Previous Year Paper

UP TGT Sanskrit 2021 Official Paper (Previous Year Paper)

125 questions · 120 minutes · with answers · free

Test (125 questions)

1

कविशब्दस्य तृतीयाविभक्तेः रूपं नास्ति

  1. ((a))

    कविना

  2. ((b))

    कविभ्याम्

  3. ((c))

    कविभिः

  4. ((d))

    कविभ्यः

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Answer: ((d))

कविभ्यः

प्रश्नार्थ - 'कवि' शब्द का तृतीया विभक्ति रूप नहीं है-

Hint

‘कवि’ शब्द का विविध वचनों तथा विभक्तियों में रूप निम्नलिखित है:-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमाकविःकवीकवयः
द्वितीयाकविम्कवीकवीन्
तृतीयाकविनाकविभ्याम्कविभिः
चतुर्थीकवयेकविभ्याम्कविभ्यः
पञ्चमीकवेःकविभ्याम्कविभ्यः
षष्ठीकवेःकव्योःकवीनाम्
सप्तमीकवौकव्योःकविषु
सम्बोधनहे कवे!हे कवी!हे कवयः!

 

 

उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट होता है, इकारान्त पुलिङ्ग ‘कवि’ शब्द से तृतीया विभक्ति में 'कविना, कविभ्याम्, कविभिः' यह रूप बनते है।, 

अर्थात् 'कविभ्यः' रूप नहीं बनने के कारण वही उचित पर्याय होता है।

2

क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम् - अत्र स्थायीभूषणं किम् ?

  1. ((a))

    स्वर्णाभूषणम्

  2. ((b))

    वाणीरूपभूषणम्

  3. ((c))

    धनरूपभूषणम् 

  4. ((d))

    भौतिकसंसाधनम्

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Answer: ((b))

वाणीरूपभूषणम्

प्रश्न अनुवाद - 'क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्' यहां स्थायीभूषण क्या है ?

स्पष्टीकरण - यह सूक्ति भर्तृहरि कृत नीतिशतकम् की है।

केयूरा न विभूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वला

न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्धजाः।

वाण्येका समलंकरोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते

क्षीयते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्॥

सूक्ति का अर्थ - अर्थात् न बाजूबन्द से, न चन्द्रमा के समान उज्ज्वल हार से, न स्नान, न सुगन्धित पदार्थो के विलेपन से, न फूलों से, न अलंकृत केशों से, पुरुषों की शोभा तो वाणी रूपी आभूषण से है। साधारण आभूषण नष्ट हो जाते है परन्तु वाणी रूपी आभूषण ही मनुष्य की शोभा को बढाती है। 

स्पष्टीकरण - वाक् अर्थात् वाणी। 'क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्' इसमें 'वाणीरूपभूषणम्' को स्थायीभूषण माना गया है। 

अतः 'वाणीरूपभूषणम्' विकल्प सही है।

3

किरातार्जुनीये कस्य रसस्य प्रधानता ?

  1. ((a))

    शृंगाररसस्य

  2. ((b))

    हास्यरसस्य

  3. ((c))

    वीररसस्य

  4. ((d))

    अद्भुतरसस्य

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Answer: ((c))

वीररसस्य

प्रश्न अनुवाद - किरातार्जुनीय में किस रस की प्रधानता है ?

स्पष्टीकरण - 

  • महाकवि भारवि के द्वारा 18 सर्गों में विरचित किरातार्जुनीयम् महाकाव्य का प्रधान रस वीर है।
  • किरातार्जुनीयम् (किरात और अर्जुन की कथा) महाकवि भारवि द्वारा सातवीं शती ई. में रचित महाकाव्य है। जिसे संस्कृत साहित्य के 'बृहत्त्रयी' में स्थान प्राप्त है।
  • महाभारत में वर्णित किरात वेशधारी शिव के साथ अर्जुन के युद्ध की लघुकथा को आधार बनाकर कवि ने राजनीति, धर्मनीति, कूटनीति, समाजनीति, युद्धनीति, जनजीवन आदि का मनोरम वर्णन किया है।
  • यह काव्य विभिन्न रसों से ओतप्रोत रचना है किन्तु वीर रस प्रधान है।

अतः 'वीररसस्य' विकल्प सही है।

Important Points

संस्कृत के छः प्रसिद्ध महाकाव्य है -

  • किरातार्जनुयीयम्‌ (भारवि), शिशुपालवधम्‌ (माघ) और नैषधीयचरितम्‌ (श्रीहर्ष) - बृहत्त्रयी कहलाते है।
  • कुमारसम्भवम्‌, रघुवंशम् और मेघदूतम् (तीनों कालिदास द्वारा रचित) - लघुत्रयी कहलाते है।
4

ब्रह्मणा आत्माधीनं एकान्तगुणं योऽस्ति अपण्डितानाम्

  1. ((a))

    मौनावलम्बनम्

  2. ((b))

    वाचालागुणम्

  3. ((c))

    परिभ्रमणम्

  4. ((d))

    दुर्व्यसनम्

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Answer: ((a))

मौनावलम्बनम्

प्रश्न अनुवाद - विद्वानों में मूर्ख स्वयं के अधीन क्या होते है?

संस्कृत में एक प्रसिद्ध श्लोक है - 

स्‍वायत्‍तमेकान्‍तगुणं विधात्रा 

विनिर्मितं छादनमज्ञतायाः।

विशेषतः सर्वविदां समाजे 

विभूषणं मौनमपण्डितानाम्।।

जिसका अर्थ है - अज्ञान के आवरण स्‍वरूप विधाता ने स्‍वेच्‍छा से मौन रहने का एक विशेष गुण बनाया है। विशेषतः विद्वानों की सभा में मूर्खों के लिये मौन आभूषण के समान है अर्थात् विद्वानों की सभा में मौन ही मूर्खों का आभूषण है।

श्लोक का स्पष्टीकरण - 

  • विद्वानों के समाज में मौन (चुप रहना) अपण्डितों (मुर्खों) का आभूषण है।
  • विद्वत् समाज में मूर्ख यदि मौन है तो वह विद्वान् ही समझा जाता है।
  • लेकिन जैसे ही वह बोलता है, वैसे ही उसका भेद खुल जाता है कि वह क्या है।
  • इसका वर्णन भर्तृहरि के नीतिशतक में किया गया है।

अतः 'मौनावलम्बनम्' (मौन साधना) विकल्प सही है।

5

'न खलु धीमतां कश्चिदविषयो नाम' कस्येयमुक्तिः? 

  1. ((a))

    शारद्वतस्य

  2. ((b))

    शार्ङ्गरवस्य

  3. ((c))

    प्रियम्वदायाः

  4. ((d))

    गौतम्या

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Answer: ((b))

शार्ङ्गरवस्य

प्रश्न अनुवाद - 'न खलु धीमतां कश्चिदविषयो नाम' किसकी उक्ति है ?

स्पष्टीकरण - 

  • 'न खलु धीमतां कश्चिदविषयो नाम' यह उक्ति 'शार्ङ्गरव' की है।
  • यह उक्ति कालिदास कृत 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' नाटक में शार्ङ्गरव द्वारा महिर्षि कण्व के विषय में कथित है।
  • इसका अर्थ है - निश्चित रूप में बुद्धिमान के लिये कोई वस्तु अज्ञात नहीं है।

अतः स्पष्ट है कि 'शार्ङ्गरवस्य' विकल्प सही है।

Important Pointsअभिज्ञानशाकुन्तलम् -

  • अभिज्ञान शाकुन्तलम् महाकवि कालिदास का विश्वविख्यात नाटक है।
  • इसमें राजा दुष्यन्त तथा शकुन्तला के प्रणय, विवाह, विरह, प्रत्याख्यान तथा पुनर्मिलन की एक सुन्दर कथा है।
  • पौराणिक कथा में दुष्यन्त को आकाशवाणी द्वारा बोध होता है, पर इस नाटक में कवि ने मुद्रिका द्वारा इसका बोध कराया है।
  • यह कथा महाभारत के आदिपर्व से ली गई है।
6

 क्रियासु युक्तैर्नृप! चारचक्षुषो न वञ्चनीयाः प्रभवोऽनुजीविभिः श्लोकेऽस्मिन् “चारचक्षुषः" कोऽस्ति ?

  1. ((a))

    केसरीनन्दनः

  2. ((b))

    मेघः

  3. ((c))

    वनेचरः

  4. ((d))

    युधिष्ठिरः

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Answer: ((d))

युधिष्ठिरः

प्रश्न अनुवाद - क्रियासु युक्तैर्नृप! चारचक्षुषो न वञ्चनीयाः प्रभवोऽनुजीविभिः इस श्लोक में “चारचक्षुषः" कौन है ?

श्लोक - प्रस्तुत श्लोक किरातार्जुनीयम् महाकाव्य से है। जहाँ चारचक्षुषः वनेचर के लिए कहा गया है। जहाँ वह महाराज युधिष्ठिर का गुप्तचर है।

क्रियासु युक्तैर्नृप! चारचक्षुषो न वञ्चनीयाः प्रभवोऽनुजीविभिः।

अतोऽर्हसि क्षन्तुमसाधु साधु वा हितं मनोहारि चे दुर्लभ वचः॥ (किरातार्जुनीयम् - १.४)

श्लोकार्थ - हे राजन्! करने योग्य कार्यों में नियुक्त गुप्तचर सेवकों द्वारा गुप्तचररूपी दृष्टि रखने वाले राजा लोग ठगे नहीं जाने चाहिए। इसलिए प्रिय अथवा अप्रिय को (आप) क्षमा करने योग्य हैं। हितकारी और प्रियवचन दुर्लभ होता है।

श्लोक के कठिन शब्द -

  • चारचक्षुषः - चार नेत्रों से देखने वाला
  • प्रभवः - राजा
  • अनुजीविभिः - सेवक

Important Pointsस्पष्टीकरण - प्रस्तुत उक्ति महाकवि भारवि कृत किरातार्जुनीयम् के प्रथम सर्ग का चतुर्थ श्लोक है।

कथानक के अनुसार 'युधिष्ठिर' ने दुर्योधन के प्रजा के प्रति व्यवहार को जानने के लिये एक किरात(वनेचर) को भेजा था। उसके लौट ने के बाद उसका कथन ही प्रस्तुत श्लोक है।

चारचक्षुषः का अर्थ है - गुप्तचर ही नेत्र है जिनके ऐसे गुप्तचरों के द्वारा देखने वाले। 'प्रभवः' (राजा) का विशेषण है।

  • गुप्तचर राजा के नेत्र होते हैं। जिस प्रकार नेत्र के द्वारा देखा हुआ प्रमाण होता है, उसी प्रकार गुप्तचर का वचन भी राजा के लिये प्रमाण होता है।
  • यहाँ प्रभवः अर्थात् राजा युधिष्ठिर है अतः यह युधिष्ठिरः का ही विशेषण है।

अतः स्पष्ट है कि यहाँ 'युधिष्ठिर' के लिए कहा गया है।

7

सन्धिं करोतु - पितृ + नाम्

  1. ((a))

    पितृनाम् 

  2. ((b))

    पितृणाम्

  3. ((c))

    पित्रानाम्

  4. ((d))

    पितॄणाम्

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Answer: ((d))

पितॄणाम्

प्रश्न अनुवाद - सन्धि कीजिए - पितृ + नाम्

स्पष्टीकरण - 

  • पितृ + नाम् - पितॄणाम्
  • इसमें णत्व सन्धि का विधान हुआ है।

सूत्र - रषाभ्यां नो णः समानपदे

वार्तिक - ऋवर्णात् नस्य णत्वं वाच्यम्

  • पाणिनीय अष्टाध्यायी का सूत्र तथा कात्यायन का वार्तिक इन दोनों के अर्थ को मिलाकर नियम बनता है।
  • यदि एक ही पद में ऋ, र्, ष् से परे न् के स्थान पर ण् आदेश हो जाता है।

उदाहरण -

पितृ + नाम् 

पितृ + ना म् 

पितृ + णाम् (ऋ, र्, ष् से परे न् के स्थान पर ण् आदेश)

पितॄणाम्

अतः 'पितॄणाम्' विकल्प सही है।

8

'कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु’ इतीयं सूक्तिर्विद्यते

  1. ((a))

    मेघदूते

  2. ((b))

    उत्तररामचरिते

  3. ((c))

    अभिज्ञानशाकुन्तले

  4. ((d))

    नीतिशतके

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Answer: ((a))

मेघदूते

प्रश्न अनुवाद - 'कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु’ यह सूक्ति है?

संपूर्ण श्लोक -

धूमज्योतिः सलिलमरुतां संनिपातः क्व मेघः

संदेशार्थाः क्व पटुकरणैः प्राणिभिः प्रापणीयाः ।

इत्यौत्सुक्यादपरिगणयन् गुह्यकस्तं ययाचे

कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु ॥५॥

श्लोकार्थ - 

धुआँ, अग्नि, जल और वायु के संमिश्रण से बना कहाँ यह अचेतन मेघ? और अच्छी इन्द्रियों से युक्त प्राणियों से द्वारा पहुचाये जाने योग्य सन्देश की बातें कहाँ ? दोनों में कितना अन्तर है, फिर भी उत्कण्ठावश यक्ष ने इस अन्तर को बिना विचारे मेघ से सन्देश ले जाने की याचना की, क्योंकि काम से पीडित जन यह चेतन है यह अचेतन है इस प्रकार के विवेक से शून्य स्वाभाविक रूप से हो जाते हैं।

Important Points

स्पष्टीकरण - 

प्रस्तुत श्लोक महाकवि कालिदास महाकवि कालिदास कृत 'मेघदूतम्' की है। यह एक खण्डकाव्य है, जो दो भागों में विभक्त है - पूर्वमेघ और उत्तरमेघ। 'कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु’ यह पूर्वमेघ की सूक्ति है।

अतः 'मेघदूते' विकल्प सही है।

Additional Informationप्रस्तुत श्लोक के पंक्ति 'कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु' यह अर्थान्तरन्यास के लिए प्रसिद्ध है।

कालिदास ने इस पंक्ति में, कामार्त यक्ष चेतन-अचेतन का भेद न देखकर मेघ के द्वारा सन्देश ले जाने के अस्वाभाविक व्यवहार को व्यावहारिक बना दिया है। अतः यह अर्थान्तरन्यास का उत्तम उदाहरण होता है।

9

यत्पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः॥ सूक्तिरियं कस्य ग्रन्थस्य ?

  1. ((a))

    किरातार्जुनीयस्य

  2. ((b))

    नीतिशतकस्य

  3. ((c))

    उत्तररामचरितस्य

  4. ((d))

    शिवराजविजयस्य

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Answer: ((b))

नीतिशतकस्य

प्रश्न अनुवाद - यत्पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः॥ यह सूक्ति किस ग्रन्थ की है ?

स्पष्टीकरण - 

  • 'यत्पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः' यह उक्ति भर्तृहरि कृत 'नीतिशतकम्' की है।

श्लोक-

पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किम्?

नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं  दूषणम्।।         

धारा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणम्?

यत्पूर्वं विधिना ललाटलिखितं  तन्मार्जितुं कः क्षमः।।

  • अर्थात् करीर के वृक्ष में यदि पत्ते नहीं लगते तो इसमें बसन्त ऋतु का क्या दोष है? उल्लू यदि दिन में नहीं देख पाता तो इसमें सूर्य का क्या दोष है? चातक पक्षी के मुँह में यदि वर्षा की धारा नहीं पड़ती तो इसमें बादल का क्या दोष? विधाता ने जिसके ललाट पर जो पहले लिख दिया है, उसे मिटाने में कौन समर्थ हो सकता है? अर्थात अर्थात् कोई नहीं।
  • इस उक्ति का अर्थ है - विधाता ने जिसके ललाट पर जो पहले लिख दिया है, उसे मिटाने में कौन समर्थ हो सकता है? अर्थात अर्थात् कोई नहीं।
  • नीतिशतकम् भर्तृहरि के तीन प्रसिद्ध शतकों जिन्हें कि 'शतकत्रय' कहा जाता है, उनमें से एक है। इसमें नीति सम्बन्धी सौ श्लोक है।
  • नीतिशतक में भर्तृहरि ने अपने अनुभवों के आधार पर तथा लोक व्यवहार पर आश्रित नीति सम्बन्धी श्लोकों की रचना की है।

 

अतः यहाँ 'नीतिशतकस्य' विकल्प सही है। 

Additional Informationविकल्पों का स्पष्टीकरण - 

1.किरातार्जुनीयस्य -

  • किरातार्जुनीयम् (किरात और अर्जुन की कथा) महाकवि भारवि द्वारा सातवीं शती ई. में रचित महाकाव्य है जिसे संस्कृत साहित्य के 'वृहत्त्रयी' में स्थान प्राप्त है।
  • महाभारत में वर्णित किरात वेशधारी शिव के साथ अर्जुन के युद्ध की लघुकथा को आधार बनाकर कवि ने राजनीति, धर्मनीति, कूटनीति, समाजनीति, युद्धनीति, जनजीवन आदि का मनोरम वर्णन किया है।
  • यह काव्य विभिन्न रसों से ओतप्रोत रचना है किन्तु वीर रस प्रधान है।

2.उत्तररामचरितस्य -

  • उत्तररामचरितम् महाकवि भवभूति का प्रसिद्ध संस्कृत नाटक है, जो सात अंकों में राम के उत्तर जीवन की कथा है।
  • इसमें रामराज्यमिषेक के पश्चात् जीवन का लोकोत्तर चरित वर्णित है जो महावीरचरित का ही उत्तर भाग माना जाता है।
  • संस्कृत नाट्यसाहित्य में मर्यादापुरषोत्तम श्री रामचन्द्र के पावन चरित्र से सम्बद्ध अनेक नाटक है किन्तु उनमें भवभूति का उत्तरराम चरितम् अपना एक अलग ही वैशिष्ट्य रखता है।

3.शिवराजविजयस्य -

  • शिवराजविजय' एक ऐतिहासिक उपन्यास है।
  • महाकवि अम्बिकादत्य व्यास द्वारा विरचित 'शिवराजविजय' को संस्कृत साहित्य का प्रथम ऐतिहासिक उपन्यास होने का सौभाग्य प्राप्त है।
  • शिवराजविजय की कथावस्तु ऐतिहासिक है इसका कथानक इतिहासक प्रसिद्ध महाराष्ट्र शिरोमणि शिवाजी के दस वर्षों की जीवनी पर आधारित है।
10

महौजसो मानधना धनार्चिता 

धनुर्भृतः संयति लब्धकीर्तयः । 

इत्यत्र 'संयति' पदे किं रूपम् ?

  1. ((a))

    सप्तमीविभक्तिः, एकवचनम् 

  2. ((b))

    प्रथमाविभक्तिः, एकवचनम्

  3. ((c))

    द्वितीयाविभक्तिः, द्विवचनम्

  4. ((d))

    सप्तमीविभक्तिः, बहुवचनम्

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Answer: ((a))

सप्तमीविभक्तिः, एकवचनम् 

प्रश्न अनुवाद -

महौजसो मानधना धनार्चिता 

धनुर्भृतः संयति लब्धकीर्तयः। इसमें 'संयति' पद का क्या रूप है ?

स्पष्टीकरण - प्रस्तुत पंक्ति किरातार्जुनीयम् महाकाव्य से है। जहाँ श्लोक इस प्रकार है-

श्लोक-

महौजसो मानधना धनार्चिता धनुर्भृतः संयति लब्धकीर्तयः

न संहतास्तस्य न भेदवृत्तयः प्रियाणि वाञ्छन्त्यसुभिः समीहितुम्।।

अर्थ: महाबलशाली, अपने कुल एवं शील का स्वाभिमान रखने वाले, धन-सम्पत्ति द्वारा सत्कृत, युद्धभूमि में कीर्ति प्राप्त करने वाले, परोपकार परायण  तथा एक कार्य में सब के सब लगे रहने वाले धनुर्धारी शूरवीर उस दुर्योधन को अपने प्राणों से (भी) प्रिय करने की अभिलाषा रखते हैं।

  • 'संयति' अर्थात् युद्ध/युद्धभूमि में
  • संयत का अर्थ -  किसी प्रकार की सीमा या मर्यादा में रहने और उसका उल्लंघन न करने वाला।
  • संयत शब्द तकारान्त पुल्लिङ्ग शब्द है। जिसके रूप भूभूत् (राजा) के समान चलते हैं।
  • संयत शब्द की सप्तमी विभक्ति-बहुवचन में 'संयति' पद बनता है।

 

अतः स्पष्ट है कि यहाँ संयति पद में सप्तमी विभक्ति-एकवचन उचित विकल्प है। 

Additional Information

संयत तकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दरूप का प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमासंयत्संयतौसंयतः
द्वितीयासंयतम्संयतौसंयतः
तृतीयासंयतासंयद्भ्याम्संयद्भिः
चतुर्थीसंयतेसंयद्भ्याम्संयद्भ्यः
पंचमीसंयतःसंयद्भ्याम्संयद्भ्यः
षष्ठीसंयतःसंयतोःसंयताम्
सप्तमीसंयतिसंयतोःसंयत्सु
सम्बोधनहे संयत्!हे संयतौ!हे संयतः!
11

दा धातोः लटि प्रथमपुरुषस्य बहुवचने रूपमस्ति-

  1. ((a))

    ददति 

  2. ((b))

    ददासि 

  3. ((c))

    दत्थः

  4. ((d))

    दत्थ 

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Answer: ((a))

ददति 

प्रश्नानुवाद - दा धातु का लट् लकार में, प्रथम पुरुष के बहुवचन में रूप है -

स्पष्टीकरण - दा (देना) धातु का लट् लकार के प्रथम पुरुष बहुवचन में ददति रूप बनता है।

अतः यहाँ ददति उचित विकल्प होगा।

Additional Informationदा (देना) धातु का लट्लकार में प्रयोग निम्नलिखित है-

पुरूषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमपुरूषददातिदत्तःददति
मध्यमपुरूषददासिदत्थःदत्थ
उत्तमपुरूषददामिदद्वःदद्मः
12

किरातार्जुनीयस्य प्रथम सर्गस्य अन्तिमं पद्यं केन छन्दसा निबद्धोऽस्ति ?

  1. ((a))

    वंशस्थ-छन्दसा

  2. ((b))

    उपजाति-छन्दसा

  3. ((c))

    आर्या-छन्दसा 

  4. ((d))

    मालिनी-छन्दसा

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Answer: ((d))

मालिनी-छन्दसा

प्रश्न अनुवाद - किरातार्जुनीयम् के प्रथम सर्ग के अन्तिम पद्य किस छन्द में निबद्ध है ?

स्पष्टीकरण - किरातार्जुनीयम् के प्रथम सर्ग के अन्तिम पद्य मालिनी छन्द में निबद्ध है। 

  • किरातार्जुनीयम् महाकवि भारवि की कृति है।
  • किरातार्जुनीयम् ग्रन्थ बृहत्रयी के अन्तर्गत है।
  • किरातार्जुनीयम् ग्रन्थ में 46 श्लोक है।
  • किरातार्जुनीयम् के प्रथम सर्ग में 1 से 44वें तक के श्लोकों में वंशस्थ छन्द है।
  • किरातार्जुनीयम् के प्रथम सर्ग के 45वें श्लोक में पुष्पिताग्रा छन्द है।
  • किरातार्जुनीयम् के प्रथम सर्ग के 46वें श्लोक में मालिनी छन्द है।

अत: 'मालिनी-छन्दसा' विकल्प सही है।  

Additional Information

मालिनी छन्द -

  • लक्षण - 'ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकै:'
  • मालिनी छन्द एक सम वर्ण वृत छन्द है।
  • इसके प्रत्येक चरण में दो नगण, एक मगण और दो यगण के क्रम से 15 वर्ण होते है।
  • आठवें और सातवें वर्णों पर यति होती है।
13

'अतिनिद्रम्' इत्यस्मिन् समासे अति अव्ययं कस्मिन् अर्थे प्रयुक्तमस्ति ?

  1. ((a))

    विभक्त्यर्थे

  2. ((b))

    शब्दप्रादुर्भावार्थे

  3. ((c))

    असम्प्रति- अर्थे

  4. ((d))

    यौगपद्य-अर्थे

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Answer: ((c))

असम्प्रति- अर्थे

प्रश्न अनुवाद - 'अतिनिद्रम्' इस समास में अति अव्यय किस अर्थ में प्रयुक्त है ?

स्पष्टीकरण - 'अतिनिद्रम्' इस समास में अति अव्यय असम्प्रति अर्थ में प्रयुक्त है।

  • 'अतिनिद्रम्' अव्ययीभाव समास का उदाहरण है।
  • सूत्र - 'अव्ययं विभक्ति - समीप - समृद्धि - व्यृद्धि - अर्थाभाव - अत्यय - असम्प्रति - शब्दप्रादुर्भाव - पश्चात् - यथा - आनुपूर्व - यौगपद्य - सादृश्य - सम्पत्ति - साकल्य - अन्तवचनेषु'
  • अर्थात् समीप, समृद्धि आदि इन अर्थानुकूल अव्ययों के साथ समास हो तो वह अव्ययीभाव समास होता है।
  • अतिनिद्रम् - निद्रा सम्प्रति न युज्यते
  • असम्प्रति 'इस समय उचित नहीं' अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।

अत: 'असम्प्रति- अर्थे' विकल्प सही है।

14

''आशाबन्धः कुसुमसदृशं प्रायशो ह्यङ्ग्नानां  

सद्यःपाति प्रणयिहृदयं विप्रयोगे रुणद्धि।।” 

इतीयं सूक्तिर्विद्यते-

  1. ((a))

    नीतिशतके

  2. ((b))

    अभिज्ञानशाकुन्तले

  3. ((c))

    उत्तररामचरिते

  4. ((d))

     मेघदूते

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Answer: ((d))

 मेघदूते

प्रश्न अनुवाद - ''आशाबन्धः कुसुमसदृशं प्रायशो ह्यङ्ग्नानां  

सद्यःपाति प्रणयिहृदयं विप्रयोगे रुणद्धि।।” यह सूक्ति है -

स्पष्टीकरण - यह सूक्ति मेघदूत की है। 

श्लोक-

आशाबन्धः कुसुमसदृशं प्रायशो ह्यङ्गनानां

सद्य:पाति प्रणयिहृदयं विप्रयोगे रुणद्धि॥

  • अर्थात् आशा के बन्धन में बंधी हुई स्त्रियाँ वियोग के दिनों को एक-एक करके व्यतीत करती रहती है। इस प्रकार विरह की अवधि शनैः-शनैः समाप्त हो जाती है।
  • यह सूक्ति कविश्रेष्ठ कालिदास विरचित मेघदूत नामक खण्डकाव्य से उद्धृत है।

अतः यहाँ 'मेघदूते' विकल्प सही है।

Additional Information

अन्य विकल्प -

1. नीतिशतके -

  • नीतिशतकम् भर्तृहरि के तीन प्रसिद्ध शतकों जिन्हें कि 'शतकत्रय' कहा जाता है, उनमें से एक है। इसमें नीति सम्बन्धी सौ श्लोक है।
  • नीतिशतक में भर्तृहरि ने अपने अनुभवों के आधार पर तथा लोक व्यवहार पर आश्रित नीति सम्बन्धी श्लोकों की रचना की है।
  • एक ओर तो उन्होनें अज्ञता, लोभ, धन, दुर्जनता, अहंकार आदि की निन्दा की है तो दूसरी ओर विद्या, सज्जनता, उदारता, स्वाभिमान, सहनशीलता, सत्य आदि गुणों की प्रशंसा भी की है।

2. अभिज्ञानशाकुन्तले -

  • अभिज्ञान शाकुन्तलम् महाकवि कालिदास का विश्वविख्यात नाटक है।
  • इसमें राजा दुष्यन्त तथा शकुन्तला के प्रणय, विवाह, विरह, प्रत्याख्यान तथा पुनर्मिलन की एक सुन्दर कथा है।
  • पौराणिक कथा में दुष्यन्त को आकाशवाणी द्वारा बोध होता है पर इस नाटक में कवि ने मुद्रिका द्वारा इसका बोध कराया है।

3. उत्तररामचरिते -

  • उत्तररामचरितम् महाकवि भवभूति का प्रसिद्ध संस्कृत नाटक है, जो सात अंकों में राम के उत्तर जीवन की कथा है।
  • इसमें रामराज्यमिषेक के पश्चात् जीवन का लोकोत्तर चरित वर्णित है जो महावीरचरित का ही उत्तर भाग माना जाता है।
  • संस्कृत नाट्यसाहित्य में मर्यादापुरषोत्तम श्री रामचन्द्र के पावन चरित्र से सम्बद्ध अनेक नाटक है किन्तु उनमें भवभूति का उत्तरराम चरितम् अपना एक अलग ही वैशिष्ट्य रखता है।
15

'गम्' इति धातोर्लट्लकारे मध्यमपुरुषस्य द्विवचने रूपं भवति-

  1. ((a))

    गच्छतः

  2. ((b))

    गच्छथ

  3. ((c))

    गच्छथः

  4. ((d))

    गच्छाव:

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Answer: ((c))

गच्छथः

प्रश्नानुवाद - 'गम्' इस धातु का लट्लकार में मध्यम पुरुष के द्विवचन में रूप होता है-

स्पष्टीकरण - गम् (जाना) धातु का लट् लकार (वर्तमान काल) के मध्यम पुरुष द्विवचन में गच्छथः रूप बनता है।

अतः यहाँ गच्छथः उचित विकल्प होगा।

Additional Informationगम् (जाना) धातु का लट्लकार में प्रयोग निम्नलिखित है-

पुरूषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमपुरूषगच्छतिगच्छतःगच्छन्ति
मध्यमपुरूषगच्छसिगच्छथःगच्छथ
उत्तमपुरूषगच्छामिगच्छावःगच्छामः
16

'हरेऽव' इत्यत्र सन्धिकारकं सूत्रमस्ति-

  1. ((a))

    एङः पदान्तादति

  2. ((b))

    अवङ् स्फोटायनस्य

  3. ((c))

    वान्तो यि प्रत्यये

  4. ((d))

    एचोऽयवायावः

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Answer: ((a))

एङः पदान्तादति

प्रश्नानुवाद - 'हरेऽव' यहाँ सन्धि कारक सूत्र है- 

स्पष्टीकरण -

  • हरेऽव में पूर्वरूप सन्धि है।
  • शब्द - हरेऽव
  • विग्रह - हरे + अव

 

सूत्र - एङ पदान्तादति।

  • नियम - यदि किसी पद (सुबन्त या तिङन्त) के अन्त में ए या ओ आवे और उसके बाद अ हो तो, वहाँ ए या ओ को वैसा ही रूप रहता है, तथा अ के स्थान पर पूर्वचिन्ह लगाया जाता है।

उदाहरण-

  • वृक्षे + अस्मिन् - वृक्षेऽस्मिन् (यहाँ प्रथम पद के सुबन्त पद अन्त में ए + बाद में अ आया है, जहाँ अ के स्थान पर पूर्वचिन्ह ऽ आदेश हो गया।
  • यहीं नियम हरेऽव शब्द में लगा है। (जहाँ प्रथम पद के अन्त में ए + बाद में अ स्वर है, जिससे हरेऽव बना)

 

अतः यहाँ 'एङ पदान्तादति।' इस सूत्र से पूर्वरूप सन्धि सही उत्तर है।

17

'पुटपाकप्रतीकाशो रामस्य करुणो रसः' इतीयमुक्तिरस्ति उत्तररामचरिते 

  1. ((a))

    मुरलायाः

  2. ((b))

    तमसायाः

  3. ((c))

    गोदावर्याः

  4. ((d))

    सीतायाः

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Answer: ((a))

मुरलायाः

प्रश्न अनुवाद - 'पुटपाकप्रतीकाशो रामस्य करुणो रसः' यह उक्ति उत्तररामचरित में किसकी है -

स्पष्टीकरण - 

  • ​यह उक्ति गोदावरी की सहायक मुरला नदी का दूसरी सहायक तमसा नदी से है।

अङ्क के आरम्भ में ही मुरला राम के शोक को पुटपाक के सदृश बताती है -

अनिर्भिन्नो गभीरत्वादन्तर्गूढघनव्यथः।

पुटपाकप्रतीकाशो रामस्य करुणो रसः।।

  • अर्थात् गम्भीरता के कारण अव्यक्त अन्दर छिपी हुई वेदना से युक्त राम का 'करुण रस' पुटपाक के समान है।
  • 'पुटपाकप्रतीकाशो रामस्य करुणो रसः' अर्थात् राम का करुण रस पुटपाक की औषधि की तरह है।
  • जहां सुदृढ़ता के कारण पुटपाक टूटता तो नहीं लेकिन भीतर के ताप से औषधि को पिघलाकर द्रवीभूत कर देता है। वैसे ही जैसे राम की व्यथा आवेग के ताप से मर्म को पिघलाती भीतर ही भीतर उबलती-फैलती है, लेकिन बाहर नहीं आ सकती।

अत: 'मुरलायाः' विकल्प सही है। 

Important Points

उत्तररामचरिते -

  • उत्तररामचरितम् महाकवि भवभूति का प्रसिद्ध संस्कृत नाटक है, जो सात अंकों में राम के उत्तर जीवन की कथा है।
  • इसमें रामराज्यमिषेक के पश्चात् जीवन का लोकोत्तर चरित वर्णित है जो महावीरचरित का ही उत्तर भाग माना जाता है।
  • संस्कृत नाट्यसाहित्य में मर्यादापुरषोत्तम श्री रामचन्द्र के पावन चरित्र से सम्बद्ध अनेक नाटक है किन्तु उनमें भवभूति का उत्तरराम चरितम् अपना एक अलग ही वैशिष्ट्य रखता है।
18

'मैं पात्र से जल पीता हूँ' इत्यस्य वाक्यस्य संस्कृतेन कर्मवाच्ये किं रूपं भवति ?

  1. ((a))

    पात्रेणाहं जलं पिबामि।

  2. ((b))

    पात्रेणाहं जलं पीयते।

  3. ((c))

    मया पात्रेण जलं पीयते।

  4. ((d))

    मया पात्रं जलं पीयते।

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Answer: ((c))

मया पात्रेण जलं पीयते।

प्रश्नानुवाद - 'मैं पात्र से जल पीता हूँ।' इस वाक्य का संस्कृत से कर्मवाच्य में क्या रूप होता है ?

