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UGC NET Paper 2: Sanskrit 19th Dec 2018 (Previous Year Paper)

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Question 1

अधस्तनेषु किं मेलनं समुचितम्?

  1. AOption (a)

    आ मुक्तेः- आङ्मर्यादाभिविध्योः

  2. BOption (b)

    मुहूर्तसुखम्- यस्य चायामः

  3. COption (c)

    घृतगन्धि- वोपसर्जनात्

  4. DOption (d)

    दम्पती- स्त्रियां संज्ञायाम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

आ मुक्तेः- आङ्मर्यादाभिविध्योः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : नीचे दिये हुए विकल्पोंं में कौन सा मेलन समुचित है?

प्रस्तुत सूत्र यह पाणिनी के अष्टाध्यायी में उल्लेखित है।

सूत्र - आङ् मर्यादाभिविध्योः (२.१.१२)अनुवृत्ति -  विभाषाः, पञ्चम्या, सुप, सह सुपा, समासः, अव्ययीभावः।

अर्थ - मर्यादाभिविध्योः वर्त्तमान आ इत्येष शब्दः समर्थेन पञ्चम्यन्तेन सुबन्तेन सह विकल्पेन समस्यते, अव्ययीभावश्च समासो भवति ॥

उदाहरण - आ पाटलिपुत्रं वृष्टो देवः, आ पाटलिपुत्राद् वृष्टो देवः अभिविधौ -आकुमारं यशः पाणिनेः, आ कुमारेभ्यो यशः पाणिनेः।

भाषार्थः -

  • [मर्यादाभिविध्योः ] मर्यादा और अभिविधि अर्थ में वर्त्तमान [आङ्] आङ् शब्द समर्थ पञ्चम्यन्त सुबन्त के साथ विकल्प से समास को प्राप्त होता है, और वह समास अव्ययीभावसंज्ञक होता है । उदाहरण में पूर्व सूत्र के समान पञ्चमी विभक्ति हुई है, तथा आङ्मर्यादावचने (१.४.८८) से आ की कर्मप्रवचनीय संज्ञा हुई है।

 

अतः स्पष्ट है, की "आ मुक्तेः- आङ्मर्यादाभिविध्योः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 2

अधोऽङ्कितेषु केन सह कस्य सम्बन्धः?

समुचितां तालिकां चिनुत-

(a)अचोन्त्यादि(i)प्रगृह्यः
(b)इ इन्द्रः(ii)उपधा
(c)कृत्तद्धितसमासाश्च(iii)टि
(d)अन्त्यादलः पूर्वो वर्णः(iv)प्रातिपदिकम्
  1. AOption (a)

    (a)-(i), (b)-(ii), (c)-(iv), (d)-(iii)

  2. BOption (b)

    (a)-(iii), (b)-(i), (c)-(iv), (d)-(ii)

  3. COption (c)

    (a)-(ii), (b)-(i), (c)-(iii), (d)-(iv)

  4. DOption (d)

    (a)-(iv), (b)-(ii), (c)-(iii), (d)-(i)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(a)-(iii), (b)-(i), (c)-(iv), (d)-(ii)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किस का किस के साथ संबंध है?

प्रस्तुत सूत्र यह पाणिनी के अष्टाध्यायी में स्थित है।

स्पष्टीकरण : 

संपूर्ण सूत्रसूत्र क्रमांकसूत्रार्थहिंदी अर्थ
अचोन्त्यादि टि।१.१.६४शब्दस्य अन्तिम-अच्-वर्णात् आरभ्य शब्दस्य अन्तिमवर्णं यावत् विद्यमानस्य अंशस्य 'टि' इति संज्ञा भवति।शब्द के अन्तिम-अच्-वर्ण से आरंभ कर शब्द के अन्तिमवर्ण पर्यंत जो अंश होता है, उसे 'टि' संज्ञा होती है।
निपात एकाजनाङ्।१.१.१४'आङ्' इति वर्जयित्वा अन्ये व्यञ्जनविरहिताः एकाचः निपाताः प्रगृह्यसंज्ञकाः भवन्ति।'आङ्' छोडकर जो व्यंजन विरहित एक स्वर होनेवाले निपात होतें हैंं, वह 'प्रगृह्य' संज्ञक होतें हैंं। जैसे - इ इन्द्रः, उ उमेशः।
कृत्तद्धितसमासाश्च।१.२.४६कृत्-प्रत्ययान्तशब्दानाम्, तद्धितप्रत्ययान्तशब्दानाम् तथा सामासिकशब्दानाम् 'प्रातिपदिकम्' इति संज्ञा भवति।कृत्-प्रत्ययान्त शब्द, तद्धित प्रत्ययान्त शब्द तथा सामासिक शब्दोंं की 'प्रातिपदिकम्' संज्ञा होती है।
अलोऽन्त्यात् पूर्व उपधा।१.१.६५शब्दे अन्तिमवर्णात् पूर्वम् विद्यमानस्य वर्णस्य 'उपधा' इति संज्ञा भवति।शब्द के अन्तिमवर्ण के पूर्व जो वर्ण होता है, उसे 'उपधा' संज्ञा होती है।

 

अतः स्पष्ट है, की "(a)-(iii), (b)-(i), (c)-(iv), (d)-(ii)" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 3

अधोऽङ्कितेषु समासप्रकरणानुसारं केन सह कस्य सम्बन्धः?

समुचितां तालिकां चिनुत-

(a)हंसौ(i)जातेश्च
(b)ब्राह्मणक्षत्रियविट्शूद्राः(ii)पुमान् स्त्रिया
(c)शूद्रभार्यः(iii)न निर्धारणे
(d)नृणां द्विजः श्रेष्ठः(iv)वर्णानामानुपूर्व्येण
  1. AOption (a)

    (a)-(iv), (b)-(i), (c)-(iii), (d)-(ii)

  2. BOption (b)

    (a)-(iii), (b)-(iv), (c)-(ii), (d)-(i)

  3. COption (c)

    (a)-(i), (b)-(iv), (c)-(ii), (d)-(iii)

  4. DOption (d)

    (a)-(ii), (b)-(iv), (c)-(i), (d)-(iii)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(a)-(ii), (b)-(iv), (c)-(i), (d)-(iii)

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प्रश्न का हिंदी अर्थ : समास प्रकरण के अनुसार किस का किस के साथ संबंध है?

प्रस्तुत सूत्र यह पाणिनी के अष्टाध्यायी में स्थित है।

स्पष्टीकरण - 

सूत्रसूत्रार्थउदाहरण
पुमान् स्त्रिया (१.२.६७)स्त्रिया सहोक्तौ पुमान् शिष्यते तल्लक्षण एव विशेषश्चेत् ।हंसौ
वर्णानामानुपूर्व्येण (वार्तिक) सूत्र - अल्पाच्तरम् (७.१.३२)द्वन्द्वे वर्णानामानुपूर्व्येण पूर्वनिपातो वक्तव्यः।ब्राह्मणक्षत्रियविट्शूद्राः
जातेश्च (६.३.४१)जातेश्च स्त्रियाः न पुंवद् भवति अमानिनि परतः।शूद्रभार्यः
न निर्धारणे (२.२.१०)निर्धारणे या षष्ठी सा न समस्यते।नृणां द्विजः श्रेष्ठः

 

अतः स्पष्ट है, की "(a)-(ii), (b)-(iv), (c)-(i), (d)-(iii)" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 4

"वागर्थाविव" इत्यत्र कतमः समासः?

  1. AOption (a)

    द्विगुसमासः

  2. BOption (b)

    केवलसमासः

  3. COption (c)

    कर्मधारयसमासः

  4. DOption (d)

    अव्ययीभावसमासः

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Correct answer

Answer: (b)B.

केवलसमासः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : "वागर्थाविव" इसमें कौन सा समास है?

केवलसमास :

व्याख्या -

  • स च विशेषसंज्ञाविनिर्मुक्‍त: केवलसमासः।
  • यस्‍य निश्चितं संज्ञा न भवति स: केवलसमासः।
  • जिसकी निश्चित संज्ञा नहीं हो सकती, वह केवलसमास होता है।

उदाहरण - 

  • पूर्वं भूत: - भूतपूर्वम्
  • वागर्थौ इव - वागर्थाविव

वार्तिक :

इवेन समासो विभक्त्यलोपश्च । वागर्थौ इव वागर्थाविव ।।

  • वार्तिकार्थ- इव शब्द के साथ सुबन्त का समास होता है तथा विभक्ति का लोप भी नहीं होता।
  • य�� सूत्र समास करने के साथ साथ सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से प्राप्त विभक्ति के लुक् का निषेध भी करता है।

उदाहरण - वागर्थाविव :

  • वागर्थौ इव यह लौकिक विग्रह और वागर्थ औ इव यह अलौकिक विग्रह है।
  • अलौकिक विग्रह में इवेन सह समासो विभक्त्यलोपश्च से समास होने के बाद वागर्थ और इव की प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई और बीच में विद्यमान और विभक्ति का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से प्राप्त लुक् को इस वार्तिक के द्वारा अलुक् (लोप का निषेध) का विधान किया गया। वागर्थौ इव बना ।
  • औकार के स्थान पर एचोऽयवायावः से आव् आदेश होकर वागर्थाविव बन गया।
  • वागर्थाविव = वाणी और अर्थ की तरह।

 

अतः स्पष्ट है, की "केवलसमासः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 5

अधस्तनेषु किं मेलनं सत्यमस्ति-

  1. AOption (a)

    प्रायश्चित्तीया मा भूमेत्यध्येयं व्याकरणम्-सारस्वतीम्

  2. BOption (b)

    न चान्तरेण व्याकरणं कृतस्तद्धिता वा शक्या विज्ञातुम्- सुदेवोऽसि

  3. COption (c)

    त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति- सक्तुमिव

  4. DOption (d)

    म्लेच्छो ह वा एष यदपशब्दः- दुष्टः शब्दः

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Answer: (a)A.

प्रायश्चित्तीया मा भूमेत्यध्येयं व्याकरणम्-सारस्वतीम्

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : कौन सा मेलन सत्य है?

व्याकरण - अध्ययन के प्रयोजन :

पतंजलि ने व्याकरण अर्थात् शब्दानुशासनशास्त्र के प्रयोजन को दो भागों में विभाजित किया है।

  • मुख्यप्रयोजन
  • गौणप्रयोजन।

मुख्यप्रयोजन में पाँच प्रयोजन है -

रक्षोहागमलघ्वसन्देहाः प्रयोजनम्।

  1. रक्षा - वेद शास्त्र की रक्षा के लिये व्याकरणाध्ययन आवश्यक है क्योंकि वेद की रक्षा वही कर सकता है जो लोप तथा आगम का ज्ञान रखता हो।
  2. ऊह - ऊह अर्थात् विभक्तियों का विपरिणाम भी शब्दशास्त्र के अध्ययन का प्रयोजन है वेद में प्रयुक्त शब्दों की विभक्तियों, वचनों आदि का ज्ञान आवश्यक है, जो व्याकरण से ज्ञात होता है।
  3. आगम - ब्राह्मण को बिना किसी दृष्ट कारण की अपेक्षा किये छः अङ्गों से युक्त वेद का धर्म मान कर अध्ययन और अर्थज्ञान प्राप्त करना चाहिए, ऐसी श्रुति है। वेद के उन छः अङ्गों में मुख्य अङ्ग व्याकरण ही है और मुख्य के विषय में किया गया प्रयत्न ही फलदायक होता है। अतः आगम भी एक प्रयोजन है।
  4. लघु - कम शब्दों से ज्यादा अर्थ का ज्ञान करना ही व्याकरण का प्रयोजन है।
  5. असन्देह - असन्देह के लिये भी व्याकरण का अध्ययन आवश्यक है।

इस के अतिरिक्त १३ आनुषंगिक अथवा गौण प्रयोजन इस प्रकार हैंं - 

इमानि च भूयः शब्दानुशानस्य, प्रयोजनानि-

  1. तेऽसुराः। तेऽसुरा हेलयो हेलय इति कुर्वन्तः पराबभूयुः तस्मात् ब्राह्मणेन न म्लेच्छितवै नापभाषितवै म्लेच्छो ह वा एष यदपशब्दः।
  2. दुष्टः शब्दः। दुष्टः शब्दः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह। स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात्।।
  3. यदधीतम्। यदधीतमविज्ञातं निगदेनैव शब्द्यते। अनग्नाविव शुष्केन्धोन तज्ज्वलति कर्हिचित्।।
  4. यस्तु प्रयुङ्क्ते। यस्तु प्रयुङ्क्ते कुशलो विशेषे शब्दान्यथावद् व्यवहारकाले। सोऽनन्तमाप्नोति जयं परत्र वाग्योगविद्दुष्यति चापशब्दैः।।
  5. अविद्वांसः। अविद्वांसः प्रत्यभिवादे नाम्नो ये प्लुतिं विदुः। कामं तेषु तु विप्रोष्य स्त्रीष्विवायमहं वदेत्।। अभिवादे स्त्रीवन्मा भूमेत्यध्येयं व्याकरणम्।।
  6. विभक्तिं कुर्वन्ति। याज्ञिकाः पठन्ति- प्रयाजाः –सविभक्तिकाः कार्याः इति न चान्तरेण व्याकरणं प्रयाजा सविभक्��िकाः शक्याः कर्तुम्।।
  7. यो वा इमाम्। यो वा इमां पदशः स्वरशोऽक्षरशश्च वाचं विदधाति स आर्त्विजीनो यजमानो भवति। आर्त्विजीनाः स्यामेत्यध्येयं व्याकरणम्।
  8. चत्वारि। चत्वारि वाक्परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः। गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति।।
  9. उत त्वः। उत त्वः पश्यन्न ददर्श वाचमुत त्वः श्रृण्वन्न श्रृणोत्येनाम्। उतो त्वस्मै तन्वं विसस्त्रे जायेव पत्य उशतो सुवासाः।।
  10. सक्तुमिव। सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत्। अत्रा सखायः संख्यानि जानते भैद्रषां लक्ष्मीर्निहिताधिवाचि।।
  11. सारस्वतीम्। आहिताग्निरपशब्दं प्रयुक्त प्रायश्चित्तीयां सारस्वतीमिष्टि निर्वपेद् इति।
  12. दशभ्यां पुत्रस्य। दशम्युत्तरकालं पुत्रस्य जातस्य नाम विदध्याद् घोषवदा।
  13. सुदेवो असि वरुणेति। सुदेवो असि वरुणः! यस्य ते सप्त सिन्धवः। अनुरक्षन्ति काकुदं सूम्यं सुषिरामिव।।

इत्यादिना।

अतः स्पष्ट है, की "प्रायश्चित्तीया मा भूमेत्यध्येयं व्याकरणम्-सारस्वतीम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 6

महाभाष्ये व्याकरणस्य आनुषङ्गिकप्रयोजनेषु "विभक्तिं कुर्वन्ति" इत्यस्य क्रमोऽस्ति-

  1. AOption (a)

    सप्तमः

  2. BOption (b)

    षष्ठः

  3. COption (c)

    पञ्चमः

  4. DOption (d)

    दशमः

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Answer: (b)B.

षष्ठः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : महाभाष्य में  व्याकरण के स्ङ्क आनुषंगिक प्रयोजनोंं में  "विभक्तिं कुर्वन्ति" का क्रम क्या है?

व्याकरण - अध्ययन के प्रयोजन :

पतंजलि ने व्याकरण अर्थात् शब्दानुशासनशास्त्र के प्रयोजन को दो भागों में विभाजित किया है।

  • मुख्यप्रयोजन
  • गौणप्रयोजन।

मुख्यप्रयोजन में पाँच प्रयोजन है -

रक्षोहागमलघ्वसन्देहाः प्रयोजनम्।

  1. रक्षा - वेद शास्त्र की रक्षा के लिये व्याकरणाध्ययन आवश्यक है क्योंकि वेद की रक्षा वही कर सकता है जो लोप तथा आगम का ज्ञान रखता हो।
  2. ऊह - ऊह अर्थात् विभक्तियों का विपरिणाम भी शब्दशास्त्र के अध्ययन का प्रयोजन है वेद में प्रयुक्त शब्दों की विभक्तियों, वचनों आदि का ज्ञान आवश्यक है, जो व्याकरण से ज्ञात होता है।
  3. आगम - ब्राह्मण को बिना किसी दृष्ट कारण की अपेक्षा किये छः अङ्गों से युक्त वेद का धर्म मान कर अध्ययन और अर्थज्ञान प्राप्त करना चाहिए, ऐसी श्रुति है। वेद के उन छः अङ्गों में मुख्य अङ्ग व्याकरण ही है और मुख्य के विषय में किया गया प्रयत्न ही फलदायक होता है। अतः आगम भी एक प्रयोजन है।
  4. लघु - कम शब्दों से ज्यादा अर्थ का ज्ञ��न करना ही व्याकरण का प्रयोजन है।
  5. असन्देह - असन्देह के लिये भी व्याकरण का अध्ययन आवश्यक है।

इस के अतिरिक्त १३ आनुषंगिक अथवा गौण प्रयोजन इस प्रकार हैंं - 

इमानि च भूयः शब्दानुशानस्य, प्रयोजनानि-

  1. तेऽसुराः।
  2. दुष्टः शब्दः।
  3. यदधीतम्।
  4. यस्तु प्रयुङ्क्ते।
  5. अविद्वांसः।
  6. विभक्तिं कुर्वन्ति।
  7. यो वा इमाम्।
  8. चत्वारि।
  9. उत त्वः।
  10. सक्तुमिव।
  11. सारस्वतीम्।
  12. दशभ्यां पुत्रस्या।
  13. सुदेवो असि वरुणेति।

इत्यादिना।

अतः स्पष्ट है, की "षष्ठः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 7

पाणिनीयशिक्षानुसारेण विसर्गस्य रूपपरिवर्तनं [गतिः] कतिविधम् भवति?

  1. AOption (a)

    त्रिविधम्

  2. BOption (b)

    अष्टविधम्

  3. COption (c)

    सप्तविधम्

  4. DOption (d)

    नवविधम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

अष्टविधम्

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : पाणिनीय शिक्षा के अनुसार विसर्ग का रूप परिवर्तन कितने प्रकार का होता है?

पाणिनीय शिक्षा-

  • पाणिनीय शिक्षा संस्कृत व्याकरण पर आधारित एक पद्यात्मक ग्रंथ है।
  • पाणिनीय शिक्षा को वर्णोच्चारण शिक्षा के रूप में भी जाना जाता है। पाणिनीय शिक्षा के रचयिता पाणिनि हैं।
  • सम्पूर्ण पाणिनीय शिक्षा में कुल 60 श्लोक हैं। पाणिनि के व्याकरण पर आधारित तथा सम्बंधित होने के कारण इसको पाणिनीय शिक्षा कहा जाता है।

स्पष्टीकरण :

ओभावश्च विवृत्तिश्च शषसा रेफ एव च।

जिह्वामूलमुपध्मा च गतिरष्टविधोष्मणः*।।* (पाणिनीय शिक्षा, १४)

अर्थ : 

  • ओभाव, विवृति, श, ष, स, र, जिव्हामूल, और उपध्मा यह विसर्ग की आठ गतिविधियाँँ होती हैंं।

अतः स्पष्ट है, की "अष्टविधम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 8

अधोऽङ्कितेषु केन सह कस्य सम्बन्धः?

समुचितां तालिकां चिनुत-

(a)अयोगात्मकभाषा(i)संस्कृत भाषा
(b)श्लिष्टयोगात्मकभाषा(ii)तुर्की
(c)प्रश्लिष्टयोगात्मकभाषा(iii)तिब्बती भाषा
(d)अश्लिष्टयोगात्मकभाषा(iv)चेरोकी
  1. AOption (a)

    (a)-(iv), (b)-(iii), (c)-(ii), (d)-(i)

  2. BOption (b)

    (a)-(i), (b)-(ii), (c)-(iii), (d)-(iv)

  3. COption (c)

    (a)-(ii), (b)-(i), (c)-(iv), (d)-(iii)

  4. DOption (d)

    (a)-(iii), (b)-(i), (c)-(iv), (d)-(ii)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(a)-(iii), (b)-(i), (c)-(iv), (d)-(ii)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किसका किसके साथ संबंध है?

भाषाओंं का आकृतिमूलक वर्गीकरण

  • योगात्मक भाषा उसे कहते हैं, जिसमें हर शब्द अलग- अलग अपनी सत्ता रखता है, उसमे दूसरे शब्दों के कारण कोई विकार या परिवर्तन नहीं होता। प्रत्येक शब्द की अलग-अलग संबंधतत्व या अर्थतत्व को व्यक्त करने की, शक्ति होती है। और उन शब्दों का परस्पर संबंध केवल वाक्य में उनके स्थान से ज्ञात होता है।
  • अयोगात्मक भाषाओं का सर्वोत्तम उदाहरण चीनी भाषाओं में मिलता है। इनमें हर एक शब्द की अलग-अलग स्थिति रहती है, किसी के प्रभाव से दूसरे में परिवर्तन नहीं होता और उन शब्दों का परस्पर संबंध पदक्रम में जान पड़ता है। कोई शब्द संज्ञा है या क्रिया या विशेषण यह सब वाक्य में प्रयोग में आने से ही ज्ञात होता है, अन्यथा नहीं।
  • श्लिष्ट उन योगात्मक भाषाओं को कहते हैं, जिनमें संबंधतत्व को जोड़ने के कारण अर्थतत्व वाले भाग में भी कुछ विकार उत्पन्न हो जाता है। तथापि संबंधतत्व का ज्ञान अलग से होता है।
  • अश्लिष्ट भाषाएँँ प्रत्ययप्रधान होती हैंं। इनमें संबंध बताने के लिये प्रकृति अर्थात् अर्थतत्व को प्रत्यय जोडना आवश्यक होता है।
  • इस आकृतिमूलक वर्गीकरण में हिंदी भाषा श्लिष्टबहिर्मुखी वियोगात्मिका मानी जाती है।

प्रस्तुत विवेचन के आधार पर सुमिलित तालिका इस प्रकार है - 

(a)अयोगात्मकभाषा(iii)तिब्बती भाषा
(b)श्लिष्टयोगात्मकभाषा(i)संस्कृत
(c)प्रश्लिष्टयोगात्मकभाषा(iv)चेरोकी
(d)अश्लिष्टयोगात्मकभाषा(ii)तुर्की

 

अतः स्पष्ट है, की "(a)-(iii), (b)-(i), (c)-(iv), (d)-(ii)" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 9

ग्रिमनियमानुसारेण प्रथमवर्णपरिवर्तने तवर्गीय-ध्वनीनां कः परिवर्तनक्रमोऽस्ति?

  1. AOption (a)

    त-> द, द-> थ, ध-> द

  2. BOption (b)

    त->ध, द-> त, ध-> द

  3. COption (c)

    त-> थ, द-> त, ध-> द

  4. DOption (d)

    त-> थ, ध-> त, द-> ध

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Correct answer

Answer: (c)C.

त-> थ, द-> त, ध-> द

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : ग्रिम नियम के अनुसार प्रथमवर्णपरिवर्तन में तवर्गीयध्वनीयोंं का परिवर्तन क्रम क्या है?

ग्रिम, ग्रासमन और वर्नर यह नियम भारोपीय भाषा परिवार से संबंधित हैं। इन नियमोंं में मूल ध्वनियोंं के परिवर्तन का वर्णन आता है।

ग्रिम नियम : यह ध्वनि नियम प्रा. याकोब ग्रिम के नाम से प्रसिद्ध है। इनका समय १७८५ से १८६३ यह है। मूलतः यह नियम ध्वनि परिवर्तन नियम इस नाम से प्रसिद्ध था, प्रा. मैक्समूलर ने इसे ग्रिम नियम यह संज्ञा दी। ग्रिम नियम के अनुसार मूल भारतीय भाषा की निम्नलिखित ध्वनियोंं का अंग्रेजी और जर्मन भाषा के निम्नलिखित ध्वनियोंं में परिवर्तन होता है - 

  • प्रथम ध्वनि का द्वितीय ध्वनि में परिवर्तन :
अघोष अल्पप्राण मूल ध्वनिपरिवर्तन
क्ख् (ह्)
त्थ्
प्फ्
  • चतुर्थ ध्वनि का तृतीय ध्वनि में परिवर्तन  :
महाप्राणपरिवर्तन
घ्ग्
ध्द्
भ्ब्
  • तृतीय ध्वनि का प्रथम ध्वनि में परिवर्तन  :
घोष अल्पप्राण मूल ध्वनिपरिवर्तन
ग्क्
द्त्
ब्प्

 

अतः स्पष्ट है, *"*त-> थ, द-> त, ध-> द" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 10

भाषाविज्ञानानुसारेण भारोपीयपरिवारस्य भाषा नास्ति-

  1. AOption (a)

    मय

  2. BOption (b)

    तोखारी

  3. COption (c)

    आर्मीनी

  4. DOption (d)

    इटालिक

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Correct answer

Answer: (a)A.

मय

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : भाषाविज्ञान के अनुसार भारोपीय परिवार की कौन सी भाषा नहीं है?

भारोपीय भाषा परिवार

  • ​​भारत से लेकर प्रायः सारे यूरोप तक बोले जाने के कारण इस भाषा परिवार को भारोपीय परिवार कहते हैं।
  • इस भाषा परिवार की प्रमुख भाषाएँ संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, हिन्दी, बंगाली, फ़ारसी, ग्रीक, लेटिन, अंग्रेज़ी, रूसी, जर्मन, पुर्तग़ाली और इतालवी इत्यादि हैं।
  • मूल रूप की दृष्टि से यह परिवार श्लिष्ट योगात्मक रूप का है।
  • भारोपीय परिवार की विशेषताएँँ :
  • इस परिवार की सारी भाषाएँँ प्रारंभ में योगात्मक थी, पर बाद में एक दो छोड के बाकी सारी भाषाएँँ वियोगात्मक हो गई।
  • शब्द-रूप शब्द के अन्त में प्रत्यय द्वारा बनाये जाते है। इस परिवार में प्रत्ययोंं की संख्या सभी परिवार से अधिक है।
  • समास रचना की शक्ति यह इस परिवार की विशेषता है।
  • साथ ही प्रत्ययोंं को अपना स्वतंत्र अर्थ होना और बाद में प्रत्यय की अर्थपूर्णता का लोप होकर आधुनिक रूप शेष रहना, यह परिवर्तन इस भाषा परिवार में दिखाई देता है।
  • हिन्द यूरोपीय शाखाओं को मुख्यतः दो वर्गों में रखा जाता है :
  • केन्तुम वर्ग।
  • शतम्  वर्ग।

केन्तुम् वर्ग : 

  • इस वर्ग की प्राचीन भाषाओं में आदि-हिन्द-यूरोपीय भाषा के व्यंजन वैसे ही परिरक्षित रहे हैं। जैसे - 
  • क्व, ग्व और घ्व
  • आदि-हिन्द-यूरोपीय भाषा के व्यंजनोंं में इस प्रकार परिवर्तन हुआ - 
  • क्य, ग्य और घ्य, यह व्यंजन क, ग और घ में विलीन हो गये।
  • इनमें इटैलिक, यूनानी, कोल्टिक और जर्मन, ग्रीक, फ्रेंच भाषा आती हैं।

शतम् वर्ग : 

  • इस वर्ग की प्राचीन भाषाओं में आदि-हिन्द-यूरोपीय भाषा के व्यंजन, क्य, ग्य और घ्य, स्पर्श-संघर्षी या संघर्षी व्यंजनों में बदल गये। जैसे - च, ज, स और श।
  • साथ ही साथ, आदि-हिन्द-यूरोपीय भाषा के व्यंजन, क्व, ग्व और घ्व, यह क, ग और घ इनमें विलय हो गये।
  • इनमें बाल्टिक, स्लाव, हिन्द ईरानी, अरमेनियाई और अल्बानियाई शाखा आती हैं। संस्कृत इसी वर्ग में आती है।
  • आर्मीनी भाषा भारोपीय भाषा परिवार के शतम् वर्ग में आती है।

 

अतः स्पष्ट है, की "मय" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 11

'जन्माद्यस्य यतः' इत्यस्मिन् सूत्रे 'यतः' पदेन किमभिधीयते?

  1. AOption (a)

    जगतः

  2. BOption (b)

    ब्रह्मणः

  3. COption (c)

    सृष्टेः

  4. DOption (d)

    प्रकृतेः

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Correct answer

Answer: (b)B.

ब्रह्मणः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'जन्माद्यस्य यतः' इस सूत्र में 'यतः' इस पद से क्या अभिधान किया है?

ब्रह्मसूत्र १.१.२ - जन्माद्यस्य यतः 

ब्रह्मसूत्र शांकरभाष्य : 

  • प्रथमे पादे जन्माद्यस्य यतः इत्याकाशादेः समसस्य जगतो जन्मादिकारणं ब्रह्मेत्युक्तम्। तस्य समस्तजगत्कारणस्य ब्रह्मणो व्यापित्वं नित्यत्वं सर्वज्ञत्वं सर्वशक्तित्वं सर्वात्मकत्वमित्येवं जातीयका धर्मा उक्ता एव भवन्ति। अर्थान्तरप्रसिद्धानां च केषांचिच्छब्दानां ब्रह्मविषयत्वहेतुप्रतिपादनेन कानिचिद्वाक्यानि स्पष्टब्रह्मलिङ्गानि संदिह्यमानानि ब्रह्मपरतया निर्णीतानि। पुनरप्यन्यानि वाक्यान्यस्पष्टब्रह्मलिङ्गानि संदिह्यन्ते किं परं ब्रह्म प्रतिपादयन्ति आहोस्विदर्थान्तरं किंचिदिति।

हिंदी अर्थ :

  • पहले सूत्र में कहा गया है कि ब्रह्म ही पूरे ब्रह्मांड के जन्म और आकाश जैसी अन्य चीजों का कारण है। उस ब्रह्म के जातीय धर्म, पूरे ब्रह्मांड का कारण, जैसे कि व्यापकता, अनंत काल, सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमान और सर्वशक्तिमान, का उल्लेख पहले ही किया जा चुका है। और अर्थ भेद से ज्ञात कुछ शब्दों की विषयवस्तु का कारण बताते हुए स्पष्ट ब्रह्म-लिंगम पर संदेह करते हुए कुछ कथनों को ब्रह्म-पराता निर्धारित किया गया है। फिर, अस्पष्ट ब्रह्म-लिंगम के अन्य कथन संदिग्ध हैं की क्या वे सर्वोच्च ब्रह्म का प्रतिनिधित्व करते हैं या उनका कोई अन्य अर्थ है या नहीं।

 

अतः स्पष्ट है, की "ब्रह्मणः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 12

'शोणो धावती' इत्युदाहरणे वेदान्तरीत्या का लक्षणा?

