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UGC NET Paper 2: Sanskrit 25th June 2025 Shift 2 (Previous Year Paper)

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Question 1

अर्थसङ्ग्रहानुसारम् अधस्तनाः वेदविधाः यथाक्रमं लेखनीयाः -

A. अर्थवादः

B. मन्त्रः

C. निषेधः

D. नामधेयः

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, C, D

  2. BOption (b)

    D, C, B, A

  3. COption (c)

    A, D, C, B

  4. DOption (d)

    B, D, C, A

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Correct answer

Answer: (d)D.

B, D, C, A

Why this answer is correct

उत्तर- B, D, C, A

अर्थसंग्रह के अनुसार चार प्रमुख रूपों में वर्गीकृत किए जाते हैं।

  1. मन्त्रः (B)- यह वेदविधाओं का मूल भाग है।
  • मन्त्र वह वाक्य होता है जिससे देवताओं की स्तुति, प्रार्थना या यज्ञ में आह्वान किया जाता है।
  • यह क्रिया को प्रेरित करता है और यज्ञीय कर्मों का आधार होता है।
  • उदाहरण: “ॐ अग्नये स्वाहा” — अग्नि को समर्पित मन्त्र।
  1. नामधेयः (D)- यह विधि कर्म या वस्तु का नामकरण करती है।
  • नामधेय से कर्म का उद्देश्य स्पष्ट होता है।
  • उदाहरण: “अग्निहोत्र” — अग्नि में आहुति देने वाला कर्म।
  1. निषेधः (C)- यह वर्जन या निषेध को दर्शाता है।
  • निषेध से यह बताया जाता है कि कौन-सा कर्म नहीं करना चाहिए।
  • उदाहरण: “न ब्राह्मणः मद्यं पिबेत्” — ब्राह्मण को मद्यपान नहीं करना चाहिए।
  1. अर्थवादः (A)- यह प्रशंसा, निंदा या कथा के रूप में होता है।
  • अर्थवाद का उद्देश्य मुख्य विधि को बल देना होता है।
  • यह स्वतः विधि नहीं होता, बल्कि अन्य विधियों को समर्थन देता है।
  • उदाहरण: “अग्निहोत्रं सर्वपापं शमयति” - अग्निहोत्र सभी पापों को नष्ट करता है।

Question 2

अशोकस्य शाहबाजगढीलेखः कस्यां लिप्यां प्राप्यते ?

  1. AOption (a)

    शारदालिप्याम्

  2. BOption (b)

    खरोष्ठीलिप्याम्

  3. COption (c)

    ब्राह्मीलिप्याम्

  4. DOption (d)

    पुष्करीलिप्याम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

खरोष्ठीलिप्याम्

Why this answer is correct

उत्तर- खरोष्ठीलिप्याम्

स्पष्टीकरण: शाहबाजगढ़ी लेख अशोक के प्रसिद्ध शिलालेखों में से एक है, जो उत्तर पश्चिमी भारत के वर्तमान पाकिस्तान में स्थित है। यह लेख खरोष्ठी लिपि में लिखा गया है। खरोष्ठी लिपि एक प्राचीन लिपि है जो बाएं से दाएं लिखी जाती है और इसका उपयोग मुख्यतः गांधार क्षेत्र में किया जाता था।

Question 3

अधोलिखितेषु सामवेदीयं ब्राह्मणद्वयम् अस्ति-

A. कौषीतकिब्राह्मणम्

B. वंशब्राह्मणम्

C. संहितोपनिषद्ब्राह्मणम्

D. ऐतरेयब्राह्मणम्

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम्

  2. BOption (b)

    B, D केवलम्

  3. COption (c)

    B, C केवलम् 

  4. DOption (d)

    A, D केवलम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

B, C केवलम् 

Why this answer is correct

उत्तर- B, C केवलम् 

ब्राह्मण ग्रंथ: वेदों की व्याख्या करने वाले धार्मिक ग्रंथ हैं जो वेदिक कर्मकांड, अनुष्ठान और पुरोहित व्यवहार का वर्णन करते हैं। हर वेद का अपना ब्राह्मण ग्रंथ होता है।

सामवेद के मुख्यतः दो ब्राह्मण ग्रंथ माने जाते हैं:

  • वंशब्राह्मणम्
  • संहितोपनिषद्ब्राह्मणम्
<br>

वंशब्राह्मणम् और संहितोपनिषद्ब्राह्मणम्:

  • वंशब्राह्मणम् सामवेद का एक महत्वपूर्ण ब्राह्मण ग्रंथ है। यह वैदिक ऋचाओं के साथ वंश और श्रेणी के महत्व से संबंधित है।
  • संहितोपनिषद्ब्राह्मणम् भी सामवेद का एक ब्राह्मण ग्रंथ है। इसमें वैदिक संहिताओं के साथ-साथ उपनिषदों का समावेश होता है।

कौषीतकिब्राह्मणम् ऋग्वेद से संबंधित है।

ऐतरेयब्राह्मणम् भी ऋग्वेद से संबंधित है।

Question 4

अधोलिखितेषु “ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च” इति सूत्रस्य उदाहरणे स्तः-

A. वासुदेवः

B. आनिरुद्धः

c. आत्रेयः

D. नैधेयः

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम्

  2. BOption (b)

    C, D केवलम् 

  3. COption (c)

    A, C केवलम् 

  4. DOption (d)

    B, D केवलम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

A, B केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर- A, B केवलम्

ऋषि-अन्धक-वृष्णि-कुरुभ्यः ( पञ्चमी-बहुवचनम् ) , च ( अव्ययम् )

अनुवृत्तिसहितं सूत्रम्-  'तस्य अपत्यम्' (इति) ऋषि-अन्धक-वृष्णि-कुरुभ्यः अण्

यः शब्दः - ऋषिवाचकः अस्ति / अन्धककुलोत्पन्नस्य अभिधानम् अस्ति / वृष्णिकुलोत्पन्नस्य अभिधानम् अस्ति / कुरुकुलोत्पन्नस्य अभिधानमस्ति, तस्मात् शब्दात् अपत्यार्थे अण् प्रत्ययः विधीयते । उदाहरणानि अधः दत्तानि सन्ति । एतेषां सर्वेषां विषये अत इञ् ४.१.९५ इत्यनेन इञ्-प्रत्यये प्राप्ते तं बाधित्वा वर्तमानसूत्रेण अण्-प्रत्ययः विधीयते ।

१) ऋषिवाचकाः शब्दाः -

अ) वसिष्ठस्य अपत्यम् पुमान् = वसिष्ठ + अण् → वासिष्ठ ।

आ) विश्वामित्रस्य अपत्यम् पुमान् = विश्वामित्र + अण् → वैश्वामित्र ।

२) अन्धककुलवाचकाः शब्दाः -

अ) श्वफल्कस्य अपत्यम् पुमान् = श्वफल्क + अण् → श्वाफल्क ।

आ) रन्धसः अपत्यम् पुमान् = रन्धस् + अण् → रान्धस ।

३) वृष्णिकुलवाचकाः शब्दाः -

अ) वसुदेवस्य अपत्यम् पुमान् = वसुदेव + अण् → वासुदेव ।

आ) अनिरूद्धस्य अपत्यम् पुमान् = अनिरुद्ध + अण् = आनिरुद्ध ।

Question 5

जगती-छन्दसा सम्बद्धविषयौ स्तः -

A. अष्टचत्वारिंशद्वर्णाः

B. जलचरगतिः

C. अतिच्छन्दः

D. चत्वारिंशद्वर्णाः

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम्

  2. BOption (b)

    A, C केवलम्

  3. COption (c)

    B, C केवलम्

  4. DOption (d)

    A, D केवलम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

A, B केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर- A, C केवलम्

जगती छन्दः:

जगती छन्द संस्कृत साहित्य में छन्द (वेदों की लयबद्ध रचनाएँ) का एक प्रमुख प्रकार है।

यह छन्द विशेष रूप से अष्टचत्वारिंशद्वर्णाः (48 वर्ण) में होता है, यानि इस छन्द मीटर में प्रति पंक्ति में 48 वर्ण होते हैं।

इसे अतिच्छन्दस् भी माना जाता है क्योंकि इसके वर्णों की संख्या त्रिष्टुप् छन्द से अधिक होती है, त्रिष्टुप् छन्द में प्रति पंक्ति 44 वर्ण होते हैं।

अष्टचत्वारिंशद्वर्णाः (48 वर्ण): जगती छन्द के प्रत्येक पाद (चरण) में सामान्यतः १२ वर्ण होते हैं। इसे चार पादों में विभाजित करने पर कुल (४ x १२) ४८ वर्ण हो जाते हैं। अतः "अष्टचत्वारिंशद्वर्णाः" इसका एक स्पष्ट लक्षण है।

जलचरगतिः (जल जैसे प्रवाह वाली गति): जगती छन्द के वर्णों की गति जलधर (जल की गति) जैसी मानी जाती है, जिससे पाठ के समय उसमें प्रवाह और लय की अनुभूति होती है। अतः यह एक और महत्वपूर्ण लक्षण है जिसेजगती छन्द में देखा जा सकता है।

इस प्रकार, 'जगती-छन्दसा सम्बद्धविषयौ' विकल्पों का विश्लेषण करने पर निम्नलिखित स्पष्ट होता है: A. अष्टचत्वारिंशद्वर्णाः - यह सही है क्योंकि जगती छन्द में कुल ४८ वर्ण होते हैं। B. जलचरगतिः - यह भी सही है क्योंकि जगती छन्द की गति जल-सी प्रवाहीन होती है।

Question 6

प्रथमसूच्या सह द्वितीयसूचीं सुमेलयत-

List – IList - II
A.वरुणसूक्तम्I.ऋग्वेदः 3.33
B.हिरण्यगर्भसूक्तम्II.ऋग्वेदः 10.125
C.वाक्सूक्तम्III.ऋग्वेदः 1.25
D.विश्वामित्रनदीसंवादसूक्तम्IV.ऋग्वेदः 10.121
<br>

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - III, B - IV, C - II, D - I

  2. BOption (b)

    A - I, B - II, C - III, D - IV

  3. COption (c)

    A - II, B - I, C - III, D - IV

  4. DOption (d)

    A - IV, B - III, C - II, D - I

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Correct answer

Answer: (a)A.

A - III, B - IV, C - II, D - I

Why this answer is correct

उत्तर- A - III, B - IV, C - II, D - I

A. वरुणसूक्तम् - III. ऋग्वेदः 1.25

वरुणसूक्त ऋग्वेद के मंडल 1, सूत्र 25 में स्थित है। इसमें भगवान वरुण की महिमा का वर्णन है।

B. हिरण्यगर्भसूक्तम् - IV. ऋग्वेदः 10.121

हिरण्यगर्भसूक्त ऋग्वेद के मंडल 10, सूत्र 121 में स्थित है। यह सूक्त सृष्टि के आरंभ और हिरण्यगर्भ की स्तुति करता है।

C. वाक्सूक्तम् - II. ऋग्वेदः 10.125

वाक्सूक्त ऋग्वेद के मंडल 10, सूत्र 125 में स्थित है। इसमें वाक् (वाणी/सरस्वती) की स्तुति की जाती है।

D. विश्वामित्रनदीसंवादसूक्तम् - I. ऋग्वेदः 3.33

विश्वामित्रनदीसंवादसूक्त ऋग्वेद के मंडल 3, सूत्र 33 में स्थित है। इसमें ऋषि विश्वामित्र और नदी (सरयू और परुश्णी) के संवाद का वर्णन है।

  • A. वरुणसूक्तम् (ऋग्वेदः 1.25)
  • B. हिरण्यगर्भसूक्तम् (ऋग्वेदः 10.121)
  • C. वाक्सूक्तम् (ऋग्वेदः 10.125)
  • D. विश्वामित्रनदीसंवादसूक्तम् (ऋग्वेदः 3.33)

इस प्रकार, प्रस्तुत प्रश्न का सही उत्तर 1) A - III, B - IV, C - II, D - I है।

Question 7

अधोलिखितेषु जैनदर्शनस्य कौ सिद्धान्तौ स्तः -

A. अपोहवादः

B. अनेकान्तवादः

C. स्याद्वादः

D. सन्तानवादः

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम् 

  2. BOption (b)

    B, C केवलम्

  3. COption (c)

    C, D केवलम्

  4. DOption (d)

    D, A केवलम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

B, C केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर- B, C केवलम्

जैन दर्शन: जैन धर्म एक प्राचीन भारतीय धर्म है, जो अहिंसा (अहिंसक जीवन), अपरिग्रह (संपत्ति की न्यूनता) और आत्म-नियंत्रण के आदर्शों पर आधारित है। जैन दर्शन के कई प्रमुख सिद्धांत हैं, जिनमें से अनेकान्तवाद और स्याद्वाद प्रमुख हैं।

अनेकान्तवादः

अनेकान्तवाद का अर्थ है "अनेक दृष्टिकोणों का सिद्धांत"। यह सिद्धांत यह बताता है कि सत्य और वास्तविकता को विभिन्न दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है और कोई भी एक दृष्टिकोण संपूर्ण सत्य को नहीं दर्शा सकता। यह जैन दर्शन का एक महत्वपूर्ण तत्व है जो सत्य के बहुआयामी दृष्टिकोण की ओर इशारा करता है।

स्याद्वादः

स्याद्वाद का अर्थ है "सापेक्षतावाद का सिद्धांत"। यह सिद्धांत यह मानता है कि किसी भी कथन की सत्यता सापेक्ष होती है और विभिन्न परिस्थितियों और दृष्टिकोणों के अनुसार परिवर्तित हो सकती है। इसे "सप्तभंगी न्याय" (सात-कोणीय सिद्धांत) के रूप में जाना जाता है, जो विभिन्न संभावित दृष्टिकोणों के माध्यम से विचारों का विश्लेषण करता है।

Question 8

अधोलिखितानि छन्दांसि यथाशास्त्रं क्रमानुसारं समुपस्थापयत-

A. बृहती

B. त्रिष्टुप्

C. पङ्क्तिः

D. जगती

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, C, D 

  2. BOption (b)

    B, C, D, A

  3. COption (c)

    A, C, B, D

  4. DOption (d)

    D, B, C, A

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Correct answer

Answer: (c)C.

A, C, B, D

Why this answer is correct

उत्तर- A, C, B, D

प्रमुख वैदिक छन्द: वैदिक साहित्य में विभिन्न प्रकार के छन्दों का वर्णन है, जिनमें से चार प्रमुख छन्द बृहती, पङ्क्तिः, त्रिष्टुप् और जगती हैं। इनका क्रम उनकी वर्ण संख्या और संरचना के आधार पर स्थापित है।

1. बृहती

बृहती छन्द में प्रति पंक्ति 36 वर्ण होते हैं। यह छन्द ऋग्वेद में प्रयुक्त होता है और इसकी संरचना इसे अन्य छन्दों से अलग बनाती है।

वर्ण संख्या: 36

2. पङ्क्तिः

पङ्क्ति छन्द में प्रति पंक्ति 40 वर्ण होते हैं। इस छन्द का उपयोग विशेष रुप से मंत्रों में होता है।

वर्ण संख्या: 40

3. त्रिष्टुप् 

त्रिष्टुप् छन्द में प्रति पंक्ति 44 वर्ण होते हैं। यह छन्द ऋग्वेद में सबसे अधिक प्रचलित है और इसका प्रयोग प्रायः किया जाता है।

वर्ण संख्या: 44

4. जगती

जगती छन्द में प्रति पंक्ति 48 वर्ण होते हैं। यह छन्द अपेक्षाकृत अधिक लंबी पंक्तियों वाला होता है।

वर्ण संख्या: 48

यथाशास्त्र क्रम: इन छन्दों को उनकी वर्ण संख्या के आधार पर क्रमबद्ध किया जाता है। इसलिए क्रम निम्नलिखित है:

  • A. बृहती (36 वर्ण)
  • C. पङ्क्तिः (40 वर्ण)
  • B. त्रिष्टुप् (44 वर्ण)
  • D. जगती (48 वर्ण)

अतः, प्रस्तुत प्रश्न का सही उत्तर है 3) A, C, B, D:

Question 9

अधोलिखितेषु यजुर्वेदीयम् आरण्यकं नाऽस्ति-

  1. AOption (a)

    बृहदारण्यकम् 

  2. BOption (b)

    तैत्तरीयारण्यकम्

  3. COption (c)

    मैत्रायणीयारण्यकम्

  4. DOption (d)

    शाङ्खायनारण्यकम्

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Correct answer

Answer: (d)D.

शाङ्खायनारण्यकम्

Why this answer is correct

उत्तर- शाङ्खायनारण्यकम्

यजुर्वेद का संक्षिप्त परिचय:

यजुर्वेद चार वेदों में से एक है और मुख्यतः यज्ञ और कर्मकाण्डों से संबंधित होता है। यजुर्वेद को दो भागों में विभाजित किया जाता है: कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद। इनके अंतर्गत विभिन्न आरण्यक और ब्राह्मण ग्रन्थ आते हैं।

आरण्यक:

आरण्यक ग्रन्थ वेदों के साथ जुड़े हुए हैं और इनमें यज्ञ, उपासना और ध्यान की विधियाँ वर्णित हैं। ये ग्रन्थ मुख्यत: उन व्यक्तियों के लिए बने हैं जो वन में निवास करते हैं, इसलिए इन्हें आरण्यक कहा जाता है।

यजुर्वेदीय आरण्यक:

यजुर्वेद के अंतर्गत आने वाले प्रमुख आरण्यक ग्रन्थ निम्नलिखित हैं:

  • बृहदारण्यकम्: यह शुक्ल यजुर्वेद का एक मुख्य आरण्यक है और इसमें उपनिषदों का बड़ा महत्त्व है। यह अद्वैत वेदान्त के महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है। यजुर्वेदीय आरण्यक है।
  • तैत्तरीयारण्यकम्: यह कृष्ण यजुर्वेद का एक आरण्यक है और इसमें कर्मकाण्ड और उपासना के साथ-साथ दर्शन के तत्व भी संकलित हैं। यजुर्वेदीय आरण्यक है।
  • मैत्रायणीयारण्यकम्: यह भी कृष्ण यजुर्वेद का एक आरण्यक है। इसमें यज्ञ के विभिन्न प्रकार और उनकी विधियों का वर्णन किया गया है। यजुर्वेदीय आरण्यक है।
  • शाङ्खायनारण्यकम्: शाङ्खायनारण्यक ऋग्वेद से संबंधित है, न कि यजुर्वेद से। इसमें ऋग्वेद के मंत्रों और यज्ञों का विवरण होता है। यजुर्वेदीय आरण्यक नहीं है।
<br>

अतः, प्रस्तुत प्रश्न का सही उत्तर 4) शाङ्खायनारण्यकम् है

Question 10

अधस्तनेषु ङीप्-प्रत्ययस्य उदाहरणमस्ति -

  1. AOption (a)

    गौरी

  2. BOption (b)

    मृद्वी 

  3. COption (c)

    गार्गी 

  4. DOption (d)

    गोपी

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Correct answer

Answer: (c)C.

गार्गी 

Why this answer is correct

उत्तर- गार्गी

गार्गी में "गर्ग" नाम के साथ ङीप्-प्रत्यय (ई) का प्रयोग हुआ है, जिससे यह एक विशिष्ट रूप से गोत्रनाम के साथ प्रयोग होने वाला उदाहरण है। इस प्रकार, "ङीप्-प्रत्यय" का सही उदाहरण "गार्गी" है।

Question 11

अधोलिखितानि महाभारतस्य पर्वनामानि यथाक्रमं चिनुत-

A. द्रोणपर्व

B. वनपर्व

C. सौप्तिकपर्व

D. कर्णपर्व

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, C, D

  2. BOption (b)

    B, A, C, D

  3. COption (c)

    B, A, D, C

  4. DOption (d)

    D, A, C, B

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Correct answer

Answer: (c)C.

B, A, D, C

Why this answer is correct

उत्तर- B, A, D, C

महाभारत एक महाकाव्य है जिसे 18 पर्वों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक पर्व में एक महत्वपूर्�� कथा या घटना का वर्णन है। दिए गए विकल्पों के अनुसार, पर्वों के अनुक्रम में सही क्रम 3) B, A, D, C है।

महाभारत के प्रमुख पर्व: महाभारत विभिन्न पर्वों में विभाजित है जिनमें से कुछ प्रमुख पर्व निम्नलिखित हैं:

  • आदिपर्व - महाभारत की शुरुआत की कथा और पांडवों तथा कौरवों का परिचय देता है।
  • सभापर्व - द्यूत (जुए) की घटना और द्रौपदी की सभा में अपमान का वर्णन करता है।
  • वनपर्व (B) - यह महाभारत का तीसरा पर्व है जिसमें पांडवों का वनवास वर्णित है।
  • विराटपर्व - पांडवों का अज्ञातवास और विराट राज के यहां निवास का वर्णन किया गया है।
  • उद्योगपर्व - युद्ध की तैयारी और युद्ध के प्रयासों का वर्णन।
  • भीष्मपर्व - महाभारत युद्ध का प्रारंभ और भीष्म का नेतृत्व।
  • द्रोणपर्व (A) - महाभारत युद्ध के मध्य भाग का वर्णन जिसमें द्रोणाचार्य मुख्य भूमिका निभाते हैं।
  • कर्णपर्व (D) - महाभारत युद्ध का वर्णन, जिसमें कर्ण की वीरता और योगदान का उल्लेख है।
  • शल्यपर्व - शल्य का युद्ध और उनकी भूमिका।
  • सौप्तिकपर्व (C) - महाभारत युद्ध के अंत के बाद अश्वत्थामा द्वारा पांडवों के शिविर पर हमला और वीरों की हत्या का वर्णन।
  • स्त्रीपर्व - युद्ध के बाद महिलाओं के शोक और विलाप का वर्णन।
  • शांतिपर्व - युद्ध के पश्चात युधिष्ठिर का शासन और राज्य संचालन।
  • अनुशासनपर्व - जीवन, धर्म और शासन के सिद्धांतों पर भीष्म के उपदेश।
  • अश्वमेधिकपर्व - अश्वमेध यज्ञ का वर्णन।
  • आश्रमेधिकपर्व - ऋषि और मुनियों के आश्रमों का वर्णन।
  • मौसलपर्व - यादवों का विनाश और उनकी आपसी लड़ाइयों का वर्णन।
  • महाप्रस्थानिकपर्व - पांडवों द्वारा हिमालय की यात्रा और महासमाधि का वर्णन।
  • स्वर्गारोहणपर्व - युधिष्ठिर का स्वर्गारोहण और स्वर्ग में प्रवेश।

कथाक्रम के अनुसार सही क्रम: महाभारत के विभिन्न पर्वों में दिए गए उपरोक्त पर्वों को अगर सही क्रम में रखा जाए, तो उनके अनुकरण निम्नलिखित होता है:

  • वनपर्व (B) - पांडवों का वनवास।
  • द्रोणपर्व (A) - महाभारत युद्ध का मध्य भाग जहां द्रोणाचार्य मुख्य भूमिका में हैं।
  • कर्णपर्व (D) - कर्ण की वीरता और योगदान वाले युद्ध का वर्णन।
  • सौप्तिकपर्व (C) - अश्वत्थामा द्वारा पांडवों के शिविर पर हमला और मृत्यु का वर्णन।

 

अतः, प्रस्तुत प्रश्न का सही उत्तर 3) B, A, D, C है।

Question 12

निरुक्ते वैश्वानरस्य निर्वचनप्रसङ्गे अधोलिखितानि यास्कवचनानि यथाक्रमं स्थापयत-

A. विश्वान् नरान् नयति

B. विश्वानर एव स्यात्

C. वैश्वानरः कस्मात्

D. विश्वे एनं नरा नयन्ति

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, C, D 

  2. BOption (b)

    D, C, B, A

  3. COption (c)

    C, A, B, D

  4. DOption (d)

    C, A, D, B

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Correct answer

Answer: (c)C.

