Previous Year Paper

UP TGT Sanskrit 2016 Official Paper (Previous Year Paper)

125 questions · 120 minutes · with answers · free

Test (125 questions)

1

“कश्चित् कान्ता विरह गुरुणा" इत्यादि श्लोक में मङ्गलाचरण का प्रकार है-

  1. ((a))

    आशीर्वादात्मक

  2. ((b))

    नमस्क्रियात्मक

  3. ((c))

    क्रियात्मक

  4. ((d))

    वस्तुनिर्देशात्मक

Show Answer
Answer: ((d))

वस्तुनिर्देशात्मक

कालिदास संस्कृत भाषा के महान कवि और नाटककार थे। उन्होंने भारत की पौराणिक कथाओं को आधार बनाकर रचनाएं की, जिसमें भारतीय जीवन और दर्शन के विविध रूप और मूल तत्त्व निरूपित हैं। कालिदास अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण राष्ट्र की समग्र राष्ट्रीय चेतना को स्वर देने वाले कवि माने जाते हैं संस्कृत साहित्य में ही नहीं अपितु समग्र साहित्यिक संसार में उन्हें कविकुलश्रेष्ठ तथा कविशिरोमणि माना जाता है।

महाकवि कालिदास विरचित 'मेघदूतम्' नामक दूतकाव्य में वस्तुनिर्देशात्मक मङ्गलाचरण से आरम्भ किया गया है -

श्लोक - 

कश्चित्‍कान्‍ताविरहगुरुणा स्‍वाधिकारात्‍प्रमत:

शापेनास्‍तग्‍ड:मितमहिमा वर्षभोग्‍येण भर्तु:।

यक्षश्‍चक्रे जनकतनयास्‍नानपुण्‍योदकेषु

स्निग्‍धच्‍छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु।।

श्लोकार्थ - अपने काम में असावधानहोने के कारण यक्षपति द्वारा अपनी पत्नी से वर्ष भर के विरह के शाप प्राप्त किया कोई यक्ष था। शाप के कारण उसकी महिमा आदि शक्तिया समाप्त हो गई थी, उसने घने छायादार पेड़ से युक्त और जहाँ सीता जी के स्‍नान के द्वारा पवित्र हुए जल-कुंड भरे रामगिरि के आश्रमों में अपना निवास बनाया।

अतः स्पष्ट है कि “कश्चित् कान्ता विरह गुरुणा" इत्यादि श्लोक में वस्तुनिर्देशात्मक मङ्गलाचरण है।

Additional Information

मङ्गलाचरण - मङ्गल का अर्थ होता है अभिलषित वस्तु की सिद्धि अर्थात् चाहे गये कार्य का होना या चाहे गये वस्तु की प्राप्ति। मनुष्य आनन्द की प्राप्ति के लिए ही सभी कार्य करता है। शब्दकल्पद्रुम के अनुसार मङ्गति हितार्थं सर्पति मङ्गति दूरदृष्टमनेनास्माद्वेति। जिसका अर्थ होता है - अभिप्रेतार्थसिद्धि अर्थात् इच्छित कार्य का होना अथवा इच्छित वस्तु की प्राप्ति। संस्कृत साहित्य का सृजन अथवा पठन,पाठन मङ्गल कार्य ही है।अतः संस्कृत काव्य( साहित्य) ग्रंथ लेखन कार्य शुभ कार्य है जिसकी निर्विघ्न समाप्ति के लिए इसके आदि(प्रारम्भ) एवं अंत में मङ्गलाचरण किया जाता है। इस मङ्गलाचरण कि आवश्यकता संस्कृत साहित्य में स्वीकार किया गया है, साहित्यदर्पणकार आचर्य विश्वनाथ आदि महाकाव्य का लक्षण करते हुए ही कहते हैं कि - 'आदौ नमस्क्रियाशीर्वा वस्तुनिर्देश एव वा॥' अर्थात् महाकाव्य के आरम्भ में नमस्कारात्मक, आशीर्वादात्मक या वस्तुनिर्देशात्मक कोई एक मङ्गलाचरण होना चहिए। इससे स्पष्ट होता है कि मङ्गलाचरण तीन प्रकार के होते होम -

नमस्कारात्मक - नमः प्रणाम आदि शब्दों का प्रयोग जिस मंगलाचरण में हो, उसको नमस्‍कारात्‍मक मङ्गलाचरण कहते हैं। जिसमें नमस्कार करने की बात की जाये वह नमस्करात्मक मंगलाचरण होता है। नमः, नमस्ते  नमस्कार या नमामि आदि आये।  

यथा - महाभारत का मंगलाचरण इसके सबसे प्रसिद्ध श्लोकों में है। इसमें महाभारतकार ने ‘नारायण, नर और नरोत्तम, सरस्वती देवी, और स्वयं (व्यास) को’ नमस्कार किया है।

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।

देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्।।

मंगलाचरण का श्‍लोक देखने पर ऐसा जान पड़ता है कि यहाँ नारायण शब्‍द का अर्थ है भगवान श्री कृष्‍ण और नरोत्‍तम का अर्थ है नर अर्जुन। महाभारत में प्रायः सर्वत्र इन्‍हीं दोनों का नर-नारायण के अवतार के रूप में उल्‍लेख हुआ है। मंगलाचरण में ग्रन्‍थ के इन दोनों प्रधान पात्र तथा भगवान के मूर्ति-युगल को प्रणाम करना मंगलाचरण को नमस्‍कारात्‍मक बनाता है।

आशीर्वादात्मक - जहाँ 'जय' या 'जयति' शब्द का प्रयोग होता हैं आशीर्वादात्मक मंगला- चरण समझना चाहिए। जहाँ किसी के लिए शुभ होने की या मंगल होने की कामना की जाये वहाँ आशीर्वादात्मक मंगलाचरण होता है। 

यथा -

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।

चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्धर्मो यशो बलम्।।

वस्तुनिर्देशात्मक - जहाँ विषय का वर्णन करते हुये शुभ शब्दों का प्रयोग करके काव्य की रचना की जाती है। जहां विषयवस्तु को बताते हुये

उसी के द्वारा मंगलाचरण हो वहाँ वस्तुनिर्देशात्मक मंगलाचरण होता है। 

यथा -

कश्चित्‍कान्‍ताविरहगुरुणा ���्‍वाधिकारात्‍प्रमत:

शापेनास्‍तग्‍ड:मितमहिमा वर्षभोग्‍येण भर्तु:।

यक्षश्‍चक्रे जनकतनयास्‍नानपुण्‍योदकेषु

स्निग्‍धच्‍छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु।।

2

कादम्बरी नायिका है

  1. ((a))

    स्वकीया

  2. ((b))

    परकीया

  3. ((c))

    मानिनी

  4. ((d))

    इनमें से कोई नहीं

Show Answer
Answer: ((a))

स्वकीया

कादम्बरी कथा संस्कृत जगत में गद्यकाव्य के रूप में अत्यंत उत्कृष्ट ग्रंथ है।

  • जिसके रचयिता कवि बाणभट्ट है।
  • जिसमें राजा चन्द्रापीड तथा उसके मित्र वैशम्पायन की तीन जन्मों की कथा है।
  • जिसका नायक चन्द्रापीड तथा नायिका कादम्बरी है।
  • जिसके अन्तर्गत नायिका कादम्बरी स्वकीया नायिका है।
  • स्वकीया नायिका अपने ही पति के प्रति अनुराग रखने वाली नायिका होती है।
  • जो कि कादम्बरी ग्रंथ में नायिका कादम्बरी का अपने प्रेमी चन्द्रापीड के प्रति था।

 

अतः स्वकीया नायिका के उपर्युक्त अभिप्राय से यह स्पष्ट है कि कादम्बरी स्वकीया नायिका है।

Important Points

उपर्युक्त विकल्पों में नायिका के तीन भेद हैं -  

  • स्वकीया - अपने पति के प्रति प्रेम रखने वाली।
  • परकीया - परपुरुष के प्रति प्रेम रखने वाली।
  • सामान्या - अन्य उद्देश्य या धन के लोभ से प्रेम करने वाली।
3

निम्नलिखित में से जो सामान्यतः अशुद्ध है-

  1. ((a))

    राधा कृष्णेन सह वनं जगाम।

  2. ((b))

    सुधा रामायणं पठितवती।

  3. ((c))

    पिता पुत्रं प्रश्नं पृच्छति।

  4. ((d))

    शोभा मोहनेन जलं याचयामा।

Show Answer
Answer: ((d))

शोभा मोहनेन जलं याचयामा।

स्पष्टीकरण - दिये गये विकल्पों में शोभा मोहनेन जलं याचयामा। अशुद्ध वाक्य है।

शुद्ध वाक्य होगा - शोभा मोहनं जलं याचते। याच् धातु द्विकर्मक धातु है, जिसके योग में मोहन में द्वितीया लगेगी।

अकथितं च - इस सूत्र से दुह्, याच्, पच्, दण्ड्, रुध्, प्रच्छ्, चि, ब्रू, शास्, जि, मन्थ्, मुष्, नी, वह्, हृ, कृष् इन 16 धातुओं के योग में गौण कर्म संज्ञा होती है और इन धातुओं को द्विकर्मक धातु कहा जाता है। इन 16 धातुओं के उदाहरण - 

  • दुह् - गोपः गां दोग्धि पयः।
  • याच् - बलिं याचते वसुधाम्।
  • पच् - स तण्डुलान् ओदनं पचति।
  • दण्ड् - राजा चौरं शतं दण्डयति।
  • रुध् - व्रजमवरुणद्धि गाम्।
  • प्रच्छ् - मुनिं मार्गं पृच्छति।
  • चि - लताम् चिनोति पुष्पाणि।
  • ब्रू - शिष्यं धर्मं ब्रूते।
  • शास् - गुरुः शिष्यं धर्मं शास्ति।
  • जि - शत्रु शतं जयति।
  • मन्थ् - क्षीरसागरममृतं मथ्नन्ति।
  • मुष् - चौरः राजानं सहस्रं मुष्णाति।
  • नी - सः ग्राममजां नयति वहति वा।
  • वह् - सः ग्राममजां नयति वहति वा।
  • हृ - चौरं कृपणं धनमहरत्।
  • कृष् - नराः वसुधां रत्नानि कर्षन्ति।

 

अतः स्पष्ट है कि यहाँ शोभा मोहनेन जलं याचयामा अशुद्ध वाक्य है।

Additional Information

अन्य विकल्प (ये तीनों विकल्प शुद्ध हैं।)

  • राधा कृष्णेन सह वनं जगाम। (राधा कृष्णेन के साथ वन को गयी।) - सह के योग में तृतीया होती है। अतः यह वाक्य शुद्ध है।
  • सुधा रामायणं पठितवती। (सुधा ने रामायण को पढ़ा।) - कर्तृवाच्य वाक्य है।
  • पिता पुत्रं प्रश्नं पृच्छति। (पिता पुत्र से प्रश्न पूछता है।) - पृच्छ् धातु के योग में पुत्र में द्वितीया लगी, जो शुद्ध है।
4

अधोलिखित में से अशुद्ध पदयुग्म है ।

  1. ((a))

    चत्वारि पुष्पाणि

  2. ((b))

    चतस्रः बालिकाः

  3. ((c))

    त्रीणि पुत्राः

  4. ((d))

    त्रयो बालकाः

Show Answer
Answer: ((c))

त्रीणि पुत्राः

स्पष्टीकरण -

सभी विकल्पों का अर्थ -

  • चत्वारि पुष्पाणि - चार पुष्प (दोनों पद चत्वारि और पुष्पाणि नपुंसकलिंग है।)
  • चतस्रः बालिका - चार बालिकाएं (दोनों पद चतस्रः और बालिकाः स्त्रीलिंग है।)
  • त्रीणि पुत्राः - तीन पुत्र (दोनों पद भिन्न-भिन्न है, त्रीणि - नपुंसकलिंग, पुत्राः - पुल्लिंग) - यह पदयुग्म अशुद्ध है।
  • त्रयो बालकाः - तीन बालक (दोनों पद त्रयो और बालकाः पुल्लिंग है।)
  • विकल्पों में दिए गए शब्दों के लिंग के अनुसार ज्ञात होता है कि यहाँ त्रीणि पुत्राः अशुद्ध पदयुग्म है, क्योंकि यहाँ दोनों पद भिन्न-भिन्न लिंग के है। अतः त्रीणि पुत्राः सही उत्तर होगा।
5

"किरातार्जुनीय" का कथानक महाभारत के किस पर्व से लिया गया है?

