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UGC NET Paper 2: Sanskrit 3rd Dec 2019 Shift 1 (Previous Year Paper)

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Question 1

सायणभाष्यर्ग्वेदसंहितां सम्पाद्य तस्याः प्रकाशनकार्यं प्रथमं केन वैदेशिकेन कृतमस्ति?

  1. AOption (a)

    मैक्समूलरेण

  2. BOption (b)

    वेवरेण

  3. COption (c)

    जैकोवी महोदयेन

  4. DOption (d)

    विण्टरनित्समहोदयेन

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Correct answer

Answer: (a)A.

मैक्समूलरेण

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प्रश्नानुवाद- सायण भाष्य सहित ऋग्वेद संहिता का संपादन करके उसका प्रकाशन कार्य किस विदेशी विद्वान के द्वारा किया गया?

स्पष्टीकरण- सायण भाष्य सहित ऋग्वेद संहिता का संपादन करके उसका प्रकाशन कार्य विदेशी विद्वान मैक्समूलर के द्वारा किया गया।

पाश्चात्य संस्कृत विद्वानों में जर्मन विद्वान फ्रेड्रिक मैक्समूलर (1823-1900 ई०) सबसे प्रमुख है। ये परम्परावादी भाष्यकारों की कोटि में आते हैं। यतोहि उन्होंने वेद मंत्रों की व्याख्या में भाषाशास्त्र के साथ-साथ भारतीय परम्परा को भी ध्यान रखा है। इनके विविध कार्यों में दो अमर कृतियां हैं -

  1. सायणभाष्य के साथ ऋग्वेद का 6 खण्डो में सर्वप्रथम प्रकाशन।
  2. पचास भागों में पवित्र प्राच्य गंथमाला (Sacred Books of the East) के अंतर्गत प्राच्य धर्मों के समस्त मौलिक साहित्य के अंग्रेजी अनुवाद का सम्पादन प्रकाशन।

Key Points

  • मैक्समूलर द्वारा सम्पादित सायण-भाष्य आज भी ग्रन्थ-सम्पदान या पाठ-संशोधन के क्षेत्र में मानदण्ड माना जाता है।
  • इस संस्करण की लम्बी भूमिका उनके पाण्डित्य और परिश्रम को प्रकट करती है।
  • सायण के प्रति की श्रद्धा इन शब्दों में प्रकट हुई है- “सायण के द्वारा निर्दिष्ट व्याख्या-विधि हमें नहीं मिलती तो इस वेद के दुरूह अर्थ की दिशा में हम एक पग भी नहीं दे सकते थे”।
  • सायण के भाष्यों को वे ‘अन्धो की छड़ी’ मानते है। इनके अतिरिक्त इन्होंने वेदों का काल निर्धारण जैसे महत्वपूर्ण कार्य भी किया है।
  • मैक्समूलर ने अपने ग्रंथ “A History of Ancient Sanskrit Literature’’ में वेदों के काल-निर्णय का प्रयास किया है।
  • उनके अनुसार सर्वप्राचीन ऋग्वेद की रचना 1200 ई० पूर्व में हुई होगी। वेदों के काल-निर्णय का यह प्रथम प्रयास था जो कि भाषाशास्त्र के आधार पर था।

Question 2

यजुर्वेदसंहितायां प्राधान्येन निरूपणं प्राप्यते-

  1. AOption (a)

    संवादस्य

  2. BOption (b)

    यज्ञानाम्

  3. COption (c)

    गानानाम्

  4. DOption (d)

    दार्शनिकविचाराणाम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

यज्ञानाम्

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प्रश्नानुवाद- यजुर्वेद संहिता में प्रधानरूप से निरूपण प्राप्त होता है-

स्पष्टीकरण- यजुर्वेद संहिता में प्रधान रूप से यज्ञ का निरूपण प्राप्त होता है। 

यज्ञ के साधक मंत्र ‘यजुष्’ कहलाते हैं। इनसे सम्बन्धित वेद का नाम यजुर्वेद है। ‘यजुष्’ शब्द की निम्न व्युत्पतियाँ हैं-

  1. यजुर्यजतेः- यज्ञ से सम्बद्ध मंत्र यजुष्, कहे जाते हैं।
  2. इज्येते अनेन इति यजुः- जिन मंत्रों से यज्ञ किया जाता है, उन्हे यजुष् कहते है।
  3. अनियताक्षरावसानो यजुः- जिन मंत्रों में वर्णों की संख्या सीमित नहीं है, वे यजुष् कहलातेहै। अर्थात् यजुष् गद्यात्मक मंत्र कहलातें हैं।
  4. शेषे यजुः शब्द:- अर्थात् पद्यबन्ध और गान से रहित मंत्रात्मक रचना को यजु कहते हैं।

यजुर्वेद के ऋत्विक अध्वर्यु कहते है। इस वेद के दो सम्प्रदाय हैं- ब्रह्म और आदित्य। ब्रह्म का वेद कृष्ण यजुर्वेद है तथा आदित्य सम्प्रदाय का वेद शुक्ल यजुर्वेद है। शुक्ल यजुर्वेद की दो शाखाएँ हैं- काण्व तथा माध्यनदिन। कृष्ण यजुर्वेद की चार शाखाएँ प्राप्त होती है - तैत्तिरीय, मैत्रायणी, कठ, कपिष्ठल। शुक्ल यजुर्वेद का ब्राह्मण शथपथब्राह्मण, आरण्यक बृहदारण्यक तथा उपनिषद इशोपनिषद कहलाते हैं। कृष्ण यजुर्वेद की मुख्य शाखा तैत्तिरीय शाखा है। यह सर्वांगपूर्ण शाखा है। यतोहि इसके ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद, कल्प सूत्र तथा वेदांग भी प्राप्त होते है।

Question 3

ऋग्वेदस्य वरुणसूक्ते [1.25] कियन्तो मन्त्राः सन्ति?

  1. AOption (a)

    दश

  2. BOption (b)

    द्वादश 

  3. COption (c)

    एकविंशतिः

  4. DOption (d)

    द्वाविंशतिः

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Correct answer

Answer: (c)C.

एकविंशतिः

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प्रश्नानुवाद- ऋग्वेद के वरुण सूक्त (1.25) में कितने मंत्र हैं?

स्पष्टीकरण- ऋग्वेद के सूक्त (1.25) में 21 मंत्र हैं। ये सभी मंत्र गायत्री छंद में निबद्ध है।

वरुण सूक्त तथा उसका महत्त्व-

  • इस सूक्त के ऋषि अजीगर्त शुनः शेप है तथा देवता स्वयं वरुण है।
  • वैदिक युग के सबसे प्रधान देवताओं में से एक वरुण है। वरुण आकाश के देवता है।
  • वरुण शब्द वर धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ होता है- ढक लेना।
  • आकाश को वरुण कहा जाता है क्योंकि यह समस्त पृथ्वी को आच्छादित कर देता है।
  • वरुण के सम्बन्ध में ऋग्वेद में कहा गया है कि सूर्य वरुण के चक्षु हैं, आकाश उसके वस्त्र है तथा तूफान उसके निःश्वास है।
  • नदियाँ उसकी आज्ञा से बहती है। सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र,वरुण के भय से कार्य करते है।
  • मित्र को वरुण का सखा कहा गया है।
  • वरुण के पास रथ है जिस पर वे मित्र के साथ विचरण करते है। वरुण का आवास स्वर्णित है।
  • वरुण को ऋग्वेद में शासक की संज्ञा दी गयी है। इसे बहुधा राजा या सम्राट कहकर भी सम्बोधित किया गया है।
  • वरुण के प्रभाव से ही रात्रि में चंद्रमा चमकते है। वरुण को सदाचार के देवता भी कहा गया है।
  • यह ऋत का रक्षक है। ऋत से तात्पर्य जगत् की व्यवस्था से है। वरुण को नैतिक नियमों का संरक्षक भी कहा गया है। वे मनुष्यों के कर्मों का मूल्यांकन करते है।

Question 4

ऐतेरेयब्राह्मणग्रन्थानुसारेण शुनःशेपस्य पितुर्नाम् किमासीत्?

  1. AOption (a)

    कुक्षीवान्

  2. BOption (b)

    ऐतरेयः

  3. COption (c)

    अजीगर्तः

  4. DOption (d)

    महीदासः

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Correct answer

Answer: (c)C.

अजीगर्तः

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प्रश्नानुवाद- ऐतरेय ब्राह्मण ग्रंथ के अनुसार शुनः शेप के पिता कौन थे?

स्पष्टीकरण- ऐतरेय ब्राह्मण ग्रंथ के अनुसार शुनः शेप के पिता का नाम 'अजीगर्त' था।

ऐतरेय ब्राह्मण- 

ऐतरेय ब्राह्मण ऋग्वेद की शाकल शाखा से सम्बद्ध ब्राह्मण है। इसमें 8 पंचिकाएँ, 40 अध्याय तधा 285 कण्डिकाएँ है। इस पर सायण भाष्य प्राप्त होता है।

शुनः शेप कथा के पात्र

  • राजा हरिश्चंद्र
  • रोहित - राजा हरिश्चंद्र का पुत्र
  • शुनः शेप
  • अजीगर्त - शुनः शेप के पिता
  • शुन:पुच्छ, शुन:लांगूल - शुनः शेप के भाई
  • वरुण देवता

ऐतरेय ब्राह्मण ग्रंथ में स्थित कथा-

इसका मुख्य सम्बन्ध सोमयाग से है इसके 33 वें अध्याय में शुनः शेप आख्यान प्राप्त होता है। इस आख्यान में पुत्र और भ्रमण का माहात्म्य दिखाया गया है। इस प्रसंग में ‘चरैवेति’ का उपदेश प्राप्त होता है।

इस आख्यान को हरिचन्द्रोपाख्यान के नाम से भी जाना जाता है। राजा हरिश्चंद्र अपनी सौ रानियों के बावजूद निस्संतान थे। उसने वरुण देवता की उपासना की कि अगर मुझे पुत्र प्राप्ति हो तो पहला पुत्र आपको समर्पित करूंगा। उसे एक पुत्र की प्राप्ति हो गई, जिसका नाम रोहित रखा गया। लेकिन राजा ने जैसे ही पुत्र को सदेह देखा, उसने पुत्र समर्पण का विचार त्याग दिया। वह किसी न किसी बहाने से रोहित को वरुण देवता को सौंपने की बात टालता रहा। पिता कहीं उसे सचमुच वरुण देव को नहीं अर्पित कर दें, इस डर से रोहित जंगल में भाग गया और हरिश्चन्द्र ने अपना प्रण पूरा नहीं किया, इसलिए वरुण ने उसे शाप दे दिया और वह बीमार हो गया। 

भाग्यवश जंगल में इधर-उधर घूमते रोहित को एक गरीब भूखा ब्राह्मण अजीगर्त मिला। उससे रोहित ने अपनी कहानी कही। अजीगर्त के तीन बेटे थे - शुन:पुच्छ, शुन:लांगूल और शुन:शेप। शुन:शेप मंझला पुत्र था और बचपन से ही बहुत समझदार और विवेकवान था। अजीगर्त ने लालच में आकर रोहित से कहा कि सौ गायों के बदले वह अपने एक पुत्र को बेचने को तैयार है। उस पुत्र को वह अपने बदले वरुण देवता को सौंप कर अपनी जान बचा सकता है। यज्ञ में नर बलि की तैयारी शुरू हुई, चार पुरोहितों को बुलाया गया। अब शुन:शेप को बलि स्तंभ से बांधना था। लेकिन इसके लिए उन चारों में से कोई तैयार नहीं हुआ, क्योंकि शुन:शेप ब्राह्मण था। तब अजीगर्त और सौ गायों के बदले खुद ही अपने बच्चे को यज्ञ स्तंभ से बांधने को तैयार हो गया। इसके बाद शुन:शेप को बलि देने की बारी आई। लेकिन पुरोहितों ने फिर मना कर दिया। ब्राह्मण की हत्या कौन करे? तब अजीगर्त और एक सौ गायों के बदले अपने बेटे को काटने के लिए भी तैयार हो गया। जब शुन:शेप ने देखा कि अब मुझे बचाने वाला कोई नहीं है, तो उसने ऊषा देवी का स्तवन शुरू किया। प्रत्येक ऋचा के साथ शुन:शेप का एक-एक बंधन टूटता गया और अंतिम ऋचा के साथ न केवल शुन:शेप मुक्त हो गया, बल्कि राजा हरिश्चंद भी श्राप मुक्त हो गए।

इसी के साथ बालक शुन:शेप, ऋषि शुन:शेप बन गया, क्योंकि वह उसके लिए रूपांतरण की घड़ी थी। यह आख्यान रामायण के बाल काण्ड में भी प्राप्त होता है।

Question 5

'इन्द्रियार्थयोस्तु यः सन्निकर्षः साक्षात्कारिप्रमाहेतुः?' स कतिविधः?

  1. AOption (a)

    सप्तविधः

  2. BOption (b)

    चतुर्विधः

  3. COption (c)

    षड्विधः

  4. DOption (d)

    पञ्चविधः

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Correct answer

Answer: (c)C.

षड्विधः

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प्रश्नानुवाद- साक्षात्कारी प्रमा का हेतु रूप जो इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष है, वह कितने प्रकार का है?

स्पष्टीकरण- साक्षात्कारी प्रमा का हेतु रूप जो इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष है, वह छह प्रकार का है। इनका निरूपण निम्नवत् है- 

  1. संयोग- चक्षुषा घटविषयं ज्ञानं जन्यते तदा चक्षुरिन्द्रियं घटो अर्थः। अनयोः सन्निकर्षः संयोग एव,अयुतसिद्धभावात् ।  अर्थात् चक्षुरिन्द्रिय से ‘घट’ (अर्थ) का प्रत्यक्ष होने से ‘संयोग सन्निकर्ष’ होता है। क्योंकि ये दोनों ‘अयुतसिद्ध’ नहीं है। इसी प्रकार अन्तरिन्द्रिय ‘मन’ से जब आत्मविषयक ज्ञान होता है तो ‘मन’ ‘इन्द्रिय’ और ‘आत्मा’ अर्थ है इन दोनों का सम्बन्ध ‘संयोग सन्निकर्ष’ ही कहा जाता है।
  2. संयुक्तसमवाय- यदा चक्षुरादिना घटगतरूपादिकं गृह्यते, घटे श्यामः रूपस्तीति, तदा  चक्षुरिन्द्रियं, घटरूपमर्थः, अनयोः सन्निकर्षः संयुक्त समवाय एव।  अर्थात् चक्षुरिंद्रिय से घटरूप का प्रत्यक्ष ग्रहण होने पर ‘संयुक्तसमवाय’ सन्निकर्ष होता है। उसी प्रकार मन से आत्मा में समवेत सुख दुःखादि का ग्रहण होने पर भी संयुक्तसमवाय सन्निकर्ष होता है।
  3. संयुक्तसंवेतसमवाय- चक्षुषा घटरूपसमवेतं रूपत्वादि- सामान्यं गृह्यते, तदा चक्षुरिन्द्रियं, रूपत्वादिसामान्य, अनयो सन्निकर्षः संयुक्तसमवेतसमवाय एव। 

जब चक्षुरिन्द्रिय  से ‘घटरूप’ में समवेत ‘रूपत्व’ आदि जाति का ग्रहण होता है। तो इनका सन्निकर्ष  संयुक्तसंवेतसमवाय कहलाता है। उसी प्रकार मन से आत्मा में समवेत (समवाय सम्बन्ध में रहने वाले) सुख दुःखादि की जाति का ग्रहण होने पर ‘संयुक्तसंवेतसमवाय’ कहलाता है। 4. समवाय-  यदा श्रोत्ररिन्द्रियेण शब्दो गृह्यते तदा श्रोत्ररिन्द्रियं, शब्दो अर्थः, अनयोः सन्निकर्षः समवाय एव। कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नं नभः श्रोत्रम्। अर्थात् जब श्रोत्ररिन्द्रियों से शब्द का ग्रहण होता है। तब ‘श्रोत्र’ इन्द्रिय है तथा शब्द अर्थ है तब उन दोनों का सन्निकर्ष सम्बन्ध ‘समवाय’ ही होता है। कर्णविवर से अवच्छिन्न ‘आकाश’ ही श्रोत्र है और शब्द आकाश का गुण है। यतोहि गुण तथा गुणी का समवाय सम्बन्ध होता है। 5. समवेतसमवाय- समवेतसमवाय- यदा पुनः शब्दसमवेत शब्दत्वादिकं सामान्यं  श्रोत्ररिन्द्रियेण गृह्यते, तदा श्रोत्ररिन्द्रियं शब्दत्वादिमान्यमर्थः। अनयोः सन्निकर्षः समवेत समवाय एव। श्रोत्रसमवेते शब्दे शब्दस्य समवायात्। अर्थात्  जब शब्द में समवेत शब्दत्व आदि जाति का श्रोत्र इन्द्रिय से ग्रहण किया जाता है। तब श्रोत्र इन्द्रिय है, शब्दत्व आदि जाति अर्थ विषय है। इन दोनों का सन्निकर्ष समवेत समवाय कहलाता है। क्योंकि श्रोत्र में समवेत और शब्द में समवाय सम्बन्ध होता है। 6. विशेष्यविशेषणभाव- यदा चक्षुषा संयुक्ते भूतले घटाभावो गृह्यते इह भूतले घटो नास्ति इति तदा विशेष्यविशेषणभावः सम्बन्धः। अर्थात् जब चक्षु से संयुक्त भूमि पर ‘यहाँ भूतल पर घट नहीं है - इस प्रकार घट के आभाव का ग्रहण होता है तब विशेष्य-विशेषण भाव सन्निकर्ष हुआ करता है।

Question 6

ऋग्वेदसंहिताया वैशिष्ट्यमस्ति-

  1. AOption (a)

    यज्ञवर्णनम्

  2. BOption (b)

    देवस्तुतिः

  3. COption (c)

    स्मार्तकार्यम्

  4. DOption (d)

    वास्तुनिर्देशः

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Correct answer

Answer: (b)B.

देवस्तुतिः

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प्रश्नानुवाद- ऋग्वेद संहिता का वैशिष्ट्य है-

स्पष्टीकरण-

ऋग्वेद संहिता एवं वैशिष्ट्य-

  • चारों वेदों में ऋग्वेद सबसे प्राचीन माना गया है। महत्त्व की दृष्टि से ‘ऋग्वेद’ का नाम प्रथम लिया जाता है।
  • ऋक् का अर्थ है- स्तुतिपरक मंत्र। दूसरें शब्दों में  ‘ऋच्यते स्तूयते अनया इति ऋक्’’ अर्थात् जिन मंत्रों के द्वारा देवों की स्तुति की जाती है, उन्हें ऋक् या ऋच् कहते हैं।
  • ऋग्वेद में विभिन्न देवों की स्तुति वाले मंत्र हैं, अतः इसे ऋग्वेद कहते हैं। ऐसी स्तुति वाली ऋचाओं का पारिभाषिक नाम ‘शस्त्र है।
  • यज्ञ में चारों वेदों के प्रतिनिधि के रूप में चार ऋत्विज् होते हैं। जो यज्ञों में देवताओं का आवाहन करते है। ऋग्वेद के ऋत्विज् ‘होता’ है।
  • पतंजलि के महाभाष्य में ऋग्वेद की 21 शाखाओं का उल्लेख किया गया है। किन्तु चरनव्यूह शौनक के अनुसार ऋग्वेद की पाँच मुख्य शाखाएँ हैं- शाकल, बाष्कल, आश्वलायन, शांखायन, माण्डूकायन।
  • ऋग्वेद का विभाजन 2 प्रकार से किया गया हैं- ऐतिहासिक विभाजन तथा पाठपरक विभाजन।
  • ऐतिहासिक विभाजन को मण्डल-क्रम तथा पाठपरक विभाजन को अष्टक-क्रम विभाजन भी कहते हैं। मण्डल-क्रम के अनुसार ऋग्वेद में 10 मण्डल, 1028 सूक्त तथा 10580 मन्त्र हैं। अष्टक-क्रम के अनुसार ऋग्वेद में 8 अष्टक तथा 64 अध्याय हैं।
  • ऋग्वेद के दो ब्राह्मण प्राप्त होतें है- ऐतरेय तथा कौषीतकि। इस वेद के दो आरण्यक प्राप्त होतें है- ऐतरेय तथा शांखायन। ऋग्वेद के तीन मुख्य उपनिषद हैं- ऐतरेयोपनिषद, कौषीतक्युपनिषद तथा बाष्कलोपनिषद।

 

अत: ऋग्वेद संहिता का वैशिष्ट्य है- देवस्तुति।

Question 7

पुरुरवा-उर्वशीसंवादसूक्ते कियन्तो मन्त्राः सन्ति?

  1. AOption (a)

    एकादश

  2. BOption (b)

    पञ्चदश

  3. COption (c)

    सप्तदश

  4. DOption (d)

    अष्टादश

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Correct answer

Answer: (d)D.

अष्टादश

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प्रश्नानुवाद- पुरुरवा- उर्वशी संवाद सूक्त में कितने मंत्र हैं?

स्पष्टीकरण- पुरुरवा- उर्वशी संवाद सूक्त में 18 मंत्र हैं। 

पुरुरवा- उर्वशी संवाद सूक्त-

  • ऋग्वेद में कई संवाद सूक्त प्राप्त होते हैं। इनमें से प्रमुख है- पुरुरवा-उर्वशी संवाद सूक्त।
  • यह ऋग्वेद के दशम मण्डल के 95 वाँ सूक्त है। इसमें त्रिष्टुप् छन्द है।
  • इस संवाद में जब स्वयं पुरुरवा-उर्वशी ऋषि तथा देवता है। पुरुरवा मानव जाति का राजा है तथा उर्वशी अप्सरा है।
  • उर्वशी चार वर्षों तक पुरुरवा के साथ पत्नी बन कर पृथ्वी पर रही। गर्भवती होने पर वह वह राजा को छोड़कर चली गई। राजा उसे ढूँढते हुए एक सरोवर पर पहुँचें जहा उर्वशी अन्य अप्सराओं के साथ क्रीड़ा कर रही थी। राजा उसे प्रेमपूर्ण बातों से मनाते है, किन्तु उर्वशी उनकी सभी बातों को ठुकराती जाती है। वार्तालाप इतना मार्मिक है कि इस आख्यान को अनेक परवर्ती ग्रंथों में प्रस्तुत किया गया है।
  • कालिदास की ‘विक्रमोर्वशीयम्’ इसका अनन्य उदाहरण है। यह पाँच अंको का त्रोटक (रूपक) है। इन संवाद सूक्तों का अन्य महत्त्व है कि इनसे ही नाटकों की उत्पत्ति मानी जाती है।

Question 8

शुक्लयजुर्वेदसंहितायाः कतमोऽध्याय ईशोपनिषद्

  1. AOption (a)

    विंशतितमः

  2. BOption (b)

    षोडशतमः

  3. COption (c)

    चत्वारिंशत्तमः

  4. DOption (d)

    एकोनविंशतितमः

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Correct answer

Answer: (c)C.

चत्वारिंशत्तमः

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प्रश्नानुवाद- शुक्ल यजुर्वेद संहिता के कौन से अध्याय में ईशोपनिषद् है?

स्पष्टीकरण- शुक्ल यजुर्वेद संहिता के 40 वे (चत्वारिंशत्) अध्याय में ईशोपनिषद् है। 

शुक्ल यजुर्वेद-

  • यजुर्वेद के दो सम्प्रदाय हैं- ब्रह्म और आदित्य। ब्रह्म का वेद कृष्ण यजुर्वेद है तथा आदित्य सम्प्रदाय का वेद शुक्ल यजुर्वेद है।
  • शुक्ल यजुर्वेद की दो शाखाएँ हैं - काण्व तथा माध्यनदिन।
  • शुक्ल यजुर्वेद का उपनिषद ‘इशोपनिषद’ कहलाता है। इसे ‘इशावास्योपनिषद’, ‘मन्त्रोपनिषद’ तथा ‘संहितोपनिषद’ भी कहते है। यह सबसे प्राचीन उपनिषद है। इसमें कुल 18 मन्त्र है।
  • इस उपनिषद् में सम्पूर्ण वेदान्त दर्शन का सार प्राप्त होता है। ईश्वर के सर्वनिर्माता होने की बात है।
  • इसमें ‘असुर्या’ नामक लोक की बात आती है। असुर्या का अर्थ है कि सूर्य से रहित लोक। वह लोक जहाँ सूर्य नहीं पहुँच पाता, घने, काले अंधकार से भरा हुआ अन्चतम लोक, अर्थात् गर्भलोक।
  • इसमें कहा गया है कि जो लोग आत्म को, अपने को नहीं पहचानते हैं  उन्हें मृत्यु के पश्चात् उसी अन्धतम लोक यानि कि असुर्या नामक लोक में जाना पड़ता है।
  • इस प्रकार इस उपनिषद् में एक ओर ईश्वर को सर्वनिर्माता मानकर स्वयं को निमित्त मात्र बनकर जीवन जीने का इशारा करता है, जो दूसरी ओर आत्म को न भूलने की इंगित करता है।
  • इसके बाद आत्म को निरुपित करने का तथ्य आता है कि ‘वह’ अचल है साथ ही मन से भी ज्यादा तीव्रगामी है।
  • यह आत्म (ब्रह्म) सभी इंद्रियों से तेज भागने वाला है। ‘आत्म’ के ब्रह्म के गुणों को बताने के क्रम में यहाँ यह बताया गया है कि वह एक साथ, एक ही समय में भ्रमणशील है, साथ ही अभ्रमणशील भी। वह पास है और दूर भी। यहाँ उसे कई विशेंषणों द्वारा इंगित किया गया है कि वह सर्वव्यापी, अशरीरी, सर्वज्ञ, स्वजन्मा और मन का शासक है।
  • इस उपनिषद् में विद्या एवं अविद्या दोनों की बात की गई है। विद्या एवं अविद्या को एक साथ जान लेने वाला व्यक्ति अविद्या को छोड़कर विद्या द्वारा अनुष्ठानित होकर मृत्यु को पार कर लेता है, वह मृत्यु को जीतकर अमृतत्व का उपभोग करता है।
  • इस उपनिषद् के अंतिम मन्त्रों में ब्रह्म के मुख को सुवर्ण पात्र से ढँके होने की बात कही गयी है। सुवर्णपात्र से ढँके हुए उस आत्म के मुख को अनावृत कर दिया जाए ताकि उपासक समझ सके, महसूस कर सके वह स्वयं ही ब्रह्मरूप है।

Question 9

साङ्ख्यदर्शनानुसारं पञ्चविंशतितत्त्वेषु गणना नास्ति-

  1. AOption (a)

    रसस्य

  2. BOption (b)

    पुद्गलस्य

  3. COption (c)

    श्रोत्रस्य

  4. DOption (d)

    जलस्य

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Correct answer

Answer: (b)B.

पुद्गलस्य

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- सांख्य दर्शन के अनुसार 25 तत्वों में गणना नहीं होती है-

स्पष्टीकरण- सांख्य दर्शन के अनुसार 25 तत्वों में  पुद्गल की  गणना नहीं होती है।

सांख्य दर्शन भारतीय दर्शन का सबसे प्राचीन सम्प्रदाय है। महर्षि कपिल इसके प्रवर्तक आचार्य है। जिनका प्रमुख ग्रंथ सांख्यसूत्र है। इन सूत्रों पर विज्ञानभिक्षु का भाष्य प्राप्त होता है, जिसका नाम ‘सांख्यप्रवचन’ है। सांख्यदर्शन का प्रमुख प्रकरण ग्रंथ ‘संख्याकारिका’ है। इसके रचनाकार ईश्वर कृष्ण है। इस प्रकरण ग्रन्थ पर वाचस्पति मिश्र की ‘सांख्यतत्वकौमुदी’ नामक टीका प्राप्त होती है। इस दर्शन में तत्त्वों की  स्पष्ट गणना की गई है, अतः इस दर्शन का नाम सांख्यदर्शन पड़ा। इसमें 25 तत्त्वों को स्वीकार कीयया गया जिनका निरूपण इस प्रकार है-

  • पुरुष (आत्मा)
  • प्रकृति
  • अंतःकरण (3)-  मन, बुद्धि, अहंकार
  • ज्ञानेन्द्रियाँ (5)- नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कर्ण
  • कर्मेन्द्रियाँ (5)- पाद, हस्त, उपस्थ, पायु, वाक्
  • तन्मात्रायें (5)- गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द
  • महाभूत (5)- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आका श

इन 25 तत्वों में मुख्य रूप से दो प्रमुख तत्व हैं- पुरुष तथा प्रकृति।

अतः यह दर्शन द्वैतवादी कहा जाता है। यह दर्शन ईश्वर की नहीं मनाता है। यह निरीश्वरवादी दर्शन भी कहलाता है। इन 25 तत्वों का ज्ञान तीन प्रमाणों से माना जाता है- प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शब्द। ‘सत्कार्यवाद’ इस दर्शन का प्रमुख सिद्धांत है।

Question 10

यदङ्ग दाशुषे त्वमग्ने भद्रं करिष्यसि।

तवेत्तत्सत्यमङ्गिरः।

अत्र 'अङ्ग' इति कस्मिन्नर्थे प्रयुक्तोऽयं शब्दः? सायणदिशा निर्दिश्यताम्-

  1. AOption (a)

    अभिमुखीकरणार्थे

  2. BOption (b)

    शरीरार्थे

  3. COption (c)

    अवयवार्थे

  4. DOption (d)

    विषयार्थे

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Correct answer

Answer: (a)A.

अभिमुखीकरणार्थे

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- यहाँ अङ्ग शब्द किस अर्थ में प्रयुक्त है? सायण के अनुआसर निर्दिष्ट करें। 

स्पष्टीकरण- सायण के अनुसार यहाँ अङ्ग का तात्पर्य अभिमुखीकरण  से है। 

यह मंत्र ऋग्वेद के प्रथम सूक्त अग्नि से है। इसमें 9 मंत्र हैं। ये सभी मंत्र गायत्री छंद में निबद्ध है। इस सूक्त के ऋषि मधुच्छन्दा है तथा देवता स्वयं अग्नि है। 

मन्त्र- यदग्ङ दाशुषे त्वमग्ने भद्रं करिष्यसि। तवेत्तत् सत्यमग्ङिर: ॥

मंत्रार्थ- है अग्ने, जो तुम हवि का दान करने वाले यजमान के लिए धन, गृह, प्रजा, पथु आदि कल्याण करने वाले पदार्थ प्रदान करोगे, वे सब पदार्थ तुम्हारे ही हैं। हे अग्नि देव यह बात सत्य ही है। इसमें कोई संशय नहीं है।

अग्नि देवता- 

  • इंद्र के बाद वैदिक देवताओं में अग्नि का स्थान है।
  • ऋग्वेद में अग्नि के लिए 200 सूक्त समर्पित हैं।
  • अग्नि उस देवता का नाम है जिसका प्रयोग मनुष्य यज्ञ के सन्दर्भ में करता है।
  • वैदिक धर्म में अग्नि का प्रयोग यज्ञ के देवता के रूप में हुआ है। अग्नि, यज्ञ के समय, देवताओं को बुलाते हैं, उन्हें बिठाते है तथा यज्ञ के हविष को देवताओं को ग्रहण करने के लिए प्रार्थना करते हैं।
  • उनके प्रयासों के फलस्वरूप देवता- गण यज्ञ- भोग कर  पाते हैं।
  • उपरोक्त विवेचन से यह प्रमाणित होता है कि मनुष्य यज्ञ करते समय जिन विषयों को अर्पित करता है उन्हें अग्नि के द्वारा देवताओं तक पहुँचाया जाता है।
  • इस प्रकार अग्नि को मानव और देवताओं के बीच एक कड़ी के रूप में स्वीकारा गया है। इसलिए अग्नि को मानव को पुरोहित कहा गया है।
  • अग्नि को 'धूमकेतु' कहा गया  है क्योंकि धूम उनका आवरण है। अग्नि की व्याख्या ऋग्वेद में मानव की तरह हुई है। अग्नि के तीन सर, तीन जिव्हा हैं। अग्नि के दाढ़ी की बात की गयी है जिसका रंग भूरा है।
  • अग्नि  दिन में तीन बार भोजन करते हैं। अग्नि का मूल्यवान भोजन घी है। कभी-कभी वे जंगल को भी भस्म कर जाते हैं। अग्नि को सूर्य के तुल्य माना गया है। वे सूर्य की तरह चमकते है तथा अधंकार का नाश करते हैं, और प्रकाश फैलाते हैं।
  • ऋग्वेद में कहा गया है ''वे सूर्य की भाँति चमकते हैं। अग्नि में सूर्य की तरह सुंदरता है। एक ओर जहाँ सूर्य से मेल खातें है वहाँ दूसरी ओर इंद्र से पृथकता ग्रहण करते हैं। इन्द्र से युद्ध के लिए प्रार्थना होती है जबकि अग्नि से घरेलू सुख-चैन के लिए प्रार्थना की जाती है। इन्द्र युद्ध के देव हैं जबकि अग्नि घरेलू समृद्धि के देव हैं।

Question 11

आर्हतदर्शनानुसारं 'सप्तभङ्गी' नयः कुत्र न स्वीकृतोऽस्ति?

  1. AOption (a)

    स्यादस्ति च नास्ति च

  2. BOption (b)

    स्यादस्ति च नास्ति चावक्तव्यः

  3. COption (c)

    स्यादस्ति च वक्तव्यः

  4. DOption (d)

    स्यान्नास्ति चावक्तव्यः 

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Correct answer

Answer: (c)C.

स्यादस्ति च वक्तव्यः

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प्रश्नानुवाद- आर्हत दर्शन के अनुसार ‘सप्तभङ्गी' नय कहाँ स्वीकार नहीं किया गया है?

स्पष्टीकरण- आर्हत दर्शन के अनुसार ‘सप्तभङ्गी' नय ‘स्यादस्ति च वक्तव्यः’ इस कथन में स्वीकार नहीं किया गया है।

जैन दर्शन-

  • जैन दर्शन भारत के प्राचीन दर्शनों में से एक है। वेदों को प्रमाण नही मानने के कारण यह नास्तिक दर्शनों की श्रेणी में आता है।
  • इसके प्रवर्तक ऋषभदेव है। इस दर्शन के 24 तीर्थंकर महावीर को भी इस दर्शन के प्रचार-प्रसार का श्रेय जाता है।
  • यह दर्शन ईश्वर भी नहीं मानता है। ‘आर्हत’ इस दर्शन का पर नाम है।
  • जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक वस्तु के अनन्त धर्म है। मनुष्य एक समय में किसी वस्तु के एक ही धर्म का ज्ञान प्राप्त कर सकता है।
  • साधारण मनुष्यों का ज्ञान अपूर्ण एवं आंशिक होता है। वस्तु के इस आंशिक ज्ञान को ‘नय’ कहा जाता है। इनसे सापेक्ष सत्य की प्राप्ति होती है। इसे सिद्धांत रूप में ‘स्यात्वाद्’ कहते है।
  • इस सिद्धांत के अनुसार सात प्रकार के नयों के द्वारा किसी वस्तु का ज्ञान प्राप्त होता है। इन्हें सम्मिलित रूप से ‘सप्तभंगीनय’ कहलाते है, जो निम्नलिखित है-
  1. स्यादस्ति- शायद है।
  2. स्यान्नास्ति- शायद नहीं है।
  3. स्यादस्ति च नास्ति च- शायद है भी और नहीं भी है।
  4. स्यादवक्तव्यः- शायद अवर्णनीय है।
  5. स्यादस्ति चावक्तव्यः- शायद है और अवर्णनीय है।
  6. स्यान्नास्ति चावक्तव्यः- शायद नहीं है और अवर्णनीय है।
  7. स्यादस्ति च नास्ति चावक्तव्यः- शायद है, नहीं है और अवर्णनीय है।

Question 12

'क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः' इति कथनमस्ति-

  1. AOption (a)

    साङ्ख्यदर्शने

  2. BOption (b)

    योगदर्शने 

  3. COption (c)

    मीमांसादर्शने 

  4. DOption (d)

    वैशेषिकदर्शने 

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Correct answer

Answer: (b)B.

योगदर्शने 

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प्रश्नानुवाद- ‘क्लेश, कर्म, विपाक और आशय के परामर्श से रहित एक विशेष प्रकार का पुरुष ईश्वर है’ यह कथन है-

स्पष्टीकरण- ‘क्लेश, कर्म, विपाक और आशय के परामर्श से रहित एक विशेष प्रकार का पुरुष ईश्वर है’ यह कथन योग दर्शन में है।

भारतीय आस्तिक दर्शनों में सांख्य के अनन्तर योगदर्शन का स्थान आता है। इसके प्रतिपादक या प्रवर्तक महर्षि पतंजलि हैं। इस दर्शन का प्रमुख ग्रंथ योगसूत्र है जो महर्षि पतंजलि द्वारा रचित है। योगदर्शन में चार पाद हैं- समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद, कैवल्यपाद। इसमें कुल 195 सूत्र हैं। इसमें ईश्वर सहित 26 तत्त्वों की चर्चा की गई है। अतः यह सेश्वर सांख्य कहलाता है। योग सूत्र में ईश्वर का वर्णन इस प्रकार है- क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः। 

अर्थात्ई ईश्��र, क्लेश, कर्म, विपाक और आशय (वासनाओं) के परामर्श से रहित एक विशेष प्रकार का पुरुष है। अविद्या अस्मित्ता, राग, द्वेष और अभिनिवेश क्लेश है। धर्म और अधर्म कर्म है। कर्म का फल विपाक है। उस विपाक से बनते वाले संस्कार वासना कहलाते है। वही आशय है। ये चारों बुद्धि में रहते हुए पुरुष में उपस्थित कहे जाते है और पुरुष बुद्धिगत फल का भोक्ता कहा जाता है जो पुरुष विशेष इस भोग से भी अपरामृष्ट है, वही ईश्वर है।

Question 13

'गगनारविन्दं सुरभि, अरविन्दत्वात्, सरोजारविन्दवत्' इत्यत्र तर्कभाषानुसारं कतमो हेत्वाभासः?

  1. AOption (a)

    स्वरूपासिद्धः

  2. BOption (b)

    विरुद्धः

  3. COption (c)

    आश्रयासिद्धः

  4. DOption (d)

    व्याप्यत्वासिद्धः

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Correct answer

Answer: (c)C.

आश्रयासिद्धः

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प्रश्ननुवाद- 'गगनारविन्दं सुरभि, अरविन्दत्वात्, सरोजारविन्दवत्' यहाँ  तर्कभाषा के अनुसार कौन सा हेत्वाभास है?

