answer

Answer: (d)D.

द्वादश

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- रुद्रदामन के गिरनार शिलालेख में कितने वाक्य हैं?

उत्तर- द्वादश

Important Pointsरुद्रदामन का गिरनार अभिलेख भारत के सबसे प्राचीन संस्कृत शिलालेखों में से एक है, जिसे शक संवत् ७२ (ई. १५०) में खुदवाया गया था। यह अभिलेख गुजरात राज्य के जूनागढ़ ज़िले के पास स्थित गिरनार पर्वत पर उत्कीर्ण है।

  • शिलालेख में कुल मिलाकर १२ स्पष्ट अर्थपूर्ण वाक्य (sentences) पाए जाते हैं।
  • ये वाक्य राजा रुद्रदामन की वंशावली, उसकी विजयों, प्रशासनिक उपलब्धियों और विशेष रूप से सुदर्शन झील के पुनर्निर्माण से जुड़े विवरणों को प्रस्तुत करते हैं।
  • यह अभिलेख संस्कृत गद्य का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, और यह दर्शाता है कि संस्कृत उस समय केवल धार्मिक भाषा नहीं थी, बल्कि शासन और प्रशासन की भी भाषा थी।
  • १२ वाक्यों में से प्रत्येक एक स्वायत्त विचार या कथन को दर्शाता है — इसलिए इन्हें स्वतंत्र वाक्य माना गया है।

 

यह अभिलेख भाषा, साहित्य और इतिहास तीनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

Question 24

नृपगुणैः अघृष्यः अभिगम्यश्च दिलीपः केन उपमितः ?

  1. AOption (a)

    समुद्रे

  2. BOption (b)

    पर्वतेन

  3. COption (c)

    महाद्रुमेण

  4. DOption (d)

    महाकाशेन

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Correct answer

Answer: (a)A.

समुद्रे

Why this answer is correct

उत्तर- समुद्रे

राजा दिलीप को उनके नृपगुणों के कारण समुद्र से उपमित किया गया है। यह उपमा कालिदास के प्रसिद्ध महाकाव्य रघुवंशम् में दी गई है।

विस्तृत व्याख्या:

  • रघुवंशम् के प्रथम सर्ग के 16वें श्लोक में कहा गया है कि राजा दिलीप अपने गुणों के कारण अधृष्य (जिसे आसानी से पराजित नहीं किया जा सकता) और अभिगम्य (जिसे लोग सहजता से प्राप्त कर सकते हैं) थे।
  • इस संदर्भ में, उन्हें समुद्र से तुलना की गई है, क्योंकि समुद्र में यादोरत्न (जलचर जीव और बहुमूल्य रत्न) होते हैं।
  • समुद्र की तरह ही, राजा दिलीप भी सामान्य जनों के लिए सुलभ थे, लेकिन शत्रुओं के लिए दुर्गम थे।

श्लोक का अर्थ:

भीमकान्तैर्नृपगुणैः स बभूवोपजीविनाम्।

अधृष्यश्चाभिगम्यश्च यादोरत्नैरिवार्णवः॥

इसका अर्थ है-

जैसे समुद्र में रत्नों के कारण लोग उसे प्राप्त करना चाहते हैं, लेकिन उसकी गहराई और भयावह जलचर जीवों के कारण वह दुर्गम भी होता है, उसी प्रकार राजा दिलीप भी अपने गुणों के कारण प्रजा के लिए सुलभ थे, लेकिन शत्रुओं के लिए अजेय थे।

निष्कर्ष:

कालिदास ने राजा दिलीप की गंभीरता, उदारता, और शक्ति को दर्शाने के लिए उन्हें समुद्र से उपमित किया है। यह उपमा उनकी राजनीतिक कुशलता और प्रजापालक स्वभाव को दर्शाती है।

Question 25

समुचितं मेलयत -

A.ज्ञानविज्ञानयोगःI.चतुर्थाध्यायः
B.ज्ञानकर्मसन्यासयोगःII.त्रयोदशाध्यायः
C.अक्षरब्रह्मयोगःIII.सप्तमाध्यायः
D.क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोगःIV.अष्टमाध्यायः
<br>

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - II, B - III, C - I, D - IV

  2. BOption (b)

    A - III, B - I, C - IV, D - II

  3. COption (c)

    A - III, B - IV, C - I, D - II

  4. DOption (d)

    A - IV, B - II, C - III, D - I

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Correct answer

Answer: (b)B.

A - III, B - I, C - IV, D - II

Why this answer is correct

उत्तर- A - III, B - I, C - IV, D - II

यह प्रश्न भगवद्गीता के विभिन्न अध्यायों और उनके शीर्षकों के सही मेल से संबंधित है।

A. ज्ञानविज्ञानयोगः — सप्तमाध्यायः (III)

यह गीता का सातवाँ अध्याय है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ज्ञान (सैद्धांतिक बोध) और विज्ञान (अनुभवजन्य बोध) के माध्यम से परमात्मा की व्यापकता को समझाते हैं।

B. ज्ञानकर्मसन्यासयोगः — चतुर्थाध्यायः (I)

यह गीता का चौथा अध्याय है। इसमें श्रीकृष्ण कर्म और ज्ञान के समन्वय से कर्मसन्यास की व्याख्या करते हैं — अर्थात् कर्म करते हुए भी फल की आसक्ति से रहित रहना।

C. अक्षरब्रह्मयोगः — अष्टमाध्यायः (IV)

यह आठवाँ अध्याय है। इसमें अक्षर ब्रह्म (अविनाशी परम तत्व) की उपासना, मृत्यु के समय स्मरण, और मोक्ष की प्राप्ति पर चर्चा की गई है।

D. क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोगः — त्रयोदशाध्यायः (II)

यह तेरहवाँ अध्याय है। इसमें क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के भेद को स्पष्ट किया गया है — यह अध्याय आत्मा और प्रकृति के संबंध को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण है

<br>

इस प्रकार विकल्प 2) A - III, B - I, C - IV, D - II ही पूर्णतः शुद्ध और शास्त्रसम्मत उत्तर है।

Question 26

अधोलिखितेषु वेदपुरुषस्य मुख- श्रोत्र - पाद- हस्त - चक्षुः - स्थानानि भवन्ति क्रमशः -

A. ज्योतिषम्

B. छन्दः

C. निरुक्तम्

D. कल्पः

E. व्याकरणम्

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, D, C, E

  2. BOption (b)

    E, C, B, D, A

  3. COption (c)

    E, C, D, B, A

  4. DOption (d)

    E, C, B, A, D

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Correct answer

Answer: (b)B.

E, C, B, D, A

Why this answer is correct

उत्तर- E, C, B, D, A

Important Pointsयह प्रश्न वेदाङ्गों के प्रतीकात्मक स्थानों को “वेदपुरुष” के अंगों के रूप में जानने से संबंधित है।

वेदपुरुष एक वैदिक अवधारणा है जिसमें वेद को मानवी रूप में रूपायित कर उसके अंगों से संबंधित वेदाङ्गों की व्याख्या की जाती है।

प्रश्न में पाँच वेदाङ्गों के पाँच अंगों से संबंध पूछा गया है- मुख, श्रोत्र (कान), पाद (पैर), हस्त (हाथ), चक्षुः (नेत्र)।

अर्थात्:

  • व्याकरणम्- मुख
  • निरुक्तम्- श्रोत्र
  • छन्दः- पाद
  • कल्पः- हस्त
  • ज्योतिषम्- चक्षुः

अब इसका विस्तार समझते हैं:

  • व्याकरण (मुख) — यह भाषा की शुद्धता, सही उच्चारण, और स्पष्टता सुनिश्चित करता है, जैसे मुख से वाणी निकलती है, वैसे ही वेद की वाणी व्याकरण से प्रकट होती है।
  • निरुक्त (श्रोत्र) — यह शब्दों के अर्थों की व्याख्या करता है। कान सुनते हैं, परंतु निरुक्त शब्दों के सुनने के पीछे के अर्थों को समझने की प्रक्रिया है।
  • छन्दः (पाद) — यह वेदों की रचना की छंदबद्धता से संबंधित है। जैसे पाँव गति का आधार होते हैं, वैसे ही छन्द वेदवाणी की गति और लय को निर्धारण करते हैं।
  • कल्प (हस्त) — यह यज्ञ और कर्मकाण्ड की विधियों से संबंध रखता है, जिनका क्रियान्वयन हाथों से होता है। अतः इसे हस्त से जोड़ा गया है।
  • ज्योतिष (चक्षुः) — यह यज्ञों के शुभ समय, मुहूर्त और ग्रह-नक्षत्रों के ज्ञान का विषय है। जैसे नेत्र मार्गदर्शक होते हैं, वैसे ही ज्योतिष यज्ञों का मार्गदर्शन करता है।

यह प्रतीकात्मक व्याख्या वेदों की संरचना और वैदिक विधियों की वैज्ञानिकता और सांस्कृतिक गहराई को उजागर करती है।

Question 27

स्वधाकारपूर्वकम् अन्नं प्रदीयते-

  1. AOption (a)

    देवेभ्यः

  2. BOption (b)

    पितृभ्यः

  3. COption (c)

    अतिथिभ्यः

  4. DOption (d)

    गुरुभ्यः

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Correct answer

Answer: (b)B.

पितृभ्यः

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- स्वधाकारपूर्वक अन्नदान किया जाता है-

उत्तर- पितृभ्यः

Important Pointsस्वधाकारपूर्वकम् अन्नं पितृभ्यः प्रदीयते:

स्वधाकारपूर्वक अन्नदान का विशेष महत्व है, और यह पितृश्राद्ध के संदर्भ में किया जाता है। हिंदू धर्म में पितरों के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने के लिए श्राद्ध किया जाता है, जिसमें अन्न का दान प्रमुख होता है।

पितृ अन्नदान का महत्व:

  • महाभारत और अनुशासनपर्व में उल्लेख है कि पितरों को अन्नदान करने से वे तृप्त होते हैं और आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
  • श्राद्धकर्म में तिल, जल, दूध, घी और अन्न का विशेष रूप से दान किया जाता है, जिससे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है।
  • पितृयज्ञ में अन्नदान को सर्वोत्तम दान माना गया है, क्योंकि इससे पितरों की कृपा प्राप्त होती है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है।

अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • देवेभ्यः: देवताओं को अन्नदान यज्ञों में किया जाता है, लेकिन स्वधाकारपूर्वक अन्नदान विशेष रूप से पितृभ्यः किया जाता है।
  • अतिथिभ्यः: अतिथियों को अन्नदान सत्कार के रूप में किया जाता है, लेकिन यह स्वधाकारपूर्वक नहीं होता।
  • गुरुभ्यः: गुरु को अन्नदान सम्मानस्वरूप किया जाता है, लेकिन यह पितृश्राद्ध से संबंधित नहीं है।

 

इस प्रकार, स्वधाकारपूर्वकम् अन्नं पितृभ्यः प्रदीयते।

Question 28

विरेचनसिद्धान्तो भवति

  1. AOption (a)

    अरस्तूवर्यस्य 

  2. BOption (b)

    लॉन्जाइनसवर्यस्य

  3. COption (c)

    क्रोचेवर्यस्य

  4. DOption (d)

    प्लेटोमहोदयस्य

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Correct answer

Answer: (a)A.

अरस्तूवर्यस्य 

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- विरेचन सिद्धान्त है-

उत्तर- अरस्तू महोदय का

अरस्तू का विरेचन सिद्धांत (Catharsis Theory) काव्यशास्त्र में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जिसे उन्होंने अपनी कृति पोएटिक्स में प्रतिपादित किया था। इस सिद्धांत के अनुसार, त्रासदी (Tragedy) के माध्यम से दर्शकों के मन में उत्पन्न करुणा और भय के भावों का शुद्धिकरण (विरेचन) होता है, जिससे वे मानसिक रूप से परिष्कृत और संतुलित अनुभव करते हैं।

विरेचन सिद्धांत का मूल विचार

अरस्तू ने प्लेटो के विचारों का विरोध करते हुए यह सिद्ध किया कि काव्य और नाटक केवल भावनाओं को उत्तेजित करने का कार्य नहीं करते, बल्कि वे मनोभावों को परिष्कृत भी करते हैं। उन्होंने कहा कि त्रासदी में करुणा और भय के संचार से दर्शकों के भीतर संचित नकारात्मक भावनाओं का विरेचन होता है, जिससे वे मानसिक रूप से संतुलित और शुद्ध अनुभव करते हैं।

विरेचन की प्रक्रिया

  • करुणा (Pity) – जब दर्शक त्रासदी में नायक की दुर्दशा देखते हैं, तो उनके मन में करुणा उत्पन्न होती है।
  • भय (Fear) – दर्शक यह अनुभव करते हैं कि वे भी ऐसी परिस्थितियों में पड़ सकते हैं, जिससे उनके भीतर भय उत्पन्न होता है।
  • शुद्धिकरण (Purification) – इन भावनाओं के अनुभव से दर्शकों के भीतर संचित मानसिक तनाव और नकारात्मक भावनाओं का शमन होता है, जिससे वे मानसिक रूप से परिष्कृत अनुभव करते हैं।

विरेचन सिद्धांत का प्रभाव

  • अरस्तू के इस सिद्धांत ने साहित्य और नाट्यशास्त्र में गहरी छाप छोड़ी है।
  • यह सिद्ध करता है कि कला केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह मानसिक और भावनात्मक शुद्धिकरण का माध्यम भी है।
  • आधुनिक मनोविज्ञान भी इस विचार को स्वीकार करता है कि भावनाओं की अभिव्यक्ति और अनुभव से मानसिक संतुलन प्राप्त किया जा सकता है।

Question 29

अधोलिखितवाक्यांशान् संयोज्य यथोक्तश्लोकं रचयत ।

A. कृतः कृतार्थोऽस्मि

B. विलोकनेनैव तवामुना मुने!

C. निबृंहितांहसा

D. गिरोऽथ वा श्रेयसि केन तृप्यते

E. तथापि शुश्रूषुरहं गरीयसीः

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, C, B, E, D

  2. BOption (b)

    A, C, D, E, B

  3. COption (c)

    B, A, E, D, C

  4. DOption (d)

    B, A, C, E, D

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Correct answer

Answer: (d)D.

B, A, C, E, D

Why this answer is correct

उत्तर- B, A, C, E, D

उत्तर विकल्प 4) B, A, C, E, D पूर्णतः युक्तिसंगत है। यह एक सुंदर संस्कृत श्लोक की रचना है, जिसमें एक शिष्य या भक्त अपने गुरु या मुनि के दर्शन मात्र से प्राप्त संतोष और कृतज्ञता को व्यक्त करता है। आइए इस श्लोक को चरणबद्ध रूप में समझते हैं:

Important Pointsसंयोजित श्लोक:

विलोकनेनैव तवामुना मुने!

कृतः कृतार्थोऽस्मि निबृंहितांहसा।

तथापि शुश्रूषुरहं गरीयसीः

गिरोऽथ वा श्रेयसि केन तृप्यते॥

श्लोक का पदविन्यास और अर्थ:

  • विलोकनेनैव तवामुना मुने!
  • हे मुनि! केवल इस दर्शन से ही...
  • कृतः कृतार्थोऽस्मि निबृंहितांहसा।
  • मैं कृतार्थ हो गया हूँ, क्योंकि आपने मंद मुस्कान से मुझे देखा।
  • तथापि शुश्रूषुरहं गरीयसीः
  • फिर भी मैं आपकी श्रेष्ठ वाणी की सेवा करना चाहता हूँ।
  • गिरोऽथ वा श्रेयसि केन तृप्यते॥
  • क्योंकि आपकी वाणी या श्रेष्ठ ज्ञान से कौन तृप्त हो सकता है?

भावार्थ:

यह श्लोक एक भक्त की भावनाओं को दर्शाता है जो कहता है कि-

“हे मुनि! आपके दर्शन मात्र से ही मैं कृतार्थ हो गया हूँ, क्योंकि आपने मुझे मंद मुस्कान से देखा। फिर भी, मैं आपकी वाणी की सेवा करना चाहता हूँ, क्योंकि आपकी श्रेष्ठ वाणी से कौन तृप्त हो सकता है?”

यहाँ श्रवण, दर्शन, सेवा, और ज्ञान की अतृप्ति- इन सभी भावों का सुंदर समन्वय है।

Question 30

अधोलिखितेषु स्थायिभावाः न भवन्ति -

A. निर्वेदः

B. शोकः

C. उत्साहः

D. आवेगः

E. जडता

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, C, E केवलम्

  2. BOption (b)

    A, B, D केवलम्

  3. COption (c)

    B, C, E केवलम् 

  4. DOption (d)

    A, D, E केवलम्

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Correct answer

Answer: (d)D.

A, D, E केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- निम्न में से स्थायीभाव नही है-

उत्तर- A, D, E केवलम्

Important Pointsस्थायिभाव क्या हैं?

स्थायिभाव वे भाव हैं जो स्थिर, गहरे और दीर्घकालिक होते हैं, और जिनके आधार पर रस की उत्पत्ति होती है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र और आचार्य मम्मट के काव्यप्रकाश में इन्हें रसों की आत्मा कहा गया है।

प्रमुख ८ स्थायिभाव हैं:

  1. रति (श्रृंगार)
  2. हास (हास्य)
  3. शोक (करुण)
  4. क्रोध (रौद्र)
  5. उत्साह (वीर)
  6. भय (भीयानक)
  7. जुगुप्सा (बीभत्स)
  8. विस्मय (अद्भुत)

 

अब दिए गए विकल्पों का विश्लेषण करते है-

B. शोकः- स्थायिभाव है

  • यह करुण रस का स्थायिभाव है।

C. उत्साहः- स्थायिभाव है

  • यह वीर रस का स्थायिभाव है।

A. निर्वेदः- स्थायिभाव नहीं है

  • यह वैराग्य या उदासीनता का भाव है, परंतु रसोत्पत्ति में इसका कोई स्थायी स्थान नहीं है।

D. आवेगः- स्थायिभाव नहीं है

  • यह एक चंचल मानसिक अवस्था है, जो व्यभिचारी भाव (संचारी भाव) की श्रेणी में आती है।

E. जडता- स्थायिभाव नहीं है

  • यह भावशून्यता या स्तब्धता को दर्शाता है, जो रसोत्पत्ति में बाधक होती है।
<br>

इस प्रकार, A, D, E — ये तीनों स्थायिभाव नहीं हैं, और विकल्प 4) A, D, E केवलम् सही उत्तर है।

Question 31

अर्थापत्तेः फलं किम्?

  1. AOption (a)

    अतिदेशवाक्यार्थज्ञानम्

  2. BOption (b)

    उपपादकज्ञानम्

  3. COption (c)

    उपपाद्यज्ञानम्

  4. DOption (d)

    ज्ञायमानार्थविज्ञानम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

उपपादकज्ञानम्

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- अर्थापत्ति क्या फल क्या होता है?

उत्तर- उपपादकज्ञानम्

अर्थापत्ति क्या है?

अर्थापत्ति एक अनुमानात्मक प्रमाण है, जिसे तब प्रयोग किया जाता है जब प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आदि प्रमाणों से कोई बात सिद्ध नहीं हो पाती, लेकिन किसी ज्ञात तथ्य के आधार पर किसी अन्य तथ्य की अनिवार्य उपस्थिति स्वीकार करनी पड़ती है।

उदाहरण के लिए:

"देवदत्तः दिवा न खादति।"

फिर भी वह मोटा है।

अतः निष्कर्ष निकलता है — रात्रौ खादति।

यह निष्कर्ष प्रत्यक्ष या अनुमान से नहीं, बल्कि अनिवार्य तार्किक आवश्यकता से निकाला गया है — यही है अर्थापत्ति।

"अर्थापत्तेः फलं किम्?"

उत्तर: उपपादकज्ञानम् — अर्थात् जिस ज्ञान से किसी अन्य बात की पुष्टि होती है।

यह इसलिए कहा गया है क्योंकि अर्थापत्ति के माध्यम से हम किसी ज्ञात तथ्य के आधार पर उसके कारण या आधार (उपपादक) का ज्ञान प्राप्त करते हैं।

उपपादक = जो किसी बात को संभव बनाता है।

अन्य विकल्पों पर संक्षिप्त दृष्टि:

  • अतिदेशवाक्यार्थज्ञानम् — यह मिमांसा दर्शन से संबंधित है, जहाँ एक विधि को दूसरी जगह लागू किया जाता है।
  • उपपाद्यज्ञानम् — यह उस बात का ज्ञान है जो सिद्ध की जा रही है, जबकि अर्थापत्ति में हम कारण (उपपादक) को जानते हैं।
  • ज्ञायमानार्थविज्ञानम् — यह सामान्य ज्ञान की ओर संकेत करता है, पर अर्थापत्ति की विशेषता नहीं है।

Question 32

अभिलेखे गुप्तकालीना लिपिः आसीत् ?

  1. AOption (a)

    शारदा

  2. BOption (b)

    ब्राह्मी

  3. COption (c)

    मागधी

  4. DOption (d)

    अर्धमागधी

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Correct answer

Answer: (b)B.

ब्राह्मी

Why this answer is correct

उत्तर- ब्राह्मी

गुप्तकाल (लगभग 4वीं से 6वीं शताब्दी ईस्वी) को भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग कहा जाता है, और इस काल में ब्राह्मी लिपि का अत्यधिक प्रचलन था। गुप्त सम्राटों द्वारा जारी किए गए अधिकांश शिलालेख, ताम्रपत्र, और सिक्कों पर ब्राह्मी लिपि में ही लेखन हुआ है।

ब्राह्मी लिपि का संक्षिप्त परिचय:

  • ब्राह्मी भारत की प्राचीनतम लिपियों में से एक है, जिसका प्रयोग मौर्यकाल से लेकर गुप्तकाल तक व्यापक रूप से हुआ।
  • यह लिपि बाएँ से दाएँ लिखी जाती है और इससे ही आगे चलकर नागरी, शारदा, कन्नड़, बंगला आदि लिपियों का विकास हुआ।
  • सम्राट अशोक के अभिलेखों में भी ब्राह्मी लिपि का प्रयोग हुआ था, और गुप्तकाल में यह लिपि और अधिक परिष्कृत रूप में सामने आई।

गुप्तकालीन ब्राह्मी की विशेषताएँ:

  • गुप्तकालीन ब्राह्मी को कभी-कभी गुप्त ब्राह्मी भी कहा जाता है।
  • इस काल की ब्राह्मी लिपि में अक्षरों की आकृति अधिक गोलाकार और सजावटी हो गई थी।
  • सांची, उदयगिरि, एरण, भीतरी, मथुरा आदि स्थानों से प्राप्त गुप्तकालीन अभिलेखों में ब्राह्मी लिपि के सुंदर उदाहरण मिलते हैं।

अन्य विकल्पों का परीक्षण:

  • शारदा - यह लिपि कश्मीर क्षेत्र में 8वीं शताब्दी के बाद प्रचलित हुई, गुप्तकाल में नहीं।
  • मागधी और अर्धमागधी — ये प्राकृत भाषाएँ हैं, न कि लिपियाँ। इन भाषाओं को लिखने के लिए भी ब्राह्मी लिपि का ही प्रयोग होता था।

निष्कर्ष:

गुप्तकालीन अभिलेखों में ब्राह्मी लिपि का ही प्रयोग होता था, जो उस समय की प्रशासनिक, धार्मिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम थी।

इसलिए उत्तर 2) ब्राह्मी पूर्णतः शास्त्रसम्मत और ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित है।

Question 33

पुरुषसूक्ताधारेण यज्ञस्य घृतमासीत्-

  1. AOption (a)

    ग्रीष्मः

  2. BOption (b)

    शरत्

  3. COption (c)

    वसन्तः

  4. DOption (d)

    हेमन्तः

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Correct answer

Answer: (c)C.