स्पष्टीकरण - मैं पात्र से जल पीता हूँ। इस वाक्य का कर्तृवाच्य में संस्कृतानुवाद होगा - अहं पात्रेण जलं पिबामि। (पात्रेण में तृतीया लगी क्योंकि पात्र के द्वारा जल पिया जाता है।) यहाँ कर्तृवाच्य में क्रिया कर्ता के अनुसार है और कर्म (जल) में द्वितीया लगी है। जबकि पात्र से जल पिया जाता है, इसलिए उसमें तृतीया है।

  • अहं पात्रेण जलं पिबामि। - इस वाक्य को कर्मवाच्य में परिवर्तित करने पर वाक्य बनेगा - मया पात्रेण जलं पीयते
  • वाक्य को कर्मवाच्य में परिवर्तित करने पर - कर्ता में तृतीया विभक्ति होगी (मया), कर्म में प्रथमा होगी (जलं) और क्रिया कर्म के अनुसार सदैव आत्मनेपद होगी (पीयते)। पात्र से (पात्रेण) जल पीता है, इसलिए उसमें कोई परिवर्तन नहीं होगा।
  • इस तरह कर्मवाच्य में वाक्य होगा - मया पात्रेण जलं पीयते।

 

अतः स्पष्ट है कि यहाँ मया पात्रेण जलं पीयते संस्कृत में उचित कर्मवाच्य रूप होगा।

Additional Information

संस्कृत में तीन वाच्य होते हैं। 1. कर्तृवाच्य, 2. कर्मवाच्य, 3. भाववाच्य

वाच्यनियमउदाहरण
कर्तरिवाच्यकर्ता + कर्म में द्वितीया विभक्ति + कर्ता के अनुसार क्रिया का पुरुष एवं वचनरामः   पुस्तकं   पठति। कर्ता + कर्म + क्रिया
कर्मवाच्यकर्ता में तृ.वि. + कर्म में प्रथमा विभक्ति (एक., द्वि., बहु.) + क्रिया का वचन कर्म के अनुसार (आत्मनेपद में)छात्रैः   पुस्तकानि   पठ्यन्ते। कर्ता में तृ.वि. + प्रथमा विभक्ति (एक., द्वि., बहु.) + क्रिया का वचन कर्म के अनुसार (आत्मनेपद में)
भाववाच्यकर्ता में तृ.वि. + क्रिया में प्रथमपुरुष एकवचन (आत्मनेपद में) (यह अकर्मक क्रियाओं में होता है।)रामेण हस्यते। कर्ता में तृ.वि. + क्रिया में प्रथम पुरुष-एकवचन (आत्मनेपद में)
19

लब्धापि का दुःखेन संरक्ष्यते ? 

  1. ((a))

    विद्या

  2. ((b))

    शक्ति

  3. ((c))

    स्मृतिः

  4. ((d))

    लक्ष्मीः

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Answer: ((d))

लक्ष्मीः

प्रश्न अनुवाद - कौन प्राप्त होकर भी कष्टपूर्वक रक्षा की जाती है।  ?

स्पष्टीकरण - 

  • लक्ष्मी प्राप्त होकर भी कष्टपूर्वक रक्षा की जाती है।
  • यह कथन बाणभट्ट द्वारा रचित शुकनासोपदेश से ली गयी है।
  • लक्ष्मी के बारे में कहा गया है - इस संसार में ऐसी कोई वस्तु अपरिचित नहीं है जिससे कि यह लक्ष्मी परिचित न हो।

अत: 'लक्ष्मीः' विकल्प सही है

Important Points

शुकनासोपदेश -

  • शुकनासोपदेश (शुकनास का उपदेश), कादम्बरी का ही एक अंश है।
  • यह एक ऐसा उपदेशात्मक ग्रंथ है जिसमें जीवन दर्शन का एक भी पक्ष बाणभट्ट की दृष्टि से ओझल नहीं हो सका।
  • इसमें राजा तारापीड का नीतिनिपुण एवं अनुभवी मन्त्री शुकनास राजकुमामार चन्द्रापीड को राज्याभिषेक के पूर्व वात्सल्य भाव से उपदेश देते है और रूप, यौवन, प्रभुता तथा ऐश्वर्य से उद्भूत दोषों से सावधान रहने की शिक्षा देते है।
20

मृतयवनस्य कञ्चुकात् किं प्राप्तम् ?

  1. ((a))

    पत्रम्

  2. ((b))

    रत्नम्

  3. ((c))

    छुरिका

  4. ((d))

    मानचित्रम्

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Answer: ((a))

पत्रम्

प्रश्न अनुवाद - मृतयवन के वस्त्रों से क्या प्राप्त हुआ ?

स्पष्टीकरण - 

  • उक्त उक्ति अम्बिकादत्त व्यास द्वारा कृत 'शिवराजविजय' की है।

शिवाजी गौरसिंह से अफजलखां के विषय में पूछ्ते है -

  • गौरसिंह कहते है - "अवगत: तत्पत्रमेव दर्शयामि" इति व्याह्यत्य, उष्णोशसन्धौ स्थापितं कन्यापहारक - यवन - युवक - मृत - शरीरवस्त्रान्त प्राप्तं पत्रं बहिश्चकार।
  • अर्थात् हां ज्ञात हुआ, उसका पत्र ही दिखाता हूं। यह कहकर पगडी के अन्दर रखे हुए कन्या का अपहरण करने वाले यवन युवक के मृत शरीर के वस्त्रों के अन्दर से प्राप्त पत्र को बाहर निकाला।
  • गौरसिंह के कथन से स्पष्ट है कि मृतयवन के वस्त्रों से पत्र प्राप्त हुआ।

अत: 'पत्रम्' विकल्प सही है।

Additional Information

शिवराजविजय -

  • शिवराजविजय एक ऐतिहासिक उपन्यास है।
  • महाकवि अम्बिकादत्त व्यास द्वारा विरचित 'शिवराजविजय' को संस्कृत साहित्य का प्रथम ऐतिहासिक उपन्यास होने का सौभाग्य प्राप्त है।
  • शिवराजविजय की कथावस्तु ऐतिहासिक है। इसका कथानक इतिहासक प्रसिद्ध महाराष्ट्र शिरोमणि शिवाजी के दस वर्षों की जीवनी पर आधारित है।
  • शिवराजविजय की सम्पूर्ण कथा तीन विराम,12 नि:श्वासों में विभक्त है।
21

'सन्तप्तानां त्वमसि शरणम्' - अत्र सन्तप्तानां रक्षकः-

  1. ((a))

    भोलेनाथः

  2. ((b))

    कुबेरः

  3. ((c))

    मेघः

  4. ((d))

    यक्षः

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Answer: ((c))

मेघः

प्रश्न अनुवाद- सन्तप्तानां त्वमसि शरणम्' यहाँ सन्तप्तों के रक्षक है -

स्पष्टीकरण-  यहाँ सन्तप्तों का रक्षक मेघ को कहा गया है। प्रस्तुत पंक्ति मेघदूत काव्य के श्लोक में उद्धृत है। जहाँ यक्ष मेघ को उसका सन्देश उसकी प्रिया तक पहुँचाने का अनुरोध करता है।

मेघदूत की रचना महाकवि कालिदास द्वारा की गयी।

श्लोक -

सन्तप्तानां त्वमसि शरणं तत्पयोद ! प्रियायाः

सन्देशं मे हर धनपतिक्रोधविश्लेषितस्य ।

गन्तव्या ते वसतिरलका नाम यक्षेश्वराणां

बाह्योद्यानस्थितहरशिरश्चन्द्रिकाधौतहर्म्या।।

अर्थ - हे मेघ! तुम सन्तप्त अर्थात ताप से पीड़ित लोगों को शरण देने वाले हो। कुबेर से वियुक्त हो चुके मेरे सन्देश को मेरी प्रिया तक ले जाओ। तुम्हें यक्षेश्वरों के बाहर के उद्यान में स्थित शिव के सिर की चन्द्रमा की चाँदनी से प्रकाशित महलों वाली अलकापुरी नामक नगरी में जाना है।

इस तरह श्लोक से स्पष्ट है, अतः यहाँ मेघ उचित विकल्प है।

22

अर्थो हि कन्या परकीय एव - इत्यस्मिन् श्लोके छन्दः-

  1. ((a))

    इन्द्रवज्रा

  2. ((b))

    उपजाति

  3. ((c))

    आर्याजाति

  4. ((d))

    वंशस्थ

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Answer: ((a))

इन्द्रवज्रा

प्रश्न का अनुवाद- अर्थो हि कन्या परकीय एव - इस श्लोक में छंद है-

स्पष्टीकरण - अर्थो हि कन्या परकीय एव - यह पंक्ति अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक के श्लोक की है। इस पंक्ति में इन्द्रवज्रा छन्द है।

इन्द्रवज्रा छन्द-

  • जिस छन्द में चारों पादों में पहला-पहला वर्ण गुरु होता है, तो वहाँ इन्द्रवज्रा छन्द होता है।
  • लक्षण - स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः। अर्थात् इन्द्रवज्रा के प्रत्येक चरण में दो तगण, एक जगण और दो गुरु के क्रम से वर्ण रखे जाते हैं।

Key Pointsअर्थो हि कन्या परकीय एव तामद्य सम्प्रेष्य परिगृहीतुः।

जातो ममायं विशदः प्रकामं प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा॥

यह श्लोक अभिज्ञान शाकुंतलम् के चतुर्थ अंक से है। जिसमें महर्षि कण्व ने कहा है -

'अर्थो हि कन्या परकीय एव' अर्थात् कन्या पराया धन होता है। यह शकुंतला विदाई के समय का वर्णन है। यह महाकवि कालिदास की रचना है। 

अतः यह स्पष्ट होता है कि 'अर्थो हि कन्या परकीय एव' इस श्लोक में इन्द्रवज्रा छन्द है।

23

मेघदूतस्य शैल्यां त्रयोदश-शताब्द्यां 

वेदान्तदेशिककृतरामकथाविषयकदूतकाव्यस्य 

नाम

  1. ((a))

    हनुमतदूतम्

  2. ((b))

    कपिदूतम्

  3. ((c))

    हंससन्देशम्

  4. ((d))

    भ्रमरदूतम्

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Answer: ((c))

हंससन्देशम्

प्रश्न अनुवाद- मेघदूत शैली में तेरहवीं शताब्दी में वेदांत देशिक कृत राम कथा विषयक दूतकाव्य का नाम है-

स्पष्टीकरण- मेघदूत की शैली में तेरहवीं शताब्दी में वेदांत देशिक द्वारा विरचित राम कथा विषयक दूतकाव्य का नाम हंससन्देशम् है। 

  • दूत काव्य संस्कृत काव्य की एक विशिष्ट परंपरा है। इसका आरंभ भास तथा घटकर्पर के काव्यों और महाकवि कालिदास के 'मेघदूत' में मिलता है। तथापि इसके बीज और अधिक पुराने प्रतीत होते हैं।
  • परिनिष्ठित काव्यों में वाल्मीकि द्वारा वर्णित वह प्रसंग, जिसे राम ने सीता के पास अपना विरह संदेश भेजा था। इसे इस परंपरा की आदि कड़ी माना जाता है।
  • स्वयं कालिदास ने भी अपने मेघदूत में इस बात का संकेत किया है कि उन्हें मेघ को दूत बनाने की प्रेरणा वाल्मीकि रामायण के हनुमान वाले प्रसंग से मिली है।
  • दूसरी और इस परंपरा के बीज लोक काव्यों में भी स्थित जान पड़ते हैं, जहाँ विरही और विरहिणियाँ अपने अपने प्रेम पात्रों के पति भ्रमर, शुक, चातक, काक आदि पक्षियों के द्वारा संदेश ले जाने का विनय करती मिलती हैं।

Key Points

हंससन्देशम्

  • हंस-संदेश या हंस का संदेश 13वीं शताब्दी में वेदांत देशिका द्वारा लिखी गई एक संस्कृत प्रेम कविता है।
  • 110 छंदों वाली यह एक छोटी गीत कविता, यह वर्णन करती है कि रामायण महाकाव्य के नायक राम अपनी भार्या सीता को हंस के माध्यम से एक संदेश भेजते हैं, जिसे राक्षस राजा रावण ने अपहरण कर लिया है।
  • कविता के अंतर्गत आता है - संदेश काव्य "दूत कविता" शैली और बहुत बारीकी पर आधारित है।
  • श्रीवैष्णवों के लिए इसका विशेष महत्व है, जिनके देवता विष्णु इसे मनाते हैं।
  • वेदांत देशिका का मेघदूत का उपयोग व्यापक और पारदर्शी रूप से जानबूझकर किया गया है।
  • उनकी कविता अपने सबसे प्रसिद्ध कवि द्वारा भारत की सबसे प्रसिद्ध कविताओं में से एक की प्रतिक्रिया है।
  • वाल्मीकि के प्रति वेदांत देशिका का ऋण शायद अधिक व्यापक है, लेकिन कम स्पष्ट है और संभवतः कम जानबूझकर भी। जहाँ कवि सचेतन रूप से कालिदास के छंद के साथ खेलता है, वह रामायण को एक बहुप्रशंसित कहानी मानता है। फिर भी वह स्पष्ट रूप से वाल्मीकि की कविता के विवरण से उतना ही परिचित है, जितना की कालिदास के साथ और वह महाकाव्य से बहुत विशिष्ट छवियों और विवरणों को प्रतिध्वनित करता है।
  • वेदांत देशिका को दक्षिण भारत की श्रीवैष्णव परंपरा में एक महत्वपूर्ण आचार्य के रूप में जाना जाता है, जिसने विशिष्टाद्वैत के दार्शनिक सिद्धांत को प्रख्यापित किया।
  • वे तमिल और संस्कृत दोनों में एक विपुल लेखक थे, जिन्होंने 100 से अधिक दार्शनिक, भक्ति और साहित्यिक कार्यों की रचना की। हंस-सन्देश उन्हीं रचनाओं में से एक है।

 

अतः कहा जा सकता है कि वेदांत देशिका राम कथा विषयक दूतकाव्य का नाम हंससंदेशम् है।

24

समासं करोतु - कृष्णं आश्रितः

  1. ((a))

    कृष्णाश्रितः

  2. ((b))

    कृष्णश्रितः

  3. ((c))

    कृष्णेश्रितः

  4. ((d))

    कृष्णीश्रितः

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Answer: ((a))

कृष्णाश्रितः

प्रश्नानुवाद - समास करें - कृष्णं आश्रितः

स्पष्टीकरण -

पद - कृष्णाश्रितः

समासविग्रह - कृष्णं श्रितः

स्पष्टीकरण - 'कृष्णाश्रितः' का अर्थ होता है, 'कृष्ण पर आश्रित'। इस पद में उत्तरपद 'श्रित' प्रधान है।

'द्वितीया श्रितातीतपतितगतात्यस्तप्राप्तापन्नैः' सूत्र के अनुसार श्रित, अतीत, पतित, गत, अत्यस्त, प्राप्त, आपन्न इन शब्दों के योग में द्वितीया तत्पुरुष समास होता है।

अतः यहाँ 'श्रित' पद के योग में तत्पुरुष समास उचित विकल्प है।

 Additional Information

‘समसनं समासम्’ संक्षिप्त करना ही समास होता है अर्थात् दो या दो से अधिक पदों के विभक्ति, समुच्चय बोधक च आदि को संक्षेप करके एक पद बनाने को समास कहते है- ‘अनेकाषां पदानां एकपदी भवनं समासः।’ इसमें पूर्व और उत्तर दो पद होते हैं। यथा-

  • पित्रा युक्तः = पितृयुक्तः
  • यूपाय दारु = यूपदारु
  • माता च पिता च = पितरौ
<br>

समास भेद:- प्रायः समास के पाँच प्रकार बताये गए हैं-

(1) केवलसमास:- ‘विशेषसंज्ञाविनिर्मुक्तः केवल समासः’ अर्थात् विशेष संज्ञा रहित जहाँ केवल समास हो। जैसे:- पूर्वं भूतः = भूतपूर्वः

(2) अव्ययीभाव:- ‘प्रायेण पूर्वपदार्थप्रधानोऽव्ययीभावो’ अर्थात् जहाँ पूर्व पद प्रधान हो तथा अव्यय हो। जैसे:- मतिम् अनतिक्रम्य = यथामति

(3) तत्पुरुष:- ‘उत्तरपदार्थप्रधानस्तत्पुरुषः’ अर्थात् जहाँ उत्तरपद प्रधान हो दोनों पद में अलग-अलग और कभी-कभी समान विभक्ति होती है तथा पूर्वपद के विभक्ति का लोप होता है।

तत्पुरुष समास के भेद:- इसके दो भेद होते हैं-

A) व्याधिकरण तत्पुरुष:- इसके सात प्रकार होते हैं-

द्वितीया तत्पुरुष:- श्रित, अतीत, आगतादि शब्द यदि उत्तरपद हो तो द्वितीया तत्पुरुष समास होता है। जैसे:-

  • कृष्णं श्रितः = कृष्णश्रित

तृतीया तत्पुरुष:- हीन, विद्ध आदि शब्द यदि उत्तरपद हो तो तृतीया तत्पुरुष समास होता है। जैसे:-

  • सर्पेण दष्टः = सर्पदष्टः

चतुर्थी तत्पुरुष:- बलि, अर्थ, तदर्थ आदि शब्द यदि उत्तरपद हो तो चतुर्थी तत्पुरुष समास होता है। जैसे:-

  • भूताय बलिः = भूतबलिः

पञ्चमी तत्पुरुष:- भय, मुक्त, पतित आदि शब्द यदि उत्तरपद हो तो पञ्चमी तत्पुरुष समास होता है। जैसे:-

  • चौरद् भयम् = चौरभयम्

षष्ठी तत्पुरुष:- जब समस्त पद में दोनों पद एक दुसरे से सम्बन्धित हो तो षष्ठी तत्पुरुष होता है। जैसे-

  • राज्ञः पुरुषः = राजपुरुषः

सप्तमी तत्पुरुष:- शौण्ड, चतुर, कुशल आदि शब्द यदि उत्तरपद हो तो सप्तमी तत्पुरुष समास होता है। जैसे:-

  • सभायां पण्डितः = सभापण्डितः

नञ् तत्पुरुष:- जहाँ पूर्वपद अ, अन् अथवा न हो वहाँ नञ् तत्पुरुष समास होता है। जैसे:-

  • न ज्ञानम् = अज्ञानम्

B) समानाधिकरण तत्पुरुष:- इसके दो भेद होते हैं-

कर्मधारय:- विशेषण-विशेष्य तथा उपमानोपमेय पदों का परस्पर समास हो तो कर्मधारय समास होता है। जैसे:-

  • नीलम् उत्पलम् = नीलोत्पलम्

द्विगु:- जब विशेषण संख्यावाची हो तो द्विगु समास होता है। जैसे:-

  • त्रयाणां भुवनानां समाहारः = त्रिभुवनम्

(4) द्वन्द्व:- ‘उभयपदार्थप्रधानो द्वन्द्वः’ जहाँ दोनों पद प्रधान हो। इसके विग्रह में च जुडता है।

  • माता च पिता च = पितरौ

(5) बहुव्रीहि:- ‘अन्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिः’ जहाँ अन्य पद प्रधान हो। जैसे:-

  • पीतम् अम्बरं यस्य सः = पीताम्बरः (हरिः)
25

'अपरिणामोपशमो दारुणो लक्ष्मीमदः' इतीयं सूक्तिर्विद्यते-

  1. ((a))

    अभिज्ञानशाकुन्तले

  2. ((b))

    उत्तररामचरिते

  3. ((c))

    कादम्बर्यां शुकनासोपदेशे

  4. ((d))

    नलचम्पूकाव्ये

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Answer: ((c))

कादम्बर्यां शुकनासोपदेशे

प्रश्न अनुवाद- 'अपरिणामोपशमो दारुणो लक्ष्मीमदः' यह सूक्ति है-

स्पष्टीकरण- 'अपरिणामोपशमो दारुणो लक्ष्मीमदः यह सूक्ति कादम्बरी शुकनासोपदेश की है।

  • शुकनासोपदेश में प्रधानमंत्री शुकनास द्वारा दिया गया उपदेश है, वे राजा के पुत्र चन्द्रापीड को देते है। यह वृतान्त बाणभट्ट कृत कादम्बरी गद्यकाव्य में देखने को मिलता है।
  • "अपरिणामोपशमो दारुणो लक्ष्मीमदः" शुकनासोपदेश में यह कथन तारापीड राजा के प्रधानमन्त्री शुकनास का है। जहाँ वे राजा के पुत्र चन्द्रापीड को उपदेश देते हुए कहते हैं -
  • ग्रन्थ की पंक्ति - अपरिणामोशमो दारुणो लक्ष्मीमदः। कष्टमनञ्जनवर्तिसाध्यमपरम् ऐश्वर्यतिमिरान्धत्वम्। अशिशिरोपचारहार्योऽतितीव्रः दर्पदाहज्वरोष्मा।
  • अर्थ - अन्य मद तो कालक्रम से स्वतः ही शान्त हो जाते हैं, किन्तु धन/लक्ष्मी का उन्माद तो मरते दम तक भी शान्त नहीं होता है। तिमिर नामक भयंकर नेत्र रोग भी अञ्जन आदि की चिकित्सा से दूर हो सकता है। किन्तु ऐश्वर्य का अविवेक रूपी गाढ़ अन्धत्व तो अञ्जनादि रूपी किसी भी उपदेशोपचार से दूर नहीं होता है। अन्य प्रकार के ज्वर का ताप तो सामान्य शीतोपचार से भी शान्त हो जाता है। किन्तु अहंकार रूपी ज्वर का ताप तो चन्दन आदि विशिष्ट शीतोपचार से भी शान्त नहीं होता है।

 

अतः स्पष्ट है कि “अपरिणामोपशमो दारुणो लक्ष्मीमदः" यह सूक्ति कादम्बरी में शुकनासोपदेश में उल्लिखित है।

26

उत्तमजनाः किं न परित्यजन्ति ?

(भर्तृहरिमतानुसारम्)

  1. ((a))

    अध्ययनम्

  2. ((b))

    धनार्जनम्

  3. ((c))

    प्रारब्धं कार्यम्

  4. ((d))

    देवार्चनम्

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Answer: ((c))

प्रारब्धं कार्यम्

प्रश्न अनुवाद- उत्तम जन (लोग) किसका परित्याग नहीं करते हैं ? (भर्तृहरि के मतानुसार)

स्पष्टीकरण - उत्तम जन (लोग) प्रारम्भ किये गये कार्य का परित्याग नहीं करते हैं। यह नीति शतक ग्रन्थ के श्लोक में उद्धृत हैं -

श्लोक-

प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः, 

प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।

विघ्नैर्मुहुर्मुहुरपि प्रतिहन्यमानाः,

प्रारब्धमुत्तमजना न परित्यजन्ति।।

अर्थ - निम्न लोग समस्याओं के विघ्नों के भय से कार्य प्रारम्भ ही नहीं करते है। मध्यम श्रेणी के लोग कार्य प्रारम्भ करके विघ्नों के भय से मध्य में ही छोड़ देते हैं। विघ्नों के बार-बार आने पर भी उत्तम श्रेणी के लोग एक बार कार्य आरम्भ करने के बाद कार्य को नहीं छोड़ते हैं। जब तक कि कार्य अपने परिणाम तक न पहुँच जाए।

इस तरह श्लोक से स्पष्ट है, अतः यहाँ प्रारब्धं कार्यम् उचित विकल्प है।

27

'अस्मद्’ शब्दस्य ‘नौ' इत्येतद् रूपं कुत्र भवति ?

  1. ((a))

    द्वितीयाविभक्तौ द्विवचने, बहुवचने च

  2. ((b))

    चतुर्थीविभक्तौ द्विवचने, बहुवचने च

  3. ((c))

    द्वितीयाचतुर्थीषष्ठीविभक्तिषु द्विवचने

  4. ((d))

    षष्ठीविभक्तौ बहुवचने

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Answer: ((c))

द्वितीयाचतुर्थीषष्ठीविभक्तिषु द्विवचने

प्रश्न अनुवाद - अस्मद् शब्द के नौ रूप किस रूप में है?

स्पष्टीकरण -

  • अस्मद् शब्द का अर्थ होता है - मैं
  • अस्मद् शब्द रूप सर्वनाम वाचक होता है।
  • अस्मद् शब्द रूप के पुल्लिंग, स्त्रीलिंग तथा नपुंसकलिंग रूप एक समान होते है।
  • इदम्, अदस्, युष्मद्, अस्मद् शब्दो के रूप मे सर्वनाम का सम्बोधन नहीं होता है।

​अस्मद् शब्द रूप (मैं)

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमाअहम्आवाम्वयम्
द्वितीयामाम्आवाम्/नौअस्मान्
तृतीयामयाआवाभ्याम्अस्माभिः
चतुर्थीमह्यम्आवाभ्याम्/नौअस्मभ्यम्
पञ्चमीमत्आवाभ्याम्अस्मत्
षष्ठीममआवयोः/नौअस्माकम्
सप्तमीमयिआवयोःअस्मासु

 

तालिका से स्पष्ट है कि 'नौ' पद 'द्वितीया', 'चतुर्थी' और 'षष्ठी' विभक्ति के द्विवचन मे आता है। 

अतः स्पष्ट है कि 'द्वितीयाचतुर्थीषष्ठी विभक्तिषु द्विवचने' विकल्प सही है।

28

पठ्धातोः लोटि प्रथमपुरुषैकवचनस्य रूपमस्ति-

  1. ((a))

    पठेत्

  2. ((b))

    पठतात्

  3. ((c))

    अपठत्

  4. ((d))

    पठति

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Answer: ((b))

पठतात्

प्रश्नानुवाद - पठ् धातु का लोट् लकार में प्रथमपुरुष एकवचन का रूप है-

स्पष्टीकरण: पठ् धातु का लोट्लकार के प्रथमपुरुष-एकवचन में पठतु/पठतात् ये दो रूप बनते हैं।

‘पठ्’ धातु से ‘लोट् लकार’ के विविध वचनों और पुरूषों में प्राप्त रूप इस प्रकार है-

पुरूषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमपुरूषपठतु/पठतात्पठताम्पठन्तु
मध्यमपुरूषपठ/पठतात्पठतम्पठत
उत्तमपुरूषपठानिपठावपठाम

 

अतः स्पष्ट है कि ‘लोट् लकार में मध्यम पुरूष, एकवचन’ में ‘पठतात्’ रूप बनता है।

29

'वनेचरः' इत्यत्र कः समासः ?

  1. ((a))

    अव्ययीभावः

  2. ((b))

    अलुक्

  3. ((c))

    तत्पुरुषः

  4. ((d))

    कर्मधारयः

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Answer: ((b))

अलुक्

**प्रश्न अनुवाद- '**वनेचरः' यहाँ कौन सा समास है ?

स्पष्टीकरण - वनेचरः पद में अलुक् तत्पुरुष समास है।

अलुक समास -

  • यह तत्पुरुष समास है। समास में प्रायः प्रथम शब्द की विभक्ति का लोप हो जाता है।
  • किन्तु कुछ ऐसे समास है, जिनमें विभक्ति के प्रत्यय का लोप नहीं होता है, उसे >अलुक् समास कहते हैं।
  • अलुक् समास में केवल ऐसे ही उदाहरण हैं, जो साहित्य में ग्रन्थकारों के ग्रन्थों में मिलते हैं, इसमें नवीन शब्दों का निर्माण नहीं किया जा सकता।
  • अलुक् समास के कुछ उदाहरण-
  • जनुषान्धः (जन्मान्ध)
  • पश्यतो हरः (चोर)
  • आत्मनेपदम्
  • परस्मैपदम्
  • अन्तेवासी (शिष्य)
  • वनेचरः
  • खेचरः (सिद्ध, देव, पक्षी, आकाश में चलने वाला)
  • सरसिजम् (कमल) आदि।

अतः स्पष्ट है कि वनेचरः में अलुक् ततत्पुरुष समास है।

30

अभिज्ञानशाकुन्तलस्य नायकः कीदृशः ?

  1. ((a))

    धीरललित

  2. ((b))

    धीरोदात्तः

  3. ((c))

    धीरोद्धतः

  4. ((d))

    धीरप्रशान्तः

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Answer: ((b))

धीरोदात्तः

प्रश्न अनुवाद- अभिज्ञानशाकुन्तल का नायक किस प्रकार का है ?

स्पष्टीकरण- अभिज्ञानशाकुंतल का नायक राजा दुष्यंत है। वह धीरोदात्त प्रकृति का नायक है। 

अभिज्ञानशाकुन्तलम् एक संस्कृत नाटक है। जिसमें 7 अंक है। इसके रचयिता महाकवि कालिदास है। इस नाटक में राजा दुष्यन्त और शकुन्तला के परिणय की कहानी है।

Important Points

संस्कृत काव्यशात्रों तथा नाट्‌यशास्त्रों में नायक और नायिका के भेदों का वर्णन श्रृंगार रस के परिप्रेक्ष्य में हुआ है।

दशरूपक संस्कृत नाट्‍यशास्त्रों में एक सम्माननीय स्थान रखता है। भरतमुनि के अनुसार नायक के चार भेद होते हैं-

  • धीरललित
  • धीरशान्त
  • धीरोदात्त
  • धीरोद्धत
  • ये भेद नाटक के नायक के हैं।
  • इनमें से प्रथम - मृदु स्वभाव वाला और संगीत प्रेमी क्षत्रिय राजा होता है।
  • दूसरा - मुख्यतः सामान्य गुणयुक्त ब्राह्मण अथवा वणिक होता है।
  • तीसरा - गम्भीर, क्षमावान, निरहंकारी वीर और दृढ़व्रत क्षत्रिय राजा होता है।
  • चौथा - अहंकारी, आत्मप्रशंसक और ईर्ष्यालु प्रकार का होता है।
  • नायक के ये चार प्रकार चार विभिन्न प्रकृति के पुरुषों को प्रदर्शित करते हैं।

दुष्यन्त धीरोदात्त उत्तम प्रकृति का नायक होता है। धीरोदात्त नायक क्षमावान, दृढ-प्रतिज्ञ, विनयी तथा अपनी भावनाओं पर पूर्ण नियंत्रण रखने वाला होता है। राजा दुष्यंत में ये सभी गुण विद्यमान हैं।

जैसा कि अभिज्ञान शाकुन्तल नाटक के श्लोक की पंक्ति में उद्धृत है-

महतस्तेजसो बीजं बालोऽयं प्रतिभाति मे

स्फुलिङ्गावस्थया वह्निरेधापेक्ष इव स्थितः।।

अर्थ - यह बालक मेरे चिंतन में महान तेज वीर्य प्रतीत हो रहा है। चिंगारी की अवस्था में यह विद्यमान और ईंधन की अपेक्षा करते हुए अग्नि की भांति मुझको प्रतीत हो रहा है।

 

अतः स्पष्ट है कि अभिज्ञानशाकुंतल नाटक का नायक धीरोदात्त प्रकृति का नायक है।

31

'विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः' इतीयं सूक्तिर्विद्यते-

  1. ((a))

    किरातार्जुनीये

  2. ((b))

    नीतिशतके

  3. ((c))

    मेघदूते

  4. ((d))

    कादम्बर्यां शुकनासोपदेशे

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Answer: ((b))

नीतिशतके

**प्रश्न अनुवाद- '**विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः' यह सूक्ति है -

**स्पष्टीकरण- '**विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः' यह सूक्ति नीतिशतक ग्रन्थ में उद्धृत है। यह एक श्लोक की पंक्ति है।

नीति शतक ग्रन्थ के रचनाकार भर्तृहरि मुनि है। जिनके द्वारा तीन शतकों (नीतिशतक, शृंगारशतक, वैराग्यशतक) की रचना की गयी।

श्लोक -

शिर: शार्वस्‍वर्गात्‍पशुपतिशिरस्‍त: क्षितिधरम् 

महीध्रादुत्‍तुंगादवनिमवनेश्‍चापिजलधिम् ।

अधोSधो गंगेयंपदमुपगतास्‍तोयमथवा

विवेकभ्रष्‍टानां भवति विनिपात: शतमुखः।।

अर्थ - स्‍वर्ग से गंगा भगवान् शिव के सिर पर गिरी, वहाँ से पर्वत पर, पर्वत से धरती पर और धरती से सागर में गिरती हैं। ठीक इसी प्रकार बुद्धि से भ्रष्‍ट लोगों का पतन सैकडों तरह से होता है अर्थात् बुद्धि से भ्रष्‍ट लोगों के पतन के सैकडों मार्ग होते हैं।

इस तरह श्लोक से स्पष्ट है, अतः यहाँ नीतिशतक उचित विकल्प है।

32

"अन्तःकरणतत्त्वस्य दम्पत्योः स्नेहसंश्रयात्। 

आनन्दग्रन्थिरेकोऽयमपत्यमिति पठ्यते।।” 

इतीयमुक्तिरस्ति

  1. ((a))

    मुरलायाः

  2. ((b))

    तमसायाः

  3. ((c))

    सीतायाः

  4. ((d))

    लोपामुद्रायाः

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Answer: ((b))

तमसायाः

प्रश्न अनुवाद- अन्तःकरणतत्त्वस्य दम्पत्योः स्नेहसंश्रयात्। 

आनन्दग्रन्थिरेकोऽयमपत्यमिति पठ्यते।।” यह उक्ति है- 

स्पष्टीकरण - यह सूक्ति तमसा नदी द्वारा कही गयी है। यह श्लोक उत्तररामचरित नाटक के ग्रन्थ में उद्धृत है। इसके रचयिता भवभूति है।

श्लोक -

अन्तःकरणतत्त्वस्य दम्पत्योः स्नेहसंश्रयात्। 

आनन्दग्रन्थिरेकोऽयमपत्यमिति पठ्यते।।

अर्थात् दंपत्ति के स्नेह का आश्रय, उनकी आनन्द ग्रंथि को जोड़ने वाला, उनके अन्तः करण का तत्व उसे संतान (अपत्य) कहा गया है।

इस तरह स्पष्ट है कि यह पंक्ति तमसा नदी के द्वारा कही गयी है। अतः यहाँ तमसायाः उचित विकल्प है।

33

श्रियः प्रदुग्धे विपदो रुणद्धि 

यशांसि सूते मलिनं प्रमार्ष्टि।

संस्कारशौचेन परं पुनीते 

शुद्धा हि बुद्धिः किल कामधेनुः।। 

अस्मिन् श्लोके कर्तृपदं किम् ?

  1. ((a))

    श्रियः

  2. ((b))

    यशांसि

  3. ((c))

    शुद्धा बुद्धिः

  4. ((d))

    कामधेनुः

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Answer: ((c))

शुद्धा बुद्धिः

प्रश्न अनुवाद- 

श्रियः प्रदुग्धे विपदो रुणद्धि 

यशांसि सूते मलिनं प्रमार्ष्टि।

संस्कारशौचेन परं पुनीते 

शुद्धा हि बुद्धिः किल कामधेनुः।। इस श्लोक में कर्तृपद (कर्ता) क्या है ?

स्पष्टीकरण- 

श्रियः प्रदुग्धे विपदो रुणद्धि 

यशांसि सूते मलिनं प्रमार्ष्टि।

संस्कारशौचेन परं पुनीते 

शुद्धा हि बुद्धिः किल कामधेनुः ।।

अर्थात् लक्ष्मी प्रदान करने वाली, विपत्ति को नष्ट करने वाली, यश को फैलाने वाली, मलिनता को दूर करने वाली। संस्कार और विचारों से हमें पवित्र करने वाली निश्चित रूप से शुद्ध बुद्धि ही कामधेनु है।

इस श्लोक के अनुसार शुद्ध बुद्धि ही लक्ष्मी प्रदान करने वाली, विपत्ति को दूर करने वाली, यश को फ़ैलाने वाली, मलिनता को दूर करने वाली व संस्कारों और विचारों से हमें पवित्र करने वाली है।

अतः इस वाक्य का कर्ता शुद्ध बुद्धि है। क्योंकि सभी कार्यों को करने वाली शुद्ध बुद्धि है।

34

उत्तररामचरित्स्य तृतीयाङ्कस्याऽऽरम्भः केन वाक्येन भवति?

  1. ((a))

    ततः प्रविशति कन्याद्वयम्

  2. ((b))

    ततः प्रविशति मुनिद्वयम्

  3. ((c))

    ततः प्रविशति नदीद्वयम्

  4. ((d))

    ततः प्रविशति सखिद्वयम्

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Answer: ((c))

ततः प्रविशति नदीद्वयम्

प्रश्न अनुवाद- उत्तररामचरित के तृतीय अंक का आरम्भ किस वाक्य से होता है ?