C, A, B, D

Why this answer is correct

उत्तर- A, B, C, D

C. वैश्वानरः कस्मात्: यास्क पहले प्रश्न करते हैं, "वैश्वानरः कस्मात्" अर्थात "वैश्वानर किस कारण हुआ?" यह वैश्वानर शब्द की उत्पत्ति का बिन्दु है।

A. विश्वान् नरान् नयति: इसके बाद यास्क यह स्पष्ट करते हैं कि "विश्वान् नरान् नयति" अर्थात "यह (वैश्वानर) सभी लोगों (नर) को साथ में ले जाता है"। यह वैश्वानर शब्द के अर्थ और व्युत्पत्ति का प्रारंभिक व्याख्यान है।

B. विश्वानर एव स्यात्: फिर यास्क यह कहते हैं कि "विश्वानर एव स्यात्" अर्थात "इसलिए इसे विश्वानर कहा जाता है"। यह इस बात की पुष्टि करता है कि सभी नर (लोग) इसे साथ में ले जाते हैं या इसके साथ होते हैं।

D. विश्वे एनं नरा नयन्ति: अंत में, यास्क यह निष्कर्ष निकालते हैं कि "विश्वे एनं नरा नयन्ति" अर्थात "सभी लोग इसे साथ में ले जाते हैं"। यह पिछले कथन की पुष्टि में है और वैश्वानर के महत्व को उजागर करता है।

Question 13

भाषाविज्ञाने अर्धस्वराः कथ्यन्ते-

  1. AOption (a)

    अन्तस्थाः

  2. BOption (b)

    स्पर्शाः

  3. COption (c)

    ऊष्माणः

  4. DOption (d)

    यमाः

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Correct answer

Answer: (a)A.

अन्तस्थाः

Why this answer is correct

उत्तर- अन्तस्थाः

भाषाविज्ञान में ध्वनियों के वर्गीकरण को समझना महत्वपूर्ण है, ताकि विभिन्न ध्वनियों की प्रकृति और उनके उच्चारण के आधार पर विभाजन को समझा जा सके। प्रस्तुत प्रश्न में ध्वनियों के चार प्रकार दिए गए हैं और इनमें से अर्धस्वर को पहचानने का कार्य है। सही उत्तर 1) अन्तस्थाः है।

अन्तस्थाः

अन्तस्थ ध्वनियाँ ध्वन्यात्मक रूप से स्वर और व्यंजन के बीच की स्थिति में होती हैं। इन्हें अर्धस्वर (Semivowels) कहा जाता है क्योंकि इनका उच्चारण स्वरों जैसे खुलेपन के साथ होता है, लेकिन इन्हें व्यंजनों की तरह माना जाता है।

संस्कृत में अन्तस्थ ध्वनियाँ य, र, ल, व होती हैं। ये ध्वनियाँ स्वर ध्वनियों के नजदीक होती हैं लेकिन पूरी तरह से स्वर नहीं होती हैं।

इन ध्वनियों को अर्धस्वर इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनका उच्चारण स्वर के समान होता है लेकिन ये व्यंजन की तरह व्यवहृत होती हैं।

Question 14

प्रथमसूच्या सह द्वितीयसूचीं सुमेलयत-

List – IList - II
A.योग्यताI.सहरि
B.वीप्साII.यथाशक्ति
C.पदार्थानतिवृत्तिःIII.प्रत्यर्थम्
D.सादृश्यम्IV.अनुरूपम्
<br>

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - III, B - IV, C - II, D - I

  2. BOption (b)

    A - I, B - II, C - III, D - IV

  3. COption (c)

    A - IV, B - III, C - II, D - I

  4. DOption (d)

    A - IV, B - II, C - III, D - I

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Correct answer

Answer: (c)C.

A - IV, B - III, C - II, D - I

Why this answer is correct

उत्तर- A - IV, B - III, C - II, D - I

A. योग्यता - अनुरूपम् (IV): योग्यता का अर्थ है किसी कार्य को करने की क्षमता या पात्रता। अनुरूपम् का अर्थ है उपयुक्त या उचित। इसलिए, योग्यता और अनुरूपम् का सही मेल है।

B. वीप्सा - प्रत्यर्थम् (III): वीप्सा का अर्थ है इ���्छा या अधिक चाहना। प्रत्यर्थम् का अर्थ है एक विशेष उद्देश्य के लिए या किसी उद्देश्य की ओर। इसलिए, वीप्सा और प्रत्यर्थम् का सही मेल है।

C. पदार्थानतिवृत्तिः - यथाशक्ति (II): पदार्थानतिवृत्तिः का अर्थ है वस्तुओं का अत्यधिक संग्रह नहीं करना। यथाशक्ति का अर्थ है अपनी क्षमता के अनुसार। इसलिए, पदार्थानतिवृत्तिः और यथाशक्ति का सही मेल है।

D. सादृश्यम् - सहरि (I): सादृश्यम् का अर्थ है समानता या समानता की अवस्था। सहरि का अर्थ है समानता या सहभागिता। इसलिए, सादृश्यम् और सहरि का सही मेल है।

Question 15

"अथ एतानि इन्द्रभक्तीनि” इति निरुक्तवचनानुसारं इन्द्रेण सम्बद्धविषयो स्तः -

A. प्रातः सवनम्

B. माध्यन्दिनं सवनम्

C. पञ्चदशस्तोमः

D. स्वर्गलोकः

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम्

  2. BOption (b)

    B, C केवलम्

  3. COption (c)

    C, D केवलम्

  4. DOption (d)

    B, D केवलम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

B, C केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर- B, C केवलम्

निरुक्तवचन के अनुसार "अथ एतानि इन्द्रभक्तीनि” से जुड़े विषयों के संदर्भ में, यह बताने का प्रयास है कि कौन-कौन से विषय इन्द्र से सम्बद्ध हैं।

इन्द्र के भक्तियाँ:

  • माध्यन्दिनं सवनम् (B): यह मुख्य रूप से इन्द्र के पूजन के लिए दूसरा सवन होता है, जो मध्याह्न में किया जाता है। यह इन्द्र को समर्पित होता है।
  • पञ्चदशस्तोमः (C): यह भी इन्द्र से सम्बंधित स्तुतियों और कर्मकाण्डों में शामिल है। यह इन्द्र की प्रार्थना के एक महत्वपूर्ण रूप को दर्शाता है।

इन दो विषयों को देखते हुए, सही उत्तर विकल्प 2) B, C केवलम् है।

Question 16

प्रथमसूच्या सह द्वितीयसूचीं सुमेलयत-

List – IList - II
A.इन्द्रःI.धृतव्रतः
B.अग्निःII.बृहत्साम
C.आदित्यःIII.रथन्तरं साम
D.वरुणःIV.वेरूपं साम
<br>

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - I, B - II, C - III, D - IV

  2. BOption (b)

    A - II, B - III, C - IV, D - I

  3. COption (c)

    A - II, B - I, C - IV, D - III

  4. DOption (d)

    A - III, B - I, C - IV, D - II

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Correct answer

Answer: (d)D.

A - III, B - I, C - IV, D - II

Why this answer is correct

उत्तर- A - III, B - I, C - IV, D - II

प्रस्तुत प्रश्न भगवान इन्द्र, अग्नि, आदित्य और वरुण से संबंधित विशेष साम गायन के साथ उनके संबंध को समझने के लिए है।

इन्द्रः (A) - रथन्तरं साम (III):

इन्द्र वैदिक धर्मग्रंथों में प्रमुख देवता हैं और उन्हें रथन्तरं साम से जुड़ा माना जाता है। रथन्तरं साम इन्द्र के स्तुति के लिए गाया जाता है।

अग्निः (B) - बृहत्साम (II):

अग्नि यज्ञों के देवता हैं और उनके स्तवन में बृहत्साम प्रयुक्त होता है। बृहत्साम एक महत्वपूर्ण साम गायन है जो अग्नि की स्तुति के लिए प्रसिद्ध है।

आदित्यः (C) - वेरूपं साम (IV):

आदित्य (सूर्य देवता) और उनके अवयवों से सम्बंधित साम स्तोत्रों में वेरूपं साम आता है। वेरूपं साम आदित्य के लिए गाया जाता है, जो सूर्य और उसके छवि को दर्शाता है।

वरुणः (D) - धृतव्रतः (I):

वरुण, जो सत्य और न्याय के देवता हैं, से धृतव्रतः विशेष रूप से संबद्ध हैं। धृतव्रतः का संबंध वरुण से है।

तदनुसार, सुमेलन निम्नानुसार होगा:

  • A. इन्द्रः - III. रथन्तरं साम
  • B. अग्निः - II. बृहत्साम
  • C. आदित्यः - IV. वेरूपं साम
  • D. वरुणः - I. धृतव्रतः

इस प्रकार, सही विकल्प (4) होगा - A - III, B - II, C - IV, D - I।

Question 17

आर्षेयब्राह्मणं केन वेदेन सह सम्बद्धम् ?

  1. AOption (a)

    होतृवेदेन

  2. BOption (b)

    सामवेदेन

  3. COption (c)

    अथर्ववेदेन

  4. DOption (d)

    आध्वर्युवेदेन

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Correct answer

Answer: (b)B.

सामवेदेन

Why this answer is correct

उत्तर- सामवेदेन

आर्षेयब्राह्मणं, वेदिक साहित्य में एक महत्वपूर्ण ब्राह्मण है और यह सामवेद से संबंधित है। 

सामवेद:

सामवेद चार प्रमुख वेदों में से एक है जिन्हें 'साम' कहा जाता है क्योंकि इसमें मंत्रों को गाने की विशेष पद्धति होती है। यह वेद संगीत और यज्ञों के दौरान गाए जाने वाले मंत्रों का संग्रह है। इसमें मुख्यतः यज्ञ के समय गाने वाले स्तोत्रों (मंत्रों) का उल्लेख किया गया है।

सामवेद का संगीत और गायन की पद्धति विशिष्ट है और इसी कारण से इसका विशेष स्थान है। इसमें ऋग्वेद के मंत्रों को संगीतबद्ध करके प्रस्तुत किया गया है।

ब्राह्मण ग्रन्थ:

ब्राह्मण ग्रंथ वेदों के साथ जुड़े हुए विस्तृत प्राचीन ग्रंथ हैं जिनमें यज्ञों से संबंधित विधि-विधानों, कर्मकाण्डों और अनुष्ठानों का वर्णन होता है।

प्रत्येक वेद का अपना एक या एक से अधिक ब्राह्मण ग्रंथ होता है। जैसे, ऋग्वेद का 'ऐतरेयब्राह्मण' और 'कौषीतकीब्राह्मण', यजुर्वेद का 'तैत्तिरीयब्राह्मण' और 'शतपथ���्राह्मण', सामवेद का 'पंचविंशब्राह्मण' और 'आर्षेयब्राह्मण' आदि।

आर्षेयब्राह्मणम्:

आर्षेयब्राह्मणम् सामवेद से संबंधित एक महत्वपूर्ण ब्राह्मण ग्रंथ है। इस ग्रंथ में सामवेद के विभिन्न मंत्रों को गाने के नियम, विधि, और महत्व का वर्णन होता है।

यह ग्रंथ सामवेद के विभिन्न सामगानों (गान विधियों) और यज्ञों के अनुष्ठानों के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करता है।

आर्षेयब्राह्मण सामवेद से सम्बद्ध है और इसमें सामवेद के स्तोत्रों और अनुष्ठानों का विशेष विवरण है।

Question 18

प्रथमसूच्या सह द्वितीयसूचीं सुमेलयत-

List – IList - II
A.मण्डनमिश्रःI.न्यायसारः
B.भासर्वज्ञःII.तार्किकपरीक्षा
C.वरदराजःIII.विधिविवेकः
D.गङ्गेशोपाध्यायःIV.तत्त्वचिन्तामणिः
<br>

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - IV, B - III, C - II, D - I

  2. BOption (b)

    A - I, B - II, C - III, D - IV

  3. COption (c)

    A - III, B - I, C - II, D - IV

  4. DOption (d)

    A - II, B - IV, C - I, D - III

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Correct answer

Answer: (c)C.

A - III, B - I, C - II, D - IV

Why this answer is correct

उत्तर- A - III, B - I, C - II, D - IV

 

​A. मण्डनमिश्रः - विधिविवेकः (III): मण्डनमिश्र (या सच्चिदानन्द) ने "विधिविवेकः" नामक महत्वपूर्ण ग्रंथ की रचना की। इस ग्रंथ में उन्होंने कर्मकाण्ड पर विस्तृत चर्चा की है।

B. भासर्वज्ञः - न्यायसारः (I): भास (या भासर्वज्ञ) ने "न्यायसारः" लिखा, जो न्यायशास्त्र का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें उन्होंने न्याय के सिद्धांतों का संक्षिप्त और सरल रूप में वर्णन किया है।

C. वरदराजः - तार्किकपरीक्षा (II): वरदराज ने "तार्किकपरीक्षा" नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें उन्होंने तर्कशास्त्र के विभिन्न पहलुओं और उनके आलोचनात्मक अध्ययन को प्रस्तुत किया है।

D. गङ्गेशोपाध्यायः - तत्त्वचिन्तामणिः (IV): गङ्गेश उपाध्याय ने "तत्त्वचिन्तामणिः" लिखा, जो नव्य न्याय दर्शन का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें उन्होंने तत्त्वमीमांसा पर व्यापक चर्चा की है।

इस प्रकार, प्रस्तुत प्रश्न का सही उत्तर है: 3) A - III, B - I, C - II, D - IV.

Question 19

प्रथमसूच्या सह द्वितीयसूचीं सुमेलयत-

List – IList - II
A.ततम्I.तालः
B.अवनद्धम्II.वंश:
C.घनःIII.तन्त्रीगतम्
D.सुषिरःIV.पौष्करम्
<br>

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - III, B - IV, C - I, D - II

  2. BOption (b)

    A - I, B - III, C - II, D - IV

  3. COption (c)

    A - IV, B - II, C - III, D - I

  4. DOption (d)

    A - II, B - I, C - IV, D - III

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Correct answer

Answer: (a)A.

A - III, B - IV, C - I, D - II

Why this answer is correct

उत्तर- A - IV, B - II, C - III, D - I

भरत मुनि:

  • प्राचीन भारतीय नाट्यशास्त्र के रचयिता
  • नाट्यकला और संगीत पर विस्तृत ग्रंथ "नाट्यशास्त्र" की रचना

नाट्यशास्त्र:

  • नाट्यशास्त्र 36 अध्यायों का एक विस्तृत ग्रंथ है
  • नाटक और मंचन की परंपराओं का सबसे पुराना ज्ञात ग्रंथ
  • नाटक, नृत्य, संगीत, रंगमंच, अभिनय, रूप सज्जा, रस (एस्थेटिक्स) आदि पर विस्तृत चर्चा

मुख्य विषय:

  • सङ्गीत: स्वर, ताल, वाद्ययंत्र
  • अभिनय: आंगिक (शारीरिक), वाचिक (वाचिक), आहार्य (सजावट), सात्विक (भावनात्मक)
  • रसः: 8 प्रमुख रस (श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भ���ानक, बीभत्स, अद्भुत) + शांति रस
  • नृत्य: नृत्त (शुद्ध नृत्य), नृत्य (अभिनययुक्त नृत्य), नाट्य (अभिनय और संवादयुक्त नृत्य)
  • रंगमंच: रंगमंच की संरचना, मंच सज्जा, पात्र चयन

मुख्यतः वाद्ययंत्रों को चार वर्गों में विभाजित किया गया है:

  • A. ततम् -> III. तन्त्रीगतम्
  • B. अवनद्धम् -> IV. पौष्करम्
  • C. घनः -> I. तालः
  • D. सुषिरः -> II. वंश:

इस तरह के वर्गीकरण को 'भरत के नाट्यशास्त्र' में देखा जा सकता है।

Question 20

“पदमञ्जरी”-व्याख्या अस्ति-

  1. AOption (a)

    काशिकायाः

  2. BOption (b)

    वाक्यपदीयस्य

  3. COption (c)

    महाभाष्यस्य

  4. DOption (d)

    वैयाकरणसिद्धान्तकौमुद्याः

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Correct answer

Answer: (a)A.

काशिकायाः

Why this answer is correct

उत्तर- काशिकायाः

काशिका:

"काशिका" एक प्रसिद्ध संस्कृत व्याकरण की व्याख्या है जिसे पतंजलि के महाभाष्य पर जैमिनिकृत व्याख्या के रूप में जाना जाता है। यह पाणिनि के अष्टाध्यायी के सूत्रों पर विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत करती है।

काशिका वृत्ति को वृहदाकृति नामक लेखक और जयादित्य ने मिलकर रचा था।

इसमें पाणिनि के प्रत्येक सूत्र का विस्तृत और सरल वर्णन किया गया है, जिसे विद्वान और विद्यार्थी दोनों ही आसानी से समझ सकते हैं।

पदमञ्जरी:

"पदमञ्जरी" एक काशिका वृत्ति पर आधारित विशिष्ट व्याख्या है। यह हरदत्त मिश्र द्वारा लिखित है।

इस व्याख्या में काशिका वृत्ति में दिए गए सूत्रों और उनके व्याख्याओं का विस्तार से विवेचन किया गया है।

यह पाणिनि के अष्टाध्यायी और काशिका वृत्ति के अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है।

Question 21

"विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मे शेवधिष्टेऽहमस्मि इत्यंशो कुत्र समुद्धृतः ?

  1. AOption (a)

    निरुक्ते

  2. BOption (b)

    शिवसङ्कल्पसूक्ते

  3. COption (c)

    वाक्सूक्ते

  4. DOption (d)

    प्रजापतिसूक्ते

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Correct answer

Answer: (a)A.

निरुक्ते

Why this answer is correct

उत्तर- निरुक्ते

निरुक्त:

निरुक्त वैदिक शब्दों की व्याख्या करने वाला एक प्राचीन ग्रंथ है, जिसे यास्क मुनि ने लिखा था। यह संस्कृत भाषा के प्राचीनतम व्याकरणिक और शाब्दिक ग्रंथों में से एक है।

निरुक्त का मुख्य उद्देश्य उन वैदिक शब्दों और नामों की व्याख्या करना है, जो वेदों में विस्तृत रूप से प्रयुक्त होते हैं। इसका प्रमुख भाग निघंटु नामक शब्दकोश पर आधारित है।

निरुक्त वेदों के अध्ययन और समझ के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वेदों में प्रयुक्त कठिन शब्दों और पदों को स्पष्ट करता है। यास्क ने इसमें वेदों के कठिन समयानुसरणी शब्दों का विस्तृत विवेचन और व्युत्पत्ति दी है।

“विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मे शेवधिष्टेऽहमस्मि”:

यह विशिष्ट अंश निरुक्त के एक प्रकरण से लिया गया है।

इस अंश का अर्थ है कि विद्या ब्राह्मण के पास आई और उसने कहा "तुम्हारी रक्षा के लिए मैं आई हूँ; मैं एक आभूषण हूँ।"

इसका संदर्भ विद्या (ज्ञान) के महत्व और उसकी रक्षा करने की आवश्यकता को इंगित करता है। यह विद्या (ज्ञान) की महत्ता और उसे संजोकर रखने के महत्व पर बल देता है।

Question 22

अधोलिखितेषु कस्य वेदस्य नाम ‘दशतयी' इति प्रथितम् ?

  1. AOption (a)

    ऋग्वेदस्य

  2. BOption (b)

    यजुर्वेदस्य 

  3. COption (c)

    सामवेदस्य

  4. DOption (d)

    अथर्ववेदस्य

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Correct answer

Answer: (a)A.

ऋग्वेदस्य

Why this answer is correct

उत्तर- ऋग्वेदस्य

ऋग्वेद:

  • ऋग्वेद चार वेदों में से एक है और यह सबसे प्राचीन व सबसे महत्वपूर्ण वेद माना जाता है।
  • इसमें प्रमुख रूप से मंत्र, स्तोत्र, और प्रार्थनाएँ शामिल हैं जिन्हें ऋचाएं कहा जाता है। ऋग्वेद में कुल 10 मंडल (अध्याय) हैं, जिनमें हजारों ऋचाएं संग्रहीत हैं।
  • ऋग्वेद को ‘दशातयी’ कहा जाता है क्योंकि इसमें 10 मंडल (अध्याय) होते हैं। यह नाम ‘दश’ (अर्थात् दस) और ‘अतयी’ (अर्थात् अध्याय-विभाजन) से मिलकर बना है।

Question 23

तर्कसङ्ग्रहानुसारं “कारणं त्रिविधं समवाय्यसमवायिनिमित्तभेदात्” । समवायिकारणस्य असमवायिकारणस्य च क्रमानुसारं उदाहरणं चिनुत-

A. तन्तवः पटस्य, पटश्च स्वगतरूपादेः

B. घटाभाववद् भूतलम्

C. वह्निव्याप्यधूमवानयं पर्वतः

D. तन्तुसंयोगः पटस्य, तन्तुरूपं पटरूपस्य

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम् 

  2. BOption (b)

    A, D केवलम्

  3. COption (c)

    B, C केवलम्

  4. DOption (d)

    B, D केवलम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

A, D केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर- A, D केवलम्

तर्कसंग्रह के अनुसार कारण तीन प्रकार के होते हैं:

  • समवायिकारणम् - जो कार्य में समवाय (अविभाज्य संबंध) से जुड़ा होता है।
  • असमवायिकारणम् - जो कार्य में असमवाय (परोक्ष संबंध) से जुड़ा होता है।
  • निमित्तकारणम् - जो बाह्य रूप से कार्य का कारण होता है।

Important PointsA. तन्तवः पटस्य, पटश्च स्वगतरूपादेः

  • तन्तु (धागे) पट (कपड़ा) के समवायिकारण हैं।
  • पट स्वयं स्वगतरूप (उसका रंग, रूप) का समवायिकारण है।

D. तन्तुसंयोगः पटस्य, तन्तुरूपं पटरूपस्य

  • तन्तुसंयोग (धागों का जुड़ाव) पट का असमवायिकारण है।
  • तन्तुरूप (धागों का रंग/गुण) पटरूप का असमवायिकारण है।

Question 24

अधोलिखितेषु ग्रन्थेषु कः ग्रन्थः मीमांसादर्शनेन सम्बद्धो नास्ति ?

  1. AOption (a)

    न्यायकणिका

  2. BOption (b)

    न्यायरत्नमाला

  3. COption (c)

    न्यायकुसुमाञ्जलिः 

  4. DOption (d)

    न्यायमालाविस्तरः

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Correct answer

Answer: (c)C.

न्यायकुसुमाञ्जलिः 

Why this answer is correct

उत्तर- न्यायकुसुमाञ्जलिः 

मीमांसा दर्शन:

मीमांसा दर्शन मुख्यतः वैदिक कर्मकांडों और विधियों की व्याख्या करने वाला दर्शन है। यह दो भागों में विभाजित है: पूर्व मीमांसा (जिसे कर्ममीमांसा भी कहा जाता है) और उत्तर मीमांसा (वेदांत).

