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UGC NET Paper 2: Sanskrit 21st June Shift 1 2019 (Previous Year Paper)

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Question 1

निम्नलिखितेषु कतमं ब्राह्मणं सामवेदीयं नास्ति?

  1. AOption (a)

    ताण्ड्यब्राह्मणम्

  2. BOption (b)

    शतपथब्राह्मणम्

  3. COption (c)

    षड्विंशब्राह्मणम्

  4. DOption (d)

    छान्दोग्यब्राह्मणम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

शतपथब्राह्मणम्

Why this answer is correct

प्रश्न का भाषान्तर: इनमे से कौन सा ब्राह्मण सामवेद का नही है?

स्पष्टीकरण: शतपथ ब्राम्हण सामवेद का नही है।

सामवेद के ब्राह्मण निम्न हे:

  • ताण्ड्य
  • षड्विंश
  • सामविधान
  • आर्षेय
  • दैवत
  • उपनिषद
  • संहितोपनिषद
  • छान्दोग्य।

Additional Information

ब्राह्मण ग्रंथ:

ब्राह्मण ग्रंथ यज्ञों तथा कर्मकांडों के विधान और इनकी क्रियाओं को समझने के लिए आवश्यक होते हैं। इनकी भाषा वैदिक संस्कृत है।

ब्रहा शब्द का शाब्दिक अर्थ है यज्ञ अर्थात यज्ञ के विषयों का अच्छी तरह से प्रतिपादन करने वाले ग्रंथ । ये ग्रंथ गद्य में लिखे गये हैं।

         इनमें यज्ञों के आनुष्ठानिक महत्व का उल्लेख है। सभी ब्राह्मणों में मोक्ष प्राप्ति के लिये यज्ञ पर बल दिया गया है। यह कर्मकांडीय ग्रंथ हैं।

         मन्त्र-भाग से अतिरिक्त शेष वेद-भाग ब्राह्मण है। जैसा कि जैमिनि का कथन है-'शेषे ब्राह्मणशब्द'। माधवाचार्य तथा सायणाचार्य ने भी इसी लक्षण से सहमति व्यक्त की है।  

कोश ग्रन्थों के अनुसार वेद-भाग का ज्ञापक 'ब्राह्मण' शब्द नपुंसक लिङ्ग में व्यवहार्य है।

      वेद-मन्त्रों की सुगम व्याख्या करने, यज्ञीय विधि-विधान के सूक्ष्मातिसूक्ष्म पक्षों को निरूपित करने तथा समकालीन वैचारिक आन्दोलन को दिशा देने की भावना मुख्य रूप से ब्राह्मण ग्रन्थों के साक्षात्कार की पृष्ठभूमि में निहित रही है।

Question 2

निम्नलिखितेषु केन ज्योतिश्शास्त्रमाधृत्य ऋग्वेदस्य कालो निर्धारितः?

  1. AOption (a)

    वेबरमहोदयेन

  2. BOption (b)

    मैक्डानलमहोदयेन

  3. COption (c)

    बालगंगाधरतिलकमहोदयेन

  4. DOption (d)

    विल्सनमहोदयेन

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Correct answer

Answer: (c)C.

बालगंगाधरतिलकमहोदयेन

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प्रश्न का भाषान्तर: किसने ऋग्वेद का काल ज्योतिष शास्त्र के अनुसार निर्धारित किया है।

 

स्पष्टीकरण:

  

लोकमान्य बालगंगाधर तिलक

 

लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने में उपलब्ध ज्योतिष विषयक साक्ष्यों के आधार पर वेदों का काल 4000 से 6000 विक्रमपूर्व स्वीकार किया है।

तिलक जी ने वैदिक काल को चार विभागों में रखा है,

  1. अदितिकाल 6000 ई. पू. से 4000 विक्रम पूर्व तक
  2. मृगशिर काल 4000 ई. पू. से 2500 विक्रमपूर्व तक (ऋग्वेदस् हिता का मन्त्रकाल)
  3. कृतिका काल 2500 से 1400 ई.पू. विक्रमपूर्व तक (तैत्तिरीय संहिता, ब्राह्मणकाल)
  4. अन्तिम काल 1400 से 500 विक्रमपूर्व शक (सूत्रग्रन्थों का रचनाकाल)

 

ऋग्वैदिक मन्त्रों के रचनाकाल की 4500 ई॰ पू॰ तक की अवधि याकोबी ने भी निर्धारित की थी। किन्तु वह उससे पीछे नहीं जा सका। तिलक ने वैदिक साहित्य में कई ऐसे उद्धरण खोज निकाले जिसमें वसन्त-सम्पात, उत्तरायण तथा वर्ष के आरम्भ का पुनर्वसु नक्षत्र में होने का संकेत मिलता है। तिलक ने देखा कि तैतरीय संहिता तथा तांडय ब्राह्मण में जहां फाल्गुनी पूर्णमास से वर्ष के प्रारम्भ होने का उल्लेख किया गया है वहां चित्रा पूर्णमास से भी वर्ष के प्रारम्भ होने की बात कही गई है।

"चित्रापूर्णमासे दीक्षेरन् मुखं वा एतत्संवत्सरस्य यच्चित्रा पूर्णमासो मुखत एवं संवत्सरमारम्य दीक्षन्ते।" तैतरीय संहिता 7.4.8

Question 3

'काण्वशतपथब्राह्मणम्' केन वेदेन सम्बद्धम् अस्ति?

  1. AOption (a)

    ऋग्वेदेन

  2. BOption (b)

    अथर्ववेदेन

  3. COption (c)

    यजुर्वेदेन

  4. DOption (d)

    सामवेदेन

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Correct answer

Answer: (c)C.

यजुर्वेदेन

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प्रश्न का भाषांतर- काण्व शतपथ ब्राम्हण कोनसे वेद से संबंधित है?

 

स्पष्टीकरण- काण्व शतपथ ब्राम्हण यजुर्वेद से संबंधित है।

शतपथ ब्राह्मण, शुक्लयजुर्वेद की दोनों शाखाओं (माध्यान्दिन तथा काण्व) में उपलब्ध है। दोनों ही शाखाओं ही प्रतिपाद्य विषय-वस्तु समान है, केवल क्रम में कुछ भिन्नता है।

 

  • शतपथ ब्राह्मण के आदि उपदेष्टा महर्षि याज्ञवल्क्य थे। इसमें सौ अध्याय तथा १४ काण्ड हैं। सौ अध्याय होने से ही सम्भवतः इसका शपतथ नाम पड़ा है। इसमें दर्शपौर्ण मास आदि सभी श्रौत यज्ञों के विधि विधानों की विस्तृत व्याख्या की गई है तथा यजुर्वेद को इस ब्राह्मण के ज्ञान के बिना समझना असम्भव ही है।
  • काण्व-शतपथ में १७ काण्ड, १०४ अध्याय, ४३५ ब्राह्मण तथा ६८०६ कण्डिकाएं हैं।

एकपात्-काण्डम् -- इस काण्ड में आधान-पुनराधान, अग्निहोत्र, आग्रयण, पिण्डपितृयज्ञ, दाक्षायण यज्ञ, उपस्थान तथा चातुर्मास्य संज्ञक यागों का विवेचन है।

हविर्यज्ञ काण्डम् -- इस काण्ड में पूर्णमास तथा दर्शयागों का प्रतिपादन है।

उद्धारि काण्डम् -- इस काण्ड में अग्निहोत्रीय अर्थवाद तथा दर्शपूर्णमासीय अर्थवाद विवेचित हैं।

अध्वरम् -- इस काण्ड में सोमयागजन्य दीक्षा का वर्णन है।

ग्रहनाम -- इस काण्ड में सोमयाग, सवनत्रयाग कर्म, षोडशी प्रभृति सोमसंस्था, द्वादशाहयाग, त्रिरात्रहीन दक्षिणा, चतुस्त्रिंशद्धोम और सत्रधर्म का निरूपण है।

वाजपेय काण्डम् -- इस काण्ड में वाजपेययाग का विवेचन है।

राजसूय काण्डम् -- इस काण्ड में राजसूय का विवेचन है।

उखासम्भरणम् -- इस में उखा-सम्भरण का विवेचन है।

हस्तिघट काण्डम् -- इस काण्ड से लेकर १२वें काण्ड तक विभिन्न चयन-याग निरुपित हैं।

चिति काण्डम् --

साग्निचिति --

अग्निरहस्यम् --

अष्टाध्यायी -- इस काण्ड में आधान काल, पथिकृत इष्टि, प्रयाजानुयामन्त्रण, शंयुवाक्, पत्नीसंयाज, ब्रह्मचर्य, दर्शपूर्णमास की शेष विधियों तथा पशुबन्ध का निरूपण है।

मध्यमम् -- इस काण्ड में दीक्षा-क्रम, पृष्ठयाभिप्लवादि, सौत्रामणीयाग, अग्निहोत्र-प्रायश्चित्त, मृतकाग्निहोत्र आदि का वर्णन हुआ है।

अश्वमेध काण्डम् -- इस काण्ड में अश्वमेध

प्रवर्ग्य काण्डम् -- इसमें सांगोपाङ्ग प्रवर्ग्यकर्म

बृहदारण्यकम् -- इसमें ब्रह्मविद्या का विवेचन किया गया है।

Question 4

दुर्गेण कस्मिन् ग्रन्थे टीका लिखिता?

  1. AOption (a)

    बृहद्देवतायाम्

  2. BOption (b)

    बौधायनगृह्यसूत्रे

  3. COption (c)

    कात्यायनशुल्बसूत्रे

  4. DOption (d)

    निरुक्ते

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Correct answer

Answer: (d)D.

निरुक्ते

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प्रश्नार्थ - दुर्ग ने किस ग्रन्थ पर टीका लिखी गयी है?

स्पष्टीकरण - दुर्गाचार्य इनकी यास्काचार्य के निरुक्त पर रचित टीका सबसे प्रसिद्ध है। उनके पूर्व कुछ टीकाओं का उन्होंने उल्लेख किया है किन्तु उपलब्ध टीकाओं में दुर्गाचार्य की टीका सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण मानी गयी है।

  • कुछ ग्रंथो के अनुसार दुर्गाचार्य जम्बुमार्गस्थित आश्रम में रहते थे। किन्तु इसका स्थान पता नहीं चलता। डा. लक्ष्मण-स्वरूप के अनुसार यह स्थान कश्मीर में होगा तथा प.भगवद्दत्त इनको गुजरात प्रदेश के मानते है।
  • दुर्गाचार्य के उपलब्ध टीका संस्करण १४ वी शताब्दी का माना जाता है। किन्तु राजवाड़े के अनुसार उनका काल १० वी से ११ वी शताब्दी होना चाहिए।

अतः 'दुर्ग' ने यास्काचार्य के निरुक्त ग्रन्थ पर टीका लिखी गयी है यह स्पष्ट होता है।

Question 5

कौषीतकिब्राह्मणं केन वेदेन सम्बद्धमस्ति?

  1. AOption (a)

    शुक्लयजुर्वेदेन

  2. BOption (b)

    कृष्णयजुर्वेदेन

  3. COption (c)

    ऋग्वेदेन

  4. DOption (d)

    सामवेदेन

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Correct answer

Answer: (c)C.

ऋग्वेदेन

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प्रश्न का भाषांतर: कौषीतकी ब्राह्मण कोनसे वेद से संबंधित है?

 

स्पष्टीकरण: कौषीतकी ब्राह्मण ऋग्वेद से संबंधित है।

 

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद कौषीतकि उपनिषद का पूरा नाम है। यह एक ऋग्वेदीय उपनिषद है। कौषीतकि उपनिषद ॠग्वेद के कौषीतकि ब्राह्मण का अंश है। इसमें कुल चार अध्याय हैं। इस उपनिषद में जीवात्मा और ब्रह्मलोक, प्राणोपासना, अग्निहोत्र, विविध उपासनाएं, प्राणतत्व की महिमा तथा सूर्य, चन्द्र, विद्युत मेघ, आकाश, वायु, अग्नि, जल, दर्पण और प्रतिध्वनि में विद्यमान चैतन्य तत्व की उपासना पर प्रकाश डाला गया है। अन्त में 'आत्मतत्त्व' के स्वरूप और उसकी उपासना से प्राप्त फल पर विचार किया गया है। 

 

अन्य उपनिषदों की तरह कौशिकी उपनिषद का कालक्रम स्पष्ट नहीं है। यह ग्रंथों में पुरातनता, शैली और दोहराव के विश्लेषण पर आधारित है, जो विचारों के संभावित विकास के बारे में धारणाओं से प्रेरित है, और अनुमानों पर आधारित है कि किस दर्शन ने अन्य भारतीय दर्शन को प्रभावित किया होगा।

Question 6

ऋग्वेदसंहितायाः पदपाठकारो निम्नलिखितेषु कोऽस्ति?

  1. AOption (a)

    गार्ग्यः

  2. BOption (b)

    शाकल्यः

  3. COption (c)

    शौनकः

  4. DOption (d)

    यास्कः

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Correct answer

Answer: (b)B.

शाकल्यः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- निम्नलिखित में से कौन ऋग्वेद संहिता के पदपाठकार है?

स्पष्टीकरण- निम्नलिखित में से शाकल्य ऋग्वेद संहिता के पदपाठकार है।

  • वेदों के पाठ प्रथमतया दो प्रकार के हैं- प्रकृति पाठ तथा विकृति पाठ।
  • प्रकृति पाठ के पुनः तीन भेद हैं- संहिता पाठ, पद पाठ तथा क्रम पाठ।
  • वेदों के मन्त्र भाग को संहिता कहते हैं। इन मन्त्रों के स्वाभाविक पाठ या मूल पाठ को संहिता पाठ कहते है।
  • संहिताओं के अनन्तर मन्त्रार्थ समझने की प्रवृत्ति जागरूक हुई। इस क्रम में मंत्रो के अवान्तरभूत पदों को पृथक कर संहिताओं के पदपाठ निर्मित किए गए।
  • क्रम से दो पदों का पाठ क्रम पाठ कहलता है।
  • विकृति पाठ पुनः आठ प्रकार के हैं- जटा, माला, शिखा, रेखा, ध्वज, दण्ड, रथ तथा घन।
  • ऋग्वेद के अन्य पदपाठकार रावण हैं। ​
  • शुक्ल यजुर्वेद का पदपाठकार अज्ञात माना जाता है।
  • कृष्ण यजुर्वेद के पदपाठकार आत्रेय हैं।
  • सामवेद के पदपाठकार गार्ग्य हैं।
  • अथर्वेद का पदपाठ ऋग्वेद के अनुरूप चलता है। इसके रचनाकार भी अज्ञात है।

 

अतिरिक्त जानकारी

  • ऋग्वेद वैदिक साहित्य का प्रथम ग्रन्थ है।
  • ऋक् या ऋच् का अर्थ है- स्तुतिपरक मंत्र, ‘ऋच्यते स्तूयते अनया इति ऋक्’। अर्थात् जिन मंत्रों के द्वारा देवों की स्तुति की जाती है, उन्हें ऋक् या ऋच् कहते हैं। ऋचाओं से युक्त वेद को ऋग्वेद कहते है।
  • ऋग्वेद के ऋत्विज का नाम होता है।
  • महाभाष्यकार पतंजलि के अनुसार ऋग्वेद की 21 शाखाओं का उल्लेख किया गया है। किन्तु शौनक के अनुसार ऋग्वेद की पाँच मुख्य शाखाएँ हैं- शाकल, बाष्कल, आश्वलायन, शांखायन, माण्डूकायन।
  • ऋग्वेद के प्रथम भाष्यकार स्कन्दस्वामी हैं।
  • ऋग्वेद में 10 मंडल, 1028 सूक्त तथा 10580 मन्त्र हैं।

Question 7

यजुर्वेदस्य निम्नलिखितभाष्यकारेषु कोऽर्वाचीनतमः?

  1. AOption (a)

    स्वामिदयानन्दः

  2. BOption (b)

    रावणः

  3. COption (c)

    उव्वटः

  4. DOption (d)

    महीधरः

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Correct answer

Answer: (a)A.

स्वामिदयानन्दः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- यजुर्वेद के निम्नलिखित भाष्यकारों में सबसे अर्वाचीन कौन है?

स्पष्टीकरण- यजुर्वेद के निम्नलिखित भाष्यकारों में सबसे अर्वाचीन स्वामी दयानन्द है।

वेदों के मन्त्रार्थ ज्ञान के लिए वेद भाष्य की परम्परा शुरू हुई। चारों वेदों की विभिन्न शाखाओं पर भाष्य लिखे गये है। यजुर्वेद के निम्नलिखित भाष्यकार हैं- 

स्वामीदयानन्द-

  • स्वामी दयानन्द सरस्वती (1824-1883 ई॰) आधुनिक भारत के चिन्तक तथा आर्य समाज के संस्थापक थे।
  • ये वैज्ञानिक भाष्यकारों की कोटि में आते हैं।
  • स्वामी दयानन्द ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन संहिता का तथा ऋग्वेद के 7 मण्डलों (80 सूक्त तक) का संस्कृत और हिन्दी में भाष्य किया है।
  • इन्होंने निरुक्त तथा व्याकरण के आधार पर वेद मंत्रो की व्याख्या की।

Additional Informationउव्वट- 

  • उव्वट (1000 ई०) याज्ञिक कोटि के भाष्यकार थे।
  • इन्होंने मुख्यतः यजुर्वेद की माध्यनन्दिन संहिता पर भाष्य किया है जो निर्णयसागर प्रेस, बम्बई से प्रकाशित है।
  • आचार्य उव्वट कृत यजुर्वेद के भाष्य द्वारा विदित होता है कि इनके पिता का नाम वज्रट था।
  • साथ ही वहीं इनका जन्मस्थान आनन्दपुर कहा गया है।
  • इनकी अन्य रचनाएँ है- ऋक प्रातिशाख्य की टीका, ईशोपनिषद पर भाष्य तथा ऋक सर्वानुक्रमणी।

महीधर- 

  • महीधर 16 वीं सदी के भाष्यकार थे।
  • इन्होनें मुख्यतः यजुर्वेद की माध्यन्दिन संहिता पर भाष्य किया है।
  • इनके भाष्य का नाम ‘वेददीप’ था।
  • महीधर काशी नगर के निवासी थे।

Question 8

माध्यन्दिनशाखायाः अपरनाम किं प्रचलितमस्ति?

  1. AOption (a)

    कैथुमशाखा

  2. BOption (b)

    बौधायनीशाखा

  3. COption (c)

    वाजसनेयिशाखा                                                              

  4. DOption (d)

    मैत्रायणीशाखा

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Correct answer

Answer: (c)C.

वाजसनेयिशाखा                                                              

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- माध्यन्दिन शाखा का अपर नाम क्या प्रचलित है?

स्पष्टीकरण- माध्यन्दिन शाखा का अपर नाम वाजसनेयि शाखा प्रचलित है। 

वाजसनेयि शाखा- 

  • माध्यन्दिन शाखा शुक्ल यजुर्वेद की शाखा है। कण्व इस वेद की एक अन्य शाखा है। इसका प्रचार प्रायः दक्षिण भारत में है। माध्यन्दिन शाखा का प्रचार प्राचीन काल में केवल उत्तर प्रदेश में था। किन्तु, यह आज समस्त उत्तर भारत में प्रचलित है। इसमें 40 अध्याय हैं।
  • आरम्भ के दोनों अध्यायों में दर्श तथा पौर्णमास यज्ञों से सम्बंध मन्त्रों का वर्णन है। तीसरे अध्याय में अग्निहोत्र तथा चातुर्मास्य के लिए उपयोगी मंत्रो का वर्णन है। चतुर्थ से लेकर अष्टम अध्याय तक सोमयागों का वर्णन है।
  • इसके अनन्तर आठ अध्यायों तक होमग्नि के लिए वेदीनिर्माण का वर्णन है। 16वें अध्याय में शतरुद्रीय होम का प्रसंग है, जिसमें रुद्र की कल्पना का बड़ा ही सांगोपांग विवेचन मिलता है। 18 वें अध्याय में ‘वासोर्धारा’ सम्बन्धी मन्त्र निर्दिष्ट है।
  • इसके अनन्तर तीन अध्यायों में सौत्रामणि यज्ञ का विधान है। अध्याय 22 से अध्याय 25 तक अश्वमेध के विशिष्ट मंत्रो का निर्देश है। अध्याय 26 से अध्याय 29 तक खिल मन्त्रों संकलन है, जिससे पूर्व-निर्दिष्ट अनुष्ठानों के विषय में नवीन मन्त्र दिए गए हैं।
  • 30वें अध्याय में ‘पुरुष मेध’ का वर्णन है। 31वें अध्याय में प्रसिद्ध पुरुष सूक्त है।अध्याय 32 के आरम्भ में हिरण्यगर्भ सूक्त के भी कतिपय मन्त्र उदधृत हैं।अध्याय 33 में ‘सर्वमेध’ के मन्त्र उल्लिखित है।
  • 34वें अध्याय में शिव संकल्प सूक्त के मन्त्र है। 35वें अध्याय में पितृमेध सम्बन्धी मंत्रो का संकलन है। अध्याय 36 से अध्याय 38 तक प्रवर्ग्ययाग का विशद वर्णन है।

Question 9

निम्नलिखितेषु ऋग्वेदस्य प्राचीनतमो भाष्यकारः कोऽस्ति?

  1. AOption (a)

    वेङ्कटमाधवः

  2. BOption (b)

    सायणः

  3. COption (c)

    उव्वटः

  4. DOption (d)

    स्कन्दस्वामी

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Correct answer

Answer: (d)D.

स्कन्दस्वामी

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- ऋग्वेद के निम्नलिखित भाष्यकारों में सबसे प्राचीन कौन है?

स्पष्टीकरण- ऋग्वेद के निम्नलिखित भाष्यकारों में सबसे प्राचीन स्कन्दस्वामी है।

स्कन्दस्वामी- 

  • स्कन्दस्वामी का भाष्य यज्ञपरक है।
  • इनका काल 645 ई॰ है। ये हर्ष तथा बाणभट्ट के समकालीन थे।
  • इनका भाष्य अत्यन्त विशद है। इसमें प्रत्येक सूक्त के आरम्भ में उस सूक्त के ऋषि तथा देवता का उल्लेख किया गया है।
  • स्कन्दस्वामी का भाष्य ऋग्वेद के केवल आधे भाग तक ही प्राप्त हुआ है। शेष भाग की पूर्ति नारायण तथा उद्गीथ ने की थी।
  • स्कन्दस्वामी ने यास्क के निरुक्त के ऊपर भी टीका लिखी है।​​

Additional Information

  • ऋग्वेद वैदिक साहित्य का प्रथम ग्रन्थ है।
  • ऋक् या ऋच् का अर्थ है- स्तुतिपर��� मंत्र, ‘ऋच्यते स्तूयते अनया इति ऋक्’। अर्थात् जिन मंत्रों के द्वारा देवों की स्तुति की जाती है, उन्हें ऋक् या ऋच् कहते हैं। ऋचाओं से युक्त वेद को ऋग्वेद कहते है।
  • ऋग्वेद के ऋत्विज का नाम होता है।
  • महाभाष्यकार पतंजलि के अनुसार ऋग्वेद की 21 शाखाओं का उल्लेख किया गया है। किन्तु शौनक के अनुसार ऋग्वेद की पाँच मुख्य शाखाएँ हैं- शाकल, बाष्कल, आश्वलायन, शांखायन, माण्डूकायन।
  • ऋग्वेद के प्रथम भाष्यकार स्कन्दस्वामी हैं। ऋग्वेद में 10 मंडल, 1028 सूक्त तथा 10580 मन्त्र हैं।

Question 10

'कौटिल्यमते कृषिपाशुपाल्ये वाणिज्या' इति विषयाः सन्ति

  1. AOption (a)

    त्रय्याः

  2. BOption (b)

    दण्डनीतेः

  3. COption (c)

    वार्तायाः

  4. DOption (d)

    आन्वीक्षक्याः

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Correct answer

Answer: (c)C.

वार्तायाः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : कौटिल्य के मत से कृषि, पशुपालन और वाणिज्य यह किस विद्या के विषय हैंं?

कौटिलीय अर्थशास्त्र का परिचय :

कौटिलीय अर्थशास्त्र प्राचीन भारतीय राजनीति का प्रसिद्ध ग्रंथ है, जिसके रचनाकार विख्यात अर्थशास्त्रज्ञ आचार्य चाणक्य हैंं। इस ग्रंथ का स्वरूप इस प्रकार है - 

  • कौटिलीय अर्थशास्त्र की शैली उपदेशात्मक और सलाहात्मक है।
  • इसमें न केवल धर्म, अर्थ और काम का प्रणयन और पालन के बारे में कहा है, पर अधर्म, अनर्थ तथा अवांछनीय के शमन का भी विधान किया है।
  • आचार्य चाणक्य ने चंद्रगुप्त के प्रशासकीय उपयोग के लिए इस ग्रंथ की रचना की थी।
  • कौटिलीय अर्थशास्त्र में १५ अधिकरण, १५० अध्याय, १८० उपविभाग तथा ६००० श्लोक हैंं।
  • प्राचीन अर्थशास्त्रज्ञोंं का भी नामनिर्देश इस ग्रंथ में आता है।
  • कौटिलीय अर्थशास्त्र में दंड, नीति, त्रयी और वार्ता इन चार विद्याओंं का विवेचन आता है। उनमें से वार्ता के बारे में कौटिल्य कहता है - 
  • ​कृषिपाशुपाल्ये वाणिज्या च वार्ता । धान्यपशुहिरण्यकुप्यविष्टिप्रदानादौपकारिकी।
  • अर्थ - कृषि, पशुपालन और वाणिज्य यह वार्ता विद्या के विषय हैंं। यह वार्ता विद्या धान्य, पशु, सोना-ताम्र आदि खनिज और नोकर-चाकर देने वाली परम उपकारिणी विद्या है।

​​

अतः स्पष्ट है, *"*वार्तायाः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 11

मनुमते अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्यं चाऽस्ति?

  1. AOption (a)

    अविद्या

  2. BOption (b)

    अतिभोजनम्

  3. COption (c)

    उच्छिष्टभोजनम्

  4. DOption (d)

    अवशिष्टभोजनम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

अतिभोजनम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : मनु के मत से अनारोग्य, अनायुष्य और अस्वर्ग्य यह क्या है?

मनुस्मृति :

मनुस्मृति भारतीय आचार-संहिता का विश्वकोश है, मनुस्मृति में बारह अध्याय तथा दो हजार पाँच सौ श्लोक हैं, जिनमें सृष्टि की उत्पत्ति, संस्कार, नित्य और नैमित्तिक कर्म, आश्रमधर्म, वर्णधर्म, राजधर्म व प्रायश्चित आदि विषयों का उल्लेख है। मनु के मत के अनुसार अतिभोजन के परिणाम यह है - 

अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्यं चातिभोजनम् ।

अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्तत् परिवर्जयेत्।।

  • अर्थ - अधिक भोजन करने से आरोग्य और आयुष्य का नाश होता है, स्वर्ग का लाभ नहीं होता है, (यज्ञ, तप इत्यादि में बाधा का कारण होने से) वह पुण्य का भी विरोधी है, अतः अतिभोजन का सर्वथा त्याग करेंं।

 

अतः स्पष्ट है, की *"*अतिभोजनम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 12

मनुस्मृत्यनुसारं कति पाकयज्ञाः

  1. AOption (a)

    चत्वारः 

  2. BOption (b)

    पञ्च

  3. COption (c)

    षट्

  4. DOption (d)

    दश

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Correct answer

Answer: (a)A.

चत्वारः 

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : मनुस्मृति के अनुसार कितने पाकयज्ञ हैंं?

स्पष्टीकरण - 

मनुस्मृति में गृहस्थधर्म का विवेचन करतेंं हुए पाकयज्ञोंं का विधान आता है। 

ये पाकयज्ञाश्चत्वारो विधियज्ञसमन्विता:। 

सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ (मनुस्मृति, २.८६)

  • अर्थ - जो चार पाकयज्ञ विधि यज्ञ के बराबर हैं, वे सभी यज्ञजप के 16 वें भाग के बराबर भी नहीं हैं। वह पाकयज्ञ इस प्रकार हैंं - 
  • पितृकर्म
  • हवन
  • बलि
  • वैश्वदेव

 

अतः स्पष्ट है, की "चत्वारः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 13

'विभागं चेत्पिता कुर्यादिच्छया विभजेत्सुतान्।' इति कस्य ग्रन्थस्य वचनमस्ति

  1. AOption (a)

    मनुस्मृत्याः

  2. BOption (b)

    याज्ञवल्क्यस्मृत्याः

  3. COption (c)

    पाराशरस्मृत्याः

  4. DOption (d)

    नारदस्मृत्याः

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Correct answer

Answer: (b)B.

याज्ञवल्क्यस्मृत्याः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'विभागं चेत्पिता कुर्यादिच्छया विभजेत्सुतान्।' यह किस ग्रंथ का वचन है?

याज्ञवल्क्य स्मृति :

याज्ञवल्क्य स्मृति में १००३ श्लोक हैं। इसपर विरचित मिताक्षरा टीका हिंदू धर्मशास्त्र के विषय में भारतीय न्यायालयों में प्रमाण मानी जाती रही है। याज्ञवल्क्य स्मृति और कौटिलीय अर्थशास्त्र में विशेष साम्य पाया जाता है। इसी स्मृति में सर्वप्रथम स्त्रियोंं के संपत्ती के अधिकार का विधान किया गया है।

याज्ञवल्क्यस्मृति के व्यवहाराध्याय के दायविभाग में पिता को अपने पुत्र में संपत्ती का कैसा विभाजन करना चाहिए, इसका विवेचन आता है - 

विभागं चेत्पिता कुर्यादिच्छया विभजेत्सुतान्।

ज्येष्ठं वा श्रेष्ठभागेन सर्वे वा स्युः समाशिनः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति २.११७)

  • अर्थ - यदि पिता कोई विभाजन करता है, तो उसे अपनी इच्छानुसार अपने पुत्रों में विभाजित करना चाहिए। या तो सबसे बड़े या सबसे अच्छे हिस्से के साथ सबसे बड़ा या वे सभी एक लाभ हो सकता है।

 

​अतः स्पष्ट है, की *"*याज्ञवल्क्यस्मृत्याः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। ​​

Question 14

'नमो अरिहंतानं। नमो सवसिधानं। ऐरेण महाराजेन...।' इति वाक्यं कस्मिन्नभिलेखे प्राप्यते?

  1. AOption (a)

    इलाहाबाद-लेखे

  2. BOption (b)

    ऐहोल-शिलालेखे

  3. COption (c)

    गिरनार-लेखे

  4. DOption (d)

    हाथीगुम्फा-लेखे

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Correct answer

Answer: (d)D.