  1. AOption (a)

    जहल्लक्षणा

  2. BOption (b)

    अजहल्लक्षणा

  3. COption (c)

    भागलक्षणा

  4. DOption (d)

    साध्यवसानलक्षणा

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Correct answer

Answer: (b)B.

अजहल्लक्षणा

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'शोणो धावती' इस उदाहरण में वेदान्त के अनुसार क्या लक्षणा है?

अजहल्लक्षणा :

  • लक्षण वाक्यार्थ का विरोध हो जाने से उसके त्याग द्वारा उसके आश्रयभूत आदि का अर्थ लक्षणा से करने से उसकी अभिन्नता का निराकरण होने का कारण अजहल्लक्षणा होती है।
  • 'शोणो धावती' इस उदाहरण में शब्दशः अर्थ "लाल दौडता है" यह होता है।
  • लाल यह वर्ण होकर, एक प्रकार का गुण होने से दौडने की क्रिया करे, यह संभव नहीं है। यहाँँ वाक्यार्थ का विरोध हुआ। उसके त्याग का प्रसंग उत्पन्न हुआ।
  • इस लाल गुण से अर्थात् वर्ण से युक्त और दौडने की क्रिया का आश्रय यहाँँ अपेक्षित है।
  • अतः "लाल रंग का घोडा दौडता है" यह अर्थ प्रतीत होता है।

​

अतः स्पष्ट है, की "अजहल्लक्षणा" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

वेदान्त में वर्णित तीन लक्षणा-प्रकार :

लक्षणा तीन प्रकार की होती है - 

  • जहदलक्षणा / लक्षणलक्षणा -
  • जो अपने मूल अर्थ को त्याग दे और दुसरा अर्थ ग्रहण करें, जैसे- गङ्गायां घोषः।
  • अजहल्लक्षणा/ उपादानलक्षणा -
  • जो अपने अर्थ को न छोड़े। जैसे शोणो धावति।
  • जहदजहल्लक्षणा/ भागलक्षणा -
  • जो अपने मूल अर्थ को त्याग दें जैसे तत्वमसि।

Question 13

साध्यशून्यः पक्षो मुक्तावल्यां क उदाह्रतः?

  1. AOption (a)

    सत्प्रतिपक्षः

  2. BOption (b)

    बाधः

  3. COption (c)

    व्याप्यत्वासिद्धः

  4. DOption (d)

    अनैकान्तिकः

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Correct answer

Answer: (b)B.

बाधः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : साध्यशून्य पक्ष मुक्तावली में क्या कहा गया है?

न्यायसिद्धांतमुक्तावली - साध्यशून्य पक्ष :

साध्यशून्यो यत्र पक्षस्त्वसौ बाधः उदाहृतः।

उत्पत्ति कालीन घटे गन्धादिर्यत्र साध्यते ।। (कारिका, ७८)

अर्थ और स्पष्टीकरण -

  • जिस स्थल में साध्याभाववत् पक्षतावच्छेदकविशिष्ट पक्ष है वहाँ हेतु कालात्ययापदिष्ट (बाधित) कहलाता है।
  • "यथा उत्पत्ति कालीन घट: गन्धवान् पृथ्वीत्वात्" यहाँ पक्षतावच्छेदक उत्पत्ति काल विशिष्ट घटरूप पक्ष गन्धाभाववत् है।
  • अतः इस स्थल का पृथ्वीत्वरूप हेतु बाधित कहलाता है।
  • यहाँ पक्ष पद से पक्षतावच्छेदक विशिष्टपक्ष समझना चाहिये।
  • ऐसा निवेश करने से घटादि में उत्पत्तिकाल भिन्न कालावच्छेदेन गन्ध रहने पर भी बाधत्व की अनुपपत्ति न हुई।
  • इसी प्रकार न्यायसिद्धान्तमुक्तावली "मूलावच्छिन्नो वृक्षः कपि संयोगी" इस स्थल में भी भूलावच्छेदेन वक्षरूप पक्ष में कपि संयोगाभावरूप साध्याभाव रहने के कारण कालात्ययापदेश (बाध) जानना चाहिये।

 

अतः स्पष्ट है, "बाधः" इस प्रश्न का सही उत्तर है।

अन्य विकल्पोंं की परिभाषाएँँ :

सत्प्रतिपक्षः -

  • विरुद्धं लक्षयति साध्येति। यस्य साध्याभावसाधकं हेत्वन्तरं विद्यते स सत्प्रतिपक्षः।

व्याप्यत्वासिद्धः -

  • शब्दस्य श्रावणत्वात्। स्वरूपासिद्धमुद्दहरति यथेति। सोपाधिको हेतुः व्याप्यत्वासिद्धः। साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकत्वम् उपाधिः।

अनैकान्तिकः -

  • अनैकान्तिकः सव्यभिचारः ।

Question 14

तर्कसङ्ग्रहरीत्या मनः कीदृक्?

  1. AOption (a)

    अनन्तं परमाणुरूपं नित्यञ्च

  2. BOption (b)

    एकमनित्यं परमाणुरूपञ्च

  3. COption (c)

    एकं विभु नित्यञ्च

  4. DOption (d)

    अनन्तं विभु नित्यञ्च 

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Correct answer

Answer: (a)A.

अनन्तं परमाणुरूपं नित्यञ्च

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : तर्कसंग्रह के अनुसार मन कैसा होता है?

तर्कसंग्रह -

  • तर्कसंग्रह न्याय एवं वैशेषिक दोनो दर्शनों को समाहित करने वाला ग्रंथ है। इसके रचयिता अन्नम्भट्ट हैं जिनका समय १६२५ से १७०० ई माना जाता है।
  • तर्कसंग्रह के अध्ययन से न्याय एवं वैशेषिक के सभी मूल सिद्धान्तों का ज्ञान मिल जाता है।
  • अन्नम्भट्ट ने बालकों को सुखपूर्वक न्यायपदार्थों का ज्ञान कराने के उद्देश्य से तर्कसंग्रह नामक अन्वर्थ लघुग्रंथ की रचना की।

तर्कसंग्रह के अनुसार मन की संकल्पना :

सुखाद्युपलब्धिसाधनमिन्द्रियं मनः। तच्च प्रत्यात्मनियतत्वादनन्तं परमाणुरूपं नित्यं च।।१८।।

भाष्य :

  • एवं च, सुखादिविषयक साक्षात्कारनिष्ठ जन्यतानिरूपित जनकताश्रयत्वे सति इन्द्रियत्वं मनसो लक्षणमिति फलितम्। तच्च प्रत्यात्मनियतत्वात्,अनन्तं परमाणुरूपं नित्यञ्च।
  • ए��ैकस्यात्मनः एकैकं मन इति आत्मनामनन्तत्वात्,मनसोऽप्यानन्त्यं बोध्यम्।

अर्थ : 

  • सुख और अन्य चीजों की धारणा और उपलब्धि का साधन वह इंद्रिय मन है। वह आत्मा द्वारा निर्धारित किया जाता है, वह परमाणु के रूप में अनंत और शाश्वत है।
  • इस प्रकार, यह स्पष्ट होता है की सुखादिविषयक साक्षात्कारनिष्ठ मन अन्य चीजों की प्राप्ति के लिए समर्पित कार्य-कारण के रूप में परिभाषित कार्य-कारण पर निर्भर है। यह स्वनिर्धारित है, तो इसका स्वरूप परमाणुओं के रूप में अनंत और शाश्वत है।
  • आत्मा का स्वरूप अनंत है,  इसलिए मन भी अनंत है, ऐसा जानना चाहिए।

 

अतः स्पष्ट है, की "अनन्तं परमाणुरूपं नित्यञ्च" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 15

अर्थसङ्ग्रहरीत्या शाब्दीभावनाया लक्षणं किम्?

  1. AOption (a)

    भवितुर्भवनानुकूलो भावयितुर्व्यापारविशेषः

  2. BOption (b)

    प्रयोजनेच्छाजनितक्रियाविषयव्यापारः

  3. COption (c)

    पुरुषप्रवृत्यनुकूलो भावयितुर्व्यापारविशेषः

  4. DOption (d)

    भविर्तुर्भवनानुकूलो भावकव्यापारविशेषः

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Correct answer

Answer: (c)C.

पुरुषप्रवृत्यनुकूलो भावयितुर्व्यापारविशेषः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अर्थसंग्रह के अनुसार शाब्दीभावना का लक्षण क्या है?

​अर्थसंग्रह -

अर्थसंग्रह मीमांसा का एक लघुकाय प्रकरण ग्रन्थ है, जिसमें शाबरभाष्य में प्रतिपादित बहुत से विषयों का अतिसंक्षेप में निरूपण है। 

इसके रचनाकार भास्कर हैं। इस ग्रन्थ में निम्नलिखित विषयों का मुख्यतः विवेचन हुआ है-

  1. धर्म तथा उसका लक्षण
  2. भावना का लक्षण तथा उसके दो भेद
  3. वेद का लक्षण तथा उसके विभाग
  4. विधि का लक्षण तथा उसके प्रकार

भावना :लक्षण :

  • भवितुर्भवनानुकूलो भावयितुर्व्यापारविशेषः भावना।
  • उत्पन्न होने वाले का, उत्पत्ति में कारणभूत, जो प्रायोजक का व्यापारविशेष होता है, वही भावना है।

विभाजन - 

  • सा द्विधा - शाब्दी आर्थी चेति।
  • वह दो प्रकार की है - शाब्दी भावना और आर्थीभावना।

शाब्दीभावना :

पुरुषप्रवृत्त्यनुकूलो भावयितुर्व्यापार विशेषः।

  • शाब्दी भावना और आर्थीभावना इन दोनो में प्रयोज्य पुरुष की प्रवृत्ति के अनुकूल प्रयोजक के व्यापारविशेष को 'शाब्दी' भावना कहते हैं।

शाब्दीभावना लिङंशेन उच्यते।

  • शाब्दी भावना का बोध 'लिङ्' अंश से होता है। 'लिडंंश' के श्रवण के पश्चात् प्रयोज्य पुरुष को यह बोध होता है कि 'यह प्रयोजक पुरुष मुझे कर्म में प्रवृत्त कराना चाहता है अर्थात् यह प्रयोजक पुरुष मेरी प्रवृत्ति को उत्पन्न करने वाले व्यापारवाला हैं,' यह अनुभव नियमत: 'लिङ्' शब्द के श्रवण के उपरान्त ही होता है। नियमत: जिस शब्द से जिस अर्थ का बोध होता है वह उस शब्द का वाच्य होता है। जैसे- 'गाम् आनय' इस वाक्य में 'गो' शब्द का अर्थ गोत्व है ।

अत्र अंशत्रयम् – साध्यम् , साधनम् , इतिकर्तव्यता च ।

  • साध्यम् - आर्थीभावना।
  • साधनम् - लिङादिज्ञानं।
  • इतिकर्तव्यता -अर्थवादज्ञाप्य प्राशस्त्यम्।
  • यह तीन प्रश्न है -
  • किं साधयेत् - क्या किया जाय ? (साध्यम्)
  • केन भावयेत्-किससे किया जाय? (साधनम्)
  • कथं भावयेत्-कैसे किया जाय? (इतिकर्तव्यता)

इन प्रश्नोंं के उत्तर दिए गए है। 

आर्थीभावना : 

प्रयोजनेच्छाजनित-क्रियाविषयव्यापारः।

  • स्वर्गादि प्रयोजन की इच्छा से उत्पन्न यागादिकर्म को सम्पादित करने का पुरुष में जो मानसिक व्यापार उत्पन्न होता है उसे 'आर्थीभावना' कहते हैं।

आर्थीभावना आख्यातत्वांशेन उच्यते।

  • यह आर्थीभावना आख्यातत्व अंश से कही जाती है क्योंकि व्यापार क्रिया का वाचक 'आख्यात सामान्य' ही होता है ।

अत्रापि अंशत्रयं - साध्यं साधनम् इतिकर्तव्या च।

  • वह 'आर्थीभावना' भी अंशत्रय साध्य, साधन और इतिकर्तव्यता की अपेक्षा करती है।
  • साध्यम् - स्वर्गादिफलम्।
  • साधनम् - यागादिः।
  • इतिकर्तव्यता - प्रयाजाद्यङ्ग्गजातम्।

 

अतः स्पष्ट है, की "पुरुषप्रवृत्यनुकूलो भावयितुर्व्यापारविशेषः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 16

तर्कसङ्ग्रहदीपिकानुसारं 'तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकः' कः?

  1. AOption (a)

    परामर्शः

  2. BOption (b)

    व्यापारः

  3. COption (c)

    उपनयः

  4. DOption (d)

    हेतुः

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Correct answer

Answer: (b)B.

व्यापारः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : तर्कसङ्ग्रहदीपिका के अनुसार 'तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकः' क्या है?

तर्कसंग्रहदीपिका-

  • तर्कसंग्रह न्याय एवं वैशेषिक दोनो दर्शनों को समाहित करने वाला ग्रंथ है। इसके रचयिता अन्नम्भट्ट हैं जिनका समय १६२५ से १७०० ई माना जाता है।
  • तर्कसंग्रह के अध्ययन से न्याय एवं वैशेषिक के सभी मूल सिद्धान्तों का ज्ञान मिल जाता है।
  • तर्कसंग्रहदीपिका में तर्कसंग्रह के प्रतिपाद्य विषय का विश्लेषण करते हुए न्याय तथा वैशेषिक दर्शनों के अन्य उपयोगी विषयों का भी प्रतिपादन किया गया है।
  • अन्नम्भट्ट ने बालकों को सुखपूर्वक न्यायपदार्थों का ज्ञान कराने के उद्देश्य से तर्कसंग्रह नामक अन्वर्थ लघुग्रंथ की रचना की तथा इसके अतिसंक्षिप्त अर्थ को स्पष्ट करने के अभिप्राय से स्वयं दीपिका नामक व्याख्या ग्रंथ की भी रचना की।

व्यापार :

व्यापारवत् कारणं करणम्। व्यापारश्च तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकः। हेतुज्ञानादि करणम्, परामर्शो व्यापारः। परामर्शश्च व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञानम्।

उदाहरण :

  • यथा कुठारः (परशुः), काष्ठम्‌। केवलं कुठारः अस्ति चेत्‌ काष्ठं भेत्तुं शक्नुमः वा? नैव। तदर्थं किं कुर्मः? हस्तेन कुठारम्‌ उन्नीय काष्ठस्य उपरि त्यजामः। तदा किं भवति? काष्ठं द्विधा विभक्तं भवति। तर्हि काष्ठविभजनं प्रति कुठारः कारणम्‌। व्यापारः कः इत्युक्ते उन्नयन-निपातनादिक्रियाः। क्रिया अपेक्षिता अस्ति।अतः मध्ये कश्चन व्यापारः भवति; अत्र क्रिया एव व्यापारः।

अर्थ : 

  • जैसे कुल्हाड़ी और काष्ठ है, क्या हम केवल कुल्हाड़ी से लकड़ी काट सकते हैं? नहीं। उसके लिए हम क्या करते हैं? हम कुल्हाड़ी को अपने हाथों से उठाकर और लकड़ी पर छोड़ देते हैंं। फिर क्या होता है? लकड़ी को दो भागों में काटा जाता है। कुल्हाड़ी ही लकड़ी के टूटने का कारण है। यह पूछे जाने पर कि व्यापार क्या है, तब उन्नयन और निपातन की क्रिया अपेक्षित है। उन के बीच में व्यापार है; यहाँ क्रिया ही व्यापार है।

परामर्श

  • पक्ष-धर्मता ज्ञान जब व्याप्ति के स्मरण के साथ होता है तब उस परिस्थिति को परामर्श कहते हैं।
  • इसी को लिंगपरामर्श भी कहते हैं क्योकि पक्षधर्मता का अर्थ है लिंग का पक्ष में उपस्थित होना। इसके कारण इसी के आधार पर पक्ष में साध्य के अस्तित्व का जो ज्ञान होता है उसी का नाम अनुमिति हैं।
  • साध्य को लिंगी भी कहते हैं क्योंकि उसका अस्तित्व लिंग के अस्तित्व के आधार पर अनुमित किया जाता हैं।
  • लिंग को हेतु भी कहते हैं क्योंकि इसके कारण ही हमको लिंगी (साध्य) के अस्तित्व का अनुमान होता है।
  • इसलिए तर्कशास्त्रों में अनुमान की यह परिभाषा की गई है-लिंगपरामर्श का नाम अनुमान है और व्याप्ति विशिष्ट पक्षधर्मता का ज्ञान परामर्श हैं।

 

अतः स्पष्ट है, "व्यापारः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 17

'नित्यज्ञानाधिकरणत्वम्' इति तर्कसङ्ग्रहदीपिकायां कस्य लक्षणं प्रोक्तम्?

  1. AOption (a)

    जीवात्मनः

  2. BOption (b)

    परमाणोः

  3. COption (c)

    ईश्वरस्य

  4. DOption (d)

    मनसः

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Correct answer

Answer: (c)C.

ईश्वरस्य

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'नित्यज्ञानाधिकरणत्वम्' यह तर्कसङ्ग्रहदीपिका के अनुसार किस का लक्षण बताया है?

तर्कसंग्रहदीपिका-

  • तर्कसंग्रह न्याय एवं वैशेषिक दोनो दर्शनों को समाहित करने वाला ग्रंथ है। इसके रचयिता अन्नम्भट्ट हैं जिनका समय १६२५ से १७०० ई माना जाता है।
  • तर्कसंग्रह के अध्ययन से न्याय एवं वैशेषिक के सभी मूल सिद्धान्तों का ज्ञान मिल जाता है।
  • तर्कसंग्रहदीपिका में तर्कसंग्रह के प्रतिपाद्य विषय का विश्लेषण करते हुए न्याय तथा वैशेषिक दर्शनों के अन्य उपयोगी विषयों का भी प्रतिपादन किया गया है।
  • अन्नम्भट्ट ने बालकों को सुखपूर्वक न्यायपदार्थों का ज्ञान कराने के उद्देश्य से तर्कसंग्रह नामक अन्वर्थ लघुग्रंथ की रचना की तथा इसके अतिसंक्षिप्त अर्थ को स्पष्ट करने के अभिप्राय से स्वयं दीपिका नामक व्याख्या ग्रंथ की भी रचना की।

तर्कसंग्रहदीपिका के अनुसार ईश्वर का लक्षण :

परमात्मनो लक्षणमाह- तत्रेति। नित्यज्ञानाधिकरणत्वम् ईश्वरत्वम्।

  • स्पष्टीकरण :
  • अन्नम्भट्ट द्वारा रचित तर्कसंग्रह की स्वोपज्ञ टीका 'तर्कसंग्रहदीपिका' है जिसे न्याय-वैशेषिक दर्शन का अग्रिम सोपान माना जा सकता है। इसमें तर्कसंग्रह में वर्णित न्याय एवं वैशे���िक के सभी मूल सिद्धान्तों का विश्लेषण मिल जाता है।
  • परमात्मा अर्थात् ईश्वर का विवेचन करते हुए  तर्कसङ्ग्रहदीपिका में यह लक्षण दिया गया है -
  • जो नित्य, शुद्ध ज्ञानस्वरूप, आश्रयरूप में विद्यमान है, वही ईश्वर है, वही उसका ईश्वरत्व है।

अतः स्पष्ट है, की "ईश्वरस्य" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 18

'तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकः' तर्कसङ्ग्रहे कः प्रोक्तः?

  1. AOption (a)

    अत्यन्ताभावः

  2. BOption (b)

    प्रध्वंसाभावः

  3. COption (c)

    अन्योन्याभावः

  4. DOption (d)

    प्रागभावः

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Correct answer

Answer: (c)C.

अन्योन्याभावः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकः' इस से तर्कसंग्रह में क्या कहा गया है?

तर्कसंग्रह -

  • तर्कसंग्रह न्याय एवं वैशेषिक दोनो दर्शनों को समाहित करने वाला ग्रंथ है। इसके रचयिता अन्नम्भट्ट हैं जिनका समय १६२५ से १७०० ई माना जाता है।
  • तर्कसंग्रह के अध्ययन से न्याय एवं वैशेषिक के सभी मूल सिद्धान्तों का ज्ञान मिल जाता है।
  • अन्नम्भट्ट ने बालकों को सुखपूर्वक न्यायपदार्थों का ज्ञान कराने के उद्देश्य से तर्कसंग्रह नामक अन्वर्थ लघुग्रंथ की रचना की।

तर्कसंग्रह के अनुसार अन्योन्याभाव : 

"तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकोऽभावोऽन्योन्याभाव" इति लक्षणं निष्कृष्यते।

यस्यायमर्थः -

  • प्रात्मन: स्वरूपस्य यः सम्बन्धः स तादात्म्यसम्बन्धः, प्रतियोगिनो भावः प्रतियोगिता। तादात्म्यसम्बन्धेनावच्छिन्ना विशिष्टा इति तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्ना, तादृशी चासौ प्रतियोगिता यस्य स तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकः।

उदाहरणम् -

  • तादात्म्यसम्बन्धेन च पटः स्वस्मिन्नेव वर्त्तते, घटादौ च न वर्तत इति तत्र-घटादौ पटान्योन्याभावो बोध्यः। तदा च "घटो न पट" इत्यभिलापप्रकारो भवति।

अर्थ और स्पष्टीकरण :

  • तर्कसंग्रह के अनुसार अन्योन्याभाव वह स्थिति है, जब हर एक वस्तु या व्यक्ति के गुणों का दूसरे में अभाव होता है या एक वस्तु दूसरी वस्तु नहीं हो सकती ऐसा भाव होता है।
  • इसका स्पष्टीकरण यह है, की आत्मा के स्वरूप से जो संबंध होता है, उसे तादात्म्यसम्बन्ध कहते है। प्रतियोगी का भाव प्रतियोगिता है। इस प्रकार जो आत्मा से अवच्छिन्न संबंध है, ऐसा मानता है और उस संबंध का दूसरी जगह अभाव है वह मानता है, वह भाव प्रतियोगिता है और यह ज्ञान जिसे है, वह तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताक इस संज्ञा से संबोधित है।

​

अतः स्पष्ट है, की "अन्योन्याभावः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 19

तर्कसङ्ग्रहरीत्या आद्यस्यन्दनासमवायिकारणं किम्भवति?

  1. AOption (a)

    द्रव्यत्वम्

  2. BOption (b)

    द्रवत्वम्

  3. COption (c)

    गुरुत्वम्

  4. DOption (d)

    स्नेहः

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Correct answer

Answer: (b)B.

द्रवत्वम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : तर्कसङ्ग्रह के अनुसार आद्यस्यन्दन का समवायिकारण क्या है?

तर्कसंग्रह -

  • तर्कसंग्रह न्याय एवं वैशेषिक दोनो दर्शनों को समाहित करने वाला ग्रंथ है। इसके रचयिता अन्नम्भट्ट हैं जिनका समय १६२५ से १७०० ई माना जाता है।
  • तर्कसंग्रह के अध्ययन से न्याय एवं वैशेषिक के सभी मूल सिद्धान्तों का ज्ञान मिल जाता है।
  • अन्नम्भट्ट ने बालकों को सुखपूर्वक न्यायपदार्थों का ज्ञान कराने के उद्देश्य से तर्कसंग्रह नामक अन्वर्थ लघुग्रंथ की रचना की।

द्रवत्व :

आद्यस्यन्दनासमवायिकारणं द्रवत्वम्। पृथिव्यप्तेजोवृत्ति। तद् द्विविधं सांसिद्धिकं नैमित्तिकं सांसिद्धिकं जले। नैमित्तिकं पृषिवीतेजसोः।

अर्थ और स्पष्टीकरण :

  • द्रवत्व दो प्रकार का होता है -
  • सांसिद्धिक
  • नैमित्तिक। 
  • स्यन्दन का अर्थ प्रस्रवण होता है। तेजसंयोग के कारण घृत आदि पार्थिव द्रव्य तथा सुवर्ण आदि तैजस द्रव्य में नैमित्तिक द्रवत्व होता है। इससे भिन्न सांसिद्धिकद्रवत्व जल में होता है।

अतः स्पष्ट है, की "द्रवत्वम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 20

'व्रीहीनवहन्ती' ति कस्य विधेरुदाहरणम् अर्थसङ्ग्रहदिशा?

  1. AOption (a)

    अपूर्वविधेः

  2. BOption (b)

    श्रौती-परिसङ्ख्याविधेः

  3. COption (c)

    आर्थी-परिसङ्ख्याविधेः

  4. DOption (d)

    नियमविधेः

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Correct answer

Answer: (d)D.

नियमविधेः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'व्रीहीनवहन्ती' यह अर्थसंग्रह के अनुसार किस विधि का उदाहरण है?

​अर्थसंग्रह -

अर्थसंग्रह मीमांसा का एक लघुकाय प्रकरण ग्रन्थ है, जिसमें शाबरभाष्य में प्रतिपादित बहुत से विषयों का अतिसंक्षेप में निरूपण है। 

इसके रचनाकार भास्कर हैं। इस ग्रन्थ में निम्नलिखित विषयों का मुख्यतः विवेचन हुआ है-

  1. धर्म तथा उसका लक्षण
  2. भावना का लक्षण तथा उसके दो भेद
  3. वेद का लक्षण तथा उसके विभाग
  4. विधि का लक्षण तथा उसके प्रकार

नियमविधि :

नियमविधि का लक्षण : 

  • 'नानासाधनसाध्यक्रियायामेकसाधनप्राप्तावप्राप्तस्यापरसाधनस्य प्रापको विधिर्नियमविधिः।
  • अर्थात् जहाँ एक ही क्रिया की सिद्धि के लिए अनेक साधन प्राप्त हों किन्तु किसी एक साधन के प्राप्त होने पर अन्य अप्राप्त साधनों की भी प्राप्ति करा दे ऐसी विधि का नाम नियम विधि है।

उदाहरण :

  • व्रीहीनवहन्ती"त्यादिवद्विधीयत इति नियमविधिरेवाऽयम्।
  • इस वाक्य में नियमविधि के द्वारा तण्डुलनिष्पत्ति में अप्राप्त साधन अवहनन का विधान किया है। इस प्रकार अवहनन रूप साधन के अप्राप्त होने पर भी उस अप्राप्त साधन को प्राप्त कराने वाली विधि नियमविधि है।

​

​अतः स्पष्ट है, की "नियमविधेः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 21

तर्कभाषारीत्या अभावात्मककार्यस्य कारणं कीदृशमस्ति?

  1. AOption (a)

    समवायिकारणम्

  2. BOption (b)

    असमवायिकारणम्

  3. COption (c)

    समवाय्यसमवायिकारणम्

  4. DOption (d)

    निमित्तकारणम्

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Correct answer

Answer: (d)D.

निमित्तकारणम्

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : तर्कभाषा के अनुसार अभावात्मककार्य का कारण कैसा होता है?

तर्कसंग्रह -

  • तर्कसंग्रह न्याय एवं वैशेषिक दोनो दर्शनों को समाहित करने वाला ग्रंथ है। इसके रचयिता अन्नम्भट्ट हैं जिनका समय १६२५ से १७०० ई माना जाता है।
  • तर्कसंग्रह के अध्ययन से न्याय एवं वैशेषिक के सभी मूल सिद्धान्तों का ज्ञान मिल जाता है।
  • अन्नम्भट्ट ने बालकों को सुखपूर्वक न्यायपदार्थों का ज्ञान कराने के उद्देश्य से तर्कसंग्रह नामक अन्वर्थ लघुग्रंथ की रचना की।

तर्कभाषा के अनुसार अभाव और निमित्तकारण :

  • तर्कभाषा में जो समवायिकारण नहीं है और असमवायिकारण भी नहीं है, जिसमें कारण के लक्षण घटित है, उसे निमित्तकारण कहा गया है।
  • अभाव यह वैशेषिकों का पदार्थ है, जिसका स्वरूप अन्य किसी कारण के द्वारा नहीं कहा जा सकता। उसके चार प्रकार है - 
  • प्रागभाव -
  • उत्पत्ति के पूर्व वस्तु का अभाव।
  • प्रध्वंसाभाव -
  • विनाश के बाद वस्तु का अभाव।
  • अन्योन्याभाव -
  • एक वस्तु का दूसरी वस्तु में अभाव।
  • अत्यंताभाव -
  • वह अभाव जो सर्वदा वर्तमान हो।
  • अभावज्ञान के लिए इंद्रियसंबंध की आवश्यकता नहीं होती। अभाव के साथ लिंग की व्याप्ति नहीं होती, अत: अनुमान भी नहीं हो सकता।
  • अभाव का कारण उसके उत्पत्ति में ही विद्यमान होता है।

अतः स्पष्ट है, की "निमित्तकारणम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 22

अज्ञानस्य समष्ट्योपहितं चैतन्यं वेदान्ते किमुच्यते?

  1. AOption (a)

    प्राज्ञः

  2. BOption (b)

    वैश्वानरः

  3. COption (c)

    विराट्

  4. DOption (d)

    ईश्वरः

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Correct answer

Answer: (d)D.

ईश्वरः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अज्ञान का समष्टि में स्थापित चैतन्य वेदान्त में क्या कहा गया है?

वेदांत में ईश्वर की संकल्पना :

  • परमात्मा का सृष्टि में चैतन्यरूप से व्यक्त हो जाना ही गर्भाधान की क्रिया है।
  • इसके फलस्वरूप सर्वप्रथम समष्टि मन को धारण करने वाले ईश्वर जिसे इस अवस्था में वेदान्त के अनुसार चैतन्य कहते हैं व्यक्त होता है और तत्पश्चात् असंख्य जीव और नामरूपमय सृष्टि उत्पन्न होती है।
  • अज्ञान भाव रूप है क्योंकि इससे वस्तु के अस्तित्व की उपलब्धि होती है, यह अभाव रूप है, क्योंकि इसका वास्तविक रूप कुछ भी नहीं है। इसी अज्ञान को जगत्‌ का कारण माना जाता है। अज्ञान का ब्रह्म के साथ क्या संबंध है, इसका सही उत्तर कठिन है परंतु ब्रह्म अपने शुद्ध निर्गुण रूप में अज्ञान विरहित है, किसी तरह वह भावाभाव विलक्षण अज्ञान से आवृत्त होकर सगुण ईश्वर कहलाने लगता है और इस तरह सृष्टिक्रम चालू हो जाता है।
  • ईश्वर को अपने शुद्ध रूप का ज्ञान होता है परंतु जीव को अपने ब्रह्मरूप का ज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना के द्वारा ब्रह्मीभूत होना पड़ता है।
  • अज्ञान का समष्टि में स्थापित चैतन्य ही ब्रह्म अथवा ईश्वर कहलाता है।

अतः स्पष्ट है, की "ईश्वरः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 23

जहदजहल्लक्षणाया वेदान्ते किमपरं नाम प्रयुक्तम्?