स्पष्टीकरण- उत्तररामचरित एक नाटक है। जिसके रचयिता भवभूति है। इस नाटक में सात अंक है।

इन नाटक के तृतीय अंक के आरम्भ में उल्लिखित पंक्ति है - ततः प्रविशति नदीद्वयम् अर्थात् उसके बाद दो नदियों का प्रवेश होता हैतमसा और मुरला नामक दो नदियाँ प्रवेश करती हैं।

अतः स्पष्ट है कि उत्तररामचरित नाटक के तृतीय अंक का आरम्भ ततः प्रविशति नदीद्वयम् इस वाक्य से होता है।

35

ब्रू धातोः लटि प्रथमपुरुषस्य रूपं नास्ति

  1. ((a))

    ब्रवीति 

  2. ((b))

    आह

  3. ((c))

    आहुः

  4. ((d))

    आत्थ 

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Answer: ((d))

आत्थ 

प्रश्नार्थ - 'ब्रू' धातु लट् लकार मे प्रथम पुरुष क रूप नहीं है-

‘ब्रू' धातु का अर्थ होता है बोलना।

इससे लोंट् लकार के विविध पुरुषों और वचनों का रूप निम्लिखित प्रकार से चलता है -

‘ब्रू' परस्मैपदी धातु लट् लकार
पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमपुरुषब्रवीति/आहब्रूतः/आहतुःब्रूवन्ति/आहुः
मध्यमपुरुषब्रवीषि/आत्थब्रूथः/आहथुःब्रूथ/आह
उत्तमपुरुषब्रवीमिब्रूवःब्रूमः
<br>

अतः उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि ‘आत्थ' रूप यह ‘ब्रू’ धातु का लट् लकार प्रथम पुरुष का नहीं मध्यमपुरुष का रूप है।

36

79 इत्यस्याः संख्यायाः  कृते कः शब्दः प्रयुज्यते ? 

  1. ((a))

    नवसप्तति

  2. ((b))

    नवाशीति

  3. ((c))

    नवनवति

  4. ((d))

    एकान्नसप्तति

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Answer: ((a))

नवसप्तति

प्रश्न की हिन्दी - ‘79’ इसके लिए उचित संस्कृत शब्द है -

स्पष्टीकरण -

  • 79 (उनहत्तर) के लिए दिए गये विकल्पों में पहले तीनों संस्कृत शब्द उपयोग किये जाते हैं।
  • नवसप्तति (70 + 9 = 79)
  • ऊनाशीति और एकोनाशीति का अर्थ होता है - 79
  • ऊन और एकोन का अर्थ होता है - एक कम अर्थात् 80 से एक कम 79

 

अतः स्पष्ट है कि 79 के लिए नवसप्तति का उपयोग होता है। 

संस्कृत शब्द और संख्या

संस्कृतसंख्या
नवसप्तति79
एकोनाशीति79
ऊनाशीति79
37

अहन्कारदाहज्वरमूर्च्छिता का भवति ?

  1. ((a))

    राजप्रकृतिः

  2. ((b))

    राजनीतिः

  3. ((c))

    राजमहिषी 

  4. ((d))

    राजकन्या

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Answer: ((a))

राजप्रकृतिः

प्रश्न का अनुवाद- अहन्कारदाहज्वरमूर्च्छिता क्या है?

शुकनासोपदेश-

  • शुकनासोपदेशः (शुकनास का उपदेश), कादम्बरी का ही एक अंश है। यह एक उपदेशात्मक ग्रंथ है।
  • इसमें राजा तारापीड का नीतिनिपुण एवं अनुभवी मन्त्री शुकनास राजकुमामार चन्द्रापीड को राज्याभिषेक के पूर्व वात्सल्य भाव से उपदेश देते हैं और रूप, यौवन, प्रभुता तथा ऐश्वर्य से उद्भूत दोषों से सावधान रहने की शिक्षा देते हैं। यह प्रत्येक युवक के लिए उपादेय उपदेश है। इसमें बाणभट्ट की शब्दचातुरी प्रदर्शित हुई है।
  • शुकनासोपदेश का नायक राजकुमार चन्द्रापीड है, जो सत्व, शौर्य और आर्जव भावों से युक्त है।
  • शुकनास एक अनुभवी मन्त्री हैं जो चन्द्रापीड को राज्याभिषेक के पूर्व वात्सल्यभाव से उपदेश देते हैं। वे उसे युवावस्था में सुलभ रूप, यौवन, प्रभुता एवं ऐश्वर्य से उद्भूत दोषों के विषय में सावधान कर देना उचित समझते हैं। इसे युवावस्था में प्रवेश कर रहे समस्त युवकों को प्रदत्त ‘दीक्षान्त भाषण’ कहा जा सकता है।

स्पष्टीकरण-

  • पहले तो यह देखा जाय कि गुरु किसको उपदेश देता है। शुकनास कहते हैं कि चन्द्रापीड ! तुम्हारा गुण ही मुझे बोलने को मुखर कर रहा है। अर्थात् तुम गुणवान हो इसीलिये उपदेश दे रहा हूँ। अन्यथा गुणहीनों को उपदेश देने से कोई लाभ नहीं होता है।
  • यह उपदेश विशेषतः राजाओं के लिये उपयोगी है। क्योंकि राजा को उपदेश देनेवाला नहीं मिलता है। प्रजा तो भय के कारण राजा के वचनों का अनुपालन करती है।
  • यदि उपदेश देनेवाला मिल भी जाता है तो गर्व के कारण राजा उपदे�� सुनता नहीं है। यदि कभी सुन भी लिया तो गजनिमीलित की तरह अनसुना कर देता है। जिससे उपदेश देनेवाले गुरु को कष्ट ही होता है।
  • राजा का स्वभाव अथवा प्रकृति ही अहङ्कार दाहज्वर ग्रस्त हो जाता है। ऐसे में मिथ्या अभिमान को बढ़ानेवाले धन उसका सहयोग करता है।

 

अत: यह स्पष्ट होता है की, राजा की प्रकृति अथवा स्वभाव ही अहन्कारदाहज्वर ग्रस्त होता है इसलिये राजप्रकृतिः यह विकल्प उचित है।

38

यक्षः रामगिर्याश्रमेषु किं चक्रे ?

  1. ((a))

    प्रणतिम्

  2. ((b))

     प्रीतिम्

  3. ((c))

    वसतिम्

  4. ((d))

    प्रतीतिम्

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Answer: ((c))

वसतिम्

प्रश्न का अनुवाद- यक्ष ने रामगिरी आश्रम में  क्या किया?

मेघदूतम्-

  • मेघदूतम् महाकवि कालिदास द्वारा रचित विख्यात दूतकाव्य है।
  • इसमें एक यक्ष की कथा है जिसे कुबेर अलकापुरी से निष्कासित कर देता है।
  • निष्कासित यक्ष रामगिरि पर्वत पर निवास करता है। मेघदूत की लोकप्रियता भारतीय साहित्य में प्राचीन काल से ही रही है।
  • मेघदूतम् काव्य दो खंडों में विभक्त है। पूर्वमेघ में यक्ष बादल को रामगिरि से अलकापुरी तक के रास्ते का विवरण देता है और उत्तरमेघ में यक्ष का यह प्रसिद्ध विरहदग्ध संदेश है जिसमें कालिदास ने प्रेमीहृदय की भावना को उड़ेल दिया है।

श्लोक-

कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात्प्रमत्तः शापेनास्तङ्गमितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तुः।

यक्षश्चक्रे जनकतनयास्त्रानपुण्योदकेषु स्त्रिग्धच्छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु ॥

श्लोक का अर्थ:-अपने कर्तव्य पालन में असावधान, (अतः) प्रिया के वियोग के कारण दुःसह, वर्षपर्यन्त भोगे जानेवाले, स्वामी के शाप से शक्ति विहीन किसी यक्ष ने, जानकी के स्नान करने से पावन नलवाले तथा घने नमेरु वृक्षों से युक्त राम-गिरि (नामक पर्वत के) आश्रमों में निवास किया।

यक्ष ने राम-गिरि पर्वत पर निवास किया अत: यह स्पष्ट होता है की, वसतिम् यह विकल्प उचित है।

39

'शाकपार्थिवः' इति पदे समासोऽस्ति-

  1. ((a))

    मध्यमपदलोपी तत्पुरुषः

  2. ((b))

    मयूरव्यंसकादितत्पुरुष

  3. ((c))

    उपपदतत्पुरुष

  4. ((d))

    अलुक्तत्पुरुषः

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Answer: ((a))

मध्यमपदलोपी तत्पुरुषः

प्रश्नानुवाद - 'शाकपार्थिवः' इस पद में समास है-

स्पष्टीकरण - शाकपार्थिव पद में मध्यमपदलोपी तत्पुरुष समास है।

इस समास में मध्यम पद का लोप हो जाता है, इसलिए इस समास को मध्यमपदलोपी तत्पुरुष समास कहा जाता है।

उदाहरण -

  • शाकप्रियः पार्थिवः - शाकपार्थिवः
  • देवपूजकः ब्राह्मणः - देवब्राह्मणः

 

अतः स्पष्ट है कि यहाँ शाकपार्थिवः पद में मध्यमपदलोपी तत्पुरुष समास है।

Additional Information

अन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण -

  • मयूरव्यंसकादि तत्पुरुष - इस समास में प्रत्यक्ष नियमों का उल्लंघन किया जाता है। इसे मयूरव्यंसकादि तत्पुरुष समास कहा जाता है। उदाहरण - व्यंसकः मयूर - मयूर व्यंसकः। (यहाँ व्यंसक पहले आने चाहिए था और मयूर बाद में।)
  • उपपद तत्पुरुष - यदि तत्पुरुष समास का कोई शब्द ऐसी संज्ञा या अव्यय हो, जिसके अभाव में द्वितीय शब्द का वह रूप नहीं रह सकता, जो उसका है, तो वह उपपद तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - कुम्भं करोति इति - कुम्भकारः
  • अलुक्तत्पुरुष - यह तत्पुरुष समास है। समास में प्रायः प्रथम शब्द की विभक्ति का लोप हो जाता है। किन्तु कुछ ऐसे समास है, जिनमें विभक्ति के प्रत्यय का लोप नहीं होता है, उसे अलुक् समास कहते हैं। अलुक् समास में केवल ऐसे ही उदाहरण हैं, जो साहित्य में ग्रन्थकारों के ग्रन्थों में मिलते हैं, इसमें नवीन शब्दों का निर्माण नहीं किया जा सकता। उदाहरण - आत्मनेपदम्
40

'भू' धातोः लट्-मध्यमपुरुष-द्विवचनस्य रूपमस्ति-

  1. ((a))

    भवतम्

  2. ((b))

    भवेतम्

  3. ((c))

    अभवतम्

  4. ((d))

    भवथः

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Answer: ((d))

भवथः

प्रश्नानुवाद - 'भू' धातु का लट्लकार में मध्यम पुरुष के द्विवचन में रूप होता है-

स्पष्टीकरण - भू (होना) धातु का लट् लकार (वर्तमान काल) के मध्यम पुरुष द्विवचन में भवथः रूप बनता है।

अतः स्पष्ट है कि यहाँ भवथः उचित विकल्प होगा।

Additional Informationभू (होना) धातु का लट्लकार में प्रयोग निम्नलिखित है-

पुरूषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमपुरूषभवतिभवतःभवन्ति
मध्यमपुरूषभवसिभवथःभवथ
उत्तमपुरूषभवामिभवावःभवामः

 

अन्य विकल्प -

  • भवतम् - यह लोट्लकार के मध्यमपुरुष-द्विवचन का रूप है।
  • भवेतम् - यह विधिलिङ्लकार के मध्यमपुरुष-द्विवचन का रूप है।
  • अभवतम् - यह लङ्लकार के मध्यमपुरुष-द्विवचन का रूप है। (इस तरह ये तीनों ही यहाँ अनुचित हैं।)
41

इयं सूक्तिः कुत्र प्राप्यते ?

'अर्थो हि कन्या परकिय एव'

  1. ((a))

    उत्तररामचरिते

  2. ((b))

    नीतिशतके

  3. ((c))

    शुकनासोपदेशे

  4. ((d))

    अभिज्ञानशाकुन्तले

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Answer: ((d))

अभिज्ञानशाकुन्तले

प्रश्न का हिन्दी अनुवाद - 'अर्थो हि कन्या परकीय एव।' इत्यादि पद्य कहाँ से लिया गया है?

स्पष्टीकरण -

महाकवि कालिदास विरचित अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक में चतुर्थ अङ्क में आश्रम से शकुन्तला को विदा करने के उपरान्त महर्षि कण्व कहते हैं - 

'अर्थो हि कन्या परकीय एव

तामद्य सम्प्रेष्य परिग्रहितुः।

जातो ममायं विशदः प्रकामं

प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा।।'

अर्थ - कन्या वास्तव में पराया धन होती हैं। आज उसे (शकुंतला को) पति के पास भेजकर मेरा मन वैसे ही निश्चिन्त हो गया है, जैसे किसी की धरोहर वापस कर दी गई हो।

अतः स्पष्ट है कि 'अर्थो हि कन्या परकीय एव।' यह पद्य महाकवि कालिदास के 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' नाटक से लिया गया है।

Additional Information 

महाकवि कालिदास विरचित अभिज्ञानशाकुन्तल की कुछ अन्य सूक्तियाँ -

  1. 'अविश्रामोऽयं लोकतन्त्राधिकारः' अर्थात् प्रजा का पालन करने वाले के लिए विश्राम कहाँ।
  2. 'कोऽन्यो हुतवहाद् दग्धुं प्रभवति' अर्थात् अग्नि के अतिरिक्त और कौन जलाने का सामर्थ्य रखता है?
  3. 'न तादृशा आकृतिविशेषा गुणविरोधिनो भवन्ति*।'* अर्थात् उस प्रकार की सुन्दर आकृतियाँ गुणों से रहित नहीं होती हैं।
  4. 'गुर्वपि विरहदुःखमाशाबन्धः साहयति।' अर्थात् आशा का बन्धन असह्य विरह के दुःख को भी सहन करा देता है।
  5. 'अतिस्नेहः पापशङ्की।' अर्थात् अत्यधिक स्नेह पाप (अनिष्ट) की आशङ्का करता है।
42

शिवस्य राशीभूत इव अट्टाहासः कः ?

  1. ((a))

    स्वर्गः

  2. ((b))

    विन्ध्यः

  3. ((c))

    कैलास:

  4. ((d))

    मेरुः

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Answer: ((c))

कैलास:

मेघदूतम्-

  • मेघदूतम् महाकवि कालिदास द्वारा रचित विख्यात दूतकाव्य है। मेघदूत की लोकप्रियता भारतीय साहित्य में प्राचीन काल से ही रही है।
  • पूर्वमेघ में यक्ष बादल को रामगिरि से अलकापुरी तक के रास्ते का विवरण देता है और उत्तरमेघ में यक्ष का यह प्रसिद्ध विरहदग्ध संदेश है जिसमें कालिदास ने प्रेमीहृदय की भावना को स्थान दिया है।
  • इसमें एक यक्ष की कथा है जिसे कुबेर अलकापुरी से निष्कासित कर देता है। निष्कासित यक्ष रामगिरि पर्वत पर निवास करता है। वर्षा ऋतु में उसे अपनी प्रेमिका की याद सताने लगती है। कामार्त यक्ष सोचता है कि किसी भी तरह से उसका अल्कापुरी लौटना संभव नहीं है, इसलिए वह प्रेमिका तक अपना संदेश दूत के माध्यम से भेजने का निश्चय करता है। अकेलेपन का जीवन गुजार रहे यक्ष को कोई संदेशवाहक भी नहीं मिलता है, इसलिए उसने मेघ के माध्यम से अपना संदेश विरहाकुल प्रेमिका तक भेजने की बात सोची। इस प्रकार आषाढ़ के प्रथम दिन आकाश पर उमड़ते मेघों ने कालिदास की कल्पना के साथ मिलकर एक अनन्य कृति की रचना कर दी।

Important Pointsश्लोक- 

गत्वा चोर्ध्वं दशमुखभुजोच्छ्वासितप्रस्थसंधेः

कैलासस्य त्रिदशवनितादर्पणस्यातिथिः स्याः।

श‍ृङ्गोच्छ्रायैः कुमुदविशदैर्यो वितत्य स्थितः खं

राशीभूतः प्रतिदिनमिव त्र्यम्बकस्याट्टहासः।।

श्लोक का अर्थ- वहाँ से आगे बढ़कर कैलास पर्वत के अतिथि होना जो अपनी शुभ्रता के कारण देवांगणनाओं के लिए दर्पण के समान है। उसकी धारों के जोड़ रावण की भुजाओं से झडझड़ाए जाने के कारण ढीले पड़ गए हैं। वह कुमुद के पुष्प जैसी श्वेत बर्फीली चोटियों की ऊँचाई से आकाश को छाए हुए ऐसे खड़ा है मानो शिव के प्रतिदिन के अट्टहास का ढेर लग गया है।

'शिवस्य राशीभूत इव अट्टाहासः कैलास:' यह सूक्ति मेघदूतम् की है। हास का वर्ण धवल माना गया है। कैलाश भी धवल है अत: वह ऐसा लागता है की, जैसे कुछ अन्य न होकर केवल शिव का अट्टहास मात्र हो।

अत: यह स्पष्ट होता है की, "शिवस्य राशीभूत इव अट्टाहासः शिवस्य राशीभूत इव अट्टाहासः कैलास:" यह  विकल्प उचित है।

43

नदीः इति पदे का विभक्तिः ?

  1. ((a))

    द्वितीया

  2. ((b))

     तृतीया

  3. ((c))

    पञ्चमी 

  4. ((d))

    षष्ठी

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Answer: ((a))

द्वितीया

प्रश्नार्थ - 'नदीः' पद में विभक्ति है-

उपर्युक्त विकल्पों में से सही विकल्प ‘द्वितीया' है।

ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग नदी शब्द - 

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमानदीनद्यौनद्यः
द्वितीयानदीम्नद्यौनदीः
तृतीयानद्यानदीभ्याम्नदीभिः
चतुर्थीनद्यैनदीभ्याम्नदीभ्यः
पंचमीनद्याःनदीभ्याम्नदीभ्यः
षष्ठीनद्याःनद्योःनदीनाम्
सप्तमीनद्याम्नद्योःनदीषु
सम्बोधनहे नदि!हे नद्यौ!हे नद्यः!

 

उपर्युक्त सारणी के अनुसार यह स्पष्ट होता है कि यह 'नदी' शब्द का ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग द्वितीया बहुवचन 'नदीः' है।

44

'निन्दन्तु निपुणाः' इत्यत्र 'नीतिनिपुणाः' इति पदे समासोऽस्ति-

  1. ((a))

    तत्पुरुषः

  2. ((b))

    कर्मधारयः

  3. ((c))

    बहुव्रीहिः

  4. ((d))

    द्विगुः

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Answer: ((a))

तत्पुरुषः

प्रश्नानुवाद - 'निन्दन्तु निपुणाः' यहाँ 'नीतिनिपुणाः' इति पद में समास है-

स्पष्टीकरण -

शब्द - नीतिनिपुणाः

समास-विग्रह - नित्या निपुणाः

सूत्र - पूर्वसदृशसमोनार्थकलहनिपुणमिश्रश्लक्ष्णैः।

नियम - यदि तृतीयान्त शब्द के साथ पूर्व, सदृश, सम, ऊन (कम), कलह, निपुण, मिश्र, श्लक्ष्ण (चिकना) ये शब्द या इनका समानार्थी शब्द आवें तो वहाँ तृतीया तत्पुरुष समास होता है। यह तत्पुरुष समास का ही भेद है।

उदाहरण -

  • पूर्व - मासपूर्वः (मासेन पूर्वः)
  • सदृश - मातृसदृशः (मात्रा सदृशः)
  • सम - पितृसमः (पित्रासमः)
  • ऊन - धान्योनम् (धान्येन ऊनम्)
  • निपुण - नीतिनिपुणाः (नित्या निपुणाः)

इसी प्रकार यहाँ नीतिनिपुणाः पद में 'नित्या' पद तृतीयान्त है। इसके बाद निपुण शब्द के समानार्थी कुशल पद आया है। 

अतः यहाँ तत्पुरुष समास सही उत्तर है।

45

'आद्ये वः कुसुमप्रसूतिसमये' इत्यत्र 'वः' इति पदे विभक्तिरस्ति-

  1. ((a))

    प्रथमा 

  2. ((b))

    द्वितीया

  3. ((c))

    तृतीया

  4. ((d))

    षष्ठी

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Answer: ((d))

षष्ठी

प्रश्नानुवाद - 'आद्ये वः कुसुमप्रसूतिसमये' यहाँ 'वः' इस पद में विभक्ति है-

स्पष्टीकरण - यहाँ वः पद में षष्ठी विभक्ति है। वः रूप त्वम् सर्वनाम शब्दरूप के षष्ठी विभक्ति-बहुवचन का रूप है।

वः रूप त्वम् सर्वनाम शब्दरूप के द्वितीया, चतुर्थी और षष्ठी के बहुवचन में बनता है।

यह पंक्ति अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक के एक श्लोक की पंक्ति है, जिसमें प्रकृति के प्रति प्रेम का विवरण प्राप्त होता है।

श्लोक-

पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या

नादत्ते प्रियमंडनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्।

आद्ये वः कुसुमप्रसूतिसमये यस्या भवत्युत्सवः

सेयं याति शकुंतला पतिगृहं सर्वैरनुज्ञायताम्।।

अर्थ - वह शकुंतला अपने पतिगृह को जा रही है, जो आपको (पेड़ को) पिलाये बिना स्वयं जल नहीं पीती थी, जो आभूषण-प्रिय होने पर भी आपके पल्लवों को नहीं तोड़ती थी (अपने श्रृंगार के लिए) और जो आपके नये फूलों के आने पर उत्सव मनाती थी, उस शकुंतला को जाने की अनुमति दें।

यहाँ पंक्ति से स्पष्ट होता है कि वः का उपयोग षष्ठी विभक्ति के अर्थ में हुआ है।

अतः स्पष्ट है कि यहाँ वः पद में षष्ठी विभक्ति है।

Additional Information

त्वम् सर्वनाम शब्दरूप का प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमात्वम्युवाम्यूयम्
द्वितीयात्वाम्, त्वायुवाम्युष्मान्, वः
तृतीयात्वयायुवाभ्याम्युष्माभिः
चतुर्थीतुभ्यम्, तेयुवाभ्याम्युष्मभ्यम्, वः
पंचमीत्वत्युवाभ्याम्युष्मत्
षष्ठीतव, तेयुवयोः, वाम्युष्माकम्, वः
सप्तमीत्वयियुवयोःयुष्मासु
46

'निरत्ययं साम न दानवर्जितम्' इत्यस्मिन् श्लोकांशे 'निरत्ययम्' इति पदे समासोऽस्ति-

  1. ((a))

    अव्ययीभावः

  2. ((b))

    तत्पुरुषः

  3. ((c))

    कर्मधारय:

  4. ((d))

    बहुव्रीहिः

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Answer: ((d))

बहुव्रीहिः

प्रश्नानुवाद - 'निरत्ययं साम न दानवर्जितम्' इस श्लोकांश में 'निरत्ययम्' इस पद में समास है-

स्पष्टीकरण - निरत्ययं साम न दानवर्जितम् - यहाँ निरत्ययं पद में बहुव्रीहि समास है।

शब्दनिरत्ययं (निर्बाध, बाधा रहित)

समास विग्रह - निर्गतः अत्ययः यस्मात् तत् (समाप्त हो गयी है बाधायें जिसकी वह) - दुर्योधन

सूत्र - अनेकमन्यपदार्थे।

नियम - जब दो या दो से अधिक सभी शब्द किसी अन्य शब्द का बोध कराते हैं, उसे बहुव्रीहि समास कहा जाता है। इस समास को अन्यपद प्रधान समास भी कहते हैं।

उदाहरण

  • चक्रं पाणौ यस्य सः - चक्रपाणिः (विष्णुः)
  • इसी नियमानुसार निरत्ययं (निर्गतः अत्ययः यस्मात् तत्) पद में बहुव्रीहि समास है, जहाँ निरत्यय पद अन्य शब्द (दुर्योधन) का बोध करा रहा हैं।

 

अतः स्पष्ट है कि यहाँ निरत्ययं पद में बहुव्रीहि समास सही उत्तर है।

Additional Informationनिरत्ययं साम न दानवर्जितम् - यह श्लोकांश किरातार्जुनीयम् महाकाव्य का है।

श्लोक -

निरत्ययं साम न दानवर्जितं न भूरि दानं विरहय्य सत्क्रियां।

प्रवर्तते तस्य विशेषशालिनी गुणानुरोधेन विना न सत्क्रिया।।

अर्थ: उस दुर्योधन की निष्कपट (निर्बाध) साम दाम दण्ड भेद नीति दान के बिना नहीं प्रवर्तित होती है तथा प्रचुर दान सत्कार के बिना नहीं होता है और उसका अतिशय सत्कार भी बिना विशेष गन के नहीं होता है। (अर्थात् वह अतिशय सत्कार भी विशेष गुनी तथा योग्य व्यक्तियों का ही करता है।)

47

'अनुमतगमना  शकुंतला

तरुभिरियं वनवासबन्धुभिः।' 

इत्यस्मिन् पद्यांशे 'अनुमतगमना' पदे कः समासः ?

  1. ((a))

    बहुव्रीहिः

  2. ((b))

    तत्पुरुषः

  3. ((c))

    अव्ययीभावः

  4. ((d))

     द्वन्द्वः

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Answer: ((a))

बहुव्रीहिः

प्रश्नानुवाद - 'अनुमतगमना शकुंतला

तरुभिरियं वनवासबन्धुभिः।' 

इस पद्यांश में 'अनुमतगमना' पद में कौन सा समास है ?

स्पष्टीकरण - अनुमतगमना पद में बहुव्रीहि समास है। प्रस्तुत पंक्ति अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक के श्लोक की है।

पंक्ति का अर्थअनुमतगमना शकुंतला तरुभिरियं वनवासबन्धुभिः। अर्थात् वन में साथ रहते हुए बन्धु भाव को प्राप्त इन वृक्षों ने शकुन्तला को पति गृह जाने की अनुमति दे दी है।

  • शब्द - अनुमतगमना
  • समास विग्रह - अनुमतं गमनं यस्याः सा (शकुन्तला)

सूत्र - अनेकमन्यपदार्थे।

नियम - इस सूत्र के अनुसार जहाँ दो या दो से अधिक समस्त शब्द किसी अन्य पद को इंगित करते हैं, वहाँ बहुव्रीहि समास होता है।

उदाहरण

  • महान् आत्मा यस्य सः (बुद्धः) - महात्मा
  • इसी नियमानुसार यहाँ अनुमतगमना पद में बहुव्रीहि समास है। जहाँ किसी अन्य पद (शकुन्तला) का बोध हो रहा है।

 

अतः स्पष्ट है कि यहाँ अनुमतगमना पद में बहुव्रीहि समास है।

Additional Information

समसनं समासः अर्थात् संक्षिप्त होने को समास कहते हैं। समास एक संज्ञा है। दो या दो से अधिक शब्दों का जब समास होकर एक पद बनता है, तो उसे समास कहते हैं। समास में दो पद होते हैं - 1. पूर्व पद, 2. उत्तर पद

समास के मुख्यतः 4 भेद है। 

  1. अव्ययीभाव
  2. तत्पुरुष
  3. बहुव्रीहि
  4. द्वन्द्व

(1) अव्ययीभाव समास - ‘पूर्वपदार्थप्रधानोSव्ययीभावः’ अर्थात् जिस पद में पूर्व पद की प्रधानता हो या पद का आरम्भ किसी अव्यय पद से हो रहा हो, वहाँ अव्ययीभाव समास होता है। उदाहरण - 

  • रूपस्य योग्यम् - अनुरूपम्
  • रामस्य पश्चात् - अनुरामम्

(2) तत्पुरुष समास - ‘उत्तरपदप्रधानो तत्पुरुषः’ अर्थात जिस पद में उत्तर पद प्रधान होता है, वहाँ तत्पुरुष समास होता है।  उदाहरण - 

  • सुखम् आपन्नः - सुखापन्नः
  • कूपं पतितः - कूपपतितः

तत्पुरुष समास के मुख्यतः दो भेद होते हैं - 

  1. व्यधिकरण तत्पुरुष समास
  2. समानाधिकरण तत्पुरुष
  3. व्यधिकरण तत्पुरुष समास के सात (7) भेद होते हैं, जो निम्नलिखित हैं - 

द्वितीया तत्पुरुष - जहाँ श्रित, अतीत, पतित, गत, अत्यस्त, प्राप्त और आपन्न इन शब्दों का संयोग होता है, वहाँ द्वितीया तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण -

  • शोकं पतितः - शोकपतितः

तृतीया तत्पुरुष - जहाँ तृतीयान्त शब्द के साथ पूर्व, सदृश, सम शब्द आता है, तो वहाँ तृतीया तत्पुरुष समास होता है।  उदाहरण - 

  • पित्रा समः - पितृसमः

चतुर्थी तत्पुरुष - जहाँ पूर्व पद चतुर्थी विभक्ति में होता है अथवा बलि, हित, सुख, रक्षित इन शब्दों को संयोग होता है,  वहाँ चतुर्थी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण -

  • ब्राह्मणाय हितम् - ब्राह्मणहितम्

पञ्चमी तत्पुरुष - जहाँ भय, भीत, भीति इन शब्दों का संयोग होता है, वहाँ पञ्चमी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • व्याघ्राद् भीतिः - व्याघ्रभीतिः

षष्ठी तत्पुरुष - जब पूर्व पद षष्ठी विभक्ति में होता है, तो वहाँ षष्ठी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • देवानां भाषा - देवभाषा

सप्तमी तत्पुरुष - जब पूर्व पद सप्तमी विभक्ति में रहता है अथवा शौण्ड (चतुर), धूर्त, कितव (शठ), प्रवीण, कुशल, पण्डित इन शब्दों का संयोग होता है, तो वहाँ सप्तमी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • सभायां पण्डितः - सभापण्डितः

नञ् तत्पुरुष - जब पूर्व पद न शब्द हो, तथा उत्तर पद कोई संज्ञा या विशेषण हो तो, वहाँ नञ् तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • न कृतम् - अकृतम्
  1. समानाधिकरण तत्पुरुष समास के दो भेद होते हैं - 
  • कर्मधारय तत्पुरुष समास
  • द्विगु तत्पुरुष समास

(1) कर्मधारय तत्पुरुष समास - ऐसा तत्पुरुष समास जहाँ विशेषण-विशेष्य और उपमान-उपमेय का सम्बन्ध होता है, वह कर्मधारय समास होता है। उदाहरण- 

  • पीतम् उत्पलम् - पीतोत्पलम्
  • घन इव श्यामः - घनश्यामः

(2) द्विगु तत्पुरुष समास - जहाँ प्रथम पद संख्यावाची होता है, वहाँ द्विगु समास होता है। यह तत्पुरुष समास का ही भेद है। उदाहरण - 

  • त्रयानां  भुवनानां समाहारः - त्रिभुवनम्
  • चतुर्णां भुजानां समाहारः - चतुर्भुजम्

(3) बहुव्रीहि समास - ‘अन्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिः’ जहाँ दो या दो से अधिक समस्त शब्द किसी अन्य पद को इंगित करते हैं, वहाँ बहुव्रीहि समास होता है। उदाहरण - 

  • महान् आत्मा यस्य सः (बुद्धः) - महात्मा
  • दश आननानि यस्य सः (रावणः) - दशाननः

बहुव्रीहि समास के दो भेद हैं-

  1. समानाधिकरण बहुव्रीहि- (जहाँ दोनों शब्द प्रथमान्त होते हैं। जैसे - पीतम् अम्बरम् यस्य सः)
  2. व्यधिकरण बहुव्रीहि - (जहाँ दोनों शब्द प्रथमान्त नहीं होते हैं। एक प्रथमान्त होता है और दूसरा शब्द षष्ठी या सप्तमी विभक्ति में होता है। जैसे - चन्द्र शेखरे यस्य सः)

(4) द्वन्द्व समास - ‘उभयपदार्थप्रधानो द्वन्द्वः’ जहाँ दोनों पद (पूर्व पद एवं उत्तर पद) प्रधान होते हैं, वहाँ द्वन्द्व समास होता है। उदाहरण -

  • रामश्च लक्ष्मणश्च भरतश्च - रामलक्ष्मणभरताः
  • पाणी च पादौ च - पाणिपादम्
48

किरातार्जुनीये महाकाव्ये कियन्तः सर्गाः ?

  1. ((a))

    21

  2. ((b))

    19

  3. ((c))

    18

  4. ((d))

    22

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Answer: ((c))

18

प्रश्न का अनुवाद - 'किरातार्जुनीय' में कितने सर्ग है?

स्पष्टीकरण - 'किरातार्जुनीय' में १८ (18) सर्ग है।

Key Points 

भारवि - 

  • भारवि संस्कृत के महान कवि हैं। वे अर्थ की गौरवता के लिये प्रसिद्ध हैं ("भारवेरर्थगौरवम्")।
  • किरातार्जुनीयम् महाकाव्य उनकी महान रचना है। इसे एक उत्कृष्ट श्रेणी की काव्यरचना माना जाता है।

किरातार्जुनीय - 

  • भारवि की कीर्ति का आधार-स्तम्भ उनकी एकमात्र रचना ‘किरातार्जुनीयम्’ महाकाव्य है, जिसकी कथावस्तु महाभारत से ली गई है।
  • इसमें अर्जुन तथा 'किरात' वेशधारी शिव के बीच युद्ध का वर्णन है।
  • अन्ततोगत्वा शिव प्रसन्न होकर अर्जुन को 'पाशुपतास्त्र' प्रदान करते हैं।
  • वीर रस प्रधान किरातार्जुनीयम् एक वीर रस प्रधान 18 सर्गों का महाकाव्य है।
  • इनका प्रारम्भ 'श्री' शब्द से होता है तथा प्रत्येक सर्ग के अन्तिम श्लोक में ‘लक्ष्मी’ शब्द का प्रयोग मिलता है।
  • यह कृति अपने अर्थगौरव के लिए प्रसिद्ध है। कवि ने बड़े से बड़े अर्थ को थोड़े से शब्दों में प्रकट कर अपनी काव्य कुशलता का परिचय दिया है।
  • कोमल भावों का प्रदर्शन भी कुशलतापूर्वक किया गया है।
  • प्राकृतिक दृश्यों तथा ऋतुओं का वर्णन भी रमणीय है। काव्य चातुर्य और भाषा भारवि ने केवल एक अक्षर ‘न’ वाला श्लोक लिखकर अपनी काव्य चातुरी का परिचय दिया है। कहीं-कहीं कविता में कठिनता भी आ गई है। इस कारण विद्वानों ने इनकी कविता को ‘नारिकेल फल के समान’ बताया है।
  • किरात में राजनीतिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन भी अत्यन्त उत्कृष्टता के साथ में किया गया है। इसकी भाषा उदात्त एवं हृदय भावों को प्रकट करने वाली है।
  • कवि में कोमल तथा उग्र दोनों प्रकार के भावों को प्रकट करने की समान शक्ति एवं सामर्थ्य थी। प्रकृति के दृश्यों का वर्णन भी अत्यन्त मनोहारी है।
<br>

अतः यह स्पष्ट है कि किरातार्जुनीय में 18 सर्ग हैं।

49

उपमानपूर्वपदकर्मधारयस्य उदाहरणमस्ति -

  1. ((a))

    घनश्यामः

  2. ((b))

    पुरुषव्याघ्रः

  3. ((c))

    कृष्णसर्पः

  4. ((d))

    चराचरम्

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Answer: ((a))

घनश्यामः

प्रश्नानुवाद - उपमान पूर्वपद कर्मधारय का उदाहरण है -

स्पष्टीकरण - उपमान पूर्वपद कर्मधारय समास का उदाहरण - घनश्यामः है।

  • शब्द - घनश्यामः
  • समास विग्रह - घन इव श्यामः

सूत्र - उपमानानि सामान्यवचनैः।

नियम - उपमान और उपमेय का समास उपमान पूर्वपद कर्मधारय समास होता है। यहाँ घन पूर्वपद उपमान और श्याम उपमेय पद है।

उदाहरण -

  • चन्द्राह्लादकः - चन्द्रः इव आह्लादकः।
  • इसी नियमानुसार घनश्यामः पद में उपमान पूर्वपद कर्मधारय समास है।

 

अतः स्पष्ट है कि उपमान पूर्वपद कर्मधारय समास का उदाहरण - घनश्यामः है।

Additional Information

अन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण - (ये सभी विकल्प अन्य कर्मधारय समास के उदाहरण है।)

  • पुरुषव्याघ्रः - (उपमानोत्तरपद कर्मधारय) - यदि उपमित (जिसकी उपमा दी जाए) और उपमान (जिससे उपमा दी जाए) दोनों साथ-साथ आवें तो उस समास को उपमानोत्तरपद कर्मधारय समास कहते हैं। यहाँ उपमान पद प्रथम पद न होकर दूसरा पद होता है। उदाहरण - पुरुषः व्याघ्रः इव - पुरुषव्याघ्रः
  • कृष्णसर्पः - (कर्मधारय समास) जहाँ प्रथम पद दूसरे पद की विशेषता बताता है, उसे कर्मधारय समास कहते हैं। उदाहरण - कृष्णसर्पः
  • चराचरम् - (विशेषणोभयपद कर्मधारय) दो समानाधिकरण विशेषणों के समास को विशेषणोभयपद कर्मधारय समास कहते हैं। उदाहरण - कृष्णश्च श्वेतश्च - कृष्णश्वेतः (कुक्कुरः), दो विशेषणों में से एक दूसरे का प्रतिवादी भी हो सकता है। उदाहरण - चरञ्च अचरञ्च - चराचरम् (जगत)
50

उत्तररामचरित्स्य तृतीयाङ्कस्य नाम किम् ?