वसन्तः

Why this answer is correct

उत्तर- वसन्तः

यह प्रश्न ऋग्वेद के पुरुषसूक्त (मण्डल 10, सूक्त 90) में वर्णित यज्ञ की प्रतीकात्मक संरचना से संबंधित है। इस सूक्त में सृष्टि की उत्पत्ति को एक यज्ञ के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें विराट् पुरुष को यज्ञ में आहुति के रूप में समर्पित किया गया।

यज्ञ में ऋतुओं की प्रतीकात्मक भूमिका:

पुरुषसूक्त में वर्णन है कि ���ब देवताओं ने विराट् पुरुष का यज्ञ किया, तब उन्होंने विभिन्न ऋतुओं को यज्ञ की सामग्रियों के रूप में नियोजित किया:

  • वसन्तः - घृतम् (घी) के रूप में प्रयुक्त हुआ।
  • ग्रीष्मः - ईध्म (यज्ञ की समिधा या लकड़ी) के रूप में।
  • शरत् - हविः (आहुति) के रूप में।

यहाँ वसन्त ऋतु को घृत कहा गया है, जो यज्ञ में पवित्रता, पोषण और ऊर्जा का प्रतीक है। घृत का प्रयोग यज्ञ में अत्यंत शुभ और आवश्यक माना जाता है, और वसन्त ऋतु भी नवजीवन, पुष्टता और सौंदर्य का प्रतीक है- इसलिए यह उपमा अत्यंत उपयुक्त है।

श्लोक सन्दर्भ:

"तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः।

तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये॥

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम्।

पशून्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्यान्ग्राम्याश्च ये॥

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे।

छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत॥

तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः।

गावो ह जज्ञिरे तस्मात् तस्माज्जाता अजावयः॥

यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्।

मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्येते॥

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् बाहू राजन्यः कृतः।

ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥

चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत।

मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत॥

नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत।

पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन्॥

सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः।

देवा यद्यज्ञं तन्वानाः अबध्नन् पुरुषं पशुम्॥

यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।

ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥"

(विशेष: ऊपर श्लोकों में "पृषदाज्यम्" शब्द घृत के लिए प्रयुक्त हुआ है, जो वसन्त ऋतु का प्रतीक है।)

निष्कर्ष:

वसन्त ऋतु को घृत के रूप में यज्ञ में प्रयुक्त किया गया, जो पवित्रता, ऊर्जा और नवसृजन का प्रतीक है। अतः उत्तर 3) वसन्तः पूर्णतः शास्त्रसम्मत और युक्तियुक्त है।

Question 34

" अगाधान्तः परिस्पन्दम्" इति श्लोके अनयोः वर्णना श्लेषमुखेन क्रियते ?

  1. AOption (a)

    वाणी - नद्योः

  2. BOption (b)

    वाणी - रजन्योः

  3. COption (c)

    वाणी - नायिकयोः

  4. DOption (d)

    वाणी - चन्द्रिकयोः

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Correct answer

Answer: (a)A.

वाणी - नद्योः

Why this answer is correct

उत्तर- वाणी - नद्योः

यहाँ श्लोक "अगाधान्तः परिस्पन्दम्" में श्लेष अलंकार का प्रयोग हुआ है, जिसमें एक ही पद या वाक्यांश से दो विभिन्न अर्थ ग्रहण किए जाते हैं। यह काव्यशास्त्र में एक प्रभावशाली अलंकार माना गया है, जो सौंदर्य और अर्थ-गांभीर्य दोनों को समृद्ध करता है।

अब इस वाक्यांश का विश्लेषण करते हैं:

  • "अगाधान्तः" — जिसका अंत अगाध (अथाह) हो, अर्थात् गहराई की कोई सीमा नहीं।
  • "परिस्पन्दम्" — कंपन, स्पंदन या तरंगित होना।

इस वर्णन को दो प्रकार से समझा जा सकता है:

  • वाणी की दृष्टि से: जब विचार अथवा भाव अत्यंत गहन हों, तब वाणी का स्वर अथवा उच्चारण भी तरंगित या कम्पनयुक्त हो जाता है। यह वाणी की गूढ़ता और भाव-सम्भाव को दर्शाता है।
  • नदी की दृष्टि से: किसी अगाध नदी के अन्तर्गत प्रवाह और सतत कंपन होता है- इसका संकेत "अगाधान्तः परिस्पन्दम्" द्वारा भी होता है। यहाँ परस्पर लहरें और जल की गति परिस्पन्द के रूप में प्रकट होती हैं।

इस प्रकार यह श्लोक वाणी और नदियों दोनों की समान प्रवृत्ति- गहनता और कंपन- को एक ही अभिव्यक्ति में समेटता है। अतः इसमें श्लेष अलंकार के माध्यम से वाणी-नद्योः वर्णना की गई है।

Question 35

परिसंख्यायाः दोषेषु परिगण्यते-

A. रूपहानिः

B. श्रुतहानिः

C. अप्राप्तबाधः

D. अश्रुतकल्पना

E. प्राप्तबाधः

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, C केवलम्

  2. BOption (b)

    C, D, E केवलम्

  3. COption (c)

    B, D, E केवलम्

  4. DOption (d)

    A, D, E केवलम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

B, D, E केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर- B, D, E केवलम्

Important Points

  • यह प्रश्न मीमांसाशास्त्र के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत परिसंख्या से संबंधित है।
  • परिसंख्या का प्रयोग तब होता है जब किसी विधिवाक्य में "एव" (केवल) जैसे शब्दों द्वारा किसी विशेष वस्तु को स्वीकार कर शेष को निषेध किया जाता है। यह एक प्रकार की निग्रहवृत्ति है।
  • परिसंख्या के प्रयोग में कुछ दोष भी उत्पन्न हो सकते हैं, जिन्हें मीमांसकों ने विश्लेषित किया है। आइए अब उन दोषों को समझें जो इस प्रश्न में पूछे गए हैं:

परिसंख्यायाः दोषाः:

  1. श्रुतहानिः (B)

जब परिसंख्या के कारण किसी श्रुति (वेदवाक्य) का अर्थ बाधित होता है या उसका प्रयोग निष्फल हो जाता है, तो उसे श्रुतहानि कहा जाता है। यह तब होता है जब परिसंख्या से किसी पूर्ववर्ती श्रुति का निषेध हो जाए।

2. अश्रुतकल्पना (D)

जब परिसंख्या के आधार पर किसी ऐसी वस्तु का निषेध किया जाता है जिसका श्रुति में उल्लेख ही नहीं है, तो यह अश्रुतकल्पना कहलाती है। यह दोष तब होता है जब कल्पना के आधार पर निषेध किया जाए, न कि श्रुति के आधार पर।

3. प्राप्तबाधः (E)

जब कोई विधि पहले से प्राप्त हो चुकी हो और परिसंख्या के कारण उसका बाध (निषेध) किया जाए, तो यह प्राप्तबाध कहलाता है। यह दोष गंभीर माना जाता है क्योंकि यह पूर्ववर्ती विधि को निष्फल करता है।

अन्य विकल्पों का परीक्षण:

  • A. रूपहानिः — यह दोष रूप (वाक्यरचना) के विकार से संबंधित होता है, जो परिसंख्या के संदर्भ में प्रमुख दोष नहीं माना गया है।
  • C. अप्राप्तबाधः — यह तब होता है जब किसी ऐसी विधि का निषेध किया जाए जो अभी प्राप्त ही नहीं हुई है। यह दोष परिसंख्या में नहीं, बल्कि अन्य संदर्भों में आता है।

निष्कर्ष:

परिसंख्यायाः दोषेषु मुख्यतः निम्न दोष परिगण्यते:

  • श्रुतहानिः (B)
  • अश्रुतकल्पना (D)
  • प्राप्तबाधः (E)

इसलिए विकल्प 3) B, D, E केवलम् ही शास्त्रसम्मत और युक्तियुक्त उत्तर है।

Question 36

परस्परं समुचितं मेलयत -

A.काशिकाविवरणपञ्चिकाI.भट्टोजिदीक्षितः
B.वैयाकरणमतोन्मज्जनम्II.जिनेन्द्रबुद्धिः
C.उद्द्योतनम्III.नागोजीभट्टः
D.स्फोटवादःIV.अन्नम्भट्टः
<br>

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - IV, B - III, C - II, D - I

  2. BOption (b)

    A - I, B - II, C - III, D - IV

  3. COption (c)

    A - II, B - I, C - IV, D - III

  4. DOption (d)

    A - II, B - IV, C - III, D - I

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Correct answer

Answer: (c)C.

A - II, B - I, C - IV, D - III

Why this answer is correct

उत्तर- A - II, B - I, C - IV, D - III

संस्कृत व्याकरण और भाषा विज्ञान में विभिन्न ग्रंथों और सिद्धांतों का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रस्तुत प्रश्न में दिए गए ग्रंथों और उनके रचयिताओं को सही रूप से मिलाने पर सही उत्तर A - II, B - I, C - IV, D - III बनता है।

1. काशिकाविवरणपञ्चिका (A) - जिनेन्द्रबुद्धिः (II)

  • काशिकाविवरणपञ्चिका एक प्रसिद्ध संस्कृत व्याकरण ग्रंथ है।
  • इसे जिनेन्द्रबुद्धि द्वारा रचित माना जाता है।
  • यह काशिका टीका पर एक महत्वपूर्ण व्याख्या है, जो पाणिनीय व्याकरण को स्पष्ट करने में सहायक है।

2. वैयाकरणमतोन्मज्जनम् (B) - भट्टोजिदीक्षितः (I)

  • वैयाकरणमतोन्मज्जनम् संस्कृत व्याकरण का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
  • इसे भट्टोजिदीक्षित द्वारा रचित माना जाता है।
  • यह ग्रंथ व्याकरण के सिद्धांतों को स्पष्ट करता है और विभिन्न मतों का विश्लेषण करता है।

3. उद्द्योतनम् (C) - अन्नम्भट्टः (IV)

  • उद्द्योतनम् एक प्रसिद्ध ग्रंथ है, जो न्याय और तर्कशास्त्र से संबंधित है।
  • इसे अन्नम्भट्ट द्वारा रचित माना जाता है।
  • यह ग्रंथ तर्कशास्त्र और न्यायशास्त्र के सिद्धांतों को विस्तार से समझाने में सहायक है।

4. स्फोटवादः (D) - नागोजीभट्टः (III)

  • स्फोटवाद भाषा विज्ञान का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है।
  • इसे नागोजीभट्ट द्वारा प्रतिपादित किया गया था।
  • यह सिद्धांत शब्दों की ध्वनि और अर्थ की व्याख्या करता है और भाषा की संरचना को समझाने में सहायक है।

निष्कर्ष

संस्कृत व्याकरण और भाषा विज्ञान में इन ग्रंथों और उनके रचयिताओं का महत्वपूर्ण योगदान है। काशिकाविवरणपञ्चिका, वैयाकरणमतोन्मज्जनम्, उद्द्योतनम् और स्फोटवाद सभी अपने-अपने क्षेत्र में विशिष्ट हैं और संस्कृत साहित्य में अमूल्य योगदान देते हैं।

Question 37

परस्परं समुचितं मेलयत -

A.द्वेष्टि श्वश्रूरप जाया रुणद्धिI.इन्द्रसूक्तम्
B.राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिवम्II.उषस्सूक्तम्
C.यं शंसन्तं यः शशमानमूतीIII.अक्षसूक्तम्
D.चक्रमिव नव्यस्या ववृत्स्वIV.अग्निसूक्तम्
<br>

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - I, B - III, C - II, D - IV

  2. BOption (b)

    A - IV, B - I, C - III, D - II

  3. COption (c)

    A - III, B - IV, C - I, D - II

  4. DOption (d)

    A - II, B - I, C - IV, D - III

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Correct answer

Answer: (c)C.

A - III, B - IV, C - I, D - II

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- परस्पर समुचित जोड़िया लगाये-

उत्तर- A - III, B - IV, C - I, D - II

  • A - III (अक्षसूक्तम्): "द्वेष्टि श्वश्रूरप जाया रुणद्धि" यह वाक्य अक्षसूक्त से संबंधित है, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाता है।
  • B - IV (अग्निसूक्तम्): "राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिवम्" यह अग्निसूक्त से मेल खाता है, क्योंकि अग्नि को यज्ञों का रक्षक और प्रकाशमान तत्व माना जाता है।
  • C - I (इन्द्रसूक्तम्): "यं शंसन्तं यः शशमानमूती" यह इन्द्रसूक्त से संबंधित है, जो इन्द्र की स्तुति करता है।
  • D - II (उषस्सूक्तम्): "चक्रमिव नव्यस्या ववृत्स्व" यह उषस्सूक्त से मेल खाता है, क्योंकि यह उषा (प्रभात) के आगमन और उसकी गति को दर्शाता है।

 

इस प्रकार, यह उत्तर सही मेल प्रस्तुत करता है।

Question 38

एषु कस्य भक्त्या शुश्रूषया वा ब्रह्मलोकः प्राप्यते ?

  1. AOption (a)

    आचार्यस्य

  2. BOption (b)

    पितुः

  3. COption (c)

    मातुः

  4. DOption (d)

    प्रजानाम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

आचार्यस्य

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उत्तर- आचार्यस्य

Important Points

  • भारतीय शास्त्रों में आचार्य (गुरु) का स्थान अत्यंत उच्च माना गया है। "गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः" — इस श्लोक में गुरु को स्वयं त्रिदेवों के तुल्य बताया गया है।
  • उपनिषदों और धर्मशास्त्रों के अनुसार ब्रह्मलोक की प्राप्ति केवल तप, ज्ञान, और आचार्य सेवा के माध्यम से ही संभव होती है।
  • श्रवण, मनन, और निदिध्यासन जैसी ज्ञान-प्राप्ति की विधियाँ तभी सफल होती हैं जब शिष्य आचार्य की भक्ति और शुश्रूषा यानी श्रद्धापूर्वक सेवा करता है।
  • आचार्य के प्रति भक्ति और निःस्वार्थ सेवा न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है, बल्कि ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति में सहायक होकर मोक्ष और ब्रह्मलोक तक भी ले जाती है।
  • इसलिए इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट रूप से "आचार्यस्य" ही युक्तियुक्त और शास्त्रसम्मत है।

Question 39

निर्विकल्पक विघ्नेषु परिगण्यते-

A. विक्षेपः

B. संक्षेपः

C. कषायः

D. अधर्मः

E. रसास्वादः

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, C केवलम्

  2. BOption (b)

    C, D, E केवलम्

  3. COption (c)

    A, C, E केवलम्

  4. DOption (d)

    B, D, E केवलम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

A, C, E केवलम्

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उत्तर- A, C, E केवलम्

यह प्रश्न निर्विकल्पक समाधि (अविकल्पक ध्यान) में बाधक तत्वों - जिन्हें विघ्न कहा जाता है - से संबंधित है। योग और वेदांत दर्शन में, जब साधक निर्विकल्प समाधि की ओर अग्रसर होता है, तब कुछ आंतरिक मानसिक विकार उस स्थिति को प्राप्त करने में बाधा डालते हैं। इन्हें निर्विकल्पक विघ्न कहा जाता है।

A. विक्षेपः

यह चित्त की चंचलता या अस्थिरता है। जब मन बार-बार विषयों की ओर भागता है और एकाग्र नहीं होता, तो यह विक्षेप कहलाता है। यह ध्यान की गहराई में उतरने में सबसे बड़ा विघ्न है।

C. कषायः

यह अवशिष्ट वासनाएँ या गहरे संस्कार हैं जो चित्त में छिपे रहते हैं। ये वासनाएँ ध्यान के समय उभरकर साधक को विचलित करती हैं। कषाय subtle होते हैं और समाधि के उच्च स्तरों में बाधा डालते हैं।

E. रसास्वादः

यह ध्यान में उत्पन्न होने वाले आनंद या सुख का आस्वादन है। जब साधक उस सुख में आसक्त हो जाता है, तो वह निर्विकल्प समाधि की ओर नहीं बढ़ पाता। यह भी एक सूक्ष्म विघ्न है, क्योंकि यह सुख की आसक्ति के रूप में प्रकट होता है।

अन्य विकल्पों का परीक्षण:

  • B. संक्षेपः — यह शब्द सामान्यतः संक्षिप्तता के अर्थ में आता है, न कि निर्विकल्प समाधि में विघ्न के रूप में।
  • D. अधर्मः — यह नैतिक दृष्टि से दोष है, परंतु ध्यान या समाधि की प्रक्रिया में इसे निर्विकल्पक विघ्न के रूप में नहीं गिना जाता।

निष्कर्ष:

विक्षेपः, कषायः, और रसास्वादः — ये तीनों निर्विकल्प समाधि में बाधक माने गए हैं। अतः विकल्प 3) A, C, E केवलम् पूर्णतः शास्त्रसम्मत और युक्तियुक्त है।

Question 40

समीचीनं मेलयत -

A.उपमाI.व्यवहारारोपमूला
B.उत्प्रेक्षाII.सक���रियारूपादिवर्णनमूला
C.समासोक्तिःIII.सादृश्यमूला
D.स्वभावोक्तिःIV.सम्भावनामूला
<br>

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - III, B - IV, C - I, D - II

  2. BOption (b)

    A - I, B - II, C - III, D - IV

  3. COption (c)

    A - IV, B - III, C - II, D - I

  4. DOption (d)

    A - II, B - IV, C - III, D - I

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Correct answer

Answer: (a)A.

A - III, B - IV, C - I, D - II

Why this answer is correct

उत्तर- A - III, B - IV, C - I, D - II

Important PointsA. उपमा- सादृश्यमूला (III)

  • उपमा अलंकार में दो वस्तुओं के बीच प्रत्यक्ष समानता (सादृश्य) को दर्शाया जाता है।
  • इसमें उपमेय और उपमान के बीच कोई गुण या धर्म साझा होता है।
  • उदाहरण: “सा चन्द्रवदना नारी” — यहाँ नारी की तुलना चन्द्र से की गई है।

B. उत्प्रेक्षा- सम्भावनामूला (IV)

  • उत्प्रेक्षा में उपमेय में उपमान के होने की संभावना या कल्पना की जाती है।
  • यह कल्पना “मनो”, “जनु”, “मानो” आदि शब्दों से प्रकट होती है।
  • उदाहरण: “मनोज्ञं वदनं मनो मृगनयनस्य” — मानो उसका मुख मृगनयन जैसा हो।

C. समासोक्तिः- व्यवहारारोपमूला (I)

  • समासोक्ति में किसी बात को संक्षेप में, व्यवहार के रूप में कहा जाता है, परंतु उसका गूढ़ अर्थ स्पष्ट होता है।
  • यह अलंकार व्यवहार की दृष्टि से आरोप करता है, जैसे कि कोई बात सामान्य हो।
  • उदाहरण: “गृहिणी धर्मपत्नी च” — यहाँ पत्नी के विविध रूपों का व्यवहारिक उल्लेख है।

D. स्वभावोक्तिः- सक्रियरूपादिवर्णनमूला (II)

  • स्वभावोक्ति में किसी वस्तु या व्यक्ति के स्वाभाविक गुणों या क्रियाओं का वर्णन होता है।
  • यह अलंकार बिना अलंकरण के, सहज रूप में सौंदर्य उत्पन्न करता है।
  • उदाहरण: “सरिता सागरं प्रति धावति” — नदी का सागर की ओर बहना उसका स्वभाव है।

Question 41

अधोलिखितेषु सन्ध्यक्षरं भवति-

  1. AOption (a)

    ओ

  2. BOption (b)

    ई

  3. COption (c)

    आ

  4. DOption (d)

    ऊ

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Correct answer

Answer: (a)A.

ओ

Why this answer is correct

उत्तर- ओ

सन्ध्यक्षर का अर्थ:

सन्ध्यक्षर वह वर्ण होता है जो दो स्वरों के मेल से उत्पन्न होता है। संस्कृत में जब दो स्वर मिलते हैं, तो उनके संयोग से एक नया स्वर उत्पन्न होता है — इसे संयुक्त स्वर या सन्ध्यक्षर कहते हैं।

"ओ" का निर्माण:

"ओ" स्वर का निर्माण निम्न प्रकार से होता है:

अ + उ = ओ

अ + ऊ = ओ

आ + उ = ओ

आ + ऊ = ओ

इस प्रकार "ओ" एक संयुक्त स्वर है जो दो मूल स्वरों के मेल से बनता है। इसलिए इसे सन्ध्यक्षर कहा जाता है।

अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • ई — यह मूल दीर्घ स्वर है, न कि सन्ध्यक्षर।
  • आ — यह भी मूल दीर्घ स्वर है, "अ" का दीर्घ रूप।
  • ऊ — यह "उ" का दीर्घ रूप है, मूल स्वर है।

इनमें से कोई भी दो स्वरों के संयोग से नहीं बना है, अतः ये सन्ध्यक्षर नहीं हैं।

निष्कर्ष:

"ओ" ही एकमात्र विकल्प है जो सन्ध्यक्षर की परिभाषा पर खरा उतरता है। इसलिए उत्तर 1) ओ पूर्णतः शुद्ध और व्याकरणसम्मत है।

Question 42

“ग्रिमनियमस्य नाम ‘रास्कनियमः' इति करणीयमासीत् ” इत्येतत्कथनं कस्य विदुषः वर्तते?