स्पष्टीकरण- 'गगनारविन्दं सुरभि, अरविन्दत्वात्, सरोजारविन्दवत्' अर्थात 'आकाश पुष्प सुगंधित है, पुष्प होने के कारण, सरोवर के फूल के समान’ यहाँ  तर्कभाषा के अनुसार आश्रयासिद्ध नामक हेत्वाभास है। 

न्याय दर्शन-

  • तर्कभाषा न्याय दर्शन का एक प्रकरण ग्रंथ है। इसके रचनाकार केशव मिश्र है।
  • न्याय दर्शन की गणना षट् भारतीय आस्तिक दर्शनों में होती है।
  • इस दर्शन के प्रवर्तक ‘गौतम’ है। इनके ग्रंथ का नाम ‘न्याय सूत्र’ है।
  • इसमें 16 पदार्थों को मान्यता दी गयी है जो इस प्रकार है- प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धांत, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितंडा, हेत्वाभास, छल, जाति तथा निग्रहस्थान।
  • इस दर्शन में चार प्रमाणों को स्वीकार किया गया है- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा शब्द।

 

न्याय दर्शन में हेत्वाभास एक पदार्थ है जिसका अर्थ है ‘असद् हेतु’। दूसरे शब्दों में जो हेतु न होकर भी हेतु की तरह प्रतीत होते है, हेत्वाभास कहलाते हैं- हेतुवत् भासते इति हेत्वाभास:। तर्कभाषा में पाँच हेत्वाभास का निरूपण किया गया है-

  1. असिद्ध
  2. विरुद्ध
  3. अनैकान्तिक
  4. प्रकरणसम
  5. कालात्ययापदिष्ट

इनमें से प्रथम असिद्ध हेत्वाभास है, जिसका लक्षण है- ‘तत्र लिङ्गत्वेनानिश्चितो हेतुरसिद्ध:’ अर्थात उन पाँचों में से लिङ्ग के रूप में निश्चित न होने वाला हेतु असिद्ध हेत्वाभास कहलाता है। यह तीन प्रकार का होता है-

  1. आश्रयासिद्ध
  2. स्वरूपासिद्ध
  3. व्याप्यत्वासिद्ध

इनमें से प्रथम आश्रयासिद्ध हेत्वाभास है। ‘आश्रयासिद्धो यथा गगनारविंद सुरभि, अरविन्दत्वात् सरोजारविंदवत्। अत्र गगनारविंदमाश्रयः, स च नास्त्येव।’ अर्थात आश्रयासिद्ध यह है जैसे आकाशकमल सुगन्धित होता है (प्रतिज्ञा), क्योंकि वह कमल (अथवा उसमें कमलत्व) है (हेतु), सरोवर में उत्पन्न कमल के समान उदाहरण। यहाँ आकाशकमल आश्रय है और वहाँ होता ही नहीं।

Question 14

पाणिनीयशिक्षानुसारं लृकारस्य भेदाः सम्भवन्ति-

  1. AOption (a)

    ह्रस्वदीर्घौ

  2. BOption (b)

    दीर्घप्लुतौ

  3. COption (c)

    ह्रस्वप्लुतौ

  4. DOption (d)

    ह्रस्वदीर्घप्लुताः

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Correct answer

Answer: (c)C.

ह्रस्वप्लुतौ

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प्रश्नानुवाद- पाणिनीय शिक्षा के अनुसार लृकार के भेद होतें है-

स्पष्टीकरण- पाणिनीय शिक्षा के अनुसार लृकार के भेद होतें है- ह्रस्व और प्लुत। 

संस्कृत वाङ्मय में वेदों के साथ वेदांगोंं का भी अपना महत्त्व है। वेदांग वेदों को समझने के साधन माने जाते है। इनकी संख्या छह है- शिक्षा, व्याकरण, कल्प, निरुक्त, छ्न्द तथा ज्योतिष। इनमें से प्रथम है शिक्षा जिसे वेद पुरुष का घ्राण माना जाता है। शिक्षा के छह प्रतिपाद्य विषय माने गए है- वर्ण, स्वर, मात्रा, बल, साम तथा सन्तान। प्राप्त शिक्षा ग्रंथोंं में से पाणिनीय शिक्षा प्रमुख माना जाता है। इसका सम्बन्ध ऋग्वेद से है। पाणिनी के शिष्यों को इसके रचनाकार के रूप में स्वीकार किया जाता है। इसके अनुसार वर्णों की संख्या 63 या 64 मानी गयी है- त्रिषष्टि: चतुर्षष्टि: वा वर्णा: सम्भवतो मता:। इन वर्णों में स्वरों की संख्या 21 मानी गयी है, जिनका निरूपण निम्नवत् है- 

  1. ह्रस्व - अ, इ, उ, ऋ, लृ
  2. दीर्घ - आ, ई, ऊ, ॠ, ए, ओ, ऐ, औ
  3. प्लुत - अ३, इ३,उ३, ऋ३, ए३, ऐ३, ओ३, औ३, लृ३

 

स्वरों के अतिरिक्त स्पर्श वर्णों की संख्या 25, अन्तःस्थः वर्णों की 4, ऊष्म वर्णों की 4, यम वर्णों की भी 4 मानी गयी है।

इनके अतिरिक्त अनुस्वार (1),  विसर्ग (1), जिह्वामूलीय (1) तथा उपध्मानीय (1) , रंग वर्ण (1) भी वर्णमाला में परिगणित होतें है।

 प्लुत लृ के स्वीकार्यता पर वर्णों की संख्या 64 हो जाती है, अन्यथा वर्णों की कुल 63 मानी गयी है।

Question 15

'मृगाक्षी'- शब्दे विद्यमानः 'मृग' इति शब्दः उदाहरणं विद्यते-

  1. AOption (a)

    अर्थादेशस्य

  2. BOption (b)

    अर्थविस्तारस्य

  3. COption (c)

    अर्थसङ्कोचस्य

  4. DOption (d)

    अर्थागमस्य

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Correct answer

Answer: (c)C.

अर्थसङ्कोचस्य

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- ‘मृगाक्षी'- शब्द में विद्यमान 'मृग' शब्द उदाहरण है-

**स्पष्टीकरण- ‘**मृगाक्षी'- शब्द में विद्यमान 'मृग' शब्द अर्थसंकोच का उदाहरण है। 

भाषाशास्त्र या भाषा विज्ञान के अंतर्गत भाषाओं का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। भाषा विज्ञान के चार प्रमुख अंग है-

  1. ध्वनि विज्ञान
  2. पद विज्ञान
  3. वाक्य विज्ञान
  4. अर्थ विज्ञान

अर्थ विज्ञान के अंतर्गत अर्थ परिवर्तन का अध्ययन किया जाता है। अर्थ पर��वर्तन के कई कारण हो सकते हैं, किन्तु अर्थ परिवर्तन की तीन मुख्य दिशाएँ है-

  1. ​अर्थ विस्तार- कुछ शब्द मूलरूप से किसी विशेष या संकुचित अर्थ में प्रयुक्त होते थे। कालान्तर में वे शब्द अनेक अर्थों को में प्रयुक्त होने लगे, उदाहरण- कुशल। इस शब्द का अर्थ था- कुशान् लाति (कुशों को लाना) कुश का अग्र भाग तीक्ष्ण होता है, उससे हाथ में छेद होने या कटने का भय रहता था। अतः कुश लाना चतुरता का सूचक था। यह शब्द धीरे- धीरे कुश लाना छोड़कर चतुरता या निपुणता का सूचक हो गया। इस प्रकार अर्थ में विस्तार हो गया। अन्य उदाहरण- प्रवीण, गोशाला, महाराज, गवेषणा आदि।
  2. अर्थ संकोच- अर्थ विस्तार के विपरीत कुछ शब्द अनेक अर्थों में प्रयुक्त होते थे। कालान्तर में वे किसी विशेष अर्थ में संकुचित हो गए, उदाहरण- मृग। इस शब्द का अर्थ था- जंगली जानवर। अब यह शब्द केवल हिरण अर्थ में संकुचित हो गया है। अन्य उदाहरण- सर्प, पंकज, अम्बुधि आदि।
  3. अर्थादेश- अर्थादेश का अर्थ है, किसी एक अर्थ के स्थान पर दूसरे अर्थ का आ जाना, उदाहरण- असुर। इस शब्द का अर्थ था- देवता। बाद में सुर देवता का उल्टा राक्षस हो गया। अन्य उदाहरण- दारू, वर, देवानां प्रिय, मुग्ध आदि।

 

अतः ‘मृगाक्षी'- शब्द में विद्यमान 'मृग' शब्द अर्थसंकोच का उदाहरण है।

Question 16

'इह पुष्यमित्रं याजयामः' इत्ययं वाक्यांशः कस्य आचार्यस्य कालनिर्धारणाय विद्वद्भिः उपयुज्यते?

  1. AOption (a)

    पतञ्जलेः

  2. BOption (b)

    कात्यायनस्य

  3. COption (c)

    पाणिनेः

  4. DOption (d)

    भर्तृहरेः

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Correct answer

Answer: (a)A.

पतञ्जलेः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- इह पुष्यमित्रं याजयामः' यह वाक्यांश विद्वानों के द्वारा किस आचार्य के काललनिर्धारण में उपयोग किया जाता है?

स्पष्टीकरण- इह पुष्यमित्रं याजयामः' यह वाक्यांश विद्वानों के द्वारा आचार्य पतंजलि के काललनिर्धारण में उपयोग किया जाता है। 

महर्षि पतंजलि-

संस्कृत व्याकरण में त्रिमुनियों पाणिनि तथा कात्यायन के बाद महर्षि पतंजलि का स्थान आता है।

इन्होंने पाणिनि के सूत्रों तथा कात्यायन के वार्तिकों पर अपना भाष्य लिखा, जो  अपने अनुपम वैशिष्ट्य के कारण महाभाष्य कहा जाता है। 

पतंजलि का जन्मकाल भी विवादग्रस्त है। पाश्चात्य विद्वान् और उनके अनुयायी इनका काल ई.पू. 150 वर्ष मानते हैं जो कि पुष्यमित्र का शासन काल माना जाता है - प्रवृत्तस्याविरामे शासितव्या भवन्ती (लटः पूर्वाचार्यसंज्ञाः)। .... इह पुष्यमित्रं याजयामः। 

पतंजलि पाणिनि के सैकड़ों वर्षों बाद ही उत्पन्न हुए थे। इनके समय तक पाणिनीय नियमों का प्रचलन हो चुका था। शब्दों का साधुत्व दर्शाने के लिए पतंजलि ने इष्टयों का आश्रयण लिया है और शास्त्रीय नियमों की अपेक्षा लोकव्यवहार की प्रधानता स्वीकार की है।  

इनके महाभाष्य में एक साथ अनेक प्रश्नों और उत्तरों को देखकर विद्वानों ने इन्हें सहस्त्र जिव्हाओं वाले शेषनाग का अवतार माना है। इसीलिए इन्हें फणी, फणिभृत्, शेषाहि, नागनाथ आदि कहा जाता है। इन्हें गोणिकापुत्र भी कहा जाता है। यह संभवतः माता के नाम के अनुसार है।

Question 17

'गो+अग्रम्' इत्यत्र न सम्भवति-

  1. AOption (a)

    प्रकृतिभावः

  2. BOption (b)

    पूर्वरूपम्

  3. COption (c)

    अवङादेशः

  4. DOption (d)

    संहिताया अभावः

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Correct answer

Answer: (d)D.

संहिताया अभावः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- 'गो+अग्रम्' यहाँ सम्भव नहीं है- 

स्पष्टीकरण- 'गो+अग्रम्' यहाँ संहिता का अभाव सम्भव नहीं है।

‘गो+अग्रम्'  इस स्थिति में तीन रूप बनेंगे-

  1. गो+अग्रम्= गोग्रम, यहाँ ‘एङ पदान्तादति’ सूत्र से ‘पूर्वरूप संधि’ हुई है। इस सूत्र का अर्थ है यदि पद के अन्त में ‘ए’ या ‘ओ’ हो और इसके बाद ‘अ’ हो तो उसका लोप हो जाएगा।
  2. गो+अग्रम्= गो अग्रम्, यहाँ ‘सर्वत्र विभाषा गो:’ सूत्र से विकल्प से प्रकृतिभाव हुआ है। इस सूत्र का अर्थ है लौकिक एवं वैदिक संस्कृत के प्रयोगों में एङन्त ‘गो’ शब्द को पदान्त में विकल्प से प्रकृतिभाव होता है।
  3. गो+अग्रम्= गवाग्रम, यहाँ ‘अवङ स्फोटायनस्य’ सूत्र से अवङ आदेश हुआ है। इस सूत्र का अर्थ है प्रकृतिभाव न होने के पक्ष में अवङ आदेश होगा।

 

अतः यहाँ संहिता का अभाव सम्भव नहीं है।

Question 18

अलोऽन्त्यात् पूर्ववर्णस्य का सञ्ज्ञा भवति?

  1. AOption (a)

    निष्ठा

  2. BOption (b)

    उपधा

  3. COption (c)

    गति

  4. DOption (d)

    संहिता

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Correct answer

Answer: (b)B.

उपधा

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- अन्तिम ‘अल्’ से पूर्व वाले वर्ण की क्या संज्ञा होती है?

स्पष्टीकरण- अन्तिम ‘अल्’ से पूर्व वाले वर्ण की उपधा संज्ञा होती है। निम्न सूत्र से -

सूत्र- अलो अन्त्यात्पूर्व उपधा (1.1.64)

वृत्ति- अन्त्यादलः पूर्वो वर्ण उपधासंज्ञः। 

सूत्रार्थ- वर्णों के समुदाय में से जो अन्तिम वर्ण हो, उससे पूर्व के वर्ण की यह उपधासंज्ञा होती है। जैसे- राम= र्+ आ+म्+अ, यहाँ राम में अन्त्य वर्ण ‘अ’ है और उससे पूर्व का वर्ण है ‘म्’ अतः ‘म्’ की उपधा संज्ञा हो जाएगी। 

Additional Informationअन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण- 

(क) निष्ठा- क्त और क्तवतु प्रत्यय निष्ठासंज्ञक होते हैं - क्तक्तवतू निष्ठा (1.1.26)। निष्ठासंज्ञक क्त और क्तवतु प्रत्यय भूतकाल अर्थ में सभी धातुओं से होते हैं। 

(ग) गति- प्र, परा आदि क्रिया के योग में गतिसंज्ञक होते हैं- गतिश्च (1.4.60), प्रादयः क्रियायोगे गतिसंज्ञाः स्युः। 

(घ) संहिता- वर्णों की अत्यन्त समीपता को संहिता संज्ञा कहते है- पर: सन्निकर्ष: संहिता (1.4.109)

Question 19

'स्थूलोऽहं, कृशोऽहं' इत्यत्र शाङ्करभाष्यानुसारं भवति-

  1. AOption (a)

    विकारः

  2. BOption (b)

    अपवादः

  3. COption (c)

    अध्यासः

  4. DOption (d)

    परिणामः

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Correct answer

Answer: (c)C.

अध्यासः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- ‘मोटा हूँ मैं’, ‘पतला हूँ मैं’ यहाँ शंकर भाष्य के अनुसार है- 

स्पष्टीकरण-  ‘मोटा हूँ मैं’, ‘पतला हूँ मैं’ यहाँ शंकर भाष्य के अनुसार अध्यास है। 

शाङ्करभाष्य-

  • शाङ्करभाष्य ‘ब्रह्मसूत्र’ पर लिखा भाष्य गया है। इसे ‘शारीरक भाष्य’ भी कहते है।
  • ब्रह्मसूत्र वेदांत दर्शन या उत्तर मीमांसा दर्शन का आधार ग्रंथ है। वेदान्त दर्शन समस्त भारतीय दर्शनों में सबसे प्रमुख है। इसके प्रवर्तक आचार्य बादरायण है।
  • ब्रह्मसूत्र में चार अध्याय है- समन्वय, अविरोध, साधन तथा फल। इस ग्रंथ में कुल 555 सूत्र है।
  • प्रस्थानत्रयी के नाम से प्रसिद्ध उपनिषद्, गीता एवं ब्रह्मसूत्र सभी वेदान्त सम्प्रदायों का प्रमुख आधार ग्रंथ है।
  • ब्रह्म और जीव का ऐक्य प्रतिपादन करना ही इस दर्शन का मुख्य उद्देश्य रहा है।
  • आचार्य शंकर ने इसके प्रथम अध्याय के भाष्य की भूमिका में ‘अध्यास’ का निरूपण निम्नवत् किया है- अध्यासो नाम अतस्मिस्तदुदिधरित्यवोचम्। तद्यथापुत्रभार्यादिषु विकलेषु सकलेषु वा अहमेव विकलः सकलो वेति बाह्याधर्मानात्मन्यध्यस्यति , तथा देह- धर्मान् स्थूलो अहं, कृशो अहं, गौरो अहं, तिष्ठामि, गच्छामि, लघयामि चेति।  एक वस्तु में दूसरी वस्तु का ज्ञान अध्यास कहलाता है।
  • जैसे कि कोई पुत्र, स्त्री आदि के अपूर्ण और पूर्ण होने पर मैं ही पूर्ण और अपूर्ण हूँ, इस प्रकार बाह्यपदार्थों के धर्मों का अध्यास करता है। इसी प्रकार मैं स्थूल हूँ, मैं कृश हूँ, मैं गौर हूँ, मैं खड़ा हूँ, मैं जाता हूँ, मैं लांघता हूँ, इस प्रकार देह के धर्मों का अध्यास करता है। अध्यास वेदांत दर्शन का पारिभाषिक शब्द है। ‘रज्जु में सर्प का ज्ञान’ इसका प्रमुख उदाहरण है।

Question 20

'प्रत्यर्थम्' इत्यत्र अव्ययीभाव समासो विद्यते-

  1. AOption (a)

    योग्यतार्थे

  2. BOption (b)

    वीप्सार्थे

  3. COption (c)

    पदार्थानतिवृत्त्यर्थे

  4. DOption (d)

    सादृश्यार्थे

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Correct answer

Answer: (b)B.

वीप्सार्थे

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- ‘प्रत्यर्थम्' यहाँ अव्ययीभाव समास है-

स्पष्टीकरण- ‘प्रत्यर्थम्' यहाँ अव्ययीभाव समास वीप्सा (द्विरुक्ति) के अर्थ में है। 

समास-

समास का शाब्दिक अर्थ है संक्षेप। समास में कई पद मिलकर एक पद बन जाते हैं- अनेकपदस्य एकपदीभाव: समास:। ये मुख्यतः पाँच प्रकार के है-

  1. केवल समास
  2. अव्ययीभाव समास
  3. तत्पुरुष समास
  4. द्वन्द्व समास
  5. बहुव्रीहि समास

 

अव्ययीभाव समास-

‘पूर्वपदार्थप्रधानः अव्ययीभावः’ जहाँ पूर्वपद की प्रधानता होती है, वहाँ अव्ययीभाव समास होता है। इस समास में निम्नलिखित कार्य होता है-

  1. समस्तपद नपुंसकलिंग एकवचन में होता है।
  2. प्रथम पद अव्यय होता है।
  3. उत्तर पद यदि दीर्घान्त हो तो उसे ह्रस्वान्त कर दिया जाता है।

 

इस समास प्रमुख सूत्र है- अव्ययं विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्यृद्धि-अर्थाभाव-अत्यय-असम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चात्-यथा-आनुपूर्व्य-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्य-अन्तवचनेषु। इसका सामान्य अर्थ है विभक्ति आदि अर्थों में अव्ययीभाव समास होता है। 

प्रति इस अव्यय का प्रयोग वीप्सा के लिए होता है। वीप्सा – शब्ददुरुक्तिः अथवा शब्द को दो बार कहना।

अर्थात् उत्तर पद को द्वितीया अथवा सप्तमी इन विभक्तियों में से उचित विभक्ति लगा कर उसे दो बार लिखना।

उदा-

  1. प्रतिदिनंं- दिने दिने प्रति
  2. प्रतिवर्षं- वर्षे वर्षे प्रति

 

विकल्पों का स्पष्टीकरण- 

  1. योग्यता के अर्थ में- रूपस्य योग्यम् अनुरूपम्।
  2. वीप्सा (द्विरुक्ति) के अर्थ में- अर्थं अर्थं इति प्रत्यर्थम्।
  3. पदार्थानतिवृत्ति के अर्थ में- शक्तिम् अनतिक्रम्य यथाशक्ति।
  4. सादृश्य के अर्थ में- हरे: सादृश्यम् इति सहरि।

Question 21

वेदान्तसारानुसारं 'तत्त्वमसि' इत्यत्र अखण्डार्थबोधकसम्बन्धः कतिविधः?

  1. AOption (a)

    चतुर्विधः 

  2. BOption (b)

    त्रिविधः

  3. COption (c)

    द्विविधः

  4. DOption (d)

    पञ्चविधः

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Correct answer

Answer: (b)B.

त्रिविधः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- वेदान्तसार के अनुसार 'तत्त्वमसि' यहाँ अखण्डार्थ बोधक सम्बन्ध कितने प्रकार का है?

प्रश्नानुवाद- वेदान्तसार के अनुसार 'तत्त्वमसि' यहाँ अखण्डार्थ बोधक सम्बन्ध तीन प्रकार का है।

वेदान्तसार वेदान्त दर्शन का एक प्रकरण ग्रन्थ है। इसके रचनाकार सदानन्द योगीन्द्र है। वेदान्त दर्शन समस्त भारतीय दर्शनों में सबसे प्रमुख है। इसके प्रवर्तक आचार्य बादरायण है। इनके दारा कृत ब्रह्मसूत्र इस दर्शन का आधार ग्रंथ है। ब्रह्मसूत्र पर लिखा गया आचार्य शंकर का शारीरिक भाष्य इस दर्शन का अद्भुत ग्रंथ माना गया है। प्रस्थानत्रयी के नाम से प्रसिद्ध उपनिषद्, गीता एवं ब्रह्मसूत्र सभी वेदान्त सम्प्रदायों का प्रमुख आधार ग्रंथ है। ब्रह्म और जीव का ऐक्य प्रतिपादन करना ही इस दर्शन का मुख्य उद्देश्य रहा है। इस दर्शन में चार महावाक्य है जो भिन्न भिन्न उपनिषद एकत्र किए गये है- 

  1. प्रज्ञानं ब्रह्म (ऐतरयोपनिषद्)
  2. तत्त्वमसि (छान्दोग्योपनिषद्)
  3. अहं ब्रह्मास्मि (बृहदारण्��कोपनिषद्)
  4. अयमात्मा ब्रह्म (माण्डूक्योपनिषद)

‘तत्त्वमसि’ छान्दोग्योपनिषद् से लिया गया महावाक्य है। इसके विषय में कहा गया है- इदं तत्त्वमसीतिवाक्यं सम्बन्धत्रयेणाखण्डार्थबोधकं भवति। सम्बन्धत्रयं विशेषणविशेष्यभावः प्रत्यगात्मलक्षणयोर्लक्ष्यलक्षणभावश्चेति। तदुक्तम् सामानाधिकरण्यं च विशेषणविशेष्यता लक्ष्यलक्षणसम्बन्धः  पदार्थप्रत्यगात्मनाम् इति। अर्थात् यह तत्त्वमसि (वह तू है ) इत्यादि वाक्य तीन सम्बन्धों से अखण्ड अर्थ का बोध कराने वाला होता है। वे तीन सम्बन्ध निम्नवत् है-

  1. दो पदों का सामान्यधिकरण सम्बन्ध
  2. दो पदों के अर्थों का विशेषणविशेष्य भाव सम्बन्ध,
  3. आंतरिक आत्मा तथा उसको बताने वाला दोनों में लक्ष्यलक्षणभाव सम्बन्ध है।

Question 22

'अनैकान्तो विरुद्धश्चाप्यसिद्धः प्रतिपक्षितः।

कालात्ययापदिष्टश्च हेत्वाभासास्तु पञ्चधा।।'

इत कस्य दार्शनिकस्य कथनमस्ति?

  1. AOption (a)

    विश्वनाथपञ्चाननस्य

  2. BOption (b)

    अन्नम्भट्टस्य

  3. COption (c)

    सदानन्दस्य

  4. DOption (d)

    केशवमिश्रस्य

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Correct answer

Answer: (a)A.

विश्वनाथपञ्चाननस्य

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- यह किस दार्शनिक का कथन है?

स्पष्टीकरण- यह विश्वनाथ पंचानन का कथन है।

आचार्य विश्वनाथ पञचानन कृत ‘न्यायसिद्धान्तमुक्तावली’ ग्रन्थ में पञ्चहेत्वाभास की चर्चा की गयी है। न्यायसिद्धान्तमुक्तावली वस्तुतः एक टीका ग्रन्थ जो विश्वनाथ पञचानन के द्वारा ही रचित ग्रन्थ ‘कारिकरवली’ पर लिखी गयी है। यह ग्रन्थ न्याय दर्शन के प्रकरण ग्रंथों में से एक है। इसमें न्याय दर्शन के विषय वस्तु को कारिका के रूप में प्रस्तुत किया गया है। प्रस्तुत कारिका हेत्वाभास से सम्बंधित है- अनेककान्तो विरुद्धश्चाप्यसिद्धः प्रतिपक्षितः। कालाव्ययापदिष्टश्च हेत्वाभासस्तु पञ्चधा। जो केवल हेतु जैसे लगते हैं किन्तु हेतु नहीं होते, वे हेत्वाभास हैं। इनकी संख्या पाँच कही गयी है- 

  1. अनेकान्त (सव्यभिचार)- जो हेतु और दूसरी बात भी उसी प्रकार सिद्ध करे अर्थात् ऐकांतिक न हो, वह 'अनेकान्त' कहलाता है। जैसे, शब्द नित्य है क्योंकि वह अमूर्त है; जैसे, परमाणु। यहाँ अमूर्त होना जो भेद दिया गया है, वह बुद्धि का उदाहरण लेने से शब्द को अनित्य भी सिद्ध करता है ।
  2. विरुद्ध- जो हेतु प्रतिज्ञा के ही विरुद्ध पड़े वह 'विरुद्ध' कहलाता है । जैसे, घट उत्पत्ति धर्मवाला है, क्योंकि वह नित्य है ।
  3. असिद्ध- जिस हेतु को साध्य के समान ही सिद्ध करने की आवश्यकता हो, उसे 'असिद्ध' कहते हैं । जैसे, छाया द्रव्य है क्योंकि उसमें गति है। यहाँ छाया में स्वतः गति है, इसे सिद्ध करने की आवश्यकता है ।
  4. प्रतिपक्षित- जिस हेतु में जिज्ञास्य विषय (प्रश्न) ज्यों का त्यों बना रहता है, वह 'प्रतिपक्षित' कहलाता है। जैसे, शब्द अनित्य है; उसमें नित्यता नहीं है ।
  5. कालाव्ययापदिष्ट- यदि हेतु ऐसा दिया जाय जो कालक्रम के विचार से साध्य पर न घटे, तो वह 'कालाव्ययापदिष्ट' कहलाता है। जैसे, शब्द नित्य है, क्योंकि उसकी अभिव्यक्ति संयोग से होती है। जैसे, घट के रूप की। यहाँ घट का रूप दीपक के संयोग के पहले भी था, पर ढोल का शब्द लकड़ी के संयोग के पहले नहीं था।

Question 23

'राम' शब्दस्य पञ्चम्येकवचनस्य विषये समुचितं कथनं नास्ति-

  1. AOption (a)

    'रामात्' इति रूपम्भवति

  2. BOption (b)

    'रामाद्' इति रूपम्भवति 

  3. COption (c)

    अवसाने खरः स्थाने चरो भवति 

  4. DOption (d)

    अवसाने झलां चरो वा स्युः

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Correct answer

Answer: (c)C.

अवसाने खरः स्थाने चरो भवति 

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प्रश्नानुवाद- ‘राम’ शब्द के पंचमी एकवचन के विषय में समुचित कथन नहीं है। 

स्पष्टीकरण- राम शब्द की सिद्धिप्रक्रिया के अन्तर्गत राम शब्द का पञ्चमी एकवचन में रामात् और रामाद् रूप बनता है। निम्न सूत्र के द्वारा- 

सूत्र- वा अवसाने (8.4.55)

वृत्ति- अवसाने झलां चरो वा। रामात्, रामाद्, रामाभ्याम्। रामेभ्यः। 

सूत्रार्थ- यदि झल् प्रत्याहार में स्थित वर्ण के बाद वर्णों का अभाव (अवसान) हो तो उसके (झल् के) स्थान पर विकल्प से चर् हो जाता है।

इसके फलस्वरूप दो रूप प्राप्त होते हैं। रामात् और रामाद्।

इससे स्पष्ट है कि अकारान्त राम आदि शब्दों के पञ्चमी विभक्ति के एकवचनम में अन्त में आने वाले प्रत्यय ‘ड़ंसि’ के स्थान में ‘टाड़सिँड़सामिनात्स्याः’ सूत्र से जो ‘आत्’ आता है उसके तकार के स्थान पर जब ‘झलां जशो अन्ते’ से ‘द्’ हो जाता है तब ‘वा अवसाने’ नियम के अनुसार पुनः द् को विकल्प से ‘त्’ होकर दोनों रूप प्राप्त होते हैं।

उपर्युक्त व्याख्या से स्पष्ट होता है कि राम शब्द के पञ्चमी विभक्ति एकवचन के विषय में 'अवसाने खरः स्थाने चरो भवति' यह अशुद्ध कथन है। अतः विकल्प 'C' सही है।

Question 24

भाषाणां 'सतम्' वर्गे स्वीक्रियते-

  1. AOption (a)

    लैटिन

  2. BOption (b)

    ग्रीक्

  3. COption (c)

    संस्कृतम्

  4. DOption (d)

    फ्रेंच

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Correct answer

Answer: (c)C.

संस्कृतम्

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प्रश्नानुवाद- भाषाओं के सतम् वर्ग में स्वीकार किया जाता है-

स्पष्टीकरण- भाषाओं के सतम् वर्ग में संस्कृत को स्वीकार किया जाता है।

भाषाओं का वर्गीकरण-

  • संसार में तीन हजार से अधिक भाषाएँ हैं। इन भाषाओं के अध्ययन के लिए इनका वर्गीकरण किया गया है।
  • यह वर्गीकरण दो प्रकार का है- आकृतिमूलक और पारिवारिकमूलक।
  • आकृतिमूलक वर्गीकरण के अन्तर्गत प्रकृति-प्रत्यय के संयोग/वियोग को वर्गीकरण का आधार बनाया जाता है। यह मुख्य रूप से दो प्रकार का है- योगात्मक तथा वियोगात्मक।
  • पारिवारिकमूलक वर्गीकरण में ध्वनि साम्य, शब्द साम्य, व्याकरण साम्य तथा स्थानिक समीपता को कुछ अपवादों के साथ आधार बनाया जाता है।
  • इस वर्गीकरण के अनुसार संसार की समस्त भाषाओं को 18 भाषा परिवारों म��ं विभाजित किया गया है।
  • इनमें से प्रथम और सर्वप्रमुख है भारोपीय भाषा परिवार। विश्व में सबसे अधिक भाषाएँ, सबसे अधिक साहित्य और सबसे प्राचीन साहित्य इस भाषा परिवार के अन्तर्गत प्राप्त होता है।
  • भारोपीय’ शब्द ‘भारत-यूरोपीय’ का संक्षिप्त रूप है। यह Indo-European का हिन्दी अनुवाद है।
  • भारोपीय में भारतवर्ष से लेकर यूरोप तक फैली हुई भाषाओं का संग्रह है। इस परिवार में दस शाखाएँ हैं।
  • भारोपीय परिवार की भाषाओं को ध्वनि के आधार पर दो उपभागों में विभक्त किया जाता है- केन्टुम् तथा शतम्। इस विभाजन का श्रेय प्रो. अस्कोली को जाता है। इनका वर्णन निम्नवत् है-

 

शतम् वर्गकेन्टुम्  वर्ग
संस्कृत- शतम्लैटिन- केन्टुम्
अवेस्ता- सतम्ग्रीक- हेकटोन
फारसी- सद्केल्टिक- केत्
हिन्दी- सौतोखारी- कन्ध
रूसी- स्तोगाथिक- हुन्ड
लिथुआनियन- स्जिम्तासजर्मन- हुन्डर्ट
फ्रेंच- सेंट
इटालियन- केन्तो

 

अतः संस्कृत सतम्/शतम् वर्ग में परिगणित होता है।

Question 25

'काव्यं ग्राह्यमलङ्कारात्' इत्युक्ति अस्ति-

  1. AOption (a)

    दण्डिनः

  2. BOption (b)

    वामनस्य

  3. COption (c)

    अभिनवगुप्तस्य

  4. DOption (d)

    भोजस्य

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Correct answer

Answer: (b)B.

वामनस्य

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प्रश्नानुवाद- ‘काव्य अलंकारोंं से ग्राह्य होता है’ यह उक्ति है- 

स्पष्टीकरण- ‘काव्य अलंकारोंं से ग्राह्य होता है’ यह उक्ति आचार्य वामन की है। 

आचार्य वामन रीति संप्रदाय के प्रवर्तक मानें जाते है। इनके ग्रंथ का नाम ‘काव्यालंकारसूत्र’ है। इसके प्रथम अधिकरण के ‘प्रयोजनस्थापना’ नामक प्रथम अध्याय में काव्य का निरूपण किया गया है-

सूत्र- काव्यं ग्राह्यमलंकारात् ॥1.1॥ 

सूत्रार्थ- काव्य अलंकार से युक्त्त होने के करण ग्रहण करने योग्य होता है। 

वृत्ति- काव्यं खलु ग्राह्यमुपादेयं भवति, अलंकारात्। काव्यशब्दो अयं गुणा अलंकारसंस्कृतयोः शब्दार्थयोर्वर्तते। भक्त्या तु शब्दार्थमात्रवचनो अत्र गृह्यते। 

वृत्यर्थ- काव्य अलंकार से युक्त्त होने से उपादेय है। यह काव्य शब्द गुण ओज, प्रसाद आदि अलंकार उपमा, यमक आदि से संस्कारसम्पन्न शब्द और अर्थ का बोध कराता है, परन्तु उपचार से केवल शब्दार्थ का बोधक ‘काव्य’ शब्द का ग्रहण होता है। 

इसके अगले सूत्र में अलंकारो को स्पष्ट करते है- 

सूत्र- सौन्दर्यमलंकारः ॥1.1.2॥  

सूत्रार्थ- पद्य में सुंदरता की स्थापना करना अलंकार है। 

वृत्ति- अलङकृतिरलंकारः। करणव्युत्पत्त्या पुनरलंकार शब्दो अयम् उपमादिषु वर्तते।          

वृत्यर्थ- भाव में विग्रह करने पर अलंकृति ही अलंकार है। (अलङक्रियते अनेन) करण अर्�� में ऐसी व्युत्पति करने पर वह अलंकार शब्द उपमा, यमक आदि में प्रयुक्त होता है।

Question 26

अनुकरणसिद्धान्तस्य समर्थकः मुख्यतया अस्ति-

  1. AOption (a)

    अरस्तू

  2. BOption (b)

    लाॅन्जाइनस

  3. COption (c)

    क्रोचे

  4. DOption (d)

    प्लेटो

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Correct answer

Answer: (a)A.

अरस्तू

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प्रश्नानुवाद- अनुकरण सिद्धांत के समर्थक मुख्य रूप से है- 

स्पष्टीकरण- अनुकरण सिद्धांत के समर्थक मुख्य रूप से अरस्तू है। 

अरस्तू-

  • अरस्तू विश्व के महान दर्शिनकों में से एक है। इनका जन्म ई॰पू॰ 384 में यूनान देश में हुआ।
  • इनके गुरु का नाम प्लेटो है। अरस्तू ने विविध विषयों पर अपना मत प्रस्तुत किया। उनके काव्यशास्त्रीय ग्रंथ का नाम ‘पोएटिक्स’ है।
  • प्लेटो की तरह अरस्तू ने भी काव्य को अनुकरण सिद्धान्त पर आधारित स्वीकार किया है, इसीलिए वह भी कलाकारों की तरह कवि को भी अनुकर्त्ता कहता है।
  • अरस्तू ने अपने गुरु प्लेटो से अनुकरण (मिमैसिस) शब्द को ग्रहण किया और उनकी मान्यता कला अनुकरण है, को ही स्वीकार किया, लेकिन उनकी व्याख्या उसने अपने ढंग से की और कहा कि कलाकार प्रकृति की गोचर वस्तुओं का नहीं वरन् प्रकृति की सर्जन प्रक्रिया का भी अनुकरण करता है।
  • प्लेटो एवं अरस्तू की अनुकरण विषयक मान्यताओं में मूलभूत अन्तर यह है कि प्लेटो ने अनुकरण का विषय बाह्यप्रकृति की वस्तुओं को माना है और अरस्तू ने गोचर वस्तुओं के अस्तित्व में आधारभूत रूप में निहित प्राकृतिक नियमों को अनुकरण का विषय माना।
  • अरस्तू अपने ‘पोएटिक्स’ में कहता है कि कविता केवल अनुभव की दुनिया की अपेक्षा अधिक बोधगम्य है और जहाँ प्रकृति सफलता प्राप्त नहीं करती, वहाँ कवि सफल हो जाता है।
  • अरस्तू ने अनुकरण के लिए एकमात्र आधार मानव जीवन को स्वीकार किया है। उसके अनुसार मानव जीवन ही वह प्रकृति है जिसका अनुकरण कला करती है।

अरस्तू का मत है कि कलाकार को वस्तुओं की तीन स्थितियों में से किसी एक का अनुकरण करना चाहिए। 

  1. जैसी वह थी या है।
  2. जैसी वह कही या समझी जाती है।
  3. जैसी वह होनी चाहिए।

अरस्तू के काव्य एवं इतिहास के विवेचन से भी अनुकरण के इसी तथ्य का बोध होता है कि अनुकरण का अभिप्राय भावपरक अनुकरण से है न कि यथार्थ वस्तुपरक प्रत्यंकन से। अरस्तू ने विषय, माध्यम और शैली के अन्तर के आधार पर एक ओर काव्य और अन्य कलाओं में भेद किया। इस तरह पहली बार उसने एक कलाकृति के रूप में काव्य को महत्त्व दिया। 

अन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण- 

  1. लोंजाइनस- इनके काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ का नाम ‘ ऑन द सब्लाइम’ है। ये काव्य में उदात तत्व के समर्थक है।
  2. क्रोचे- इनके काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ का नाम ‘सौंदर्यमीमांसा का सार’ है। ये अभिव्यंजनावाद के समर्थक है।

Question 27

'---अमृतसहोदरापि कटुकविपाका---' शु���नासोपदेश वर्णनमिदं वर्तते-

  1. AOption (a)

    सरस्वत्याः

  2. BOption (b)

    ​कादम्बर्याः 

  3. COption (c)

    लक्ष्म्याः

  4. DOption (d)

    महाश्वेतायाः

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Correct answer

Answer: (c)C.

लक्ष्म्याः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- '---अमृतसहोदरापि कटुकविपाका---' शुकनासोपदेश में यह वर्णन है-

स्पष्टीकरण- '---अमृतसहोदरापि कटुकविपाका---' शुकनासोपदेश में यह वर्णन लक्ष्मी के लिए है। 

महाकवि बाणभट्ट संस्कृत गद्य कवियों में सर्वोत्कृष्ट है। ये राजा हर्षवर्धन के दरबार में थे। इनकी दो प्रमुख गद्य कृतियाँ है-

  1. कादम्बरी (कथा)
  2. हर्षचरित (आख्यायिका)

कादम्बरी काव्य पूर्वार्ध और उत्तरार्ध दो भागों में लिखा गया है। पूर्वभाग महाकवि बाणभट्ट  की रचना है और उत्तरभाग उनके पुत्र पुलिनभट्ट या भूषणभट्ट द्वारा लिखा गया है। 

कादम्बरी के प्रारम्भ में प्रस्तावना के रूप में 20 श्लोक हैं जिनमें मंगलाचरण, सज्जनप्रशंसा आदि विषय निहित हैं। सम्पूर्ण कृति में चन्द्रापीड और पुण्डरीक के तीन जन्मों की कथा वर्णित है। राजा तारापीड का पुत्र चन्द्रापीड था और प्रधानमन्त्री शुकनास का पुत्र वैशम्पायन था। यथासमय राजकुमार चन्द्रापीड के यौवराज्याभिषेक की तैयारियाँ आरम्भ हुई। इसी समय शुकनास ने राजकुमार चन्द्रापीड  को जो उपदेश दिया था, वही शुकनासोपदेश है। मन्त्री शुकनास ने राजकुमार चन्द्रापीड को लक्ष्मी के अवगुणों के विषय में बताया है-

अमृतसहोदरापि कटुविपाका। विग्रहवत्यप्रत्यक्षदर्शन। 

अर्थ- अमृत की सगी बहन होकर भी कड़वे फल वाली है। विग्रह वाली होकर भी प्रत्यक्ष न दिखाई देने वाली है।

Additional Informationलक्ष्मी के अवगुणों का वर्णन-

परस्परविरुद्धञचेन्द्रजालमिव दर्शयन्ती प्रकटयति जगति निजं चरितम्।            

अर्थ- (इस तरह यह लक्ष्मी) इन्द्रजाल (जादू) के समान परस्पर विरोधी बातें दिखती हुयी जगत् चरित्र प्रकट करती है। 

तथाहि, सततमूष्माणमुपजनयन्त्यपि जाड्यमुपजनयति।  

अर्थ- (उदाहरण के लिए) निरन्तर ऊष्मा उत्पन्न करती हुई भी जड़ता उत्पन्न करती है। 

उन्नतिमादधानापि नीचस्वभावतामाविष्करोति।   

अर्थ- उन्नति को धारण करती हुई भी नीच स्वभावता को प्रकट करती है। 

तयोराशिसंभवापि तृष्णां संवर्धयति। 

अर्थ- समुद्र से उत्पन्न हुई भी तृष्णा को बढ़ाती है।

ईश्वरतां दधानाप्यशिवप्रकृतित्वमातनोति। 

अर्थ- प्रभुता को धारण करती हुई भी अशिव स्वभाव (अमंगल) का विस्तार करती है। 

बलोपचयमाहरन्त्यपि लघिमानमापादयति। 

अर्थ- बल समूह को लाती हुयी भी लघुता को प्राप्त कराती है अर्थात् लाती है।       

पुरुषोत्तमरतापि खलजनप्रिया। रेनूमयीव स्वच्छमपि कलुषीकरोति। 

अर्थ- पुरुषोत्तम में आसक्त होते हुए भी दुष्टजनों से प्रेम करने वाली है। रेणुमयी यह लक्ष्मी स्वच्छ को भी कलुषित बना देती है।

Question 28

ध्वन्यालोके प्रतीयमानस्य तृतीयः प्रभेदः कः?