प्रमुख मीमांसा ग्रन्थ:

न्यायकणिका, न्यायरत्नमाला, और न्यायमालाविस्तर जैसे ग्रन्थ मीमांसा दार्शनिक विचारधारा के अंतर्गत आते हैं।

न्यायकुसुमाञ्जलिः:

न्यायकुसुमाञ्जलिः एक प्रसिद्ध ग्रंथ है जो "न्याय दर्शन" से सम्बद्ध है और इसके लेखक उदयन आचार्य हैं। यह ग्रंथ न्याय दर्शन (न्यायशास्त्र) के सिद्धांतों का गहन परीक्षण और स्पष्टीकरण करता है।

इसमें ईश्वर की सत्ता, आत्मा की अजर-अमरता, पुनर्जन्म और कर्मफल जैसी न्याय दर्शन की प्रमुख अवधारणाओं को समझाया गया है।

<br>

इस प्रकार, न्यायकुसुमाञ्जलिः मीमांसा दर्शन के बजाय न्याय दर्शन के साथ सम्बद्ध है।

Question 25

वाल्मीकिरामायणस्य कस्मिन् काण्डे गङ्गावतरणोपाख्यानं लभ्यते ?

  1. AOption (a)

    बालकाण्डे 

  2. BOption (b)

    अयोध्याकाण्डे 

  3. COption (c)

    लङ्काकाण्डे

  4. DOption (d)

    अरण्यकाण्डे

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Correct answer

Answer: (a)A.

बालकाण्डे 

Why this answer is correct

उत्तर- बालकाण्डे 

बालकाण्ड:

बालकाण्ड वाल्मीकि रामायण का प्रथम कांड है और यह मुख्यतः भगवान राम की बाल्यावस्था, उनके जन्म और प्रारंभिक जीवन की कथाओं का वर्णन करता है।

इसमें विभिन्न महत्वपूर्ण घटनाओं का उल्लेख है, जैसे कि विश्वामित्र का राम और लक्ष्मण को कल्याणकारी शिक्षाओं और अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान देना, ताड़का का वध, और सीता स्वयंवर आदि।

गंगा अवतरण (गंगावतरण):

बालकाण्ड में राजा भगीरथ के तप और प्रयासों की कथा भी मिलती है, जिसके फलस्वरूप मां गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ।

यह कथा राजा सगर और उनके साठ हजार पुत्रों की कथा से संबंधित है, जिनका उद्धार गंगा के अवतरण से होता है।

यह महाकाव्यात्मक कथा भगवान श्रीराम के पूर्वजों की मूर्धन्य कथाओं में से एक है, जिससे गंगा नदी का महत्व और पवित्रता प्रतिपादित होती है।

Question 26

अरस्तूप्रणीते “काव्यशास्त्रे” कति अध्यायाः सन्ति ?

  1. AOption (a)

    विंशतिः 

  2. BOption (b)

    षड्विंशतिः

  3. COption (c)

    पञ्चविंशतिः 

  4. DOption (d)

    ऊनविंशतिः

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Correct answer

Answer: (b)B.

षड्विंशतिः

Why this answer is correct

उत्तर- षड्विंशतिः

अरस्तू का “काव्यशास्त्र”

अरस्तू एक प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक थे जिन्होंने विभिन्न विषयों पर अनेकों महत्वपूर्ण ग्रंथ रचे।

अरस्तू का “काव्यशास्त्र” विशेष रूप से साहित्यिक आलोचना का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसमें उन्होंने काव्य, नाटक, विशेषकर त्रासदी (ट्रैजेडी), और महाकाव्य का विस्तार से विश्लेषण किया है।

अध्यायों की संख्या:

अरस्तू के “काव्यशास्त्र” में कुल 26 अध्याय (षड्विंशतिः) हैं।

पहले 15 अध्याय मुख्य रूप से त्रासदी और उसके तत्वों (जैसे कथानक, पात्र, विचारधारा, दृश्य-प्रस्तुति, संगीत और स्पीच) पर केंद्रित हैं।

शेष अध्याय महाकाव्यऔर उसकी तुलना त्रासदी से करते हैं।

इस प्रकार, अरस्तू के “काव्यशास्त्र” में कुल 26 अध्याय हैं।

अतः, प्रस्तुत प्रश्न का सही उत्तर 2) षड्विंशतिः है।

Question 27

प्रथमसूच्या सह द्वितीयसूचीं सुमेलयत-

List – IList - II
A.हिरण्यगर्भःI.वेदनावः समुद्रियः
B.इन्द्रःII.यो अन्तरिक्षे रजसो विमानः
C.वरुणःIII.यो अन्तरिक्षं विममे वरीयः
D.अग्निःIV.वर्धमानं स्वे दमे
<br>

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - I, B - II, C - III, D - IV

  2. BOption (b)

    A - II, B - III, C - I, D - IV

  3. COption (c)

    A - II, B - III, C - IV, D - I

  4. DOption (d)

    A - IV, B - III, C - II, D - I

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Correct answer

Answer: (b)B.

A - II, B - III, C - I, D - IV

Why this answer is correct

उत्तर- A - II, B - III, C - I, D - IV

Important Points

  • हिरण्यगर्भः- II. यो अन्तरिक्षे रजसो विमानः- हिरण्यगर्भ को सृष्टि का आदिकर्ता माना गया है। ऋग्वेद में उसे "अन्तरिक्ष में रजस का विमान" कहा गया है, जो ब्रह्मांड में सर्वव्यापी है।
  • इन्द्रः- III. यो अन्तरिक्षं विममे वरीयः- इन्द्र को देवताओं का राजा कहा गया है। वह अन्तरिक्ष को मापने वाला, उसकी सीमाओं को निर्धारित करने वाला शक्तिशाली देवता है।
  • वरुणः- I. वेदनावः समुद्रियः- वरुण जल के देवता हैं, उन्हें समुद्रों का स्वामी और नैतिकता का रक्षक माना गया है। "वेदनावः समुद्रियः" उनके जल से संबंधित स्वरूप को दर्शाता है।
  • अग्निः- IV. वर्धमानं स्वे दमे- अग्नि को गृहस्थ जीवन का केंद्र माना गया है। "स्वे दमे वर्धमानं" का अर्थ है—जो अपने घर में बढ़ता है, यानी यज्ञ में अग्नि की उपस्थिति।

Question 28

सर्वदर्शनसङ्ग्रहे वर्णितान् बौद्धसम्प्रदायस्य भेदान् क्रमानुसारं समुपस्थापयत-

A. सौत्रान्तिकः

B. वैभाषिकः

C. योगाचारः

D. माध्यमिकः

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    D, C, A, B

  2. BOption (b)

    A, B, C, D

  3. COption (c)

    C, D, B, A

  4. DOption (d)

    B, C, A, D

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Correct answer

Answer: (a)A.

D, C, A, B

Why this answer is correct

उत्तर- D, C, A, B

सर्वदर्शनसङ्ग्रह एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है जिसमें विभिन्न भारतीय दार्शनिक संप्रदायों का वर्णन किया गया है। इसमें बौद्ध संप्रदायों का भी उल्लेख मिलता है। निम्नलिखित क्रम में बौद्ध संप्रदायों का वर्णन मिलता है:

  • माध्यमिक (D)
  • योगाचार (C)
  • सौत्रान्तिक (A)
  • वैभाषिक (B)

Question 29

प्रथमसूच्या सह द्वितीयसूचीं सुमेलयत-

List – IList - II
A.मानवाःI.आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिश्च
B.ओशनसाःII.त्रयी वार्ता दण्डनीतिश्च
C.बार्हस्पत्याःIII.दण्डनीतिः
D.कौटिल्यःIV.वार्ता दण्डनीतिश्च
<br>

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - II, B - III, C - IV, D - I

  2. BOption (b)

    A - I, B - II, C - III, D - IV

  3. COption (c)

    A - III, B - II, C - I, D - IV

  4. DOption (d)

    A - III, B - IV, C - II, D - I

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (a)A.

A - II, B - III, C - IV, D - I

Why this answer is correct

उत्तर- A - II, B - III, C - IV, D - I

नीतियों और उनके संबंधित विद्वान:

  • A. मानवाः – II. त्रयी वार्ता दण्डनीतिश्च: मनु स्मृति में मानव संहिता को "त्रयी" (वेद), "वार्ता" (अर्थशास्त्र), और "दण्डनीति" (दंड संहिता) का मिश्रण कहा जाता है।
  • B. ओशनसाः – III. दण्डनीतिः: 'ओशनस' ने दंड और शासन की नीतियों पर प्रकाश डाला है, इसलिए "दण्डनीति" उनके साथ उचित मिलान है।
  • C. बार्हस्पत्याः – IV. वार्ता दण्डनीतिश्च: बृहस्पति नीति साहित्य में 'वार्ता' (अर्थशास्त्र) और 'दण्डनीति' (दंड विज्ञान) का उल्लेख मिलता है।
  • D. कौटिल्यः – I. आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिश्च: कौटिल्य (चाणक्य) के अर्थशास्त्र में "आन्वीक्षिकी", "त्रयी" (वेद), "वार्ता" (अर्थशास्त्र) और "दण्डनीति" (दंड नीति) को प्रमुख स्थान दिया गया है।

इस प्रकार, सही संयोजन होगा: 1) A - II, B - III, C - IV, D - I

Question 30

अधोलिखितेषु अनुबन्धचतुष्टयेषु कौ परिगणितौ -

A. अधिकारी

B. ब्रह्म

C. विषयः

D. जीव:

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम्

  2. BOption (b)

    B, D केवलम् 

  3. COption (c)

    A, C केवलम्

  4. DOption (d)

    C, D केवलम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

A, C केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर- A, C केवलम्

अनुबन्धचतुष्टय वह सिद्धांत है जिसके आधार पर किसी भी शास्त्र या ग्रंथ का अध्ययन और उसकी उपादेयता का निर्धारण किया जाता है। अनुबन्धचतुष्टय के चार प्रमुख तत्व होते हैं

अधिकारीः (अधिकारी):

यह उस व्यक्ति या जाती को संदर्भित करता है जो शास्त्र या ग्रंथ का अध्ययन करने के योग्य है।

उदाहरण के लिए, वेदांत शास्त्र का अधिकारी वह व्यक्ति होता है जिसने वैदिक शिक्षा प्राप्त की हो और जिसके पास आध्यात्मिक उन्नति की तीव्र अभिलाषा हो।

विषयः (विषय):

यह उस सामग्री या विषयवस्तु को संदर्भित करता है जिसका ग्रंथ में वर्णन किया गया है।

उदाहरण के लिए, भगवद गीता का विषय है कर्मयोग, भक्तियोग, और ज्ञानयोग।

प्रयोजनम् (प्रयोजन):

यह अध्ययन का उद्देश्य या लक्ष्य है। यह बताता है कि ग्रंथ का अध्ययन करने से हमें क्या लाभ मिलेगा।

उदाहरण के लिए, उपनिषदों का प्रयोजन है आत्मज्ञान प्राप्त करना और मोक्ष की प्राप्ति।

सम्बन्धः (सम्बन्ध):

यह ग्रंथ और उसके प्रयोजन के बीच का सम्बन्ध निर्धारित करता है। यह बताता है कि विषयवस्तु कैसे उद्देश्य की प्राप्ति में सहायक होती है।

उदाहरण के लिए, भगवद गीता में अर्जुन को दिए गए कृष्ण के उपदेशों का सम्पूर्ण सम्बन्ध है उसके नैतिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शन से।

इन चारों तत्वों के माध्यम से एक छात्र यह समझ पाता है कि उसे किस प्रकार के शास्त्र का अध्ययन करना चाहिए, उसका विषय क्या है, उसका अध्ययन करने का उद्देश्य क्या होगा और उस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए विषयवस्तु का अध्ययन कैसे सहायक है।

उदाहरण के लिए, यदि कोई वेदांत का अध्ययन कर रहा है, तो:

  • अधिकारी: वह व्यक्ति जो वेदांत में रुचि रखता है और जिसकी इच्छा मोक्ष प्राप्ति की है।
  • विषय: ब्रह्म, जीव, और जगत का ज्ञान।
  • प्रयोजन: मोक्ष प्राप्ति, यानी जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति।
  • सम्बन्ध: वेदांत शास्त्र के अध्ययन से ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति होती है, जो मोक्ष का कारण बनती है।

अधिकारी (A) - वह व्यक्ति जो अध्ययन के योग्य है।

विषयः (C) - वह विषय या सामग्री जिस पर ग्रंथ आधारित है।

Question 31

साङ्ख्यकारिकानुसारं प्रत्ययसर्गस्यावान्तरभेदौ चिनुत-

A. विपर्ययः, शक्तिः

B. विपर्ययः, अशक्तिः

C. तुष्टिः, सिद्धिः

D. अतुष्टिः, सिद्धिः

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम्

  2. BOption (b)

    B, D केवलम्

  3. COption (c)

    B, C केवलम्

  4. DOption (d)

    A, D केवलम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

B, C केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर- B, C केवलम्

सांख्यकारिका, जो कि ईश्वरकृष्ण द्वारा रचित है, में प्रत्ययसर्ग के अन्तर्गत मानस, बुद्धि और चित्त के विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन किया गया है। प्रत्ययसर्ग में दो मुख्य अवान्तर भेद होते हैं: विपर्यय (मिथ्या ज्ञान) और अशक्ति (अविज्ञान/असमर्थता), साथ ही तुष्टि (संतोष) और सिद्धि (प्राप्ति)।

यहाँ पर B, C विकल्प सही हैं क्योंकि विपर्ययः और अशक्तिः प्रत्ययसर्ग के दो अवान्तर भेद हैं, और तुष्टि और सिद्धि भी इनकी अन्तर्गत आते हैं।

Question 32

प्रथमसूच्या सह द्वितीयसूचीं सुमेलयत-

List – IList - II
A.जेगीयतेI.णिजन्तरूपम्
B.निद्रापयतिII.यङन्तरूपम्
C.दिदृक्षतेIII.नामधातुरूपम्
D.कलहायतेIV.सन्नन्तरूपम्
<br>

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - IV, B - II, C - III, D - I

  2. BOption (b)

    A - II, B - I, C - IV, D - III

  3. COption (c)

    A - II, B - IV, C - I, D - III

  4. DOption (d)

    A - III, B - II, C - IV, D - I

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Correct answer

Answer: (b)B.

A - II, B - I, C - IV, D - III

Why this answer is correct

उत्तर- A - II, B - I, C - IV, D - III

शब्द और उनके रूप:

  • A. जेगीयते – II. यङन्तरूपम्: "जेगीयते" संस्कृत धातु 'जि' का यङन्तरूप है, जो कि यङ् प्रत्यय का प्रयोग करके बनता है।
  • B. निद्रापयति – I. णिजन्तरूपम्: "निद्रापयति" संस्कृत में 'णि' प्रत्यय के प्रयोग द्वारा निर्मित होता है, जो कर्म के अर्थ में प्रयोग होता है। यह धातु 'निद्रा' से बना है।
  • C. दिदृक्षते – IV. सन्नन्तरूपम्: "दिदृक्षते" सन्नन्तरूप है, क्योंकि इसमें 'सन्' प्रत्यय का प्रयोग किया गया है। यह धातु 'दृश्' से बना है।
  • D. कलहायते – III. नामधातुरूपम्: "कलहायते" नामधातुरूप है, जिसमें नाम 'कलह' पर धातु प्रत्यय जोड़ा गया है, जिससे इसका अर्थ 'कलह करना' हो जाता है।

इस प्रकार, सही संयोजन होगा: 2) A - II, B - I, C - IV, D - III

Question 33

कः सिद्धान्तः जैनदर्शनेन सम्बद्धो नास्ति ?

  1. AOption (a)

    विवर्तवादः

  2. BOption (b)

    स्याद्वादः

  3. COption (c)

    अनेकान्तवादः

  4. DOption (d)

    सप्तभङ्गीनयः

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Correct answer

Answer: (a)A.

विवर्तवादः

Why this answer is correct

उत्तर- विवर्तवादः

विवर्तवाद:

विवर्तवाद मुख्यतः अद्वैत वेदांत का सिद्धांत है, जिसे आदि शंकराचार्य ने प्रतिपादित किया। इसके अनुसार, सृष्टि माया (मायावाद) के कारण ब्रह्म (परम सत्य) का विकार (प्रभाव या परिवर्तन) नहीं है, बल्कि माया के चलते भ्रांति से उत्पन्न होती है।

इस सिद्धांत के अनुसार, जगत वास���तव में नहीं बदलता, बल्कि माया के प्रभाव से ऐसा प्रतीत होता है। यह सिद्धांत जैन दर्शन का हिस्सा नहीं है।

इस प्रकार, विवर्तवाद जैन दर्शन से सम्बद्ध नहीं है।

Question 34

अधोलिखितानां शब्दप्रवृत्तीनां यथाशास्त्रक्रमं समुपस्थापयत-

A. डित्थ:

B. शुक्लः

C. गौः

D. चल:

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, C, D 

  2. BOption (b)

    B, A, C, D 

  3. COption (c)

    D, C, B, A 

  4. DOption (d)

    C, B, D, A

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Correct answer

Answer: (d)D.

C, B, D, A

Why this answer is correct

उत्तर- C, B, D, A

Question 35

अधोलिखितेषु लङ्लकारप्रथमपुरुषैकवचनस्य क्रियापदे स्तः -

A. प्राशंसत्

B. अक्रुधत्

C. उदतिष्ठत्

D. अकुपत्

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, C केवलम्

  2. BOption (b)

    B, D केवलम् 

  3. COption (c)

    B, C केवलम् 

  4. DOption (d)

    A, B केवलम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

B, D केवलम् 

Why this answer is correct

उत्तर- B, D केवलम्

  • प्राशंसत्: तीसरा पुरुष बहुवचन (इसलिए प्रथम पुरुष एकवचन नहीं है)
  • अक्रुधत्: लङ्लकार प्रथम पुरुष एकवचन (सही)
  • उदतिष्ठत्: तीसरा पुरुष बहुवचन (इसलिए प्रथम पुरुष एकवचन नहीं है)
  • अकुपत्: लङ्लकार प्रथम पुरुष एकवचन (सही)

इसलिए, सही उत्तर है: 2) B, D केवलम्

Question 36

लोंजाइनसमतानुसारम् अधोलिखितेषु को अलङ्कारो उदात्तस्योत्कर्षे सहायको भवतः ?

A. पर्यायोक्तिः

B. अर्थान्तरन्यासः

C. विपर्ययः

D. यमकम्

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    B, C केवलम्

  2. BOption (b)

    B, D केवलम्

  3. COption (c)

    C, D केवलम्

  4. DOption (d)

    A, C केवलम्

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Correct answer

Answer: (d)D.

A, C केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर- A, C केवलम्

लोंजाइनस ने अपनी कृति "ऑन द सबलाइम" में उदात्तता (सबलिमिटी) के सिद्धांतों पर गहन चर्चा की है। उदात्त या श्रेष्ठ साहित्यिक कला में वह तत्व शामिल होते हैं जो पाठक या श्रोता में गहन संवेदनाएं उत्पन्न करते हैं और उनके मन को उच्चता की ओर ले जाते हैं।

लोंजाइनसमतानुसार, उदात्तता को प्राप्त करने में सहायक अलंकारों में से निम्नलिखित विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं:

A. पर्यायोक्तिः (पर्यायोक्ति): यह अलंकार अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्त की जाने वाली वस्तु का वर्णन या उपमा देना है। यह स्पष्टतः कहे बिना या प्रकट न करते हुए विषय की महत्ता को बढ़ाता है, जिससे उदात्तता की भावना सर्वोत्तम होती है।

C. विपर्ययः: विपर्यय (विपरीतता) अलंकार में विषय की चर्चा को सामान्य से विपरीत रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिससे उसमें एक नवीन प्रकार की रुचि और विशेषता आ जाती है, और यह उदात्तता को ऊंचाइयों पर ले जाने में सहायक होता है।

Question 37

अधोलिखितानि आचार्याणां नामानि कालक्रमानुसारं चेतव्यानि -

A. भट्टोजिदीक्षितः

B. कैय्यट 

C. भर्तृहरिः

D. वामनजयादित्यौ

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, C, D

  2. BOption (b)

    C, D, B, A

  3. COption (c)

    D, A, C, B

  4. DOption (d)

    B, C, A, D

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Correct answer

Answer: (b)B.

C, D, B, A

Why this answer is correct

उत्तर- C, D, B, A

भर्तृहरिः (C):

भर्तृहरि प्राचीन व्याकरणाचार्य और भाषाशास्त्री थे। वे 5वीं शताब्दी के आसपास माने जाते हैं। उनकी प्रसिद्ध कृति है "वाक्यपदीयम्"।

वामनजयादित्यौ (D):

वामन और जयादित्य संस्कृत के विख्यात पाणिनीय व्याकरण के आचार्य थे। इनकी रचनाएं 8वीं-9वीं शताब्दी के बीच मानी जाती हैं। वामन ने साहित्य में 'काव्यालंकारसूत्र' और जयादित्य ने 'काशिका' की टीका लिखी है।

कैय्यट (B):

कैय्यट  (कौमुदीकृत) 11वीं-12वीं शताब्दी के उत्कृष्ठ व्याकरणाचार्य थे। इन्होंने पाणिनीय व्याकरण की परंपरा को जीवित रखा और 'प्रपञ्चकौमुदी' लिखी।

भट्टोजिदीक्षितः (A):

भट्टोजि दीक्षित 17वीं शताब्दी के आचार्य थे। इन्होंने 'सिद्धान्तकौमुदी' की रचना की, जो पाणिनीय व्याकरण का एक महत्वपूर्ण और व्यापक टीका है।

कालक्रमानुसार इन आचार्यों के नाम निम्नलिखित क्रम में आते हैं:

  • भर्तृहरिः (C) - 5वीं शताब्दी
  • वामन-जयादित्यौ (D) - 8वीं-9वीं शताब्दी
  • कैय्यः (B) - 11वीं-12वीं शताब्दी
  • भट्टोजिदीक्षितः (A) - 17वीं शताब्दी

इस प्रकार, सही क्रम है: 2) C, D, B, A।

Question 38

अधोलिखितेषु कौ शब्दौ पुंल्लिङ्गे स्तः?

A. विश्वपाः

B. मधु

C. वारि

D. मघवा

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम् 

  2. BOption (b)

    B, C केवलम् 

  3. COption (c)

    A, D केवलम् 

  4. DOption (d)

    C, D केवलम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

A, D केवलम् 

Why this answer is correct

उत्तर- A, D केवलम्

  • A. विश्वपाः: विश्वपाः का अर्थ होता है "सभी का रक्षक"। यह एक पुल्लिंग शब्द है और देवता इन्द्र के लिए प्रयुक्त होता है।
  • B. मधु: मधु का अर्थ होता है "शहद"। यह एक नपुंसकलिंग शब्द है।
  • C. वारि: वारि का अर्थ होता है "जल"। यह भी एक नपुंसकलिंग शब्द है।
  • D. मघवा: मघवा का अर्थ होता है "दानशील व्यक्ति" या "इन्द्र"। यह भी एक पुल्लिंग शब्द है।

इस प्रकार, सही उत्तर होगा: 3) A, D केवलम्

Question 39

मनुस्मृत्यनुसारं पितॄन् पितामहान् प्रपितामहांश्च केन नाम्ना वदन्ति ?

A. वसून् वदन्ति तु पितॄन् रुद्रांश्चैव पितामहान्

B. पितॄन् वदन्ति वसून् रुद्रांश्चैव प्रपितामहान्

C. प्रपितामहास्तथाऽऽदित्यान् श्रुतिरेषा सनातनी

D. नादित्यांश्च पितॄन् श्रुतिरेषा सनातनी

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम्

  2. BOption (b)

    A, C केवलम्

  3. COption (c)

    B, C केवलम्

  4. DOption (d)

    B, D केवलम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

A, C केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर- A, C केवलम्

मनुस्मृति के अनुसार पितरों, पितामहों और प्रपितामहों को विशिष्ट नामों से संबोधित किया गया है। 

"पितॄन् वसून् वदन्ति तु पितामहांश्च रुद्रांश्चैव प्रपितामहान् ।

प्रपितामहास्तथाऽऽदित्यान् श्रुतिरेषा सनातनी ॥"

Question 40

चार्वाकदर्शनस्य प्रतिनिधिग्रन्थः कः ?