  1. AOption (a)

    जहल्लक्षणा

  2. BOption (b)

    अजहल्लक्षणा

  3. COption (c)

    भागलक्षणा

  4. DOption (d)

    सारोपलक्षणा

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Correct answer

Answer: (c)C.

भागलक्षणा

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : जहदजहल्लक्षणा के लिए वेदान्त में दूसरा कौन सा नाम प्रयुक्त है?

जहदजहल्लक्षणा अथवा भागलक्षणा :

  • जहदजहल्लक्षणा लक्षणा का वह भेद जिसमें वक्ता के शब्दों से निकलने वाले कई अर्थों या आशयों में से केवल एक विशिष्ट और संबद्ध अर्थ या आशय ग्रहण किया जाता है।
  • जो अपने मूल अर्थ को त्याग दें और एक अंश का बोध कराये वह जहदजल्लक्षणा है। इसे भागलक्षणा भी कहते है।
  • उदाहरण - 
  • तत्वमसि' महावाक्ये अखण्डार्थप्रतीति जहदजहल्लक्षणया जायते। 
  • तत्त्वमसि वाक्य का बोध जहदजहल्लक्षणा या भागलक्षणा से होता है।
  • लक्षणा तीन प्रकार की होती है
  • जहदलक्षणा / लक्षणलक्षणा -
  • जो अपने मूल अर्थ को त्याग दे और दुसरा अर्थ ग्रहण करें, जैसे- गङ्गायां घोषः।
  • अजहल्लक्षणा/ उपादानलक्षणा -
  • जो अपने अर्थ को न छोड़े। जैसे शोणो धावति।
  • जहदजहल्लक्षणा/ भागलक्षणा -
  • जो अपने मूल अर्थ को त्याग दें जैसे तत्वमसि।

अतः स्पष्ट है, की "भागलक्षणा" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 24

'सच्चिदानन्दाद्वयं ब्रह्मे' त्यादिना वेदान्तसारे किं लक्षितम्?

  1. AOption (a)

    अवस्तु

  2. BOption (b)

    अज्ञानम्

  3. COption (c)

    वस्तु

  4. DOption (d)

    अधिकारी

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Correct answer

Answer: (c)C.

वस्तु

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'सच्चिदानन्दाद्वयं ब्रह्मे' इस से वेदांतसार में क्या लक्षित है?

​वेदान्तसार-

  • वेदान्तसार वेदान्त की परम्परा का अन्तिम ग्रन्थ है जिसके रचयिता सदानन्द योगी हैं। इसकी रचना १६वीं शताब्दी में हुई थी।
  • वेदान्तसार, वेदान्त के सिद्धान्तों में सरलता से प्रवेश करने का मार्ग प्रशस्त करता है। इस दृष्टि से यह सर्वाधिक लोकप्रिय रचना है।
  • अद्वैत-वेदान्त अपने आप में एक गूढ़ विषय है। अद्वैत-वेदान्त के आचार्यों की एक लम्बी परम्परा है जिन्होंने वेदान्त के सिद्धान्तों का विकास कर उसको एक समृद्ध दर्शन का रूप दिया है।
  • इन आचार्यों के सिद्धान्तों में प्रवेश करना कोई सरल कार्य नहीं है। वेदान्तसार के रचयिता ने इस कठिन कार्य को सुगम कर दिखाया है।
  • अद्वैत-वेदान्त के सिद्धान्तों का एक समन्वित, संक्षित तथा सरल रूप हमें वेदान्तसार में प्राप्त होता है।

वेदांतसार के अनुसार वस्तु और अवस्तु :

वस्तु सच्चिदानन्दाद्वयं ब्रह्म। 

  • अर्थात् सच्चिदानन्द अद्वितीय ब्रह्म वस्तु है।

अज्ञानादिसकलजड़समूहोऽवस्तु।

  • अज्ञान से प्रारम्भ होने वाले समस्त जड़पदर्थों का समूह अवस्तु है।

​

अतः स्पष्ट है, की "वस्तु" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 25

कतिविधास्तुष्टयः साङ्ख्ये परिगणिताः?

  1. AOption (a)

    अष्टौ

  2. BOption (b)

    नव

  3. COption (c)

    सप्त

  4. DOption (d)

    तिस्रः

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Correct answer

Answer: (b)B.

नव

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : साङ्ख्य दर्शन में कितनी प्रकार की तुष्टियोंं का वर्णन है?

सांख्यकारिका-

  • सांख्यकारिका, सांख्य दर्शन के उपलब्ध ग्रन्थों में सबसे प्राचीन एवं बहुत ही महत्त्वपूर्ण प्रकरण ग्रन्थ है जिसने अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त की है।
  • इसके रचयिता ईश्वरकृष्ण हैं। संस्कृत के एक विशेष प्रकार के श्लोकों को "कारिका" कहते हैं। सांख्यकारिका में ७२ कारिकाएँ हैं जो आर्या छन्द में हैं।
  • दुःख की एकान्त निवृत्ति तो केवल ‘व्यक्ताव्यक्तज्ञ विज्ञान’ से हो सकती है, वही इस शास्त्र में प्रतिपादित है।

सांख्यकारिका के अनुसार तुष्टियाँँ :

एष प्रत्ययसर्गो विपर्ययाशक्तितुष्टिसिद्ध्याख्यः।

गुणवैषम्यविमर्दात् तस्य च भेदास्तु पञ्चाशत्।। ४६।।

पञ्च विपर्ययभेदा भवन्त्यशक्तिश्च करणवैकल्यात् ।

अष्टाविंशतिभेदा तुष्टिर्नवधाऽष्टधा सिद्धिः।।४७।।

  • प्रत्ययसर्ग मूल रूप से ४ प्रकार का हैं -
  • विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि, सिद्धि।
  • प्रत्ययसर्ग के कुल ५० भेद हैं
  • विपर्यय - ५
  • अशक्ति - २८
  • तुष्टि - ९
  • सिद्धि - ८

आध्यात्मिक्यश्चतस्र: प्रकृत्युपादानकालभाग्याख्याः।

बाह्या विषयोपरमात् पञ्च च नव तुष्टयोऽभिमताः।।५०।।

  • अर्थ - प्रकृति, उपादान, काल और भाग्य यह चार आध्यात्मिक तुष्टि और शब्दादि विषयोंं के वैराग्य से उत्पन्न चार बाह्य तुष्टि, इस प्रकार तुष्टि की संख्या नौ है।
  • प्रकृति, उपदान, काल, भाग, शब्दोपरम्, स्पर्शोपरम्, रूपोपरम्, रसोपरम्, गन्धोपरम् यह नौ तुष्टियाँँ है।

अतः स्पष्ट है, की "नव" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 26

साङ्ख्यरीत्या मोक्षप्राप्तिः कस्मादङ्गीक्रियते?

  1. AOption (a)

    धर्मात्

  2. BOption (b)

    वैराम्यात्

  3. COption (c)

    ऐश्वर्यात्

  4. DOption (d)

    ज्ञानात्

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Correct answer

Answer: (d)D.

ज्ञानात्

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : सांख्य दर्शन के अनुसार मोक्षप्राप्ति कैसे होती है?

सांख्यकारिका-

  • सांख्यकारिका, सांख्य दर्शन के उपलब्ध ग्रन्थों में सबसे प्राचीन एवं बहुत ही महत्त्वपूर्ण प्रकरण ग्रन्थ है जिसने अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त की है।
  • इसके रचयिता ईश्वरकृष्ण हैं। संस्कृत के एक विशेष प्रकार के श्लोकों को "कारिका" कहते हैं। सांख्यकारिका में ७२ कारिकाएँ हैं जो आर्या छन्द में हैं।
  • दुःख की एकान्त निवृत्ति तो केवल ‘व्यक्ताव्यक्तज्ञ विज्ञान’ से हो सकती है, वही इस शास्त्र में प्रतिपादित है।

सांख्यदर्शन में मोक्ष का सिद्धांत :

  • सांख्य दर्शन में पुरूष और प्रकृति में विभिन्नता का बोध कराने वाले सम्यक् ज्ञान को ही मोक्ष कहा गया है।
  • अपने जीवन काल कमें जिस व्यक्ति को तत्व ज्ञान हो जाता है, वह जीवन मुक्त हो जाता है। ऐसे जीवन मुक्त को प्रारम्ध कर्मों का फल भोगने के लिये शरीर धारण करना आवश्यक है। देहावसान होने पर जीवनमुक्त पूर्ण मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
  • इस दर्शन के अनुसार मानव का सर्वोच्च कर्तव्य है, अपने स्वरूप का तावित्क ज्ञान कि मैं पुरुष हूँ।
  • अहंकार, राग, द्वेष, अभिनिवेश आदि ज्ञान के मार्ग में बाधक माने गये। सांख्य दर्शन में ज्ञान की सर्वोपरि प्रतिष्ठा की गई।
  • इसमें यज्ञों को कोई स्थान नहीं दिया। इस दर्शन ने सभी वर्णो के लिये ज्ञान का मार्ग खोल दिया। जिस समय पुरूष को यह ज्ञान हो जाता है कि त्रिगुणात्मक प्रकृति भिन्न है और मैं भिन्न हूँ। उस समय वह मुक्त ही हैं।
  • इस दर्शन के अनुसार मुक्ति का प्रमुख साधन यही विवेक या ज्ञान है।

अतः स्पष्ट है, की "ज्ञानात्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 27

साङ्ख्यदर्शनेऽन्तःकरणं किमात्मकम्?

  1. AOption (a)

    बुद्धिरेव

  2. BOption (b)

    बुद्ध्यहङ्कारावेव

  3. COption (c)

    मनोबुद्धी एव

  4. DOption (d)

    बुद्ध्यहङ्कारमनांसि

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Correct answer

Answer: (d)D.

बुद्ध्यहङ्कारमनांसि

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : सांख्यदर्शन में अन्तःकरण किस से युक्त है?

सांख्यकारिका-

  • सांख्यकारिका, सांख्य दर्शन के उपलब्ध ग्रन्थों में सबसे प्राचीन एवं बहुत ही महत्त्वपूर्ण प्रकरण ग्रन्थ है जिसने अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त की है।
  • इसके रचयिता ईश्वरकृष्ण हैं। संस्कृत के एक विशेष प्रकार के श्लोकों को "कारिका" कहते हैं। सांख्यकारिका में ७२ कारिकाएँ हैं जो आर्या छन्द में हैं।
  • दुःख की एकान्त निवृत्ति तो केवल ‘व्यक्ताव्यक्तज्ञ विज्ञान’ से हो सकती है, वही इस शास्त्र में प्रतिपादित है।

सांख्यदर्शन के तत्व :

सांख्य दर्शन के २५ तत्व इस प्रकार है -

  • आत्मा (पुरुष)
  • तत्व (प्रकृति)
  • अंतःकरण (३) :
  • मन, बुद्धि, अहंकार
  • ज्ञानेन्द्रियाँ (५) :
  • नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कर्ण
  • कर्मेन्द्रियाँ (५) :
  • पाद, हस्त, उपस्थ, पायु, वाक्
  • तन्मात्रायें (५) :
  • गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द
  • महाभूत (५) :
  • पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश

 

अतः स्पष्ट है, की "बुद्ध्यहङ्कारमनांसि" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 28

साङ्ख्यदर्शने कैवल्यं कस्य मन्यते?

  1. AOption (a)

    पुरुषस्य

  2. BOption (b)

    प्रधानस्य

  3. COption (c)

    महतः

  4. DOption (d)

    अहङ्कारस्य

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Correct answer

Answer: (a)A.

पुरुषस्य

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : साङ्ख्यदर्शन में कैवल्य किस का माना है?

सांख्यकारिका-

  • सांख्यकारिका, सांख्य दर्शन के उपलब्ध ग्रन्थों में सबसे प्राचीन एवं बहुत ही महत्त्वपूर्ण प्रकरण ग्रन्थ है जिसने अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त की है।
  • इसके रचयिता ईश्वरकृष्ण हैं। संस्कृत के एक विशेष प्रकार के श्लोकों को "कारिका" कहते हैं। सांख्यकारिका में ७२ कारिकाएँ हैं जो आर्या छन्द में हैं।
  • दुःख की एकान्त निवृत्ति तो केवल ‘व्यक्ताव्यक्तज्ञ विज्ञान’ से हो सकती है, वही इस शास्त्र में प्रतिपादित है।

सांख्यदर्शन के अनुसार कैवल्य :

पुरुषस्यदर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य। 'पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतः सर्गः।

  • 'दुःखों की ऐकान्तिक या आत्यन्तिक निवृत्ति ही सांख्य का लक्ष्य है।
  • प्रकृति की सृष्टिः के उद्देश्य की पूर्ति हो जाने पर प्रकृति विरत हो जाती है और पुरुष कैवल्य को प्राप्त हो जाता है।

अतः स्पष्ट है, की "पुरुषस्य" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 29

पुरुषस्यास्तित्वं साङ्ख्यरीत्या कस्माद् हेतोः?

  1. AOption (a)

    त्रैगुण्यात्

  2. BOption (b)

    विषयत्वात्

  3. COption (c)

    भेदानां परिमाणात्

  4. DOption (d)

    अधिष्ठानात्

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Correct answer

Answer: (d)D.

अधिष्ठानात्

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : सांख्य दर्शन के अनुसार पुरुष का अस्तित्व किस हेतु से होता है?

सांख्यकारिका-

  • सांख्यकारिका, सांख्य दर्शन के उपलब्ध ग्रन्थों में सबसे प्राचीन एवं बहुत ही महत्त्वपूर्ण प्रकरण ग्रन्थ है जिसने अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त की है।
  • इसके रचयिता ईश्वरकृष्ण हैं। संस्कृत के एक विशेष प्रकार के श्लोकों को "कारिका" कहते हैं। सांख्यकारिका में ७२ कारिकाएँ हैं जो आर्या छन्द में हैं।
  • दुःख की एकान्त निवृत्ति तो केवल ‘व्यक्ताव्यक्तज्ञ विज्ञान’ से हो सकती है, वही इस शास्त्र में प्रतिपादित है।

सांख्यदर्शन के अनुसार पुरुष की सत्ता :

ईश्वरकृष्ण सांख्यकारिका में पुरुष की सत्ता अर्थात् अस्तित्व सिद्ध करने हेतु पाँच तर्क देते हैंं - 

"संघात परार्थत्वात् त्रिगुणादि विपर्ययादधिष्ठानात्। 

पुरूषोऽस्ति भोक्तृभावात् कैवल्यार्थ प्रवृत्तेश्च।।” (सांख्यकारिका १७)

  • संघात परार्थत्वात् -
  • संघात इस शब्द का अर्थ एकसाथ आकर कार्य करनेवाले तत्व यह होता है। पुरुष तीन गुणोंं से भिन्न, अविवेकी, अविषय, असामान्य, चेतन और अपरिणामी होना चाहिये। पुरुष संघात से भिन्न इस प्रकार अभिप्रेत है। इस प्रकार वही पुरुष है, यह सिद्ध होता है।
  • त्रिगुणादिविपर्ययात् -
  • प्रकृति अपने स्वरूप में त्रिगुणात्मक तथा परिणामी है तो तार्किक दृष्टि से त्रिगुण निर्गुण की ओर संकेत करता है परिणामी अपरिणामी की ओर।यह निर्गुण तथा अपरिणामी तत्व पुरुष है।यह पुरुष की सत्ता सिद्धि का एक प्रमाण यह है।
  • अधिष्ठानात् -
  • त्रिगुणात्मक पदार्थोंं का आधार होना आवश्यक है। सुखदुःखमोहरूप पदार्थोंं को आधार होना चाहिये, जो त्रिगुणादिकोंं से भिन्न आत्मा है।
  • भोक्तृभावात् -
  • प्रकृति और उससे उत्पन्न पदार्थ जड़ होने के कारण भोग्य है, अतः इसे भोगने के लिए भोक्ता होना चाहिए।और यह भोक्ता वही हो सकता है जो चेतना से युक्त हो।  चेैतन्य होने के कारण पुरुष इस प्रकृति का भोक्ता है। अत: भोक्तृभाव होने से पुरुष  का अस्तित्व सिद्ध होता है।
  • कैवल्यार्थप्रवृत्तेश्च -
  • प्रकृति का साध्य कैवल्य है। अब यह प्रश्न उठता है, कि कैवल्य की प्राप्ति  किससे होगी। पुरुष की सत्ता का वास्तविक बोध होने पर ही प्राणि कैवल्य अर्थात् मोक्ष प्राप्त कर सकतें हैं।

अतः स्पष्ट है, की **"अधिष्ठानात्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 30

कस्माद् हेतोः प्रधानस्यानुपलब्धिः सांख्यरीत्या?

  1. AOption (a)

    अतिदूरात्

  2. BOption (b)

    समानाभिहारात्

  3. COption (c)

    सौक्ष्म्यात्

  4. DOption (d)

    मनोऽनवस्थानात्

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Correct answer

Answer: (c)C.

सौक्ष्म्यात्

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : सांख्यदर्शन के अनुसार किस हेतु से प्रधान की अनुपलब्धि होती है?

सांख्यकारिका-

  • सांख्यकारिका, सांख्य दर्शन के उपलब्ध ग्रन्थों में सबसे प्राचीन एवं बहुत ही महत्त्वपूर्ण प्रकरण ग्रन्थ है जिसने अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त की है।
  • इसके रचयिता ईश्वरकृष्ण हैं। संस्कृत के एक विशेष प्रकार के श्लोकों को "कारिका" कहते हैं। सांख्यकारिका में ७२ कारिकाएँ हैं जो आर्या छन्द में हैं।
  • दुःख की एकान्त निवृत्ति तो केवल ‘व्यक्ताव्यक्तज्ञ विज्ञान’ से हो सकती है, वही इस शास्त्र में प्रतिपादित है।

स्पष्टीकरण :

सौक्ष्म्यात्तदनुपलब्धिर्नाभावात् कार्यतस्तदुपलब्धेः।

महदादि तच्च कार्यं प्रकृतिसरूपं विरूपं च।। (सांख्यकारिका, ८)

अर्थ - 

  • प्रकृति आदि प्रधान तत्वोंं का बोध न होने का कारण सांख्यकारिका में इस प्रकार बताया है -
  • सूक्ष्मता से उसका बोध नहीं होता है, उसका अभाव है, इसलिए नहीं। कार्य से कारण का ज्ञान होता है, महत् आदि कार्य प्रकृति स्वरूप और प्रकृति से भिन्न आदि दो प्रकार का होता है।

अतः स्पष्ट है, की "सौक्ष्म्यात्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 31

'प्रतिहर्त्ता' ऋत्विक् कस्य गणस्य विद्यते

  1. AOption (a)

    उद्गातृगणस्य

  2. BOption (b)

    होतृगणस्य

  3. COption (c)

    ब्रह्मगणस्य

  4. DOption (d)

    अध्वर्युगणस्य

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Correct answer

Answer: (a)A.

उद्गातृगणस्य

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'प्रतिहर्त्ता' ऋत्विक् किस गण का होता है?

ऋत्विक् :

जो ऋतु में यज्ञ करता है उसे ऋत्विक कहा जाता है। 

अग्नयाधेयं पाकयज्ञानग्निष्टोमादिकान्यमखान्।

य: करोति वृतो यस्य स तस्यर्त्विगिहोच्यते।।

  • अग्नि की स्थापना, पाकयज्ञ, अग्निष्टोम आदि यज्ञ जो यजमान के लिए करता है, वह उसका ऋत्विक कहा जाता है।

ऋत्विकोंं का विभाजन :

  • पुरातन और यज्ञों में कार्य करने वालों की निश्चित संख्या सात होती थी। ऋग्वेद की एक पुरानी तालिका में इन्हें होता, पोता, नेष्टा, आग्नीध्र, प्रशास्ता, अध्वर्यु और ब्रह्मा कहा गया है।
  • सातों में प्रधान 'होता' माना जाता था, जो ऋचाओं का गान करता था। वह प्रारम्भिक काल में ऋचाओं की रचना भी (ऊह विधि से) करता था।
  • अर्ध्वयु सभी यज्ञकार्य (हाथ से किये जाने वाले) करता था।
  • उसकी सहायता मुख्य रूप से आग्नीध्र करता था, ये ही दोनों छोटे यज्ञों को स्वतंत्र रूप से कराते थे।
  • प्रशास्ता जिसे उपवक्ता तथा मैत्रावरुण भी कहते हैं, केवल बड़े यज्ञों में भाग लेता था और 'होता' को परामर्श देता था। कुछ प्रार्थनाएँ इसके अधीन होती थीं।
  • पोता, नेष्टा एवं ब्रह्मा का सम्बन्ध सोमयज्ञों से था। बाद में ब्रह्मा को ब्राह्माच्छंसी कहने लगे जो कि यज्ञों में निरीक्षक का कार्य करने लगा।
  • उद्गाता तथा उसके सहायक प्रशोस्ता एवं दूसरे सहायक प्रतिहर्ता के कार्य यज्ञों के प्राचीन काल में होतें हैं।
  • बाद में सोलह पुरोहित होने लगे, जिनमें नये ऋत्विक थे।
  • अच्छावाक, ग्रावस्तुत, उन्नेता तथा सुब्रह्मण्य, जो औपचारिक तथा कार्यविधि के अनुसार चार-चार भागों में बँटे हुए थे -
  • होतृगण - होता, मैत्रावरुण, अच्छावाक, तथा ग्रावस्तुत;
  • उद्गातृगण - उद्गाता, प्रस्तोता, प्रतिहर्ता तथा सुब्रह्मण्य,
  • अध्वर्युगण - अध्वर्यु, प्रतिस्थाता, नेष्टा तथा उन्नेता
  • ब्रह्मगण - ब्रह्मा, ब्रह्माणच्छांसी, आग्नीध्र तथा पोता।
  • इनके अतिरिक्त एक पुरोहित और होता था, जो राजा के सभी धार्मिक कर्तव्यों का आध्यात्मिक परामर्शदाता था। यह पुरोहित बड़े यज्ञों में ब्रह्मा का स्थान ग्रहण करता था तथा सभी याज्ञिक कार्यों का मुख्य निरीक्षक होता था। यह पुरोहित प्रारम्भिक काल में होता था तथा सर्वप्रथम मंत्रों का गान करता था। पश्चात् यही ब्रह्मा का स्थान लेकर यज्ञनिरीक्षक का कार्य करने लगा।

 

​अतः स्पष्ट है, की "उद्गातृगणस्य" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 32

'अग्निष्टोमाख्यः' सोमयागः कदा अनुष्ठीयते?

  1. AOption (a)

    ग्रीष्मे

  2. BOption (b)

    वसन्ते

  3. COption (c)

    शरदि

  4. DOption (d)

    प्रावृषि

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Correct answer

Answer: (b)B.

वसन्ते

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अग्निष्टोम नामक सोमयाग का अनुष्ठान कब किया जाता है?

अग्निष्टोम याग :

  • सोमयाग की श्रेणी में ७ यज्ञ आते हैं। इन सात सोमयागोंके नाम इस प्रकार हैं। यथा – अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र तथा अप्तोर्याम। इन सातों सोमयागोंमें अग्निष्टोम सबसे प्रथम आता है।
  • प्रजापति ने प्रजा उत्पन्न करनेकी इच्छासे बहुत होने की कामना की और ऐसी कामना करते हुए ही उसने प्रजननसाधनरूप अग्निष्टोमका दर्शन किया। इसके पश्चात् उसने दृश्यमान यह सारी सृष्टि उत्पन्न की।
  • अग्निष्टोम का अनुष्ठान सत्रह ऋत्विजों के द्वारा सम्पन्न होता है। सत्रहवाँ ऋत्विज स्वयं यजमान होता है, जो कि स्वयं यज्ञका स्वामी है। यजमानातिरिक्त ये सोलहों ऋत्विज चार वर्गोंमें विभक्त किए गए हैं।
  • अग्निष्टोमके अन्तर्गत सवन कर्ममें गाए जाने वाले स्तोत्रोंकी संख्या 12 एवं शंसन किए जाने वाले शस्त्रों की भी संख्या 12 ही है। शस्त्रों का स्वरूप इस प्रकार होता है - 
  • प्रातः सवनमें त्रिवृत्स्तोमात्मक बहिष्पवमानस्तोत्र तथा पञ्चदशस्तोमात्मक चार आज्य स्तोत्रों का गायन किया जाता है। शस्त्रोंमें आज्यशस्त्र, प्रउग शस्त्र, मैत्रावरुण शस्त्र, ब्रह्मणाच्छंसिशस्त्र तथा अच्छावाक शस्त्रका शंसन किया जाता है।
  • माध्यन्दिन सवनमें पञ्चदशस्तोमात्मक माध्यन्दिन पवमान स्तोत्र तथा सप्तदशस्तोमात्मक चार पृष्ठ स्तोत्रों का गायन किया जाता है। शस्त्रोंमें मरुत्वतीय शस्त्र, निष्वेफवल्य, मैत्रावरुण, ब्राह्मणाच्छंसि तथा अच्छावाक शस्त्रका शंसन किया जाता है।
  • तृतीय सवनमें आर्भव पवमान  तथा अग्निष्टोम स्तोत्र का गायन तथा वैश्वदेव एवं अग्निमारुत शस्त्रका शंसन किया जाता है।
  • यह याग वसंत ऋतु में किया जाता है और पांच दिन चलता है।
  • जिस प्रकार हविर्यागोंकी प्रकृति दर्शपौर्णमासेष्टि है, उसी प्रकार समस्त सोमयागों की प्रकृति अग्निष्टोम यज्ञ है। उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र तथा अप्तोर्याम ये छहों सोमयाग, अग्निष्टोम की विकृति हैं।

 

​अतः स्पष्ट है, की  "वसन्ते"**  यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 33

'मशककल्पसूत्रम्' कस्य वेदस्य वर्तते?

  1. AOption (a)

    अथर्ववेदस्य

  2. BOption (b)

    ॠग्वेदस्य

  3. COption (c)

    कृष्णयजुर्वेदस्य

  4. DOption (d)

    सामवेदस्य

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Correct answer

Answer: (d)D.

सामवेदस्य

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'मशककल्पसूत्रम्' किस वेद से संबंधित है?

मशककल्पसूत्र :

  • मशककल्पसूत्र आर्षेय कल्पसूत्र के नाम से भी जाना जाता है।
  • सामान्यत: श्रौतसूत्रों और विशेष रूप से साम–लक्षण ग्रन्थों के मध्य इसका अत्यन्त सम्मानपूर्ण स्थान है।
  • कालन्द के अनुसार यह लाट्यायन एवं द्राह्यायण श्रौतसूत्रों की अपेक्षा अधिक प्राचीन है।
  • इसके रचयिता मशक या मशक गार्ग्य माने जाते हैं।
  • आर्षेयकल्प पूर्णतया साम वेद से संबंधित और ताण्ड्य ब्राह्मण के क्रम का अनुसर्त्ता है।

​अतः स्पष्ट है, की "सामवेदस्य" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

मशककल्पसूत्र का विभाजन :

  • प्रथम दो अध्यायों में गवामयन सत्र का निरूपण है, जो वास्तव में विभिन्न एकाहों के निश्चित क्रम में अनुष्ठान से सम्पन्न होता है।
  • तृतीय अध्याय में ज्योति, गौ:, आयु प्रभृति एकाहों के साथ ही श्येन और इषु सदृश अभिचार यागों तथा संस्कारविहीन व्रात्यस्तोम यागों का भी विधान है। इसी अध्याय में 'सर्वस्वार' नामक विलक्षण याग (जो सुत्या के दिन मृत्यु–कामना करने वाले के द्वारा अनुष्ठेय है) का विधान भी हुआ है।
  • चतुर्थ अध्याय में चातुर्मास्यों का विशद विवरण है। इनके साथ ही उपहव्य, ऋतपेय, दूणाश, वैश्य स्तोम, तीव्रसुत, वाजपेय तथा राजसूय संज्ञक यागों का निरूपण भी हुआ है।
  • पञ्चम अध्याय में राज, विराज, औपशद्, पुन: स्तोम, द्विविध चतुष्टोम, उद्भिद्, बलभिद्, अपचिति, ज्योति, ऋषभ प्रभृति का वर्णन हुआ है।
  • षष्ठ से अष्टम अध्याय तक विभिन्न अहीन यागों (दो सुत्यादिवसों से लेकर 11 सुत्यादिवसों से युक्त) का निरूपण किया गया है।
  • पञ्चरात्र हैं। तीन षडह हैं, सात सप्तरात्र हैं, एक अष्टरात्र है, दो नवरात्र हैं, चार दशरात्र हैं और एक एकादश रात्र है।
  • नवम अध्याय में 48 सत्रयागों का विवरण है। दशम तथा एकादश अध्याय विभिन्न 'अयन' संज्ञक यागों के विधि–विधान के प्रस्तावक हैं।

Question 34

'मौद' शाखा केन वेदेन सह सम्बद्धा वर्तते?

  1. AOption (a)

    सामवेदेन

  2. BOption (b)

    कृष्णयजुर्वेदेन

  3. COption (c)

    अथर्ववेदेन

  4. DOption (d)

    ऋग्वेदेन

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Correct answer

Answer: (c)C.

अथर्ववेदेन

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'मौद' शाखा किस वेद से संबंधित है?

वेद - शाखा :

  • मूलवस्तु से निकले हुए विभाग अथवा अंग को शाखा कहते हैं - जैसे वृक्ष की शाखा।
  • वैदिक साहित्य के संदर्भ में वैदिक शाखा शब्द से उन विशेष परंपराओं का बोध होता है जो गुरु-शिष्य-प्रणाली, देशविभाग, उच्चारण की भिन्नता, काल एवं विशेष परिस्थितिजन्य कारणों से चार वेदों के भिन्न-भिन्न पाटों के रूप में विकसित हुई।
  • शाखाओं को कभी कभी 'चरण' भी कहा जाता है।
  • इन शाखाओं का विवरण शौनक के चरणव्यूह और पुराणों में विशद रूप से मिलता है।

अथर्ववेदीय शाखाएँँ :

 पतंजलि ने ऋग्वेद की 21, यजुर्वेद की 100, सामवेद की 1000 तथा अथर्ववेद की 9 शाखाएँ बताई हैं। किंतु चरणव्यूह में उल्लिखित संख्याएँ इनसे भिन्न हैं।

चरणव्यूह के अनुसार अथर्ववेद की शाखाएँँ यह हैं -

  • पिप्पलाद, स्तौद, मौद, शौनक, जाजल, जलद, ब्रह्मवद, देवदर्श तथा चारणवैद्य।
  • इनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध शाखाएँ हैं - पिप्पलाद और शौनक।

 

​अतः स्पष्ट है, की "अथर्ववेदेन" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 35

'अग्निवेश्य-गृह्यसूत्रम्' कस्य वेदस्य वर्तते?