  1. AOption (a)

    अलङ्कारादिः

  2. BOption (b)

    गुणादिः

  3. COption (c)

    रसादिः

  4. DOption (d)

    वृत्यादिः

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Correct answer

Answer: (c)C.

रसादिः

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प्रश्नानुवाद- ध्वन्यालोक में प्रतीयमान अर्थ का तीसरा भेद कौन सा है?

स्पष्टीकरण- ध्वन्यालोक में प्रतीयमान अर्थ का तीसरा भेद रसादि है। 

ध्वन्यालोक -

ध्वन्यालोक आचार्य आनन्दवर्धन की सर्वोत्कृष्ट कृति है। आचार्य आनन्दवर्धन काव्यशास्त्र के एक प्रमुख सम्प्रदाय ‘ध्वनि-सम्प्रदाय‘ के प्रवर्तक है। उन्होंने ध्वन्यालोक में इस ध्वनि सिद्धान्त की स्थापना की।

यह ग्रंथ चार उद्योतों में विभाजित है। इस ग्रंथ पर अभिनवगुप्तकृत लोचन टीका प्राप्त होती है।

इसके प्रथम उद्योत में काव्यलक्षण ‘कावस्यात्मा ध्वनिः’ काव्य की आत्मा ध्वनि है, का प्रतिपादन किया गया है। इसके बाद वाच्यादि को बताते हुए प्रतीयमान को बताते हैं- प्रतीयमानं पुनरन्यदेव वस्त्वस्ति वाणीषु महाकवीनाम्। यत् तत् प्रसिद्धावयवातिरिक्तं विभाति लावण्यमिवाङ्गनासु॥ (१\४)

अर्थात प्रतीयमान कुछ और ही चीज है जो रमणियों के प्रसिद्ध (मुख, नेत्र, श्रोत्र, नासिकादि) अवययों से भिन्न उनके लिए लावण्य के समान, महाकवियों की सूक्तियों में वाच्य अर्थ से अलग ही भासित होता है।

 प्रतीयमान के तीन भेद हैं - वाच्य, अलंकार, रसध्वनि। इसलिये तृतीय प्रभेद रसध्वनि है।

Additional Informationआचार्य आनन्दवर्धन ने निम्न कारिकाओं में प्रतीयमान अर्थ के विषय में बताया है- 

सरस्वती स्वादु तदर्थवस्तु निष्यन्दमाना महतां कवीनाम्। आलोकसामान्यमभिव्यनक्ति परिस्फुरन्तं प्रतिभाविशेषम्।।1/6 ।।

उस तत्त्व को प्रवाहित करने वाली महान कवियों की वाणी परिस्फूरित होते हुए प्रतिभा के विशेष को अभिव्यक्त करती है। जिसके कारण इस अतिविचित्र कवियों की परम्परा को वहन  करने वाले संसार में कालिदास आदि दो - तीन या पाँच - छह ही महाकवि गिने जाते हैं ।

शब्दार्थ-शासनज्ञानमात्रेणैव न वेद्यते। वेद्यते स तु काव्यार्थतत्वज्ञैरेव केवलम्।।1/7।।

वह प्रतीयमान अर्थ केवल शब्द शास्त्र के जानने से विदित नही होगा अपितु केवल काव्य के अर्थ के तत्त्व को जानने वाले को होगा ।

सोर्थस्तद्व्यक्तिसामर्थ्ययोगी शब्दश्च कश्चन । यत्नय: प्रत्यभिज्ञेयौ तौ शब्दार्थौ महाकवे: ।1/8।।

यह प्रतीयमान अर्थ और उस प्रतीयमान अर्थ को अभिव्यक्त करने की सामर्थ्य से युक्त जो कोई विशेष शब्द है। इन दोनो शब्द और अर्थ को पहचानना चाहिए। 

आलोकार्थी यथा दीपशिखायां यत्नवान् जन:। तदुपायतया तद्वदर्थे वाच्ये तदादृत: ।।1/9।।

प्रकाश को चाहने वाला व्यक्ति, जिस प्रकार उसका उपाय होने के कारण दीपक की शिखा के लिए प्रयत्न करता है उसी प्रकार उस प्रतीयमान अर्थ के प्रति आदर से युक्त कवि उसका उपाय होने के कारण वाच्य अर्थ का उपादान करने के प्रति आदरवान होता है ।

यथा पदार्थद्वारेण वाक्यार्थ: सम्प्रतीयते। वाच्यार्थपूर्विका तद्वत् प्रतिपत्तस्य वस्तुन: ।।1/10।।

जिस प्रकार पदों के अर्थों के द्वारा वाक्य के अर्थ की प्रतीति होती है, उसी प्रकार प्रतीयमान अर्थ की प्रतीति वाच्य अर्थ के ज्ञान पूर्वक होती है।

स्वसामर्थ्यवशेनैव वाक्यार्थ: प्रथयन्नपि । यथा व्यापारनिष्पत्तौ पदार्थो न विभाव्यते।।1/11।। जिस प्रकार पदों का अर्थ अपने अर्थ व्यापार द्वारा ही वाक्य अर्थ को प्रात करता हुआ भी व्यापार के निष्पन्न हो जाने पर अलग से प्रतीत नही होता है।

तद्वत् सचेतसां सोर्थो वाच्यार्थविमुखात्मनाम्। बुद्धौ तत्वार्थदर्शिन्यां झटित्येवावभासते।।1/12।।

उसी प्रकार वह प्रतीयमान अर्थ वाच्य अर्थ से विमुख रहने वाले सहृदयों के तत्वार्थ का दर्शन करने में समर्थ बुद्धि में तुरंत ही प्रकाशित हो जाता है।

Question 29

'सोऽर्थस्तद्व्यक्तिसामर्थ्ययोगी'- अत्र 'सः' पदस्य क आशयः-

  1. AOption (a)

    शब्दः

  2. BOption (b)

    व्यंग्यः

  3. COption (c)

    लक्ष्यः

  4. DOption (d)

    वाच्यः

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Correct answer

Answer: (b)B.

व्यंग्यः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- 'सोऽर्थस्तद्व्यक्तिसामर्थ्ययोगी'- यहाँ 'सः' पद का आशय है- 

स्पष्टीकरण- 'सोऽर्थस्तद्व्यक्तिसामर्थ्ययोगी'- यहाँ 'सः' पद का आशय व्यंग्य है। 

ध्वन्यालोक-

  • प्रस्तुत कारिकांश ध्वन्यालोक के प्रथम उद्योत की है। ध्वन्यालोक आचार्य आनन्दवर्धन की सर्वोत्कृष्ट कृति है।
  • आचार्य आनन्दवर्धन काव्यशास्त्र के एक प्रमुख सम्प्रदाय ‘ध्वनि-सम्प्रदाय‘ के प्रवर्तक है। उन्होंने ध्वन्यालोक में इस ध्वनि सिद्धान्त की स्थापना की।
  • यह ग्रंथ चार उद्योतों में विभाजित है। इस ग्रंथ पर अभिनवगुप्तकृत लोचन टीका प्राप्त होती है। इसके प्रथम उद्योत में काव्यलक्षण ‘कावस्यात्मा ध्वनिः’ काव्य की आत्मा ध्वनि है, का प्रतिपादन किया गया है।
  • इसके बाद वाच्यादि को बताते हुए प्रतीयमान अर्थ या व्यंग्य अर्थ को बताते हैं- प्रतीयमानं पुनरन्यदेव वस्त्वस्ति वाणीषु महाकवीनाम्। यत् तत् प्रसिद्धावयवातिरिक्तं विभाति लावण्यमिवाङ्गनासु॥ (१\४)
  • अर्थात वह प्रतीयमान या व्यंग्य अर्थ कुछ और ही चीज है जो रमणियों के प्रसिद्ध (मुख, नेत्र, श्रोत्र, नासिकादि) अवयवों से भिन्न उनके लिए लावण्य के समान, महाकवियों की सूक्तियों में वाच्य अर्थ से अलग ही भासित होता है। प्रतीयमान के तीन भेद हैं - वाच्य, अलंकार, रसध्वनि। इसलिय तृतीय प्रभेद रसध्वनि है। आचार्य आनन्दवर्धन ने निम्न कारिकाओं में प्रतीयमान अर्थ के विषय में बताया है-

सरस्वती स्वादु तदर्थवस्तु निष्यन्दमाना महतां कवीनाम्। आलोकसामान्यमभिव्यनक्ति परिस्फुरन्तं प्रतिभाविशेषम्।।1/6 ।।

अर्थात उस तत्त्व को प्रवाहित करने वाली महान कवियों की वाणी परिस्फूरित होते हुए प्रतिभा के विशेष को अभिव्यक्त करती है। जिसके कारण इस अतिविचित्र कवियों की परम्परा को वहन  करने वाले संसार में कालिदास आदि दो - तीन या पाँच - छह ही महाकवि गिने जाते हैं ।

शब्दार्थ-शासनज्ञानमात्रेणैव न वेद्यते। वेद्यते स तु काव्यार्थतत्वज्ञैरेव केवलम्।।1/7।।

अर्थात वह प्रतीयमान अर्थ या व्यंग्य अर्थ केवल शब्द शास्त्र के जानने से विदित नही होगा अपितु केवल काव्य के अर्थ के तत्त्व को जानने वाले को होगा ।

सोर्थस्तद्व्यक्तिसामर्थ्ययोगी शब्दश्च कश्चन । यत्नय: प्रत्यभिज्ञेयौ तौ शब्दार्थौ महाकवे: ।1/8।।

यह प्रतीयमान अर्थ या व्यंग्य अर्थ और उस प्रतीयमान अर्थ या व्यंग्य अर्थ को अभिव्यक्त करने की सामर्थ्य से युक्त जो कोई विशेष शब्द है। इन दोनों शब्द और अर्थ को पहचानना चाहिए।

Question 30

महाकविकालिदासस्य प्रसिद्धौ कस्यालङ्कारस्योदाहरणरूपेण उपयोगः क्रियते-

  1. AOption (a)

    उपमालङ्कारस्य

  2. BOption (b)

    उत्प्रेक्षालङ्कारस्य

  3. COption (c)

    समासोक्त्यलङ्कारस्य

  4. DOption (d)

    अतिशयोक्त्यलङ्कारस्य

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Correct answer

Answer: (a)A.

उपमालङ्कारस्य

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प्रश्नानुवाद- महाकवि कालिदास की प्रसिद्धि में किस अलंकार का प्रयोग उदाहरण रूप में किया जाता हैं?

स्पष्टीकरण- महाकवि कालिदास की प्रसिद्धि में उपमा अलंकार का प्रयोग उदाहरण रूप में किया जाता हैं। 

कालिदास भारत के श्रेष्ठतम संस्कृत कवियों में से एक है। इनको राजा विक्रमादित्य के दरबार के नौरत्न में शामिल किया गया था। इनका जन्म स्थान मुख्य रूप से उज्जैन माना जाता है। इनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं-

  1. महाकाव्य- रघुवंश, कुमारसम्भव
  2. खण्डकाव्य- मेघदूत, ऋतुसंहार
  3. रूपक- अभिज्ञानशाकुन्तल, विक्रमोर्शीय (त्रोटक), मालविकाग्निमित्र

 

इनके रचनाओं में मुख्य रूप से शृंगार रस प्रतीत होता है। कवि जगत में इनकी प्रसिद्धि उपमा अलंकार के प्रयोग से है। इसकी पुष्टि आचार्य उद्भट ने अपने ग्रन्थ ‘काव्यालंकारसारसंग्रह’ में निम्न पद्य से की है- 

उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवम्।

दण्डिनः (नैषधे) पदलालित्यं माघे सन्ति त्रयो गुणाः।।         

अर्थात महाकवि कालिदास की विशिष्टता उपमा के कारण है, भारवि का प्रधान गुण अर्थगौरव है, दण्डी (या नैषधचरित) की विशिष्टाता पदलालित्य के कारण है तो माघ में तीनों गुणों का समन्वित प्रयोग प्रमुख वैशिष्टय है।

Question 31

रथाङ्गपाणेः पटलेन रोचिषामृषित्विषः संवलिताविरेजिरे।

चलत्पलाशान्तरगोचरास्तरोस्तुषारमूर्तेरिव नक्तमंशवः।।

  • अस्मिन् श्लोके 'तुषारमूर्ति' इति शब्दः कस्य वाचकः?
  1. AOption (a)

    सूर्यस्य

  2. BOption (b)

    चन्द्रस्य

  3. COption (c)

    श्रीकृष्णस्य

  4. DOption (d)

    रथस्य

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Correct answer

Answer: (b)B.

चन्द्रस्य

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प्रश्नानुवाद- इस श्लोक में ‘तुषारमूर्ति’ यह शब्द किसका वाचक है?

स्पष्टीकरण- इस श्लोक में ‘तुषारमूर्ति’ यह चंद्र का वाचक है। 

प्रस्तुत पंक्ति महाकवि माघ द्वारा प्रणीत एकमात्र महाकाव्य शिशुपालवध से है। इस काव्य में 20 सर्ग है। य��� किरातार्जुनीय तथा नैषधीयचरित के साथ बृहत्त्रयी के अन्तर्गत आता है। इसके प्रथम सर्ग में नारद जी की कान्ति की हरि के श्यामल किरणों से मिश्रित होने का वर्णन किया गया है-

रथाङगपाणे  पटलेन रोचिषामृषित्विषः संवलिताविरेजिरे ।

चलत्पलाशान्तरगोचरास्तरोस्तुषारमूर्तेरिव नक्तमंशवः॥(1\21)

अर्थ- चक्रपाणि (श्रीकृष्ण)  के कान्तिपुञ्ज से मिली हुई मुनि की किरणें रात्रि में हिलते-डुलते पत्तों के बीच में पड़ने वाली चन्द्र किरणों की तरह सुशोभित हुई। 

शब्दार्थ- 

रथाङ्गपाणेः - हाथ में चक्र धारण करने वाले (श्रीकृष्ण)

ऋषित्विषः - नारद जी की आभायें

नक्त्तम् - रात में

तुषारमूर्तेः - हिम शरीर वाले चन्द्रमा की 

अंशवः - किरणें 

विरेजिरे - सुशोभित हुई

Question 32

भोजप्रबन्धानुसारं शिलालेख-लिपिवाचनं कथ्यते-

  1. AOption (a)

    लिपिपरीक्षा

  2. BOption (b)

    शिलापरीक्षा

  3. COption (c)

    जतुपरीक्षा

  4. DOption (d)

    पाण्डुपरीक्षा

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Correct answer

Answer: (c)C.

जतुपरीक्षा

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प्रश्नानुवाद- भोजप्रबन्ध के अनुसार शिलालेख का लिपिवाचन कहा जाता है-

स्पष्टीकरण- भोजप्रबन्ध के अनुसार शिलालेख का लिपिवाचन जतुपरीक्षा कहा जाता है।

भोजप्रबंध-

भोजप्रबंध, कवि बल्लाल की रचना है। बल्लाल के संबंध में प्रामाणिक जानकारी नहीं है। इतना ही पता चलता है कि बल्लाल दैवज्ञ अथवा बल्लाल मिश्र नामक एक काशीनिवासी विद्वान् था। उसके पिता का नाम त्रिमल्ल था।

भोजप्रबंध के अंत:साक्ष्य के आधार पर कहा जा सकता है कि बल्लाल का समय कहीं ई॰ 16वीं शताब्दी होगा।

भोजप्रबन्ध राजा भोज पर आश्रित दन्तकथाओं का एक संग्रह ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में कालिदास आदि अनेक कवियों को किम्वदंतियों और कल्पनाओं के आधार पर राजा भोज के समकालीन दर्शाया है। 

भोजप्रबन्ध की एक कथा में नर्मदा की एक बड़ी झील में धीवरों ने कुछ मिटे हुए अक्षरों वाला एक पत्थर देखा। उस पर लिखे लेख का जतु (लाख) द्वारा परीक्षण कर के शुद्धपाठ ज्ञात किया, इसी प्रक्रिया को भोज प्रबन्ध में जतुपरीक्षा कहा गया है- ततः किमिदं लिखितामित्यवश्यं विचार्यमिति लिपिज्ञानं कार्यं। जतुपरीक्षा अक्षराणि परिज्ञाय पठति। अर्थात यहाँ क्या लिखा है यह अवश्य ही विचार करने योग्य है, अतः लिपिकार्य करना चाहिये। जतुपरिक्षा अक्षरों को जानने के लिए उनका पाठ करना है। अतः भोजप्रबन्ध अनुसार शिलालेख लिपिवाचन को ‘जतुपरीक्षा’ कहा जाता है।

Question 33

मनुस्मृतिकारेण 'नारा' इति शब्देन किं गृहीतम्?

  1. AOption (a)

    आपः

  2. BOption (b)

    मनुष्यः

  3. COption (c)

    पशुः

  4. DOption (d)

    पक्षी

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Correct answer

Answer: (a)A.

आपः

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प्रश्नानुवाद- मनुस्मृति के अनुसार ‘नारा’ शब्द से क्या गृहीत है?

स्पष्टीकरण- मनुस्मृति के अनुसार ‘नारा’ शब्द से ‘आप’ या ‘जल’ गृहीत है।

मनुस्मृति- 

धर्मशास्त्र का प्राचीनतम ग्रन्थ ‘मनुस्मृति’ है जो बहुत लोकप्रिय तथा प्रमाण रूप में रखा जाने वाला ग्रन्थ है। इसमें समाजशास्त्र, नीतिशास्त्र, धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र सभी का समावेश है।

अतः समाजिक व्यवस्था का आधारभूत ग्रंथ है। भारतीय वाङ्मय में मनु को मानव-जाति का जनक कहां जाता है, इसीलिए मनु का धर्मशास्त्र मानवमात्र के लिए निर्मित प्रथम तथा शाश्वत धर्मों का विवेचन करता है।

वर्तमान में मनुस्मृति में 12 अध्याय हैं। इसके प्रथम अध्याय में सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन है। इसके कुछ महत्वपूर्ण अंशो का निरूपण निम्नवत् है- 

आपो नारा इति प्रोक्त आपो वै नरसूनवः। ता यदस्यायनं पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः॥

जल को नारा कहते हैं क्योंकि जल नर(रूप परमात्मा) से उत्पन्न हुआ है। यही जल परमात्मा का प्रथम वासस्थान है इस कारण परमात्मा ‘नारायण’ कहा गया है। 

यत्तत्कारणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम्। तद्विसृष्टः स पुरुषो लोके ब्रह्मेति कीर्त्यते॥ 

लोक और वेद में प्रसिद्ध, अव्यक्त नित्य और सत् असत् का आत्मा ऐसा कारण से उत्पन्न हुआ वह पुरुष ‘ब्रह्मा’ इस नाम से संसार में विख्यात है।

तदण्डमभवद्धैमं सहस्त्रांशुसमप्रभम्। तस्मिञ्जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः॥

वह बीज सूर्य के समान कान्ति वाला सुवर्ण का अण्डा हो गया और उसमें सब लोकों का कर्ता ब्रह्मा स्वयं उत्पन्न हुआ। 

आचारः परमो धर्मः।

वेद और स्मृति दोनों में कहा गया है- आचार ही परम धर्म है।

Question 34

महाभारतस्य 'खिल' पर्व कथ्यते-

  1. AOption (a)

    मत्स्यपुराणम्

  2. BOption (b)

    स्कन्दपुराणम्

  3. COption (c)

    हरिवंशपुराणम्

  4. DOption (d)

    पद्मपुराणम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

हरिवंशपुराणम्

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प्रश्ननुवाद- महाभारत का खिल पर्व कहा जाता है-

स्पष्टीकरण- महाभारत का खिल पर्व ‘हरिवंशपुराण’ कहा जाता है।

महाभारत भारतीय साहित्य के उत्कृष्ट ग्रंथो में से एक है। यह आर्षकाव्यों में से एक है। यह इतिहास काव्य भी कहलाता है। इसका विकास तीन चरणों में हुआ- 

  1. जय (8800 श्लोक)
  2. भारत (24000 श्लोक)
  3. महाभारत (100000 श्लोक)

महाभारत का विभाजन 18 पर्वों में विभक्त है। जिनका निरूपण निम्नवत् है- आदिपर्व, सभापर्व, वनपर्व, विराटपर्व, उद्योगपर्व, भीष्मपर्व, द्रोणपर्व, कर्णपर्व, शल्यपर्व, सौप्तिकपर्व, स्त्रीपर्व, शांतिपर्व, अनुशासनपर्व, आश्वमेधिकपर्व, आश्रमवासिकपर्व, मौसलपर्व, महाप्रस्थानिकपर्व, स्वर्गारोहणपर्व। 

इनके अतिरिक्त एक परिशिष्ट पर्व भी है जिसे खिल पर्व भी कहते है। इस पर्व का नाम ‘हरिवंशपुराण’ है। इसमें 16374 श्लोक हैं। इसे भी वैशम्पायन ने जनमेजय को सुनाया था। यह भी महाभारत के समान अनेक लेखकों की रचना के रूप में है। इस ग्रन्थ के तीन खण्ड (पर्व) हैं- हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व और भविष्यपर्व। 

  1. हरिवंशपर्व में कृष्ण के वंश (वृष्णि, अन्धक) की कथा विस्तार से वर्णित है, इसी के नाम पर पूरे ग्रंथ का नाम दिया गया है। पुराणों की दृष्टि से सृष्टि का वर्णन ध्रुव, दक्ष, वेन और पृथु के आख्यान, सूर्यवंश के वर्णन के प्रसंग में विश्वामित्र और वसिष्ठ की कथा एवं चंद्रवंश के वर्णनक्रम में उर्वशी पुरुरवा नहुष, ययाति, यदु, वसुदेव तथा कृष्ण की कथाएँ वर्णित हैं।
  2. विष्णुपर्व सबसे बड़ा भाग है जिसमें महाभारत के नायक कृष्ण की विविध लीलाओं का वर्णन है। कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न तथा पौत्र अनिरुद्ध के विवाहों का भी विस्तृत विवरण है। भागवत में निरूपित कृष्णकथा से कहीं- कहीं विवरणों में पार्थक्य है। अतः प्राचीनतम कृष्णकथा का प्रतिनिधित्व इसमें मिलता है।
  3. भविष्यपर्व में विविध वृत्तों का पौराणिक शैली में परस्पर असम्बद्ध विवरण है। विष्णु के अवतारों का वर्णन, शिव और विष्णु की उपासना का समन्वय एवं शिव के दो उपासकों (हंस तथा डिम्भ) की कृष्ण द्वारा पराजय की कथा के अतिरिक्त अन्त में महाभारत और हरिवंश के माहात्म्य का निरूपण है।

ध्वन्यालोक में आनन्दवर्धन ने कहा है कि कृष्णद्वैपायन ने महाभारत का हरिवंश के द्वारा समापन करके शान्तरस की पुष्टि की है। इस प्रकार हरिवंश को प्राचीन काल से ही महाभारत का अंश माना गया है। आदिपर्व के द्वितीयाध्याय में जो महाभारत में १०० पर्व माने गये हैं उनमें हरिवंश भी सम्मिलित हैं। अतः महाभारत के परिशिष्ट के रूप में स्वतंत्र ग्रंथ होने के कारण हरिवंशपुराण को खिलपर्व कहा जाता है।

Question 35

संस्कृत-आलोचना-परम्परायां वाल्मीकिरामायणं कीदृशं काव्यं मन्यते?

  1. AOption (a)

    अरससिद्धकाव्यम्

  2. BOption (b)

    सिद्धरसकाव्यम्

  3. COption (c)

    असिद्धरसकाव्यम्

  4. DOption (d)

    सिद्धासिद्धरसकाव्यम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

सिद्धरसकाव्यम्

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प्रश्नानुवाद- संस्कृत आलोचना परम्परा में वाल्मीकि रामायण कैसा काव्य मानते है?

स्पष्टीकरण- संस्कृत आलोचना परम्परा में वाल्मीकि रामायण रससिद्ध काव्य मानते है। 

  • रामायण संस्कृत का प्रथम महाकाव्य है। इसे ‘आर्षकाव्य’ भी कहते है। भारतीय जन-मानस में प्रतिष्ठित राम-सीता की कथा का सर्वप्रथम विवरण ‘रामायण’ में ही मिलता है।
  • महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की थी। अतः वाल्मीकि को ‘आदिकवि’ कहा गया है।
  • रामायण का विभाजन सात काण्डों में विभक्त है- यह काव्य का आदिरूप है जिसकी रचना बालकाण्ड,  अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, युद्धकाण्ड, उत्तरकाण्ड।
  • प्रत्येक काण्ड सर्गों में विभक्त है। सर्गों में रमणीय संस्कृत पद्य हैं जो अनुष्टुप्, उपजाति, वंशस्थ आदि सुन्दर गेयात्मक छंदों में निबन्ध हैं। सर्वाधिक संख्या अनुष्टुप् छन्द की है जिसे ‘श्लोक’ भी कहा जाता है।
  • सम्पूर्ण ग्रन्थ में 24 सहस्त्र पद्य या श्लोक हैं। इसीलिए इसे ‘चतुर्विंशति सहस्र संहिता’ कहते हैं।
  • परवर्ती कवियों, नाटककारों तथा गद्य-लेखकों ने रामायण की कथा का अनुहरण अपने ग्रंथों में किया है, इसकी शैली का अनुसरण भी किया है। रामकथा का विभिन्न भाषाओं, प्रदेशों तथा विदेशों में भी जो रूपांतर करके रामायण ग्रन्थ लिखे गये है, उन सब का उपजीव्य यही है।
  • रामायण की जीवनी शक्ति या स्थिरता का संकेत स्वयं इस ग्रन्थ में ही किया गया है- यावत्स्थास्यन्ति गिरयः सरितश्च महितले। तावद् रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति॥ अर्थात जब तक धरती पर पर्वत और नदियाँ है तब तक लोक में रामायण की कथा का प्रचार रहेगा। आचार्य आनन्दवर्धन प्रणीत ध्वन्यालोक में रामायण को ‘सिद्धरस’ कहा गया है-

 

सन्ति सिद्धरसप्रख्या ये च रामायणादयः। 

कथाश्रया न तैर्योज्या स्वेच्छाः रसविरोधिनी॥ 

अर्थात् सिद्धरस के समान रामायण आदि जो कथा के आश्रय हैं, उनमें स्वेच्छा का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि स्वेच्छा रस की विरोधिनी होती है। 

‘सिद्धरसप्रख्या’ पद के सिद्ध शब्द का अर्थ है कि वे केवल आस्वादन के ही योग्य हैं। उनमें रस भवनीय नहीं है। कथाओं के आश्रय इतिहास हैं। उन इतिहासों के अर्थों के साथ स्वेच्छा को नहीं जोड़ना चाहिये।

Question 36

कौटिलीयमते प्रव्रज्याप्रत्यवसितः प्रज्ञाशौचयुक्तः गूढपुरुषोऽस्ति-

  1. AOption (a)

    कापटिकः

  2. BOption (b)

    गृहपतिकः

  3. COption (c)

    वैदेहकः

  4. DOption (d)

    उदास्थितः

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Correct answer

Answer: (d)D.

उदास्थितः

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प्रश्नानुवाद- कौटिल्य के मत में बुद्धिमान्, सदाचारी, संन्यासी के वेष में रहने वाला गुप्तचर है-

स्पष्टीकरण- कौटिल्य के मत में बुद्धिमान्, सदाचारी, संन्यासी के वेष में रहने वाला गुप्तचर उदास्थित है।

कौटिल्य के द्वारा रचित अर्थशास्त्र नामक ग्रंथ एक धर्मशास्त्रीय ग्रंथ हैं जिसमें धर्मशास्त्र के अतिरिक्त राज्यव्यवस्था, कृषि, न्याय एवं राजनीति आदि के विभिन्न पक्षों पर विचार किया गया है। इस ग्रंथ का विभाजन 15 अधिकरणों में हुआ है। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र के प्रथम अधिकरण ‘विनयाधिकरण’ में गुप्तचरों की नियुक्ति के विषय में बताया है। उनके अनुसार गुप्तचर दो प्रकार के होते हैं- भ्रमणशील और स्थायी। भ्रमणशील गुप्तचर चार प्रकार के होतें हैं- सत्री (राजा के सम्बन्धी), तीक्ष्ण (शूर), रसद (आलसी) तथा भिक्षुकी। स्थायी गुप्तचर पाँच प्रकार के होते हैं-

  1. परमर्मज्ञः प्रगल्भश्छात्रः कापटिकः। (दूसरों के रहस्य को जानने वाला, बड़ा प्रगल्भ और विद्यार्थी की वेष-भूषा में रहने वाला गुप्तचर कापटिक कहलाता है।)
  2. प्रव्रज्याप्रत्यवसितः प्रज्ञाशौचयुक्त उदास्थितः। (बुद्धिमान्, सदाचारी, सन्यासी के वेष में रहने वाले गुप्तचर का नाम उदास्थित है।)
  3. कर्षको वृत्तिक्षीणः प्रज्ञाशौचयुक्तो गृहपतिकव्यंजनः। (बुद्धिमान्, पवित्र हृदय और गरीब किसान के वेष में रहने वाले गुप्तचर को गृहपतिक कहते हैं।)
  4. वाणिजको वृत्तिक्षीणः प्रज्ञाशौचयुक्तो वैदेहक-व्यंजनः। (बुद्धिमान्, पवित्र हृदय और गरीब व्यपारी के वेष में रहने वाला गुप्तचर वैदहक है।)
  5. मुण्डो जटिलो वा वृत्तिकामस्तापसव्यंजनः। (जीविका के लिय सिर मुड़ाये या जटाधारण किये हुए राजा का कार्य करने वाला तापस गुप्तचर ही तापस है।)

Question 37

''ब्रह्मचर्यं भूमौ शय्या जटाऽजिनधारणमग्निहोत्राभिषेकौ देवतापित्रतिथिपूजा वन्यश्चाहारः" इति कौटिलीयमते कस्य धर्मोऽस्ति?

  1. AOption (a)

    ब्रह्मचारिणः

  2. BOption (b)

    गृहस्थस्य

  3. COption (c)

    वानप्रस्थस्य

  4. DOption (d)

    परिव्राजकस्य

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Correct answer

Answer: (c)C.

वानप्रस्थस्य

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद-  “ब्रह्मचर्य, भूमि शय्या, जटाजिन धारण, अग्निहोत्र, अभिषेक, देव, पितर एवं अभ्यागतों की पूजा, वन्याहार” कौटिल्य के मत में किसके धर्म हैं?

स्पष्टीकरण- “ब्रह्मचर्य, भूमि शय्या, जटाजिन धारण, अग्निहोत्र, अभिषेक, देव, पितर एवं अभ्यागतों की पूजा, वन्याहार” कौटिल्य के मत में वानप्रस्थों का धर्म है। 

कौटिल्य के द्वारा रचित अर्थशास्त्र नामक ग्रंथ एक धर्मशास्त्रीय ग्रंथ हैं जिसमें धर्मशास्त्र के अतिरिक्त राज्यव्यवस्था, कृषि, न्याय एवं राजनीति आदि के विभिन्न पक्षों पर विचार किया गया है। इस ग्रंथ का विभाजन 15 अधिकरणों में हुआ है। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र के प्रथम अधिकरण ‘विनयाधिकरण’ में चारों आश्रमों का वर्णन है। इसका निरूपण निम्नवत् है- 

  1. ब्रह्मचारिणः स्वाध्यायोअग्निकार्याभिषेकौ भैक्षव्रतत्त्वमाचार्यो प्राणन्तिकी वृत्तिस्तदभावे गुरुपुत्रे सब्रह्मचारिणि वा। (ब्रह्मचारी का धर्म है कि वह नियमित स्वाध्याय करें, अग्निहोत्र करे, नित्य स्नान करे, गुरु के लिए प्राण तक त्यागने को उद्यत रहे, भीक्षाटन करे, गुरु की अनुपस्थिति में गुरुपुत्र अथवा अपने किसी समान शाखाध्यायी के निकट रहे।)
  2. गृहस्थस्य स्वकर्माजीवस्तुल्यैरसमानर्षिभिवाह्यमृतुगामित्वं देवपित्रतिथिभृत्येषु त्यागः शेषभोजनं च। (गृहस्थ अपनी परम्परा के अनुकूल कार्यों द्वारा जीविकोपार्जन करें, अनुरूप श्रेणी के व्यक्तियों तथा असगोत्र समाज में विवाह, ऋतुगामी हो, देव, पितर, अथिति और भृत्यजनों को देकर सबसे अन्त में भोजन करें।)
  3. वानप्रस्थस्य ब्रह्मचर्यं भूमौ शय्या जटाअजिनधारणमग्निहोत्राभिषेकौ देवतापित्रतिथिपूजा वन्यश्चाहारः। (वानप्रस्थी का धर्म है- ब्रह्मचर्यपूर्वक रहना, अग्निहोत्र तथा प्रतिदिन स्नान करना, देव, पितर एवं अभ्यागतों की सेवा- पूजा करना और वन के कन्द मूल फल पर निर्वाह करना।)
  4. परिव्राजकस्य संयतेन्द्रियत्वमनारम्भो निष्किञ्चनत्वं सङ्गत्यागो भैक्षमनेकात्रारण्यवासो बाह्यभ्यन्तरं च शौचम्। (सन्यासी का धर्म- जितेंद्रिय होना, वह किसी भी सांसारिक कार्य को न करे, निष्किंचन बना रहे, एकाकी रहे, प्राणरक्षा मात्र के लिए स्वल्प आहार, समाज में न रहे, जंगल में भी एक स्थान पर न रहता रहे, मन, वचन, कर्म से अपना बाह्यभ्यन्तर पवित्र रखे।)

Question 38

वैशेषिकदर्शनानुसारं सप्तपदार्थेषु न गण्येते-

(a) पुरुषः

(b) विशेषः

(c) गुणः

(d) अहङ्कारः

समुचितं विकल्पमत्र चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) एवं (c)

  2. BOption (b)

    (b) एवं (c)

  3. COption (c)

    (c) एवं (d)

  4. DOption (d)

    (a) एवं (d)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(a) एवं (d)

Why this answer is correct

प्रश्ननुवाद- वैशेषिक दर्शन के अनुसार सप्त पदार्थों में गणना नहीं होती-

स्पष्टीकरण- वैशेषिक दर्शन के अनुसार सप्त पदार्थों में पुरुष और अहंकार की गणना नहीं होती।

वैशेषिक दर्शन-

  • वैशेषिक दर्शन, भारतीय आस्तिक दर्शनों में से एक है।
  • इसके मूल प्रवर्तक ऋषि कणाद हैं। इनके ग्रन्थ का नाम वैशेषिकसूत्र है।
  • यह दर्शन "औलूक्य" और "काणाद" के नामों से भी प्रसिद्ध है।
  • वस्तुतः वैशेषिकसूत्र में 6 पदार्थों की ही चर्चा है। किन्तु इसके अन्नम्भट्टप्रणीत तर्कसंग्रह नामक प्रकरण ग्रंथ में सप्तपदार्थों की चर्चा है- द्रव्यगुणगुणसामान्यविशेषसमवायाभावाः सप्तपदार्थाः। अर्थात् द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव ये सात ही पदार्थ हैं।

इन सप्त पदार्थों का निरूपण निम्नलिखित है- 

  1. द्रव्य- पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशकालदिगात्ममनांसि नवैव अर्थात् उन पदार्थों में द्रव्यों की संख्या नौ है- पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन।
  2. गुण- रूप-रस-गन्ध-स्पर्श-संख्या-परिमाण-पृथक्त्व-संयोग-विभाग-परत्वापरत्व-गुरुत्व-द्रवत्व-स्नेह-शब्द-बुद्धि-सुख-दुःखेच्छा-द्वेष-प्रयत्न-धर्माधर्म- संस्कराश्चतुर्विंशतिर्गुणाः अर्थात् रूप, रस, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्वापरत्व, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, शब्द, बद्धि, सुख, दुःख,  द्वेष, प्रयत्न, धर्म,अधर्म और  संस्कार ये चौबीस गुण हैं।
  3. कर्म- उत्क्षेपणापक्षेणाकुञ्चनप्रसारणगमनानि पञ्चकर्माणि अर्थात् उत्क्षेपण, अवक्षेपण, आकुञ्चन, प्रसारण और गमन- ये पाँच कर्म हैं।
  4. सामान्य- परमपरं चेति द्विविधं सामान्यम्। पर (सामान्य) और अपर (सामान्य) यह दो प्रकार का सामान्य (जाति) है।
  5. विशेष- नित्यद्रव्यवृत्तयो विशेषास्त्वनन्ता एव अर्थात् नित्यद्रव्यों में रहने वाले विशेष पदार्थ हैं और वे अनन्त हैं।
  6. समवाय- नित्यसम्बंध: समवाय: अर्थात्  नित्य सम्बंध को समवाय कहते है।
  7. अभाव- अभावश्चतुर्विधः प्रागभावः, प्रध्वंसाभावो अत्यन्ताभावोअन्योन्याभावश्चेति अर्थात् अभाव पदार्थ चार प्रकार का होता है-  प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव और अन्योन्याभाव।

Question 39

आधिदैविकदुःखेषु गण्येते-

(a) झञ्झावातः

(b) अश्वाघातः

(c) पश्वाघातः

(d) भूकम्पः

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) एवं (c)

  2. BOption (b)

    (a) एवं (d)

  3. COption (c)

    (c) एवं (d)

  4. DOption (d)

    (b) एवं (c)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(a) एवं (d)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- आधिदैविक दुःखों में गणना होती है- 

स्पष्टीकरण- आधिदैविक दुःखों में झञ्झावात और भूकम्प की गणना होती है।

साङ्ख्यकारिका-  

भारतीय आस्तिक दर्शनों में सबसे प्राचीन सांख्य है। इसके प्रवर्तक कपिल मुनि है। इनके ग्रन्थ का नाम ‘सांख्य सूत्र’ है। सांख्य दर्शन वे विभिन्न विषयों में से एक है- दुःखत्रयवाद । ईश्वरकृष्ण द्वारा प्रणीत सांख्यकारिका इस दर्शन का प्रकरण ग्रन्थ है। इसके प्रथम कारिका में त्रिविध दुःखों की चर्चा है।- 

कारिका- दुःखत्रयाभिघाताज् जिज्ञासा तदपघातके हेतौ। दृष्टे साअपार्था चेन्नैकान्तात्यन्ततोअभावात्।। 

कारिकार्थ- त्रिविध दुःखों द्वारा किए गए अभिघात के कारण उनके विनाश करने वाले कारण के सम्बन्ध में जिज्ञासा अत्यन्त स्वाभाविक होती है। दृष्ट उपायों से उस जिज्ञासा की पूर्ति नहीं होगी। यतोहि दृष्ट उपायों से निश्चित रूप से और सदा के लिए दुःखों का का विनाश सम्भव नहीं है।  