  1. ((a))

    सीता

  2. ((b))

    छाया

  3. ((c))

    माया

  4. ((d))

    प्रज्ञा

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Answer: ((b))

छाया

प्रश्न का अनुवाद- उत्तररामचरित के तृतीय अङ्क का नाम क्या है?

उत्तररामचरितम्-

  • उत्तररामचरितम् महाकवि भवभूति का प्रसिद्ध संस्कृत नाटक है, जिसके सात अंकों में राम के उत्तर जीवन की कथा है।
  • सात अंकों में निबद्ध उत्तररामचरितम भवभूति की सर्वश्रेष्ठ नाट्यकृति है। इसमें रामराज्याभिषेक के पश्चात् जीवन का लोकोत्तर चरित वर्णित है जो महावीरचरित का ही उत्तर भाग माना जाता है।
  • इसमे करुण रस प्रधान है। जनापवाद के कारण राम न चाहते हुए भी सीता का परित्याग कर देते हैं। सीतात्याग के बाद विरही राम की दशा का करुण चित्र प्रस्तुत किया गया है।
  • उत्तररामचरितम् सात अंकों का नाटक है। उत्तररामचरितम् में श्लोक संख्या २५६ है।

उत्तररामचरित के सात अंकों के नाम इसप्रकार है-

  1. चित्रदर्शन
  2. पंचवटी प्रवेश
  3. छाया अङ्क
  4. कौशल्या-जनक योग
  5. कुमार विक्रम
  6. कुमार प्रत्यभिज्ञान
  7. सम्मेलन

 

इस प्रकार स्पष्टीकरण से यह प्रतीत होता है कि उत्तररामचरितं के तृतीय अङ्क का नाम छाया है।

 Additional Information

उत्तररामचरितं तृतीय अङ्क-

  • अगस्त्याश्रम से लौटने के पश्चात् श्रीरामचन्द्रजी पञ्चवटी में आते हैं और उसी दिन लव-कुश की बारहवीं वर्षगाँठ भी है। इस अवसर पर भगवती भागीरथी सीता को उसी के हाथों से चुने हुए पुष्पों से भगवान सूर्य की पूजा कराने के बहाने (वस्तुतः राम की रक्षा के लिए) अपने साथ लेकर गोदावरी के पास आती हैं। और सीता को अदृश्य बनाकर तमसा के साथ पञ्चवटी में भेज देती हैं।
  • तदनन्तर श्रीराम पञ्चवटी में प्रवेश करते हैं और सीता-सहवासविषयक स्थानों को देखकर शोक से मूर्छित हो जाते हैं।
  • भगवती सीता अदृश्य रहती हुई भी अपने शीतल-कर-स्पर्श से श्रीराम को चैतन्यलाभ पहुँचाती हैं।
  • वनदेवता वासन्ती पञ्चवटी में ही राम से मिलती है तथा सीता-विषयक वार्तालाप करती है। सीता और राम दोनों ही शोकसन्तप्त होकर विलाप करते हैं।
  • अन्त में राम अश्वमेध यज्ञ हेतु योध्या वापस लौट जाते हैं और सीता अपने पुत्रों की वर्षगाँठ मनाने के लिए गंगा के पास लौट जाती है।
  • इस अंक में सीता को राम की विरहव्यथा का प्रत्यक्ष होता है। राम के मुख से अश्वमेध यज्ञ में अपनी हिरण्यमयी प्रतिमा को सहधर्मिणी के रूप में स्वीकार की गई सुनकर राम के प्रति उनका सारा क्षोभ दूर हो जाता है और उनके हृदय से परित्यागजन्य शल्य निकल जाता है।
  • जिससे नाटक के अन्त में होने वाले समागम का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। इस अंक को ‘छायांक' के नाम से जाना जाता है।
51

‘दुरोदरच्छद्मजितां समीहते नयेन जेतुं जगतीं सुयोधनः' इति श्लोकांशस्य दुरोदरशब्दस्यार्थोऽस्ति

  1. ((a))

    लम्बोदरः

  2. ((b))

    द्यूतकारः

  3. ((c))

    युधिष्ठिरः

  4. ((d))

    द्यूतम्

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Answer: ((d))

द्यूतम्

प्रश्न का अनुवाद- ‘दुरोदरच्छद्मजितां समीहते नयेन जेतुं जगतीं सुयोधनः' इस श्लोक में आये दुरोदर इस शब्द का अर्थ क्या है?

किरातार्जुनीयम्-

  • किरातार्जुनीयम् (अर्थ : किरात और अर्जुन की कथा) महाकवि भारवि द्वारा सातवीं शती ई. में रचित महाकाव्य है जिसे संस्कृत साहित्य के 'बृहत्त्रयी' में स्थान प्राप्त है।
  • महाभारत में वर्णित किरात वेशधारी शिव के साथ अर्जुन के युद्ध की लघुकथा को आधार बनाकर कवि ने राजनीति, धर्मनीति, कूटनीति, समाजनीति, युद्धनीति, जनजीवन आदि का मनोरम वर्णन किया है।
  • यह काव्य विभिन्न रसों से ओतप्रोत रचना है किन्तु वीर रस प्रधान है।
  • संस्कृत के छः प्रसिद्ध महाकाव्य हैं – किरातार्जनुयीयम्‌ (भारवि), शिशुपालवधम्‌ (माघ) और नैषधीयचरितम्‌ (श्रीहर्ष)– बृहत्त्रयी कहलाते हैं।

Important Pointsविशङ्कमानो भवतः पराभवं

नृपासनस्थोऽपि वनाधिवासिनः।

दुरोदरच्छद्मजितां समीहते

नयेन जेतुं जगतीं सुयोधनः ।।

श्लोक का अर्थ- सिंहासनासीन होते हुए भी (वह) सुयोधन, वनवासाश्रयी (अतएव विपन्न) आपसे (अपनी) पराजय की आशङ्का करता हुआ द्यूतक्रीडा के बहाने जीती गई पृथ्वी को (अब) नीति से जीतना चाह रहा है।

अत: स्पष्टीकरण से यह प्रतीत होता है की, दुरोदर शब्द का अर्थ द्यूतक्रीडा यह होता है। अत: द्यूतम् यह विकल्प उचित है।

52

'भर्तुर्विप्रकृतापि रोषणतया मा स्म प्रतीपं गमः' श्लोकोऽयं कुत्रास्ति ?

  1. ((a))

    अभिज्ञानशाकुन्तले 4/22

  2. ((b))

    अभिज्ञानशाकुन्तले 4/18

  3. ((c))

    अभिज्ञानशाकुन्तले 4/6

  4. ((d))

    अभिज्ञानशाकुन्तले 4/9

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Answer: ((b))

अभिज्ञानशाकुन्तले 4/18

प्रश्न का अनुवाद- 'भर्तुर्विप्रकृतापि रोषणतया मा स्म प्रतीपं गमः' यह श्लोक कहाँ से है?

अभिज्ञानशाकुन्तलम्-

  • अभिज्ञान शाकुन्तलम् महाकवि कालिदास का विश्वविख्यात नाटक है।
  • इसमें राजा दुष्यन्त तथा शकुन्तला के प्रणय, विवाह, विरह, प्रत्याख्यान तथा पुनर्मिलन की एक सुन्दर कहानी है।
  • पौराणिक कथा में दुष्यन्त को आकाशवाणी द्वारा बोध होता है पर इस नाटक में कवि ने मुद्रिका द्वारा इसका बोध कराया है।

चतुर्थ अङ्क की विशेषता-

कालिदास की नाट्यकला  "अभिज्ञानशाकुन्तलम्" नाटक रमणीय व सर्वश्रेष्ठ है, उसमें भी चतुर्थ अङ्क ,और उसमे भी श्लोक चतुष्ट्य अत्यधिक रम्य है -

  • विदाई के अवसर पर पिता का अपनी पुत्री को उपदेश तथा जामाता से निवेदन भी दृष्टव्य है। इस उपदेश तथा निवेदन मे भी पितृ - ह्रदय कि करुण वेदना ही छिपी है। पुत्री के सौभाग्य की कामना करते हुए ऋषि कण्व अपनी पुत्री को सदुपदेश देते हुए कहते हैं -

"सुश्रूषस्व गुरुन् कुरु प्रियसखीवृत्तिं सपत्नीजने ,

भर्तुर्वि प्रकृतापि रोषणतया मा स्म प्रतीप गमः 

भूयिष्ठमं भव दक्षिणा परिजने भाग्येष्व नुत्सेकिनी ,

यान्त्येवं गृहिणीपदं युवतयो वामाः कुलस्याधयः।।" 

श्लोक का अर्थ- तुम सास -ससुर आदि की सेवा करना ,सपत्नियों के साथ प्रिय सखियों जैसा व्यवहार करना ,पति के द्वारा अपमानित होने पर भी रोष से उनके विरुद्ध आचरण मत करना, सेवकों के प्रति अत्यन्त उदार रहना और अपने भाग्य पर गर्व मत करना। इस प्रकार का आचरण करने वाली स्त्रियां ही गृहिणी नाम को सार्थक करती हैं,और इसके विपरीत आचरण करने वाली स्त्रियां तो कुल के लिये पीडादायकही होती हैं।

[अभिज्ञानशाकुन्तलम् 4/18]

अर्थात् गुरुजनों की सेवा करना, सपत्नियों (सौतों) के साथ प्रियसखी जैसा व्यवहार करना, तिरस्कृत होने पर क्रोध के कारण पति के प्रतिकूल कार्य न करना, अपने सेवकों के प्रति उदार रहना और अपने भाग्य पर गर्व न करना। इस प्र��ार का आचरण करने वाली स्त्रियाँ गृहलक्ष्मी के पद को प्राप्त कर लेती हैं तथा इसके विपरीत आचरण करने वाली कुल के लिए अभिशाप होती हैं।

  • महर्षि कण्व ने कितने कम शब्दों में कितनी सारगर्भित बात कह दी, साथ ही स्पष्ट भी कर दिया कि वधू (कन्या) के सम्बन्धियों को उसकी ससुराल में अधिक हस्तक्षेप नही करना चाहिए।
  • महर्षि कण्व के इस सन्देश का परीक्षण वर्तमान समय में सत्य है क्योंकि वधू के परिजनों का जहां अधिक हस्तक्षेप होता है, वहाँ कलह का वातावरण होता है।
  • समाज में तमाम घर पुत्री के घर में माता-पिता के अनर्गल हस्तक्षेप के कारण टूटते हैं। वर्तमान समय में यदि कन्या के माता-पिता इस सन्देश का सार समझ लें तो समाज में काफी घर टूटने से बच सकते हैं।

 

इस प्रकार 'भर्तुर्विप्रकृतापि रोषणतया मा स्म प्रतीपं गमः' यह श्लोक अभिज्ञानशाकुन्तल के 4/18 में स्थित है।

53

'कामकरिणः कदलिका' का ?

  1. ((a))

    लक्ष्मीः

  2. ((b))

    तृष्णा

  3. ((c))

    माया

  4. ((d))

    वासना

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Answer: ((a))

लक्ष्मीः

प्रश्न का अनुवाद- 'कामकरिणः कदलिका' कौन है?

शुकनासोपदेश:-

शुकनासोपदेशः (शुकनास का उपदेश), कादम्बरी का ही एक अंश है। यह एक उपदेशात्मक ग्रंथ है।

इसमें राजा तारापीड का नीतिनिपुण एवं अनुभवी मन्त्री शुकनास राजकुमामार चन्द्रापीड को राज्याभिषेक के पूर्व वात्सल्य भाव से उपदेश देते हैं और रूप, यौवन, प्रभुता तथा ऐश्वर्य से उद्भूत दोषों से सावधान रहने की शिक्षा देते हैं। यह प्रत्येक युवक के लिए उपादेय उपदेश है। इसमें बाणभट्ट की शब्दचातुरी प्रदर्शित हुई है।

शुकनासोपदेश का नायक राजकुमार चन्द्रापीड है, जो सत्व और शौर्य भावों से युक्त है।

शुकनास एक अनुभवी मन्त्री हैं जो चन्द्रापीड को राज्याभिषेक के पूर्व वात्सल्यभाव से उपदेश देते हैं। वे उसे युवावस्था में सुलभ रूप, यौवन, प्रभुता एवं ऐश्वर्य से उद्भूत दोषों के विषय में सावधान कर देना उचित समझते हैं। इसे युवावस्था में प्रवेश कर रहे समस्त युवकों को प्रदत्त ‘दीक्षान्त भाषण’ कहा जा सकता है।

“प्रस्तावना कपटनाटकस्य। कामकरिणः कदलिका। वध्यशाला साधुभावस्य। राहुजिह्वा धर्मेन्दुमण्डलस्य।

श्लोक का अर्थ- यह लक्ष्मी छलरूपी नाटक की प्रस्तावना है अर्थात् लक्ष्मी के आते ही व्यक्ति जीवन में छल-प्रपंच करने लगता है, जिससे और अधिक धन प्राप्त कर सके। जिस प्रकार हाथी केले के वन में स्वच्छन्दतापूर्वक विचरण करता है उसी प्रकार कामदेव लक्ष्मी के सानिध्य में स्वतन्त्र रूप से रहता है अर्थात् धन की अधिकता के साथ-साथ काम संबंधी दोष स्वयमेव आ जाते हैं। मंगलकारी भावनाओं की लक्ष्मी वघ-शाला है। राहु जिस प्रकार चन्द्रमा को ग्रस लेता है उसी प्रकार लक्ष्मी धर्म का नाश कर देती है।

प्रस्तुत स्पष्टीकरण से यह प्रतीत होता है की, कामकरिणः कदलिका यह लक्ष्मी का वर्णन है।

54

'राजराज' इति शब्दस्य कोऽर्थः ?

  1. ((a))

    इन्द्रः

  2. ((b))

    कुबेरः

  3. ((c))

    शिवः

  4. ((d))

    विष्णुः

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Answer: ((b))

कुबेरः

प्रश्न का अनुवाद- 'राजराज' इस शब्द का अर्थ क्या होगा?

मेघदूतम्-

  • मेघदूतम् महाकवि कालिदास द्वारा रचित विख्यात दूतकाव्य है।
  • इसमें एक यक्ष की कथा है जिसे कुबेर अलकापुरी से निष्कासित कर देता है।
  • निष्कासित यक्ष रामगिरि पर्वत पर निवास करता है। मेघदूत की लोकप्रियता भारतीय साहित्य में प्राचीन काल से ही रही है।
  • मेघदूतम् काव्य दो खंडों में विभक्त है। पूर्वमेघ में यक्ष बादल को रामगिरि से अलकापुरी तक के रास्ते का विवरण देता है और उत्तरमेघ में यक्ष का यह प्रसिद्ध विरहदग्ध संदेश है जिसमें कालिदास ने प्रेमीहृदय की भावना को उड़ेल दिया है।

श्लोक-

तस्य स्थित्वा कथमपि पुरः कौतुकाधानहेतो रन्तर्बाष्पश्चिरमनुचरो राजराजस्य दध्यौ ।

मेघालोके भवति सुखिनोऽप्यन्यथावृत्तिचेतः कण्ठाश्लेषप्रणयिनि जने किं पुनरसंस्थे ॥

श्लोक का अर्थ:- यक्षराज कुबेर का सेवक आँखों में आँसू रोककर उत्कंठा की उत्पत्ति करनेवाले उस (मेघ) के सामने किसी-किसी तरह ( अर्थात् बड़े कष्ट से) खड़ा होकर बड़ी देर तक चिंतामग्न रहा। मेघ-दर्शन होने पर (जब) प्रियतमा से सनाथ व्यक्ति का भी चित्त चञ्चल हो उठता है (तो) गले से लिपट जाने की अभिलाषावाली प्रियतमा के दूर रहने पर फिर क्या कहना ?

स्पष्टीकरण से यह स्पष्ट होता है की, 'राजराज' इसका कुबेर अर्थ होता है।

अत: सही विकल्प कुबेर: यह है।

55

मनुष्याणां देहस्य शत्रुः कः ?

(नीतिशतकानुसारम् )

  1. ((a))

    निद्रा

  2. ((b))

    आलस्यम्

  3. ((c))

    बुभुक्षा

  4. ((d))

    पिपासा

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Answer: ((b))

आलस्यम्

प्रश्नानुवाद - मनुष्यों की देह का शत्रु कौन है ? (नीति शतक के अनुसार) 

स्पष्टीकरण - नीति शतक के अनुसार मनुष्य की देह का शत्रु आलस्य है। नीति शतक ग्रन्थ में इससे सम्बन्धित श्लोक है। इस ग्रन्थ के रचयिता भर्तृहरि हैं।-

श्लोक -

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः

नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥

अर्थात् आलस्य मनुष्य के शरीर में रहने वाला सबसे बड़ा शत्रु है और मेहनत (उद्यम) जैसा कोई बन्धु नहीं है, जिसे (मेहनत को) करके मनुष्य (कभी भी) दुखी नहीं होता है।

अतः स्पष्ट है कि नीति शतक के अनुसार मनुष्य की देह का शत्रु आलस्य है।

56

'भू' धातोः लङ् लकारस्य मध्यमपुरुषस्य बहुवचने रूपम् भवति-

  1. ((a))

    अभवत्

  2. ((b))

    अभवत

  3. ((c))

    अभवन्

  4. ((d))

    अभवम्

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Answer: ((b))

अभवत

प्रश्नानुवाद - 'भू' धातु का लङ्लकार के मध्यम पुरुष के बहुवचन में रूप होता है-

स्पष्टीकरण - भू (होना) धातु का लङ् लकार (भूतकाल) के मध्यम पुरुष बहुवचन में भवत रूप बनता है।

अतः स्पष्ट है कि यहाँ भवत उचित विकल्प होगा।

Additional Informationभू (होना) धातु का लङ्लकार में प्रयोग निम्नलिखित है-

पुरूषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमपुरूषअभवत्अभवताम्अभवन्
मध्यमपुरूषअभवःअभवतम्अभवत
उत्तमपुरूषअभवम्अभवावअभवाम
57

सुयोधनस्य कः परस्परं न बाधते ?

  1. ((a))

    त्रिगणः

  2. ((b))

    मित्रगणः

  3. ((c))

    शत्रुगणः

  4. ((d))

    भृत्यगणः

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Answer: ((a))

त्रिगणः

प्रश्न का अनुवाद- सुयोधन के कौन एक दुसरे को बाधा नही पहुंचाते है?

किरातार्जुनीयम्-

  • किरातार्जुनीयम् (अर्थ : किरात और अर्जुन की कथा) महाकवि भारवि द्वारा सातवीं शती ई. में रचित महाकाव्य है जिसे संस्कृत साहित्य के 'बृहत्त्रयी' में स्थान प्राप्त है।
  • महाभारत में वर्णित किरात वेशधारी शिव के साथ अर्जुन के युद्ध की लघुकथा को आधार बनाकर कवि ने राजनीति, धर्मनीति, कूटनीति, समाजनीति, युद्धनीति, जनजीवन आदि का मनोरम वर्णन किया है।
  • यह काव्य विभिन्न रसों से ओतप्रोत रचना है किन्तु वीर रस प्रधान है।
  • संस्कृत के छः प्रसिद्ध महाकाव्य हैं – किरातार्जनुयीयम्‌ (भारवि), शिशुपालवधम्‌ (माघ) और नैषधीयचरितम्‌ (श्रीहर्ष)– बृहत्त्रयी कहलाते है।

श्लोक-

असक्तमाराधयतो यथायथं विभज्य भक्त्या समपक्षपातया।

गुणानुरागादिव सख्यमीयिवान् न बाधतेऽस्य त्रिगणः परस्परम् ॥

श्लोक का अर्थ- यथोचित विभाजन करके समान पक्षपात वाले अनुराग से अनासक्त भाव से सेवन करते हुए इस ( दुर्योधन ) के तीन पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम) मानों उसके गुणों में अनुराग होने के कारण मित्रता को प्राप्त हुए से एक दूसरे को बाधा नहीं पहुंचाते ( रुकावट पैदा नहीं करते )।

सुयोधनस्य 'त्रिगणः' परस्परं न बाधते। यह सूक्ति वनेचर आकर युधिष्ठिर से कहता है कि दुर्योधन के त्रिगण (धर्म, अर्थ, काम) परस्पर एक दूसरे को बाधा नहीं पहुँचाते हैं। अर्थात् दुर्योधन अपने राज कार्य को अच्छी तरह से चला रहा है।

अत: त्रिगणः यह उचित विकल्प है।

58

'शिवराजविजयः' रचना अस्ति

  1. ((a))

    अम्बिकादत्तव्यासस्य

  2. ((b))

    पण्डितराजजगन्नाथस्य

  3. ((c))

    दण्डिनः

  4. ((d))

    बाणभट्टस्य

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Answer: ((a))

अम्बिकादत्तव्यासस्य

प्रश्नार्थ - 'शिवराजविजयः' की रचना है-

लौकिक संस्कृत साहित्य में अनेक विधायें विकसित हुई - उपजीव्य काव्य, महाकाव्य, ऐतिहासिक काव्य, गीतिकाव्य, स्तोत्रकाव्य, नीतिकाव्य, गद्यकाव्य, चम्पूकाव्य, कथा, नाटक आदि।

शिवराजविजयः - प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटनाओं का आश्रय लेकर जिन काव्यों की रचना की जाती है उन्हें ऐतिहासिक काव्य कहा जाता है। पं अम्बिकादत्त व्यास विरचित 'शिवराजविजयम्' ऐसा ही ग्रन्थ है -

  • यह संस्कृत साहित्य का प्रथम ऐतिहासिक उपन्यास है।
  • इसकी सभी प्रमुख घटनाएं ऐतिहासिक तथा वास्तविक है।
  • इस उपन्यास में शिवाजी महाराज के जीवन के महत्त्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन हुआ है।
  • यह तीन वीरामों में विभक्त है, जिनमें प्रत्येक में चार - चार निःश्वास है।
  • इसमें एक साथ दो कथायें स्वतन्त्र रूप से चलती हैं, जिनमें से एक के नायक छत्रपति शिवाजी हैं और दूसरी के रामसिंह।
  • इसमें वीर रस की प्रधानता है।
  • भाषा सरल, स्पष्ट और माधुर्य पुट से युक्त है।
<br>

अतः स्पष्ट है कि 'शिवराजविजयः' यह यह रचना 'अम्बिकादत्तव्यासस्य' अर्थात् 'पं अम्बिकादत्त व्यास' की है।

59

'पञ्चगङ्गम्' इति समस्तपदे कः समासः ?

  1. ((a))

    द्विगु समासः 

  2. ((b))

    अव्ययीभावः

  3. ((c))

    बहुव्रीहि समासः

  4. ((d))

    कर्मधारयः

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Answer: ((b))

अव्ययीभावः

प्रश्नानुवाद - 'पञ्चगङ्गम्' इस समस्त पद में कौन-सा समास है ?

स्पष्टीकरण -

  • पञ्चगंगम् में अव्ययीभाव समास होगा।
  • समास विग्रह:= पञ्चानां गङ्गानां समाहार: - पञ्चगङ्गम्
  • पञ्चानां= संख्यावाची शब्द
  • गङ्गानां = नदी का नाम

सूत्र - 'नदीभिश्च'।

  • नियम - जब संख्यावाची शब्द का नदीवाचक शब्दों के साथ समास होता है, तो वहाँ द्विगु समास न होकर अव्ययीभाव समास होता हैI

उदाहरण

  • द्वयोः यमुनयोः समाहारः - द्वियमुनम्

 

अतः स्पष्ट है कि यहाँ अव्ययीभाव समास है।

60

'इष्टप्रवासजनितान्यबलाजनस्य

दुःखानि नूनमतिमात्रसुदुःसहानि।।'

इतीयं सूक्तिर्विद्यते।

  1. ((a))

    मेघदूते

  2. ((b))

    अभिज्ञानशाकुन्तले

  3. ((c))

    उत्तररामचरिते

  4. ((d))

    नीतिशतके

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Answer: ((b))

अभिज्ञानशाकुन्तले

प्रश्नानुवाद - 'इष्टप्रवासजनितान्यबलाजनस्य

दुःखानि नूनमतिमात्रसुदुःसहानि।।' - यह सूक्ति है।

स्पष्टीकरण - यह सूक्ति अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक के चतुर्थ अंक में उल्लिखित है। जिसके रचयिता महाकवि कालिदास है। यह सूक्ति चतुर्थ अंक के एक श्लोक में उद्धृत है-

श्लोक-

अन्तर्हिते शशिनि सैव कुमुद्वती मे, दृष्टिं न नन्दयति सस्मरणीयशोभा।

इष्टप्रवासजनितान्यबलाजनस्य दुःखानि नूनमतिमात्रसुदुःसहानि।।

अर्थात् - जिस प्रकार चन्द्रमा के अस्त हो जाने पर वह कुमुदिनी (अब) स्मरणीय शोभा वाली होते हुए भी मेरे दृष्टि को आनन्दित नहीं करती है। उसी तरह स्त्रीजनों को अपने प्रिय के प्रवास से उत्पन्न दुःख अत्यन्त असहनीय होते हैं

इस तरह श्लोक के अर्थ से स्पष्ट है कि यह सूक्ति अभिज्ञान शाकुन्तलम् से ली गयी है।

61

राष्ट्रभक्तिभावनापूर्णं गद्यकाव्यमस्ति

  1. ((a))

    कादम्बरी

  2. ((b))

    शिवराजविजयम्

  3. ((c))

    मालविकाग्निमित्रम्

  4. ((d))

    रघुनाथचरितम्

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Answer: ((b))

शिवराजविजयम्

प्रश्नानुवाद - राष्ट्रभक्ति भावना से पूर्ण गद्यकाव्य है-

स्पष्टीकरण - राष्ट्रभक्ति भावना से पूर्ण गद्यकाव्य शिवराजविजय है। इस ग्रन्थ के रचयिता अम्बिकादत्त व्यास है।

  • इस ग्रन्थ में शिवाजी महाराज की विजय का वर्णन है।
  • इस ग्रन्थ में तीन विराम है। प्रत्येक विराम में चार निःश्वास हैं। इस तरह कुल 12 निःश्वास हैं।
  • यह संस्कृत का प्रसिद्ध उपन्यास है। इस ग्रन्थ में वीर रस की प्रधानता है।
  • इसका कथानक इस प्रकार है – दक्षिण देश में (यवन) शासकों के अत्याचारों से तगं आकर शिवाजी (शिवराज) स्वतन्त्रता के  लिए संघर्ष आरम्भ करते हैं और उन्हें इस कार्वय में सफलता भी मिलती है। उनकी विजय से घबराकर बीजापुर का शासक उन्हें मारने के लिए अफजल खान को भेजता है। वे उसे भी मौत के घाट उतार देते हैं। कवि ने शिवाजी के मुख से सम्पूर्ण राष्ट्र की मुक्ति की उद्घोषणा करवायी है – ‘कार्यं हि साधयेयं देहं वा पातयेयम्।'
  • कवि ने प्रस्तुत उपन्यास में ऐतिहासिक पात्रों के अतिरिक्त अन्य अनेक पात्रों की परिकल्पना की है।
  • शिवराज विजय तत्कालीन स्वाधीनता संग्राम के लिए एक प्रेरणादायी मार्गदर्शक काव्य सिद्ध हुआ है।

 

अतः स्पष्ट है कि राष्ट्रभक्ति भावना से पूर्ण गद्यकाव्य शिवराजविजय है। जो एक प्रसिद्ध संस्कृत उपन्यास है।

62

दुर्योधनः दण्डेन कं निहन्ति ?

  1. ((a))

    उपद्रवम्

  2. ((b))

    अर्थबाधाम्

  3. ((c))

    धर्मविप्लवम्

  4. ((d))

    दण्डपारुष्यम्

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Answer: ((c))

धर्मविप्लवम्

प्रश्न का अनुवाद- दुर्योधन दण्ड से किसका निवारण करता है?

किरातार्जुनीयम्-

  • किरातार्जुनीयम् (अर्थ : किरात और अर्जुन की कथा) महाकवि भारवि द्वारा सातवीं शती ई. में रचित महाकाव्य है जिसे संस्कृत साहित्य के 'बृहत्त्रयी' में स्थान प्राप्त है।
  • महाभारत में वर्णित किरात वेशधारी शिव के साथ अर्जुन के युद्ध की लघुकथा को आधार बनाकर कवि ने राजनीति, धर्मनीति, कूटनीति, समाजनीति, युद्धनीति, जनजीवन आदि का मनोरम वर्णन किया है।
  • यह काव्य विभिन्न रसों से ओतप्रोत रचना है किन्तु वीर रस प्रध��न है।
  • संस्कृत के छः प्रसिद्ध महाकाव्य हैं – किरातार्जनुयीयम्‌ (भारवि), शिशुपालवधम्‌ (माघ) और नैषधीयचरितम्‌ (श्रीहर्ष)– बृहत्त्रयी कहलाते हैं।

**Important Pointsश्लोक-**वसूनि वाञ्छन्न वशी न मन्युना स्वधर्म इत्येव निवृत्तकारणः।

गुरूपदिष्टेन रिपौ सुतेऽपि वा निहन्ति दण्डेन स धर्मविप्लवम् ॥

श्लोक का अर्थ- इन्द्रियों को वश में रखने वाला वह दुर्योधन धन प्राप्त करने की इच्छा से नहीं और न क्रोध से दण्ड देता है किन्तु लोभ, क्रोध इत्यादि कारणों से रहित होकर 'यह मेरा धर्म है' यही समझकर गुरुओ के द्वारा बतलाये गए दण्ड के द्वारा शत्रु अथवा मित्र में स्थित धर्मोल्लंघन (अधर्म) का निवारण करता है।

अत: यह स्पष्ट है की, दुर्योधन दण्ड से धर्मविप्लवम् अर्थात धर्मोल्लंघन का निवारण करता है।

63

स्त्रीलिङ्गस्य किं शब्दस्य रूपं नास्ति ?

  1. ((a))

    कान्

  2. ((b))

    कया

  3. ((c))

    कयोः

  4. ((d))

    कासाम्

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Answer: ((a))

कान्

प्रश्नानुवाद - स्त्रीलिङ्ग का कौनसे शब्द का रूप नहीं है ?

स्पष्टीकरण - दिये गये विकल्पों में कान् शब्दरूप स्त्रीलिंग का रूप नहीं है।

  • कान् शब्दरूप किम् (क्या/कौन) सर्वनाम शब्द के पुल्लिंग द्वितीया विभक्ति-बहुवचन का रूप है।
  • अन्य सभी विकल्प कया, कयोः, कासाम् स्त्रीलिंग (किम्) सर्वनाम के शब्दरूप हैं।
  • कयोः रूप पुल्लिंग और स्त्रीलिंग दोनों में प्राप्त होता है।

 

अतः स्पष्ट है कि यहाँ कान् स्त्रीलिंग शब्दरूप नहीं हैं।

Additional Information

किम् (क्या) स्त्रीलिंग सर्वनाम शब्दरूप का प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमाकाकेकाः
द्वितीयाकाम्केकाः
तृतीयाकयाकाभ्याम्काभिः
चतुर्थीकस्यैकाभ्याम्काभ्यः
पंचमीकस्याःकाभ्याम्काभ्यः
षष्ठीकस्याःकयोःकासाम्
सप्तमीकस्याम्कयोःकासु
64

'न हि प्रियं प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः'

अस्य सुभाषितस्य रचनाकारः कः ?

  1. ((a))

    माघः

  2. ((b))

    भारविः

  3. ((c))

    श्रीहर्षः 

  4. ((d))

    भासः

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Answer: ((b))

भारविः

प्रश्नानुवाद - 'न हि प्रियं प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः' इस सुभाषित के रचनाकार कौन है ?

स्पष्टीकरण - न हि प्रियं प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः' इस सुभाषित के रचनाकार महाकवि भारवि है।

दिया गया सुभाषित किरातार्जुनीयम् महाकाव्य के श्लोक की पंक्ति है। इसके रचयिता महाकवि भारवि है।

श्लोक -

कृतप्रणामस्य महीं महीभुजे जितां सपत्नेन निवेदयिष्यतः।

न विव्यथे तस्य मनो न हि प्रियं प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः।।

अर्थात् उस समय के लिए उचित प्रणाम करने के अनन्तर शत्रुओं (कौरवों) द्वारा अपहृत पृथ्वीमण्डल (राज्य) की यथातथ्य बातें राजा युधिष्ठिर से निवेदन करते हुए उस वनवासी किरात के मन को तनिक भी व्यथा नहीं हुई। (ऐसा क्यों न होता) क्योंकि किसी के कल्याण की अभिलाषा करने वाले लोग (सत्य बात को छिपा कर केवल उसे प्रसन्न करने के लिए) झूठ-मूठ की प्यारी बातें (बना कर) कहने की इच्छा नहीं करते हैं।

इस तरह स्पष्ट है उपरोक्त सुभाषित के रचनाकार महाकवि भारवि है।

65

'पा' धातोः विधिलिङ्लकारे मध्यमपुरुषैकवचने किं रूपं भवति ?

  1. ((a))

    पेयात्

  2. ((b))

    पेयाः

  3. ((c))

    पिबेयम्

  4. ((d))

    पिबेः

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Answer: ((d))

पिबेः

प्रश्नानुवाद - 'पा' धातु के विधिलिङ्लकार में मध्यम पुरुष एकवचन में क्या रूप होता है?