हाथीगुम्फा-लेखे

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'नमो अरिहंतानं। नमो सवसिधानं। ऐरेण महाराजेन...।' यह वाक्य किस अभिलेख में प्राप्त होता है?

हाथीगुम्फा अभिलेख :

  • उड़ीसा के भुवनेश्वर नामक स्थान से तीन मील दूर उदयगिरि नाम की पहाड़ी है, जिसकी एक गुफा में एक शिलालेख उपलब्ध हुआ है, जो 'हाथीगुम्फा शिलालेख' के नाम से प्रसिद्ध है।
  • इसे कलिंगराज खारवेल ने उत्कीर्ण कराया था। यह लेख प्राकृत भाषा में है और प्राचीन भारतीय इतिहास के लिए इसका बहुत अधिक महत्त्व है।
  • इसके अनुसार कलिंग के स्वतंत्र राज्य के राजा प्राचीन 'ऐल वंश' के चेति या चेदि क्षत्रिय थे। चेदि वंश में 'महामेधवाहन' नाम का प्रतापी राजा हुआ, जिसने मौर्यों की निर्बलता से लाभ उठाकर कलिंग में अपना स्वतंत्र शासन स्थापित किया।
  • महामेधवाहन की तीसरी पीढ़ी में खारवेल हुआ, जिसका वृत्तान्त हाथीगुम्फा शिलालेख में विशद के रूप से उल्लिखित है।
  • खारवेल जैन धर्म का अनुयायी था और सम्भवतः उसके समय में कलिंग की बहुसंख्यक जनता भी वर्धमान महावीर के धर्म को अपना चुकी थी।
  • इस शिलालेख में ही जैन धर्म का प्रमुख प्रार्थना वाक्य आता है - 'नमो अरिहंतानं। नमो सवसिधानं। ऐरेण महाराजेन...।

 

​अतः स्पष्ट है, की *"*हाथीगुम्फा-लेखे" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 15

सारनाथ-बौद्धप्रतिमालेखस्य भाषाऽस्ति

  1. AOption (a)

    संस्कृतम्

  2. BOption (b)

    प्राकृतम्

  3. COption (c)

    पालिः

  4. DOption (d)

    अपभ्रंशः

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Correct answer

Answer: (b)B.

प्राकृतम्

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : सारनाथ-बौद्धप्रतिमा लेख की भाषा क्या है?

सारनाथ के उत्खनन की प्राप्तियाँँ :

सारनाथ के उत्खनन ने निम्नलिखित  प्राप्तियाँँ हुई है - 

  • चौखंडी स्तूप
  • धर्मराजिका स्तूप
  • मूलगंध कुटी विहार
  • अशोक स्तंभ
  • धमेख स्तूप (धर्मचक्र स्तूप)

धर्मराजिका स्तूप : 

  • इस स्तूप का निर्माण अशोक ने करवाया था। दुर्भाग्यवश 1794 ई. में जगत सिंह के आदमियों ने काशी का प्रसिद्ध मुहल्ला जगतगंज बनाने के लिए इसकी ईंटों को खोद डाला था।
  • खुदाई के समय 8.23 मी. की गहराई पर एक प्रस्तर पात्र के भीतर संगरमरमर की मंजूषा में कुछ हड्डिया: एवं सुवर्णपात्र, मोती के दाने एवं रत्न मिले थे, जिसे उन्होंने विशेष महत्त्व का न मानकर गंगा में प्रवाहित कर दिया।
  • यहाँ से प्राप्त महीपाल के समय के 1026 ई. के एक लेख में यह उल्लेख है कि स्थिरपाल और बसंतपाल नामक दो बंधुओं ने धर्मराजिका और धर्मचक्र का जीर्णोद्धार किया।
  • उत्खनन से इस स्तूप से दो मूर्तियाँ मिलीं। ये मूर्तियाँ सारनाथ से प्राप्त मूर्तियों में मुख्य हैं। पहली मूर्ति कनिष्क के राज्य संवत्सर 3 (81 ई.) में स्थापित विशाल बोधिसत्व प्रतिमा और दूसरी धर्मचक्रप्रवर्तन मुद्रा में भगवान बुद्ध की मूर्ति है।
  • ये मूर्तियाँ सारनाथ की सर्वश्रेष्ठ कलाकृतियाँ हैं। इनकी भाषा प्राकृत है।

​ 

​अतः स्पष्ट है, की *"*प्राकृतम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 16

अधस्तनानां केन अभिलेखेन सह कस्य सम्बन्धः? समीचीनां तालिकां चिनुत

तालिका-Iतालिका-II
(a)रुद्रदाम्नः(i)हाथीगुम्फा
(b)खारवेलस्य(ii)मन्दसौरः
(c)यशोधर्मणः(iii)ऐहोलः
(d)पुलकेशिनः(iv)गिरनारः
  1. AOption (a)

    (a) - (iv); (b) - (i); (c) - (ii); (d) - (iii)

  2. BOption (b)

    (a) - (i); (b) - (ii); (c) - (iii); (d) - (iv)

  3. COption (c)

    (a) - (iv); (b) - (iii); (c) - (ii); (d) - (i)

  4. DOption (d)

    (a) - (iii); (b) - (i); (c) - (iv); (d) - (ii)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(a) - (iv); (b) - (i); (c) - (ii); (d) - (iii)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किस अभिलेख का किस के साथ संबंध है?

गिरनार अभिलेख :

रुद्रदमन का गिरनार शिलालेख पश्चिमी छत्रप नरेश रुद्रदमन द्वारा लिखवाया गया शिलालेख है। यह शिलालेख गिरनार पर्वतों पर है जो जूनागढ़ के निकट स्थित है। यह १३०-से १५० ई॰ के मध्य लिखा गया था। जूनागढ़ शिलाओं पर अशोक के १४ शिलालेख तथा स्कन्दगुप्त के शिलालेख भी है। इस अभिलेख की मुख्य विशेषताएँँ - 

  • रुद्रदामन का गिरनार शिलालेख उच्च कोटि के संस्कृत गद्य का स्वरूप प्रकट करता है जिसमें सुबन्धु, दण्डी और बाण की गद्यशैली का पूर्वरूप देखा जा सकता है।
  • इसकी भाषा सरल और प्रवाहपूर्ण है। इसमें दीर्घ समासों का भी प्रयोग देखते बनता है।
  • अलंकृत शैली, नादात्मकता इसकी अन्य विशेषताएँ है।
  • इस शिलालेख में एक बहुत बड़े सुदर्शन तड़ाग सरोवर के निर्माण की बात कही है।
  • इस क्षेत्र में पानी की कमी है। यह कार्य भी जनहित के लिए प्रशंसनीय प्रयास है।

मंदसौर अभिलेख :

यशोधर्मन-विष्णुवर्धन का मन्दसौर शिलालेख मध्य प्रदेश के मन्दसौर में स्थित एक शिलालेख है जो संस्कृत भाषा एवं गुप्त लिपि में है। इसका लेखनकाल लगभग 532 ई माना गया है। यह लेख 2 फुट चौड़े तथा 1.5 फुट ऊँचे एवं 2.5 इंच मोटे पत्थर पर अंकित है। यह लेख ॐ से आरम्भ होता है, जिसके पश्चात शिव के मंगलाचरण है। इसके अन्त में लिपिकार का नाम भी अंकित है। यह विभिन्न छन्दों में है।

हाथीगुम्फा अभिलेख :

  • उड़ीसा के भुवनेश्वर नामक स्थान से तीन मील दूर उदयगिरि नाम की पहाड़ी है, जिसकी एक गुफा में एक शिलालेख उपलब्ध हुआ है, जो 'हाथीगुम्फा शिलालेख' के नाम से प्रसिद्ध है।
  • इसे कलिंगराज खारवेल ने उत्कीर्ण कराया था। यह लेख प्राकृत भाषा में है और प्राचीन भारतीय इतिहास के लिए इसका बहुत अधिक महत्त्व है।
  • इसके अनुसार कलिंग के स्वतंत्र राज्य के राजा प्राचीन 'ऐल वंश' के चेति या चेदि क्षत्रिय थे। चेदि वंश में 'महामेधवाहन' नाम का प्रतापी राजा हुआ, जिसने मौर्यों की निर्बलता से लाभ उठाकर कलिंग में अपना स्वतंत्र शासन स्थापित किया।
  • महामेधवाहन की तीसरी पीढ़ी में खारवेल हुआ, जिसका वृत्तान्त हाथीगुम्फा शिलालेख में विशद के रूप से उल्लिखित है।
  • खारवेल जैन धर्म का अनुयायी था और सम्भवतः उसके समय में कलिंग की बहुसंख्यक जनता भी वर्धमान महावीर के धर्म को अपना चुकी थी।
  • इस शिलालेख में ही जैन धर्म का प्रमुख प्रार्थना वाक्य आता है - 'नमो अरिहंतानं। नमो सवसिधानं। ऐरेण महाराजेन...।

ऐहोल अभिलेख :

  • ऐहोल के एक जैन मंदिर की दीवारों में वातापी के चालुक्य शासकों का प्रारंभिक इतिहास एवं इस वंश के महान शासक पुलकेशिन द्वितीय (610-643 ई.) की विभिन्न विजयों की सूची उत्कीर्ण की गई है।
  • यह एक प्रशस्ति रूप है, जिसे ‘ऐहोल प्रशस्ति‘ या ‘होल अभिलेख‘ कहा जाता है।
  • यह अभिलेख संस्कृत भाषा मे ७वी सदी मे रवि कीर्ति ने लिखा। इसमें पुल्केशन द्वितिया वा हर्ष वर्धन के मध्य हुए युद्ध का वर्णन मिलता है, जिसमे हर्ष पराजय हुआ। इसी अभिलेख मे संस्कृत के महान कवि कालिदास का उल्लेख मिलता है।

 

अतः स्पष्ट है, की "(a) - (iv); (b) - (i); (c) - (ii); (d) - (iii)" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 17

यशोधर्मणः मन्दसौर-स्तम्भलेखस्य लिपिरस्ति

  1. AOption (a)

    देवनागरी

  2. BOption (b)

    ब्राह्मी

  3. COption (c)

    खरोष्ठी

  4. DOption (d)

    शारदा

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Correct answer

Answer: (b)B.

ब्राह्मी

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : यशोधर्मा के मन्दसौरस्तम्भलेख की लिपि कौन सी है?

यशोधर्मा राजा : 

यशोधर्मा राजा का सामान्य परिचय इस प्रकार है - 

  • यशोधर्मा यह राजा विष्णुवर्धन के नाम से भी जाना जाता है।
  • इस राजा ने निम्नलिखित उपाधियाँँ धारण की थी - 
  • राजाधिराज
  • परमेश्वर
  • सम्राट
  • इस राजा की तुलना मांधाता, अलर्क, भरत और मनु से की जाती थी।

मंदसौर शिलालेख : यह शिलालेख एक अज्ञात पानी के कुएँ की मरम्मत के दौरान गलती से खोजा गया था। पहली बार जे. एफ. फ्लीट द्वारा पढ़ा गया। उसने अनुमान लगाया कि यह मूल कुआँ हो सकता है।

  • मन्दसौर शिलालेख मध्य प्रदेश के मन्दसौर में स्थित यशोधर्मा का एक शिलालेख है जो संस्कृत भाषा एवं गुप्त ब्राह्मी लिपि में है।
  • इसका लेखनकाल लगभग 532 ईसाकाल माना गया है।
  • यह लेख 2 फुट चौड़े तथा 1.5 फुट ऊँचे एवं 2.5 इंच मोटे पत्थर पर अंकित है।
  • यह लेख ॐ से आरम्भ होता है, जिसके पश्चात शिव का मंगलाचरण है।
  • इसके अन्त में लिपिकार का 'दक्ष' यह नाम भी अंकित है। यह विभिन्न छन्दों में है।
  • मन्दसौर शिलालेख का मंगलाचरण - 
  • सिद्धं स जयति जगतां पतिः पिनाकी स्मितरवगीतिषु यस्य दन्तकान्तिः। द्युतिर् इव तडितां निशि स्फुरन्ती तिरयति च स्फुटयत्य् अदश् च विश्वं।।
  • यहाँँ 'पिनाकी' इस शब्द से शिव का बोध होता है।  पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाला अर्थात् शिव, इसलिये पिनाकी शब्द प्रयुक्त है।

अतः स्पष्ट है, "ब्राह्मी" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 18

अशोकस्य शाहबाजगढ़ी-अभिलेखः कुत्र प्राप्यते

  1. AOption (a)

    जूनागढ़-गुजरातप्रान्ते

  2. BOption (b)

    पेशावर-पाकिस्तानदेशे

  3. COption (c)

    गुजर्रा-मध्यप्रदेशे

  4. DOption (d)

    भावू-राजस्थानप्रदेशे

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Correct answer

Answer: (b)B.

पेशावर-पाकिस्तानदेशे

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अशोक का शाहबाजगढ़ी-अभिलेख कहाँँ प्राप्त होता है?

शाहबाज गढी :

  • शाहबाज़ गढ़ी पाकिस्तान के उत्तरी भाग में ख़ैबर-पख़्तूनख़्वा, पेशावर प्रान्त के मरदान ज़िले में स्थित एक गाँव व पुरातत्व-स्थल है।
  • यहाँ तीसरी शताब्दी ईसापूर्व काल के मौर्य राजवंश के सम्राट अशोक के शिला पर अभिलेख का सबसे प्राचीन उदाहरण मिलता है जो खरोष्ठी लिपि में है।
  • यह इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि यह भारतीय उपमहाद्वीप में लिखाई का सबसे पुराना ज्ञात नमूना है।

अशोक के पुराभिलेख :

  • मौर्य सम्राट अशोक के इतिहास की संपूर्ण जानकारी उसके अभिलेखों से मिलती है। इनकी विशेषता इस प्रकार है -
  • यह माना जाता है कि, अशोक को अभिलेखों की प्रेरणा ईरान के शासक 'डेरियस' से मिली थी।
  • अशोक के लगभग ४० अभिलेख प्राप्त हुए हैं। ये ब्राह्मी, खरोष्ठी और आर्मेइक-ग्रीक लिपियों में लिखे गये हैं।
  • सम्राट अशोक के ब्राह्मी लिपि में लिखित सन्देश को सर्वप्रथम एलेग्जेंडर कनिंघम के सहकर्मी जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा था।
  • अशोक के अभिलेखों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-
  • शिलालेख
  • स्तम्भलेख
  • गुहालेख
  • सम्राट अशोक का इतिहास इन लेखोंं से प्राप्त होता है। अशोक के १४ शिलालेख मिलतेंं हैंं।
  • अशोक का तक्षशिला एवं लघमान, अफगाणिस्तान का शिलालेख आर्मेइक-ग्रीक लिपि में है।
  • शाहबाज़गढ़ी के अतिरिक्त अन्य सारे शिलालेख ब्राह्मी लिपि में है। शाहबाज़गढ़ी का लेख खरोष्ठी लिपि में उत्कीर्ण है।

अतः स्पष्ट है, "पेशावर-पाकिस्तानदेशे"** यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 19

अधस्तनयुग्मानां वाल्मीकिरामायणस्योपजीविग्रन्थेषु केन सह कस्य सम्बन्धः?समुचितां तालिकां चिनुत

तालिका-Iतालिका-II
(a)रामायणमञ्जरी(i)विलोमकाव्यम्
(b)यादवराघवीयम्(ii)चित्रकाव्यम्
(c)अनर्घराघवम्(iii)महाकाव्यम्
(d)रामलीलामृतम्(iv)नाटकम्
  1. AOption (a)

    (a) - (iii); (b) - (i); (c) - (iv); (d) - (ii)

  2. BOption (b)

    (a) - (iii); (b) - (iv); (c) - (i); (d) - (ii)

  3. COption (c)

    (a) - (ii); (b) - (iv); (c) - (iii); (d) - (i)

  4. DOption (d)

    (a) - (iv); (b) - (ii); (c) - (i); (d) - (iii)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(a) - (iii); (b) - (i); (c) - (iv); (d) - (ii)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- नीचे दिए गए युग्मों में वाल्मीकि रामायण के उपजीव्य ग्रंथो में किसके साथ किसका सम्बंध है? समुचित तालिका चुनें। 

स्पष्टीकरण- 

  1. रामायणमञ्जरी- यह आचार्य क्षेमेन्द्र द्वारा रचित महाकाव्य है। इसमें रामायण की प्रख्यात कथाओं को संक्षेप रूप में प्रस्तुत किया गया है।
  2. यादवराघवीयम्- यह वेंकटध्वरी द्वारा रचित विलोमकाव्य है। इसमें विलोम पद्धति से राम और कृष्ण दोनों का एकत्र वर्णन किया है, जिसके अनुसार साधारण क्रम से पढ़ने पर राम का वर्णन प्राप्त होता है और श्लोक को उलटे क्रम से पढ़ने पर कृष्ण का वर्णन प्राप्त होता है।
  3. अनर्घराघव- यह मुरारि कवि द्वारा रचित सात अंकों का नाटक है। इसमें रामायण की कथावस्तु वर्णित है। इसमें विश्वामित्र द्वारा यज्ञ की रक्षा हेतु दशरथ से राम और लक्ष्मण की याचना से लेकर रामराज्याभिषेक तक की कथा वर्णित है।
  4. रामलीलामृतम्- यह गोविन्दचंद्र मिश्र द्वार रचित एक चित्रकाव्य है। इसमें अलंकारो का क्लिष्ट प्रयोग किया गया है।

 

अत: (a) - (iii); (b) - (i); (c) - (iv); (d) - (ii) यह पर्याय उचित है।

Question 20

अधस्तनयुग्मानां समीचीनमेलनतालिकां चिनुत

तालिका-Iतालिका-II
(a)भारविः(i)बुद्धचरितम्
(b)कालिदासः(ii)रघुवंशम्
(c)अश्वघोषः(iii)किरातार्जुनीयम्
(d)शूद्रकः(iv)मृच्छकटिकम्
  1. AOption (a)

    (a) - (iii); (b) - (ii); (c) - (i); (d) - (iv)

  2. BOption (b)

    (a) - (ii); (b) - (i); (c) - (iv); (d) - (iii)

  3. COption (c)

    (a) - (i); (b) - (ii); (c) - (iii); (d) - (iv)

  4. DOption (d)

    (a) - (iv); (b) - (iii); (c) - (ii); (d) - (i)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(a) - (iii); (b) - (ii); (c) - (i); (d) - (iv)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- नीचे दिए गए युग्मों में समुचित मेलित तालिका को चुनें।

स्पष्टीकरण- 

भारवि-

  • भारवि की प्रमुख रचना किरातार्जुनीय है।
  • किरातार्जुनीय 18 सर्गों का एक महाकाव्य है।
  • इसकी कथा महाभारत के वन पर्व से ली गयी है।
  • इसमें अर्जुन और किरातवेशधारी शिव के युद्ध का वर्णन है।

​कालिदास- 

  • रघुवंश कालिदास द्वारा विरचित एक महाकाव्य है।
  • इसमें 19 सर्ग हैं।
  • इसमें  29 रघुवंशीय राजा का वर्णन है।
  • इसकी कथा रामायण पर आधारित है।
  • इस ग्रन्थ पर सर्वाधिक प्रसिद्ध टीका मल्लिनाथ विरचित 'संजीवनी' नामक टीका है।

अश्वघोष- 

  • अश्वघोष की प्रमुख रचना बुद्धचरितम है।
  • बुद्धचरितम् 28 सर्गों का एक महाकाव्य है।
  • इसमें भगवान बुद्ध के जीवन कथा का वर्णन है।

शूद्रक- 

  • शुद्रक की प्रमुख रचना मृच्छकटिक है।
  • यह 10 अंको वाला प्रकरण है।
  • इसमें चारुदत्त और वसन्तसेना की प्रणय कथा का वर्णन है।

 

अत: यह स्पष्ट होता है की, (a) - (iii); (b) - (ii); (c) - (i); (d) - (iv) यह पर्याय योग्य है।

Question 21

अधस्तनीयानां युग्मानां समीचीनां तालिकां चिनुत

तालिका-Iतालिका-II
(a)पाणिनिः(i)वृत्तिः
(b)कात्यायनः(ii)सूत्रम्
(c)पतञ्जलिः(iii)वार्तिकम्
(d)जयादित्यः(iv)इष्टिः
  1. AOption (a)

    (a) - (i); (b) - (ii); (c) - (iii); (d) - (iv)

  2. BOption (b)

    (a) - (i); (b) - (iii); (c) - (ii); (d) - (iv)

  3. COption (c)

    (a) - (iii); (b) - (ii); (c) - (iv); (d) - (i)

  4. DOption (d)

    (a) - (ii); (b) - (iii); (c) - (iv); (d) - (i)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(a) - (ii); (b) - (iii); (c) - (iv); (d) - (i)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : समीचीन तालिका का चयन कीजिए।

वृत्ति :

काशिका यह जयादित्य और वामन नाम के दो विद्वानों की सम्मिलित कृति है। इसमें बहुत से सूत्रों की वृत्तियाँ और उनके उदाहरण पूर्वकालिक आचार्यों के वृत्तिग्रंथों से भी दिए गए हैं। अपेक्षाकृत छोटी टीकाओं को वाक्य या वृत्ति कहते हैं।

सूत्र :

पाणिनि (7०० ई॰पू॰) संस्कृत भाषा के सबसे बड़े वैयाकरणी हुए हैं। इनका जन्म तत्कालीन उत्तर पश्चिम भारत के गान्धार में हुआ था। इनके व्याकरण का नाम अष्टाध्यायी है जिसमें आठ अध्याय और लगभग चार सहस्र सूत्र हैं। सूत्र का यह लक्षण है - 

अल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवद्विश्वतोमुखम्।

अस्तोभमनवद्यञ्च सूत्रं सूत्रविदो विदुः।।

  • अल्प अक्षरों वाला, असंदिग्ध, सारपूर्ण, सर्वतोमुख (वैश्विक रूप से उपयुज्य), अस्तोभ (यानी अखंडित रूप से उच्चारणसुलभ) और अवद्य (दोषमुक्त) जो है, उसे ही “सूत्र” माना जाता है।

वार्तिक : 

वररुचि कात्यायन पाणिनीय सूत्रों के प्रसिद्ध वार्तिककार हैं। वररुचि कात्यायन के वार्तिक पाणिनीय व्याकरण के लिए अति महत्वशाली सिद्ध हुए हैं। वार्तिकों के आधार पर ही बाद में पतंजलि ने महाभाष्य की रचना की।  

उक्‍तानुक्‍तदुरुक्‍तानां चिन्‍ता यत्र प्रवर्तते । 

तं ग्रन्‍थं वार्तिकं प्राहुर्वार्तिकज्ञा मनीषिण: ।।

  • जिस ग्रंथ में उक्त, अनुक्त और दुरुक्‍त का विचार होता है, उसे विद्वान वार्तिक कहते हैंं।

वृत्तेर्व्‍याख्‍यानम् वृत्‍तेरिदं वार्तिकम्।

  • जो रचनाएँँ भाष्यों का अर्थ स्पष्ट करने के लिये रची गयी हैं उन्हें वार्तिक कहते हैं।

इष्टि :

कात्यायन के वार्त्तिकों के पश्चात् महर्षि पतंजलि ने पाणिनीय अष्टाध्यायी पर एक महती व्याख्या लिखी, जो 'महाभाष्य' के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें उन्होंने पाणिनीय सूत्रों तथा उन पर लिखे गये वार्त्तिकों का विवेचन किया, और साथ ही साथ अपने इष्टि-वाक्यों का भी समावेश किया। 

अतः स्पष्ट है, "(a) - (ii); (b) - (iii); (c) - (iv); (d) - (i)" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 22

बाष्कलशाखा कस्य वेदस्य विद्यते?

  1. AOption (a)

    ऋग्वेदस्य

  2. BOption (b)

    सामवेदस्य

  3. COption (c)

    यजुर्वेदस्य

  4. DOption (d)

    अथर्ववेदस्य

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Correct answer

Answer: (a)A.

ऋग्वेदस्य

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- बाष्कल शाखा किस वेद की है?

स्पष्टीकरण- बाष्कल शाखा ऋग्वेद की है।

Key Pointsबाष्कल शाखा-

  • शौनक के चरणव्यूह में ऋग्वेद की पाँच शाखाओं की तालिका है। ये शाखायें ये हैं- शाकल, बाष्कल, अश्वलायन, शांखायन और माण्डूकायन।
  • वर्तमान समय में इनमें से शाकल और बाष्कल - दो शाखायें प्रचलित हैं।
  • ऋग्वेद की बाष्कल शाखा में खिलानि हैं, जो शाकल शाखा में नहीं हैं। फिर भी वर्तमान में पुणे में सुरक्षित शाकल शाखा की एक कश्मीरी पाण्डुलिपि में खिलानि पाया गया है।

Additional Informationऋग्वेद-

ऋग्वेद वैदिक साहित्य का प्रथम ग्रन्थ है। 

ऋक् या ऋच् का अर्थ है- स्तुतिपरक मंत्र, ‘ऋच्यते स्तूयते अनया इति ऋक्’। अर्थात् जिन मंत्रों के द्वारा देवों की स्तुति की जाती है, उन्हें ऋक् या ऋच् कहते हैं। ऋचाओं से युक्त वेद को ऋग्वेद कहते है। 

ऋग्वेद के ऋत्विज का नाम होता है। 

महाभाष्यकार पतंजलि के अनुसार ऋग्वेद की 21 शाखाओं का उल्लेख किया गया है। किन्तु शौनक के अनुसार ऋग्वेद की पाँच मुख्य शाखाएँ हैं- शाकल, बाष्कल, आश्वलायन, शांखायन, माण्डूकायन। 

ऋग्वेद के प्रथम भाष्यकार स्कन्दस्वामी हैं। 

ऋग्वेद में 10 मंडल, 1028 सूक्त तथा 10580 मन्त्र हैं। 

Confusion Pointsखिलानि- ऋग्वेद के उन ९८ 'अनाम' मंत्रों के समूह को खिलानि कहते हैं जो वाष्कल शाखा में विद्यमान हैं किन्तु शाकल शाखा में नहीं। ऐसा माना जाता है कि ये ऋग्वेद में बाद में जोड़े गये किन्तु फिर भी वैदिक संस्कृत के मंत्रकाल के हैं।

Question 23

ऋग्वेदे वरुणसूक्तस्य (1.2) ऋषिः कः?

  1. AOption (a)

    शुनःशेपः

  2. BOption (b)

    मधुच्छन्दाः

  3. COption (c)

    हिरण्यस्तूपः

  4. DOption (d)

    गौतमः

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Correct answer

Answer: (a)A.

शुनःशेपः

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प्रश्नानुवाद- ऋग्वेद में वरुण सूक्त (1.2) के ऋषि कौन है?

स्पष्टीकरण- ऋग्वेद में वरुण सूक्त (1.2) के ऋषि शुनःशेप है।

Key Pointsशुनःशेपः-

  • शुनःशेप एक महान ऋषि थे जिनका वर्णन कई सनातन शास्त्रों अथवा हिन्दू ग्रंथों में मिलता है। ऋग्वेद की कई ऋचाओं की रचना उन्होंने की।
  • शुनःशेप का उल्लेख सबसे प्रथम ऋग्वेद के प्रथम मंडल, सूक्त २४ में वरुण देव के उपासक के रूप में मिलता है।

Additional Informationवरुण सूक्त-

  • इस सूक्त के देवता स्वयं वरुण है। ये सभी मंत्र गायत्री छंद में निबद्ध है। वैदिक युग के सबसे प्रधान देवताओं में से एक वरुण है। वरुण आकाश के देवता है।
  • वरुण शब्द वर धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ होता है- ढक लेना। आकाश को वरुण कहा जाता है क्योंकि यह समस्त पृथ्वी को आच्छादित कर देता है।
  • वरुण के सम्बन्ध में ऋग्वेद में कहा गया है कि सूर्य वरुण के चक्षु हैं, आकाश उसके वस्त्र है तथा तूफान उसके निःश्वास है।
  • नदियाँ उसकी आज्ञा से बहती है। सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र,वरुण के भय से कार्य करते है। मित्र को वरुण का सखा कहा गया है।
  • वरुण के पास रथ है जिस पर वे मित्र के साथ विचरन करते है। वरुण का आवास स्वर्णिम है।

Question 24

'सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षातपो ब्रह्मयज्ञः पृथिवीं धारयन्ति' मन्त्रांशोऽयं कस्मिन् वेदे विद्यते?

  1. AOption (a)

    ऋग्वेदे

  2. BOption (b)

    यजुर्वेदे

  3. COption (c)

    सामवेदे

  4. DOption (d)

    अथर्ववेदे

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Correct answer

Answer: (d)D.

अथर्ववेदे

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प्रश्नानुवाद- 'सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षातपो ब्रह्मयज्ञः पृथिवीं धारयन्ति' यह मंत्रांश किस वेद का है?

स्पष्टीकरण- 'सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षातपो ब्रह्मयज्ञः पृथिवीं धारयन्ति' यह मंत्रांश अथर्ववेद का है।

मन्त्र- सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षातपो ब्रह्मयज्ञः पृथिवीं धारयन्ति। स नो भूतस्य भव्यस्य पत्नयुरुं लोकं पृथ्वी नः कृणॊतु।।

सन्दर्भ- प्रस्तुत मंत्र अथर्व के 12वें काण्ड में वर्णित पृथ्वी सूक्त का प्रथम मन्त्र है। इस सूक्त में कुल 63 मन्त्र हैं। इस सूक्त के ऋषि अथर्वा तथा देवता भूमि हैं। इसमें अनेक छंदों का प्रयोग किया गया है। 

मंत्रार्थ- सत्य, महत्ता, ऋत, उग्रता, दीक्षा, तपस्या, ब्रह्म और यज्ञ पृथ्वी को धारण करते हैं। भूत और भविष्य की पत्नी वह पृथ्वी हमारे लोक को विस्तृत बना दें। 

अतिरिक्त जानकारी

इस सूक्त के अन्य सूक्तियाँ निम्नलिखित हैं- 

  • यस्यामापः परिचरा: समानीरहोरात्रे अप्रमादं क्षरन्ति। (जिस पृथ्वी के चारों ओर विचरण करने वाला जल समान भाव से रात-दिन निर्बाध रूप से प्रवाहित होता है।)
  • माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या:। (भूमि माता है, मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ।)

Question 25

दर्शयज्ञः कस्यां तिथौ क्रियते?

  1. AOption (a)

    पौर्णमास्याम्

  2. BOption (b)

    अमावास्याम्

  3. COption (c)

    अष्टम्याम्

  4. DOption (d)

    चतुर्दश्याम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

अमावास्याम्

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प्रश्नानुवाद- दर्श यज्ञ किस तिथि में किया जाता है?