  1. AOption (a)

    रास्क इत्यस्य

  2. BOption (b)

    प्रो. ईरे इत्यस्य

  3. COption (c)

    प्रो. मैक्समूलर इत्यस्य

  4. DOption (d)

    प्रो. ओटो येस्पर्सन इत्यस्य

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Correct answer

Answer: (d)D.

प्रो. ओटो येस्पर्सन इत्यस्य

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उत्तर- प्रो. ओटो येस्पर्सन इत्यस्य

कथन का आशय:

“ग्रिमनियमस्य नाम ‘रास्कनियमः’ इति करणीयमासीत्” — इस कथन का अर्थ है कि ग्रिम नियम (Grimm's Law) को वास्तव में रास्क नियम (Rask's Law) कहा जाना चाहिए था। यह कथन इस तथ्य को इंगित करता है कि जिस ध्वन्यात्मक परिवर्तन का श्रेय सामान्यतः याकोब ग्रिम को दिया जाता है, उसकी मूल खोज रास्क नामक विद्वान ने पहले ही कर ली थी।

प्रो. ओटो येस्पर्सन — यह कथन उन्हीं का है:

  • ओटो येस्पर्सन (1860–1943) एक प्रसिद्ध डेनिश भाषावैज्ञानिक थे, जिन्होंने भाषाशास्त्र, व्याकरण, ध्वनिशास्त्र और भाषा शिक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
  • उन्होंने यह विचार व्यक्त किया कि रास्क (Rasmus Rask), जो स्वयं डेनमार्क के ही विद्वान थे, ने जर्मैनिक भाषाओं में व्यंजन ध्वनियों के परिवर्तन का सिद्धांत ग्रिम से पहले ही प्रतिपादित किया था।
  • अतः येस्पर्सन का मत था कि इस नियम को ‘रास्क नियम’ कहा जाना चाहिए था, न कि ‘ग्रिम नियम’।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:

  • रास्क ने 1818 ई. में आईसलैंडिक और अन्य जर्मैनिक भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन में ध्वन्यात्मक परिवर्तनों का उल्लेख किया था।
  • याकोब ग्रिम ने 1822 ई. में इन परिवर्तनों को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया, जिससे यह नियम उनके नाम से प्रसिद्ध हो गया — Grimm’s Law।

Question 43

रसात्मवादसन्दर्भे आनन्दवर्धन- अभिनवगुप्त- मम्मट-महिमभट्ट-विश्वनाथानां क्रमशः मतानि भवन्ति -

A. काव्यस्यात्मनि रसादिरूपे न कस्यचिद्विमतिः

B. ये रसस्याङ्गिनो धर्माः

C. वाक्यं रसात्मकं काव्यम्

D. काव्यस्यात्मा स एवाऽर्थः

E. रसेनैव सर्व जीवति काव्यम्

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    D, E, B, A, C

  2. BOption (b)

    D, E, C, B, A

  3. COption (c)

    D, E, C, A, B

  4. DOption (d)

    B, D, C, A, E

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Correct answer

Answer: (a)A.

D, E, B, A, C

Why this answer is correct

उत्तर- D, E, B, A, C

रसात्मवाद के संदर्भ में विभिन्न आचार्यों के मत संस्कृत काव्यशास्त्र में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। प्रस्तुत प्रश्न में दिए गए विकल्पों के अनुसार सही उत्तर D, E, B, A, C है। 

1. काव्यस्यात्मा स एवाऽर्थः (D) - आनन्दवर्धन का मत

  • आनन्दवर्धन ने ध्वनि सिद्धांत को प्रतिपादित किया और कहा कि काव्य का आत्मा अर्थ ही होता है।
  • उनके अनुसार, व्यंजना शक्ति के माध्यम से रस की अनुभूति होती है।
  • उन्होंने यह भी कहा कि रस की उत्पत्ति काव्य के अर्थ से होती है, न कि केवल शब्दों से।

2. रसेनैव सर्व जीवति काव्यम् (E) - अभिनवगुप्त का मत

  • अभिनवगुप्त ने रस को काव्य का जीवन माना।
  • उन्होंने कहा कि रस के बिना काव्य का अस्तित्व नहीं होता।
  • उनके अनुसार, रस ही वह तत्व है जो पाठक को आनंद प्रदान करता है।

3. ये रसस्याङ्गिनो धर्माः (B) - मम्मट का मत

  • मम्मट ने काव्यप्रकाश में रस को अंगिन (मुख्य तत्व) माना।
  • उन्होंने कहा कि रस के विभिन्न धर्म (गुण) होते हैं, जो काव्य को उत्कृष्ट बनाते हैं।
  • उनके अनुसार, रस की निष्पत्ति विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के संयोग से होती है।

4. काव्यस्यात्मनि रसादिरूपे न कस्यचिद्विमतिः (A) - महिमभट्ट का मत

  • महिमभट्ट ने रस को काव्य की आत्मा मानने में कोई विवाद नहीं कहा।
  • उन्होंने यह भी कहा कि रस की अनुभूति ही काव्य का मुख्य उद्देश्य है।
  • उनके अनुसार, काव्य में रस की प्रधानता निर्विवाद रूप से स्वीकार्य है।
  1. वाक्यं रसात्मकं काव्यम् (C) - विश्वनाथ का मत
  • विश्वनाथ ने काव्य को रसात्मक वाक्य के रूप में परिभाषित किया।
  • उन्होंने कहा कि काव्य का मुख्य उद्देश्य रस की अभिव्यक्ति है।
  • उनके अनुसार, रस के बिना काव्य केवल शब्दों का समूह मात्र रह जाता है।

निष्कर्ष

रसात्मवाद के संदर्भ में विभिन्न आचार्यों के मतों को समझने से स्पष्ट होता है कि रस ही काव्य का प्राण तत्व है। आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, मम्मट, महिमभट्ट और विश्वनाथ सभी ने अपने-अपने दृष्टिकोण से रस की व्याख्या की, लेकिन सभी इस बात पर सहमत हैं कि रस के बिना काव्य अधूरा है।

Question 44

समुचितं मेलयत -

A.मदनिकाI.मुद्राराक्षसम्
B.पद्मिनिकाII.रत्नावली
C.विजयाIII.स्वप्नवासवदत्तम्
D.सुसङ्गताIV.मृच्छकटिकम्
<br>

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - III, B - IV, C - II, D - I

  2. BOption (b)

    A - IV, B - III, C - II, D - I

  3. COption (c)

    A - II, B - III, C - I, D - IV

  4. DOption (d)

    A - IV, B - III, C - I, D - II

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Correct answer

Answer: (d)D.

A - IV, B - III, C - I, D - II

Why this answer is correct

उत्तर- A - IV, B - III, C - I, D - II

A. मदनिका- मृच्छकटिकम् (IV)

मदनिका शूद्रककृत मृच्छकटिकम् नाटक की एक प्रमुख दासी पात्रा है। वह चारुदत्त की दासी है और नायिका वसन्तसेना की सहचरी भी बनती है। उसकी भूमिका नाटक में हास्य, प्रेम और सामाजिक संवाद को गहराई देती है।

B. पद्मिनिका- स्वप्नवासवदत्तम् (III)

पद्मिनिका भासकृत स्वप्नवासवदत्तम् की एक सहचरी पात्रा है, जो नायिका वासवदत्ता की सखी है। वह नाटकीय घटनाओं में संवाद और रहस्य को आगे बढ़ाने में सहायक होती है।

C. विजया- मुद्राराक्षसम् (I)

विजया विशाखदत्तकृत मुद्राराक्षसम् की एक प्रमुख स्त्री पात्रा है। वह चाणक्य की योजनाओं में सहायक होती है और नाटक की राजनीतिक गूढ़ता में स्त्री-भूमिका को दर्शाती है।

D. सुसङ्गता- रत्नावली (II)

सुसङ्गता हर्षवर्धनकृत रत्नावली नाटक की एक प्रमुख पात्रा है। वह नायिका रत्नावली की सखी है और नायक उदयन के साथ उसकी प्रेमकथा को आगे बढ़ाने में सहायक होती है।

इस प्रकार, सभी पात्रों का उनके संबंधित नाटकों से मेल इस प्रकार है:

  • मदनिका- मृच्छकटिकम्
  • पद्मिनिका- स्वप्नवासवदत्तम्
  • विजया- मुद्राराक्षसम्
  • सुसङ्गता- रत्नावली

Question 45

'स्मृतिचन्द्रिका' केन लिखिता ?

  1. AOption (a)

    कुल्लूकभट्टेन

  2. BOption (b)

    चण्डेश्वरेण

  3. COption (c)

    शङ्करभट्टेन

  4. DOption (d)

    देवणभट्टेन

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Correct answer

Answer: (d)D.

देवणभट्टेन

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प्रश्नार्थ- 'स्मृतिचन्द्रिका' किसने लिखा है?

उत्तर- देवणभट्टेन

ग्रंथ: स्मृतिचन्द्रिका

  • ‘स्मृतिचन्द्रिका’ एक प्रसिद्ध धर्मशास्त्रीय ग्रंथ है, जो विशेष रूप से मिताक्षरा परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
  • यह ग्रंथ धर्म, आचार, व्यवहार, उत्तराधिकार, विवाह, श्राद्ध आदि विषयों पर विस्तृत विवेचन करता है।

रचयिता: देवणभट्ट

  • देवणभट्ट (या देवन्नभट्ट) दक्षिण भारत के एक प्रमुख धर्मशास्त्रज्ञ थे।
  • उन्होंने यह ग्रंथ मिताक्षरा व्याख्या की परंपरा में लिखा, और इसे विशेष रूप से द्रविड़ क्षेत्र में मान्यता प्राप्त हुई।
  • देवणभट्ट का पूरा नाम कई बार "याज्ञिक देवणभट्ट उपाध्याय" के रूप में भी उल्लिखित होता है।

ग्रंथ की विशेषताएँ:

  • स्मृतिचन्द्रिका में मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति, नारदस्मृति आदि ग्रंथों के श्लोकों का उद्धरण देकर उनका व्यावहारिक और न्यायशास्त्रीय विश्लेषण किया गया है।
  • यह ग्रंथ आह्निककाण्ड, विवाहकाण्ड, उत्तराधिकारकाण्ड आदि खंडों में विभाजित है।
  • विशेष रूप से उत्तराधिकार विषय पर इसकी व्याख्या अत्यंत प्रामाणिक मानी जाती है।

यह ग्रंथ आज भी धर्मशास्त्र, विधिशास्त्र और समाजशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए एक अमूल्य स्रोत है।

Question 46

"मातरि साधुर्निपुणो वा" इत्यत्र कस्मिन् अर्थे सप्तमी ?

  1. AOption (a)

    आख्यातोपयोगे

  2. BOption (b)

    अधिकार्थवचने

  3. COption (c)

    अर्चायाम्

  4. DOption (d)

    नियोगार्थे

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Correct answer

Answer: (c)C.

अर्चायाम्

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उत्तर- अर्चायाम्

"मातरि साधुर्निपुणो वा" - इस वाक्य में "मातरि" शब्द सप्तमी विभक्ति में है, और इसका प्रयोग अर्चायामर्थे (पूजा, आदर, सम्मान के अर्थ में) हुआ है।

यह प्रयोग पाणिनि के अष्टाध्यायी सूत्र 2.3.43 - "साधुनिपुणाभ्यामर्चायां सप्तम्यप्रतेः" के अंतर्गत आता है। इस सूत्र का अर्थ है:

"जब 'साधु' या 'निपुण' शब्दों का प्रयोग 'अर्चा' (पूजा/आदर) के अर्थ में हो, और 'प्रति', 'परि', 'अनु' आदि उपसर्ग न हों, तब सप्तमी विभक्ति का प्रयोग होता है।"

उदाहरण:

मातरि साधुः - माता के प्रति आदरभाव है

पितरि निपुणः - पिता के प्रति कुशलता या सेवा में दक्षता है

यहाँ "मातरि" और "पितरि" - दोनों सप्तमी में हैं, और साधु/निपुण शब्दों के साथ अर्चा (आदर) का भाव प्रकट कर रहे हैं।

अन्य विकल्पों का परीक्षण:

    1. आख्यातोपयोगे — यह तब होता है जब विभक्ति क्रिया के प्रयोग से निर्धारित होती है, परंतु यहाँ ऐसा नहीं है।
    1. अधिकार्थवचने — यह तब होता है जब कोई स्थान या अधिकार सूचित किया जाता है, जैसे "गृहे राजा" (राजा घर में है)।
    1. नियोगार्थे — यह आदेश या निर्देश के अर्थ में होता है, जैसे "राज्ञि यजेत" (राजा के लिए यज्ञ करे)।

निष्कर्ष:

"मातरि साधुः" में सप्तमी विभक्ति का प्रयोग अर्चायामर्थे हुआ है - अर्थात् माता के प्रति आदरभाव प्रकट करने हेतु।

अतः उत्तर 3) अर्चायाम् पूर्णतः शास्त्रसम्मत है

Question 47

यास्केन उद्धृतेषु द्वादशसु निरुक्तकारेषु भवन्ति -

A. कात्थक्यः

B. सुवर्णनाभः

C. गालवः

D. लाटदेवः

E. स्थौलाष्ठविः

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, C, E केवलम्

  2. BOption (b)

    B, D, E केवलम्

  3. COption (c)

    C, D, E केवलम्

  4. DOption (d)

    A, D, E केवलम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

A, C, E केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर- A, C, E केवलम्

  • यह प्रश्न यास्ककृत निरुक्त ग्रंथ में उद्धृत द्वादश निरुक्तकारों (व्युत्पत्तिकारों) से संबंधित है।
  • यास्क ने अपने ग्रंथ निरुक्त में पूर्ववर्ती व्याख्याताओं के मतों का उल्लेख करते हुए बारह प्रमुख आचार्यों का नाम लिया है, जिनके मतों का खंडन-मंडन करते हुए उन्होंने अपने सिद्धांत प्रस्तुत किए हैं।
  • इन द्वादश निरुक्तकारों में से कात्थक्यः, गालवः, और स्थौलाष्ठविः प्रमुख रूप से यास्क द्वारा उद्धृत हैं।

आइए इन तीनों का संक्षिप्त परिचय देखें:

  • कात्थक्यः (A) — यह एक प्राचीन वैदिक व्युत्पत्तिकार थे, जिनके मतों का यास्क ने निरुक्त में उल्लेख किया है। वे शब्दों की व्याख्या में धातु-प्रधान दृष्टिकोण रखते थे।
  • गालवः (C) — गालव भी एक प्रसिद्ध वैदिक व्याख्याकार थे। यास्क ने उनके मतों को उद्धृत कर कभी समर्थन तो कभी खंडन किया है।
  • स्थौलाष्ठविः (E) — यह भी यास्क द्वारा उद्धृत एक निरुक्तकार हैं, जिनकी व्याख्याएँ विशेष रूप से द्रव्य और क्रिया के भेद पर आधारित हैं।

अन्य विकल्पों का परीक्षण:

  • सुवर्णनाभः (B) — यास्क के निरुक्त में इनका उल्लेख नहीं मिलता। यह नाम अन्य वैदिक ग्रंथों में भले हो, परंतु निरुक्तकारों की सूची में नहीं आता।
  • लाटदेवः (D) — यह भी यास्क द्वारा उद्धृत निरुक्तकारों में नहीं गिने जाते।

 

इसलिए, A (कात्थक्यः), C (गालवः), और E (स्थौलाष्ठविः) ही यास्क द्वारा उद्धृत निरुक्तकारों में सम्मिलित हैं, और विकल्प 1) A, C, E केवलम् ही शुद्ध उत्तर है।

Question 48

यथाक्रमं मृच्छकटिकोक्तश्लोकं रचयत -

A. किं वा प्रशस्तवचनैर्बहुभिर्मदुक्तैः

B. रक्तञ्च नाम मधुरञ्च

C. भावान्वितञ्च ललितञ्च मनोहरञ्च

D. समं स्फुटञ्च

E. अन्तर्हिता यदि भवेद्वनितेति मन्ये

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    B, D, C, E, A

  2. BOption (b)

    B, D, C, A, E

  3. COption (c)

    B, D, A, C, E

  4. DOption (d)

    A, B, D, C, E

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Correct answer

Answer: (b)B.

B, D, C, A, E

Why this answer is correct

उत्तर- B, D, C, A, E

मृच्छकटिकम् संस्कृत साहित्य का एक प्रसिद्ध नाटक है, जिसकी रचना शूद्रक ने की थी। यह नाटक सामाजिक, राजनीतिक और प्रेम संबंधी विषयों को दर्शाता है। प्रस्तुत प्रश्न में दिए गए श्लोकों को सही क्रम में व्यवस्थित करने पर सही उत्तर B, D, C, A, E बनता है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:

श्लोकों का क्रम और अर्थ:

रक्तञ्च नाम मधुरञ्च (B)

  • यह पंक्ति सौंदर्य और आकर्षण को दर्शाती है।
  • इसमें रंग (रक्त) और मधुरता का उल्लेख है, जो किसी वस्तु या व्यक्ति की विशेषता को उजागर करता है।

समं स्फुटञ्च (D)

  • यह पंक्ति संतुलन और स्पष्टता को दर्शाती है।
  • इसमें समता (संतुलन) और स्फुटता (स्पष्टता) का उल्लेख है, जो किसी विचार या अभिव्यक्ति की विशेषता को दर्शाता है।

भावान्वितञ्च ललितञ्च मनोहरञ्च (C)

  • यह पंक्ति भावनाओं और सौंदर्य को दर्शाती है।
  • इसमें भावनात्मकता, कोमलता और मनोहरता का उल्लेख है, जो किसी वस्तु या व्यक्ति की विशेषता को उजागर करता है।
  • किं वा प्रशस्तवचनैर्बहुभिर्मदुक्तैः (A)
  • यह पंक्ति प्रशंसा और शब्दों के प्रभाव को दर्शाती है।
  • इसमें प्रशंसा के शब्दों की सार्थकता पर विचार किया गया है।

अन्तर्हिता यदि भवेद्वनितेति मन्ये (E)

  • यह पंक्ति स्त्री के अस्तित्व और उसकी भूमिका को दर्शाती है।
  • इसमें स्त्री के अंतर्धान (अदृश्य होने) की संभावना पर विचार किया गया है।

निष्कर्ष:

मृच्छकटिकम् में प्रयुक्त श्लोकों का क्रम B, D, C, A, E है, जो सौंदर्य, स्पष्टता, भावनात्मकता, प्रशंसा और स्त्री की भूमिका को क्रमशः दर्शाता है। यह नाटक संस्कृत साहित्य में अपनी सामाजिक और भावनात्मक गहराई के लिए प्रसिद्ध है।

Question 49

"परस्तु शब्दसन्तानः प्रचयापचयात्मकः" इत्यादिकारिकायां शब्दसन्तानः' इति शब्दस्य कोऽर्थः ?

  1. AOption (a)

    शब्दोच्चारणस्थानानि

  2. BOption (b)

    शब्दतरङ्गः

  3. COption (c)

    स्फोट:

  4. DOption (d)

    हस्वादिगुणाः

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Correct answer

Answer: (b)B.

शब्दतरङ्गः

Why this answer is correct

उत्तर- शब्दतरङ्गः

"शब्दसन्तानः" शब्द का अर्थ "शब्दतरंगः" होता है। यह भाषा विज्ञान और व्याकरण में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो ध्वनि तरंगों के प्रवाह और उनके क्रमिक परिवर्तन को दर्शाती है।

विस्तृत व्याख्या:

  • "परस्तु शब्दसन्तानः प्रचयापचयात्मकः" का अर्थ है कि शब्दों की श्रृंखला (शब्दसंतान) क्रमशः वृद्धि और क्षय के रूप में होती है।
  • यह सिद्धांत भाषा के ध्वनि प्रवाह को समझाने के लिए प्रयुक्त होता है, जिसमें शब्दों की ध्वनियाँ एक के बाद एक उत्पन्न होती हैं और उनका क्रमिक परिवर्तन होता है।
  • "शब्दतरंगः" का तात्पर्य शब्दों की ध्वनि तरंगों से है, जो उच्चारण के दौरान उत्पन्न होती हैं और भाषा के प्रवाह को नियंत्रित करती हैं।

शब्दतरंग का महत्व:

  • ध्वनि विज्ञान (Phonetics) में शब्दतरंग का अध्ययन किया जाता है, जिससे भाषा की ध्वनि संरचना को समझा जा सकता है।
  • संस्कृत व्याकरण में यह सिद्धांत स्फोटवाद से जुड़ा हुआ है, जिसमें शब्दों की ध्वनि और उनके अर्थ की व्याख्या की जाती है।
  • भाषा के विकास में शब्दतरंग महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि यह शब्दों के क्रमिक परिवर्तन और उनके उच्चारण को प्रभावित करता है।

निष्कर्ष:

संस्कृत भाषा में "शब्दसन्तानः" शब्द का अर्थ "शब्दतरंगः" होता है, जो भाषा के ध्वनि प्रवाह और उसके क्रमिक परिवर्तन को दर्शाता है। यह सिद्धांत भाषा विज्ञान और व्याकरण में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

Question 50

ऋग्वेदस्य मण्डलक्रमे कति अनुवाकाः भवन्ति ?

  1. AOption (a)

    64

  2. BOption (b)

    72

  3. COption (c)

    82

  4. DOption (d)

    85

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Correct answer

Answer: (d)D.

85

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- ऋग्वेद के मण्डल क्रम में कितने अनुवाक है?