स्पष्टीकरण - पा (पीना) धातु का विधिलिङ्लकार के मध्यम पुरुष एकवचन में पिबेः रूप बनता है।

अतः स्पष्ट है कि यहाँ पिबेः उचित विकल्प होगा।

Additional Informationपा (पीना) धातु का विधिलिङ्लकार में प्रयोग निम्नलिखित है-

पुरूषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमपुरूषपिबेत्पिबेताम्पिबेयुः
मध्यमपुरूषपिबेःपिबेतम्पिबेत
उत्तमपुरूषपिबेयम्पिबेवपिबेम

 

अन्य विकल्प -

  • पेयात् - यह रूप आशीर्लिङ्लकार के प्रथमपुरुष-एकवचन का रूप है।
  • पेयाः - यह रूप आशीर्लिङ्लकार के मध्यमपुरुष-एकवचन का रूप है।
66

पतिशब्दः प्रथमा विभक्तौ, द्विवचने -

  1. ((a))

    पतिः 

  2. ((b))

    पत्या 

  3. ((c))

    पत्ये

  4. ((d))

    पती  

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Answer: ((d))

पती  

प्रश्नानुवाद - पति शब्द प्रथमा विभक्ति के द्विवचन में - 

स्पष्टीकरण - ‘पति' शब्द रूप इकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दरूप है। 

‘पति’ शब्द की प्रथमा विभक्ति द्विवचन में पती रूप प्राप्त होता है। पती रूप प्रथमा और द्वितीया विभक्ति के द्विवचन में बनता है।

अतः यहाँ पती उचित विकल्प है।

Additional Information

‘पति’ इकारान्त पुल्लिंग शब्दरूप का प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमापतिःपतीपतयः
द्वितीयापतिम्पतीपतीन्
तृतीयापत्या (पतिना)पतिभ्याम्पतिभिः
चतुर्थीपतये (पत्यैः)पतिभ्याम्पतिभ्यः
पञ्चमीपत्युःपतिभ्याम्पतिभ्यः
षष्ठीपत्युःपत्योःपतीनाम्
सप्तमीपत्यौपत्योःपतिषु
सम्बोधनहे पते!हे पती!हे पतयः!
67

अधोलिखिता सूक्तिः कुत्र विद्यते ?

'हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः।'

  1. ((a))

    मेघदूते

  2. ((b))

    शुकनासोपदेशे

  3. ((c))

    उत्तररामचरिते

  4. ((d))

    किरातार्जुनीये

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Answer: ((d))

किरातार्जुनीये

प्रश्नानुवाद - अधोलिखित सूक्ति कहाँ विद्यमान है ?

'हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः।'

स्पष्टीकरण - हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः। - यह सूक्ति किरातार्जुनीयम् के एक श्लोक से ली गयी है।

  • प्रस्तुत श्लोक किरातार्जुनीयम् महाकाव्य से लिया गया है। जिसमें बताया गया है कि सेवक को स्वामी के प्रति निष्ठावान् होना चाहिए।

श्लोक-

क्रियासु युक्तैर्नृप चारचक्षुषो न वञ्चनीयाः प्रभवोऽनुजीविभिः।

अतोऽर्हसि क्षन्तुमसाधु साधु वा हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः।। 

  • श्लोक का अर्थ - कोई कार्य पूरा करने के लिए नियुक्त किये गए सेवकों का यह परम कर्त्तव्य है कि वे दूतों की आँखों से ही देखने वाले अपने स्वामी को (झूठी और प्रिय बातें बता कर) न ठगें। इसलिए मैं जो कुछ भी अप्रिय अथवा प्रिय बातें कहूँ, उन्हें आप क्षमा करेंगे, क्योंकि सुनने में मधुर तथा कल्याणकारी वाणी दुर्लभ होती है।

 

इस तरह स्पष्ट है कि यह सूक्ति किरातार्जुनीयम् में उल्लिखित है।

68

पा (पिब्) धातोः लङ् - प्रथमपुरुषैकवचन रूपमस्ति-

  1. ((a))

    पिबति

  2. ((b))

    अपिबत्

  3. ((c))

    पिबेत्

  4. ((d))

    पास्यति

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Answer: ((b))

अपिबत्

प्रश्नानुवाद - 'पा' (पिब्) धातु का लङ्लकार के प्रथमपुरुष एकवचन में रूप है-

स्पष्टीकरण - पा (पिब्) (पीना) धातु का लङ्लकार के प्रथमपुरुष एकवचन में पिबत् रूप बनता है।

अतः स्पष्ट है कि यहाँ अपिबत् उचित विकल्प होगा।

Additional Informationपा (पीना) धातु का लङ्लकार में प्रयोग निम्नलिखित है-

पुरूषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमपुरूषअपिबत्अपिबताम्अपिबन्
मध्यमपुरूषअपिबःअपिबतम्अपिबत
उत्तमपुरूषअपिबम्अपिबावअपिबाम

 

अन्य विकल्प -

  • पिबति - यह रूप लट्लकार के प्रथमपुरुष-एकवचन का रूप है।
  • पिबेत् - यह रूप विधिर्लिङ्लकार के प्रथमपुरुष-एकवचन का रूप है।
  • पास्यति -  यह रूप लृट्लकार के प्रथमपुरुष-एकवचन का रूप है।
69

 सुयोधनः जगतीं केन जेतुं समीहते ?

  1. ((a))

    युद्धेन

  2. ((b))

    छलेन

  3. ((c))

    नयेन

  4. ((d))

    विनयेन

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Answer: ((c))

नयेन

प्रश्न का अनुवाद- सुयोधन जग को किससे जीतना चाहता है?

किरातार्जुनीयम्-

  • किरातार्जुनीयम् (अर्थ : किरात और अर्जुन की कथा) महाकवि भारवि द्वारा सातवीं शती ई. में रचित महाकाव्य है जिसे संस्कृत साहित्य के 'बृहत्त्रयी' में स्थान प्राप्त है।
  • महाभारत में वर्णित किरात वेशधारी शिव के साथ अर्जुन के युद्ध की लघुकथा को आधार बनाकर कवि ने राजनीति, धर्मनीति, कूटनीति, समाजनीति, युद्धनीति, जनजीवन आदि का मनोरम वर्णन किया है।
  • यह काव्य विभिन्न रसों से ओतप्रोत रचना है किन्तु वीर रस प्रधान है।
  • संस्कृत के छः प्रसिद्ध महाकाव्य हैं – किरातार्जनुयीयम्‌ (भारवि), शिशुपालवधम्‌ (माघ) और नैषधीयचरितम्‌ (श्रीहर्ष)– बृहत्त्रयी कहलाते हैं।

Important Pointsविशङ्कमानो भवतः पराभवं

नृपासनस्थोऽपि वनाधिवासिनः।

दुरोदरच्छद्मजितां समीहते

नयेन जेतुं जगतीं सुयोधनः ।।

श्लोक का अर्थ- सिंहासनासीन होते हुए भी (वह) सुयोधन, वनवासाश्रयी (अतएव विपन्न) आपसे (अपनी) पराजय की आशङ्का करता हुआ द्यूतक्रीडा के बहाने जीती गई पृथ्वी को (अब) नीति से जीतना चाह रहा है

अत: यह स्पष्ट होता है की, सुयोधन जग को नय से अर्थात नीति से जीतना चाहता है।

70

'पारेगङ्गम्' इत्यत्र समासोऽस्ति-

  1. ((a))

    अव्ययीभावः

  2. ((b))

    तत्पुरुषः

  3. ((c))

    बहुव्रीहिः

  4. ((d))

    द्विगुः

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Answer: ((a))

अव्ययीभावः

प्रश्नानुवाद - 'पारेगङ्गम्' यहाँ समास है-

स्पष्टीकरण - पारेगङ्गम् में अव्ययीभाव समास होता है। वही विकल्प से षष्ठी तत्पुरुष समास होता है।

  • शब्द - पारेगङ्गम् (गंगा के पार)
  • समास विग्रह - गंगापारम् (पारेगङ्गम्)

सूत्रपारे मध्ये षष्ठ्या वा

नियम - इस सूत्र के अनुसार पार और मध्य षष्ठ्यन्त पद के साथ अव्ययीभाव समास तथा विकल्प से षष्ठी तत्पुरुष समास होता है।

इस तरह स्पष्ट है कि यहाँ पारेगङ्गम् पद में अव्ययीभाव समास उचित विकल्प है।

Hint

  • यदि गङ्गायाः पारम् दिया होता तो षष्ठी तत्पुरुष समास होता, क्योंकि वहाँ उत्तर पद प्रधान होता है। साथ ही उस पद में षष्ठी विभक्ति होती है। इसलिए यहाँ अव्ययीभाव समास होगा।

Additional Information

समसनं समासः अर्थात् संक्षिप्त होने को समास कहते हैं। समास एक संज्ञा है। दो या दो से अधिक शब्दों का जब समास होकर एक पद बनता है, तो उसे समास कहते हैं। समास में दो पद होते हैं - 1. पूर्व पद, 2. उत्तर पद

समास के मुख्यतः 4 भेद है। 

  1. अव्ययीभाव
  2. तत्पुरुष
  3. बहुव्रीहि
  4. द्वन्द्व

(1) अव्ययीभाव समास - ‘पूर्वपदार्थप्रधानोSव्ययीभावः’ अर्थात् जिस पद में पूर्व पद की प्रधानता हो या पद का आरम्भ किसी अव्यय पद से हो रहा हो, वहाँ अव्ययीभाव समास होता है। उदाहरण - 

  • रूपस्य योग्यम् - अनुरूपम्
  • रामस्य पश्चात् - अनुरामम्

(2) तत्पुरुष समास - ‘उत्तरपदप्रधानो तत्पुरुषः’ अर्थात जिस पद में उत्तर पद प्रधान होता है, वहाँ तत्पुरुष समास होता है।  उदाहरण - 

  • सुखम् आपन्नः - सुखापन्नः
  • कूपं पतितः - कूपपतितः

तत्पुरुष समास के मुख्यतः दो भेद होते हैं - 

  1. व्यधिकरण तत्पुरुष समास
  2. समानाधिकरण तत्पुरुष
  3. व्यधिकरण तत्पुरुष समास के सात (7) भेद होते हैं, जो निम्नलिखित हैं - 

द्वितीया तत्पुरुष - जहाँ श्रित, अतीत, पतित, गत, अत्यस्त, प्राप्त और आपन्न इन शब्दों का संयोग होता है, वहाँ द्वितीया तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण -

  • शोकं पतितः - शोकपतितः

तृतीया तत्पुरुष - जहाँ तृतीयान्त शब्द के साथ पूर्व, सदृश, सम शब्द आता है, तो वहाँ तृतीया तत्पुरुष समास होता है।  उदाहरण - 

  • पित्रा समः - पितृसमः

चतुर्थी तत्पुरुष - जहाँ पूर्व पद चतुर्थी विभक्ति में होता है अथवा बलि, हित, सुख, रक्षित इन शब्दों को संयोग होता है,  वहाँ चतुर्थी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण -

  • ब्राह्मणाय हितम् - ब्राह्मणहितम्

पञ्चमी तत्पुरुष - जहाँ भय, भीत, भीति इन शब्दों का संयोग होता है, वहाँ पञ्चमी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • व्याघ्राद् भीतिः - व्याघ्रभीतिः

षष्ठी तत्पुरुष - जब पूर्व पद षष्ठी विभक्ति में होता है, तो वहाँ षष्ठी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • देवानां भाषा - देवभाषा

सप्तमी तत्पुरुष - जब पूर्व पद सप्तमी विभक्ति में रहता है अथवा शौण्ड (चतुर), धूर्त, कितव (शठ), प्रवीण, कुशल, पण्डित इन शब्दों का संयोग होता है, तो वहाँ सप्तमी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • सभायां पण्डितः - सभापण्डितः

नञ् तत्पुरुष - जब पूर्व पद न शब्द हो, तथा उत्तर पद कोई संज्ञा या विशेषण हो तो, वहाँ नञ् तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • न कृतम् - अकृतम्
  1. समानाधिकरण तत्पुरुष समास के दो भेद होते हैं - 
  • कर्मधारय तत्पुरुष समास
  • द्विगु तत्पुरुष समास

(1) कर्मधारय तत्पुरुष समास - ऐसा तत्पुरुष समास जहाँ विशेषण-विशेष्य और उपमान-उपमेय का सम्बन्ध होता है, वह कर्मधारय समास होता है। उदाहरण- 

  • पीतम् उत्पलम् - पीतोत्पलम्
  • घन इव श्यामः - घनश्यामः

(2) द्विगु तत्पुरुष समास - जहाँ प्रथम पद संख्यावाची होता है, वहाँ द्विगु समास होता है। यह तत्पुरुष समास का ही भेद है। उदाहरण - 

  • त्रयानां  भुवनानां समाहारः - त्रिभुवनम्
  • चतुर्णां भुजानां समाहारः - चतुर्भुजम्

(3) बहुव्रीहि समास - ‘अन्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिः’ जहाँ दो या दो से अधिक समस्त शब्द किसी अन्य पद को इंगित करते हैं, वहाँ बहुव्रीहि समास होता है। उदाहरण - 

  • महान् आत्मा यस्य सः (बुद्धः) - महात्मा
  • दश आननानि यस्य सः (रावणः) - दशाननः

बहुव्रीहि समास के दो भेद हैं-

  1. समानाधिकरण बहुव्रीहि- (जहाँ दोनों शब्द प्रथमान्त होते हैं। जैसे - पीतम् अम्बरम् यस्य सः)
  2. व्यधिकरण बहुव्रीहि - (जहाँ दोनों शब्द प्रथमान्त नहीं होते हैं। एक प्रथमान्त होता है और दूसरा शब्द षष्ठी या सप्तमी विभक्ति में होता है। जैसे - चन्द्र शेखरे यस्य सः)

(4) द्वन्द्व समास - ‘उभयपदार्थप्रधानो द्वन्द्वः’ जहाँ दोनों पद (पूर्व पद एवं उत्तर पद) प्रधान होते हैं, वहाँ द्वन्द्व समास होता है। उदाहरण -

  • रामश्च लक्ष्मणश्च भरतश्च - रामलक्ष्मणभरताः
  • पाणी च पादौ च - पाणिपादम्
71

“किम्” प्रश्नवाचकसर्वनामपदं चतुर्थीविभक्ति, एकवचने-

  1. ((a))

    कस्मात्

  2. ((b))

    कस्य

  3. ((c))

    कस्मै

  4. ((d))

    केन

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Answer: ((c))

कस्मै

प्रश्नानुवाद - “किम्” प्रश्नवाचक सर्वनाम पद चतुर्थी विभक्ति, एकवचन में-

स्पष्टीकरण - किम् (क्या) प्रश्नवाचक सर्वनाम पद का चतुर्थी विभक्ति एकवचन में कस्मै शब्दरूप बनता है। जो पुल्लिंग सर्वनाम शब्दरूप है।

अतः स्पष्ट है कि यहाँ कस्मै उचित विकल्प है।

Additional Information

किम् (क्या) पुल्लिंग सर्वनाम शब्दरूप का प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमाकःकौके
द्वितीयाकम्कौकान्
तृतीयाकेनकाभ्याम्कैः
चतुर्थीकस्मैकाभ्याम्केभ्यः
पंचमीकस्मात्काभ्याम्केभ्यः
षष्ठीकस्यकयोःकेषाम्
सप्तमीकस्मिन्कयोःकेषु
72

किरातार्जुनीयस्य कथावस्तुनः मूलस्रोतः किम् ?

  1. ((a))

    महाभारतम्

  2. ((b))

    रामायणम्

  3. ((c))

    वायुपुराणम्

  4. ((d))

    अग्निपुराणम्

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Answer: ((a))

महाभारतम्

प्रश्न का अनुवाद- किरातार्जुनीयम् के कथावस्तू  का मूल स्रोत क्या है?

किरातार्जुनीयम्-

  • किरातार्जुनीयम् प्रसिद्ध प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में से एक है। इसे एक उत्कृष्ट काव्य रचना माना जाता है।
  • इसके रचनाकार महाकवि भारवि हैं, जिनका समय छठी-सातवीं शताब्दी माना जाता है।
  • यह रचना 'किरात' रूपधारी शिव एवं पांडु पुत्र अर्जुन के बीच हुए धनुर्युद्ध तथा वार्तालाप पर आधारित है।
  • किरातार्जुनीयम् का मूल स्रोत महाभारत है।
<br>

अत: यह स्पष्ट होता है की, महाभारत ही किरातार्जुनीयम् का मूल स्रोत है।

73

कर्मसंज्ञाविधायकं सूत्रं नास्ति-

  1. ((a))

    अभिनिविशश्च

  2. ((b))

    तथायुक्तं चानीप्सितम्

  3. ((c))

    अकथितञ्च

  4. ((d))

    सहयुक्तेऽप्रधानम्

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Answer: ((d))

सहयुक्तेऽप्रधानम्

प्रश्नानुवाद - कर्मसंज्ञा विधायक सूत्र नहीं है-

स्पष्टीकरण - दिये गये विकल्पों में सहयुक्तेऽप्रधानम् कर्मसंज्ञा विधायक सूत्र नहीं है। अन्य सभी कर्मसंज्ञा विधायक सूत्र है। कर्म संज्ञा द्वितीया विभक्ति के अर्थ में होती है।

'सहयुक्तेऽप्रधानम्' इस सूत्र के अनुसार सह, साकम्, सार्धम्, समम् के साथ वाले शब्दों में तृतीया विभक्ति लगती है।

अतः स्पष्ट है कि सहयुक्तेऽप्रधानम् कर्मसंज्ञा विधायक सूत्र नहीं हैं।

Important Pointsअन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण (ये सभी सूत्र द्वितीया विभक्ति, कर्मसंज्ञा के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं -

  • अभिनिविशश्च - इस सूत्र के अनुसार अभि और नि उपसर्ग जब एक साथ विश् धातु के पहले लगते है, तो विश् का आधार कर्म कारक होता है। जिसमें द्वितीया विभक्ति होती है।
  • तथायुक्तं चानीप्सितम् - इस सूत्र के अनुसार कुछ पदार्थ ऐसे भी होते हैं, जो कर्ता द्वारा अनीप्सित होते हुए भी ईप्सित की तरह क्रिया से सम्बद्ध होते हैं, जिनकी कर्म संज्ञा होती है।
  • अकथितञ्च - इस सूत्र से दुह्, याच्, पच्, दण्ड्, रुध्, प्रच्छ्, चि, ब्रू, शास्, जि, मन्थ्, मुष्, नी, वह्, हृ, कृष् इन 16 धातुओं के योग में गौण कर्म संज्ञा होती है और इन धातुओं को द्विकर्मक धातु कहा जाता है।
74

मेघदूतं केन छन्दसा निबद्धमस्ति ?

  1. ((a))

    मन्दाक्रान्ता

  2. ((b))

    उपजातिः

  3. ((c))

    मालिनी

  4. ((d))

    प्रहर्षिणी

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Answer: ((a))

मन्दाक्रान्ता

प्रश्नानुवाद - मेघदूत किस छन्द में निबद्ध है ?

स्पष्टीकरण - मेघदूत ग्रन्थ मन्दाक्रान्ता छन्द में निबद्ध है।

  • मेघदूत महाकवि कालिदास की अप्रतिम रचना है। अकेली यह रचना ही उन्हें कविकुल गुरु उपाधि से मण्डित करने में समर्थ है।
  • भाषा, रस, छंद और चरित्र-चित्रण समस्त दृष्टियों से मेघदूत अनुपम खण्डकाव्य है। सहृदय रसिकों ने मुक्त कंठ से इसकी सराहना की है।
  • समीक्षकों ने इसे न केवल संस्कृत जगत में अपितु विश्व साहित्य में श्रेष्ठ काव्य के रूप में अंकित किया है। 
  • महाकवि कालिदास ने सम्पूर्ण मेघदूत की रचना मन्दाक्रान्ता छंद में की है।
  • इस छंद का लक्षण इस प्रकार है - मन्दाक्रान्ताऽम्बुधिरसनगैर्मो भनौ तौ गयुग्मम्
  • अर्थात् इस छंद के प्रत्येक पाद में 17 अक्षर होते हैं। वे मगण, भगण, नगण, तगण, तगण और दो गुरु इस क्रम में होते हैं तथा चौथे, दसवें, सत्रहवें अक्षर पर यति होती है।
  • मेघदूत में विप्रलम्भ रस की गंभीरता और भावविह्वलता का बोध कराने के लिए मंथरगति से पढ़ा जाने वाला मन्दाक्रान्ता छंद अपनाया गया है। खेद, दुःख, विपत्ति, प्रवास, वर्षा आदि के वर्णन में मन्दाक्रान्ता छंद रुचिकर माना गया है।

 

अतः स्पष्ट है कि मेघदूत ग्रन्थ मन्दाक्रान्ता छन्द में निबद्ध है।

75

सन्धिं करोतु - स्व + ईरिणी 

  1. ((a))

    स्वेरिणी

  2. ((b))

    स्वैरिणी

  3. ((c))

    स्वीरिणी

  4. ((d))

    स्वारिणी

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Answer: ((b))

स्वैरिणी

प्रश्नानुवाद - सन्धि करो - स्व + ईरिणी।

स्पष्टीकरण - स्व + ईरीणी का सन्धि पद होगा - स्वैरिणी। यहाँ गुण सन्धि नहीं होगी। अपितु गुण का अपवाद वार्तिक सूत्र लगने से वृद्धि सन्धि होगी।

वार्तिक - स्वादीरेरिणोः

नियम - इस वार्तिक के अनुसार जब स्व शब्द के बाद ईर और ईरिन् आता है, तो वहाँ गुण न होकर वृद्धि सन्धि होती है।

  • स्व + ईर - स्वैरः (स्वेच्छाचारी)
  • स्व + ईरिणि - स्वैरिणि (स्वेच्छाचारिणी स्त्री)

 

अतः स्पष्ट है कि स्व + ईरिणी का सन्धि पद स्वैरिणी होगा।

76

'विग्रहवत्यपि अप्रत्यक्षदर्शना' का ?

  1. ((a))

    तृष्णा

  2. ((b))

    लक्ष्मीः

  3. ((c))

    इन्द्रियरागः

  4. ((d))

    लोलुपता

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Answer: ((b))

लक्ष्मीः

प्रश्न का अनुवाद- 'विग्रहवत्यपि अप्रत्यक्षदर्शना' कौन है?

शुकनासोपदेश-

  • शुकनासोपदेशः (शुकनास का उपदेश), कादम्बरी का ही एक अंश है। यह एक उपदेशात्मक ग्रंथ है।
  • इसमें राजा तारापीड का नीतिनिपुण एवं अनुभवी मन्त्री शुकनास राजकुमामार चन्द्रापीड को राज्याभिषेक के पूर्व वात्सल्य भाव से उपदेश देते हैं और रूप, यौवन, प्रभुता तथा ऐश्वर्य से उद्भूत दोषों से सावधान रहने की शिक्षा देते हैं। यह प्रत्येक युवक के लिए उपादेय उपदेश है। इसमें बाणभट्ट की शब्दचातुरी प्रदर्शित हुई है।
  • शुकनासोपदेश का नायक राजकुमार चन्द्रापीड है, जो सत्व, शौर्य और आर्जव भावों से युक्त है।
  • शुकनास एक अनुभवी मन्त्री हैं जो चन्द्रापीड को राज्याभिषेक के पूर्व वात्सल्यभाव से उपदेश देते हैं। वे उसे युवावस्था में सुलभ रूप, यौवन, प्रभुता एवं ऐश्वर्य से उद्भूत दोषों के विषय में सावधान कर देना उचित समझते हैं। इसे युवावस्था में प्रवेश कर रहे समस्त युवकों को प्रदत्त ‘दीक्षान्त भाषण’ कहा जा सकता है।

Key Points"अमृतसहोदरापि कटुकविपाका विग्रहवत्यपि अप्रत्यक्षदर्शना। पुरुषोत्तमरतापि खलजनप्रिया।

  • लक्ष्मी के चरित्र के विभिन्न पक्ष अपने आप में पर्याप्त विरोधाभास लिए हुए हैं। इस प्रकार यह मानो जादू दिखाती हुई स्वयं को प्रकट करती है।
  • यथा निरन्तर ऊष्मा अर्थात् दर्प को उत्पन्न करती हुयी भी जड़ता अर्थात् मूर्खता को उत्पन्न करती है।
  • उन्नति अर्थात् समृद्धि को दिखाती हुई भी नीचस्वभावता को प्रकट करती है।
  • जलराशि (समुद्र) से उत्पन्न हुयी भी प्यास को बढ़ाती है।
  • ऐश्वर्य को धारण करती हुई भी अकल्याणकारी स्वभाव को फैलाती है।
  • बल (सेना आदि) को बढ़ाती हुई भी कंजूसी को उत्पन्न करती है।
  • अमृत के साथ उत्पन्न होने पर भी कड़वे अर्थात् कष्टकारी परिणाम वाली है।
  • शरीरधारिणी होते हुए भी अदृश्य रहती है।
  • सर्वोत्तम पुरुष विष्णु में अनुरक्त होते हुए भी दुष्टों की प्रिया है।

 

अत: यह स्पष्ट है की, 'विग्रहवत्यपि अप्रत्यक्षदर्शना' यह लक्ष्मी का वर्णन है।

77

'सर्व' इति शब्दस्य स्त्रीलिङ्गे चतुर्थी विभक्तौ एकवचने रूपं भविष्यति-

  1. ((a))

    सर्वस्मै

  2. ((b))

    सर्वायाः

  3. ((c))

    सर्वस्यै

  4. ((d))

    सर्वाय

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Answer: ((c))

सर्वस्यै

प्रश्नानुवाद - 'सर्व' इस शब्द के स्त्रीलिङ्ग के चतुर्थी विभक्ति में एकवचन में रूप होगा-

स्पष्टीकरण - 'सर्व' (सब) सर्वनाम शब्दरूप का स्त्रीलिंग के चतुर्थी विभक्ति-एकवचन में सर्वस्यै रूप बनता है।

सर्वस्मै रूप सर्व सर्वनाम शब्दरूप पुल्लिंग के चतुर्थी विभक्ति-एकवचन का रूप है।

अतः स्पष्ट है कि यहाँ सर्व शब्द के स्त्रीलिंग के चतुर्थी विभक्ति-एकवचन में सर्वस्यै उचित विकल्प होगा।

Additional Informationसर्व (सब) सर्वनाम शब्दरूप का स्त्रीलिंग में प्रयोग निम्नलिखित है -

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमासर्वासर्वेसर्वाः
द्वितीयासर्वेसर्वेसर्वाः
तृतीयासर्वयासर्वाभ्याम्सर्वाभिः
चतुर्थीसर्वस्यैसर्वाभ्याम्सर्वाभ्यः
पंचमीसर्वस्याःसर्वाभ्याम्सर्वाभ्यः
षष्ठीसर्वस्याःसर्वयोःसर्वासाम्
सप्तमीसर्वस्याम्सर्वयोःसर्वासु
78

धनस्य महत्तां कस्मिन् वाक्येऽकथयत् ? 

  1. ((a))

    सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति

  2. ((b))

    अर्थो हि कन्या परकीय एव

  3. ((c))

    विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः 

  4. ((d))

    न हि गणयति क्षुद्रो जन्तुः परिग्रहफल्गुताम्

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Answer: ((a))

सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति

प्रश्नानुवाद - धन की महत्ता किस वाक्य में कही गयी है ? 

स्पष्टीकरण - धन की महत्ता इस वाक्य में कही गयी है - सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति अर्थात् सभी गुण सोने/धन में आश्रित होते हैं

यह पंक्ति नीति शतक में उल्लिखित है। इस श्लोक में धन की महत्ता बतायी गयी है।

श्लोक -

यस्यास्ति वित्तं सः नरः कुलीनः, सः पण्डितः सः श्रुतवान् गुणज्ञः।

सः एव वक्ता सः च दर्शनीयः, सर्वे गुणाः काञ्चनम् आश्रयन्ते।।

अर्थात् जिस व्यक्ति के पास धन है, वह व्यक्ति उच्च कुल वाला है, वह ज्ञानी है, गुणवान है और वह ही वक्ता है। केवल वही देखने योग्य है, क्योंकि सभी गुणों का आश्रय स्वर्ण (धन) में है अर्थात् सभी गुणों का निवास धन में ही है।

श्लोक के अर्थ से स्पष्ट है, अतः यहाँ धन की महत्ता सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति इस वाक्य द्वारा कही गयी है।

79

'अहो दुरन्ता बलवद्विरोधिता' इतीयमुक्तिरस्ति-

  1. ((a))

    वनेचरस्य

  2. ((b))

    युधिष्ठिरस्य

  3. ((c))

    द्रौपद्याः

  4. ((d))

    भीमसेनस्य

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Answer: ((a))

वनेचरस्य

प्रश्न का अनुवाद-  'अहो दुरन्ता बलवद्विरोधिता' यह उक्ति है-

स्पष्टीकरण - 'अहो दुरन्ता बलवद्विरोधिता' यह उक्ति वनेचर द्वारा युधिष्ठिर को कही जाती है। जो उनका गुप्तचर था। वह दुर्योधन की दशा में बताता है।

किरातार्जुनीयम्-

  • किरातार्जुनीयम् (अर्थ : किरात और अर्जुन की कथा) महाकवि भारवि द्वारा सातवीं शताब्दी में रचित महाकाव्य है, जिसे संस्कृत साहित्य के 'बृहत्त्रयी' में स्थान प्राप्त है।
  • महाभारत में वर्णित किरात वेशधारी शिव के साथ अर्जुन के युद्ध की लघुकथा को आधार बनाकर कवि ने राजनीति, धर्मनीति, कूटनीति, समाजनीति, युद्धनीति, जनजीवन आदि का मनोरम वर्णन किया है।
  • यह काव्य विभिन्न रसों से ओत-प्रोत रचना है, किन्तु यह वीर रस प्रधान है।
  • संस्कृत के तीन प्रसिद्ध महाकाव्य हैं – किरातार्जनुयीयम्‌ (भारवि), शिशुपालवधम्‌ (माघ) और नैषधीयचरितम्‌ (श्रीहर्ष) – ये बृहत्त्रयी कहलाते हैं।

Key Pointsउपरोक्त सूक्ति किरातार्जुनीयम् महाकाव्य के श्लोक की है-

प्रलीनभूपालमपि स्थिरायति प्रशासदावारिधि मण्डलं भुवः।

स चिन्तयत्येव भियस्त्वदेष्यतीरहो दुरन्ता ब���वद्विरोधिता।।

अर्थ: वह दुर्योधन (शत्रु) राजाओं के विनष्ट हो जाने के कारण सुस्थिर भूमण्डल पर समुद्रपर्यन्त राज्य शासन करते हुए भी आप की ओर से आने वाली विपदा के भय से चिन्तित ही रहता है। क्यों न ऐसा हो, बलवान के साथ का वैर-विरोध अमङ्गलकारी ही होता है

अतः यह स्पष्ट है कि 'अहो दुरन्ता बलवद्विरोधिता' यह उक्ति वनेचर द्वारा कही गयी है।

80

'राजपुरुषः' इति उदाहरणमस्ति-

  1. ((a))

    द्वन्द्वस्य

  2. ((b))

    बहुव्रीहे:

  3. ((c))

    समानाधिकरणतत्पुरुषस्य

  4. ((d))

    व्यधिकरणतत्पुरुषस्य

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Answer: ((d))

व्यधिकरणतत्पुरुषस्य

प्रश्नानुवाद - 'राजपुरुषः' यह उदाहरण है-

स्पष्टीकरण - राजपुरुषः यह शब्द व्यधिकरण तत्पुरुष समास का उदाहरण है। (व्यधिकरण तत्पुरुष समास के सात भेद हैं, जो द्वितीया विभक्ति से सप्तमी विभक्ति तक और नञ् तत्पुरुष समास होता है।)

  • पद - राजपुरुषः
  • समास विग्रह - राज्ञः पुरुषः
  • समास - व्यधिकरण तत्पुरुष समास (षष्ठी विभक्ति)

सूत्र - ‘उत्तरपदप्रधान तत्पुरुषः' इस सूत्र के अनुसार जिस समास में उत्तरपद प्रधान होता है, वह तत्पुरुष समास है। तत्पुरुष समास में दोनों पदों का संबंध विभक्ति से दिखाया जाता है तथा पूर्वपद के विभक्ति का लोप होता है।

राजपुरुषः इस सामासिक पद में षष्ठी इस सूत्र से राज्ञः पुरुषः यह समास विग्रह होता है।

उदाहरण​

  • सूर्यस्य उदयः - सूर्योदयः।
  • देवानां भाषा - देवभाषा।
  • राज्ञः पुत्रः - राजपुत्रः।

 

अतः यह स्पष्ट होता है कि राजपुरुषः व्यधिकरण तत्पुरुष समास का उदाहरण है।

Additional Information

‘समसनं समासम्’ संक्षिप्त करना ही समास होता है अर्थात् दो या दो से अधिक पदों के विभक्ति, समुच्चय बोधक च आदि को संक्षेप करके एक पद बनाने को समास कहते है- ‘अनेकाषां पदानां एकपदी भवनं समासः।’ इसमें पूर्व और उत्तर दो पद होते हैं। यथा-

  • पित्रा युक्तः = पितृयुक्तः
  • यूपाय दारु = यूपदारु
  • माता च पिता च = पितरौ

समास भेद:- प्रायः समास के पाँच प्रकार बताये गए हैं-

(1) केवलसमास:- ‘विशेषसंज्ञाविनिर्मुक्तः केवल समासः’ अर्थात् विशेष संज्ञा रहित जहाँ केवल समास हो। जैसे:- पूर्वं भूतः = भूतपूर्वः

(2) अव्ययीभाव:- ‘प्रायेण पूर्वपदार्थप्रधानोऽव्ययीभावो’ अर्थात् जहाँ पूर्व पद प्रधान हो तथा अव्यय हो। जैसे:- मतिम् अनतिक्रम्य = यथामति

(3) तत्पुरुष:- ‘उत्तरपदार्थप्रधानस्तत्पुरुषः’ अर्थात् जहाँ उत्तरपद प्रधान हो दोनों पद में अलग-अलग और कभी-कभी समान विभक्ति होती है तथा पूर्वपद के विभक्ति का लोप होता है।

तत्पुरुष समास के भेद:- इसके दो भेद होते हैं-

A) व्यधिकरण तत्पुरुष:- इसके सात प्रकार होते हैं-

द्वितीया तत्पुरुष:- श्रित, अतीत, आगतादि शब्द यदि उत्तरपद हो तो द्वितीया तत्पुरुष समास होता है। जैसे:-

  • कृष्णं श्रितः = कृष्णश्रित
  • दुःखम् अतीत = दुःखातीत
  • सुखाद् अपेतः = सुखापेतः।

तृतीया तत्पुरुष:- हीन, विद्ध आदि शब्द यदि उत्तरपद हो तो तृतीया तत्पुरुष समास होता है। जैसे:-

  • सर्पेण दष्टः = सर्पदष्टः
  • शरेण विद्धः = शरविद्धः
  • विद्यया हीनः = विद्याहीनः।

चतुर्थी तत्पुरुष:- बलि, अर्थ, तदर्थ आदि शब्द यदि उत्तरपद हो तो चतुर्थी तत्पुरुष समास होता है। जैसे:-

  • भूताय बलिः = भूतबलिः
  • स्नानाय इदम् = स्नानार्थम्
  • तस्मै इदम् = तदर्थम्।

पञ्चमी तत्पुरुष:- भय, मुक्त, पतित आदि शब्द यदि उत्तरपद हो तो पञ्चमी तत्पुरुष समास होता है। जैसे:-

  • चौरद् भयम् = चौरभयम्
  • रोगात् मुक्तः = रोगमुक्तः
  • स्वर्गात् पतितः = स्वर्गपतितः

षष्ठी तत्पुरुष:- जब समस्त पद में दोनों पद एक दूसरे से सम्बन्धित हो, तो षष्ठी तत्पुरुष होता है। जैसे-

  • राज्ञः पुरुषः = राजपुरुषः
  • गङ्गायाः जलम् = गङ्गाजलम्

सप्तमी तत्पुरुष:- शौण्ड, चतुर, कुशल आदि शब्द यदि उत्तरपद हो तो सप्तमी तत्पुरुष समास होता है। जैसे:-

  • सभायां पण्डितः = सभापण्डितः
  • कर्मणि कुशलः = कर्मकुशलः

नञ् तत्पुरुष:- जहाँ पूर्वपद अ, अन् अथवा न हो वहाँ नञ् तत्पुरुष समास होता है। जैसे:-

  • न ज्ञानम् = अज्ञानम्
  • न आदि = अनादि
  • न आस्तिक = अनास्तिक

B) समानाधिकरण तत्पुरुष:- इसके दो भेद होते हैं-

कर्मधारय:- विशेषण-विशेष्य तथा उपमानोपमेय पदों का परस्पर समास हो तो कर्मधारय समास होता है। जैसे:-

  • नीलम् उत्पलम् = नीलोत्पलम्
  • चन्द्र इव मुखम् = चन्द्रमुखम्

द्विगु:- जब विशेषण संख्यावाची हो तो द्विगु समास होता है। जैसे:-

  • त्रयाणां भुवनानां समाहारः = त्रिभुवनम्
  • सप्तानां दिनानां समाहारः = सप्तदिनम्

(4) द्वन्द्व:- ‘उभयपदार्थप्रधानो द्वन्द्वः’ जहाँ दोनों पद प्रधान ह���। इसके विग्रह में च जुडता है।

  • माता च पिता च = पितरौ
  • हरिः च हरः च = हरिहरौ

इसके तीन प्रकार हैं-

  1. इतरेतर द्वन्द्व
  2. एकशेष द्वन्द्व
  3. समाहार द्वन्द्व

(5) बहुव्रीहि:- ‘अन्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिः’ जहाँ अन्य पद प्रधान हो। जैसे:-

  • पीतम् अम्बरं यस्य सः = पीताम्बरः (हरिः)
  • लम्बः उदरः यस्य सः = लम्बोदरः (गणेशः)
81

"कोऽन्यो हुतवहाद् दग्धुं प्रभवति ?” इति का कथयति ?