स्पष्टीकरण- दर्श यज्ञ अमावास्या स्थिति में किया जाता है।

यज्ञ संकल्पना-

  • भारतीय परम्परा में यज्ञों का अत्यधिक महत्व है।
  • ये यज्ञ मुख्य रूप से दो प्रकार के हैं- श्रौत और स्मार्त।
  • श्रुतियों पर आधारित यज्ञ श्रौत यज्ञ कहलाते हैं।
  • स्मृति अथवा धर्म शास्त्रों पर आधारित यज्ञ स्मार्त कहलाते है।
  • ब्राह्मणों ग्रंथो में समस्त श्रौतयज्ञों को पाँच भागों में बाँटा गया है- अग्निहोत्र, दर्शपौर्णमास, चातुर्मास्य, पशु, सोम।
  • दर्शपौर्णमास यज्ञ दो यज्ञों का सम्मिलित रूप है- पौर्णमास यज्ञ तथा दर्शयज्ञ।
  • पौर्णमास यज्ञ पूर्णिमा के दिन में किया जाता है।
  • दर्शयज्ञ में अमावस्या के दिन अग्नि के लिए पुरोडाश और इन्द्र के लिए दही तथा दूध के बने द्रव्य की आहुतियाँ दी जाती है।
  • पौर्णमास यज्ञ में पूर्णिमा के दिन अग्नि और सोम के लिए घी और पूरोडाश की आहुति दी जाती है।

Question 26

पञ्चमहायज्ञेषु किं न गण्यते?

  1. AOption (a)

    देवयज्ञः

  2. BOption (b)

    पितृयज्ञः

  3. COption (c)

    ब्रह्मयज्ञः

  4. DOption (d)

    विष्णुयज्ञः

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Correct answer

Answer: (d)D.

विष्णुयज्ञः

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प्रश्नानुवाद- पञ्चमहायज्ञ में किसकी गणना नहीं होती है?

स्पष्टीकरण- पञ्चमहायज्ञ में विष्णुयज्ञ की गणना नहीं होती है।

भारतीय संस्कृति में गृहस्थ आश्रम में पञ्चमहायज्ञों का बड़ा महत्व है। ये यज्ञ निम्नलिखित है- ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, नृयज्ञ। 

ब्रह्मयज्ञ- 

  • पञ्चमहायज्ञों में यह सर्वश्रेष्ठ महायज्ञ माना जाता है।
  • इसे ऋषि यज्ञ के नाम से भी जाना जाता है।
  • गृहस्थ आश्रम में यदि कोई मनुष्य वेदों, ब्राह्मणों, आरण्यकों, उपनिषदों, पुराणों इत्यादि ग्रंथों का अध्ययन अध्यापन करता है तो वह ब्रह्म यज्ञ या ऋषि यज्ञ कहलाता है।
  • इस यज्ञ संपादन के द्वारा मनुष्य ऋषि ऋण से भी मुक्ति प्राप्त करता है।

पितृयज्ञ- 

  • गृहस्थाश्रम me यदि कोई मनुष्य अपने मृत परिजनों को पिंडदान या तर्पण अर्पित करता है अथवा जीवित माता-पिता की सेवा करता है तो वह पितृ यज्ञ कहलाता है।
  • इस यज्ञ के द्वारा पूर्वजों को भी देवताओं के समान पूजनीय मानकर उनकी उपासना की जाती है।
  • वर्तमान समय में श्राद्ध पक्ष में इस यज्ञ का निर्वहन किया जाता है।

देवयज्ञ- 

  • धर्म ग्रंथों के अनुसार मनुष्य प्रतिदिन सुबह-शाम अपने इष्ट देव की उपासना करता है, इस उपासना के समय अग्नि हवन भी किया जाता है। इस कार्य को ही देव यज्ञ के नाम से पुकारा जाता है।
  • इस यज्ञ को अमर यज्ञ एवं अग्निहोत्र यज्ञ के नाम से भी पुकारा जाता है।
  • पर्यावरण को शुद्ध बनाए रखना इस यज्ञ का प्रमुख उद्देश्य माना जाता है।

भूतयज्ञ- 

  • गृहस्थ का पालन करते हुए यदि कोई मनुष्य असहाय प्राणियों (कुत्ते, चिट्टी, किट, गरीब, रोगी इत्यादि) को भोजन प्रदान करता है तो वह भूत यज्ञ कहलाता है।
  • प्रतिदिन घर में भोजन पकाते समय भोजन का सर्वप्रथम अंश अग्नि को समर्पित करना ही भूत यज्ञ कहलाता है।
  • इस यज्ञ को बलि वैश्वदेव यज्ञ के नाम से भी पुकारा जाता है।

​नृयज्ञ- 

  • गृहस्थी के घर में आए हुए किसी अतिथि का सम्मान सहित आदर सत्कार करना एवं जल भोजन आदि के द्वारा उसे संतुष्ट कर देना ही नृयज्ञ कहलाता है।
  • इस यज्ञ को अतिथि यज्ञ एवं मनुष्य यज्ञ के नाम से भी पुकारा जाता है।
  • धर्म ग्रन्थों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के घर से कोई अतिथि रुष्ट होकर या अप्रसन्न होकर चला जाता है तो वह अपने द्वारा किए हुए सभी दुष्कर्म उस घर को दे जाता है तथा उस घर के द्वारा किए गए सभी पुण्य कर्मों को अपने साथ लेकर चला जाता है।
  • उत्तम वर्ण के व्यक्ति के घर में यदि नीच वर्ण का कोई भी अतिथि आ जाता है तो वह यथायोग्य पूजनीय माना गया है क्योंकि अतिथि में ही सभी देवता निवास करते हैं।

Question 27

'कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः' अत्र 'जिजीविषेत्' पदस्य कोऽर्थः?

  1. AOption (a)

    जीवितुमिच्छेत्

  2. BOption (b)

    जेतुमिच्छेत्

  3. COption (c)

    ज्ञातुमिच्छेत्

  4. DOption (d)

    प्राप्तुमिच्छेत्

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Correct answer

Answer: (a)A.

जीवितुमिच्छेत्

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प्रश्नानुवाद- 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः' यहाँ 'जिजीविषेत्' पद का क्या अर्थ?

स्पष्टीकरण- 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः' यहाँ 'जिजीविषेत्' पद का अर्थ है- जीवितुमिच्छेत् अर्थात जीने की इच्छा करना।

ईशोपनिषद- 

  • प्रस्तुत मन्त्र ईशोपनिषद से लिया गया है।
  • यह शुक्ल यजुर्वेद से  उपनिषद है। यह शुक्ल यजुर्वेद का 40वाँ अध्याय है।
  • इसे ईशावास्योपनिषद, मंत्रोपनिषद तथा संहितोपनिषद के नाम से जाना जाता है।
  • इस उपनिषद में केवल 18 मन्त्र हैं।
  • इस उपनिषद में वेदान्त दर्शन के विषय समाहित है।

Important Pointsमन्त्र- कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे।।

मंत्रार्थ- इस लोक में शास्त्र विहित कर्मों को करते हुए ही सौ वर्ष जीवित रहने की इच्छा करें। जिस प्रकार मनुष्य में कर्म लिप्त नहीं होता है, इससे भिन्न अन्य कोई मार्ग भी नहीं है।

Question 28

अधोऽङ्कितेषु योगदर्शनानुसारेण समुचितः क्रमोऽस्ति-

  1. AOption (a)

    अस्तेय-अपरिग्रह-सत्य-ब्रह्मचर्य-अहिंसाः

  2. BOption (b)

    अपरिग्रह-ब्रह्मचर्य-सत्य-अस्तेय-अहिंसाः

  3. COption (c)

    अहिंसा-सत्य-अस्तेय-ब्रह्मचर्य-अपरिग्रहाः

  4. DOption (d)

    सत्य-अहिंसा-अस्तेय-ब्रह्मचर्य-अपरिग्रहाः

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Correct answer

Answer: (c)C.

अहिंसा-सत्य-अस्तेय-ब्रह्मचर्य-अपरिग्रहाः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : योग दर्शन के अनुसार समुचित क्रम है - 

अष्टांग योग :

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि।

यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि यह अष्टांग योग है।

यम :

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरग्रहाः यमा।

अहिंसा-सत्य-अस्तेय-ब्रह्मचर्य-अपरिग्रह यह यम है।

अतः स्पष्ट है, "अहिंसा-सत्य-अस्तेय-ब्रह्मचर्य-अपरिग्रहाः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

यमोंं का विभाजन :

अहिंसा -

  • अहिंसाप्रतिष्ठायांतत्सन्निधौ वैरत्यागः। (पातंजलयोगदर्शन 2/35)
  • अर्थात अहिंसा से प्रतिष्ठित हो जाने पर उस योगी पास वैरभाव छूट जाता है।
  • शब्दों से, विचारों से और कर्मों से किसी को अकारण हानि नहीं पहुँचाना यह अहिंसा है।

सत्य -

  • सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफ़लाश्रययत्वम्। (पातंजलयोगदर्शन 2/36)
  • अर्थात सत्य से प्रतिष्ठित (वितर्क शून्यता स्थिर) हो जाने पर उस साधक में क्रियाओं और उनके फलों की आश्रयता आ जाती है।
  • अर्थात जब साधक सत्य की साधना में प्रतिष्ठित हो जाता है तब उसके किए गए कर्म उत्तम फल देने वाले होते हैं और इस सत्य आचरण का प्रभाव अन्य प्राणियों पर कल्याणकारी होता है।
  • विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना, जैसा विचार मन में है वैसा ही प्रामाणिक बातें वाणी से बोलना यह सत्य है।

अस्तेय -

  • अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्। (पातंजलयोगदर्शन 2/37)
  • अर्थात अस्तेय के प्रतिष्ठित हो जाने पर सभी रत्नों की उपस्थति हो जाती है।
  • अस्तेय अर्थात चोर-प्रवृति का न होना, यह अस्तेय है।

ब्रह्मचर्य -

  • ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः। (पातंजलयोगदर्शन 2/ 38) 
  • अर्थात ब्रह्मचर्य के प्रतिष्ठित हो जाने पर वीर्य(सामर्थ्य) का लाभ होता है।
  • ब्रह्मचर्य के दो अर्थ हैं-
  • चेतना को ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर करना।
  • सभी इन्द्रिय जनित सुखों में संयम रखना।

अपरिग्रह -

  • अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः। (पातंजलयोगदर्शन 2/ 39)
  • अर्थात अपरिग्रह स्थिर होने पर (बहुत, वर्तमान और भविष्य के ) जन्मों तथा उनके प्रकार का संज्ञान होता है ।
  • अपरिग्रह का अर्थ आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करना और दूसरों की वस्तुओं की इच्छा नहीं करना।

Question 29

कर्मकाण्डस्य प्रधानता कस्मिन् दर्शने प्रतिपाद्यते?

  1. AOption (a)

    न्यायदर्शने

  2. BOption (b)

    चार्वाकदर्शने

  3. COption (c)

    मीमांसादर्शने

  4. DOption (d)

    योगदर्शने

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Correct answer

Answer: (c)C.

मीमांसादर्शने

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : कर्मकांड के प्रधानता का किस दर्शन में प्रतिपादन किया है?

मीमांसा दर्शन :

  • मीमांसा या पूर्वमीमांसा दर्शन हिन्दुओं के छह दर्शनों में से एक है जिसमें वेद के यज्ञपरक वचनों की व्याख्या बड़े विचार के साथ की गयी है।
  • इसके प्रणेता जैमिनी हैं। मीमांसा का तत्वसिद्धान्त विलक्षण है।
  • इसकी गणना अनीश्वरवादी दर्शनों में है। किसी विषय पर गहराई से किए गये विचार-विमर्श को मीमांसा कहते हैं।
  • मीमांसनं मीमांसा।
  • मीमांसा दर्शन में "धर्म क्या है" इस विषय पर मीमांसा की गई है।
  • इसके अनुसार
  • *चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः। (*पूर्वमीमांसा १.१.२) 
  • अर्थात् वेद-वाक्य से लक्षित अर्थ, धर्म है।
  • वेद ने जिन कर्मों को करने के लिये कहा है, उनको करना और जिनको करने से मना किया है, उनको न करना "धर्म" है।
  • श्रौतसूत्र आदि कर्मकाण्ड के ग्रन्थों के वाक्यों को लेकर मीमांसा में पर्याप्त मात्रा में कर्म मीमांसा की गई है, साथ में इन्हीं वाक्यों पर भाषाविज्ञान के सिद्धान्तों पर भी गहराई से विचार-विमर्श किया गया है।

अतः स्पष्ट है, "मीमांसादर्शने" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 30

'श्लोकवार्तिकम्' कस्य दर्शनस्य ग्रन्थोऽस्ति?

  1. AOption (a)

    मीमांसादर्शनस्य

  2. BOption (b)

    वेदान्तदर्शनस्य

  3. COption (c)

    न्यायदर्शनस्य

  4. DOption (d)

    सांख्यदर्शनस्य

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Correct answer

Answer: (a)A.

मीमांसादर्शनस्य

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'श्लोकवार्तिकम्' किस दर्शन का ग्रंथ है?

कुमारिल भट्ट :

  • कुमारिल भट्ट मीमांसा दर्शन के दो प्रधान सम्प्रदायों में से एक भट्टसम्प्रदाय के संस्थापक थे। उन्होने मीमांसा पर अनेक ग्रन्थों की रचना की जिसमें 'मीमांसाश्लोकवार्त्तिक' सर्वाधिक प्रसिद्ध है।
  • कुमारिल ने मीमांसा सूत्रोंं का भाष्य - शाबर भाष्य पर तीन प्रसिद्ध वृत्तिग्रन्थ लिखेंं हैंं - 
  • श्लोकवार्तिक -
  • यह प्रथम अध्याय के प्रथम पाद की व्याख्या है।
  • तन्त्रवार्तिक -
  • इसमें पहले अध्याय के दूसरे पाद से लेकर तीसरे अध्यायों की संक्षिप्त व्याख्या की गई है।
  • टुप्टीका -
  • इसमें अंतिम नौ अध्यायों की संक्षिप्त व्याख्या की गई है।

अतः स्पष्ट है, "मीमांसादर्शनस्य" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 31

बौद्धदर्शने पञ्चविधस्कन्धेषु परिगणितो नास्ति-

  1. AOption (a)

    विज्ञानम्

  2. BOption (b)

    वेदना

  3. COption (c)

    संज्ञा

  4. DOption (d)

    विशेषणम्

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Correct answer

Answer: (d)D.

विशेषणम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : बौद्धदर्शन में पंच स्कंधोंं में किसकी परिगणना नहीं की है?

बौद्ध दर्शन में पंचस्कंध :

  • बौद्ध दर्शन का प्रारंभिक स्वरूप चार आर्य सत्यों में प्रकट होता है। चार आर्य सत्य ही तथागत धर्म तथा बौद्ध दर्शन के मूलाधार है।
  • इन में से द्वितीय आर्य सत्य - दुःख समुदाय के 12 अंग हैं, अतः इसे द्वादश निदान भी कहा जाता हैं।
  • इसमें से एक निदान है - नामरूप। यह पंचस्कंध की अवस्था है।
  • पांच स्कंध इस प्रकार हैंं –
  1. संज्ञा,
  2. वेदना,
  3. संस्कार,
  4. विज्ञान
  5. रूप।
  • ये सभी शारीरिक धर्म हैं और मानवी जीवन की अवस्था और प्रक्रिया का बोध करातेंं हैंं।

अतः स्पष्ट है, "विशेषणम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 32

अधोलिखितेषु वेदान्तमते असमीचीनं कथनं चिनुत-

  1. AOption (a)

    काम्यकर्माणि स्वर्गादिसाधनानि

  2. BOption (b)

    निषिद्धानि कर्माणि अनिष्टसाधनानि

  3. COption (c)

    नित्यानि कर्माणि अनिष्टसाधनानि

  4. DOption (d)

    नैमित्तिकानि प्रायश्चित्तादीनि कर्माणि पापक्षयादिसाधनानि

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Correct answer

Answer: (c)C.

नित्यानि कर्माणि अनिष्टसाधनानि

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अधोलिखित कथनोंं में से वेदांतमत के अनुसार गलत कथन चुनिए।

वेदांत दर्शन :

वेदान्त ज्ञानयोग का एक स्रोत है जो व्यक्ति को ज्ञान प्राप्ति की दिशा में उत्प्रेरित करता है। इसका मुख्य स्रोत उपनिषद है जो वेद ग्रंथोंं और वैदिक साहित्य का सार समझे जाते हैं। उपनिषद वैदिक साहित्य का अंतिम भाग है, इसीलिए इसको वेदान्त कहते हैं।

वेदान्त में आचार्योंं के मुख्य मत अथवा वाक्योंं का विधान किया गया है। इन्हेंं ही वेदांतमत कहा गया है।

वेदांतमत :

वेदांतमत से प्रमुख कथन : 

  • काम्यकर्माणि स्वर्गादिसाधनानि।
  • अर्थ : काम्य कर्म स्वर्ग के साधन हैं।
  • फल के उद्दिष्ट से किये जाने वाले कर्म काम्य कर्म  हैं, जैसे स्वर्गप्राप्ति के लिए किए जाने वाले ज्योतिष्टोम आदि याग। काम्य कर्मोंं का फल मरणोत्तर मिलता है। मुमुक्षु व्यक्ति को इन कर्मोंं का त्याग करना चाहिए।
  • निषिद्धानि कर्माणि अनिष्टसाधनानि।
  • अर्थ : निषिद्ध कर्म अनिष्ट के साधन हैं।
  • नरक जैसे अनिष्ट साध्य के साधन निषिद्ध कर्म हैं। ब्राह्मणहनन अथवा वेदोंं में जिन कर्मोंं का विधान अनिष्ट कहकर किया है, वह करने से अंतःकरण में पाप नामक संस्कार होता है, और उससे दुःखप्राप्ति होती है। इससे समुचित काल आने पर अनिष्ट का उद्भव होता है।
  • नैमित्तिकानि प्रायश्चित्तादीनि कर्माणि पापक्षयादिसाधनानि।
  • अर्थ : नैमित्तिक प्रायश्चित्तादि कर्म पापक्षय के साधन हैं।
  • जिनका निमित्त कारण होता है, वह नैमित्तिक कर्म हैं, जैसे पुत्रजन्म से उत्पन्न होनेंं वाले जातेष्टी आदि कर्म। निमित्त कारण होने से ही इन कर्मोंं की आवश्यकता होती है, अन्यथा नहीं।
  • नित्यानि कर्माणि प्रत्यवयसाधनानि।
  • नित्य कर्म पितृलोक और सत्यलोक की उपलब्धि के साधन हैं।
  • संध्यावंदनादि नित्य कर्म हैं। यथार्थ ज्ञान के साथ इन कर्मोंं का आचरण ही ज्ञानकर्मसमुच्चय है। संन्यासी आदियोंं ने भी यह कर्म अवश्य करने चाहिए।
  • वेदांत में नित्यानित्य कर्मों को पितृलोक और सत्यलोक की उपलब्धि का साधन बताया गया है ना कि अनिष्ट का साधन।

इससे प्रतीत होता है, की नित्यानि कर्माणि अनिष्टसाधनानि यह वाक्य असमुचित है।

अतः स्पष्ट है, "नित्यानि कर्माणि अनिष्टसाधनानि" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 33

अनुमितिज्ञाने व्यापार उच्यते

  1. AOption (a)

    करणम्

  2. BOption (b)

    परामर्शः

  3. COption (c)

    व्याप्तिः

  4. DOption (d)

    हेतुः

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Correct answer

Answer: (b)B.

परामर्शः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अनुमिति ज्ञान में व्यापार क्या कहा गया है?

अनुमान प्रमाण :

  • प्रत्यक्ष (इंद्रिय सन्निकर्ष) द्वारा जिस वस्तु के अस्तित्व का ज्ञान नहीं हो रहा हैं उसका ज्ञान किसी ऐसी वस्तु के प्रत्यक्ष ज्ञान के आधार पर, जो उस अप्रत्यक्ष वस्तु के अस्तित्व का संकेत इस ज्ञान पर पहुँचने की प्रक्रिया का नाम अनुमान है।
  • इस प्रक्रिया का सरलतम उदाहरण इस प्रकार है-किसी पर्वत के उस पार धुआँ उठता हुआ देखकर वहाँ पर आग के अस्तित्व का ज्ञान अनुमिति है और यह ज्ञान जिस प्रक्रिया से उत्पन्न होता है उसका नाम अनुमान है।
  • परामर्श से उत्पन्न ज्ञान को अनुमिती कहते हैंं।​

परामर्श : 

  • पक्ष-धर्मता ज्ञान जब व्याप्ति के स्मरण के साथ होता है तब उस परिस्थिति को परामर्श कहते हैं।
  • इसी को लिंगपरामर्श भी कहते हैं क्योकि पक्षधर्मता का अर्थ है लिंग का पक्ष में उपस्थित होना। इसके कारण इसी के आधार पर पक्ष में साध्य के अस्तित्व का जो ज्ञान होता है उसी का नाम अनुमिति हैं।
  • साध्य को लिंगी भी कहते हैं क्योंकि उसका अस्तित्व लिंग के अस्तित्व के आधार पर अनुमित किया जाता हैं।
  • लिंग को हेतु भी कहते हैं क्योंकि इसके कारण ही हमको लिंगी (साध्य) के अस्तित्व का अनुमान होता है।
  • इसलिए तर्कशास्त्रों में अनुमान की यह परिभाषा की गई है-लिंगपरामर्श का नाम अनुमान है और व्याप्ति विशिष्ट पक्षधर्मता का ज्ञान परामर्श हैं।

अतः स्पष्ट है, "परामर्शः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

**महत्वपूर्ण पारिभाषिक शब्द :**इस प्रक्रिया के लिए यह पारिभाषिक शब्द महत्वपूर्ण हैंं - 

  • लिंग -
  • जिस वस्तु का हमें प्रत्यक्ष ज्ञान हो रहा हैं और जिस ज्ञान के आधार पर हमें अप्रत्यक्ष वस्तु के अस्तित्व का ज्ञान होता है उसे लिंग कहते हैं।
  • साध्य - 
  • जिस वस्तु के अस्तित्व का ज्ञान होता हैं उसे साध्य कहते हैं।
  • व्याप्ति - 
  • पूर्व-प्रत्यक्ष ज्ञान के आधार पर उन दोनों के सहअस्तित्व अथवा साहचर्य के ज्ञान को, जो अब स्मृति के रूप में हमारे मन में है, व्याप्ति कहते है।
  • पक्ष - 
  • जिस स्थान या विषय में लिंग का प्रत्यक्ष हो रहा हो उसे पक्ष कहते हैं।
  • उदाहरण -  
  • ऐसे स्थान या विषय जिनमें लिंग और साध्य पूर्वकालीन प्रत्यक्ष अनुभव में साथ साथ देखे गए हों समक्ष उदाहरण कहलाते है। *ऐसे उदाहरण जहाँ पूर्वकालीन अनुभव में साध्य के अभाव के साथ लिंग का भी अभाव देखा गया हो, विपक्ष उदाहारण कहलाते हैं।
  • ज्ञान - 
  • पक्ष में लिंग की उपस्थिति का नाम है पक्षधर्मता और उसका प्रत्यक्ष होना पक्षधर्मता ज्ञान कहलाता है।

Question 34

वेदान्तसारमतेन कर्मेन्द्रियाणामुत्पत्तिः भवति-

  1. AOption (a)

    आकाशादीनां रजोंऽशेभ्यः समस्तेभ्यः

  2. BOption (b)

    आकाशादीनां रजोंऽशेभ्यः व्यस्तेभ्यः

  3. COption (c)

    आकाशादीनां सत्त्वांशेभ्यो व्यस्तेभ्यः

  4. DOption (d)

    आकाशादीनां सत्त्वांशेभ्यो समस्तेभ्यः

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Correct answer

Answer: (b)B.

आकाशादीनां रजोंऽशेभ्यः व्यस्तेभ्यः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : वेदान्तसार के मत से कर्मेन्द्रियोंं की उत्पत्ति किस प्रकार होती है?

कर्मेंद्रियोंं की उत्पत्ति : 

कर्मेन्द्रियाणि वाक्पाणिपादपायूपस्थाख्यानि । एतानि पुनराकाशादीनां रजोंशेभ्यो व्यस्तेभ्यः पृथक् पृथक् क्रमेणोत्पद्यन्ते।

  • अर्थ : वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ आदि कर्मेन्द्रिय हैंं। यह आकाश आदि के रजोगुण के अंश के पृथक् पृथक् क्रम से उत्पन्न होतें हैंं।

अतः स्पष्ट है, "आकाशादीनां रजोंऽशेभ्यः व्यस्तेभ्यः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

ज्ञानेन्द्रियोंं की उत्पत्ति :

ज्ञानेन्द्रियाणि श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणाख्यानि । एतान्याकाशादीनां सात्विकांशेभ्यो व्यस्तेभ्यः पृथक् पृथक् क्रमेणोत्पद्यन्ते ।

  • अर्थ : श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, घ्राण यह ज्ञानेन्द्रिय हैंं।  यह आकाश आदि के सत्वगुण के अंश के पृथक् पृथक् क्रम से उत्पन्न होतें हैंं।

Question 35

'उद्भिदा यजेत पशुकामः' इत्यत्र 'उद्भिद्' शब्दो यागस्य नामधेयो भवति-

  1. AOption (a)

    मत्त्वर्थलक्षणाभयात्

  2. BOption (b)

    वाक्यभेदभयात्

  3. COption (c)

    तत्प्रख्यशास्त्रात्

  4. DOption (d)

    तद्व्यपदेशात्

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Correct answer

Answer: (a)A.

मत्त्वर्थलक्षणाभयात्

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'उद्भिदा यजेत पशुकामः' यहाँँ 'उद्भिद्' शब्द का याग यह नामधेय किस प्रकार होता है?

मत्वर्थलक्षणा :

विशिष्टविधौ च मत्त्वर्थलक्षणा।

  • विशिष्टविधि में मत्त्वर्थलक्षणा होती है।
  • 'उद्भिदा यजेत पशुकामः' इस वाक्यमें पशु-रूप फल के लिए उद्भिद् याग का विधान किया गया है।
  • यहाँँ मत्वर्थलक्षणा भय से उद्भिद् शब्द का याग यह नामधेय हुआ। क्योंकि इस वाक्य से फल के प्रति याग विधान नहीं जुड़ता अपितु गुण विधान जुड़ता है। इसलिए यहाँँ विशिष्ट विधि का विधान होने से मत्त्वर्थलक्षणा होती है।

अतः स्पष्ट है, "मत्त्वर्थलक्षणाभयात्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

नामधेय :

अर्थसंग्रह में वेद के पाँच भाग माने हैं -

  • विधि, मन्त्र, नामधेय, निषेध और अर्थवाद

इन में से नामधेय इन वेद के भाग में याग संज्ञा स्पष्ट होती है। नामधेय के प्रमुख वाक्य - 

  • उद्भिदा यजेत पशुकामः।
  • चित्रया यजेत पशुकामः।
  • अग्रिहोत्रं जुहोति।
  • श्येनेनाभिचरन् यजेत। 
  • नामधेय निवृत्तिपूर्वक विधेयार्थ का निश्चय कराता है। यथा गुणवाद अर्थवाद की भाँति 'उद्भिदा यजेत पशुकाम:' इस वाक्य में पशु-रूप फलके होता है और न ही लिये याग का विधान किया गया है। यह याग अप्राप्त है और इस वाक्यद्वारा विहित किया जा रहा है।
  • यदि इस वाक्यसे 'उद्भिद्' शब्द हटा दिया जाये तो 'यजेत पशुकामः' यह वाक्य होगा, जिसका अर्थ है 'यागेन पशुं भावयेत्', किंतु इससे याग सामान्यका से इस कथन का विरोध होगा जो कि अविधेय है, क्योंकि याग विशेष का नाम अभिहित किये बिना अनुष्ठान सम्भव नहीं है।
  • अतः 'उद्भिदा' पदद्वारा इस प्रयोजन की पूर्ति होती है, अतः इस प्रकार उभय पक्ष के 'उद्भिद' याग का नाम, हुआ तथा याग-विशेष का निर्देशक होने से विधेयार्थं परिच्छेद भी हुआ। नामधेयत्व चार कारणों से होता है-
  • मत्वर्थलक्षणाके भय से
  • वाक्य-भेदके भय से,
  • तत्प्रख्यशास्त्र से
  • तद्व्यपदेश से।

Question 36

भावनायां लिङ्गादिज्ञानं करणं भवति-

  1. AOption (a)

    भावनोत्पादकत्वेन

  2. BOption (b)

    शब्दभावनानिवर्तकत्वेन

  3. COption (c)

    आर्थीभावनोत्पादकत्वेन

  4. DOption (d)

    शब्दभावनाभाव्यनिर्वर्तकत्वेन

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Correct answer

Answer: (d)D.

शब्दभावनाभाव्यनिर्वर्तकत्वेन

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : भावना में लिंग आदि का ज्ञान करण में कैसे होता है?

भावना :

तस्य च करणत्वं न भावनोत्पादकत्वेन तत्पूर्वमपि तस्याः शब्दे सत्वात् किन्तु भावना ज्ञापकत्वेन शब्द भावनाभाव्यनिवर्तकत्वेन वा। 

  • अर्थात् साधन की आकांक्षा होने पर लिङ्ग आदि का ज्ञान साधन के रूप में अन्वित होता है।
  • उस लिङ्ग आदि के ज्ञान की करणता इसलिये नहीं है कि उससे भावना की उत्पत्ति होती हैं। बल्कि उसके पहले भी भावना उसमें रहती है।
  • अपितु लिङ्ग आदि का ज्ञान भावना व्यापक के रूप में अथवा शाब्दी भावना के साधक के रूप में करण में होता है।
  • इस प्रकार भावना मे लिङ्गादि का ज्ञान शब्दभावनाभाव्यनिर्वर्तकता से होता है।

अतः स्पष्ट है, "शब्दभावनाभाव्यनिर्वर्तकत्वेन" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 37

चक्षुषा घटरूपत्वग्रहणे कः सन्निकर्षः

  1. AOption (a)

    समवायः

  2. BOption (b)

    संयुक्तसमवायः

  3. COption (c)

    संयुक्तसमवेतसमवायः

  4. DOption (d)

    विशेषणविशेष्यभावः

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Correct answer

Answer: (c)C.

संयुक्तसमवेतसमवायः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : आंखोंं से घटत्व रूपग्रहण में क्या संनिकर्ष है?

प्रत्यक्ष प्रमाण दो प्रकार का है - 

  • निर्विकल्प
  • सविकल्प

प्रत्यक्ष ज्ञान का हेतु अर्थात् इंद्रिय और पदार्थोंं का संबंध छह प्रकार का है, इसका क्रम यह है - 

  • संयोग
  • संयुक्त समवाय
  • संयुक्तसमवेत समवाय
  • समवाय
  • समवेतसमवाय
  • विशेष्यविशेषभाव

इनमेंं संयुक्तसमवेतसमवाय ही संनिकर्ष कहलाता है। 

अतः स्पष्ट है, **"संयुक्तसमवेतसमवायः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 38

सत्कार्यवादस्य समर्थने हेतुर्नास्ति-

  1. AOption (a)

    असदकरणम्

  2. BOption (b)

    सर्वसम्भवाभावः

  3. COption (c)

    शक्तस्य शक्यकरणम्

  4. DOption (d)

    सर्वसम्भव-भावः

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Correct answer

Answer: (d)D.