  1. ((a))

    आदिपर्व

  2. ((b))

    विराटपर्व

  3. ((c))

    वनपर्व

  4. ((d))

    शान्तिपर्व

Show Answer
Answer: ((c))

वनपर्व

संस्कृत महाकाव्यों के बृहदत्रयी में स्थान प्राप्त करने वाला भारवी कृत 'किरातार्जुनीयम' यहाँ महाकाव्य महाभारत के वनपर्व पर आधारित है।

किरातार्जुनीयम से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे-

  • किरातार्जुनीयम १८ सर्गो में वर्णित है।
  • प्रस्तुत महाकाव्य का नायक पांडवो से अर्जुन है।
  • इस काव्य में वीर रस प्रधान है।
  • किरात वेष धारित भगवान शंकर से युद्ध का प्रमुख वर्णन इस काव्य के कथानक में है।
  • किरातार्जुनीयम का कथानक महाभारत के वनपर्व पर आधारित है।

अतः "किरातार्जुनीय" का कथानक महाभारत के 'वनपर्व' से लिया गया है यह स्पष्ट होता है।

6

“शापेनास्तङ्मित महिमा" किसका विशेषण है ?

  1. ((a))

    मेघ

  2. ((b))

    यक्षिणी

  3. ((c))

    यक्ष

  4. ((d))

    मेघदूत

Show Answer
Answer: ((c))

यक्ष

कालिदास संस्कृत भाषा के महान कवि और नाटककार थे। उन्होंने भारत की पौराणिक कथाओं को आधार बनाकर रचनाएं की, जिसमें भारतीय जीवन और दर्शन के विविध रूप और मूल तत्त्व निरूपित हैं। कालिदास अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण राष्ट्र की समग्र राष्ट्रीय चेतना को स्वर देने वाले कवि माने जाते हैं संस्कृत साहित्य में ही नहीं अपितु समग्र साहित्यिक संसार में उन्हें कविकुलश्रेष्ठ तथा कविशिरोमणि माना जाता है।

महाकवि कालिदास विरचित 'मेघदूतम्' नामक दूतकाव्य में वस्तुनिर्देशात्मक मङ्गलाचरण से आरम्भ करते हुए कहते हैं -

श्लोक - 

कश्चित्‍कान्‍ताविरहगुरुणा स्‍वाधिकारात्‍प्रमत:

           शापेनास्‍तङ्गमितमहिमा वर्षभोग्‍येण भर्तु:।

यक्षश्‍चक्रे जनकतनयास्‍नानपुण्‍योदकेषु

           स्निग्‍धच्‍छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु।।

श्लोकार्थ - अपने काम में असावधानहोने के कारण यक्षपति द्वारा अपनी पत्नी से वर्ष भर के विरह के शाप प्राप्त किया कोई यक्ष था। शाप के कारण उसकी महिमा आदि शक्तियाँ समाप्त हो गई थी, उस यक्ष ने घने छायादार पेड़ से युक्त और जहाँ सीता जी के स्‍नान के द्वारा पवित्र हुए जल-कुंड से युक्त रामगिरि के आश्रमों में अपना निवास बनाया।

श्लोकार्थ से ज्ञात होता है 'शापेनास्‍तङ्गमितमहिमा' अर्थात् 'शाप के कारण जिसकी महिमा आदि शक्तियाँ समाप्त हो गई थी' यह यक्ष के बारे में कहा गया है।

अतः स्पष्ट है कि “शापेनास्‍तङ्गमितमहिमा" यह यक्ष का विशेषण है।

7

लक्ष्मी के द्वारा कालकूट से क्या ग्रहण किया ?

  1. ((a))

    चञ्चलता

  2. ((b))

    मोहनशक्ति

  3. ((c))

    रागता

  4. ((d))

    वक्रता

Show Answer
Answer: ((b))

मोहनशक्ति

बाणभट्ट विरचित प्रसिद्ध ग्रन्थ 'कादंबरी' के प्रथम अध्याय 'शुकनासोपदेशः' से इसमें राजा तारापीड का नीतिनिपुण एवं अनुभवी मन्त्री शुकनास राजकुमामार चन्द्रापीड को राज्याभिषेक के पूर्व वात्सल्य भाव से उपदेश देते हैं और रूप, यौवन, प्रभुता तथा ऐश्वर्य से उद्भूत दोषों से सावधान रहने की शिक्षा देते हैं।

शुकनासोपदेशः में लक्ष्मी के स्वभाव का वर्णन करने से पहले उन के गुणों की उत्पत्ति कैसे हुई इसका उल्लेख किया है-

"लक्ष्मीः क्षीरसागरात्-पारिजातपल्लवेभ्यो रागम्, इन्दुशकलादेकान्तवक्रताम्, उच्चैःश्रवसश्चञ्चलताम्, कालकूटान्मोहशक्तिम्, मदिराया मदम्, कौस्तुभमणेरतिनैष्ठुर्यम्, इत्येतानि सहवासपरिचय-वशद्विरहविनोदचिह्नानि गृहीत्वेवोद्गता।"

अर्थ - "समुद्र मंथन से जब यह उत्पन्न हुई तो क्षीर सागर के पारिजात पल्लवों से राग, चन्द्रमा से वक्रता, उच्चैःश्रवा से चंचलता, कालकूट से मोहनशक्ति, मदिरा से मादकता, कौस्तुभ मणि से कठोरता ग्रहण कर उन-उन वस्तुओं के विरह में अपने मनोरंजन के लिए उनके चिह्नों के साथ बाहर निकली।" 

अतः लक्ष्मी के द्वारा कालकूट से मोहनशक्ति ग्रहण की।

8

"नवयौवनोद्वतम्" यह पद किरातार्जुनीय महाकाव्य में किसके लिए प्रयुक्त हुआ है ?

  1. ((a))

    वनेचर के लिए

  2. ((b))

    दुर्योधन ���े लिए

  3. ((c))

    भीम के लिए

  4. ((d))

    दुःशासन के लिए

Show Answer
Answer: ((d))

दुःशासन के लिए

स्पष्टीकरण

  • किरातार्जुनीयम् महाकवि भारवि का एकमात्र महाकाव्य है।
  • जिसमें 18 सर्ग है तथा जो बृहत्त्रयी ग्रंथों में से एक है।
  • उपर्युक्त पद किरातार्जुनीयम् के प्रथम सर्ग की श्लोक संख्या 12 से है।

Important Points

जो श्लोक इस प्रकार है - 

स यौवराज्ये नवयौवनोद्धतं निधाय दुःशासनमिद्धशासनम्।

मखेष्वखिन्नोनुमतः पुरोधसा धिनोति हव्येन हिरण्यरेतसम्।।

अर्थ -  जिसकी आज्ञा का उल्लंघन कोई नहीं कर सकता, ऐसा वह दुर्योधन नवयुवावस्था के कारण गर्व से युक्त दुःशासन को युवराज पद पर स्थापित करके पुरोहित की आज्ञा से यज्ञों में अग्नि को हवि प्रदान करते हुए अग्नि को प्रसन्न करता है।

अतः उपर्युक्त श्लोक से यह स्पष्ट है कि उपर्युक्त पद दुःशासन के लिए प्रयुक्त हुआ है।

9

"स्मरिष्यति त्वां न स बोधितोऽपि सन् कथा प्रमत्तः प्रथमं कृतामिव” यह पंक्ति किसने कही है ?

  1. ((a))

    दुष्यन्त ने

  2. ((b))

    कण्व ने

  3. ((c))

    शार्ङ्गरव ने

  4. ((d))

    दुर्वासा ने

Show Answer
Answer: ((d))

दुर्वासा ने

स्पष्टीकरण - उपरोक्त पंक्ति दुर्वासा ऋषि द्वारा शकुन्तला को कही गयी।

  • प्रस्तुत पंक्ति अभिज्ञान शाकुन्तलम् नाटक के एक श्लोक की है। इस नाटक में दुष्यन्त और शकुन्तला के परिणय की कहानी है। इस नाटक के रचयिता महाकवि कालिदास है।
  • प्रस्तुत श्लोक में महर्षि दुर्वासा ऋषि शकुन्तला को शाप देते हुए कहते हैं कि -

श्लोक -

विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा तपोधनं न वेत्थि मामुपस्थितम्।

स्मरिष्यति त्वां न स बोधितोऽपि सन् कथां प्रमत्तः प्रथमं कृतामिव।।

  • अर्थ - जिसके ध्यान में इतनी मग्न होकर तू मुझ जैसे तपस्वी के आने की भी सुध नहीं ले रही है, वह (दुष्यन्त) बहुत स्मरण दिलाने पर भी तुझे उसी प्रकार भूल जाएगा, जैसे पागल मनुष्य अपनी पिछली सारी बातें भूल जाया करता है।
  • श्लोक की पंक्ति से स्पष्ट है कि शकुन्तला दुष्यन्त के विषय में सोच रही है, जिस कारण वह महर्षि दुर्वासा का अतिथि सत्कार नहीं कर पाती, जिस कारण दुर्वासा उसे शाप देते हैं।

 

अतः स्पष्ट है कि उपरोक्त पंक्ति दुर्वासा ऋषि द्वारा कही गयी।

10

उत्तररामचरित के तृतीयाङ्क में किस नदी का उल्लेख है ?