  1. AOption (a)

    कृष्णयजुर्वेदस्य

  2. BOption (b)

    सामवेदस्य

  3. COption (c)

    ऋग्वेदस्य

  4. DOption (d)

    अथर्ववेदस्य

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Correct answer

Answer: (a)A.

कृष्णयजुर्वेदस्य

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'अग्निवेश्य-गृह्यसूत्रम्' किस वेद से संबंधित है?

गृह्यसूत्र :

  • वेद द्वारा प्रतिपादित विषयों को स्मरण कर उन्हीं के आधार पर आचार-विचार को प्रकाशित करनेवाली शब्दराशि को "स्मृति" कहते हैं।
  • स्मृति से विहित कर्म स्मार्त कर्म हैं। इन कर्मों की समस्त विधियाँ स्मार्त सूत्रों से नियंत्रित हैं। स्मार्त सूत्र का नामांतर गृह्यसूत्र है।
  • अतीत में वेद की अनेक शाखाएँ थीं। प्रत्येक शाखा के निमित्त गृह्यसूत्र भी होंगे। वर्तमानकाल में जो गृह्यसूत्र उपलब्ध हैं वे अपनी शाखा के कर्मकांड को प्रतिपादित करते हैं।

प्रमुख गृह्यसूत्र :

  • शांखायनगृह्यसूत्र ऋग्वेद की शांखायन शाखा से संबद्ध है।
  • कौशीतकि गृह्यसूत्र का भी ऋग्वेद से संबंध है। शांखायनगृह्यसूत्र से इसका शब्दगत अर्थगत पूर्णत: साम्य है।
  • आश्वलायन गृह्यसूत्र ऋग्वेद की आश्वलायन शाखा से संबंद्ध है। यह गुजरात तथा महाराष्ट्र में प्रचलित है।
  • पारस्करगृह्यसूत्र शुक्ल यजुर्वेद का एकमात्र गृह्यसूत्र है।
  • लौगाक्षिगृह्यसूत्र गृह्यसूत्र कृष्ण यजुर्वेद की विभिन्न शाखाओं से संबंद्ध है।
  • 'अग्निवेश्य-गृह्यसूत्रम्' भी कृष्ण यजुर्वेद से संबंद्ध है।
  • बौधायान गृह्यसूत्र के अंत में गृह्यपरिभाषा, गृह्यशेषसूत्र और पितृमेध सूत्र हैं।
  • गोभिलगृह्यसूत्र सामवेद की कौथुम शाखा से संबद्ध है।
  • द्राह्यायणगृह्यसूत्र, जैमिनिगृह्यसूत्र और कौथुम गृह्यसूत्र सामवेद से संबद्ध है। खादिरगृह्यसूत्र भी सामवेद से संबद्ध गृह्यसूत्र है।
  • कोशिकागृह्यसूत्र का संबंध अथर्ववेद से है।

 

​अतः स्पष्ट है, की "कृष्णयजुर्वेदस्य" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 36

'अग्निष्टोमाख्ये' सोमयागे कति शस्त्राणि भवन्ति?

  1. AOption (a)

    एकादश

  2. BOption (b)

    अष्ट

  3. COption (c)

    द्वादश

  4. DOption (d)

    पञ्चदश

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Correct answer

Answer: (c)C.

द्वादश

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अग्निष्टोम नामक सोमयाग में कितने शस्त्र होतें हैंं?

अग्निष्टोम याग :

  • सोमयाग की श्रेणी में ७ यज्ञ आते हैं। इन सात सोमयागोंके नाम इस प्रकार हैं। यथा – अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र तथा अप्तोर्याम। इन सातों सोमयागोंमें अग्निष्टोम सबसे प्रथम आता है।
  • प्रजापति ने प्रजा उत्पन्न करनेकी इच्छासे बहुत होने की कामना की और ऐसी कामना करते हुए ही उसने प्रजननसाधनरूप अग्निष्टोमका दर्शन किया। इसके पश्चात् उसने दृश्यमान यह सारी सृष्टि उत्पन्न की।
  • अग्निष्टोम का अनुष्ठान सत्रह ऋत्विजों के द्वारा सम्पन्न होता है। सत्रहवाँ ऋत्विज स्वयं यजमान होता है, जो कि स्वयं यज्ञका स्वामी है। यजमानातिरिक्त ये सोलहों ऋत्विज चार वर्गों में विभक्त किए गए हैं।
  • अग्निष्टोमके अन्तर्गत सवन कर्म में गाए जाने वाले स्तोत्रों की संख्या 12 एवं शंसन किए जाने वाले शस्त्रों की भी संख्या 12 ही है। शस्त्रों का स्वरूप इस प्रकार होता है - 
  • प्रातः सवन में त्रिवृत्स्तोमात्मक बहिष्पवमानस्तोत्र तथा पञ्चदशस्तोमात्मक चार आज्य स्तोत्रों का गायन किया जाता है। शस्त्रोंमें आज्यशस्त्र, प्रउग शस्त्र, मैत्रावरुण शस्त्र, ब्रह्मणाच्छंसिशस्त्र तथा अच्छावाक शस्त्रका शंसन किया जाता है।
  • माध्यन्दिन सवन में पञ्चदशस्तोमात्मक माध्यन्दिन पवमान स्तोत्र तथा सप्तदशस्तोमात्मक चार पृष्ठ स्तोत्रों का गायन किया जाता है। शस्त्रोंमें मरुत्वतीय शस्त्र, निष्वेफवल्य, मैत्रावरुण, ब्राह्मणाच्छंसि तथा अच्छावाक शस्त्रका शंसन किया जाता है।
  • तृतीय सवन में आर्भव पवमान तथा अग्निष्टोम स्तोत्र का गायन तथा वैश्वदेव एवं अग्निमारुत शस्त्रका शंसन किया जाता है।
  • यह याग वसंत ऋतु में किया जाता है और पांच दिन चलता है।
  • जिस प्रकार हविर्यागों की प्रकृति दर्शपौर्णमासेष्टि है, उसी प्रकार समस्त सोमयागों की प्रकृति अग्निष्टोम यज्ञ है। उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र तथा अप्तोर्याम ये छहों सोमयाग, अग्निष्टोम की विकृति हैं।

 

​अतः स्पष्ट है, की "द्वादश" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 37

'मानवश्रौतसूत्रम्' केन वेदेन सह सम्बद्धम् विद्यते?

  1. AOption (a)

    ऋग्वेदेन

  2. BOption (b)

    कृष्णयजुर्वेदेन

  3. COption (c)

    सामवेदेन

  4. DOption (d)

    अथर्ववेदेन

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Correct answer

Answer: (b)B.

कृष्णयजुर्वेदेन

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'मानवश्रौतसूत्रम् किस वेद से संबंधित है?

मानवश्रौतसूत्र :

कृष्णयजुर्वेद की मैत्रायणी शाखा के दो श्रौतसूत्र उपलब्ध होते हैं-

  • मानव श्रौतसूत्र
  • वाराह श्रौतसूत्र
  • मानव श्रौतसूत्र का प्रसार–प्रदेश दक्षिण का गोदा नामक भू–भाग है।
  • मैत्रायणी शाखा के ब्राह्मण और आरण्यक पृथक् रूप से उपलब्ध नहीं हैं।
  • मैत्रायणी शाखा से सम्बद्ध मानव श्रौतसूत्र आकार, शैली एवं श्रौत यागों के विशद निरूपण के कारण श्रौत साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखता है।
  • यह श्रौतसूत्र अध्यायों, खण्डों एवं सूत्रों के उपविभाजन में विभाजित है।

 

​अतः स्पष्ट है, की "कृष्णयजुर्वेदेन" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

मानवश्रौतसूत्र का विभाजन :

  • प्रथम भाग की संज्ञा प्राक्सोम है। प्राक्सोम भाग के प्रथम चार अध्यायों में दर्शपौणमास यज्ञ का वर्णन है। पाँचवे अध्याय में अग्न्याधान इष्टि का विशद विवेचन है। प्राक्सोम के छठे अध्याय में अग्निहोत्र, आग्रयण तथा पुनराधान इष्टियों का वर्णन मिलता है। प्राक्सोम के अंतिम अध्याय में पशुयाग की प्रकृति निरूढ पशुबन्ध का निरूपण है।
  • मानव श्रौतसूत्र के दूसरे भाग में कुल पाँच अध्याय हैं। इन पाँचों अध्यायों में सोमयाग की प्रकृति अग्निष्टोम का वर्णन किया गया है।
  • तीसरे भाग में एक ही अध्याय है जिसमें इष्टि, सोम तथा पशुयागों से सम्बन्धित प्रायश्चित्तों का वर्णन है।
  • चौथे भाग में भी एक ही अध्याय है तथा इसमें प्रवर्ग्य याग का विस्तृत वर्णन किया गया है।
  • पाँचवे भाग में दो अध्याय हैं, इसे इष्टि तथा पशुयाग का परिशेष माना जा सकता है, क्योंकि इस प्रकरण में उस प्रसंग में छूटी हुई बातों का वर्णन है।
  • छठा भाग दो अध्यायों में विभक्त है जिसमें अग्निचयन नामक जटिल सोमयाग का विशद निरूपण है।
  • सातवाँ भाग भी दो अध्यायों में विभक्त है। प्रथम अध्याय में स्वराज्य–प्राप्ति की कामना से किए जाने वाले वाजपेय याग का वर्णन है। दूसरे अध्याय में उभयात्मक–सत्रात्मक तथा अहीनात्मक द्वादशाह तथा गवामयन याग निरूपित हैं।
  • आठवें भाग की संज्ञा अनुग्राहिक है। इसे इष्टि, पशु तथा सोम का परिशेष कहा जा सकता है।
  • नवाँ तथा पाँचवा अवान्तर भागों में विभक्त है जिसमें प्रथम में राजसूय, दूसरे में अश्वमेध, तीसरे में एकाह, चौथे में अहीन और पाँचवें में सत्र यागों का निरूपण है।
  • मानव श्रौतसूत्र के दसवें भाग में शुल्ब सूत्रों का उल्लेख है जिसमें विविध श्रौत यागों में प्रयुक्त होने वाली वेदि–निर्माण प्रक्रिया सविस्तर निरूपित है।

Question 38

'त्रयो धर्मस्कन्धाः, यज्ञो अध्ययनं दानम् इति '- इत्युक्तिः कस्याम् उपनिषदि लभ्यते?

  1. AOption (a)

    बृहदारण्यकोपनिषदि

  2. BOption (b)

    छान्दोग्योपनिषदि

  3. COption (c)

    ऐतरेयोपनिषदि

  4. DOption (d)

    तैत्तिरीयोपनिषदि

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Correct answer

Answer: (b)B.

छान्दोग्योपनिषदि

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'त्रयो धर्मस्कन्धाः, यज्ञो अध्ययनं दानम् इति '- यह उक्ति किस उपनिषद में प्राप्त होती है?

संपूर्ण उक्ति : 

  • त्रयो धर्मस्कन्धाः यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमः, तप एव द्वितीयः, ब्रह्मचारी आचार्यकुलवासी तृतीयः अत्यन्तम् आत्मानम् आचार्यकुले अवसादयन्; सर्वे एते पुण्यलोका भवन्ति। ब्रह्मसंस्थो अमृतत्वमेति।

संदर्भ : 

  • छान्दोग्योपनिषत् २-२३-१

अर्थ : 

  • धर्म की तीन शाखाएं हैं। यज्ञ, अध्ययन और दान यह पहला स्कंध है, स्वयं तपस्या दूसरा स्कंध है, ब्रह्मचारी, आचार्य के परिवार का निवासी यह तिसरास्कंध है, जिसने शिक्षक के परिवार में खुद को विसर्जित कर दिया; यह सब पावन होतें हैं। जो ब्रह्म में स्थित हो जाता है, वह अमर हो जाता है।

 

​अतः स्पष्ट है, की "छान्दोग्योपनिषदि" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 39

'गौतमधर्मसूत्रम्' केन वेदेन सह सम्बद्धम् विद्यते?

  1. AOption (a)

    कृष्णयजुर्वेदेन

  2. BOption (b)

    ऋग्वेदेन

  3. COption (c)

    अथर्ववेदेन

  4. DOption (d)

    सामवेदेन

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Correct answer

Answer: (d)D.

सामवेदेन

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : ''गौतमधर्मसूत्रम्' किस वेद से संबंधित है?

गौतमधर्मसूत्र :

  • गौतम धर्मसूत्र अब तक उपलब्ध धर्मसूत्रों में प्राचीनतम है। यद्यपि सभी धर्मसूत्र ग्रंथ बिना किसी शाखाभेद के संपूर्ण आर्यजन को सामान्य रूप से मान्य हैं, तथापि कुमारिल (तंत्रवार्तिक, काशी, पृ. 179) के अनुसार गौतम धर्मसूत्र और गोभिल गृह्यसूत्र छंदोग (सामवेद) अध्येताओं के द्वारा विशेष रूप से परिगृहीत हैं।
  • गौतम धर्मसूत्र के आंतरिक साक्ष्य से कुमारिल के मत की पुष्टि होती है। इस ग्रंथ का संपूर्ण 26वां अध्याय सामवेद के ब्राह्मण सामविधान से गृहीत है।
  • सामवेदीय गोभिलगृह्यसूत्र में गौतम के प्रमाणों के उद्धरण हैं। परंपरा के अनुसार सामवेद की शाखा राणायनीय का एक सूत्रचरण गौतम था और संभवत: इसी सूत्रचरण में गौतमधर्मसूत्र की रचना हुई। यह कल्पना भी दूरारूढ़ नहीं कि धर्मसूत्र के अतिरिक्त गौतमसूत्रचरण के गृह्य और श्रौतस्त्र थे जो अब उपलब्ध नहीं।
  • सामयाचारिक अथवा स्मार्त धर्म का विवेचन करनेवाले इस धर्मसूत्र में 28 अध्याय हैं, जिनमें वर्ण, आश्रम और निमित्त (प्रायश्चित्त) धर्मों का विस्तृत तथा गुणधर्म (राजधर्म) का अपेक्षतया संक्षिप्त विधान है। धर्मप्रमाण, प्रमाणों का पौर्वापर्य, उपनयन, शौच (अ. 1-2), ब्रह्मचारी, भिक्षु और बैखानस आश्रमों की विधि (अ.-3), गृहस्थाश्रम से संबद्ध संस्कार और कर्तव्य (अ. 4-6), ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के कर्तव्य (अ. 9-10), राजधर्म (अ. 11), दंड (अ. 11-13), शौच (अ. 14), स्त्रीधर्म (अ. 18), प्रायश्चित्त (अ. 18-27), दायभाग (अ. 27, 28) एवं पुत्रों के प्रकार (अ. 28) का विवेचन है।
  • गौतम धर्मसूत्र में केवल तीन प्रश्न हैं। प्रथम तथा द्वितीय प्रश्न में नौ–नौ अध्याय तथा तृतीय प्रश्न में दस अध्याय हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण गौतम धर्मसूत्र 28 अध्यायों में विभक्त है, जिसमें एक सहस्त्र सूत्र है।
  • इसपर हरदत्त की "मिताक्षरा" व्याख्या और मस्करी का भाष्य है।

 

​अतः स्पष्ट है, की "सामवेदेन" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 40

'तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्यया आत्मानम् अन्विष्यात्' - इत्युक्तिः कस्याम् उपनिषदि प्राप्यते?

  1. AOption (a)

    प्रश्नोपनिषदि

  2. BOption (b)

    केनोपनिषदि

  3. COption (c)

    मुण्डकोपनिषदि

  4. DOption (d)

    श्वेताश्वतरोपनिषदि

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Correct answer

Answer: (a)A.

प्रश्नोपनिषदि

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्यया आत्मानम् अन्विष्यात्''- यह उक्ति किस उपनिषद में प्राप्त होती है?

संपूर्ण उक्ति : 

  • अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययात्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते। एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्‌ परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः। तदेष श्लोकः।।

संदर्भ : 

  • प्रश्नोपनिषद् - प्रथमः प्रश्न - १०

अर्थ : 

किन्तु उत्तरायण मार्ग का अनुसरण करते हैं वे महात्माजन जिन्होंने 'आत्मा' का ब्रह्मचर्य, विद्या, श्रद्धा एवं तपस्या के द्वारा अन्वेषण कर लिया है; क्योंकि वे 'सूर्यलोक' के अपने स्वर्ग को जीत लेते हैं। वहीं है 'प्राणों' का आयतन (विश्राम स्थल), वहाँ अमृतत्व अभय प्रदान करता है, वहाँ जीवात्माओं का सर्वोच्च द्युलोक है; वहीं से कोई लौटता नहीं हैं; अतएव यह निरोध तथा यह अवरोध है। जिसके सम्बन्ध में यह श्लोक (श्रुतिवचन) है।

​अतः स्पष्ट है, की "प्रश्नोपनिषदि" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 41

कस्याम् उपनिषदि 'भृगुवल्ली' उपदिष्टा?

  1. AOption (a)

    बृहदारण्यकोपनिषदि

  2. BOption (b)

    केनोपनिषदि

  3. COption (c)

    तैत्तिरीयोपनिषदि

  4. DOption (d)

    ऐतरेयोपनिषदि

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Correct answer

Answer: (c)C.

तैत्तिरीयोपनिषदि

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किस उपनिषद में भृगुवल्ली का उपदेश किया है?

भृगुवल्ली :

भृगुवल्ली तैत्तिरीयोपनिषद का भाग है और इस में 10 अनुवाक आतेंं हैं। इसका स्वरूप यह है - 

  • भृगुवल्ली में ऋषिवर भृगु की ब्रह्मपरक जिज्ञासा का समाधान उनके पिता महर्षि वरुण द्वारा किया जाता है।
  • वे उन्हें तत्त्वज्ञान का बोध कराने के उपरान्त, साधना द्वारा उसे स्वयं अनुभव करने के लिए कहते हैं।
  • तब वे स्वयं अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द को ब्रह्म-रूप में अनुभव करते हैं।
  • ऐसा अनुभव हो जाने पर महर्षि वरुण उन्हें आशीर्वाद देते हैं और अन्नादि का दुरुपयोग न करके उसे सुनियोजित रूप से वितरण करने की प्रणाली समझाते हैं।
  • अन्त में परमात्मा के प्रति साधक के भावों और उसके समतायुक्त उद्गारों का उल्लेख करते हैं।

 

​अतः स्पष्ट है, की "तैत्तिरीयोपनिषदि" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 42

'खलु कृत्वा'- इत्यत्र निरुक्तानुसारं 'खलु' पदं विद्यते-

  1. AOption (a)

    प्रतिषेधार्थे

  2. BOption (b)

    समुच्चयार्थे

  3. COption (c)

    निश्चयार्थे

  4. DOption (d)

    पदपूरणार्थे

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Correct answer

Answer: (a)A.

प्रतिषेधार्थे

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'खलु कृत्वा'- में निरुक्त के अनुसार खलु पद क्या है?

निरुक्त में पदजातियाँँ :

निरुक्त में शब्दों का विभाजन चार प्रकार से किया गया है  -

  • चत्वारि पदजातानि नामाख्याते चोपसर्गनिपाताश्च तानीमानि भवन्ति।
  • चार प्रकार की पदजातियाँँ होती हैंं -
  • नाम
  • आख्यात
  • उपसर्ग
  • निपात

निपात

"उच्चावचेष्वर्थेषु निपतन्ति इति निपाताः"

  • अर्थात् अनेकार्थक होने के कारण इन्हें निपात कहते हैं। निपात तीन प्रकार के होते हैं - 
  • उपमार्थक
  • इव न चित् नु ।
  • कर्मोपसंग्रहार्थक
  • वा, आ. अह, ह, किल, हि, ननु, खलु, शश्वतम्, नूनम् इत्यादि
  • पादपूरणार्थक
  • कम, इम, इत, उ, त्वत् इत्यादि।

**खलु - निपात :**खल्विति च। खलु कृत्वा। खलु कृतम्। अथापि पदपूरणः। एवं खलु तद् बभूवेति।

  • खलु इस निपात का अर्थ इस प्रकार होता है - 
  • खलु कृत्वा में प्रतिषेध के अर्थ से।
  • खलु कृतम् में प्रतिषेध के अर्थ से।
  • खलु तद् बभूव में पदपूरण के लिए।

 

​अतः स्पष्ट है, की "प्रतिषेधार्थे" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 43

अधस्तनेषु उचितसम्बन्धयुतं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    वि मृळीकाय ते मनो रथीरश्वं न संदितम्- इन्द्रसूक्तम्

  2. BOption (b)

    यस्य व्रते पृथिवी नन्नमीति यस्य व्रते शफवज्जर्भुरीति- पर्जन्यसूक्तम्

  3. COption (c)

    ऋतस्य बुध्न उषसमिषण्यन् वृषा मही रोदसी आ विवेश- वरुणसूक्तम्

  4. DOption (d)

    यो रध्रस्य चोदिता यः कृशस्य यो ब्रह्मणो नाधमानस्य कीरेः- अग्निसूक्तम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

यस्य व्रते पृथिवी नन्नमीति यस्य व्रते शफवज्जर्भुरीति- पर्जन्यसूक्तम्

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : उचित संबंध के विकल्प का चयन कीजिए।

विकल्प में दिए हुए वैदिक उक्तियोंं का स्पष्टीकरण इस प्रकार है - 

  • वि मृळीकाय ते मनो रथीरश्वं न संदितम्। गीर्भिर्वरुण सीमहि।। (ऋग्वेद १.२५.३)
  • वरुणदेव, जिस प्रकार रथ का स्वामी अपने थके हुए घोड़े को शान्त करता है, उसी प्रकार सुख के लिए स्तुति-द्वारा हम तुम्हारे मन को प्रसन्न करते हैं।
  • यह वरुणसूक्त से उद्धृत है।
  • यस्य व्रते पृथिवी नन्नमीति यस्य व्रते शफवज्जर्भुरीति। यस्य व्रत ओषधीर्विश्वरूपाः स नः पर्जन्य महि शर्म यच्छ।। (ऋग्वेद ५.८३.५)
  • हे (पर्जन्य) मेघ के सदृश वर्तमान विद्वन् ! (यस्य) जिस मेघ के (व्रते) कर्म्म में (पृथिवी) भूमि (नन्नमीति) अत्यन्त नम्र होती और (यस्य) जिस मेघ के (व्रते) कर्म्म में (शफवत्) खुर के तुल्य (जर्भुरीति) निरन्तर धारण करती है और (यस्य) जिस मेघ के (व्रते) कर्म में (विश्वरूपाः) अनेक प्रकार की (ओषधीः) सोमलता आदि ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं, उस मेघ की विद्या से युक्त (सः) वह आप (नः) हम लोगों के लिये (महि) बड़े (शर्म) गृह को (यच्छ) दीजिये।
  • यह पर्जन्यसूक्त से उद्धृत है।
  • ऋतस्य बुध्न उषसाम् इषण्यन् वृषा मही रोदसी आ विवेश। मही मित्रस्य वरुणस्य माया चन्द्रेव भानुं वि दधे पुरुत्रा।। (ऋग्वेद ३.६१.७)
  • हे मनुष्यो ! जो बिजुलीरूप अग्नि (बुध्ने) अन्तरिक्ष में (उषसाम्) प्रातःकालों और (ऋतस्य) सत्य के संबन्ध में (इषण्यन्) अपनी प्रेरणा की इच्छा करता हुआ सा (वृषा) वृष्टि का हेतु (मही) बड़ी (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (आ, विवेश) प्रविष्ट होता है और (मित्रस्य) मित्र (वरुणस्य) श्रेष्ठ पुरुष की (मही) बड़ी पूज्य (माया) बुद्धि (चन्द्रेव) सुवर्णों के सदृश (पुरुत्रा) बहुतरूपयुक्त (भानुम्) सूर्य्य को (विदधे) धारण करता है इससे उसको जान के कार्यों को सिद्ध करो।
  • यह अग्निसूक्त से उद्धृत है।
  • यो रध्रस्य चोदिता यः कृशस्य यो ब्रह्मणो नाधमानस्य कीरेः। युक्तग्राव्णो योऽविता सुशिप्रः सुतसोमस्य स जनास इन्द्रः।। (ऋग्वेद २.१२.६)
  • हे (जनासः) मनुष्यो ! (यः) जो (रध्रस्य) हिंसा करनेवाले का (यः) को (कृशस्य) दुर्बल का (यः) जो (नाधमानस्य) समस्त ऐश्वर्य प्राप्त करानेवाले का (यः) जो (ब्रह्मणः) वेद का (युक्तग्राव्णः) और जिसमें मेघ वा पत्थरयुक्त हैं उस पदार्थ का (कीरे:) तथा सकल विद्याओं की स्तुति प्रशंसा करनेहारे का (चोदिता) प्रेरणा करनेवाला वा (यः) जो (सुशिप्रः) ऐसा है कि जिसमें सुन्दर सेवन होते और (सुतसोमस्य) जिसने उत्पन्न किये सोमादि अच्छे पदार्थ उसकी (अविता) रक्षा करनेवाला है (सः) वह (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् परमेश्वर है।
  • यह इंद्रसूक्त से उद्धृत है।

 

​अतः स्पष्ट है, की "यस्य व्रते पृथिवी नन्नमीति यस्य व्रते शफवज्जर्भुरीति- पर्जन्यसूक्तम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 44

ऋग्वेदप्रातिशाख्ये कियन्ति समानाक्षराणि उक्तानि?

  1. AOption (a)

    चत्वारि

  2. BOption (b)

    अष्टौ

  3. COption (c)

    पञ्चविंशतिः

  4. DOption (d)

    दश

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Correct answer

Answer: (b)B.

अष्टौ

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : ऋग्वेदप्रातिशाख्य में कितने समान अक्षर बताएंं हैंं?

प्रातिशाख्य :

  • प्रातिशाख्य शब्द का अर्थ है: 'प्रति' अर्थात्‌ तत्तत्‌ 'शाखा' से संबंध रखनेवाला शास्त्र अथवा अध्ययन। यहाँ 'शाखा' से अभिप्राय वेदों की शाखाओं से है। वैदिक शाखाओं से संबद्ध विषय अनेक हो सकते थे
  • सब शाखाओं के प्रतिशाख्यों की प्रवृत्ति पदों को ही संहिता का आधार मानकर हुई है। इससे यह ध्वनि निकलती है कि प्राचीन काल में सब वैदिक शाखाओं के अपने-अपने प्रातिशाख्य रहे होंगे।

ऋग्वेदप्रातिशाख्य :

  • इसका संबंध ऋग्वेद की संहिता से है। पर परंपरा के अनुसार इसको ऋग्वेदीय शाकल शाखा की अवांतर शैशिरीय शाखा से संबद्ध बतलाया जाता ��ै।
  • प्रातिशाख्यों में यह सबसे बड़ा प्रातिशाख्य है और कई दृष्टियों से अपना विशेष महत्व रखता है।
  • इसमें छह-छह पटलों के तीन अध्याय हैं। यहाँ और प्रातिशाख्य सूत्र शैली में हैं, वहाँ यह पद्यों में निर्मित है। पर व्यख्याकारों ने पद्यों को टुकड़ों में विभक्त कर सूत्ररूप में ही उनकी व्याख्या की है।
  • इस प्रातिशाख्य के प्रथम 1-15 अध्यायों में शिक्षा और व्याकरण से संबंधित विषयों (वर्णविवेचन, वर्णोच्चारण के दोष, संहितागत वर्णसंधियाँ, क्रमपाठ आदि) का प्रतिपादन है और अंत के तीन (16-18) अध्यायों में छंदों की चर्चा है।
  • इस प्रातिशाख्य में समान अक्षरोंं की संख्या इस प्रकार ८ कहींं है - 
  • अ - आ
  • इ - ई
  • उ - ऊ
  • ऋ - ॠ

 

​अतः स्पष्ट है, की "अष्टौ" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 45

'तस्मादृचः साम यजूंषि दीक्षा' - पंक्तिरियं कुत्र प्राप्यते?

  1. AOption (a)

    ऋग्वेदे

  2. BOption (b)

    मुण्डकोपनिषदि

  3. COption (c)

    ईशोपनिषदि

  4. DOption (d)

    शुक्ल्ययजुर्वेदे

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Correct answer

Answer: (b)B.

मुण्डकोपनिषदि

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'तस्मादृचः साम यजूंषि दीक्षा' - यह उक्ति किस उपनिषद में प्राप्त होती है?

संपूर्ण उक्ति : 

  • तस्मादृचः साम यजूंषि दीक्षा यज्ञाश्च सर्वे क्रतवो दक्षिणाश्च। संवत्सरश्च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र सूर्यः।।

​संदर्भ : 

मुंडकोपनिषद - २.१.५ 

अर्थ : 

  • उसी 'परमात्म-तत्त्व' से ऋग्वेद की, सामवेद तथा यजुर्वेद की ऋचाएँ तथा मन्त्रगान हैं, दीक्षाएँ, समस्त यज्ञ तथा योग-कर्म और दान-दक्षिणाएँ हैं, उसी से संवत्सर हैं, यजमान हैं, लोक-लोकान्तर हैं जिनमें चन्द्रमा तथा सूर्य प्रकाश फैलाते हैं।

 

​अतः स्पष्ट है, की "मुण्डकोपनिषदि" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 46

निरुक्ते कति पदजातानि उपदिष्टानि?

  1. AOption (a)

    चत्वारि

  2. BOption (b)

    षट्

  3. COption (c)

    पञ्च

  4. DOption (d)

    त्रीणि

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Correct answer

Answer: (a)A.

चत्वारि

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : निरुक्त में कितनी पदजातियाँँ उपदिष्ट हैंं?

निरुक्त में पदजातियाँँ

निरुक्त में यास्क ने निघण्टु में गिनाये गए वैदिक शब्दों की व्याख्या की है, निघण्टु में ५ अध्याय और निरुक्त में १२ अध्याय हैं। दो प्रक्षिप्त अध्याय को लेकर कुल चौदह अध्याय हैं। निरुक्त में शब्दों का विभाजन चार प्रकार से किया गया है  -

  • चत्वारि पदजातानि नामाख्याते चोपसर्गनिपाताश्च तानीमानि भवन्ति।
  • चार प्रकार की पदजातियाँँ होती हैंं -
  • नाम
  • आख्यात
  • उपसर्ग
  • निपात

नाम : 

 

"सत्वप्रधानानि नामानि'

  • अर्थात् जो सत्व प्रधान हो, उसे नाम कहते हैं। सत्व का तात्पर्य सिद्ध क्रिया से है। यथा-पाठ इत्यादि।

आख्यात : 

"भावप्रधानमाख्यातम्'

  • अर्थात् जिसमें भाव प्रधान हो, वह आख्यात है जैसे पढ़ना इत्यादि ।

उपसर्ग : 

यास्क ने उपसर्गों का निश्चित लक्षण नहीं दिया है। शाकटायन के मतानुसार - 

  • "न निर्बद्धा उपसर्गा अर्थान्निराहुरिति शाकटायनः'
  • उपसर्ग से युक्त होने पर नाम तथा आख्यात में भिन्नता आ जाती है।

निपात : 

"उच्चावचेष्वर्थेषु निपतन्ति इति निपाताः"

  • अर्थात् अनेकार्थक होने के कारण इन्हें निपात कहते हैं। निपात तीन प्रकार के होते हैं - 
  • उपमार्थक
  • इव, न, चित्, नु।
  • कर्मोपसंग्रहार्थक
  • वा, आ. अह, ह, किल, हि, ननु, खलु शश्वतम्, नूनम् इत्यादि।
  • पादपूरणार्थक
  • कम, इम, इत, उ, त्वत् इत्यादि।

 

​अतः स्पष्ट है, की "चत्वारि" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 47

'महदरण्यमित्यर्थे स्त्रीप्रत्यये किं भवति?