सर्वसम्भव-भावः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : सत्कार्यवाद के समर्थन में कौन सा हेतु नहीं है?

सत्कार्यवाद :

सत्कार्यवाद, मुख्यतः सांख्य का सिद्धान्त है जिसके अनुसार कार्य (प्रभाव), अपनी उत्पत्ति के पूर्व कारण में विद्यमान (सत्) रहता है। इसके अनुसार सत् (जिसका अस्तित्व है वह) असत् (जिसका अस्तित्व नहीं है) से उत्पन्न नहीं हो सकता। 

असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसम्भवाभावात्।

शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत्कार्यम्*।।* (सांख्यकारिका, ०९)

  • अर्थ : असदकरण से (असदकारणात् = असत् + अकरणात् ) , उपादानग्रहण से ( उपादानग्रहणात् ), सर्वसम्भवाभाव से ( सर्वसम्भवाभावात् = सर्वसम्भव अभावात्) , शक्त के शक्यकरण से (शक्तस्य शक्यकरणात् ), कारणभाव से (कारणभावात्) कार्य ‘सत्’ है, अर्थात् कार्य अपने कारण में सदा विद्यमान है।
  • कार्य ‘सत्’ है अर्थात् कार्य अपने कारण में सदा विद्यमान है; क���योंकि उसके यह हेतु है - 
  • असत् को सत् से उत्पन्न नहीं किया जा सकता।
  • जिस कार्य की आवश्यकता होती है उसी कारण को ग्रहण करना पड़ता है।
  • हर कार्य हर जगह विद्यमान नहीं होता।
  • जो कारण जिस कार्य को उत्पन्न कर सकता है, वह उसी को उत्पन्न कर सकता है।
  • कारण जिस प्रकार का होता है, कार्य भी उसी प्रकार का होता है।​

परिभाषाओंं का स्पष्टीकरण :

असदकरण :

  • जिसका अस्तित्व नहीं है, उसे उत्पन्न नहीं किया जा सकता।

उपादानग्रहण :

  • कुछ उत्पन्न करने के लिये सही उपादान होना चाहिये।

सर्वसम्भवाभाव :

  • किसी वस्तु से सब कुछ उत्पन्न नहीं किया जा सकता।

शक्तस्य शक्यकरण :

  • कारण केवल वही कर सकता है जो उसकी कर सकने की सीमा में हो।

कारणभाव :

  • कार्य की प्रकृति, कारण जैसी होती है।

अतः स्पष्ट है, "सर्वसम्भव-भावः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 39

आर्हतदर्शने चतुर्विधबन्धेषु परिगणितो नास्ति-

  1. AOption (a)

    प्रकृतिबन्धः

  2. BOption (b)

    विषयबन्धः

  3. COption (c)

    स्थितिबन्धः

  4. DOption (d)

    प्रदेशबन्धः

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Correct answer

Answer: (b)B.

विषयबन्धः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : आर्हत दर्शन में चार प्रकार के बंधोंं में किसकी परिगणना नहीं है?

बंध :

प्रकृति बंध, स्थिति बंध, अनुभाग बंध और प्रदेश बंध इन भेदों से बंध चार प्रकार का है। इनमें से प्रकृति और प्रदेश बंध योग के निमित्त से होते हैं तथा स्थिति और अनुभाग बंध कषाय से होते हैं।

प्रकृति बन्ध - प्रकृति का अर्थ स्वभाव है, बंधे हुए कर्मों में अपने स्वभाव के अनुसार प्रकृति पड़ जाना प्रकृति बंध है जैसे ज्ञानावर्णी कर्म का प्रकृति बंध ज्ञान को न होने देने रूप।

स्थिति बंध - बंधा हुआ कर्म कितने समय तक अपना फल देगा यह समय सीमा निर्धारण स्थिति बन्ध है, जेसे यह कर्म एक वर्ष तक अपना फल देगा । 

प्रदेश बन्ध - बन्धे हुए कर्म स्कंध में प्रदेशों की स्कंध संख्या प्रदेश बंध पर निर्भर करती है, जैसे अमुख कर्म में संख्यात अथवा असंख्यात प्रदेश हैं।

अनुभाग बन्ध - बन्धे हुए कर्म में फल देने की शक्ति की होनाधिकता का निर्धारण अनुभाग बंध से होता है।

लक्षण-

चतुर्धा प्रकृतिस्थित्यनुभाग-प्रदेशभेदात्

  • बंध के प्रकृति, स्थिति, अनुभव व प्रदेश के भेद से चार प्रकार हैं।

अतः स्पष्ट है, **"विषयबन्धः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 40

पाणिनीयशिक्षायाम् अधमपाठकेषु को न परिगणितः?

  1. AOption (a)

    गीती

  2. BOption (b)

    लिखितपाठकः

  3. COption (c)

    पदानि विच्छिद्य पाठकः

  4. DOption (d)

    शीघ्री

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Correct answer

Answer: (c)C.

पदानि विच्छिद्य पाठकः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : पाणिनीय शिक्षा में अधम पाठकोंं में किसकी परिगणना नहीं की है?

अधम पाठक :

गीती शीघ्री शिरः कम्पी तथा लिखित पाठकः।

अनर्थज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः।।

  • गाकर पढना, शीघ्रता से पढना, पढते हुए सिर हिलाना, लिखा हुआ पढ जाना, अर्थ न जानकर पढना, और धीमा आवाज होना ये छ पाठक के दोष हैं।
  • पदों को अलग-अलग करके पढ़ना यह पाठक का दोष नहीं है।

​अतः स्पष्ट है, **"पदानि विच्छिद्य पाठकः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

उत्तम पाठक :

माधुर्यमक्षरव्यक्ति: पदच्छेदस्तु सुस्वरः |

धैर्यं लयसामर्थ्यं च षडेते पाठके गुणाः।।

  • मधुर वाणी में पढ़ना, अक्षरों को अलग-अलग करके पढ़ना, पदों को भी अलग-अलग करके पढ़ना, ठीक स्वर में पढ़ना, आराम से पढ़ना, लय पर काबू रखना, यह छह पाठक के गुण hai।

Question 41

अधोलिखितेषु केन्टुमवर्गे नास्ति

  1. AOption (a)

    जर्मनभाषा

  2. BOption (b)

    रूसीभाषा

  3. COption (c)

    फ्रेंचभाषा

  4. DOption (d)

    ग्रीकभाषा

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Correct answer

Answer: (b)B.

रूसीभाषा

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अधोलिखितोंं में केन्टुमवर्ग में यह भाषा नहीं है - 

भारोपीय भाषा परिवार

  • ​​भारत से लेकर प्रायः सारे यूरोप तक बोले जाने के कारण इस भाषा परिवार को भारोपीय परिवार कहते हैं।
  • इस भाषा परिवार की प्रमुख भाषाएँ संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, हिन्दी, बंगाली, फ़ारसी, ग्रीक, लेटिन, अंग्रेज़ी, रूसी, जर्मन, पुर्तग़ाली और इतालवी इत्यादि हैं।
  • मूल रूप की दृष्टि से यह परिवार श्लिष्ट योगात्मक रूप का है।
  • भारोपीय परिवार की विशेषताएँँ :
  • इस परिवार की सारी भाषाएँँ प्रारंभ में योगात्मक थी, पर बाद में एक दो छोड के बाकी सारी भाषाएँँ वियोगात्मक हो गई।
  • शब्द-रूप शब्द के अन्त में प्रत्यय द्वारा बनाये जाते है। इस परिवार में प्रत्ययोंं की संख्या सभी परिवार से अधिक है।
  • समास रचना की शक्ति यह इस परिवार की विशेषता है।
  • साथ ही प्रत्ययोंं को अपना स्वतंत्र अर्थ होना और बाद में प्रत्यय की अर्थपूर्णता का लोप होकर आधुनिक रूप शेष रहना, यह परिवर्तन इस भाषा परिवार में दिखाई देता है।
  • हिन्द यूरोपीय शाखाओं को मुख्यतः दो वर्गों में रखा जाता है :
  • केन्तुम वर्ग।
  • शतम्  वर्ग।

केन्टुम् वर्ग :

  • इस वर्ग की प्राचीन भाषाओं में आदि-हिन्द-यूरोपीय भाषा के व्यंजन वैसे ही परिरक्षित रहे हैं। जैसे - 
  • क्व, ग्व और घ्व
  • आदि-हिन्द-यूरोपीय भाषा के व्यंजनोंं में इस प्रकार परिवर्तन हुआ - 
  • क्य, ग्य और घ्य, यह व्यंजन क, ग और घ में विलीन हो गये।
  • इनमें इटैलिक, यूनानी, कोल्टिक और जर्मन, ग्रीक, फ्रेंच भाषा आती हैं।

शतम् वर्ग : 

  • इस वर्ग की प्राचीन भाषाओं में आदि-हिन्द-यूरोपीय भाषा के व्यंजन, क्य, ग्य और घ्य, स्पर्श-संघर्षी या संघर्षी व्यंजनों में बदल गये। जैसे - च, ज, स और श।
  • साथ ही साथ, आदि-हिन्द-यूरोपीय भाषा के व्यंजन, क्व, ग्व और घ्व, यह क, ग और घ इनमें विलय हो गये।
  • इनमें बाल्टिक, स्लाव, हिन्द ईरानी, अरमेनियाई और अल्बानियाई शाखा आती हैं। संस्कृत इसी वर्ग में आती है।
  • आर्मीनी भाषा भारोपीय भाषा परिवार के शतम् वर्ग में आती है।

 

अतः स्पष्ट है, रूसीभाषा  यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 42

अधोलिखितेषु खकारस्य बाह्यप्रयत्नविषयकम् उपयुक्ततमं विकल्पं चिनुत

  1. AOption (a)

    विवारः, श्वासः, अघोषः, अल्पप्राणः

  2. BOption (b)

    संवारः, नादः, घोषः, अल्पप्राणः

  3. COption (c)

    विवारः, श्वासः, अघोषः, महाप्राणः

  4. DOption (d)

    संवारः, नादः, घोषः, महाप्राणः

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Correct answer

Answer: (c)C.

विवारः, श्वासः, अघोषः, महाप्राणः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अधोलिखितोंं में खकार के बाह्य प्रयत्न विषयक उपयुक्त विकल्प चुनिए।

बाह्य प्रयत्न :

मुख से जब वर्ण बाहर निकलने लगते हैं, उस समय उच्चारण की जो चेष्टा होती है, उसे बाह्य प्रयत्न कहते हैं।

बाह्य प्रयत्न 11 प्रकार के होते हैं - 

    1. विवार 2. संवार, 3. श्वास, 4. नाद, 5. घोष, 6. अघोष, 7. अल्पप्राण, 8. महाप्राण, 9. उदात्त, 10. अनुदात्त, 11. स्वरित।

खकार का बाह्य प्रयत्न - 

  • खरो विवारा: श्वास अघोषश्च।
  • खर् (ख्, फ्, छ्, ठ् थ्, च्, ट्, त्, क्, प्, श्, ष्, स् ) प्रत्याहार के अंतर्गत आने वाले वर्णो का बाह्य प्रयत्न विवार-श्वास-अघोष-महाप्राण होगा।

अतः स्पष्ट है, विवारः, श्वासः, अघोषः, महाप्राणः यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 43

आकृतिमूलकवर्गीकरणे हिन्दीभाषा मन्यते

  1. AOption (a)

    प्रश्लिष्ट-बहिर्मुखी

  2. BOption (b)

    श्लिष्टबहिर्मुखी वियोगात्मिका

  3. COption (c)

    श्लिष्टबहिर्मुखी संयोगात्मिका

  4. DOption (d)

    श्लिष्टान्तर्मुखी वियोगात्मिका

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Correct answer

Answer: (b)B.

श्लिष्टबहिर्मुखी वियोगात्मिका

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : आकृतिमूलकवर्गीकरण में हिंदी भाषा क्या मानी जाती है?

भाषाओंं का आकृतिमूलक वर्गीकरण :

  • योगात्मक भाषा उसे कहते हैं, जिसमें हर शब्द अलग- अलग अपनी सत्ता रखता है, उसमे दूसरे शब्दों के कारण कोई विकार या परिवर्तन नहीं होता। प्रत्येक शब्द की अलग-अलग संबंधतत्व या अर्थतत्व को व्यक्त करने की, शक्ति होती है। और उन शब्दों का परस्पर संबंध केवल वाक्य में उनके स्थान से ज्ञात होता है।
  • अयोगात्मक भाषाओं का सर्वोत्तम उदाहरण चीनी भाषाओं में मिलता है। इनमें हर एक शब्द की अलग-अलग स्थिति रहती है, किसी के प्रभाव से दूसरे में परिवर्तन नहीं होता और उन शब्दों का परस्पर संबंध पदक्रम में जान पड़ता है। कोई शब्द संज्ञा है या क्रिया या विशेषण यह सब वाक्य में प्रयोग में आने से ही ज्ञात होता है, अन्यथा नहीं।
  • श्लिष्ट उन योगात्मक भाषाओं को कहते हैं, जिनमें संबंधतत्व को जोड़ने के कारण अर्थतत्व वाले भाग में भी कुछ विकार उत्पन्न हो जाता है। तथापि संबंधतत्व का ज्ञान अलग से होता है।
  • अश्लिष्ट भाषाएँँ प्रत्ययप्रधान होती हैंं। इन में संबंध बताने के लिये प्रकृति अर्थात् अर्थतत्व को प्रत्यय जोडना आवश्यक होता है।
  • इस आकृतिमूलक वर्गीकरण में हिंदी भाषा श्लिष्टबहिर्मुखी वियोगात्मिका मानी जाती है।

 

​अतः स्पष्ट है, **"श्लिष्टबहिर्मुखी वियोगात्मिका" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 44

अधोलिखितेषु अर्थविस्तारस्योदाहरणं नास्ति

  1. AOption (a)

    गवेषणा

  2. BOption (b)

    तैलम्

  3. COption (c)

    प्रवीणः

  4. DOption (d)

    श्राद्धः

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Correct answer

Answer: (d)D.

श्राद्धः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अधोलिखितोंं में अर्थविस्तार का उदाहरण नहीं है - 

अर्थविस्तार :

वे शब्द जो पहले सीमित अर्थ में प्रयोग होते हों, लेकिन बाद में उनके अर्थ में विस्तार देखने को मिलता है और उनका अर्थ व्यापक हो जाता है। इसे ही अर्थ विस्तार कहते हैं। अर्थविस्तार के उदाहरण - 

  • प्रवीण का अर्थ पहले केवल वीणा बजानेवाले के लिए प्रयुक्त होता था किंतु धीरे-धीरे इस शब्द का अर्थ विस्तार हुआ और बाद में चल कर किसी भी काम में निपुण व्यक्ति को प्रवीण कहा जाने लगा।
  • कुशल शब्द का अर्थ था 'कुश लाने वाला', लेकिन बाद में यह 'चतुर' का पर्याय बन गया।
  • गवेषणा’ शब्द 'गो +एषणा' से बना है, जिसका अर्थ है गाय की खोज । कालांतर में अर्थ-विस्तार होकर किसी भी खोज के लिए गवेषणा का प्रयोग किया जाने लगा।
  • तिल से निकले हुए द्रव पदार्थ को तैल कहा गया। परंतु इसके अर्थविस्तार में कौन से भी पदार्थ के तेल को तैल शब्द रूढ हुआ।

 

अतः स्पष्ट है, "श्राद्धः" यह अर्थविस्तार का उदाहरण नहीं है।

Question 45

अधोलिखितेषु का वैदिकभाषायाः विशेषता नास्ति

  1. AOption (a)

    सानुनासिकस्वराणां प्रयोगः

  2. BOption (b)

    'लेट्' लकारस्य प्रयोगः

  3. COption (c)

    तुमुन्नर्थे तवैप्रत्ययस्य प्रयोगः

  4. DOption (d)

    क्त्वार्थे तवेङ्प्रत्ययस्य प्रयोगः

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Correct answer

Answer: (d)D.

क्त्वार्थे तवेङ्प्रत्ययस्य प्रयोगः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अधोलिखितोंं में वैदिक भाषा की यह विशेषता नहीं है - 

वैदिकभाषा की विशेषताएँँ :

  • वैदिक भाषा में स्वरों के प्लुत उच्चारण भी होता है; जैसे, आसीत्, विन्दती इत्यादि। स्वरोंं का सानुनासिक प्रयोग होता है।
  • वैदिक भाषा में 'लृ' स्वर का प्रयोग प्रचुर मात्रा में हुआ है।
  • वैदिक भाषा में संगीतात्मक स्वराघात का बहुत महत्त्व है। इसमें तीन प्रकार के स्वर हैं- उदात्त, अनुदात्त और स्वरित। वैदिक मन्त्रों के उच्चारण में इनका ध्यान रखना अनिवार्य होता है। स्वर परिवर्तन से शब्दों के अर्थों में भी परिवर्तन हो जाता है। 'इन्द्रशत्रुः' इसका प्रसिद्ध उदाहरण है। भाषाविज्ञान की दृष्टि से वैदिक भाषा की स्वराघात प्रधानता का बहुत महत्त्व है।
  • वैदिक भाषा की व्यञ्जन ध्वनियों में ळ् और कह दो ऐसी ध्वनियां हैं, जो उसे अन्य भाषाओं से पृथक् करती हैं, जैसे 'इळा', 'अग्निमीळे'।
  • प्राचीन वैदिक में के स्थान पर प्रायः 'र' का व्यवहार मिलता है, जैसे- 'सलिल' के स्थान पर 'सरिर।
  • वैदिक भाषा में सन्धि-नियमों में पर्याप्त शिथिलता दृष्टिगोचर होती है। अनेक बार सन्धि- योग्य स्थलों पर भी सन्धि नहीं होती और दो स्वर सार्थ साथ प्रयुक्त हो जाते हैं, जैसे 'तितङ' (अ. उ) 'गोओपशा' (ओ, ओ)
  • वैदिक भाषा में शब्द रूपों में पर्याप्त अनेकरूपता मिलती है। उदाहरण के लिए प्रथमा विभक्ति, द्विवचन में, 'देवा' और 'देओं, प्रथमा विभक्ति बहुवचन में 'जना' और 'जनासः तृतीया विभक्ति बहुवचन में 'देव' और 'देवेभि:' दो-दो रूप मिलते हैं। यह विविधता कुछ अन्य रूपों में भी मिलती है।
  • यही विविधता धातुरूपों में भी उपलब्ध होती है। एक ही 'कृ' धातु के लट्लकार, प्रथम पुरुष में 'कृणोति', 'कृणुते', 'करोति', में-'कृणोति', 'कुरुते, आदि रूप मिलते हैं।
  • इसमें लेट् लकार का प्रयोग मिलता है।
  • धातुओं से, एक ही अर्थ में अनेक प्रत्यय लगते हैं। जैसे एक ही 'तुमन्' प्रत्यय के अर्थ में 'तुमुन्' 'से', 'सेन्, 'असे', 'असेन्' 'कसे', 'कसेन्', 'अध्य', 'अध्यैन, कथ्य', 'कध्यैन्', 'शध्यै', 'शध्यैन्', 'तवै', 'तवैङ्' और 'त्वेन्'-ये 16 प्रत्यय मिलते हैं। यही विविधता आदि अन्य अनेक प्रत्ययों में भी है।

 

अतः स्पष्ट है, "क्त्वार्थे तवेङ्प्रत्ययस्य प्रयोगः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 46

पाणिनीयशिक्षानुसारं कस्य प्राणिनः ध्वनिः एकमात्रिकवर्णतुल्यः भवति

  1. AOption (a)

    नकुलस्य

  2. BOption (b)

    शिखिनः

  3. COption (c)

    वायसस्य

  4. DOption (d)

    चाषस्य

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Correct answer

Answer: (d)D.

चाषस्य

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : पाणिनीय शिक्षा के अनुसार किस प्राणि का ध्वनि एक मात्रिक वर्ण के तुल्य होता है?

स्पष्टीकरण : 

चाषस्तु वदते मात्रां द्विमात्रंं त्वेव वायसः। 

शिखी रौति त्रिमात्रंं तु नकुलस्त्वर्धमात्रकम्। । (पाणिनीय शिक्षा, ४९)

  • नीलकंठ एक मात्रा का उच्चारण करता है, कौआ दो मात्राओंं का करता है, मोर तीन मात्राओंं में केकारव करता है और नेवला आधी मात्रा का उच्चारण करता है।

अतः स्पष्ट है, "चाषस्य" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 47

अधोलिखितेषु वैदिकभाषादृशा साधुप्रयोगो मन्यते

  1. AOption (a)

    देवेभिः

  2. BOption (b)

    विश्वा

  3. COption (c)

    एमसि

  4. DOption (d)

    उक्ता: सर्वेऽपि साधवः

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Correct answer

Answer: (d)D.

उक्ता: सर्वेऽपि साधवः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अधोलिखितोंं में वैदिक भाषा के अनुसार कौन से प्रयोग साधु प्रयोग हैंं?

स्पष्टीकरण :

वैदिक भाषा के अनुसार उपरोक्त सारे प्रयोग साधु अर्थात् उचित है। इन सारे शब्दोंं का प्रयोग वैदिक भाषा में मिलता है। उदाहरणार्थ - 

  • देवेभिः - 
  • ​ऐभिरग्ने दुवो गिरो विश्वेभिः सोमपीतये। देवेभिर्याहि यक्षि च।।
  • अग्निर्होता कविक्रतु सत्यश्चित्रश्रवस्तमः। देवो देवेभिरागमत्।।
  • एमसि -
  • उप त्वाग्ने दिवेदिवे दोषावस्तर्धिया वयम्। नमो भरन्त एमसि।।
  • विश्वा -
  • य इमा विश्वा भुवनानि जुह्वदृषिर्होता न्यसीदत्पिता नः। स आशिषा द्रविणमिच्छमानः प्रथमच्छदवराँ आ विवेश।।

 

​अतः स्पष्ट है, "उक्ता: सर्वेऽपि साधवः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 48

'दीर्घज्जसि च' इत्यनेन भवति

  1. AOption (a)

    पूर्वसवर्णदीर्घः

  2. BOption (b)

    पूर्वसवर्णदीर्घस्य निषेधः

  3. COption (c)

    वृद्धिः एकादेशः

  4. DOption (d)

    गुणादेशस्याभावः

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Correct answer

Answer: (b)B.

पूर्वसवर्णदीर्घस्य निषेधः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- ‘दीर्घाज्जसि च’ इससे होता है- 

**स्पष्टीकारण- ‘**दीर्घाज्जसि च’ सूत्र से पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध होता है। 

  • सूत्र- ‘दीर्घाज्जसि च’ (6/1/105)
  • सूत्र प्रकार- विधि सूत्र
  • अनुवृत्ति- दीर्घात् इचि जसि च प्रथमयोः पूर्वसवर्णः न ।
  • सूत्रार्थ- संहिता के विषय में दीर्घवर्ण से उत्तर इच् वर्ण या जस् प्रत्यय परे रहते पूर्वसवर्ण दीर्घ नहीं होता है।
  • उदाहरण- कुमारी + जस् (अस्) (यहाँ यण् प्राप्त हुआ)
  • ‘प्रथमयोः पूर्वसवर्णः’ ने यण् का बाध किया, परन्तु ‘दीर्घाज्जसि च’ सूत्र के द्वारा पूर्वसवर्ण दीर्घ का निषेध होकर कुमार्यः बना।
  • प्रथमयोः पूर्वसवर्णः - ‘प्रथमयोः पूर्वसवर्णः’ पूर्णसवर्णदीर्घ विधायक विधिसूत्र है। अक् प्रत्याहार से प्रथमा और द्वितीया विभक्ति सम्बन्धी अच् के परे रहने पर पूर्व और पर के स्थान पर पूर्णसवर्ण दीर्घ एकादेश होता है।

Question 49

'प्र + एजते = प्रेजते' इत्यत्र एकारो भवति-

  1. AOption (a)

    'आद्गुणः' सूत्रेण गुणत्वात्

  2. BOption (b)

    'वृद्धिरेचि' सूत्रेण वृद्धित्वात्

  3. COption (c)

    'एङि पररूपम्' सूत्रेण पररूपत्वात्

  4. DOption (d)

    'एङः पदान्तादति' सूत्रेण पूर्वरूपत्वात्

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Correct answer

Answer: (c)C.

'एङि पररूपम्' सूत्रेण पररूपत्वात्

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- 'प्र+एजते’ = प्रेजते' यहाँ एकार होता है-

स्पष्टीकारण- 'प्र + एजते’ = प्रेजते' यहाँ एङि पररूपम्' सूत्रे से प्राप्त पररूप से एकार होता है। 

  • सूत्र- ‘एङि पररूपम्’ (6/1/94)
  • सूत्र प्रकार- विधि सूत्र
  • वृत्ति- आत् उपसर्गात् एङि धातौ पूर्वपरयोः एकः पररूपम्
  • सूत्रार्थ- संहिता के विषय में अवर्णान्त उपसर्ग से एङादि धातु के परे रहने पर पूर्व और पर के स्थान पर पररूप एकादेश होता है।
  • उदाहरण- प्र + एजते (यहाँ गुण प्राप्त हुआ)
  • परन्तु उसे बाधकर वृद्धिरेचि सूत्र से वृद्धि प्राप्त हुई, उसे भी बाधकर ‘एङि पररूपम्’ सूत्र से अवर्णान्त उपसर्ग ‘प्र’ से एङादि धातु ‘ऐजते’ के परे रहने पर पूर्व और पर के स्थान पर पररूप ‘ए’ एकादेश होकर प्रेजते रूप सिद्ध हुआ है।

Question 50

'कुरुचरः' इत्यत्र 'चरेष्टः' सूत्रेण 'ट' प्रत्ययो विधीयते-

  1. AOption (a)

    अधिकरणे उपपदे

  2. BOption (b)

    कर्मण्युपपदे

  3. COption (c)

    सुबन्ते उपपदे

  4. DOption (d)

    उपसर्गे उपपदे

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Correct answer

Answer: (a)A.

अधिकरणे उपपदे

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- 'कुरुचरः' यहाँ 'चरेष्ट:' सूत्र से 'ट' प्रत्यय का विधान होता है-

स्पष्टीकारण- ‘कुरुचरः' यहाँ 'चरेष्ट:' सूत्र से 'ट' प्रत्यय का विधान अधिकरण उपपद से होता है-

  • सूत्र- ‘चरेष्ट:’ (3/2/16)
  • सूत्र प्रकार- विधि सूत्र
  • वृत्ति- अधिकरणे उपपदे । कुरुचरः । कुरुचरी।।
  • सूत्रार्थ- अधिकरण के उपपद होने पर ‘चर्’ धातु से ‘ट’ प्रत्यय होता है।
  • उदाहरण- कुरुचरः, कुरुषु यह अधिकरण उपपद में हैं। अतः चर् धातु से ‘ट’ प्रत्यय होकर अनुबन्ध लोप।
  • ‘उपपदमतिङ्’ से उपपद समास होकर सुप् विभक्ति का ‘सुपो धातुप्रातिपदिकयोः’ से लुक् होकर ‘कुरुचर्+ अ’ बना।
  • वर्णसम्मेलन होने पर कुरुचर बना।
  • सु विभक्ति एवं उसका रुत्व और विसर्ग करके ‘कुरुचरः’ सिद्ध हुआ।

Question 51

शारिपुत्रप्रकरणमस्ति

  1. AOption (a)

    माघप्रणीतम्

  2. BOption (b)

    श्रीहर्षप्रणीतम्

  3. COption (c)

    अश्वघोषप्रणीतम्

  4. DOption (d)

    बिल्हणप्रणीतम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

अश्वघोषप्रणीतम्

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- शारिपुत्रप्रकरण है 

स्पष्टीकरण- शारिपुत्रप्रकरण अश्वघोष प्रणीत है। 

अश्वघोष का व्यक्तित्व- 

  • अश्वघोष का नाम श्रेष्ठ प्राची��� कवियों में आता है। कुछ विद्वान इन्हें कालीदास से पूर्ववर्ती बताते है।
  • ये बौद्ध धर्मप्रचारक तथा दार्शनिक थे।
  • इनकी माता का नाम सुवर्णाक्षी था।
  • इनका निवास स्थान साकेत(अयोध्या) था।

अश्वघोष का रचनायें- 

  1. बुद्धचरितम्- यह अश्वघोष कृत 18 सर्गों का महाकाव्य है। यह पूरा ग्रन्थ संस्कृत में उपलब्ध नहीं है। संस्कृत में प्रथम सर्ग के आरंभिक कुछ श्लोक (सप्तम श्लोक तक) तथा चौदहवें सर्ग के 32 वें श्लोक से ग्रन्थ के अन्त तक का भाग नहीं मिलता। चीनी और तिब्बती भाषा में पूरे महाकाव्य का अनुवाद सुरक्षित है।
  2. सौन्दरनन्द- यह अश्वघोष रचित पूर्णतः संस्कृत भाषा में उपलब्ध महाकाव्य है। इसमें 18 सर्ग हैं जिनमें बुद्ध द्वारा अपने सौतेले भाई नन्द को उसकी पत्नी सुन्दरी के प्रेमपाश से मुक्त करके विलासमय जीवन से धर्म में दीक्षित किये जाने का वर्णन है। महाकाव्य के उत्तरार्ध प्रायः दर्शन के विचारों से भरा है जिसमें अश्वघोष की दर्शनिकता और कवित्व के युग्पत दर्शन होते हैं। महाकाव्य शान्तरस- प्रधान है।
  3. शारीपुत्रप्रकरण- नौ अङ्को का रूपक जो अंशतः प्राप्त है।
  4. राष्ट्रपालनाटक- यह ग्रन्थ केवल चीनी भाषा में अनुवाद मात्र में सुरक्षित गेय नाटक है।

Question 52

'अल्पक्लेशं मरणं दारिद्र्यमनन्तकं दुःखमिति' केनोक्तम्?

  1. AOption (a)

    बाणभट्टेन

  2. BOption (b)

    माघेन

  3. COption (c)

    शूद्रकेण

  4. DOption (d)

    भारविणा

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Correct answer

Answer: (c)C.

शूद्रकेण

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- 'अल्पक्लेशं मरणं दारिद्र्यमनन्तकं दुःखम्’ यह किसके द्वारा कहा गया है?