  1. ((a))

    कावेरी का

  2. ((b))

    कृष्णा का

  3. ((c))

    गोदावरी का

  4. ((d))

    यमुना का

Show Answer
Answer: ((c))

गोदावरी का

स्पष्टीकरण - उत्तररामचरित के तृतीयाङ्क में गोदावरी नदी का उल्लेख है।

उत्तररामचरितम् महाकवि भवभूति का प्रसिद्ध संस्कृत नाटक है, जिसके सात अंकों में राम के उत्तर जीवन की कथा है।

भवभूति एक सफल नाटककार हैं। उत्तररामचरितम् में उन्होने ऐसे नायक से संबंधित इतिवृत्त का चयन किया है, जो भारतीय संस्कृति की आत्मा है।

कथानक - जनापवाद के कारण राम न चाहते हुए भी सीता का परित्याग कर देते हैं। सीतात्याग के बाद विरही राम की दशा का तृतीय अंक में करुण चित्र प्रस्तुत किया गया है, जो काव्य की दृष्टि से इस नाटक की जान है। भवभूति ने इस दृश्य-काव्य में दांपत्य प्रणय के आदर्श रूप को अंकित किया है।

Important Pointsउत्तररामचरित तृतीय अंक के आरम्भ में ही कहा गया है-

पंक्ति - मुरला - सखि तमसे, प्रेषितास्मि भगवतोऽगस्त्यस्य पत्न्या लोपामुद्रया सरितां गोदावरीमभिधातुम्। जानास्येव यथा वधू परित्यागात्प्रभृति-

अर्थ - मुरला - सखी तमसा (नदी), भगवान् अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा ने श्रेष्ठ नदी गोदावरी से यह कहने के लिये भेजा है कि - तुम जानती ही हो कि पत्नी (सीता) के परित्याग करने के बाद से।

इस तरह पंक्ति से स्पष्ट है, अतः यहाँ गोदावरी उचित विकल्प है।

11

'दा' धातु के लृट लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन में रूप बनता है-

  1. ((a))

    ददासि

  2. ((b))

    दास्यन्ते

  3. ((c))

    दत्ते

  4. ((d))

    दास्यसि

Show Answer
Answer: ((d))

दास्यसि

‘दा’ धातु से ‘लृट् लकार’ के विविध वचनों और पुरूषों में प्राप्त रूप इस प्रकार है-

पुरूषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमपुरूषदास्यतिदास्यतःदास्यन्ति
मध्यमपुरूषदास्यसिदास्यथःदास्यथ
उत्तमपुरूषदास्यामिदास्यावःदास्यामः

 

अतः स्पष्ट है कि 'दास्यसि' इस पद में मूलधातु 'दा' धातु का 'लृट् लकार' मध्यम पुरुष एकवचन है।

12

मुनि शब्द का षष्ठी एक वचन का रूप है-

  1. ((a))

    मुनये

  2. ((b))

    मुनेः

  3. ((c))

    मुनिम्

  4. ((d))

    मुनिः

Show Answer
Answer: ((b))

मुनेः

स्पष्टीकरण -

  • मुनि शब्द का षष्ठी विभक्ति - एकवचन में मुनेः रूप बनता है।
  • अतः मुनेः सही उत्तर होगा।

अन्य विकल्प -

  • मुनये - चतुर्थी विभक्ति-एकवचन में ये रूप बनता है।
  • मुनिम् - द्वितीया विभक्ति-एकवचन में ये रूप बनता है।
  • मुनिः - प्रथमा विभक्ति-एकवचन में ये रूप बनता है।

Additional Information

मुनि शब्दरूप (इकारान्त पुल्लिंग) का प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमामुनिःमुनीमुनयः
द्वितीयामुनिम्मुनीमुनीन्
तृतीयामुनिनामुनिभ्याम्मुनिभिः
चतुर्थीमुनयेमुनिभ्याम्मुनिभ्यः
पञ्चमीमुनेःमुनिभ्याम्मुनिभ्यः
षष्ठीमुनेःमुन्योःमुनीनाम्
सप्तमीमुनौमुन्योःमुनिषु
सम्बोधनहे मुनेहे मुनीहे मुनयः
13

"अमृतसहोदरापि कटुविपाकाः। विग्रहवत्यपि अप्रत्ययदर्शना। पुरुषोत्तमरतापि खलजनप्रिया” इसमें अलङ्कार है-

  1. ((a))

    उत्प्रेक्षा

  2. ((b))

    विरोधाभास

  3. ((c))

    अपह्नति

  4. ((d))

    व्याजस्तुति

Show Answer
Answer: ((b))

विरोधाभास

स्पष्टीकरण

  • शुकनासोपदेश बाणभट्ट द्वारा रचित गद्यकाव्य कादम्बरी से उद्धृत है।
  • जिसमें मन्त्री शुकनास नवयुवास्था में प्रवेश करने वाले युवराज चन्द्रापीड को उपदेश देते हैं।
  • उन्हीं उपदेशों में मन्त्री शुकनास ने लक्ष्मी की चंचलता का भी वर्णन किया है।
  • उन्ही वर्णनों में से एक गद्यांश उपर्युक्त भी है - 
  • "अमृतसहोदरापि कटुविपाकाः। विग्रहवत्यपि अप्रत्ययदर्शना। पुरुषोत्तमरतापि खलजनप्रिया।
  • अर्थ - अमृत की सहोदर होते हुए भी परिणाम दुख को देने वाली है, मूर्तियुक्त होते हुए भी प्रत्यक्ष नहीं है। पुरुषोत्तम (विष्णु) में आसक्त होते हुए भी दुर्जनों की प्रिया है।

Important Points

  • प्रकृत गद्यांश में विरोधाभास अलङ्कार है।
  • विरोधाभास का लक्षण है -  विरोधः सोऽविरोधेऽपि विरुद्धत्वेन यद्वचः।
  • अर्थ - जहाँ विरोध न होने पर भी विरोधी वचन का प्रयोग किया जाता है। अर्थात् विरोध का आभास होता है, वहाँ विरोधाभास अलंकार है।
  • उपर्युक्त गद्यांश में विरोधाभास अलंकार का लक्षण गद्यांश में पूर्ण रूप से  घटित होता है।

 

अतः उपर्युक्त गद्यांश में विरोधाभास अलंकार है।

14

“कान्ताविरहगुरुणा'' इस समस्त पद में कितने पदों का समास हुआ है ?

  1. ((a))

    चार

  2. ((b))

    तीन

  3. ((c))

    दो

  4. ((d))

    एक

Show Answer
Answer: ((c))

दो

स्पष्टीकरण - कान्ताविरहगुरुणा पद में दो पदों (कान्ताविरह एवं गुरु) का समास है। 

यहाँ कान्ताविरहः एक शब्द है, जिसका समास षष्ठी तत्पुरुष है - कान्तायाः विरहः, जिससे एक शब्द कान्ताविरह बना।

दूसरा पद यहाँ गुरुणा है। पूर्ण शब्द कान्ताविरह-गुरुणा।

समासविग्रह - कान्ताविरहेण गुरुः (तृतीया तत्पुरुष समास)

  • कविकालिदास का सर्वप्रसिद्ध खण्डकाव्य मेघदूत है।
  • जो कालिदास का अनुपम खण्डकाव्य है।
  • जिसके अन्तर्गत यक्ष के विरह का अत्यंत मनोरम वर्णन कवि द्वारा किया गया है।
  • मेघदूत पूर्वमेघ तथा उत्तरमेघ में विभक्त है।

Important Points

उपर्युक्त पद मेघदूत के पूर्वमेघ के मंगलाचरण श्लोक से है। जो इस प्रकार है - 

कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात्प्रमत्तः 

शापेनास्तङ्गमितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तुः।

यक्षश्चक्रे जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु

स्निग्धच्छाया वसति तरुषु रामगिर्याश्रमेषु।।

  • अर्थ -  अपने कार्य में प्रमाद करने वाला, प्रियतमा के वियोग के कारण एक वर्ष तक भोगे जाने योग्य स्वामी के शाप के कारण जिसकी महिमा नष्ट कर दी गयी। ऐसा कोई यक्ष जनक की पुत्री सीता के स्नान से पवित्र जल वाले तथा घने छायादार वृक्षों से युक्त रामगिरि के आश्रमों में निवास करने लगा था।

 

अतः स्पष्ट है कि कान्ताविरहगुरुणा पद में दो पदों का समास है।

15

"अपरिणामोपशमो दारुणो लक्ष्मीमदः" शुकनासोपदेश में किसका कथन है ?

  1. ((a))

    तारापीड

  2. ((b))

    शुकनास

  3. ((c))

    चन्द्रापीड

  4. ((d))

    लक्ष्मी

Show Answer
Answer: ((b))

शुकनास

स्पष्टीकरण - शुकनासोपदेश में प्रधानमंत्री शुकनास द्वारा दिया गया उपदेश है, जो वे राजा के पुत्र चन्द्रापीड को देते है। यह वृतान्त बाणभट्ट कृत कादम्बरी गद्यकाव्य में देखने को मिलता है।

"अपरिणामोपशमो दारुणो लक्ष्मीमदः" शुकनासोपदेश में यह कथन तारापीड राजा के प्रधानमन्त्री शुकनास का है। जहाँ वे राजा के पुत्र चन्द्रापीड को उपदेश देते हुए कहते हैं - 

शुकनासोपदेश ग्रन्थ की पंक्ति - अपरिणामोशमो दारुणो लक्ष्मीमदः। कष्टमनञ्जनवर्तिसाध्यमपरम् ऐश्वर्यतिमिरान्धत्वम्। अशिशिरोपचारहार्योऽतितीव्रः दर्पदाहज्वरोष्मा।

अर्थ - अन्य मद तो कालक्रम से स्वतः ही शान्त हो जाते हैं, किन्तु धन/लक्ष्मी का उन्माद तो मरते दम तक भी शान्त नहीं होता है। तिमिर नामक भयंकर नेत्र रोग भी अञ्जन आदि की चिकित्सा से दूर हो सकता है। किन्तु ऐश्वर्य का अविवेक रूपी गाढ़ अन्धत्व तो अञ्जनादि रूपी किसी भी उपदेशोपचार से दूर नहीं होता है। अन्य प्रकार के ज्वर का ताप तो सामान्य शीतोपचार से भी शान्त हो जाता है। किन्तु अहंकार रूपी ज्वर का ताप तो चन्दन आदि विशिष्ट शीतोपचार से भी शान्त नहीं होता है।

अतः स्पष्ट है कि अपरिणामोपशमो दारुणो लक्ष्मीमदः" शुकनासोपदेश में यह कथन प्रधानमन्त्री शुकनास का है।

16

शिवराजविजय में वर्णन है

  1. ((a))

    भगवान शिव का

  2. ((b))

    शिवाजी महाराज का

  3. ((c))

    व्यास का

  4. ((d))

    विजयकुमार का

Show Answer
Answer: ((b))

शिवाजी महाराज का

पं. अम्बिकादत्त व्यास 'अभिनव बाण' के रूप में तथा उनका काव्य 'शिवराजविजय' संस्कृत के प्रथम उपन्यास के रूप में जाना जाता है।

शिवराजविजय एक ऐतिहासिक उपन्यास है तथा इसमें वर्णित कथा ऐतिहासिक कथा है। शिवराजविजय उपन्यास में शिवाजी महाराज और रघुवीरसिंग यह नायकों के रूप में हैं तथा गौरसिंह, श्यामसिंह आदि के भी चरित्र हैं। इनके द्वारा छात्र राष्ट्रभक्ति, स्वाभिमान, आत्मसम्मान, आत्मविश्वास, स्वधार्मनुराग आदि मूल्य दिखाए गए है। इस काव्य का प्रधान रस वीर है। तथा अन्य सभी रस इसमें उपकारी रूप में ज्ञात होते है।

अतः शिवराजविजय में शिवाजी महाराज का वर्णन है यह स्पष्ट होता है।

17

पैंतालीस का संस्कृत शब्द होगा-

  1. ((a))

    पञ्चालीसः

  2. ((b))

    पञ्चचत्वारिंशतिः

  3. ((c))

    पञ्चचत्वारिंशिती

  4. ((d))

    पञ्चचत्वारिंशत्

Show Answer
Answer: ((d))

पञ्चचत्वारिंशत्

स्पष्टीकरण -

  • पैंतालीस (45) को संस्कृत में - पञ्चचत्वारिंशत् लिखते हैं।
  • अतः पञ्चचत्वारिंशत् सही विकल्प है।
  • अन्य तीनों विकल्प (पञ्चालीसः, पञ्चचत्वारिंशतिः, पञ्चचत्वारिंशिती) अशुद्ध है तथा इनसे किसी अन्य संख्या शब्द की भी संस्कृत नहीं बनती है।
18

"न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत्” यहां प्रतिनिविष्ट पद का अभिप्राय है

  1. ((a))

    दुराग्रह विशेष से ग्रस्त

  2. ((b))

    ज्ञान विशेष से युक्त

  3. ((c))

    अज्ञानान्धकार से युक्त

  4. ((d))