  1. AOption (a)

    प्रमेयमार्तण्डः 

  2. BOption (b)

    तत्त्वोपप्लवसिंहः

  3. COption (c)

    सर्वदर्शनसङ्ग्रहः

  4. DOption (d)

    षड्दर्शनसमुच्चयः

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Correct answer

Answer: (b)B.

तत्त्वोपप्लवसिंहः

Why this answer is correct

उत्तर- तत्त्वोपप्लवसिंहः

  • चार्वाक दर्शन, जिसे लोकायतः भी कहा जाता है, भारतीय दर्शन का एक भौतिकवादी और नास्तिक दृष्टिकोण है। यह दर्शन संसार को भौतिक और प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर समझने पर बल देता है। इस दर्शन के प्रमुख प्रतिनिधि ग्रंथ के रूप में "तत्त्वोपप्लवसिंहः" को मान्यता मिली है।
  • तत्त्वोपप्लवसिंहः – यह ग्रंथ जयाराशि भट्ट द्वारा रचित है और चार्वाक दर्शन के सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है। इसमें चार्वाक के भौतिकवादी और नास्तिक दृष्टिकोण का विस्तृत विवरण मिलता है। इसलिए यह विकल्प सही है।

विस्तृत स्पष्टीकरण:

"तत्त्वोपप्लवसिंहः" जयाराशि भट्ट द्वारा रचित ग्रंथ है, जो चार्वाक दर्शन के प्रमुख ग्रंथों में से एक है। इस ग्रंथ का रचनाकाल 8वीं या 9वीं शताब्दी का माना जाता है। जयाराशि भट्ट ने अपने इस ग्रंथ में चार्वाक दर्शन के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है, जिसमें मुख्यतः इंद्रियप्रत्यक्ष को ही ज्ञान का स्रोत माना गया है और अन्य साधनों (जैसे अनुमान, शब्द आदि) का खंडन किया गया है।

चार्वाक दर्शन:

  • नास्तिक दृष्टिकोण: चार्वाक दर्शन वेद, आत्मा, परलोक आदि का खंडन करता है।
  • भौतिकवाद: यह दर्शन केवल भौतिक और इंद्रियगम्य जगत को ही यथार्थ मानता है।
  • हेदोनिज्म (सुखवाद): इस दर्शन के अनुसार, जीवन का प्रमुख लक्ष्य इंद्रिय-सुख प्राप्त करना है।
  • तत्त्वोपप्लवसिंहः: इस ग्रंथ में चार्वाक के भौतिकवादी दृष्टिकोण को विस्तारपूर्वक समझाया गया है, इसलिए यह चार्वाक दर्शन का प्रतिनिधि ग्रंथ कहलाता है।

Question 41

प्रद्वेषो बहुमानो वा सङ्कल्पादुपजायते ।

भर्तृदाराभिलाषित्वादस्यां मे महती स्वता ॥ इति उक्तिः ?

  1. AOption (a)

    वासवदत्तायाः

  2. BOption (b)

    पद्मावत्याः 

  3. COption (c)

    यौगन्धरायणस्य

  4. DOption (d)

    ब्रह्मचारिणः

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Correct answer

Answer: (c)C.

यौगन्धरायणस्य

Why this answer is correct

उत्तर- यौगन्धरायणस्य

यह श्लोक भवभूति के प्रसिद्ध संस्कृत नाटक "मालतीमाधव" से लिया गया है।

यौगन्धरायण एक प्रमुख पात्र है, विशेषतः कालिदास के नाटक "मालविकाग्निमित्र" में।

इस श्लोक में इसके पात्र यौगन्धरायण द्वारा प्रद्वेष (द्वेष) और बहुमान (सम्मान) को विवाद का मुख्य रूप से संबोधित किया गया है।

श्लोक का विश्लेषण:

"प्रद्वेषो बहुमानो वा सङ्कल्पादुपजायते ।"

द्वेष और सम्मान (बहुमान) विचारों से उत्पन्न होते हैं।

"भर्तृदाराभिलाषित्वादस्यां मे महती स्वता ॥"

यह पत्नी की इच्छा के कारण मेरे लिए महान स्‍वायत्तता उत्पन्न होती है।

वर्णन:

यहाँ पर यौगन्धरायण अपनी पत्नी के प्रेम को लेकर द्वेष तथा सम्मान के बारे में बात करता है।

उसकी यह उक्ति बौधिक स्तर पर यह प्रकट करती है कि मनुष्य के विचारों में द्वेष या सम्मान कैसे उत्पन्न हो सकते हैं।

निष्कर्ष:

इस श्लोक के संदर्भ और साहित्यिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए, सही उत्तर यौगन्धरायणस्य है, जो कालिदास के नाटक से संबंधित पात्र है।

Question 42

ऋक्प्रातिशाख्याऽभिमते समानाक्षराणां सङ्ख्या अस्ति-

  1. AOption (a)

    अष्टौ

  2. BOption (b)

    नव

  3. COption (c)

    दश

  4. DOption (d)

    पञ्च

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Correct answer

Answer: (a)A.

अष्टौ

Why this answer is correct

उत्तर- अष्टौ

ऋक् प्रातिशाख्य एक महत्वपूर्ण वैदिक ग्रंथ है जो ऋग्वेद के उच्चारण, स्वरूप और व्याकरण संबंधी नियमों का वर्णन करता है। इस ग्रंथ में समानाक्षराणां (समान अक्षरों) की संख्या का उल्लेख किया गया है।

यह संख्या "अष्टौ" सही उत्तर है क्योंकि ऋक्प्रातिशाख्य के अनुसार समानाक्षरों की संख्या आठ है। ये समानाक्षर वे अक्षर हैं जिनके उच्चारण और ध्वनि में समानता होती है।

स्पष्टीकरण: ऋक्प्रातिशाख्य में वर्णित विभिन्न अक्षरों के उच्चारण और ध्वन्यात्मक विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है। यहाँ पर समानाक्षर वे अक्षर होते हैं जो ध्वनि (ध्वन्यात्मक दृष्टि से) में समान होते हैं या उनमें बहुत अधिक ब्यंजन की समानता होती है। इस प्रकार, ऋक्प्रातिशाख्य में आठ समानाक्षरों का उल्लेख मिलता है।

Question 43

अधोलिखितानाम् आचार्याणां यथोचितं कालक्रमं चिनुत-

A. वात्स्यायनः

B. जयन्तभट्टः

C. उदयनाचार्यः

D. उद्योतकरः

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, D, C

  2. BOption (b)

    D, C, B, A

  3. COption (c)

    A, D, C, B 

  4. DOption (d)

    B, C, A, D

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Correct answer

Answer: (a)A.

A, B, D, C

Why this answer is correct

उत्तर- A, B, D, C

आचार्यों के कालक्रम को सही तरीके से समझने के लिए हमें उनकी समयावधि का आकलन करना होगा। यहाँ चार आचार्यों की समयावधि का विवरण दिया जा रहा है:

आचार्यों का कालक्रम:

  • वात्स्यायनः (A)
  • वात्स्यायन प्राचीन भारतीय दार्शनिक और कामसूत्र के लेखक माने जाते हैं। इन्हें सामान्यतः चौथी-पाँचवीं शताब्दी के आसपास का माना जाता है।
  • जयन्तभट्टः (B)
  • जयन्तभट्ट कश्मीर के विद्वान थे और न्याय तथा मीमांसा पर उनके महत्वपूर्ण ग्रंथ माने जाते हैं। इन्हें सामान्यतः नौवीं शताब्दी का माना जाता है।
  • उदयनाचार्यः (C)
  • उदयनाचार्य भारतीय तर्कशास्त्री थे और उन्होंने न्यायध्वन्तर, न्यायकुसुमाञ्जलि जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। इन्हें सामान्यतः ग्यारहवीं शताब्दी का माना जाता है।

उद्योतकः (D) उद्योतकः संस्कृत दार्शनिक थे जिन्होंने न्यायशास्त्र पर कार्य किया। उनका समय वात्स्यायन और अन्य बीच का माना जाता है, लगभग सातवीं शताब्दी।

Question 44

ब्राह्मीलिपेः विकसिते लिपी स्तः -

A. गुप्तलिपिः

B. शारदालिपिः

C. खरोष्ठीलिपिः

D. चीनीलिपिः

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    B, C केवलम्

  2. BOption (b)

    A, C केवलम्

  3. COption (c)

    A, B केवलम्

  4. DOption (d)

    D, C केवलम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

A, B केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर- A, B केवलम्

  • गुप्तलिपिः (A): गुप्त लिपि ब्राह्मी लिपि से विकसित हुई एक प्राचीन भारतीय लिपि है, जो गुप्त काल (लगभग ४ठी से ६ठी शताब्दी के बीच) में प्रयोग में लाई जाती थी।
  • शारदालिपिः (B): शारदा लिपि भी ब्राह्मी लिपि से विकसित हुई है, जो 8वीं शताब्दी के आसपास कश्मीर और उत्तर-पश्चिमी भारत में प्रमुख रूप से प्रयोग की जाती थी।
  • खरोष्ठीलिपिः (C): खरोष्ठी लिपि का विकास अर्ध-भारतीय, अर्ध-ईरानी लिपि से हुआ था, यह ब्राह्मी से अलग एक स्वतंत्र लिपि थी।
  • चीनीलिपिः (D): चीनी लिपि पूरी तरह से एक अलग लिपि प्रणाली है और इसका विकास ब्राह्मी लिपि से नहीं हुआ।

इस प्रकार, सही उत्तर होगा: 3) A, B केवलम्

Question 45

“जीवातु”-टीका अधोलिखितेषु कस्य महाकाव्यस्य ?

  1. AOption (a)

    रघुवंशस्य

  2. BOption (b)

    कुमारसम्भवस्य

  3. COption (c)

    किरातार्जुनीयस्य 

  4. DOption (d)

    नैषधीयचरितस्य

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Correct answer

Answer: (d)D.

नैषधीयचरितस्य

Why this answer is correct

उत्तर- नैषधीयचरितस्य

"नैषधीयचरित" श्रीहर्ष द्वारा रचित एक महाकाव्य है, जो नल और दमयंती की कथा को वर्णित करता है। "जीवातु" एक महत्वपूर्ण टीका है जो इसी महाकाव्य पर लिखी गई है। इस टीका में नैषधीयचरित के श्लोकों का विस्तृत व्याख्या और विश्लेषण किया गया है।

Question 46

अधोलिखितेषु उषसो विशेषणे न स्तः-

A. ऋतावरी

B. राष्ट्री

C. चिकितुषी

D. रेवती

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम्

  2. BOption (b)

    B, D केवलम्

  3. COption (c)

    B, C केवलम् 

  4. DOption (d)

    A, C केवलम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

B, C केवलम् 

Why this answer is correct

उत्तर- B, C केवलम्

उषसः के लिए विशिष्ट विशेषण होते हैं जैसे: रेवती (जो सुबह की सुंदरता को दर्शाता है) और ऋतावरी (जो ऋतुओं का पालन करने वाली होती है)।

विशेषण:

ऋतावरी (A): उषा को ऋतावरी कहा जाता है, क्योंकि वह ऋतुओं का पालन करती है। यह विशेषण उषा के लिए उपयुक्त है।

रेवती (D): रेवती का अर्थ सुंदर या भव्य होता है, जो उषा की सुंदरता और भव्यता को दर्शाता है। यह विशेषण उषा के लिए उपयुक्त है।

Additional Informationराष्ट्री (B): राष्ट्री का अर्थ राष्ट्र की देवी होता है। यह विशेषण उषा के लिए उपयुक्त नहीं है।

चिकितुषी (C): चिकितुषी आमतौर पर शरीर या स्वास्थ्य से संबंधित होती है। यह विशेषण भी उषा के लिए उपयुक्त नहीं है।

Question 47

धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ ।

यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् ॥ इत्यनेन कस्य ग्रन्थस्य परिचयः प्र���प्यते ?

  1. AOption (a)

    रामायणस्य

  2. BOption (b)

    मनुस्मृतेः

  3. COption (c)

    महाभारतस्य

  4. DOption (d)

    श्रीमद्भागवतस्य

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Correct answer

Answer: (c)C.

महाभारतस्य

Why this answer is correct

उत्तर- महाभारतस्य

धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ । यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् ॥"

इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – इन चारों पुरुषार्थों की बातें महाभारत में कही गई हैं। जो कुछ यहाँ (महाभारत में) है, वही अन्यत्र भी है; और जो यहाँ नहीं है, वह कहीं भी नहीं है।

यह श्लोक महाभारत के विषयवस्तु की व्यापकता और उसकी महत्ता को दर्शाता है। महाभारत को भारतीय साहित्य का सबसे विशाल और समृद्ध ग्रंथ माना जाता है, जिसमें जीवन के हर पहलू – धर्म, नीति, युद्ध, प्रेम, नीति शास्त्र और दर्शन का विस्तृत वर्णन है।

Question 48

अधोलिखितेषु उषसो विशेषणं नाऽस्ति -

  1. AOption (a)

    पुराणी

  2. BOption (b)

    मघोनी

  3. COption (c)

    चन्द्ररथा

  4. DOption (d)

    धृतव्रतः

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Correct answer

Answer: (d)D.

धृतव्रतः

Why this answer is correct

उत्तर- धृतव्रतः

  • पुराणी (1): पुराणी का अर्थ है प्राचीन। उषा को पुरानी या प्राचीन कहा जा सकता है क्योंकि वह हर दिन उदय होती है और अतीत से लेकर वर्तमान तक निरंतरता में है। यह विशेषण उषा के लिए उपयुक्त है।
  • मघोनी (2): मघोनी का अर्थ है सम्पन्न या ऐश्वर्यशाली। यह विशेषण भी उषा के लिए उपयुक्त है क्योंकि प्रातःकाल के समय उषा को ऐश्वर्य और समृद्धि का प्रतीक माना गया है।
  • चन्द्ररथा (3): चन्द्ररथा का अर्थ है चंद्रमा द्वारा संचालित रथ वाली। उषा के लिए यह विशेषण उपयुक्त है क्योंकि उसे चंद्रमा और रथ से संबंधित विचारों के साथ जोड़ा जा सकता है।
  • धृतव्रतः (4): धृतव्रतः का अर्थ है दृढ़ व्रत वाला या सख्त नियमों का पालन करने वाला। यह विशेषण उषा के संदर्भ में प्रयोग नहीं होता है, क्योंकि उषा के विभिन्न गुणों में यह विशेषण शामिल नहीं है। यह विशेषण अधिकतर पुरुषों या मानवों के लिए प्रयोग होता है जो कठोर व्रत या तपस्या का पालन करते हैं।

Question 49

प्रथमसूच्या सह द्वितीयसूचीं सुमेलयत-

List – IList - II
A.पण्डिता क्षमारावःI.गुप्ताशुद्धिप्रदर्शनम्
B.वेंकटराम राघवन्II.शिवराज्योदयः
C.अम्बिकादत्त व्यासःIII.स्वराजविजयम्
D.श्रीधरभास्कर वर्णेकर:IV.अभिनवसुन्दरी
<br>

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - II, B - I, C - IV, D - III

  2. BOption (b)

    A - III, B - IV, C - I, D - II

  3. COption (c)

    A - IV, B - II, C - III, D - I

  4. DOption (d)

    A - I, B - III, C - II, D - IV

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Correct answer

Answer: (d)D.

A - I, B - III, C - II, D - IV

Why this answer is correct

उत्तर- A - I, B - III, C - II, D - IV

विद्वान और उनके कार्य:

  • पण्डिता क्षमारावः (A) – I. गुप्ताशुद्धिप्रदर्शनम्: पण्डिता क्षमाराव ने "गुप्ताशुद्धिप्रदर्शनम्" लिखा था। यह उनकी महत्वपूर्ण रचना है।
  • वेंकटराम राघवन् (B) – III. स्वराजविजयम्: वेंकटराम राघवन् ने "स्वराजविजयम्" नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी थी।
  • अम्बिकादत्त व्यासः (C) – II. शिवराज्योदयः: अम्बिकादत्त व्यास ने "शिवराज्योदयः" नामक काव्य विरचित किया था।
  • श्रीधरभास्कर वर्णेकर: (D) – IV. अभिनवसुन्दरी: श्रीधरभास्कर वर्णेकर ने "अभिनवसुन्दरी" नामक रचना की

Question 50

“प्रायश्चित्तीया मा भूमेत्यध्येयं व्याकरणम्" इति वाक्येन महाभाष्यकारः व्याकरणाध्ययनस्य किन्नामकं प्रयोजनं प्रतिपादयति ?

  1. AOption (a)

    सारस्वतीम् 

  2. BOption (b)

    यो वा इमाम् 

  3. COption (c)

    आगमः खल्वपि

  4. DOption (d)

    दशम्यां पुत्रस्य

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Correct answer

Answer: (a)A.

सारस्वतीम् 

Why this answer is correct

उत्तर- सारस्वतीम्

महाभाष्यकार पतंजलि द्वारा कहे गए वाक्य "प्रायश्चित्तीया मा भूमेत्यध्येयं व्याकरणम्" का अर्थ यह है कि प्रायश्चित्त से बचने के लिए व्याकरण का अध्ययन किया जाना चाहिए। व्याकरण के अध्ययन का प्रमुख प्रयोजन वाणी की शुद्धता और विद्या की प्राप्ति है, जो कि देवी "सारस्वती" की कृपा से प्राप्त होती है।

इस प्रकार, इस वाक्य का उद्देश्य वाणी की शुद्धता और विद्या की देवी सारस्वती से जुड़ा हुआ है, इसलिए सही उत्तर है: सारस्वतीम्

Question 51

ब्राह्मीलिप्यां लिखितः सर्वप्राचीनलेखः वर्तते-

  1. AOption (a)

    एरणमुद्रालेखः 

  2. BOption (b)

    अशोक शिलालेखः 

  3. COption (c)

    गिरनारशिलालेखः

  4. DOption (d)

    मथुराशिलालेखः

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Correct answer

Answer: (b)B.

अशोक शिलालेखः 

Why this answer is correct

उत्तर- अशोक शिलालेखः 

ब्राह्मी लिपि, भारत की सबसे प्राचीन लिपियों में से एक है और इसे सकारण लिखा गया रूप में पहली बार सम्राट अशोक के शिलालेखों में देखा गया था।

सम्राट अशोक (273–232 ईसा पूर्व) के समय में, उनके द्वारा लिखित शिलालेख विभिन्न स्थानों पर स्थापित किए गए थे, जिनमें उन्होंने अपने धम्म (धर्म) के सिद्धांतों का प्रचार किया था। यह शिलालेख ब्राह्मी लिपि में लिखे गए थे, और ये शिलालेख भारतीय पुरालेखों में सबसे प्राचीन माने जाते हैं।

Question 52

“अर्थनिबन्धनेयं सञ्ज्ञा”- इति वृत्त्यंशो वैयाकरणसिद्धान्तकौमुद्यां लभ्यते-

  1. AOption (a)

    सञ्ज्ञाप्रकरणे

  2. BOption (b)

    कारकप्रकरणे

  3. COption (c)

    समासप्रकरणे 

  4. DOption (d)

    स्त्रीप्रत्ययप्रकरणे

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Correct answer

Answer: (b)B.

कारकप्रकरणे

Why this answer is correct

उत्तर- कारकप्रकरणे

"अर्थनिबन्धनेयं सञ्ज्ञा" यह वृत्त्यंश वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी में कारकप्रकरण में आता है। कारकप्रकरण में पाणिनि व्याकरण में कारकों की संज्ञाओं को परिभाषित करते हुए यह बताते हैं कि संज्ञाएं विभिन्न कार्यों और उनके संदर्भों के आधार पर निर्धारित होती हैं। कारकों का अर्थ यह होता है कि वे किसी कार्य या क्रिया को संपादित करने के क्रम में एक विशेष भूमिका निभाते हैं और यह संज्ञाएं उन भूमिकाओं के आधार पर प्राप्त होती हैं।

Question 53

“यशोमती”-कस्य पत्नी आसीत् ?

  1. AOption (a)

    प्रभाकरवर्धनस्य 

  2. BOption (b)

    राज्यवर्धनस्य 

  3. COption (c)

    हर्षवर्धनस्य

  4. DOption (d)

    यशोवर्धनस्य

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Correct answer

Answer: (a)A.

प्रभाकरवर्धनस्य 

Why this answer is correct

उत्तर- प्रभाकरवर्धनस्य

"यशोमती" प्रभाकरवर्धन की पत्नी थीं। प्रभाकरवर्धन वर्तमान में हरियाणा राज्य में के राजा थे और वर्धन वंश के प्रमुख शासकों में से एक थे।

यशोमती और प्रभाकरवर्धन के दो पुत्र थे: राज्यवर्धन और हर्षवर्धन। हर्षवर्धन ने आगे चलकर अपनी महान उपलब्धियों के कारण भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया।

Question 54

पाणिनीयशिक्षानुसारम् आश्रयस्थानभागिनो भवन्ति-

  1. AOption (a)

    स्वरवर्णाः

  2. BOption (b)

    ऊष्माणः 

  3. COption (c)

    अन्तस्थाः

  4. DOption (d)

    अयोगवाहाः

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Correct answer

Answer: (d)D.

अयोगवाहाः

Why this answer is correct

उत्तर- अयोगवाहाः

पाणिनीय शिक्षा, जो पाणिनि द्वारा रचित संस्कृत व्याकरण की शिक्षाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, में वर्णों के विभिन्न वर्गों का विस्तृत विवरण दिया गया है। इस संदर्भ में, "आश्रयस्थानभागिनः" का अर्थ उन वर्णों से है जो किसी विशेष स्थान या आश्रय को साझा करते हैं।

पाणिनीय व्याकरण में वर्णों को विभिन्न प्रकार के वर्गों में विभाजित किया गया है। इनमें स्वरवर्ण (स्वर), व्यंजन (मध्यवर्ग), ऊष्म (स्थाननासिक) और अयोगवाह (निर्वार्ण या विशेष स्थान) शामिल हैं।

अयोगवाहाः विशेष प्रकार के ध्वनियों को संदर्भित करते हैं, जिनमें निम्नलिखित तत्व शामिल हैं:

अं (अनुस्वार)

अः (विसर्ग)

ये वर्ण ध्वनिगत रूप से न तो स्वर होते हैं, न ही परंपरागत अर्थ में व्यंजन, बल्कि इनका एक विशेष रूप और आश्रयस्थान होता है।

अनुस्वार (अं) और विसर्ग (अः) विशेष रूप से ध्वनियों के बीच पुल का काम करते हैं और उच्चारण के स्थान के अनुसार उनके लिए विशिष्ट नियम होते हैं। इन्हें "आश्रयस्थानभागिनो" कहा गया है क्योंकि ये विशिष्ट उच्चारण स्थानों (आश्रयों) को साझा करते हैं।

पाणिनीय शिक्षा में स्पष्ट किया गया है कि ये वर्ण विशेष प्रकार के ध्वनियों के निर्माण और विशिष्ट स्थानों को साझा करने के कारण "आश्रयस्थानभागिनः" कहलाते हैं।

अतः प्रस्तुत प्रश्न का सही उत्तर है: 4) अयोगवाहाः

सारांश में, पाणिनीयशिक्षानुसार "आश्रयस्थानभागिनो" वे वर्ण होते हैं जो अनुस्वार (अं) और विसर्ग (अः) के रूप में जाने जाते हैं, जो विशिष्ट स्थान या आश्रय को साझा करते हैं।

Question 55

अधोलिखितग्रन्थाः कालक्रमानुसारं स्थापनीयाः

A. प्रौढमनोरमा

B. लघुमञ्जूषा

C. वाक्यपदीयम्

D. सिद्धहेमशब्दानुशासनम्

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, C, D

  2. BOption (b)

    C, D, B, A

  3. COption (c)

    C, D, A, B 

  4. DOption (d)

    D, B, C, A

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Correct answer

Answer: (c)C.