  1. ((a))

    अनसूया

  2. ((b))

    शकुन्तला

  3. ((c))

    प्रियंवदा

  4. ((d))

    गौतमी

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Answer: ((a))

अनसूया

प्रश्न का अनुवाद- "कोऽन्यो हुतवहाद् दग्धुं प्रभवति ?” यह कथन किसका है?

अभिज्ञानशाकुन्तलम्-

  • अभिज्ञान शाकुन्तलम् महाकवि कालिदास का विश्वविख्यात नाटक है।
  • इसमें राजा दुष्यन्त तथा शकुन्तला के प्रणय, विवाह, विरह, प्रत्याख्यान तथा पुनर्मिलन की एक सुन्दर कहानी है।
  • पौराणिक कथा में दुष्यन्त को आकाशवाणी द्वारा बोध होता है पर इस नाटक में कवि ने मुद्रिका द्वारा इसका बोध कराया है।

Important Pointsअनसूया कहती है की, अग्नि के सिवाय कौन जला सकता है? यहा अग्नि से अभिप्राय दुर्वासा से है।

अनसूया गंभीर स्वभाव की है। ऋषि दुर्वासा के शाप को सुनकर जब प्रियंवदा घबरा जाती है, तब अनसूया उसे ऋषि दुर्वासा को मनाकर शाप की समाप्ति का उपाय जानने के लिये प्रेरित करते है।

इसप्रकार "कोऽन्यो हुतवहाद् दग्धुं प्रभवति ?” यह कथन अनसूया का है।

82

लक्ष्मीं प्रति किमकथयत् ?

  1. ((a))

    सरस्वतीपरिगृहीतमीर्ष्ययेव नालिङ्गति

  2. ((b))

    वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनचरैः सह 

  3. ((c))

    संतप्तानां त्वमसि शरणम्

  4. ((d))

    जातं वंशे भुवनविदिते

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Answer: ((a))

सरस्वतीपरिगृहीतमीर्ष्ययेव नालिङ्गति

प्रश्न का अनुवाद- लक्ष्मी के प्रति क्या कथन किया गया है?

शुकनासोपदेश-

  • शुकनासोपदेशः (शुकनास का उपदेश), कादम्बरी का ही एक अंश है। यह एक उपदेशात्मक ग्रंथ है।
  • इसमें राजा तारापीड का नीतिनिपुण एवं अनुभवी मन्त्री शुकनास राजकुमार चन्द्रापीड को राज्याभिषेक के पूर्व वात्सल्य भाव से उपदेश देते हैं और रूप, यौवन, प्रभुता तथा ऐश्वर्य से उद्भूत दोषों से सावधान रहने की शिक्षा देते हैं। यह प्रत्येक युवक के लिए उपादेय उपदेश है। इसमें बाणभट्ट की शब्दचातुरी प्रदर्शित हुई है।
  • शुकनासोपदेश का नायक राजकुमार चन्द्रापीड है, जो सत्व, शौर्य और आर्जव भावों से युक्त है।
  • शुकनास एक अनुभवी मन्त्री हैं जो चन्द्रापीड को राज्याभिषेक के पूर्व वात्सल्यभाव से उपदेश देते हैं। वे उसे युवावस्था में सुलभ रूप, यौवन, प्रभुता एवं ऐश्वर्य से उद्भूत दोषों के विषय में सावधान कर देना उचित समझते हैं। इसे युवावस्था में प्रवेश कर रहे समस्त युवकों को प्रदत्त ‘दीक्षान्त भाषण’ कहा जा सकता है।
  • शुकनास राजकुमार चन्द्रापीड को अनर्थ परंपरा एवं युवावस्था का प्रभाव, गुरुपदेश का महिमा, लक्ष्मी की प्रकृति, राजाओंं के प्रति लक्ष्मी का आचरण इन विषयोंं पर उपदेश करते है।
  • उस में लक्ष्मी का स्वभाव एवं प्रकृति स्पष्ट करते हुए शुकनास सरस्वतीपरिगृहीतमीर्ष्ययेव नालिङ्गति जनम् । यह वक्तव्य करते है अर्थात लक्ष्मी विद्वान जनोंं को अर्थात जो सरस्वती के पास जाते है, ईर्ष्यावश वो उन जनोंं को आलिंगन नही करती।

 

अत: यह स्पष्ट होता है की, सरस्वतीपरिगृहीतमीर्ष्ययेव नालिङ्गति यह कथन लक्ष्मी के लिये आया है।

83

पञ्चत्रिंशदधिकद्विशतम् बोधयति-

  1. ((a))

    253

  2. ((b))

    235

  3. ((c))

    532

  4. ((d))

    335

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Answer: ((b))

235

प्रश्नानुवाद - पञ्चत्रिंशदधिकद्विशतम् से बोध होता है-

स्पष्टीकरण - पञ्चत्रिंशदधिकद्विशतम् से 235 का बोध होता है।

पञ्चत्रिंशदधिकद्विशतम् अर्थात् पञ्चत्रिंशदधिक 35 ज्यादा या अधिक (कितने) + द्विशतम् (200)

संस्कृत में संख्या लिखते समय छोटी संख्या को पहले तथा बड़ी सख्या को बाद में लिखा जाता है। 

साथ ही छोटी संख्या के बाद अधिक या उत्तर जोड़ दिया जाता है।

इस तरह पञ्चत्रिंशदधिकद्विशतम् - 35 + 200 = 235

अतः स्पष्ट है कि पञ्चत्रिंशदधिकद्विशतम् से 235 संख्या का बोध होता है।

Additional Information

अन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण -

  • 253 - त्रिपञ्चाशदधिकद्विशतम्। (53 + 200)
  • 532 - द्वित्रिंशदधिकपञ्चशतम्। (32 + 500)
  • 335 - पञ्चत्रिंशदधिकत्रिशतम्। (35 + 300)
84

'हरये' इत्यत्र सन्धिप्रयोजकं सूत्रमस्ति-

  1. ((a))

    इको यणचि

  2. ((b))

    एचोऽयवायावः

  3. ((c))

    लोपः शाकल्यस्य

  4. ((d))

    एङः पदान्तादति

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Answer: ((b))

एचोऽयवायावः

प्रश्नानुवाद - 'हरये' यहाँ सन्धि प्रयोजक सूत्र है-

स्पष्टीकरण-

अयादि सन्धि का सूत्र-

सूत्र - "एचोऽयवायावः"

नियम - पद के अन्त में एच् प्रत्याहार (ए,ओ, ऐ, औ) वर्ण हो और बाद में कोई स्वर हो तो एच् प्रत्याहार के स्थान क्रमशः पर अय्, अव्, आय् तथा आव् हो जाता हैI  

  • ए को अय्
  • ओ को अव्
  • ऐ को आय्
  • औ को आव्

उदाहरण 

  • हरे + ए
  • हर् ए + ए (ए के स्थान पर अय्)
  • हर् अय् + ए
  • हरये

अन्य उदाहरण

  • विष्णो + ए = विष्णवे (ओ का अव्)
  • पौ + अकः = पावकः (औ का आव्)

 

अतः स्पष्ट है कि यहाँ हरये शब्द में एचोऽयवायावः सन्धि प्रयोजक सूत्र है।

85

'कुलटा' इत्यत्र केन नियमेन सन्धिर्जातः ?

  1. ((a))

    अकः सवर्णे दीर्घः

  2. ((b))

    आद् गुणः

  3. ((c))

    शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम्

  4. ((d))

    एङः पदान्तादति

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Answer: ((c))

शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम्

प्रश्नानुवाद - 'कुलटा' यहाँ किस नियम से सन्धि हुयी है ?

स्पष्टीकरण - कुलटा पद में शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम् इस वार्तिक के अनुसार अच सन्धि हुयी है। जो अकः सवर्णे दीर्घः सूत्र का अपवाद है।

  • पद - कुलटा
  • संधिविच्छेद - कुल + अटा

वार्तिक'शकन्ध्वादिषु पररूपम् वाच्यम्’ इस वार्तिक से शकन्धु आदि के ‘टि’(अन्त्य स्वर और अन्त्य स्वर के साथ जो व्यञ्जन होता है) में पररूप सन्धि एकादेश होता है।

उदाहरण-

शक + अन्धुः → शक् अन्धुः = शकन्धुः

मनस् + ईषा → मन् ईषा = मनीषा

कर्क + अन्धु → कर्क् अन्धुः = कर्कन्धु

कुल + अटा → कुल् अटा = कुलटा

पतत् + अञ्जलिः → पत् + अञ्जलिः = पतञ्जलिः

यहाँ कुल् के अ की टि संज्ञा होती है और उसके स्थान पर पररूप 'अ' का आदेश हो जाता है और 'कुलटा' रूप बनता है।

अतः स्पष्ट है कि ‘कुलटा’ पद में शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम् इस वार्तिक के अनुसार सन्धि हुयी है।

86

भी धातोः विधिलिङि प्रथमपुरुषैकवचनस्य रूपमस्ति-

  1. ((a))

    बिभेत्

  2. ((b))

    बिभियात्

  3. ((c))

    बिभ्यतु

  4. ((d))

    बिभित

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Answer: ((b))

बिभियात्

प्रश्नानुवाद - भी धातु का विधिलिङ् में प्रथमपुरुष एकवचन का रूप है-

स्पष्टीकरण - भी (डरना) धातु का विधिलिङ् लकार के प्रथमपुरुष एकवचन में बिभियात् रूप बनता है। यहाँ प्रत्येक पुरुष और वचन में दो रूप प्राप्त होते हैं।

अतः स्पष्ट है कि यहाँ बिभियात् उचित विकल्प होगा।

Additional Information

भी (डरना) धातु का विधिलिङ्लकार में प्रयोग निम्नलिखित है-

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमपुरुषबिभियात्/ बिभीयात्बिभियाताम्/ बिभीयाताम्बिभियुः/ बिभीयुः
मध्यमपुरुषबिभियाः/ बिभीयाःबिभियातम्/ बिभीयातम्बिभियात/ बिभीयात
उत्तमपुरुषबिभियाम्/ बिभीयाम्बिभियाव/ बिभीयावबिभियाम/ बिभीयाम

 

अन्य विकल्प -

  • बिभेत् - यह अशुद्ध शब्द है - यह रूप प्राप्त नहीं होता है।
  • बिभ्यतु - यह रूप भी धातु के लोट्लकार के प्रथमपुरुष-बहुवचन का रूप है।
  • बिभित - यह अशुद्ध है, जबकि बिभितः रूप भी धातु के लट्लकार के प्रथमपुरुष-द्विवचन का रूप है।
87

'आः अतिथिपरिभाविनि' - अस्य कथनस्य कथनकारः

  1. ((a))

    महर्षि विश्वामित्रः 

  2. ((b))

    महर्षि मारीचः

  3. ((c))

    महर्षि कण्वः 

  4. ((d))

    महर्षि दुर्वासा

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Answer: ((d))

महर्षि दुर्वासा

प्रश्नानुवाद - 'आः अतिथिपरिभाविनि!' इस कथन को कहने वाले है -

स्पष्टीकरण - यह कथन महर्षि दुर्वासा के द्वारा शकुन्तला को कहा गया।

  • प्रस्तुत पंक्ति अभिज्ञान शाकुन्तलम् नाटक की है। इस नाटक में दुष्यन्त और शकुन्तला के परिणय की कहानी है। इस नाटक के रचयिता महाकवि कालिदास है।
  • प्रस्तुत श्लोक में महर्षि दुर्वासा ऋषि शकुन्तला को शाप देते हुए कहते हैं कि -

श्लोक -

'आः अतिथिपरिभाविनि!'

विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा तपोधनं न वेत्थि मामुपस्थितम्।

स्मरिष्यति त्वां न स बोधितोऽपि सन् कथां प्रमत्तः प्रथमं कृतामिव।।

  • अर्थ - ओह! ओ अतिथि का अपमान करने वाली! जिसके ध्यान में इतनी मग्न होकर तू मुझ जैसे तपस्वी के आने की भी सुध नहीं ले रही है, वह (दुष्यन्त) बहुत स्मरण दिलाने पर भी तुझे उसी प्रकार भूल जाएगा, जैसे पागल मनुष्य अपनी पिछली सारी बातें भूल जाया करता है।
  • श्लोक की पंक्ति से स्पष्ट है कि शकुन्तला दुष्यन्त के विषय में सोच रही है, जिस कारण वह महर्षि दुर्वासा का अतिथि सत्कार नहीं कर पाती, जिस कारण दुर्वासा उसे शाप देते हैं। इस तरह स्पष्ट है कि यह पंक्ति दुर्वासा द्वारा कही गयी।

 

अतः स्पष्ट है कि यह पंक्ति महर्षि दुर्वासा के द्वारा कही गयी है।

88

शुकनासो यमुपदिष्टवान्, स उपदेशानन्तरं कुत्र जगाम ?

  1. ((a))

    मातुरन्तिकम्

  2. ((b))

    पितुरन्तिकम्

  3. ((c))

    स्वभवनम्

  4. ((d))

    स्वोपवनम्

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Answer: ((c))

स्वभवनम्

प्रश्नानुवाद - शुकनास ने जिनको उपदेश दिया, वह उपदेश के बाद कहाँ गया ?

स्पष्टीकरण - शुकनास राजा तारापीड के महामन्त्री थे। उन्होंने राजा के पुत्र चन्द्रापीड को उपदेश दिया। जो मन्त्री का नीति आधारित उपदेश सुनने के पश्चात् अपने भवन को गया।

  • महाकवि बाणभट्ट द्वारा विरचित कादम्बरी काव्य के अन्तर्गत शुकनासोपदेश ग्रन्थ आता है।
  • इस ग्रन्थ में शुकनास राजा तारापीड का मन्त्री है। वह राजा तारापीड के पुत्र चन्द्रापीड को उपदेश देता है। इसलिए इसे शुकनासोपदेश कहा जाता है।
  • शुकनास से उपदेश सुनने के बाद राजा का पुत्र अपने भवन को गया। जैसा शुकनासोपदेश में उल्लिखित पंक्ति है -
  • उपशान्तवचसि शुकनासे चन्द्रापीडस्ताभिरमलाभिः उपदेशवाग्भिः प्रक्षालित इव, उन्मीलित इव, स्वच्छीकृत इव, निर्मृष्ट इव, अभिषिक्त इव, अभिलिप्त इव, अलङ्कृत इव, पवित्रीकृत इव, उद्भासित इव प्रीतहृदयो मुहूर्तं स्थित्वा स्वभवनमाजगाम
  • अर्थात् इस प्रकार उपदेश देकर शुकनास के मौन हो जाने पर उनके पवित्र उपदेश की सरस्वती से मानो धुलकर, मानो प्रफुल्लित होकर, स्वच्छ होकर, आभूषणों से सुसज्जित होकर, पवित्र होकर, चमत्कृत होकर, प्रसन्न मन से युक्त चन्द्रापीड कुछ देर तक रुक कर वहाँ से खुशी-खुशी अपने महल को लौट आया

 

इस तरह स्पष्ट है कि शुकनास का उपदेश सुनने के पश्चात्, वह युवराज चन्द्रापीड अपने महल को गया

89

 कः 'पयःपूरपूरितान्यकूपारतलानि' मरुकरोति ?

  1. ((a))

    योगिराजः

  2. ((b))

    भगवान् कालः

  3. ((c))

    शिववीरः

  4. ((d))

    महमूद गजनी

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Answer: ((b))

भगवान् कालः

प्रश्न का अनुवाद- जल प्रवाह से पूर्ण समुद्र तल को मरूभूमि कौन बना देता है?

शिवराजविजयम्-

पंडित अम्बिकादत्त व्यासजी ने छत्रपति शिवाजी के जीवन पर 'शिवराजविजयम्' नामक गद्यकाव्य की रचना की है, जो 'कादम्बरी' की शैली में रचित है।

पंडित जितेन्द्रियाचार्य द्वारा संशोधित 'शिवराजविजयम्' की, 6 आवृत्तियां प्रकाशित हो चुकी हैं। 

यह कथन व्यास जी के शिवराजविजय के प्रथम नि:श्वास में है। इसमे भगवान महाकाल की विशेषता का वर्णन किया गया है। 

अत: यह स्पष्ट होता है की, जल प्रवाह से पूर्ण समुद्र तल को मरूभूमि 'भगवान महाकाल' बना देता है।

90

अच् प्रत्याहारेण न बोधितो भवति-

  1. ((a))

     च्

  2. ((b))

  3. ((c))

    ऋ 

  4. ((d))

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Answer: ((a))

 च्

प्रश्नानुवाद - अच् प्रत्याहार से बोध नहीं होता है- 

स्पष्टीकरण - अच् प्रत्याहार से च् का बोध नहीं होता है। च् की इत्संज्ञा होने से उसका लोप हो जाता है।

  • अच् प्रत्याहार की रचना चार सूत्रों से मिलकर हुयी है। जिसमें अइउण्, ऋलृक्, एओङ्, ऐऔच् - ये चार सूत्र आते हैं।
  • जिसमें - अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ - इन नौ वर्णों की गणना की जाती है। सभी सूत्रों के अन्तिम वर्ण की इत्संज्ञा होने के कारण उनकी गणना नहीं की जाती है।
  • अच् प्रत्याहार में सभी नौ स्वर आ जाते हैं।

 

अतः स्पष्ट है कि अच् प्रत्याहार से च् का बोध नहीं होता है।

Important Points

  • संस्कृत व्याकरण की रचना महर्षि पाणिनि द्वारा की गई।
  • पाणिनि व्याकरण में 14 सूत्र है। जिन्हें माहेश्वर सूत्र भी कहते हैं।
  • इन 14 सूत्रों के आधार पर 42 प्रत्याहारों की रचना होती है।
  • इन 14 सूत्रों के अन्तिम वर्ण की अन्त्य संज्ञा होने से उनकी गणना नहीं की जाती है।
  • पहले चार सूत्रों में स्वरों की गणना की गयी है। इसे अच् प्रत्याहार कहते है।
  • हयवरट् सूत्र से लेकर हल् अन्तिम सूत्र तक व्यंजनों की गणना की गयी है। इसे हल् प्रत्याहार कहते हैं।

14 माहेश्वर सूत्र निम्नलिखित है -

क्र.सं.सूत्रसूत्रों में आने वाले वर्ण
1अइउण्अ इ उ
2ऋलृक्ऋ लृ
3एओङ्ए ओ
4ऐऔच्ऐ औ
5हयवरट्ह य व र
6लण्
7ञमङणनम्ञ म ङ ण न
8झभञ्झ भ
9घढधष्घ ढ ध
10जबगडदश्ज ब ग ड द
11खफछठथचटतव्ख फ छ ठ थ च ट त
12कपय्क प
13शषसर्श ष स
14हल्
91

नीतिशतकानुसारं मूर्खाणाम् आभूषणं किम् ?

  1. ((a))

    हारः

  2. ((b))

    वाचालत्वम्

  3. ((c))

    मौनम्

  4. ((d))

    करस्थं पुस्तकम्

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Answer: ((c))

मौनम्

प्रश्नानुवाद - नीतिशतक के अनुसार मूर्खों का आभूषण क्या है?

स्पष्टीकरण - नीति शतक के रचयिता भर्तृहरि है। इस ग्रन्थ के अनुसार मूर्खों का आभूषण मौन है। जैसा कि श्लोक में कहा गया है-

श्लोक-

स्वायत्तमेकान्तगुणं विधात्रा विनिर्मितं छादनमज्ञतायाः।      

विशेषतः सर्वविदां समाजे विभूषणं मौनमपण्डितानाम्

अर्थ - अपनी मूर्खता को छिपाने के लिए भगवान ने मूर्खों को मौन धारण करने का एक अद्भुत सुरक्षा कवच दिया है, जो उनके अधीन भी है। विद्वानों से भरी सभा में मौन रहना मूर्खों के लिये आभूषण से कम नहीं है। 

श्लोक से स्पष्ट है कि नीतिशतक के अनुसार मूर्खों का आभूषण मौन है।

अतः यहाँ मौन उचित विकल्प होगा।

92

कोऽस्ति प्रधानो रसः शिवराजविजयस्य ?

  1. ((a))

    करुणः

  2. ((b))

    वीरः

  3. ((c))

    शृङ्गार

  4. ((d))

    रौद्रः

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Answer: ((b))

वीरः

प्रश्नानुवाद - शिवराजविजय का प्रधान रस कौनसा है ?-

स्पष्टीकरण - शिवराजविजय ग्रन्थ में वीर रस की प्रधानता है। अन्य रसों का उपयोग सहायक रस के रूप में हुआ है। यह राष्ट्रभक्ति भावना से ओत-प्रोत संस्कृत उपन्यास है। इस ग्रन्थ के रचयिता अम्बिकादत्त व्यास है।

किसी काव्य की पंक्ति को पढ़कर मन में भाव जागृत होते हैं एवं अलौकिक आनंद की अनुभूति होती है। ये मन के भाव ही रस कहलाते हैं। "वाक्यं रसात्मकं वाक्यं" अर्थात् रस युक्त वाक्य ही काव्य है। रस को काव्य की आत्मा कहा जाता है। 

  • इस ग्रन्थ में शिवाजी महाराज की विजय का वर्णन है।
  • इस ग्रन्थ में तीन विराम है। प्रत्येक विराम में चार निःश्वास हैं। इस तरह कुल 12 निःश्वास हैं।
  • यह संस्कृत का प्रसिद्ध उपन्यास है। इस ग्रन्थ में वीर रस की प्रधानता है।
  • इसका कथानक इस प्रकार है – दक्षिण देश में (यवन) शासकों के अत्याचारों से तगं आकर शिवाजी (शिवराज) स्वतन्त्रता के  लिए संघर्ष आरम्भ करते हैं और उन्हें इस कार्वय में सफलता भी मिलती है। उनकी विजय से घबराकर बीजापुर का शासक उन्हें मारने के लिए अफजल खान को भेजता है। वे उसे भी मौत के घाट उतार देते हैं। कवि ने शिवाजी के मुख से सम्पूर्ण राष्ट्र की मुक्ति की उद्घोषणा करवायी है – ‘कार्यं हि साधयेयं देहं वा पातयेयम्।'
  • कवि ने प्रस्तुत उपन्यास में ऐतिहासिक पात्रों के अतिरिक्त अन्य अनेक पात्रों की परिकल्पना की है।
  • शिवराज विजय तत्कालीन स्वाधीनता संग्राम के लिए एक प्रेरणादायी मार्गदर्शक काव्य सिद्ध हुआ है।

 

अतः स्पष्ट है कि शिवराजविजय ग्रन्थ में वीर रस की प्रधानता है। जो एक प्रसिद्ध संस्कृत उपन्यास है।

93

'येषां न विद्या न तपो न दानं ..... मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति'।। - अस्मिन् श्लोके ‘मृगाः' इति पदस्यार्थोऽस्ति-

  1. ((a))

    हरिणाः

  2. ((b))

    पशवः

  3. ((c))

     गर्दभाः

  4. ((d))

    वृषभाः

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Answer: ((b))

पशवः

प्रश्नानुवाद - 'येषां न विद्या न तपो न दानं ..... मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति'।। - इस श्लोक में ‘मृगाः' इस पद का अर्थ है-

स्पष्टीकरण - प्रस्तुत श्लोक में मृगाः शब्द का अर्थ पशवः के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।

प्रस्तुत श्लोक संस्कृत साहित्य का प्रसिद्ध श्लोक है-

श्लोक -

येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।

ते मृत्युलोके भुवि भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति

श्लोकार्थ - जिनके पास विद्या, तप, दान, ज्ञान, शील, गुण और धर्म ये नहीं होते हैं, वे पृथ्वी पर भार स्वरूप मनुष्य रूप में पशु के समान विचरण करते हैं।

इस तरह श्लोक से स्पष्ट है, अत यहाँ पशवः उचित विकल्प है।

94

"प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा' इत्यस्मिन् पद्यांशे कोऽलङ्कारः?

  1. ((a))

    उपमा

  2. ((b))

    उत्प्रेक्षा

  3. ((c))

    रूपकम्

  4. ((d))

    दीपकम्

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Answer: ((b))

उत्प्रेक्षा

प्रश्न का अनुवाद- "प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा' इस पद्यांश में कौनसा अलंकार है?

स्पष्टीकरण - प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा - इस पद्यांश में उत्प्रेक्षा अलंकार है। यह पद्यांश अभिज्ञानशाकुन्तलम् के श्लोक का है।

उत्प्रेक्षा अलंकार-

''उपमेयस्य उपमानरूपे सम्भावना उत्प्रेक्षा अलंकारः।''

उत्प्रेक्षावाचक शब्द - मन्ये, शङ्के, ध्रुवम्, प्रायः, नूनम्, इव आदि इनमें इव का प्रयोग उपमा में भी होता है। अन्तर यह है कि इव शब्द जब उत्प्रेक्षा का वाचक होता है, तब क्रिया के साथ प्रयुक्त होता है और जब उपमा का वाचक होता है, तब संज्ञा के साथ।

जहाँ पर उपमान के न होने पर उपमेय को ही उपमान मान लिया जाए। अर्थात् जहाँ पर अप्रस्तुत को प्रस्तुत मान लिया जाए वहाँ पर उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। 

Additional Informationश्लोक -

अर्थो हि कन्या परकीय एव तामद्य सम्प्रेष्य परिगृहीतुः।

जातो ममायं विशदः प्रकामं प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा

अर्थ - कन्या वास्तव में पराया धन होती हैं। आज उसे (शकुंतला को) पति के पास भेजकर मेरा मन वैसे ही निश्चिन्त हो गया है, जैसे किसी की धरोहर वापस कर दी गई हो।

यह श्लोक अभिज्ञान शाकुंतलम् के चतुर्थ अंक से है। जिसमें महर्षि कण्व ने कहा है - 'अर्थो हि कन्या परकीय एव' अर्थात् कन्या पराया धन होता है। यह शकुंतला विदाई के समय का वर्णन है। यह महाकवि कालिदास की रचना है। 

अतः स्पष्ट है कि यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार उचित विकल्प है।

95

किरातार्जुनीयमिति महाकाव्यस्य स्रोतं किम् ?

  1. ((a))

    भागवतपुराणम्

  2. ((b))

    शिवपुराणम्

  3. ((c))

    दशरथजातकम्

  4. ((d))

    हितोपदेशम्

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Answer: ((b))

शिवपुराणम्

प्रश्न का अनुवाद- किरातार्जुनीयम् महाकाव्य का मूल स्रोत कौनसा है?

किरातार्जुनीयम्-

  • किरातार्जुनीयम् प्रसिद्ध प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में से एक है। इसे एक उत्कृष्ट काव्य रचना माना जाता है।
  • इसके रचनाकार महाकवि भारवि हैं, जिनका समय छठी-सातवीं शताब्दी माना जाता है।
  • यह रचना 'किरात' रूपधारी शिव एवं पांडु पुत्र अर्जुन के बीच हुए धनुर्युद्ध तथा वार्तालाप पर आधारित है।
  • किरातार्जुनीयम् का स्रोत महाभारत में स्थित 'शिवपुराण' यह है।

अत: यह स्पष्ट होता है की, शिवपुराण ही किरातार्जुनीयम् का मूल स्रोत है।

96

‘पतिः' इति शब्दस्य तृतीया विभक्तौ एकवचने रूपमस्ति-

  1. ((a))

    पत्या

  2. ((b))

    पतिना

  3. ((c))

    पत्येन

  4. ((d))

    पतीना

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Answer: ((a))

पत्या

प्रश्नानुवाद - ‘पतिः' इस शब्द का तृतीया विभक्ति में एकवचन में रूप है- 

स्पष्टीकरण - ‘पति' शब्द रूप इकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दरूप है। 

‘पति’ शब्द की तृतीया विभक्ति एकवचन में पत्या रूप प्राप्त होता है।

अतः यहाँ पत्या उचित विकल्प है।

Additional Information

‘पति’ इकारान्त पुल्लिंग शब्दरूप का प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमापतिःपतीपतयः
द्वितीयापतिम्पतीपतीन्
तृतीयापत्यापतिभ्याम्पतिभिः
चतुर्थीपत्येपतिभ्याम्पतिभ्यः
पञ्चमीपत्युःपतिभ्याम्पतिभ्यः
षष्ठीपत्युःपत्योःपतीनाम्
सप्तमीपत्यौपत्योःपतिषु
सम्बोधनहे पते!हे पती!हे पतयः!

 

Hint

  • पति शब्द के रूप जब किस शब्द के साथ समास के अन्त में आता है, तो इसके रूप हरि शब्द के समान चलते हैं।
  • जैसे - गणपति की तृतीया विभक्ति-एकवचन में गणपतिना रूप बनता है।
97

मेघदूते 'सृष्टिराद्येव धातुः' इति का कथिता ?

  1. ((a))

    अलकापुरी

  2. ((b))

    रेवा नदी

  3. ((c))

    उज्जयिनी

  4. ((d))

    यक्षप्रिया

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Answer: ((d))

यक्षप्रिया

प्रश्नानुवाद - मेघदूत में 'सृष्टिराद्येव धातुः' यह किसको कहा गया है ?

स्पष्टीकरण - मेघदूत में सृष्टिराद्येव धातुः यह यक्ष की पत्नी के लिए कहा गया है। जिसके लिए यक्ष कहता है। जो श्लोक में उद्धृत हैं। मेघदूत के रचनाकार महाकवि कालिदास है।

श्लोक

तन्‍वी श्‍यामा शिखरिदशना पक्‍वबिम्‍बाधरोष्‍ठी

मध्‍ये क्षामा चकितहरिणीप्रेक्षणा निम्‍ननाभिः।

श्रोणीभारादलसगमना स्‍तोकनम्रा स्तनाभ्‍यां

या तत्र स्‍याद्युवतिविषये सृष्टिराद्येव धातुः।।

अर्थ - देह की छरहरी, उठते हुए यौवन वाली, नुकीले दाँतों वाली, पके कुंदरू से लाल अधरों वाली, कटि की क्षीण, चकित हिरनी की चित्त वाली, गहरी नाभि वाली श्रोणि भार से चलने में अलसाती हुई, स्‍तनों के भार से कुछ झुकी हुई ऐसी मेरी (यक्ष की) पत्‍नी वहाँ अलकापुरी की युवतियों में मानो ब्रह्मा की पहली कृति है।

यहाँ श्लोक से स्पष्ट है, अतः यक्षप्रिया उचित विकल्प है।

98

'हेतौ' इति सूत्रस्योदाहरणमस्ति-

  1. ((a))

    पुण्येन दृष्टो हरिः

  2. ((b))

    जटाभिस्तापसः

  3. ((c))

    कृष्णाय ईक्षते

  4. ((d))

    चौराद् विभेति

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Answer: ((a))

पुण्येन दृष्टो हरिः

प्रश्नानुवाद - 'हेतौ' इस सूत्र का उदाहरण है-

स्पष्टीकरण - हेतौ इस सूत्र का उदाहरण है - पुण्येन दृष्टो हरिः (पुण्य से हरि दिखते हैं।)। इस सूत्र का उपयोग तृतीया विभक्ति के अर्थ में होता है।

'हेतौ' इस सूत्र के अनुसार कारण (हेतु) बोधक शब्दों में तृतीया विभक्ति होती है।

उदाहरण - सः अध्ययनेन वसति। (वह पढ़ने के लिए रहता है।)

इसी तरह पुण्येन दृष्टो हरिः (पुण्य से हरि दिखते हैं।) - यहाँ हेतु शब्द है - पुण्य, जिसमें तृतीया लगी है। पुण्य के कारण से ही हरि दिखते हैं।

अतः यहाँ पुण्येन दृष्टो हरिः उचित विकल्प है।

Additional Information

अन्य विकल्प -

  • जटाभिस्तापसः - यह इत्थंभूतलक्षणे सूत्र का उदाहरण है, जिसके अनुसार जिस चिन्ह से किसी व्यक्ति या वस्तु का ज्ञान होता है।
  • चौराद् विभेति - यह भीत्रार्थानां भयहेतुः सूत्र का उदाहरण है, जहाँ भय और रक्षा के अर्थवाली धातुओं के साथ भय के कारण में पञ्चमी लगती है।
  • कृष्णाय ईक्षते - यह राधीक्ष्योर्यस्य विप्रश्नः सूत्र का उदाहरण है, जहाँ शुभाशुभ अर्थ में राध् और ईक्ष् धातुओं के प्रयोग में जिनके विषय में प्रश्न किया जाता है, उनकी सम्प्रदान संज्ञा होती है।
99

'अन्तर्हिते शशिनि सैव कुमुद्वती में दृष्टिं न नन्दयति संस्मरणीयशोभा'। 

इत्यत्र ‘अन्तर्हिते शशिनि' इत्यनयोः पदयोः केन सूत्रेण सप्तमीविभक्तिर्भवति ?