    वेदज्ञान विशेष से युक्त

Show Answer
Answer: ((a))

दुराग्रह विशेष से ग्रस्त

स्पष्टीकरण

  • नीतिशतक कवि भर्तृहरि द्वारा रचित अद्यतन प्रसिद्ध नीति ग्रंथ है।
  • इनके द्वारा तीन शतक रचित किये गये हैं -
  • नीतिशतक
  • शृंगारशतक
  • वैराग्यशतक

Important Points

उपर्युक्त श्लोकांश नीतिशतक के श्लोक संख्या 4 से है। जो इस प्रकार है - 

प्रसह्यमणिमुद्धरेन्मकरवक्त्रदंष्ट्रान्तरात्

समुद्रमपि संतरेत् प्रचलदुर्मिमालाकुलम्।

भुजङ्गमपिकोपितं शिरसि पुष्पवद् धारयेत्

न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत्।।

अर्थ - मगरमच्छ के मुख के दाढ़ से मणि को निकाला जा सकता है, चंचल लहरों के समूह में समुद्र को पार किया जा सकता है, क्रोधित सांप को सिर पर पुष्प के समान धारण किया जा सकता है, परन्तु मूर्ख व्यक्ति के चित्त को प्रसन्न नहीं किया जा सकता ।

  • उपर्युक्त श्लोकांश उपरोक्त श्लोक से है। जिसके अन्तर्गत प्रतिनिविष्ट पद का अभिप्राय दुराग्रह विशेष से ग्रस्त है। अर्थात् हठी मन वाला।

 

अतः उपर्युक्त श्लोक के अर्थ से स्पष्ट है कि प्रतिनिविष्ट पद का अभिप्राय दुराग्रह विशेष से ग्रस्त है।

19

"त्वं जीवितं त्वमसि मे हृदयं द्वितीयम्" इस पंक्ति में अलङ्कार है-

  1. ((a))

    उपमा

  2. ((b))

    सन्देह

  3. ((c))

    उत्प्रेक्षा

  4. ((d))

    अतिशयोक्ति एवं रूपक

Show Answer
Answer: ((a))

उपमा

स्पष्टीकरण :-

  • वाक्य - 'त्वं जीवितं त्वमसि मे हृदयं द्वितीयम्'
  • अर्थ - तुम जीवित हो, तुम मेरा दूसरा हृदय हो।
  • नियम - जब किसी वस्तु या व्यक्ति की तुलना किसी दूसरी वस्तु या व्यक्ति के साथ की जाती है, वहाँ  उपमा अलंकार होता है। जैसे - चन्द्रमा के समान सुन्दर बालक। यहाँ बालक की तुलना चन्द्रमा से की गयी है।
  • प्रस्तुत वाक्य में तुम मेरा दूसरा हृदय हो, इस प्रकार से उपमा दी गई है। अतः यहाँ उपमा अलंकार सही उत्तर है।
20

इदम् (स्त्रीलिङ्ग) शब्द के सप्तमी विभक्ति, एकवचन में रूप बनता है-

  1. ((a))

    अस्याः

  2. ((b))

    अस्याम्

  3. ((c))

    अस्यै

  4. ((d))

    अनयोः

Show Answer
Answer: ((b))

अस्याम्

स्पष्टीकरण -

  • इदम् (यह) सर्वनाम शब्द रूप है, जिसका सप्तमी विभक्ति - एकवचन में अस्याम् रूप बनता है।
  • अतः अस्याम् सही उत्तर होगा।

अन्य विकल्प -

  • अस्याः - पञ्चमी/षष्ठी विभक्ति-एकवचन में ये रूप बनता है।
  • अस्यै - चतुर्थी विभक्ति-एकवचन में ये रूप बनता है।
  • अनयोः - षष्ठी/सप्तमी विभक्ति-एकवचन में ये रूप बनता है।

इदम् सर्वनाम शब्दरूप (स्त्रीलिंग) का प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमाइयम्इमेइमाः
द्वितीयाइमाम्इमेइमाः
तृतीयाअनयाआभ्याम्आभिः
चतुर्थीअस्यैआभ्याम्आभ्यः
पञ्चमीअस्याःआभ्याम्आभ्यः
षष्ठीअस्याःअनयोःआसाम्
सप्तमीअस्याम्अनयोःआसु
21

सर्व शब्दस्य पुल्लिङ्गे सप्तमी विभक्तौ एकवचने रूपं भवति -

  1. ((a))

    सर्वेस्मिन्

  2. ((b))

    सर्वे

  3. ((c))

    सर्वस्याम्

  4. ((d))

    सर्वस्मिन्

Show Answer
Answer: ((d))

सर्वस्मिन्

प्रश्नानुवाद - सर्व शब्द का पुल्लिंग में सप्तमी विभक्ति-एकवचन में रूप होता है।

स्पष्टीकरण -

  • सर्व (सब) सर्वनाम शब्दरूप है, जिसका सप्तमी विभक्ति - एकवचन (पुल्लिंग) में सर्वस्मिन् रूप बनता है।

 

अतः यहाँ सर्वस्मिन् सही उत्तर होगा।

अन्य विकल्प -

  • सर्वेस्मिन् - यह अशुद्ध शब्द है।
  • सर्वे - प्रथमा विभक्ति-बहुवचन (पुल्लिंग) में ये रूप बनता है।
  • सर्वस्याम् - सप्तमी विभक्ति-एकवचन (स्त्रीलिंग) में ये रूप बनता है।

Additional Information

सर्व सर्वनाम शब्दरूप (पुल्लिंग) का प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमासर्वःसर्वौसर्वे
द्वितीयासर्वम्सर्वौसर्वान्
तृतीयासर्वेणसर्वाभ्याम्सर्वैः
चतुर्थीसर्वस्मैसर्वाभ्याम्सर्वेभ्यः
पञ्चमीसर्वस्मात्सर्वाभ्याम्सर्वेभ्यः
षष्ठीसर्वस्यसर्वयोःसर्वेषाम्
सप्तमीसर्वस्मिन्सर्वयोःसर्वेषु
22

शिवराजविजय का प्रमुख रस है

  1. ((a))

    शृङ्गार

  2. ((b))

    वीर

  3. ((c))

    रौद्र

  4. ((d))

    करुण

Show Answer
Answer: ((b))

वीर

पं. अम्बिकादत्त व्यास 'अभिनव बाण' के रूप में तथा उनका काव्य 'शिवराजविजय' संस्कृत के प्रथम उपन्यास के रूप में जाना जाता है।

शिवराजविजय एक ऐतिहासिक उपन्यास है तथा इसमें वर्णित कथा ऐतिहासिक कथा है। शिवराजविजय उपन्यास में शिवाजी, गौरसिंह, श्यामसिंह आदि के चरित्र के द्वारा छात्र राष्ट्रभक्ति, स्वाभिमान, आत्मसम्मान, आत्मविश्वास, स्वधार्मनुराग आदि मूल्य दिखाए गए है। इस काव्य का प्रधान रस वीर है। तथा अन्य सभी रस इसमें उपकारी रूप में ज्ञात होते है।

अतः उचित पर्याय वीर रस होगा यह स्पष्ट होता है।

23

किरातार्जुनीय के द्विषाम् पद पर सही व्याकरणात्मक टिप्पणी है

  1. ((a))

    द्विष् + क्विप्, षष्ठी बहुवचन

  2. ((b))

    द्विष् + घञ्, षष्ठी बहुवचन

  3. ((c))

    द्विष् + टाप्, षष्ठी बहुवचन

  4. ((d))

    द्विष् + टच षष्ठी बहुवचन

Show Answer
Answer: ((a))

द्विष् + क्विप्, षष्ठी बहुवचन

स्पष्टीकरण

  • किरातार्जुनीयम् कवि भारवि का एकमात्र रचित ग्रंथ है।
  • जिसमें 18 सर्ग है।
  • प्रकृत द्विषाम् पद किरातार्जुनीयम् के प्रथम सर्ग से है।

Important Points

जिसका श्लोक इस प्रकार है - 

द्विषां विघाताय विधातुमिच्छतो रहस्यनुज्ञामधिगम्य भूभृतः।

स सौष्ठवौदार्यविशेषशालिनीं विनिश्चितार्थमिति वाचमाददे।।

अर्थ - शत्रु के विनाश के लिए प्रयत्न करने की इच्छा वाला राजा युधिष्ठिर की अनुमति प्राप्त करके वह वनेचर शब्दसौन्दर्य तथा अर्थगम्भीरता से सुशोभित वाणी को इस प्रकार कहा।

  • प्रकृत श्लोक में द्विषाम् पद का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ शत्रुओं का है।
  • पद - द्विषाम्
  • पद - उत्पत्ति -  द्विष् + क्विप् + षष्ठी विभक्ति बहुवचन

सूत्र - सत्सूद्विष्द्रूहदुह्युज्विद्च्छिद्जिनीराजामुपसर्गे क्विप्

  • अर्थ -  सद्, सू , द्विष्, द्रुह्, दुह्, युज्, विद्, जि, नी, और राज् धातुओं से पहले उपसर्ग हो या न हो इन धातुओं के बाद क्विप् प्रत्यय होगा।

 

अतः यहाँ उपर्युक्त पद में द्विष् धातु होने का कारण उसमें क्विप् प्रत्यय होकर षष्ठी विभक्ति बहुवचन द्विषाम् पद हुआ है।

24

"पतिरोषधीनाम्" इस पद का अभिप्राय है-

  1. ((a))

    चन्द्र

  2. ((b))

    सूर्य

  3. ((c))

    दुष्यन्त

  4. ((d))

    कण्व

Show Answer
Answer: ((a))

चन्द्र

स्पष्टीकरण

  • प्रकृत पद अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक के चतुर्थांक के श्लोक संख्या 2 से है।

Important Points

जो इस प्रकार है - ​

यात्येकतोस्तिशिखरं पतिरोषधीनाम् आविष्कृतो अरुण पुरःसर एकतो अर्कः। 

तेजोद्वयस्य युगपद् व्यसनोदयाभ्याम् लोको नियम्यदिव आत्मदशांतरेषु।।

  • अर्थ -  एक ओर औषधियों का स्वामी चन्द्रमा अस्त हो रहा और दूसरी ओर अरुण लालिमा को आगे किये हुए सूर्य उदित हो रहा है। यह संसार दो तेजों के एक साथ उदय और अस्त क्रिया के द्वारा मानों अपने दशा-विशेषों में नियन्त्रित हो रहा है।

 

अतः  उपर्युक्त श्लोक में पतिरोषधीनाम् पद का अभिप्राय चन्द्रमा से है।

25

केवल समास का उदाहरण है-

  1. ((a))

    भूतपूर्व

  2. ((b))

    पूर्वभाव

  3. ((c))

    यथाशक्ति

  4. ((d))

    पीताम्बर

Show Answer
Answer: ((a))

भूतपूर्व

स्पष्टीकरण - दो या दो से अधिक शब्दों के मेल से जो नया शब्द बनता है, उसे समस्त पद कहते हैं।

इस मेल की प्रक्रिया को समास कहते हैं। अर्थात् परस्पर संबंध रखने वाले दो या दो से अधिक शब्दों का मेल समास कहलाता है।

विशेष संज्ञा से मुक्त समास केवल समास होता है। अर्थात् अव्ययीभाव, तत्पुरुष, द्वन्द्व और बहुव्रीहि के अलावा समास केवल समास है।

सूत्र स्पष्टीकरण

सह सुपा सूत्र से केवल समास समास होता है। कहीं कहीं सुबन्त का सुबन्त के साथ समास हो जाता है।  