  1. AOption (a)

    अरण्या

  2. BOption (b)

    महारण्या

  3. COption (c)

    अरण्यानी

  4. DOption (d)

    महारण्यानी

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Correct answer

Answer: (c)C.

अरण्यानी

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'महदरण्यम्' इस अर्थ से स्त्री प्रत्यय क्या होता है?

सूत्र - इन्द्रवरुणभवशर्वरुद्रमृडहिमारण्ययवयवनमातुलाचार्यामानुक् (४.१.४९)

अनुवृत्ति - पुंयोगात्, ङीष्, अनुपसर्जनात् स्त्रियाम् प्रातिपदिकात् प्रत्यय:, परश्च

अर्थ- इन्द्र, वरुण, भव, शर्व, रुद्र, मृड, हिम, अरण्य, यव, यवन मातुल आचार्य इत्येतेभ्यः पुंयोगात् स्त्रियां वर्तमानेभ्योऽनुपस प्रातिपदिकेभ्यो ङीष् प्रत्ययो भवत्यानुक् चागमः ॥

उदाहरण - इन्द्रस्य स्त्री इन्द्राणी, वरुणानी, भवानी, शर्वाणी, रुद्राणी, मृडानी, हिमानी, अरण्यानी, यवानी, यवनानी, मातुलानी, आचार्यानी ॥

भाषार्थ - 

  • इन्द्र, वरुण आदि प्रातिपदिक पुंल्लिङ्ग के हेतु से स्त्रीत्व में वर्तमान हों, तो उनसे ङीष् प्रत्यय तथा [आनुक्] आनुकू का आगम होता है ।
  • इन्द्राणी (इन्द्र की स्त्री), वरुणानी (वरुण की स्त्री), भवानी (भव की स्त्री), शर्वाणी (महादेव की स्त्री), रुद्राणी (रुद्र की स्त्री), मृडानी (मृड नामक व्यक्ति की स्त्री), हिमानी वह (हिम जो सदा बर्फ रूप में रहती है, कभी पिघलती नहीं), अरण्यानी (घना जंगल), यवानी (खराब जौ), यवनानी (यवनों की लिपि), मातुलानी (मामी), आचार्यानी (आचार्य की स्त्री) इस प्रकार रूप होंगे।
  • आद्यन्तौ टकितौ (१.१.४५ ) से आनुक् आगम अन्त में होकर, इन्द्र आनुकू ङीष् इन्द्रान् ई-इन्द्रानी बना, अट्कुप्वाङ्० (८.४.२) से णत्व होकर इन्द्राणी बना। आगे भी जहाँ जहाँ णत्व कार्य करना हो, तो इसी सूत्र से वह कार्य होगा। सिद्धियां सब इसी प्रकार हैं।

 

​अतः स्पष्ट है, की "अरण्यानी" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 48

जातिवाच्ये सति 'हस्त' शब्दस्य मत्वर्थीयः कः प्रयोगः?

  1. AOption (a)

    हस्तवान्

  2. BOption (b)

    हस्ती

  3. COption (c)

    हस्तिकः

  4. DOption (d)

    हस्तालुः

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Correct answer

Answer: (b)B.

हस्ती

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : जातिवाच्य होने पर हस्त शब्द का मत्वर्थीय प्रयोग क्या होता है?

हस्ताज्जातौ ५.२.१३३ 

'तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप्' इस मतुप् प्रत्यय के अपवाद रूप से 'हस्त'(सूंड) जातिवाच्य शब्द से जातिवाचक अर्थ से 'हस्ताज्जातौ' इस सूत्र से 'इनि' प्रत्यय लगता है।

हस्तः अस्ति यस्य सः 'हस्ती' (हस्तिन् इस प्रातिपदिक से प्रथमा एकवचन)। (जिस जाती को सूंड होती है वह - हाथी)

विशेष

'अस्य अस्ति' इस अर्थ में 'हस्त' शब्द में 'अत इनिठनौ ५.२.११५' इस सूत्र से मतुप्, इनि, तथा 'ठन्' प्रत्यय प्राप्त होने के पश्चात् जातिनिर्देश होने पर 'हस्ताज्जातौ' सूत्र से 'इनि' प्रत्यय का प्रयोग होता है और 'मतुँप्' तथा 'ठन्' प्रत्यय का निषेध होता है।

परन्तु जातिनिर्देश न होने पर इस सूत्र का प्रयोग नही होता और तीनों प्रत्ययों का प्रयोग होता है।

जैसे- हस्तौ विद्यते अस्य सः हस्तवान् पुरुषः, हस्ती पुरुषः, हस्तिकः पुरूषः (जिसकी हाथ में है ऐसा पुरुष - हस्तवान्/हस्ती/हस्तिकः)

अतः जातिवाच्य होने पर हस्त शब्द का हस्ताज्जातौ सूत्र से मत्वर्थीय प्रयोग 'हस्ती' होता है।

Question 49

'वाग्ग्मी' इत्यत्र को मत्वर्थीयप्रत्ययः?

  1. AOption (a)

    इनिः

  2. BOption (b)

    मिनि

  3. COption (c)

    ग्मिनि

  4. DOption (d)

    विनि

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Correct answer

Answer: (c)C.

ग्मिनि

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'वाग्ग्मी' यहाँँ कौन सा मत्वर्थीयप्रत्यय है?

वाचो ग्मिनिः (५.२.११४)

अनुवृत्ति - तत्, अस्य, अस्ति, अस्मिन्, इति, मतुप्

सूत्रार्थ - 'अस्य अस्ति' तथा 'अस्मिन् अस्ति' एतयोः अर्थयोः 'वाच्' शब्दात् प्रथमासमर्थात् 'ग्मिनि' प्रत्ययः भवति।

भाषार्थ - 

  • इसका है वह और इस में है वह इस अर्थ में 'वाच्' शब्द से प्रथमा के सामर्थ्य से ग्मिनि' प्रत्यय होता है।

सिद्धि - 

  • वाच् + ग्मिनि
  • वाच् + ग्मिन् [इकारः उच्चारणार्थः, तस्य लोपः । अङ्गस्य स्वादिष्वसर्वमानस्थाने १.४.१७ इति पदसंज्ञा]
  • वाक् + ग्मिन् [चोः कुः (८.२.३०) इति कुत्वे ककारः]
  • वाग् + ग्मिन् [झलां जशोऽन्ते (८.२.३९) इति पदान्तककारस्य गकारः]
  • वाग्ग्मिन्

 

अतः स्पष्ट है, की "ग्मिनि" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 50

'दण्डिक' इत्यस्मिन् पदे कः तद्धितप्रत्ययः?

  1. AOption (a)

    इक्

  2. BOption (b)

    ठक्

  3. COption (c)

    ठन्

  4. DOption (d)

    ठञ्

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Correct answer

Answer: (c)C.

ठन्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'दण्डिक' इस पद में कौन सा तद्धितप्रत्यय है?

सूत्र - अत इनिठनौ (५.२.११५)

सूत्रार्थ -  'अस्य अस्ति' अस्मिन् अर्थे प्रथमासमर्थेभ्यः अदन्तशब्देभ्यः विकल्पेन 'इनि' तथा 'ठन्' प्रत्ययौ भवतः, पक्षे मतुँप्-प्रत्ययः अपि विधीयते।

भाषार्थ -

  • 'इसका है वह' और 'इस में है' वह इस अर्थ में स्वरान्त शब्दों से प्रथमा के सामर्थ्य से विकल्प से इनि तथा ठन् प्रत्यय होतेंं हैंं, मतुँप्-प्रत्यय का भी यहाँँ विधान किया गया है।
  • अकारान्त शब्दों ‘वाला’ या ‘युक्त’ अर्थ में ‘इनि’ और (तद्धित) ‘ठन्’ प्रत्यय होता है। इनि का ‘इन्’ और ठन् का ‘ठ’ शेष रहता है।
  • इनि प्रत्यय अकारान्त के अतिरिक्त आकारान्त शब्दों में भी लग सकता है, यथा– मया + इनि = मायिन्, शिखा + इनि = शिखिन्, वीणा + इनि = वीणिन् इत्यादि।
  • इनि प्रत्ययान्त शब्द के रूप पुल्लिङ्ग में ‘करिन्’ के समान, स्त्रीलिंग में ‘ई’ लगाकर ‘नदी’ के समान और नपुंसकलिंग में ‘मनोहारिन्’ शब्द के समान चलते हैं।
  • ठन् प्रत्यय के ‘ठ’ को ‘इक्’ हो जाता है, यथा–
  • दण्ड+ठन् – दण्ड + इक् = दण्डिकः (दण्ड वाला)
  • धन+ठन् – धन + इक् = धनिकः (धन वाला)

 

अतः स्पष्ट है, की "ठन्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 51

'सारङ्गी' इत्यत्र स्त्रियां ङीष्-प्रत्यय-विधायकं किमस्ति सूत्रम्?

  1. AOption (a)

    वर्णादनुदात्तात् तोपधात्तो नः

  2. BOption (b)

    अन्यतो ङीष्

  3. COption (c)

    जातेरस्त्रीविषयादयोपधात्

  4. DOption (d)

    षिद्गौरादिभ्यश्च

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Correct answer

Answer: (b)B.

अन्यतो ङीष्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'सारङ्गी' यहाँँ स्त्रीलिंग में ङीष्-प्रत्यय-विधायक सूत्र क्या है?

प्रस्तुत सूत्र यह पाणिनी के अष्टाध्यायी में उल्लेखित है।

अन्यतो ङीष् (४.१.४०)

अनुवृत्ति -  वर्णात्, अनुदात्तात्, अनुपसर्जनात्

सूत्रार्थ - यस्य वर्णवाचकशब्दस्य अन्तिमः स्वरः अनुदात्तः अकारः अस्ति; तथा च यस्य उपधायाम् तकारभिन्नः वर्णः विद्यते, तस्मात् स्त्रीत्वं द्योतयितुम् ङीष्-प्रत्ययः विधीयते।

भाषार्थ - 

  • जिस वर्णवाचक शब्द का अंतिम स्वर अनुदात्त अकार होता है, तथा जिस के उपधा में तकार से भिन्न वर्ण होता है, उस शब्द के स्त्रीलिंग में ङीष्-प्रत्यय का विधान किया जाता है।

उदाहरण - 

  • सारङ्ग+ ङीष् = सारङ्गी ।
  • कल्माष + ङीष् = कल्माषी ।
  • शबल + ङीष् = शबली ।
  • कर्बुर+ ङीष् = कर्बुरी।

 

अतः स्पष्ट है, की "अन्यतो ङीष्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 52

शब्दनित्यत्वे वार्तिककृतः किं प्रमाणम्?

  1. AOption (a)

    पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्

  2. BOption (b)

    सर्वे सर्वपदादेशाः दाक्षीपुत्रस्य पाणिनेः

  3. COption (c)

    तदशिष्यं सञ्ज्ञाप्रमाणत्वात्

  4. DOption (d)

    सिद्धन्तु नित्यशब्दत्वात्

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Correct answer

Answer: (d)D.

सिद्धन्तु नित्यशब्दत्वात्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : शब्दनित्यत्व के लिए वार्तिककृत क्या प्रमाण है?

शब्दनित्यत्व :

शब्द के नित्यत्व के संदर्भ में अनेकविध प्रमाण प्रचलित हैं। उनमें प्रधान स्थान भर्तृहरि कृत वाक्यपदीय और कात्यायन कृत वार्तिक का है। 

भर्तृहरि, आचार्य के अनुसार, शब्द नित्य है। जैसे - 

नित्या शब्दार्थसम्बन्धाः समाम्नाता महर्षिभिः।

सूत्राणां सानुतन्त्राणां भाष्याणाञ्च प्रणेतृभिः।। (वाक्यपदीयम्, ब्रह्मकाण्डम् 23)

  • शब्दों और अर्थों के निरंतर संबंधों को महान ऋषियों ने संक्षेप में प्रस्तुत किया है। सूत्रों और उनकी भाष्य के साथ विद्वान उन्हें प्रदर्शित करतेंं हैंं।

पाणिनि, कात्यायन और पतंजलि भी शब्द का नित्यत्व मानतेंं हैंं - 

  • पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्। (अष्टाध्यायी 6.3.109)
  • सिद्धन्तु नित्यशब्दत्वात्। (वार्तिक)
  • प्राधान्येन परीक्षित नित्य शब्द। (1.1. आ. 1)
  • नित्येषु च शब्देषु संग्रह एतत्।
  • कूटस्थैरविचालिभिर्वर्णैभवितव्यम- नपायोजनाविकारिभि। (1.1.. आ. 2)
  • सर्वे सर्वपदादेशा दाक्षीपुत्रस्य पाणिनेः एकदेशविकारे हि नित्यत्वं नोपपद्यते। (1.1. आ. 5. सू. 20)
  • एकः इन्द्रशब्दः क्रतुशते प्रादुर्भूतः सर्वयमेष्वङ्गं भवति। (1.2. आ. 3 सू. 04)

इस प्रकार शब्दों की अनंतता, उनके अर्थ और उनके शब्दार्थ संबंधों को प्रदर्शित किया है।

अतः स्पष्ट है, की "सिद्धन्तु नित्यशब्दत्वात्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 53

'बुध-युध-नश-जनेङ्-प्रु-द्रु-स्रुभ्यो णेः' इति नियमेन शुद्धः प्रयोगः कः?

  1. AOption (a)

    बोधयति पद्मम्

  2. BOption (b)

    बोधयते पद्मम्

  3. COption (c)

    योधयते काष्ठानि

  4. DOption (d)

    वेदमध्याप्यते

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Correct answer

Answer: (a)A.

बोधयति पद्मम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'बुध-युध-नश-जनेङ्-प्रु-द्रु-स्रुभ्यो णेः' इस नियम से शुद्ध प्रयोग कौन सा है?

प्रस्तुत सूत्र यह पाणिनी के अष्टाध्यायी में उल्लेखित है।

बुधयुधनशजनेङ्प्रुद्रुस्सृभ्यो णेः (१.३.८६)

अनुवृत्ति - परस्मैपदम्।

अर्थ - बुध, युध, नश, जन, इङ्, प्रु, द्रु, खु इत्येतेभ्यो ण्यन्तेभ्यो धातुभ्यः परस्मैपदं भवति। 

भाषार्थ - 

  • [बुध..भ्यः ] बुध्, युध्, नश, जन, इङ्, प्रु, द्रु, स्रु इन [णे:] ण्यन्त धातुओं से परस्मैपद होता है ।

उदाहरण - 

  • बोधयति (बोध कराता है)।
  • योधयति (लड़ाता है) ।
  • नाशयति ( नाश करता है)।
  • जनयति (उत्पन्न करता है)।
  • अध्यापयति (पढ़ाता है)।
  • प्रावयति (प्राप्त कराता है) ।
  • द्रावयति (पिघलाता है)।
  • स्स्रावयति (टपकाता ���ै)।

यहाँ ण्यन्त होने से कर्त्रभिप्राय क्रियाफल अर्थ में णिचश्च (१.३.७४) से आत्मनेपद प्राप्त था, किंतु इस सूत्र से परस्मैपद विधान होता है।

अतः स्पष्ट है, की "बोधयति पद्मम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 54

'वेः शब्दकर्मणः' इति सूत्रस्योदाहरणम्भवति-

  1. AOption (a)

    चित्तं विकरोति कामः

  2. BOption (b)

    छात्राः विकुर्वते

  3. COption (c)

    स्वरान् विकुरुते

  4. DOption (d)

    शत्रुमधिकुरुते

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Correct answer

Answer: (c)C.

स्वरान् विकुरुते

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'वेः शब्दकर्मणः' इस सूत्र का उदाहरण क्या हो सकता है?

प्रस्तुत सूत्र यह पाणिनी के अष्टाध्यायी में उल्लेखित है।

सूत्र - वेः शब्दकर्मणः (१.३.३४)

अनुवृत्ति - कृञः, आत्मनेपदम्

अर्थ - विपूर्वात् शब्दकर्मणः कृञ्धातोरात्मनेपदं भवति।

भाषार्थ -

  • [शब्दकर्मणः ] शब्दकर्मवाले [वे:] विपूर्वक कृञ् धातु से आत्मनेपद होता है ॥

उदाहरण - 

  • क्रोष्टा विकुरुते स्वरान् (गीदड़ स्वरों को बिगाड़ बिगाड़ कर बोलता है)।
  • ध्वाङ्क्षो विकुरुते स्वरान् (कौवा स्वरों को बिगाड़ बिगाड़ कर बोलता है) ।
  • उदाहरणों में 'विकुरुते' का 'स्वर' शब्द कर्म है, सो आत्मनेपद हो गया है।

 

अतः स्पष्ट है, की "स्वरान् विकुरुते" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 55

'शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यः' इति लक्षणलक्षिता चित्तवृत्तिः का योगदर्शनानुसारेण?

  1. AOption (a)

    प्रमाणम्

  2. BOption (b)

    विपर्ययः

  3. COption (c)

    विकल्पः

  4. DOption (d)

    निद्रा

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Correct answer

Answer: (c)C.

विकल्पः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- 'शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यः' योगदर्शन के अनुसार इस लक्षण से लक्षित कौन सी चित्तवृत्ति है?

स्पष्टीकरण- ‘शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यः' योगदर्शन के अनुसार इस लक्षण से लक्षित विकल्प चित्तवृत्ति है। 

योगदर्शन- 

  • इस दर्शन के प्रवर्तक पतंजलि मुनि है।
  • इसंके ग्रंथ का नाम योगसूत्र है।
  • इसमें चार पाद है- समाधि, साधन, विभूति तथा कैवल्य।
  • वाचस्पति मिश्र ने योगसूत्र पर ‘तत्ववैशारदी’ नामक टीका लिखी है।
  • इसमें चार अध्याय है- समाधि, साधन, विभूति तथा कैवल्य।
  • इसके प्रथम पाद में चित्तवृत्तियों का वर्णन है।

Important Pointsचित्तवृत्तियाँ- 

समस्त मानसिक विचार चित्तवृत्तियाँ कहलाते हैं और इनका निरोध ही योग कहलाता है- योगश्चितवृत्तिनिरोधः।

योगसूत्र में चित्तवृत्तियों की संख्या पांच हैं- प्रमाणविपर्यविकल्पनिद्रास्मृतयः। अर्थात प्रमाण, विपर्य, विकल्प, निद्रा, स्मृति  ये पांच वृत्तियाँ  है।  

  1. प्रमाण- प्रत्यक्षनुमानागमा: प्रमाणानि अर्थात प्रत्यक्ष, अनुमान, और आगम ये तीन प्रमाण है।
  2. विपर्यय- विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिठम् अर्थात किसी भी वस्तु के विषय में मिथ्या ज्ञान हो जाना जो वास्तव में उसके स्वरुप में विद्यमान नही है।
  3. विकल्प- शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्प: अर्थात शब्दो के ज्ञान के द्वारा किसी अविद्यमान वस्तु की कल्पना कर लेने वाली वृत्ति विकल्प है।
  4. निद्रा- अभावप्रत्ययालम्बना वृतिर्निद्रा: अर्थात अभाव के ज्ञान का अवलम्बन करने वाली वृत्ति निद्रा है।
  5. स्मृति- अनुभूतविषयासम्प्रमोष: स्मृति: अर्थात अनुभव किये हुए विषय का न छिपना अर्थात प्रकट हो जाना स्मृति है।

Question 56

अधोऽङ्कितेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    माध्यमिकाः - महायानम्

  2. BOption (b)

    योगाचाराः - हीनयानम्

  3. COption (c)

    सौत्रान्तिकाः - तज्ज्ञानं पञ्चविधं मतिश्रुतावधिमनःपर्यायकेवलभेदेन।

  4. DOption (d)

    वैभाषिकाः - तत्र बोधात्मको जीवः। अबोधात्मस्त्वजीवः।

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Correct answer

Answer: (a)A.

माध्यमिकाः - महायानम्

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प्रश्नानुवाद- निम्नलिखित में से समुचित विकल्प चुनें- 

स्पष्टीकरण- प्रस्तुत पंक्ति सर्वदर्शनसंग्रह के बौद्ध दर्शन नामक अध्याय से ली गयी है।

सर्वदर्शनसंग्रह- 

  • सर्वदर्शनसंग्रह के रचनाकार माधवाचार्य हैं।
  • माधवाचार्य वैदिक विद्वान सायण के बड़े है।
  • इसमें 16 दार्शनिक सम्प्रदाय का वर्णन है।
  • इस ग्रन्थ के दूसरे अध्याय में बौद्ध दर्शन का वर्णन है।

​बौद्ध दर्शन- 

  • बौद्ध दर्शन भारतीय नास्तिक दर्शनों में से एक है।
  • इसके प्रवर्तक गौतम बुद्ध है।
  • इस दर्शन में दो प्रमाण स्वीकार किए गए है- प्रत्यक्ष तथा अनुमान।
  • इस दर्शन के दो मुख्य सम्प्रदाय है- हीनयान और महायान।
  • पुनः हीनयान दो उपसंप्रदायों में विभक्त है- सौत्रांतिक (बाह्यर्थ अनुमेयवादी) और वैभाषिक (बाह्यर्थ प्रत्यक्षवादी)।
  • पुनः महायान भी दो उपसंप्रदायों में विभक्त है- योगाचार (विज्ञानवादी) और माध्यमिक (शून्यवादी)

Question 57

अधोऽङ्कितेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    स्यान्नास्ति चावक्तव्यः- वैभाषिकाः

  2. BOption (b)

    जीवाजीवास्रवबन्धसम्वरनिर्जरमोक्षास्तत्त्वानि - सौत्रान्तिकाः

  3. COption (c)

    तत्र जीवा द्विविधाः संसारिणो मुक्ताश्च - आर्हताः

  4. DOption (d)

    भावनाभिर्भावितानि पञ्चभिः पञ्चधाक्रमात्, महाव्रतानि - व्यासभाष्यम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

तत्र जीवा द्विविधाः संसारिणो मुक्ताश्च - आर्हताः

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प्रश्नानुवाद- निम्नलिखित में से समुचित विकल्प चुनें- 

**स्पष्टीकरण- ‘**तत्र जीवा द्विविधाः संसारिणो मुक्ताश्च’- प्रस्तुत पंक्ति सर्वदर्शनसंग्रह के जैन दर्शन नामक अध्याय से ली गयी है।

सर्वदर्शनसंग्रह- 

  • सर्वदर्शनसंग्रह के रचनाकार माधवाचार्य हैं।
  • माधवाचार्य वैदिक विद्वान सायण के बड़े है।
  • इसमें 16 दार्शनिक सम्प्रदाय का वर्णन है।
  • इस ग्रन्थ के तीसरे अध्याय में जैन दर्शन का वर्णन है।

​जैन दर्शन- 

  • जैन दर्शन भारतीय नास्तिक दर्शनों में से एक है।
  • इसके प्रवर्तक ऋषभदेव है।
  • इस दर्शन में दो प्रमाण स्वीकार किए गए है- प्रत्यक्ष तथा अनुमान।
  • इस दर्शन में सात तत्व माने गए हैं- जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा, और मोक्ष।
  • इन सात तत्वों में से प्रथम जीव का लक्षण है- बोधात्मको जीव:। अर्थात ज्ञानात्मक तत्व जीव है।
  • इसमें से प्रथम जीव दो प्रकार के है- संसारी और मुक्त। (तत्र जीवा द्विविधाः संसारिणो मुक्ताश्च)

Question 58

मनुस्मृतौ 'सर्वतेजोमयो हि सः' अस्मिन् श्लोकांशे 'सः' पदेन कः प्रोक्तः?

  1. AOption (a)

    नृपः

  2. BOption (b)

    गुरुः

  3. COption (c)

    सूर्यः

  4. DOption (d)

    प्राज्ञः

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Correct answer

Answer: (a)A.

नृपः

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प्रश्नानुवाद- "सर्वतेजोमयो हि सः" मनुस्मृति  के इस श्लोकांश में सः पद से क्या कहा गया है?

स्पष्टीकरण-  "सर्वतेजोमयो हि सः" मनुस्मृति  के इस  श्लोकांश में सः पद से नृप (राजा) कहा गया है। 

मनुस्मृति-

  • मनुस्मृति स्वयं मनु द्वारा रचित धर्मशास्त्रीय ग्रंथ है। इस ग्रंथ में 12 अध्याय तथा 2694 श्लोक हैं।
  • इसकी गणना विश्व के ऐसे ग्रन्थों में की जाती है, जिनसे मानव ने वैयक्तिक आचरण और समाज रचना के लिए प्रेरणा प्राप्त की है।
  • इस ग्रंथ पर निम्नलिखित टीकाएँ प्राप्त होती है-
  • मनुभाष्य- मेधातिथि
  • मन्वर्थमुक्तावाली- कुल्लूकभट्ट
  • नंदिनी- नंदन

श्लोक- 

यस्य प्रसादे पद्मा श्रीर्विजयश्च पराक्रमे । मृत्युश्च वसति क्रोधे सर्वतेजोमयो हि सः ।

श्लोकार्थ- जिसकी प्रसन्नता में बहुत सी लक्ष्मी बसती है अर्थात् प्रसन्न होने पर बहुत सी धन सम्पत्ति देता है, जिसके पराक्रम में विजय और जिसके कोप में मृत्यु होती है ऐसा वह राजा सब तेजो की मूर्ति है।

Question 59

"कथाप्रसङ्गेषु मिथः सखीमुखात्तृणेऽपि तन्व्या नलनामानि श्रुते " अत्र नलपदस्यार्थोऽस्ति-

  1. AOption (a)

    नृपः

  2. BOption (b)

    तृणम्

  3. COption (c)

    अग्निः

  4. DOption (d)

    शत्रुः

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Correct answer

Answer: (b)B.

तृणम्

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प्रश्नानुवाद- "कथाप्रसङ्गेषु मिथः सखीमुखात्तृणेऽपि तन्व्या नलनामानि श्रुते " यहाँ नल पद का क्या अर्थ है?

स्पष्टीकरण- "कथाप्रसङ्गेषु मिथः सखीमुखात्तृणेऽपि तन्व्या नलनामानि श्रुते " यहाँ नल पद का तृण अर्थ है। उपरोक्त पंक्ति नैषधीयचरित के प्रथम सर्ग से लिया गया है।

नैषधीयचरित-

  1. नैषधीयचरित महाकवि श्रीहर्ष का प्रसिद्ध महाकाव्य है।
  2. यह 22 सर्गों में विभक्त है।
  3. इसकी कथा महाभारत से ली गयी है।
  4. इसमें नल और दमयंती की प्रणय कथा वर्णित है।
  5. इस महाकाव्य की गणना शिशुपालवध तथा किरातर्जुनीय के साथ संस्कृत साहित्य के बृहत्त्रयी में होती है।
  6. इस ग्रन्थ पर सर्वाधिक प्रसिद्ध टीका मल्लिनाथ विरचित 'जीवातु' नामक टीका है।
  7. प्रस्तुत श्लोक यह नैषधीयचरितम् के प्रथम सर्ग में से लिया गया है।

श्लोक- 

कथा प्रसङ्गेषु मिथः सखीमुखात् तृणेऽपि तन्व्या नलनामनि श्रुते*।*

द्रुतं विधूयान्यदभूयतानया मुदा तदाकर्णनसज्जकर्णया ॥35॥

श्लोकार्थ- परस्पर वार्तालाप के दौरान सखियों के सुख नल नामक तृण के भी सुनने पर यह कृशांगी तुरंत अन्य कार्य छोड़कर हर्ष से उसके कीर्तन सुनने के लिए तत्पर कानों वाली हो जाती थी।

Question 60

हर्षचरितम् कति उच्छ्वासेषु विभक्तम्?

  1. AOption (a)

    चतुर्षु

  2. BOption (b)

    सप्तसु

  3. COption (c)

    अष्टसु

  4. DOption (d)

    दशसु

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Correct answer

Answer: (c)C.

अष्टसु

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प्रश्नानुवाद- हर्षचरित कितने उच्छ्वासों में विभक्त है?

स्पष्टीकरण- हर्षचरित आठ उच्छ्वासों में विभक्त है।

हर्षचरित- 

  • हर्षचरित बाणभट्ट का प्रसिद्ध ऐतिहासिक गद्यकाव्य है जो की आठ उच्छ्वासों में विभक्त है।
  • यह गद्यकाव्यों में आख्यायिका कोटि का काव्य है।
  • यह मुख्यतया राजा हर्षवर्धन के जीवन पर आधरित है।
  • इसमें बाण ने गौण रूप में अपनी आत्मकथा भी वर्णित किया है।

Additional Informationबाणभट्ट- 

  • बाणभट्ट संस्कृत साहित्य के श्रेष्ठतम गद्यकवि है।
  • इनकी दो प्रमुख रचना है- कादम्बरी और आख्यायिका।
  • कादम्बरी गद्यकाव्यों में कथा कोटि का काव्य है।
  • बाणभट्ट ने चण्डीशतक नामक एक गीतिकाव्य लिखा है।
  • इसके अतिरिक्त, पार्वतीपरिणय और मुकुटताडिक नामक नाटक भी लिखा है।
  • बाणभट्ट की निम्न उपाधियाँ है- गद्यसम्राट, कविताकाननकेसरी, कविताकामिनीकौतुक, वश्यवाणीचक्रवर्ती, तुरंगबाण आदि।

Question 61

फललक्षणा निम्नलिखितासु लक्षणासु कस्याः पर्याया विद्यते?

  1. AOption (a)

    रूढिवतीलक्षणायाः

  2. BOption (b)

    प्रयोजनवतीलक्षणायाः

  3. COption (c)

    शुद्धालक्षणायाः

  4. DOption (d)

    गौणीलक्षणायाः

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Correct answer

Answer: (b)B.

प्रयोजनवतीलक्षणायाः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- फललक्षणा निम्नलिखित लक्षणाओं में से किसका पर्याय है?