उत्तर- 85

ऋग्वेद के मण्डलक्रम में 85 अनुवाक होते हैं. ऋग्वेद को 10 मण्डलों में विभाजित किया गया है, और प्रत्येक मण्डल में विभिन्न सूक्तों और मंत्रों का समावेश होता है।

ऋग्वेद का विभाजन:

  • मण्डल -10
  • अनुवाक - 85
  • सूक्त - 1028
  • मंत्र - 10580

ऋग्वेद के शाकल शाखा के अनुसार, इन 85 अनुवाकों में मंत्रों को व्यवस्थित किया गया है। प्रत्येक अनुवाक में सूक्तों का क्रम निर्धारित होता है, जिससे ऋग्वेद के अध्ययन और पाठन में सुविधा होती है।

Question 51

उपपुराणानि चिनुत -

A. शाम्बपुराणम्

B. वायुपुराणम्

C. वरुणपुराणम्

D. मारीचपुराणम्

E. ब्रह्मवैवर्तपुराणम्

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, C केवलम्

  2. BOption (b)

    C, D, E केवलम्

  3. COption (c)

    A, C, D केवलम्

  4. DOption (d)

    B, C, D केवलम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

A, C, D केवलम्

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उत्तर- A, C, D केवलम्

उपपुराण हिंदू धर्म के ग्रंथों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। ये महापुराणों के पूरक होते हैं और विभिन्न देवी-देवताओं, तीर्थों, धर्मशास्त्रों तथा ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन करते हैं।

सही उत्तर A, C, D (शाम्बपुराणम्, वरुणपुराणम्, मारीचपुराणम्) है। ये सभी उपपुराण की श्रेणी में आते हैं।

1. शाम्बपुराणम् (A)

  • यह सूर्य उ��ासना से संबंधित उपपुराण है।
  • इसमें शाम्ब (श्रीकृष्ण के पुत्र) द्वारा सूर्य की आराधना का वर्णन मिलता है।
  • यह सौर धर्म और सूर्य पूजा की विधियों को विस्तार से बताता है।

2. वरुणपुराणम् (C)

  • यह जल और जल देवता वरुण से संबंधित उपपुराण है।
  • इसमें जल तत्व, तीर्थ स्नान, और वरुण देव की महिमा का वर्णन किया गया है।
  • यह पवित्र नदियों और जल स्रोतों के महत्व को दर्शाता है।

3. मारीचपुराणम् (D)

  • यह ऋषि मारीच द्वारा रचित उपपुराण माना जाता है।
  • इसमें धार्मिक अनुष्ठानों, यज्ञों, और आध्यात्मिक साधनाओं का वर्णन किया गया है।
  • यह वेदों और पुराणों के बीच एक सेतु के रूप में कार्य करता है।

अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • वायुपुराणम् (B) महापुराणों में गिना जाता है, इसलिए यह उपपुराण नहीं है।
  • ब्रह्मवैवर्तपुराणम् (E) भी महापुराण की श्रेणी में आता है, इसलिए यह सही उत्तर में शामिल नहीं है।

निष्कर्ष:

शाम्बपुराण, वरुणपुराण और मारीचपुराण उपपुराणों की श्रेणी में आते हैं। ये ग्रंथ हिंदू धर्म के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से समझाने में सहायक होते हैं।

Question 52

समुचितं मेलयत -

A.साध्यवदन्यवृत्तिःI.बाधः
B.पक्षे पक्षतावच्छेदकस्याभावःII.सत्प्रतिपक्षः
C.साध्याभाववान् पक्षःIII.साधारणः
D.साध्याभावव्याप्यवान् पक्षःIV.आश्रयासिद्धिः
<br>

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - II, B - III, C - IV, D - I

  2. BOption (b)

    A - III, B - I, C - IV, D - II

  3. COption (c)

    A - III, B - I, C - II, D - IV

  4. DOption (d)

    A - III, B - IV, C - I, D - II

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Correct answer

Answer: (d)D.

A - III, B - IV, C - I, D - II

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- समुचित विकल्पों का मेल करे-

उत्तर- A - III, B - IV, C - I, D - II

साध्यवदन्यवृत्तिः (A) - साधारणः (III)

  • साध्यवदन्यवृत्तिः का अर्थ है कि कोई विशेषता अन्य स्थानों पर भी पाई जाती है।
  • इसे साधारण कहा जाता है क्योंकि यह किसी विशेष पक्ष तक सीमित नहीं होती।

पक्षे पक्षतावच्छेदकस्याभावः (B) - आश्रयासिद्धिः (IV)

  • पक्ष में यदि पक्षतावच्छेदक का अभाव हो, तो वह तर्क में मान्य नहीं होता।
  • इसे आश्रयासिद्धि कहा जाता है, क्योंकि तर्क का आधार ही असिद्ध होता है।

साध्याभाववान् पक्षः (C) - बाधः (I)

  • यदि किसी पक्ष में साध्य का अभाव हो, तो वह तर्क में बाधा उत्पन्न करता है।
  • इसे बाध कहा जाता है, क्योंकि यह निष्कर्ष को अस्वीकार करता है।

साध्याभावव्याप्यवान् पक्षः (D) - सत्प्रतिपक्षः (II)

  • यदि कोई पक्ष साध्य के अभाव से व्याप्त हो, तो वह तर्क में एक मजबूत प्रतिपक्ष प्रस्तुत करता है।
  • इसे सत्प्रतिपक्ष कहा जाता है, क्योंकि यह मूल तर्क के विरोध में एक वैध तर्क प्रस्तुत करता है।

इस प्रकार, प्रस्तुत उत्तर तर्कशास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार उचित है।

Question 53

तन् धातोः लुङ्लकारस्य रूपाणि चिनुत -

A. अतुदत

B. अतौत्ताम्

C. अतुदध्वम्

D. अतुत्साताम्

E. अतुद्ध्वम्

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, D, E केवलम्

  2. BOption (b)

    B, D, E केवलम्

  3. COption (c)

    A, B, D केवलम्

  4. DOption (d)

    A, B, C केवलम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

B, D, E केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- तन् धातु के लुङ्लकार रूपों को चुने-

उत्तर- B, D, E केवलम्

Important Pointsतन् धातु और लुङ्लकार रूपों का विश्लेषण:

संस्कृत व्याकरण में तन् धातु का अर्थ फैलाना या विस्तार करना होता है। यह तनादिगण में आता है और उभयपदी धातु है। लुङ्लकार (सामान्य भूतकाल) में इस धातु के रूप निम्नलिखित होते हैं:

  • B (अतौत्ताम्) → यह द्विवचन प्रथम पुरुष का रूप है।
  • D (अतुत्साताम्) → यह द्विवचन मध्यम पुरुष का रूप है।
  • E (अतुद्ध्वम्) → यह बहुवचन मध्यम पुरुष का रूप है।

अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • A (अतुदत) → यह तन् धातु का सही रूप नहीं है, बल्क��� तुद् धातु से संबंधित हो सकता है।
  • C (अतुदध्वम्) → यह भी तन् धातु का सही रूप नहीं है।

लुङ्लकार में तन् धातु के अन्य रूप:

  • एकवचन प्रथम पुरुष → अतनोत्
  • द्विवचन प्रथम पुरुष → अतौत्ताम्
  • बहुवचन प्रथम पुरुष → अतन्वन्
  • एकवचन मध्यम पुरुष → अतनोः
  • द्विवचन मध्यम पुरुष → अतुत्साताम्
  • बहुवचन मध्यम पुरुष → अतुद्ध्वम्

 

इस प्रकार, B, D, E ही सही उत्तर हैं।

Question 54

तनितुमिच्छति इत्यर्थे किं किं रूपं साधु ?

A. तितांसति

B. तितंसति

C. तितंसिषति

D. तितनिषति

E. तितांतिषति

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, D केवलम्

  2. BOption (b)

    B, C, D केवलम्

  3. COption (c)

    C, D, E केवलम्

  4. DOption (d)

    A, D, E केवलम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

A, B, D केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर- A, B, D केवलम्

यह प्रश्न धातु "तनु" (विस्तारे) के सन् प्रत्यय से बने इच्छार्थक रूपों से संबंधित है। "तनितुमिच्छति" - अर्थात् "तानना चाहता है" - इस अर्थ में जो रूप प्रयोग में आते हैं, वे साधु रूप (व्याकरणसम्मत) माने जाते हैं।

अब आइए विकल्पों का विश्लेषण करें:

✅ A. तितांसति

यह रूप सन् प्रत्यय से बना हुआ है और व्याकरण की दृष्टि से मान्य है। यह रूप तनोते धातु से इच्छार्थक प्रयोग में आता है।

✅ B. तितंसति

यह भी एक वैकल्पिक रूप है जो सन् प्रत्यय के प्रयोग से उत्पन्न होता है। सिद्धहेमचन्द्रशब्दानुशासनम् जैसे ग्रंथों में यह रूप प्रमाणित है।

❌ C. तितंसिषति

यह रूप सन् + सिच् (लोट्/लृट्) के अनुचित संयोग से बना प्रतीत होता है, जो व्याकरण की दृष्टि से असंगत है।

✅ D. तितनिषति

यह भी एक वैकल्पिक रूप है जो सन् प्रत्यय के अन्य रूपांतरण से उत्पन्न होता है। यह धुटादि नियमों के अंतर्गत आता है।

❌ E. तितांतिषति

यह रूप व्याकरण में मान्य नहीं है और न ही किसी प्रमाणिक ग्रंथ में इसका उल्लेख मिलता है।

निष्कर्ष:

"तनितुमिच्छति" के लिए जो रूप साधु (शुद्ध) माने जाते हैं, वे हैं:

  • तितांसति
  • तितंसति
  • तितनिषति

इसलिए विकल्प 1) A, B, D केवलम् ही शुद्ध और शास्त्रसम्मत उत्तर है।

Question 55

परस्परं समुचितं मेलयत

A.सुनुयातI.लङ्लकारः
B.सूयात्II.आशीर्लिङ्लकारः
C.असोषतIII.विधिलिङ्लकारः
D.असुनुतIV.लुङ्लकारः
<br>

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - II, B - IV, C - III, D - I

  2. BOption (b)

    A - II, B - III, C - I, D - IV

  3. COption (c)

    A - II, B - III, C - IV, D - I

  4. DOption (d)

    A - III, B - II, C - I, D - IV

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Correct answer

Answer: (a)A.

A - II, B - IV, C - III, D - I

Why this answer is correct

उत्तर- A - II, B - IV, C - III, D - I

यह प्रश्न संस्कृत व्याकरण के लकार और उनके प्रयोग से संबंधित है।

A. सुनुयात - आशीर्लिङ्लकारः (II)

  • यह रूप श्रु धातु (श्रवण) से बना है।
  • "यात्" प्रत्यय दर्शाता है कि यह आशीर्लिङ् लकार (आशीर्वाद के लिए प्रयुक्त) है।
  • अर्थ: "वह सुने (ऐसा शुभ हो)" — आशीर्वचन।

B. सूयात् - लुङ्लकारः (IV)

  • यह रूप सू धातु (प्रसारण, फैलाना) से बना है।
  • "यात्" प्रत्यय के साथ यह लुङ् लकार (परोक्ष भूतकाल) का रूप है।
  • लुङ् लकार में क्रिया भूतकाल में घटित होती है, परंतु वक्ता ने उसे प्रत्यक्ष नहीं देखा होता।

C. असोषत - विधिलिङ्लकारः (III)

  • यह रूप अस् धातु (होना) से बना है।
  • "षत्" प्रत्यय और "असो" पूर्वरूप दर्शाते हैं कि यह विधिलिङ् लकार (संभावना, इच्छा, आदेश) का प्रयोग है।
  • अर्थ: "वह हो सकता था / हो"

D. असुनुत - लङ्लकारः (I)

  • यह भी अस् धातु से बना है।
  • "नुत्" प्रत्यय दर्शाता है कि यह लङ् लकार (अनद्यतन भूतकाल) का रूप है।
  • अर्थ: "वह था / हुआ था

Question 56

समीचीनसम्बन्धं मेलयत -

A.शूद्रकःI.आदिसूरः
B.भट्टनारायणःII.भट्टगोपालः
C.विल्हणःIII.नायकचारुदत्तः
D.भवभूतिःIV.कर्णसुन्दरी
<br>

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - I, B - II, C - IV, D - III

  2. BOption (b)

    A - III, B - II, C - I, D - IV

  3. COption (c)

    A - III, B - I, C - IV, D - II

  4. DOption (d)

    A - III, B - IV, C - II, D - I

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Correct answer

Answer: (c)C.

A - III, B - I, C - IV, D - II

Why this answer is correct

उत्तर- A - III, B - I, C - IV, D - II

प्रश्न में दिए गए साहित्यकारों और उनके काव्य/नाट्य कृतियों के बीच समीचीन सम्बन्ध को पहचानने पर सही उत्तर 3) A - III, B - I, C - IV, D - II बनता है।

A. शूद्रकः- III. नायकचारुदत्तः

  • शूद्रक प्रसिद्ध संस्कृत नाटककार हैं, जिनकी रचना "मृच्छकटिकम्" है।
  • इस नाटक का नायक चारुदत्तः है, जो एक उदार और धर्मनिष्ठ ब्राह्मण है।
  • अतः शूद्रक का संबंध नायकचारुदत्तः से है।

B. भट्टनारायणः- I. आदिसूरः

  • भट्टनारायण ने "वेंकटेश्वर विजयम्" नामक काव्य की रचना की, जिसमें आदिसूर नामक पात्र का उल्लेख मिलता है।
  • आदिसूर एक ऐतिहासिक राजा माने जाते हैं, जिनका वर्णन भट्टनारायण के ग्रंथ में हुआ है।

C. विल्हणः- IV. कर्णसुन्दरी

  • विल्हण ने "कर्णसुन्दरी" नामक नाटक की रचना की, जो एक एकांकी नाट्यकृति है।
  • यह नाटक कर्ण और सुन्दरी के संवाद पर आधारित है।

D. भवभूतिः- II. भट्टगोपालः

  • भवभूति संस्कृत के महान नाटककार हैं, जिनकी रचनाओं में उत्तररामचरितम्, मालतीमाधवम्, और महावीरचरितम् प्रमुख हैं।
  • भट्टगोपाल भवभूति के समकालीन और उनके संरक्षक माने जाते हैं।

निष्कर्ष:

इस प्रकार, उपयुक्त मेल इस प्रकार है:

  • A - III (शूद्रकः — नायकचारुदत्तः)
  • B - I (भट्टनारायणः — आदिसूरः)
  • C - IV (विल्हणः — कर्णसुन्दरी)
  • D - II (भवभूतिः — भट्टगोपालः)

 

यह मेल संस्कृत साहित्य के ऐतिहासिक और काव्यिक संदर्भों पर आधारित है, जो इन रचनाकारों की विशिष्ट कृतियों और पात्रों से जुड़ा हुआ है।

Question 57

एतासु महाभाष्यप्रदीपस्योपरि लिखिताष्टीकाः चिनुत-

A. उद्द्योतः 

B. सर्वमङ्गला 

C. उद्द्योतनम्

D. चन्द्रिका

<br>

E. आनन्दा

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, D केवलम्

  2. BOption (b)

    B, C केवलम्

  3. COption (c)

    A, C केवलम्

  4. DOption (d)

    B, E केवलम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

A, C केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर- A, C केवलम्

यह प्रश्न महाभाष्यप्रदीप (कात्यायनकृत वार्तिकों पर पतञ्जलिकृत महाभाष्य पर काशिकावृत्तिकार वाचस्पतिमिश्र द्वारा रचित प्रदीप टीका) के ऊपर लिखित अष्टीकाओं (अर्थात् उपटीकाओं या व्याख्याओं) से संबंधित है।

महाभाष्यप्रदीप पर लिखित अष्टीकाः:

उद्द्योतः (A) — यह एक प्रसिद्ध अष्टीका है जो महाभाष्यप्रदीप पर लिखी गई है। इसका उद्देश्य प्रदीप की व्याख्या को और अधिक स्पष्ट करना है। यह ग्रंथ गदाधर भट्ट अथवा अन्य नव्यन्यायाचार्यों से संबंधित माना जाता है।

उद्द्योतनम् (C) — यह भी महाभाष्यप्रदीप पर लिखी गई एक अन्य अष्टीका है। यह उद्द्योतः से भिन्न है, यद्यपि नाम साम्य है। इसमें प्रदीप के गूढ़ तात्पर्य को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।

अन्य विकल्पों का परीक्षण:

  • सर्वमङ्गला (B) — यह अष्टीका महाभाष्य या प्रदीप पर नहीं, बल्कि अन्य ग्रंथों (जैसे काव्यशास्त्र या तंत्रशास्त्र) से संबंधित मानी जाती है।
  • चन्द्रिका (D) — यह नाम कई ग्रंथों की टीकाओं में आता है (जैसे लघुचन्द्रिका, तर्कचन्द्रिका), परंतु महाभाष्यप्रदीप पर इसकी कोई प्रसिद्ध अष्टीका नहीं मानी जाती।
  • आनन्दा (E) — यह भी महाभाष्यप्रदीप पर लिखित अष्टीका नहीं है; यह नाम अन्य ग्रंथों की टीकाओं में मिलता है।

निष्कर्ष:

उद्द्योतः और उद्द्योतनम् — ये दोनों ही महाभाष्यप्रदीप पर लिखित प्रमाणिक अष्टीकाएँ हैं। अतः विकल्प 3) A, C केवलम् ही शुद्ध और शास्त्रसम्मत उत्तर है।

Question 58

"अणो द्व्यचः" इति सूत्रेण किं विधीयते ?

  1. AOption (a)

    अण्

  2. BOption (b)

    फिन्

  3. COption (c)

    फक्

  4. DOption (d)

    फिञ्

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Correct answer

Answer: (d)D.

फिञ्

Why this answer is correct

उत्तर: 4) फिञ्

Important Pointsसूत्र: "अणो द्व्यचः" (अष्टाध्यायी 4.1.156)

यह सूत्र पाणिनि द्वारा रचित अष्टाध्यायी के तद्धितप्रकरण में आता है और इसका संबंध अपत्यार्थे तद्धितप्रत्यय से है।

सूत्र का विग्रह:

अणः - "अण्" प्रत्यय से बने प्रातिपदिकों से।

द्व्यचः - जिन प्रातिपदिकों में दो ही वर्ण (अक्षर) हों।

(अपत्ये) - यह लुप्तविधेय अर्थ है, अर्थात् "अपत्ये" (संतान के अर्थ में)।

फिञ् - यह प्रत्यय विधेय है, जो इस सूत्र से निष्पन्न होता है।

सूत्र का अर्थ:

"जो प्रातिपदिक 'अण्' प्रत्यय से बना हो और द्व्यच (दो वर्णों वाला) हो, उससे 'अपत्यार्थे' फिञ् प्रत्यय होता है।"

यह सूत्र इञ् प्रत्यय का अपवाद है। सामान्यतः अपत्ये अर्थे इञ् प्रत्यय होता है, परंतु जब अण् प्रत्यय से बना द्व्यच प्रातिपदिक हो, तब फिञ् प्रत्यय होता है।

उदाहरण:

  • कर्तृ + अण् → कार्त्र

कार्त्र (कर्तृ से बना अण् प्रत्ययान्त प्रातिपदिक) — द्व्यच है।

→ कार्त्र + फिञ् → कार्त्रायणिः (कर्तृ का पुत्र)

  • दक्ष + अण् → दाक्ष

→ दाक्ष + फिञ् → दाक्षायणिः (दक्ष का पुत्र)

अन्य विकल्पों का परीक्षण:

  1. अण् - यह प्रत्यय है, परंतु सूत्र में इसका प्रयोग पूर्वसर्ग के रूप में हुआ है, न कि विधेय रूप में।

  2. फिन् - यह प्रत्यय नहीं है, और न ही इस संदर्भ में उपयुक्त।

  3. फक् - यह अन्य तद्धितप्रत्ययों में प्रयुक्त होता है, परंतु इस सूत्र में नहीं।

निष्कर्ष:

"अणो द्व्यचः" सूत्र के द्वारा फिञ् प्रत्यय की विधि होती है, जो अण् प्रत्ययान्त द्व्यच प्रातिपदिकों से अपत्यार्थे प्रयुक्त होता है। अतः उत्तर 4) फिञ् पूर्णतः शास्त्रसम्मत है।

Question 59

एतेषु विकर्षणादिः भवति-

  1. AOption (a)

    वर्णः

  2. BOption (b)

    स्वरः

  3. COption (c)

    सन्तानः

  4. DOption (d)

    साम

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Correct answer

Answer: (c)C.

सन्तानः

Why this answer is correct

उत्तर- सन्तानः

 Important Pointsयह प्रश्न शिक्षा वेदाङ्ग के एक प्रसिद्ध सूत्र से संबंधित है, जो तैत्तिरीयोपनिषद् के शिक्षावल्ली में वर्णित है:

"वर्णः स्वरः मात्रा बलं साम सन्तानः" - इत्युक्तः शिक्षाध्यायः

इस वाक्य में वेदाध्ययन के छह प्रमुख अंगों का उल्लेख है, जो उच्चारण और पाठ की शुद्धता सुनिश्चित करते हैं। इन छहों में से प्रत्येक का एक विशिष्ट प्रारंभिक गुण (आदि) होता है।

अब आइए समझते हैं कि "विकर्षणादिः" किसका गुण है:

विकर्षण का अर्थ:

विकर्षण का तात्पर्य है — लंबे खिंचाव या प्रवाह के साथ उच्चारण करना, अर्थात् ध्वनि की निरंतरता और प्रवाह।

सन्तानः- विकर्षणादिः:

सन्तान का अर्थ है — ध्वनि की निरंतरता, प्रवाह और क्रमबद्धता। यह वेदपाठ में वर्णों और स्वरों के बीच संतुलित गति और प्रवाह बनाए रखने की कला है।

इसमें विकर्षण (धीरे-धीरे खींचकर उच्चारण) का विशेष महत्व होता है, जिससे पाठ में लयबद्धता और स्पष्टता आती है। अतः सन्तान का प्रारंभिक गुण विकर्षण माना गया है।

अन्य विकल्पों का परीक्षण:

  • वर्णः - इसका आदि गुण उच्चारण की स्पष्टता है, न कि विकर्षण।
  • स्वरः - इसका आदि गुण उदात्त, अनुदात्त, स्वरित जैसे स्वरभेद हैं।
  • साम - इसका आदि गुण लय और संगीतात्मकता है, परंतु विकर्षण नहीं।

निष्कर्ष:

सन्तानः ही वह अंग है जिसका प्रारंभ विकर्षण से होता है। इसलिए उत्तर 3) सन्तानः पूर्णतः शास्त्रसम्मत और युक्तियुक्त है।

Question 60

ध्वनिपरिवर्तनस्य मुख्यानि कारणानि कति ?

  1. AOption (a)

    द्वे

  2. BOption (b)

    त्रीणि

  3. COption (c)

    चत्वारि

  4. DOption (d)

    पञ्च

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Correct answer

Answer: (a)A.