समास विग्रह - पूर्व भूतः- पूर्व अम् भूत सु- भूतपूर्वः

सूत्र - भूतपूर्वे चरट् सूत्र से भूत का प्रयोग पहले होता है।

अतः स्पष्ट है कि 'भूतपूर्व:' केवल समास का उदाहरण है।

26

"तेजोद्वयस्य युगपद् व्यसनोदयाभ्यां लोको नियम्यत इवात्मदशान्तरेषु" यह पंक्ति है-

  1. ((a))

    मेघदूत की

  2. ((b))

    रघुवंश की

  3. ((c))

    उत्तररामचरित की

  4. ((d))

    अभिज्ञान शाकुन्तल की

Show Answer
Answer: ((d))

अभिज्ञान शाकुन्तल की

स्पष्टीकरण - "तेजोद्वयस्य युगपद् व्यसनोदयाभ्यां लोको नियम्यत इवात्मदशान्तरेषु" यह पंक्ति अभिज्ञान शाकुन्तलम् नाटक में उद्धृत है।

अभिज्ञान शाकुन्तलम् नाटक में 7 अंक है। इस नाटक के रचयिता महाकवि कालिदास हैं। प्रस्तुत पंक्ति एक श्लोक में उल्लिखित हैं-

श्लोक - 

यात्येकतोस्तिशिखरं पतिरोषधीनाम् आविष्कृतो अरुण पुरःसर एकतो अर्कः। 

तेजोद्वयस्य युगपद् व्यसनोदयाभ्याम् लोको नियम्यदिव आत्मदशांतरेषु।।

अर्थ - एक तरफ औषधियों के एकमात्र स्वामी चन्द्रमा अस्ताचल हो रहे हैं तथा दुसरी तरफ उदयाचल पर अरुण को आगे किये हुए सूर्य उदय हो रहे हैं। इस प्रकार ये दोनों अपनी इस अस्त और उदय की स्थिति से समस्त विश्व को संसार का उत्थान-पतन चक्र बता रहे हैं। 

अतः यह स्पष्ट है कि उपर्युक्त पंक्ति अभिज्ञान शाकुन्तलम् नाटक से उद्धृत है।

27

"शान्तः" का सन्धि विच्छेद होगा-

  1. ((a))

    शान् + तः

  2. ((b))

    शाम् + तः

  3. ((c))

    शा + अन्तः

  4. ((d))

    शाम् + अन्तः

Show Answer
Answer: ((b))

शाम् + तः

स्पष्टीकरण - शान्तः का सन्धि विच्छेद होगा - शाम् + तः होगा।

सूत्रअनुस्वारस्य ययि परसवर्णः

नियम - अनुस्वार के बाद यय् (श, ष, स, ह) को छोड़कर सभी व्यंजन आये तो, अनुस्वार को बाद वाले वर्ण का पञ्चम वर्ण आदेश हो जाता है।

उदाहरण -

  • अं (अम्) + कः = अङ्कः (यहाँ अनुस्वार के बाद क आया है, जहाँ अनुस्वार को बाद वाले वर्ण क का पञ्चम वर्ण ङ आदेश हो गया।)
  • इसी नियमानुसार शान्तः (शां + तः) का सन्धि विच्छेद होगा। जहाँ अनुस्वार के बाद त आया है, जहाँ अनुस्वार को बाद वाले वर्ण त का पञ्चम वर्ण न् आदेश हो गया। जिससे शान्तः पद बना।

 

अतः स्पष्ट है कि यहाँ शान्तः का सन्धिविच्छेद - शाम् + तः होगा। जिसे शां + तः लिखा जाता है।

28

"राम विद्यालय जाना चाहता है" अस्य संस्कृतानुवादः विधेयः -

  1. ((a))

    रामः विद्यालयं गच्छन्निच्छति

  2. ((b))

    रामो विद्यालयं जिगमिषति

  3. ((c))

    रामेण विद्यालयः गच्छन्निच्छते

  4. ((d))

    रामो विद्यालयं गन्तुं याति

Show Answer
Answer: ((b))

रामो विद्यालयं जिगमिषति

प्रश्नानुवाद - "राम विद्यालय जाना चाहता है" इसका संस्कृतानुवाद होना चाहिए -

स्पष्टीकरण - 

  • राम विद्यालय जाना चाहता है। इस वाक्य की उचित संस्कृतानुवाद होगा - रामो विद्यालयं जिगमिषति

सूत्र - धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा।

  • नियम - जो इच्छार्थक इष् धातु का कर्म हो और इष् धातु के साथ समानकर्तृक भी हो, उस धातु से इच्छा अर्थ में विकल्प से सन् प्रत्यय होता है।
  • इस वाक्य में जाने की इच्छा प्रकट हो रही है, जाना चाहता है।
  • सन् प्रत्यय के योग में धातु को द्वित्व हो जाता है और धातु पद में अनिट् आदेश होता है।
  • जैसे - पठितुम् इच्छति - पिपठिषति।
  • इसी तरह गन्तुम् इच्छति - जिगमिषति

 

अतः इस वाक्य का उचित अनुवाद होगा - रामो विद्यालयं जिगमिषति।

29

"शक्यो वारयितुं जलेन हुतभुक्” यहाँ हुतभुक शब्द का अर्थ है-

  1. ((a))

    हवनकर्ता

  2. ((b))

    अग्नि

  3. ((c))

    हविष्यभोक्ता देव

  4. ((d))

    हुतात्मा

Show Answer
Answer: ((b))

अग्नि

स्पष्टीकरण

  • उपर्युक्त श्लोकांश भर्तृहरि द्वारा रचित प्रसिद्ध नीतिग्रंथ नीतिशतक से उद्धृत है।
  • जिसके अन्तर्गत नीति उपदेश के द्वारा मानव जीवन को मार्गदर्शित किया गया है।

Important Points

प्रकृत श्लोकांश भी इस ग्रंथ के श्लोक संख्या 11 से है। जो इस प्रकार है - 

शक्यो वारयितुं जलेन हुतभुक् छत्रेण सूर्यातपोः

नागेन्द्रो निशिताङ्कुशेन समदो दण्डेन गोगर्दभौ।

व्याधि भैषजसंग्रहैश्च विविधैर्मन्त्रप्रयोगैर्विषं

सर्वस्यौषधमस्ति शास्त्रविहितं मूर्खस्य नास्त्यौषधम्।।

  • अर्थअग्नि को जल से, सूर्य के ताप को छत्र से, हाथी को तीक्ष्ण अंकुश से, मदोन्मत्त बैल और गधे को डण्डे से, रोगों को औषधियों के सेवन से तथा विष का उपशमन को मंत्रों के प्रयोग से रोका जा सकता है, जो सभी शास्त्रों में है उल्लिखित है, परन्तु मूर्ख की कोई औषधि नहीं है।
  • उपर्युक्त श्लोकांश का अर्थ है कि अग्नि को जल से रोका जा सकता है। अर्थात् श्लोकांश में हुतभुक् शब्द का अर्थ अग्नि है।

 

अतः उपर्युक्त श्लोकांश में हुतभुक् का अर्थ अग्नि है।

30

"रमया कोकिल दृश्यते” इस वाक्य का कर्तृवाच्य में वाक्य बनेगा -

  1. ((a))

    रमा कोकिलं पश्येत्

  2. ((b))

    रमा कोकिलं दृश्यते

  3. ((c))

    रमा कोकिलं पश्यति

  4. ((d))

    रमा कोकिलं द्रक्ष्यति

Show Answer
Answer: ((c))

रमा कोकिलं पश्यति

स्पष्टीकरण -

  • रमया कोकिलः दृश्यते। यह वाक्य कर्मवाच्य है।
  • इस वाक्य को कर्तृवाच्य में परिवर्तित करने पर - रमा कोकिलं पश्यति रूप बनेगा। यह लट् लकार, सामान्य वर्तमान काल का वाक्य है।
  • अतः रमा कोकिलं पश्यति सही उत्तर है।

अन्य विकल्प -

  • रमा कोकिलं पश्येत्। - रमा कोकिल को देखो। यह लोट् लकार (आज्ञार्थक) है।
  • रमा कोकिलं दृश्यते। - यह अशुद्ध वाक्य है।
  • रमा कोकिलं द्रक्ष्यति। - रमा कोकिल को देखेगी। यह लृट् लकार (भविष्य काल) है।
31

"बालकः स्नानं करोति" इत्यस्य वाच्यपरिवर्तनम् अस्ति-

  1. ((a))

    बालकः स्नानं क्रियते

  2. ((b))

    बालकेन स्नानं क्रियते

  3. ((c))

    बालकेन स्नानं कृतम्

  4. ((d))

    बालकः स्नाति

Show Answer
Answer: ((b))

बालकेन स्नानं क्रियते

प्रश्नानुवाद - "बालकः स्नानं करोति" इसका वाच्यपरिवर्तन है-

स्पष्टीकरण - बालकः स्नानं करोति - यह कर्तृवाच्य वाक्य है। इसे कर्मवाच्य में परिवर्तित करने पर बालकेन स्नानं क्रियते वाक्य बनेगा।

कर्मवाच्य में परिवर्तित करने पर कर्ता में (बालकेन) तृतीया होती है। कर्म में (स्नानं) प्रथमा होती है और क्रिया पद कर्म के पुरुष एवं वचन के अनुसार (क्रियते) सदैव आत्मनेपद में होता है।

अतः यहाँ क���्मवाच्य में परिवर्तित करने पर बालकेन स्नानं क्रियते वाक्य बनेगा।

Additional Information

संस्कृत व्याकरण में तीन वाच्य होते हैं। 1. कर्तृवाच्य, 2. कर्मवाच्य, 3. भाववाच्य

वाच्यनियमउदाहरण
कर्तरिवाच्यकर्ता + कर्म में द्वितीया विभक्ति + कर्ता के अनुसार क्रिया का पुरुष एवं वचनरामः   पुस्तकं   पठति। कर्ता +  कर्म +   क्रिया
कर्मवाच्यकर्ता में तृ.वि. + कर्म में प्रथमा विभक्ति (एकव., द्विव., बहुव.) + क्रिया कर्म के अनुसारछात्रैः   पुस्तकानि   पठ्यन्ते। कर्ता में तृ.वि. +  कर्म में प्रथमा विभक्ति (एकव., द्विव., बहुव.) + क्रिया कर्म के अनुसार (आत्मने पद में)
भाववाच्यकर्ता में तृ.वि. + क्रिया में प्रथमपुरुष एकवचन (यह अकर्मक क्रियाओं में होता है।)रामेण हस्यते। कर्ता में तृ.वि. + क्रिया में प्रथम पुरुष-एकवचन (आत्मने पद, एकवचन)
32

"उपपौर्णमासम्" पद में समास है-

  1. ((a))

    अव्ययीभावसमास

  2. ((b))

    तत्पुरुष

  3. ((c))

    उपमानपूर्वपदकर्मधारय

  4. ((d))

    बहुव्रीहि

Show Answer
Answer: ((a))

अव्ययीभावसमास

स्पष्टीकरण - "उपपौर्णमासम्" पद में अव्ययीभाव समास होता है। जहाँ समीप के अर्थ में अव्ययी भाव समास हुआ है। पौर्णमास्याः समीपम् - उपपौर्णमासम्।

शब्द - उपपौर्णमासम्

समास विग्रह - पौर्णमास्याः समीपम्

सूत्र - नदीपौर्णमास्याग्रहायणीभ्यः।

नियम - नदी, पौर्णमासी और आग्रहायणी शब्दों के अव्ययीभाव समास के अन्त में आने पर विकल्प से टच् (अ) प्रत्यय लगता है। जिससे इनके दो-दो रूप बनते हैं।