ये तीन प्रकार के दुःख निम्नलिखित है- 

  1. आध्यात्मिक- दुःख जिसका आत्मिक या आन्तरिक तत्त्वों से सम्बन्ध है। यह दो प्रकार का होता है- शारीरिक और मानसिक। जो शरीर के प्रमुख तत्त्व वात, पित्त और कफ की विषमता के कारण उत्पन्न होता है, शारीरिक दुःख कहलाता है। जैसे- ज्वरादि। यह भी दो प्रकार का होता है- नैसर्गिक (भूखादि), त्रिदोषजन्य (ज्वरादि)। काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय और ईर्ष्या आदि भावों के कारण उत्पन्न होने वाला दुःख मानसिक कहलाता है।
  2. आधिभौतिक- बाह्यकारणों अथवा पदार्थों जिन्हें हम देख सकते हैं, से उत्पन्न होने वाला दुःख आधिभौतिक कहलाता है। जैसे- पशु, पक्षी, सर्प, मनुष्य आदि पदार्थों से उत्पन्न दुःख अथवा कष्ट।
  3. आधिदैविक- प्रत्यक्ष न दिखाई देने वाली देवयोनियों जैसे- देवता, यक्ष, राक्षस, विकार, ग्रहादि के दुष्प्रभाव से होने वाला कष्ट आधिदैविक कहलाता है। आधिदैविक दुःखों में झञ्झावात और भूकम्प की गणना होती है। यतोहि ये देव जनित माने जाते है।

Question 40

अधोऽङ्कितेषु योगसूत्रानुसारं योगाङ्गेषु गण्येते-

(a) स्वाध्यायः

(b) निरुद्धम्

(c) प्रत्यक्षम्

(d) समाधिः

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) एवं (d)

  2. BOption (b)

    (a) एवं (b)

  3. COption (c)

    (a) एवं (c)

  4. DOption (d)

    (b) एवं (d)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(a) एवं (d)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- निम्नलिखित में से योग दर्शन के अनुसार योगाङ्गों में गणना होती है- 

स्पष्टीकरण- योग दर्शन के अनुसार योगाङ्गों में स्वाध्याय और समाधि की गणना होती है। 

भारतीय आस्तिक दर्शनों में सबसे प्राचीन सांख्य है। उसके बाद योग दर्शन का स्थान आता है। इसके प्रवर्तक पतंजलि मुनि है। इनके ग्रन्थ का नाम ‘योग सूत्र’ है। इसमें चार पाद है - समाधि, साधन, विभूति तथा कैवल्य। योग दर्शन में चित्त के विकारों के निरोध के मोक्ष की प्राप्ति को स्वीकार किया गया है। चित्त के विकारों के निरोध के लिए योगाङ्गों को साधन माना गया है। ये योगाङ्ग दो प्रकार है-

  1. अष्टांग योग- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि।
  2. क्रियायोग- तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान।

 

अतः स्वाध्याय और समाधि योगाङ्गों में गिने जाते हैं।

Question 41

अधस्तनेषु वेदान्तानुसारं षट्कसम्पत्तिषु गण्येते-

(a) श्रवणम्

(b) मननम्

(c) श्रद्धा

(d) समाधानम्

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) एवं (d)

  2. BOption (b)

    (b) एवं (c)

  3. COption (c)

    (c) एवं (d)

  4. DOption (d)

    (c) एवं (a)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(c) एवं (d)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- निम्नलिखित में से वेदान्तसार के अनुसार षट्क सम्पत्ति में गणना होती है- 

स्पष्टीकरण- वेदान्तसार के अनुसार षट्क सम्पत्ति में श्रद्धा और समाधान की गणना होती है। 

भारतीय आस्तिक दर्शनों में सबसे प्रचलित वेदान्त दर्शन सांख्य है। इसके प्रवर्तक बादरायण व्यास है। इनके ग्रन्थ का नाम ‘ब्रह्मसूत्र’ है। यह ग्रन्थ गीता और उपनिषद के साथ प्रस्थानत्रयी में गिना जाता है। योगीन्द्र सदानंद द्वारा प्रणीत ’वेदान्तसार’ इस दर्शन का प्रकरण ग्रन्थ है। इसका प्रथम विषय अनुबन्ध चतुष्ट्य है, जो निम्नलिखित है- 

  1. अधिकारी
  2. विषय
  3. सम्बन्ध
  4. प्रयोजन

अधिकारी को साधन चतुष्ट्य सम्पन्न प्रमाता माना गया है, जो निम्नलिखित है- 

  1. नित्यानित्यवस्तुविवेक
  2. इहामुत्रार्थफलभोगविराग
  3. शमदमादिषट्कसम्पत्ति
  4. मुमुक्षुत्व

 

​शमदमादिषट्कसम्पत्ति में निम्नलिखित की गणना होती है-

  1. शम- श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन को छोड़कर मन को अन्य विषयों से हटाना।
  2. दम- श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन को छोड़कर इंद्रियों को अन्य विषयों से हटाना।
  3. उपरति- विषयों की ओर उन्मुख हो जाने के उत्साह से रहित होना।
  4. तितिक्षा- शीत-उष्ण आदि द्वंद्व को सहन करना।
  5. समाधान- वशीभूत मन का श्रवण आदि एवं उसके अनुकूल विषयों में स्थिर हो जाना।
  6. श्रद्धा- गुरु के वचनों तथा वेदान्त वाक्यों में श्रद्धा।

Question 42

अधस्तनेषु चित्तभूमिषु न गण्येते-

(a) चलम्

(b) मूढम्

(c) विक्षिप्तम्

(d) अचलम्

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) एवं (c)

  2. BOption (b)

    (a) एवं (d)

  3. COption (c)

    (c) एवं (d)

  4. DOption (d)

    (b) एवं (c)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(a) एवं (d)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- निम्नलिखित में से चित्त भूमियों में गणना नहीं होती है- 

स्पष्टीकरण- चित्त भूमियों में चल और अचल की गणना नहीं होती है। 

भारतीय आस्तिक दर्शनों में सबसे प्राचीन सांख्य है। उसके बाद योग दर्शन का स्थान आता है। इसके प्रवर्तक पतंजलि मुनि है। इनके ग्रन्थ का नाम ‘योग सूत्र’ है। इसमें चार पाद है - समाधि, साधन, विभूति तथा कैवल्य। योग दर्शन के अनुसार मानसिक अवस्थाओं को चित्तभूमि कहते है। महर्षि पतंजलि प्रथमपाद में पञ्चचित्तभूमियों को बताते हैं-

  1. क्षिप्त- रजोगुण के उद्रेक के कारण विषयों में ही व्यापृत रहने वाली चित्त की अवस्था क्षिप्त भूमि है।
  2. मूढ- तमोगुण के उद्रेक के कारण मूर्छादि व्यापारवान् चित्त की स्थिति मूढ भूमि कहीं जाती है।
  3. विक्षिप्त- इसमें किञ्चित् कालपर्यन्त समाधि लगने पर भी रजोगुण के जोर मारते रहने के कारण बीच में अन्य विषयों की ओर चित्त दौड़ जाता है चित्त की यह अवस्था उसकी विक्षिप्त नामक भूमि कही जाती है।
  4. एकाग्र- इस अवस्था में चित्त की सात्त्विकवृत्ति किसी एक विषय की ओर लगी रहती है। रजोगुण और तमोगुण दबे रहते हैं। अतः उस एक विषय की ओर अग्र या उन्मुख वृत्ति वाली अवस्था को एकाग्रभूमि कहते हैं।
  5. निरुद्ध- जिस अवस्था में चित्त की तामस और राजस वृत्तियों के साथ-साथ सात्त्विक वृत्ति का भी निरोध हो जाता है, केवल संस्कारमात्र चित्त में रहते हैं, उसे निरुद्ध भूमि कहते हैं।

Question 43

रामायणाश्रितं रचनाद्वयं किमस्ति?

  1. AOption (a)

    मालविकाग्निमित्रम्, रत्नावली 

  2. BOption (b)

    उत्तररामचरितम्, महावीरचरितम् 

  3. COption (c)

    प्रतिमानाटकम्, वेणीसंहारम्

  4. DOption (d)

    मालविकाग्निमित्रम्, स्वप्नवासवदत्तम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

उत्तररामचरितम्, महावीरचरितम् 

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प्रश्ननुवाद- रामायण पर आश्रित दो रचनाएँ कौन से हैं?

स्पष्टीकरण- रामायण पर आश्रित दो रचनाएँ है- उत्तररामचरित, महावीरचरित। 

रामायण संस्कृत महाकाव्य का प्रथम महाकाव्य है, अतः यह आदिकाव्य कहलाता है। इसके रचनाकार महर्षि वाल्मीकि है। इन्हें आदिकवि भी कहा जाता है। यह साथ कांडो में विभक्त है- बालकांड, अयोध्याकांड, आरण्यकांड, किष्किन्धाकांड, सुंदरकांड, युद्धकांड तथा उत्तरकांड । इसमें 24000 श्लोक है। इसमें भारतीय जन-मानस में प्रचलित राम-सीता की कथा है। इस कथा को आधार बनाकर बाद के कवियों ने कई ग्रंथ लिखें, अतः रामायण उपजीव्य ग्रंथ कहलाया। महाकवि भवभूति ने भी रामायण पर आश्रित दो रचनाएँ की जिनका वर्णन निम्नलिखित है- 

  1. महावीरचरितम्- यह महाकवि भवभूति की रचना है। यह 7 अंकों वाला एक नाटक है। इसमें रामायण के बालकांड से लेकर युद्धकांड तक की कथा का वर्णन है।
  2. उत्तररामचरितम्- यह महाकवि भवभूति की रचना है। यह 7 अंकों वाला एक नाटक है। इसमें रामायण के उत्तरकांड की कथा का करुण रस में वर्णन है।

Additional Informationअन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण- 

  • मालविकाग्निमित्रम्- यह महाकवि कालिदास की रचना है। यह 7 अंकों वाला एक नाटक है। इसमें मालविका-अग्निमित्र की प्रणय कथा वर्णन है।
  • रत्नावली- यह महाकवि हर्षवर्धन की रचना है। यह 4 अंकों वाली एक नाटिका है। इसमें उदयन-रत्नावली की प्रणय कथा वर्णन है।
  • प्रतिमानाटक- यह महाकवि भास की रचना है। यह 7 अंकों वाला एक नाटक है। इसमें राम के राज्याभिषेक के रुकने से लेकर पुनः लंका विजय के बाद के राज्याभिषेक का वर्णन है।
  • स्वप्नवासवदत्तम्- यह महाकवि भास की रचना है। यह 6 अंको वाला एक नाटक है। इसमें उदयन-वासवदत्ता की प्रणय कथा वर्णन है।
  • वेणीसंहार- यह महाकवि भट्टनारायण की रचना है। यह 6 अंको वाला एक नाटक है। इसमें भीम द्वारा दु:शासन के रक्त से द्रौपदी के केश सज्जा का वर्णन है।

Question 44

दीप्त्या च धैर्येण च यो रराज वालो रविर्भूमिमिवावतीर्णः।

तथातिदीप्तोऽपि निरीक्ष्यमाणो जहार चक्षूंषि यथा शशाङ्कः।।

  • श्लोकेऽस्मिन् किं छन्दः कश्चात्र अलङ्कारः?
  1. AOption (a)

    मालिनीवृत्तम्, परिकरालङ्कारः

  2. BOption (b)

    आर्यावृत्तम्, उत्प्रेक्षालङ्कारः

  3. COption (c)

    उपजातिवृत्तम्, उपमालङ्कारः

  4. DOption (d)

    वंशस्थवृत्तम्, रूपकालङ्कारः

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Correct answer

Answer: (c)C.

उपजातिवृत्तम्, उपमालङ्कारः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- इस श्लोक में कौन सा छन्द तथा अलंकार है?

स्पष्टीकरण- इस श्लोक में उपमा अलंकार तथा उपजाती छन्द है। 

यह श्लोक अश्वघोष कृत बुद्धचरित नामक महाकाव्य से लिया गया है। इसमें 28 सर्ग है। इसमें प्रथम सर्ग का नाम भगवत्प्रसूति है। 

श्लोक- दीप्त्या च धैर्येण च यो वालो रविर्भूमिमिवावतीर्णः। तथातिदीप्तोअपि निरीक्ष्यमाणो जहार चक्षुंषि यथा शशाङ्कः॥1/12।। 

अर्थ- तेज एवं धैर्य से वह (बुद्ध), भूमि पर आये हुए बाल सूर्य की भाँति, शोभित हुआ और अत्यन्त तेजस्वी होने पर भी, देखे जाने पर, नेत्र चन्द्रमा के समान हर लेता था।

उपमा अलंकार-

  • यहाँ उपमा अलंकार है।
  • आचार्य मम्मट के अनुसार उपमा का लक्षण है- साधर्म्यमुपमा भेदे। अर्थात् उपमान और उपमेय का भेद होने पर उनके साधर्म्य का वर्णन उपमा कहलाता है।
  • उपमा के प्रमुख अंग हैं- उपमेय, उपमान, साधारण धर्म और वाचक शब्द।
  • उपर्युक्त उदाहरण में बुद्ध उपमेय है, बालसूर्य उपमान है, तेज साधारणधर्म तथा ‘इव’ उपमानवाचक शब्द है।

उपजाति छंद-

  • यहाँ उपजाति छंद है।
  • वृत्तरत्नाकरकार ने अनुसार उपजाति का लक्षण है- अनन्तरोदीरितलक्ष्मभाजौ, पादौ यदीयावुपजातयस्ताः। अर्थात् जिस छन्द के दो चरण इन्द्रवज्रा तथा उपेन्द्रवज्रा के लक्षण से युक्त हो, उसे उपजाति छन्द कहते हैं। इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा की भाँति इसमें चार पाद  है। प्रत्येक पाद में 11 वर्ण है।
  • इसके पहले तथा दूसरे पाद में इंद्रवज्रा का लक्षण घटित हो रहा है- स्यात् इंद्रवज्रा यदि तौ जगौ गः। इसके तीसरे तथा चौथे पाद में उपेन्द्रवज्रा का लक्षण घटित हो रहा है- उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गः।

Question 45

नाट्यशास्त्रानुसारं रसानां वर्णाः सन्ति-

(a) शृङ्गारः श्यामः हास्यः कपोतः 

(b) हास्यः सितः शृङ्गारः श्यामः 

(c) हास्यः सितः शृङ्गारः कपोतः 

(d) करुणः कपोतः शृङ्गारः श्यामः 

समीचीनमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) एवं (b)

  2. BOption (b)

    (b) एवं (d)

  3. COption (c)

    (c) एवं (d)

  4. DOption (d)

    (a) एवं (d)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(b) एवं (d)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- नाट्यशास्त्र के अनुसार रसों का वर्ण है- 

स्पष्टीकरण- नाट्यशास्त्र के रचनाकार भरतमुनि है। ये काव्यशास्त्र के प्रथम संप्रदाय ‘रस सम्प्रदाय’ के प्रवर्तक है। नाट्यशास्त्र पर अभिनवगुप्त कृत ‘अभिनवभारती’ टीका प्राप्त होती है। इसमें 36 अध्याय हैं। इसके छठवें अध्याय में रसों की चर्चा की गयी है। भारतमुनि का प्रचलित रस सूत्र इसी अध्याय में है- विभावनुभावव्यभिचारिसंयोगात् रसनिष्पत्ति: अर्थात् विभव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। इसी अध्ययाय में रसों के वर्णों की भी चर्चा है जो निम्नवत् है- 

कारिका- श्यामो भवति श्रृङ्गारः सितो हास्यः प्रकीर्त्तितः। कपोतः करुणश्चैव रक्तो रौद्र प्रकीर्त्तितः।। गौरो वीरस्तु विज्ञेयः कृष्णश्चैव भयानकः। नीलवर्णस्तु बीभत्सः पीतश्चैवाद्भूतः स्मृतः।।

अर्थ- श्रृङ्गार का रंग श्याम होता है तथा हास्य सित अर्थात् शुभ्र वर्ण का कहा गया है। करुण का वर्ण कपोत अर्थात् चितकबरा तो रौद्र रस का वर्ण रक्त होता है। वीर रस को गौर समझना चाहिए तथा भयानक को काले रंग का। बीभत्स रस का वर्ण नीला है तो अद्भुत रस पीले रंग का माना गया है।

Question 46

नाट्यशास्त्रे विश्वकर्मणा प्रेक्षागृहस्य त्रैविध्ये वर्णितम्-

(a) विकृष्टम्

(b) त्र्यस्रम् 

(c) चतुरस्रम् 

(d) अष्टास्रम्

उपर्युक्तेषु समीचीनमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) एवं (b)

  2. BOption (b)

    (a) एवं (d)

  3. COption (c)

    (b) एवं (d)

  4. DOption (d)

    (c) एवं (d)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(a) एवं (b)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- नाट्यशास्त्र में विश्वकर्मा के द्वारा प्रेक्षागृह का त्रिविध प्रकारों में वर्णित है- 

स्पष्टीकरण- नाट्यशास्त्र के रचनाकार भरतमुनि है। ये काव्यशास्त्र के प्रथम संप्रदाय ‘रस सम्प्रदाय’ के प्रवर्तक है। नाट्यशास्त्र में 36 अध्याय हैं। इसके दूसरे अध्याय में प्रेक्षागृह अथवा नाट्यमण्डप की चर्चा की गयी है। 

नाट्यशास्त्र में भरतमुनि ने विश्वकर्मा के मतों को उपस्थापित किया है। विश्वकर्मा ने नाट्यमण्डप के दो प्रकार से भेद किये गये हैं- 

प्रेक्षागृहाणां सर्वेषां त्रिपकारो विधिः स्मृतः ।

विकृष्टश्चतुरस्त्रश्च त्र्यस्त्रश्चैव प्रयोक्तृभिः ॥

कनीयस्तु स्मृतं त्र्यस्रं चतुरस्रं तु मध्यमम्

ज्येष्ठं विकृष्टं विज्ञेयं नाट्यवेदप्रयोक्तृभिः

अर्थात् -

(क) परिमाण की दृष्टि से- 

  1. ज्येष्ठ
  2. कनिष्ठ
  3. मध्यम

 

(ख) आकार की दृष्टि से- 

  1. विकृष्ट (आयताकार)
  2. चतुरस्त्र (वर्गाकार)
  3. त्र्यस्त्र (त्रिभुजाकार)​​

विकृष्ट

  • विकृष्ट नाट्य मंडल की विशेषता यह है कि इसमें अधिक दर्शकों के बैठने का स्थान होता है।
  • इन नाट्य मंडपों के विस्तार में आधा स्थान नाटक के पात्रों के हेतु तथा आधा स्थान दर्शकों के हेतु रहता था, लेकिन आज वहीं दर्शकों के लिए अधिक स्थान रखा जाता है और अभिनेताओं के रंग कर्म करने के लिए कम स्थान।
  • विकृष्ट नाट्य मंडप जो लंबाई में 108 हस्त और चौड़ाई में 64 हस्त होता है। विकृष्ट मध्यम 64 हस्त लंबा और 32 हस्त चौड़ा होना चाहिए वहीं कनिष्ठ विकृष्ट मंडप 32 हस्त लंबाई में और 16 हस्त चौड़ाई में होना चाहिए।

चतुरस्त्र 

  • यह चारों ओर से 32-32 हाथ (48 फुट) का होना चाहिए जिसकी विधि, लक्षण आदि विकृष्ट के समान ही हों।
  • चारों ओर से बराबर भूमि नापकर डोरी से उसके भाग बाँट जिए जाएँ और फिर बाहर चारों ओर पक्की ईंटों की जुड़ाई करके भीत बना ली जाए।
  • फिर भीतर की और रंगपीठ के ऊपर मंडप के लिए 10 खंभे खड़े किए जाएँ।
  • इन खंभों के बाहर प्रेक्षकों के बैठने के लिए ईंट और लकड़ी से सीढ़ीनुमा पीठासन बनाए जाएँ जो क्रमश: अगले आसन से एक एक हाथ उँचे उठे हुए हों जिससे रंगपीठ भली भाँति दिखाई दे सके। स्तंभों के विधान के अनुसार निर्दिष्ट दिशाओं में छह दृढ़ खंभे खड़े कर दिए जाएँ जिनपर आठ हाथ लंबा चौड़ा पीठ बनाया जाए। मंडप के आधार के लिए उचित खंभे खड़े किए जाएँ।
  • इन खंभों को धरन के सहारे कस देना चाहिए और उनपर पुतलियाँ खड़ी कर देनी चाहिए। भरत ने ब्राह्मण और क्षत्रिय स्तंभ के संबंध में यह स्पष्ट नहीं किया कि इन्हें कहाँ खड़ा किया जाए।

 

त्र्यस्त्र 

  • त्र्यस्त्र नाट्यगृह तिकोना बनाना चाहिए और इसी त्रिकोण के बीच के कोने में रंगपीठ बनाना चाहिए। उस कोण से एक द्वार रंगपीठ पर प्रवेश करने के लिए बनाना चाहिए और दूसरा रंगपीठ के पीछे से।
  • भरत ने प्रेक्षागृह के निर्माण की यह सब व्यवस्था इतनी अधूरी दी है कि इसके आधार पर भरत के विचारे हुए प्रेक्षागृह का पूरा निर्माण नहीं किया जा सकता, किंतु इतना स्पष्ट हो जाता है कि उनके प्रेक्षागृह का आधा भाग रंगमंच तथा नेपथ्यगृह के लिए होता था और आधा दर्शकों के लिए।
  • कुछ विद्वानों ने विंध्यमेखला में अवस्थित सरगूजा प्रदेश की पहाड़ी में सीतावंगा और जोगीमारा गुफाओं के विहार शिलावेश्म का प्राचीन रंगमच मानने की भूल की है, किंतु उन्हें समरण रखना चाहिए कि भरत ने भूमि, नाप, इष्टिकाकर्म, दारुकर्म, स्तंभ तथा द्वार आदि का जो विस्तृत विधान दिया है वह इस प्रकार के शिलावेश्म में संभव ही नहीं है।
  • ये वास्तव में उसी प्रकार के शिलावेश्म हैं जिनका उल्लेख मेघदूत (नीचैराख्यं - 1/27) कुमारसंभव (वनेचराणां - 1/10 तथा 1/14) के दरीगृह में किया गया है और जिसका उल्लेख सौंदरानंद (6/33) में भी मिलता है।

 

इस स्पष्टीकरण से यह पता चलता है की, विकृष्ट, चतुरस्त्र और त्र्यस्त्र इन तीनो का वर्णन विश्वकर्मा के द्वारा किया गया है परन्तु (a) एवं (b) यह पर्याय उचित है क्योकि बाकि तीनो पर्यायों में d यह पर्याय दिया है जो की गलत है।

अत: (a) एवं (b) यह पर्याय बराबर है।

Question 47

''काव्यप्रकाशे विशेषवपुरपदार्थोऽपि वाक्यार्थः" - अत्र क: उच्यते-

  1. AOption (a)

    अननन्वितार्थः

  2. BOption (b)

    लक्ष्यार्थः

  3. COption (c)

     व्यंग्यार्थः

  4. DOption (d)

    तात्पर्यार्थः

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Correct answer

Answer: (d)D.

तात्पर्यार्थः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- काव्यप्रकाश में ‘विशेषवपुरपदार्थोऽपि वाक्यार्थः’ यहाँ क्या कहा जा रहा है?

स्पष्टीकरण- काव्यप्रकाश में ‘विशेषवपुरपदार्थोऽपि वाक्यार्थः’ यहाँ तात्पर्यार्थ कहा जा रहा है।

काव्यप्रकाश-

  • आचार्य मम्मटकृत काव्यप्रकाश भारतीय साहित्यशास्त्र का अन्यतम ग्रंथ है। यह दस उल्लासों में विभाजित है। आचार्य मम्मट ध्वनिवादी आचार्यों में परिगणित होतें है।
  • काव्यप्रकाश के द्वितीय उल्लास में शब्द शक्तियों का वर्णन किया गया है।
  • उपाधि के भेद से एक ही शब्द कभी वाचक, कभी लक्ष्य और कभी व्यंजक कहा जा सकता है, उसी प्रकार अर्थ भी तीन प्रकार के होते हैं- वाच्यादयस्तदर्थाः स्युः वाच्य-लक्ष्य-व्यङ्गयाः। वाच्य, लक्ष्य तथा व्यङ्गय आदि उन वाचक, लक्ष्य तथा व्यंजक शब्दों के अर्थ भी तीन प्रकार के हैं। पुनः मम्मट कहते है- तात्पर्यार्थोअपि केषुचित् ।
  • अर्थात कुछ लोग तात्पर्यार्थ को भी मानते है। यहाँ कुछ लोग से तात्पर्य कुमारिलभट्ट तथा उनके अनुयायी पार्थसारमिश्र आदि अभिहितान्वयवादियों से है। वाक्यार्थ बोध के लिये अभिहित पदार्थों का अन्वय मानने के कारण कुमारिलभट्ट आदि का यह सिद्धान्त अभिहितान्वयवाद कहा जाता है।
  • उनके अनुसार पदार्थों का आकांक्षा, योग्यता, सन्निधि के बल से परस्पर सम्बन्ध होने से पदों से प्रतीति होने से विशेष प्रकार का तात्पर्य रूप वाक्यार्थ प्रतीत होता है- आकांक्षा-योग्यता-सन्निधिवशात् वक्ष्यमाणस्वरूपाणां पदार्थानां समन्वये तात्पर्यार्थो विशेषवपुरपदार्थोअपि वाक्यार्थः समुल्लसतीति ‘अभिहितान्वयवादिनां’ मतम् ।
  • इनके विरोधी प्रभाकर , शालिकनाथ मिश्र आदि अन्विताभिधानवादी है जो मानते है कि पदों के द्वारा अन्वित पदार्थों की ही उपस्थिति होती है इसलिए पदार्थों का परस्पर सम्बन्ध रूप वाक्यार्थ वाच्य ही होता है- ‘वाच्य एव वाक्यार्थ इति ‘अन्विताभिधानवादिनः’।

Question 48

मनुस्मृत्यनुसारं समुचितमस्ति-

  1. AOption (a)

    आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः

  2. BOption (b)

    आचार्यो मूर्तिः प्रजापतेः

  3. COption (c)

    आचार्यो मूर्तिरात्मनः

  4. DOption (d)

    आचार्यः पृथिव्या मूर्तिः 

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Correct answer

Answer: (a)A.

आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- मनुस्मृति अनुसार समुचित है-

व्याख्या- आचार्य मनु द्वारा प्रणीत मनुस्मृति जिसमें १२ अध्याय है और २६९४ श्लोक हैं। मनुस्मृति की सबसे प्राचीन टीका 'मेधातिथि' की है। जिसका समय ९०० ई. है। 

मनुस्मृति के द्वितीय अध्याय में धर्म की परिभाषा, धर्म के उपदान आदि का वर्णन किया गया है-

आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः, पिता मूर्तिः प्रजापतेः। 

माता पृथिवी मूर्तिस्तु, भ्राता स्वो मूर्तिरात्मनः॥२/२२६/॥ 

अर्थ- आचार्य परमात्मा की मूर्ति है, पिता ब्रह्मा की मूर्ति, माता पृथ्वी की मूर्ति और भाई अपनी ही मूर्ति है। 

आचार्यश्च पिता चैव माता भ्राता च पूर्वजः। 

नार्तेनाप्यवमन्तव्या ब्रह्मणेन विशेषतः॥२/२२५॥ 

अर्थ- आचार्य, पिता, माता, बड़ा भाई- इनका दुखी होने पर भी मनुष्य और विशेषकर ब्राह्मण कदापि अपमान न करे। 

अन्य महत्वपूर्ण सूक्तियाँ-

न स्नानमाचरेत् भुक्त्वा (४/१२९)

मनु कहते हैं- भोजन करके स्नान करे । 

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः (३/५६)

मनु कहते हैं- जिस कुल में स्त्रियाँ सम्मानित होती है, उस कुल में देवगण प्रसन्न होते हैं। 

वेदोअखिलो धर्ममूलम्।(२/६)

मनु कहते हैं- सम्पूर्ण वेद सभी विद्यायों के मूल हैं और वेदों के ज्ञाता स्मृतिशील हैं।

Question 49

दर्शं नु विश्वदर्शतं दर्शं रथमधि क्षमि।

एता जुषत मे गिरः।।

उपर्युक्तमन्त्रे 'गिरः' पदस्य अर्थौ स्तः-

(a) पर्वतः

(b) गिरिः

(c) वाणी

(d) स्तुतिः

अत्र समीचीनमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (b) एवं (c)

  2. BOption (b)

    (a) एवं (b)

  3. COption (c)

    (c) एवं (d)

  4. DOption (d)

    (b) एवं (d)

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

(c) एवं (d)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- उपरोक्त मन्त्र में ‘गिर’ पद के दो अर्थ है- 

स्पष्टीकरण- उपरोक्त मन्त्र में ‘गिर’ पद के दो अर्थ है- वाणी और स्तुति। 

वरुण देवता-

  • ऋग्वेद के प्रमुख देवताओं में वरुण देव का भी नाम आता है। वैदिक युग के सबसे प्रधान देवताओं में से एक वरुण है।
  • वरुण आकाश के देवता है। वरुण शब्द वर धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ होता है- ढक लेना।
  • आकाश को वरुण कहा जाता है क्योंकि यह समस्त पृथ्वी को आच्छादित कर देता है।
  • वरुण के सम्बन्ध में ऋग्वेद में कहा गया है कि सूर्य वरुण के चक्षु हैं, आकाश उसके वस्त्र है तथा तूफान उसके निःश्वास है। नदियाँ उसकी आज्ञा से बहती है। सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र,वरुण के भय से कार्य करते है।
  • मित्र को वरुण का सखा कहा गया है। वरुण के पास रथ है जिस पर वे मित्र के साथ विचरन करते है। वरुण का आवास स्वर्णित है।
  • ऋग्वेद के प्रथम मंडल के वरुण सूक्त में 21 मंत्र हैं। ये सभी मंत्र गायत्री छंद में निबद्ध है। इस सूक्त के ऋषि अजीगर्त शुनः शेप है तथा देवता स्वयं वरुण है।

मंत्र- दर्शं नु विश्वदर्शतं दर्शं रथमधि क्षमि। एता जुषत मे गिरः॥(1.25.18)

मंत्रार्थ- सम्पूर्ण विश्व के द्वारा देख सकने योग्य उस वरुण को निश्चित रूप से मैनें देख लिया है। भूमि पर उस वरुण के रथ को मैनें देख लिया है। उस वरुण देवता ने इन मेरी स्तुतियों को ग्रहण कर लिया है। 

शब्दार्थ- 

दर्शनम्-  देख लिया है

जुषत- ग्रहण कर लिया है         

गिरः - स्तुतियों को

अधिक्षमि- भूमि पर

Question 50

भर्तृहरेः कृती इमे :-

(a) दीपिका

(b) प्रदीपः

(c) द्योतनम्

(d) वाक्यपदीयम्

अधोलिखितेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) एवं (b)

  2. BOption (b)

    (b) एवं (c)

  3. COption (c)

    (a) एवं (d)

  4. DOption (d)

    (b) एवं (d)

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

(a) एवं (d)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- भर्तृहरि की रचनायें है- 

स्पष्टीकरण- भर्तृहरि की रचनायें है- दीपिका और वाक्यपदीय।

संस्कृत व्याकरण के त्रिमुनियों (पाणिनि, कात्यायन, पतंजलि) के बाद भर्तृहरि का स्थान आता है। पाणिनि व्याकरण तंत्र में वैयाकरण-दार्शनिक भर्तृहरि का अनुपम स्थान है। भर्तृहरि का समय चतुर्थ और पञ्चम शती के मध्य माना जाता है। इन्होंने व्याकरण-दर्शन की एक अद्भुत कृति ‘वाक्यपदीय’ के द्वारा अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। महाभाष्य में निरूपित दार्शनिक सिद्धांतो तथा अर्थविज्ञान के नियमों का पद्यात्मक विवेचन इस ग्रंथ में है। इस ग्रंथ में प्रथम बार ‘शब्द ब्रह्म’ की चर्चा की गयी। वाक्यपदीयम् में तीन काण्ड हैं-ब्रह्मकाण्ड, वाक्यकाण्ड, पदकाण्ड।  इसके अतिरिक्त इन्होंने महाभाष्य की एक ‘दीपिका’ नामक टीका भी लिखी, जिसके प्रथम साथ आह्निक प्रकाशित है। 

अन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण- 

(b) प्रदीप- यह कैय्यट द्वारा महाभाष्य भी लिखी गयी एक टीका है। इस टीका पर नागेश भट्ट की ‘उद्योत’ नामक टीका प्राप्त होती है।

Question 51

'हरी+एतौ' इत्यत्र भवतः-

(a) यण्-सन्धिः 

(b) पररूपम्

(c) प्रगृह्यसञ्ज्ञा

(d) प्रकृतिभावः

अधोलिखितेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) एवं (b)

  2. BOption (b)

    (b) एवं (c)

  3. COption (c)

    (c) एवं (d)

  4. DOption (d)

    (a) एवं (d)

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

(c) एवं (d)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- 'हरी+एतौ' यहाँ पर क्या सम्भव है-

स्पष्टीकरण- 'हरी+एतौ' यहाँ पर सम्भव है- प्रगृह्यसञ्ज्ञा और प्रकृतिभाव। 

पाणिनि ने प्रकृति भाव संधि के लिए निम्नलिखित सूत्र पढ़ा है- 

प्लुतप्रगृह्यम् अचि नित्यम् (6/1/122)-  प्लुतसंज्ञक और प्रगृह्यसंज्ञक, अच् परे होने पर प्रकृति से अर्थात् सन्धि कार्य से रहित रहते है। अत: यह प्रकृतिभाव विधायक सूत्र है।

पाणिनि ने कई प्रगृह्यसंज्ञक सूत्र पढ़े उनमें से दो निम्नलिखित है- 

ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्मम् (1.1.11)-  ईदन्त, ऊदन्त तथा एदन्त द्विवचन प्रगृह्म सञ्ज्ञक हो। जैसे- गंङ्गे अमू।

अदसो मात् (1.1.12)- अदस् शब्द के मकार से परे ईत् और ऊत् प्रगृह्मसंज्ञक हो। जैसे- अमी ईशाः । 

हरी+एतौ, इस स्थिति में ‘ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्मम्’  सूत्र से ‘हरी’ की प्रगृह्य संज्ञा हुई। पुनः ‘प्लुतप्रगृह्यम् अचि नित्यम्’  सूत्र से अच् के परे रहते प्रकृति भाव हुआ। अतः यहाँ प्रगृह्यसञ्ज्ञा और प्रकृतिभाव दोनों सम्भव है।

Question 52

'पैलः' इति पदं विद्यते-

(a) गणविशेषस्यादिमः शब्दः 

(b) पैले भवा

(c) पीलाया गोत्रापत्यम्

(d) पैलस्य इयम्

अधोलिखितेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) एवं (b)

  2. BOption (b)

    (c) एवं (d)

  3. COption (c)

    (a) एवं (c)

  4. DOption (d)

    (b) एवं (d)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(a) एवं (c)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- ‘पैल:’ इस शब्द है- 

**स्पष्टीकरण- ‘**पैल’ शब्द की चर्चा प्रायः संस्कृत व्याकरण के तद्धित प्रकरण में की जाती है। ‘पैल’शब्द के संदर्भ में इस प्रकरण में प्रमुख दो सूत्र हैं- 

  1. पैलादिभ्यश्च (2.4.59)-  इस सूत्र के अनुसार पैल आदि गण का प्रथम शब्द ‘पैल’है। पैलादि गण आकृति गण है इसमें आने वाले शब्दों की संख्या निश्चित नहीं है। इसमें से कुछ प्रसिद्ध शब्द- पैल। शालनङ्कि, सात्यकि, सात्यकामि, दैवि, औदमज्जि, औदव्रजि। औदमेधि, औदबुद्धि, दैवस्थानि, पैङ्गलायनि, राणायनि, शैहक्षिति, भौलिङ्गि, औङ्गाहमानि, औज्जिहानि।
  2. पीलाया वा (4.1.118)- इस सूत्र के अनुसार पीला शब्द गोत्रापत्य अर्थ में अण् प्रत्यय होता है। अण् प्रत्यय होने के कारण ‘पीलायाः गोत्रापत्यम्’ इस अर्थ में ‘’पैलः’’ शब्द बनता है।

 

अन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण- 

पैले भवा-  इस अर्थ में ‘तत्र भवः’  से अण् प्रत्यय होगा । पैलसी इयम्- इस अर्थ में ‘तस्येदम्’  से अण् प्रत्यय होगा परन्तु उक्त दोनों विग्रहवाक्यों में “भवा” और “इयम्” शब्द दिया है फलस्वरूप स्त्रीलिङ्ग हो जाने के कारण “पैली" शब्द बनेगा ।

अत: गणविशेषस्यादिमः शब्द: तथा पीलाया गोत्रापत्यम् यह सही उत्तर है। अर्थात (a) एवं (c) यह पर्याय उचित है।

Question 53

भवभूतिकृतं रचनाद्वयं किमस्ति?

  1. AOption (a)

    महावीरचरितम्, प्रतिज्ञायौगन्धरायणम् 

  2. BOption (b)

    उत्तररामचरितम्, महावीरचरितम् 

  3. COption (c)

    अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मुद्राराक्षसम्

  4. DOption (d)

    मृच्छकटिकम्, महावीरचरितम् 

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Correct answer

Answer: (b)B.