स्पष्टीकारण-  'अल्पक्लेशं मरणं दारिद्र्यमनन्तकं दुःखम्’ यह शुद्रक के द्वारा कहा गया है।

शुद्रक- 

  • ये संस्कृत के श्रेष्ठ नाटककारों में से एक है। ये दक्षिण भारतीय कवि है। इनका काल 100 ई॰ से 200 ई॰ के बीच माना जाता है।
  • मृच्छकटिक की प्रस्तावना ने तीन श्लोकों में शुद्रक का वर्णन प्राप्त होता है कि वे शारीरिक सौन्दर्य से विभूषित, ब्राह्मणों में प्रमुख, अगाध शक्तिसम्पन्न एवं कवि थे। ऋग्वेद, सामवेद, गणित, संगीत- नृत्यादि कला और गजशास्त्र में निपुण शूद्रक ने शिव के प्रसाद से अज्ञानान्धकार से रहित दिव्य दृष्टि पाकर, पुत्र को राज्य देकर अश्वमेध- यज्ञ करके, एक सौ वर्ष और दस दिन लम्बी आयु पाकर अग्नि में प्रवेश किया था- लब्ध्वा चायुः शताब्दं दशदिनसाहितं शूद्रकोअग्निं प्रविष्टः। वे  महान् योद्धा, तपस्वी और वेदज्ञों में श्रेष्ठ भी थे- समरव्यसनी प्रमादशून्यः, ककुदं वेदविदां । परवारणबाहुयुद्धलुब्धः क्षितिपालः किल शूद्रको बभूव॥
  • उनकी एक मात्र कृति मृच्छकटिक है।

​मृच्छकटिक- 

  • यह संस्कृत का एक श्रेष्ठ सामाजिक रूपक है।
  • यह अपनी प्रकृति में प्रकरण है। इसमें 10 अंक है।
  • इसमें चारुदत्त और वसंतसेना की प्रणय कथा वर्णित है।
  • इसके प्रथम अंक में नायक चारुदत्त अपनी दरिद्रता का वर्णन करता है- द्रारिद्रयान्मरणाद्वा मरणं मम रोचते न दारिद्रयम्। अल्पक्लेशं मरणं, दारिद्रयमनन्तकं दुःखम् ॥ अर्थात निर्धनता और मृत्यु में से मृत्यु मुझे अच्छी लगती है, निर्धनता नहीं मृत्यु में थोड़ा कष्ट है, किन्तु निर्धनता कभी न समाप्त होने वाला दुःख है।

Question 53

'न वञ्चनीयाः प्रभवोऽनुजीविभिः इति केनोक्तम्?

  1. AOption (a)

    विशाखदत्तेन

  2. BOption (b)

    दण्डिना

  3. COption (c)

    भासेन

  4. DOption (d)

    भारविणा

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Correct answer

Answer: (d)D.

भारविणा

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- न वञ्चनीयाः प्रभवोऽनुजीविभिः यह किसके द्वारा कहा गया है?

स्पष्टीकारण- न वञ्चनीयाः प्रभवोऽनुजीविभिः यह भारवि के द्वारा कहा गया है।

भारवि- 

  • भारवि संस्कृत के श्रेष्ठ महाकाव्यकारों में गिने जाते है।
  • इनका काल 550-620 ई॰ के बीच का माना जाता है।
  • इनका स्थान अचलपुर माना जाता है।
  • इनका वास्तविक नाम दामोदर था और भारवि इनकी उपाधि थी।
  • भारवेरर्थगौरवम्, भारवेरिव भारवेः, प्रकृतिमधुरा भारविगिरः तथा आतपत्र आदि भारवि की अन्य उपाधियाँ है।
  • इनकी एक मात्र रचना किरातर्जुनीय है।

​किरातर्जुनीय- 

  • भारवि की प्रमुख रचना किरातार्जुनीय है।
  • इसकी कथा महाभारत के वन पर्व से ली गयी है।
  • किरातार्जुनीय 18 सर्गों का एक महाकाव्य है।
  • प्रथम सर्ग में युधिष्ठिर द्वारा भेजा गया वनेचर दुर्योधन के राजकार्यों को जानकर द्वैतवन में आया है और युधिष्ठिर से कहता है- क्रियासु युक्तैर्नृप। चारचक्षुषो न वञ्चनीयाः प्रभवोअनुजीविभिः। अतोअर्हसि क्षन्तुमसाधु साधु वा हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः॥ अर्थात हे राजन, किसी कार्य को करने के लिए नियुक्त किए गए सेवकों के द्वारा स्वामी (झूठी तथा प्रिय बातें बताकर) नहीं ठगे जाने चाहिये। इसीलिए मैं अप्रिय अथवा प्रिय बातें करू, उन्हें आप क्षमा करेंगे, क्योंकि मधुर तथा परिणाम में कल्याण देने वाली वाणी दुर्लभ होती है।

अन्य प्रमुख सूक्तियाँ-

  • हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः (मधुर तथा परिणाम में कल्याण देने वाली दुर्लभ होती है।)
  • न हि प्रियं प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः (कल्याण चाहने वाले लोग मिथ्याभूत मधुर वचन बोलने की इच्छा नहीं करते हैं।)
  • वरं विरोधोअपि समं महात्मभिः (महापुरुषों के साथ किया गया विरोधभाव भी दुष्टों के संसर्ग की अपेक्षा अच्छा है।)
  • अहो दुरन्ता बलवद्विरोधिता (बलवान् के साथ किया गया वैर विरोध अनर्थपर्यवसायी होता है।)  ​

Question 54

कस्य वचः नारिकेलफलसम्मितं कल्पितम्?

  1. AOption (a)

    विशाखदत्तस्य

  2. BOption (b)

    भारवेः

  3. COption (c)

    दण्डिनः

  4. DOption (d)

    बाणभट्टस्य

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Correct answer

Answer: (b)B.

भारवेः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- किसका वचन नारियल के फल के समान है?

स्पष्टीकारण- भारवि का वचन नारियल के फल के समान है। 

भारवि- 

  • भारवि संस्कृत के श्रेष्ठ महाकाव्यकारों में गिने जाते है।
  • इनका काल 550-620 ई॰ के बीच का माना जाता है।
  • इनका स्थान अचलपुर माना जाता है।
  • इनका वास्तविक नाम दामोदर था और भारवि इनकी उपाधि थी।
  • इनके पिता का नाम श्रीधर था।
  • इनकी माता का नाम सुशीला था।
  • इनकी पत्नी का नाम रसिका था।
  • इनके पुत्र का नाम मनोरथ था।
  • भारवेरर्थगौरवम्, भारवेरिव भारवेः, प्रकृतिमधुरा भारविगिरः तथा आतपत्र आदि भारवि की अन्य उपाधियाँ है।
  • ये काव्य में चित्रालंकार के प्रयोग लिए प्रसिद्ध है।
  • इनकी एक मात्र रचना किरातर्जुनीय है।

​किरातर्जुनीय- 

  • भारवि की प्रमुख रचना किरातार्जुनीय है।
  • किरातार्जुनीय 18 सर्गों का एक महाकाव्य है।
  • इसकी कथा महाभारत के वन पर्व से ली गयी है।
  • इसमें अर्जुन और किरातवेशधारी शिव के युद्ध का वर्णन है।
  • यह शिशुपालवध और नैषधकाव्य के साथ बृहत्त्रयी के अन्तर्गत परिगणित होता है।
  • किरातर्जुनीयम् पर मल्लिनाथ कृत ‘घण्टापथ’ प्रसिद्ध टीका है। जिसमें  मल्लिनाथ ने भारवि के विषय में कहा है- नारिकेलफलसम्मितं वचो भारवेः। ​

Question 55

अधोलिखितेषु उपन्यासकारं चिनुत

  1. AOption (a)

    बाणभट्टः

  2. BOption (b)

    बिल्हणः

  3. COption (c)

    दण्डी

  4. DOption (d)

    अम्बिकादत्तव्यासः

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Correct answer

Answer: (d)D.

अम्बिकादत्तव्यासः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- निम्नलिखित में उपन्यासकार को चुनें

स्पष्टीकारण- अम्बिकादत्त व्यास संस्कृत साहित्य के प्रथम उपन्यासकार है। 

अम्बिकादत्त व्यास- ​

  • अम्बिकादत्त व्यास उपन्यासकारों तथा आधुनिक साहित्यकारों में प्रमुख है।
  • इनका काल 1848 ई॰ से 1900 ई॰ के बीच का माना जाता है।
  • ये संस्कृत के साथ-साथ हिंदी भाषा के भी प्रसिद्ध कवि माने जाते है।
  • इनकी निम्न रचनायें है- शिवराजविजय, गद्यकाव्यमीमांसा, गणेशशतक, शिवविवाह, कथाकुसुम आदि।
  • इन्हें सर्वाधिक प्रसिद्धि शिवाजी के जीवन- वृत्त पर आश्रित ऐतिहासिक संस्कृत उपन्यास ‘शिवराजविजय’ से प्राप्त हुआ।
  • शिवराजविजय का विभाजन 3 विराम तथा 12 नि:श्वासों में हुआ है।
  • एक घड़ी (24 मिनट) 100 श्लोकों की रचना करने से व्यास जी को ‘घटिकाशतक’ की उपाधि दी गयी थी।
  • 100 प्रश्नों को एक साथ ही सुनकर उन सभी प्रश्नों का उत्तर उसी क्रम में देने के की अद्भुत क्षमता होने के कारण उन्हें ‘शतावधान’ की उपाधि दी गयी थी।

Question 56

'न हि रसाट्टते कश्चिदर्थः प्रवर्तते' इति केनोक्तम्?

  1. AOption (a)

    भामहेन

  2. BOption (b)

    भरतेन

  3. COption (c)

    विश्वनाथेन

  4. DOption (d)

    मम्मटेन

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Correct answer

Answer: (b)B.

भरतेन

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- 'न हि रसाट्टते कश्चिदर्थः प्रवर्तते' यह किसके द्वारा कहा गया है?

स्पष्टीकारण- 'न हि रसाट्टते कश्चिदर्थः प्रवर्तते' यह आचार्य भरत द्वारा कहा गया है। इसका अर्थ है- रस के विना (काव्य में) कोई भी अर्थ प्रवर्तित नहीं होता है। 

आचार्य भरत- 

  • भरतमुनि रस सम्प्रदाय के प्रवर्तक हैं।
  • यह सबसे प्राचीन काव्यशास्त्रीय सम्प्रदाय है।
  • इनके ग्रन्थ का नाम नाट्यशास्त्र है।
  • इस ग्रन्थ में 36 अध्याय है।
  • इस ग्रन्थ पर अभिनवगुप्त की ‘अभिनवभारती’ नामक प्रसिद्ध टीका है।
  • रस के विषय में सर्वप्रथम विवेचन ‘नाट्यशास्त्र’ में मिलता है।
  • जिन्होंने नाट्यरस का ही मुख्यतः विश्लेषण किया और उस विवरण को अवांतर आचार्यों ने काव्यरस के लिए भी प्रामाणिक माना।

अतिरिक्त जानकारी

काव्यशास्त्र के अन्य पाँच सम्प्रदाय तथा उनके आचार्य निम्नलिखित है- 

सम्प्रदायप्रवर्तकग्रन्थ
अलंकारभामहकाव्यालंकार
रीतिवामनकाव्यालंकारसूत्र
ध्वनिआनंदवर्धनध्वन्यालोक
वक्रोक्तिकुंतकवक्रोक्तिजीवितम्
औचित्यक्षेमेन्द्रऔचित्यविचारचर्चा

Question 57

स्वेच्छाकेसरिणः स्वच्छस्वच्छायायासितेन्दवः।

त्रायन्तां वो मधुरिपोः प्रपन्नार्तिच्छिदो नखाः।।

इत्यस्मिन् मंगलाचरणे ग्रन्थकारेण इष्टदेवस्य कस्य रसाभिव्यञ्जकस्वरूपस्य स्मरणं कृतम्

  1. AOption (a)

    श्रृंगाररसाभिव्यञ्जकस्य

  2. BOption (b)

    वीररसाभिव्यञ्जकस्य

  3. COption (c)

    शान्तरसाभिव्यञ्जकस्य

  4. DOption (d)

    करूणरसाभिव्यञ्जकस्य

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Correct answer

Answer: (b)B.

वीररसाभिव्यञ्जकस्य

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- इस मंगलाचरण में ग्रंथकार द्वारा इष्टदेव की किस रस अभिव्यंजक स्वरूप का स्मरण किया गया है?

स्पष्टीकरण-

  • यह मंगलाचरण ध्वन्यालोक नामक ग्रंथ का है।
  • इस मंगलाचरण में ग्रंथकार द्वारा इष्टदेव की वीर रस अभिव्यंजक स्वरूप का स्मरण किया गया है।
  • ध्वन्यालोक आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा विरचित है एक काव्यशास्त्रीय ग्रंथ है। आचार्य आनन्दवर्धन ध्वनि सम्प्रदाय के प्रवर्तक है।
  • ध्वन्यालोक का विभाजन 4 उद्योतों में हुआ है।

इसका मंगलाचरण निम्नलिखित है- 

स्वेच्छाकेसरिणः स्वच्छस्वच्छायायासितेन्दवः। 

त्रायन्तां वो मधुरिपोः प्रपन्नार्त��च्छिदो नखाः।। 

अर्थ- अपनी इच्छा से ही सिंह का रूप धारण करने वाले मधु नामक असुर के शत्रु, भगवान विष्णु के, अपनी निर्मल कान्ति से चन्द्र्मा को पीड़ित (तिरस्कृत) करने वाले और शरण में आने वाले के कष्टों को काट देने वाले, नख तुम सबकी रक्षा करें।

इस मंगलाचरण में कष्टों को काट देने वाले विष्णु के नरसिंह अवतार के नखों का वर्णन है जो वीर रस के अभिव्यंजक है। ​

Question 58

कुन्तकानुसारम् अधस्तनेषु सुकुमारमार्गस्य प्रथमो गुणः वर्तते

  1. AOption (a)

    माधुर्यम्

  2. BOption (b)

    सौन्दर्यम्

  3. COption (c)

    स्वाभाविकम्

  4. DOption (d)

    लावण्यम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

माधुर्यम्

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- कुन्तक के अनुसार निम्नलिखित में से सुकुमार मार्ग का प्रथम गुण है-

स्पष्टीकरण- कुन्तक के अनुसार निम्नलिखित में से सुकुमार मार्ग का प्रथम गुण है- माधुर्यम्।

आचार्य कुन्तक-

  • आचार्य कुन्तक काव्यशास्त्र के वक्रोक्ति मत के संस्थापक है।
  • इनके ग्रंथ का नाम वक्रोक्तिजीवित है। यह ग्रंथ चार उन्मेषों में विभाजित है।
  • कुंतक कश्मीर निवासी थे। इनकी उपाधि राजनक है। ये शैव मत के अनुयायी थे।
  • इनका काल 11 वी शताब्दी माना जाता है।

इन्होंने अपने ग्रंथ में तीन कवि मार्ग का वर्णन किया है-

  1. सुकुमार मार्ग- जो कवि काव्य प्रणयन में सरल मार्ग का प्रयोग करते है, वे सुकुमार मार्ग के कवि कहलाते है। उदाहरण- कालिदास।
  2. विचित्र मार्ग- जो कवि काव्य प्रणयन में क्लिष्ट मार्ग का प्रयोग करते है, वे विचित्र मार्ग के कवि कहलाते है। उदाहरण- सुबंधु।
  3. मध्यम मार्ग- जो कवि काव्य प्रणयन में सरल व क्लिष्ट से भिन्न मध्य मार्ग का प्रयोग करते है, वे मध्यम मार्ग के कवि कहलाते है। उदाहरण- बाणभट्ट।

आचार्य कुंतक सुकुमार मार्ग के निम्न गुण मानते है-

  1. माधुर्य
  2. प्रसाद
  3. लावण्य
  4. अभिजात्य

 

अतः माधुर्य सुकुमार मार्ग का प्रथम गुण है।

Question 59

काव्यप्रकाशस्य कस्मिन्नुल्लासे व्यञ्जनायाः स्थापना अभवत्

  1. AOption (a)

    सप्तमोल्लासे

  2. BOption (b)

    अष्टमोल्लासे

  3. COption (c)

    पञ्चमोल्लासे

  4. DOption (d)

    प्रथमोल्लासे

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Correct answer

Answer: (c)C.

पञ्चमोल्लासे

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- काव्यप्रका�� के किस उल्लास में व्यञ्जना की स्थापना हुई है?

स्पष्टीकरण- काव्यप्रकाश के पाँचवे उल्लास में व्यञ्जना की स्थापना है।

काव्यप्रकाश- 

  • काव्यप्रकाश आचार्य मम्मट द्वारा विरचित है एक काव्यशास्त्रीय ग्रंथ है।
  • इसका विभाजन 10 उल्लासों में हुआ है।
  • आचार्य मम्मट ने काव्य के तीन भेद माने हैं- ध्वनि काव्य (उत्तम काव्य), गुणीभूतव्यंग्य काव्य (मध्यम काव्य), अवर (चित्र) काव्य (अधम काव्य)।
  • आचार्य मम्मट ने काव्यप्रकाश के पाँचवें उल्लास में गुणीभूतव्यंग्य काव्य की चर्चा की है।

​काव्यप्रकाश के 10 उल्लासों के विषय- 

  1. प्रथम- काव्यस्वरूप
  2. द्वितीय- शब्दार्थस्वरूप
  3. तृतीय- अर्थव्यंजकता
  4. चतुर्थ- ध्वनि काव्य
  5. पंचम- गुणीभूत काव्य
  6. षष्ठ- शब्दार्थ चित्र
  7. सप्तम- काव्य दोष
  8. अष्टम- गुण-अलंकार
  9. नवम- शब्दालंकार
  10. दशम- अर्थालंकार

Question 60

विश्वनाथकविराजेन प्रतिपादितं काव्यस्वरूपं किम्?

  1. AOption (a)

    रीतिरात्मा काव्यस्य

  2. BOption (b)

    वाक्यं रसात्मकं काव्यम्

  3. COption (c)

    रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दो काव्यम्

  4. DOption (d)

    काव्यस्यात्मा ध्वनिः

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Correct answer

Answer: (b)B.

वाक्यं रसात्मकं काव्यम्

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- विश्वनाथ कविराज द्वारा प्रतिपादित काव्य का स्वरूप क्या है?

स्पष्टीकरण- विश्वनाथ कविराज द्वारा प्रतिपादित काव्य का स्वरूप है- वाक्यं रसात्मकं काव्यम्।

आचार्य विश्वनाथ-

  • आचार्य विश्वनाथ संस्कृत काव्यशास्त्र के श्रेष्ठ आचार्य है। ये रस सम्प्रदाय के आचार्य है।
  • इनके ग्रंथ का नाम साहित्यदर्पण है। इसका विभाजन 10 परिच्छेदों में हुआ है।
  • इन्होंने अपने ग्रंथ के प्रथम परिच्छेद में कहा है की रस से युक्त वाक्य को ही काव्य कहे जाते है- वाक्यं रसात्मकं काव्यम्।

Additional Informationअन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण- 

  1. ​रीतिरात्मा काव्यस्य- यह उक्ति आचार्य वामन की है। इनके ग्रंथ का नाम ‘काव्यालंकारसूत्र’ है। इसके अनुसार रीति ही काव्य की आत्मा है।
  2. रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दो काव्यम्- यह उक्ति आचार्य जगन्नाथ की है। इनके ग्रंथ का नाम ‘रसगंगाधर’ है। इसके अनुसार रमणीय अर्थ को प्रतिपादित करने वाले शब्द ही काव्य है।
  3. काव्यस्यात्मा ध्वनिः- यह उक्ति आचार्य आनन्दवर्धन की है। इनके ग्रंथ का नाम ‘ध्वन्यालोक’ है। इसके अनुसार ध्वनि ही काव्य की आत्मा है।

Question 61

'यो जात एव प्रथमो मनस्वान् देवो देवान् क्रतुना पर्यभूषत्' मन्त्रांशोऽयं कस्य सूक्तस्य विद्यते?

  1. AOption (a)

    सूर्यसूक्तस्य

  2. BOption (b)

    वरुणसूक्तस्य

  3. COption (c)

    अग्निसूक्तस्य

  4. DOption (d)

    इन्द्रसूक्तस्य

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Correct answer

Answer: (d)D.

इन्द्रसूक्तस्य

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- 'यो जात एव प्रथमो मनस्वान् देवो देवान् क्रतुना पर्यभूषत्' यह मंत्रांश किस सूक्त का है?

स्पष्टीकरण- ‘यो जात एव प्रथमो मनस्वान् देवो देवान् क्रतुना पर्यभूषत्' यह मंत्रांश इन्द्र सूक्त का है।

ऋग्वेद में इन्द्र सर्वाधिक प्रमुख देवता है। सम्पूर्ण ऋग्वेद में प्रायः 250 सूक्तों में इनकी प्रशंसा की गयी है। इसके अतिरिक्त, 50 सूक्तों में अन्य देवताओं के साथ इनकी स्तुति की गई। वैदिक ग्रन्थों में इन्द्र के मानवीय स्वरूप का वर्णन प्राप्त होता है। इनका प्रधान अस्त्र वज्र है, जिसके कारण ये वज्रबाहु कहे जाते है। यास्काचार्य ने इन्द्र शब्द निम्न निरुक्तियाँ दी हैं - 

  1. इन्द्र: इरां दृणातीति वा। अर्थात् इस इरा अन्न का विदारण करने वाले।
  2. इन्द्रन् शत्रुणां दारयिता वा। अर्थात् शत्रु का विदारण करने वाला।
  3. इन्द्रन् शत्रुणां द्रावयिता वा। अर्थात् शत्रुओं को भगाने वाला।

मन्त्र- यो जात एव प्रथमो मनस्वान् देवो देवान् क्रतुना पर्यभूषत्। यस्य शुष्माद् रोदसी अभ्यसेतां मह्ना स जनास इंद्र:।।

सन्दर्भ- यह मन्त्र ऋग्वेद के दूसरे मण्डल के 15 वें सूक्त का है। इस सूक्त में कुल 15 मन्त्र । इस सूक्त के ऋषि गृत्समद तथा देवता इन्द्र हैं। इस मन्त्र में त्रिष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है। 

मंत्रार्थ- जो उत्पन्न होते ही है सब देवताओं में प्रमुख परम मनस्वी हुआ, दिव्य गुणों से युक्त होते हुए जिसने यज्ञ से या वृत्र के वध आदि कर्मों से अन्य देवताओं को अलंकृत किया, या अन्य देवताओं की शक्ति का अतिक्रमण किया, जिसके शारीरिक बल से द्युलोक, पृथ्वी लोक डरते थे, या काँपते थे, महती सेना के महत्व से युक्त है, हे, लोगों, वही इंद्र है।

Question 62

'षड् भावविकारा भवन्ति' मतमिदं कस्य विद्यते?

  1. AOption (a)

    वार्ष्यायणेः

  2. BOption (b)

    शाकपूणेः

  3. COption (c)

    शाकटायनस्य

  4. DOption (d)

    यास्कस्य

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Correct answer

Answer: (a)A.

वार्ष्यायणेः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- 'षड् भावविकारा भवन्ति' यह मत किसका है?

स्पष्टीकरण- ‘षड् भावविकारा भवन्ति' यह मत वार्ष्यायणि का है।

Important Pointsषड् भावविकार- भाव-विकार से तात्पर्य क्रियाओं के प्रकार से है। निरुक्त ये भाव-विकार 6 प्रकार के हैं- 

  1. जायते- उत्पन्न होना
  2. अस्ति- रहता है
  3. विपरिणमते- परिवर्तित होता है
  4. वर्धते- बढ़ता है
  5. अपक्षीयते- क्षीण होता है
  6. विनश्यति- नष्ट होता है

​ 

Additional Information

  • षड् भावविकारों का वर्णन आचार्य यास्क अपने ग्रंथ निरुक्त में किया है।
  • इस ग्रन्थ में मुख्यतः 12 अध्याय हैं।
  • यह निघंटु नामक ग्रन्थ पर आश्रित है जो प्रकृति में एक वैदिक शब्दकोश है।
  • निघंटु ग्रन्थ तीन कण्डों में विभक्त है।

Question 63

अभिनिहितस्वरितो भेदोऽस्ति-

  1. AOption (a)

    आश्रितस्वरितस्य

  2. BOption (b)

    जात्यस्वरितस्य

  3. COption (c)

    तैरोविरामस्वरितस्य

  4. DOption (d)

    स्वतन्त्रस्वरितस्य

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Correct answer

Answer: (d)D.

स्वतन्त्रस्वरितस्य

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प्रश्नानुवाद- अभिनिहितस्वरित भेद है- 

स्पष्टीकरण- अभिनिहित स्वरित स्वतन्त्र स्वरित का भेद है।

  • संस्कृत भाषा में तीन प्रकार के स्वर माने गए है- उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित।
  • कण्ठ, तालु आदि स्थानों के ऊपर के भाग से जिस स्वर का उच्चारण होता है, वह उदात्त कहलाता है। (उच्चैरूदात्त:)
  • कण्ठ, तालु आदि स्थानों के निम्न भाग से जिस स्वर का उच्चारण होता है, वह अनुदात्त कहलाता है। (नीचैरनुदात्त:)
  • कण्ठ, तालु आदि स्थानों के मध्य भाग से जिस स्वर का उच्चारण होता है, वह स्वरित कहलाता है। (समाहार: स्वरित:)

Important Pointsस्वरित स्वर- 

  • स्वरित स्वर दो प्रकार के हैं- आश्रित तथा स्वतन्त्र।
  • उदात्त के बाद आने वाला अनुदात्त जब स्वरित में परिवर्तित हो जाता है तो इसे आश्रित स्वरित कहते है।
  • जो स्वरित पूर्ववर्ती उदात्त पर आश्रित नहीं होते है वे स्वतन्त्र स्वरित कहे जाते हैं।
  • अभिनिहित स्वरित स्वतन्त्र स्वरित का एक भेद है। यह पूर्वरूप संधि के फल स्वरूप उत्पन्न होता है, जब उदात्त ए/ओ के साथ अनुदात्त अ का मेल होता है।

Question 64

तर्कसंग्रहानुसारं पदार्थाः कति सन्ति?

  1. AOption (a)

    सप्त

  2. BOption (b)

    षोडश

  3. COption (c)

    नव

  4. DOption (d)

    दश

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Correct answer

Answer: (a)A.

सप्त

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प्रश्नानुवाद- तर्कसंग्रह के अनुसार कितने पदार्थ है?

स्पष्टीकरण- तर्कसंग्रह के अनुसार सात पदार्थ है। 

तर्कसंग्रह वैशेषिक दर्शन का प्रकरण ग्रन्थ है। यह दर्शन भारतीय आस्तिक दर्शनों की श्रेणी में आता है, इसके प्रवर्तक महर्षि कणाद हैं। इस दर्शन को औलूक्य दर्शन भी कहा जाता है। तर्कसंग्रह में सात पदार्थों का निरूपण किया गया है- द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाभावाः सप्तपदार्थाः। 

  1. द्रव्य- जिसमें द्रव्यत्व जाति हो वही द्रव्य है। पृथ्वी, जल, तेजस, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा तथा मनस् ये नौ द्रव्य कहलाते हैं।
  2. गुण- द्रव्यों के आश्रय में रहने वाली पदार्थ गुण कहलाते है। रूप, रस, गंध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, शब्द, ज्ञान, सुख, दु:ख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म अधर्म तथा संस्कार ये चौबीस गुण के भेद हैं।
  3. कर्म- क्रिया को कर्म कहते हैं। ऊपर फेंकना, नीचे फेंकना, सिकुड़ना, फैलाना तथा (अन्य प्रकार के) गमन, जैसे भ्रमण, स्पंदन, रेचन, आदि, ये पाँच "कर्म" के भेद हैं। कर्म द्रव्य ही में रहता है।
  4. सामान्य- जो नित्य एक है तथा अनेक वस्तुओं में एक सी प्रतीत होती है, वह सामान्य है।
  5. विशेष- द्रव्यों के अंतिम विभाग में रहनेवाला तथा नित्य द्रव्यों में रहनेवाला विशेष कहलाता है। नित्य द्रव्यों में परस्पर भेद करनेवाला एकमात्र यही पदार्थ है। यह अनंत है।
  6. समवाय- नित्य सम्बंध को समवाय कहते है, जो अवयव और अवयवी, गुण और गुणी, क्रिया और क्रियावान् जाति और व्यक्ति तथा विशेष और नित्य द्रव्य के बीच रता है।
  7. अभाव- किसी वस्तु का न होना, उस वस्तु का अभाव कहा जाता है। इसके चार भेद हैं- प्राग् अभाव, प्रध्वंस अभाव, अन्योन्य अभाव, अत्यंत अभाव।

Question 65

सवितर्का समापत्तिः उच्यते-

  1. AOption (a)

    शब्दार्थज्ञानविकल्पैः सङ्कीर्णा

  2. BOption (b)

    स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा

  3. COption (c)

    श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया

  4. DOption (d)

    उक्तेषु त्रिषु न कापि

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Correct answer

Answer: (a)A.

शब्दार्थज्ञानविकल्पैः सङ्कीर्णा

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : सवितर्क समापत्ति क्या कहींं गई है?

सवितर्का समापत्ति :

तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पै: संकीर्णा सवितर्का समापत्ति:।

  • सूत्रार्थ :- उन समापत्तियों में शब्द, उसके अर्थ व उसके ज्ञान अर्थात उसकी सही जानकारी आदि प्रकारों से युक्त सवितर्क समापत्ति कहलाती है।
  • उदाहरण स्वरूप :-
  • जैसे – “गाय शब्द, गाय शब्द का अर्थ व गाय शब्द का ज्ञान” यह तीनों ही अलग अलग हैं ।
  • इनमें से गाय एक शब्द है जैसे किसी भी वस्तु का कोई न कोई नाम तो अवश्य ही होता है। फिर उस नाम का कोई अर्थ भी होता है जैसे गाय का अर्थ है एक ऐसा पशु जिसकी चार टांगे, दो आँखे, दो सींग व एक पूँछ आदि होती हैं।
  • उसके बाद उसके गुणों के द्वारा ही उस वस्तु का बोध अर्थात ज्ञान होता है, जैसे कि उपर्युक्त गुण किस प्राणी में होते हैं ।
  • यहाँ पर हमारे चित्त में शब्द, अर्थ व ज्ञान का एकत्रित चित्र निर्माण होता है। अर्थात तीनों की मिश्रित अवस्था होती है। यही सवितर्क समापत्ति कहलाती है।

अतः स्पष्ट है, "शब्दार्थज्ञानविकल्पैः सङ्कीर्णा" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 66

ग्रिमनियमानुसारेण तवर्गीयध्वनीनां परिवर्तनक्रमोऽस्ति

  1. AOption (a)

    द > ध, ध > थ, थ > त

  2. BOption (b)

    त > थ, द > ध, ध > त

  3. COption (c)

    थ > ध, त > द, ध > द

  4. DOption (d)

    त > थ, ध > द, द > त

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Correct answer

Answer: (d)D.