द्वे

Why this answer is correct

उत्तर- द्वे

ध्वनिपरिवर्तन के मुख्य दो कारण होते हैं, जो भाषा-विज्ञान और ध्वनि-विज्ञान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

  1. उच्चारण की सुविधा
  • भाषा के प्रयोग में सरलता और प्रवाह बनाए रखने के लिए ध्वनियाँ परिवर्तित होती हैं।
  • जब कोई ध्वनि उच्चारण में कठिन होती है, तो वक्ता उसे सरल रूप में बदल देता है।
  • उदाहरण: संस्कृत में "सप्त" शब्द हिंदी में "सात" बन जाता है, क्योंकि "सप्त" का उच्चारण कठिन है।
  1. ध्वनि-पर्यावरण
  • ध्वनि के आसपास की अन्य ध्वनियाँ उसके स्वरूप को प्रभावित करती हैं।
  • यदि कोई ध्वनि किसी विशेष स्थान पर आती है, तो वह अपने आसपास की ध्वनियों के अनुसार बदल सकती है।
  • उदाहरण: संस्कृत में "अग्नि" शब्द हिंदी में "अग्नी" बन जाता है, क्योंकि "न" और "इ" के मेल से उच्चारण में परिवर्तन होता है।

निष्कर्ष

ध्वनिपरिवर्तन भाषा के विकास की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जो उच्चारण की सुविधा और ध्वनि-पर्यावरण के कारण होती है। यह प्रक्रिया भाषा को अधिक सुगम और प्रवाहमय बनाती है।

Question 61

श्रीमद्भागवतपुराणस्य टीके वर्तेते 

A. गूढार्थदीपिका

B. तत्त्वदीपिका

C. गूढार्थीका

D. भावार्थदीपिका 

E. सारार्थदर्शिनी

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम्

  2. BOption (b)

    C, D केवलम्

  3. COption (c)

    C, E केवलम्

  4. DOption (d)

    D, E केवलम्

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Correct answer

Answer: (d)D.

D, E केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर: 4) D, E केवलम्

अब आइए इस उत्तर का शास्त्रसम्मत और प्रमाणिक विश्लेषण करें:

✅ D. भावार्थदीपिका

  • यह श्रीधरस्वामी द्वारा रचित प्रसिद्ध टीका है, जिसे "श्रीधरी टीका" भी कहा जाता है।
  • यह श्रीमद्भागवतपुराण पर लिखी गई प्राचीनतम और सर्वमान्य व्याख्या मानी जाती है।
  • इस टीका में श्रीधरस्वामी ने भक्तियोग, वेदान्त, और वैष्णव सिद्धांतों का समन्वय करते हुए गूढ़ भावों को सरल भाषा में प्रस्तुत किया है।

✅ E. सारार्थदर्शिनी

  • यह गौड़ीय वैष्णवाचार्य श्���ी विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर द्वारा रचित टीका है।
  • इसमें उन्होंने भागवत के रस, भक्ति, और तत्त्वज्ञान को अत्यंत भावपूर्ण शैली में स्पष्ट किया है।
  • यह टीका विशेषतः भागवत के रासपंचाध्यायी और उद्धवगीता जैसे अंशों की गूढ़ व्याख्या के लिए प्रसिद्ध है।

❌ अन्य विकल्पों का परीक्षण:

  • A. गूढार्थदीपिका - यह नाम अन्य ग्रंथों (जैसे स्मृतिग्रंथों) की टीकाओं में मिलता है, परंतु श्रीमद्भागवतपुराण पर ऐसी कोई प्रसिद्ध टीका प्रमाणित नहीं है।
  • B. तत्त्वदीपिका - यह नाम भी भागवत पर लिखित किसी मान्य टीका के रूप में प्रमाणित नहीं है।
  • C. गूढार्थीका - यह नाम गूढार्थदीपिका से मिलता-जुलता है, परंतु भागवत पर ऐसी कोई प्रसिद्ध टीका नहीं मिलती।

निष्कर्ष:

भावार्थदीपिका (श्रीधरस्वामीकृत) और सारार्थदर्शिनी (विश्वनाथ चक्रवर्तीकृत) — ये दोनों ही श्रीमद्भागवतपुराण पर लिखित प्रसिद्ध, प्रमाणिक और परंपरासम्मत टीकाएँ हैं।

अतः उत्तर 4) D, E केवलम् पूर्णतः युक्तियुक्त और शास्त्रसम्मत है।

Question 62

दूतप्रणिधिप्रकरणे दूतकर्मणामयं क्रमः सूचितः -

A. प्रपूजया नोत्सिक्तः

B. वसेदविसृष्टः

C. स्त्रियः पानं च वर्जयेत्

D. परेषु बलित्वं न मन्येत

E. वाक्यमनिष्टं सहेत

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, E, D, C, B

  2. BOption (b)

    A, D, E, B, C

  3. COption (c)

    B, A, D, E, C

  4. DOption (d)

    B, C, D, A, E

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Correct answer

Answer: (c)C.

B, A, D, E, C

Why this answer is correct

उत्तर- B, A, D, E, C

यह क्रम दूतप्रणिधिप्रकरणे (राजनीतिक दूतों के आचरण संबंधी शास्त्रीय विवेचन) में वर्णित दूतकर्मणां मर्यादा और अनुशासन को दर्शाता है। आइए प्रत्येक बिंदु को क्रमशः समझते हैं:

1. B. वसेदविसृष्टः- दूत को राजा द्वारा नियुक्त किए जाने के बाद ही कहीं ठहरना चाहिए।

यह प्रारंभिक अवस्था है, जहाँ दूत को स्वेच्छया नहीं, बल्कि राजा की आज्ञा से ही कहीं निवास करना चाहिए। यह अनुशासन और आज्ञापालन का प्रतीक है।

2. A. प्रपूजया नोत्सिक्तः- यदि कहीं उसका सम्मान हो, तो भी वह अहंकार से उन्मत्त न हो।

दूत को प्राप्त सम्मान से वह स्वयं को श्रेष्ठ न माने। यह विनय और संयम का संकेत है।

3. D. परेषु बलित्वं न मन्येत- वह दूसरों पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन न करे।

दूत को अपनी स्थिति का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। यह राजनयिक मर्यादा का मूल है।

4. E. वाक्यमनिष्टं सहेत- यदि कोई कटु वचन कहे, तो भी वह सहन करे।

दूत को धैर्य और सहिष्णुता का परिचय देना चाहिए, क्योंकि वह शांति और संवाद का प्रतिनिधि होता है।

5. C. स्त्रियः पानं च वर्जयेत्- स्त्रियों और मद्यपान से दूर रहे।

यह दूत के नैतिक संयम और आत्मनियंत्रण को दर्शाता है, जिससे वह अपने उद्देश्य से विचलित न हो।

यह क्रम राजनीतिक शिष्टाचार, आत्मसंयम, और कूटनीतिक विवेक का आदर्श रूप प्रस्तुत करता है।

Question 63

अङ्गभावनासम्बन्धिप्रकरणं भवति -

  1. AOption (a)

    संदंशप्रकरणम्

  2. BOption (b)

    अवान्तरप्रकरणम्

  3. COption (c)

    पाठप्रकरणम्

  4. DOption (d)

    महाप्रकरणम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

अवान्तरप्रकरणम्

Why this answer is correct

उत्तर: 2) अवान्तरप्रकरणम्

यह प्रश्न मीमांसादर्शन के प्रकरण सिद्धांत से संबंधित है, विशेषतः अङ्गभावना के संदर्भ में।

अङ्गभावना क्या है?

अङ्गभावना वह भावना है जो मुख्य यज्ञकर्म (मुख्यभावना) के अङ्ग - जैसे प्रयाज, अनुयाज, उपांशु, जूहोति आदि - के लिए की जाती है। ये अङ्ग मुख्य यज्ञ के पूरक होते हैं, परंतु स्वयं भी विधिवत् नियोजित होते हैं।

अवान्तरप्रकरणम् क्या है?

अवान्तरप्रकरणम् वह प्रकरण होता है जो अङ्गभावना से संबंधित होता है। यह मुख्य यज्ञकर्म से अलग, परंतु उससे जुड़ा हुआ होता है। इसमें प्रयाजादि अङ्गों की विधियाँ, उनके प्रयोजन, और उनके माध्यम से मुख्य फल की सिद्धि का विवेचन होता है।

मीमांसाशास्त्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है:

  • "अङ्गभावनासम्बन्धि प्रकरणम् - अवान्तरप्रकरणम्।"
  • "मुख्यभावनासम्बन्धि प्रकरणम् - महाप्रकरणम्।"

इससे स्पष्ट होता है कि जब कोई प्रकरण यज्ञ के अङ्गों की भावना से संबंधित होता है, तो उसे अवान्तरप्रकरण कहा जाता है।

अन्य विकल्पों का परीक्षण:

    1. संदंशप्रकरणम् - यह एक विशेष प्रकार का प्रकरण है जो दो वाक्यों के बीच संबंध स्थापित करता है, परंतु अङ्गभावना से इसका सीधा संबंध नहीं है।
    1. पाठप्रकरणम् - यह पाठक्रम या पाठविन्यास से संबंधित होता है, न कि भावना से।
    1. महाप्रकरणम् - यह मुख्यभावना से संबंधित होता है, जैसे यज्ञ का मुख्य उद्देश्य (स्वर्गकामता आदि)।

निष्कर्ष:

अङ्गभावना से संबंधित प्रकरण को अवान्तरप्रकरणम् कहा जाता है, क्योंकि यह मुख्य यज्ञकर्म के अङ्गों की विधियों और उनके प्रयोजन को स्पष्ट करता है। अतः उत्तर 2) अवान्तरप्रकरणम् पूर्णतः शास्त्रसम्मत और युक्तियुक्त है।

Question 64

योगाङ्गनियमेषु परिगण्यते -

A. सत्यम्

B. शौचम्

C. तपः

D. ईश्वरप्रणिधानम्

E. अस्तेयम्

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    C, D, E केवलम्

  2. BOption (b)

    A, B, C केवलम्

  3. COption (c)

    B, D, E केवलम्

  4. DOption (d)

    B, C, D केवलम्

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Correct answer

Answer: (d)D.

B, C, D केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्��ार्थ- योगांग नियमों में गणना की जाती है-

उत्तर- B, C, D केवलम्

Important Pointsयोगाङ्गनियम और उनका विश्लेषण:

महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित अष्टांग योग में नियम (व्यक्तिगत अनुशासन) का विशेष स्थान है। नियम पाँच प्रकार के होते हैं:

  • B (शौचम्) → यह शारीरिक और मानसिक शुद्धि को दर्शाता है। बाह्य शुद्धि में स्नान, स्वच्छता आदि आते हैं, जबकि आंतरिक शुद्धि में विचारों की पवित्रता और सकारात्मकता शामिल होती है।
  • C (तपः) → यह आत्मसंयम और धैर्य को दर्शाता है। तप का अर्थ है कठिनाइयों को सहन करना और आत्मनियंत्रण बनाए रखना।
  • D (ईश्वरप्रणिधानम्) → यह ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण को दर्शाता है। इसमें व्यक्ति अपने सभी कर्मों को ईश्वर को अर्पित करता है और फल की चिंता नहीं करता।

अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • A (सत्यम्) → यह यम के अंतर्गत आता है, नियम के अंतर्गत नहीं।
  • E (अस्तेयम्) → यह भी यम के अंतर्गत आता है, जिसका अर्थ है चोरी न करना।

नियमों का महत्व:

नियमों का पालन करने से व्यक्ति का आंतरिक और बाह्य विकास होता है। यह आत्मसंयम, शुद्धता और ईश्वर के प्रति समर्पण को बढ़ावा देता है।

Question 65

भागवतपुराणाभिमतपुराणलक्षणानां क्रमं चिनुत -

A. वंशानुचरितम्

B. अपाश्रयः

C. वंशः

D. हेतुः

E. संस्था

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    B, D, C, E, A

  2. BOption (b)

    C, D, A, E, B

  3. COption (c)

    C, A, E, D, B

  4. DOption (d)

    D, B, C, A, E

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Correct answer

Answer: (c)C.

C, A, E, D, B

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- भागवतपुराण में पुराणलक्षणों का क्रम चुनिए-

उत्तर- C, A, E, D, B

Important Pointsभागवतपुराण में पुराणलक्षणों का क्रम C, A, E, D, B इस प्रकार व्यवस्थित किया गया है:

  • वंशः (C) – यह पुराणों का पहला लक्षण है, जिसमें विभिन्न राजवंशों और देववंशों का वर्णन किया जाता है।
  • वंशानुचरितम् (A) – इसमें वंशों के विस्तार और उनके प्रमुख व्यक्तियों की कथाएँ सम्मिलित होती हैं।
  • संस्था (E) – यह लक्षण विभिन्न घटनाओं और युगों के समापन को दर्शाता है।
  • हेतुः (D) – इसमें घटनाओं के कारणों और उनके प्रभावों का विश्लेषण किया जाता है।
  • अपाश्रयः (B) – यह अंतिम लक्षण है, जिसमें मोक्ष और आध्यात्मिक आश्रय की चर्चा होती है।

यह क्रम भागवतपुराण के अनुसार व्यवस्थित किया गया है, जिससे पुराणों की संरचना और उनके उद्देश्य को स्पष्ट किया जा सके।

Question 66

वैयाकरणमतोन्मज्जनकारिकाग्रन्थस्य रचयिता कः ?

  1. AOption (a)

    नागेशभट्टः 

  2. BOption (b)

    भट्टोजिदीक्षितः

  3. COption (c)

    कौण्डभट्टः

  4. DOption (d)

    भर्तृहरिः

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Correct answer

Answer: (b)B.

भट्टोजिदीक्षितः

Why this answer is correct

उत्तर- भट्टोजिदीक्षितः

Important Pointsग्रंथ का नाम: वैयाकरणमतोन्मज्जनकारिका

यह ग्रंथ संस्कृत व्याकरण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण रचना है, जिसमें पाणिनीय व्याकरण की परंपरा में वैयाकरणों के मतों का विवेचन किया गया है। इस ग्रंथ में विभिन्न वैयाकरणों के मतों को उद्धृत कर, उनके बीच के भेदों को स्पष्ट किया गया है।

रचयिता: भट्टोजिदीक्षितः

  • भट्टोजिदीक्षित १७वीं शताब्दी के एक महान संस्कृत वैयाकरण थे।
  • इन्होंने सिद्धान्तकौमुदी जैसे प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की, जो पाणिनीय सूत्रों की प्रक्रिया को सरल और क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करता है।
  • इनके अन्य ग्रंथों में शब्दकौस्तुभ, प्रौढमनोरमा, और वैयाकरणमतोन्मज्जनकारिका प्रमुख हैं।
  • भट्टोजिदीक्षित का योगदान यह था कि उन्होंने केवल पाणिनीय सूत्रों की व्याख्या ही नहीं की, बल्कि विभिन्न वैयाकरणों के मतों को एकत्र कर उन्हें तुलनात्मक रूप में प्रस्तुत किया।

ग्रंथ की विशेषता:

  • वैयाकरणमतोन्मज्जनकारिका में "उन्मज्जन" शब्द का अर्थ है — विभिन्न मतों का "प्रकाश में लाना" या "उद्घाटन करना"।
  • यह ग्रंथ व्याकरणशास्त्र के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए अत्यंत उपयोगी है, क्योंकि यह विभिन्न वैयाकरणों के दृष्टिकोणों को एक साथ प्रस्तुत करता है

Question 67

समुचितं मेलयत -

A.कैकेयीवरयाचनाI.सुन्दरकाण्डे
B.अशोकवनविध्वंसनम्II.किष्किन्धाकाण्डे
C.वालीबधम्III.अरण्यकाण्डे
D.जटायुर्मरणम्IV.अयोध्याकाण्डे
<br>

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - IV, B - III, C - I, D - II

  2. BOption (b)

    A - IV, B - I, C - III, D - II

  3. COption (c)

    A - IV, B - II, C - I, D - III

  4. DOption (d)

    A - IV, B - I, C - II, D - III

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Correct answer

Answer: (d)D.

A - IV, B - I, C - II, D - III

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- समुचित जोड़िया मिलाये-

उत्तर- A - IV, B - I, C - II, D - III

Important Points��ैकेयीवरयाचना – अयोध्याकाण्डे (IV)

  • कैकेयी द्वारा राम को वनवास और भरत को राज्य देने की दो वर माँगने की घटना अयोध्याकाण्ड में वर्णित है।
  • यह प्रसंग राम के वनगमन का कारण बनता है और कथा की दिशा को निर्णायक रूप से मोड़ता है।

B. अशोकवनविध्वंसनम् – सुन्दरकाण्डे (I)

  • हनुमान द्वारा लंका में प्रवेश कर अशोकवाटिका का विध्वंस करना, राक्षसों से युद्ध करना और लंका दहन करना सुन्दरकाण्ड का प्रमुख भाग है।
  • यह काण्ड हनुमान के पराक्रम और सीता की खोज की सफलता को दर्शाता है।

C. वालीबधम् – किष्किन्धाकाण्डे (II)

  • राम द्वारा वाली का वध और सुग्रीव को किष्किन्धा का राजा बनाना किष्किन्धाकाण्ड में आता है।
  • यह प्रसंग राम-सुग्रीव मैत्री और सीता की खोज की शुरुआत से जुड़ा है।

D. जटायुर्मरणम् – अरण्यकाण्डे (III)

  • रावण द्वारा सीता हरण के समय जटायु द्वारा संघर्ष और फिर उनकी मृत्यु अरण्यकाण्ड में वर्णित है।
  • यह प्रसंग राम को सीता के अपहरण की सूचना देने वाला महत्वपूर्ण मोड़ है।

 

इस प्रकार, सभी युग्म सही रूप से मेल खाते हैं और उत्तर 4) A - IV, B - I, C - II, D - III पूर्णतः उचित है।

Question 68

गोपथब्राह्मणं एतत्सम्बद्धं भवति-

  1. AOption (a)

    ऋग्वेदसम्बद्धम् 

  2. BOption (b)

    यजुर्वेदसम्बद्धम्

  3. COption (c)

    सामवेदसम्बद्धम्

  4. DOption (d)

    अथर्ववेदसम्बद्धम्

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Correct answer

Answer: (d)D.

अथर्ववेदसम्बद्धम्

Why this answer is correct

उत्तर- अथर्ववेदसम्बद्धम्

गोपथब्राह्मणं - अथर्ववेदसम्बद्धं

गोपथब्राह्मण एकमात्र ऐसा ब्राह्मण ग्रन्थ है जो अथर्ववेद से सम्बद्ध है। यह ग्रन्थ पैप्पलाद शाखा के अंतर्गत आता है और अथर्ववेद के यज्ञीय पक्ष, देवताओं की व्याख्या, ब्रह्मविद्या, और सामाजिक विधानों का गूढ़ विवेचन करता है।

गोपथब्राह्मण की विशेषताएँ:

  • यह एकमात्र ब्राह्मण ग्रन्थ है जो अथर्ववेद से जुड़ा है, जबकि अन्य वेदों के एकाधिक ब्राह्मण ग्रन्थ होते हैं।
  • इसमें यज्ञों की विधियाँ, देवताओं की उत्पत्ति, ऋषियों की परंपरा, और वर्णाश्रम धर्म का विवेचन मिलता है।
  • इसकी भाषा वैदिक संस्कृत है और शैली में गद्यात्मकता प्रमुख है।
  • इसमें उपनिषदों के दर्शन की झलक भी मिलती है, विशेषतः ब्रह्म और आत्मा के स्वरूप पर।

अन्य विकल्पों का परीक्षण:

  • ऋग्वेद - इससे संबंधित ब्राह्मण ग्रन्थ हैं: ऐतरेय ब्राह्मण, कौषीतकि ब्राह्मण।
  • यजुर्वेद - इसके लिए शतपथ ब्राह्मण, तैत्तिरीय ब्राह्मण, मैत्रायणी ब्राह्मण आदि हैं।
  • सामवेद - इसके अंतर्गत पंचविंश ब्राह्मण, जैमिनीय ब्राह्मण, छांदोग्य ब्राह्मण आदि आते हैं।

निष्कर्ष:

गोपथब्राह्मण केवल अथर्ववेद से सम्बद्ध है और यह उसका एकमात्र ब्राह्मण ग्रन्थ है। अतः उत्तर 4) अथर्ववेदसम्बद्धम् पूर्णतः शास्त्रसम्मत और प्रमाणिक है।

Question 69

परस्परं समुचितं मेलयत

A.सीम्I.परिग्रहार्थीयः
B.नूनम्II.परिभयार्थीयः
C.त्वIII.विचिकित्सार्थीयः
D.न + इत्IV.विनिग्रहार्थीयः
<br>

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - I, B - III, C - IV, D - II

  2. BOption (b)

    A - II, B - III, C - I, D - IV

  3. COption (c)

    A - IV, B - II, C - III, D - I

  4. DOption (d)

    A - III, B - IV, C - II, D - I

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Correct answer

Answer: (a)A.

A - I, B - III, C - IV, D - II

Why this answer is correct

उत्तर- A - I, B - III, C - IV, D - II

संस्कृत भाषा में शब्दों के अर्थ और उनके उपयोग को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रस्तुत प्रश्न में दिए गए शब्दों को उनके सही अर्थों से मिलाने पर सही उत्तर A - I, B - III, C - IV, D - II बनता है।

विस्तृत व्याख्या:

सीम् (A) - परिग्रहार्थीयः (I)

  • सीम् का अर्थ सीमा या परिग्रह होता है।
  • यह परिग्रह (संपत्ति या अधिकार का ग्रहण) से संबंधित है।
  • इसलिए इसे परिग्रहार्थीयः से जोड़ा जाता है।

नूनम् (B) - विचिकित्सार्थीयः (III)

  • नूनम् का अर्थ निश्चित रूप से, संदेह रहित रूप से होता है।
  • यह विचिकित्सा (संदेह या अनिश्चितता) को दूर करने के लिए प्रयुक्त होता है।
  • इसलिए इसे विचिकित्सार्थीयः से जोड़ा जाता है।

त्व (C) - विनिग्रहार्थीयः (IV)

  • त्व का प्रयोग किसी विशेषता को सीमित करने या नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।
  • यह विनिग्रह (नियंत्रण या रोक) से संबंधित है।
  • इसलिए इसे विनिग्रहार्थीयः ���े जोड़ा जाता है।

न + इत् (D) - परिभयार्थीयः (II)

  • न + इत् का अर्थ निषेध या भय से बचाव होता है।
  • यह परिभय (भय या आशंका) से संबंधित है।
  • इसलिए इसे परिभयार्थीयः से जोड़ा जाता है।

निष्कर्ष:

संस्कृत भाषा में शब्दों का सही मेल उनके अर्थ और उपयोग के आधार पर किया जाता है।

Question 70

मेध्यस्य अश्वस्य, क्रमशः शिरः - व्यात्तमुख - आत्म- उदर- पृष्ठानि भवन्ति -A. संवत्सरः

B. द्यौः

C. वैश्वानराग्निः

D. अन्तरिक्षम्

E. उषा

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    E, B, C, A, D

  2. BOption (b)

    E, C, A, D, B

  3. COption (c)

    E, B, A, D, C

  4. DOption (d)

    E, B, D, A, C

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Correct answer

Answer: (b)B.