उत्तररामचरितम्, महावीरचरितम् 

Why this answer is correct

प्रश्ननुवाद- भवभूति के द्वारा कृत दो रचनाएँ है- 

स्पष्टीकरण- भवभूति के द्वारा कृत दो रचनाएँ है- उत्तररामचरित, महावीरचरित। 

भवभूति का नाम संस्कृत साहित्य के श्रेष्ठ नाटककारों में गिना जाता है। ये विदर्भ देश के 'पद्मपुर' नामक स्थान के निवासी श्री भट्टगोपाल के पोते थे। इनके पिता का नाम नीलकंठ और माता का नाम जतुकर्णी था। भवभूति द्वारा रचित तीन रूपक प्राप्त होते हैं -

  1. महावीरचरितम्- यह 7 अंकों वाला एक नाटक ���ै। इसमें रामायण के बालकांड से लेकर युद्धकांड तक की कथा का वर्णन है।
  2. उत्तररामचरितम्- यह 7 अंकों वाला एक नाटक है। इसमें रामायण के उत्तरकांड की कथा का करुण रस में वर्णन है।
  3. मालतीमाधवम्- यह 10 अंको वाला एक प्रकरण है। इसमें मालती-माधव की प्रणय कथा वर्णन है।

Additional Informationअन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण-

  1. प्रतिज्ञायौगंधरायण- यह महाकवि भास की रचना है। यह 4 अंकों वाला नाटक है। इसमें उदयन के मंत्री योगन्धरायण की दो प्रतिज्ञाओं का वर्णन है।
  2. अभिज्ञानशाकुन्तल- यह महाकवि कालिदास की रचना है। यह 7 अंकों वाला एक नाटक है। इसमें दुष्यन्त-शकुंतला की प्रणय कथा वर्णन है।
  3. मुद्राराक्षस- यह महाकवि विशाखदत्त की रचना है। यह 7 अंकों वाला एक नाटक है। इसमें चाणक्य-चन्द्रगुप्त की ऐतिहासिक कथा का वर्णन है।
  4. मृच्छकटिक- यह महाकवि शुद्रक की रचना है। यह 10 अंको वाला एक प्रकरण है। इसमें चारुदत्त-वसन्तसेना  की प्रणय कथा वर्णन है।

Question 54

'अग्निना रयिमश्नवत्पोषमेव दिवे दिवे' इत्यस्मिन्मत्रांशे (रयि:) पदस्य अर्थम् निर्दिशतु-

(a) रात्रिः

(b) रत्नम्

(c) धनम्

(d) वसु

अत्र उचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) एवं (b)

  2. BOption (b)

    (c) एवं (d)

  3. COption (c)

    (b) एवं (c)

  4. DOption (d)

    (a) एवं (d)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(b) एवं (c)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- ‘अग्निना रयिमश्नवत्पोषमेव दिवे दिवे' इस मंत्रांश में (रयि:) पद का अर्थ बतायें-

स्पष्टीकरण- ‘अग्निना रयिमश्नवत्पोषमेव दिवे दिवे' इस मंत्रांश में (रयि:) पद का अर्थ है- रत्न और धन। 

अग्नि देवता-

  • अग्नि वेदों के सबसे प्रमुख देवताओं में से एक है। अग्नि की महत्ता इस बात से सिद्ध होती है कि समस्त वेदों का प्रथम सूक्त अग्नि देव को ही समर्पित है। ऋग्वेद में 200 सूक्त अग्नि को समर्पित है।
  • इंद्र के बाद वैदिक देवताओं में अग्नि का स्थान है। अग्नि उस देवता का नाम है जिसका प्रयोग मनुष्य यज्ञ के सन्दर्भ में करता है। वैदिक धर्म में अग्नि का प्रयोग यज्ञ के देवता के रूप में हुआ है।
  • अग्नि, यज्ञ के समय, देवताओं को बुलाते हैं, उन्हें बिठाते है तथा यज्ञ के हविष को देवताओं को ग्रहण करने के लिए प्रार्थना करते हैं। उनके प्रयासों के फलस्वरूप देवता- गण यज्ञ- भोग कर पाते हैं।
  • उपरोक्त विवेचन से यह प्रमाणित होता है कि मनुष्य यज्ञ करते समय जिन विषयों को अर्पित करता है उन्हें अग्नि के द्वारा देवताओं तक पहुँचाया जाता है। इस प्रकार अग्नि को मानव और देवताओं ���े बीच एक कड़ी के रूप में स्वीकारा गया है।
  • इसलिए अग्नि को मानव को पुरोहित कहा गया है। अग्नि की सिफारिश पर देवता यज्ञ के हविष को, जैसा ऊपर कहा गया है, ग्रहण करते हैं। अग्नि को 'धूमकेतु' कहा गया  है क्योंकि धूम उनका आवरण है।
  • अग्नि की व्याख्या ऋग्वेद में मानव की तरह हुई है। अग्नि के तीन सर, तीन जिव्हा हैं। अग्नि के दाढ़ी की बात की गयी है जिसका रंग भूरा है।
  • अग्नि दिन में तीन बार भोजन करते हैं। अग्नि का मूल्यवान भोजन घी है। कभी-कभी वे जंगल को भी भस्म कर जाते हैं। अग्नि को सूर्य के तुल्य माना गया है। वे सूर्य की तरह चमकते है तथा अंंध:कार का नाश करते हैं, और प्रकाश फैलाते हैं।

मन्त्र- अग्निना रयिमश्नवत् पोषमेव दिवे दिवे। यशसं वीरवत्तमम्॥(1.1.3)

मंत्रार्थ- स्तुति किये जाते हुए अग्नि से यह यजमान प्रतिदिन ही निरन्तर पोषण को प्राप्त होने वाले और पुत्र भृत्य आदि वीरों से अत्यधिक युक्त धन को प्राप्त करता है। 

शब्दार्थ-

  • अश्नवत्- प्राप्त करता है
  • पोषम्- पोषण को प्राप्त होने पर
  • दिवे दिवे- प्रतिदिन
  • यशसम्- यश को प्राप्त होने वाले
  • वीरवत्तमम्- पुत्र, भृत्य आदि वीरों से युक्त

Question 55

पाणिनीयशिक्षानुसारं शम्भुमते मताः वर्णाः सन्ति-

(a) 61

(b) 62

(c) 63

(d) 64

अधोलिखितेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) एवं (b)

  2. BOption (b)

    (b) एवं (c)

  3. COption (c)

    (c) एवं (d)

  4. DOption (d)

    (a) एवं (d)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(c) एवं (d)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- पाणिनीयशिक्षा के अनुसार शंभु के मत में कितने वर्ण है- 

स्पष्टीकरण- पाणिनीयशिक्षा के अनुसार शंभु के मत में कितने 63 या 64 वर्ण है।

संस्कृत वाङ्मय में वेदों के साथ-साथ वेदांगों का भी अपना महत्त्व है। वेदांगों को वेदों को समझने का साधन माना जाता है। इनकी संख्या छह है- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, छन्द, ज्योतिष, निरुक्त। इनमें से प्रथम शिक्षा का भी छह विषय हैं- वर्ण, स्वर, मात्रा, बल, साम, सन्तान। पाणिनीयशिक्षा सभी शिक्षा ग्रंथो में प्रमुख है। इसके रचनाकार पाणिनि के शिष्य माने जाते हैं। इसका सम्बन्ध ऋग्वेद से है। इसके परंभिक कारिकाओं में वर्णों की संख्या आदि का वर्णन है- 

कारिका- त्रिषष्टिः चतुःषष्टिर्वा वर्णाः शम्भुमते मताः। प्राकृते- संस्कृते चापि स्वयं प्रोक्ताः स्वयम्भुवा।।

कारिकार्थ- प्राकृत और संस्कृत भाषा में शम्भु के मत में 63 या 64 वर्ण कहे गये हैं। स्वयं ब्रह्मा के द्वारा भी यही कहा गया है। 

पुनः अग्रिम कारिकाओं में वर्णों के उप-विभाग बताए गये है- 

स्वरा विंशतिरेकश्च स्पर्शानां पञ्चविंशतिः। 

यादयश्च स्मृता ह्याष्टौ चत्वार यमाः स्मृताः।। 

अनुस्वारो विसर्गश्च क  पौ  चापि पराश्रितौ। 

दुःस्पृष्टश्चेति विज्ञेय लृकारः प्लुत एव च।।

यह उपविभाग निम्नवत् है- 

  • स्वर= 21 या 22 (प्लुत लृकार को जोड़ने से स्वरों की संख्या 22 हो जाती है और परिणामस्वरूप वर्णों की संख्या 64 हो जाती है।)
  • स्पर्श वर्ण= 25
  • यादि = 08
  • यम= 4
  • अनुस्वार = 1
  • विसर्ग = 1
  • जिह्वामूलीय = 1
  • उपध्मानीय= 1
  • रंग वर्ण= 1

Question 56

'यस्य शुष्माद्रोदसी अभ्यसेताम्' अस्मिन् मन्त्रांशे 'शुष्मात्' पदस्य अर्थो निर्धार्यताम्-

(a) बलात्

(b) पूजनात्

(c) पराक्रमात्

(d) शस्त्रात्

अत्रोचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) एवं (b)

  2. BOption (b)

    (c) एवं (d)

  3. COption (c)

    (a) एवं (d)

  4. DOption (d)

    (a) एवं (c)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(a) एवं (c)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- 'यस्य शुष्माद्रोदसी अभ्यसेताम्' इस मंत्रांश में 'शुष्मात्' पद का अर्थ निर्धारित करें-

स्पष्टीकरण- 'यस्य शुष्माद्रोदसी अभ्यसेताम्' इस मंत्रांश में 'शुष्मात्' पद का अर्थ बलात् और पराक्रमात् है। 

इंद्र देवता-

इंद्र सबसे प्रमुख वैदिक देवता है। यतोहि सम्पूर्ण ऋग्वेद में प्रायः 250 सूक्तों में इनकी प्रशंसा की गयी है। 

इसके अतिरिक्त, 50 सूक्तों में अन्य देवताओं के साथ इनकी स्तुति की गई। 

इन्द्रसूक्त ऋग्वेद के दूसरे मण्डल का 12 वाँ सूक्त है। इस सूक्त के ऋषि गृत्समद और देवता इन्द्र हैं और छन्द त्रिष्टुप् है।

वैदिक ग्रन्थों में इन्द्र के मानवीय स्वरूप का वर्णन प्राप्त होता है। इनका प्रधान अस्त्र वज्र है, जिसके कारण ये वज्रबाहु कहे जाते है। यास्काचार्य ने इन्द्र शब्द निम्न निरुक्तियाँ दी हैं - 

  1. इन्द्र: इरां दृणातीति वा। अर्थात् इस इरा अन्न का विदारण करने वाले।
  2. इन्द्रन् शत्रुणां दारयिता वा। अर्थात् शत्रु का विदारण करने वाला।
  3. इन्द्रन् शत्रुणां द्रावयिता वा। अर्थात् शत्रुओं को भगाने वाला।

इन्द्रसूक्त का पहला मंत्र है-

यो जात एव प्रथमो मनस्वान् देवो देवान्क्रतुना पर्यभूषत्। 

यस्य शुष्माद्रोदसी अभ्यसेतामं, नृम्णस्य मह्न स जनास इन्द्रः॥ 

मंत्रार्थ- जिस प्रमुख मनस्वी देव ने उत्पन्न होते ही अपने पराक्रम से देवों को अभिभूत कर लिया, जिसकी शक्ति से द्युलोक और पृथिवी लोक काँप गये। हे मनुष्यों। महान् बल की महिमा से युक्त वह इन्द्र है।

 Additional Informationशब्दार्थ-

प्रथमः - प्रधान, प्रमुख 

मनस्वान् - मनस्वी, बुद्धिमान् 

देवः - देव ने 

जातःएव - उत्पन्न होते ही

क्रतुना - पराक्रम से, शक्ति से, कर्म से 

शुष्मात् - बल से, शक्ति से, पराक्रम से 

रोदसी - द्युलोक-पृथिवी लोक 

अभ्यसेताम् - डर गये, काँप गये

नृम्णस्य - महान् बल से 

मह्ना - महिमा से, महत्व से

Question 57

'प्रवीणः' इति पदम् कयोः उदाहरणं वर्तते-

(a) अर्थसङ्कोचस्य

(b) अर्थपरिवर्तनस्य

(c) अर्थविस्तारस्य 

(d) अर्थहानेः

अधोलिखितेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) एवं (b)

  2. BOption (b)

    (b) एवं (c)

  3. COption (c)

    (c) एवं (d)

  4. DOption (d)

    (a) एवं (c)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(a) एवं (c)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- ‘प्रवीण'- पद किनका उदाहरण है-

स्पष्टीकरण- ‘प्रवीण'- पद अर्थ परिवर्तन और अर्थ विस्तार का उदाहरण है।

अर्थसंकुचन (अर्थसङ्कोच): एक समय में 'प्रवीणः' शब्द का अर्थ व्यापक रूप से 'किसी भी विशेष क्षेत्र में कुशल व्यक्ति' के संदर्भ में किया जाता था। वर्तमान में, इसका प्रयोग अधिकतर 'विशेष रूप से दक्ष या निपुण' व्यक्ति के लिए किया जाता है, जिसका अर्थ संकीर्ण हो गया है।

अर्थविस्तार (अर्थविस्तार): एक समय में, 'प्रवीणः' का मतलब मात्र 'कुशल या निपुण' तक सीमित था। लेकिन समय के साथ, यह शब्द 'अनुभवी', 'कौशलयुक्त', और 'निपुण' जैसे व्यापक और विविध अर्थों में भी उपयोग किया जाने लगा है।

इसीलिए, 'प्रवीणः' शब्द दोनों ही दृष्टियों से देखा जा सकता है:

अर्थसंकुचन के लिए: प्रारंभिक व्यापक अर्थ से संकीर्ण अर्थ तक।

अर्थविस्तार के लिए: मूल सीमित अर्थ से व्यापक और कई अन्य गुणों को समेटते हुए।

इस प्रकार, सही उत्तर है: (a) एवं (c)

भाषाशास्त्र या भाषा विज्ञान के अंतर्गत भाषाओं का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। भाषा विज्ञान के चार प्रमुख अंग है-

  1. ध्वनि विज्ञान
  2. पद विज्ञान
  3. वाक्य विज्ञान
  4. अर्थ विज्ञान

Question 58

कल्पसाहित्ये गण्यते-

(a) गौतमधर्मसूत्रम्

(b) वाजसनेयिप्रातिशाख्यम्

(c) मानवशुल्बसूत्रम्

(d) निघण्टुः

अधोलिखितेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) एवं (b)

  2. BOption (b)

    (c) एवं (d)

  3. COption (c)

    (a) एवं (c)

  4. DOption (d)

    (b) एवं (d)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(a) एवं (c)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- कल्प साहित्य में गणना है-

स्पष्टीकरण- कल्प साहित्य में गौतमधर्मसूत्र तथा मानवशुल्बसूत्र की गणना है। 

वैदिक साहित्य के अंतर्गत वेदांगों की भी गणना होती है। वेदांग में अंग शब्द का अर्थ है वे उपकारक तत्त्व जिनसे वस्तु के स्वरूप का बोध होता है- अंगयन्ते ज्ञायन्ते ऐभिरिति अंगानि। वेदांगों की संख्या छह हैं- शिक्षा, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, ज्योतिष, कल्प, वेदांग हैं। 

शिक्षा व्याकरणं छंदो निरुक्तं ज्योतिषं तथा। 

कल्पश्चेति षडङ्गानि वेदस्याहुर्मनीषिणः।। 

कल्पसूत्र का तात्पर्य प्रयोगविधि के यथार्थ प्रतिपादक ग्रंथों से है। जिन ग्रंथों में यज्ञ-सम्बन्धी विधियों का समर्थन या प्रतिपादन किया जाता है, उन्हें कल्प कहते हैं। कल्पसूत्र के चार प्रकार हैं-

  1. श्रोतसूत्र
  2. गृह्यसूत्र
  3. धर्मसूत्र
  4. शूल्बसूत्र

अतः कल्पसाहित्य के अंतर्गत गौतमधर्मसूत्र तथा मानवशुल्बसूत्र की गणना है। गौतमधर्मसूत्र सामवेद तथा मानवशुल्बसूत्र कृष्ण यजुर्वेद का धर्मसूत्र है।

Question 59

याज्ञवल्क्यमते उत्तरा क्रिया कुत्र बलवतीभवति?

  1. AOption (a)

    सर्वेष्वर्थविवादेषु

  2. BOption (b)

    आधौ प्रतिग्रहे

  3. COption (c)

    सर्वेषु भूमिविवादेषु

  4. DOption (d)

    दायविभागविवादेषु

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Correct answer

Answer: (a)A.

सर्वेष्वर्थविवादेषु

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प्रश्नानुवाद- याज्ञवल्क्य के मत में उत्तरा क्रिया कहाँ बलवती होती है?

स्पष्टीकरण- याज्ञवल्क्य के मत में उत्तरा क्रिया सभी अर्थ विवादों में बलवती होती है।

याज्ञवल्क्यस्मृति भारतीय धर्मशास्त्र का सबसे प्रमुख ग्रंथ है। इसकी महत्ता इस बात से सिद्ध होती है कि आज भी भारतीय संविधान के कुछ प्रावधान सीधे-सीधे यहीं से स्वीकृत है। इसके रचनाकार स्वयं याज्ञवल्क्य हैं। वे शुक्लयजुर्वेद के द्रष्टा थे। याज्ञवल्क्यस्मृति के सुप्रसिद्ध टीकाकार विश्वरूप, विज्ञानेश्वर और अपरार्क ने वृद्धयाज्ञवल्क्य को अनेक बार उद्धृत किया है। इसका विभाजन तीन अध्यायों में हुआ है- आचार, व्यवहार तथा प्रायश्चित। इस ग्रंथ निम्न टिकाएँ प्राप्त होती हैं- 

  1. विश्वरूप की बालक्रीड़ा
  2. विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा
  3. शूलपाणि की दीपकालिका

याज्ञवल्क्यस्मृति में प्रथम अध्याय में न्यायिक व्यवहार का वर्णन है। इसके कुछ प्रमुख अंशो का निरूपण निम्नलिखित है-

सर्वष्वर्थविवादेषु बलवत्युत्तरा क्रिया।

अर्थ- सभी प्रकार के अर्थ (धन) के विवादों में उत्तराक्रिया (बाद के कार्य) प्रबल होते हैं। 

आधौ प्रतिग्रहे क्रीते पूर्वा तु बलवत्तरा। 

अर्थ- किन्तु आधि (बन्धन) दान और क्रय में पूर्वकार्य (पहले का अधिकार-पत्र) प्रबल होता है। 

दर्शने प्रत्यये दाने प्रातिभाव्यं विधीयते। 

आद्यौ तु वितथे दाप्यावितरस्य सुता अपि।।

अर्थ- प्रातिभाव्य (जमानतदार- वह अन्य व्यक्ति जो शर्त या विश्वास दिलाता है), दर्शन (आवश्यकता पड़ने पर उपस्थित करने या दिखाने), प्रत्यय ( विश्वास कि यह देने लायक) और  दान (न देने पर स्वयं देना) के कार्य में प्रातिभाव्य (जामिन) होता है। प्रथम दो दर्शन और प्रत्यय के असत्य होने पर राजा उससे धन दिलावे और तीसरे के असत्य होने पर उसके पुत्रों से भी धन दिलावे।  

संततिः स्त्रीपशुष्वेव धान्यं त्रिगुणमेव च। 

वस्त्रं चतुर्गुणं प्रोक्तं रसश्चाष्टगुणस्तथा ।।

अर्थ- प्रतिभू के स्त्री और पशु दिलाने की स्थिति में तो बच्चे सहित स्त्री और पशु दे। धान्य होने पर तीन गुना, वस्त्र होने पर चौगुना और रस (तेल घृतादि) होने पर आठ गुना दिलावे।

Question 60

तैत्तिरीयब्राह्मणस्य प्रथमे काण्डे के द्वे वर्णिते-

(a) उपहोमः

(b) अग्निहोत्रम्

(c) अग्न्याधानम्

(d) गवामयनम्

अधोलिखितेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (b) एवं (c)

  2. BOption (b)

    (a) एवं (d)

  3. COption (c)

    (c) एवं (d)

  4. DOption (d)

    (a) एवं (b)

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Answer: (c)C.

(c) एवं (d)

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प्रश्नानुवाद- तैत्तिरीय ब्राह्मण के प्रथम काण्ड में कौन से दो (विषय) वर्णित हैं- 

स्पष्टीकरण- तैत्तिरीय ब्राह्मण के प्रथम काण्ड में दो विषय वर्णित हैं- अग्न्याधान और गवामयन। 

वैदिक साहित्य के चार भाग है- संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद। ब्राह्मण ग्रंथ संहिता के प्रथम भाष्य मानें जाते है। ब्राह्मणग्रन्थों के अर्थ में ‘ब्राह्मण’ शब्द विभिन्न तीन अर्थों को लेकर ब्रह्मन् शब्द से अण् (अ) प्रत्यय करके बना है। 

  1. शतपथ ब्राह्मण के अनुसार ब्रह्मन् शब्द का अर्थ है ‘मंत्र’। अतः वेदमंत्रों की व्याख्या और विनियोग प्रस्तुत करने वाले ग्रन्थ को ‘ब्राह्मण’ कहते है’।
  2. शतपथ के अनुसार ही ब्रह्मन् शब्द का दूसरा अर्थ है- ‘यज्ञ’। अतः यज्ञों की व्याख्या और विवरण प्रस्तुत करने वाले ग्रंथों को ‘ब्राह्मण’ कहते हैं।
  3. ब्रह्मन् शब्द का एक अन्य अर्थ है- ‘पवित्र ज्ञान या रहस्यात्मक विद्या।’ अतः जिन ग्रंथों में वैदिक रहस्यों का उद्घाटन किया गया है, उसे ‘ब्राह्मण’ कहते हैं।

वाचस्पति मिश्र ने ब्राह्मण ग्रंथों के चार प्रयोजन बताए हैं- निर्वचन, विनियोग, प्रतिष्ठान और विधि। 

नैरुक्त्यं यत्र मंत्रस्य विनियोगः प्रयोजनम्। 

प्रतिष्ठानं विधिश्चैव ब्राह्मणं तदिहोच्यते।। 

मीमांसादर्शन के भाष्य में शबरस्वामी ने इन्हीं विषयों को कुछ और विस्तृत करते हुए ब्राह्मणग्रंथों के प्रतिपाद्य विषयों की संख्या दस बताई है- हेतु, निर्वचन, निन्दा, प्रशंसा, संशय, विधि, परक्रिया, पुराकल्प, व्यवधारण, कल्पना और उपमान। 

हेतुर्निर्वचनं निन्दा प्रशंसा संशयो विधिः। 

परक्रिया पुराकल्पो व्यवधारण- कल्पना। 

उपमानं दशैते तु विधयो ब्राह्मणस्य वै।। 

चारों वेद के अपने अपने ब्राह्मण है। कृष्णयजुर्वेद में परिगणित एकमात्र ब्राह्मण तैत्तिरीयब्राह्मण है। इसके रचयिता वैशम्पायन के शिष्य आचार्य तित्तिर हैं। तित्तिर ने तैत्तिरीय संहिता और तैत्तिरीय ब्राह्मण की रचना की। यह तीन काण्डों या अष्टकों में विभाजित है। प्रथम और द्वितीय काण्ड में 8-8 अध्याय या प्रपाठक हैं। तृतीय काण्ड में 12 अध्याय हैं। इनके उपखण्डों को ‘अनुवाक्’ कहते हैं। इनकी संख्या 353 हैं। तीनों काण्डों के अनुसार प्रतिपाद्य विषय निम्नलिखित है- 

  1. प्रथम काण्ड- अग्न्याधान, गवामयन, वाजपेय, सोम, नक्षत्रेष्टि और राजसूय याग।
  2. द्वितीय काण्ड- अग्निहोत्र, उपहोम,सौत्रामणी बृहस्पति सव, वैश्य सव आदि।
  3. तृतीय काण्ड- नक्षत्रेष्टियाँ और पुरुषमेध।

Question 61

महाभारताश्रितं भासविरचितं नाटकमस्ति-

(a) दूतवाक्यम्

(b) प्रतिमानाटकम् 

(c) मध्यमव्यायोगम्

(d) बालभारतम् 

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) एवं (b)

  2. BOption (b)

    (b) एवं (d)

  3. COption (c)

    (a) एवं (c) 

  4. DOption (d)

    (b) एवं (c)

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Answer: (c)C.

(a) एवं (c) 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : महाभारत पर आश्रित भासविरचित नाटक कौन से हैंं?

मध्यमव्यायोगम् :

यह एक अंक का व्यायोग है।  इसकी कथावस्तु का आधार महाभारत है। इसमें पाण्डवों के वनवास काल में भीम द्वारा घटोत्कच के पंजे से एक ब्राह्मण बालक की मुक्ति की कथा है। मध्यम शब्द मध्यम पाण्डव भीम और ब्राह्मण के मध्यम पुत्र दोनों के लिए प्रयुक्त हुआ है। इसलिए इस नाटक का नाम ‘‘मध्यम व्यायोग’’ है। इस नाटक की यह विशेषताएँँ हैंं - 

  • नाटकीय दृष्टि से यह नाटक उत्तम कोटि का है, क्योंकि इस परिपाक तथा भावोन्मेष में नाटककार को पूरी सफलता प्राप्त हुई है।
  • कथोपकथनों में कहीं वैरस्य नहीं आता तथा दर्शक का कुतुहल प्रतिक्षण बढ़ता हुआ दिखाई देता है।
  • इन कथोपकथनों में भाषा भी बड़ी सहायक सिद्ध हुई है।
  • लम्बे समासान्त पदों का यहाँ अभाव है।
  • घटनाक्रम में सत्वरता प्रभावोत्पादन में चार-चाँद लगा देती है। भास का काव्य कर्म भी इस रुपक में सफल रहा है।

दूतवाक्यम् :

यह भी एकांकी नाटक है। रुपक के भेदानुसार यह ‘‘व्यायोग’’ है। इसमें श्रीकृष्ण का दूत के रूप में वर्णन हुआ है। श्रीकृष्ण दुर्योधन के पास संधि का प्रस्ताव लेकर आते हैं किन्तु उनका वहाँ अपमान किया जाता है तथा वे असफल होकर लौटते हैं। वे कुद्ध होकर सुदर्शन चक्र का आह्वान करते हैं तथा उसे दुर्योधन का वध करने का आदेश देते हैं। परन्तु वह वैसा करन से रोकता है। इसकी कथावस्तु महाभारत से ली गई है। इस नाटक की यह विशेषताएँँ हैंं -

  • इसका नामकरण बहुत ही सटीक है।
  • सम्पूर्ण नाटक दूतवेशधारी श्रीकृष्ण के वचनों से अनुप्रमाणित है।
  • अतः ‘‘दूतवाक्य’’ नाम पूर्णतया सार्थक है। सम्पूर्ण नाटक वीररस से ओत प्रोत है।
  • श्रीकृष्ण के अस्त्रों की सहसा उद्भावना तथा विराट रूप प्रदर्शन में अद्भुत रस का चमत्कार है।
  • प्रधान रूप से आरभटी वृत्ति की योजना है।
  • राजनीतिक सिद्धान्तों से यह नाटक परिपूर्ण है।  दुर्योधन एवं श्रीकृष्ण के मध्य हुआ वार्तालाप अत्यन्त रोचक एवं सटीक है।

अतः स्पष्ट है, दूतवाक्यम् तथा मध्यमव्यायोगम् यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

Additional Information 

भास की रचनारूपकआधारअंकसंक्षिप्त कथानक
दूतवाक्यअंकमहाभारत१इसमें श्रीकृष्ण का दूत के रूप में वर्णन हुआ है। कृष्णशिष्टाई इस कृति का विषय है।
मध्यमव्यायोगव्यायोगमहाभारत१इसमें पाण्डवों के वनवास काल में भीम द्वारा घटोत्कच के पंजे से एक ब्राह्मण बालक की मुक्ति की कथा है। मध्यम शब्द मध्यम पाण्डव भीम और ब्राह्मण के मध्यम पुत्र दोनों के लिए प्रयुक्त हुआ है।
दूतघटोत्कचव्यायोगमहाभारत१इसमें अभिमन्यु की मृत्यु के पश्चात् श्रीकृष्ण घटोत्कच को दूत रूप में धृतराष्टं के पास भेजते हैं। घटोत्कच के दूत बनकर जाने के कारण ही इसका नाम ‘‘दूत घटोत्कच’’ रखा गया है।
कर्णभारअंकमहाभारत१इसमें द्रोणाचार्य के परलोक सिधारे जाने पर कर्ण को सेनापति बनाया जाता है तथा युद्ध का भार उस पर आ पड़ता है, इसलिए नाटक का नाम ‘‘कर्णभार’’ है।
उरुभंगअंकमहाभारत१इसमें द्रौपदी के अपमान का प्रतिशोध लेने हेतु भीम व दुर्योधन का गदायुद्ध वर्णित है, तथा दुर्योधन का अंत समय में पश्चात्तापदग्ध करुण चित्रण है।
पंचरात्रसमवकारमहाभारत३इसमें प्रारंभ पाँच रात्रियों में पाण्डवों को ढूँढनें की बात से हुआ है। द्रोणाचार्य के सत्प्रयास से पाण्डव मिल जाते हैं तथा दुर्योधन द्वारा उन्हे आधा राज्य दे दिया जाता है, यह कथा है।
अभिषेकनाटकरामायण६इसमें रामायण के किष्किंधाकाण्ड से युद्धकाण्ड की समाप्ति तक की कथा अर्थात् बालिवध से राम राज्याभिषेक तक की कथा वर्णित है।
प्रतिमानाटकरामायण७राम वनगमन से लेकर रावणवध तथा राम राज्याभिषेक तक की घटनाओं का इसमें चित्रण है।
बालचरितनाटकपुराण५यह नाटक भगवान् श्री कृष्ण की बाल लीलाओं पर आधारित है। इसमें श्रीकृष्ण के जन्म से कंस वध तक की कथा वर्णित है।
प्रतिज्ञायौगंधरायणनाटकलोककथा४इसमें कौशाम्बी के राजा वत्सराज उदयन द्वारा उज्जयिनी के राजा प्रद्योत की पुत्री वासवदत्ता के हरण की कथा है।
स्वप्नवासवदत्तनाटकलोककथा६इसमें प्रतिज्ञायौगन्धरायण से आगे की कथा का वर्णन है। इस नाटक का नामकरण राजा उदयन के द्वारा स्वप्न में वासवदत्ता के दर्शन पर आधारित है।
अविमारकनाटकलोककथा६इसमें राजा कुन्तिभोज की पुत्री कुरंगी का राजकुमार अविमारक से प्रणय एवं विवाह का वर्णन है।
दरिद्र चारुदत्तप्रकरणस्वतन्त्र कल्पना४शूद्रक के प्रसिद्ध प्रकरण ‘‘मृच्छकटिक’’ का आधार यही माना जाता है। इसमें कवि ने दरिद्र चारूदत्त एवं वेश्या वसन्तसेना की प्रणय-कथा का वर्णन किया है।

Question 62

अशोकस्य गिरनार-अभिलेखानां सन्दर्भे समुचितं कथनमस्ति-

(a) अभिलेखानां भाषा संस्कृतमस्ति।

(b) अभिलेखानां भाषा प्राकृतम् (पालिः) अस्ति। 

(c) अभिलेखानां लिपिः देवनागरी अस्ति। 

(d) अभिलेखानां लिपिः ब्राह्मी अस्ति। 

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) एवं (b)

  2. BOption (b)

    (b) एवं (c)

  3. COption (c)

    (c) एवं (d)

  4. DOption (d)

    (b) एवं (d)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(b) एवं (d)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अशोक के गिरनार के अभिलेख के संदर्भ में कौन से दो कथन सही हैंं? 

अशोक का गिरनार का अभिलेख :

गिरनार गुजरात में जूनागढ़ के निकट स्थित पहाड़ियाँ हैं। गिरनार की पहाड़ियों से पश्चिम और पूर्व दिशा में 'भादस', 'रोहजा', 'शतरूंजी' और घेलो नदियाँ बहती हैं। इन पहाड़ियों पर मुख्यतः भील और डुबला लोगों का निवास है। इन पहाड़ियों पर मौर्य सम्राट अशोक का 'चतुर्दश शिलालेख' अंंकित है।

  • पहाड़ियों की दूसरी ओर शक क्षत्रप रुद्रदामन का भी अभिलेख (150ई.) है।
  • इस अभिलेख में मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के आदेश से वहाँ पर 'सुदर्शन झील' के निर्माण का उल्लेख है।
  • रुद्रदामन के जूनागढ़ लेख से ज्ञात होता है कि, सम्राट अशोक के समय 'तुशाष्प' नामक अधीनस्थ यवन राज्यपाल के रूप में सौराष्ट्र पर शासन करता था।
  • गिरनार की एक पहाड़ी की तलहटी में अशोक के शिलालेख (तीसरी शताब्दी ई.पू.) से युक्त एक चट्टान हैं।
  • मौर्य शासक चंद्रगुप्त (चौथी शताब्दी ई.पू. का उत्तरार्ध) द्वारा सुदर्शन नामक झील बनाए जाने का उल्लेख भी इसी शिलालेख में मिलता है।
  • इन दो महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रमाणों के आस-पास की पहाड़ियों पर सोलंकी वंश (961-1242) के राजाओं द्वारा बनवाए गए कई जैन मंदिर भी स्थित हैं।
  • इस अभिलेख की भाषा प्राकृत और लिपि ब्राह्मी है।

 

​अतः स्पष्ट है, अभिलेखानां भाषा प्राकृतम् (पालिः) अस्ति  तथा अभिलेखानां लिपिः ब्राह्मी अस्ति  यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 63

निन्माङ्कितेषु समुचितः सम्बन्धो वर्तते-

(a) हर्षस्य बांसखेडा-ताम्र-अभिलेखः

(b) पुलकेशिन द्वितीयस्य मन्दसौर-अभिलेखः 

(c) यशोधर्मणः इलाहाबाद-अभिलेखः 

(d) रुद्रदाम्नः गिरनार-अभिलेखः 

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) एवं (b)

  2. BOption (b)

    (b) एवं (c)

  3. COption (c)

    (c) एवं (d)

  4. DOption (d)

    (a) एवं (d)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(a) एवं (d)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : समुचित संबंध यह है - 

बांसखेडा ताम्र अभिलेख : 

यहाँ से प्राप्त अभिलेख में हर्ष द्वारा अहिछत्र भुक्ति के अंगदीया विषय के 'मर्कटसागर' नामक गाँव को सभी करों से मुक्त करके, दो ब्राह्मणों- बालचन्द्र और भट्टस्वामी को दान देने का उल्लेख है। इस अभिलेख में हर्ष की वंशावली भी दी गयी है, यद्यपि उसके मूलपुरुष पुष्यभूति का इसमें उल्लेख नहीं है। बांसखेड़ा अभिलेख की मुख्य विशेषताएँँ - 

  • इसमें स्वयं हर्ष के हस्ताक्षर हैं। यह हस्ताक्षर संभवत: मूल हस्ताक्षर की अनुलिपि हैं, जिसे ताम्रपट्ट पर उतार लिया गया है। अभिलेख के अंत में यह हस्तलेख सुंदर अक्षरों में इस प्रकार है-
  • 'स्वहस्तो मम महाराजाधिराज श्री हर्षस्य'
  • यह अभिलेख 'वर्धमानकोटि' नामक स्थान से प्रचलित किया गया था।
  • उसमें हर्ष के पूर्वज राजाओं के आराध्य देवों और व्यक्तिगत विश्वासों का भी संकेत है।
  • हर्ष के पिता प्रभाकरवर्धन को इसमें वर्णाश्रम व्यवस्था को स्थिर करने वाला कहा गया है।
  • अभिलेख की अन्य विशेषता यह है कि इसमें हर्ष के प्रशासन के विभिन्न अंग अधिकारियों के पद एवं दान में दिये गाँवों पर लगने वाले करों आदि का उल्लेख है।
  • इससे हर्ष के प्रशासन एवं आर्थिक मामलों पर प्रकाश पड़ता है।
  • इसमें राज्यवर्धन द्वारा मालवा नरेश देवगुप्त एवं अन्य राजाओं पर विजय का और शशांक का शत्रुगृह (शशांक के घर) में वध का भी उल्लेख है।

मन्दसौर अभिलेख : 

यशोधर्मन-विष्णुवर्धन का मन्दसौर शिलालेख मध्य प्रदेश के मन्दसौर में स्थित एक शिलालेख है जो संस्कृत भाषा एवं गुप्त लिपि में है। इसका लेखनकाल लगभग 532ई माना गया है। यह लेख 2 फुट चौड़े तथा 1.5 फुट ऊँचे एवं 2.5 इंच मोटे पत्थर पर अंकित है। यह लेख ॐ से आरम्भ होता है, जिसके पश्चात शिव के मंगलाचरण है। इसके अन्त में लिपिकार का नाम भी अंकित है। यह विभिन्न छन्दों में है।

इलाहाबाद अभिलेख : 

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में स्थित अशोक स्‍तम्‍भ है। इलाहाबाद क़िले के मुख्य द्वार पर स्थित 10.6 मीतर की ऊँचाई का यह स्तम्भ 232 ई.पू. के समय का है।

  • अशोक स्तम्भ पर तीन शासकों के लेख खुदे हुए हैं। यह पुरातात्विक समय का उत्कृष्ट नमूना है।
  • भारतीय इतिहास के प्राचीन बौद्ध काल में प्रयाग की महत्ता का प्रमाण अशोक स्तंभ के ऊपर उत्कीर्ण अभिलेखों से भी मिलता है, जो आज भी प्राचीन इलाहाबाद क़िले के मुख्य द्वार के भीतर मौजूद है।
  • 200 ई. में समुद्रगुप्त इसे कौशाम्बी से प्रयाग लाया और उसके दरबारी कवि हरिषेण द्वारा रचित प्रयाग-प्रशस्ति इस पर ख़ुदवाया गया।
  • कालान्तर में 1605 ई. में इस स्तम्भ पर मुग़ल सम्राट जहाँगीर के तख़्त पर बैठने का वाकया भी ख़ुदवाया गया।
  • 1800 ई. में किले की प्राचीर सीधी बनाने हेतु इस स्तम्भ को गिरा दिया गया और 1838 में अंग्रेज़ों ने इसे पुनः खड़ा किया।

गिरनार अभिलेख : 

रुद्रदमन का गिरनार शिलालेख पश्चिमी छत्रप नरेश रुद्रदमन द्वारा लिखवाया गया शिलालेख है। यह शिलालेख गिरनार पर्वतों पर है जो जूनागढ़ के निकट स्थित है। यह १३०-से १५० ई॰ के मध्य लिखा गया था। जूनागढ़ शिलाओं पर अशोक के १४ शिलालेख तथा स्कन्दगुप्त के शिलालेख भी है। इस अभिलेख की मुख्य विशेषताएँँ - 

  • रुद्रदामन का गिरनार शिलालेख उच्च कोटि के संस्कृत गद्य का स्वरूप प्रकट करता है जिसमें सुबन्धु, दण्डी और बाण की गद्यशैली का पूर्वरूप देखा जा सकता है।
  • इसकी भाषा सरल और प्रवाहपूर्ण है। इसमें दीर्घ समासों का भी प्रयोग देखते बनता है।
  • अलंकृत शैली, नादात्मकता इसकी अन्य विशेषताएँ है।
  • इस शिलालेख में एक बहुत बड़े सुदर्शन तड़ाग सरोवर के निर्माण की बात कही है।
  • इस क्षेत्र में पानी की कमी है। यह कार्य भी जनहित के लिए प्रशंसनीय प्रयास है।

 

अतः स्पष्ट है, हर्षस्य बांसखेडा-ताम्र-अभिलेखः  तथा रुद्रदाम्नः गिरनार-अभिलेखः  यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 64

याज्ञवल्क्यस्मृतौ व्यावहाराध्यायस्य विषयोऽस्ति-

(a) ऋणादानप्रकरणम्

(b) दानप्रकरणम्

(c) गृहस्थधर्ममप्रकरणम्

(d) साक्षिप्रकरणम्

अधस्तनेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) एवं (b)

  2. BOption (b)

    (a) एवं (d)

  3. COption (c)

    (b) एवं (d)

  4. DOption (d)

    (c) एवं (b)

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Answer: (b)B.

(a) एवं (d)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : याज्ञवल्क्यस्मृति के व्यवहाराध्याय के कौन से दो विषय हैंं?

याज्ञवल्क्य स्मृति :  

याज्ञवल्क्य स्मृति में १००३ श्लोक हैं। इसपर विरचित मिताक्षरा टीका हिंदू धर्मशास्त्र के विषय में भारतीय न्यायालयों में प्रमाण मानी जाती रही है। याज्ञवल्क्य स्मृति और कौटिलीय अर्थशास्त्र में विशेष साम्य पाया जाता है। इसी स्मृति में सर्वप्रथम स्त्रियोंं के संपत्ती के अधिकार का विधान किया गया है।

याज्ञवल्क्य स्मृति की रचना :

याज्ञवल्क्य स्मृति में तीन कांड (अध्याय) हैं-

  • आचारकाण्ड -
  • इसमें तेरह प्रकरण हैं।
  • उपोद्घात-प्रकरणं, ब्रह्मचारिप्रकरणं, विवाह-प्रकरणं, वर्णजातिविवेक-प्रकरणं, गृहस्थ-प्रकरणम्, स्नातवह-प्रकरणम्, भक्ष्याभक्ष्य-प्रकरणम्, द्रव्यशुद्धि प्रकरणम्, दान-प्रकरणम्, श्राद्ध्-प्रकरणम्, गणपति कल्पप्रकरणम्, ग्रहशान्ति-प्रकरणम्, राजधर्म-प्रकरणम्
  • व्यवहारकाण्ड -
  • इसमें पच्चीस प्रकरण हैं।
  • व्यवहाराध्याये साधाराव्यवहारमातृका, ऋणादानो-पनिधि-साक्षी-लेख्य-दिव्य-दायविभाग-सीमाविवाद-स्वामिपालविवाद-अस्वामिविक्रय-दत्ताप्रदानिक क्रीतानुशया-अभ्युपेत्याशुश्रूषा-संविदव्यतिक्रम्-वेतनादानद्यूत समाह्वय -वाक् पारुष्य-दण्डपारुष्य-साहसविक्रीयासम्प्रदानसम्भूय समुत्थान-स्तेय-स्त्रीसंग्रहण-प्रकरण
  • प्रायश्चितकाण्ड -
  • इसमें छह प्रकरण हैं।
  • शौचप्रकरणम्, आपद्धर्मप्रकरणम्, वानप्रस्थप्रकरणम्, यति-धर्मप्रकरणम्, प्रायश्चित्त-प्रकरणम्, प्रकीर्ण-प्रयश्चित्तानि

अतः स्पष्ट है, ऋणादानप्रकरणम्  तथा  साक्षिप्रकरणम्  यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 65

महाभारताश्रितं भासविरचितं ग्रन्थद्वयं किमस्ति?