स्पष्टीकरण- फललक्षणा निम्नलिखित लक्षणाओं में से प्रयोजनवती लक्षणा का पर्याय है। 

  • आचार्य विश्वनाथ अपने ग्रन्थ साहित्यदर्पण के दूसरे परिच्छेद में शब्दशक्तियों का वर्णन किया है।
  • ये शब्दशक्तियाँ तीन प्रकार की है- अभिधा, लक्षणा और व्यंजना।
  • लक्षणा-  मुख्यार्थबाधे तद्युक्तो ययान्योर्ऽथः प्रतीयते । रूढेः प्रयोजनाद्वासौ लक्षणा शक्तिरर्पिता ।।
  • अर्थात मुख्यार्थ के बाधित होने पर रूढ़ि अथवा प्रयोजन के बल पर जिस शब्दशक्ति के द्वारा उस (मुख्यार्थ) से संयुक्त अर्थ प्रतीति होती है, वही लक्षणा है।
  • प्रयोजन रहित रूढ़ि पर आश्रित लक्षणा रूढ़ि लक्षणा कहलाती है। जैसे- कलिंग: साहसिक:। यहाँ कलिंग के लोगों का साहसी होना रूढ़ि है।
  • प्रयोजन आश्रित लक्षणा प्रयोजनवती लक्षणा कहलाती है। जैसे- गंगायां घोष:। यहाँ शीलतत्व तथा पावनत्व प्रयोजन है।
  • इसे ही फल लक्षणा कहते है। चूँकि इसी का फल व्यंजना होती है। रूढ़ि से कभी व्यंजना नहीं होता।

Question 62

'अखण्डेषु कारणेषु फलावचः' इत्यनेन कस्यालङ्कारस्य लक्षणं प्रोक्तमाचार्यमम्मटेन?

  1. AOption (a)

    समासोक्तेः

  2. BOption (b)

    विभावनायाः

  3. COption (c)

    विशेषोक्तः

  4. DOption (d)

    सङ्करस्य

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Correct answer

Answer: (c)C.

विशेषोक्तः

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प्रश्नानुवाद- ‘अखण्डेषु कारणेषु फलावचः’ इससे आचार्य मम्मट के द्वारा किस अलंकार का लक्षण कहा गया है?

स्पष्टीकरण- ‘अखण्डेषु कारणेषु फलावचः’ इससे आचार्य मम्मट के द्वारा किस विशेषोक्ति अलंकार का लक्षण कहा गया है। 

  • आचार्य मम्मट संस्कृत काव्यशास्त्र के प्रमुख ध्वनिवादी आचार्य है।
  • इनके ग्रन्थ का नाम काव्यप्रकाश है।
  • काव्यप्रकाश का विभाजन दश उल्लासों में हुआ है।
  • आचार्य मम्मट ने काव्यप्रकाश के दशम उल्लास में अर्थालंकारों का निरूपण किया है।
  • उन्होंने विशेषोक्त्ति अलंकार का लक्षण इस प्रकार दिया है- ‘विशेषोक्त्तिरखण्डेषु कारणेषु फलवचः’ अर्थात अनेक कारणों के मिलने पर भी जहाँ कार्य का कथन नहीं होता वहाँ विशेषोक्त्ति अलंकार होता है।
  • उदाहरण- निद्रानिवृत्तावुदिते द्युरत्ने सखीजने द्वारपदं पराप्ते। श्लथीकृताश्लेषरसे भुजङ्गे चचाल नालिङ्गनतोङ्गना सा।।
  • अर्थात निद्रा की निवृत्ति हो जाने पर, सूर्य उदित होने पर, सखियों के द्वारस्थान पर आ जाने पर, प्रेमी के द्वारा आलिङ्गन के आनन्द को शिथिल कर देने पर भी वह अङ्गना आलिङ्गन से नहीं हटी।
  • विशेषोक्त्ति तीन प्रकार की होती है- अनुक्त्तनिमित्ता, उक्त्तनिमित्ता तथा अचिन्त्यनिमित्ता।

Question 63

'स्वच्छजलवत् सहसैव...सर्वत्र विहितस्थितिः' इत्यादिना काव्यप्रकाशकृता को गुणो मतः?

  1. AOption (a)

    माधुर्यगुणः

  2. BOption (b)

    ओजो गुणः

  3. COption (c)

    प्रसादगुणः

  4. DOption (d)

    समाधिगुणः

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Correct answer

Answer: (c)C.

प्रसादगुणः

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प्रश्नानुवाद- 'स्वच्छजलवत् सहसैव...सर्वत्र विहितस्थितिः' इत्यादि के द्वारा काव्यप्रकाशकार के द्वारा कौन सा गुण माना गया है?

स्पष्टीकरण- स्वच्छजलवत् सहसैव...सर्वत्र विहितस्थितिः' इत्यादि के द्वारा काव्यप्रकाशकार के द्वारा प्रसाद गुण माना गया है। 

  • आचार्य मम्मट संस्कृत काव्यशास्त्र के प्रमुख ध्वनिवादी आचार्य है।
  • इनके ग्रन्थ का नाम काव्यप्रकाश है।
  • काव्यप्रकाश का विभाजन दश उल्लासों में हुआ है।
  • आचार्य मम्मट ने काव्यप्रकाश के अष्टम उल्लास में गुणों का निरूपण किया है।
  • उनके अनुसार तीन प्रकार के काव्यगुण होते है- प्रसाद, माधुर्य, ओज।
  • प्रसाद गुण- शुष्केन्धनाग्निवत् स्वच्छजलवत्सहसैव यः। व्याप्नोत्यन्यत् प्रसादोअसौ सर्वत्र विहितस्थितिः।।
  • अर्थात सूखे ईंधन में अग्नि के समान तथा स्वच्छ वस्त्र में जल के समान जो गुण सहसा चित्त में व्याप्त हो जाता है उसे प्रसाद गुण कहते हैं। इसकी स्थिति सर्वत्र है अर्थात् यह सभी रसों तथा रचनाओं में रहता है।

Question 64

'राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिविम्'- अत्र 'दीदिविम्' पदस्य कोऽर्थः?

  1. AOption (a)

    प्रकाशमानम्

  2. BOption (b)

    द्युलोकम्

  3. COption (c)

    इन्द्रम्

  4. DOption (d)

    पुनर्जायमानम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

प्रकाशमानम्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिविम्' - यहाँ 'दीदिविम्' इस पद का क्या अर्थ है?

मंत्र :

संपूर्ण मंत्र : 

  • राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिविम्। वर्धमानं स्वे दमे।।

संदर्भ : ऋग्वेद १.१.१८

ऋषि - मधुच्छन्दा वैश्वामित्र

देवता - अग्नि

छन्द - यवमध्याविराड्गायत्री

अर्थ : 

पदार्थ -

  • हम लोग (स्वे) अपने (दमे) उस परम आनन्द पद में कि जिसमें बड़े-बड़े दुःखों से छूट कर मोक्ष सुख को प्राप्त हुए पुरुष रमण करते हैं, (वर्धमानम्) सब से बड़ा (राजन्तम्) प्रकाशस्वरूप (अध्वराणाम्) पूर्वोक्त यज्ञादि अच्छे-अच्छे कर्म धार्मिक मनुष्यों के (गोपाम्) रक्षक (ऋतस्य) सत्यविद्यायुक्त चारों वेदों और कार्य जगत् के अनादि कारण के (दीदिविम्) प्रकाश करनेवाले परमेश्वर को उपासना योग से प्राप्त होते हैं।

भावार्थ -

  • विनाश और अज्ञान आदि दोषरहित परमात्मा अपने अन्तर्यामिरूप से सब जीवों को सत्य का उपदेश तथा श्रेष्ठ विद्वान् और सब जगत् की रक्षा करता हुआ अपनी सत्ता और परम आनन्द में प्रवृत्त हो रहा है। उस परमेश्वर के उपासक हम भी आनन्दित, वृद्धियुक्त विज्ञानवान् होकर विज्ञान में विहार करते हुए परम आनन्दरूप विशेष फलों को प्राप्त होते हैं।

 

​अतः स्पष्ट है, की "प्रकाशमानम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 65

'केवलाघो भवति केवलादी' - अस्य मन्त्रस्य द्रष्टा कः?

  1. AOption (a)

    भिक्षुराङ्गिरसः

  2. BOption (b)

    गविष्ठिरः

  3. COption (c)

    कण्वः

  4. DOption (d)

    ब्रह्मा

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Correct answer

Answer: (a)A.

भिक्षुराङ्गिरसः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'केवलाघो भवति केवलादी'' - इस मंत्र का द्रष्टा (ऋषि) कौन है?

मंत्र :

संपूर्ण मंत्र : 

  • मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः सत्यं ब्रवीमि वध इत्स तस्य। नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी।।

संदर्भ : ऋग्वेद १०.११७.६

ऋषि - भिक्षुराङ्गिरस

देवता - धनान्नदानप्रशंसा

छन्द - त्रिष्टुप्

अर्थ : 

पदार्थ -

  • (अप्रचेताः) अप्रकृष्ट बुद्धिवाला-बेसमझ मनुष्य (मोघम्) व्यर्थ (अन्नं विन्दते) अन्नादि धन को प्राप्त करते हैं (सत्यं ब्रवीमि) मैं सत्य कहता हूँ (तस्य) उसका (सः) वह धन वैभव (वधः-इत्) वधक है-घातक ही है (अर्यमणम्) उस अन्नादि से ज्ञानदाता विद्वान् को (न पुष्यति) नहीं पालता है (न-उ सखायम्) और न ही समानधर्मी समानवंशी सम्बन्धी को पालता है-घोषित करता है, वह ऐसा (केवलादी) अकेला खानेवाला (केवलाघः) केवल पापी होता है।

भावार्थ -

  • जो मनुष्य अन्न धन सम्पत्ति का स्वामी बनकर उससे किसी ज्ञान देनेवाले विद्वान् का पोषण नहीं करता न किसी वंशीय सम्बन्धी का पोषण करता है, उसका अन्नधन सम्पत्ति पाना व्यर्थ है-घातक है, वह केवल अकेले खाकर पापी बनकर संसार से चला जाता है।

 

​अतः स्पष्ट है, की "भिक्षुराङ्गिरसः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 66

'मा नो वधाय हत्नवे जिहीव्ठानस्य रीरधः।' - अत्र स्तूयमानो देवः कः?

  1. AOption (a)

    रुद्रः

  2. BOption (b)

    वरुणः

  3. COption (c)

    अग्निः

  4. DOption (d)

    मित्रः

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Correct answer

Answer: (b)B.

वरुणः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'मा नो वधाय हत्नवे जिहीव्ठानस्य रीरधः।'' - यहाँ किस देव की स्तुति की है?

मंत्र : 

संपूर्ण मंत्र : 

  • मा नो वधाय हत्नवे जिहीळानस्य रीरधः । मा हृणानस्य मन्यवे।।

ऋषि - शुनःशेप आजीगर्ति

देवता - वरुण

छन्द -  गायत्री

अर्थ :  

पदार्थ -

  • हे वरुण जगदीश्वर ! आप जो (जिहीळानस्य) अज्ञान से हमारा अनादर करे, उसके (हत्नवे) मारने के लिये (नः) हम लोगों को कभी (मा रीरधः) प्रेरित और इसी प्रकार (हृणानस्य) जो कि हमारे सामने लज्जित हो रहा है, उस पर (मन्यवे) क्रोध करने को हम लोगों को (मा रीरधः) कभी मत प्रवृत्त कीजिये।

भावार्थ -

  • ईश्वर उपदेश करता है कि हे मनुष्यो ! जो अल्पबुद्धि अज्ञानीजन अपनी अज्ञानता से तुम्हारा अपराध करें, तुम उसको दण्ड ही देने को मत प्रवृत्त और वैसे ही जो अपराध करके लज्जित हो अर्थात् तुम से क्षमा करवावे तो उस पर क्रोध मत छोड़ो, किन्तु उसका अपराध सहो और उसको यथावत् दण्ड भी दो।

 

​अतः स्पष्ट है, की "वरुणः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 67

'उभयप्राप्तौ कर्मणी'ति कारकसूत्रस्योदाहरणं किम्?

  1. AOption (a)

    आश्चर्यो गवां दोहोऽगोपेन

  2. BOption (b)

    कर्तृकर्मणोः कृति

  3. COption (c)

    अधिकरणवाचिनश्च

  4. DOption (d)

    कृत्यानां कर्तरि वा

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Correct answer

Answer: (a)A.

आश्चर्यो गवां दोहोऽगोपेन

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'उभयप्राप्तौ कर्मणी'ति इस कारक सूत्र का उदाहरण क्या है?

सूत्र - उभयप्राप्तौ कर्मणि (२.३.६६)

अनुवृत्ति - कृति, षष्ठी, अनभिहिते।

अर्थ - उभयोः कर्त्तृकर्मणोः प्राप्तिर्यस्मिन् कृति तत्रानभिहिते कर्मण्येव षष्ठी विभक्तिर्भवति, न कर्त्तरीति नियम्यते।

उदाहरण - आश्चर्यो गवां दोहोऽगोपालकेन। रोचते मे ओदनस्य पाको देवदत्तेन।

भाषार्थ -

  • जिस कृदन्त के योग में  कर्त्ता और कर्म दोनों में एक साथ षष्ठी प्राप्त हो, वहाँ अनभिहित कर्म में षष्ठी होती है, कर्त्ता में नहीं। उदाहरण में दोहः, पाकः यह घञ् प्रत्ययान्त कृदन्त हैं। अगोपालक तथा देवदत्त कर्त्ता हैं, और गौ तथा ओदन कर्म हैं। कृत् के योग में दोनों में (कर्त्ता और कर्म में) षष्ठी प्राप्त हुई, तब इस सूत्र से कर्म 'गौ' तथा 'ओदन' में ही षष्ठी हुई। कर्त्ता में कर्त्तृकरणयोस्तृतीया (२.३.१८) से तृतीया हो गई।

 

अतः स्पष्ट है, की "आश्चर्यो गवां दोहोऽगोपेन" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 68

'मनसा हरिं व्रजति' इत्यत्र 'गत्यर्थकर्मणी'-त्यादिसूत्रेण कर्मणि चतुर्थी कथन्न भवति?

  1. AOption (a)

    अध्ववाचिकर्मत्वात्

  2. BOption (b)

    व्रजधातोः गत्यर्थाभावात्

  3. COption (c)

    चेष्टायाः प्रतीत्यभावात्

  4. DOption (d)

    गत्यर्थकर्मणोऽभावात्

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Correct answer

Answer: (c)C.

चेष्टायाः प्रतीत्यभावात्

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : मनसा हरिं व्रजति यहाँँ 'गत्यर्थकर्मणी'-त्यादिसूत्र से कर्मणि चतुर्थी कैसे नहीं होती?

सूत्र - गत्यर्थकर्मणिद्वितीयाचतुर्थ्यौचेष्टायामनध्वनि (२.३.१२)

अनुवृत्ति - अनभिहिते।

अर्थ -  गत्यर्थानां धातूनां चेष्टाक्रियाणां परिस्पन्दक्रियाणां कर्मणि कारकेऽध्ववर्जिते द्वितीयाचतुर्थ्यौ भवतः।

उदाहरण -  ग्रामं व्रजति, ग्रामाय व्रजति। ग्रामं गच्छति, ग्रामाय गच्छति।

भाषार्थ - 

  • [चेष्टायाम्] चेष्टा जिनकी क्रिया हो, ऐसे [गत्यर्थकर्मणि] गत्यर्थक धातुओं के [अनध्वनि] मार्गरहित कर्म में [द्वितीयचतुर्थ्यो] द्वितीया और चतुर्थी विभक्ति होती हैं।
  • ग्रामं व्रजति (गाँव को जाता है) इत्यादि में व्रजादि गत्यर्थक धातु हैं। यहा केवल द्वितीया प्राप्त थी, तो यहा चतुर्थी का भी विधान किया है। गाँँव चलकर चेष्टा करके जायेगा, अतः व्रज् अथवा गम् यह चेष्टा क्रिया करनेवाले धातु हैंं। किंतु मनसा हरिं व्रजति (मन से हरि के पास जाता है) इस वाक्य में मार्ग के साधन से चला जाने की चेष्टा प्रतीत नहीं होती, अतः इस उदाहरण में चतुर्थी का विषण नहीं हो सकता।

 

अतः स्पष्ट है, की "चेष्टायाः प्रतीत्यभावात्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 69

'लोकेऽधिको हरिः' इत्यत्र सप्तमीविभक्तौ को नियमः?

  1. AOption (a)

    यस्मादधिकं यस्य चेश्वरवचनं तत्र सप्तमी

  2. BOption (b)

    अधिरीश्वरे

  3. COption (c)

    सप्तमी-पञ्चम्यौ कारकमध्ये

  4. DOption (d)

    'तदस्मिन्नधिकमिति दशान्ताड्डः' इति सूत्रनिर्देशात्

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Correct answer

Answer: (a)A.

यस्मादधिकं यस्य चेश्वरवचनं तत्र सप्तमी

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'लोकेऽधिको हरिः' यहाँँ सप्तमी विभक्ति के लिये कौन सा नियम है?

सूत्र - यस्मादधिकं यस्य चेश्वरवचनं सप्तमी (२.३.९)

अनुवृत्ति - कर्मप्रवचनीययुक्ते।

अर्थ - यस्माद् अधिकं यस्य च ईश्वरवचनं तत्र कर्मप्रवचनीययोगे सप्तमी विभक्तिर्भवति।

उदाहरण -  उपखार्य्यां द्रोणः, उपनिष्के कार्षापणम् अधि ब्रह्मदत्ते पञ्चालाः, अधि पञ्चालेषु ब्रह्मदत्तः।

भाषार्थः -

  • [यस्मात् ] जिससे [अधिकम् ] अधिक हो, [च] और [यस्य] जिसका [ईश्वरवचनम् ] ईश्वरवचन अर्थात् सामर्थ्य हो, [तत्र] उसमें कर्मप्रवचनीय के योग में [ सप्तमी] सप्तमी विभक्ति होती है। यह सूत्र कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया (२.३.८) का अपवाद है।
  • लोकेऽधिको हरिः इस उदाहरण में भी लोक से हरि अधिक अर्थात् श्रेष्ठ होने के कारण लोक शब्द की प्रस्तुत सूत्र से सप्तमी विभक्ति हुई।

अतः स्पष्ट है, की "यस्मादधिकं यस्य चेश्वरवचनं तत्र सप्तमी" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 70

तस्मादकृतकं शास्त्रं स्मृतिं च सनिबन्धनाम्।

आश्रित्यारभ्यते शिष्टैः शब्दानामनुशासनम्।।

वाक्यपदीयस्यास्यां कारिकायाम् 'अकृतकं शास्त्रम्' इति किम्?

  1. AOption (a)

    व्याकरणशास्त्रम्

  2. BOption (b)

    अपौरुषेयं शास्त्रम्

  3. COption (c)

    मीमांसाशास्त्रम्

  4. DOption (d)

    ब्रह्मसूत्रम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

अपौरुषेयं शास्त्रम्

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : वाक्यपदीय की प्रस्तुत कारिका में 'अकृतकं शास्त्रम्' क्या है?

वाक्यपदीय-

  • वाक्यपदीय, संस्कृत व्याकरण का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसे त्रिकाण्डी भी कहते हैं। वाक्यपदीय, व्याकरण शृंखला का मुख्य दार्शनिक ग्रन्थ है।
  • इसके रचयिता नीतिशतक के रचयिता महावैयाकरण तथा योगिराज भर्तृहरि हैं। इनके गुरु का नाम वसुरात था।
  • वाक्यपदीय में भर्तृहरि ने भाषा (वाच्) की प्रकृति और उसका बाह्य जगत से सम्बन्ध पर अपने विचार व्यक्त किये हैं।
  • यह ग्रंथ तीन भागों में विभक्त है जिन्हें "कांड" कहते हैं। यह समस्त ग्रंथ पद्य में लिखा गया है।
  • प्रथम "ब्रह्मकांड" है जिसमें 157 कारिकाएँ हैं, दूसरा "वाक्यकांड है जिसमें 493 कारिकाएँ हैं और तीसरा "पदकांड" के नाम से प्रसिद्ध है।
  • इसका प्रथम काण्ड ब्रह्मकाण्ड है जिसमें शब्द की प्रकृति की व्याख्या की गयी है। इसमें शब्द को ब्रह्म माना गया है और ब्रह्म की प्राप्ति के लिये शब्द को प्रमुख साधन बताया गया है।
  • दूसरे काण्ड में वाक्य के विषय में भर्तृहरि ने विभिन्न मत रखे हैं।
  • तीसरे काण्ड में अन्य दार्शनिक रीतियों के विषयों, जैसे - जाति, द्रव्य, काल आदि की चर्चा की गयी है।

Important Pointsसंपूर्ण कारिका - 

तस्मादकृतकं शास्त्रं स्मृतिं च सनिबन्धनाम्।

आश्रित्यारभ्यते शिष्टैः शब्दानामनुशासनम्।। (वाक्यपदीय, ब्रह्मकांड, ४३)

अर्थ - 

  • शास्त्र अकृतक अर्थात् अपौरुषेय ह��ता है, और स्मृति बद्ध रूप में होती है, इसका ही आधार लेकर विद्वान शब्दोंं के अनुशासन का अभ्यास करतेंं हैंं।
  • यहाँँ पर शास्त्र अपौरुषेय होने  निर्देश किया गया है, जो अनादि परंपरा से प्राप्त, नित्य, सहज और स्वयंसिद्ध है।

 

अतः स्पष्ट है, की "अपौरुषेयं शास्त्रम्" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 71

'सत्या विशुद्धिस्तत्रोक्ता विद्यैवैकपदागमा' वाक्यपदीयस्य अस्यां कारिकायां 'विद्यैवैकपदागमा' इत्यनेन पदेन किंस्वरूपा विद्या लक्ष्यते?

  1. AOption (a)

    शब्दरूपा

  2. BOption (b)

    प्रणवरूपा

  3. COption (c)

    वर्णरूपा

  4. DOption (d)

    अर्थरूपा

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Correct answer

Answer: (b)B.

प्रणवरूपा

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'सत्या विशुद्धिस्तत्रोक्ता विद्यैवैकपदागमा' वाक्यपदीय की इस कारिका में 'विद्यैवैकपदागमा' इस पद से किस प्रकार की विद्या का निर्देश किया गया है?

वाक्यपदीय-

  • वाक्यपदीय, संस्कृत व्याकरण का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसे त्रिकाण्डी भी कहते हैं। वाक्यपदीय, व्याकरण शृंखला का मुख्य दार्शनिक ग्रन्थ है।
  • इसके रचयिता नीतिशतक के रचयिता महावैयाकरण तथा योगिराज भर्तृहरि हैं। इनके गुरु का नाम वसुरात था।
  • वाक्यपदीय में भर्तृहरि ने भाषा (वाच्) की प्रकृति और उसका बाह्य जगत से सम्बन्ध पर अपने विचार व्यक्त किये हैं।
  • यह ग्रंथ तीन भागों में विभक्त है जिन्हें "कांड" कहते हैं। यह समस्त ग्रंथ पद्य में लिखा गया है।
  • प्रथम "ब्रह्मकांड" है जिसमें 157 कारिकाएँ हैं, दूसरा "वाक्यकांड है जिसमें 493 कारिकाएँ हैं और तीसरा "पदकांड" के नाम से प्रसिद्ध है।
  • इसका प्रथम काण्ड ब्रह्मकाण्ड है जिसमें शब्द की प्रकृति की व्याख्या की गयी है। इसमें शब्द को ब्रह्म माना गया है और ब्रह्म की प्राप्ति के लिये शब्द को प्रमुख साधन बताया गया है।
  • दूसरे काण्ड में वाक्य के विषय में भर्तृहरि ने विभिन्न मत रखे हैं।
  • तीसरे काण्ड में अन्य दार्शनिक रीतियों के विषयों, जैसे - जाति, द्रव्य, काल आदि की चर्चा की गयी है।

Important Pointsसंपूर्ण कारिका - 

सत्या विशुद्धिस्तत्रोक्ता विद्यैवैकपदागमा। 

युक्ता प्रणवरूपेण सर्ववादाविरोधिनी।। (वाक्यपदीयम्, ब्रह्मकाण्डम् ९)

अर्थ - 

  • जहाँँ सत्य, विशुद्धि का वर्णन है, जो ओंकार के रूप से संपन्न है, जो विवेकपद की प्राप्ति कराती है, वह विद्या सब संदेहों का भी निराकरण करती है।

 

अतः स्पष्ट है, की "प्रणवरूपा" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 72

'सन्निहितसाधनादधिकस्यानुपादित्सा' इत्यनेन योगाङ्गनियमेषु कः?

  1. AOption (a)

    शौचम्

  2. BOption (b)

    तपः

  3. COption (c)

    ईश्वरप्रणिधानम्

  4. DOption (d)

    सन्तोषः

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Correct answer

Answer: (d)D.

सन्तोषः

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**प्रश्नानुवाद- ‘**सन्निहितसाधनादधिकस्यानुपादित्सा’ यह योगांगो में कौन सा नियम है?

स्पष्टीकरण- **‘**सन्निहितसाधनादधिकस्यानुपादित्सा’ यह योगांगो में कौन सा नियम है?

योगदर्शन- 

  • इस दर्शन के प्रवर्तक पतंजलि मुनि है।
  • इसके ग्रंथ का नाम योगसूत्र है।
  • योगसूत्रों पर भाष्य व्यास ने लिखा है।
  • वाचस्पति मिश्र ने योगसूत्र पर ‘तत्ववैशारदी’ नामक टीका लिखी है।
  • इसमें चार पाद है- समाधि, साधन, विभूति तथा कैवल्य।
  • इसके द्वितीय तथा तृतीय पाद में अष्टांग-योग का वर्णन है।

अष्टांग-योग- 

पतंजलि के अनुसार आठ योगांग निम्नलिखित है- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। इनमें से नियमों की संख्या पाँच है-  

  1. शौच- तत्र शौचं मृज्जलादिजनितं मेध्याभ्यवहरणादि च बाह्यम्, आभ्यन्तरं चित्तमलानामाक्षालनम् अर्थात मिट्टी और जल से होने वाला तथा पवित्र भोजनादि बाहरी ‘शौच’ है। चित्त के दोषों को धोना भीतरी ‘शौच’ है।
  2. सन्तोष- सन्तोषः सन्निहितसाधनादधिकस्यानुपादित्सा। अर्थात विद्यमान से अधिक साधनों का संग्रह करने की अनिच्छा सन्तोष है।
  3. तप- तपो द्वन्द्वसहनम्। व्रतानि चैषां यथायोगं कृच्छ्रचान्द्रायणसान्तापनादीनि। अर्थात द्वंद्वों (बुभुक्षा आदि) को सहना तप है। शरीर की अनुकूलता के अनुसार चंद्रायण आदि व्रत भी तप है।
  4. स्वाध्याय-* स्वाध्यायो मोक्षशास्त्राणामध्ययनं प्रणवजपो वा।* अर्थात मोक्षशास्त्र का अध्ययन अथवा ओंकार का जप स्वाध्याय है।
  5. ईश्वरप्रणिधान- ईश्वरप्रणिधानं तस्मिन्परमगुरौ सर्वकर्मार्पणम्। अर्थात परमगुरु ईश्वर के प्रति सभी कर्मों का अर्पण करना ‘ईश्वरप्रणिधान’ है।

Question 73

अर्थशास्त्रस्य चतुर्थमधिकरणं वर्तते-

  1. AOption (a)

    कण्टकशोधनम्

  2. BOption (b)

    धर्मस्थीयम्

  3. COption (c)

    योगवृत्तम्

  4. DOption (d)

    षाड्गुण्यम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

कण्टकशोधनम्

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प्रश्नानुवाद- अर्थशास्त्र का चतुर्थ अधिकरण है-

स्पष्टीकरण- अर्थशास्त्र का चतुर्थ अधिकरण है- कण्टकशोधन।

अर्थशास्त्र- 

  • यह आचार्य कौटिल्य या विष्णुगुप्त की रचना है।
  • इस में 15 अधिकरण, 150 अध्याय तथा 180 प्रकरण है।
  • इस ग्रंथ राजशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा धर्मशास्त्र के विषय समाहित है।

अर्थशास्त्र के 15 अधिकरण क्रमशः निम्नलिखित है- 

विनयाधिकारिक, अध्यक्षप्रचार, धर्मस्थीय, कण्टकशोधन, योगवृत्त, मण्डलयोनि, षाड्यगुण्य, व्यसनाधिकारिक, अभियास्यत्कर्म, संग्रामिक, वृत्तसंघ, आबलीयस, दुर्गलंभोपाय, औपनिशषदिक, तन्त्रयुक्ति। 

Important Pointsकण्टकशोधन-

  • कौटिल्य अर्थशास्त्रानुसार दो प्रकार के न्यायालय थे - दीवानी और फौजदारी। दीवानी न्यायालयों को 'धर्मस्थीय' कहा जाता था। इसका प्रमुख व्यावहारिक होता था। फौजदारी न्यायालय को 'कण्टकशोधन कहा जाता है। इसका प्रमुख 'प्रदेष्टा' होता था।
  • अर्थात् वे न्यायालय जिनका उद्देश्य राजा अथवा राज्य में कण्टकों अर्थात् शत्रुओं को दूर करना हो। इनका कार्य राजा अथवा राज्य के विरुद्ध किये जाने वाले सभी अपराधों पर विचार करना यह था।
  • कण्टकशोधन न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में प्रमुख रूप से ये विवाद रखे गये हैं- प्रजा के दिन-प्रतिदिन के सम्पर्क में आने वाले धोबी, जुलाहे, रंगरेज, सुनार, वैद्य, नट-नर्तक आदि द्वारा किये गये प्रजा के शोषण तथा धनहरण से सम्बन्धित विवाद, दुष्टजनों द्वारा किये गये प्रजा पीड़न के कार्य और राज कर्मचारियों द्वारा किये जाने वाले प्रजा पीड़न के कार्य आदि ।
  • कौटिल्य ने इन सभी अपराधों को कण्टक की श्रेणी में रखा है और यह व्यवस्था दी है कि ऐसे अपराधियों का पता लगाने के लिए राजा के द्वारा गुप्तचरों और पुलिस की व्यवस्था की जानी चाहिए और न्याय���लयों द्वारा इन्हें दण्डित किया जाना चाहिए।

Question 74

शमप्रधानेषु तपोधनेषु गूढं हि दाहात्मकमस्ति तेजः।

स्पर्शानुकूला इव सूर्यकान्तास्तदन्यतेजोऽभिभवाद् वमन्ति।।

अत्र 'तत्' पदेन किं द्योतते?

  1. AOption (a)

    शमः

  2. BOption (b)

    तपः

  3. COption (c)

    धनम्

  4. DOption (d)

    तेजः

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Correct answer

Answer: (d)D.