त > थ, ध > द, द > त

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : ग्रिम नियम के अनुसार तवर्गीयध्वनीयोंं का परिवर्तन क्रम क्या है?

ग्रिम, ग्रासमन और वर्नर यह नियम भारोपीय भाषा परिवार से संबंधित हैं। इन नियमोंं में मूल ध्वनियोंं के परिवर्तन का वर्णन आता है।

**ग्रिम नियम :**यह ध्वनि नियम प्रा. याकोब ग्रिम के नाम से प्रसिद्ध है। इनका समय १७८५ से १८६३ यह है। मूलतः यह नियम ध्वनि परिवर्तन नियम इस नाम से प्रसिद्ध था, प्रा. मैक्समूलर ने इसे ग्रिम नियम यह संज्ञा दी। ग्रिम नियम के अनुसार मूल भारतीय भाषा की निम्नलिखित ध्वनियोंं का अंग्रेजी और जर्मन भाषा के निम्नलिखित ध्वनियोंं में परिवर्तन होता है - 

  • प्रथम ध्वनि का द्वितीय ध्वनि में परिवर्तन :
अघोष अल्पप्राण मूल ध्वनिपरिवर्तन
क्ख् (ह्)
त्थ्
प्फ्
  • चतुर्थ ध्वनि का तृतीय ध्वनि में परिवर्तन  :
महाप्राणपरिवर्तन
घ्ग्
ध्द्
भ्ब्
  • तृतीय ध्वनि का प्रथम ध्वनि में परिवर्तन  :
घोष अल्पप्राण मूल ध्वनिपरिवर्तन
ग्क्
द्त्
ब्प्

 

अतः स्पष्ट है, **"त > थ, ध > द, द > त" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 67

'एध्-वृद्धौ' इत्यस्माद् धातोः 'ऐधिष्ट' इति रूपं निष्पद्यते

  1. AOption (a)

    विधिलिङ्लकारे

  2. BOption (b)

    लुङ्लकारे

  3. COption (c)

    आशीर्लिङ्लकारे

  4. DOption (d)

    लङ्लकारे

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Correct answer

Answer: (b)B.

लुङ्लकारे

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- ‘एध्-वृद्धौ' इस धातो से 'ऐधिष्ट' यह रूप निष्पन्न होता है- 

स्पष्टीकारण- ‘एध्-वृद्धौ' इस धातो से 'ऐधिष्ट' यह रूप लुङ् लकार में निष्पन्न होता है।

लुङ् लकार ( सामान्य भूत काल ) जो कभी भी बीत चुका हो ।

उदा- अहं भोजनम् अभक्षत् । मैंने खाना खाया।

‘एध्-वृद्धौ’ धातु का लुङ् लकार रूप निम्नवत् है-

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमपुरुषऐधिष्टऐधिषाताम्ऐधिषत
मध्यपुरुषऐधिष्ठाःऐधियाथाम्ऐधिढ्वम्
उत्तमपुरुषऐधिषिऐधिष्वहिऐधिष्महि

Question 68

अधस्तनेषु 'ध्वन्यते इति ध्वनिः' इत्यनेन कोऽभिप्रायः?

  1. AOption (a)

    व्यञ्जकशब्दार्थौ

  2. BOption (b)

    व्यञ्जनाशक्तिः

  3. COption (c)

    व्यङ्ग्यार्थः

  4. DOption (d)

    व्यङ्ग्यकाव्यम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

व्यङ्ग्यार्थः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- नीचे दिए गये 'ध्वन्यते इति ध्वनिः' इससे क्या अभिप्राय है?

स्पष्टीकारण- 'ध्वन्यते इति ध्वनि:' इससे व्यङ्ग्यार्थ अभिप्रेत है। prsiddh काव्यशास्त्री आचार्य विश्वेश्वर ने काव्यशास्त्र में ध्वनि के पाँच व्युत्पत्तियाँ दी हैं- 

  1. धवनति ध्वनयति वा य: स: व्यंजक: शब्द: ध्वनि: - जो ध्वनित करे या कराये वह व्यंजक शब्द ध्वनि है।
  2. धवनति ध्वनयति वा य: स: व्यंजक: अर्थ: ध्वनि: - जो ध्वनित करे या कराये वह व्यंजक अर्थ ध्वनि है।
  3. ध्वन्यते इति ध्वनि: - जो ध्वनित किया जाए,  वह व्यंग्य अर्थ ध्वनि है। इसमें रस, अलंकार तथा वस्तु व्यंग्य आते है।
  4. ध्वन्यते अनेन इति ध्वनि: - जिसके द्वारा ध्व���ित किया जाए, वह ध्वनि है। इससे व्यंजना व्यापार का बोध होता है।
  5. ध्वन्यते अस्मिन् इति ध्वनि: - जिसमें वस्तु, अलंकार, रसादि ध्वनित हों उस काव्य को ध्वनि कहतें है।

शब्द, अर्थ, व्यंग्य अर्थ, व्यंजना व्यापार और काव्य व्यापार इन पाँचों को ध्वनि संज्ञा से व्यवहृत किया जाता है। किन्तु ‘ध्वन्यते इति ध्वनि:' से  व्यङ्ग्यार्थ ही अभिप्रेत है।​

Question 69

अरस्तूविरचितं पुस्तकमस्ति

  1. AOption (a)

    दि रिपब्लिक [The Republic]

  2. BOption (b)

    ऑन द सब्लाइम [On the Sublime]

  3. COption (c)

    पॉएटिक्स [Poetics]

  4. DOption (d)

    टेल ऑफ टू सिटीज़ [Tale of two cities]

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Correct answer

Answer: (c)C.

पॉएटिक्स [Poetics]

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- अरस्तू विरचित पुस्तक है

स्पष्टीकारण- अरस्तू विरचित पुस्तक है- पॉएटिक्स

अरस्तू- 

  • अरस्तु एक दार्शनिक, वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ तथा काव्यशास्त्री थे। इनका काल 368 ई॰पू॰- 322 ई॰पू के बीच का माना जाता है। ये प्लेटो के शिष्य व सिकंदर के गुरु थे। इनका जन्म मकदुनिया के स्टेगेरिया नामक नगर में हुआ था। अरस्तु ने दार्शनिक, वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ तथा सहित्यक विषयों पर रचना की।
  • जो स्थान भरत का भारतीय काव्यशास्त्र में है वही स्थान इनका पाश्चात्य काव्यशास्त्र में है। इनके तीन प्रमुख सिद्धांत है- अनुकरण सिद्धान्त, त्रासदी सिद्धान्त तथा विरेचन सिद्धांत।
  • अनुकरण के सिद्धांत के अनुसार कवि काव्य में प्राकृति का अनुकरण करता है। यह अनुकरण नकल मात्र नहीं है अपितु इसमें कल्पनाओं और भावों का संयोग होता है।
  • त्रासदी के सिद्धान्त अनुसार मानवीय भावनाओं का सफलतापूर्वक विवेचन विशेषकर त्रासदी में ही होता है। इस कारण से ही पश्चिम के कवियों ने दुखांत नाटकों का आश्रय लिया।
  • विरेचन सिद्धांत द्वारा अरस्तु ने प्रतिपादित किया कि कला और साहित्य के द्वारा हमारे दूषित मनोविकारों का उचित रूप से विरेचन (शुद्धि) हो जाता है। सफल त्रासदी विरेचन द्वारा करुणा और त्रास के भावों को उद्बुद करती है, उनका सामंजन करती है और इस प्रकार आनंद की भूमिका प्रस्तुत करती है। विरेचन से भावात्मक विश्रांति ही नहीं होती, भावात्मक परिष्कार भी होता है।

Question 70

मुद्राराक्षसस्य तृतीयाङ्कस्य नाम अस्ति-

  1. AOption (a)

    मुद्राप्राप्तिः

  2. BOption (b)

    भूषणविक्रयः

  3. COption (c)

    प्रलोभनम्

  4. DOption (d)

    कृतककलहः

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Correct answer

Answer: (d)D.

कृतककलहः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- मुद्राराक्षस के तृतीय अंक का नाम है-

स्पष्टीकरण- मुद्राराक्षस के तृतीय अंक का नाम है- कृतककलह।

विशाखदत्त- 

  • विशाखदत्त की गणना संस्कृत साहित्य के श्रेष्ठ नाटककारों में से एक है।
  • इनके पिता का नाम भास्करदत्त है।
  • इनके पितामह का नाम बटेश्वरदत्त है।
  • इनका निवासस्थान बंगाल अथवा बिहार माना जाता है।
  • ये शिव के उपासक है।
  • इनका काल अधिकांश विद्वानों के अनुसार चतुर्थ शताब्दी माना जाता है।
  • मुद्राराक्षस ही विशाखदत्त की एकमात्र प्रमाणिक रचना है।

​मुद्राराक्षस- 

  • यह सात अंको वाला ऐतिहासिक नाटक है।
  • इसका मुख्य रस वीर रस है।
  • इसका उपजीव्य विष्णु पुराण तथा श्रीमद्भगवतमहापुराण को माना जाता है।
  • कुछ विद्वान इसका नायक चाणक्य तथा अन्य विद्वान् चन्द्रगुप्त को मानते हैं।
  • यह नायिका विहीन नाटक है।
  • इसका प्रतिनायक राक्षस (सुबुद्धि शर्मा) था।
  • इसके सात अंको का नाम निम्नलिखित है- मुद्रालाभ, राक्षसविचार, कृतककलह, राक्षस-उद्योग, राक्षसनिकार, राक्षसनिर्वेद तथा राक्षसनिग्रह।

Question 71

महाभारतोपजीविकाव्यं नास्ति

  1. AOption (a)

    बृहत्कथामंजरी

  2. BOption (b)

    शिशुपालवधम्

  3. COption (c)

    मध्यमव्यायोगः

  4. DOption (d)

    भारतमंजरी

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Correct answer

Answer: (a)A.

बृहत्कथामंजरी

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- महाभारत का उपजीवी काव्य नहीं है-

स्पष्टीकरण- बृहत्कथामंजरी महाभारत का उपजीवी काव्य नहीं है। 

बृहत्कथामंजरी- यह क्षेमेन्द्र द्वारा विरचित महाकाव्य है। इसका उपजीव्य गुणाढ्य द्वारा विरचित बृहत्कथा है। इसका विभाजन 18 लंबकों में हुआ है। 

अन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण-  

  • शिशुपालवध- यह महाकवि माघ द्वारा विरचित महाकाव्य है। इसका उपजीव्य महाभारत का सभा पर्व है। इसका विभाजन 20 सर्गों में हुआ है।
  • मध्यमव्यायोग- यह महाकवि भास द्वारा रचित एक रूपक है। इसमें एक अंक है। इसमें मध्यम पांडव भीम द्वारा मध्यम ब्राह्मण के पुत्र को बचाने के का वर्णन है।
  • भारतमंजरी- यह क्षेमेन्द्र द्वारा विरचित महाकाव्य है। इसका उपजीव्य महाभारत है। इसका विभाजन भी पर्वों में हुआ है। इसमें महाभारत के 18 पर्व तथा हरि वंशपर्व के साथ साथ कवि प्रशस्ति भी वर्णित है।

Question 72

पुराणसन्दर्भे सप्तद्वीपेषु गणना नास्ति

  1. AOption (a)

    कुशद्वीपः

  2. BOption (b)

    प्लक्षद्वीपः

  3. COption (c)

    शाकद्वीपः

  4. DOption (d)

    आम्रद्वीपः

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Correct answer

Answer: (d)D.

आम्रद्वीपः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- पुराण के संदर्भ में सप्तद्वीप में गणना नहीं होती है-

स्पष्टीकरण- पुराण के संदर्भ में सप्तद्वीप में आम्रद्वीप की गणना नहीं होती है। 

पुराण-

  • महर्षि कृष्णद्वैपायण वेदव्यास को पुराणों एवं महाभारत का रचयिता माना जाता है।
  • इतिहास (महाभारत) तथा पुराण को संयुक्त रूप से नारद ने ‘पंचम वेद’ कहा है- ‘इतिहास-पुराणं पञ्चमं वेदानां वेदम्’ ।
  • वैदिक साहित्य के अतिरिक्त महाभारत में भी कहा गया है- ‘इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत्’। अर्थात् वेद के अर्थ का पल्लवन इतिहास और पुराण के द्वारा करना चाहिए।
  • पुराणों की महापुराण संख्या 18 है- मत्स्यपुराण, मार्कण्डेयपुराण, भविष्यपुराण, भागवतपुराण, ब्रह्मपुराण, ब्रह्मांडपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, विष्णुपुराण, वामनपुराण, वराहपुराण, वायुपुराण, अग्निपुराण, नारदपुराण, पद्मपुराण, लिंगपुराण, गरुड़पुराण, कूर्मपुराण, स्कन्दपुराण।

Important Pointsपुराणों में सप्त द्वीप- 

  1. जम्बुद्वीप- यह क्षार समुद्र से घिरा हुआ द्वीप है।
  2. प्लक्षद्वीप- यह इक्षुरस समुद्र से घिरा द्वीप है।
  3. शाल्माली द्वीप- यह सुरा समुद्र से घिरा द्वीप है।
  4. कुश द्वीप- यह घृत समुद्र से घिरा द्वीप है।
  5. क्रौंच द्वीप- यह दधि समुद्र से घिरा द्वीप है।
  6. शाक द्वीप- यह क्षीर समुद्र से घिरा द्वीप है।
  7. पुष्कर द्वीप- यह स्वादु जल से घिरा द्वीप है।

 

अतः स्पष्ट होता है की, पुराण के सप्तद्वीप में आम्रद्वीप की गणना नहीं होती है।

Question 73

मनुस्मृतिः कति अध्यायेषु विभक्ताऽस्ति?

  1. AOption (a)

    दशाध्यायेषु

  2. BOption (b)

    एकादशाध्यायेषु

  3. COption (c)

    त्रयोदशाध्यायेषु

  4. DOption (d)

    द्वादशाध्यायेषु

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Correct answer

Answer: (d)D.

द्वादशाध्यायेषु

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : मनुस्मृति कितने अध्यायोंं में विभक्त है?

मनुस्मृति की रचना :

मनुस्मृति भारतीय आचार-संहिता का विश्वकोश है, मनुस्मृति में बारह अध्याय तथा दो हजार पाँच सौ श्लोक हैं, जिनमें सृष्टि की उत्पत्ति, संस्कार, नित्य और नैमित्तिक कर्म, आश्रमधर्म, वर्णधर्म, राजधर्म व प्रायश्चित आदि विषयों का उल्लेख है। मनुस्मृति के अध्यायोंं के विषय इस प्रकार हैंं -

  1. जगत् की उत्पत्ति
  2. संस्कारविधि, व्रतचर्या, उपचार
  3. स्नान, दाराघिगमन, विवाहलक्षण, महायज्ञ, श्राद्धकल्प
  4. वृत्तिलक्षण, स्नातक व्रत
  5. भक्ष्याभक्ष्य, शौच, अशुद्धि, स्त्रीधर्म
  6. गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थ, मोक्ष, संन्यास
  7. राजधर्म
  8. कार्यविनिर्णय, साक्षिप्रश्नविधान
  9. स्त्रीपुंसधर्म, विभाग धर्म, धूत, कंटकशोधन, वैश्यशूद्रोपचार
  10. संकीर्णजाति, आपद्धर्म
  11. प्रायश्चित्त
  12. संसारगति, कर्म, कर्मगुणदोष, देशजाति, कुलधर्म, निश्रेयस।

 

अतः स्पष्ट है, की "द्वादशाध्यायेषु" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 74

याज्ञवल्क्यस्मृतौ व्यवहाराध्यायः कतमोऽस्ति

  1. AOption (a)

    प्रथमः

  2. BOption (b)

    द्वितीयः

  3. COption (c)

    तृतीयः

  4. DOption (d)

    चतुर्थः

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Correct answer

Answer: (b)B.

द्वितीयः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : याज्ञवल्क्यस्मृति में व्यवहाराध्याय का क्रमांक कौन सा है?

याज्ञवल्क्य स्मृति :

याज्ञवल्क्य स्मृति में १००३ श्लोक हैं। इसपर विरचित मिताक्षरा टीका हिंदू धर्मशास्त्र के विषय में भारतीय न्यायालयों में प्रमाण मानी जाती रही है। याज्ञवल्क्य स्मृति और कौटिलीय अर्थशास्त्र में विशेष साम्य पाया जाता है। इसी स्मृति में सर्वप्रथम स्त्रियोंं के संपत्ती के अधिकार का विधान किया गया है।

याज्ञवल्क्य स्मृति की रचना :

याज्ञवल्क्य स्मृति में तीन कांड (अध्याय) हैं-

  1. आचारकाण्ड -
  • इसमें तेरह प्रकरण हैं।
  • उपोद्घात-प्रकरणं, ब्रह्मचारिप्रकरणं, विवाह-प्रकरणं, वर्णजातिविवेक-प्रकरणं, गृहस्थ-प्रकरणम्, स्नातवह-प्रकरणम्, भक्ष्याभक्ष्य-प्रकरणम्, द्रव्यशुद्धि प्रकरणम्, दान-प्रकरणम्, श्राद्ध्-प्रकरणम्, गणपति कल्पप्रकरणम्, ग्रहशान्ति-प्रकरणम्, राजधर्म-प्रकरणम्
  1. व्यवहारकाण्ड -
  • इसमें पच्चीस प्रकरण हैं।
  • व्यवहाराध्याये साधाराव्यवहारमातृका, ऋणादानो-पनिधि-साक्षी-लेख्य-दिव्य-दायविभाग-सीमाविवाद-स्वामिपालविवाद-अस्वामिविक्रय-दत्ताप्रदानिक क्रीतानुशया-अभ्युपेत्याशुश्रूषा-संविदव्यतिक्रम्-वेतनादानद्यूत समाह्वय -वाक् पारुष्य-दण्डपारुष्य-साहसविक्रीयासम्प्रदानसम्भूय समुत्थान-स्तेय-स्त्रीसंग्रहण-प्रकरण
  1. प्रायश्चितकाण्ड -
  • इसमें छह प्रकरण हैं।
  • शौचप्रकरणम्, आपद्धर्मप्रकरणम्, वानप्रस्थप्रकरणम्, यति-धर्मप्रकरणम्, प्रायश्चित्त-प्रकरणम्, प्रकीर्ण-प्रयश्चित्तानि

 

अतः स्पष्ट है, "द्वितीयः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 75

अशोकस्य शाहबाजगढीलेखः कस्यां लिप्यां प्रप्यते

  1. AOption (a)

    ब्राह्मी

  2. BOption (b)

    खरोष्ठी

  3. COption (c)

    शारदा

  4. DOption (d)

    पुष्करी

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Correct answer

Answer: (b)B.

खरोष्ठी

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अशोक का शाहबाज़गढ़ी का शिलालेख किस लिपि में प्राप्त होता है?

अशोक के पुराभिलेख :

  • मौर्य सम्राट अशोक के इतिहास की संपूर्ण जानकारी उसके अभिलेखों से मिलती है। इनकी विशेषता इस प्रकार है -
  • यह माना जाता है कि, अशोक को अभिलेखों की प्रेरणा ईरान के शासक 'डेरियस' से मिली थी।
  • अशोक के लगभग ४० अभिलेख प्राप्त हुए हैं। ये ब्राह्मी, खरोष्ठी और आर्मेइक-ग्रीक लिपियों में लिखे गये हैं।
  • सम्राट अशोक के ब्राह्मी लिपि में लिखित सन्देश को सर्वप्रथम एलेग्जेंडर कनिंघम के सहकर्मी जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा था।
  • अशोक के अभिलेखों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-
  • शिलालेख
  • स्तम्भलेख
  • गुहालेख
  • सम्राट अशोक का इतिहास इन लेखोंं से प्राप्त होता है। अशोक के १४ शिलालेख मिलतेंं हैंं।
  • अशोक का तक्षशिला एवं लघमान, अफगाणिस्तान का शिलालेख आर्मेइक-ग्रीक लिपि में है।
  • शाहबाज़गढ़ी के अतिरिक्त अन्य सारे शिलालेख ब्राह्मी लिपि में है। शाहबाज़गढ़ी का लेख खरोष्ठी ल��पि में उत्कीर्ण है।

 

अतः स्पष्ट है, 'खरोष्ठी'  यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 76

'भवाति' रूपमिदं कस्य लकारस्य विद्यते?

  1. AOption (a)

    लोट्लकारस्य

  2. BOption (b)

    विधिलिङ्लकारस्य

  3. COption (c)

    लेट्लकारस्य

  4. DOption (d)

    लुट्लकारस्य

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Correct answer

Answer: (c)C.

लेट्लकारस्य

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प्रश्नानुवाद- 'भवाति' यह रूप किस लकार का है?

स्पष्टीकरण- ‘भवाति' यह रूप लेट् लकार का है।

लेट्लकार-

  • लेट् लकार, वेदों में पाये जाने वाले क्रियापद के वैविध्य को पाणिनीय व्याकरण में प्रबन्धित और व्यवस्थित करने का उपाय लगता है ।
  • पाणिनीय व्याकरण के अनुसार लेट् लकार का प्रयोग केवल वेदों में उपलब्ध क्रियापदों की व्युत्पत्ति प्रक्रिया में करना चाहिये, न तु अवैदिक नये क्रियापदों की रचना में ।
  • वैदिक भाषा की यह विशेषता है कि इसमें लेट् लकार का प्रयोग होता है। भवाति पद भू धातु में लेट् लकार लगाकर निष्पन्न हुआ है।
पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमपुरुषभवाति/भवात्भवात:भवान्
मध्यमपुरुषभवासि/भवा:भवाथ:भवाथ
उत्तमपुरुषभवानि/भवाभवावभवाम

Question 77

तर्कभाषानुसारम् इन्द्रियार्थसन्निकर्षः कस्य कारणम्?

  1. AOption (a)

    अनुमानस्य

  2. BOption (b)

    प्रत्यक्षस्य

  3. COption (c)

    उपमानस्य

  4. DOption (d)

    इन्द्रियस्य

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Correct answer

Answer: (b)B.

प्रत्यक्षस्य

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प्रश्नानुवाद- तर्कभाषा के अनुसार इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष किसका कारण है?

स्पष्टीकरण- तर्कभाषा के अनुसार इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष प्रत्यक्ष प्रमाण का कारण है। 

इन्द्रियार्थयोस्तु यः सन्निकर्षः साक्षात्कारिप्रमा हेतुः स षडविध एव। तद्यथा, संयोगः, संयुक्तसमवायः, संयुक्तसंवेतसमवायः,समवायः, समवेतसमवायः, विशेष्यविशेषणभावश्चेति। 

अर्थात साक्षात्कारि प्रमा का हेतु या कारण इन्द्रियार्थसन्निकर्ष है, वह छह प्रकार का है- संयोग, संयुक्तसमवाय, संयुक्तसंवेतसमवाय, समवाय, समवेतसमवाय, विशेष्यविशेषणभाव। 

  1. संयोग- सन्निकर्ष-चक्षुषा घटविषयं ज्ञानं जन्यते तदा चक्षुरिन्द्रियं घटो अर्थः। अनयोः सन्निकर्षः संयोग एव,अयुतसिद्धभावात् । अर्थात चक्षुरिन्द्रिय से ‘घट’ (अर्थ) का प्रत्यक्ष होने से ‘संयोग सन्निकर्ष’ होता है। क्योंकि ये दोनों ‘अयुतसिद्ध’ नहीं है। इसी प्रकार अन्तरिन्द्रिय ‘मन’ से जब आत्मविषयक ज्ञान होता है तो ‘मन’ ‘इन्द्रिय’ और ‘आत्मा’ अर्थ है इन दोनों का सम्बन्ध ‘संयोग सन्निकर्ष’ ही कहा जाता है।
  2. संयुक्तसमवाय- यदा चक्षुरादिना घटगतरूपादिकं गृह्यते, घटे श्यामः रूपस्तीति, तदा  चक्षुरिन्द्रियं, घटरूपमर्थः, अनयोः सन्निकर्षः संयुक्त समवाय एव। अर्थात चक्षुरिंद्रिय से घटरूप का प्रत्यक्ष ग्रहण होने पर ‘संयुक्तसमवाय’ सन्निकर्ष होता है। उसी प्रकार मन से आत्मा में समवेत सुख दुःखादि का ग्रहण होने पर भी संयुक्तसमवाय सन्निकर्ष होता है।
  3. संयुक्तसंवेतसमवाय- चक्षुषा घटरूपसमवेतं रूपत्वादि- सामान्यं गृह्यते, तदा चक्षुरिन्द्रियं, रूपत्वादिसामान्य, अनयो सन्निकर्षः संयुक्तसमवेतसमवाय एव। अर्थात जब चक्षुरिन्द्रिय  से ‘घटरूप’ में समवेत ‘रूपत्व’ आदि जाति का ग्रहण होता है। तो इनका सन्निकर्ष संयुक्तसंवेतसमवाय कहलाता है। उसी प्रकार मन से आत्मा में समवेत (समवाय सम्बन्ध में रहने वाले) सुख दुःखादि की जाति का ग्रहण होने पर ‘संयुक्तसंवेतसमवाय’ कहलाता है।
  4. समवाय- यदा श्रोत्ररिन्द्रियेण शब्दो गृह्यते तदा श्रोत्ररिन्द्रियं, शब्दो अर्थः, अनयोः सन्निकर्षः समवाय एव। कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नं नभः श्रोत्रम्। जब श्रोत्ररिन्द्रियों से शब्द का ग्रहण होता है। तब ‘श्रोत्र’ इन्द्रिय है और शब्द अर्थ है। और उन दोनों का सन्निकर्ष सम्बन्ध ‘समवाय’ ही होता है। कर्णविवर से अवच्छिन्न ‘आकाश’ ही श्रोत्र है। और शब्द आकाश का गुण है। और गुण तथा गुणी का समवाय सम्बन्ध होता है।
  5. समवेतसमवाय- यदा पुनः शब्दसमवेत शब्दत्वादिकं सामान्यं श्रोत्ररिन्द्रियेण गृह्यते, तदा श्रोत्ररिन्द्रियं शब्दत्वादिमान्यमर्थः। अनयोः सन्निकर्षः समवेत समवाय एव। श्रोत्रसमवेते शब्दे शब्दस्य समवायात। अर्थात जब शब्द में समवेत शब्दत्व आदि जाति का श्रोत्र इन्द्रिय से ग्रहण किया जाता है। तब श्रोत्र इन्द्रिय है, शब्दत्व आदि जाति अर्थ विषय है। इन दोनों का सन्निकर्ष समवेत समवाय कहलाता है। क्योंकि श्रोत्र में समवेत और शब्द में समवाय सम्बन्ध होता है।
  6. विशेष्यविशेषणभाव- यदा चक्षुषा संयुक्ते भूतले घटाभावो गृह्यते इह भूतले घटो नास्ति इति तदा विशेष्यविशेषणभावः सम्बन्धः। अर्थात जब चक्षु से संयुक्त भूमि पर ‘यहाँ भूतल पर घट नहीं है - इस प्रकार घट के आभाव का ग्रहण होता है तब विशेष्य विशेषण भाव सन्निकर्ष हुआ करता है।

Question 78

निम्नलिखितेषु दर्शनेषु किं दर्शनं परमात्मनः सृष्टिकर्तृत्वं न मन्यते?

  1. AOption (a)

    आर्हतदर्शनम्

  2. BOption (b)

    न्यायदर्शनम्

  3. COption (c)

    वेदान्तदर्शनम्

  4. DOption (d)

    योगदर्शनम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

आर्हतदर्शनम्

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : निम्नलिखित दर्शनोंं में से कौन सा दर्शन परमात्मा का सृष्टिकर्तृत्व स्वीकार नहीं करता है?