  1. ((a))

    यतश्च निर्धारणम्

  2. ((b))

    यस्य च भावेन भावलक्षणम्

  3. ((c))

    निमित्तात् कर्मयोगे

  4. ((d))

    सप्तमीपञ्चम्यौ कारकमध्ये

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Answer: ((b))

यस्य च भावेन भावलक्षणम्

प्रश्न का अनुवाद- 'अन्तर्हिते शशिनि सैव कुमुद्वती में दृष्टिं न नन्दयति संस्मरणीयशोभा'। इस वाक्य में ‘अन्तर्हिते शशिनि' पद की किस सूत्र से सप्तमी विभक्ति होती है?

वाक्य का हिंदी अनुवाद- 'अन्तर्हिते शशिनि सैव कुमुद्वती में दृष्टिं न नन्दयति संस्मरणीयशोभा'।- चन्द्रमा के अस्त हो जाने पर स्मरणीय शोभावाली वही कुमुदिनी मेरी आँखों को आनन्दित नही कर रही है।

सूत्रम् - यस्‍य च भावेन भावलक्षणम् ।। 2/3/37 ।।

संस्कृत व्याख्या- यया क्रियया अन्‍यक्रियाया: स्थिति: सूचित: भवति तस्‍यां क्रियायां तस्‍या: कर्तु:, कर्मणि च  सप्‍तमी विभक्ति: भवति ।

हिंदी में अर्थ- अर्थात जब एक क्रिया के बाद दूसरी क्रिया होती है तब पूर्व क्रिया में और उसके कर्त्ता में सप्तमी विभक्ति होती है।

उदा-

  1. रामे वनं गते दशरथः प्राणान् अत्यजत्। (राम के वन जाने पर दशरथ ने प्राणों को त्याग दिया।)
  2. गोषु दुह्यमानासु गत: - जब गायें दुही जा रहीं थीं तब वह गया ।

 

अत: स्पष्टीकरण से यह प्रतीत होता है की, उपर्युक्त दिये गये वाक्य में 'यस्य च भावेन भावलक्षणम्' इस सूत्रसे सप्तमी विभक्ति होती है।

Additional Informationअभिज्ञानशाकुन्तलम्- 

  • अभिज्ञान शाकुन्तलम् महाकवि कालिदास का विश्वविख्यात नाटक है।
  • इसमें राजा दुष्यन्त तथा शकुन्तला के प्रणय, विवाह, विरह, प्रत्याख्यान तथा पुनर्मिलन की एक सुन्दर कहानी है।
  • पौराणिक कथा में दुष्यन्त को आकाशवाणी द्वारा बोध होता है पर इस नाटक में कवि ने मुद्रिका द्वारा इसका बोध कराया है।

श्लोक-

अन्तर्हिते शशिनि सैव कुमुद्वती मे

दृष्टिं न नन्दयति संस्मरणीयशोभा।

इष्टप्रवासजनितान्यबलाजनस्य

दुःखानि नूनमतिमात्रसुदुःसहानि ॥3॥

श्लोक का हिंदी अनुवाद- चन्द्रमा के अस्त हो जाने पर स्मरणीय शोभावाली वही कुमुदिनी मेरी आँखों को नहीं आनन्दित कर रही है। वस्तुतः स्त्रियों का (अपने) प्रेमी व्यक्ति के परदेश-गमन से उत्पन्न दुःख अत्यन्त असह्य हुआ करता है।

स्पष्टीकरण- चन्द्रमा के रहने पर रात में ही कुमुदिनी विकसित होती है।चन्द्रमा कीअनुपस्थिति में कुमुदिनी मलिन हो जाती है।विकास की अवस्था में कुमुदिनी लोगों की आँखों को अपनी ओर आकृष्ट करती

है, परन्तु मलिनावस्था में वही कुमुदिनी आँखों को आनन्दित नहीं करती है। यहाँ कुमुदिनी को नायिका और चन्द्रको नायक के रूप में चित्रित किया गया है।  कुमुदिनी उसके लिए मलिन हो रही है।इसीप्रकार नायक दुष्यन्त भी सकलङ्क है,किन्तु शकुन्तला उसके लिए विकल है।

100

अलुक्तत्पुरुषस्य उदाहरणमस्ति-

  1. ((a))

    परस्मैपदम्

  2. ((b))

    अलंकृत्य

  3. ((c))

    सत्कृत्य

  4. ((d))

    ऊरीकृत्य

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Answer: ((a))

परस्मैपदम्

प्रश्नानुवाद - अलुक्तत्पुरुष का उदाहरण है-

स्पष्टीकरण - अलुक्तत्पुरुष समास का उदाहरण - परस्मैपदम् है।

अलुक समास -

  • यह तत्पुरुष समास है। समास में प्रायः प्रथम शब्द की विभक्ति का लोप हो जाता है।
  • किन्तु कुछ ऐसे समास है, जिनमें विभक्ति के प्रत्यय का लोप नहीं होता है, उसे अलुक् समास कहते हैं।
  • अलुक् समास में केवल ऐसे ही उदाहरण हैं, जो साहित्य में ग्रन्थकारों के ग्रन्थों में मिलते हैं, इसमें नवीन शब्दों का निर्माण नहीं किया जा सकता।
  • अलुक् समास के कुछ उदाहरण-
  • जनुषान्धः (जन्मान्ध)
  • पश्यतो हरः (चोर)
  • आत्मनेपदम्
  • परस्मैपदम्
  • अन्तेवासी (शिष्य)
  • खेचरः (���िद्ध, देव, पक्षी, आकाश में चलने वाला)
  • सरसिजम् (कमल) आदि।

 

अतः स्पष्ट है कि परस्मैपदम् अलुक्तत्पुरुष समास का उदाहरण है।

Hint

  • अन्य सभी विकल्प गतितत्पुरुष समास के भेद हैं।
  • कृत्प्रत्ययान्त शब्दों के साथ कुछ विशेष शब्दोंं का जो समास होता है, उसे गतितत्पुरुष समास कहते हैं।
  • जैसे - ऊरीकृत्य, अलंकृत्य, सत्कृत्य, स्वीकृत्य आदि।
101

अधोलिखितायाः सूक्तेः स्रोतः किम् ? 

‘आपन्नार्तिप्रशमनफलाः सम्पदो ह्युत्तमानाम्।'

  1. ((a))

    नीतिशतकम्

  2. ((b))

    शिवराजविजयः

  3. ((c))

    मेघदूतम्

  4. ((d))

    किरातार्जुनीयम्

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Answer: ((c))

मेघदूतम्

प्रश्न का अनुवाद- अधोलिखित सूक्ति का स्रोत क्या है? ‘आपन्नार्तिप्रशमनफलाः सम्पदो ह्युत्तमानाम्।'

सूक्ति का हिंदी अनुवाद- सत्पुरुषों की संपत्ति दुःखी लोगो को पीडा हरने के लिये होती है।

यह सूक्ति महाकवी कालिदास कृत मेघदूतम् के पूर्वमेघ से है। यक्ष मेघ को निर्देश देता है की, यदि हिमालय को दावानल पीडित करे तो उसे तुम शान्त कर देना।

अत: यह स्पष्ट होता है की, ‘आपन्नार्तिप्रशमनफलाः सम्पदो ह्युत्तमानाम्।' इस सूक्ति का स्रोत मेघदूतम् है।

Additional Informationमेघदूतम्-

  • मेघदूतम् महाकवि कालिदास द्वारा रचित विख्यात दूतकाव्य है। मेघदूत की लोकप्रियता भारतीय साहित्य में प्राचीन काल से ही रही है।
  • पूर्वमेघ में यक्ष बादल को रामगिरि से अलकापुरी तक के रास्ते का विवरण देता है और उत्तरमेघ में यक्ष का यह प्रसिद्ध विरहदग्ध संदेश है जिसमें कालिदास ने प्रेमीहृदय की भावना को उड़ेल दिया है।
  • इसमें एक यक्ष की कथा है जिसे कुबेर अलकापुरी से निष्कासित कर देता है। निष्कासित यक्ष रामगिरि पर्वत पर निवास करता है। वर्षा ऋतु में उसे अपनी प्रेमिका की याद सताने लगती है। कामार्त यक्ष सोचता है कि किसी भी तरह से उसका अल्कापुरी लौटना संभव नहीं है, इसलिए वह प्रेमिका तक अपना संदेश दूत के माध्यम से भेजने का निश्चय करता है। अकेलेपन का जीवन गुजार रहे यक्ष को कोई संदेशवाहक भी नहीं मिलता है, इसलिए उसने मेघ के माध्यम से अपना संदेश विरहाकुल प्रेमिका तक भेजने की बात सोची। इस प्रकार आषाढ़ के प्रथम दिन आकाश पर उमड़ते मेघों ने कालिदास की कल्पना के साथ मिलकर एक अनन्य कृति की रचना कर दी।

श्लोक-

तं चेद् वायौ सरति सरलस्कन्धसङ्घट्टजन्मा

बाधेतोल्काक्षपितचमरीबालभारो दवाग्निः ।

अर्हस्येनं शमयितुमलं वारिधारासहस्रैः

आपन्नार्तिप्रशमनफलाः सम्पदो ह्युत्तमानाम्॥

श्लोक का अर्थ- जंगली हवा चलने पर देवदारु के तनों की रगड़ से उत्पन्न दावाग्नि, जिसकी चिनगारियों से चौंरी गायों की पूँछ के बाल झुलस जाते हैं, यदि उस पर्वत को जला रही हो, तो तुम अपनी असंख्य जल-धाराओं से उसे शान्त करना। श्रेष्ठ पुरुषों की सम्पत्ति का यही फल है कि दु:खी प्राणियों के दुःख उससे दूर हों।

102

'सख्युः' पदे विभक्तिः वचनं च-

  1. ((a))

    पञ्चमी, एकवचनम्

  2. ((b))

    पञ्चमी, द्विवचनम्

  3. ((c))

    चतुर्थी, एकवचनम्

  4. ((d))

    चतुर्थी, बहुवचनम्

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Answer: ((a))

पञ्चमी, एकवचनम्

प्रश्नानुवाद - 'सख्युः' पद में विभक्ति और वचन है-

स्पष्टीकरण - सखि (मित्र) इकारान्त पुल्लिंग शब्द है। जिसकी पञ्चमी विभक्ति-एकवचन में सख्युः रूप बनता है।

सख्युः रूप पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन में बनता है।

अतः स्पष्ट है कि यहाँ पञ्चमी-एकवचन उचित विकल्प है।

Additional Information

सखि’ (मित्र) इकारान्त पुल्लिंग शब्दरूप का प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमासखासखायौसखायः
द्वितीयासखायम्सखायौसखीन्
तृतीयासख्यासखिभ्याम्सखिभिः
चतुर्थीसख्सखिभ्याम्सखिभ्यः
पञ्चमीसख्युःसखिभ्याम्सखिभ्यः
षष्ठीसख्युःसख्योःसखीनाम्
सप्तमीसख्यौसख्योःसखिषु
सम्बोधनहे सखे!हे सखायौ!हे सखायः!
103

‘दा’ धातोः लङ्लकारस्य प्रथमपुरुषस्य बहुवचने किं रूपं भवति ?

  1. ((a))

    अददाम्

  2. ((b))

    अददुः

  3. ((c))

    दद्युः

  4. ((d))

    अदुः

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Answer: ((b))

अददुः

प्रश्नानुवाद - 'दा' धातु के लङ् लकार के प्रथम पुरुष के बहुवचन में क्या रूप होता है ?

स्पष्टीकरण - दा (देना) धातु के लङ् लकार के परस्मैपद में प्रथमपुरुष-बहुवचन में अददुः रूप बनता है।

अतः यहाँ ददुः उचित विकल्प होगा।

Additional Information

दा (देना) धातु का लङ्लकार में प्रयोग निम्नलिखित है-

पुरूषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमपुरूषअददात्अदत्ताम्अददुः
मध्यमपुरूषअददाःअदत्तम्अदत्त
उत्तमपुरूषअददाम्अदद्वअदद्म

 

अन्य विकल्प -

  • दद्युः - यह रूप विधिलिङ्लकार के प्रथमपुरुष-बहुवचन में बनता है।
  • अदुः - यह रूप लुङ्लकार के प्रथमपुरुष-बहुवचन में बनता है।
104

पितृशब्दस्य रूपं नास्ति-

  1. ((a))

    पितृणा

  2. ((b))

    पित्रे

  3. ((c))

    पितुः

  4. ((d))

    पित्रोः

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Answer: ((a))

पितृणा

प्रश्नानुवाद - पितृशब्द का रूप नहीं है-

स्पष्टीकरण - दिये गये विकल्पों में पितृणा पितृ शब्द का रूप नहीं है। अपितु पितॄणाम् रूप है।

  • पितृ (पिता) ऋकारान्त पुल्लिंग शब्द है।
  • दिये गये विकल्पों में पित्रे, पितुः, पित्रोः - ये सभी पितृ शब्द के रूप है।

 

अतः स्पष्ट है कि यहाँ पितृणा पितृ शब्द का रूप नहीं है।

 

Additional Informationपितृ (पिता) ऋकारान्त पुल्लिंग शब्दरूप का प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमापितापितरौपितरः
द्वितीयापितरम्पितरौपितृृन्
तृतीयापित्रापितृभ्याम्पितृभिः
चतुर्थीपित्रेपितृभ्याम्पितृभ्यः
पंचमीपितुःपितृभ्याम्पितृभ्यः
षष्ठीपितुःपित्रोःपितृृणाम्
सप्तमीपितरिपित्रोःपितृषु
सम्बोधनहे पितःहे पितरौहे पितरः
105

शिवराजविजयो यथा मङ्गलसूक्त्या आरम्भ्यते सा कुतः समुद्धृता ?

  1. ((a))

    विष्णुपुराणात्

  2. ((b))

    श्रीमद्भगवद्गीतायाः

  3. ((c))

    श्रीदुर्गासप्तशत्याः

  4. ((d))

    भागवतमहापुराणात्

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Answer: ((d))

भागवतमहापुराणात्

प्रश्नानुवाद - शिवराजविजय जैसे मङ्गल सूक्ति से आरम्भ होता है, वह कहाँ से समुद्धृत है ?

स्पष्टीकरण - शिवराज विजय ग्रन्थ में उल्लिखित मंगल सूक्ति भागवतमहापुराण से ली गयी है। शिवराजविजय ग्रन्थ के रचयिता अम्बिकादत्त व्यास है।

शिवराज विजय में उल्लिखित मंगल सूक्ति निम्नलिखित है। इसमें दो श्लोकों से ली गयी दो पंक्तियाँ हैं -

विष्णोर्माया भगवती यय सम्मोहितञ्जगत्। (भागवतम् 10/1/25)

अर्थात् वह विष्णु की माया ऐश्वर्यशालिनी है, जिसने सम्पूर्ण जगत् को मोह में डाल रखा है।

हिंस्र स्वपापेन विहिंसित खल साधु समत्वेन भयाद्विमुच्यते। (भागवतम् 10/7/31)

अर्थात् दुष्ट हिंसक व्यक्ति अपने पाप से मारा गया और सज्जन समत्वभाव के कारण भय से बच गया।

इस तरह स्पष्ट है कि शिवराज विजय ग्रन्थ में उल्लिखित मंगल सूक्ति भागवतमहापुराण से ली गयी है।

106

'न विव्यथे तस्य मनो न हि प्रियं,

प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः।' इति श्लोकांशस्य ‘हितैषिणः' 

इति पदे विभक्तिवचने स्तः

  1. ((a))

     प्रथमा, बहुवचनम्

  2. ((b))

    द्वितीया, बहुवचनम्

  3. ((c))

    पञ्चमी, एकवचनम्

  4. ((d))

    षष्ठी, एकवचनम्

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Answer: ((a))

 प्रथमा, बहुवचनम्

प्रश्नानुवाद - 'न विव्यथे तस्य मनो न हि प्रियं, प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः।' इस श्लोकांश के ‘हितैषिणः' इस पद में विभक्ति वचन हैं-

स्पष्टीकरण - हितैषिणः पद में प्रथमा विभक्ति बहुवचन है। जिसका अर्थ है - हित चाहने वाला। हितैषिन् नकारान्त पुल्लिंग शब्द रूप है।

दी गयी पंक्ति किरातार्जुनीयम् महाकाव्य के श्लोक की पंक्ति है। इसके रचयित महाकवि भारवि है।

श्लोक -

कृतप्रणामस्य महीं महीभुजे जितां सपत्नेन निवेदयिष्यतः ।

न विव्यथे तस्य मनो न हि प्रियं प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः।।

अर्थात् उस समय के लिए उचित प्रणाम करने के अनन्तर शत्रुओं (कौरवों) द्वारा अपहृत पृथ्वीमण्डल (राज्य) की यथातथ्य बातें राजा युधिष्ठिर से निवेदन करते हुए उस वनवासी किरात के मन को तनिक भी व्यथा नहीं हुई। (ऐसा क्यों न होता) क्योंकि किसी के कल्याण की अभिलाषा करने वाले लोग (सत्य बात को छिपा कर केवल उसे प्रसन्न करने के लिए) झूठ-मूठ की प्यारी बातें (बना कर) कहने की इच्छा नहीं करते हैं।

इस तरह श्लोक से स्पष्ट है कि हितैषिणः पद में प्रथमा विभक्ति-बहुवचन हैं।

Additional Information

हितैषिन् (हित चाहने वाला) नकारान्त पुल्लिंग शब्दरूप का प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमाहितैषीहितैषिणौहितैषिणः
द्वितीयाहितैषिनम्हितैषिणौहितैषिणः
तृतीयाहितैषिनाहितैषिभ्याम्हितैषिभिः
चतुर्थीहितैषिणेहितैषिभ्याम्हितैषिभ्यः
पञ्चमीहितैषिणःहितैषिभ्याम्हितैषिभ्यः
षष्ठीहितैषिणःहितैषिणोःहितैषिनाम्
सप्तमीहितैषिणिहितैषिणोःहितैषिषु
सम्बोधनहे हितैषिन्हे हितैषिनौहे हितैषिणः
107

'परभृतविरुतं कलं यतः' इत्यत्र 'परभृत' शब्दस्य कोऽर्थः?

  1. ((a))

    चातकः

  2. ((b))

    काकः

  3. ((c))

    हंसः

  4. ((d))

    कोकिलः

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Answer: ((d))

कोकिलः

प्रश्नानुवाद - 'परभृतविरुतं कलं यतः' यहाँ 'परभृत' शब्द का क्या अर्थ है?

स्पष्टीकरण - यहाँ परभृत का अर्थ कोकिल है।

प्रस्तुत पंक्ति अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक के श्लोक की पंक्ति है। इस नाटक के रचयिता महाकवि कालिदास है।

श्लोक

अनुमतगमना शकुन्तला तरुभिरियं वनवासबन्धुभिः।

परभृतविरुतं कलं यतः प्रतिवचनीकृतमेभिरात्मनः।।

अर्थात् (कोकिल के शब्द की सूचना देकर) हे भगवन्! वन में साथ ही रहने से बन्धु भाव को प्राप्त इन वृक्षों ने शकुन्तला को पति गृह जाने की अनुमति दे दी है, क्योंकि इन्होंने मधुर एवं मनोहर यह कोकिल का शब्द ही अपने उत्तर में मानो उच्चारित किया है। (कहा है।)

इस तरह श्लोक के अर्थ से स्पष्ट है, अतः यहाँ कोकिल उचित विकल्प है।

108

भूतबलिः समस्त पदे यः समासः-

  1. ((a))

    तृतीया तत्पुरुषः

  2. ((b))

    द्वितीया तत्पुरुषः

  3. ((c))

    पञ्चमी तत्पुरुषः

  4. ((d))

    चतुर्थी तत्पुरुषः

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Answer: ((d))

चतुर्थी तत्पुरुषः

प्रश्नानुवाद - भूतबलिः समस्त पद में जो समास होता है-

स्पष्टीकरण - भूतबलि का समस्त पद में चतुर्थी तत्पुरुष समास होता है।

  • समस्त पद - भूतेभ्यः बलि।
  • पद - भूतबलिः

सूत्र - चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः।

नियम - चतुर्थ्यन्त शब्दों का प्रयोग अर्थ, बलि, हित, सुख तथा रक्षित के साथ हो, तो चतुर्थी तत्पुरुष समास होता है। 

उदाहरण

  • द्विजाय अयम् - द्विजार्थः।
  • ब्राह्मणाय हितम् - ब्राह्मणहितम्।
  • भूतेभ्यो बलिः - भूतबलिः
  • गवे हितम्, रक्षितम्, सुखम् - गोहितम्, गोरक्षितम्, गोसुखम्।

 

अतः स्पष्ट है कि यहाँ भूतबलि का समस्त पद चतुर्थी तत्पुरुष समास होता है।

Additional Information

समसनं समासः अर्थात् संक्षिप्त होने को समास कहते हैं। समास एक संज्ञा है। दो या दो से अधिक शब्दों का जब समास होकर एक पद बनता है, तो उसे समास कहते हैं। समास में दो पद होते हैं - 1. पूर्व पद, 2. उत्तर पद

समास के मुख्यतः 4 भेद है। 

  1. अव्ययीभाव
  2. तत्पुरुष
  3. बहुव्रीहि
  4. द्वन्द्व

(1) अव्ययीभाव समास - ‘पूर्वपदार्थप्रधानोSव्ययीभावः’ अर्थात् जिस पद में पूर्व पद की प्रधानता हो या पद का आरम्भ किसी अव्यय पद से हो रहा हो, वहाँ अव्ययीभाव समास होता है। उदाहरण - 

  • रूपस्य योग्यम् - अनुरूपम्
  • रामस्य पश्चात् - अनुरामम्

(2) तत्पुरुष समास - ‘उत्तरपदप्रधानो तत्पुरुषः’ अर्थात जिस पद में उत्तर पद प्रधान होता है, वहाँ तत्पुरुष समास होता है।  उदाहरण - 

  • सुखम् आपन्नः - सुखापन्नः
  • कूपं पतितः - कूपपतितः

तत्पुरुष समास के मुख्यतः दो भेद होते हैं - 

  1. व्यधिकरण तत्पुरुष समास
  2. समानाधिकरण तत्पुरुष
  3. व्यधिकरण तत्पुरुष समास के सात (7) भेद होते हैं, जो निम्नलिखित हैं - 

द्वितीया तत्पुरुष - जहाँ श्रित, अतीत, पतित, गत, अत्यस्त, प्राप्त और आपन्न इन शब्दों का संयोग होता है, वहाँ द्वितीया तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण -

  • शोकं पतितः - शोकपतितः

तृतीया तत्पुरुष - जहाँ तृतीयान्त शब्द के साथ पूर्व, सदृश, सम शब्द आता है, तो वहाँ तृतीया तत्पुरुष समास होता है।  उदाहरण - 

  • पित्रा समः - पितृसमः

चतुर्थी तत्पुरुष - जहाँ पूर्व पद चतुर्थी विभक्ति में होता है अथवा बलि, हित, सुख, रक्षित इन शब्दों को संयोग होता है,  वहाँ चतुर्थी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण -

  • ब्राह्मणाय हितम् - ब्राह्मणहितम्

पञ्चमी तत्पुरुष - जहाँ भय, भीत, भीति इन शब्दों का संयोग होता है, वहाँ पञ्चमी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • व्याघ्राद् भीतिः - व्याघ्रभीतिः

षष्ठी तत्पुरुष - जब पूर्व पद षष्ठी विभक्ति में होता है, तो वहाँ षष्ठी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • देवानां भाषा - देवभाषा

सप्तमी तत्पुरुष - जब पूर्व पद सप्तमी विभक्ति में रहता है अथवा शौण्ड (चतुर), धूर्त, कितव (शठ), प्रवीण, कुशल, पण्डित इन शब्दों का संयोग होता है, तो वहाँ सप्तमी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • सभायां पण्डितः - सभापण्डितः

नञ् तत्पुरुष - जब पूर्व पद न शब्द हो, तथा उत्तर पद कोई संज्ञा या विशेषण हो तो, वहाँ नञ् तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • न कृतम् - अकृतम्
  1. समानाधिकरण तत्पुरुष समास के दो भेद होते हैं - 
  • कर्मधारय तत्पुरुष समास
  • द्विगु तत्पुरुष समास

(1) कर्मधारय तत्पुरुष समास - ऐसा तत्पुरुष समास जहाँ विशेषण-विशेष्य और उपमान-उपमेय का सम्बन्ध होता है, वह कर्मधारय समास होता है। उदाहरण- 

  • पीतम् उत्पलम् - पीतोत्पलम्
  • घन इव श्यामः - घनश्यामः

(2) द्विगु तत्पुरुष समास - जहाँ प्रथम पद संख्यावाची होता है, वहाँ द्विगु समास होता है। यह तत्पुरुष समास का ही भेद है। उदाहरण - 

  • त्रयानां  भुवनानां समाहारः - त्रिभुवनम्
  • चतुर्णां भुजानां समाहारः - चतुर्भुजम्

(3) बहुव्रीहि समास - ‘अन्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिः’ जहाँ दो या दो से अधिक समस्त शब्द किसी अन्य पद को इंगित करते हैं, वहाँ बहुव्रीहि समास होता है। उदाहरण - 

  • महान् आत्मा यस्य सः (बुद्धः) - महात्मा
  • दश आननानि यस्य सः (रावणः) - दशाननः

बहुव्रीहि समास के दो भेद हैं-

  1. समानाधिकरण बहुव्रीहि- (जहाँ दोनों शब्द प्रथमान्त होते हैं। जैसे - पीतम् अम्बरम् यस्य सः)
  2. व्यधिकरण बहुव्रीहि - (जहाँ दोनों शब्द प्रथमान्त नहीं होते हैं। एक प्रथमान्त होता है और दूसरा शब्द षष्ठी या सप्तमी विभक्ति में होता है। जैसे - चन्द्र शेखरे यस्य सः)

(4) द्वन्द्व समास - ‘उभयपदार्थप्रधानो द्वन्द्वः’ जहाँ दोनों पद (पूर्व पद एवं उत्तर पद) प्रधान होते हैं, वहाँ द्वन्द्व समास होता है। उदाहरण -

  • रामश्च लक्ष्मणश्च भरतश्च - रामलक्ष्मणभरताः
  • पाणी च पादौ च - पाणिपादम्
109

वारिशब्दस्य सप्तमी विभक्तेः रूपं नास्ति-

  1. ((a))

    वारिणि

  2. ((b))

    वारिणोः

  3. ((c))

    वारिषु

  4. ((d))

    वारिसु

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Answer: ((d))

वारिसु

प्रश्नानुवाद - वारिशब्द के सप्तमी विभक्ति का रूप नहीं है-

स्पष्टीकरण - दिये गये विकल्पों में वारिसु वारि शब्द के सप्तमी विभक्ति का रूप नहीं है।

वारि (जल) इकारान्त नपुंसकलिंग शब्दरूप है। जिसकी सप्तमी विभक्ति के तीनों वचनों में क्रमशः वारिणि, वारिणोः, वारिषु रूप बनते हैं।

अतः स्पष्ट है कि वारिसु वारि शब्द के सप्तमी विभक्ति का रूप नहीं है।

Additional Information

‘वारि’ (जल) इकारान्त नपुंसकलिंग शब्दरूप का प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमावारिवारिणीवारीणि
द्वितीयावारिवारिणीवारीणि
तृतीयावारिणावारिभ्याम्वारिभिः
चतुर्थीवारिणेवारिभ्याम्वारिभ्यः
पञ्चमीवारिणःवारिभ्याम्वारिभ्यः
षष्ठीवारिणःवारिणोःवारीणाम्
सप्तमीवारिणिवारिणोःवारिषु
सम्बोधनहे वारि!हे वारिणी!हे वारीणि!
110

'याच्ञा मोघा वरमधिगुणे नाधमेलब्धकामा' इत्यस्मिन् श्लोकांशे 'अधिगुणे' इति पदे समासोऽस्ति-

  1. ((a))

    अव्ययीभावः

  2. ((b))

    बहुव्रीहिः 

  3. ((c))

    तत्पुरुषः

  4. ((d))

    कर्मधारयः

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Answer: ((b))

बहुव्रीहिः 

प्रश्नानुवाद - 'याच्ञा मोघा वरमधिगुणे नाधमेलब्धकामा' इस श्लोकांश में 'अधिगुणे' इस पद में समास है-

स्पष्टीकरण - अधिगुणे पद में बहुव्रीहि समास है। यह पंक्ति मेघदूत खण्डकाव्य की है। जिसका श्लोक इस प्रकार है-

श्लोक -

जातं वंशे भुवनविदिते पुष्करावर्तकानां

जानामि त्वां प्रकृतिपुरुषं कामरूपं मघोनः ।

तेनार्थित्वं त्वयि विधिवशाद्दूरबन्धुर्गतोऽहं

याच्ञा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामा।।

श्लोकार्थ - पुष्कर और आवर्तक नाम वाले मेघों के लोक प्रसिद्ध वंश में तुम्हारा जन्म हुआ है। तुम्हें मैं इन्द्र का कामरूपी मुख्य अधिकारी जानता हूँ। भाग्य के कारण अपनी प्रिया से दूर पड़ा हुआ, मैं इसी कारण तुम्हारे पास याचक बना हूँ। गुणी जन (अच्छे लोग) से याचना करना अच्छा है, चाहे वह निष्फल ही हो, परन्तु अधम से माँगना अच्छा नहीं, चाहे वह सफल भी रहे।

शब्द - अधिगुणे (गुणशालिनि पुरुषे)

समास विग्रह - गुणानि विद्यमानानि यस्मिन् सः पुरुषः। (गुणवान् पुरुष)

सूत्र - अनेकमन्यपदार्थे।

नियम - जब दो या दो से अधिक सभी शब्द किसी अन्य शब्द का बोध कराते हैं, उसे बहुव्रीहि समास कहा जाता है। इस समास को अन्यपद प्रधान समास भी कहते हैं।

उदाहरण - 

  • चक्रं पाणौ यस्य सः - चक्रपाणिः (विष्णुः)
  • इसी नियमानुसार अधिगुणे (गुणानि विद्यमानानि यस्मिन् सः पुरुषः) पद में बहुव्रीहि समास है, जहाँ अधिगुणे पद अन्य शब्द (गुणवान् पुरुष) का बोध करा रहा हैं।

 

अतः स्पष्ट है कि यहाँ अधिगुणे पद में बहुव्रीहि समास सही उत्तर है।

Additional Information

समसनं समासः अर्थात् संक्षिप्त होने को समास कहते हैं। समास एक संज्ञा है। दो या दो से अधिक शब्दों का जब समास होकर एक पद बनता है, तो उसे समास कहते हैं। समास में दो पद होते हैं - 1. पूर्व पद, 2. उत्तर पद

समास के मुख्यतः 4 भेद है। 

  1. अव्ययीभाव
  2. तत्पुरुष
  3. बहुव्रीहि
  4. द्वन्द्व

(1) अव्ययीभाव समास - ‘पूर्वपदार्थप्रधानोSव्ययीभावः’ अर्थात् जिस पद में पूर्व पद की प्रधानता हो या पद का आरम्भ किसी अव्यय पद से हो रहा हो, वहाँ अव्ययीभाव समास होता है। उदाहरण - 

  • रूपस्य योग्यम् - अनुरूपम्
  • रामस्य पश्चात् - अनुरामम्

(2) तत्पुरुष समास - ‘उत्तरपदप्रधानो तत्पुरुषः’ अर्थात जिस पद में उत्तर पद प्रधान होता है, वहाँ तत्पुरुष समास होता है।  उदाहरण - 

  • सुखम् आपन्नः - सुखापन्नः
  • कूपं पतितः - कूपपतितः

तत्पुरुष समास के मुख्यतः दो भेद होते हैं - 

  1. व्यधिकरण तत्पुरुष समास
  2. समानाधिकरण तत्पुरुष
  3. व्यधिकरण तत्पुरुष समास के सात (7) भेद होते हैं, जो निम्नलिखित हैं - 

द्वितीया तत्पुरुष - जहाँ श्रित, अतीत, पतित, गत, अत्यस्त, प्राप्त और आपन्न इन शब्दों का संयोग होता है, वहाँ द्वितीया तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण -

  • शोकं पतितः - शोकपतितः

तृतीया तत्पुरुष - जहाँ तृतीयान्त शब्द के साथ पूर्व, सदृश, सम शब्द आता है, तो वहाँ तृतीया तत्पुरुष समास होता है।  उदाहरण - 

  • पित्रा समः - पितृसमः

चतुर्थी तत्पुरुष - जहाँ पूर्व पद चतुर्थी विभक्ति में होता है अथवा बलि, हित, सुख, रक्षित इन शब्दों को संयोग होता है,  वहाँ चतुर्थी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण -

  • ब्राह्मणाय हितम् - ब्राह्मणहितम्

पञ्चमी तत्पुरुष - जहाँ भय, भीत, भीति इन शब्दों का संयोग होता है, वहाँ पञ्चमी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • व्याघ्राद् भीतिः - व्याघ्रभीतिः

षष्ठी तत्पुरुष - जब पूर्व पद षष्ठी विभक्ति में होता है, तो वहाँ षष्ठी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • देवानां भाषा - देवभाषा

सप्तमी तत्पुरुष - जब पूर्व पद सप्तमी विभक्ति में रहता है अथवा शौण्ड (चतुर), धूर्त, कितव (शठ), प्रवीण, कुशल, पण्डित इन शब्दों का संयोग होता है, तो वहाँ सप्तमी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • सभायां पण्डितः - सभापण्डितः

नञ् तत्पुरुष - जब पूर्व पद न शब्द हो, तथा उत्तर पद कोई संज्ञा या विशेषण हो तो, वहाँ नञ् तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • न कृतम् - अकृतम्
  1. समानाधिकरण तत्पुरुष समास के दो भेद होते हैं - 
  • कर्मधारय तत्पुरुष समास
  • द्विगु तत्पुरुष समास

(1) कर्मधारय तत्पुरुष समास - ऐसा तत्पुरुष समास जहाँ विशेषण-विशेष्य और उपमान-उपमेय का सम्बन्ध होता है, वह कर्मधारय समास होता है। उदाहरण- 

  • पीतम् उत्पलम् - पीतोत्पलम्
  • घन इव श्यामः - घनश्यामः

(2) द्विगु तत्पुरुष समास - जहाँ प्रथम पद संख्यावाची होता है, वहाँ द्विगु समास होता है। यह तत्पुरुष समास का ही भेद है। उदाहरण - 

  • त्रयानां  भुवनानां समाहारः - त्रिभुवनम्
  • चतुर्णां भुजानां समाहारः - चतुर्भुजम्

(3) बहुव्रीहि समास - ‘अन्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिः’ जहाँ दो या दो से अधिक समस्त शब्द किसी अन्य पद को इंगित करते हैं, वहाँ बहुव्रीहि समास होता है। उदाहरण - 

  • महान् आत्मा यस्य सः (बुद्धः) - महात्मा
  • दश आननानि यस्य सः (रावणः) - दशाननः

बहुव्रीहि समास के दो भेद हैं-

  1. समानाधिकरण बहुव्रीहि- (जहाँ दोनों शब्द प्रथमान्त होते हैं। जैसे - पीतम् अम्बरम् यस्य सः)
  2. व्यधिकरण बहुव्रीहि - (जहाँ दोनों शब्द प्रथमान्त नहीं होते हैं। एक प्रथमान्त होता है और दूसरा शब्द षष्ठी या सप्तमी विभक्ति में होता है। जैसे - चन्द्र शेखरे यस्य सः)

(4) द्वन्द्व समास - ‘उभयपदार्थप्रधानो द्वन्द्वः’ जहाँ दोनों पद (पूर्व पद एवं उत्तर पद) प्रधान होते हैं, वहाँ द्वन्द्व समास होता है। उदाहरण -

  • रामश्च लक्ष्मणश्च भरतश्च - रामलक्ष्मणभरताः
  • पाणी च पादौ च - पाणिपादम्
111

'96' संख्यायाः कृते संस्कृते कः शब्दः प्रयुज्यते ?