(a) अभिज्ञानशाकुन्तलम् 

(b) उरुभङ्गम्

(c) स्वप्नवासवदत्तम्

(d) दूतघटोत्कचम्

अधस्तनेषु समीचीनं  विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) एवं (d)

  2. BOption (b)

    (b) एवं (c)

  3. COption (c)

    (c) एवं (d)

  4. DOption (d)

    (b) एवं (d)

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Answer: (d)D.

(b) एवं (d)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : महाभारत पर आश्रित भास विरचित दो ग्रंथ कौन से हैंं?

उरुभङ्गम्

यह भी महाभारत की कथा पर आश्रित एक एकांकी है। द्रौपदी के अपमान का प्रतिशोध लेने हेतु भीम व दुर्योधन का गदायुद्ध इसमें वर्णित हुआ है। नाटक की विशिष्टता इसके दुःखान्त होने के कारण है। इस नाटक की विशेषता इस प्रकार है - 

  • इस रुपक का नायक दुर्योधन है। उसके चरित्र विन्यास में नाटककार ने पर्याप्त कौशल प्रदर्शित किया है।
  • इस एंकाकी में नाटककार ने उसके चरित्र को नितान्त उदात्त तथा प्रांजल रूप में प्रदर्शित किया है। वह शौर्य पराक्रम का जीवन्त प्रतीक है।
  • दुर्योधन के अतिरिक्त अश्वत्थामा तथा बलराम का व्यक्तित्व भी अपने में महत्वपूर्ण है।
  • संस्कृत नाट्य-साहित्य में उरुभङ्ग अपना विशिष्ट स्थान रखता है। नाटकीय कौशल की दृष्टि से यह नाटक प्रशंसनीय है।
  • कथोपकथनों में स्वाभाविकता सर्वत्र परिलक्षित होती है। समय और पात्र के अनुकूल ही वार्तालापों की संघटना की गई है।
  • दुर्योधन के उरुभङ्ग हो जाने पर बलराम जी की चेष्टाओं तथा कथनों में पर्याप्त स्वाभाविकता है।
  • रस की दृष्टि से भी नाटककार को पर्याप्त सफलता प्राप्त हुई है। नाटक में करुण तथा वीर रस परस्पर अनुस्यूत हैं।

दूतघटोत्कचम् :

यह एकांकी भी महाभारत की कथा पर आधारित है। इसमें अभिमन्यु की मृत्यु के पश्चात् श्रीकृष्ण घटोत्कच को दूत रूप में धृतराष्ट के पास भेजते हैं। दुर्योधन क्रुद्ध होकर घटोत्कच का तिरस्कार करता है। दोनों में परस्पर वाद विवाद होता है। घटोत्कच दुर्योधन को युद्ध के लिये ललकारता है। धृतराष्ट उसे शान्त करते हैं। अन्त में घटोत्कच अर्जुन द्वारा अभिमन्यु का बदला लेने की बात कहकर धमकी देते हुये निकल जाता है। घटोत्कच के दूत बनकर जाने के कारण ही इसका नाम ‘‘दूत घटोत्कच’’ रखा गया है। इस नाटक की विशेषता इस प्रकार है - 

  • इस नाटक का प्रधान पात्र घटोत्कच है। वह वीर रस से ओतप्रोत है।
  • वीरता के साथ-साथ उसमें शालीनता तथा शिष्टता भी दृष्टिगत होती है। वह वाक्पटु भी है।
  • संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि नाटककार ने घटोत्कच का चरित्र बहुत ही उन्नत रूप में प्रस्तुत किया है।
  • घटोत्कच के अलावा दुर्योधन, शकुनि तथा दुःशासन के चरित्र भी इस नाटक में उभरकर समाने आये हैं। ये सभी अत्यन्त अभिमानी तथा क्रूर प्रकृति के हैं। निहत्थे बालक अभिमन्यु को मारकर वे प्रसन्न होते हैं।
  • नाटक वीर तथा करुण रस का सम्मिलन है।
  • एक और अभिमन्यु की मृत्यु से करुण रस का वातावरण प्रस्तुत है तो दूसरी और घटोत्कच तथा दुर्योधनादि के विवाद में वीररस अपना अस्तित्व व्यक्त करता है।
  • यह नाटक वास्तविकता के निकट प्रतीत होता हैं मानव हृदय की आकांक्षाओं एवं कमजोरियों के चित्रण में नाटककार अत्यन्त सफल है।
  • इस नाटक में भरतवाक्य का अभाव है, अतः कुछ लोग इसे अपूर्ण बतलाते हैं , संभव है आगे इसमें कुछ अंश रहा हो। परन्तु यह नाटक अपने प्रयोजन में पूर्ण है।

 

अतः स्पष्ट है, उरुभङ्गम् तथा दूतघटोत्कचम् यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

Additional Information

भास की रचनारूपकआधारअंकसंक्षिप्त कथानक
दूतवाक्यअंकमहाभारत१इसमें श्रीकृष्ण का दूत के रूप में वर्णन हुआ है। कृष्णशिष्टाई इस कृति का विषय है।
मध्यमव्यायोगव्यायोगमहाभारत१इसमें पाण्डवों के वनवास काल में भीम द्वारा घटोत्कच के पंजे से एक ब्राह्मण बालक की मुक्ति की कथा है। मध्यम शब्द मध्यम पाण्डव भीम और ब्राह्मण के मध्यम पुत्र दोनों के लिए प्रयुक्त हुआ है।
दूतघटोत्कचअंकमहाभारत१इसमें अभिमन्यु की मृत्यु के पश्चात् श्रीकृष्ण घटोत्कच को दूत रूप में धृतराष्टं के पास भेजते हैं। घटोत्कच के दूत बनकर जाने के कारण ही इसका नाम ‘‘दूत घटोत्कच’’ रखा गया है।
कर्णभारअंकमहाभारत१इसमें द्रोणाचार्य के परलोक सिधारे जाने पर कर्ण को सेनापति बनाया जाता है तथा युद्ध का भार उस पर आ पड़ता है, इसलिए नाटक का नाम ‘‘कर्णभार’’ है।
उरुभंगअंकमहाभारत१इसमें द्रौपदी के अपमान का प्रतिशोध लेने हेतु भीम व दुर्योधन का गदायुद्ध वर्णित है, तथा दुर्योधन का अंत समय में पश्चात्तापदग्ध करुण चित्रण है।
पंचरात्रसमवकारमहाभारत३इसमें प्रारंभ पाँच रात्रियों में पाण्डवों को ढूँढनें की बात से हुआ है। द्रोणाचार्य के सत्प्रयास से पाण्डव मिल जाते हैं तथा दुर्योधन द्वारा उन्हे आधा राज्य दे दिया जाता है, यह कथा है।
अभिषेकनाटकरामायण६इसमें रामायण के किष्किंधाकाण्ड से युद्धकाण्ड की समाप्ति तक की कथा अर्थात् बालिवध से राम राज्याभिषेक तक की कथा वर्णित है।
प्रतिमानाटकरामायण७राम वनगमन से लेकर रावणवध तथा राम राज्याभिषेक तक की घटनाओं का इसमें चित्रण है।
बालचरितनाटकपुराण५यह नाटक भगवान् श्री कृष्ण की बाल लीलाओं पर आधारित है। इसमें श्रीकृष्ण के जन्म से कंस वध तक की कथा वर्णित है।
प्रतिज्ञायौगंधरायणनाटकलोककथा४इसमें कौशाम्बी के राजा वत्सराज उदयन द्वारा उज्जयिनी के राजा प्रद्योत की पुत्री वासवदत्ता के हरण की कथा है।
स्वप्नवासवदत्तनाटकलोककथा६इसमें प्रतिज्ञायौगन्धरायण से आगे की कथा का वर्णन है। इस नाटक का नामकरण राजा उदयन के द्वारा स्वप्न में वासवदत्ता के दर्शन पर आधारित है।
अविमारकनाटकलोककथा६इसमें राजा कुन्तिभोज की पुत्री कुरंगी का राजकुमार अविमारक से प्रणय एवं विवाह का वर्णन है।
दरिद्र चारुदत्तप्रकरणस्वतन्त्र कल्पना४शूद्रक के प्रसिद्ध प्रकरण ‘‘मृच्छकटिक’’ का आधार यही माना जाता है। इसमें कवि ने दरिद्र चारूदत्त एवं वेश्या वसन्तसेना की प्रणय-कथा का वर्णन किया है।

Question 66

अधस्तनेषु केन सह कस्य सम्बन्धः?

(a) शिक्षा                                           (i) पादव्यवस्था

(b) कल्पः                                          (ii)शब्दानुशासनम्

(c) व्याकरणम्                                   (iii) यज्ञविधानविमर्शः

(d) छन्दः                                          (iv) वर्णस्वरमात्रादिविमर्शः

समुचितां तालिकां चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a)-(i), (b)-(ii), (c)-(iii), (d)-(iv)

  2. BOption (b)

    (a)-(iv), (b)-(iii), (c)-(ii), (d)-(i)

  3. COption (c)

    (a)- ii), (b)-(i), (c)-(iv),(d)-(iii)

  4. DOption (d)

    (a)-(iii), (b)-(i), (c)-(iv), (d)-(ii)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(a)-(iv), (b)-(iii), (c)-(ii), (d)-(i)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किसका किस के साथ संबंध है?

वेदांगोंं का परिचय :

  • शिक्षा -
  • इसमें वेद मन्त्रों के उच्चारण करने की विधि बताई गई है। स्वर एवं वर्ण आदि के उच्चारण-प्रकार की जहाँ शिक्षा दी जाती हो, उसे शिक्षा कहां जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य वेदमन्त्रों के अविकल यथास्थिति विशुद्ध उच्चारण किये जाने का है। शिक्षा का उद्भव और विकास वैदिक मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण और उनके द्वारा उनकी रक्षा के उदेश्य से हुआ है।
  • कल्प -
  • वेदों के किस मन्त्र का प्रयोग किस कर्म में करना चाहिये, इसका कथन किया गया है। इसकी तीन शाखायें हैं- श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र। कल्प वेद-प्रतिपादित कर्मों का भलीभाँति विचार प्रस्तुत करने वाला शास्त्र है। इसमें यज्ञ सम्बन्धी नियम दिये गये हैं।
  • व्याकरण -
  • इससे प्रकृति और प्रत्यय आदि के योग से शब्दों की सिद्धि और उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वरों की स्थिति का बोध होता है। वेद-शास्त्रों का प्रयोजन जानने तथा शब्दों का यथार्थ ज्ञान हो सके अतः इसका अध्ययन आवश्यक होता है। इस सम्बन्ध में पाणिनीय व्याकरण ही वेदांग का प्रतिनिधित्व करता है। व्याकरण वेदों का मुख भी कहा जाता है।
  • निरुक्त -
  • वेदों में जिन शब्दों का प्रयोग जिन-जिन अर्थों में किया गया है, उनके उन-उन अर्थों का निश्चयात्मक रूप से उल्लेख निरूक्त में किया गया है। इसे वेद पुरुष का कान कहा गया है। निःशेषरूप से जो कथित हो, वह निरुक्त है। इसे वेद की आत्मा भी कहा गया है।
  • ज्योतिष -
  • इससे वैदिक यज्ञों और अनुष्ठानों का समय ज्ञात होता है। यहाँ ज्योतिष से मतलब `वेदांग ज्योतिष´ से है। यह वेद पुरुष का नेत्र माना जाता है। वेद यज्ञकर्म में प्रवृत होते हैं और यज्ञ काल के आश्रित होते है तथा जयोतिष शास्त्र से काल का ज्ञान होता है। अनेक वेदिक पहेलियों का भी ज्ञान बिना ज्योतिष के नहीं हो सकता।
  • छन्द -
  • वेदों में प्रयुक्त गायत्री, उष्णिक आदि छन्दों की रचना का ज्ञान छन्दशास्त्र से होता है। इसे वेद पुरुष का पैर कहा गया है। ये छन्द वेदों के आवरण है। छन्द नियताक्षर वाले होते हैं। इसका उदेश्य वैदिक मन्त्रों के समुचित पाठ की सुरक्षा भी है।

 

अतः स्पष्ट है, (a)-(iv), (b)-(iii), (c)-(ii), (d)-(i) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 67

अधोलिखितेषु केन सह कस्य सम्बन्धः?

(a)आख्यातम्(i)अदः
(b)नाम(ii)भवति
(c)निपातः(iii)परि
(d)उपसर्गः(iv)नु

समुचितां तालिकां चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a)-(iii), (b)-(ii), (c)-(i), (d)-(iv)

  2. BOption (b)

    (a)-(i), (b)-(iii), (c)-(ii), (d)-(iv)

  3. COption (c)

    (a)-(iv), (b)-(iii), (c)-(i), (d)-(ii)

  4. DOption (d)

    (a)-(ii), (b)-(i), (c)-(iv), (d)-(iii)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(a)-(ii), (b)-(i), (c)-(iv), (d)-(iii)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किसका किस के साथ संबंध है?

निरुक्त के नैघण्टुक-काण्ड नामक प्रथम कांड में यास्काचार्य ने पद के चार भेद माने हैंं। 

  • नाम
  • आख्यात
  • उपसर्ग
  • निपात

इनके उदाहरण इस प्रकार हैंं - 

(a)आख्यातम्(ii)भवति
(b)नाम(i)अदः
(c)निपातः(iv)नु
(d)उपसर्गः(iii)परि

 

अतः स्पष्ट है, (a)-(ii), (b)-(i), (c)-(iv), (d)-(iii) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 68

अधोऽङ्कितानां केन सह कस्य सम्बन्धः?

(a)प्रत्यक्षमेव प्रमाणम्(i)जैनाः
(b)सप्तभङ्गिनयः(ii)साङ्ख्यदर्शनम्
(c)हेत्वाभासाः(iii)चार्वाकाः
(d)सत्कार्यवादः(iv)नैयायिकाः

अत्र समुचितां विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a)-(iv), (b)-(i), (c)-(iii), (d)-(ii)

  2. BOption (b)

    (a)-(iii), (b)-(i), (c)-(iv), (d)-(ii)

  3. COption (c)

    (a)-(ii), (b)-(iv), (c)-(iii), (d)-(i)

  4. DOption (d)

    (a)-(i), (b)-(iii), (c)-(ii), (d)-(iv)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(a)-(iii), (b)-(i), (c)-(iv), (d)-(ii)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किसका किस के साथ संबंध है?

प्रत्यक्ष प्रमाण : 

चार्वाक दर्शन एक प्राचीन भारतीय भौतिकवादी नास्तिक दर्शन है। यह मात्र प्रत्यक्ष प्रमाण को मानता है तथा पारलौकिक सत्ताओं को यह सिद्धांत स्वीकार नहीं करता है। यह दर्शन वेदबाह्य भी कहा जाता है।

सप्तभंगी सिद्धांत : 

स्यादवाद या अनेकान्तवाद या सप्तभङ्गी का सिद्धान्त जैन धर्म में मान्य सिद्धान्तों में से एक है।

  • 'स्यादवाद' का अर्थ 'सापेक्षतावाद' होता है। यह जैन दर्शन के अंतर्गत किसी वस्तु के गुण को समझने, समझाने और अभिव्यक्त करने का सापेक्षिक सिद्धांत है।
  • 'सापेक्षता' अर्थात 'किसी अपेक्षा से'। अपेक्षा के विचारों से कोई भी चीज सत्‌ भी हो सकती है और असत्‌ भी। इसी को 'सत्तभंगी नय' से समझाया जाता है। इसी का नाम 'स्यादवाद' है।
  • जैन धर्म के अनुसार भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से देखे जाने के कारण प्रत्येक ज्ञान भी भिन्न-भिन्न हो सकता है। केवल दो ('सत्य' और 'असत्य') नहीं, बल्कि सात स्तरीय तर्कपद्धति। ज्ञान की यह विभिन्नता सात प्रकार की हो सकती है-
  • स्यात्-अस्ति (है)
  • स्यात्-नास्ति (नहीं है)
  • स्यात् अस्ति च नास्ति च (है और नहीं है)
  • स्यात् अवक्तव्यम् (कहा नहीं जा सकता)
  • स्यात् अस्ति च अवक्तव्यम् च (है किन्तु कहा नहीं जा सकता)
  • स्यात् नास्ति च अवक्तव्यम् च (नहीं है और कहा नहीं जा सकता)
  • स्यात् अस्ति च नास्ति च अवक्तव्यम् च (है, नहीं है और कहा नहीं जा सकता।)

हेत्वाभास :

भारतीय न्यायदर्शन (तर्कशास्त्र) में हेत्वाभास उस अवस्था को कहते हैं जिसमें वास्तविक हेतु का अभाव होने पर या किसी अवास्तविक असद् हेतु के वर्तमान रहने पर भी वास्तविक हेतु का आभास मिलता या अस्तित्व दिखाई देता है और उसके फल-स्वरूप भ्रम होता या हो सकता हो।

  • 'हेत्वाभास' दो शब्दों 'हेतु' और 'आभास' की सन्धि से बना है।
  • 'आभास' का मतलब है 'जो नहीं है वह दीखना' या 'जो नहीं है वैसा दीखना'। हेतु का आभास तब होता है जब हेतु के पाँचों लक्षणों (पक्षसत्व, सपक्षसत्व, विपक्षासत्व, अवाधितत्व और असत् प्रतिपक्षतव) का अभाव हो।
  • भारतीय नैयायिकों ने इसके पाँच प्रकारों की चर्चा की है। गौतम ने हेत्वाभास के निम्नलिखित पाँच भेद बताए हैं-
  • सव्यभिचार
  • विरुद्ध
  • प्रकरणसम,
  • साद्य-सम और
  • कालातीत

सत्कार्यवाद : 

सत्कार्यवाद, मुख्यतः सांख्य का सिद्धान्त है जिसके अनुसार कार्य (प्रभाव), अपनी उत्पत्ति के पूर्व कारण में विद्यमान (सत्) रहता है। इसके अनुसार सत् (जिसका अस्तित्व है वह) असत् (जिसका अस्तित्व नहीं है) से उत्पन्न नहीं हो सकता।

असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसम्भवाभावात्।

शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत्कार्यम्॥

कार्य ‘सत्’ है अर्थात् कार्य अपने कारण में सदा विद्यमान है; क्योंकि

  • असत् को सत् से उत्पन्न नहीं किया जा सकता,
  • जिस कार्य की आवश्यकता होती है उसी कारण को ग्रहण करना पड़ता है,
  • हर कार्य हर जगह विद्यमान नहीं होता,
  • जो कारण जिस कार्य को उत्पन्न कर सकता है, वह उसी को उत्पन्न कर सकता है,
  • कारण जिस प्रकार का होता है, कार्य भी उसी प्रकार का होता है,
  • असदकरण : जिसका अस्तित्व नहीं है, उसे उत्पन्न नहीं किया जा सकता।
  • उपादानग्रहण : कुछ उत्पन्न करने के लिये सही उपादान होना चाहिये।
  • सर्वसम्भवाभाव : किसी वस्तु से सब कुछ उत्पन्न नहीं किया जा सकता। बालू से तेल न्हीं निकाला जा सकता।
  • शक्तस्य शक्यकरण : कारण केवल वही कर सकता है जो उसकी कर सकने की सीमा में हो।
  • कारणभाव : कार्य की प्रकृति, कारण जैसी होती है।

अतः समुचित तालिका इस प्रकार है - 

(a)प्रत्यक्षमेव प्रमाणम्(iii)चार्वाकाः
(b)सप्तभङ्गिनयः(i)जैनाः
(c)हेत्वाभासाः(iv)नैयायिकाः
(d)सत्कार्यवादः(ii)साङ्ख्यदर्शनम्

 

अतः स्पष्ट है, (a)-(iii), (b)-(i), (c)-(iv), (d)-(ii) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 69

अधोऽङ्कितेषु केन सह कस्य सम्बन्धः?

(a)माध्यमिकाः(i)बाह्यार्थशून्यम्
(b)योगाचाराः(ii)बाह्यार्थप्रत्यक्षम्
(c)सौत्रान्तिकाः(iii)सर्वं शून्यम्
(d)वैभाषिकाः(iv)बाह्यार्थानुमेयम्

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) - (iii), (b) - (i), (c) - (iv), (d) - (ii)

  2. BOption (b)

    (a) - (i), (b) - (ii), (c) - (iii), (d) - (iv)

  3. COption (c)

    (a) -( iv), (b) - (iii), (c) - (ii), (d) - (i)

  4. DOption (d)

    (a) - (iii), (b) - (ii), (c) - (iv), (d) - (i)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(a) - (iii), (b) - (i), (c) - (iv), (d) - (ii)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किसका किस के साथ संबंध है?

Important Points

बौद्धन्याय चार संप्रदायों में विभक्त है-

  • वैभाषिक,
  • सौत्रांतिक,
  • योगाचार,
  • माध्यमिक।

इनमें प्रथम दो हीनयान के तथा अंतिम दो महायान के अंतर्गत हैं। हीनयान का संबंध स्थविरवादी संघ से और महायान का संबंध महासांघिक संघ से है। पहला संघ बुद्धविषयों को परिवर्तनार्ह तथा दूसरा संघ उसे अपरिर्वनार्ह मानता है।

वैभाषिक :

  • वैभाषिक न्याय में पदार्थ के "विषयी" और विषय के रूप में दो भेद मानकर दोनों का पृथक् अस्तित्व माना गया है।
  • "विषयी" में रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान इन पाँच स्कंधों का; चक्षु आदि छ: इंद्रियों तथा रूप आदि इनके छ: विषयों, इन बारह आयतनों का तथा इंद्रिय, विषय और विज्ञान इन तीन धातुओं का समावेश होता है।
  • "विषय" में रूपधर्म, चित्तधर्म, चैत्तधर्म और रूपचित्तविप्रयुक्तधर्म इन चार "संस्कृत" हेतुप्रत्ययजन्य धर्मों का समावेश होता है।
  • इस न्याय में जगत् को त्रैधातुक, संस्कृत तथा असंस्कृत धर्मों का समष्टि रूप, सत्य, प्रत्यक्षवेद्य तथा क्षणभंगुर मानकर "अर्हत्" पद की प्राप्ति और दु:खाभाव रूप निर्वाण को मानव जीवन का चरम लक्ष्य माना गया है।
  • वैभाषिक न्याय की विशेष जानकारी के लिए कात्यायनीपुत्र, वसुबंधु, स्थिरमति, दिंनाग, यशोमित्र तथा संघभद्र आदि बौद्ध विद्वानों के ग्रंथों का अवलोकन करना चाहिए।

सौत्रान्तिक

  • "सौत्रांतिक न्याय" में बुद्ध के सूत्रात्मक वचनों के यथाश्रुत अर्थ को विशेष महत्व दिया जाता है।
  • इसकी पदार्थ कल्पना वैभाषिक के समान ही है, अंतर केवल इतना है कि वैभाषिक न्याय में "ज्ञेय" और "ज्ञान" दोनों को प्रत्यक्ष माना जाता है और सौत्रांतिक न्याय में ज्ञान को प्रत्यक्ष तथा ज्ञेय को अतींद्रिय एवं ज्ञानानुमेय माना जाता है।
  • सौत्रांतिक न्याय का समुचित परिचय प्राप्त करने के लिए कुमारलात, श्रीलाभ, धर्मत्रात, बुद्धदेव और यशोमित्र आदि बौद्ध पंडितों के ग्रंथों का अनुशीलन करना चाहिए।

योगाचार :

  • "योगाचार न्याय" में "विज्ञानवाद" को दार्शनिक सिद्धांत के रूप में स्वीकृत किया गया है।
  • विज्ञानवाद के अनुसार "विज्ञान" ही एकमात्र सत्य वस्तु है। चित्त, मन और विज्ञप्ति उसी के नाम है।
  • विज्ञान के दो भेद हैं-
  • प्रवृत्तिविज्ञान
  • आलयविज्ञान।
  • संसार के समस्त व्यवहार प्रवृत्तिविज्ञान से संपन्न होते हैं। "अहम्" आकार का ज्ञान आलयविज्ञान है।
  • आलयविज्ञान ही इस न्याय के अनुसार आत्मा है। दोनों ही विज्ञान स्वप्रकाश एवं क्षणिक है। जगत् की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। वह विज्ञान का विवर्त मात्र है। उसकी सत्ता केवल व्यावहारिक है।
  • परमार्थ सत्ता केवल विज्ञान की ही है। इस न्याय के अनुसार आत्मभूत ज्ञानप्रवाह को नितांत निर्मल बनाना ही मनुष्य का अंतिम ध्येय है।
  • योगाचार न्याय को पूर्णतया अवगत करने के लिए मैत्रेयनाथ, असंग, वसुबंधु, स्थिरमति, दिंनाग, शंकर स्वामी, धर्मपाल तथा धर्मकीर्ति आदि बौद्ध मनीषियों के ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए।

माध्यमिक :

  • "माध्यमिक न्याय" ने "शून्यवाद" को दार्शनिक सिद्धांत के रूप में अंगीकृत किया है।
  • इसके अनुसार ज्ञेय और ज्ञान दोनों ही कल्पित हैं। पारमार्थिक तत्व एकमात्र "शून्य" ही है।
  • "शून्य" सार, असत्, सदसत् और सदसद्विलक्षण, इन चार कोटियों से अलग है। जगत् इस "शून्य" का ही विवर्त है।
  • विवर्त का मूल है संवृति, जो अविद्या और वासना के नाम से भी अभिहित होती है।
  • इस मत के अनुसार कर्मक्लेशों की निवृत्ति होने पर मनुष्य निर्वाण प्राप्त कर उसी प्रकार शांत हो जाता है जैसे तेल और बत्ती समाप्त होने पर प्रदीप।
  • माध्यमिक न्याय के विस्तृत और विशद ज्ञान के लिए नागार्जुन, आर्यदेव, बुद्धपालित, भावविवेक, चंद्रकीर्ति, शांतिदेव और शांतिरंक्षित आदि बौद्ध विपश्चितों के ग्रंथों का परिशीलन अपेक्षित है।

इस प्रकार समुचित तालिका है - 

(a)माध्यमिकाः(iii)सर्वं शून्यम्
(b)योगाचाराः(i)बाह्यार्थशून्यम्
(c)सौत्रान्तिकाः(iv)बाह्यार्थानुमेयम्
(d)वैभाषिकाः(ii)बाह्यार्थप्रत्यक्षम्

 

अतः स्पष्ट है, (a) - (iii), (b) - (i), (c) - (iv), (d) - (ii) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 70

सूत्रोदाहरणयोः युग्मं यथोचितं मेलयतु-

(a)तुमुण्ण्वुलौ क्रियायां क्रियार्थायाम्(i)पठितुं प्रवीणः
(b)समानकर्तृकेषु तुमुन्(ii)वेला भोक्तुम्
(c)पर्याप्तिवचनेष्वलमर्थेषु(iii)ज्ञातुम् इच्छामि
(d)कालसमयवेलासु तुमुन्(iv)कृष्णं दर्शको याति

अधोलिखितेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) - (i), (b) - (iii), (c) - (iv), (d) - (ii)

  2. BOption (b)

    (a) - (iv), (b) - (iii), (c) - (i), (d) - (ii)

  3. COption (c)

    (a) - (ii), (b) - (iii), (c) - (iv), (d) - (i)

  4. DOption (d)

    (a) - (iv), (b) - (i), (c) - (ii), (d) - (iii)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(a) - (iv), (b) - (iii), (c) - (i), (d) - (ii)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : सूत्र और उदाहरण के जोडे का चयन कीजिए।

स्पष्टीकरण : 

अष्टाध्यायी-

  • अष्टाध्यायी (अष्टाध्यायी = आठ अध्यायों वाली) महर्षि पाणिनि द्वारा रचित संस्कृत व्याकरण का एक अत्यंत प्राचीन ग्रंथ (7०० ई पू) है।
  • इसमें आठ अध्याय हैं; प्रत्येक अध्याय में चार पद हैं; प्रत्येक पद में 38 से 220 तक सूत्र हैं। इस प्रकार अष्टाध्यायी में आठ अध्याय, बत्तीस पद और सब मिलाकर लगभग 4000 सूत्र हैं।
  • अष्टाध्यायी पर महामुनि कात्यायन का विस्तृत वार्तिक ग्रन्थ है और सूत्र तथा वार्तिकों पर भगवान पतंजलि का विशद विवरणात्मक ग्रन्थ महाभाष्य है।
  • संक्षेप में सूत्र, वार्तिक एवं महाभाष्य तीनों सम्मिलित रूप में 'पाणिनीय व्याकरण' कहलाता है और सूत्रकार पाणिनी, वार्तिककार कात्यायन एवं भाष्यकार पतंजलि - तीनों व्याकरण के 'त्रिमुनि' कहलाते हैं।

समुचित तालिका इस प्रकार है - 

(a)तुमुण्ण्वुलौ क्रियायां क्रियार्थायाम्(iv)कृष्णं दर्शको याति
(b)समानकर्तृकेषु तुमुन्(iii)ज्ञातुम् इच्छामि
(c)पर्याप्तिवचनेष्वलमर्थेषु(i)पठितुं प्रवीणः
(d)कालसमयवेलासु तुमुन्(ii)वेला भोक्तुम्

 

अतः स्पष्ट है, (a) - (iv), (b) - (iii), (c) - (i), (d) - (ii) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 71

अधोस्तनयुग्मानां समीचीनतालिकां चिनुत-

(a)श्रीहर्ष���(i)हर्षचरितम्
(b)दण्डी(ii)मुद्राराक्षसम्
(c)बाणभट्टः(iii)नैषधीयचरितम्
(d)विशाखदत्तः(iv)दशकुमारचरितम्

समुचितां तालिकां चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) - (ii), (b) - (iii), (c) - (iv), (d) - (i)

  2. BOption (b)

    (a) - (iii), (b) - (iv), (c) - (i), (d) - (ii)

  3. COption (c)

    (a) - (iv), (b) - (i), (c) - (ii), (d) - (iii)

  4. DOption (d)

    (a) - (i), (b) - (ii), (c) - (iii), (d) - (iv)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(a) - (iii), (b) - (iv), (c) - (i), (d) - (ii)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : समुचित तालिका का चयन कीजिए।

हर्षचरित :

हर्षचरित संस्कृत में बाणभट्ट द्वारा रचित एक ग्रन्थ है। इसमें भारतीय सम्राट हर्षवर्धन का जीवनचरित वर्णित है। ऐतिहासिक कथानक से सम्बन्धित यह संस्कृत का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है। इस समय उपलब्ध हर्षचरित आठ उच्छ्वासों में विभाजित है। बाण ने हर्ष की प्रस्थान करती हुई सेना का, राज्यसभा का, धार्मिक सम्प्रदायों का, ग्रामों का सुन्दर चित्र प्रस्तुत किया है जो कि इतिहास की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है।

मुद्राराक्षस :

मुद्राराक्षस संस्कृत का ऐतिहासिक नाटक है जिसके रचयिता विशाखदत्त हैं। इसकी रचना चौथी शताब्दी में हुई थी। इसमें चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य संबंधी ख्यात वृत्त के आधार पर चाणक्य की राजनीतिक सफलताओं का अपूर्व विश्लेषण मिलता है। इसमें इतिहास और राजनीति का सुन्दर समन्वय प्रस्तुत किया गया है। इसमें नन्दवंश के नाश, चन्द्रगुप्त के राज्यारोहण, राक्षस के सक्रिय विरोध, चाणक्य की राजनीति विषयक सजगता और अन्ततः राक्षस द्वारा चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रभुत्व की स्वीकृति का उल्लेख हुआ है। इसमें साहित्य और राजनीति के तत्त्वों का योग मिलता है।

नैषधीयचरित :

नैषधीयचरित, श्रीहर्ष द्वारा रचित संस्कृत महाकाव्य है। यह वृहत्त्रयी नाम से प्रसिद्ध तीन महाकव्यों में से एक है। महाभारत का नलोपाख्यान इस महाकाव्य का मूल आधार है। इसमें कुल २२ सर्ग हैं इस ग्रन्थ के दो भाग हैं- पूर्व और उत्तर। दोनों में ११-११ सर्ग हैं (कुल २२ सर्ग) इस ग्रन्थ के अन्त में यह निर्दिष्ट नहीं है कि 'ग्रन्थ समाप्त हुआ' - इस कारण संशय होता है कि यह ग्रन्थ अपूर्ण है। यह काव्य कठिन है क्योंकि कहा गया है -

  • नैषधं विद्वदौषधम् (नैषध विद्वानों के लिये औषध है।)

दशकुमारचरित :

दशकुमारचरित, दंडी (षष्ठ या सप्तम शताब्दी ई.) द्वारा प्रणीत संस्कृत गद्यकाव्य है। इसमें दश कुमारों का चरित वर्णित होने के कारण इसका नाम "दशकुमारचरित" है। 

दशकुमारचरित के हस्तलिखित तथा प्रकाशित संस्करणों में प्राय: तीन भाग हैं-

  • आरंभिक अथवा भूमिका भाग, जिसमें पाँच उच्छ्वास हैं, पूर्वपीठिका के नाम से प्रसिद्ध हैं;
  • मध्यम भाग, जिसमें आठ उच्छ्वास हैं, दशकुमारचरित के नाम से जाना जाता है।
  • अंतिम अथवा परिशिष्ट भाग, जो उत्तरपीठिका के नाम से प्रसिद्ध है।

समुचित तालिका इस प्रकार है - 

(a)श्रीहर्षः(iii)नैषधीयचरितम्
(b)दण्डी(iv)दशकुमारचरितम्
(c)बाणभट्टः(i)हर्षचरितम्
(d)विशाखदत्तः(ii)मुद्राराक्षसम्

 

अतः स्पष्ट है, (a) - (iii), (b) - (iv), (c) - (i), (d) - (ii) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 72

अधोस्तनयुग्मानां समीचीनां तालिकां चिनुत-

(a)हर्षः(i)मुद्राराक्षसम्
(b)भवभूतिः(ii)कर्णभारम्
(c)विशाखदत्तः(iii)उत्तररामचरितम्
(d)भासः(iv)रत्नावली

एषु समीचीनमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) - (iii), (b) - (ii), (c) - (iv), (d) - (i)

  2. BOption (b)

    (a) - (iv), (b) - (iii), (c) - (i), (d) - (ii)

  3. COption (c)

    (a) - (ii), (b) - (i), (c) - (iii), (d) - (iv)

  4. DOption (d)

    (a) - (i), (b) - (iv), (c) - (ii), (d) - (iii)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(a) - (iv), (b) - (iii), (c) - (i), (d) - (ii)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : समुचित तालिका का चयन कीजिए।

मुद्राराक्षस :

मुद्राराक्षस संस्कृत का ऐतिहासिक नाटक है जिसके रचयिता विशाखदत्त हैं। इसकी रचना चौथी शताब्दी में हुई थी। इसमें चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य संबंधी ख्यात वृत्त के आधार पर चाणक्य की राजनीतिक सफलताओं का अपूर्व विश्लेषण मिलता है। इसमें इतिहास और राजनीति का सुन्दर समन्वय प्रस्तुत किया गया है। इसमें नन्दवंश के नाश, चन्द्रगुप्त के राज्यारोहण, राक्षस के सक्रिय विरोध, चाणक्य की राजनीति विषयक सजगता और अन्ततः राक्षस द्वारा चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रभुत्व की स्वीकृति का उल्लेख हुआ है। इसमें साहित्य और राजनीति के तत्त्वों का योग मिलता है। 

कर्णभार :

यह भी एक अंक के कथानक वाला महाभारत की कथावस्तु से सम्बद्ध कृति है। द्रोणाचार्य के परलोक सिधारे जाने पर कर्ण को सेनापति बनाया जाता है तथा युद्ध का भार उस पर आ पड़ता है, इसलिए नाटक का नाम ‘‘कर्णभार’’ है।

  • ‘‘कर्णभार’’ शीर्षक की व्याख्या विद्वानों ने अनेक प्रकार से की है। प्रोफेसर ए. डी. पुसालकर की सम्मति में कानों के भारभूत कुण्डलों का दानकर यहाँ कर्ण की अद्भुत दानशीलता वर्णित की गई है। अतः कानों के आधारभूत कुण्डलों के दान को केन्द्र मानकर इस नाटक की रचना करने से इस नाटक का नाम ‘‘कर्णभार’’ है।
  • डॉ विन्टरनित्स ने कर्णभार की व्याख्या कर्ण के कठिन कार्य से की है। डॉ॰ भट्ट की धारणा है कि कर्ण की चिन्ता ही भारस्वरूप हो गई है। इसी बात को ध्यान में रखकर इस नाटक का नाम कर्णभार रखा गया है।
  • कुछ लोगों के मत में कर्ण द्वारा प्राप्त युद्ध कौशल उनके लिए भारभूत हो गया था, अतः इस नाटक का नाम कर्णभार पड़ा।

उत्तररामचरित :

उत्तररामचरितम् महाकवि भवभूति का प्रसिद्ध संस्कृत नाटक है, जिसके सात अंकों में राम के उत्तर जीवन की कथा है। सात अंकों में निबद्ध उत्तररामचरितम भवभूति की सर्वश्रेष्ठ नाट्यकृति है। इसमें रामराज्यमिषेक के पश्चात् जीवन का लोकोत्तर चरित वर्णित है जो महावीरचरित का ही उत्तर भाग माना जाता है। संस्कृत नाट्यसाहित्य में मर्यादापुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र के पावन चरित्र से सम्बद्ध अनेक नाटक है किन्तु उनमें भवभूति का उत्तरराम चरितम् अपना एक अलग ही वैशिष्ट्य रखता है। काव्य शास्त्र में जहाँ नाटकों में श्रृंगार अथवा वीर रस की प्रधानता का विधान है वहीं भवभूति ने उसके विपरीत करुण रस प्रधान नाटक रचकर नाट्यजगत में एक अपूर्व क्रान्तिला दी है। उत्तररामचरितम् में प्रेम का जैसा शुद्ध रूप देखने को मिलता है वैसा अन्य कवियों की कृत्तियों में दुर्लभ है।

Important Pointsरत्नावली यह हर्षविरचित नाटिका है। नाटिका यह १८ उपरुपकोंं में से एक रूपक है, इसलिये इसका महत्व अपार है। 

समुचित तालिका इस प्रकार है - 

(a)हर्षः(iv)रत्नावली
(b)भवभूतिः(iii)उत्तररामचरितम्
(c)विशाखदत्तः(i)मुद्राराक्षसम्
(d)भासः(ii)कर्णभारम्

 

अतः स्पष्ट है, (a) - (iv), (b) - (iii), (c) - (i), (d) - (ii) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 73

अधोलिखितेषु केन सह कस्य सम्बन्धः?

(a)भट्टोजिदीक्षितः(i)काशिका
(b)नरेन्द्राचार्यः(ii)शब्दकौस्तुभः
(c)वामनः(iii)लघुमञ्ञूषा
(d)नागेशः(iv)सारस्वतव्याकरणम्

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) - (iv), (b) - (iii), (c) - (i), (d) - (ii)

  2. BOption (b)

    (a) - (i), (b) - (iv), (c) - (iii), (d) - (ii)

  3. COption (c)

    (a) - (iii), (b) - (ii), (c) - (i), (d) - (iv)

  4. DOption (d)

    (a) - (ii), (b) - (iv), (c) - (i), (d) - (iii)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(a) - (ii), (b) - (iv), (c) - (i), (d) - (iii)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किसका किस के साथ संबंध है?