E, C, A, D, B

Why this answer is correct

उत्तर- E, C, A, D, B

यह प्रश्न बृहदारण्यकोपनिषद् के अश्वब्राह्मण खंड से लिया गया है, जिसमें यज्ञ में प्रयुक्त मेध्य अश्व (बलि योग्य अश्व) को ब्रह्मांड के प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया गया है। अश्व के विभिन्न अंगों की तुलना ब्रह्मांडीय तत्वों से की गई है। आइए विकल्प 2) E, C, A, D, B के अनुसार क्रमशः विवेचन करें:

  • E. उषा — शिरः (सिर)
  • उषा (प्रभात) को अश्व के सिर के रूप में वर्णित किया गया है। यह दिन की शुरुआत का प्रतीक है, जैसे सिर शरीर का अग्रभाग होता है।
  • C. वैश्वानराग्निः — व्यात्तमुख (खुला मुख)
  • वैश्वानर अग्नि को अश्व के खुले मुख के रूप में देखा गया है। यह अग्नि यज्ञ की जठराग्नि है, जो आहुति को पचाती है।
  • A. संवत्सरः — आत्मा (आत्मा)
  • संवत्सर (वर्ष) को अश्व की आत्मा कहा गया है। यह समय का प्रतीक है, जो जीवन का आधार है।
  • D. अन्तरिक्षम् — उदर (पेट)
  • अन्तरिक्ष (आकाश का मध्य भाग) को अश्व के उदर से जोड़ा गया है, जो जीवन को धारण करता है।
  • B. द्यौः — पृष्ठम् (पीठ)
  • द्युलोक (स्वर्ग) को अश्व की पीठ कहा गया है, जो ऊर्ध्व दिशा में स्थित है और स्थिरता का प्रतीक है।

 

इस प्रकार, यह प्रतीकात्मक वर्णन दर्शाता है कि यज्ञीय अश्व केवल एक पशु नहीं, बल्कि समस्त ब्रह्मांड का प्रतीक है। यह दृष्टिकोण वेदों की गूढ़ता और प्रतीकात्मकता को उजागर करता है, जहाँ प्रत्येक अंग ब्रह्मांडीय तत्व से जुड़ा होता है।

Question 71

अधोलिखितेषु शाङ्खायनारण्यके जनपदाः वर्णिताः -

A. कुरुपाञ्चालः

B. कङ्गोदः

C. उशीनरः

D. मत्स्यः

E. कलिङ्गः

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    B, C, D केवलम्

  2. BOption (b)

    B, D, E केवलम्

  3. COption (c)

    A, C, D केवलम्

  4. DOption (d)

    C, D, E केवलम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

A, C, D केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- निम्नलिखित में से शाङ्खायनारण्यक में जनपदों का वर्णन-

उत्तर- A, C, D केवलम्

Important Pointsशाङ्खायनारण्यक में वर्णित जनपदों का विश्लेषण:

शाङ्खायनारण्यक में विभिन्न जनपदों का उल्लेख मिलता है, जिनमें कुरुपाञ्चाल, उशीनर और मत्स्य प्रमुख रूप से वर्णित हैं।

  • A (कुरुपाञ्चालः) → यह जनपद वैदिक काल में अत्यंत महत्वपूर्ण था। कुरु और पांचाल जनपदों का उल्लेख कई वैदिक ग्रंथों में मिलता है।
  • C (उशीनरः) → उशीनर जनपद का उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण में भी मिलता है। यह मध्यदेश का एक प्रमुख जनपद था।
  • D (मत्स्यः) → मत्स्य जनपद भी वैदिक काल में प्रसिद्ध था और इसका उल्लेख कई ग्रंथों में हुआ है।

अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • B (कङ्गोदः) → इस जनपद का उल्लेख शाङ्खायनारण्यक में नहीं मिलता।
  • E (कलिङ्गः) → कलिङ्ग जनपद का उल्लेख अन्य ग्रंथों में मिलता है, लेकिन शाङ्खायनारण्यक में नहीं।

 

इस प्रकार, कुरुपाञ्चाल, उशीनर और मत्स्य जनपद शाङ्खायनारण्यक में वर्णित हैं।

Question 72

केन प्रमाणेनावगन्तुमिष्टं ब्रह्म?

  1. AOption (a)

    ज्ञानेन

  2. BOption (b)

    धर्मेण

  3. COption (c)

    कर्मणा

  4. DOption (d)

    संस्कारेण

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Correct answer

Answer: (a)A.

ज्ञानेन

Why this answer is correct

उत्तर- ज्ञानेन

ब्रह्म का स्वरूप

ब्रह्म वह परम तत्त्व है जो नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और सत्यस्वरूप है। यह अद्वैत वेदान्त में अहं ब्रह्मास्मि, तत्त्वमसि जैसे महावाक्यों के माध्यम से प्रतिपादित किया गया है।

ब्रह्म को जानने का प्रमाण: ज्ञान (प्रमाण)

"न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते"

श्रीमद्भगवद्गीता 4.38

“इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ भी नहीं है।”

यह श्लोक स्पष्ट करता है कि ब्रह्म की प्राप्ति केवल ज्ञान के द्वारा ही संभव है, न कि कर्म, धर्म या संस्कार मात्र से।

अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • धर्मेण- धर्म (नैतिक आचरण) मनोशुद्धि का साधन है, परंतु ब्रह्मज्ञान का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं।
  • कर्मणा- कर्म (यज्ञ, दान, त��) चित्तशुद्धि के लिए सहायक हैं, परंतु मोक्ष का साधन नहीं।
  • संस्कारेण- संस्कार (जन्मजात या सामाजिक संस्कार) केवल पूर्वभूमि प्रदान करते हैं, ज्ञान नहीं।

Question 73

भित्तिस्थानीयः वेदः कः ? 

  1. AOption (a)

    ऋग्वेदः

  2. BOption (b)

    यजुर्वेदः

  3. COption (c)

    सामवेदः

  4. DOption (d)

    अथर्ववेदः

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Correct answer

Answer: (b)B.

यजुर्वेदः

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- भित्तिस्थानीय वेद कौनसा है?

उत्तर- यजुर्वेदः

यजुर्वेदः को भित्तिस्थानीयः वेदः कहा जाता है क्योंकि यह मुख्य रूप से यज्ञीय कर्मकांडों और अनुष्ठानों से संबंधित है।

यह वेद यज्ञों की विधियों, मंत्रों और प्रक्रियाओं का विस्तृत वर्णन करता है, जिससे इसे कर्मकांड का वेद भी कहा जाता है।

Important Pointsयजुर्वेद का स्वरूप:

यजुर्वेद चार वेदों में से एक है और इसका मुख्य उद्देश्य यज्ञों के लिए आवश्यक ज्ञान प्रदान करना है।

इसमें मंत्रों और गद्यात्मक व्याख्याओं का मिश्रण होता है, जिससे यज्ञों की विधियों को व्यवस्थित किया जाता है।

इसे दो भागों में विभाजित किया गया है:

  • शुक्ल यजुर्वेद – इसमें मंत्रों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।
  • कृष्ण यजुर्वेद – इसमें मंत्रों के साथ गद्यात्मक व्याख्या भी होती है।

भित्तिस्थानीयता का कारण:

  • यजुर्वेद में यज्ञों की प्रक्रिया को व्यवस्थित करने के लिए मंत्रों और विधियों का संकलन किया गया है।
  • यह यज्ञों के दौरान बोले जाने वाले मंत्रों और अनुष्ठानों की विधियों को स्पष्ट करता है।
  • इसमें अग्निहोत्र, सोमयज्ञ, राजसूय यज्ञ, अश्वमेध यज्ञ आदि का विस्तृत वर्णन मिलता है।

 

यजुर्वेद का यह व्यवस्थित स्वरूप इसे भित्तिस्थानीय वेद बनाता है, क्योंकि यह धार्मिक अनुष्ठानों की आधारशिला के रूप में कार्य करता है।

Question 74

परस्परं समुचितं मेलयत -

A.मन्त्रिपरिषदि द्वादशामात्याःI.बार्हस्पत्याः
B.षोडशामात्यका मन्त्रिपरिषद्II.कौटिल्यः
C.मन्त्रिपरिषद् विंशत्यमात्यकाIII.मानवाः
D.यथासामर्थ्यममात्यान् नियोजयेत्IV.औशनसाः
  1. AOption (a)

    A - IV, B - III, C - II, D - I

  2. BOption (b)

    A - I, B - II, C - III, D - IV

  3. COption (c)

    A - II, B - I, C - III, D - IV

  4. DOption (d)

    A - III, B - I, C - IV, D - II

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Correct answer

Answer: (d)D.

A - III, B - I, C - IV, D - II

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- परस्पर समुचित मेल लगाये-

उत्तर- A - III, B - I, C - IV, D - II

Important Pointsमन्त्रिपरिषद और अमात्य व्यवस्था का विश्लेषण:

प्राचीन भारतीय शासन व्यवस्था में मन्त्रिपरिषद का विशेष महत्व था। विभिन्न ग्रंथों में मन्त्रिपरिषद के आकार और उसमें सम्मिलित अमात्यों की संख्या का उल्लेख मिलता है।

  • A - III (मन्त्रिपरिषदि द्वादशामात्याः - मानवाः) → मानव संहिता में द्वादश अमात्य (बारह मंत्री) वाली मन्त्रिपरिषद का उल्लेख मिलता है।
  • B - I (षोडशामात्यका मन्त्रिपरिषद् - बार्हस्पत्याः) → बार्हस्पत्य संहिता में षोडश अमात्य (सोलह मंत्री) वाली मन्त्रिपरिषद का वर्णन किया गया है।
  • C - IV (मन्त्रिपरिषद् विंशत्यमात्यका - औशनसाः) → औशनस संहिता में विंशति अमात्य (बीस मंत्री) वाली मन्त्रिपरिषद का उल्लेख मिलता है।
  • D - II (यथासामर्थ्यममात्यान् नियोजयेत् - कौटिल्यः) → कौटिल्य (चाणक्य) ने अर्थशास्त्र में मंत्रियों की नियुक्ति को उनकी योग्यता के आधार पर करने की बात कही है।
<br>

इस प्रकार, A - III, B - I, C - IV, D - II का मेल सबसे उपयुक्त है।

Question 75

आलयविज्ञान-प्रवृत्तिविज्ञानप्रवाहो भवति-

  1. AOption (a)

    रूपस्कन्धः

  2. BOption (b)

    वेदनास्कन्धः

  3. COption (c)

    संस्कारस्कन्धः

  4. DOption (d)

    विज्ञानस्कन्धः

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Correct answer

Answer: (d)D.

विज्ञानस्कन्धः

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- आलयविज्ञान-प्रवृत्तिविज्ञानप्रवाह होता है-

उत्तर- विज्ञानस्कन्धः

प्रवृत्ति विज्ञान :

विज्ञान स्वरूपतः अभिन्न है, परन्तु अवस्था भेद से वह आठ प्रकार का माना जाता है - (1) चक्षुर्विज्ञान, (2) श्रोत्रविज्ञान, (3) घ्राणविज्ञान, (4) जिह्वा विज्ञान, (5) कायविज्ञान, (6) मनोविज्ञान, (7) क्लिष्टमनोविज्ञान, (8) आलयविज्ञान । प्रारम्भ के सात विज्ञान प्रवृत्ति-विज्ञान कहलाते हैं । ये आलय विज्ञान से उत्पन्न होते हैं तथा उसी में विलीन हो जाते हैं ।

Important Pointsआलयविज्ञान और प्रवृत्तिविज्ञानप्रवाह:

आलयविज्ञान बौद्ध दर्शन के योगाचार मत का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। इसे "भंडार विज्ञान" कहा जाता है, क्योंकि यह सभी कर्मों और संस्कारों को संचित करता है।

विज्ञानस्कन्धः का संबंध:

  • विज्ञानस्कन्धः बौद्ध दर्शन के पंचस्कन्ध में से एक है, जो चेतना से संबंधित है।
  • आलयविज्ञान को प्रवृत्तिविज्ञानप्रवाह कहा जाता है, क्योंकि यह निरंतर प्रवाहित होता रहता है और विभिन्न अनुभवों को संचित करता है।
  • यह सभी संस्कारों और कर्मों का आधार है, जिससे व्यक्ति के अनुभव और चेतना का प्रवाह बना रहता है।

अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • रूपस्कन्धः: यह भौतिक रूप से संबंधित है, जबकि आलयविज्ञान चेतना से जुड़ा हुआ है।
  • वेदनास्कन्धः: यह अनुभूति और संवेदनाओं से संबंधित है, लेकिन आलयविज्ञान का मुख्य संबंध चेतना से है।
  • संस्कारस्कन्धः: यह मानसिक प्रवृत्तियों और आदतों से संबंधित है, लेकिन आलयविज्ञान का मूल आधार विज्ञानस्कन्ध है।

 

इस प्रकार, आलयविज्ञान प्रवृत्तिविज्ञानप्रवाह विज्ञानस्कन्धः के अंतर्गत आता है।

Question 76

“जयति तरुणयोषित् लोचनानां विलासः" इति कुत्रोक्तम् ?

  1. AOption (a)

    स्वप्नवासवदत्ते

  2. BOption (b)

    रत्नावल्याम्

  3. COption (c)

    नलचम्प्वाम्

  4. DOption (d)

    वेणीसंहारे

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Correct answer

Answer: (c)C.

नलचम्प्वाम्

Why this answer is correct

उत्तर- नलचम्प्वाम्

यह प्रसिद्ध पद्यांश-

"जयति तरुणयोषित् लोचनानां विलासः"

संस्कृत काव्य नलचम्पू में प्रथम उच्छ्वास (प्रारंभिक सर्ग) में उल्लिखित है।

पद्य का संदर्भ:

यह श्लोक त्रिविक्रमभट्ट द्वारा रचित नलचम्पू के मंगलाचरण खंड में आता है, जहाँ कवि विभिन्न सौंदर्य और रस के प्रतीकों की स्तुति करता है। यह विशेष पंक्ति तरुण स्त्रियों की चंचल दृष्टि के सौंदर्य की सराहना करती है:

"जयति तरुणयोषित् लोचनानां विलासः"

अर्थात् "युवतियों की आँखों का विलास (चंचलता, लज्जा, आकर्षण) जयमय हो।"

यहाँ विलास शब्द में श्रृंगार, लज्जा, आकर्षण, और नयनाभिनय की सूक्ष्म अभिव्यक्ति समाहित है।

नलचम्पू का परिचय:

  • नलचम्पू एक चम्पूकाव्य है, जिसमें गद्य और पद्य का मिश्रण होता है।
  • इसकी रचना त्रिविक्रमभट्ट ने की थी, और यह नल-दमयन्ती की कथा पर आधारित है।
  • यह काव्य रस, अलंकार, और नायिका-भेद की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है।

निष्कर्ष:

इस प्रकार, "जयति तरुणयोषित् लोचनानां विलासः" पद्य नलचम्पू में आता है, और यह नायिकाओं की सौंदर्यपूर्ण दृष्टि की स्तुति करता है। अतः उत्तर 3) नलचम्प्वाम् पूर्णतः प्रमाणिक और युक्तियुक्त है।

Question 77

समीचीनं मेलयत-

A.ऐतरेय ब्राह्मणम्I.सामवेदः
B.शाट्यायनब्राह्मणम्II.शाङ्खायनः
C.कौषीतकिब्राह्मणम्III.यजुर्वेदः
D.शतपथब्राह्मणम्IV.महिदासः
<br>

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - I, B - II, C - IV, D - III

  2. BOption (b)

    A - IV, B - I, C - II, D - III

  3. COption (c)

    A - II, B - IV, C - III, D - I

  4. DOption (d)

    A - IV, B - I, C - III, D - II

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Correct answer

Answer: (b)B.

A - IV, B - I, C - II, D - III

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- समुचित मेल लगाये-

उत्तर- A - IV, B - I, C - II, D - III

समीचीन मेल का विश्लेषण:

  • A - IV (ऐतरेय ब्राह्मणम् - महिदासः): ऐतरेय ब्राह्मण ऋग्वेद से संबंधित है और इसे महिदास ऐतरेय द्वारा रचित माना जाता है.
  • B - I (शाट्यायनब्राह्मणम् - सामवेदः): शाट्यायन ब्राह्मण सामवेद से संबंधित है, जो संगीत और छंदों पर केंद्रित है।
  • C - II (कौषीतकिब्राह्मणम् - शाङ्खायनः): कौषीतकि ब्राह्मण शाङ्खायन शाखा से जुड़ा हुआ है और इसमें यज्ञों की विस्तृत व्याख्या है।
  • D - III (शतपथब्राह्मणम् - यजुर्वेदः): शतपथ ब्राह्मण यजुर्वेद से संबंधित है और इसमें यज्ञों की विधियों का विस्तार से वर्णन किया गया है।

 

इस प्रकार, यह मेल सही है और वैदिक साहित्य के विभिन्न ब्राह्मण ग्रंथों की शाखाओं को दर्शाता है।

Question 78

चतुर्वर्णानां सजातीयादिस्त्रीषु व्यभिचारे दण्डप्रदाने सत्यवचनानि चिनुत -

A. सजाती उत्तमो दण्डः

B. प्रातिलोम्ये वधः कार्यः 

C. आनुलोम्ये उत्तमोत्तमः दण्डः

D. सङ्करस्य तु सम्मानम्

E. नीच जातिपुरुषेण स्त्रिया क्रियमाणे ��स्याः तेन विवाहः

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A B केवलम्

  2. BOption (b)

    B, C केवलम्

  3. COption (c)

    C, D केवलम् 

  4. DOption (d)

    C. E केवलम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

A B केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- चतुर्वर्ण व्यवस्था और दंड विधान के सत्यवचन चुनिए-

उत्तर- A B केवलम्

Important Pointsचतुर्वर्ण व्यवस्था और दंड विधान:

चतुर्वर्ण व्यवस्था में सामाजिक नियमों और दंड विधान का विशेष स्थान था। मनुस्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों में वर्णों के आधार पर दंड का निर्धारण किया गया था।

सत्यवचन और दंड विधान:

  • A (सजाती उत्तमो दण्डः) → यदि कोई व्यक्ति अपनी ही जाति में व्यभिचार करता है, तो उसे कठोरतम दंड दिया जाता है। यह समाज में नैतिकता बनाए रखने के लिए आवश्यक माना जाता था।
  • B (प्रातिलोम्ये वधः कार्यः) → यदि कोई व्यक्ति प्रातिलोम विवाह (उच्च जाति की स्त्री और निम्न जाति के पुरुष का संबंध) करता है, तो उसे कठोरतम दंड, यहाँ तक कि वध का प्रावधान था। यह नियम सामाजिक संरचना को बनाए रखने के लिए लागू किया गया था।

अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • C (आनुलोम्ये उत्तमोत्तमः दण्डः) → आनुलोम विवाह (उच्च जाति के पुरुष और निम्न जाति की स्त्री का संबंध) को अपेक्षाकृत कम कठोर दंड दिया जाता था।
  • D (सङ्करस्य तु सम्मानम्) → संकर जाति को सम्मान देने का कोई विशेष उल्लेख नहीं मिलता।
  • E (नीच जातिपुरुषेण स्त्रिया क्रियमाणे तस्याः तेन विवाहः) → इस नियम का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता।

 

इस प्रकार, A और B ही सत्यवचन हैं।

Question 79

"कातरा येऽप्यशक्ता वा नोत्साहस्तेषु जायते" इति कस्य वचनम् ?

  1. AOption (a)

    विदूषकस्य

  2. BOption (b)

    काञ्चुकीय

  3. COption (c)

    राज्ञः उदयनस्य

  4. DOption (d)

    यौगन्धरायणस्य

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Correct answer

Answer: (b)B.

काञ्चुकीय

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- "कातरा येऽप्यशक्ता वा नोत्साहस्तेषु जायते" यह किसका वचन है?

उत्तर- काञ्चुकीय

"कातरा येऽप्यशक्ता वा नोत्साहस्तेषु जायते" यह कथन काञ्चुकीय का है, जो भास द्वारा रचित प्रसिद्ध संस्कृत नाटक स्वप्नवासवदत्ता में आता है।

विस्तृत स्पष्टीकरण:

  • स्वप्नवासवदत्ता नाटक में यह कथन काञ्चुकीय पात्र द्वारा कहा गया है, जो राजदरबार का एक महत्वपूर्ण व्यक्ति है।
  • इस कथन का अर्थ है कि जो लोग डरपोक या अशक्त होते हैं, वे किसी भी कार्य में उत्साह नहीं दिखाते।
  • यह विचार मानसिक दृढ़ता और आत्मविश्वास के महत्व को दर्शाता है, क्योंकि साहसी व्यक्ति ही कठिन परिस्थितियों में आगे बढ़ने का साहस रखते हैं।
  • यह कथन राजनीतिक और सामाजिक व्यवहार के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह बताता है कि निर्णय लेने और कार्य करने के लिए साहस आवश्यक है।

 

स्वप्नवासवदत्ता नाटक में यह संवाद एक महत्वपूर्ण संदर्भ रखता है, जो पात्रों के मनोभाव और परिस्थितियों को दर्शाता है।

Question 80

गतिबुद्धिसूत्रस्थवार्त्तिकानि सिद्धान्तकौमुद्युक्तक्रमेण व्यवस्थापयत -

A. आदिखाद्योर्न

B. नवह्योर्न

C. नियन्तृकर्तृकस्य वहेरनिषेधः

D. भक्षेरहिंसार्थस्य न 

E. जल्पतिप्रभृतीनामुपसंख्यानम्

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    B, C, A, D, E

  2. BOption (b)

    C, B, D, A, E

  3. COption (c)

    E, B, C, A, D

  4. DOption (d)

    E, C, B, D, A

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Correct answer

Answer: (a)A.