  1. ((a))

    ऊननवति

  2. ((b))

    नवाशीति

  3. ((c))

    षण्णवति

  4. ((d))

    नवनवति

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Answer: ((c))

षण्णवति

प्रश्नानुवाद - '96' संख्या के लिए संस्कृत में कौनसा शब्द प्रयोग होता है ?

स्पष्टीकरण - 96 के लिए संस्कृत में षण्णवति लिखा जाता है।

षण्णवति अर्थात् षड् (6) + नवति (90) = 96 

विकल्पों का स्पष्टीकरण - 

संख्यासंस्कृत
89 (नवासी)नवाशीति
89 (नवासी)नवाशीति
96 (छियानवे)षण्णवति
99 (निन्यानवे)नवनवति
<br>

अतः स्पष्ट है कि ‘षण्णवति’ 96 (छियानवे) को कहते हैं।

112

यस्मिन् श्लोके वस्तुनिर्देशात्मकं मंगलाचरणमस्ति

  1. ((a))

    श्रियः कुरुणामधिपस्य पालनीं प्रजासु

  2. ((b))

    या सृष्टिः स्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं

  3. ((c))

    दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये

  4. ((d))

    तस्मिन्नद्रौ कतिचिदबलाविप्रयुक्तः

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Answer: ((a))

श्रियः कुरुणामधिपस्य पालनीं प्रजासु

प्रश्न का अनुवाद- इस श्लोक में वस्तुनिर्देशात्मक मंगलाचरण है-

श्लोक-

श्रियः कुरूणामधिपस्य पालनीं प्रजासु वृत्तिं यमयुंक्त वेदितुम्।

स वणिर्लिङ्गी विदितः समाययौ युधिष्ठिरं द्वैतवने वनेचरः ।।1।।

श्लोक का अर्थ- कुरुदेश के राजा दुर्योधन की राजलक्ष्मी का पालन करने वाली प्रजा-नीति (प्रजाविषयक नीति) को जानने के लिये युधिष्ठिर ने जिस गुप्तचर किरात को नियुक्त किया था, ब्रह्मचारी के वेष को धारण करने वाला वह किरात (वनवासी भील) (दुर्योधन के सम्पूर्ण वृत्तान्त को) जानकर द्वैतवन में युधिष्ठिर के पास वापस लौट आया।

Important Points

  • ग्रन्थ की निर्विघ्न समाप्ति के लिए महाकवि ने महाकाव्य का प्रारम्भ मङ्गलवाचक श्री (श्रियः) शब्द से किया है। यह वस्तुनिर्देशात्मक मंगलाचरण है।
  • वस्तुनिर्देशात्मक मंगलाचरण - ग्रंथ के प्रारंभ में कवि द्वारा देवताओं की स्तुति के साथ साथ विषयवस्तु की ओर भी मंगलाचरण संकेत करना वस्तुनिर्देशात्मक मंगलाचरण है।

 

अत: यह स्पष्ट होता है की, श्रियः कुरुणामधिपस्य पालनीं प्रजासु इस श्लोक में वस्तुनिर्देशात्मक मंगलाचरण है।

Additional Informationकिरातार्जुनीयम्-

  • किरातार्जुनीयम् (अर्थ : किरात और अर्जुन की कथा) महाकवि भारवि द्वारा सातवीं शती ई. में रचित महाकाव्य है जिसे संस्कृत साहित्य के 'बृहत्त्रयी' में स्थान प्राप्त है।
  • महाभारत में वर्णित किरात वेशधारी शिव के साथ अर्जुन के युद्ध की लघुकथा को आधार बनाकर कवि ने राजनीति, धर्मनीति, कूटनीति, समाजनीति, युद्धनीति, जनजीवन आदि का मनोरम वर्णन किया है।
  • यह काव्य विभिन्न रसों से ओतप्रोत रचना है किन्तु वीर रस प्रधान है।
  • संस्कृत के छः प्रसिद्ध महाकाव्य हैं – किरातार्जनुयीयम्‌ (भारवि), शिशुपालवधम्‌ (माघ) और नैषधीयचरितम्‌ (श्रीहर्ष)– बृहत्त्रयी कहलाते हैं।
113

महाकविबाणभट्टकृतकादम्बर्यन्तर्गतः ग्रन्थः-

  1. ((a))

    वासवदत्ता

  2. ((b))

    शुकनासोपदेशः

  3. ((c))

    ऋग्वेदभाष्यभूमिका

  4. ((d))

    वेदान्तसारः

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Answer: ((b))

शुकनासोपदेशः

प्रश्नानुवाद - महाकवि बाणभट्ट कृत कादम्बरी के अन्तर्गत ग्रन्थ है-

स्पष्टीकरण - महाकवि बाणभट्ट द्वारा विरचित कादम्बरी काव्य के अन्तर्गत शुकनासोपदेश ग्रन्थ आता है।

  • इस ग्रन्थ में शुकनास राजा का मन्त्री है। वह राजा तारापीड के पुत्र चन्द्रापीड को उपदेश देता है। इसलिए इसे शुकनासोपदेश कहा जाता है।
  • शुकनास राजा के पुत्र को युवावस्था, यौवन, सम्प्रभुता और लक्ष्मी इनके दुष्प्रभाव के विषय में बताता है कि इनमें से एक भी व्यक्ति का सर्वनाश करने के लिए पर्याप्त है, अगर चारों ओर एक साथ हो तो, क्या ही कहा जा सकता है।
  • जैसा कि शुकनासोपदेश में उल्लिखित पंक्ति है - समुपस्थितयौवराज्याभिषेकञ्च तं कदाचिद्दर्शनार्थमागतमारुढविनयमपि विनीततरमिच्छन् कर्तुं शुकनासः सविस्तमुवाच। अर्थात् एक बार दर्शन के लिए आये हुए, निकट भविष्य में युवराज के लिए अभिषिक्त होने वाले, पहले से ही विनीत चन्द्रापीड को और अधिक विनीत बनाने की इच्छा वाले प्रधानमन्त्री शुकनास ने विस्तारपूर्वक कहा।

 

इस तरह स्पष्ट है कि महाकवि बाणभट्ट द्वारा विरचित कादम्बरी काव्य के अन्तर्गत शुकनासोपदेश ग्रन्थ आता है।

114

'विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा' इत्यत्र 'अनन्यमानसा' पदे समासोऽस्ति

  1. ((a))

    तत्पुरुषः

  2. ((b))

    कर्मधारयः

  3. ((c))

    बहुव्रीहिः

  4. ((d))

    अव्ययीभावः

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Answer: ((c))

बहुव्रीहिः

प्रश्न का अनुवाद- 'विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा' इसके 'अनन्यमानसा' पद में समास है-

सामासिक शब्द - अनन्यमानसा

समास विग्रह - अनन्य मानसा यस्या सा (शकुंतला)

<br>

सूत्र - अनेकमन्यपदार्थे  बहुव्रीहि।

नियम - इस सूत्र के अनुसार जहाँ दो या दो से अधिक समस्त शब्द किसी अन्य पद को इंगित करते हैं, वहाँ बहुव्रीहि समास होता है।

<br>

इसी नियमानुसार यहाँ 'अनन्यमानसा' पद में बहुव्रीहि समास है। जहाँ किसी अन्य पद (शकुंतला) का बोध हो रहा है।

Key Points

अभिज्ञानशाकुन्तलम्- 

  • अभिज्ञान शाकुन्तलम् महाकवि कालिदास का विश्वविख्यात नाटक है।
  • इसमें राजा दुष्यन्त तथा शकुन्तला के प्रणय, विवाह, विरह, प्रत्याख्यान तथा पुनर्मिलन की एक सुन्दर कहानी है।
  • पौराणिक कथा में दुष्यन्त को आकाशवाणी द्वारा बोध होता है पर इस नाटक में कवि ने मुद्रिका द्वारा इसका बोध कराया है।

श्लोक-

विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा तपोधनं न वेत्थि मामुपस्थितम्।

स्मरिष्यति त्वां  न स बोधितोपि सन् कथां प्रमत्तः प्रथमं कृतामिव।।

श्लोक का अर्थ-

अरी ओ अतिथि का अपमान करनेवाली! जिसके ध्यान में इतनी मग्न होकर मुझ जैसे तपस्वी के आने की भी सुध नहीँ ले रही है वह बहुत स्मरण दिलाने पर भी तुझे उसी प्रकार भूल जाएगा,जैसे पागल मनुष्य अपनी पिछली सारी बातें भूल जाया करता है।

Additional Informationसमसनं समासः अर्थात् संक्षिप्त होने को समास कहते हैं। समास एक संज्ञा है। दो या दो से अधिक शब्दों का जब समास होकर एक पद बनता है, तो उसे समास कहते हैं। समास में दो पद होते हैं - 1. पूर्व पद, 2. उत्तर पद

समास के मुख्यतः 4 भेद है। 

  1. अव्ययीभाव
  2. तत्पुरुष
  3. बहुव्रीहि
  4. द्वन्द्व

(1) अव्ययीभाव समास - ‘पूर्वपदार्थप्रधानोSव्ययीभावः’ अर्थात् जिस पद में पूर्व पद की प्रधानता हो या पद का आरम्भ किसी अव्यय पद से हो रहा हो, वहाँ अव्ययीभाव समास होता है। उदाहरण - 

रूपस्य योग्यम् - अनुरूपम्

रामस्य पश्चात् - अनुरामम्

(2) **तत्पुरुष समास - ‘**उत्तरपदप्रधानो तत्पुरुषः’ अर्थात जिस पद में उत्तर पद प्रधान होता है, वहाँ तत्पुरुष समास होता है।  उदाहरण - 

सुखम् आपन्नः - सुखापन्नः

कूपं पतितः - कूपपतितः

(3) बहुव्रीहि समास - ‘अन्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिः’ जहाँ दो या दो से अधिक समस्त शब्द किसी अन्य पद को इंगित करते हैं, वहाँ बहुव्रीहि समास होता है। उदाहरण - 

महान् आत्मा यस्य सः (बुद्धः) - महात्मा

दश आननानि यस्य सः (रावणः) - दशाननः

बहुव्रीहि समास के दो भेद हैं-

  • समानाधिकरण बहुव्रीहि- (जहाँ दोनों शब्द प्रथमान्त होते हैं। जैसे - पीतम् अम्बरम् यस्य सः)
  • व्यधिकरण बहुव्रीहि - (जहाँ दोनों शब्द प्रथमान्त नहीं होते हैं। एक प्रथमान्त होता है और दूसरा शब्द षष्ठी या सप्तमी विभक्ति में होता है। जैसे - चन्द्र शेखरे यस्य सः)

(4) द्वन्द्व समास - ‘उभयपदार्थप्रधानो द्वन्द्वः’ जहाँ दोनों पद (पूर्व पद एवं उत्तर पद) प्रधान होते हैं, वहाँ द्वन्द्व समास होता है। उदाहरण -

रामश्च लक्ष्मणश्च भरतश्च - रामलक्ष्मणभरताः

पाणी च पादौ च - पाणिपादम्

115

गुणसन्धेरुदाहरणमस्ति-

  1. ((a))

    अक्षौहिणी

  2. ((b))

    स्वैरिणी

  3. ((c))

    प्रौढः

  4. ((d))

    उपेन्द्रः

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Answer: ((d))

उपेन्द्रः

प्रश्नानुवाद - गुण सन्धि का उदाहरण है-

स्पष्टीकरण - दिये गये विकल्पों में उपेन्द्रः गुण सन्धि का उदाहरण है। (अन्य सभी गुण सन्धि के अपवाद है, जहाँ वृद्धि सन्धि होती है।)

  • शब्द - उपेन्द्रः
  • सन्धि विच्छेद - उप + इन्द्रः

सूत्र - आद् गुणः।

नियम - जब प्रथम पद के अन्त में अ या आ आवे और उसके बाद उ या ऊ आता है तो, वहाँ दोनों के स्थान पर ओ आदेश होता है।

  • अ, आ + इ, ई = ए
  • अ, आ + उ, ऊ = ओ
  • अ, आ + ऋ, ऋृ = अर्
  • अ, आ + लृ = अल्

उदाहरण-

  • हित + उपदेशः - हितोपदेशः (यहाँ प्रथम पद के अन्त में अ + बाद में उ आया है, जहाँ दोनों के स्थान पर ओ आदेश हो गया।)
  • यहीं नियम उपेन्द्रः (उप + इन्द्रः) शब्द में लगा है। (जहाँ प्रथम पद के अन्त में अ + बाद में इ स्वर है, जिससे उपेन्द्रः शब्द बना।)

 

अतः स्पष्ट है कि उपेन्द्रः गुण सन्धि का उदाहरण है।

Additional Information

अन्य विकल्प (ये तीनों विकल्प गुण सन्धि के अपवाद हैं। जहाँ गुण सन्धि न होकर भिन्न-भिन्न वार्तिक सूत्रों के अनुसार वृद्धि सन्धि आदेश होती है।)

  • अक्षौहिणी - अक्षादूहिन्यामुपसङ्ख्यानम् वार्तिक के अनुसार - अक्ष + ऊहिनी में गुण न होकर वृद्धि होती है। अक्षौहिणी
  • स्वैरिणीस्वादीरेरिणोः वार्तिक के अनुसार - जब स्व शब्द के बाद ईर और ईरिन् आता है, तो वहाँ गुण न होकर वृद्धि सन्धि होती है। स्वैरिणी
  • प्रौढः - प्रादूहोढोढ्येषैष्येषु वार्तिक के अनुसार - जब प्र के बाद ऊह, ऊढ, ऊढि, एष, एष्य शब्द आते हैं, तब गुण न होकर वृद्धि सन्धि होती है। प्रौढः।
116

करणसंज्ञा भवति-

  1. ((a))

    कर्तुरीप्सिततमस्य

  2. ((b))

    साधकतमस्य

  3. ((c))

    क्रियया अभिप्रेतस्य

  4. ((d))

    अधिकरणस्य

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Answer: ((b))

साधकतमस्य

प्रश्नानुवाद - करण संज्ञा होती है -

स्पष्टीकरण - साधकतम की करण संज्ञा होती है। अर्थात् जो क्रिया की सिद्धि में अत��यन्त सहायक होता है, उसकी करण संज्ञा होती है।

सूत्र - साधकतमं करणम्। 

नियम - जो क्रिया की सिद्धि में अत्यन्त सहायक होता है, उसे करण कहते हैं। करण में तृतीया विभक्ति होती है।

उदाहरण -

  • रामः कलमेन लिखति (राम कलम से लिखता है।) - यहाँ राम लिखने की क्रिया कर रहा है। लिखने के लिए कलम अत्यन्त सहायक है, क्योंकि कलम द्वारा ही लिखा जा सकता है। अतः कलम की करण संज्ञा-तृतीया विभक्ति है।

 

अतः स्पष्ट है कि साधकतम की करण संज्ञा होती है।

Additional Information

अन्य विकल्प -

  • कर्तुरीप्सिततमस्य - इसकी कर्म संज्ञा होती है। कर्तुरीप्सिततमं कर्म सूत्र के अनुसार  कर्ता सब से अधिक जिस पदार्थ को चाहता है, वह कर्म होता है। कर्म में द्वितीया विभक्ति होती है। उदाहरण - गुरुं नमति।
  • क्रियया अभिप्रेतस्य - इसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है। कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम् इस सूत्र के अनुसार - दान के कर्म के द्वारा कर्ता जिसे सन्तुष्ट/प्रसन्न करता है। वह सम्प्रदान कारक होता है। सम्प्रदान की चतुर्थी विभक्ति होती है।
  • अधिकरणस्य - इसकी अधिकरण संज्ञा होती है। आधारोऽधिकरणम् सूत्र से अधिकरण कारक होता है और 'सप्तम्यधिकरणे च' इस सूत्र से अधिकरण कारक में सप्तमी विभक्ति होती है। इस सूत्र के अनुसार कर्ता और क्रियापद के संबध को अधिकरण कहते हैं। अधिकरण साक्षात् क्रिया का आधार नहीं होता परन्तु कर्ता या कर्म के द्वारा क्रिया का आधार होता है।
117

मूलश्लोकस्य उचितं शब्दं (पदं) रिक्तस्थाने प्रपूरयतु - 'रिक्तः सर्वो भवति हि ______ पूर्णता गौरवाय।।'

  1. ((a))

    विभुः

  2. ((b))

    लघुः

  3. ((c))

    प्रभुः

  4. ((d))

    शिशुः

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Answer: ((b))

लघुः

प्रश्नानुवाद - मूल श्लोक के उचित शब्द (पद) से रिक्तस्थान को पूरा करे - 'रिक्तः सर्वो भवति हि ______ पूर्णता गौरवाय।।'

स्पष्टीकरण - रिक्तस्थान में लघुः पद आयेगा। जिससे पूर्ण पंक्ति होगी - रिक्तः सर्वो भवति हि लघुः पूर्णता गौरवाय।

प्रस्तुत पंक्ति मेघदूत के एक श्लोक की पंक्ति है। इस ग्रन्थ के रचयिता महाकवि कालिदास है।

श्लोक -

तस्‍यास्तिक्‍तैर्वननगजमदैर्वासितं वान्‍तवृष्टि-

र्जम्‍बूकुञ्जप्रतिहतरयं तोयमादाय गच्‍छेः।

अन्‍त:सारं घन! तुलयितुं नानिल: शक्ष्‍यति त्‍वां

रिक्‍तः सर्वो भवति हि लघु: पूर्णता गौरवाय।।

अर्थ - जब तुम वृष्टि द्वारा अपना जल बाहर फेंक चुके हो तो नर्मदा के उस जल का पान कर आगे बढ़ना, जो जंगली हाथियों के तीते महकते मद से भावित है और जामुनों के कुंजों में रुक-रुककर बहता है। हे घन, भीतर से तुम ठोस होगे तो हवा तुम्‍हें न उड़ा सकेगी, क्‍योंकि जो खाली हैं, वे हल्के, और जो भरे-पूरे हैं वे भारी-भरकम होते हैं। अर्थात् चीज खाली होने से हल्की बन जाती है, गौरव तो पूर्णता से ही मिलती है।

इस तरह श्लोक से स्पष्ट है, अतः यहाँ रिक्तस्थान में लघुः शब्द आयेगा।

118

अपादानसंज्ञायाः विधानं न करोति सूत्रम्-

  1. ((a))

    ध्रुवमपायेऽपादानम्

  2. ((b))

    स्पृहेरीप्सितः

  3. ((c))

    भुवः प्रभवश्च

  4. ((d))

    वारणार्थानामीप्सितः

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Answer: ((b))

स्पृहेरीप्सितः

प्रश्नानुवाद - अपादान संज्ञा का विधान यह सूत्र नहीं करता है-

स्पष्टीकरण - दिये गये विकल्पों में स्पृहेरीप्सितः सूत्र अपादान संज्ञा का विधान करने वाला सूत्र नहीं है, अपितु यह सम्प्रदान संज्ञां (चतुर्थी विभक्ति) के अर्थ में प्रयुक्त होता है।

स्पृहेरीप्सितः सूत्र के अनुसार - स्पृह् (चाहना) धातु के योग में जिसे चाहा जाय, वह सम्प्रदान संज्ञक होता है।

अतः स्पष्ट है कि दिये गये विकल्पों में स्पृहेरीप्सितः सूत्र अपादान संज्ञा का विधान करने वाला सूत्र नहीं है।

Important Points

अन्य सभी सूत्र अपादान संज्ञा (पंचमी विभक्ति) अर्थ में प्रयुक्त होते हैं।

  • ध्रुवमपायेऽपादानम् - जिस स्थान से कोई वस्तु या व्यक्ति अलग होती है। उस स्थान को अपादान कारक होता है। अपादान कारक में पञ्चमी विभक्ति होती है। जैसे - वह घर से आता है। (सः गृहात् आगच्छति।)
  • भुवः प्रभवश्च - प्रभव का अर्थ होता है - उत्पत्ति स्थान। उत्पन्न होने वाले का प्रभव अपादान होता है। जैसे - हिमालयात् गङ्गा प्रभवति।
  • वारणार्थानामीप्सितः - जिस वस्तु से किसी को हटाया जाय, उसमें पंचमी विभक्ति होती है। जैसे - यवेभ्यों गां वारयति क्षेत्रे। (खेत में जौ से गाय को हटाता है।)

इस तरह ये तीनों ही सूत्र अपादान संज्ञा के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं।

119

"द्वावेव" पदस्य सन्धि विच्छेदं कुरु-

  1. ((a))

    द्वा + एव

  2. ((b))

    द्वे + एव

  3. ((c))

    द्वौ + एव

  4. ((d))

    द्वि + एव 

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Answer: ((c))

द्वौ + एव

प्रश्नानुवाद - "द्वावेव" पद का सन्धि विच्छेद करें-

स्पष्टीकरण -

  • शब्द - द्वावेव
  • सन्धिविच्छेद - द्वौ + एव

 

सूत्र - एचोSयवायावः।

  • नियम - जब ए, ऐ, ओ, औ के बाद कोई स्वर आता है तो वहाँ क्रमशः अय्, आय्, अव्, आव् आदेश होता है। इसे अयादि सन्धि कहते हैं। यह स्वर सन्धि का भेद है।
  • ए + कोई स्वर = अय्
  • ऐ + कोई स्वर = आय्
  • ओ + कोई स्वर = अव्
  • औ + कोई स्वर = आव्

उदाहरण - 

  • द्वावेव (द्वौ + एव) - यहाँ औ के बाद ए स्वर है, जिससे ए के स्थान पर आव् आदेश होने से द्वावेव शब्द बना।
  • इसी नियमानुसार द्वावेव का सन्धिविच्छेद (द्वौ + एव) है। जहाँ औ के बाद + ए के होने से औ को आव् आदेश हो गया।
<br>

अतः द्वावेव का सन्धि विच्छेद द्वौ + एव है। यहाँ अयादि सन्धि हुयी है।

120

किरातार्जुनीयस्य सुभाषितमस्ति

  1. ((a))

    कामार्त्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु

  2. ((b))

    वरं विरोधिऽपि समं महात्मभिः

  3. ((c))

    याञ्चा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामाः

  4. ((d))

    तरलहृदयमप्रतिबुद्धञ्च मदयन्ति धनानि 

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Answer: ((b))

वरं विरोधिऽपि समं महात्मभिः

प्रश्नानुवाद - किरातार्जुनीय का सुभाषित है-

स्पष्टीकरण - दिये गये विकल्पों में वरं विरोधिऽपि समं महात्मभिः यह सुभाषित/सूक्ति किरातार्जुनीयम् महाकाव्य की है।

किरातार्जुनीयम् महाकाव्य के रचनाकार महाकवि भारवि है। प्रस्तुत सुभाषित किरातार्जुनीय के एक श्लोक में उद्धृत है-

श्लोक-

तथाऽपि जिह्मः स भवज्जिगीषया तनोति शुभ्रं गुणसम्पदा यशः ।

समुन्नयन्भूतिमनार्यसंगमाद्वरं विरोधोऽपि समं महात्मभिः।। 

अर्थ - आप से सशंकित होकर भी वह कुटिल प्रकृति वाला दुर्योधन आप को पराजित करने की अभिलाषा से दान-दाक्षिण्यादि सद्गुणों से अपने निर्मल यश का (उत्तरोत्तर) विस्तार कर रहा है क्योंकि नीच लोगों के सम्पर्क से वैभव प्राप्त करने की अपेक्षा सज्जनो से विरोध प्राप्त करना भी अच्छा ही होता है

इस तरह स्पष्ट है कि दिये गये विकल्पों में वरं विरोधिऽपि समं महात्मभिः यह सुभाषित/सूक्ति किरातार्जुनीयम् महाकाव्य की है।

Additional Information

अन्य विकल्प -

  • कामार्त्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु - यह पंक्ति मेघदूत में उद्धृत है।
  • याञ्चा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामाः - यह पंक्ति मेघदूत में उद्धृत है।
  • तरलहृदयमप्रतिबुद्धञ्च मदयन्ति धनानि - यह पंक्ति कादम्बरी-शुकनासोपदेश में उद्धृत है।
121

संस्कृत व्याकरणे (पाणिनिमनुसृत्य) प्रत्याहाराणां संख्या कियति ?

  1. ((a))

    54

  2. ((b))

    45

  3. ((c))

    43

  4. ((d))

    39

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Answer: ((c))

43

प्रश्नानुवाद - संस्कृत व्याकरण में (पाणिनि के अनुसार) प्रत्याहारों की संख्या कितनी है ?

स्पष्टीकरण - संस्कृत व्याकरण में पाणिनि मतानुसार प्रत्याहारों की संख्या 43 स्वीकार की गयी है।

  • माहेश्वर सूत्र व्याकरण का महत्वपूर्ण अङ्ग है। पाणिनि ने पूरी वर्णमाला को 14 छोटे-छोटे सूत्रों में क्रमबद्ध कर दिया। उन 14 सूत्रों को माहेश्वर सूत्र एवं शिव सूत्र नाम दिया गया। इन चौदह सूत्रों से 42 प्रत्याहारों की रचना होती है।
  • ये 14 सूत्र इस प्रकार हैं - १. अइउण्। २. ऋऌक्। ३. एओङ्। ४. ऐऔच्। ५. हयवरट्। ६. लण्। ७. ञमङणनम्। ८. झभञ्। ९. घढधष्। १०. जबगडदश्। ११. खफछठथचटतव्। १२. कपय्। १३. शषसर्। १४. हल्।
  • इन 14 माहेश्वर सूत्रों से बनने वाले प्रत्याहार अच् से शुरु होकर हल् पर समाप्त होते हैं।
  • प्रत्येक प्रत्याहार का अन्तिम वर्ण इत्संज्ञक होने से प्रत्याहार में शामिल नहीं होता है।
  • अच् प्रत्याहार में स्वर वर्णों का बोध होता है और हल् प्रत्याहार में सभी व्यञ्जन वर्ण आ जाते हैं।
  • अच् = अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ (स्वर)
  • हल् = ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ,ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द, ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स, ह (व्यञ्जन)

Hint

  • इन 14 माहेश्वर सूत्रों से पाणिनीय व्याकरण के अनुसार 43 प्रत्याहार बनते हैं।
  • जबकि कुछ वैयाकरणों के मतानुसार कुल 42 प्रत्याहार होते हैं।
  • पाणिनीय व्याकरण में प्रयुक्त 43 प्रत्याहारों का क्रम - अण्, अक्, इक्, उक्, एङ्, अच्, इच्, एच्, ऐच्, अट्, अण्, इण्, यण्, अम्, यम्, ञम्, ङम्, यञ्, झष्, भष्, अश्, हश्, वश्, जश्, झश्, बश्, छव्, यय्, मय्, झय्, खय्, चय्, यर्, झर्, खर्, चर्, शर्, अल्, हल्, वल्, रल्, झल्, शल्।

 

अतः स्पष्ट है कि पाणिनि मतानुसार प्रत्याहारों की संख्या 43 स्वीकार की गयी है।

122

'प्रासादात् बालकः पततीति वाक्यं बहुवचने लिख-

  1. ((a))

    प्रासादेन बालकः पतति

  2. ((b))

    प्रासादात्  बालकाः पतन्ति 

  3. ((c))

    प्रासादात् बालकः पतन्ति 

  4. ((d))

    प्रासादेन  बालकाः पतन्ति 

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Answer: ((b))

प्रासादात्  बालकाः पतन्ति 

प्रश्नानुवाद - 'प्रासादात् बालकः पतति' इस वाक्य को बहुवचन में लिखो-

स्पष्टीकरण - प्रासादात् बालकः पतति - महल से बालक गिरता है। - यह वाक्य एकवचन में है।

इस वाक्य को बहुवचन में परिवर्तित करने पर वाक्य होगा - प्रासादात् बालकाः पतन्ति अर्थात् महल से बालक गिरते हैं

अलग होने या गिरने के अर्थ में पञ्चमी विभक्ति होती है, इसलिए यह प्रासाद (महल) शब्द में पञ्चमी विभक्ति है, क्योंकि बालक महल से गिरते हैं या अलग होते हैं।

अतः स्पष्ट है कि बहुवचन में प्रासादात् बालकाः पतन्ति उचित वाक्य है।

123

शुकनासेन कः उपदिष्टः ?

  1. ((a))

    तारापीडः

  2. ((b))

    चन्द्रापीडः

  3. ((c))

    जाबालिः

  4. ((d))

    पुण्डरीकः

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Answer: ((b))

चन्द्रापीडः

प्रश्नानुवाद - शुकनास के द्वारा किसे उपदेश दिया गया ?

स्पष्टीकरण - शुकनास के द्वारा राजकुमार चन्द्रापीड को उपदेश दिया गया। यह वृतान्त महाकवि बाणभट्ट द्वारा विरचित कादम्बरी काव्य के अन्तर्गत शुकनासोपदेश के अन्तर्गत आता है।

  • इस ग्रन्थ में शुकनास तारापीड राजा का मुख्यमन्त्री है। वह राजा तारापीड के पुत्र चन्द्रापीड को उपदेश देता है। इसलिए इसे शुकनासोपदेश कहा जाता है।
  • शुकनास राजा के पुत्र को युवावस्था, यौवन, सम्प्रभुता और लक्ष्मी इनके दुष्प्रभाव के विषय में बताता है कि इनमें से एक भी व्यक्ति का सर्वनाश करने के लिए पर्याप्त है, अगर चारों ओर एक साथ हो तो, क्या ही कहा जा सकता है।
  • जैसा कि शुकनासोपदेश में उल्लिखित पंक्ति है - समुपस्थितयौवराज्याभिषेकञ्च तं कदाचिद्दर्शनार्थमागतमारुढविनयमपि विनीततरमिच्छन् कर्तुं शुकनासः सविस्तमुवाच। अर्थात् एक बार दर्शन के लिए आये हुए, निकट भविष्य में युवराज के लिए अभिषिक्त होने वाले, पहले से ही विनीत चन्द्रापीड को और अधिक विनीत बनाने की इच्छा वाले प्रधानमन्त्री शुकनास ने विस्तारपूर्वक कहा।

 

इस तरह स्पष्ट है कि शुकनास मन्त्री के द्वारा राजकुमार चन्द्रापीड को उपदेश दिया गया।

124

शुकनासोपदेशस्य वचनमात्र

  1. ((a))

    तृष्णा-विष-मूर्च्छिताः कनकमयमिव सर्वं पश्यन्ती

  2. ((b))

    हस्तेलीलाकमलमलके बालकुन्दानुविद्धम्

  3. ((c))

    बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः

  4. ((d))

    हितं  मनोहारि दुर्लभं वचः 

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Answer: ((a))

तृष्णा-विष-मूर्च्छिताः कनकमयमिव सर्वं पश्यन्ती

प्रश्नानुवाद - शुकनासोपदेश का वचनमात्र है -

स्पष्टीकरण - दिये गये विकल्पों में तृष्णा-विष-मूर्च्छिताः कनकमयमिव सर्वं पश्यन्ती शुकनासोपदेश की पंक्ति है। अन्य पंक्तियाँ विभिन्न ग्रन्थों से ली गयी है।

  • महाकवि बाणभट्ट द्वारा विरचित कादम्बरी काव्य के अन्तर्गत शुकनासोपदेश ग्रन्थ आता है।
  • इस ग्रन्थ में शुकनास राजा तारापीड का मन्त्री है। वह राजा तारापीड के पुत्र चन्द्रापीड को उपदेश देता है। इसलिए इसे शुकनासोपदेश कहा जाता है।
  • उपरोक्त पंक्ति शुकनासोपदेश में उल्लिखित है -
  • पंक्ति - दुष्टवारणा एव महामानस्तम्भनिश्चलीकृताः न गृह्णन्त्युपदेशम्। तृष्णा-विष-मूर्च्छिताः कनकमयमिव सर्वं पश्यन्ती।
  • अर्थ - जिस प्रकार मतवाला हाथी विशाल खम्भे में बाँधे रखने पर भी पीलवान् की बातों को नहीं मानता। उसी प्रकार अत्यधिक अहंकार से निःस्तब्ध राजे गुरुजनों के उपदेश पर ध्यान नहीं देते हैं। धन-प्राप्ति की लालसारूपी विष की मूर्च्छा से प्रत्येक पदार्थ को सुवर्णमय देखते हैं

 

इस तरह स्पष्ट है कि दिये गये विकल्पों में तृष्णा-विष-मूर्च्छिताः कनकमयमिव सर्वं पश्यन्ती शुकनासोपदेश की पंक्ति है।

Additional Information

अन्य विकल्प -

  • हस्तेलीलाकमलमलके बालकुन्दानुविद्धम्। - यह मेघदूत की पंक्ति है।
  • बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः। - यह पंक्ति नीतिशतक में उद्धृत है।
  • हितं  मनोहारि दुर्लभं वचः। - यह पंक्ति किरातार्जुनीयम् की है।
125

'स च कुलपतिराद्यश्छन्दसां यः प्रयोक्ता' इत्यनेन संकेतितोऽस्ति -

  1. ((a))

    वाल्मीकिः

  2. ((b))

    व्यास:

  3. ((c))

    अगस्त्यः

  4. ((d))

    वसिष्ठः

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Answer: ((a))

वाल्मीकिः

प्रश्नानुवाद - 'स च कुलपतिराद्यश्छन्दसां यः प्रयोक्ता' इससे संकेतित है -

स्पष्टीकरण - यहाँ 'स च कुलपतिराद्यश्छन्दसां यः प्रयोक्ता' इस पंक्ति से महर्षि वाल्मीकि को संकेत किया गया है।

प्रस्तुत पंक्ति उत्तमरामचरित नाटक के तृतीय अंक के एक श्लोक में उद्धृत है। इस नाटक के रचयिता भवभूति हैं।

तमसावासन्त्यौ (सीतारामौ प्रति) अर्थात् - जहाँ तमसा नदी और वासन्ती (राम और सीता के प्रति)

श्लोक-

अवनिरमरसिन्धु सार्धमस्मद्विधाभिः

स च कुलपतिराद्यश्छन्दसा य प्रयोक्ता।

स च मुनिरनुयातास्त्वतीको वसिष्ठ-

स्तव वितरतु भद्र भूयसे मगलाय।।

अर्थ - हमारी जैसी नदियों (तमसा के पक्ष में नदियों और वासन्ती के पक्ष में वनदेवताओं) सहित पृथ्वी और गङ्गा, छन्दों के प्रथम प्रयोक्ता प्रसिद्ध कुलपति वाल्मीकि और अरुन्धती समेत मुनि वसिष्ठ आपके महान् कल्याण के लिये आशीर्वाद प्रदान करें।

अर्थात् तमसा और वासन्ती राम और सीता के लिए कहती है कि महर्षि वाल्मीकि और मुनि वसिष्ठ आपके कल्याण हेतु आपको आशीर्वाद प्रदान करें।

इस तरह श्लोक से स्पष्ट है कि उपरोक्त पंक्ति से महर्षि वाल्मीकि की ओर संकेत किया गया है। 

अतः यहाँ वाल्मीकि उचित विकल्प है।

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