काशिका :

काशिकावृत्ति, पाणिनीय "अष्टाध्यायी" पर 7वीं शताब्दी ई. में रची गई प्रसिद्ध वृत्ति है��� इसमें बहुत से सूत्रों की वृत्तियाँ और उनके उदाहरण पूर्वकालिक आचार्यों के वृत्तिग्रंथों से भी दिए गए हैं। केवल महाभाष्य का ही अनुसरण न कर अनेक स्थलों पर महाभाष्य से भिन्न मत का भी प्रतिपादन हुआ है। काशिका में उद्धृत वृत्तियों से प्राचीन वृत्तिकारों के मत जानने में बड़ी सहायता मिलती है, अन्यथा वे विलुप्त ही हो जाते। इसी प्रकार इसमें दिए उदाहरणों प्रत्युदाहरणों से कुछ ऐसे ऐतिहासिक तथ्यों की उपलब्धि हुई है जो अन्यत्र दुष्प्राप्य थे। इस ग्रंथ की एक विशेषता यह भी है इसमें गणपाठ दिया हुआ है जो प्राचीन वृत्तिग्रंथों में नहीं मिलता।

'काशिका' शब्द के दो अर्थ हो सकते हैं।

  • प्रथम अर्थ के अनुसार, 'काशिका' 'काश्' धातु से निष्पन्न है इसलिये काशिका का अर्थ 'प्रकाशित करने वाली' या 'प्रकाशिका' हुआ (काश् में ही प्र उपसर्ग जोड़ने से प्रकाश बनता है)।
  • काशिका के व्याख्याता हरदत्त के अनुसार दूसरी व्याख्या यह यह है कि काशिका की रचना काशी में हुई थी इसलिये इसे काशिका कहा गया (काशीषु भवा काशिका)।

यह जयादित्य और वामन नाम के दो विद्वानों की सम्मिलित कृति है। 

शब्दकौस्तुभ :

भट्टोजी दीक्षित ने अपने ग्रन्थ 'शब्दकौस्तुभ' में पातंजल महाभाष्य के विषयों का युक्तिपूर्वक समर्थन किया है।

लघुमंजूषा :

वैयाकरण-सिद्धांत-मंजूषा के साथ ही नागेश के मञ्जूषा, लघुमञ्जूषा, परमलघुमञ्जूषा ये तीनों व्‍याकरण के दार्शनिक ग्रन्‍थ हैं।

सारस्वत व्याकरण :

स्वरूपाचार्य अनुभूति को सारस्वत व्याकरण का निर्माता माना जाता है। बहुत से वैयाकरण इनको सारस्वत का टीकाकार ही मानते हैं। इसकी पुष्टि में जो तथ्यपूर्ण प्रमाण मिलते हैं उनमें क्षेमेंद्र का प्रमाण सर्वोपरि है। मूल सारस्वतकार कौन थे इसका पता नहीं चलता।

सारस्वत पर क्षेमेंद्र की प्रचीनतम टीका मिलती है। उसमें सारस्वत का निर्माता "नरेंद्र" माना गया है। क्षेमेंद्र सं. 1250 के आसपास वर्तमान थे। उसके बाद अनुभूति स्वरूपाचार्यकृत "सारस्वतप्रक्रिया" नामक ग्रंथ पाया जाता है।

अतः समुचित तालिका इस प्रकार है - 

(a)भट्टोजिदीक्षितः(ii)शब्दकौस्तुभः
(b)नरेन्द्राचार्यः(iv)सारस्वतव्याकरणम्
(c)वामनः(i)काशिका
(d)नागेशः(iii)लघुमञ्ञूषा

 

अतः स्पष्ट है, (a) - (ii), (b) - (iv), (c) - (i), (d) - (iii) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 74

अधोलिखितेषु केन सह कस्य सम्बन्धः?

(a)द्यूतक्रीडा(i)भीष्मपर्व
(b)गीता-उपदेशः(ii)महाप्रस्थानिकपर्व
(c)अभिमन्यु-वधः(iii)सभापर्व
(d)पाण्डवानां हिमालययात्रा(iv)द्रोणपर्व

समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) - (i), (b) - (iv), (c) - (iii), (d) - (ii)

  2. BOption (b)

    (a) - (iii), (b) - (i), (c) - (ii), (d) - (iv)

  3. COption (c)

    (a) - (iv), (b) - (ii), (c) - (iii), (d) - (i)

  4. DOption (d)

    (a) - (iii), (b) - (i), (c) - (iv), (d) - (ii)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(a) - (iii), (b) - (i), (c) - (iv), (d) - (ii)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किस का किस के साथ संबंध है?

स्पष्टीकरण : 

महाभारत-

  • महाभारत भारत का एक प्रमुख काव्य ग्रंथ है, जो स्मृति के इतिहास वर्ग में आता है।
  • इसे भारत भी कहा जाता है। यह काव्यग्रंथ भारत का अनुपम धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक ग्रंथ हैं।
  • विश्व का सबसे लंबा यह साहित्यिक ग्रंथ और महाकाव्य, हिन्दू धर्म के मुख्यतम ग्रंथों में से एक है। इस ग्रन्थ को हिन्दू धर्म में पंचम वेद माना जाता है।

 

महाभारत के पर्व और उनके विषयोंं का मेलन इस प्रकार है - 

(a)द्यूतक्रीडा(iii)सभापर्व
(b)गीता-उपदेशः(i)भीष्मपर्व
(c)अभिमन्यु-वधः(ii)द्रोणपर्व
(d)पाण्डवानां हिमालययात्रा(iv)महाप्रस्थानिकपर्व

 

अतः स्पष्ट है, (a) - (iii), (b) - (i), (c) - (ii), (d) - (iv) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 75

मनुस्मृतेः टीकाकाराणां केन सह कस्य सम्बन्धः -

(a)गोविन्दराजः(i)मनुभाष्यम्
(b)कुल्लूकभट्टः(ii)मन्वाशयानुसारिणी-मनुटीका
(c)सर्वज्ञनारायणः(iii)मन्वर्थमुक्तावली
(d)मेधातिथिः(iv)मन्वर्थविवृत्ति

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) - (iii), (b) - (i), (c) - (ii), (d) - (iv)

  2. BOption (b)

    (a) - (ii), (b) - (iii), (c) - (iv), (d) - (i)

  3. COption (c)

    (a) - (iv), (b) - (ii), (c) - (i), (d) - (iii)

  4. DOption (d)

    (a) - (i), (b) - (iv), (c) - (iii), (d) - (ii)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(a) - (ii), (b) - (iii), (c) - (iv), (d) - (i)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : मनुस्मृति के टीकाकारोंं में किसका किस के साथ संबंध है?

मनुस्मृति के टीकाकार :

मनुस्मृति पर कई व्याख्याएँ प्रचलित हैं-

  • मेधातिथि कृत भाष्य;
  • कुल्लूक भट्ट द्वारा रचित मन्वर्थमुक्तावली टीका;
  • नारायण कृत मन्वर्थ विवृत्ति टीका;
  • राघवानन्द कृत मन्वर्थ चन्द्रिका टीका;
  • नन्दन कृत नन्दिनी टीका;
  • गोविन्दराज कृत मन्वाशयानसारिणी टीका आदि।

मनु के अनेक टीकाकारों के नाम ज्ञात हैं, जिनकी टीकाएँ अब लुप्त हो गई हैं, यथा- असहाय, भर्तृयज्ञ, यज्वा, उपाध्याय ऋजु, विष्णुस्वामी, उदयकर, भारुचि या भागुरि, भोजदेव धरणीधर आदि।

समुचित तालिका इस प्रकार है - 

(a)गोविन्दराजः(ii)मन्वाशयानुसारिणी-मनुटीका
(b)कुल्लूकभट्टः(iii)मन्वर्थमुक्तावली
(c)सर्वज्ञनारायणः(iv)मन्वर्थविवृत्ति
(d)मेधातिथिः(i)मनुभाष्यम्

 

अतः स्पष्ट है, (a) - (ii), (b) - (iii), (c) - (iv), (d) - (i) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 76

वैदिकसाहित्ये अधोलिखितानां सुनिश्चितक्रमो लेख्यः

(i) ब्राह्मणम्

(ii) उपनिषद्

(iii) शुक्लयजुर्वेदः

(iv) सूत्रसाहित्यम्

अधोलिखितेषु उचितक्रमं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (ii), (i), (iv), (iii)

  2. BOption (b)

    (iii), (i), (ii), (iv)

  3. COption (c)

    (i), (ii), (iii), (iv)

  4. DOption (d)

    (iv), (i), (ii), (iii)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(iii), (i), (ii), (iv)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : वैदिक साहित्य का सुनिश्चित क्रम लिखिए। 

वैदिक साहित्य :

वैदिक साहित्य में वेद और वेद से संबंधित साहित्य आता है। रचना के अनुसार प्रत्येक शाखा की वैदिक शब्द-राशि के चार भाग हैं। वेद के मुख्य मन्त्र भाग को संहिता कहते हैं। संहिता के अलावा हरेक में टीका अथवा भाष्य के तीन स्तर होते हैं। वह इस प्रकार है- 

  • संहिता - मन्त्र भाग
  • ऋग्वेद
  • सामवेद
  • यजुर्वेद
  • अथर्ववेद
  • ब्राह्मण-ग्रन्थ - गद्य में कर्मकाण्ड के विवेचक ग्रंथ
  • आरण्यक - कर्मकाण्ड के पीछे के उद्देश्य के विवेचक ग्रंथ
  • उपनिषद - परमेश्वर, परमात्मा-ब्रह्म और आत्मा के स्वभाव और सम्बन्ध का बहुत ही दार्शनिक और ज्ञानपूर्वक वर्णन

वैदिक साहित्य का क्रम :

वैदिक साहित्य में प्रथम वेद, उसके अनन्तर ब्राह्मणग्रंथ, फिर आरण्यक और उसके बाद उपनिषद आतेंं हैंं। इसके आधार पर सूत्रग्रंथो का निर्माण हुआ है, जिसमेंं वेदांग, दर्शन से संबंधित ग्रंथ आतेंं हैंं। वैदिक साहित्य का सुनिश्चित क्रम यह है- 

(iii) शुक्लयजुर्वेदः

(i) ब्राह्मणम्

(ii) उपनिषद्

(iv) सूत्रसाहित्यम्

अतः स्पष्ट है, (iii), (i), (ii), (iv) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 77

निरुक्तकारेण केन क्रमेण पदजातानि वर्णितानि?

(i) आख्यातम्

(ii) उपसर्गाः

(iii) निपाताः

(iv) नाम

अत्र कः क्रमः? स्पष्टयत

  1. AOption (a)

    (iv), (i), (ii), (iii)

  2. BOption (b)

    (i), (iii), (ii), (iv)

  3. COption (c)

    (ii), (i), (iii), (iv)

  4. DOption (d)

    (iii), (ii), (iv), (i)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(iv), (i), (ii), (iii)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : निरुक्तकार ने किस क्रम से पदजातियोंं का वर्णन किया है?

निरुक्त में पदजातियोंं का विवेचन :

निरुक्त में यास्क ने निघण्टु में गिनाये गए वैदिक शब्दों की व्याख्या की है, निघण्टु में ५ अध्याय और निरुक्त में १२ अध्याय हैं। दो प्रक्षिप्त अध्याय को लेकर कुल चौदह अध्याय हैं। निरुक्त में शब्दों का विभाजन चार प्रकार से किया गया है  -

  • चत्वारि पदजातानि नामाख्याते चोपसर्गनिपाताश्च तानीमानि भवन्ति।
  • चार प्रकार की पदजातियाँँ होती हैंं -
  • नाम
  • आख्यात
  • उपसर्ग
  • निपात

नाम :

"सत्वप्रधानानि नामानि'

  • अर्थात् जो सत्व प्रधान हो, उसे नाम कहते हैं। सत्व का तात्पर्य सिद्ध क्रिया से है। यथा-पाठ इत्यादि।

 आख्यात :

"भावप्रधानमाख्यातम्'

  • अर्थात् जिसमें भाव प्रधान हो, वह आख्यात है जैसे पढ़ना इत्यादि ।

 उपसर्ग :

यास्क ने उपसर्गों का निश्चित लक्षण नहीं दिया है। शाकटायन के मतानुसार - 

  • "न निर्बद्धा उपसर्गा अर्थान्निराहुरिति शाकटायनः'
  • उपसर्ग से युक्त होने पर नाम तथा आख्यात में भिन्नता आ जाती है।

 निपात :

"उच्चावचेष्वर्थेषु निपतन्ति इति निपाताः"

  • अर्थात् अनेकार्थक होने के कारण इन्हें निपात कहते हैं। निपात तीन प्रकार के होते हैं - 
  • उपमार्थक
  • इव न चित् नु ।
  • कर्मोपसंग्रहार्थक
  • वा, आ, अह, ह, किल, हि, ननु, खलु शश्वतम्, नूनम् इत्यादि
  • पादपूरणार्थक
  • कम, इम इत उ त्वत् इत्यादि।

 

अतः स्पष्ट है, (iv), (i), (ii), (iii) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 78

 बौद्धदर्शनानुसारं चतुर्णाम् आर्यसत्यानाम् उचितः क्रमोऽस्ति-

  1. AOption (a)

    दुःखम्, समुदायः, निरोधः, मार्गः,

  2. BOption (b)

    मार्गः, दुःखम्, निरोधः, समुदायः 

  3. COption (c)

    समुदायः, दुःखम्, मार्गः, निरोधः 

  4. DOption (d)

    निरोधः, मार्गः, दुःखम्, समुदायः 

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Correct answer

Answer: (a)A.

दुःखम्, समुदायः, निरोधः, मार्गः,

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर :  बौद्धदर्शन के अनुसार चार आर्यसत्योंं का उचित क्रम क्या है?

आर्यसत्य :

आर्यसत्य की संकल्पना बौद्ध दर्शन के मूल सिद्धांत है। इसे संस्कृत में 'चत्वारि आर्यसत्यानि' और पाली में 'चत्तरि अरियसच्चानि' कहते हैं। और इनका क्रम इसप्रकार है-

आर्यसत्य चार हैं-

  • दुःख : संसार में दुःख है। 
  • प्राणी जन्म भर विभिन्न दु:खों की शृंखला में पड़ा रहता है, यह दु:ख आर्यसत्य है। ​
  • समुदय : यह दुःख के कारण हैं,
  • संसार के विषयों के प्रति जो तृष्णा है वही समुदय आर्यसत्य है। जो प्राणी तृष्णा के साथ मरता है, वह उसकी प्रेरणा से फिर भी जन्म ग्रहण करता है। इसलिए तृष्णा की समुदय आर्यसत्य कहते हैं।​
  • निरोध : यह दुःख के निवारण हैं। 
  • तृष्णा का अशेष प्रहाण कर देना निरोध आर्यसत्य है। तृष्णा के न रहने से न तो संसार की वस्तुओं के कारण कोई दु:ख होता है और न मरणोंपरांत उसका पुनर्जन्म होता है।
  • मार्ग : निवारण के लिये यह अष्टांगिक मार्ग हैं।
  • निरोध की प्राप्ति का मार्ग आर्यसत्य - आष्टांगिक मार्ग है। इसके आठ अंग हैं-सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वचन, सम्यक् कर्म, सम्यक् आजीविका, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि। इस आर्यमार्ग को सिद्ध कर वह मुक्त हो जाता है।

बौद्धदर्शन के अनुसार चार आर्यसत्योंं का उचित क्रम इस प्रकार है - 

  1. दुःख
  2. समुदय
  3. निरोध
  4. मार्ग

 

अतः स्पष्ट है, दुःखम्, समुदायः, निरोधः, मार्गः यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 79

जैनमतानुसारं सप्ततत्त्वानां समुचितं क्रमोऽस्ति-

  1. AOption (a)

    आस्रवः, संवरः, बन्धः, निर्जरा, जीवः, अजीवः, मोक्षः

  2. BOption (b)

    बन्धः, आस्रवः, संवरः, निर्जरा, जीवः, अजीवः, मोक्षः

  3. COption (c)

    जीवः, अजीवः, आस्रवः, बन्धः, संवरः, निर्जरा, मोक्षः

  4. DOption (d)

    बन्धः, जीवः, अजीवः, आस्रवः, संवरः, निर्जरा, मोक्षः

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Answer: (c)C.

जीवः, अजीवः, आस्रवः, बन्धः, संवरः, निर्जरा, मोक्षः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : जैन मत के अनुसार सात तत्वोंं का उचित क्रम क्या है?

जैन धर्म के अनुसार सात तत्व :

जैन धर्म का तत्त्वज्ञान सात सत्य अथवा मौलिक सिद्धांतों पर आधारित है, जिन्हें तत्त्व कहा जाता है। वह तत्व इस प्रकार हैंं - 

  • जीव
  • जैन धर्म के अनुसार आत्मा (जीव) एक वास्तविकता के रूप में मौजूद है। आत्मा जिस शरीर में रहती है, आत्मा का उससे अलग अस्तित्व होता है। चेतना और उपयोग (ज्ञान और धारणा) जीव के लक्षण होते है। हालाँकि, जीव जन्म और मृत्यु दोनों का बोध करता है, पर असलियत में इसका निर्माण और विनाश नहीं होता है। मृत्यु और जन्म केवल जीव के एक अवस्था के खत्म होने और अगली दशा के शुरू होने को दर्शाती है।
  • अजीव
  • जीव (आत्मा) के अलावा जो भी पदार्थ हम देखते हैं वो अजीव है।
  • आस्रव
  • कर्मों की आमद को आस्रव कहतें हैं। यह तब होता है, जब मन, संवाद और शरीर की गतिविधियों द्वारा उत्पन्न स्पंदन के कारण कर्म कण आत्मा की ओर आकर्षित होते हैं| तत्त्वार्थसूत्र 6:1-2 के अनुसार, "मन, संवाद और शरीर की गतिविधियों को योग कहते हैं।"
  • बंध
  • कर्मों का असर चेतना से जुडन��� पर ही होता है। चेतना के साथ कर्मों के इस बंधन को बंध कहते हैं। हालाँकि, केवल योग या गतिविधियों के माध्यम से ही बंध नहीं होता। बंध के कई कारणों में से, राग मुख्य कारण है। वस्तुतः, कर्म के चिपकने का कारण आत्मा का चिपचिपापन है, जो विभिन्न रागों और मानसिक स्वभाव के अस्तित्व की वजह से है।
  • संवर
  • कर्मों की रोक को संवर कहतें हैं। मुक्ति या आत्मबोध की ओर पहला कदम, यह सुनिश्चित करना है कि जिन रास्तों से कर्म आत्मा में प्रविष्ट हो रहे हैं, वे बंद किये जाएँ और नए कर्म इकट्ठे न हों। इसे कर्मों के अंतर्वाह को रोकना या संवर कहा जाता है।
  • निर्जरा
  • पहले से एकत्रित कर्मों का नाश करना या झाडना निर्जरा कहलाता है। निर्जरा दो प्रकार की होती हैं-
  • भाव निर्जरा
  • द्रव्य निर्जरा
  • मोक्ष
  • आत्मा की मुक्ति या कर्मों से छुटकारा को मोक्ष कहते हैं। यह आत्मा के अस्तित्व की आनंदित अवस्था है, जो कर्मों के बंधन से, संसार से और जन्म मरण के चक्र से पूरी तरह मुक्त होती है। एक मुक्त आत्मा अपने सच्ची और मूल प्रकृति- अनंत सुख, अनंत ज्ञान और अनंत दर्शन को पा लेती है। ऐसी आत्मा को सिद्ध या परमात्मा कहा जाता है और सर्वोच्च आत्मा या भगवान मानी जाती है।

जैन मत के अनुसार सात तत्वोंं का उचित क्रम यह है - 

जीवः, अजीवः, आस्रवः, बन्धः, संवरः, निर्जरा, मोक्षः 

अतः स्पष्ट है, जीवः, अजीवः, आस्रवः, बन्धः, संवरः, निर्जरा, मोक्षः  यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 80

अधोलिखितानां ग्रन्थानां रचनाकालदृष्टया समुचितं क्रमं चिनुत-

  1. AOption (a)

    काशिका, वाक्यपदीयम्, सारस्वत व्याकरणम्, प्रदीपः

  2. BOption (b)

    वाक्यपदीयम्, काशिका, सारस्वत व्याकरणम्, प्रदीपः 

  3. COption (c)

    वाक्यपदीयम्, काशिका, प्रदीपः, सारस्वत व्याकरणम् 

  4. DOption (d)

    वाक्यपदीयम्, प्रदीपः, काशिका, सारस्वत व्याकरणम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

वाक्यपदीयम्, काशिका, प्रदीपः, सारस्वत व्याकरणम् 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अधोलिखित ग्रंथोंं का रचना काल के दृष्टि से समुचित क्रम चुनिये।

वाक्यपदीय : 

वाक्यपदीय, संस्कृत व्याकरण का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसे त्रिकाण्डी भी कहते हैं। वाक्यपदीय, व्याकरण शृंखला का मुख्य दार्शनिक ग्रन्थ है। इसके रचयिता नीतिशतक के रचयिता महावैयाकरण तथा योगिराज भर्तृहरि हैं। इनके गुरु का नाम वसुरात था। भर्तृहरि को किसी ने तीसरी, किसी ने चौथी तथा छठी या सातवी सदी में रखा है। वाक्यपदीय में भर्तृहरि ने भाषा (वाच्) की प्रकृति और उसका बाह्य जगत से सम्बन्ध पर अपने विचार व्यक्त किये हैं। यह ग्रंथ तीन भागों में विभक्त है जिन्हें "कांड" कहते हैं। यह समस्त ग्रंथ पद्य में लिखा गया है। प्रथम "ब्रह्मकांड" है जिसमें 157 कारिकाएँ हैं, दूसरा "वाक्यकांड है जिसमें 493 कारिकाएँ हैं और तीसरा "पदकांड" के नाम से प्रसिद्ध है।

काशिका : 

काशिकावृत्ति, पाणिनीय "अष्टाध्यायी" पर 7वीं शताब्दी ई. में रची गई प्रसिद्ध वृत्ति है। इसमें बहुत से सूत्रों की वृत्तियाँ और उनके उदाहरण पूर्वकालिक आचार्यों के वृत्तिग्रंथों से भी दिए गए हैं। केवल महाभाष्य का ही अनुसरण न कर अनेक स्थलों पर महाभाष्य से भिन्न मत का भी प्रतिपादन हुआ है। काशिका में उद्धृत वृत्तियों से प्राचीन वृत्तिकारों के मत जानने में बड़ी सहायता मिलती है, अन्यथा वे विलुप्त ही हो जाते। इसी प्रकार इसमें दिए उदाहरणों प्रत्युदाहरणों से कुछ ऐसे ऐतिहासिक तथ्यों की उपलब्धि हुई है जो अन्यत्र दुष्प्राप्य थे। इस ग्रंथ की एक विशेषता यह भी है इसमें गणपाठ दिया हुआ है जो प्राचीन वृत्तिग्रंथों में नहीं मिलता।

'काशिका' शब्द के दो अर्थ हो सकते हैं।

  • प्रथम अर्थ के अनुसार, 'काशिका' 'काश्' धातु से निष्पन्न है इसलिये काशिका का अर्थ 'प्रकाशित करने वाली' या 'प्रकाशिका' हुआ (काश् में ही प्र उपसर्ग जोड़ने से प्रकाश बनता है)।
  • काशिका के व्याख्याता हरदत्त के अनुसार दूसरी व्याख्या यह यह है कि काशिका की रचना काशी में हुई थी इसलिये इसे काशिका कहा गया (काशीषु भवा काशिका)।

यह जयादित्य और वामन नाम के दो विद्वानों की सम्मिलित कृति है। 

प्रदीप :

कैयट पतंजलि के व्याकरण भाष्य की 'प्रदीप' नामक टीका के रचयिता है। इनका काल 1090 विक्रम अर्थात् 12वी शताब्दी के आसपास है। इस टीकाग्रंथ के संबंध में उन्होने लिखा है कि उसका आधार भर्तृहरि (वाक्यपदीयकार) की भाष्यटीका है जो अब पूर्णरूप से अप्राप्य है)। प्रदीप में स्थान स्थान पर पतंजलि और भर्तृहरि के स्फोटवाद का अच्छा दार्शनिक विवेचन हुआ है।

सारस्वत व्याकरण :

 

स्वरूपाचार्य अनुभूति को सारस्वत व्याकरण का निर्माता माना जाता है। बहुत से वैयाकरण इनको सारस्वत का टीकाकार ही मानते हैं। इसकी पुष्टि में जो तथ्यपूर्ण प्रमाण मिलते हैं उनमें क्षेमेंद्र का प्रमाण सर्वोपरि है। मूल सारस्वतकार कौन थे इसका पता नहीं चलता।

सारस्वत पर क्षेमेंद्र की प्राचीनतम टीका मिलती है। उसमें सारस्वत का निर्माता "नरेंद्र" माना गया है। क्षेमेंद्र सं. 1250 के आसपास वर्तमान थे। उसके बाद अनुभूति स्वरूपाचार्यकृत "सारस्वतप्रक्रिया" नामक ग्रंथ पाया जाता है।

 

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है, कि वाक्यपदीयम्, काशिका, प्रदीपः, सारस्वत व्याकरणम् यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 81

सिद्धान्तकौमुदीमाश्रित्य प्रकरणानां समीचीनं क्रमं चिनुत-

  1. AOption (a)

    कारकम्, परस्मैपदप्रक्रिया, कृदन्तः, तद्धितम्

  2. BOption (b)

    कारकम्, तद्धितम्, परस्मैपदप्रक्रिया, कृदन्तः 

  3. COption (c)

    परस्मैपदप्रक्रिया, कृदन्तः, तद्धितम्, कारकम् 

  4. DOption (d)

    परस्मैपदप्रक्रिया, कारकम्, तद्धितम्, कृदन्तः 

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Correct answer

Answer: (b)B.

कारकम्, तद्धितम्, परस्मैपदप्रक्रिया, कृदन्तः 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : सिद्धांतकौमुदी पर आश्रित प्रकरणोंं का सही क्रम चुनिये।

सिद्धांतकौमुदी :

सिद्धान्तकौमुदी संस्कृत व्याकरण का ग्रन्थ है जिसके रचयिता भट्टोजि दीक्षित हैं। इसका पूरा नाम "वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी" है। भट्टोजि दीक्षित ने प्रक्रियाकौमुदी के आधार पर सिद्धांत कौमुदी की रचना की। इस ग्रंथ पर उन्होंने स्वयं प्रौढ़ मनोरमा टीका लिखी। भट्टोजिदीक्षित के शिष्य वरदराज भी व्याकरण के महान पण्डित हुए। उन्होने लघुसिद्धान्तकौमुदी की रचना की।

सिद्धान्तकौमुदी के प्रकरणोंं का क्रम इस प्रकार है - 

कारकम्- क्रिया को जो करता है अथवा क्रिया के साथ जिसका सीधा अथवा परम्परा से सम्बन्ध होता है, वह ‘कारक’ कहा जाता है। 

  1. कर्त्ता कारक
  2. कर्म कारक
  3. करण कारक
  4. सम्प्रदान कारक
  5. अपादान कारक
  6. अधिकरण कारक

परस्मैपदप्रक्रिया- सिद्धांतकौमुदी में पाणिनी ने परस्मैपद की प्रक्रिया किस प्रकार होती है इसका विस्तृत वर्णन किया गया है। परस्मैपद में होनेवाले गणों की चर्चा इसमें की गयी है। 

कृदन्तः- धातुओं के बाद आने वाले प्रत्यय ‘’कृत’’ कहे जाते है। शब्द के अन्त में लगने के रुप में जाने जाते है। अर्थ होता है – ‘ हुए’ कहते हुए , जाते हुए। 

तद्धितम्- व्याकरण में वह प्रत्यय जिसे संज्ञा के अंत में लगाकर भाववाचक संज्ञा या विशेषण बनाते हैं।

अतः स्पष्ट है, कारकम्, तद्धितम्, परस्मैपदप्रक्रिया, कृदन्तः यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 82

पूर्ववर्तिन आचार्यस्य प्राथम्येन कालक्रमानुसारमुचितमुत्तरं निर्दिशत-

(a) क्षेमेन्द्रः

(b) अभिनवगुप्तः

(c) भरतः

(d) रुय्यकः

-एषु क्रमं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (d) (c) (b) (a)

  2. BOption (b)

    (c) (b) (a) (d)

  3. COption (c)

    (a) (d) (b) (c)

  4. DOption (d)

    (b) (d) (c) (a)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(c) (b) (a) (d)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : पूर्ववर्ति आचार्य के कालक्रम से उचित उत्तर का निर्देशन कीजिए।

भरतमुनि :

  • भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र नामक ग्रंथ लिखा । इनका समय विवादास्पद है।
  • इन्हें 400 ई॰पू॰ 100 ई॰ सन् के बीच किसी समय का माना जाता है। भरत बड़े प्रतिभाशाली थे। इतना स्पष्ट है कि भरतमुनि नाट्यशास्त्र के गहन जानकार और विद्वान थे।
  • इनके द्वारा रचित ग्रंथ 'नाट्यशास्त्र' भारतीय नाट्य और काव्यशास्त्र का आदिग्रन्थ है।
  • इसमें सर्वप्रथम रस सिद्धांत की चर्चा तथा इसके प्रसिद्ध सूत्र -'विभावानुभाव संचारीभाव संयोगद्रस निष्पति:" की स्थापना की गयी है। इसमें नाट्यशास्त्र, संगीतशास्त्र, छंदशास्त्र, अलंकार, रस आदि सभी का सांगोपांग प्रतिपादन किया गया है।
  • कहा गया है कि भरतमुनि रचित प्रथम नाटक का अभिनय, जिसका कथानक 'देवासुर संग्राम' था।

अभिनवगुप्त :

  • अभिनवगुप्त (975-1025) दार्शनिक, रहस्यवादी एवं साहित्यशास्त्र के मूर्धन्य आचार्य थे। वे संगीतज्ञ, कवि, नाटककार, धर्मशास्त्री एवं तर्कशास्त्री भी थे।
  • अभिनवगुप्त के आविर्भावकाल का पता उन्हीं के ग्रंथों के समयनिर्देश से भली भाँति लगता है। इनके आरंभिक ग्रंथों में क्रमस्तोत्र की रचना 66 लौकिक संवत् (991 ई.) में और भैरवस्तोत्र की 68 संवत (993 ई.) में हुई।
  • इनकी ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा-विमर्षिणी का रचनाकाल 90 लौकिक संवत् (1015 ई.) है।
  • फलत: इनकी साहित्यिक रचनाओं का काल 990 ई. से लेकर 1020 ई. तक माना जा सकता है। इस प्रकार इनका समय दशम शती का उत्तरार्ध तथा एकादश शती का आरंभिक काल स्वीकार किया जा सकता है।

क्षेमेंद्र : 

  • क्षेमेन्द्र (जन्म लगभग 1025-1066) संस्कृत के प्रतिभासंपन्न काश्मीरी महाकवि थे। ये विद्वान ब्राह्मणकुल में उत्पन्न हुए थे।
  • ये सिंधु के प्रपौत्र, निम्नाशय के पौत्र और प्रकाशेंद्र के पुत्र थे।
  • इन्होंने प्रसिद्ध आलोचक तथा तंत्रशास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान् अभिनवगुप्त से साहित्यशास्त्र का अध्ययन किया था। इन्होंने अपने ग्रंथों के रचनाकाल का उल्लेख किया है जिससे इनके आविर्भाव के समय का परिचय हमें मिलता है।
  • काश्मीर नरेश अनन्त (1028-1063) तथा उनके पुत्र और उत्तराधिकारी राजा कलश (1063-1089) के राज्यकाल में क्षेमेन्द्र का जीवन व्यतीत हुआ।
  • क्षेमेन्द्र के ग्रंथ समयमातृका का रचनाकाल 1050 ई. तथा इनके अंतिम ग्रंथ दशावतारचरित का निर्माण काल इनके ही लेखानुसार 1066 ई. है।
  • फलत: एकादश शती का मध्यकाल (लगभग 1025-1066) क्षेमेंद्र के आविर्भाव का, निश्चित रूप से, समय माना जा सकता है।

रुय्यक : 

  • कश्मीर के एक विद्वान्‌ परिवार में राजानक रुय्यक या रुचक का जन्म बारहवीं शताब्दी के प्रथम भाग में हुआ था।
  • उद्भट के काव्यालंकार संग्रह के विवृतिकार राजानक तिलक इनके पिता थे, जो अलंकारशास्त्र के पंडित थे।
  • 'श्रीकंठचरित्‌' में मंखक ने अध्यापक, विद्वान्‌ व्याख्याकार तथा साहित्यशास्त्री के रूप में अपने गुरु रुय्यक का परिचय दिया है।

 

अतः स्पष्ट है, (c) (b) (a) (d) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 83

सर्वप्राचीनरचनायाः प्राथम्येन कालक्रमानुसारमुचितमुत्तरं चिनुत-

(a) बुद्धचरितम्

(b) नैषधीयचरितम् 

(c) स्वप्नवासवदत्तम् 

(d) मुद्राराक्षसम्

-एषु क्रमं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (a) (d) (b) (c)

  2. BOption (b)

    (d) (c) (a) (b)

  3. COption (c)

    (c) (b) (a) (d)

  4. DOption (d)

    (c) (a) (d) (b)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(c) (a) (d) (b)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : सर्वप्राचीन रचना के प्रथमता से कालक्रमानुसार उचित उत्तर का चयन कीजिए।

नाटकोंं का समय निर्धारण :

  • भास और उनके नाटकों का अविर्भाव निश्चय ही कालिदास से पूर्व हुआ था। गणपति शास्त्री, पुसलकर आदि ने उपर्युक्त नाटकों का रचनाकाल कौटिल्य अर्थशास्त्र से पूर्व पंचम चतुर्थ शताब्दी ई. पू. माना है। स्वप्नवासवदत्तम् यह भास कि रचना है।
  • बुद्धचरितम्, संस्कृत का महाकाव्य है। इसके रचयिता अश्वघोष हैं। इसकी रचनाकाल दूसरी शताब्दी है।
  • मुद्राराक्षस नाटक की रचना अनुमानतः छठी से नवीं शताब्दी के मध्य हुई थी।
  • नैषधीयचरितम् के रचनाकार श्रीहर्ष बारहवीं शती के उत्तरार्ध में विद्यमान थे।

इस विवेचन से सर्वप्राचीन रचना के प्रथमता से कालक्रमानुसार नाटकोंं का सही क्रम है - 

(c) स्वप्नवासवदत्तम् 

(a) बुद्धचरितम्

(d) मुद्राराक्षसम्

(b) नैषधीयचरितम् 

अतः स्पष्ट है, (c) (a) (d) (b) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 84

रामायणस्य बालकाण्डस्य सर्गानुसारम् उपाख्यानानां समुचितः क्रमोऽस्ति-

  1. AOption (a)

    शुनःशेपाख्यानम्-ऋष्यशृङ्गाख्यानम्-क्रौञ्चवधाख्यानम्-अहिल्योद्धाराख्यानम्

  2. BOption (b)

    क्रौञ्चवधाख्यानम्-ऋष्यशृङ्गाख्यानम्-अहिल्योद्धाराख्यानम्-शुनःशेपाख्यानम् 

  3. COption (c)

    क्रौञ्चवधाख्यानम्-शुनःशेपाख्यानम्-अहिल्योद्धाराख्यानम्-ऋष्यशृङ्गाख्यानम् 

  4. DOption (d)

    ऋष्यशृङ्गाख्यानम्-शुनःशेपाख्यानम्-अहिल्योद्धाराख्यानम्-क्रौञ्चवधाख्यानम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

क्रौञ्चवधाख्यानम्-ऋष्यशृङ्गाख्यानम्-अहिल्योद्धाराख्यानम्-शुनःशेपाख्यानम् 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : रामायण के बालकांड के सर्गानुसार उपाख्यानोंं का समुचित क्रम क्या है?

रामायण के कांड : 

इसके रचयिता महर्षि वाल्मीकि को 'आदिकवि' भी कहा जाता है। संस्कृत साहित्य परम्परा में रामायण और महाभारत को इतिहास कहा गया है और इनके रचयिता ऋषि होने से इनको आर्षमहाकाव्य भी कहा जाता है। रामायण के सात अध्याय हैं जो काण्ड के नाम से जाने जाते हैं। इसमें कुल लगभग २४,००० श्लोक हैं। रामायण के सर्ग क्रम के अनुसार इस प्रकार हैंं - 

  1. बालकाण्ड
  2. अयोध्याकाण्ड
  3. अरण्यकाण्ड
  4. किष्किन्धाकाण्ड
  5. सुन्दरकाण्ड
  6. युद्धकाण्ड
  7. उत्तरकाण्ड

रामायण के बालकांड के सर्गानुसार उपाख्यानोंं का समुचित क्रम : 

  • क्रौञ्चवधाख्यानम्
  • ऋष्यशृङ्गाख्यानम्
  • अहिल्योद्धाराख्यानम्
  • शुनःशेपाख्यानम्

 

​अतः स्पष्ट है, क्रौञ्चवधाख्यानम्-ऋष्यशृङ्गाख्यानम्-अहिल्योद्धाराख्यानम्-शुनःशेपाख्यानम्  यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 85

याज्ञवल्क्यस्मृतेः व्यवहाराध्याये प्रकरणानां समुचितं क्रमोऽस्ति-

  1. AOption (a)

    ऋणादान-उपनिधि-साक्षि-लेख्य-दिव्य-सीमाविवाद-दायविभागप्रकरणम्

  2. BOption (b)

    दिव्य-लेख्य-साक्षि-उपनिधि-ऋणादान-सीमाविवाद-दायविभागप्रकरणम् 

  3. COption (c)

    ऋणादान-उपनिधि-साक्षि-लेख्य-दिव्य-दायविभाग-सीमाविवादप्रकरणम्

  4. DOption (d)

    साक्षि-लेख्य-दिव्य-उपनिधि-ऋणादान-सीमाविवाद-दायविभागप्रकरणम् 

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Correct answer

Answer: (c)C.