B, C, A, D, E

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- गतिबुद्धिसूत्रस्थवार्त्तिक को सिद्धान्तकौमुदी अनुसार क्रम  लगाये-

उत्तर- B, C, A, D, E

Important Points

  • नवह्योर्न (B) – यह वार्त्तिक नवह्य धातु से संबंधित है, जिसमें विशेष रूप से धातु के प्रयोग और उसके अर्थ की व्याख्या की जाती है।
  • नियन्तृकर्तृकस्य वहेरनिषेधः (C) – यह वार्त्तिक वह धातु के प्रयोग में नियन्तृकर्तृक (नियंत्रण करने वाले कर्ता) के संदर्भ में निषेध को स्पष्ट करता है।
  • आदिखाद्योर्न (A) – यह वार्त्तिक खाद्य पदार्थों के संदर्भ में आदि धातु के प्रयोग को व्यवस्थित करता है।
  • भक्षेरहिंसार्थस्य न (D) – यह वार्त्तिक भक्ष धातु के प्रयोग में अहिंसा के अर्थ को प्रतिबंधित करता है।
  • जल्पतिप्रभृतीनामुपसंख्यानम् (E) – यह वार्त्तिक जल्पति और अन्य संबंधित शब्दों के उपसंख्यान (गणना) को स्पष्ट करता है।

 

यह क्रम सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार व्यवस्थित किया गया है, जिससे व्याकरणिक नियमों की स्पष्टता बनी रहती है।

Question 81

एतेषु ध्वनिपरिवर्तनस्य बाह्यकारणानि चिनुत -

A. बलाघातः

B. भौगोलिकप्रभावः

C. कालप्रभावः

D. सादृश्यम्

E. कृत्रिमता

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    B, C, D केवलम्

  2. BOption (b)

    A, B, C केवलम्

  3. COption (c)

    C, D, E केवलम्

  4. DOption (d)

    A, D, E केवलम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

B, C, D केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर- B, C, D केवलम्

ध्वनिपरिवर्तन के बाह्य कारण वे कारक होते हैं जो भाषा के ध्वनि स्वरूप को प्रभावित करते हैं। सही उत्तर B, C, D (भौगोलिक प्रभाव, काल प्रभाव, सादृश्य) है।

1. भौगोलिक प्रभाव (B)

  • विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में भाषा की ध्वनियाँ अलग-अलग रूप में विकसित होती हैं।
  • उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में स्वर अधिक स्पष्ट होते हैं, जबकि नमी वाले क्षेत्रों में ध्वनि नरम हो सकती है।
  • उदाहरण: हिंदी और बंगाली में उच्चारण भिन्न होते हैं, क्योंकि बंगाल की जलवायु और संस्कृति हिंदी भाषी क्षेत्रों से अलग है।

2. काल प्रभाव (C)

  • समय के साथ भाषा में ध्वनि परिवर्तन होता है।
  • पुरानी भाष��ओं में प्रयुक्त ध्वनियाँ आधुनिक भाषाओं में बदल जाती हैं।
  • उदाहरण: संस्कृत में "सप्त" शब्द हिंदी में "सात" बन गया, जो काल प्रभाव का उदाहरण है।

3. सादृश्य (D)

  • जब कोई ध्वनि किसी अन्य ध्वनि से समानता रखती है, तो वह परिवर्तित हो सकती है।
  • यह प्रभाव भाषा के प्रवाह को सरल बनाने में मदद करता है।
  • उदाहरण: संस्कृत में "अग्नि" शब्द हिंदी में "अग्नी" बन गया, क्योंकि "न" और "इ" की ध्वनियाँ आपस में मेल खाती हैं।

अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • बलाघात (A): यह आंतरिक कारणों में आता है, क्योंकि यह उच्चारण की तीव्रता से संबंधित है।
  • कृत्रिमता (E): यह भाषा के कृत्रिम रूप से बनाए गए शब्दों से संबंधित है, जो बाह्य कारणों में नहीं आता।

निष्कर्ष:

ध्वनिपरिवर्तन के बाह्य कारणों में भौगोलिक प्रभाव, काल प्रभाव और सादृश्य प्रमुख भूमिका निभाते हैं। ये कारक भाषा के विकास और ध्वनि परिवर्तन को प्रभावित करते हैं।

Question 82

किंवदन्त्याधारेण कालिदासः अन्तिमसमये कस्य राज्ञः राजत्वकाले वेश्यया हतः ?

  1. AOption (a)

    भोजस्य

  2. BOption (b)

    कुमारदासस्य

  3. COption (c)

    विक्रमादित्यस्य

  4. DOption (d)

    धनपालस्य

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Correct answer

Answer: (b)B.

कुमारदासस्य

Why this answer is correct

उत्तर- कुमारदासस्य

Important Points

  • कालिदास के जीवन और मृत्यु से जुड़ी कई किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार, कुमारदास के शासनकाल में कालिदास की हत्या एक वेश्या द्वारा की गई थी।
  • किंवदंती के अनुसार, कालिदास अपनी विद्वत्ता और काव्य प्रतिभा के लिए प्रसिद्ध थे। कहा जाता है कि उन्होंने कुमारदास के दरबार में अपनी रचनाओं का प्रदर्शन किया था।
  • इसी दौरान, कुछ षड्यंत्रकारियों ने उनकी हत्या की योजना बनाई। एक वेश्या को इस कार्य के लिए नियुक्त किया गया, जिसने कालिदास को धोखे से मार डाला।
  • हालाँकि, यह कथा ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं है और इसे केवल एक लोककथा के रूप में देखा जाता है।
  • कालिदास के जीवन और मृत्यु के बारे में निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी संस्कृत साहित्य में अमूल्य धरोहर के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

Question 83

पण्डिता क्षमारावस्य समयो भवति -

  1. AOption (a)

    1908 – 1979 (AD)

  2. BOption (b)

    1918-2000 (AD)

  3. COption (c)

    1848 – 1900 (AD)

  4. DOption (d)

    1890 – 1954 (AD)

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Correct answer

Answer: (d)D.

1890 – 1954 (AD)

Why this answer is correct

उत्तर- 1890 – 1954 (AD)

पण्डिता क्षमाराव संस्कृत साहित्य की एक विलक्षण प्रतिभा थीं, जिनका जन्म 4 जुलाई 1890 को महाराष्ट्र के एक विद्वत्परिवार में हुआ था और उनका निधन 22 अप्रैल 1954 को हुआ।

वे संस्कृत की उन विरल कवयित्रियों में थीं जिन्होंने परंपरागत विषयों से आगे बढ़कर नवीन विधाओं और राष्ट्रभक्ति को अपने काव्य का विषय बनाया।

उनके जीवन और योगदान का संक्षिप्त विवरण:

  • संस्कृत, मराठी और अंग्रेज़ी तीनों भाषाओं में उन्होंने साहित्य रचा।
  • उन्होंने मीरा लहरी, वीरभा, सत्याग्रहगीता, उत्तरसत्याग्रहगीता, और स्वराज्यविजयः जैसी रचनाएँ कीं, जिनमें राष्ट्रप्रेम और नारीशक्ति का अद्भुत समन्वय है।
  • सत्याग्रहगीता नामक महाकाव्य 1932 में पेरिस से प्रकाशित हुआ था, जो गांधीजी के सत्याग्रह आंदोलन से प्रेरित था।
  • उन्हें ‘पण्डिता’ और ‘साहित्यचन्द्रिका’ जैसी उपाधियाँ प्राप्त हुईं, जो उनके विद्वत्ता और साहित्यिक योगदान का प्रमाण हैं।

 

उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि विपरीत परिस्थितियों में भी सृजनशीलता और राष्ट्रभक्ति के माध्यम से कैसे एक स्त्री साहित्य और समाज में अमिट छाप छोड़ सकती है।

Question 84

मन्वनुसारेण दिशमुद्दिश्य क्रियमाणभोजनस्य फलसम्बद्धानि सत्यवचनानि चिनुत -

A. प्राङ्मुखभोजनेन बलवर्धनम् ।

B. प्रत्यङ्मुखभोजनेन श्रीवर्धनम् ।

C. उदङ्मुखवचनेन सत्यवर्धनम् ।

D. दक्षिणामुखभोजनेन यशोवर्धनम् । 

E. उर्ध्वमुखभोजनेन आयुर्वर्धनम् ।

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, C, D केवलम् 

  2. BOption (b)

    C, D, E केवलम्

  3. COption (c)

    A, B, C केवलम्

  4. DOption (d)

    B, C, D केवलम्

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Correct answer

Answer: (d)D.

B, C, D केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- मन्वनुसारेण दिशानुसार भोजन और उसके फल से सम्बंधित योग्य पर्याय चुनिए-

उत्तर- B, C, D केवलम्

Important Pointsमन्वनुसारेण दिशानुसार भोजन और उसका फल:

मनुस्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों में भोजन की दिशा का विशेष महत्व बताया गया है। भोजन करते समय व्यक्ति की दिशा उसके शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक प्रभावों को प्रभावित करती है।

सत्यवचन और दिशानुसार भोजन का प्रभाव:

  • B (प्रत्यङ्मुखभोजनेन श्रीवर्धनम्) → यदि व्यक्ति पश्चिम दिशा की ओर मुख करके भोजन करता है, तो उसे समृद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
  • C (उदङ्मुखवचनेन सत्यवर्धनम्) → यदि व्यक्ति उत्तर दिशा की ओर मुख करके भोजन करता है, तो उसकी सत्यता और ज्ञान में वृद्धि होती है।
  • D (दक्षिणामुखभोजनेन यशोवर्धनम्) → यदि व्यक्ति दक्षिण दिशा की ओर मुख करके भोजन करता है, तो उसे यश और प्रसिद्धि प्राप्त होती है।

अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • A (प्राङ्मुखभोजनेन बलवर्धनम्) → पूर्व दिशा की ओर मुख करके भोजन करने से बल और ऊर्जा की वृद्धि होती है, लेकिन यह सही उत्तर में शामिल नहीं है।
  • E (उर्ध्वमुखभोजनेन आयुर्वर्धनम्) → उर्ध्वमुख भोजन का कोई विशेष उल्लेख नहीं मिलता, अतः यह सही उत्तर में नहीं आता।

 

इस प्रकार, B, C, D का क्रम दिशानुसार भोजन के प्रभावों को सही रूप में दर्शाता है।

Question 85

तात्पर्यनिर्णयलिङ्गानां क्रमं चिनुत -

A. अपूर्वता

B. अर्थवादः

C. अभ्यासः

D. उपपत्तिः

E. फलम्

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    C, A, E, B, D

  2. BOption (b)

    C, B, D, A, E

  3. COption (c)

    B, C, D, E, A

  4. DOption (d)

    A, B, C, D, E

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Correct answer

Answer: (a)A.

C, A, E, B, D

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- तात्पर्यनिर्णय लिङ्गों का क्रम चुनिए-

उत्तर- C, A, E, B, D

Important Pointsतात्पर्यनिर्णयलिङ्गानां क्रम का विश्लेषण:

तात्पर्यनिर्णय के लिए विभिन्न लिङ्गों का क्रम निर्धारित किया जाता है, जिससे किसी वाक्य या शास्त्रीय कथन का सही अर्थ स्पष्ट किया जा सके। इस क्रम में निम्नलिखित लिङ्गों का उपयोग किया जाता है:

  • C (अभ्यासः) → किसी शब्द या वाक्य का बार-बार प्रयोग होने से उसका तात्पर्य स्पष्ट होता है। अभ्यास से यह सिद्ध होता है कि किसी विशेष शब्द या वाक्य का महत्व अधिक है।
  • A (अपूर्वता) → यदि कोई कथन या शब्द नया और अनूठा प्रतीत होता है, तो उसका विशेष अर्थ निकालने की आवश्यकता होती है।
  • E (फलम्) → किसी कथन से प्राप्त होने वाले फल के आधार पर उसका तात्पर्य निर्धारित किया जाता है। यदि किसी वाक्य का कोई विशेष फल बताया गया है, तो उसका अर्थ उसी के अनुसार समझा जाता है।
  • B (अर्थवादः) → अर्थवाद का प्रयोग किसी कथन के समर्थन में किया जाता है। यह किसी वाक्य के महत्व को बढ़ाने के लिए प्रयुक्त होता है।
  • D (उपपत्तिः) → किसी कथन की तर्कसंगत व्याख्या या सिद्धांत के आधार पर उसका तात्पर्य निर्धारित किया जाता है।

अन्य विकल्पों का विश्लेषण:

  • विकल्प 2 (C, B, D, A, E) → इसमें अर्थवाद को अभ्यास से पहले रखा गया है, जबकि अभ्यास अधिक प्रभावी लिङ्ग है।
  • विकल्प 3 (B, C, D, E, A) → इसमें अर्थवाद को पहले रखा गया है, जो उचित नहीं है।
  • विकल्प 4 (A, B, C, D, E) → यह क्रम सामान्य रूप से व्यवस्थित नहीं है।

 

इस प्रकार, C, A, E, B, D का क्रम तात्पर्यनिर्णय के लिए सबसे उपयुक्त है।

Question 86

शुकनाशोपदेशाधारेण अधोलिखितेषु अनर्थपरम्परायाम् अन्तर्भवन्ति -

A. गर्भेश्वरत्वम् 

B. अमानुषशक्तित्वम्

C. अविद्याव्याधित्वम्

<br>

D. अप्रतिमरूपत्वम्

E. द्रव्यलोलुपत्वम्

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, C, D केवलम्

  2. BOption (b)

    A, B, D केवलम्

  3. COption (c)

    A, D, E केवलम्

  4. DOption (d)

    B, D, E केवलम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

A, B, D केवलम्

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- शुकनाशोपदेश के आधारे निम्नलिखित में से अनर्थपरम्परा में इनका अंतर्भाव होता है-

उत्तर- A, B, D केवलम्

Important Pointsशुकनाशोपदेश में वर्णित अनर्थपरम्परा के आधार पर निम्नलिखित तत्वों का समावेश किया जाता है:

A (गर्भेश्वरत्वम्): यह राजाओं के जन्मसिद्ध अधिकार और उनके शासन की अनिवार्यता को दर्शाता है। शुकनाशोपदेश में यह विचार प्रस्तुत किया गया है कि राजा का जन्म ही शासन के लिए होता है।

B (अमानुषशक्तित्वम्): इसमें राजा को अलौकिक शक्तियों से युक्त माना जाता है। शुकनाशोपदेश में राजाओं को दिव्य शक्तियों से संपन्न बताया गया है, जिससे वे सामान्य जनों से अलग होते हैं।

D (अप्रतिमरूपत्वम्): इसमें राजा के अद्वितीय सौंदर्य और प्रभावशाली व्यक्तित्व का वर्णन किया जाता है। शुकनाशोपदेश में राजाओं को अत्यंत आकर्षक और प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया गया है।

इस प्रकार, गर्भेश्वरत्वम्, अमानुषशक्तित्वम् और अप्रतिमरूपत्वम् शुकनाशोपदेश में वर्णित अनर्थपरम्परा के अंतर्गत आते हैं।

Question 87

साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानं भवति-

  1. AOption (a)

    सिद्धान्तः

  2. BOption (b)

    छलम्

  3. COption (c)

    जातिः

  4. DOption (d)

    निग्रहस्थानम् 

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Correct answer

Answer: (c)C.

जातिः

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उत्तर- जातिः

Important Points

  • जातिः न्यायशास्त्र में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो तर्क-वितर्क के दौरान प्रस्तुत किए गए तर्कों की कमजोरी को उजागर करने के लिए प्रयोग की जाती है।
  • "साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानं भवति" का अर्थ है कि समानता (साधर्म्य) और असमानता (वैधर्म्य) के आधार पर किसी तर्क को खंडित किया जा सकता है।
  • जब कोई व्यक्ति किसी तर्क को प्रस्तुत करता है और उसका प्रतिवाद समानता या असमानता के आधार पर किया जाता है, तो यह जाति कहलाता है।
  • जाति का उपयोग मुख्य रूप से तर्क-वितर्क में किया जाता है, जहाँ किसी तर्क की कमजोरी को दिखाने के लिए समानता या असमानता के आधार पर उसे अस्वीकार किया जाता है।
  • यह न्यायशास्त्र के न्यायसूत्रों में उल्लिखित एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जिसका उपयोग तर्कों की समीक्षा और उनकी वैधता को परखने के लिए किया जाता है।

Question 88

कुन्तकस्य षड्विधवक्रतासु नान्तर्भवन्ति -

A. रसपूर्वार्थवक्रता

B. वर्णविन्यासवक्रता

C. प्रकरणपरार्धवक्रता

D. रीतिवक्रता 

E. पदपूर्वार्धवक्रता

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, C, D केवलम्

  2. BOption (b)

    B, C, D केवलम्

  3. COption (c)

    C, D, E केवलम्

  4. DOption (d)

    A, B, D केवलम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

A, C, D केवलम्

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उत्तर- A, C, D केवलम्

कुन्तक ने वक्रोक्तिसिद्धांत को प्रतिपादित किया, जिसमें उन्होंने षड्विध वक्रता (छह प्रकार की वक्रता) का उल्लेख किया। उनके अनुसार, काव्य की सौंदर्यपूर्ण अभ���व्यक्ति में वक्रता का विशेष महत्व है।

कुन्तक की षड्विध वक्रता:

  1. वर्णविन्यासवक्रता – ध्वनि और अक्षरों की विशेष व्यवस्था।
  2. पदपूर्वार्धवक्रता – शब्दों के प्रारंभिक भाग में विशेषता।
  3. पदपरार्धवक्रता – शब्दों के अंतिम भाग में विशेषता।
  4. वाक्यवक्रता – पूरे वाक्य की संरचना में सौंदर्य।
  5. प्रकरणवक्रता – प्रसंग या संदर्भ में विशेषता।
  6. प्रबंधवक्रता – संपूर्ण काव्य रचना में वक्रता।

उत्तर का विश्लेषण:

  • रसपूर्वार्थवक्रता (A) – कुन्तक ने रस को स्वतंत्र रूप से वक्रता के रूप में नहीं माना, बल्कि उन्होंने शब्द और अर्थ की वक्रता पर अधिक ध्यान दिया।
  • प्रकरणपरार्धवक्रता (C) – कुन्तक ने प्रकरणवक्रता को स्वीकार किया, लेकिन प्रकरणपरार्धवक्रता का उल्लेख नहीं किया।
  • रीतिवक्रता (D) – कुन्तक ने रीति को वक्रता के रूप में नहीं माना, बल्कि उन्होंने भाषा की सौंदर्यपूर्ण अभिव्यक्ति को प्राथमिकता दी।

निष्कर्ष:

कुन्तक की षड्विध वक्रता में रसपूर्वार्थवक्रता, प्रकरणपरार्धवक्रता और रीतिवक्रता शामिल नहीं हैं। इसलिए सही उत्तर A, C, D है।

Question 89

परस्परं समुचितं मेलयत-

A.प्राशस्त्यनिन्दातरपरं वाक्यम्I.निषेधः
B.विधेयार्थपरिच्छेदकतयार्थवत्त्वम्II.अर्थवादः
C.एकाङ्गानुवादेन विधीयमानयोरङ्गयोरन्तराले विहितत्वम्III.नामधेयः
D.पुरुषस्य निवर्तकं वाक्यम्IV.संदंशः
<br>

अधोलिखितविकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - II, B - I, C - III, D - IV

  2. BOption (b)

    A - II, B - III, C - IV, D - I

  3. COption (c)

    A - II, B - IV, C - III, D - I

  4. DOption (d)

    A - II, B - I, C - IV, D - III

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Correct answer

Answer: (b)B.

A - II, B - III, C - IV, D - I

Why this answer is correct

उत्तर- A - II, B - III, C - IV, D - I

A - II: प्राशस्त्यनिन्दातरपरं वाक्यम्- अर्थवादः

यह वह कथन होता है जो विधि या निषेध न होकर प्रशंसा (प्रशस्ति) या निंदा के माध्यम से किसी व्यवहार को प्रेरित करता है। इसे अर्थवाद कहते हैं, जैसे यज्ञ करने से स्वर्ग की प्राप्तियह वाक्य यज्ञ की प्रशंसा करता है।

B - III: विधेयार्थपरिच्छेदकतया अर्थवत्त्वम्- नामधेयः

जब कोई वाक्य किसी विशेष क्रिया (विधेयार्थ) की सटीकता या विशिष्टता से जुड़ा होता है, तब उसे नामधेय कहा जाता है। यह वाक्य क्रिया को अधिक स्पष्टता देता है, जिससे उसका संपूर्ण आशय समझ में आता है।

C - IV: एकाङ्गानुवादेन विधीयमानयोरङ्गयोरन्तराले विहितत्वम्- संदंशः

यह विशेष प्रकार की विधि होती है जिसमें किसी अंग विशेष के अनुवाद से दोनों अंगों के मध्य विद्यमान विधि को स्पष्ट किया जाता है। यह संदंश कहलाता है। इसे "अंतराले विहितत्व" की स्थिति भी कहा जाता है।

D - I: पुरुषस्य निवर्तकं वाक्यम्- निषेधः

जब कोई वाक्य किसी क्रिया या व्यवहार से पुरुष (कर्ता) को रोकता है, उसे निषेध कहते हैं। उदाहरणतः – "न हिंस्यात् सर्वाणि भूतानि" – यह वाक्य हिंसा से रोकता है।

इस प्रकार सभी विकल्पों का उचित समायोजन विकल्प 2) A - II, B - III, C - IV, D - I में मिलता है।

अगर चाहें तो मैं इन पदों पर आधारित कोई श्लोक या अभ्यास भी तैयार कर सकता हूँ... बताएँगे? 😊📚

अधोलिखतानुच्छेदं पठित्वा प्रश्नानाम् उत्तरं देयम्-

विषयस्यानिगीर्णस्यान्यतादात्म्यप्रतीतिकृत् ।

सारोपा, स्यान्निगीर्णस्य मता साध्यवसानिका ॥

विषयिणा अनिगीर्णस्य अतिरोहितस्य विषयस्य तेनैव सह तादात्म्यप्रतीतिकृत् सारोपा। इयमेव रूपकालङ्कारस्य बीजम् । रूढावुपादानलक्षणा सारोपा, यथा- अश्वः श्वेतो धावति । अत्र हि श्वेतगुणवानश्वोऽनिगीर्णस्वरूपः स्वसमवेतगुणतादात्म्येन प्रतीयते । प्रयोजने यथा- एते कुन्ताः प्रविशन्ति । अत्र सर्वनाम्ना कुन्तधारिपुरुषनिर्देशात् सारोपत्वम्। रूढो लक्षणलक्षणा सारोपा, यथा- कलिङ्गः पुरुषो युध्यते । अत्र कलिङ्गपुरुषयोराधाराधेयभावः सम्बन्धः । प्रयोजने यथा - आयुर्धृतम् । अत्रायुष्कारणमपि घृतं कार्यकारणभावसम्बन्धसम्बन्ध्यायुस्तादात्म्येन प्रतीयते।

अन्यवैलक्षण्येनाव्यभिचारेणायुष्करत्वं प्रयोजनम् । यथा वा राजकीये पुरुषे गच्छति इति । अत्र स्वस्वामिभावलक्षणः सम्बन्धः । यथा वा अग्रमात्रेऽवयवभागे 'हस्तोऽयम् ।

अत्रावयवावयविभावलक्षणसम्बन्धः । ब्राह्मणेऽपि तक्षाऽसी । अत्र तात्कर्म्यलक्षणः ।

Question 90

'कलिङ्गः पुरुषो युध्यते' इत्यत्र कलिङ्ग-पुरुषयोः कः सम्बन्धः ?