C, D, A, B 

Why this answer is correct

उत्तर- C, D, A, B

वाक्यपदीयम् (C)

वाक्यपदीयम्- यह ग्रंथ भर्तृहरि द्वारा रचित है, जो 5वीं शताब्दी का प्रसिद्ध वैयाकरण और दार्शनिक थे। वाक्यपदीयम् संस्कृत व्याकरण और भाषा दर्शन पर एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह सबसे प्राचीन ग्रंथों में से एक है।

सिद्धहेमशब्दानुशासनम् (D)

सिद्धहेमशब्दानुशासनम्- यह ग्रंथ प्रसिद्ध जैन आचार्य हेमचंद्र द्वारा रचित है। हेमचंद्र 12वीं शताब्दी के महान विद्वान थे और उनका यह ग्रंथ संस्कृत व्याकरण पर महत्वपूर्ण है।

प्रौढमनोरमा (A)

प्रौढमनोरमा- यह ग्रंथ भट्टोजि दीक्षित द्वारा रचित है। भट्टोजि दीक्षित 17वीं शताब्दी के प्रसिद्ध वैयाकरण थे। यह ग्रंथ "सिद्धान्त कौमुदी" की एक टिप्पणी है।

लघुमञ्जूषा (B)

लघुमञ्जूषा- यह ग्रंथ नागेशभट्ट द्वारा रचित है, जो 17वीं-18वीं शताब्दी के विद्वान थे। यह ग्रंथ संस्कृत व्याकरण पर नागेशभट्ट की टिप्पणियों का संग्रह है और अपेक्षाकृत अन्य ग्रंथों के बाद का है।

अतः कालक्रमानुसार इन ग्रंथों को व्यवस्थित किया जाए तो निम्नलिखित क्रम प्राप्त होता है:

C. वाक्यपदीयम् (5वीं शताब्दी) D. सिद्धहेमशब्दानुशासनम् (12वीं शताब्दी) A. प्रौढमनोरमा (17वीं शताब्दी) B. लघुमञ्जूषा (17वीं-18वीं शताब्दी)

Question 56

“अथातो ब्रह्मजिज्ञासा” इति सूत्रे शाङ्करभाष्यदृष्ट्या “अथ” शब्दस्य कोऽर्थः ?

  1. AOption (a)

    आरम्भार्थकः

  2. BOption (b)

    सूचनार्थकः

  3. COption (c)

    आनन्तर्यार्थकः

  4. DOption (d)

    नान्द्यर्थकः

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Correct answer

Answer: (c)C.

आनन्तर्यार्थकः

Why this answer is correct

उत्तर- आनन्तर्यार्थकः

शाङ्करभाष्य (शंकराचार्य की टिप्पणी) में "अथ" शब्द का विशेष महत्त्व है। इस शब्द का सामान्य अर्थ "अब" या "इसके बाद" होता है।

शाङ्करभाष्य का मुख्य मत है कि यहाँ "अथ" का अर्थ आनन्तर्यार्थकः है, जिसका तात्पर्य यह है कि "इसके बाद" या "इससे अगला कार्य" के रूप में लिया जाता है। इस प्रकार, "अथ" शब्द का उपयोग यह दर्शाने के लिए किया गया है कि यह "ब्रह्मजिज्ञासा" (ब्रह्म की जिज्ञासा) का आरंभ एक अनुक्रमिक क्रम में होता है, जो पूर्व के अध्ययन, अनुभव या योग्यता के बाद आता है।

विस्तृत स्पष्टीकरण:

शाङ्करभाष्य के अनुसार, "अथ" शब्द का प्रयोग यह संकेत करने के लिए किया गया है कि ब्रह्मजिज्ञासा (ब्रह्म के प्रति जिज्ञासा) एक निश्चित पूर्व स्थिति, योग्यता या अनुभव के पश्चात ही आरंभ होती है। इस प्रकार, यह नये अध्ययन की शुरुआत को एक अनुक्रमिक क्रम में स्थापित करता है:

  • पूर्वानुभूति या योग्यता: पहले व्यक्ति को जीवन के चारों पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में अनुभव होना चाहिए।
  • अनुक्रम का पालन: यह अध्ययन एक क्रम के अनुसार पूर्वानुभव या योग्यता के बाद होनी चाहिए।
  • श्रवण, मनन एवं ध्यान: इन तीन चरणों से गुजरने के बाद ही ब्रह्मज्ञान प्राप्ति की दिशा में बढ़ा जा सकता है।

इस प्रकार, "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" का अर्थ है, "अब, इससे बाद, ब्रह्म के प्रति जिज्ञासा का समय है।" यहाँ "अथ" का अर्थ आनन्तर्यार्थकः (इसके पश्चात) लिया जाता है।

Question 57

प्रथमसूच्या सह द्वितीयसूचीं सुमेलयत-

List – IList - II
A.सोत्रान्तिकाःI.बाह्यार्थशून्यत्वं स्वीकुर्वन्ति
B.वैभाषिकाःII.सर्वशून्यत्त्वं स्वीकुर्वन्ति
C.योगाचाराःIII.बाह्यार्थानुमेयं स्वीकुर्वन्ति
D.माध्यमिकाःIV.बाह्यार्थप्रत्यक्षं स्वीकुर्वन्ति
<br>

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-​

  1. AOption (a)

    A - III, B - IV, C - I, D - II

  2. BOption (b)

    A - IV, B - II, C - I, D - III

  3. COption (c)

    A - I, B - II, C - III, D - IV

  4. DOption (d)

    A - IV, B - III, C - II, D - I

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Correct answer

Answer: (a)A.

A - III, B - IV, C - I, D - II

Why this answer is correct

उत्तर- A - III, B - IV, C - I, D - II

सोत्रान्तिकाः (A) – बाह्यार्थानुमेयं स्वीकुर्वन्ति (III): सोत्रान्तिक मत के अनुयायी बाह्य वस्तुओं के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं, लेकिन उन्हें सीधे रूप में नहीं देखते बल्कि अनुमेय मानते हैं।

वैभाषिकाः (B) – बाह्यार्थप्रत्यक्षं स्वीकुर्वन्ति (IV): वैभाषिक मत के अनुयायी बाह्य वस्तुओं के प्रत्यक्ष अस्तित्व में विश्वास करते हैं। वे प्रत्यक्ष अनुभव को सच्चा मानते हैं।

योगाचाराः (C) – बाह्यार्थशून्यत्वं स्वीकुर्वन्ति (I): योगाचार मत के अनुयायी बाह्य वस्तुओं के अस्तित्व को नकारते हैं और उन्हें मानसिक अनुमानों का परिणाम मानते हैं। उनका मानना है कि बाह्यार्थ वस्तुतः शून्य होती है।

माध्यमिकाः (D) – सर्वशून्यत्त्वं स्वीकुर्वन्ति (II): माध्यमिक मत के अनुयायी सभी वस्तुओं और धारणाओं को शून्य मानते हैं। वे सम्पूर्ण शून्यवाद का समर्थन करते हैं।

अतः, सही संयोजन इस प्रकार हैं: 1) A - III, B - IV, C - I, D - II

Question 58

“उभयसारिका-भाणः”- इति नाट्यस्य रचयिता वर्तते -

  1. AOption (a)

    हरदत्तः

  2. BOption (b)

    मुरारिमिश्रः 

  3. COption (c)

    वीरेन्द्रकुमारभट्टाचार्यः

  4. DOption (d)

    कात्यायनः

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Correct answer

Answer: (d)D.

कात्यायनः

Why this answer is correct

उत्तर- कात्यायनः

"उभयसारिका-भाणः" की रचना

"उभयसारिका-भाणः" संस्कृत साहित्य का एक प्रसिद्ध नाट्य है। इस नाट्य की रचना कात्यायन ने की है। कात्यायन प्राचीन भारतीय साहित्य मनीषियों में से एक हैं, जिन्होंने विभिन्न प्रकार के साहित्यिक और शास्त्रीय ग्रंथों की रचना की है।

कात्यायन के अन्य योगदान

कात्यायन संस्कृत व्याकरण, साहित्य और शास्त्रों के विशिष्ट ग्रंथकार माने जाते हैं। कात्यायन का योगदान मुख्यतः व्याकरण और साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण रहा है।

उनकी रचनाओं में "उभयसारिका-भाणः" एक महत्वपूर्ण नाट्य रचना है, जिसे भाण (वक्तृदृश्य) के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह नाटक विशिष्ट संरचना और संवादों के माध्यम से भिन्न-भिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्यों को समझाने का प्रयास करता है।

Question 59

मनुस्मृत्यनुसार प्रथमसूच्या सह द्वितीयसूचीं सुमेलयत-

List – IList - II
A.ब्राह्मणस्यI.जुगुप्सितम्
B.क्षत्रियस्यII.धनसंयुक्तम्
C.वैश्यस्यIII.बलान्वितम्
D.शूद्रस्यIV.मङ्गल्यम्
<br>

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - IV, B - II, C - I, D - III

  2. BOption (b)

    A - IV, B - I, C - III, D - II

  3. COption (c)

    A - I, B - II, C - III, D - IV

  4. DOption (d)

    A - IV, B - III, C - II, D - I

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Correct answer

Answer: (d)D.

A - IV, B - III, C - II, D - I

Why this answer is correct

उत्तर- A - IV, B - III, C - II, D - I

ब्राह्मणस्य - मङ्गल्यम् (A - IV): ब्राह्मण को धर्म, ज्ञान, और मंगलीक गतिविधियों से जोड़ा गया है। इसलिए एक ब्राह्मण का कर्म मङ्गल्यम् (पवित्र और मंगलकारी) है।

क्षत्रियस्य - बलान्वितम् (B - III): क्षत्रिय को सैन्य और प्रशासनिक कार्यों से जोड़ा गया है। इसलिए क्षत्रिय का गुण बलान्वितम् (शक्ति से युक्त) है।

वैश्यस्य - धनसंयुक्तम् (C - II): वैश्य व्यापार, वाणिज्य, और कृषि से जुड़े होते हैं। इसलिए वैश्य का गुण धनसंयुक्तम् (धन से युक्त) है।

शूद्रस्य - जुगुप्सितम् (D - I): शूद्र को समाज में सेवा कार्य का उत्तरदायित्व सौंपा गया है। परन्तु मनुस्मृति में उनकी स्थिति को जुगुप्सितम् (हीन या अवमूल्यित) कहा गया है।

इस प्रकार, इन सभी सूचियों का संयोजन सही रूप से इस प्रकार होता है:

  • A - IV (ब्राह्मणस्य - मङ्गल्यम्)
  • B - III (क्षत्रियस्य - बलान्वितम्)
  • C - II (वैश्यस्य - धनसंयुक्तम्)
  • D - I (शूद्रस्य - जुगुप्सितम्)

Question 60

भक्त्या ध्वनेः एकत्वं नास्ति-

  1. AOption (a)

    अर्थभेदात्

  2. BOption (b)

    शब्दभेदात् 

  3. COption (c)

    रूपभेदात् 

  4. DOption (d)

    सम्बन्धभेदात्

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Correct answer

Answer: (c)C.

रूपभेदात् 

Why this answer is correct

उत्तर- रूपभेदात्

रूपभेद का मतलब है "रूप में भिन्नता"। किसी शब्द या ध्वनि का उच्चारण, संरचना, और प्रस्तुति भिन्न-भिन्न स्थितियों या संदर्भों में अलग-अलग हो सकती है। इस अंतर के कारण ध्वनि की एकरूपता संभव नहीं होती। आइए इसे गहराई से समझें:

उच्चारण भिन्नता

विभिन्न व्यक्ति और स्थान के उच्चारण में भिन्नता होती है। उदाहरण के लिए, एक ही शब्द को अलग-अलग क्षेत्र के लोग भिन्न-भिन्न प्रकार से उच्चारित कर सकते हैं।

सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव

विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में एक ही ध्वनि या शब्द के भिन्न रूप हो सकते हैं।

संरचनात्मक भिन्नता

एक ही शब्द के रूप में लिंग, वचन, कारक आदि के आधार पर भिन्नता आ सकती है। उदाहरण के लिए, 'राम' का 'रामः', 'रमम्', 'रामेण', 'रामाय' आदि रूप होते हैं।

Question 61

यस्य वर्णस्य अनुनासिकसञ्ज्ञा विहिता तस्यैव अन्यसञ्ज्ञा भवति-

  1. AOption (a)

    रक्तः

  2. BOption (b)

    विवृतिः 

  3. COption (c)

    स्वरभक्तिः

  4. DOption (d)

    अन्तस्थः

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Correct answer

Answer: (c)C.

स्वरभक्तिः

Why this answer is correct

उत्तर- अनुनासिक वर्ण

संस्कृत व्याकरण में, अनुनासिक वर्ण वे वर्ण होते हैं जिन्हें बोलते समय हवा नाक से निकलती है। यह एक विशेष प्रकार की ध्वनि होती है।

स्वरभक्ति

संस्कृत व्याकरण के अनुसार, स्वरभक्ति उन विशेषताओं में से एक है जो उन वर्णों को दी जाती है जिनमें अनुनासिकता होती है। "स्वरभक्ति" का तात्पर्य स्वर के अवयव या प्रत्ययों से है। इसे आमतौर पर इन वर्णों के साथ जोड़ा जाता है।

Question 62

प्रथमसूच्या सह द्वितीयसूचीं सुमेलयत-

List – IList - II
A.बादरायणःI.तत्त्ववेशारदी टीका
B.वाचस्पतिमिश्रःII.राजमार्तण्डवृत्तिः
C.भोजःIII.योगसूत्रभाष्यम्
D.विज्ञानभिक्षुःIV.योगवार्तिकम्
<br>

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - IV, B - III, C - II, D - I

  2. BOption (b)

    A - II, B - III, C - I, D - IV

  3. COption (c)

    A - III, B - I, C - II, D - IV

  4. DOption (d)

    A - I, B - II, C - III, D - IV

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Correct answer

Answer: (c)C.

A - III, B - I, C - II, D - IV

Why this answer is correct

उत्तर- A - III, B - I, C - II, D - IV

A. बादरायणः - योगसूत्रभाष्यम् (III)

  • बादरायण को ब्रह्मसूत्र के रचयिता माना जाता है, परंतु यहाँ संदर्भ है योगसूत्रभाष्य का।
  • कई विद्वानों के अनुसार, योगसूत्रभाष्य पतञ्जलि द्वारा रचित है, परंतु कुछ परंपराओं में इसे बादरायण से भी जोड़ा गया है।
  • यह योगदर्शन की मूल टीका मानी जाती है।

B. वाचस्पतिमिश्रः - तत्त्ववेशारदी टीका (I)

  • वाचस्पति मिश्र ने योगसूत्रभाष्य पर तत्त्ववेशारदी नामक टीका लिखी।
  • यह टीका योगदर्शन को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

C. भोजः - राजमार्तण्डवृत्तिः (II)

  • राजा भोज ने योगसूत्र पर राजमार्तण्डवृत्ति नामक टीका लिखी।
  • इसमें उन्होंने पतञ्जलि के सूत्रों को सरल भाषा में समझाया है।

D. विज्ञानभिक्षुः - योगवार्तिकम् (IV)

  • विज्ञानभिक्षु ने योगसूत्र पर योगवार्तिक नामक टीका लिखी।
  • यह टीका विशेषतः योग के व्यावहारिक पक्ष को स्पष्ट करती है।

Question 63

अधोलिखितानि ब्रह्मसूत्राणि क्रमानुसारं समुपस्थापयत-

A. जन्माद्यस्य यतः

B. अथातो ब्रह्मजिज्ञासा

C. तत्तु समन��वयात्

D. शास्त्रयोनित्त्वात्

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, C, D 

  2. BOption (b)

    D, C, B, A 

  3. COption (c)

    C, A, D, B

  4. DOption (d)

    B, A, D, C

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Correct answer

Answer: (d)D.

B, A, D, C

Why this answer is correct

उत्तर- B, A, D, C

  • अथातो ब्रह्म जिज्ञासा (B) - ये ब्रह्मसूत्र का प्रथम सूत्र है, जो यह कहता है कि अब हम ब्रह्म के बारे में जिज्ञासा करेंगे। यह सूत्र प्रारंभ में आता है और ब्रह्म के विषय में जिज्ञासा उत्पन्न करता है।
  • जन्माद्यस्य यतः (A) - यह दूसरा सूत्र है, जो यह बताता है कि ब्रह्म से ही इस जगत की उत्पत्ति, स्थिति और लय होती है।
  • शास्त्रयोनित्वात् (D) - यह सूत्र तीसरा है और यह कहता है कि ब्रह्म शास्त्रों (वेदों) का स्रोत है। शास्त्र ही हमें ब्रह्म का ज्ञान देते हैं।
  • तत्तु समन्वयात् (C) - यह चौथा सूत्र है, जो यह बताता है कि ब्रह्म सभी शास्त्रों का तात्पर्य है और सभी शास्त्र वेदवाक्यों के साथ मेल खाते हैं।

 

सही क्रम को ध्यान में रखते हुए, "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" (B) सबसे पहले आता है। इसके बाद "जन्माद्यस्य यतः" (A) आता है, इसके बाद "शास्त्रयोनित्वात्" (D) आता है और अंत में "तत्तु समन्वयात्" (C) आता है। अतः सही उत्तर 4) B, A, D, C है।

Question 64

लिङ्गशरीराणि भवन्ति -

  1. AOption (a)

    अष्टादशावयवानि

  2. BOption (b)

    सप्तदशावयवानि 

  3. COption (c)

    षोडशावयवानि

  4. DOption (d)

    पञ्चदशावयवानि

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Correct answer

Answer: (b)B.

सप्तदशावयवानि 

Why this answer is correct

उत्तर- सप्तदशावयवानि

लिङ्गशरीर (सूक्ष्म शरीर) का अर्थ है वह शरीर जो सूक्ष्म है और स्थूल (भौतिक) शरीर के विपरीत है। हालांकि कई भारतीय दर्शन और ग्रन्थ सम्बंधित आचार्य इस पर विस्तार से विश्लेषण करते हैं, यहाँ सामान्यत: सम्पूर्ण लिङ्गशरीर के अवयवों का जो समुदाय होता है वह सप्तदश (सत्रह) होते हैं।

लिङ्गशरीर के सप्तदश अवयव निम्नलिखित होते हैं:

पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि - पाँच इन्द्रियाँ जो ज्ञान प्राप्त करने में सहायक होती हैं:

  • चक्षु (आँखें)
  • श्रोत्र (कान)
  • घ्राण (नाक)
  • रसना (जीभ)
  • त्वक् (त्वचा)

पञ्च कर्मेन्द्रियाणि - पाँच इन्द्रियाँ जो कर्म करने में सहायक होती हैं:

  • वाक् (भाषा)
  • पाणि (हाथ)
  • पाद (पैर)
  • उपस्थ (उत्सर्जन अंगों)
  • पायु (प्रजनन अंग)

पञ्च प्राणाः - पाँच प्रकार की वायुयें जो जीवन शक्ति के रूप में कार्य करती हैं:

  • प्राण (श्वास)
  • अपान (विषण्णता)
  • व्यान (परिचालन)
  • उदान (वाच्य)
  • समान (पाचन)
  • मनः (मन) - जो विचार और भावनाओं का केंद्र होता है।
  • बुद्धिः (बुद्धि) - यह निर्णय और विवेक का स्थान होता है।

 

इस प्रकार ये सभी मिलकर लिङ्गशरीर या सूक्ष्म शरीर के सत्रह (सप्तदश) अवयवों का समूह बनाते हैं।

Question 65

अधोलिखितेषु “यौ कुत्सितं बहु भाषेते” तौ वर्तेते-

A. वाग्ग्मी

B. वाचालः

C. वाचाट:

D. वातकी

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, D केवलम्

  2. BOption (b)

    B, C केवलम्

  3. COption (c)

    C, D केवलम् 

  4. DOption (d)

    A, C केवलम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

B, C केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर- B, C केवलम्

वाचालः: अत्यधिक बोलने वाला, चंचल बातूनी।

वाचाट: अत्यधिक और बुरे तरीके से बोलने वाला।

इस स्पष्टीकरण के अनुसार, "वाचालः" और "वाचाट:" दोनों "कुत्सितं बहु भाषेते" व्यक्ति को सही ढंग से प्रस्तुत करते हैं।

Question 66

साङ्ख्यदर्शने कति प्रमाणानि स्वीक्रियन्ते

  1. AOption (a)

    त्रीणि

  2. BOption (b)

    चत्वारि

  3. COption (c)

    पञ्च

  4. DOption (d)

    षट्

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Correct answer

Answer: (a)A.

त्रीणि

Why this answer is correct

उत्तर- त्रीणि

सांख्य दर्शन भारतीय दर्शन की एक प्रमुख प्रणाली है जिसमें सृष्टि के मूल कारणों का विश्लेषण किया गया है। सांख्य दर्शन के अनुसार, सृष्टि के संपूर्ण ज्ञान और सत्य को जानने के लिए तीन प्रमाणों को स्वीकार किया जाता है। ये प्रमाण हमारे ज्ञान को सत्य और यथार्थ साबित करने के लिए साधन माने जाते हैं।

सांख्य दर्शन में निम्नलिखित तीन प्रमाणों को स्वीकृत किया गया है:

  • प्रत्यक्ष (प्रत्यक्ष प्रमाण) - यह प्रत्यक्ष ज्ञान का प्रमाण है, जो सीधी इंद्रिय ग्राही द्वारा प्राप्त होता है, जैसे आँखों से देखना, कानों से सुनना, आदि।
  • अनुमान (अनुमान प्रमाण) - यह तर्क और निष्कर्ष पर आधारित ज्ञान का प्रमाण है, जहां हम लक्षणों और संकेतों के आधार पर निष्कर्ष निकालते हैं। उदाहरण स्वरूप, धुआं देखकर आग का अनुमान लगाना।
  • शब्द (आप्तवाक्य प्रमाण) - यह सत्ता (अपरोक्ष) का मान्य स्रोत है, जैसे शास्त्र, वेद, या विश्वास पात्र आचार्य के वचन। यह वह ज्ञान है जो अनुकरणीय योग्य स्नात विशेषज्ञों या प्राचीन ग्रंथों से प्राप्त होता है।

अतः, सांख्य दर्शन में प्रमाणों की संख्या त्रीणि (तीन) है।

Question 67

“शैशवेऽभ्यस्तविद्यानाम्” इति श्लोकांशः कुत्र लभ्यते ?

  1. AOption (a)

    बुद्धचरितमहाकाव्ये 

  2. BOption (b)

    रघुवंशमहाकाव्ये 

  3. COption (c)

    किरातार्जुनीयमहाकाव्ये

  4. DOption (d)

    शिशुपालवधमहाकाव्ये

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Correct answer

Answer: (b)B.