ऋणादान-उपनिधि-साक्षि-लेख्य-दिव्य-दायविभाग-सीमाविवादप्रकरणम्

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : याज्ञवल्क्यस्मृति के व्यवहाराध्याय के प्रकरणोंं का समुचित क्रम है - 

याज्ञवल्क्य स्मृति :   

याज्ञवल्क्य स्मृति में १००३ श्लोक हैं। इसपर विरचित मिताक्षरा टीका हिंदू धर्मशास्त्र के विषय में भारतीय न्यायालयों में प्रमाण मानी जाती रही है। याज्ञवल्क्य स्मृति और कौटिलीय अर्थशास्त्र में विशेष साम्य पाया जाता है। इसी स्मृति में सर्वप्रथम स्त्रियोंं के संपत्ती के अधिकार का विधान किया गया है।

याज्ञवल्क्य स्मृति की रचना : 

याज्ञवल्क्य स्मृति में तीन कांड (अध्याय) हैं-

  • आचारकाण्ड -
  • इसमें तेरह प्रकरण हैं।
  • उपोद्घात-प्रकरणं, ब्रह्मचारिप्रकरणं, विवाह-प्रकरणं, वर्णजातिविवेक-प्रकरणं, गृहस्थ-प्रकरणम्, स्नातवह-प्रकरणम्, भक्ष्याभक्ष्य-प्रकरणम्, द्रव्यशुद्धि प्रकरणम्, दान-प्रकरणम्, श्राद्ध्-प्रकरणम्, गणपति कल्पप्रकरणम्, ग्रहशान्ति-प्रकरणम्, राजधर्म-प्रकरणम्
  • व्यवहारकाण्ड -
  • इसमें पच्चीस प्रकरण हैं।
  • व्यवहाराध्याये साधाराव्यवहारमातृका, ऋणादानो-पनिधि-साक्षी-लेख्य-दिव्य-दायविभाग-सीमाविवाद-स्वामिपालविवाद-अस्वामिविक्रय-दत्ताप्रदानिक क्रीतानुशया-अभ्युपेत्याशुश्रूषा-संविदव्यतिक्रम्-वेतनादानद्यूत समाह्वय -वाक् पारुष्य-दण्डपारुष्य-साहसविक्रीयासम्प्रदानसम्भूय समुत्थान-स्तेय-स्त्रीसंग्रहण-प्रकरण
  • प्रायश्चितकाण्ड -
  • इसमें छह प्रकरण हैं।
  • शौचप्रकरणम्, आपद्धर्मप्रकरणम्, वानप्रस्थप्रकरणम्, यति-धर्मप्रकरणम्, प्रायश्चित्त-प्रकरणम्, प्रकीर्ण-प्रयश्चित्तानि

अतः स्पष्ट है, ऋणादान-उपनिधि-साक्षि-लेख्य-दिव्य-दायविभाग-सीमाविवादप्रकरणम् यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 86

कथनद्वयमधोलिखितम्- एकम् (A) इति अभिकथनम् अपरञ्च (R) इति कारणम्।

अभिकथनम् (A) : वाल्मीकेः रामः सीता-वियोगे कारुण्य-आनृशंस्य-शोके-मदनरूप-चतुर्मुखी-सन्तापेन सन्तप्तो भवति। 

कारणम् (R) : सर्वेऽपि पुरुषा भार्या-वियोगे सन्तप्ताः भवन्ति। 

उपर्युक्तानुसारं समीचीनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) तथा (R) उभौ अपि सत्यम्। (R) इति समुचित समुचितं कारणमस्ति (A) इत्यस्य। 

  2. BOption (b)

    (A) तथा (R) उभौ अपि सत्यं किन्तु (R) इति उचितं कारणं नास्ति (A) इत्यस्य। 

  3. COption (c)

    (A) इति सत्यम् (R) इति असत्यम् 

  4. DOption (d)

    (A) तथा (R) उभौ अपि असत्यम्। 

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A) तथा (R) उभौ अपि सत्यं किन्तु (R) इति उचितं कारणं नास्ति (A) इत्यस्य। 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 

दो कथन लिखे हुए है - एक अभिकथन है, और दूसरा कारण है।  

अभिकथन : वाल्मीकि ऋषि का राम सीता वियोग होने पर चार मुख वाले मदन रूपी करूणा, क्रूरता, शोक और दु:ख से व्यथित होता हैं।

कारण : सारे पुरुष पत्नी का वियोग होने पर व्यथित होतें हैंं। 

उपर्युक्त कथनोंं के आधार पर उचित विकल्प का चयन कीजिए। 

स्पष्टीकरण : 

  • अभिकथन में वाल्मीकि विरचित काव्य अर्थात् रामायण का नायक राम पत्नी का वियोग होने पर क्या भाव प्रदर्शित करता है, यह वर्णन आया है।
  • राम इस नायक के आचरण लिये सामान्य पुरुषोंं के आचरण का आधार नहीं लिया जा सकता, बल्कि सामान्य पुरुष के आचरण का समर्थन राम के आचरण से हो सकता है।
  • किंतु सारे पुरुष पत्नी के वियोग से पीडित होतें है, यह सत्य है। पर यह राम के आचरण का कारण नहीं हो सकता।

 

अतः स्पष्ट है, (A) तथा (R) उभौ अपि सत्यं किन्तु (R) इति उचितं कारणं नास्ति (A) इत्यस्य यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 87

(A) 'स किं सखा साधु न शास्ति यो नृपम्'।- इयं पंक्तिः भारवेः किरातार्जुनीयादुद्धृतोऽस्ति।

(R) वनेचरः युधिष्ठिरं प्रति दुर्योधनस्य सत्यं वृत्तान्तमवबोधयितुं वदति।

-अधोलिखितेषु उचितं कारणं लिखत-

  1. AOption (a)

    (A) कथनं मित्रस्य साधुशीलतां प्रमाणीकरोती।

    (R) कथनं वनेचरस्य स्वामिनः वञ्चनां निषेधयति।

  2. BOption (b)

    (A) कथने नृपस्य स्वरूपं वर्णितमस्ति।

    (R) कथने दुर्योधनं प्रति वनेचरस्य सह्रदयता ज्ञायते।

  3. COption (c)

    (A) कथने 'स:' पदेन वनेचरः 'नृपम्' पदेन सुयोधनं कथितमस्ति।

    (R) कथनेन सुयोधनं प्रति सेवाभावोऽस्ति।

  4. DOption (d)

    (A) कथने 'सखा' वनेचर अस्ति। 

    (R) वनेचरः युधिष्ठिरं सत्यं वृत्तान्तं न कथयति।

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Correct answer

Answer: (a)A.

(A) कथनं मित्रस्य साधुशीलतां प्रमाणीकरोती।

(R) कथनं वनेचरस्य स्वामिनः वञ्चनां निषेधयति।

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : उचित कारण लिखिए।

(A) 'स किं सखा साधु न शास्ति यो नृपम्'।- इयं पंक्तिः भारवेः किरातार्जुनीयादुद्धृतोऽस्ति।

  • भाषांतर : "वह क्या मित्र है, जो राजा को उचित स��ाह नहीं देता" यह पंक्ति भारवि के किरातार्जुनीयम् से उद्धृत है।

(R) वनेचर युधिष्ठिरं प्रति दुर्योधनस्य सत्यं वृत्तान्तमवबोधयितुं वदति।

  • भाषांतर : वनेचर युधिष्ठिर को दुर्योधन का सत्य वृतान्त जानकर कहता है।

स्पष्टीकरण : 

  • (A) इस कथन में मित्र अथवा सहाय्यक के चरित्र का वर्णन किया गया है। मित्र वहींं है, जो राजा को सत्य और हितकारक वचन कहता है, जो इसके विपरीत आचरण करता है, वह मित्र नहीं हो सकता। इस प्रकार यहांँ मित्र के अच्छे चरित्र का वर्णन किया है।
  • (R) इस वाक्य से स्पष्ट होता है, कि युधिष्ठिर का चर दुर्योधन का सत्य वृतान्त उसे कहता है। वह अपना कर्तव्य निभाता है। दुर्योधन का अच्छा वृत्त सुनकर अपना स्वामि कुपित हो सकता है, इस बात कि परवाह न करते हुए वह अपने आचरण से स्वामि कि वंचना न कर के सत्य का ही आश्रय लेता है।

अतः स्पष्ट है, 

(A) कथनं मित्रस्य साधुशीलतां प्रमाणीकरोती।

(R) कथनं वनेचरस्य स्वामिनः वञ्चनां निषेधयति।

यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 88

कथनद्वयमधोलिखितम्- एकम् अभिकथनम् (A) अपरञ्च कारणम् (R)

अभिकथनम् (A) :  साङ्ख्यकारिकायां पुरुषस्य सत्ता स्वीक्रियते। 

कारणम् (R) : सङ्घातपरार्थत्वात्।

अत्र समुचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) असत्यम् (R) सत्यम् 

  2. BOption (b)

    (A) तथा (R) उभे सत्ये स्तः 

  3. COption (c)

    (A) तथा (R) उभे असत्ये स्तः 

  4. DOption (d)

    (A) सत्यम् (R) असत्यम् 

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A) तथा (R) उभे सत्ये स्तः 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 

दो कथन लिखे हुए है - एक अभिकथन है, और दूसरा कारण है।  

अभिकथन : सांख्यकारिका में पुरुष कि सत्ता का स्वीकार किया है। 

कारण : संघात के परार्थ होने से। 

स्पष्टीकरण : 

सङ्घातपरार्थत्वात् त्रिगुणादिविपर्ययादधिष्ठानात्।

पुरुषोऽस्ति भोक्तभावात् केवल्यार्थप्रवृत्तेश्च*।।* (सांख्यकारिका, १७)

  • अर्थात्‌ संघात के परार्थ होने से, त्रिगुणादि के विपरीत होने से, अधिष्ठान से, भोक्ताभाव से और मोक्ष की ओर होने से "पुरुष" का अस्तित्व सिद्ध होता है।
  • संघात का अर्थ एकसाथ आकर कार्य करने वाले तत्व यह होता है। यह तत्व परार्थ अर्थात् दूसरे के काम के लिये होने से पुरुष कि सत्ता सिद्ध होती है। स्पष्ट है, कि सांख्यकारिका के इस कारिका में संघात के परार्थ होने से पुरुष कि सत्ता का स्वीकार किया है। (A) तथा (R) दोनोंं यहांँ सत्य है।

अतः स्पष्ट है, (A) तथा (R) उभे सत्ये स्तः यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 89

अत्र द्वौ कथनांशौ स्तः-

(a) : पशुपादप्रकृतिः प्रभागपादः

(b) : पशुः चतुष्पादयुक्ता भवन्ति।  तेषामियं प्रकृतिर्भवति। अतः छन्दस्सु चत्वारः पादा भवन्ति। पद्यो चत्वारः पादाः छन्दनिरूपणे गण्यन्ते।

एतेषु-उचितमुत्तरं लिखत्-

  1. AOption (a)

    (a) तथा (b) उभये सत्यकथने,(b) (a) अंशस्य उचितमुदाहरणम्।

  2. BOption (b)

    (a) कथनं सत्यम् (b) कथनं तथा न निर्दिशति (a) स्वरूपम्।

  3. COption (c)

    (a) कथनमसत्यम् (b) कथनं सत्यमस्ति 

  4. DOption (d)

    (a) सत्यमस्ति (b) परिभाषां न प्रस्तौति 

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Correct answer

Answer: (a)A.

(a) तथा (b) उभये सत्यकथने,(b) (a) अंशस्य उचितमुदाहरणम्।

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 

दो कथन लिखे हुए है - एक अभिकथन है, और दूसरा कारण है।  

अभिकथन : पशुओंं के पैर यह प्रकृति है, बाद में भाग यह अर्थ है। 

कारण : पशु चार पैरोंं से युक्त होतें हैंं। उनकी यह प्रकृति होती है। छंदोंं के चार पाद होतें है। छंद के निरुपण में पद्य के चार पादोंं कि गणना होती है। 

स्पष्टीकरण : 

  • प्राकृतिक अर्थ का विधान पहले किया जाता है और उसके अनन्तर साहचर्य प्रतीत करने वाले अर्थ का विधान होता है।
  • पशुओंं के चार पाद होना, यह उनका प्राकृतिक गुण है। इस कारण से पाद इस शब्द के पैर इस अर्थ का प्राधान्य होगा।
  • इस के बाद पाद के विभाग इस अर्थ का विधान होगा, जैसे छंदोंं के पाद अर्थात् विभाग होतें है।
  • इस से स्पष्ट होता है, कि (b) यह (a) का उचित उदाहरण है और दोनोंं सत्यकथन है।

अतः स्पष्ट है, (a) तथा (b) उभये सत्यकथने, (b) (a) अंशस्य उचितमुदाहरणम् यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 90

कथनद्वयम् अधोलिखितम्- तत्र एकम् अभिकथनम् (A) अपरञ्च तस्य कारणम् (R) इति। 

अभिकथनम् (A) : एकनवतिवर्षीयस्य प्रणवस्य प्रपौत्रः ओङ्कारः। ओङ्कारस्य युवापत्यसञ्ज्ञा भवति। 

कारणम् (R) : 'जीवति तु वंश्ये युवा' इति विधानात्।

उपर्युक्तम् अभिकथन- कारणमाश्रित्य समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) तथा (R) उभयं सत्यमस्ति। (A) इत्यस्य (R) उचितं कारणमस्ति। 

  2. BOption (b)

    (A) तथा (R) उभावपि असमीचीनौ

  3. COption (c)

    (A) तथा (R) उभावपि समीचीनौ, परं (A) इत्यस्य (R) इति समुचितं कारणं नास्ति। 

  4. DOption (d)

    (A) इति असमीचीनं परं (R) इति समीचीनम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

(A) तथा (R) उभयं सत्यमस्ति। (A) इत्यस्य (R) उचितं कारणमस्ति। 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 

दो कथन लिखे हुए है - एक अभिकथन है, और दूसरा कारण है।  

अभिकथन : ९१ वर्ष के प्रणव का प्रपौत्र ओंकार है। ओंकार कि युवापत्य संज्ञा होती है। 

कारण :  'जीवति तु वंश्ये युवा' इस विधान से। 

स्पष्टीकरण : 

  • सूत्र : जीवति तु वंश्ये युवा। (४.१.१६३)

अर्थ : 

  • यह सूत्र अपत्यार्थक तद्धित प्रकरण में आता है। 
  • पौत्र आदि जो अपत्य होतें है, उनके पिता आदि पितर जीवित है, तो गोत्र संज्ञा का बाध हो कर युवा संज्ञा होती है।
  • अभिकथन में कहा गया है, कि प्रणव का प्रपौत्र ओंकार है, और प्रणव यह व्यक्ति जीवित है, ऐसा ज्ञान हो रहा है। इसका परिणाम यह है, कि ओंकार इस शब्द में  गोत्र संज्ञा का बाध हो कर युवा संज्ञा हुई है।
  • यह स्पष्ट हो रहा है, कि 'जीवति तु वंश्ये युवा' इस विधान से ओंकार कि युवापत्य संज्ञा होती है। अतः दोनोंं विधान सत्य है, और (A) का (R) उचित कारण है।

अतः स्पष्ट है, यह (A) तथा (R) उभयं सत्यमस्ति। (A) इत्यस्य (R) उचितं कारणमस्ति इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

अन्य उदाहरण :

  • अर्जुनस्य अपत्यमभिमन्युः - अर्जुन का अपत्य अभिमन्यु है।
  • अभिमन्योः अपत्यम् परीक्षितः - अभिमन्यु का अपत्य परीक्षित है।
  • परीक्षितस्य अपत्यम् जनमेजयः - परीक्षित का अपत्य जनमेजय है।
  • यहाँ अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम् इस सूत्र से जनमेजय अर्जुन का 'गोत्रापत्य' है, ऐसा कहा जा सकता है।
  • किंतु अर्जुन, अभिमन्यु, परीक्षित इन में से अगर कोई जीवित है, तो जनमेजय अर्जुन का 'युवापत्य' है।
  • पितरोंं में से एक कोई जीवित होने से गोत्रसंज्ञा का बाध हो कर युवासंज्ञा हुई।

Question 91

छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते।

ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते।।

अत्र श्लोके केषां वर्णनं प्राप्यते-

  1. AOption (a)

    आरण्यकानाम्

  2. BOption (b)

    उपनिषदाम्

  3. COption (c)

    वेदाङ्गानाम्

  4. DOption (d)

    वेदानाम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

वेदाङ्गानाम्

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 

छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते।

ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते।।

इस श्लोक में किसका वर्णन मिलता है?

वेदांगोंं का वर्णन :

छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते

ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते।

शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्

तस्मात्सांगमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते॥

  • छन्द को वेदों का पाद, कल्प को हाथ, ज्योतिष को नेत्र, निरुक्त को कान, शिक्षा को नाक, व्याकरण को मुख कहा गया है। इस प्रकार वेदांगोंं के साथ वेदोंं का अध्ययन करने से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। इस श्लोक में छह वेदांगोंं का वर्णन आया है।

अतः स्पष्ट है, वेदाङ्गानाम् यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

वेदांगोंं का परिचय :

  • शिक्षा -
  • इसमें वेद मन्त्रों के उच्चारण करने की विधि बताई गई है। स्वर एवं वर्ण आदि के उच्चारण-प्रकार की जहाँ शिक्षा दी जाती हो, उसे शिक्षा कहां जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य वेदमन्त्रों के अविकल यथास्थिति विशुद्ध उच्चारण किये जाने का है। शिक्षा का उद्भव और विकास वैदिक मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण और उनके द्वारा उनकी रक्षा के उदेश्य से हुआ है।
  • कल्प -
  • वेदों के किस मन्त्र का प्रयोग किस कर्म में करना चाहिये, इसका कथन किया गया है। इसकी तीन शाखायें हैं- श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र। कल्प वेद-प्रतिपादित कर्मों का भलीभाँति विचार प्रस्तुत करने वाला शास्त्र है। इसमें यज्ञ सम्बन्धी नियम दिये गये हैं।
  • व्याकरण -
  • इससे प्रकृति और प्रत्यय आदि के योग से शब्दों की सिद्धि और उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वरों की स्थिति का बोध होता है। वेद-शास्त्रों का प्रयोजन जानने तथा शब्दों का यथार्थ ज्ञान हो सके अतः इसका अध्ययन आवश्यक होता है। इस सम्बन्ध में पाणिनीय व्याकरण ही वेदांग का प्रतिनिधित्व करता है। व्याकरण वेदों का मुख भी कहा जाता है।
  • निरुक्त -
  • वेदों में जिन शब्दों का प्रयोग जिन-जिन अर्थों में किया गया है, उनके उन-उन अर्थों का निश्चयात्मक रूप से उल्लेख निरूक्त में किया गया है। इसे वेद पुरुष का कान कहा गया है। निःशेषरूप से जो कथित हो, वह निरुक्त है। इसे वेद की आत्मा भी कहा गया है।
  • ज्योतिष -
  • इससे वैदिक यज्ञों और अनुष्ठानों का समय ज्ञात होता है। यहाँ ज्योतिष से मतलब `वेदांग ज्योतिष´ से है। यह वेद पुरुष का ���ेत्र माना जाता है। वेद यज्ञकर्म में प्रवृत होते हैं और यज्ञ काल के आश्रित होते है तथा जयोतिष शास्त्र से काल का ज्ञान होता है। अनेक वेदिक पहेलियों का भी ज्ञान बिना ज्योतिष के नहीं हो सकता।
  • छन्द -
  • वेदों में प्रयुक्त गायत्री, उष्णिक आदि छन्दों की रचना का ज्ञान छन्दशास्त्र से होता है। इसे वेद पुरुष का पैर कहा गया है। ये छन्द वेदों के आवरण है। छन्द नियताक्षर वाले होते हैं। इसका उदेश्य वैदिक मन्त्रों के समुचित पाठ की सुरक्षा भी है।

Question 92

चत्वारो वेदाः जगति प्रसिद्धाः सान्ति। एते ऋग्वेदः, यजुर्वेदः, सामवेदः, अथर्ववेदश्च। एतेषां मन्त्राणामर्थख्यापनाय बहवः आचार्याः प्रयत्नं कृतवन्तः। तत्रर्ग्वेदस्य प्रथमो भाष्यकारः स्कन्दस्वामी आसीत्। विस्तारपूर्वकं यज्ञपद्धतेः प्रथमं भाष्यं आचार्यसायणेन कृतम्। स एव कृष्णयजुर्वेदस्य भाष्यं प्रथमतया विरचितवान्। आनन्दतीर्थः, दयानन्दश्च वेदभाष्यं रचितवन्तौ।

उपर्युक्तेषु ऋग्वेदस्य प्रथमभाष्यकारः क आसीत्?

  1. AOption (a)

    सायणः

  2. BOption (b)

    स्कन्दस्वामी 

  3. COption (c)

    आनन्दतीर्थः 

  4. DOption (d)

    दयानन्दः

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Correct answer

Answer: (b)B.

स्कन्दस्वामी 

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : उपरोक्त भाष्यकारोंं में से ऋग्वेद के प्रथम भाष्यकर कौन थे?

गद्य का हिंदी भाषांतर : 

  • चारों वेद विश्व में प्रसिद्ध हैं। ये ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद हैं। कई आचार्योंं ने इन मंत्रों का अर्थ समझाने का प्रयास किया है। ऋग्वेद के पहले भाष्यकार स्कंदस्वामी थे। यज्ञ की विधि पर सर्वप्रथम भाष्य आचार्य सायण ने विस्तार से दिया था। वह हि कृष्ण यजुर्वेद पर भाष्य लिखने वाले पहले व्यक्ति थे। आनंदतीर्थ और दयानन्द ने वेदों पर भाष्य लिखा।
  • उत्तर के लिये महत्वपूर्ण पंक्ति : 
  • तत्रर्ग्वेदस्य प्रथमो भाष्यकारः स्कन्दस्वामी आसीत्।
  • हिंदी भाषांतर : 
  • ऋग्वेद के पहले भाष्यकार स्कंदस्वामी थे।

अतः स्पष्ट है, स्कन्दस्वामी  यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 93

'यत्समवायिकारणप्रत्यासन्नमवधृतसामर्थ्यं तदसमवायिकारणम्/यथा-तन्तुसंयोगः पटस्यासमवायिकारणम्। तन्तुसंयोगस्य गुणस्य पटसमवायिकारणेषु तन्तुषु गुणिषु समवेतत्वेन समवेयिकारणे प्रत्यासन्नत्वात्। अनन्यथासिद्धनियतपूर्वभावित्वेन पटं प्रति कारणत्वाच्च।'

इति सिद्धान्तानुसारेण 'तन्तुसंयोगः पटस्य' कीदृशं कारणम् भवति?

  1. AOption (a)

    असमवायिकारणम्

  2. BOption (b)

    समवायिकारणम्

  3. COption (c)

    संयोगकारणम्

  4. DOption (d)

    निमित्तकारणम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

असमवायिकारणम्

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : समवायि कारण से प्राप्त होने की क्षमता समवायि कारण है, जैसे, तंतुओं का संयोग कपड़े का समवायि कारण है। तन्तुसंयोग के गुण के कपड़े के समवायि कारण तंतु के गुणों के समवायि कारण के करीब है। और क्योंकि यह विशेष रूप से अमान्य निर्धारित पूर्व-अस्तित्व द्वारा कपड़े का कारण है।

इस सिद्धांत के अनुसार तंतुसंयोग यह कपडे का कौन सा कारण है?

स्पष्टीकरण : 

कारिका-

‘यत्समवायिकारणप्रत्यासन्नमवधृतसामर्थ्यं तदसमवायिकारणम्/ यथा- तन्तुसंयोगः पटस्यासमवायिकारणम् । तन्तुसंयोगस्य गुणस्य पटसमवायिक���रणेषु तन्तुषु गुणिषु समवेतत्वेन समवायिकारणे प्रत्यासन्नत्वात् । अनन्यथासिद्ध नियतपूर्व भावित्वेन पट प्रति कारणत्वाच्च।' इति सिद्धान्तानुसारेण 'तन्तुसंयोगः' पटस्य असमवायिकारणम् भवति ।

अर्थ- अर्थात् जो समवायिकारण में प्रत्यासन्न (= निकटतः सम्बद्ध) होता है और जिसकी (कार्य के प्रति ) सामर्थ्य निश्चित होती है ( अर्थात् जिसमें कारण का लक्षण घटित होता है) वह असमवायिकारण है। जैसे - तन्तुसंयोग पट का असमवायिकारण है। क्योंकि तन्तुसंयोग गुण है, वह पट के समवायिकारण तन्तु नामक गुणी में समवाय सम्बन्ध से रहता है। अतः (पट के) समवायिकारण में प्रत्यासन्न है। और वह अनन्यथासिद्ध पूर्वभावी होने से पट के प्रति कारण भी है।

 

अतः स्पष्ट है, असमवायिकारणम् यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 94

'आत्मा बुद्धया' समेत्यर्थान् मनो युङ्कते विवक्षया।

मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम्।।

उपर्युक्तेन श्लोकेन उपदिश्यते-

  1. AOption (a)

    वर्णोत्पत्तिप्रक्रिया

  2. BOption (b)

    वर्णानां स्थानम्

  3. COption (c)

    वर्णनां प्रयत्नः

  4. DOption (d)

    वर्णानां उच्चारणकालः

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Correct answer

Answer: (a)A.

वर्णोत्पत्तिप्रक्रिया

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : उपर्युक्त श्लोक से किस का उपदेश किया है?

श्लोक : 

आत्मा बुद्ध्या समेत्यर्थान् मनो युङ्कते विवक्षया।

मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम्।। (पाणिनीय शिक्षा, ०६)

हिंदी भाषांतर : 

  • आत्मा बुद्धि से अर्थों की संगति करके कहने की इच्छा से मन की योजना कर के, शरीरस्थित अग्नि को प्रज्वलित कर के, वायु को प्रेरणा देकर, और उससे वायु का उरःस्थान में विचरण होकर  मन्द स्वर को उत्पन्न करता है।

स्पष्टीकरण : 

इस श्लोक में वर्णोत्पत्तिप्रक्रिया का विवेचन किया है। वर्णोत्पत्तिप्रक्रिया में इस क्रम से घटक कार्य करतेंं हैंं - 

  1. आत्मा
  2. बुद्धि
  3. मन
  4. कायाग्नि
  5. वायु

अतः स्पष्ट है, वर्णोत्पत्तिप्रक्रिया यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 95

'ननु तन्तुसम्बन्ध इव तुर्यादिसम्बन्धोऽपि पटस्य विद्यते, तक्तथं तन्तुष्वेव पटः समवेतो जायते, न तुर्यादिषु? सत्यम्, द्विविधः सम्बन्धः संयोगः समवायश्चेति। तत्रायुतसिद्धयोः सम्बन्धः समवायः, अन्ययोस्तु संयोग एव'।

अत्र उचितमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    तन्तुः पटस्य समवायिकारणम्, अयुतसिद्धत्वात्।

  2. BOption (b)

    न तन्तुः पटस्य समवायिकारणम्, अयुतसिद्धत्वात्। 

  3. COption (c)

    तन्तुः पटस्य असमवायिकारणम्, अयुतसिद्धत्वात्। 

  4. DOption (d)

    तुर्यादि पटस्य समवायिकारणम्, अयुतसिद्धत्वात्। 

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Correct answer

Answer: (a)A.

तन्तुः पटस्य समवायिकारणम्, अयुतसिद्धत्वात्।

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : उचित उत्तर का चयन कीजिए। 

संस्कृत पंक्ति : 

'ननु तन्तुसम्बन्ध इव तुर्यादिसम्बन्धोऽपि पटस्य विद्यते, तक्तथं तन्तुष्वेव पटः समवेतो जायते, न तुर्यादिषु? सत्यम्, द्विविधः सम्बन्धः संयोगः समवायश्चेति। तत्रायुतसिद्धयोः सम्बन्धः समवायः, अन्ययोस्तु संयोग एव'।

हिंदी भाषांतर : 

  • तंतुसंबंध जैसे तुरि ( बुनकर कि कूंंची) का भी कपडे के साथ संबंध होता है, तो तंतुओंं में हि कपडे का अस्तित्व कैसे होता है? तुरि इत्यादि वस्तुओंं में क्योंं नहीं? सत्य है, कि संबंध दो प्रकार का होता है, संयोग और समवाय। अयुतसिद्ध संबंध केवल समवायसंबंध होता है, बाकी के वस्तुओंं का तो संयोग संबंध होता है।

स्पष्टीकरण : 

  • दो पदार्थों का वैसा संबंध अयुतसिद्ध कहलाता है जिसमें एक अपने विनाश की अवस्था तक दूसरे पर आश्रित होता है।
  • अयुतसिद्ध संबंध से जुड़ी वस्तुओं में एक वस्तु आधार होती है और दूसरी आधारित।
  • संयोग अनित्य एवं युतसिद्ध संबंध है, और समवाय नित्य एवं अयुतसिद्ध संबंध है।
  • यहाँँ पर तंतु यह पट ��ा समवायि संबंध है और वह दोनोंं अयुतसिद्ध अर्थात् आधार - आधारित संबंध से जुडे है।

 

अतः स्पष्ट है, तन्तुः पटस्य समवायिकारणम्, अयुतसिद्धत्वात् यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 96

'पदे न वर्णा विद्यन्ते वर्णेष्ववयवा न च।

वाक्यात् पदानामत्यन्तं प्रविवेको न कश्चन।।'

  • अस्याः कारिकायाः सम्बन्धः केन सिद्धान्तेन सह भवितुमर्हति?
  1. AOption (a)

    ध्वनिवादः

  2. BOption (b)

    स्फोटवादः

  3. COption (c)

    व्यञ्जनावादः

  4. DOption (d)

    लक्षणावादः

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Correct answer

Answer: (b)B.

स्फोटवादः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : दिये हुए कारिका का संबंध किस सिद्धांत के साथ है?

श्लोक : 

पदे न वर्णा विद्यन्ते वर्णेष्ववयवा न च।

वाक्यात् पदानामत्यन्तं प्रविवेको न कश्चन।। (वाक्यपदीय, ब्रह्मकांड)

हिंदी भाषांतर : 

  • पद में कोई वर्ण नहीं होता है और वर्णों में कोई अवयव नहीं है। वाक्य से पदोंं का कोई अत्याधिक भेदभाव नहीं है।

स्पष्टीकरण : 

  • इस श्लोक में बताया है, कि पद में वर्ण तथा वाक्य में पदोंं का केवल आभास होता है, वस्तुतः पद अथवा वाक्य अखंड होता है। वह नित्य होता है, यह स्फोट से भिन्न नहींं है।

 

अतः स्पष्ट है, स्फोटवादः यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

भर्तृहरि का स्फोटसिद्धांत :

स्फोट का सिद्धान्त भर्तृहरि ने प्रतिपादित किया है। भर्तृहरि द्वारा विरचित वाक्यपदीय नामक व्याकरण ग्रंथ में तीन कांड हैं।

  • ब्रह्मकाण्ड,
  • वाक्यकाण्ड
  • पदकाण्ड

वाक्यपद संबंधी व्याकरण दर्शन के सिद्धांतों का कारिकाओं में गूढ़ विवेचन है। व्याकरण दर्शन के प्राचीनतम और प्रामाणिक ग्रंथों में इसकी गणना है। शब्दब्रह्म, स्फोटब्रह्म और स्फोटवाद का इसमें प्रतिपादन है। इसे 'हरिकारिका' भी कहते हैं। इसकी दो प्राचीन टीकाएँ प्राप्त होती हैं।

भर्तृहरि के वाक्यपदीय के अनुसार वाक तीन चरणों में निर्मित होती है-

  • बोलने वाले द्वारा सोचना (पश्यन्ती)
  • बोलने की क्रिया (मध्यमा)
  • दूसरे द्वारा उसे समझना (वैखारी)

तीन काण्डों - ब्रह्मकाण्ड, वाक्यकाण्ड और पदकाण्ड में विभक्त वाक्यपदीय भाषाविज्ञान का एक उत्कृष्ट ग्रन्थ है। अत्यन्त संक्षेप में इस ग्रंथ की विशेषताओ पर निम्नांकित रूपों में प्रकाश डाला जा सकता है :

  • भाषा की इकाई वाक्य ही होता है, चाहे उसका अस्तित्व एक वर्ण के रूप में क्यों न हो।
  • वाक्शक्ति विश्व-व्यवहार का सर्वप्रमुख आधार है।
  • वाक्-प्रयोग एक मनोवैज्ञानिक क्रिया होता है, जिसमें वक्ता और श्रोता दोनों का होना आवश्यक है। ज्ञातव्य है कि गार्डीनर, जेस्पर्सन एवं चॉम्सकी प्रभृति अधिक चर्चित आधुनिक भाषाविज्ञानी भी इसका पूर्ण समर्थन करते हैं।
  • हर वर्ण में उस के अतिरिक्त भी किंचित वर्णांश सम्मिलित रहता है। अमरीकी भाषाविज्ञान ने भी प्रयोग द्वारा इसे सिद्ध करने का सफल प्रयास किया है। भौतिक विज्ञान भी यही बतलाता है।
  • ध्वनि उत्पादन, उच्चारण, ध्वनि-ग्रहण, स्फोट आदि का विस्तृत विवेचन भर्तृहरि ने किया है।

Question 97

यथा हिरण्यं शुचिधातुमध्ये मेरुर्गिरीणां सरसां समुद्रः।

तारा सचन्द्रस्तपतां च सूर्यः पुत्रस्तथा ते द्विपदेषु वर्यः।।

---- श्लोकेऽस्मिन् कस्य पुत्रस्य वर्णनमस्ति-

  1. AOption (a)

    दशरथस्य

  2. BOption (b)

    दुष्यन्तस्य

  3. COption (c)

    दुर्योधनस्य 

  4. DOption (d)

    शुद्धोदनस्य

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Correct answer

Answer: (d)D.

शुद्धोदनस्य

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : दिये हुए श्लोक में किस के पुत्र का वर्णन है?

संपूर्ण पंक्ति :

'यथा हिरण्यं शुचिधातुमध्ये मेरुर्गिरीणां सरसां समुद्रः।

तारास्तु चन्द्रस्तपतां च सूर्यः पुत्रस्तथा ते द्विपदेषु श्रेष्ठः।।'

  • अर्थ - जिस प्रकार धातुओंं में सोना, पर्वतोंं में मेरु, जलाशयोंं में समुद्र, ताराओंं में चंद्र और अग्नियोंं में सूर्य श्रेष्ठ हैंं, उस प्रकार तुम्हारा पुत्र मानवोंं में श्रेष्ठ है।

स्पष्टीकरण : 

  • प्रस्तुत पंक्ति बुद्धचरित में आती है।
  • यह वचन भगवान गौतम बुद्ध के संदर्भ में उनके पिता शुद्धोदन से कहा गया है।

 

अतः स्पष्ट है, 'शुद्धोदनस्य' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

बुद्धचरित : 

बुद्धचरित यह अश्वघोष की रचना है। इस काव्य का रचनाकाल दूसरी शताब्दी माना जाता है। 

  • बुद्धचरित २८ सर्गों में था जिसमें १४ सर्गों तक बुद्ध के जन्म से बुद्धत्व-प्राप्ति तक का वर्णन है। किन्तु बुद्धचरितम् मूल रूप में अपूर्ण ही उपलब्ध है। 28 सर्गों में विरचित इस महाकाव्य के दूसरे सर्ग से लेकर तेरहवें सर्ग तक पूर्ण रूप से तथा पहला एवं चौदहवाँ सर्ग के कुछ अंश ही मिलते हैं।
  • प्रथम सर्ग के प्रारम्भ के सात श्लोक और चतुर्दश सर्ग के बत्तीस से एक सौ बारह तक (81 श्लोक) मूल में नहीं मिलते हैं।
  • संक्षेप में इस महाकाव्य में बुद्ध के जन्म से लेकर महानिर्वाण तथा बुद्ध के सिद्धांतोंं का वर्णन आता है।

Question 98

न तेन सज्यं  क्वचिदुद्यतं धनुः कृतं न वा तेन विजिह्यमानम्।

गुणानुरागेण शिरोभिरुह्यते नराधिपैर्माल्यमिवास्य शासनम्।।

-अस्मिन् श्लोके प्रशंसा वर्तते-

  1. AOption (a)

    युधिष्ठिरस्य

  2. BOption (b)

    वनेचरस्य 

  3. COption (c)

    दुर्योधनस्य 

  4. DOption (d)

    अर्जुनस्य

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Correct answer

Answer: (c)C.

दुर्योधनस्य 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : दिये हुए श्लोक में किस की प्रशंसा है?

श्लोक : 

न तेन सज्यं  क्वचिदुद्यतं धनुः कृतं न वा तेन विजिह्यमानम्।

गुणानुरागेण शिरोभिरुह्यते नराधिपैर्माल्यमिवास्य शासनम्।। (किरातार्जुनीयम् १.२१)

हिंदी भाषांतर : 

  • उस (दुर्योधन) के द्वारा प्रत्यंचा से युक्त धनुष किसी पर भी उठाया नहीं गया अथवा न अपने मुख को क्रोध के कारण कुटिल किया गया। कर देने वाले अधीन राजाओंं के द्वारा इस (दुर्योधन) का आदेश उस के गुणोंं प्र अनुरक्त होने से पुष्पमाला के तरह नत मस्तक होकर धारण किया जाता है।

स्पष्टीकरण : 

  • प्रस्तुत श्लोक में युधिष्ठिर के द्वारा हस्तिनापुर में भेजा हुआ वनेचर उसे दुर्योधन का वृतान्त बताते हुये उसके शासन पद्धती का वर्णन करता है, और उसकी व्यवस्था कि प्रशंसा करता है।

अतः स्पष्ट है, दुर्योधनस्य यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 99

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।

दैवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्।।

उपर्युक्तश्लोकेन सम्बन्धोऽस्ति-

  1. AOption (a)

    वाल्मीकिरामायणस्य

  2. BOption (b)

    महाभारतस्य 

  3. COption (c)

    जयपुराणस्य

  4. DOption (d)

    भारतविजयस्य

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Correct answer

Answer: (b)B.

महाभारतस्य 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : दिये गये श्लोक से क्या संबंधित  है?

श्लोक : 

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।

दैवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्।।

हिंदी भाषांतर : 

  • अंतर्यामी नारायणरूप भगवान श्रीकृष्ण, उनके सखा नर रत्न अर्जुन, उनकी लीला प्रकट करने वाली देवी सरस्वती और उनके वक्ता भगवान व्यास को नमस्कार करके आसुरी संपत्तियों का नाश करके अंत:करण पर विजय प्राप्त कराने वाले जय ग्रंथ का (महाभारत) का पाठ करना चाहिए।

स्पष्टीकरण : 

महाभारत ग्रंथ के तीन संस्करण प्रसिद्ध है - 

  • जय ग्रंथ : 
  • यह महाभारत का मूल नाम है। इस कि श्लोकसंख्या ८,८०० थी और यह ग्रंथ व्यास महर्षि ने अपने वैशंपायन नामक शिष्य को पढाया। महाभारत के प्रत्येक पर्व के नमन श्लोक में 'जय' यह शब्द आता है तथा अंतिम पर्व में "जय नामेतिहासोऽयम्" इस प्रकार का अंतिम विधान आता है।
  • भारत ग्रंथ : 
  • यह ग्रंथ जनमेजय के सर्पसत्र में वैशंपायन ऋषि ने जो पाठ किया, उससे निर्मित है। इस कि श्लोकसंख्या २४,००० है।
  • महाभारत :
  • यह द्वादशवार्षिक सत्र में सौती ऋषिने शौनक ऋषि को बताया हुआ है। इस कि श्लोकसंख्या एक लाख है। इसे शतसाहस्री संहिता कहा जाता है।

 

अतः स्पष्ट है, महाभारतस्य यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 100

याज्ञवल्क्यस्मृतेरनुसारं 'लिखितं भुक्तिः साक्षिणश्चेति' किम्?

  1. AOption (a)

    प्रमाणम् 

  2. BOption (b)

    प्रकरणम् 

  3. COption (c)

    अनुमानम्

  4. DOption (d)

    साधनम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

प्रमाणम् 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : याज्ञवल्क्यस्मृति के अनुसार 'लिखितं भुक्तिः साक्षिणश्चेति' यह क्या है?

याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार प्रमाण :

याज्ञवल्क्य स्मृति में १००३ श्लोक हैं। इसपर विरचित मिताक्षरा टीका हिंदू धर्मशास्त्र के विषय में भारतीय न्यायालयों में प्रमाण मानी जाती रही है। याज्ञवल्क्य स्मृति और कौटिलीय अर्थशास्त्र में विशेष साम्य पाया जाता है। इसी स्मृति में सर्वप्रथम स्त्रियोंं के संपत्ती के अधिकार का विधान किया गया है।

  • महर्षि याज्ञवल्क्य ने लिखित, भुक्ति, साक्षी और दिव्य इन चार प्रमाणों का वर्णन किया है।

श्लोक-

प्रमाणं लिखितं भुक्तिः साक्षिणश्चेति कीर्तितम्।

एषामन्यतमाभावे दिव्यान्यतममुच्यते।।

श्लोक का अर्थ- विवाद में लिखित, भुक्ति और साक्षी तीन प्रमाण है, किन्तु इनमें से किसी के भी न होने पर चतुर्थ दिव्य प्रमाण को स्वीकार किया है। शास्त्रकार यह भी लिखते हैं यदि इन चारों प्रमाणों से भी अभियोग का निर्णय न हो सके तो राजा को विद्वान् ब्राह्मणों की सहायता और अपनी युक्ति का प्रयोग करना चाहिए। मिताक्षरा व्याख्याकार ने इन चार प्रमाणों को मानुषी और दैविक 14 दो भागों में विभक्त किया है। प्रमाणों में प्रथम तीन लिखित, उपभोग और साक्षी मानुषी और दिव्य को दैविक प्रमाणों की श्रेणी में रखा है।

अतः स्पष्ट है, प्रमाणम् यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

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