  1. AOption (a)

    स्वस्वामिभावसम्बन्धः 

  2. BOption (b)

    आधाराधेयभावसम्बन्धः

  3. COption (c)

    निरूप्यनिरूपकभावसम्बन्धः

  4. DOption (d)

    जन्यजनकभावसम्बन्धः

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Correct answer

Answer: (b)B.

आधाराधेयभावसम्बन्धः

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उत्तर- ​आधाराधेयभावसम्बन्धः

यह गद्यांश संस्कृत काव्यशास्त्र में "सारोपा लक्षणा" के विभिन्न प्रकारों और उनके प्रयोगों का वर्णन करता है।

सारांश:

गद्यांश में यह बताया गया है कि जब कोई विषय (शब्द) अपने वास्तविक अर्थ में नहीं लिया जाता, बल्कि उससे संबंधित किसी अन्य वस्तु के साथ तादात्म्य (एकरूपता) के आधार पर अर्थ ग्रहण किया जाता है, तो उसे सारोपा लक्षणा कहते हैं। यह रूपक अलंकार की नींव होती है।

लेख में विभिन्न उदाहरणों से यह स्पष्ट किया गया है:

  • रूढ़ाव उपादान लक्षणा: जैसे “अश्वः श्वेतो धावति” में सफेद रंग के गुण के कारण अश्व की पहचान।
  • रूढ़ लक्षण लक्षणा: जैसे “कलिङ्गः पुरुषो युध्यते” में 'कलिङ्ग' से ‘कलिङ्ग देश का पुरुष’ तात्पर्य है।
  • कार्य-कारण सम्बन्ध: “आयुर्धृतम्” में 'घृत' से आयु का संबंध दर्शाया गया है।
  • स्वामित्व सम्बन्ध: “राजकीये पुरुषे गच्छति” में राजकीय का अर्थ राजा का सेवक।
  • अवयव-अवयवी सम्बन्ध: “हस्तोऽयम्” में 'हस्त' को व्यक्ति का अवयव मानकर उसका अर्थ समझा गया है।
  • तात्कर्म्य लक्षणा: “ब्राह्मणेऽपि तक्षाऽसी” में ब्राह्मण के कार्य के अनुसार उसका अर्थ तक्षक लिया गया है।

 

इस प्रकार यह गद्यांश लक्षणा के एक विशिष्ट प्रकार "सारोपा लक्षणा" की परिभाषा, स्वरूप और उपादान के आधार पर विभिन्न प्रयोगों को स्पष्ट करता है।

Question 91

अनिगीर्णशब्दस्य कोऽर्थः ?

  1. AOption (a)

    अतिरोहितः

  2. BOption (b)

    तिरोहितः

  3. COption (c)

    सङ्कल्पितः

  4. DOption (d)

    असङ्कल्पितः

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Correct answer

Answer: (a)A.

अतिरोहितः

Why this answer is correct

उत्तर- ​अतिरोहितः

यह गद्यांश संस्कृत काव्यशास्त्र में "सारोपा लक्षणा" के विभिन्न प्रकारों और उनके प्रयोगों का वर्णन करता है।

सारांश:

गद्यांश में यह बताया गया है कि जब कोई विषय (शब्द) अपने वास्तविक अर्थ में नहीं लिया जाता, बल्कि उससे संबंधित किसी अन्य वस्तु के साथ तादात्म्य (एकरूपता) के आधार पर अर्थ ग्रहण किया जाता है, तो उसे सारोपा लक्षणा कहते हैं। यह रूपक अलंकार की नींव होती है।

लेख में विभिन्न उदाहरणों से यह स्पष्ट किया गया है:

  • रूढ़ाव उपादान लक्षणा: जैसे “अश्वः श्वेतो धावति” में सफेद रंग के गुण के कारण अश्व की पहचान।
  • रूढ़ लक्षण लक्षणा: जैसे “कलिङ्गः पुरुषो युध्यते” में 'कलिङ्ग' से ‘कलिङ्ग देश का पुरुष’ तात्पर्य है।
  • कार्य-कारण सम्बन्ध: “आयुर्धृतम्” में 'घृत' से आयु का संबंध दर्शाया गया है।
  • स्वामित्व सम्बन्ध: “राजकीये पुरुषे गच्छति” में राजकीय का अर्थ राजा का सेवक।
  • अवयव-अवयवी सम्बन्ध: “हस्तोऽयम्” में 'हस्त' को व्यक्ति का अवयव मानकर उसका अर्थ समझा गया है।
  • तात्कर्म्य लक्षणा: “ब्राह्मणेऽपि तक्षाऽसी” में ब्राह्मण के कार्य के अनुसार उसका अर्थ तक्षक लिया गया है।

 

इस प्रकार यह गद्यांश लक्षणा के एक विशिष्ट प्रकार "सारोपा लक्षणा" की परिभाषा, स्वरूप और उपादान के आधार पर विभिन्न प्रयोगों को स्पष्ट करता है।

Question 92

आयुर्धृतमित्यत्र आयुषः जनकं किम् ?

  1. AOption (a)

    दधि

  2. BOption (b)

    दुग्धम्

  3. COption (c)

    नवनीतम्

  4. DOption (d)

    घृतम्

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Correct answer

Answer: (d)D.

घृतम्

Why this answer is correct

उत्तर- घृतम्

यह गद्यांश संस्कृत काव्यशास्त्र में "सारोपा लक्षणा" के विभिन्न प्रकारों और उनके प्रयोगों का वर्णन करता है।

सारांश:

गद्यांश में यह बताया गया है कि जब कोई विषय (शब्द) अपने वास्तविक अर्थ में नहीं लिया जाता, बल्कि उससे संबंधित किसी अन्य वस्तु के साथ तादात्म्य (एकरूपता) के आधार पर अर्थ ग्रहण किया जाता है, तो उसे सारोपा लक्षणा कहते हैं। यह रूपक अलंकार की नींव होती है।

लेख में विभिन्न उदाहरणों से यह स्पष्ट किया गया है:

  • रूढ़ाव उपादान लक्षणा: जैसे “अश्वः श्वेतो धावति” में सफेद रंग के गुण के कारण अश्व की पहचान।
  • रूढ़ लक्षण लक्षणा: जैसे “कलिङ्गः पुरुषो युध्यते” में 'कलिङ्ग' से ‘कलिङ्ग देश का पुरुष’ तात्पर्य है।
  • कार्य-कारण सम्बन्ध: “आयुर्धृतम्” में 'घृत' से आयु का संबंध दर्शाया गया है।
  • स्वामित्व सम्बन्ध: “राजकीये पुरुषे गच्छति” में राजकीय का अर्थ राजा का सेवक।
  • अवयव-अवयवी सम्बन्ध: “हस्तोऽयम्” में 'हस्त' को व्यक्ति का अवयव मानकर उसका अर्थ समझा गया है।
  • तात्कर्म्य लक्षणा: “ब्राह्मणेऽपि तक्षाऽसी” में ब्राह्मण के कार्य के अनुसार उसका अर्थ तक्षक लिया गया है।

 

इस प्रकार यह गद्यांश लक्षणा के एक विशिष्ट प्रकार "सारोपा लक्षणा" की परिभाषा, स्वरूप और उपादान के आधार पर विभिन्न प्रयोगों को स्पष्ट करता है।

Question 93

हस्त- तदग्रभागयोः कः सम्बन्धः ?

  1. AOption (a)

    तात्कर्म्यसम्बन्धः

  2. BOption (b)

    कार्यकारणभावसम्बन्धः

  3. COption (c)

    अवयवावयविभावसम्बन्धः

  4. DOption (d)

    आधराधेयभावसम्बन्धः

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Correct answer

Answer: (c)C.

अवयवावयविभावसम्बन्धः

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उत्तर- ​अवयवावयविभावसम्बन्धः

 

यह गद्यांश संस्कृत काव्यशास्त्र में "सारोपा लक्षणा" के विभिन्न प्रकारों और उनके प्रयोगों का वर्णन करता है।

सारांश:

गद्यांश में यह बताया गया है कि जब कोई विषय (शब्द) अपने वास्तविक अर्थ में नहीं लिया जाता, बल्कि उससे संबंधित किसी अन्य वस्तु के साथ तादात्म्य (एकरूपता) के आधार पर अर्थ ग्रहण किया जाता है, तो उसे सारोपा लक्षणा कहते हैं। यह रूपक अलंकार की नींव होती है।

लेख मे�� विभिन्न उदाहरणों से यह स्पष्ट किया गया है:

  • रूढ़ाव उपादान लक्षणा: जैसे “अश्वः श्वेतो धावति” में सफेद रंग के गुण के कारण अश्व की पहचान।
  • रूढ़ लक्षण लक्षणा: जैसे “कलिङ्गः पुरुषो युध्यते” में 'कलिङ्ग' से ‘कलिङ्ग देश का पुरुष’ तात्पर्य है।
  • कार्य-कारण सम्बन्ध: “आयुर्धृतम्” में 'घृत' से आयु का संबंध दर्शाया गया है।
  • स्वामित्व सम्बन्ध: “राजकीये पुरुषे गच्छति” में राजकीय का अर्थ राजा का सेवक।
  • अवयव-अवयवी सम्बन्ध: “हस्तोऽयम्” में 'हस्त' को व्यक्ति का अवयव मानकर उसका अर्थ समझा गया है।
  • तात्कर्म्य लक्षणा: “ब्राह्मणेऽपि तक्षाऽसी” में ब्राह्मण के कार्य के अनुसार उसका अर्थ तक्षक लिया गया है।

 

इस प्रकार यह गद्यांश लक्षणा के एक विशिष्ट प्रकार "सारोपा लक्षणा" की परिभाषा, स्वरूप और उपादान के आधार पर विभिन्न प्रयोगों को स्पष्ट करता है।

Question 94

रूपकालङ्कारस्य बीजं किम्?

  1. AOption (a)

    उपादानलक्षणा

  2. BOption (b)

    लक्षितलक्षणा

  3. COption (c)

    सारोपालक्षणा

  4. DOption (d)

    अध्यवसाना लक्षणा

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Correct answer

Answer: (c)C.

सारोपालक्षणा

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उत्तर- ​सारोपालक्षणा

यह गद्यांश संस्कृत काव्यशास्त्र में "सारोपा लक्षणा" के विभिन्न प्रकारों और उनके प्रयोगों का वर्णन करता है।

सारांश:

गद्यांश में यह बताया गया है कि जब कोई विषय (शब्द) अपने वास्तविक अर्थ में नहीं लिया जाता, बल्कि उससे संबंधित किसी अन्य वस्तु के साथ तादात्म्य (एकरूपता) के आधार पर अर्थ ग्रहण किया जाता है, तो उसे सारोपा लक्षणा कहते हैं। यह रूपक अलंकार की नींव होती है।

लेख में विभिन्न उदाहरणों से यह स्पष्ट किया गया है:

  • रूढ़ाव उपादान लक्षणा: जैसे “अश्वः श्वेतो धावति” में सफेद रंग के गुण के कारण अश्व की पहचान।
  • रूढ़ लक्षण लक्षणा: जैसे “कलिङ्गः पुरुषो युध्यते” में 'कलिङ्ग' से ‘कलिङ्ग देश का पुरुष’ तात्पर्य है।
  • कार्य-कारण सम्बन्ध: “आयुर्धृतम्” में 'घृत' से आयु का संबंध दर्शाया गया है।
  • स्वामित्व सम्बन्ध: “राजकीये पुरुषे गच्छति” में राजकीय का अर्थ राजा का सेवक।
  • अवयव-अवयवी सम्बन्ध: “हस्तोऽयम्” में 'हस्त' को व्यक्ति का अवयव मानकर उसका अर्थ समझा गया है।
  • तात्कर्म्य लक्षणा: “ब्राह्मणेऽपि तक्षाऽसी” में ब्राह्मण के कार्य के अनुसार उसका अर्थ तक्षक लिया गया है।

 

इस प्रकार यह गद्यांश लक्षणा के एक विशिष्ट प्रकार "सारोपा लक्षणा" की परिभाषा, स्वरूप और उपादान के आधार पर विभिन्न प्रयोगों को स्पष्ट करता है।

अधोलिखितानुच्छेदं पठित्वा प्रश्नानाम् उत्तरं देयम्-

यदा चक्षुरादिना घटगतरूपादिकं गृह्यते घटे श्यामरूपमस्तीति तदा चक्षुरिन्द्रियं घटरूपमर्थः, अनयोः सन्निकर्षः संयुक्तसमवाय एव, चक्षुः संयुक्ते घटे रूपस्य समवायात् । एवं मनसाऽऽत्मसमवेते सुखादी गृह्यमाणे अयमेव सन्निकर्षः । यदा पुनश्चक्षुषा घटरूपसमवेतं रूपत्वादिसामान्यं गृह्यते तदा चक्षुरिन्द्रियं रूपत्वादिसामान्यमर्थः, अनयोः सन्निकर्षः संयुक्तसमवेतसमवाय एव यतश्चक्षुस्संयुक्ते घटे रूपं समवेतं तत्र रूपत्वस्य समवायात् । यदा श्रोत्रेन्द्रियेण शब्दो गृह्यते तदा श्रोत्रमिन्द्रियं शब्दोऽर्थ, अनयोः सन्निकर्षः समवाय एव । कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नं नभः श्रोत्रम्। श्रोत्रस्याकाशात्मकत्वाच्छब्दस्य चाकाशगुणत्वाद् गुणगुणिनोश्च समवायात् । यदा शब्दसमवेतं शब्दत्वादिसामान्यं श्रोत्रेन्द्रियेण गृह्यते तदा श्रोत्रमिन्द्रियं शब्दत्वादिसामान्यमर्थः । अनयोः सन्निकर्षः समवेतसमवाय एव । श्रोत्रसमवेते शब्दे शब्दत्वस्य समवायात् । यदा च मनस्संयुक्त आत्मनि सुखाद्यभावो गृह्यते 'अहं सुखरहितः' इति तदा मनः संयुक्तस्यात्मनः सुखाद्यभावो विशेषणम्। यदा श्रोत्रसमवेते गकारे घत्वाभावो गृह्यते तदा श्रोत्रसमवेतस्य गकारस्य घत्वाभावो विशेषणम्।

Question 95

सुखप्रत्यक्षे कः सन्निकर्षः ?

  1. AOption (a)

    संयोगसन्निकर्षः 

  2. BOption (b)

    संयुक्तसमवेतसमवायसन्निकर्षः

  3. COption (c)

    संयुक्तसमवायसन्निकर्षः

  4. DOption (d)

    समवेतसमवायसन्निकर्षः

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Correct answer

Answer: (c)C.

संयुक्तसमवायसन्निकर्षः

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उत्तर- ​संयुक्तसमवायसन्निकर्षः

हिन्दी अनुवाद-

जब चक्षु आदि इन्द्रियों द्वारा घट में स्थित रूप आदि को ग्रहण किया जाता है, तब चक्षु इन्द्रिय और घट में स्थित रूप के बीच का संबंध संयुक्तसमवाय कहलाता है, क्योंकि चक्षु घट से संयुक्त है और रूप घट में समविष्ट है।

इसी प्रकार, जब मन द्वारा आत्मा में स्थित सुख आदि को ग्रहण किया जाता है, तब भी वही संयुक्तसमवायसन्निकर्ष होता है।

परंतु जब चक्षु द्वारा घट में स्थित रूप में समविष्ट रूपत्व (रूप का सामान्य गुण) को ग्रहण किया जाता है, तब चक्षु इन्द्रिय और रूपत्व के बीच का संबंध संयुक्तसमवेतसमवाय कहलाता है, क्योंकि चक्षु घट से संयुक्त है, घट में रूप समविष्ट है और रूप में रूपत्व समविष्ट है।

जब श्रोत्र इन्द्रिय द्वारा शब्द को ग्रहण किया जाता है, तब श्रोत्र और शब्द के बीच का संबंध समवायसन्निकर्ष होता है, क्योंकि श्रोत्र आकाश का अंश है और शब्द आकाश का गुण है—गुण और गुणी के बीच समवाय संबंध होता है।

जब श्रोत्र द्वारा शब्द में समविष्ट शब्दत्व (शब्द का सामान्य गुण) को ग्रहण किया जाता है, तब वह संबंध समवेतसमवायसन्निकर्ष कहलाता है।

इसी प्रकार, जब मन द्वारा आत्मा में स्थित सुख का अभाव (जैसे – "मैं सुखरहित हूँ") ग्रहण किया जाता है, तब वह सुख का अभाव आत्मा का विशेषण होता है।

Question 96

आत्मनि सुखाभावस्य प्रत्यक्षे कः सन्निकर्षः ?

  1. AOption (a)

    समवेतसमवायसन्निकर्षः

  2. BOption (b)

    विशेषणविशेष्यभावसन्निकर्षः

  3. COption (c)

    संयुक्तसमवेतसमवायसन्निकर्षः

  4. DOption (d)

    संयुक्तसमवायसन्निकर्षः

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Correct answer

Answer: (b)B.

विशेषणविशेष्यभावसन्निकर्षः

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उत्तर- ​विशेषणविशेष्यभावसन्निकर्षः

अधोलिखितानुच्छेदं पठित्वा प्रश्नानाम् उत्तरं देयम्-

यदा चक्षुरादिना घटगतरूपादिकं गृह्यते घटे श्यामरूपमस्तीति तदा चक्षुरिन्द्रियं घटरूपमर्थः, अनयोः सन्निकर्षः संयुक्तसमवाय एव, चक्षुः संयुक्ते घटे रूपस्य समवायात् । एवं मनसाऽऽत्मसमवेते सुखादी गृह्यमाणे अयमेव सन्निकर्षः । यदा पुनश्चक्षुषा घटरूपसमवेतं रूपत्वादिसामान्यं गृह्यते तदा चक्षुरिन्द्रियं रूपत्वादिसामान्यमर्थः, अनयोः सन्निकर्षः संयुक्तसमवेतसमवाय एव यतश्चक्षुस्संयुक्ते घटे रूपं समवेतं तत्र रूपत्वस्य समवायात् । यदा श्रोत्रेन्द्रियेण शब्दो गृह्यते तदा श्रोत्रमिन्द्रियं शब्दोऽर्थ, अनयोः सन्निकर्षः समवाय एव । कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नं नभः श्रोत्रम्। श्रोत्रस्याकाशात्मकत्वाच्छब्दस्य चाकाशगुणत्वाद् गुणगुणिनोश्च समवायात् । यदा शब्दसमव���तं शब्दत्वादिसामान्यं श्रोत्रेन्द्रियेण गृह्यते तदा श्रोत्रमिन्द्रियं शब्दत्वादिसामान्यमर्थः । अनयोः सन्निकर्षः समवेतसमवाय एव । श्रोत्रसमवेते शब्दे शब्दत्वस्य समवायात् । यदा च मनस्संयुक्त आत्मनि सुखाद्यभावो गृह्यते 'अहं सुखरहितः' इति तदा मनः संयुक्तस्यात्मनः सुखाद्यभावो विशेषणम्। यदा श्रोत्रसमवेते गकारे घत्वाभावो गृह्यते तदा श्रोत्रसमवेतस्य गकारस्य घत्वाभावो विशेषणम्।

Question 97

रूप-रूपत्वयोः कः सम्बन्धः ?

  1. AOption (a)

    स्वरूपसम्बन्धः

  2. BOption (b)

    समवायसम्बन्धः

  3. COption (c)

    संयोगसम्बन्धः

  4. DOption (d)

    संयुक्तसमवायसम्बन्धः

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Correct answer

Answer: (b)B.

समवायसम्बन्धः

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उत्तर- ​समवायसम्बन्धः

Question 98

शब्दत्वजातिप्रत्यक्षे कः सन्निकर्षः ?

  1. AOption (a)

    संयुक्तसमवायसन्निकर्षः

  2. BOption (b)

    संयुक्तसमवेतसमवायसन्निकर्षः

  3. COption (c)

    समवायसन्निकर्षः

  4. DOption (d)

    समवेतसमवायसन्निकर्षः

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Correct answer

Answer: (d)D.

समवेतसमवायसन्निकर्षः

Why this answer is correct

उत्तर- ​समवेतसमवायसन्निकर्षः

Question 99

समवायेन शब्दः कुत्र तिष्ठति?

  1. AOption (a)

    श्रोत्रे

  2. BOption (b)

    चक्षुष

  3. COption (c)

    तेजसि

  4. DOption (d)

    आकाशत्वे

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Correct answer

Answer: (a)A.

श्रोत्रे

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उत्तर- ​श्रोत्रे

Question 100

महाश्वेतायाः दासी का अस्ति?

  1. AOption (a)

    चन्द्रलेखा

  2. BOption (b)

    तरलिका

  3. COption (c)

    मदनिका

  4. DOption (d)

    पत्रलेखा

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Correct answer

Answer: (b)B.

तरलिका

Why this answer is correct

प्रश्नार्थ- महाश्वेता की दासी कौन है?

उत्तर- तरलिका

Important Points

  • "कादम्बरी" बाणभट्ट द्वारा रचित एक प्रसिद्ध संस्कृत उपन्यास है, जिसमें कई प्रमुख पात्र और उनकी कहानियाँ विस्तृत रूप में प्रस्तुत की गई हैं।
  • इस उपन्यास में महाश्वेता एक प्रमुख पात्र हैं, और उनकी परिचारिका का नाम तरलिका है।
  • तरलिका महाश्वेता की दासी है और महाश्वेता के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
  • महाश्वेता चंद्रापीड से प्रेम करती हैं और अपनी अनन्य भक्ति के लिए जानी जाती हैं।
  • महाश्वेता का चरित्र उच्च कोटि की स्त्री चरित्र है, और उनकी दासी तरलिका उनकी सेवा में सच्ची और निष्ठावान रही है।
  • तरलिका महाश्वेता के साथ उनके दुर्भाग्यपूर्ण और दारुण स्थितियों में भी हमेशा साथ होती है।
  • उनका निष्ठा और सेवाभाव महाश्वेता की कठिनाइयों को भी सहर्ष अपनाने की क्षमता को दर्शाता है।
  • तरलिका महाश्वेता की भावना और स्थिति को समझती है और उनकी संपूर्ण निष्ठा के साथ सेवा करती है, जो किसी भी स्वामी-दासी के संबंध का आदर्श रूप प्रस्तुत करता है।
  • इस प्रकार, "कादम्बरी" ग्रंथ में महाश्वेता की दासी के रूप में तरलिका का वर्णन है, और प्रस्तुत प्रश्न का सही उत्तर "2) तरलिका" है।

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