तेजः

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प्रश्नानुवाद- यहाँ ‘तत्’ पद के द्वारा क्या द्योतित किया गया है?

स्पष्टीकरण- यहाँ ‘तत्’ पद के द्वारा तेज द्योतित किया गया है। उपरोक्त पंक्ति अभिज्ञानशाकुन्तल के दूसरे अंक से लिया गया है। 

अभिज्ञानशाकुन्तल- 

  • अभिज्ञानशाकुन्तल महाकवि कालिदास का प्रसिद्ध नाटक है।
  • यह सात अंको में विभक्त है।
  • इसकी कथा महाभारत के आदि पर्व से ली गयी है।
  • इसमें दुष्यंत और शाकुन्तल की प्रणय कथा वर्णित है।
  • इसमें दुष्यंत अपने सेनापति भद्रसेन से कहता है-

श्लोक-

शमप्रधानेषु तपोधनेषु गूढं हि दाहात्मकमस्ति तेजः। 

स्पर्शानुकूला इव सूर्यकान्तास्तदन्यतेजोऽभिभवाद् वमन्ति ।।7।।

श्लोकार्थ- शान्ति प्रधान तपस्वियों में जला देने वाला गुप्त तेज रहता है। क्योंकि स्पर्श के योग्य सूर्यकांत मणियों के तुल्य (वे) अन्य तेज से तिरस्कृत होने पर उस (तेज) को प्रकट

करते है।

Question 75

कथाप्रसङ्गेन जनैरुदाहृतादनुस्मृताखण्डलसूनुविक्रमः।

तवाभिधानाद् व्यथते नताननः सुदुःसहान्मन्त्रपदादिवोरगः।। अत्र कोऽलंकारः?

  1. AOption (a)

    मालोपमा

  2. BOption (b)

    लुप्तोपमा

  3. COption (c)

    श्लिष्टोपमा

  4. DOption (d)

    उत्प्रेक्षा

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Correct answer

Answer: (c)C.

श्लिष्टोपमा

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प्रश्नानुवाद- कथाप्रसङ्गेन जनैरुदाहृतादनुस्मृताखण्डलसूनुविक्रमः। तवाभिधानाद् व्यथते नताननः सुदुःसहान्मन्त्रपदादिवोरगः।। यहाँ कौन सा अलंकार है ?

स्पष्टीकरण- कथाप्रसङ्गेन जनैरुदाहृतादनुस्मृताखण्डलसूनुविक्रमः। तवाभिधानाद् व्यथते नताननः सुदुःसहान्मन्त्रपदादिवोरगः।। यहाँ श्लिष्टोपमा अलंकार है। 

  • आचार्य मम्मट के अनुसार काव्य के वे धर्म जो शब्द और अर्थ रूपी अंगो के द्वारा इसमें विद्यमान रस को उपकृत करते है, वे अनुप्रास (शब्दालंकार), उपमादि (���र्थालंकार) हारादि के समान ‘अलंकार’ अलंकार कहे जाते है- उपकुर्वन्ति तं सन्तं ये ऽङ्गद्वारेण जातुचित्। हारादिवदलंकारास्तेऽनुप्रासोपमादयः।।
  • आचार्य मम्मट ने अर्थालंकारो में सर्वप्रथम उपमा का वर्णन किया है- साधर्म्यम् उपमा भेदे पूर्णा लुप्ता च साग्रिमा। अर्थात् उपमान तथा उपमेय का भेद होने पर साधर्म्य का कथन उपमा अलंकार होता है। इसके अनेक भेदों में से श्लिष्टोपमा है। इस भेद में यहाँ श्लिष्ट पदों द्वारा साधर्म्य का कथन किया जाता है।
  • ​उदाहरण- कथाप्रसङ्गेन जनैरुदाहृतदानुसमृताखण्डसूनुविक्रमः। तवाभिधानाद् व्यथते नताननः सुदुःसहान्मन्त्रपदादिवोरगः।।
  • अर्थात् बातचीत के प्रसङ्ग में लोगों के द्वारा कहे गए अत्यन्त असह्य तुम्हारे नाम से इनके ( अर्जुन ) के पराक्रम को स्मरण करके वह ( दुर्योधन ) उसी प्रकार अधोमुख होकर (भय के कारण मुंह को नीचे किए हुए ) अत्यधिक दुःखी होता है जैसे विषवैद्यों में श्रेष्ठ लोगों के द्वारा उच्चारण किए हुए अत्यन्त असह्य ताय (गरुड ) और वासुकि ( नागराज ) के नाम से युक्त मन्त्र-पद (विष दूर करने वाले मन्त्र के पद) से इन्द्र के अनुज (विष्णु ) के पक्षी ( वाहनभूत गरुड) के पाद-प्रहार का स्मरण कर लेने वाले तथा मुख (फण ) को नीचे झुकाए हुए सर्प। इस श्लोक के दो अर्थ हैं एक दुर्योधन पक्ष में और दूसरा सर्पपक्ष में। यहाँ श्लिष्ट पदों द्वारा समान धर्म का कथन किया जाता है, अतः श्लिष्टोपमा अलंकार है।

Question 76

'मेदश्छेदकृशोदरं लघुभवत्युत्थानयोग्यं वपुः' इत्येवं कस्य वैशिष्ट्यं प्रतिपादितम्?

  1. AOption (a)

    पादपसिञ्चनस्य

  2. BOption (b)

    तपश्चर्यायाः

  3. COption (c)

    मृगयायाः

  4. DOption (d)

    पर्यटनस्य

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Correct answer

Answer: (c)C.

मृगयायाः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- 'मेदश्छेदकृशोदरं लघुभवत्युत्थानयोग्यं वपुः' यहाँ किसकी विशेषता प्रतिपादित की गयी है। 

स्पष्टीकरण- 'मेदश्छेदकृशोदरं लघुभवत्युत्थानयोग्यं वपुः' यहाँ मृगया (शिकार) की विशेषता प्रतिपादित की गयी है। 

उपरोक्त पंक्ति अभिज्ञानशाकुन्तल के दूसरे अंक से लिया गया है। इसमें दुष्यंत का सेनापति भद्रसेन मृगया (शिकार) की विशेषता बताता है। 

अभिज्ञानशाकुन्तल- 

  • अभिज्ञानशाकुन्तल महाकवि कालिदास का प्रसिद्ध नाटक है।
  • यह सात अंको में विभक्त है।
  • इसकी कथा महाभारत के आदि पर्व से ली गयी है।
  • इसमें दुष्यंत और शाकुन्तल की प्रणय कथा वर्णित है।

Important Pointsश्लोक- 

मेदश्छेदकृशोदरं लघु भवत्युत्थानयोग्यं वपुः सत्त्वानामपि लक्ष्यते विकृतिमच्चितं भयक्रोधयोः ।

उत्कर्य: स च धन्विनां यदिषवः सिध्यन्ति लक्ष्ये चले मिथ्यैव व्यसनं वदन्ति मृगयामीदृग्विनोदः कुतः ॥ 9 ॥

**श्लोकार्थ- (**मृगया से) शरीर, चर्बी कम होने से घटे हुए पेट वाला, चुस्त और उत्साह के योग्य हो जाता है। जीवों के भय और क्रोध की अवस्था में क्षुब्ध मन का भी ज्ञान हो जाता है। यह धनुधारियों के लिए गर्व की बात है की चंचल लक्ष्य पर उनके बाण सफल हो जाते है। शिकार करने को लोग व्यर्थ में ही व्यसन बोलते हैं, इतना मनोरंजन और कहाँ?

Question 77

भरतमुनिना रसस्य संख्या कियती स्वीकृता?

  1. AOption (a)

    षट्

  2. BOption (b)

    दश

  3. COption (c)

    नव

  4. DOption (d)

    अष्टौ

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Correct answer

Answer: (d)D.

अष्टौ

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प्रश्नानुवाद- भरतमुनि के द्वारा कितने रस स्वीकार किए गए है?

स्पष्टीकरण- भरतमुनि के द्वारा आठ रस स्वीकार किए गए है। 

  • भरतमुनि रस सम्प्रदाय के प्रवर्तक हैं।
  • यह सबसे प्राचीन काव्यशास्त्रीय सम्प्रदाय है।
  • इनके ग्रन्थ का नाम नाट्यशास्त्र है।
  • इस ग्रन्थ में 36 अध्याय है।
  • इस ग्रन्थ पर अभिनवगुप्त की ‘अभिनवभारती’ नामक प्रसिद्ध टीका है।
  • रस के विषय में सर्वप्रथम विवेचन ‘नाट्यशास्त्र’ के छठे अध्याय में मिलता है।
  • भरतमुनि ने आठ रस माने है- शृंगारहास्यकरुणरौद्रवीरभयानका:। बीभत्साद्भुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्ये रसा: स्मृता:। अर्थात्  शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, तथा अद्भुत, ये आठ नाट्य रस माने गए है।
  • इन्होंने शान्त रस को स्वीकार नहीं किया है।

Question 78

अजहत्स्वार्था लक्षणा का भवति?

  1. AOption (a)

    उपादानलक्षणा

  2. BOption (b)

    लक्षणलक्षणा

  3. COption (c)

    साध्यवसानिका

  4. DOption (d)

    फललक्षणा

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Correct answer

Answer: (a)A.

उपादानलक्षणा

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- अजहत्स्वार्था लक्षणा कौन होती है?

स्पष्टीकरण- अजहत्स्वार्था लक्षणा उपादान लक्षणा होती है। 

  • आचार्य विश्वनाथ ने अपने ग्रन्थ साहित्यदर्पण के दूसरे परिच्छेद में शब्दशक्तियों का वर्णन किया है।
  • ये शब्दशक्तियाँ तीन प्रकार की है- अभिधा, लक्षणा और व्यंजना।
  • लक्षणा-  
  • ​​मुख्यार्थबाधे तद्युक्तो ययान���योर्ऽथः प्रतीयते । रूढेः प्रयोजनाद्वासौ लक्षणा शक्तिरर्पिता ।।
  • अर्थात मुख्यार्थ के बाधित होने पर रूढ़ि अथवा प्रयोजन के बल पर जिस शब्दशक्ति के द्वारा उस (मुख्यार्थ) से संयुक्त अर्थ की प्रतीति होती है, वही लक्षणा है।
  • यह लक्षणा प्रथमतया दो प्रकार की है- उपादान और लक्षणा।
  • उपादान लक्षणा- 
  • मुख्यार्थस्येतराक्षेपो वाक्यार्थे ऽन्वयसिद्धये । स्यादात्मनो ऽप्युपादानादेषोपादानलक्षणा ।।
  • अर्थात जब वाक्यार्थ में अपने अन्वय की सिद्धि के लिए, मुख्यार्थ अन्य अर्थ का आक्षेप (ग्रहण) कर लेता है तब वहाँ उपादान लक्षणा होती है।
  • वाच्यार्थ को न त्याग करके अर्थान्तर की प्रतीति अजहत्स्वार्था लक्षणा का लक्षण है।

 

यहाँ अन्य अर्थ ग्रहण हो रहा न की त्याग हो रहा इसलिए यह उपादान लक्षणा अजहत्स्वार्था है।

Question 79

काव्यमीमांसानुसारं काव्यकविः कतिधा भवति?

  1. AOption (a)

    चतुर्धा

  2. BOption (b)

    त्रिधा

  3. COption (c)

    पञ्चधा

  4. DOption (d)

    अष्टधा

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Correct answer

Answer: (d)D.

अष्टधा

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प्रश्नानुवाद- काव्यमीमांसा के अनुसार काव्यकवि कितने प्रकार के है?

स्पष्टीकरण- काव्यमीमांसा के अनुसार काव्यकवि आठ प्रकार के है। 

काव्यमीमांसा-

  • राजशेखर संस्कृत काव्यशास्त्र के प्रमुख रसवादी आचार्य है।
  • इनकर ग्रन्थ का नाम काव्यमीमांसा है।
  • इस ग्रन्थ का विभाजन 18 अध्यायों में हुआ है।

कवि कौन होता है? 

राजशेखर काव्यमीमांसा व्युत्पत्तिकविककल्प नामक पञ्चम अध्याय में कवियों के विषय में बताते हैं। 'प्रतिभाव्युत्तपत्तिमांश्च कविः कविरिच्युच्यते। स च त्रिधा। शास्त्रकविः काव्यकविरुभयकविश्च।' अर्थात् प्रतिभा तथा व्युत्पति से युक्त कवि ही कवि कहा जाता है। उनके कवि के तीन प्रकार होते है-

  1. शास्त्रकवि- जो काव्य में रस को कम प्राधान्य देते है। 
  • प्रथम जो शास्त्र कविता करता है।
  • जो काव्य में शास्त्रीय तत्त्व का विधान करते है।
  • जो काव्य में शास्त्रार्थ का सन्निवेश करते है।
  1. काव्यकवि- जो अलंकार आदि के समन्वय से रचना करते है। काव्यकविः पुनरष्ठधा। अर्थात् काव्यकवि आठ होते है। 
  • रचनाकवि
  • शब्दकवि
  • अर्थकवि
  • अलंकारकवि
  • उक्तिकवि
  • रसकवि
  • मार्गकवि
  • शास्त्रार्थकवि
  1. उभयकवि- जो उपरोक्त दोनों प्रकार की रचनायें करते है।

अतः स्पष्ट है काव्यमीमांसा के अनुसार काव्यकवि आठ प्रकार के है।

Question 80

'रीतिरात्मा काव्यस्य' मतमिदं कस्य विद्यते?

  1. AOption (a)

    वामनस्य

  2. BOption (b)

    रुय्यकस्य

  3. COption (c)

    रुद्रटस्य

  4. DOption (d)

    भामहस्य

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Correct answer

Answer: (a)A.

वामनस्य

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- रीति काव्य की आत्मा है यह मत किसका है?

स्पष्टीकरण- रीति काव्य की आत्मा है यह मत वामन का है। 

काव्यालंकारसूत्र-

  • यह मत ‘काव्यालंकारसूत्र’ नामक ग्रंथ में प्रतिपादित है।
  • काव्यालंकारसूत्र आचार्य वामन द्वारा विरचित है एक प्रमुख काव्यशास्त्रीय ग्रंथ है।
  • आचार्य वामन रीति सम्प्रदाय के प्रवर्तक है।
  • काव्यालंकारसूत्र का विभाजन 5 अधिकरण में हुआ है।
  • आचार्य वामन ने रीति का अर्थ इसप्रकार बताया है- विशेष प्रकार की पद रचना।
  • उनके मत में विशेष का अर्थ प्रसाद आदि गुणों से युक्त होना है।
  • गुण और रीति का विशेष सम्बन्ध होने के कारण रीति सम्प्रदाय को गुण सम्प्रदाय भी कहते है।

वामन का मत-

  • रीति का अर्थ -  संस्कृत काव्य परंपरा में 'रीति' सिद्धांत के प्रवर्तक आचार्य वामन माने जाते हैं। रीति के सम्बन्ध में उन्होंने कहा है कि-
  • 'रीतिरात्मा काव्यस्य ; विशिष्टापदरचना रीति:।'
  • उन्होंने ही सर्वप्रथम गुण  और अलंकार में भेद स्पष्ट किया। उनके अनुसार काव्य का नित्य धर्म माधुर्य, प्रसाद और ओज आदि गुण ही हैं तथा इन्हीं गुणों पर आधृत रीतियाँ ही काव्य की अंतरात्मा हैं।
  • हिंदी साहित्य में रीति शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थों में हुआ है। अलंकार, रस, छंद इत्यादि काव्यगत विशेषताएँ जिनका ज्ञान काव्य रचना हेतु आवश्यक है, संयुक्त रूप  से काव्य रीति कहलाती हैं।
  • आचार्य वामन ने रीति का अर्थ इसप्रकार बताया है- विशेष प्रकार की पद रचना। उनके मत में विशेष का अर्थ प्रसाद आदि गुणों से युक्त होना है।
  • गुण और रीति का विशेष सम्बंध होने के कारण रीति सम्प्रदाय को गुण सम्प्रदाय भी कहते है।

Question 81

वेदे 'सूनरी' कस्याः विशेषणम्?

  1. AOption (a)

    घोषायाः

  2. BOption (b)

    उषसः

  3. COption (c)

    अपालायाः

  4. DOption (d)

    सरस्वत्याः 

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Correct answer

Answer: (b)B.

उषसः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : वेद में 'सूनरी' किस का विशेषण है?

उषा देवता :

उषा शब्द वस् दीप्तौ धातु से निष्पन्न हुआ है, जिस का अर्थ है -  प्रकाशमान होना। इस सौन्दर्य की देवी के उदित् होते ही आकाश का कोना कोना जगमगाने लगता है तथा विश्व हर्ष के अतिरेक से भर जाता है। देवता उषा के यह विशेष हैं - 

  • यह प्रत्येक प्राणी को अपने कार्य में प्रवृत्त कर देती है। उषा का रथ चमकदार है और उसे लाल रंग के घोड़े खींचते है। उषा को रात्रि की बहन भी कहा गया है।
  • आकाश से उत्पन्न होने के कारण उषा को स्वर्ग की पुत्री भी कहा गया है।
  • उषा सूर्य की प्रेमिका है इसके अतिरिक्त उषा का सम्बन्ध अश्विनी कुमारो से भी कहा गया है।
  • उषा अपने भक्तों को धन, यश, पुत्र आदि प्रदान करती हैं।
  • ऋग्वेद में उषा को रेवती, सुभगाः, प्रचेताः, विश्ववारा, पुराणवती मधुवती,ऋतावरी, सुम्नावरी, अरुषीः, अमर्त्या, सूनरी आदि विशेषणों से अलंकृत किया गया है।

 

​अतः स्पष्ट है, की "उषसः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

सूनरी विशेषण का वेदोंं में प्रयोग :

  • विश्वमस्या नानाम चक्षसे जगज्ज्योतिष्कृणोति सूनरी। अप द्वेषो मघोनी दुहिता दिव उषा उच्छदप स्रिधः।।
  • हे स्त्री जनो ! तुम जैसे (मघोनी) प्रशंसनीय धन का निमित्त (सूनरी) अच्छे प्रकार प्राप्त करानेवाली (दिवः) प्रकाशमान सूर्य्य की (दुहिता) पुत्री के सदृश (उषाः) प्रकाशने वाली प्रभात की वेला (विश्वम्) सब जगत् को (नानाम) आदर करता है, और उसको (चक्षसे) देखने के लिये (ज्योतिः) प्रकाश को (कृणोति) करती है और (स्रिधः) हिंसक (द्वेषः) बुरा द्वेष करनेवाले शत्रुओं को (अपोच्छत्) दूर वास कराती है।
  • प्रतिष्या सूनरी जनी व्युच्छन्ती परि स्वसुः। दिवो अदर्शि दुहिता।।
  • हे मनुष्यो ! जो (दिवः) सुन्दर (स्वसुः) भगिनी की (जनी) उत्पन्न करनेवाली (सूनरी) उत्तम पहुँचाती और (परि, व्युच्छन्ती) सब ओर से निवास देती हुई (दुहिता) कन्या के सदृश वर्त्तमान प्रातर्वेला (प्रति, अदर्शि) एक के प्रति एक देखी जाती है (स्या) वह जागे हुए मनुष्य से देखने योग्य है ॥

Question 82

'नीतिमञ्जरी' प्रतिपाद्यविषयाः केन सम्बद्धाः?

  1. AOption (a)

    ऋग्वेदेन

  2. BOption (b)

    कृष्णयजुर्वेदेन

  3. COption (c)

    सामवेदेन

  4. DOption (d)

    अथर्ववेदेन

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Correct answer

Answer: (a)A.

ऋग्वेदेन

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'नीतिमंजरी' के प्रतिपाद्य विषय किस से संबंधित हैंं?

नीतिमंजरी : 

  • नीतिमंजरी दीया द्विवेद लिखित एक विद्वत्तापूर्ण, नीतिपर ग्रंथ है।
  • दीया द्विवेद वैदिक साहित्य की लगभग सभी शाखाओं में पारंगत थे और साथ ही साथ संस्कृत साहित्य के कई विभागों से भी काफी परिचित थे।
  • मुख्य रूप से नीतिमंजरी उन जैसे सूक्ति और उपदेशात्मक छंदों का एक सुंदर गुच्छा है, जो नीतिपर कथाग्रंथोंं के सदृश है ।
  • लेखक इस में ऋग्वेद की  किंवदंतियों का एक अच्छा संग्रह बनाते हैं और इस प्रकार वैदिक पौराणिक कथाओं का नया रूप स्थापन करतेंं हैं।
  • यह ऋग्वेद के अध्ययन के लिए सामग्री प्रदान करके  सामान्य रूप से तुलनात्मक पौराणिक कथाओं और विशेष रूप से वैदिक पौराणिक कथाओं के अध्ययन में विशेष योगदान देता है।
  • यह एक ही समय में आंतरिक मूल्य के नैतिक सिद्धांतों के कारण लोकप्रिय है और लौकिक ज्ञान की शिक्षा द्वारा शिक्षाप्रद है, जो प्राचीन ऋषियों और देवताओं के उपयुक्त चित्रण द्वारा मनोरंजक भी है।

 

​अतः स्पष्ट है, की "ऋग्वेदेन" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 83

एध् धातोः लङ्लकारे उत्तमपुरुषबहुवचनस्य किं रूपं भवति?

  1. AOption (a)

    ऐधामहि

  2. BOption (b)

    ऐधेमहि

  3. COption (c)

    एधामहि

  4. DOption (d)

    एधामहै

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Correct answer

Answer: (a)A.

ऐधामहि

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : एध् धातु का लङ्लकार में उत्तमपुरुष बहुवचन में क्या रूप ह��ता है?

धातुविचार :

धातु : एधँ वृद्धौ

अर्थ : वृद्धि

पाणिनीय सूत्रपाठ क्रमांक : ०१.०००२

अतिरिक्त जानकारी : भ्वादि गण, आत्मनेपदी, अकर्मक, सेट्

लङ् लकार रूप : 

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमपुरुषऐधतऐधेताम्ऐधन्त
मध्यमपुरुषऐधथाःऐधेथाम्ऐधध्वम्
उत्तमपुरुषऐधेऐधावहिऐधामहि

 

अतः स्पष्ट है, की *"*ऐधामहि" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

लङ् लकार के विशेष : 

सूत्र : अनद्यतने लङ्।

  • अनद्यतन भूत में लङ् लकार होता है, जो कार्य आज से पूर्व हो चुका है अर्थात् क्रिया आज समाप्त नहीं हुई बल्कि कल या उससे भी पूर्व हो चुकी है, वह अनद्यतन काल होता है।
  • लङ् लकार में धातु के आरंभ में 'अ' यह वर्ण लगाना आवश्यक है। जो धातु उपसर्गसहित होते है, उन में उपसर्ग के बाद 'अ' लगता है और दोनों की संधि होती है। 
  • उदाहरणार्थ, नि + अवसत् =  न्यवसत्।

Question 84

योगदर्शने सर्वा चित्यभूमयः काः?

  1. AOption (a)

    क्षिप्तम्, मूढम्, विक्षिप्तम्, एकाग्रम्, निरुद्धम्

  2. BOption (b)

    क्षिप्तम्, प्रक्षिप्तम्, मूढम्, विमूढम्, सम्मूढम्

  3. COption (c)

    निद्रा, तन्द्रा, प्रमादः, मोदः, दुःखम्

  4. DOption (d)

    स्मृतिः, विस्मृतिः, निरुद्धम्, एकाग्रम्, मोहः

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Correct answer

Answer: (a)A.

क्षिप्तम्, मूढम्, विक्षिप्तम्, एकाग्रम्, निरुद्धम्

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प्रश्नानुवाद- योगदर्शन में सभी चित्तभूमियाँ कौन सी हैं?

स्पष्टीकरण- योगदर्शन में सभी चित्तभूमियाँ हैं- क्षिप्तम्, मूढम्, विक्षिप्तम्, एकाग्रम्, निरुद्धम्। 

योगदर्शन- 

  • इस दर्शन के प्रवर्तक पतंजलि मुनि है।
  • इसंके ग्रंथ का नाम योगसूत्र है।
  • योगसूत्रों पर भाष्य व्यास ने लिखा है।
  • वाचस्पति मिश्र ने योगसूत्र पर ‘तत्ववैशारदी’ नामक टीका लिखी है।
  • इसमें चार पाद है- समाधि, साधन, विभूति तथा कैवल्य।
  • इसके प्रथम पाद में चित्तभूमियों का वर्णन है।

Important Pointsचित्तभूमियाँ- 

योग दर्शन में चित्त की पाँच अवस्थाओं का वर्णन किया गया है जिन्हें चित्तभूमियाँ कहते है- 

  1. क्षिप्त- इस अवस्था में मनुष्य भोग- विलास में लिप्त रहता है । इस अवस्था में रजोगुण प्रधान रहता है। मनुष्य में राग -द्वेष , मोह, हिंसा, दुख ,आदि उत्पन्न होते हैं। यह मनुष्य के नैतिक पतन का कारण बनती है।
  2. मूढा- इस अवस्था में मनुष्य आलस, निंद्रा के प्रभाव में रहता है। इस अवस्था में तमोगुण प्रधान रहता है। इसमें मनुष्य लोभ, आलस, भ्रम आदि विकारों में रहता है। मनुष्य अनैतिक तथा अधर्म कार्य करता हुआ अपना जीवन अज्ञानता में व्यतीत करता है।
  3. विक्षिप्त- इस आवस्था में सत्व गुण प्रधान रहता है। इस अवस्था में उत्साह, प्रसन्नता, सुख, आदि गुण उत्पन्न होते हैं।  इसमें व्यक्ति समाधि की अवस्था में जा सकता है। परंतु रजोगुण के प्रभाव से मन में उत्पन्न होने वाली चंचलता अध्यात्म की ओर जाने से रोकती हैं।
  4. एकाग्र- इस अवस्था में सत्व गुण पूर्व प्रधान रहता है। एकाग्र भूमि में व्यक्ति पूर्ण रूप से निर्मल तथा स्वस्थ रहता है। यह अवस्था साम्प्रज्ञात समाधि भी कहलाती हैं।
  5. निरुध- यह अवस्था सिद्ध योगियों की होती हैं। इस अवस्था में किसी भी प्रकार का विशेष नहीं रह जाता। इसमें संस्कार ही शेष रह जाते हैं। इसे शून्यता की स्थिति भी कहा जाता है।

Question 85

"अदूरवर्तिनीं सिद्धिं राजन्विगणयात्मनः" रघुवंशे इयमुक्तिः कस्य?

  1. AOption (a)

    वसिष्ठस्य

  2. BOption (b)

    अरुन्धत्याः

  3. COption (c)

    कौत्सस्य

  4. DOption (d)

    सिंहस्य

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Correct answer

Answer: (a)A.

वसिष्ठस्य

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प्रश्नानुवाद- "अदूरवर्तिनीं सिद्धिं राजन्विगणयात्मनः" रघुवंश में यह उक्ति किसकी है?

स्पष्टीकरण- "अदूरवर्तिनीं सिद्धिं राजन्विगणयात्मनः" रघुवंश में यह उक्ति वसिष्ठ की है। 

रघुवंश- 

  • रघुवंश महाकवि कालिदास द्वारा रचित प्रसिद्ध महाकाव्य है।
  • इस महाकाव्य में 19 सर्ग हैं।
  • कुमारसम्भव और मेघदूत के साथ इस महाकाव्य की गणना संस्कृत साहित्य के लघुत्रयी में होती है।
  • इस महाकाव्य में 29 या 31 रघुवंशीय राजाओं का वर्णन है।
  • इस ग्रंथ पर मल्लिनाथ कि संजीवनी टीका प्राप्त होती है।

श्लोक- 

अदूरवर्तिनीं सिद्धिं राजन्विगणयात्मनः । 

उपस्थितेयं कल्याणी नाम्नी कीर्तित एव यत् ॥1।87॥

श्लोकार्थ- हे महाराज, आप अपने पुत्रप्राप्ति रूपी कार्य की सिद्धि को समीप समझे क्योंकि यह सामने आयी हुई कल्याणमूर्ति नन्दिनी नाम लेते ही उपस्थित हुई है।

Question 86

शिशुपालवधस्य सर्गसंख्या काऽस्ति?

  1. AOption (a)

    सप्तविंशतिः

  2. BOption (b)

    पञ्चविंशतिः

  3. COption (c)

    एकविंशतिः

  4. DOption (d)

    विंशतिः

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Correct answer

Answer: (d)D.

विंशतिः

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- शिशुपालवध की सर्गों की संख्या है?

स्पष्टीकरण- शिशुपालवध की सर्गों की संख्या विंशतिः अर्थात बीस है। 

शिशुपालवध- 

  • शिशुपालवध महाकवि माघ द्वारा विरचित एक प्रसिद्ध महाकाव्य है।
  • इसकी कथा महाभारत के उद्योग पर्व से गृहीत है।
  • इसमें पांडवों की सभा में श्रीकृष्ण द्वारा शिशुपाल के वध का वर्णन है।
  • इसके अतिरिक्त, प्रथम सर्ग में शिशुपाल के पूर्व जन्मों की कथा वर्णित है।
  • इस ग्रन्थ पर सर्वाधिक प्रसिद्ध टीका मल्लिनाथ विरचित 'सर्वांकषा' नामक टीका है।
  • किरतार्जुनीय तथा नैषधीयचरित के साथ इस महाकाव्य की गणना संस्कृत साहित्य के बृहत्त्रयी में होती है।

Additional Informationमाघ- 

  • ये संस्कृत साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कवियों में से एक है।
  • प्रायः अधिकांश विद्वान इनका काल सप्तम शताब्दी ई॰ मानते है।
  • प्रायः अधिकांश विद्वान इनका स्थान भीनमाल (राजस्थान) मानते है।
  • इनकी उपाधि घण्टामाघ है।
  • संस्कृत जगत में इनके लिए एक उक्ति प्रचलित है- माघे सन्ति त्रयो गुणा:। इसका तात्पर्य है कि माघ में तीनों गुण है- कालिदास की उपमा, भारवि का अर्थगौरव तथा दंडी का पदलालित्य।

Question 87

काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति सिद्धान्तः प्रधानतया केन प्रतिपादितः?

  1. AOption (a)

    अभिनवगुप्तेन

  2. BOption (b)

    मम्मटेन

  3. COption (c)

    भरतमुनिना

  4. DOption (d)

    आनन्दवर्धनेन

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Correct answer

Answer: (d)D.

आनन्दवर्धनेन

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प्रश्नानुवाद- काव्य की आत्मा ध्वनि है यह सिद्धान्त प्रधानतया किसके द्वारा प्रतिपादित की गयी है?