रघुवंशमहाकाव्ये 

Why this answer is correct

उत्तर- रघुवंशमहाकाव्ये

"शैशवेऽभ्यस्तविद्यानाम्" इत्यादि श्लोकांश महाकवि कालिदास द्वारा रचित रघुवंशमहाकाव्ये प्राप्त होता है। यह महाकाव्य, रघुवंश के चरित्र पर आधारित है और इसमें रघु के वंशजों के वीर गाथाओं और उनके विविध घटनाओं का विवरण मिलता है। श्लोक "शैशवेऽभ्यस्तविद्यानाम्" राजा दिलीप के गुणों का वर्णन करते हुए उद्धृत होता है।

शैशवेऽभ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैषिणाम् ।

वार्द्धके मुनिवृत्तीनां योगेनान्ते तनुत्यजाम्।।

अन्वयः शैशवे अभ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैषिणाम् वार्द्धके मुनिवृत्तिनाम्। अन्ते योगेन तनुत्यजाम् (रघूणां अन्वयं वक्ष्ये)।

अनुवादः बाल्यकाल में (विविध) विद्याओं को अभ्यास करने वाले, यौवन काल में विषयभोगों की इच्छा करने वाले, वृद्धावस्था में मुनियों का-सा जीवन बिताने वाले तथा अन्त में योग (समाधि) द्वारा शरीर का त्याग करने वाले - रघुवंशी राजाओं का वर्णन करूंगा।

Question 68

अर्थशास्त्रस्य प्रथमाधिकरणानुसारं यथाक्रमम् अधोलिखितानि अध्यायनामानि लेखनीयानि -

A. मन्त्राधिकारः

B. राजपुत्ररक्षणम्

C. वृद्धसंयोगः

D. राजर्षिवृत्तम्

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    B, A, D, C

  2. BOption (b)

    C, B, A, D

  3. COption (c)

    D, C, B, A

  4. DOption (d)

    C, D, A, B

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Correct answer

Answer: (c)C.

D, C, B, A

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उत्तर- D, C, B, A

कौटिल्य के अर्थशास्त्र का प्रथम अधिकारण राज्य के शासन और प्रशासन से सम्बंधित है। इसमें विभिन्न अध्यायों के माध्यम से, राज्य के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। प्रस्तुत प्रश्न में चार अध्यायों के क्रम के बारे में पूछा गया है।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र के प्रथम अधिकारण के विभिन्न अध्यायों के क्रम में रखा गया विवरण इस प्रकार है:

  • राजर्षिवृत्तम् (राजाओं द्वारा अनुसरणीय आचार) - D
  • वृद्धसंयोगः (वयोवृद्धों और अनुभवी सलाहकारों के साथ संयोग) - C
  • राजपुत्ररक्षणम् (राजकुमारों की सुरक्षा) - B
  • मन्त्राधिकारः (मंत्रियों के प्रभारी) - A

अतः, सही क्रम है: D, C, B, A।

Question 69

प्रथमसूच्या सह द्वितीयसूचीं सुमेलयत-

List – IList - II
A.कुल्लूकभट्टःI.मन्वर्थचन्द्रिका
B.सर्वज्ञनारायणःII.मन्वर्थमुक्तावली
C.राघवानन्दसरस्वतीIII.मन्वर्थविवृत्तिः
D.नन्दनाचार्यःIV.नन्दिनी
<br>

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - I, B - III, C - IV, D - II

  2. BOption (b)

    A - II, B - IV, C - III, D - I

  3. COption (c)

    A - II, B - III, C - I, D - IV

  4. DOption (d)

    A - IV, B - II, C - I, D - III

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Correct answer

Answer: (c)C.

A - II, B - III, C - I, D - IV

Why this answer is correct

उत्तर- A - II, B - III, C - I, D - IV

कुल्लूकभट्टः - मन्वर्थमुक्तावली (A - II):

कुल्लूकभट्ट ने 'मन्वर्थमुक्तावली' नामक टीका लिखी है। यह मनुस्मृति पर एक महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध टीका है, जिसमें मनुस्मृति के श्लोकों की व्याख्या की गई है।

सर्वज्ञनारायणः - मन्वर्थविवृत्तिः (B - III):

सर्वज्ञनारायण द्वारा लिखित 'मन्वर्थविवृत्तिः' मनुस्मृति पर एक और महत्वपूर्ण टीका ���ै। इसमें भी मनुस्मृति के श्लोकों की गहन व्याख्या की गई है।

राघवानन्दसरस्वती - मन्वर्थचन्द्रिका (C - I):

राघवानन्दसरस्वती ने 'मन्वर्थचन्द्रिका' नामक ग्रंथ लिखा है, जो मनुस्मृति पर आधारित है और इसके श्लोकों की व्याख्या करता है।

नन्दनाचार्यः - नन्दिनी (D - IV):

नन्दनाचार्य द्वारा रचित 'नन्दिनी' एक टीका है, जो मनुस्मृति के विभिन्न श्लोकों का व्यापक विवरण और विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

<br>

इस प्रकार, प्रश्न का सही उत्तर और उन जोड़ी वाले विद्वानों और उनकी रचनाओं का सूचीकरण इस प्रकार है:

A - II, B - III, C - I, D - IV

Question 70

अधोलिखितासु श्लिष्ट-योगात्मक भाषासु का परिगणिता न भवति ?

  1. AOption (a)

    लैटिन भाषा 

  2. BOption (b)

    तुर्की भाषा

  3. COption (c)

    ग्रीक भाषा

  4. DOption (d)

    रूसी भाषा

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Correct answer

Answer: (a)A.

लैटिन भाषा 

Why this answer is correct

उत्तर- लैटिन भाषा

श्लिष्ट-योगात्मक भाषाएँ वे भाषाएँ होती हैं जिनमें शब्दों को बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के उपसर्ग, प्रत्यय आदि को जोड़कर (अर्थात्, संलग्न करके) नए शब्दों का निर्माण किया जाता है। इन भाषाओं में नए शब्दों और विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए शब्दों के मूल रूप में बदलाव करते हुए विभिन्न तत्व जोड़ते हैं।

उदाहरणतः, तुर्की, ग्रीक, और रूसी भाषाएँ श्लिष्ट-योगात्मक भाषाओं की श्रेणी में आती हैं क्योंकि इन भाषाओं में उपसर्गों और प्रत्ययों के उपयोग से शब्द निर्माण किया जाता है।

लैटिन भाषा इस श्रेणी में नहीं आती। लैटिन भाषा एक फ्यूज़नल (संलयात्मक) भाषा है जिसमें शब्दों के अंत में बदलाव करके शब्दों के अर्थ और व्याकरणिक संबंधों को दर्शाया जाता है। इसमें शब्दों के आंतरिक स्वरूप में बदलाव होता है और यह श्लिष्ट-योगात्मकता की परिभाषा में फिट नहीं बैठता।

Question 71

हरिषेणविरचिते इलाहाबादशिलालेखे कस्य प्रशस्तिर्विद्यते ?

  1. AOption (a)

    समुद्रगुप्तस्य

  2. BOption (b)

    चन्द्रगुप्तस्य

  3. COption (c)

    अशोकस्य

  4. DOption (d)

    भरद्वाजस्य

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Correct answer

Answer: (a)A.

समुद्रगुप्तस्य

Why this answer is correct

उत्तर- समुद्रगुप्तस्य

  • हरिषेण, जो कि गुप्त साम्राज्य का एक महत्वपूर्ण कवि और अधिकारी था, ने यह शिलालेख रचा था।
  • इलाहाबाद स्तम्भ शिलालेख में गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त की महानता और वीरता की प्रशंसा की गई है। यह शिलालेख समुद्रगुप्त के शासनकाल के दौरान उनके द्वारा किए गए विजयों, पराक्रम, कूटनीति और प्रशासनिक महत्वाकांक्षाओं को विस्तार से वर्णित करता है।
  • समुद्रगुप्त (लगभग 335-380 ईस्वी) को गुप्त साम्राज्य का महान सम्राट माना जाता है और उसे भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
  • हरिषेण ने इस शिलालेख में समुद्रगुप्त के विभिन्न युद्धों, उनके द्वारा जीत की गई राजाओं और साम्राज्यों, उनके प्रशासनिक गुण और उनकी सांस्कृतिक उपलब्धियों का वर्णन किया है।
  • इतिहासकारों के लिए, यह शिलालेख महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यह समुद्रगुप्त के शासनकाल की व्यापक जानकारी प्रदान करता है और उसके चरित्र और कार्यों की प्रशंसा करता है।
  • इस शिलालेख से हमें उस समय के राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामरिक स्थलों की भी जानकारी मिलती है।

Question 72

अधस्तनेषु उपपुराणमस्ति-

  1. AOption (a)

    नारदपुराणम्

  2. BOption (b)

    गरुडपुराणम् 

  3. COption (c)

    कालिकापुराणम्

  4. DOption (d)

    वामनपुराणम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

कालिकापुराणम्

Why this answer is correct

उत्तर- कालिकापुराणम्

पुराण हिन्दू धर्म में धार्मिक ग्रंथों का एक महत्वपूर्ण वर्ग है, जो देवताओं, पौराणिक कथाओं, महत्वपूर्ण घटनाओं और धार्मिक मान्यताओं का वर्णन करता है। पुराणों को विभिन्न प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है, जैसे कि महापुराण और उपपुराण।

कालिकापुराणम्:

कालिकापुराण एक उपपुराण है। उपपुराण वे ग्रंथ होते हैं जो महापुराणों के पूरक होते हैं और विशेष रूप से किसी विशिष्ट देवता, तीर्थ, उत्सव या धार्मिक अनुष्ठान पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

कालिकापुराण में देवी काली और तांत्रिक पूजा विधानों का विस्तार से वर्णन है। इसमें देवी महात्म्य, काली की पूजा विधि, उपदेश और विभिन्न मंत्रों का विस्तृत विवरण मिलता है।

नारदपुराणम्, गरुडपुराणम् और वामनपुराणम् महापुराणों की श्रेणी में आते हैं।

Question 73

अधोलिखितेषु स्त्रीलिङ्गे शतृप्रत्ययान्तं पदद्वयम् अस्ति-

A. पिबती

B. सती

C. दधती

D. जाग्रती

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम्

  2. BOption (b)

    B, C केवलम्

  3. COption (c)

    B, D केवलम् 

  4. DOption (d)

    A, C केवलम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

B, C केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर- B, C केवलम्

विश्लेषण और निष्कर्ष

  • पिबती: स्त्रीलिंग में वर्तमान काल का रूप है, लेकिन शतृप्रत्यय का नहीं है।
  • सती: शतृप्रत्यय का स्त्रीलिंग रूप है।
  • दधती: शतृप्रत्यय का स्त्रीलिंग रूप है।
  • जाग्रती: स्त्रीलिंग में वर्तमान काल का रूप है, लेकिन शतृप्रत्यय का नहीं है।

"सती" (B) और "दधती" (C) ही वे शब्द हैं जो शतृप्रत्ययान्त स्त्रीलिंग शब्द हैं।

Question 74

“क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः” इति सूत्रे "क्लेश” इतिपदस्य कोऽर्थः ?

  1. AOption (a)

    लोकिकाः क्लेशाः

  2. BOption (b)

    पारलौकिकाः क्लेशाः

  3. COption (c)

    अविद्यादयः क्लेशाः

  4. DOption (d)

    जय-पराजयादयः क्लेशाः

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Correct answer

Answer: (c)C.

अविद्यादयः क्लेशाः

Why this answer is correct

उत्तर- अविद्यादयः क्लेशाः

योगसूत्र का यह श्लोक "क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः" पतंजलि के योगसूत्रों से है। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर (सम्पूर्ण आत्मा) वह विशेष पुरुष है जो क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से अपरामृष्ट (अस्पर्शित) है।

"क्लेश" शब्द का अर्थ

इस श्लोक में "क्लेश" का विशेष महत्व है।

अविद्यादयः क्लेशाः (अविद्या आदि क्लेश):

"अविद्यादयः" का अर्थ है अविद्या (अज्ञान) आदि क्लेश। यह सही उत्तर है क्योंकि पतंजलि के अनुसार, पाँच प्रकार के क्लेश होते हैं: अविद्या (अज्ञान), अस्मिता (अहंकार), राग (आकर्षण), द्वेष (घृणा), और अभिनिवेश (मृत्यु से डर)। ये क्लेश मन के भीतर गहरे स्तर पर होते हैं और अशांत करते हैं।

Question 75

“कमलेव मतिः मतिरिव कमला तनुरिव विभा विभेव तनुः । धरणीव धृतिर्धृतिरिव धरणी सततं विभाति बत यस्य ॥” इत्यत्र कोऽलङ्कारः ?

  1. AOption (a)

    अनन्वयः 

  2. BOption (b)

    उत्प्रेक्षा

  3. COption (c)

    उपमेयोपमा

  4. DOption (d)

    मालोपमा

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Correct answer

Answer: (c)C.

उपमेयोपमा

Why this answer is correct

उत्तर- उपमेयोपमा

पमेयोपमा-

उपमेयोपमा वह अलंकार है जिसमें एक उपमेय (तुल्य) की उपमा को पुनः उपमेय के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यहाँ श्लोक में यही हो रहा है: बुद्धि को कमल से और कमल को बुद्धि से, तनु को विभा से और विभा को तनु से, धृति को धरणी से और धरणी को धृति से तुलना की जा रही है। यह द्विगुण उपमा का उदाहरण है।

Question 76

ऋग्वेदस्य अधोलिखितानि सूक्तानि यथाक्रमं चिनुत-

A. पुरुरवा-उर्वशी-संवादसूक्तम्

B. सरमा-पणि-संवादसूक्तम्

C. विश्वामित्र-नदी-संवादसूक्तम्

D. यम-यमी-संवादसूक्तम्

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, C, D 

  2. BOption (b)

    C, D, A, B 

  3. COption (c)

    C, B, D, A

  4. DOption (d)

    D, C, A, B

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Correct answer

Answer: (d)D.

D, C, A, B

Why this answer is correct

उत्तर- D, C, A, B

ऋग्वेद के संवाद सूक्त प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण हैं। ये सूक्त विभिन्न देवताओं, ऋषियों और पौराणिक चरित्रों के मध्य हुए संवादों को प्रस्तुत करते हैं। आपके प्रश्न में चार संवाद सूक्तों को कालक्रमानुसार प्रस्तुत करना है, और सही उत्तर विकल्प 4) D, C, A, B है।

यम-यमी-संवादसूक्तम् (D): यह सूक्त ऋग्वेद के दसवें मंडल में आता है (10.10)। इसमें यमी अपने भाई यम से संवाद करती है जिसमें वे विभिन्न विषयों पर चर्चा करते हैं। यह संभवतः सबसे प्राचीन संवाद सूक्त है।

विश्वामित्र-नदी-संवादसूक्तम् (C): यह सूक्त ऋग्वेद के तीसरे मंडल में है (3.33)। इसमें ऋषि विश्वामित्र और सरस्वती तथा वस्तु नदियों के बीच संवाद होता है। यह सूक्त नदी स्तुतियों और उनके महत्त्व को प्रकट करता है।

पुरुरवा-उर्वशी-संवादसूक्तम् (A): यह सूक्त ऋग्वेद के दसवें मंडल में आता है (10.95)। इसमें पुरुरवा और उर्वशी के बीच संवाद होता है, जिसमें उनकी प्रेम कथा और वियोग की बातें हैं।

सरमा-पणि-संवादसूक्तम् (B): यह सूक्त ऋग्वेद के दसवें मंडल में (10.108) है। इसमें सरमा देवताओं की दूत है और वह पणियों से संवाद करती है जो धन और सम्पत्ति को चुरा लेते हैं। यह संवाद सूक्त उनमें उनकी चर्चा को प्रस्तुत करता है।

आपके अनुसार प्रस्तुत प्रश्न का योग्य उत्तर विकल्प 4) D, C, A, B है, इसलिए:

  • यम-यमी-संवादसूक्तम् (D)
  • विश्वामित्र-नदी-संवादसूक्तम् (C)
  • पुरुरवा-उर्वशी-संवादसूक्तम् (A)
  • सरमा-पणि-संवादसूक्तम् (B)

यह कालक्रम इस प्रकार है कि यम-यमी संवाद सबसे प्राचीन है और फिर विश्वामित्र-नदी संवाद, इसके बाद पुरुरवा-उर्वशी संवाद और अंत में सरमा-पणि संवाद आता है।

इस प्रकार, सही उत्तर विकल्प 4) D, C, A, B ही है।

Question 77

अधोलिखितसम्प्रदायान् कालक्रमानुसारं समुपस्थापयत-

A. ध्वनिसम्प्रदायः

B. वक्रोक्तिसम्प्रदायः

C. अलङ्कारसम्प्रदायः

D. रससम्प्रदायः

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, D, C

  2. BOption (b)

    D, C, A, B

  3. COption (c)

    A, B, C, D

  4. DOption (d)

    C, D, B, A

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Correct answer

Answer: (d)D.

C, D, B, A

Why this answer is correct

उत्तर- C, D, B, A

अलङ्कारसम्प्रद��यः (C): यह काव्यशास्त्र में सबसे प्राचीन सम्प्रदाय है। इस समृद्ध साहित्यिक परम्परा के प्रमुख आचार्यों में भामह और उद्भट प्रमुख हैं, जिन्होंने काव्य में अलंकारों की महत्ता प्रतिपादित की।

रससम्प्रदायः (D): इस सम्प्रदाय के प्रमुख आचार्य भरत मुनि हैं, जिन्होंने "नाट्यशास्त्र" के माध्यम से रस का सिद्धांत प्रस्तुत किया। रस के सिद्धांत में कविता और नाट्य की सौंदर्यात्मक अनुभूति को महत्वपूर्ण माना गया है।

वक्रोक्तिसम्प्रदायः (B): यह सम्प्रदाय काव्यशास्त्र में काव्य की विशेषता और उसकी शैली के महत्व को दर्शाता है। इसके प्रमुख प्रवर्तक कुण्डक हैं, जिन्होंने वक्रोक्ति को काव्य की आत्मा माना है।

ध्वनिसम्प्रदायः (A): यह सम्प्रदाय काव्य में ध्वनि के महत्व को प्रतिपादित करता है। इसके प्रमुख आचार्य आनन्दवर्धन और अभिनवगुप्त हैं। ध्वनि को काव्य की आत्मा मानते हुए, इसमें निहित भावना को प्रधानता दी गई है।

इस क्रम में, सही कालक्रमानुसार संयोजन होगा:

  • अलङ्कारसम्प्रदायः (C)
  • रससम्प्रदायः (D)
  • वक्रोक्तिसम्प्रदायः (B)
  • ध्वनिसम्प्रदायः (A)

अतः सही उत्तर 4) C, D, A, B होगा, न कि 3) A, B, C, D।

Question 78

अधोलिखितेषु अभिहितान्वयवादस्य समर्थकौ स्तः -

A. प्रभाकरः

B. कुमारिलभट्टः

C. शालिकनाथमिश्रः

D. पार्थसारथिमिश्रः

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम्

  2. BOption (b)

    B, C केवलम्

  3. COption (c)

    B, D केवलम् 

  4. DOption (d)

    A, C केवलम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

B, D केवलम् 

Why this answer is correct

उत्तर- B, D केवलम् 

अभिहितान्वयवाद (स्पष्टित: अभिहित-अन्वय-वाद) मीमांसाशास्त्र में वाक्य के अर्थ को समझाने का एक प्रमुख सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार, वाक्य का अर्थ उसके घटक शब्दों के अर्थों के संयोग से उत्पन्न होता है। शब्द पहले अपने-अपने स्वतंत्र अर्थ देते हैं, और फिर उन अर्थों का संयोग (अन्वय) करके वाक्य का अर्थ निर्मित होता है।

अब हम देखेंगे कि इस सिद्धांत के समर्थक कौन हैं:

  • प्रभाकर (A): प्रभाकर ने अनुबुद्धिवाद या अविवक्षित-भाव सिद्धांत का समर्थन किया, जिसमें वह अभिहितान्वयवाद का खंडन करते हैं। अत: प्रभाकर अभिहितान्वयवाद के समर्थक नहीं हैं।
  • कुमारिलभट्ट (B): कुमारिलभट्ट प्रसिद्ध मीमांसक हैं जिन्होंने अभिहितान्वयवाद का समर्थन किया। उनके अनुसार, वाक्य का अर्थ उसके घटक शब्दों के स्वतंत्र अर्थों के संयोग से उत्पन्न होता है।
  • शालिकनाथ मिश्र (C): शालिकनाथ मिश्र ने प्रभाकर के मत का समर्थन करते हुए अविवक्षित-भाव सिद्धांत या अनुपूर्ववाद का प्रतिपादन किया, जो अभिहितान्वयवाद का खंडन करता है। अत: शालिकनाथ मिश्र अभिहितान्वयवाद के समर्थक नहीं हैं।
  • पार्थसारथिमिश्र (D): पार्थसारथिमिश्र कुमारिलभट्ट के शिष्य और मीमांसाशास्त्र के अन्य प्रमुख व्याख्याकार हैं जिन्होंने अभिहितान्वयवाद का समर्थन किया।

अतः, अभिहितान्वयवाद के समर्थक निम्नलिखित हैं:

कुमारिलभट्ट (B)

पार्थसारथिमिश्र (D)

इस प्रकार, सही विकल्प (3) होगा - "B, D केवलम्"

Question 79

अधोलिखितेषु सात्त्विकपुराणद्वयं चेतव्यम् -

A. शिवपुराणम्

B. भागवतपुराणम्

C. कालिकापुराणम्

D. विष्णुपुराणम्

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम

  2. BOption (b)

    B, D केवलम्

  3. COption (c)

    C, D केवलम् 

  4. DOption (d)

    A, D केवलम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

B, D केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर- B, D केवलम्

पुराण भारतीय धर्म और संस्कृति का अभिन्न अंग हैं, और इन्हें तीन मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है: सात्त्विक, राजस और तामस। सात्त्विक पुराणों को विष्णु से संबंधित माना जाता है और इनमें विष्णु और उनके अवतारों की महिमा का वर्णन होता है। प्रस्तुत प्रश्न में सात्त्विक पुराणद्वय को पहचानना है।

सात्त्विक पुराणद्वयं:

भागवतपुराणम् (B): भागवतपुराण एक प्रमुख सात्त्विक पुराण है, जो भगवान विष्णु और उनके अवतारों की कथाओं का विवरण करता है। इसमें विशेष रूप से भगवान कृष्ण की लीलाओं का वर्णन मिलता है।

विष्णुपुराणम् (D): विष्णुपुराण भी एक प्रमुख सात्त्विक पुराण है, जो भगवान विष्णु की महिमा और उनके अवतारों का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत करता है। यह पुराण वेदांत और पुराणिक कथाओं का मिश्रण है।

इस प्रकार, सात्त्विक पुराणों में भागवतपुराण (B) और विष्णुपुराण (D) सम्मिलित हैं।

Question 80

प्रथमसूच्या सह द्वितीयसूचीं सुमेलयत-

List – IList - II
A.आख्यातोपयोगेI.वृक्षमवचिनोति फलानि
B.जनिकर्तुः प्रकृतिःII.यागाय याति
C.अकथित चIII.उपाध्यायात् अधीते
D.तुमर्थाच्च भाववचनात्IV.ब्रह्मणः प्रजाः प्रजायन्ते
<br>

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - III, B - IV, C - I, D - II

  2. BOption (b)

    A - II, B - III, C - IV, D - I

  3. COption (c)

    A - I, B - IV, C - II, D - III

  4. DOption (d)

    A - IV, B - I, C - III, D - II

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Correct answer

Answer: (a)A.