उदाहरण -

  • पौर्णमास्याः समीपम् - उपपौर्णमासि, उपपौर्णमासम्।
  • नद्याः समीपम् - उपनदि, उपनदम्।

 

अतः स्पष्ट है कि उपपौर्णमासम् पद में अव्ययीभाव समास होता है। 

Additional Information

समसनं समासः अर्थात् संक्षिप्त होने को समास कहते हैं। समास एक संज्ञा है। दो या दो से अधिक शब्दों का जब समास होकर एक पद बनता है, तो उसे समास कहते हैं। समास में दो पद होते हैं - 1. पूर्व पद, 2. उत्तर पद

समास के मुख्यतः 4 भेद है। 

  1. अव्ययीभाव
  2. तत्पुरुष
  3. बहुव्रीहि
  4. द्वन्द्व

(1) अव्ययीभाव समास - ‘पूर्वपदार्थप्रधानोSव्ययीभावः’ अर्थात् जिस पद में पूर्व पद की प्रधानता हो या पद का आरम्भ किसी अव्यय पद से हो रहा हो, वहाँ अव्ययीभाव समास होता है। उदाहरण - 

  • रूपस्य योग्यम् - अनुरूपम्
  • रामस्य पश्चात् - अनुरामम्

(2) तत्पुरुष समास - ‘उत्तरपदप्रधानो तत्पुरुषः’ अर्थात जिस पद में उत्तर पद प्रधान होता है, वहाँ तत्पुरुष समास होता है।  उदाहरण - 

  • सुखम् आपन्नः - सुखापन्नः
  • कूपं पतितः - कूपपतितः

तत्पुरुष समास के मुख्यतः दो भेद होते हैं - 

  1. व्यधिकरण तत्पुरुष समास
  2. समानाधिकरण तत्पुरुष
  3. व्यधिकरण तत्पुरुष समास के सात (7) भेद होते हैं, जो निम्नलिखित हैं - 

द्वितीया तत्पुरुष - जहाँ श्रित, अतीत, पतित, गत, अत्यस्त, प्राप्त और आपन्न इन शब्दों का संयोग होता है, वहाँ द्वितीया तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण -

  • शोकं पतितः - शोकपतितः

तृतीया तत्पुरुष - जहाँ तृतीयान्त शब्द के साथ पूर्व, सदृश, सम शब्द आता है, तो वहाँ तृतीया तत्पुरुष समास होता है।  उदाहरण - 

  • पित्रा समः - पितृसमः

चतुर्थी तत्पुरुष - जहाँ पूर्व पद चतुर्थी विभक्ति में होता है अथवा बलि, हित, सुख, रक्षित इन शब्दों को संयोग होता है,  वहाँ चतुर्थी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण -

  • ब्राह्मणाय हितम् - ब्राह्मणहितम्

पञ्चमी तत्पुरुष - जहाँ भय, भीत, भीति इन शब्दों का संयोग होता है, वहाँ पञ्चमी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • व्याघ्राद् भीतिः - व्याघ्रभीतिः

षष्ठी तत्पुरुष - जब पूर्व पद षष्ठी विभक्ति में होता है, तो वहाँ षष्ठी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • देवानां भाषा - देवभाषा

सप्तमी तत्पुरुष - जब पूर्व पद सप्तमी विभक्ति में रहता है अथवा शौण्ड (चतुर), धूर्त, कितव (शठ), प्रवीण, कुशल, पण्डित इन शब्दों का संयोग होता है, तो वहाँ सप्तमी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • सभायां पण्डितः - सभापण्डितः

नञ् तत्पुरुष - जब पूर्व पद न शब्द हो, तथा उत्तर पद कोई संज्ञा या विशेषण हो तो, वहाँ नञ् तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • न कृतम् - अकृतम्
  1. समानाधिकरण तत्पुरुष समास के दो भेद होते हैं - 
  • कर्मधारय तत्पुरुष समास
  • द्विगु तत्पुरुष समास

(1) कर्मधारय तत्पुरुष समास - ऐसा तत्पुरुष समास जहाँ विशेषण-विशेष्य और उपमान-उपमेय का सम्बन्ध होता है, वह कर्मधारय समास होता है। उदाहरण- 

  • पीतम् उत्पलम् - पीतोत्पलम्
  • घन इव श्यामः - घनश्यामः

(2) द्विगु तत्पुरुष समास - जहाँ प्रथम पद संख्यावाची होता है, वहाँ द्विगु समास होता है। यह तत्पुरुष समास का ही भेद है। उदाहरण - 

  • त्रयानां  भुवनानां समाहारः - त्रिभुवनम्
  • चतुर्णां भुजानां समाहारः - चतुर्भुजम्

(3) बहुव्रीहि समास - ‘अन्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिः’ जहाँ दो या दो से अधिक समस्त शब्द किसी अन्य पद को इंगित करते हैं, वहाँ बहुव्रीहि समास होता है। उदाहरण - 

  • महान् आत्मा यस्य सः (बुद्धः) - महात्मा
  • दश आननानि यस्य सः (रावणः) - दशाननः

बहुव्रीहि समास के दो भेद हैं-

  1. समानाधिकरण बहुव्रीहि- (जहाँ दोनों शब्द प्रथमान्त होते हैं। जैसे - पीतम् अम्बरम् यस्य सः)
  2. व्यधिकरण बहुव्रीहि - (जहाँ दोनों शब्द प्रथमान्त नहीं होते हैं। एक प्रथमान्त होता है और दूसरा शब्द षष्ठी या सप्तमी विभक्ति में होता है। जैसे - चन्द्र शेखरे यस्य सः)

(4) द्वन्द्व समास - ‘उभयपदार्थप्रधानो द्वन्द्वः’ जहाँ दोनों पद (पूर्व पद एवं उत्तर पद) प्रधान होते हैं, वहाँ द्वन्द्व समास होता है। उदाहरण -

  • रामश्च लक्ष्मणश्च भरतश्च - रामलक्ष्मणभरताः
  • पाणी च पादौ च - पाणिपादम्
33

"अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः" इस पंक्ति के रचयिता हैं-

  1. ((a))

    भर्तृहरि

  2. ((b))

    विष्णुशर्मा

  3. ((c))

    कल्हण

  4. ((d))

    कालिदास

Show Answer
Answer: ((a))

भर्तृहरि

स्पष्टीकरण - प्रस्तुत पंक्ति के रचयिता भर्तृहरि हैं। जिनके द्वारा नीति शतक ग्रन्थ में यह श्लोक उद्धृत हैं-

श्लोक-

अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः

ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रहमाऽपि नरं न रञ्जयति।।

अर्थ - अज्ञानी व्यक्ति सरलता से प्रसन्न हो सकता है। विद्वान् व्यक्ति और भी सरलता से प्रसन्न हो सकता है। किन्तु जिनके पास अल्प ज्ञान (कम ज्ञान( होता है। उन्हें ब्रह्मा भी प्रसन्न नहीं कर सकते हैं।

अतः स्पष्ट है कि इस पंक्ति के रचनाकार भर्तृहरि है।

34

वह पद्य जो अभिज्ञान शाकुन्तल के श्लोक चतुष्टय के अन्तर्गत है-

  1. ((a))

    विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा ....

  2. ((b))

    सरसिजमनुविद्धं शैवलेनापि ....

  3. ((c))

    अधरं किमलय रागः कोमल ....

  4. ((d))

    यास्त्यद्य शकुन्तलेतिहृदयं ....

Show Answer
Answer: ((d))

यास्त्यद्य शकुन्तलेतिहृदयं ....

स्पष्टीकरण

  • कवि कालिदास के द्वारा सात रचनाएं रचित हैं।
  • जिसमें अभिज्ञानशाकुन्तलम् अत्यंत महत्वपूर्ण रचना है। यह एक सात अंको वाला नाटक है।
  • उसमें भी चतुर्थांक तथा चतुर्थांक में भी श्लोक चतुष्ट्य (चार श्लोक)

उनमें से एक श्लोक इस प्रकार है -

यास्त्यद्येति शंकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया

कण्ठः स्तम्भितबाष्पवृत्तिकलुषश्चिन्ताजडं दर्शनम्।

वैकल्व्यं मम तावदीदृशमिदं स्नेहादरण्यौकसः 

पीड्यन्ते गृहीणः कथं नु तनयाविश्लेषेदुःखैर्नवैः।।

  • अर्थ - प्रकृत श्लोक में ऋषि कण्व पतिगृह को जाती शकुन्तला को देखते हुए कहते हैं कि आज शकुन्तला विदा हो जायेगी, इसलिए मेरा हृदय दुःख से भर रहा है। आंसुओं को रोकने के कारण मेरा गला रुंध रहा है। मेरी दृष्टि चिन्ता के कारण जड़ हो गयी है। वनवासी होने के कारण भी मेरा शकुन्तला के प्रति इतना प्रेम है, जिस कारण इस प्रकार का दुःख मुझे हो रहा है, तो गृहस्थ जन पहली बार अपनी पुत्री के वियोग होने के दुःख से कितना अधिक दुःखी होते होंगे।
  • उपर्युक्त श्लोक अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक के चतुर्थांक में से श्लोक चतुष्ट्य से है।

 

अतः यास्त्यद्येति शकुन्तलेति हृदयं...। श्लोक अभिज्ञानशाकुन्तलम् के श्लोक चतुष्ट्य के अन्तर्गत आता है।

Key Points

कवि कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक के श्लोक चतुष्ट्य इस प्रकार हैं-

प्रथम श्लोक-

यास्त्यद्येति शंकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया

कण्ठः स्तम्भितबाष्पवृत्तिकलुषश्चिन्ताजडं दर्शनम्।

वैकल्व्यं मम तावदीदृशमिदं स्नेहादरण्यौकसः 

पीड्यन्ते गृहीणः कथं नु तनयाविश्लेषेदुःखैर्नवैः।।

द्वितीय श्लोक-

पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या

नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्।

आद्ये वः कुसुमप्रसूतिसमये यस्या भवत्युत्सवः

सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वैर्नुज्ञायताम्।।

  • अर्थ - हे तपोवन के वृक्षों। जो तुम्हें पानी दिए स्वयं पानी नहीं पीती थी,तुम्हारे प्रति अगाध प्रेम होने के कारण जिसको अलङ्कार अधिक प्रिय होने पर भी वह तुम्हारे नये पत्तों को नहीं तोड़ती थी, तुम्हारे नवपुष्पोद्भव के समय जिसका उत्सव होता था, वह शकुन्तला अब पतिगृह को जा रही है । इसलिए तुम सभी अपनी स्वीकृति दो।

तृतीय श्लोक-

अस्मान् साधु विचिन्त्य संयधनानुच्चैः कुलं चात्मन-

स्त्वय्यस्याः कथमप्यबान्धवकृतां स्नेहप्रवृत्तिं च ताम्।

सामान्यप्रतिपत्तिपूर्वकमियं दारेषु दृश्या त्वया

भाग्यायत्तमतः परं न खलु तद् वाच्यं वधूबन्धूभिः।।

  • अर्थ - संयमरूपी धन से युक्त हम तपस्वियों की निश्छलता अपने ऊँचे कुल का तथा बिना अनुमति के इसके द्वारा तुमसे किये गये प्रेम का अच्छी तरह विचार करके तुम्हें इसके साथ अपनी अन्य पत्नियों के समान ही व्यवहार करना। इससे आगे जो होगा वह भाग्य के अधीन है, वह हम वधू के सम्बन्धीजनों को नहीं कहना चाहिए।

चतुर्थ श्लोक-

शुश्रूस्व गुरून् कुरु प्रियसखीवृत्तिं सपत्नीजने

भर्तुर्विप्रकृता पि रोषणतया मा स्म प्रतीपं गमः।

भूयिष्ठं भव दक्षिणा परिजने भाग्येष्वनुत्सेकिनी

यान्तयेवं गृहिणीपदं युवतयो वामाः कुलस्याधयः।।

  • अर्थ - प्रस्तुत श्लोक में ऋषि कण्व पतिगृह को जाने वाली शकुंतला को पतिगृह में किस प्रकार व्यवहार करें इस विषय में उसे उपदेश देते है कि तू गुरुजनों की सेवा करना, अपनी सपत्नियों के साथ सखियों जैसा व्यवहार करना, तिरस्कृत होने पर भी क्रोधवश अपने पति के प्रतिकूल व्यवहार मत करना, अपने आश्रितों के साथ उदार व्यवहार करना, समृद्धियुक्त होने पर अभिमान करना, इस प्रकार आचरण करने वाली स्त्रियां ही गृहलक्ष्मी के पद को प्राप्त करती है तथा इसके विपरीत आचरण करने वाली कुल के लिए अभिशाप होती हैं।
35

“हितान्न यः संशृणते स किं प्रभुः" इसमें "हितात्" पद में किस सूत्र से पञ्चमी विभक्ति है ?