स्पष्टीकरण- काव्य की आत्मा ध्वनि है यह सिद्धान्त प्रधानतया आनन्दवर्धन द्वारा प्रतिपादित की गयी है।

ध्वन्यालोक-

  • यह सिद्धान्त ध्वन्यालोक नामक ग्रंथ में प्रतिपादित है।
  • ध्वन्यालोक आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा विरचित है एक प्रमुख काव्यशास्त्रीय ग्रंथ है।
  • आचार्य आनन्दवर्धन ध्वनि सम्प्रदाय के प्रवर्तक है।
  • ध्वन्यालोक का विभाजन 4 उद्योतों में हुआ है।
  • इस ग्रंथ पर अभिनवगुप्त की ‘लोचन टीका’ प्राप्त होती है।

अतिरिक्त जानकारीप्रसिद्ध काव्यशास्त्री आचार्य विश्वेश्वर ने काव्यशास्त्र में ध्वनि के पाँच व्युत्पत्तियाँ दी हैं- 

  1. धवनति ध्वनयति वा य: स: व्यंजक: शब्द: ध्वनि: - जो ध्वनित करे या कराये वह व्यंजक शब्द ध्वनि है।
  2. धवनति ध्वनयति वा य: स: व्यंजक: अर्थ: ध्वनि: - जो ध्वनित करे या कराये वह व्यंजक अर्थ ध्वनि है।
  3. ध्वन्यते इति ध्वनि: - जो ध्वनित किया जाए,  वह व्यंग्य अर्थ ध्वनि है। इसमें रस, अलंकार तथा वस्तु व्यंग्य आते है।
  4. ध्वन्यते अनेन इति ध्वनि: - जिसके द्वारा ध्वनित किया जाए, वह ध्वनि है। इससे व्यंजना व्यापार का बोध होता है।
  5. ध्वन्यते अस्मिन् इति ध्वनि: - जिसमें वस्तु, अलंकार, रसादि ध्वनित हों उस काव्य को ध्वनि कहतें है। 

शब्द, अर्थ, व्यंग्य अर्थ, व्यंजना व्यापार और काव्य व्यापार इन पाँचों को ध्वनि संज्ञा से व्यवहृत किया जाता है। किन्तु ‘ध्वन्यते इति ध्वनि:' से  व्यङ्ग्यार्थ ही अभिप्रेत है।​

Question 88

माण्डूकायनी शाखा कस्य वेदस्य विद्यते?

  1. AOption (a)

    ऋग्वेदस्य

  2. BOption (b)

    यजुर्वेदस्य

  3. COption (c)

    अथर्ववेदस्य

  4. DOption (d)

    सामवेदस्य

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Correct answer

Answer: (a)A.

ऋग्वेदस्य

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'माण्डूकायनी' शाखा किस वेद से संबंधित है?

वेद - शाखा :

  • मूलवस्तु से निकले हुए विभाग अथवा अंग को शाखा कहते हैं - जैसे वृक्ष की शाखा।
  • वैदिक साहित्य के संदर्भ में वैदिक शाखा शब्द से उन विशेष परंपराओं का बोध होता है जो गुरु-शिष्य-प्रणाली, देशविभाग, उच्चारण की भिन्नता, काल एवं विशेष परिस्थितिजन्य कारणों से चार वेदों के भिन्न-भिन्न पाटों के रूप में विकसित हुई।
  • शाखाओं को कभी कभी 'चरण' भी कहा जाता है।
  • इन शाखाओं का विवरण शौनक के चरणव्यूह और पुराणों में विशद रूप से मिलता है।

ऋग्वेद की शाखाएँँ :

पतंजलि के महाभाष्य के अनुसार ऋग्वेद की कदाचित 21 शाखाएं थीं। इनमें से 'चरणव्यूह' नामक ग्रन्थ में उल्लखित ये पांच शाखाएं प्रमुख मानी जाती हैं-

  • शाकल
  • बाष्कल
  • आश्वलायनी
  • शांखायनी
  • माण्डूकायनी

सम्प्रति ऋग्वेद की एक शाकल शाखा की संहिता ही प्राप्त होती है।

​अतः स्पष्ट है, की "ऋग्वेदस्य" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 89

"सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः" उक्तिरियं कुत्र प्राप्यते?

  1. AOption (a)

    मालविकाग्निमित्रे

  2. BOption (b)

    रघुवंशे

  3. COption (c)

    किरातार्जुनीये

  4. DOption (d)

    मेघदूते

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Correct answer

Answer: (b)B.

रघुवंशे

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- "सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः" यह उक्ति कहाँ प्राप्त है?

स्पष्टीकरण- "सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः" यह उक्ति रघुवंश में प्राप्त है। उपरोक्त पंक्ति रघुवंश के प्रथम सर्ग से लिया गया है। इसमें कालिदास रघुवंशी राजाओं के चरित्र का वर्णन करते है-

रघुवंश- 

  • रघुवंश महाकवि कालिदास का प्रसिद्ध महाकाव्य है।
  • यह 19 सर्गों में विभक्त है।
  • इसकी कथा रामायण से ली गयी है।
  • इसमें 29 या 31 रघुवंशी राजाओं की कथा वर्णित है।
  • इस महाकाव्य की गणना मेघदूत तथा कुमारसम्भव के साथ संस्कृत साहित्य के लघुत्रयी में होती है।
  • इस ग्रन्थ पर सर्वाधिक प्रसिद्ध टीका मल्लिनाथ विरचित 'संजीवनी' नामक टीका है।

Important Pointsश्लोक- 

प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत्। 

सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः ।।18।।

श्लोकार्थ- रघुवंशी राजा अपनी प्रजा के हित के लिये प्रजा से उसी प्रकार कर लिया करते थे, जिस प्रकार सहस्रगुना बनाकर बरसाने के लिये ही सूर्य पृथ्वी से जल लिया करते हैं।

Additional Informationकालिदास- 

  • ये संस्कृत साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कवियों में से एक है।
  • इनके काल के सम्बंध में पर्याप्त मतभेद है। प्रायः अधिकांश विद्वान इनका काल  ई॰ पू॰ प्रथम शताब्दी मानते है।
  • इनके स्थान के सम्बंध में भी पर्याप्त मतभेद है। प्रायः अधिकांश विद्वान इनका स्थान उज्जैन मानते है।
  • इनकी रचनाओं की संख्या के सम्बंध में भी पर्याप्त मतभेद है। कुछ विद्वान कालिदास की रचनाओं की संख्या 41 तक ले जाते हैं। निर्विवाद रूप से अधिकांश विद्वानों ने सिर्फ निम्नलिखित 7 रचनाओं को ही कालिदास का माना है।
  • महाकाव्य- रघुवंश (19 सर्ग), कुमारसम्भव (17)
  • खण्डकाव्य- मेघदूत (पूर्व मेघ तथा उत्तर मेघ), ऋतुसंहार (6 सर्ग)
  • रूपक (नाटक)- अभिज्ञानशाकुन्तल (7 अंक), मालविकाग्निमित्र (5 अंक)
  • उपरूपक (त्रोटक)- विक्रमोर्वशीयम्

Question 90

साहित्यदर्पणानुसारं रसस्य किं विशेषणं न साधु?

  1. AOption (a)

    स्वप्रकाशः

  2. BOption (b)

    लोकानुभूतिः

  3. COption (c)

    ब्रह्मास्वादसहोदरः

  4. DOption (d)

    अभिन्नः

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Correct answer

Answer: (b)B.

लोकानुभूतिः

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प्रश्नानुवाद- साहित्यदर्पण के अनुसार रस का कौन सा विशेषण सही नहीं है?

स्पष्टीकरण- साहित्यदर्पण के अनुसार लोकानुभूति रस का विशेषण सही नहीं है। 

  • आचार्य विश्वनाथ संस्कृत काव्यशास्त्र के श्रेष्ठ आचार्य है।
  • ये रस सम्प्रदाय के आचार्य है।
  • इनके ग्रंथ का नाम साहित्यदर्पण है।
  • इसका विभाजन 10 परिच्छेदों में हुआ है।
  • इसके तृतीय परिच्छेद में रसास्वादन के हेतु का वर्णन इसप्रकार है-

श्लोक-

सत्त्वोद्रेकादखण्डस्वप्रकाशानन्दचिन्मयः। वेद्यान्तरस्पर्शशून्यो ब्रह्मास्वादसहोदरः।। 

लोकोत्तरचमत्कारप्राणः कैश्चित्प्रमातृभिः। स्वाकारवदभिन्नत्वेनायमास्वाद्यते रसः।। 

श्लोक का अर्थ- सत्त्व का उद्रेक होने के कारण, कुछ प्रमाताओं (सहृदयों) द्वारा अखण्ड (अद्वितीय) स्वयंप्रकाशस्वरूप, आनन्दमय, अनुभूयमान अन्य विषय के संस्पर्श से शून्य, ब्रह्मास्वादसहोदर अलौकिक चमत्कार से अनुप्राणित इस रस का, अपने आकार की ही भाँति अभिन्नरूप से आस्वादन किया जाता है। 

अतः लोकानुभूति रस आस्वादन का उचित विशेषण नहीं है।

Question 91

रुद्रदाम्नः गिरनारलेखः कस्यां भाषायां विद्यते?

  1. AOption (a)

    संस्कृतभाषायाम्

  2. BOption (b)

    प्राकृतभाषायाम्

  3. COption (c)

    पालिभाषायाम्

  4. DOption (d)

    अपभ्रंशभाषायाम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

संस्कृतभाषायाम्

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प्रश्नानुवाद- रुद्रदाम्न का गिरनारलेख किस भाषा में है?

स्पष्टीकरण- रुद्रदाम्न का गिरनारलेख संस्कृत भाषा में है। 

गिरनारलेख-

  • रुद्रदमन का गिरनार शिलालेख पश्चिमी छत्रप नरेश रुद्रदमन द्वारा लिखवाया गया शिलालेख है। यह शिलालेख गिरनार पर्वतों पर है जो जूनागढ़ के निकट स्थित है।
  • यह १३०-से १५० ई॰ के मध्य लिखा गया था। जूनागढ़ शिलाओं पर अशोक के १४ शिलालेख तथा स्कन्दगुप्त के शिलालेख भी है।
  • रुद्रदामन का गिरनार शिलालेख उच्च कोटि के संस्कृत गद्य का स्वरूप प्रकट करता है जिसमें सुबन्धु, दण्डी और बाण की गद्यशैली का पूर्वरूप देखा जा सकता है।
  • इसकी भाषा सरल और प्रवाहपूर्ण है। इसमें दीर्घ समासों का भी प्रयोग देखते बनता है। अलंकृत शैली, नादात्मकता इसकी अन्य विशेषताएँ है।
  • इस शिलालेख में एक बहुत बड़े सुदर्शन तड़ाग सरोवर के निर्माण की बात कही है। इस क्षेत्र में पानी की कमी है। यह कार्य भी जनहित के लिए प्रशंसनीय प्रयास है।

Question 92

'रि च' इत्यनेन सूत्रेण किं कार्यं भवति?

  1. AOption (a)

    रेफस्य लोपः रादौ प्रत्यये परे।

  2. BOption (b)

    तासस्त्योः सस्य लोपः रादौ प्रत्यये परे।

  3. COption (c)

    पूर्वस्वरस्य दीर्घः रादौ प्रत्यये परे।

  4. DOption (d)

    उपधायाः दीर्घः रेफस्य च लोपः।

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Correct answer

Answer: (b)B.

तासस्त्योः सस्य लोपः रादौ प्रत्यये परे।

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'रि च' इस सूत्र से क्या कार्य होता है?

सूत्र - रि च (७.४.५१)

अनुवृत्ति - तासस्त्योर्लोपः, सः, अङ्गस्य।

अर्थ -  रेफादौ प्रत्यये परतस्तासेरस्तेश्च सकारस्य लोपो भवति। (तास्-प्रत्ययस्य अन्तिमवर्णस्य रेफे परे लोपः भवति।)

उदाहरण - कर्त्तारौ, कर्त्तारः, अध्येतारौ, अध्येतारः।

भाषार्थ: -

  • [रि] रेफादि प्रत्यय के परे रहते [च] भी तास् और अस् के सकार का लोप होता है। लौकिक प्रयोग विषय में अस् से परे रेफादि प्रत्यय सम्भव ही नहीं, अतः उदाहरण नहीं दिया जा सकता।
  • कर् + तास् + रौ = कर्त्तारौ बन गया। अध्येतारौ आदि में आत्मनेपद के आताम्, झ को रौ, रस् होता है।

सिद्धि : 

  • पठ्-धातु लुट्-लकार, प्रथमपुरुष-द्विवचन रूप
  • पठ् + लुट् [अनद्यतने लुट् ३.३.१५ इति लुट्]
  • पठ् + तास् + ल् [स्यतासी लृलुटोः ३.१.३३ इति विकरणप्रत्ययः तास्]
  • पठ् + इट् + तास् + ल् [आर्धधातुकस्येड्वलादेः ७.२.३५ इति इडागमः]
  • पठ् + इ + तास् + तस् [तिप्तस् ३.४.७८ इति तस्]
  • पठ् + इ + तास् + रौ [लुटः प्रथमस्य डारौरसः २.४.८५ इति तस्-प्रत्ययस्य रौ-आदेशः]
  • पठ् + इ + ता+ रौ [रि च ७.४.५१ इति रेफे परे तास्-इत्यस्य सकारस्य लोपः]
  • पठितारौ।

 

अतः स्पष्ट है, की "तासस्त्योः सस्य लोपः रादौ प्रत्यये परे" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Additional Informationभविष्यकाल के दो प्रकार होते है-

लृट् लकार और  लुट् लकार लृट् लकार को हम स्य भविष्यकाल से जानते है उदा- भविष्यति, पठिष्यति इ.

प्रस्तुत उदाहरण यह लुट् लकार अर्थात ता भविष्यकाल का है।

Question 93

पण्डितराज-जगन्नाथानुसारं निम्नलिखितेषु को न रसदोषः?

  1. AOption (a)

    रसस्य व्यङ्ग्यत्वम्

  2. BOption (b)

    स्थायि-व्यभिचारिणां शब्दवाच्यत्वम्

  3. COption (c)

    समबल-प्रबलप्रतिकूलरसाङ्गानां निबन्धनम्

  4. DOption (d)

    विच्छन्नरसस्य पुनर्दीपनम्

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Answer: (a)A.

रसस्य व्यङ्ग्यत्वम्

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प्रश्नानुवाद- पण्डितराज जगन्नाथ के अनुसार निम्नलिखित में से कौन रसदोष नहीं?

स्पष्टीकरण- पण्डितराज जगन्नाथ के अनुसार निम्नलिखित में से रसस्य व्यङ्ग्यत्वम् अर्थात रस का व्यङ्ग्यत्व रसदोष नहीं है। 

पंडित जगन्नाथ-

  • पंडित जगन्नाथ प्रसिद्ध ध्वनिवादी काव्यशास्त्री थे।
  • इनके ग्रंथ का नाम रसगंगाधर है।
  • इसका विभाजन 5 आननों में हुआ है।
  • इसके प्रथम आनन में सात रस दोषों की चर्चा है, जो निम्नलिखित है-
  1. वमन दोष- व्यंग्य को वाच्य बना देना
  2. निर्थकत्व दोष- करण आदि पदों से रस को वाच्य बना देना।
  3. शब्दवाच्यत्व दोष- स्थायीभावों और व्यभिचारी भावों का भी नामोल्लेखपूर्वक वर्णन करना।
  4. विलम्ब प्रतीति दोष- विभाव और अनुभाव की विलम्ब से प्रतीति होना
  5. जिस रस का वर्णन करना कवि को इष्ट है उसके विरोधी रस के समबल या अंगो का वर्णन करना।
  6. विछिन्नदीपन दोष- किसी प्रबंध में जिस रस का वर्णन चल रहा हो, उसका यदि एक बार किसी भी प्रसंगान्तर से विच्छेद हो जाने पर पुनः आगे उसका वर्णन करना।
  7. जिस रस का प्रस्ताव/विच्छेद नहीं करना चाहिये उसका प्रस्ताव/विच्छेद करना।

 

​प्रस्तुत पर्यायों में से स्थायि-व्यभिचारिणां शब्दवाच्यत्वम्, समबल-प्रबलप्रतिकूलरसाङ्गानां निबन्धनम् एवं विच्छन्नरसस्य पुनर्दीपनम् यह तीनो भी रसदोष है केवल रसस्य व्यङ्ग्यत्वम् यह रसदोष नही है अतः रस का व्यङ्ग्यत्व रसदोष नहीं है।

Question 94

'सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च'- अस्य मन्त्रस्य द्रष्टा ऋषिः कः?

  1. AOption (a)

    कुत्स आङ्गिरसः

  2. BOption (b)

    दीर्घतमा

  3. COption (c)

    मधुच्छन्दा

  4. DOption (d)

    वसिष्ठः

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Correct answer

Answer: (a)A.

कुत्स आङ्गिरसः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : ''सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च''' - इस मंत्र का द्रष्टा (ऋषि) कौन है?

मंत्र :  

संपूर्ण मंत्र : 

  • चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः। आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च।।

ऋषि - कुत्स आङ्गिरस

देवता - सूर्य

छन्द - निचृत्त्रिष्टुप्

अर्थ : 

पदार्थ -

  • हे मनुष्यो ! जो (अनीकम्) नेत्र से नहीं देखने में आता तथा (देवानाम्) विद्वान् और अच्छे-अच्छे पदार्थों वा (मित्रस्य) मित्र के समान वर्त्तमान सूर्य वा (वरुणस्य) आनन्द देनेवाले जल, चन्द्रलोक और अपनी व्याप्ति आदि पदार्थों वा (अग्नेः) बिजुली आदि अग्नि वा और सब पदार्थों का (चित्रम्) अद्भुत (चक्षुः) दिखानेवाला है, वह ब्रह्म (उदगात्) उत्कर्षता से प्राप्त है। जो जगदीश्वर (सूर्य्यः) सूर्य के समान ज्ञान का प्रकाश करनेवाला विज्ञान से परिपूर्ण (जगतः) जङ्गम (च) और (तस्थुषः) स्थावर अर्थात् चराचर जगत् का (आत्मा) अन्तर्यामी अर्थात् जिसने (अन्तरिक्षम्) आकाश (द्यावापृथिवी) प्रकाश और भूमिलोक को (आ, अप्राः) अच्छे प्रकार परिपूर्ण किया अर्थात् उनमें आप भर रहा है, उसी परमात्मा की तुम लोग उपासना करो।

भावार्थ -

  • जो देखने योग्य परिमाणवाला पदार्थ है वह परमात्मा होने को योग्य नहीं। न कोई भी उस अव्यक्त सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर के विना समस्त जगत् को उत्पन्न कर सकता है और न कोई सर्वव्यापक, सच्चिदानन्दस्वरूप, अनन्त, अन्तर्यामी, चराचर जगत् के आत्मा परमेश्वर के विना संसार के धारण करने, जीवों को पाप और पुण्यों को साक्षीपन और उनके अनुसार जीवों को सुख-दुःख रूप फल देने को योग्य है। न इस परमेश्वर की उपासना के विना धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के पाने को कोई जीव समर्थ होता है, इससे यही परमेश्वर उपासना करने योग्य इष्टदेव सबको मानना चाहिये।

 

​अतः स्पष्ट है, की "कुत्स आङ्गिरसः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 95

याज्ञवल्क्यस्मृत्यनुसारं किं स्त्रीधनं नास्ति?

  1. AOption (a)

    अध्यग्नि

  2. BOption (b)

    आधिवेदनिकम्

  3. COption (c)

    अन्वाधेयकम्

  4. DOption (d)

    सामान्यार्थः

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Answer: (d)D.

सामान्यार्थः

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प्रश्नानुवाद- याज्ञवलक्यस्मृति के अनुसार क्या स्त्रीधन नहीं है?

स्पष्टीकरण- याज्ञवलक्यस्मृति के अनुसार सामान्यार्थ स्त्रीधन नहीं है। 

याज्ञवलक्यस्मृति- 

  • याज्ञवलक्यस्मृति के रचनाकार स्वयं याज्ञवल्क्य हैं।
  • ये मिथिला निवासी तथा शुक्ल यजुर्वेद से सम्बंधित ऋषि माने जाते हैं।
  • याज्ञवलक्यस्मृति में तीन अध्याय हैं- आचार, व्यवहार तथा प्रायश्चित।
  • याज्ञवलक्यस्मृति में 44 प्रकरण हैं- आचाराध्याय में 13, व्यवहायाध्याय में 25 तथा प्रायश्चिताध्याय में छह प्रकरण है।

स्त्रीधन- 

  • पितृमातृपतिभातृदत्तम् अध्याग्न्युपागतम्। आधिवेदनिकाद्यं च स्त्रीधनं परिकीर्ततम्।। बंधुदत्तं तथा शुल्कम् अन्वाधेयकमेव च। (याज्ञवल्क्यस्मृति, 2.143 )
  • अर्थात् पिता, माता, पति और भाई के द्वारा दिया गया धन, अध्यग्नि (विवाह के समय अग्नि के समीप धन) तथा आधिवेदनिक (दूसरा विवाह करते समय प्रथम पत्नी के परितोषार्थ उसे दिया गया धन) इत्यादि स्त्रीधन कहे गए है। स्त्री के माता पिता और बंधुओ द्वारा दिया गया धन, परिणय के शुल्क के रूप में दिया गया धन, विवाह के बाद पति तथा अन्वाधेयक (पितृकुल से प्राप्त धन) भी स्त्री-धन होता है।

अतः यह स्पष्ट होता है की, प्रस्तुत पर्यायों में से सामान्यार्थ स्त्रीधन नहीं है।

Question 96

'ऋषीणां पुनराद्यानां वाचमर्थोऽनुधावति' उक्तिरियं कुत्र प्राप्यते?

  1. AOption (a)

    उत्तररामचरिते

  2. BOption (b)

    मालविकाग्निमित्रे

  3. COption (c)

    हर्षचरिते

  4. DOption (d)

    नैषधीयचरिते

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Answer: (a)A.

उत्तररामचरिते

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प्रश्नानुवाद- 'ऋषीणां पुनराद्यानां वाचमर्थोऽनुधावति' यह उक्ति कहाँ प्राप्त होती है?

स्पष्टीकरण- 'ऋषीणां पुनराद्यानां वाचमर्थोऽनुधावति' यह उक्ति उत्तररामचरित में प्राप्त होती है। उपरोक्त पंक्ति उत्तररामचरित के प्रथम अंक से लिया गया है।

उत्तररामचरित- 

  • उत्तररामचरित महाकवि भवभूति का प्रसिद्ध नाटक है। यह सात अंको में विभक्त है।
  • इसकी कथा रामायण के उत्तरकाण्ड से ली गयी है।
  • यह करुण रस प्रधान नाटक है। यह नाटक विदूषक रहित है।

Important Pointsश्लोक- 

लौकिकानां हि साधूनामर्थं वागनुवर्तते। 

ऋषीणां पुनराद्यानां वाचमर्थोऽनुधावति ।।10।।

श्लोकार्थ- लौकिक साधुजन या सामान्य विद्वान जो व्यक्ति होता है उसकी वाणी हमेशा अर्थ का अनुगमन करती है। किंतु सिद्ध ऋषिजन जो होते हैं स्वयं अर्थ उनकी वाणी का अनुसरण करता है, जब वे बोलते हैं तब अर्थ निर्धारित किये जाते हैं। 

Additional Informationभवभूति- 

  • भवभूति संस्कृत वाङ्मय के श्रेष्ठ नाटककारों में गिने जाते हैं।
  • इनका काल 606 ई॰ से 733 ई॰ माना जाता है।
  • इनका स्थान पद्मपूर (महाराष्ट्र) माना जाता है।
  • इनके पिता का नाम नीलकण्ठ तथा माता का नाम जतुकर्णी था।
  • इनकी अनेक उपाधियाँ भी थी- श्रीकण्ठ, पदवाक्यप्रमाणज्ञ, वश्यवाक्, उम्बेक आदि।
  • इन्होंने तीन रूपकों की रचना की जो निम्नलिखित है-
  • नाटक- महावीरचरित (7 अंक), उत्तररामचरित, प्रकरण- मालतीमाधव (10 अंक)

Question 97

साहित्यदर्पणानुसारं रसास्वादने को हेतुः?

  1. AOption (a)

    काव्यपाठः

  2. BOption (b)

    सत्त्वोद्रेकः

  3. COption (c)

    पात्राणि

  4. DOption (d)

    सहृदयता

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Correct answer

Answer: (b)B.

सत्त्वोद्रेकः

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प्रश्नानुवाद- साहित्यदर्पण के अनुसार रस आस्वादन का हेतु कैन सा है?

स्पष्टीकरण- साहित्यदर्पण के अनुसार रस आस्वादन का हेतु सत्त्वोद्रेक है। 

साहित्यदर्पण-

  • आचार्य विश्वनाथ संस्कृत काव्यशास्त्र के श्रेष्ठ आचार्य है।
  • ये रस सम्प्रदाय के आचार्य है।
  • इनके ग्रंथ का नाम साहित्यदर्पण है।
  • इसका विभाजन 10 परिच्छेदों में हुआ है।
  • इसके तृतीय परिच्छेद में रसास्वादन के हेतु का वर्णन है-

श्लोक-

सत्त्वोद्रेकादखण्डस्वप्रकाशानन्दचिन्मयः। वेद्यान्तरस्पर्शशून्यो ब्रह्मास्वादसहोदरः।। 

लोकोत्तरचमत्कारप्राणः कैश्चित्प्रमातृभिः। स्वाकारवदभिन्नत्वेनायमास्वाद्यते रसः।। 

श्लोक का अर्थ- अर्थात सत्त्व का उद्रेक होने के कारण, कुछ प्रमाताओं (सहृदयों) द्वारा अखण्ड (अद्वितीय) स्वयंप्रकाशस्वरूप, आनन्दमय, अनुभूयमान अन्य विषय के संस्पर्श से शून्य, ब्रह्मास्वादसहोदर अलौकिक चमत्कार से अनुप्राणित इस रस का, अपने आकार की ही भाँति अभिन्नरूप से आस्वादन किया जाता है। 

अतः रस आस्वादन का हेतु सत्त्वोद्रेक है।

Question 98

अथर्ववेदीयकृषिसूक्तस्य द्रष्टा ऋषिः कः?

  1. AOption (a)

    मधुच्छन्दा

  2. BOption (b)

    भिक्षुः

  3. COption (c)

    बुधः

  4. DOption (d)

    विश्वामित्रः

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Correct answer

Answer: (d)D.

विश्वामित्रः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अथर्ववेदीयकृषिसूक्त का द्रष्टा ऋषि कौन है?

कृषिसूक्त :

  • अथर्ववेद का  काण्ड ३, १७ क्रमांक का सूक्त कृषिसूक्त है।
  • इस सूक्त के ऋषि विश्वामित्र और देवता सीता है।
  • इस सूक्त में देवता सीता की कृषिदेवता अथवा फलदायी रूप में स्तुती की है।
  • प्रस्तुत सूक्त में कृषिकर्मोंं के साथ ही आध्यात्मिक संदर्भ में भी कृषि का वर्णन किया गया है। दृश्यभूमी के साथ मनोभूमी का भी भाव यहाँ सिद्ध होता है।

 

अतः स्पष्ट है, की "विश्वामित्रः" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 99

'तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि' - इत्युद्धरणं वर्त्तते-

  1. AOption (a)

    ईशोपनिषदि

  2. BOption (b)

    बृहदारण्यकोपनिषदि

  3. COption (c)

    तैत्तिरीयोपनिषदि

  4. DOption (d)

    कठोपनिषदि

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Correct answer

Answer: (a)A.

ईशोपनिषदि

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि''- यह उद्धरण किस उपनिषद में प्राप्त होता है?

संपूर्ण उक्ति : 

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन्‌ समूह।

तेजो यत् ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि।

योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि।।

संदर्भ : 

ईशोपनिषद - १६

अर्थ : 

  • हे पोषक, हे एकमात्र द्रष्टा, हे विधाता एवं नियन्ता, हे प्रकाशदाता सूर्य, हे प्रजापति की (प्राणियों एवं प्रजाओं के पिता की) शक्ति! अपनी किरणों को व्यूहबद्ध एवं व्यवस्थित कर, अपने प्रकाश को एकत्र एवं पुञ्जीभूत कर ले जो तेज तेरा सबसे अधिक कल्याणकारी रूप है, तेरा वही रूप मैं देखता हूं, वहां, वहां जो पुरुष है वही मैं हूँ।

 

​अतः स्पष्ट है, की "ईशोपनिषदि" यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 100

'तं राजा प्रणयन् सम्यक् त्रिवर्गेणाभिवर्धते' अत्र त्रिवर्गस्याभिप्रायः कः?

  1. AOption (a)

    धर्मः अर्थः कामश्च

  2. BOption (b)

    ब्राह्मणः क्षत्रियः वैश्यश्च

  3. COption (c)

    साम दानं भेदश्च

  4. DOption (d)

    भूः भुवः स्वश्च

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Correct answer

Answer: (a)A.

धर्मः अर्थः कामश्च

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प्रश्नानुवाद- 'तं राजा प्रणयन् सम्यक् त्रिवर्गेणाभिवर्धते' यहाँ त्रिवर्ग से क्या अभिप्राय है?

स्पष्टीकरण- तं राजा प्रणयन् सम्यक् त्रिवर्गेणाभिवर्धते' यहाँ त्रिवर्ग से धर्म अर्थ तथा काम अभिप्रेत है। 

मनुस्मृति-

  • मनुस्मृति स्वयं मनु द्वारा रचित धर्मशास्त्रीय ग्रंथ है। इस ग्रंथ में 12 अध्याय तथा 2694 श्लोक हैं।
  • इसकी गणना विश्व के ऐसे ग्रन्थों में की जाती है, जिनसे मानव ने वैयक्तिक आचरण और समाज रचना के लिए प्रेरणा प्राप्त की है।
  • प्रस्तुत श्लोक यह मनुस्मृति के सप्तम अध्याय से लिया गया है।
  • इस ग्रंथ पर निम्नलिखित टीकाएँ प्राप्त होती है-
  • मनुभाष्य- मेधातिथि
  • मन्वर्थमुक्तावाली- कुल्लूकभट्ट
  • नंदिनी- नंदन

श्लोक- 

तं राजा प्रणयन् सम्यक् त्रिवर्गेणाभिवर्धते । कामात्मा विषमः क्षुद्रो दण्डेनैव निहन्यते ॥ (सप्तमोऽध्याय)

श्लोकार्थ- यदि राजा भलीभाँति विचार करके दण्ड देता है तो धर्म, अर्थ और काम में वृद्धि होती है और जो राजा, कामी और अनुचित दण्ड देने वाला होता है तो वह उसी दण्ड से मारा जाता है। यह श्लोक मनुस्मृति के सातवें अध्याय में वर्णित है।

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