A - III, B - IV, C - I, D - II

Why this answer is correct

उत्तर- A - III, B - IV, C - I, D - II

A. आख्यातोपयोगे - III. उपाध्यायात् अधीते

आख्यातोपयोग (क्रिया के प्रयोजन) में क्रिया का प्रयोग बताया जाता है। "उपाध्यायात् अधीते" का अर्थ है "शिक्षक से पढ़ता है", यहाँ क्रिया का प्रयोजन स्पष्ट है।

B. जनिकर्तुः प्रकृतिः - IV. ब्रह्मणः प्रजाः प्रजायन्ते

जनिकर्ता (उत्पत्ति के कर्ता) की प्रकृति जनकत्व को दर्शाती है। "ब्रह्मणः प्रजाः प्रजायन्ते" का अर्थ है "ब्रह्मा से प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं", यहाँ जनक और उत्पत्ति की प्रकृति का संबंध स्पष्ट है।

C. अकथित च - I. वृक्षमवचिनोति फलानि

अकथित का तात्पर्य बिना किसी स्पष्ट वर्णन के होता है। "वृक्षमवचिनोति फलानि" का अर्थ है "वृक्ष से फल तोड़ता है", जहाँ कार्य का परिणाम बिना किसी विशेष वर्णन के है।

D. तुमर्थाच्च भाववचनात् - II. यागाय याति

तुमर्थ (तुमुन् प्रत्यय) और भाववचन से तात्पर्य उद्देश्य सूचक क्रियाओं का प्रयोग है। "यागाय याति" का अर्थ है "यज्ञ के लिए जाता है", यहाँ तुमर्थ और भाववचन का उद्देश्य स्पष्ट है।

इस प्रकार, सही अंकन निम्नलिखित प्रकार से है:

  • A (आख्यातोपयोगे) - III (उपाध्यायात् अधीते)
  • B (जनिकर्तुः प्रकृतिः) - IV (ब्रह्मणः प्रजाः प्रजायन्ते)
  • C (अकथित च) - I (वृक्षमवचिनोति फलानि)
  • D (तुमर्थाच्च भाववचनात्) - II (यागाय याति)

 

अतः सही उत्तर 1) A - III, B - IV, C - I, D - II है।

Question 81

दशरूपकानुसारम् अर्थोपक्षेपकेषु परिगणितौ स्तः -

A. परिभाषणम्

B. चूलिका

C. उपगूहनम्

D. अङ्कावतारः

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B केवलम्

  2. BOption (b)

    B, D केवलम्

  3. COption (c)

    B, C केवलम्

  4. DOption (d)

    A, D केवलम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

B, D केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर- B, D केवलम्

दशरूपक का प्रतिपाद्य विषय संस्कृत नाट्यशास्त्र के अंतर्गत आता है, जिसमें नाट्य कला के विभिन्न तत्वों और उनके उपयोग का वर्णन किया गया है। अर्थोपक्षेपक वे तत्व हैं जो नाटक की संरचना में सहायक होते हैं।

दशरूपक के अनुसार, अर्थोपक्षेपक पांच प्रकार के होते हैं, जिनमें प्रमुख रूप से दस (दाशरूपकम्) तत्वों का वर्णन किया गया है। इनमें से कुछ तत्वों को अर्थोपक्षेपक रूप में परिगणित किया गया है। निम्नलिखित व्याख्या से स्पष्ट होता है कि "चूलिका" और "अङ्कावतारः" अर्थोपक्षेपक के अंतर्गत आते हैं:

चूलिका (B): चूलिका अर्थोपक्षेपक के अंतर्गत आती है। यह नाटक के प्रविष्टिसूत्र का हिस्सा होती है, जो नाटक के मुख्य कथा को प्रारंभ करने के लिए प्रयुक्त होती है।

अङ्कावतारः (D): अङ्कावतार भी अर्थोपक्षेपक के अंतर्गत आता है। यह एक प्रकार से अंको के प्रारंभ या प्रस्तुति का माध्यम होता है, जो दर्शकों को आगामी अंकों की भूमिका के बारे में सूचित करता है।

इस प्रकार, सही उत्तर 2) B, D केवलम् है।

Question 82

अधोलिखितेषु भवभूतेः प्रसिद्धम् उपाधिद्वयं विद्यते -

A. मृगराजः

B. कविमृगेन्द्रः

C. वश्यवाक्

D. परिणतप्रज्ञः

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, C केवलम् 

  2. BOption (b)

    C, D केवलम् 

  3. COption (c)

    B, C केवलम्

  4. DOption (d)

    A, B केवलम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

B, C केवलम्

Why this answer is correct

उत्तर- B, C केवलम्

भवभूति एक प्रसिद्ध संस्कृत नाटककार और कवि थे, जिनकी रचनाएँ आज भी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। उन्हें निम्नलिखित उपाधियों से जाना जाता है:

कविमृगेन्द्रः (B): "कविमृगेन्द्रः" का अर्थ है "कवियों में सिंह"। यह उपाधि भवभूति को उनके उत्कृष्ट साहित्यिक योगदान और प्रतिभा के कारण दी गई है। यह उपाधि भवभूति के कवित्व-कौशल की श्रेष्ठता को दर्शाती है।

वश्यवाक् (C): "वश्यवाक्" का अर्थ है "जिसकी वाणी सबको वश में कर लेती है"। भवभूति को यह उपाधि उनकी प्रभावशाली और सम्मोहक वाणी एवं भाषा-शैली के कारण दी गई है।

इस प्रकार, भवभूति के दो प्रसिद्ध उपाधियाँ "कविमृगेन्द्रः" (B) और "वश्यवाक्" (C) हैं।

Question 83

प्रथमसूच्या सह द्वितीयसूचीं सुमेलयत-

List – IList - II
A.शृङ्गारःI.महेन्द्रः
B.वीभत्सःII.विष्णुः
C.वीरःIII.महाकालः
D.अद्भुतःIV.ब्रह्मा
<br>

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A - IV, B - I, C - III, D - II

  2. BOption (b)

    A - II, B - III, C - I, D - IV

  3. COption (c)

    A - II, B - IV, C - I, D - III

  4. DOption (d)

    A - III, B - II, C - IV, D - I

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Correct answer

Answer: (b)B.

A - II, B - III, C - I, D - IV

Why this answer is correct

उत्तर- A - II, B - III, C - I, D - IV

शृङ्गारः (A) - विष्णुः (II): शृंगार रस का देवता विष्णु है। शृंगार रस प्रेम और श्रृंगार की भावनाओं से संबंधित है, और भगवान विष्णु को प्रेम और भक्ति का प्रतीक माना जाता है।

वीभत्सः (B) - महाकालः (III): वीभत्स रस का देवता महाकाल (शिव) हैं। वीभत्स रस घृणा, वितृष्णा और भय की भावना से सम्बंधित है, और भगवान शिव का महाकाल रूप विनाश और भयानकता को दर्शाता है।

वीरः (C) - महेन्द्रः (I): वीर रस का देवता महेन्द्र (इंद्र) है। वीर रस साहस, वीरता और पराक्रम की भावना से संबंधित है, और इंद्र को देवताओं के राजा के रूप में वीरता का प्रतीक माना जाता है।

अद्भुतः (D) - ब्रह्मा (IV): अद्भुत रस का देवता ब्रह्मा है। अद्भुत रस विस्मय, चमत्कार और जिज्ञासा की भावना से सम्बंधित है, और भगवान ब्रह्मा सृष्टि के निर्माता के रूप में अद्भुतता और सृजन के प्रतीक हैं।

Question 84

ऋग्वेदस्य व्याख्यापद्धतिषु पौर्वापर्यं निर्धारणीयम् -

A. वेङ्कटमाधवस्य व्याख्यापद्धतिः

B. उद्गीथस्य व्याख्यापद्धतिः

C. भट्टगोविन्दस्य व्याख्यापद्धतिः

D. सायणाचार्यस्य व्याख्यापद्धतिः

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    B, A, C, D

  2. BOption (b)

    A, B, C, D

  3. COption (c)

    C, D, A, B

  4. DOption (d)

    D, B, A, C

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Correct answer

Answer: (c)C.

C, D, A, B

Why this answer is correct

उत्तर- C, D, A, B

ऋग्वेद की व्याख्याओं की परंपरा में विभिन्न मनीषियों ने अपने-अपने दृष्टिकोण और पद्धतियों के आधार पर व्याख्याएँ की हैं।

व्याख्यापद्धतियों के नाम: A. वेङ्कटमाधवस्य व्याख्यापद्धतिः B. उद्गीथस्य व्याख्यापद्धतिः C. भट्टगोविन्दस्य व्याख्यापद्धतिः D. सायणाचार्यस्य व्याख्यापद्धतिः

समय के आधार पर सही अनुक्रम:

भट्टगोविन्दस्य व्याख्यापद्धतिः (C): भट्ट गोविन्द ने सबसे पहले ऋग्वेद की व्याख्या की। वे 8वीं शताब्दी के मनीषी थे।

सायणाचार्यस्य व्याख्यापद्धतिः (D): सायणाचार्य ने 14वीं शताब्दी में ऋग्वेद पर व्यापक व्याख्या लिखी। यह व्याख्या सबसे प्रख्यात और प्रमाणिक मानी जाती है।

वेङ्कटमाधवस्य व्याख्यापद्धतिः (A): वेङ्कटमाधव ने 15वीं शताब्दी में ऋग्वेद की व्याख्या लिखी, जो भाष्य के रूप में महत्वपूर्ण है।

उद्गीथस्य व्याख्यापद्धतिः (B): उद्गीथ ने 17वीं शताब्दी के आसपास व्याख्या की, जो प्राचीन वेदों की दार्शनिक और धार्मिक सदर्भ्सी में की गई है।

अतः, सही क्रम है: 3) C, D, A, B

Question 85

अधोलिखिताः आचार्याः कालक्रमानुसारं स्थापनीयाः-

A. हर्षः

B. विल्हणः

C. श्रीहर्षः

D. भट्टनारायणः

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    A, B, C, D 

  2. BOption (b)

    B, C, D, A 

  3. COption (c)

    A, C, B, D

  4. DOption (d)

    A, D, B, C

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Correct answer

Answer: (d)D.

A, D, B, C

Why this answer is correct

उत्तर- A, D, B, C

  • हर्ष (A): हर्षवर्धन (606-647 ई.) प्रारंभिक काल के एक महत्वपूर्ण शासक और लेखक थे। उनका शासनकाल 7वीं शताब्दी में था।
  • भट्टनारायण (D): भट्टनारायण 8वीं-9वीं शताब्दी के समय के संस्कृत कवि थे। उन्होंने 'वेणीसंहारम्' नामक महानाटक की रचना की।
  • विल्हण (B): विल्हण 11वीं शताब्दी के एक महत्वपूर्ण कवि थे, जिन्होंने 'विक्रमार्कचरित' लिखा।
  • श्रीहर्ष (C): श्रीहर्ष 12वीं शताब्दी के कवि थे, जिन्होंने 'नैषधीयचरितम्' जैसी महत्वपूर्ण रचनाएँ लिखीं।

इस प्रकार, इन आचार्यों को सही कालक्रमानुसार क्रमबद्ध करने पर सही उत्तर 4) A, D, B, C प्राप्त होता है।

फलस्वरूप, हर्षवर्धन सबसे पहले हैं, उसके बाद भट्टनारायण, फिर विल्हण और अंत में श्रीहर्ष आते हैं।

Question 86

षट्पञ्चाशिका नाम ग्रन्थः कस्य वेदाङ्गस्य प्रतिनिधिः?

  1. AOption (a)

    कल्पवेदाङ्गस्य

  2. BOption (b)

    शिक्षावेदाङ्गस्य 

  3. COption (c)

    ज्योतिषवेदाङ्गस्य

  4. DOption (d)

    निरुक्तवेदाङ्गस्य

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Correct answer

Answer: (c)C.

ज्योतिषवेदाङ्गस्य

Why this answer is correct

उत्तर- ज्योतिषवेदाङ्गस्य

"षट्पञ्चाशिका" एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है जो मुख्यतः ज्योतिष वेदांग से संबंधित है। इसे "वेदाङ्ग ज्योतिष" के नाम से भी जाना जाता है। यह ग्रंथ प्राचीन भारतीय ज्योतिष शास्त्र का प्रतिनिधि है, जिसमें 54 श्लोक हैं।

ज्योतिष का महत्व

ज्योतिष वेदांग का मुख्य उद्देश्य वेदों के अनुष्ठानों के समय का निर्धारण करना है। इसका उपयोग शुभ समय (मुहूर्त) का चयन करने, ग्रह नक्षत्रों की स्थिति निर्धारित करने और यज्ञादि कर्मकांडों के लिए उपयुक्त समय का निर्णय करने के लिए होता है।

निष्कर्ष

"षट्पञ्चाशिका" वेदांग ज्योतिष का प्रतिनिधित्व करता है। यह ग्रंथ वेदों के अनुष्ठानों के लिए खगोलीय और समय निर्धारण के संदर्भ में विस्तृत जानकारी प्रदान करता है। अतः इस प्रश्न का सही उत्तर ज्योतिष वेदांग है।

Question 87

योगदर्शनस्य प्रथमः उपदेष्टा कः ?

  1. AOption (a)

    पतञ्जलिः

  2. BOption (b)

    रामदेवः

  3. COption (c)

    वाचस्पतिमिश्रः

  4. DOption (d)

    कपिलमुनिः

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Correct answer

Answer: (a)A.

पतञ्जलिः

Why this answer is correct

उत्तर- पतञ्जलिः

पतञ्जलि को योगदर्शन का प्रथम और प्रमुख उपदेशक माना जाता है। उन्होंने योग के सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया, जिसे हम "पतञ्जलि योगसूत्र" के नाम से जानते हैं।

पतञ्जलि योगसूत्र के चार अध्याय:

  • समाधिपादः - योग की परिभाषा और समाधि की अवस्थाएँ
  • साधनपादः - योग के अभ्यास की विधियाँ
  • विभूतिपादः - योग से प्राप्त सिद्धियाँ
  • कैवल्यपादः - मोक्ष और आत्मज्ञान की स्थिति

पतञ्जलि के योगदान:

  • उन्होंने योग को केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक अनुशासन के रूप में प्रस्तुत किया।
  • अष्टाङ्ग योग (योग के आठ अंग) - यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि - का वर्णन उन्हीं के ग्रंथ में मिलता है

Question 88

शकुन्तलोपाख्यानं महाभारतस्य कस्मिन् पर्वणि प्राप्यते ?

  1. AOption (a)

    आदिपर्वणि

  2. BOption (b)

    वनपर्वणि

  3. COption (c)

    सभापर्वणि 

  4. DOption (d)

    भीष्मपर्वणि

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Correct answer

Answer: (a)A.

आदिपर्वणि

Why this answer is correct

उत्तर- आदिपर्वणि

महाभारत और इसकी संरचना

महाभारत एक विशाल और महत्त्वपूर्ण महाकाव्य है, जिसमें विभिन्न कथाएं और कहानियां समाहित हैं। यह महाभारत कुल 18 पर्वों (भागों) में विभाजित है। हर पर्व में एक मुख्य कथा तथा अनेक उपकथाएं और उपाख्यान होते हैं।

आदिपर्व

आदिपर्व महाभारत का पहला पर्व (भाग) है। इसे महाभारत का प्रस्तावना पर्व भी कहा जाता है। इसमें कुल 19 उपपर्व और 236 अध्याय हैं। इसमें महाभारत के नायकों और उनके पूर्वजों का परिचय दिया गया है और विभिन्न वंशों का वर्णन किया गया है। आदिपर्व में ही महाभारत की कथा का प्रारम्भ होता है और इसमें बहुत से रोचक एवं महत्वपूर्ण उपाख्यान (कथाएँ) सम्मिलित हैं।

शकुंतलोपाख्यान

शकुंतला और राजा दुष्यन्त की कहानी, जिसे शकुंतलोपाख्यान कहा जाता है, आदिपर्व में वर्णित है। इस उपाख्यान में विस्तार से बताया गया है कि कैसे राजा दुष्यन्त और शकुंतला की मुलाकात होती है, उनका प्रेम प्रसंग होता है और उनके पुत्र भरत का जन्म होता है, जो कि आखिर में चंद्रवंश का संस्थापक बनता है। यह कहानी महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत तनाव्य और मार्मिक घटनाओं के साथ एक प्रमुख उपाख्यान है।

Question 89

न्यायसिद्धान्तमुक्तावल्यां कति पदार्थाः निरूपिताः सन्ति ?

  1. AOption (a)

    त्रयः

  2. BOption (b)

    पञ्च

  3. COption (c)

    सप्त

  4. DOption (d)

    नव

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Correct answer

Answer: (c)C.

सप्त

Why this answer is correct

उत्तर- सप्त

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली

न्यायसिद्धान्तमुक्तावलि, न्याय दर्शन पर एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसके रचयिता विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य हैं। इस ग्रंथ में न्याय दर्शन के सिद्धान्तों को विस्तारपूर्वक और सुगम भाषा में समझाया गया है।

सप्त पदार्थ

न्यायसिद्धान्तमुक्तावलि में सात पदार्थों का निरूपण किया गया है, जो इस प्रकार हैं:

  • अभाव: किसी वस्तु या विशेषता की अनुपस्थिति।
  • समवाय: अपृथक सिद्ध संबंध।
  • विशेष: अद्वितीयता या अणु का गुण।
  • समान्य: समान और सामान्य लक्षण।
  • गुण: वस्तु के विशेष गुण।
  • कर्म: एक वस्तु की क्रिया।
  • द्रव्य: वह वस्तु जिसमें गुण और कर्म विद्यमान होते हैं।

इन सात पदार्थों के माध्यम से न्यायशास्त्र में समस्त ज्ञान की व्याख्या और विवेचना की जाती है।

Question 90

“तदतिशयहेतवस्त्वलङ्काराः” इति अलङ्कारलक्षणवाक्यं प्राप्यते-

  1. AOption (a)

    भामहकृतकाव्यालङ्कारे

  2. BOption (b)

    दण्डिकृतकाव्यादर्शे

  3. COption (c)

    वामनकृतकाव्यालङ्कारसूत्रेषु 

  4. DOption (d)

    कुन्तककृतवक्रोक्तिजीविते

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Correct answer

Answer: (a)A.

भामहकृतकाव्यालङ्कारे

Why this answer is correct

उत्तर- भामहकृतकाव्यालङ्कारे

काव्यालङ्कार शास्त्र

भारतीय साहित्यशास्त्र में काव्यालङ्कार (काव्य अलंकार) शास्त्र का महत्व बहुत अधिक है। काव्यालङ्कार शास्त्र में काव्य की सुन्दरता और उसकी शोभा बढ़ाने वाले अलंकारों का वर्णन और विवेचन होता है।

भामहकृत काव्यालङ्कार

भामह एक प्रसिद्ध काव्यशास्त्री हैं, जिन्होंने 'काव्यालङ्कार' नामक ग्रंथ की रचना की। भामह का काव्यालङ्कार प्राचीनतम उपलब्ध काव्यशास्त्रीय ग्रंथों में से एक है। इसमें काव्य के विभिन्न अंगों और उसकी शोभा को बढ़ाने वाले अलंकारों का विस्तृत वर्णन किया गया है।

भामह ने 'काव्यालङ्कार' ग्रंथ में इस महत्वपूर्ण वाक्य का उल्लेख करके काव्य की शोभा और उसकी विशिष्टता को बढ़ाने वाले विभिन्न अलंकारों की व्याख्या की है।

भामह के अनुसार, अलंकार वे तत्व होते हैं जो काव्य की सुंदरता में विशिष्टता एवं अतिशयोक्ति को जोड़ते हैं और उसे अधिक मनोहारी बनाते हैं।

अधोलिखितं परिच्छेदं पठित्वा तदाधारिताः प्रश्नाः समाधेयाः-

“अस्याङ्गिनो निर्विकल्पकस्य लयविक्षेपकषायरसास्वादलक्षणाश्चत्त्वारो विघ्नाः सम्भवन्ति । लयस्तावदखण्डवस्त्वनवलम्बेन चित्तवृत्तेर्निद्रा । अखण्डवस्त्वनवलम्बेन चित्तवृत्तेरन्यावलम्बनं विक्षेपः । लयविक्षेपाभावेऽपि चित्तवृत्ते रागादिवासनया स्तब्धीभावादखण्डवस्त्वनवलम्बनं कषायः । अखण्डस्त्वनवलम्बनेनापि चित्तवृत्तेः सविकल्पकानन्दास्वादनं रसास्वादः । समाध्यारम्भसमये सविकल्पकानन्दास्वादनं वा । अनेन विघ्नचतुष्टयेन विरहितं चित्तं निर्वातदीपवदचलं सदखण्डचेतन्यमात्रमवतिष्ठते यदा तदा निर्विकल्पकः समाधिरित्युच्यते ।"

Question 91

उपरिलिखितपरिच्छेदानुसारम् अखण्डवस्त्वनवलम्बनेन चित्तवृत्तीनां निद्रायां सत्यां कः विघ्नः भवति ?

  1. AOption (a)

    लयः 

  2. BOption (b)

    विक्षेपः

  3. COption (c)

    कषायः

  4. DOption (d)

    रसास्वादः

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Correct answer

Answer: (a)A.

लयः 

Why this answer is correct

उत्तर- लयः

"विदर्भ नाम का एक जनपद था, जिसमें भोजवंश का भूषण, धर्म का अवतार-सा, अत्यंत श्रेष्ठ, पुण्यात्मा पुण्यवर्मा नामक राजा था। वह पुण्य कर्मों के द्वारा पूरी आयु तक जीकर, पुनः अपने पुण्य से प्रजा के बीच बेहद सम्मानित हुआ। इसके बाद अनन्तवर्मा नामक राजा ने राज्य संभाला। वह सर्वगुण संपन्न था, परन्तु दंडनीति में उतना प्रवीण नहीं था। एक बार रहस्यमय तरीके से वसुरक्षितो नामक एक वृद्ध मंत्री, जो उसके पिता का अत्यंत सम्मानित था, उससे बातचीत करने लगा।

वृद्ध मंत्री बोला, "तात, आप सभी दृष्टियों से आत्मसम्पन्न हैं, आपकी बुद्धि परिपक्व है, और नृत्य-गीत, चित्रकलाओं तथा काव्य विस्तृत ज्ञान में उत्कृष्ट है। फिर भी आपने अर्थशास्त्र में शिक्षण प्रयास नहीं किया है, जिससे आपकी बुद्धि असँस्कारी प्रतीत होती है, जैसे अग्नि में न तपाए गए सोने का तेज। बिना नीति ज्ञान के राजा, चाहे वह कितना भी महान हो, अन्य लोगों द्वारा आसानी से प्रभावित हो सकता है। और वह ना तो कार्य को समझ सकता है और ना ही साधनों का सही विभाजन कर सकता है। शास्त्र एक दिव्य दृष्टि जैसा होता है, जो भूत, वर्तमान और भविष्य की जटिलताओं को साफ-साफ देख सकता है। इसीलिए बाह्य विद्याओं का मोह छोड़कर, अपने कुल की दंडनीति का ज्ञान प्राप्त करो और उसके अनुपालन से शक्ति संचय कर, अविचलित शासन द्वारा इस धरती पर लंबे समय तक शासन करो।"

Question 92

उपरिलिखितपरिच्छेदानुसारं विघ्नचतुष्टयेन विरहिते चित्ते सति कः समाधिः भवति ?

  1. AOption (a)

    सविल्पकसमाधिः

  2. BOption (b)

    सम्प्रज्ञातसमाधिः 

  3. COption (c)

    निर्विकल्पकसमाधिः

  4. DOption (d)

    विक्षेपसमाधिः

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Correct answer

Answer: (c)C.