  1. ((a))

    भीत्रार्थानां भयहेतुः

  2. ((b))

    अपादाने पञ्चमी

  3. ((c))

    आख्यातोपयोगे

  4. ((d))

    वारणार्थानामीप्सितः

Show Answer
Answer: ((a))

भीत्रार्थानां भयहेतुः

स्पष्टीकरण -

  • वाक्य - “हितान्न यः संशृणते स किं प्रभुः"
  • अर्थ -  जो हित चाहने वालों के वचन नहीं सुनता वह कैसा राजा।
  • शब्द - हितात्
  • अर्थ - हित से

सूत्र - भीत्रार्थानां भयहेतुः।

  • नियम - भय और रक्षा के अर्थ में पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग होता है।
  • प्रस्तुत वाक्य में भीत्रार्थानां भयहेतुः पद से पञ्चमी विभक्ति हुई है। हित चाहना (रक्षा के अर्थ में) प्रयुक्त होता है। अतः यहाँ भीत्रार्थानां भयहेतुः सही उत्तर है।

Additional Information

अन्य विकल्प -

  • अपादाने पञ्चमी - किसी वस्तु का एक वस्तु से अलग होने के अर्थ में प्रयोग होता है। जैसे - वृक्षात् पत्राणि पतन्ति।
  • आख्यातोपयोगे - जिससे विद्या नियमपूर्वक पढ़ी जाये, उस गुरु या अध्यापक पद में प्रयोग होता है। जैसे - उपाध्यायात् अधीते। (उपाध्याय से पढ़ता है।)
  • वारणार्थानामीप्सितः - किसी वस्तु से हटाने के अर्थ में प्रयोग होता है। जैसे - यवेभ्यो गां वारयति क्षेत्रे। (खेत में जौ से गाय को हटाता है।)
36

निम्नाङ्कित में से कालिदास की उक्ति जो नहीं है, वह है-

  1. ((a))

    हितं मनोहारि हि दुर्लभं वचः

  2. ((b))

    कामार्ता हि प्रकृति कृपणाश्चेतनाचेतनेषु

  3. ((c))

    अर्थो हि कन्या परकीय एव

  4. ((d))

    आपन्नार्तिप्रशमनफला सम्पदो ह्रुत्तमानाम्

Show Answer
Answer: ((a))

हितं मनोहारि हि दुर्लभं वचः

स्पष्टीकरण - दिये गये विकल्पों में हितं मनोहारि हि दुर्लभं वचः कालिदास की उक्ति नहीं है। यह पंक्ति भारवि की है, जो किरातार्जुनीयम् महाकाव्य में उल्लिखित है।।

Important Points

  • भारवेर्थगौरवम् से अलंकृत कवि भारवि की एकमात्र रचना किरातार्जुनीयम् है।
  • जो कि महाकाव्यों बृहत्त्रयी रचनाओं में से एक है।
  • किरातार्जुनीयम् में 18 सर्ग है।
  • उपर्युक्त विकल्पों में प्रथम विकल्प में उपस्थित उक्ति कालिदास की उक्ति नहीं है।
  • यह उक्ति भारवि की रचना किरातार्जुनीयम् के प्रथम सर्ग से उद्धृत है।

जो श्लोक संख्या 4 से है, जो इस प्रकार है - 

क्रियासु युक्तैर्नृपचारचक्षुषो न वञ्चनीयाः प्रभवो नुजीविभिः।

अतोर्हसि क्षन्तुमसाधु साधु वा हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः।।

  • अर्थ - हे राजन्। स्वामियों के द्वारा कार्यों में नियुक्त गुप्तचर जिनके नेत्रों के द्वारा देखे जाने वाले स्वामीजन ठगे नहीं जाने चाहिए। इसलिए जो भी अप्रिय हो या प्रिय वचन हो (जैसे भी वचन हो) उसके लिए क्षमा करें। क्योंकि हितकारी मनोहारी वचन दुर्लभ होते हैं।

 

अतः उपर्युक्त सूक्तियों में से हितं मनोहारी च दुर्लभं वचः सूक्ति कालिदास की उक्ति नहीं है, अपितु यह उक्ति कवि भारवि की है।

Additional Information 

अन्य विकल्प-

ये सभी विकल्प कालिदास की उक्तियाँ हैं।

  • कामार्ता हि प्रकृति कृपणाश्चेतनाचेतनेषु - मेघदूत
  • अर्थो हि कन्या परकीय एव -  अभिज्ञानशाकुन्तलम् (चतुर्थांक)
  • आपन्नार्तिप्रशमनफला सम्पदो ह्रुत्तमानाम् - मेघदूत
37

घण्टापथ नाम की टीका किस ग्रन्थ की है ?

  1. ((a))

    मेघदूत की

  2. ((b))

    किरातार्जुनीय की

  3. ((c))

    उत्तररामचरित की

  4. ((d))

    शिवराजविजय की

Show Answer
Answer: ((b))

किरातार्जुनीय की

घण्टापथ नाम की टीका यह मल्लिनाथ की है, जो भारवीकृत 'किरातर्जुनीयम्' पर रचित है।

Additional Information

किरातार्जुनीयम् महाकवि भारवि द्वारा सातवीं शती ई. में रचित महाकाव्य है जिसे संस्कृत साहित्य में महाकाव्यों की 'वृहत्त्रयी' में स्थान प्राप्त है। महाभारत में वर्णित किरातवेशी शिव के साथ अर्जुन के युद्ध की लघु कथा को आधार बनाकर कवि ने राजनीति, धर्मनीति, कूटनीति, समाजनीति, युद्धनीति, जनजीवन आदि का मनोरम वर्णन किया है। यह काव्य विभिन्न रसों से ओतप्रोत है किन्तु यह मुख्यतः वीर रस प्रधान रचना है।

38

'लभ्' धातु आत्मनेपद के विधिलिङ् में मध्यम पुरुष, बहुवचन का रूप है-

  1. ((a))

    लभेध्वम्

  2. ((b))

    लभध्वम्

  3. ((c))

    लभेत

  4. ((d))

    लभेः

Show Answer
Answer: ((a))

लभेध्वम्

स्पष्टीकरण - 'लभ्' धातु आत्मनेपद का विधिलिङ् लकार के मध्यम पुरुष, बहुवचन में लभेध्वम् रूप बनता है।

अतः यहाँ लभेध्वम् उचित विकल्प है।

Additional Information

लभ् (पाना) धातु का आत्मनेपद विधिलिङ् लकार में प्रयोग निम्नलिखित है-

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषलभेतलभेयाताम्लभेरन्
मध्यम पुरुषलभेथाःलभेयाथाम्लभेध्वम्
उत्तम पुरुषलभेयलभेवहिलभेमहि
39

"आख्यातोपयोगे" इस सूत्र से सिद्ध होता है-

  1. ((a))

    मातुर्निलीयते कृष्णः

  2. ((b))

    नटस्य गाथां श्रृणोति

  3. ((c))

    हिमवतो गङ्गा प्रभवति

  4. ((d))

    उपाध्यायादधीते

Show Answer
Answer: ((d))

उपाध्यायादधीते

'आख्यातोपयोगे' इस सूत्र में - आख्याता का अर्थ वक्ता‚ उपदेष्टा‚ शिक्षक या अध्यापक होता है और 'उपयोग' का अर्थ, ब्रह्मचर्य आदि नियमों का पालन करते हुए विद्‍याध्ययन करना होता है।

इस सूत्र के अनुसार नियम पूर्वक जिससे अध्ययन होता है उसके अपादान की अपेक्षा होती है।

उदाहरण -

  • छात्रः शिक्षकात् पठति।
  • उपाध्यायाद् अधीते।

 

अतः स्पष्ट है कि 'उपाध्यायादधीते' यह 'आख्यातोपयोगे' सूत्र का उदाहरण है।

40

मातृ शब्द का पंचमी विभक्ति का एकवचन रूप है-

  1. ((a))

    मातृस्य

  2. ((b))

    मातातः

  3. ((c))

    मातात्

  4. ((d))

    मातुः

Show Answer
Answer: ((d))

मातुः

'मातृ' यह प्रातिपदिक 'ऋकारान्त स्त्रीलिंग शब्द है। इसके विभिन्न विभक्ति-वचन में रूप निम्नलिखित हैं-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमामातामातरौमातरः
द्वितीयामातरम्मातरौमातृ
तृतीयामात्रामातृभ्याम्मातृभिः
चतुर्थीमात्रेमातृभ्याम्मातृभ्यः
पन्चमीमातुःमातृभ्याम्मातृभ्यः
षष्ठीमातुःमात्रोःमातृणाम्
सप्तमीमातरिमात्रोःमातृषु
सम्बोधनहे माता!हे मातरौ!हे मातरः!

 

उपर्युक्त सारणी के अनुसार यह स्पष्ट होता है कि 'मातृ' शब्द की पञ्चमी विभक्ति एकवचन में 'मातुः' रूप होता है।

Additional Information

मातृ की तरह दुहितृ, स्वसृ, ननादृ यह कुछ अन्य 'ऋकारान्त' स्त्रीलिंग पद है।

41

"अस्मद्" शब्द का चतुर्थी एकवचन में रूप होगा-

  1. ((a))

    आवाभ्याम्

  2. ((b))

    मह्यम्

  3. ((c))

    मत्

  4. ((d))

    अस्मभ्यम्

Show Answer
Answer: ((b))

मह्यम्

‘अस्मद्’ उत्तमपुरुष सर्वनाम शब्द होता है।

‘अस्मद्’ सर्वनाम शब्दरूप का विविध विभक्ति-वचन में प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमाअहम्आवाम्वयम्
द्वितीयामाम्/माआवाम्/नौअस्मान्/नः
तृतीयामयाआवाभ्याम्अस्माभिः
चर्तुथीमह्यम्/मेआवाभ्याम्/नौअस्मभ्यम्/नः
पञ्चमीमत्आवाभ्याम्अस्मत्
षष्ठीमम/मेआवयोः/नौअस्माकम्/नः
सप्तमीमयिआवयोःअस्मासु

 

अतः 'अस्मद्' शब्द का चतुर्थी एकवचन में रूप **'**मह्यम्' होगा।

42

"श्रियायुत्सकः" में दो पद हैं-

  1. ((a))

    श्री तथा आयुत्सकः

  2. ((b))

    श्रिय तथा आयुत्सकः

  3. ((c))

    श्रिया तथा युत्सकः

  4. ((d))