आर्हत दर्शन :

  • जैन दर्शन, प्राचीन भारतीय नास्तिक दर्शन है। इसे आर्हत दर्शन भी कहा जाता है। इसमें अहिंसा को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।
  • जैन धर्म की मान्यता अनुसार, 24 तीर्थंकर संसार चक्र में फंसे जीवों के कल्याण हेतु उपदेश देने के लिए, समय-समय पर इस धरती पर आते रहे है।
  • जैन तीर्थंकरों में से कुछ के नाम ऋग्वेद में भी मिलते हैं, जिससे इनकी प्राचीनता प्रमाणित होती है। लगभग छठी शताब्दी ई॰ पू॰ में अंतिम तीर्थंकर, भगवान महावीर के द्वारा जैन दर्शन का पुनराव्रण हुआ।
  • अंतिम जैन तीर्थंकर महावीर ने अपने शिष्यों को अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करने), ब्रह्मचर्य (शुद्धता) और अपरिग्रह (गैर- लगाव) की शिक्षा दी, और उनकी शिक्षाओं को जैन आगम कहा गया।
  • जैन दर्शन के अनुसार जीव और कर्मों का सम्बन्ध अनादि काल से मौजूद है। जब जीव इन कर्मों को अपनी आत्मा से सम्पूर्ण रूप से मुक्त कर देता है तो वह स्वयं भगवान बन जाता है।
  • जैन दर्शन इस संसार को किसी ईश्वर द्वारा बनाया हुआ स्वीकार नहीं करता है, अपितु शाश्वत मानता है। जन्म मरण आदि जो भी होता है, उसे नियंत्रित करने वाली कोई सार्वभौमिक सत्ता नहीं है। जीव जैसे कर्म करता है, उन के परिणाम स्वरुप अच्छे या बुरे फलों को भुगतने के लिए वह मनुष्य, नरक, देव, एवं तिर्यंच (जानवर) योनियों में जन्म मरण करता रहता है।

अतः स्पष्ट है, "आर्हतदर्शनम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है। 

Additional Information न्याय दर्शन :

  • न्याय दर्शन भारत के छः वैदिक दर्शनों में एक दर्शन है। इसके प्रवर्तक ऋषि अक्षपाद गौतम हैं जिनका न्यायसूत्र इस दर्शन का सबसे प्राचीन एवं प्रसिद्ध ग्रन्थ है।
  • जिन साधनों से हमें ज्ञेय तत्त्वों का ज्ञान प्राप्त हो जाता है, उन्हीं साधनों को ‘न्याय’ की संज्ञा दी गई है। जब कोई मनुष्य किसी विषय में कोई सिद्धान्त स्थिर करता है तो वहाँ न्याय की सहायता अपेक्षित होती है।
  • इसलिये न्याय-दर्शन विचारशील मानव समाज की मौलिक आवश्यकता और उद्भावना है। उसके बिना न मनुष्य अपने विचारों एवं सिद्धान्तों को परि��्कृत एवं सुस्थिर कर सकता है न प्रतिपक्षी के सैद्धान्तिक आघातों से अपने सिद्धान्त की रक्षा ही कर सकता है।

वेदांत दर्शन :

  • वेदान्त ज्ञानयोग का एक स्रोत है जो व्यक्ति को ज्ञान प्राप्ति की दिशा में उत्प्रेरित करता है। इसका मुख्य स्रोत उपनिषद है जो वेद ग्रंथो और वैदिक साहित्य का सार समझे जाते हैं। उपनिषद् वैदिक साहित्य का अंतिम भाग है, इसीलिए इसको वेदान्त कहते हैं। कर्मकाण्ड और उपासना का मुख्यतः वर्णन मंत्र और ब्राह्मणों में है, ज्ञान का विवेचन उपनिषदों में। 'वेदान्त' का शाब्दिक अर्थ है - 'वेदों का अन्त' (अथवा सार)।
  • वेदान्त की तीन शाखाएँ जो सबसे ज्यादा जानी जाती हैं वे हैं:
  • अद्वैत वेदान्त,
  • प्रवर्तक - शंकराचार्य
  • विशिष्ट अद्वैत 
  • प्रवर्तक - रामानुज
  • द्वैत।
  • प्रवर्तक - मध्वाचार्य
  • इनके अलावा भी ज्ञानयोग की अन्य शाखाएँ हैं। ये शाखाएँ अपने प्रवर्तकों के नाम से जानी जाती हैं जिनमें भास्कर, वल्लभ, चैतन्य, निम्बार्क, वाचस्पति मिश्र, सुरेश्वर और विज्ञान भिक्षु।

योग दर्शन :

  • योगदर्शन छः आस्तिक दर्शनों (षड्दर्शन) में से एक है। इसके प्रणेता पतञ्जलि मुनि हैं। यह दर्शन सांख्य दर्शन के 'पूरक दर्शन' के नाम से प्रसिद्ध है।
  • इस दर्शन का प्रमुख लक्ष्य मनुष्य को वह मार्ग दिखाना है जिस पर चलकर वह जीवन के परम लक्ष्य (मोक्ष) की प्राप्ति कर सके। अन्य दर्शनों की भांति योगदर्शन तत्त्वमीमांसा के प्रश्नों (जगत क्या है, जीव क्या है?, आदि) में न उलझकर मुख्यतः मोक्षप्राप्ति के उपाय बताने वाले दर्शन की प्रस्तुति करता है।
  • किन्तु मोक्ष पर चर्चा करने वाले प्रत्येक दर्शन की कोई न कोई तात्विक पृष्टभूमि होनी आवश्यक है। अतः इस हेतु योगदर्शन, सांख्यदर्शन का सहारा लेता है और उसके द्वारा प्रतिपादित तत्त्वमीमांसा को स्वीकार कर लेता है। इसलिये प्रारम्भ से ही योगदर्शन, सांख्यदर्शन से जुड़ा हुआ है।
  • प्रकृति, पुरुष के स्वरूप के साथ ईश्वर के अस्तित्व को मिलाकर मनुष्य जीवन की आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक उन्नति के लिये दर्शन का एक बड़ा व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक रूप योगदर्शन में प्रस्तुत किया गया है।
  • इसका प्रारम्भ पतञ्जलि मुनि के योगसूत्रों से होता है। योगसूत्रों की सर्वोत्तम व्याख्या व्यास मुनि द्वारा लिखित व्यासभाष्य में प्राप्त होती है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार मनुष्य अपने मन (चित) की वृत्तियों पर नियन्त्रण रखकर जीवन में सफल हो सकता है और अपने अन्तिम लक्ष्य निर्वाण को प्राप्त कर सकता है।

Question 79

अधोलिखितेषु भतृहरिमतेन ध्वनेः भेदद्वयं चिनुत

  1. AOption (a)

    पश्यन्ती, वैखरी

  2. BOption (b)

    प्राकृतः, वैखरी

  3. COption (c)

    प्राकृतः, वैकृतः

  4. DOption (d)

    वैखरी, वैकृतः

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Correct answer

Answer: (c)C.

प्राकृतः, वैकृतः

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प्रश्नानुवाद- नीचे लिखे गए में से भर्तृहरि के मत से ध्वनि के भेद चुनें। 

स्पष्टीकरण- भर्तृहरि के मत से ध्वनि के दो भेद है- प्राकृत तथा वैकृत।

भर्तृहरि-

  • पाणिनीय व्याकरण परम्परा में त्रिमुनियों (पाणिनि, कात्यायन, पतंजलि) के बाद भर्तृहरि का स्थान आता है।
  • इनका काल छठी शताब्दी ई॰ माना जाता है।
  • इनके पिता का नाम चंद्रसेन था।
  • इनकी पत्नी का नाम पिंगला था।
  • इनके गुरु का नाम गोरखनाथ था।
  • इनका सम्बंध अलवर (राजस्थान) नामक स्थान से था।
  • इनके निम्न रचनायें है- नीतिशतक, शृंगारशतक, वैराग्यशतक, वाक्यपदीय, महाभाष्यदीपिका टीका।

​वाक्यपदीय- 

  • वाक्यपदीय व्याकरण दर्शन का अद्भुत ग्रंथ है।
  • इस वाक्यपदीय में तीन काण्ड हैं, इसलिए इसे त्रिकाण्डी भी कहा जाता है- ब्रह्म काण्ड (146 कारिकाएँ), वाक्य काण्ड (483 कारिकाएँ), प्रकीर्ण काण्ड या पद काण्ड (14 समुदेशों में विभक्त, 1323 कारिकाएँ)।
  • प्रथम काण्ड पर हरिवृषभ, द्वितीय काण्ड पर पुण्यराज एवं तृतीय काण्ड पर हेलाराज की व्याख्याएँ मिलती हैं।
  • स्वयं ब्रह्म काण्ड पर भर्तृहरि ने स्वोपज्ञवृत्ति भी लिखी थी।
  • इसके अतिरिक्त भर्तृहरि ने महाभाष्य की व्याख्या में दीपिका नामक टीका ने लिखी।

Important Pointsध्वनि के प्रकार- 

  • वाक्यपदीयम् के प्रथम काण्ड ब्रह्म काण्ड में प्राकृत, वैकृत दो प्रकार की ध्वनि बतायी गयी है- प्रकृतो वैकृतश्चेति द्विविधो ध्वनिः।
  • प्राकृत ध्वनि- स्फोट को अभिव्यक्त करनी वाली (मध्यमा)
  • वैकृत ध्वनि- स्फोट को निरंतर लम्बे समय तक उपलब्ध करने वाली (वैखरी)
  • प्राकृत ध्वनि को स्फोट का एक विशेष रूप मान लेने से प्राकृत ध्वनि का ही एकमात्रिक आदि काल ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत में स्थिर रहता है, जो स्फोट के नित्य होने पर भी शब्द में आरोपित है वास्तविक नहीं।
  • वैकृत ध्वनि तो प्राकृत ध्वनि के बाद ‘यह वही है’ इस प्रतीति का नियामक होता है। अतः स्फोट रूप नहीं है और उसके कालभेद, द्रुत आदि स्फोट में प्रतीति नहीं होते, जिनसे द्रुत आदि वृत्तियों के ग्रहण को रोकने के लिए कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता।

Question 80

'रुदति प्राव्राजीत्' अत्र रुदति पदे सप्तमी विभक्तिः अस्ति

  1. AOption (a)

    निर्धारणे

  2. BOption (b)

    सामीप्ये अधिकरणे

  3. COption (c)

    अनादराधिक्ये भावलक्षणे

  4. DOption (d)

    कर्मप्रवचनीयस्य योगे

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Correct answer

Answer: (c)C.

अनादराधिक्ये भावलक्षणे

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प्रश्नानुवाद- 'रुदति प्राव्राजीत्' यहाँ रुदति पद में सप्तमी विभक्ति है

स्पष्टीकारण- 'रुदति प्राव्राजीत्' यहाँ रुदति पद में सप्तमी विभक्ति अनादर के आधिक्य होने पर भावलक्षण में सप्तमी विभक्ति है। 

  • सूत्र- ‘षष्ठी चानादरे’ (2/3/38)
  • सूत्र प्रकार- विधि सूत्र
  • अनुवृत्ति- अनादराधिक्ये भावलक्षणे षष्ठीसप्तम्यौ स्तः । रुदति रुदतो वा प्राव्राजीत् । रुदन्तं पुत्रादिकमनादृत्य संन्यस्तवानित्यर्थः ॥
  • सूत्रार्थ- अनादर के आधिक्य होने पर जिसकी क्रिया से दूसरी क्रिया लक्षित हो उससे षष्ठी और सप्तमी विभक्ति होती है।
  • **उदाहरण- ‘**रुदति रुदतो वा प्राव्राजीत्’ रोते हुए को छोड़कर सन्यास ले लिया। इस वाक्य में रोदने (रोने की क्रिया) क्रिया से प्रव्रजन क्रिया लक्षित होती है और अनादर अर्थ में भी प्रतीत होती है।

​अतः ‘षष्ठी चानादरे’ सूत्र से रूदत् शब्द सप्तमी विभक्ति में रुदति और षष्ठी विभक्ति एकवचन में रूदतः बना।

Question 81

'यस्य हलः’ इत्यत्र यस्य इत्यनेन ग्रहणं भवति

  1. AOption (a)

    केवलं यकारस्य

  2. BOption (b)

    अकारसहितं यकारस्य

  3. COption (c)

    यत् प्रातिपदिकेन निष्पन्नस्य षष्ठ्यन्तस्य

  4. DOption (d)

    उक्तेषु न कस्यापि

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Correct answer

Answer: (b)B.

अकारसहितं यकारस्य

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प्रश्नानुवाद- ‘यस्य हलः’ इत्यत्र यस्य इत्यनेन ग्रहणं भवति

**स्पष्टीकारण- ‘**यस्य हलः’ यहाँ यस्य से अकारसहित यकार का ग्रहण होता है।

  • सूत्र- ‘यस्य हलः’ (6/4/49)
  • सूत्र प्रकार- विधि सूत्र
  • वृत्ति- यस्येति संघातग्रहणम्। हलः परस्य यशब्दस्य लोप आर्धधातुके।
  • सूत्रार्थ- आर्धधातुक परे रहते हल् (व्यञ्जन) से उत्तर य का लोप होता है। यस्य अर्थात् सस्वर यकार अर्थात् आकार सहित यकार का ही लोप होता है। हलः अर्थात् हल् से उत्तर यकार का लोप होता है।
  • ‘यस्य इति संघातग्रहणम्’ सूत्र में पठित यस्य यकारोत्तरवर्त्ती आकार उच्चारणार्थ नहीं है, किन्तु यकार और आकार दोनों के लोप के लिए ‘य’ ऐसे समूह का निर्देश किया गया है।

Question 82

त्रिविक्रमभट्टप्रणीतं चम्पूकाव्यमस्ति

  1. AOption (a)

    नलचम्पू

  2. BOption (b)

    राजचम्पू

  3. COption (c)

    रामायणचम्पू

  4. DOption (d)

    जीवन्धरचम्पू

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Correct answer

Answer: (a)A.

नलचम्पू

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- त्रिविक्रमभट्ट प्रणीत चम्पूकाव्य है-

स्पष्टीकरण- त्रिविक्रमभट्ट प्रणीत चम्पूकाव्य है- नलचम्पू।

Important Pointsनलचम्पू-

इसकी कथा महाभारत के नलोपाख्यान (वन पर्व) से ली गयी है। 

इसका विभाजन 7 उच्छ्वासों में है। 

इसमे नल और दमयंती की प्रणय कथा का वर्णन है। 

Key Pointsचम्पूकाव्य- 

  • संस्कृत श्रव्य काव्य के तीन प्रमुख भेद है- गद्य, पद्य और चम्पू।
  • छन्द रहित काव्य गद्य, छन्द सहित काव्य पद्य तथा गद्य-पद्य के मिश्रित काव्य को चम्पू कहते हैं।
  • करभक, विरुदावली, जयघोषणा आदि चम्पू काव्य के भेद हैं।
  • इसका विभाजन उच्छ्वासों में होता है।
  • चंपू काव्य का प्रथम निदर्शन त्रिविक्रम भट्ट का नलचंपू है जिसमें चंपू का वैशिष्ट्य स्फुटतया उद्भासित होता है।

त्रिविक्रमभट्ट- 

  • इनका काल 10 वी शताब्दी ई॰ माना जाता है।
  • इनका स्थान हैदराबाद माना जाता है।
  • ये सिंहादित्य नाम से भी प्रसिद्ध हैं।
  • इनके पिता का नाम नेमादित्य है।
  • इनकी दो प्रमुख रचनायें है- नलचम्पू तथा मदालसा चम्पू।

Question 83

अधस्तनेषु वाल्मीकि रामायणस्य काण्डानां समुचितक्रमोऽस्ति

  1. AOption (a)

    बाल-अयोध्या-सुन्दर-अरण्य-किष्किन्धा-युद्ध-उत्तराणि

  2. BOption (b)

    बाल-अयोध्या-किष्किन्धा-अरण्य-सुन्दर-युद्ध-उत्तराणि

  3. COption (c)

    अयोध्या-बाल-किष्किन्धा-अरण्य-सुन्दर-युद्ध-उत्तराणि

  4. DOption (d)

    बाल-अयोध्या-अरण्य-किष्किन्धा-सुन्दर-युद्ध-उत्तराणि

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Correct answer

Answer: (d)D.

बाल-अयोध्या-अरण्य-किष्किन्धा-सुन्दर-युद्ध-उत्तराणि

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प्रश्नानुवाद- नीचे दिए गए वाल्मीकि रामायण के काण्डों का समुचित क्रम है-

स्पष्टीकरण- नीचे दिए गए वाल्मीकि रामायण के काण्डों का समुचित क्रम है- बाल-अयोध्या-अरण्य-किष्किन्धा-सुन्दर-युद्ध-उत्तर।

रामायण-

  • लौकिक साहित्य का प्रथम ग्रन्थ रामायण को ही माना जाता है। इसमें मर्यादापुरुषोत्तम राम की कथा का वर्णन है।
  • इसके रचयिता ‘महर्षि वाल्मीकि’ हैं। जिन्हे आदिकवि भी कहा जाता है। यह महाकाव्य की कोटि में आता है।
  • यह सात काण्डों में विभक्त है- बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, आरण्यककाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, युद्धकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड।
  • प्रत्येक काण्ड सर्गों में विभक्त है। सर्गों में संस्कृत पद्य हैं, जिनमें अनुष्टुप्, उपजाति, वंशस्थ छंदों का प्रयोग किया गया है।
  • सर्वाधिक संख्या में अनुष्टुप् छंद का प्रयोग किया गया है। सम्पूर्ण ग्रन्थ में 24 सहस्त्र श्लोक हैं, इसीलिए इसे ‘चतुर्विंशति साहस्रीसंहिता’ भी कहा जाता है।
  • इसमें प्रधान रस करूण रस है। इसका सबसे काण्ड युद्ध काण्ड या लंका काण्ड है तथा सबसे छोटा काण्ड किष्किन्धाकाण्ड है।
  • इसकी कथा को आधार बनाकर अनेक परवर्ती कवियों जैसे कालिदास, भास आदि ने अनेक ग्रंथ लिखे।
  • बालकाण्ड- 
  • बालकाण्ड वाल्मीकि कृत रामायण और गोस्वामी तुलसीदास कृत श्री राम चरित मानस का एक भाग (काण्ड या सोपान) है।
  • इसमें श्रीराम के जन्म से लेकर सीता से विवाह होने तक की सम्पूर्ण कथा बताई गयी है।
  • अयोध्याकाण्ड-
  • इसमें श्रीराम के राज्याभिषेक से लेकर चौदह वर्षों के लिये वनवास जाने तक की कथा आयी है।
  • अरण्यकाण्ड-
  • इसमें राम का चित्रकूट के प्रयाण से लेकर सीता की खोज तक का वर्णन आया है।
  • किष्किन्धाकाण्ड-
  • इसमें राम-सुग्रीव मिलन से लेकर हनुमान को स्वशक्तियों का ज्ञान होने तक का वर्णन आया है।
  • सुन्दरकाण्ड-
  • हनुमान जी का लंका प्रस्थान से लेकर रामसेतु की योजना बनाने तक का वर्णन इसमें किया गया है।
  • युद्धकाण्ड-
  • इस काण्ड में सेतु बनाने से लेकर सीता को छुड़ा के पुनः अयोध्या की तरफ प्रयाण करने तक का वर्णन आया है।
  • उत्तरकाण्ड-
  • ​उत्तरकाण्ड राम कथा का उपसंहार है। मूल वाल्मिकी रामायण में उत्तर काण्ड नहीं है। केवल युद्ध काण्ड सहित छः काण्ड हैं। उत्तर काण्ड को बाद में जोड़ा गया है।

Question 84

अधस्तनानां महाभारतीयपर्वणां समुचितः क्रमोऽस्ति

  1. AOption (a)

    शान्तपर्व, स्त्रीपर्व, अनुशासनपर्व, आश्वमेधिकपर्व

  2. BOption (b)

    स्त्रीपर्व, शान्तिपर्व, अनुशासनपर्व, आश्वमेधिकपर्व

  3. COption (c)

    अनुशासनपर्व, स्त्रीपर्व, आश्वमेधिकपर्व, शान्तिपर्व

  4. DOption (d)

    आश्वमेधिकपर्व, अनुशासनपर्व, स्त्रीपर्व, शान्तिपर्व

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Correct answer

Answer: (b)B.

स्त्रीपर्व, शान्तिपर्व, अनुशासनपर्व, आश्वमेधिकपर्व

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प्रश्नानुवाद- नीचे दिए गए महाभारत के पर्वों का उचित क्रम है- 

स्पष्टीकरण- महाभारत के पर्वों का उचित क्रम है- स्त्रीपर्व, शान्तिपर्व, अनुशासनपर्व, आश्वमेधिकपर्व

लौकिक संस्कृत साहित्य में महत्व की दृष्टि से रामायण के बाद महाभारत का स्थान आता है। ये दोनों ग्रन्थ सम्मिलित रूप से आर्ष काव्य कहे जाते हैं। महाभारत विश्व साहित्य का सबसे बड़ा ग्रन्थ है। इसमें एक लाख श्लोक है, अतः यह ‘शतसाहस्रीसंहिता’ के नाम से जाना जता है। इसके लेखक वेद व्यास माने जाते हैं।

  • इसका विकास तीन चरणों में हुआ- जय (8800 श्लोक), भारत (24000 श्लोक) तथा महाभारत (100000 श्लोक)। महाभारत में कौरवों-पाण्डवों के भीषण युद्ध का वर्णन मिलता है। महाभारत में ही ‘में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। इसमें शांत रस है।
  • महाभारत को 18 पर्वों में विभक्त किया गया है, जिनका वर्णन प्रकार निम्नलिखित है- आदिपर्व, सभापर्व, वनपर्व, विराटपर्व, उद्योगपर्व, भीष्मपर्व, द्रोणपर्व, कर्णपर्व, शल्यपर्व, सौप्तिकपर्व, स्त्रीपर्व, शांतिपर्व, अनुशासनपर्व, आश्वमेधिकपर्व, आश्रमवासिकपर्व, मौसलपर्व, महाप्रस्थानिकपर्व, स्वर्गारोहणपर्व।
  • सभी पर्वों में सबसे बड़ा शान्ति पर्व तथा सबसे छोटा महाप्रस्थानिकपर्व है। इन पर्वों के अतिरिक्त महाभारत का एक खिल पर्व भी है, जो हरिवंश  पर्व के नाम से जाना जाता है। इसमें कृष्ण की लीलाओं का वर्णन है।

Question 85

अधस्तनेषु पुराणस्य पञ्चलक्षणेषु नास्ति

  1. AOption (a)

    वंशः

  2. BOption (b)

    मन्वन्तराणि

  3. COption (c)

    संसर्गः

  4. DOption (d)

    प्रतिसर्गः

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Correct answer

Answer: (c)C.

संसर्गः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : पुराणोंं के पांच लक्षणोंं में से कौन सा लक्षण नीचे दिये हुए विकल्पोंं में नहीं है?

पुराणोंं का परिचय :

पुराण और इतिहास इनका महत्व वेदोंं के समान होता था, इसके यह प्रमाण हैंं - 

  • अथर्ववेद के अनुसार -
  • "ऋच: सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह।" (११.७.२)
  • अर्थात् पुराणों का आविर्भाव ऋक्, साम, यजुस् औद छन्द के साथ ही हुआ था।
  • शतपथ ब्राह्मण (१४.३.३.१३) में तो पुराणसाहित्य को वेद ही कहा गया है।
  • छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार' - 
  • "इतिहास पुराणं पञ्चमंं वेदानांवेदम्।" (७.१.२)
  • पुराण पंचम और वेदोंं का वेद है।
  • बृहदारण्यकोपनिषद् तथा महाभारत में कहा गया है कि - 
  • "इतिहास पुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत्।"**
  • अर्थात् वेद का अर्थविस्तार पुराण के द्वारा करना चाहिये।

पुराणोंं की संख्या :

पुराणों की संख्या प्राचीन काल से अठारह मानी गयी है। देवीभागवत में नाम के आरंभिक अक्षर के निर्देशानुसार १८ पुराणों की गणना इस प्रकार की गयी हैं:

​​मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम्।

​​अनापलिंगकूस्कानि पुराणानि पृथक्पृथक्।।

  • म-२ 
  • मार्कण्डेय पुराण, मत्स्य पुराण
  • भ-२
  • भागवत पुराण - (भिन्न मत से - देवीभागवत पुराण), भविष्य पुराण
  • ब्र-३
  • ब्रह्म पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण
  • व-४
  • वराह पुराण, वायु पुराण (भिन्न मत से - शिव पुराण), विष्णु पुराण (उत्तर भाग - विष्णुधर्मोत्तर), वामन पुराण
  • अ-१
  • अग्नि पुराण
  • ना-१
  • नारद पुराण
  • प-१
  • पद्म पुराण
  • लिं-१
  • लिङ्ग पुराण
  • ग-१
  • गरुड पुराण
  • कू-१
  • कूर्म पुराण
  • स्क-१
  • स्कन्द पुराण​

पुराणोंं के लक्षण : 

अमरकोष आदि प्राचीन कोशों में पुराण के पाँच लक्षण माने गये हैं : सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (प्रलय, पुनर्जन्म), वंश (देवता व ऋषि सूचियां), मन्वन्तर (चौदह मनु के काल), और वंशानुचरित (सूर्य चन्द्रादि वंशीय चरित)।

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।

वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम्।।

  • सर्ग - पंचमहाभूत, इन्द्रियगण, बुद्धि आदि तत्त्वों की उत्पत्ति का वर्णन
  • प्रतिसर्ग - ब्रह्मादिस्थावरान्त संपूर्ण चराचर जगत् के निर्माण का वर्णन
  • वंश - सूर्यचन्द्रादि वंशों का वर्णन
  • मन्वन्तर - मनु, मनुपुत्र, देव, सप्तर्षि, इन्द्र और भगवान् के अवतारों का वर्णन
  • वंशानुचरित - प्रति वंश के प्रसिद्ध पुरुषों का वर्णन।

 

अतः स्पष्ट है, "संसर्गः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 86

ऋक्प्रातिशाख्यानुसारं समानाक्षराणां का संख्या?

  1. AOption (a)

    षड्

  2. BOption (b)

    अष्टौ

  3. COption (c)

    पञ्च

  4. DOption (d)

    सप्त

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Correct answer

Answer: (b)B.

अष्टौ

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प्रश्नानुवाद- ऋक्प्रातिशाख्य के अनुसार समानाक्षरों की क्या संख्या है?

स्पष्टीकरण- ऋक्प्रातिशाख्य के अनुसार समानाक्षरों की संख्या अष्टौ अर्थात 8 है।

Important Pointsऋक्प्रातिशाख्य- इसके रचनाकार शौनक है। यह 18 पटलों में भी विभक्त है। इसके प्रथम पटल में वर्ण-प्रकरण है। 

समानाक्षर- अष्टौ समानक्षराण्यादित: अर्थात वर्णमाला के आदि से प्रारम्भ करके अष्टम वर्ण पर्यन्त समानाक्षर कहलाते है- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऋॄ।

Additional Informationप्रातिशाख्य ग्रंथो में शिक्षा, छन्द तथा व्याकरण के विषयों का सामान्य वर्णन प्राप्त होता है। 

चारों वेदों के भिन्न भिन्न प्रातिशाख्य ग्रंथ प्राप्त होतें है, जो निम्नलिखित है-

  1. ऋग्वेद- ऋक्प्रातिशाख्य
  2. यजुर्वेद- वाजसनेयी प्रातिशाख्य
  3. सामवेद- ऋक्तन्त्र तथा पुष्पसूत्र
  4. अथर्ववेद- अथर्वेद प्रातिशाख्य

Question 87

निम्नलिखितेषु को हेत्वाभासो नास्ति?

  1. AOption (a)

    असिद्धः

  2. BOption (b)

    विरुद्धः

  3. COption (c)

    अनैकान्तिकः

  4. DOption (d)

    असत्प्रतिपक्षः

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Correct answer

Answer: (d)D.

असत्प्रतिपक्षः

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प्रश्नानुवाद- निम्नलिखित में से कौन नहीं है?

स्पष्टीकरण- निम्नलिखित में से असत्प्रतिपक्ष हेत्वाभास नहीं है। 

हेत्वाभास न्याय दर्शन के 16 पदार्थों में से एक पदार्थ है जिसका अर्थ है ‘असद् हेतु’। दूसरे शब्दों में जो हेतु न होकर भी हेतु की तरह प्रतीत होते है, हेत्वाभास कहलाते हैं- हेतुवत् भासते इति हेत्वाभास:। इस दर्शन में पाँच हेत्वाभास का निरूपण किया गया है- असिद्ध, विरुद्ध, अनैकान्तिक, प्रकरणसम, कालात्ययापदिष्ट।

  1. असिद्ध हेत्वाभास- तत्र लिङ्गत्वेनानिश्चितो हेतुरसिद्ध तत्रासिद्धस्त्रिविधः। आश्रयसिद्धः, स्वरूपासिद्धः, व्याप्यत्वासिद्धश्चेति। अर्थात उन हेत्वाभास में जो लिङ्ग के रूप में निश्चित न होने वाला हेतु असिद्ध हेत्वाभास कहलाता है। वह तीन प्रकार का होता है- आश्रयासिद्ध, स्वरूपासिद्ध, व्याप्यत्वासिद्ध।
  2. विरुद्ध हेत्वाभास- साध्यविपर्ययव्याप्तो हेतुर्विरुद्धः। स यथा शब्दो नित्यः कृतकत्वादात्मवत्। अर्थात साध्य के आभाव विपर्यय से व्याप्त हेतु विरुद्ध हेत्वाभास कहलाता है। वह इस प्रकार है, शब्द नित्य है, क्योंकि वह कृतक (जन्म) है (हेतु) आत्मा (उदाहरण)।
  3. अनैकान्तिक हेत्वाभास- सव्यभिचारो अनैकान्तिकः। स द्विविधः साधारणानैकान्तिको असाधारणानैकान्तिकश्चेति। तत्र पक्षसपक्षविपक्षवृत्तिः साधारणः। यथा शब्दो नित्यः प्रमेयत्वात् व्योमवत्। अत्र हि प्रमेयत्वं हेतुस्तच्च नित्यानित्यवृत्ति। स यथा- भूर्नित्या गन्धवत्त्वात्  गन्धवत्त्वं हि सपक्षान्नित्याद् विपक्षाच्चानित्याद् व्यावृत्तं भूमात्रवृत्ति। अर्थात सव्यभिचार हेतु अनैकान्तिक हेत्वाभास कहलाता है। यह दो प्रकार का होता है- साधारण अनैकान्तिक और असाधारण अनैकान्तिक। उनमें पक्ष, सपक्ष और विपक्ष में रहने वाले साधारण अनैकान्तिक है, जैसे शब्द नित्य है, कियोंकि वह प्रमेय है, आकाश के समान। यहाँ प्रमेयत्व हेतु है जो नित्य (पक्ष एवं सपक्ष) एवं अनित्य (विपक्ष) दोनों से व्यावृत्त होकर केवल पक्ष में ही रहता है वह साधारण अनैकान्तिक हेत्वाभास है। जैसे भूमि नित्य है। क्योंकि यह गंधवाली है। यहाँ गन्धत्व है, वह सपक्ष- नित्य से तथा विपक्ष अनित्य से व्यावृत्त है केवल पृथिवी में रहता है।
  4. प्रकरणसम- प्रकरणसमस्तु स एव यस्य हेतोः साध्यविपरीतसाधकं हेत्वन्तरं विद्यते। स यथा शब्दोअनित्य नित्यधर्मरहितत्वात्। शब्दो नित्योअनित्यधर्मरहितत्वादिति। अयमेव हि सत्प्रतिपक्ष इति चोच्यते। अर्थात प्रकरणसम तो वह हेत्वाभास हे जिस हेतु के साध्य के विपरीत अर्थ का साधक दूसरा हेतु विद्यमान होता है। वह इस प्रकार है, जैसे शब्द अनित्य है, क्योंकि वह नित्य के धर्म से रहित (हेतु)। शब्द नित्य है, क्योंकि वह अनित्य के धर्म से रहित है। यह प्रकरणसम ही सत्प्रतिपक्ष कहलाता है।
  5. कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभास- पक्षे प्रमाणान्तरावधृतसाध्याभावो हेतुर्बाधित- विषयः कालात्ययापदिष्ट इति चोच्यते। यथा अग्निरनुष्णः कृतकत्वाज्जलवत्। अर्थात जिसके साध्य का अभाव अन्य प्रमाण से निश्चित कर दिया जाता है वह हेतु बाधितविषय तथा कालात्ययापदिष्ट कहलाता है। जैसे- अग्नि अनुष्ण है, क्योंकि वह जन्य है, जैसे जल। यहाँ कृतकत्व हेतु का साध्य अनुष्णत्व है उसका अभाव प्रत्यक्ष से ही निश्चित कर लिया गया है क्योंकि स्पर्शन प्रत्यक्ष से अग्नि में उष्णता की उपलब्धि होती है।

Question 88

'मालामतिक्रान्तः-अतिमालः' इत्यत्र समासविधायकं वर्तते

  1. AOption (a)

    अत्यादयः क्रान्त्याद्यर्थे द्वितीयया

  2. BOption (b)

    अत्यादयः कुष्ठाद्यर्थे द्वितीयया

  3. COption (c)

    कुगतिप्रादयः

  4. DOption (d)

    एकविभक्ति चापूर्वनिपाते

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Correct answer

Answer: (a)A.