निर्विकल्पकसमाधिः

Why this answer is correct

उत्तर- निर्विकल्पकसमाधिः

"विदर्भ नाम का एक जनपद था, जिसमें भोजवंश का भूषण, धर्म का अवतार-सा, अत्यंत श्रेष्ठ, पुण्यात्मा पुण्यवर्मा नामक राजा था। वह पुण्य कर्मों के द्वारा पूरी आयु तक जीकर, पुनः अपने पुण्य से प्रजा के बीच बेहद सम्मानित हुआ। इसके बाद अनन्तवर्मा नामक राजा ने राज्य संभाला। वह सर्वगुण संपन्न था, परन्तु दंडनीति में उतना प्रवीण नहीं था। एक बार रहस्यमय तरीके से वसुरक्षितो नामक एक वृद्ध मंत्री, जो उसके पिता का अत्यंत सम्मानित था, उससे बातचीत करने लगा।

वृद्ध मंत्री बोला, "तात, आप सभी दृष्टियों से आत्मसम्पन्न हैं, आपकी बुद्धि परिपक्व है, और नृत्य-गीत, चित्रकलाओं तथा काव्य विस्तृत ज्ञान में उत्कृष्ट है। फिर भी आपने अर्थशास्त्र में शिक्षण प्रयास नहीं किया है, जिससे आपकी बुद्धि असँस्कारी प्रतीत होती है, जैसे अग्नि में न तपाए गए सोने का तेज। बिना नीति ज्ञान के राजा, चाहे वह कितना भी महान हो, अन्य लोगों द्वारा आसानी से प्रभावित हो सकता है। और वह ना तो कार्य को समझ सकता है और ना ही साधनों का सही विभाजन कर सकता है। शास्त्र एक दिव्य दृष्टि जैसा होता है, जो भूत, वर्तमान और भविष्य की जटिलताओं को साफ-साफ देख सकता है। इसीलिए बाह्य विद्याओं का मोह छोड़कर, अपने कुल की दंडनीति का ज्ञान प्राप्त करो और उसके अनुपालन से शक्ति संचय कर, अविचलित शासन द्वारा इस धरती पर लंबे समय तक शासन करो।"

Question 93

उपरिलिखितपरिच्छेदानुसारं लयविक्षेपाऽभावे सति रागादिवासनात् चित्तवृत्तेरखण्डवस्त्वलम्बने कः विघ्नः भवति -

  1. AOption (a)

    लयः

  2. BOption (b)

    कषायः 

  3. COption (c)

    विक्षेपः

  4. DOption (d)

    रसास्वादः

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Correct answer

Answer: (b)B.

कषायः 

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उत्तर- कषायः

"विदर्भ नाम का एक जनपद था, जिसमें भोजवंश का भूषण, धर्म का अवतार-सा, अत्यंत श्रेष्ठ, पुण्यात्मा पुण्यवर्मा नामक राजा था। वह पुण्य कर्मों के द्वारा पूरी आयु तक जीकर, पुनः अपने पुण्य से प्रजा के बीच बेहद सम्मानित हुआ। इसके बाद अनन्तवर्मा नामक राजा ने राज्य संभाला। वह सर्वगुण संपन्न था, परन्तु दंडनीति में उतना प्रवीण नहीं था। एक बार रहस्यमय तरीके से वसुरक्षितो नामक एक वृद्ध मंत्री, जो उसके पिता का अत्यंत सम्मानित था, उससे बातचीत करने लगा।

वृद्ध मंत्री बोला, "तात, आप सभी दृष्टियों से आत्मसम्पन्न हैं, आपकी बुद्धि परिपक्व है, और नृत्य-गीत, चित्रकलाओं तथा काव्य विस्तृत ज्ञान में उत्कृष्ट है। फिर भी आपने अर्थशास्त्र में शिक्षण प्रयास नहीं किया है, जिससे आपकी बुद्धि असँस्कारी प्रतीत होती है, जैसे अग्नि में न तपाए गए सोने का तेज। बिना नीति ज्ञान के राजा, चाहे वह कितना भी महान हो, अन्य लोगों द्वारा आसानी से प्रभावित हो सकता है। और वह ना तो कार्य को समझ सकता है और ना ही साधनों का सही विभाजन कर सकता है। शास्त्र एक दिव्य दृष्टि जैसा होता है, जो भूत, वर्तमान और भविष्य की जटिलताओं को साफ-साफ देख सकता है। इसीलिए बाह्य विद्याओं का मोह छोड़क��, अपने कुल की दंडनीति का ज्ञान प्राप्त करो और उसके अनुपालन से शक्ति संचय कर, अविचलित शासन द्वारा इस धरती पर लंबे समय तक शासन करो।"

Question 94

उपरिलिखित परिच्छेदानुसारम् अखण्डवस्त्वनवलम्बनेनापि चित्तवृत्तेः सविकल्पकानन्दास्वादनं भवति-

  1. AOption (a)

    निद्रास्वादः

  2. BOption (b)

    निरास्वादः

  3. COption (c)

    रसास्वादः

  4. DOption (d)

    भोजनास्वादः

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Correct answer

Answer: (c)C.

रसास्वादः

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उत्तर- ​रसास्वादः

"विदर्भ नाम का एक जनपद था, जिसमें भोजवंश का भूषण, धर्म का अवतार-सा, अत्यंत श्रेष्ठ, पुण्यात्मा पुण्यवर्मा नामक राजा था। वह पुण्य कर्मों के द्वारा पूरी आयु तक जीकर, पुनः अपने पुण्य से प्रजा के बीच बेहद सम्मानित हुआ। इसके बाद अनन्तवर्मा नामक राजा ने राज्य संभाला। वह सर्वगुण संपन्न था, परन्तु दंडनीति में उतना प्रवीण नहीं था। एक बार रहस्यमय तरीके से वसुरक्षितो नामक एक वृद्ध मंत्री, जो उसके पिता का अत्यंत सम्मानित था, उससे बातचीत करने लगा।

वृद्ध मंत्री बोला, "तात, आप सभी दृष्टियों से आत्मसम्पन्न हैं, आपकी बुद्धि परिपक्व है, और नृत्य-गीत, चित्रकलाओं तथा काव्य विस्तृत ज्ञान में उत्कृष्ट है। फिर भी आपने अर्थशास्त्र में शिक्षण प्रयास नहीं किया है, जिससे आपकी बुद्धि असँस्कारी प्रतीत होती है, जैसे अग्नि में न तपाए गए सोने का तेज। बिना नीति ज्ञान के राजा, चाहे वह कितना भी महान हो, अन्य लोगों द्वारा आसानी से प्रभावित हो सकता है। और वह ना तो कार्य को समझ सकता है और ना ही साधनों का सही विभाजन कर सकता है। शास्त्र एक दिव्य दृष्टि जैसा होता है, जो भूत, वर्तमान और भविष्य की जटिलताओं को साफ-साफ देख सकता है। इसीलिए बाह्य विद्याओं का मोह छोड़कर, अपने कुल की दंडनीति का ज्ञान प्राप्त करो और उसके अनुपालन से शक्ति संचय कर, अविचलित शासन द्वारा इस धरती पर लंबे समय तक शासन करो।"

Question 95

उपरिलिखितपरिच्छेदानुसारं निर्विकल्पकसमाधौ वर्णितेषु चतुर्षु विघ्नेषु चतुर्थः विघ्नः भवति -

  1. AOption (a)

    कषायः

  2. BOption (b)

    लयः

  3. COption (c)

    कषायरसः

  4. DOption (d)

    रसादस्वादः

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Correct answer

Answer: (d)D.

रसादस्वादः

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उत्तर- रसादस्वादः

"विदर्भ नाम का एक जनपद था, जिसमें भोजवंश का भूषण, धर्म का अवतार-सा, अत्यंत श्रेष्ठ, पुण्यात्मा पुण्यवर्मा नामक राजा था। वह पुण्य कर्मों के द्वारा पूरी आयु तक जीकर, पुनः अपने पुण्य से प्रजा के बीच बेहद सम्मानित हुआ। इसके बाद अनन्तवर्मा नामक राजा ने राज्य संभाला। वह सर्वगुण संपन्न था, परन्तु दंडनीति में उतना प्रवीण नहीं था। एक बार रहस्यमय तरीके से वसुरक्षितो नामक एक वृद्ध मंत्री, जो उसके पिता का अत्यंत सम्मानित था, उससे बातचीत करने लगा।

वृद्ध मंत्री बोला, "तात, आप सभी दृष्टियों से आत्मसम्पन्न हैं, आपकी बुद्धि परिपक्व है, और नृत्य-गीत, चित्रकलाओं तथा काव्य विस्तृत ज्ञान में उत्कृष्ट है। फिर भी आपने अर्थशास्त्र में शिक्षण प्रयास नहीं किया है, जिससे आपकी बुद्धि असँस्कारी प्रतीत होती है, जैसे अग्नि में न तपाए गए सोने का तेज। बिना नीति ज्ञान के राजा, चाहे वह कितना भी महान हो, अन्य लोगों द्वारा आसानी से प्रभावित हो सकता है। और वह ना तो कार्य को समझ सकता है और ना ही साधनों का सही विभाजन कर सकता है। शास्त्र एक दिव्य दृष्टि जैसा होता है, जो भूत, वर्तमान और भविष्य की जटिलताओं को साफ-साफ देख सकता है। इसीलिए बाह्य विद्याओं का मोह छोड़कर, अपने कुल की दंडनीति का ज्ञान प्राप्त करो और उसके अनुपालन से शक्ति संचय कर, अविचलित शासन द्वारा इस धरती पर लंबे समय तक शासन करो।"

अधोलिखितं परिच्छेदं पठित्वा तदाधारिताः प्रश्नाः समाधेयाः-

“विदर्भों नाम जनपदः तस्मिन्भोजवंशभूषणम्, अंशावतार इव धर्मस्य, अतिसत्त्वः, पुण्यश्लोकः पुण्यवर्मा नामासीत् । स पुण्येः कर्मभिः प्राप्य पुरुषायुषम्, पुनरपुण्येन प्रजानामगण्यतामरेषु । तदनन्तरमनन्तवर्मा न तदायतिरवनिमध्यतिष्ठत् । स सर्वगुणैः समृद्धोऽपि देवाद्दण्डनीत्यां नात्याद्यतोऽभूत् । तमेकदा रहसि वसुरक्षितो नाम मन्त्रिवृद्धः पितुरस्य बहुमतः प्रगल्भवागभाषत् । तात सर्वेवात्मसम्पदभिजनात्प्रभृत्यन्यूनेवात्रभवति लक्ष्यते । बुद्धिश्च निसर्गपट्ठी, कलासु, नृत्यगीतादिषु चित्रेषु च काव्यविस्तरेषु प्राप्तविस्तरा तवेतरेभ्यः प्रतिविशिष्यते । तथाप्यसावप्रतिपद्यात्मसंस्कारमर्थशास्त्रेषु, अनग्निसंशोधितेव हेमजातिर्नातिभाति बुद्धिः । बुद्धिहीनो हि भूभृदत्युच्छ्रितोऽपि परैरध्यारुह्यमाणमात्मानं न चेतयते । न च शक्तः साध्यं साधनं वा विभज्य वर्तितुम् । दिव्यं हि चक्षुर्भूतभवद्भविष्यत्सु व्यवहितविप्रकृष्टादिषु च विषयेषु शास्त्रं नामाप्रतिहतवृत्ति । अतो विहाय बाह्यविद्यास्वभिषङ्गमागमय दण्डनीतिं कुलविद्यां तदर्थानुष्ठानेन चावर्जितशक्तिसिद्धिरस्खलितशासनः शाधि चिरमुदधिमेखलामुर्वीम्” इति ।

Question 96

उपरिलिखितपरिच्छेदानुसारं दिव्यं चक्षुः किमस���ति ?

  1. AOption (a)

    कोषः

  2. BOption (b)

    शास्त्रम् 

  3. COption (c)

    प्रजानां योगक्षेमः

  4. DOption (d)

    सैन्यबलम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

शास्त्रम् 

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उत्तर- शास्त्रम् 

"विदर्भ नाम का एक जनपद था, जिसमें भोजवंश का भूषण, धर्म का अवतार-सा, अत्यंत श्रेष्ठ, पुण्यात्मा पुण्यवर्मा नामक राजा था। वह पुण्य कर्मों के द्वारा पूरी आयु तक जीकर, पुनः अपने पुण्य से प्रजा के बीच बेहद सम्मानित हुआ। इसके बाद अनन्तवर्मा नामक राजा ने राज्य संभाला। वह सर्वगुण संपन्न था, परन्तु दंडनीति में उतना प्रवीण नहीं था। एक बार रहस्यमय तरीके से वसुरक्षितो नामक एक वृद्ध मंत्री, जो उसके पिता का अत्यंत सम्मानित था, उससे बातचीत करने लगा।

वृद्ध मंत्री बोला, "तात, आप सभी दृष्टियों से आत्मसम्पन्न हैं, आपकी बुद्धि परिपक्व है, और नृत्य-गीत, चित्रकलाओं तथा काव्य विस्तृत ज्ञान में उत्कृष्ट है। फिर भी आपने अर्थशास्त्र में शिक्षण प्रयास नहीं किया है, जिससे आपकी बुद्धि असँस्कारी प्रतीत होती है, जैसे अग्नि में न तपाए गए सोने का तेज। बिना नीति ज्ञान के राजा, चाहे वह कितना भी महान हो, अन्य लोगों द्वारा आसानी से प्रभावित हो सकता है। और वह ना तो कार्य को समझ सकता है और ना ही साधनों का सही विभाजन कर सकता है। शास्त्र एक दिव्य दृष्टि जैसा होता है, जो भूत, वर्तमान और भविष्य की जटिलताओं को साफ-साफ देख सकता है। इसीलिए बाह्य विद्याओं का मोह छोड़कर, अपने कुल की दंडनीति का ज्ञान प्राप्त करो और उसके अनुपालन से शक्ति संचय कर, अविचलित शासन द्वारा इस धरती पर लंबे समय तक शासन करो।"

Question 97

उपरिलिखितपरिच्छेदे वर्णितः मन्त्री वसुरक्षितः केन सम्मानितः आसीत् ?

  1. AOption (a)

    अनन्तवर्मणा

  2. BOption (b)

    महामात्येन

  3. COption (c)

    पुण्यवर्मणा 

  4. DOption (d)

    मन्त्रिपरिषदा

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Answer: (a)A.

अनन्तवर्मणा

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उत्तर- अनन्तवर्मणा

"विदर्भ नाम का एक जनपद था, जिसमें भोजवंश का भूषण, धर्म का अवतार-सा, अत्यंत श्रेष्ठ, पुण्यात्मा पुण्यवर्मा नामक राजा था। वह पुण्य कर्मों के द्वारा पूरी आयु तक जीकर, पुनः अपने पुण्य से प्रजा के बीच बेहद सम्मानित हुआ। इसके बाद अनन्तवर्मा नामक राजा ने राज्य संभाला। वह सर्वगुण संपन्न था, परन्तु दंडनीति में उतना प्रवीण नहीं था। एक बार रहस्यमय तरीके से वसुरक्षितो नामक एक वृद्ध मंत्री, जो उसके पिता का अत्यंत सम्मानित था, उससे बातचीत करने लगा।

वृद्ध मंत्री बोला, "तात, आप सभी दृष्टियों से आत्मसम्पन्न हैं, आपकी बुद्धि परिपक्व है, और नृत्य-गीत, चित्रकलाओं तथा काव्य विस्तृत ज्ञान में उत्कृष्ट है। फिर भी आपने अर्थशास्त्र में शिक्षण प्रयास नहीं किया है, जिससे आपकी बुद्धि असँस्कारी प्रतीत होती है, जैसे अग्नि में न तपाए गए सोने का तेज। बिना नीति ज्ञान के राजा, चाहे वह कितना भी महान हो, अन्य लोगों द्वारा आसानी से प्रभावित हो सकता है। और वह ना तो कार्य को समझ सकता है और ना ही साधनों का सही विभाजन कर सकता है। शास्त्र एक दिव्य दृष्टि जैसा होता है, जो भूत, वर्तमान और भविष्य की जटिलताओं को साफ-साफ देख सकता है। इसीलिए बाह्य विद्याओं का मोह छोड़कर, अपने कुल की दंडनीति का ज्ञान प्राप्त करो और उसके अनुपालन से शक्ति संचय कर, अविचलित शासन द्वारा इस धरती पर लंबे समय तक शासन करो।"

Question 98

उपरिलिखितपरिच्छेदानुसारं पुण्यवर्मा कीदृशमायुः प्राप्तवान् ?

  1. AOption (a)

    पूर्णमायुः

  2. BOption (b)

    अल्पायुः

  3. COption (c)

    मध्यमायुः

  4. DOption (d)

    मध्यमोत्तमायुः

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Correct answer

Answer: (a)A.

पूर्णमायुः

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उत्तर- पूर्णमायुः

"विदर्भ नाम का एक जनपद था, जिसमें भोजवंश का भूषण, धर्म का अवतार-सा, अत्यंत श्रेष्ठ, पुण्यात्मा पुण्यवर्मा नामक राजा था। वह पुण्य कर्मों के द्वारा पूरी आयु तक जीकर, पुनः अपने पुण्य से प्रजा के बीच बेहद सम्मानित हुआ। इसके बाद अनन्तवर्मा नामक राजा ने राज्य संभाला। वह सर्वगुण संपन्न था, परन्तु दंडनीति में उतना प्रवीण नहीं था। एक बार रहस्यमय तरीके से वसुरक्षितो नामक एक वृद्ध मंत्री, जो उसके पिता का अत्यंत सम्मानित था, उससे बातचीत करने लगा।

वृद्ध मंत्री बोला, "तात, आप सभी दृष्टियों से आत्मसम्पन्न हैं, आपकी बुद्धि परिपक्व है, और नृत्य-गीत, चित्रकलाओं तथा काव्य विस्तृत ज्ञान में उत्कृष्ट है। फिर भी आपने अर्थशास्त्र में शिक्षण प्रयास नहीं किया है, जिससे आपकी बुद्धि असँस्कारी प्रतीत होती है, जैसे अग्नि में न तपाए गए सोने का तेज। बिना नीति ज्ञान के राजा, चाहे वह कितना भी महान हो, अन्य लोगों द्वारा आसानी से प्रभावित हो सकता है। और वह ना तो कार्य को समझ सकता है और ना ही साधनों का सही विभाजन कर सकता है। शास्त्र एक दिव्य दृष्टि जैसा होता है, जो भूत, वर्तमान और भविष्य की जटिलताओं को साफ-साफ देख सकता है। इसीलिए बाह्य विद्याओं का मोह छोड़कर, अपने कुल की दंडनीति का ज्ञान प्राप्त करो और उसके अनुपालन से शक्ति संचय कर, अविचलित शासन द्वारा इस धरती पर लंबे समय तक शासन करो।"

Question 99

उपरिलिखितपरिच्छेदानुसारं वसुरक्षितः कां विद्यामपहातुमुपदिशति ?

  1. AOption (a)

    कुलविद्याम् 

  2. BOption (b)

    नृत्यविद्याम्

  3. COption (c)

    दण्डनीतिविद्याम् 

  4. DOption (d)

    बाह्यविद्याम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

कुलविद्याम् 

Why this answer is correct

उत्तर- कुलविद्याम् 

"विदर्भ नाम का एक जनपद था, जिसमें भोजवंश ���ा भूषण, धर्म का अवतार-सा, अत्यंत श्रेष्ठ, पुण्यात्मा पुण्यवर्मा नामक राजा था। वह पुण्य कर्मों के द्वारा पूरी आयु तक जीकर, पुनः अपने पुण्य से प्रजा के बीच बेहद सम्मानित हुआ। इसके बाद अनन्तवर्मा नामक राजा ने राज्य संभाला। वह सर्वगुण संपन्न था, परन्तु दंडनीति में उतना प्रवीण नहीं था। एक बार रहस्यमय तरीके से वसुरक्षितो नामक एक वृद्ध मंत्री, जो उसके पिता का अत्यंत सम्मानित था, उससे बातचीत करने लगा।

वृद्ध मंत्री बोला, "तात, आप सभी दृष्टियों से आत्मसम्पन्न हैं, आपकी बुद्धि परिपक्व है, और नृत्य-गीत, चित्रकलाओं तथा काव्य विस्तृत ज्ञान में उत्कृष्ट है। फिर भी आपने अर्थशास्त्र में शिक्षण प्रयास नहीं किया है, जिससे आपकी बुद्धि असँस्कारी प्रतीत होती है, जैसे अग्नि में न तपाए गए सोने का तेज। बिना नीति ज्ञान के राजा, चाहे वह कितना भी महान हो, अन्य लोगों द्वारा आसानी से प्रभावित हो सकता है। और वह ना तो कार्य को समझ सकता है और ना ही साधनों का सही विभाजन कर सकता है। शास्त्र एक दिव्य दृष्टि जैसा होता है, जो भूत, वर्तमान और भविष्य की जटिलताओं को साफ-साफ देख सकता है। इसीलिए बाह्य विद्याओं का मोह छोड़कर, अपने कुल की दंडनीति का ज्ञान प्राप्त करो और उसके अनुपालन से शक्ति संचय कर, अविचलित शासन द्वारा इस धरती पर लंबे समय तक शासन करो।"

Question 100

उपरिलिखितपरिच्छेदे समुल्लिखितस्य “पुण्यश्लोकः” इति पदस्य अर्थो वर्तते -

  1. AOption (a)

    परमपटुः

  2. BOption (b)

    पवित्रकीर्तिः 

  3. COption (c)

    सत्यवादी 

  4. DOption (d)

    विनीतः

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Correct answer

Answer: (b)B.

पवित्रकीर्तिः 

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उत्तर- पवित्रकीर्तिः

परिलिखित परिच्छेद में उल्लिखित "पुण्यश्लोकः" शब्द का अर्थ "पवित्र कीर्ति" है। 

"विदर्भ नाम का एक जनपद था, जिसमें भोजवंश का भूषण, धर्म का अवतार-सा, अत्यंत श्रेष्ठ, पुण्यात्मा पुण्यवर्मा नामक राजा था। वह पुण्य कर्मों के द्वारा पूरी आयु तक जीकर, पुनः अपने पुण्य से प्रजा के बीच बेहद सम्मानित हुआ। इसके बाद अनन्तवर्मा नामक राजा ने राज्य संभाला। वह सर्वगुण संपन्न था, परन्तु दंडनीति में उतना प्रवीण नहीं था। एक बार रहस्यमय तरीके से वसुरक्षितो नामक एक वृद्ध मंत्री, जो उसके पिता का अत्यंत सम्मानित था, उससे बातचीत करने लगा।

वृद्ध मंत्री बोला, "तात, आप सभी दृष्टियों से आत्मसम्पन्न हैं, आपकी बुद्धि परिपक्व है, और नृत्य-गीत, चित्रकलाओं तथा काव्य विस्तृत ज्ञान में उत्कृष्ट है। फिर भी आपने अर्थशास्त्र में शिक्षण प्रयास नहीं किया है, जिससे आपकी बुद्धि असँस्कारी प्रतीत होती है, जैसे अग्नि में न तपाए गए सोने का तेज। बिना नीति ज्ञान के राजा, चाहे वह कितना भी महान हो, अन्य लोगों द्वारा आसानी से प्रभावित हो सकता है। और वह ना तो कार्य को समझ सकता है और ना ही साधनों का सही विभाजन कर सकता है। शास्त्र एक दिव्य दृष्टि जैसा होता है, जो भूत, वर्तमान और भविष्य की जटिलताओं को साफ-साफ देख सकता है। इसीलिए बाह्य विद्याओं का मोह छोड़कर, अपने कुल की दंडनीति का ज्ञान प्राप्त करो और उसके अनुपालन से शक्ति संचय कर, अविचलित शासन द्वारा इस धरती पर लंबे समय तक शासन करो।"

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