अत्यादयः क्रान्त्याद्यर्थे द्वितीयया

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**प्रश्नानुवाद- ‘**मालामतिक्रान्तः-अतिमालः' यहाँ समास विधायक है-

**स्पष्टीकारण- ‘**मालामतिक्रान्तः-अतिमालः' यहाँ समास विधायक (वार्तिक) है- अत्यादयः क्रान्त्याद्यर्थे द्वितीयया। 

वार्तिक- ‘अत्यादयः क्रान्त्याद्यर्थे द्वितीयया’

वार्तिक प्रकार- विधि वार्तिक

वार्तिकार्थ- इस वार्तिक में क्रान्त का अर्थ पार गया हुआ है। लांघ चुका, पारगामी आदि अर्थों में वर्तमान ‘अति’ आदि निपातों का द्वितीया समर्थ सुबन्त के साथ समास होता है। उसे तत्पुरुष समास कहा जाता है। 

उदाहरण- अतिमालः (माला का अतिक्रमण करने वाला अर्थात सुगन्ध से माला आदि को मात दे चुका कोई पदार्थ)

  • मालाम् अतिक्रान्तः- लौकिक विग्रह
  • माला अम् अति- अलौकिक विग्रह
  • ‘अति’ इस प्रादि निपात का माला अम् इस सुबन्त के साथ ‘अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयया’ से समास हुआ।
  • प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके ‘माला अति’ बनने के बाद ‘प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम्’ से अति की उपसर्जनसंज्ञा होकर पूर्वप्रयोग हुआ।
  • पुनः ह्रस्व करने के लिए ‘एकविभक्ति चापूर्वनिपाते’ से माला की भी उपसर्जनसंज्ञा हुई और ‘गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य’ से उपसर्जन माला को ह्रस्व होकर अतिमाल बना।
  • सु, रुत्वविसर्ग करके अतिमालः सिद्ध हुआ।

इसी तरह ‘अतिक्रान्तो’ मानुषम् अतिमानुषः, अतिक्रान्तः अर्थम् अत्यर्थः आदि जगहों पर इस वार्तिक से समास किया जा सकता है।     ​

Question 89

अलङ्कारसम्प्रदायस्य प्रवर्तकाचार्यः कः?

  1. AOption (a)

    वामनः

  2. BOption (b)

    भरतः

  3. COption (c)

    भामहः

  4. DOption (d)

    रुद्रटः

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Correct answer

Answer: (c)C.

भामहः

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प्रश्नानुवाद- अलंकार सम्प्रदाय का प्रवर्तक आचार्य कौन है?

स्पष्टीकारण- काव्य के विधि व निषेध का प्रतिपादन करने वाला शास्त्र काव्यशास्त्र कहलाता है। काव्यशास्त्र के में मुख्यतया इस प्रश्न पर विचार किया जाता है की काव्य में में प्रधान तत्व या आत्म तत्व क्या है। विभिन्न काव्यशास्त्रियों ने इस प्रश्न का उत्तर भिन्न-भिन्न दिया, फलस्वरूप काव्यशास्त्र के सम्पदायों का उद्भव हुआ। काव्यशास्त्र के छह सम्प्रदाय निम्नलिखित है- 

सम्प्रदायप्रवर्तकग्रन्थ
रसभरतनाट्यशास्त्र
अलंकारभामहकाव्यालंकार
रीतिवामनकाव्यालंकारसूत्र
ध्वनिआनंदवर्धनध्वन्यालोक
वक्रोक्तिकुंतकवक्रोक्तिजीवितम्
औचित्यक्षेमेन्द्रऔचित्यविचारचर्चा

अतः अलंकार सम्प्रदाय का प्रवर्तक आचार्य भामह है।

Question 90

ऑन दि सब्लाइम [On the Sublime] ग्रन्थस्य प्रणेता वर्तते

  1. AOption (a)

    अरस्तु

  2. BOption (b)

    क्रोञ्चे

  3. COption (c)

    प्लेटो

  4. DOption (d)

    लान्जाइनस

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Correct answer

Answer: (d)D.

लान्जाइनस

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प्रश्नानुवाद- ऑन दि सब्लाइम [On the Sublime] ग्रन्थ के प्रणेता है

स्पष्टीकारण- ऑन दि सब्लाइम [On the Sublime] ग्रन्थ के प्रणेता है- लान्जाइनस।

लान्जाइनस- ​ 

  • ये एक पाश्चात्य काव्यशास्त्री थे। इनका जन्म स्थान इटली माना जाता है। इनका काल 213-273 ई॰ का माना जाता है।
  • लोंजाइनस ने काव्य को श्रेष्ठ बनाने वाले तत्वों पर विचार करते हुए ‘काव्य में उदात्त तत्व के सिद्धान्त का प्रतिपादन’ किया है।
  • यद्यपि उदात्त का अर्थ परिष्कार, शोधन, शुद्धि आदि माना जाता है तथापि काव्य में इसका अर्थ विभिन्न व्यंजनाओं के माध्यम से किसी घटना या व्यक्तित्व का वर्णन है।
  • वे उदात्त को काव्य को श्रेष्ठ बनाने वाला तथा कवि को प्रतिष्ठा दिलाने वाला तत्व मानते हैं। इस उदात्त के तीन भेद है- अंतरंग, बहिरंग, विरोधी तत्व।
  • अंतरंग से तात्पर्य कवि के उदात्त विचार, भावों की गहराई, भावों की उत्कृष्टता आदि से है। गरिमापूर्ण शब्द-विधान, अच्छी अलंकार योजना, अभिजात्य पद रचना आदि बहिरंग उदात्त तत्व हैं। वागाडंबर और भावाडंबर उदात्ता में विरोधी तत्व हैं।
  • यह उदात्त तत्व संस्कृत काव्यशास्त्र के रस से साम्य रखता है।

Question 91

'यं ब्राह्मणमियं देवी वाग्वश्येवानुवर्तते' इति केन उद्घोषितम्?

  1. AOption (a)

    भवभूतिना

  2. BOption (b)

    भासेन

  3. COption (c)

    माघेन

  4. DOption (d)

    भट्टनारायणेन

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Correct answer

Answer: (a)A.

भवभूतिना

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प्रश्नानुवाद- 'यं ब्राह्मणमियं देवी वाग्वश्येवानुवर्तते' यह किसके द्वारा कहा गया है?

स्पष्टीकरण- 

'यं ब्राह्मणमियं देवी वाग्वश्येवानुवर्तते' यह भवभूति के द्वारा कहा गया है।

यह पंक्ति महाकवि भवभूति द्वारा विरचित ‘उत्तररामचरितम’ नामक नाटक के प्रथम अंक के एक श्लोक से लिया गया है।

श्लोक-

यं ब्राह्मणमियं देवी वाग्वश्येवानुवर्तते।

उत्तरं रामचरितं तत्प्रणीतं प्रयोक्ष्यते।। 

श्लोक का अर्थ- भवभूति कहते है की यह देवी सरस्वती वशवर्तिनी के तुल्य जिस ब्रह्म भवभूति का अनुसरण करती है, उसके द्वारा बनाए हुए उत्तररामचरित नाटक का हम अभिनय करेंगे।

Additional Informationभवभूति- 

  • भवभूति संस्कृत वाङ्मय के श्रेष्ठ नाटककारों में गिने जाते हैं।
  • इनका काल 606 ई॰ से 733 ई॰ माना जाता है।
  • इनका स्थान पद्मपूर (महाराष्ट्र) माना जाता है।
  • इनके पिता का नाम नीलकण्ठ तथा माता का नाम जतुकर्णी था।
  • इनकी अनेक उपाधियाँ भी थी- श्रीकण्ठ, पदवाक्यप्रमाणज्ञ, वश्यवाक्, उम्बेक आदि।
  • इन्होंने तीन रूपकों की रचना की जो निम्नलिखित है-
  • नाटक- महावीरचरित (7 अंक), उत्तररामचरित, प्रकरण- मालतीमाधव (10 अंक)

उत्तररामचरित- 

  • यह भवभूति की श्रेष्ठ रचना है।
  • सात अंको में निबद्ध यह कथा रामायण के उत्तर काण्ड से प्रभावित है।
  • यह महावीरचरित का उत्तर भाग है जिसमें रामायण के बाल काण्ड से लेकर युद्धकाण्ड तक की कथा का वर्णन है।
  • प्रायः नाटकों में शृंगार या वीर रस को अंगी रस बनाया जाता है लेकिन भवभूति ने इस नाटक में करुण की अंगी रस बनाया है।

Question 92

कौटिलीय-अर्थशास्त्रं कति अधिकरणेषु विभक्तमस्ति?

  1. AOption (a)

    अष्टादशाधिकरणेषु

  2. BOption (b)

    द्वादशाधिकरणेषु

  3. COption (c)

    दशाधिकरणेषु

  4. DOption (d)

    पञ्चदशाधिकरणेषु

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Correct answer

Answer: (d)D.

पञ्चदशाधिकरणेषु

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : कौटिलीय अर्थशास्त्र कितने अधिकरणोंं में विभक्त है?

कौटिलीय अर्थशास्त्र का परिचय : 

कौटिलीय अर्थशास्त्र प्राचीन भारतीय राजनीति का प्रसिद्ध ग्रंथ है, जिसके रचनाकार विख्यात अर्थशास्त्रज्ञ आचार्य चाणक्य हैंं। इस ग्रंथ का स्वरूप इस प्रकार है - 

  • कौटिलीय अर्थशास्त्र की शैली उपदेशात्मक और सलाहात्मक है।
  • इसमें न केवल धर्म, अर्थ और काम का प्रणयन और पालन के बारे में कहा है, पर अधर्म, अनर्थ तथा अवांछनीय के शमन का भी विधान किया है।
  • आचार्य चाणक्य ने चंद्रगुप्त के प्रशासकीय उपयोग के लिए इस ग्रंथ की रचना की थी।
  • कौटिलीय अर्थशास्त्र में १५ अधिकरण, १५० अध्याय, १८० उपविभाग तथा ६००० श्लोक हैंं।
  • प्राचीन अर्थशास्त्रज्ञोंं का भी नामनिर्देश इस ग्रंथ में आता है।

 

​अतः स्पष्ट है, "पञ्चदशाधिकरणेषु" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 93

'प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम्' पंक्तिरियं कस्याः विद्यायाः सन्दर्भेऽस्ति

  1. AOption (a)

    त्रय्याः

  2. BOption (b)

    आन्वीक्षिक्याः

  3. COption (c)

    वार्तायाः

  4. DOption (d)

    दण्डनीतेः

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Correct answer

Answer: (b)B.

आन्वीक्षिक्याः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम्' यह पंक्ति किस विद्या के संदर्भ में है?

आन्वीक्षिकी विद्या :

भारत के विद्याविद् आचार्यों ने विद्या के चार विभाग बताए हैं -

  • आन्वीक्षिकी
  • त्रयी
  • वार्ता
  • दण्डनीति।
  • आन्वीक्षिकी का अर्थ है- प्रत्यक्षदृष्ट तथा शास्त्रश्रुत विषयों के तात्त्विक रूप को अवगत करानेवाली विद्या। यही विद्या न्यायविद्या या न्यायशास्त्र के नाम से भी जानी जाती है।
  • आन्वीक्षिकी में स्वयं न्याय का तथा न्यायप्रणाली से अन्य विषयों का अध्ययन होने के कारण उसे न्यायविद्या या न्यायशास्त्र कहा जाता है।
  • आन्वीक्षिकी विद्याओं में सर्वश्रेष्ठ मानी गई है।
  • वात्स्यायन ने अर्थशास्त्राचार्य चाणक्य के निम्नलिखित वचन को उद्धृत कर आन्वीक्षिकी को समस्त विद्याओं का प्रकाशक, संपूर्ण कर्मों का साधक और समग्र धर्मों का आधार बताया है-

प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम्।

आश्रयः सर्वधर्माणां विद्योद्देशे प्रकीर्तिता ॥ (न्यायभाष्य , सूत्र १)

अतः स्पष्ट है, की "आन्वीक्षिक्याः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 94

शब्दे व्याकरणे स्वीकारे महाभाष्ये का शङ्का नोत्थापिता

  1. AOption (a)

    ल्युडर्थस्य अनुपपन्नतायाः

  2. BOption (b)

    'तत्र भव' इत्यस्य अनुपपन्नतायाः

  3. COption (c)

    प्रोक्तादीनां तद्धितार्थानाम् अनुपपन्नतायाः

  4. DOption (d)

    षष्ठ्यर्थस्य अनुपपन्नतायाः

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Correct answer

Answer: (d)D.

षष्ठ्यर्थस्य अनुपपन्नतायाः

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प्रश्नानुवाद-  शब्द में व्याकरण स्वीकार करने पर महाभाष्य में क्या शंका नहीं प्रस्तुत की गयी है। 

महाभाष्य- 

  • पाणिनि के सूत्रों तथा कात्यायन के वार्तिकों पर पतंजलि ने जो भाष्य लिखा वह महाभाष्य कहलाता है।
  • इस विभाजन आन्हिकों में हुआ है। इसमें 84 या 85 आन्हिक हैं।
  • इसके प्रथम आन्हिक पस्पशान्हिक में व्याकरण को शब्द मानने पर तीन दोष तथा सूत्र मानने पर दो दोष होते हैं।

​व्याकरण का अर्थ शब्द मानने पर तीन दोष-

  • ल्युट् प्रत्यय के अर्थ की अनुपपत्ति - ‘शब्द पक्ष में’ व्याक्रियते शब्दा अनेन इस व्युत्पत्ति में वि+ आङ्+ ल्युट्= अन यहाँ करण अर्थ में ल्युट् होता है, किन्तु व्याकरण का अर्थ शब्द मानने पर यह अर्थ उत्पन्न नहीं हो सकता, क्योंकि व्याकरण= शब्द के द्वारा किसी व्युत्पतिव्याकृति नहीं की जाती है। इसके विपरीत शब्द की व्याकृति (प्रकृति- प्रत्यय विभागादि- ज्ञान) की जाती है। अतः शब्द व्याकृति का कारण नहीं अपितु कर्म है।
  • ‘तत्र भवः’ भव अर्थ वाले तद्धित प्रत्यय की ‘अनुपपत्ति- व्याकरणे भवो योगः वैयाकरणः’ कहा जाता है, परन्तु व्याकरण= शब्द में तो कोई योग नहीं होता है, अपितु एक सूत्र में ही कहीं कहीं दूसरा योग सूत्र कल्पित कर लिया जाता है।
  • प्रोक्त अर्थ वाले तद्धित प्रत्यय भी नहीं उपपन्न होते हैं, क्योंकि पाणिनिना प्रोक्तम् इस अर्थ में पाणिनीयम् आदि शब्द बनाने के लिए ‘तेन प्रोक्तम्’ से तद्धित प्रत्यय होते हैं, परन्तु व्याकरण शब्द मानने पर ये प्रत्यय नहीं हो सकते, क्योंकि पाणिनि आदि के द्वारा प्रोक्त शब्द नहीं अपितु सूत्र ही प्रोक्त है।

Important Pointsव्याकरण का अर्थ सूत्र मानने पर दोष-

  • व्याकरणसूत्रम् - यहाँ षष्ठी का अर्थ उपपन्न नहीं हो सकता, क्योंकि षष्ठी का अर्थ सम्बन्ध है और वह दो भिन्न पदार्थों में ही होता है, जैसे राज्ञः पुरुषः। परन्तु जब व्याकरण श��्द का अर्थ सूत्र माना जाता है, तब व्याकरण और सूत्र एक ही हो जाते हैं, दोनों में भेद नहीं है, अतः षष्ठ्यर्थ भेद सम्बन्ध की उपपत्ति नहीं हो सकती।
  • दूसरा दोष यह है कि ‘व्याकरणात् शब्दान् प्रतिपद्यामहे’ अर्थात् व्याकरण से शब्दों का ज्ञान करते हैं, ऐसा व्यवहार होता है, किन्तु इस सूत्रपक्ष में नहीं हो सकता क्योंकि केवल सूत्र से शब्दों की प्रतिपत्ति का ज्ञान नहीं होता है। उसके लिए तो व्याख्यान की भी आवश्यकता पड़ती है। उदाहरण, प्रत्युदाहरण, वाक्य का अध्याहार ये सब मिलकर ही व्याख्यान होते हैं। केवल सूत्र का सन्धिविच्छेद कर देना व्याख्यान नहीं है।

Question 95

'सर्पिषो नाथनम्' इह षष्ठी विभक्तिर्भवति

  1. AOption (a)

    कर्मणः शेषत्वेन विवक्षायाम्

  2. BOption (b)

    करणस्य शेषत्वेन विवक्षायाम्

  3. COption (c)

    सम्बन्धस्य सम्बन्धत्वेन विवक्षायाम्

  4. DOption (d)

    अधिकरणस्य शेषत्वेन विवक्षायाम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

कर्मणः शेषत्वेन विवक्षायाम्

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प्रश्नानुवाद- ‘सर्पिषो नाथनम्' यहाँ षष्ठी विभक्ति होती है

**स्पष्टीकारण- ‘**सर्पिषो नाथनम्' यहाँ षष्ठी विभक्ति कर्म की शेषत्व की विवक्षा में होता है।

  • सूत्र- ‘आशिषि नाथः’ (2/3/55)
  • सूत्र प्रकार- विधि सूत्र
  • अनुवृत्ति- आशीरर्थस्य नाथतेः शेषे कर्मणि षष्ठी स्यात्। सर्पिषो नाथनम् ।
  • सूत्रार्थ- आशीर्वाद अर्थ में नाथ् धातु के कर्म में सम्बन्धमात्र की विवक्षा में षष्ठी विभक्ति होती है।
  • **उदाहरण- ‘**सर्पिषो नाथनम्’- घी सम्बन्धी इच्छा, इस वाक्य में नाथ् धातु के कर्म सर्पिष् में सम्बन्ध की विवक्षा होने पर सर्पिषः षष्ठी विभक्ति ‘आशिषि नाथः’ सूत्र से हुई। सूत्र में आशिषि पद का प्रयोग इसलिए किया गया है, क्योंकि नाथ् धातु का आशिष् से भिन्न अर्थात् याचना के अर्थ में उसके कर्म में द्वितीया विभक्ति होती है।

Question 96

वेदान्तदर्शनानुसारं जगत: प्रपञ्च: किं कथ्यते?

  1. AOption (a)

    ईश्वरस्य स्वरूपम्

  2. BOption (b)

    अनन्तसत्ता

  3. COption (c)

    अनादितत्त्वम्

  4. DOption (d)

    विवर्तः

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Correct answer

Answer: (d)D.

विवर्तः

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प्रश्नानुवाद- वेदान्त दर्शन ने अनुसार जगत का प्रपंच क्या कहलता है?

स्पष्टीकरण- वेदान्त दर्शन ने अनुसार जगत का प्रपंच विवर्त कहलता है।

वेदान्त दर्शन- 

  • यह षड् भारतीय आस्तिक दर्शनों में सबसे प्रचलित है।
  • इसके प्रवर्तक बादरायण व्यास माने जाते हैं।
  • बादरायण विरचित ब्रह्मसूत्र इस दर्शन का आधारभूत ग्रंथ है।
  • प्रस्थानत्रयी के नाम से प्रसिद्ध उपनिषद्, गीता एवं ब्रह्मसूत्र सभी वेदान्त सम्प्रदायों का प्रमुख आधार ग्रंथ है।
  • ब्रह्मसूत्र पर लिखा गया आचार्य शंकर का शारीरिक भाष्य इस दर्शन का अद्भुत ग्रंथ माना गया है। इन्होंने अपने ग्रंथ में जीव और ब्रह्म की एकता को स्थापित किया है। अतः ये अद्वैतवाद के समर्थक हुए।

Additional Informationविवर्त- 

  • किसी वस्तु में अन्य वस्तु की मिथ्या प्रतीति विवर्त कहलाता है। जैसे- रज्जु में साँप की प्रतीति।
  • विवर्तवाद आचार्य शंकर का कार्य-कारण सिद्धांत है। उनके अनुसार समस्त संसार ब्रह्म का ही विवर्त है।

Question 97

जीवाजीवाख्ये द्वे तत्त्वे कस्मिन् दर्शने मन्येते?

  1. AOption (a)

    बौद्धदर्शने

  2. BOption (b)

    सांख्यदर्शने

  3. COption (c)

    वेदान्तदर्शने

  4. DOption (d)

    जैनदर्शने

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Correct answer

Answer: (d)D.

जैनदर्शने

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : जीव और अजीव नामक दो तत्व किस दर्शन में माने गए हैंं?

जैन ग्रंथों में सात तत्त्वों का वर्णन मिलता हैं। वह हैंं - जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष।

जीव तत्व :

  • जीव शब्द का प्रयोग जैन दर्शन में आत्मा के लिए किया जाता है। जैन दर्शन सबसे पुराना भारतीय दर्शन है जिसमें कि शरीर (अजीव) और आत्मा (जीव) को पूर्णता पृथक माना गया है। इन दोनों के मेल को अनादि से बताया गया है, जिसे रत्नात्रय (सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, और सम्यक् चरित्र) के माध्यम से पूर्णता पृथक किया जा सकता है। संयम से जीव मुक्ति या मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।
  • आचार्य उमास्वामी ने तीर्थंकर महावीर के मन्तव्यों को पहली सदी में सूत्रित करते हुए तत्त्वार्थ सूत्र में लिखा है - 
  • "परस्परोपग्रहो जीवानाम्"।
  • इस सूत्र का अर्थ है, 'जीवों के परस्पर में उपकार है'।

अजीव तत्व :

  • अजीव शब्द का अर्थ होता हैं जिसमें जान न हो। कुर्सी मेज, पन्ना आदि अजीव वस्तु के उदहारण हैं।
  • जैन दर्शन के अनुसार यह सात तत्त्वों में से एक तत्त्व हैं। इस में स्वयं का बल नहीं होता है और ये स्वयं गति नहीं कर सकते हैं।
  • जैन दर्शन के अनुसार अजीव द्रव्य के पांच भेद हैं:-
  • धर्मास्तिकाय
  • अधर्मास्तिकाय
  • आकाशास्तिकाय
  • पुद्गलास्तिकाय
  • काल

अतः स्पष्ट है, "जैनदर्शने" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 98

चार्वाकदर्शनस्य कृते किम् अपरनाम प्रचलितमस्ति?

  1. AOption (a)

    ब्रह्मदर्शनम्

  2. BOption (b)

    परलोकदर्शनम्

  3. COption (c)

    ऐहलौकिकदर्शनम्

  4. DOption (d)

    लोकायतदर्शनम्

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Correct answer

Answer: (d)D.

लोकायतदर्शनम्

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प्रश्नानुवाद- चार्वाक दर्शन के लिए क्या अपर नाम प्रचलित है?

स्पष्टीकरण- चार्वाक दर्शन के लिए लोकायत दर्शन नाम प्रचलित है, क्योंकि यह केवल लौकिक वस्तुओं की सत्ता ही स्वीकार करता है। 

चार्वाक दर्शन-

  • चार्वाक भारतीय नास्तिक दर्शनों में सबसे प्रमुख है। अतः, यह नास्तिक शिरोमणि कहलाता है।
  • तत्व मीमांसा- चार्वाक केवल चार तत्वों को मानता है- पृथ्वी, वायु, अग्नि तथा जल।
  • प्रमाण मीमांसा- चार्वाक केवल प्रत्यक्ष प्रमाण मानता है- प्रत्यक्षमेव प्रमाणम् ।
  • अचार मीमांसा- यह वस्तुतः सुखवादी दर्शन है। इसके अनुसार व्यक्ति का परम प्रयोजन है अपनी इच्छाओं की पूर्ति। इसकी पुष्टि निम्नलिखित पंक्ति से होती है- यावत् जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणम् घृतं पिबेत्। अर्थात् जब तक जीवित रहो सुख से रहो चाहे ऋण लेकर घी का भी सेवन करो।
  • कार्य-कारण सिद्धान्त- यह दर्शन सृष्टि की रचना का कोई कारण नहीं मानता है। इनके कारण सृष्टि अपने स्वभाव से उत्पन्न हुई है, जैसे अग्नि में उष्णता। अतः ये स्वभाववाद के समर्थक हैं।
  • आत्मा- ये आत्मा को शरीर से युक्त मानते है। अतः ये देहात्मवाद के समर्थक है।
  • ईश्वर- ये ईश्वर के उस दिव्य या चेतन सत्ता को स्वीकार नहीं करते है। अतः ये अनीश्वरवादी दर्शन है। ये राजा को ही ईश्वर कह देते है।
  • मोक्ष- इनके मत में मृत्यु ही मोक्ष है।

Question 99

'क्व सूर्यप्रभवो वंशः क्व चाल्पविषया मतिः।' इत्यत्र 'अल्पविषया मतिः' इति कस्य कृते प्रयुक्तम्?

  1. AOption (a)

    विशाखदत्तस्य

  2. BOption (b)

    भासस्य

  3. COption (c)

    कालिदासस्य

  4. DOption (d)

    बाणभट्टस्य

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Correct answer

Answer: (c)C.

कालिदासस्य

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प्रश्नानुवाद- 'क्व सूर्यप्रभवो वंशः क्व चाल्पविषया मतिः।' यहाँ 'अल्पविषया मतिः' यह किसके लिए प्रयोग किया गया है?

स्पष्टीकरण-

'क्व सूर्यप्रभवो वंशः क्व चाल्पविषया मतिः।' यहाँ 'अल्पविषया मतिः' यह कालिदास के लिए प्रयोग किया गया है।

यह पंक्ति कालिदास विरचित ‘रघुवंश’ के प्रथम सर्ग से लिया गया है।

श्लोक-

क्व सूर्यप्रभवो वंशः क्व चाल्पविषया मतिः ।

तितीर्षुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम् ॥ 

श्लोक का अर्थ-  श्लोक में कालिदास अपने विषय में कहते हैं कि सूर्य से उत्पन्न हुआ वह तेजस्वी वंश कहां और कहां मेरी मंदबुद्धि। (मैं रघु के वंश का वर्णन करने से सर्वथा अयोग्य हूं फिर भी मेरी मूर्खता है कि) मैं उसी तरह इसे पार करना चाहता हूं जैसे कोई छोटी सी नाव से अपार समुद्र को पार करने की इच्छा कर रहा हो ।

 Additional Informationरघुवंश- 

  • रघुवंश कालिदास द्वारा विरचित एक महाकाव्य है।
  • इसमें 19 सर्ग हैं।
  • इसमें  29 रघुवंशीय राजा का वर्णन है।
  • इसकी कथा रामायण पर आधारित है।
  • इस ग्रन्थ पर सर्वाधिक प्रसिद्ध टीका मल्लिनाथ विरचित 'संजीवनी' नामक टीका है।

कालिदास- 

  • ये संस्कृत साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कवियों में से एक है।
  • इनके काल के सम्बंध में पर्याप्त मतभेद है। प्रायः अधिकांश विद्वान इनका काल  ई॰ पू॰ प्रथम शताब्दी मानते है।
  • इनके स्थान के सम्बंध में भी पर्याप्त मतभेद है। प्रायः अधिकांश विद्वान इनका स्थान उज्जैन मानते है।
  • इनकी रचनाओं की संख्या के सम्बंध में भी पर्याप्त मतभेद है। कुछ विद्वान कालिदास की रचनाओं की संख्या 41 तक ले जाते हैं। निर्विवाद रूप से अधिकांश विद्वानों ने सिर्फ निम्नलिखित 7 रचनाओं को ही कालिदास का माना है।
  • महाकाव्य- रघुवंश (19 सर्ग), कुमारसम्भव (17)
  • खण्डकाव्य- मेघदूत (पूर्व मेघ तथा उत्तर मेघ), ऋतुसंहार (6 सर्ग)
  • रूपक (नाटक)- अभिज्ञानशाकुन्तल (7 अंक), मालविकाग्निमित्र (5 अंक)
  • उपरूपक (त्रोटक)- विक्रमोर्वशीयम्

Question 100

वानीरकुञ्जोड्डीनशकुनि कोलाहलं शृण्वन्त्याः।

गृहकर्मव्यापृताया वध्वाः सीदन्त्यङ्गानि।।

काव्यप्रकाशानुसारम् उपर्युक्तमुदाहरणं कस्य?

  1. AOption (a)

    काक्वाक्षिप्तगुणीभुतव्यंग्यस्य

  2. BOption (b)

    असुन्दरगुणीभूतव्यंग्यस्य

  3. COption (c)

    अस्फुटगुणीभूतव्यंग्यस्य

  4. DOption (d)

    सन्दिग्धप्राधान्यगुणीभूतव्यंग्यस्य

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Correct answer

Answer: (b)B.

असुन्दरगुणीभूतव्यंग्यस्य

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प्रश्नान���वाद- काव्यप्रकाश के अनुसार उपरोक्त उदाहरण किसका है?

स्पष्टीकरण- काव्यप्रकाश के अनुसार उपरोक्त उदाहरण असुन्दरगुणीभूतव्यंग्य का है। 

काव्यप्रकाश- 

  • काव्यप्रकाश आचार्य मम्मट द्वारा विरचित एक काव्यशास्त्रीय ग्रंथ है।
  • इसका विभाजन 10 उल्लासों में हुआ है।
  • आचार्य मम्मट ने काव्य के तीन भेद माने हैं- ध्वनि काव्य (उत्तम काव्य), गुणीभूतव्यंग्य काव्य (मध्यम काव्य), अवर (चित्र) काव्य (अधम काव्य)।
  • आचार्य मम्मट ने काव्यप्रकाश के पाँचवें उल्लास में गुणीभूतव्यंग्य काव्य की चर्चा की है।

​गुणीभूतव्यंग्य काव्य- 

  • जिस काव्य में वाच्य से अधिक चमत्कारी व्यंग्य अर्थ हो, उसे ध्वनि काव्य कहते है।
  • जिस काव्य में वाच्य से अधिक चमत्कारी व्यंग्य अर्थ न हो, उसे गुणीभूतव्यंग्य काव्य कहते है।
  • गुणीभूत व्यंग्य के आठ भेद हैं- अगूढ़, अपरांग, वाच्यसिद्ध्यंग, अस्फुट, संदिग्धप्रधान, तुल्यप्रधान, काक्वाक्षिप्त तथा असुन्दर।
  • आचार्य मम्मट ने असुन्दर गुणीभूतव्यंग्य का निम्नलिखित उदाहरण दिया है- वानीरकुञ्जोड्डीनशकुनि कोलाहलं शृण्वन्त्याः। गृहकर्मव्यापृताया वध्वाः सीदन्त्यङ्गानि।।
  • अर्थात बेत-वानीर की लताओं के कुंज में उड़ते हुए पक्षियों के कोलाहल को सुनकर घर के काम में लगी हुई वधू के अंग शिथिल हो रहे हैं। यहाँ
  • ‘दत्त संकेत कोई लतागृह में प्रविष्ट हो गया है’ इस व्यंग्य से बहु के अंग शिथिल हो रहे हैं, यह वाच्य अधिक चमत्कारजनक है। अतः यह असुन्दर गुणीभूतव्यंग्य काव्य है।

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