    श्रियै तथा उत्सुकः

Show Answer
Answer: ((d))

श्रियै तथा उत्सुकः

स्पष्टीकरण

  • पद - श्रियायुत्सुकः
  • पदविच्छेद - श्रियै + उत्सुकः
  • सूत्र - लोपः शाकल्यस्य
  • नियम - पदान्त य् या व् से पहले यदि अ/आ हो और बाद में अश् प्रत्याहार का कोई वर्ण हो तो य् और व् को विकल्प से लोप होगा तथा लोप होने के पश्चात् उनमें कोई सन्धि नहीं होगी।
  • उदाहरण
  • हर + एहि  -   हर इह/ हरयेहि
  • गुरौ + उत्कः - गुरा उत्कः / गुरावुत्कः
  • रात्रौ + आगतः  -  रात्रा आगतः / रात्रावागतः

 

अतः उपर्युक्त श्रियायुत्सकः पद में दो पद श्रियै + उत्सुकः है।

43

निम्नलिखित में से नीतिशतक का सूक्ति वाक्य है -

  1. ((a))

    कर्मायत्तं फलं पुंसाम्

  2. ((b))

    बुद्धिः कर्मानुसारिणी

  3. ((c))

    नमः कर्मणे

  4. ((d))

    उपर्युक्त तीनों

Show Answer
Answer: ((d))

उपर्युक्त तीनों

स्पष्टीकरण

  • नीतिशतक कवि भर्तृहरि द्वारा रचित अद्यतन प्रसिद्ध नीति ग्रंथ है।
  • इनके द्वारा तीन शतक रचित किये गये हैं -
  • नीतिशतक
  • शृंगारशतक
  • वैराग्यशतक
  • उपर्युक्त विकल्पों में तीनों सूक्तियां नीतिशतक से उद्धृत है।
  • कर्मायतं फलं पुंसाम् - मनुष्य को फल कर्म के अनुसार प्राप्त होता है।
  • बुद्धिः कर्मानुसारिणी - बुद्धि भी कर्म के अनुसार चलती है।
  • नमः कर्मणे - कर्म को नमस्कार है।

Important Points

  • उपर्युक्त तीनों सूक्तियां नीतिशतक से उद्धृत है।
  • जिसमें प्रारम्भिक दो सूक्तियां श्लोक 89 से है, जो इस प्रकार है -

कर्मायत्तं फलं पुंसाम् बुद्धिः कर्मानुसारिणी।

तथापि सुधिया भाव्यं सुविचार्यैव कुर्वता।।

  • अर्थ - मनुष्य को फलप्राप्ति कर्म के अनुसार होती है और बुद्धि उसी कर्म के अनुरूप कार्य करती है। तथापि विद्वज्जन सम्यक् प्रकार से विचार कर ही कार्य करने वाले होने चाहिए।
  • जबकि अन्तिम सूक्ति नीतिशतक के श्लोक संख्या 95 से उद्धृत है, जो इस प्रकार है -

ब्रह्मा येन कुलालवन्नियमितो ब्रह्माण्डभाण्डोदरे

विष्णुर्येन दशावतारगहने क्षिप्तो महासङ्कटे।

रुद्रो येन कपालपाणिपुटके भिक्षाटनं कारितः

सूर्यो भ्राम्यति नित्यमेवगगने तस्मै नमः कर्मणे।।

  • अर्थ - जिस कर्म के द्वारा ब्रह्मा भी कुम्हार के समान ब्रह्माण्ड रूपी पात्र के अन्दर नियमित कर दिये गये गये हैं।, जिसने विष्णु को  दशावतार रूपी महासंकट में डाल दिया, जिस कर्म के द्वारा भगवान् शिव के दोनो हाथों को कपाल थामकर भिक्षाटन करने के लिए प्रेरित किया है तथा जिस कर्म के कारण सूर्य नित्य आकाश में भ्रमण करता है उस कर्म को नमस्कार है।

 

अतः उपर्युक्त तीनों विकल्पों में तीनों सूक्तियां नीतिशतक से उल्लिखित हैं।

44

"रिक्तं सर्वो भवति हि लघुः पूर्णता गौरवाय” यह सूक्ति उद्धृत है-

  1. ((a))

    कादम्बरी से

  2. ((b))

    शुकनासोपदेश से

  3. ((c))

    मेघदूत से

  4. ((d))

    अभिज्ञान शाकुन्तल से

Show Answer
Answer: ((c))

मेघदूत से

स्पष्टीकरण - "रिक्तं सर्वो भवति हि लघुः पूर्णता गौरवाय” यह सूक्ति मेघदूत में उद्धृत है।

प्रस्तुत पंक्ति मेघदूत के एक श्लोक की पंक्ति है। इस ग्रन्थ के रचयिता महाकवि कालिदास है।

श्लोक -

तस्‍यास्तिक्‍तैर्वननगजमदैर्वासितं वान्‍तवृष्टि-

र्जम्‍बूकुञ्जप्रतिहतरयं तोयमादाय गच्‍छेः।

अन्‍त:सारं घन! तुलयितुं नानिल: शक्ष्‍यति त्‍वां

रिक्‍तः सर्वो भवति हि लघु: पूर्णता गौरवाय।।

अर्थ - जब तुम वृष्टि द्वारा अपना जल बाहर फेंक चुके हो तो नर्मदा के उस जल का पान कर आगे बढ़ना, जो जंगली हाथियों के तीते महकते मद से भावित है और जामुनों के कुंजों में रुक-रुककर बहता है। हे घन, भीतर से तुम ठोस होगे तो हवा तुम्‍हें न उड़ा सकेगी, क्‍योंकि जो खाली हैं, वे हल्के, और जो भरे-पूरे हैं वे भारी-भरकम होते हैं। अर्थात् चीज खाली होने से हल्की बन जाती है, गौरव तो पूर्णता से ही मिलती है।

अतः श्लोक से स्पष्ट है कि "रिक्तं सर्वो भवति हि लघुः पूर्णता गौरवाय” यह सूक्ति मेघदूत में उद्धृत है।

45

तीन का स्त्रीलिङ्ग में संस्कृत में अनुवाद होगा-

  1. ((a))

    तिस्रः

  2. ((b))

    त्रीणि

  3. ((c))

    त्रयाः

  4. ((d))

    त्रयः

Show Answer
Answer: ((a))

तिस्रः

स्पष्टीकरण - तीन का (स्त्रीलिङ्ग में) संस्कृत में तिस्रः अनुवाद होता है।

संस्कृत में एक से लेकर चार संख्या तक संख्या के रूप तीन लिंगों में भिन्न-भिन्न चलते हैं। इस आगे की संख्या सभी लिंगों में समान होती है।

संख्या 1 से 4 तक तीन लिंगों में (संस्कृत में)

संख्यापुल्लिंगस्त्रीलिंगनपुंसकलिंग
1एकःएकाएकम्
2द्वौद्विद्वे
3त्रयःतिस्रःत्रीणि
4चत्वारःचतस्रःचत्वारि

 

अतः स्पष्ट है कि तीन को स्त्रीलिंग संस्कृत में तिस्रः लिखा जाता है।

46

“परभृत विरुतम्" इस पदसमुच्चय का अभिप्राय-

  1. ((a))

    काक-ध्वनि

  2. ((b))

    कोकिल-ध्वनि

  3. ((c))

    मधुर-ध्वनि

  4. ((d))

    चक्रवाक-ध्वनि

Show Answer
Answer: ((b))

कोकिल-ध्वनि

स्पष्टीकरण - “परभृत विरुतम्" इस पद समुच्चय का अभिप्राय कोकिल ध्वनि से है।

परभृत विरुतम् - यह अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक के श्लोक में उल्लिखित है। इस नाटक के रचयिता महाकवि कालिदास है।

श्लोक - 

अनुमतगमना शकुन्तला तरुभिरियं वनवासबन्धुभिः।

परभृतविरुतं कलं यतः प्रतिवचनीकृतमेभिरात्मनः।।

अर्थात् (कोकिल के शब्द की सूचना देकर) हे भगवन्! वन में साथ ही रहने से बन्धु भाव को प्राप्त इन वृक्षों ने शकुन्तला को पति गृह जाने की अनुमति दे दी है, क्योंकि इन्होंने मधुर एवं मनोहर यह कोकिल का शब्द ही अपने उत्तर में मानो उच्चारित किया है। (कहा है।)

इस तरह श्लोक के अर्थ से स्पष्ट है, अतः यहाँ परभृत विरुतम् इस पद समुच्चय का अभिप्राय कोकिल ध्वनि से है।

47

"को नामोष्णोदकेन नवमालिकां सिञ्चति" यह कथन है-

  1. ((a))

    शकुन्तला का

  2. ((b))

    अनसूया का

  3. ((c))

    प्रियंवदा का

  4. ((d))

    कण्व शिष्य का 

Show Answer
Answer: ((c))

प्रियंवदा का

स्पष्टीकरण -

  • कथन - नामोष्णोदकेन नवमालिकां सिञ्चति।
  • अर्थ - कौन नवमालिका को गर्म जल से सींचेगा।
  • उपर्युक्त उक्ति महाकवि कालिदास की सर्वोत्कृष्ट कृति अभिज्ञानशाकुन्तलम् के चतुर्थांक से उद्धृत है।
  • जिसमें यह उक्ति काव्य चतुर्थांक के शुद्ध विष्कम्भक से है।
  • उपर्युक्त उक्ति प्रियंवदा द्वारा उक्त है।

 

अतः उपर्युक्त कथन प्रियवंदा का है।

Important Points

  • यहा विष्कम्भक से तात्पर्य नाटक के काव्य तत्व से है, जिसके अन्तर्गत नाटक में भूत और भविष्यकाल की घटनाओं की सूचना देने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।
  • जिसमें एक या दो पात्र मध्यम कोटि के आते हैं जो शुद्ध विष्कम्भक कहलाता है।
  • जबकि यदि उसमें एक पात्र अधम कोटि का तथा दूसरा पात्र मध्यम कोटि के हो तो वह मिश्र विष्कम्भक कहलाता है।
  • अतः उपर्युक्त नाटक में भी चतुर्थांक में महर्षि दुर्वासा संस्कृत में तथा अनुसूया और प्रियम्वदा प्राकृत भाषा में बोलते हैं। ये सभी पात्र मध्यम श्रेणी के पात्र है।
  • इसलिए अभिज्ञानशाकुन्तलम् के चतुर्थांक में शुद्ध विष्कम्भक का प्रयोग किया गया है।
48

"वामाः कुलस्याधयः" इस पंक्ति में प्रयुक्त आधयः का अर्थ है-

  1. ((a))

    मानसिक पीडा

  2. ((b))

    अधिक योग्य

  3. ((c))

    कुल वृद्धिकारक

  4. ((d))

    हितकारी

Show Answer
Answer: ((a))

मानसिक पीडा

स्पष्टीकरण - 'वामाः कुलस्याधयः' इस पंक्ति में आधयः का अर्थ मानसिक पीड़ा से है-

Important Points

  • प्रस्तुत शब्दांश कविकुलगुरु कालिदास की विश्वप्रसिद्ध कृति अभिज्ञान शाकुन्तलम् के चतुर्थांक के श्लोक 18 से है।
  • यह श्लोक इस प्रकार है -

शुश्रूस्व गुरून् कुरु प्रियसखीवृत्तिं सपत्नीजने

भर्तुर्विप्रकृता पि रोषणतया मा स्म प्रतीपं गमः।

भूयिष्ठं भव दक्षिणा परिजने भाग्येष्वनुत्सेकिनी

यान्तयेवं गृहिणीपदं युवतयो वामाः कुलस्याधयः।।

  • अर्थ  - प्रस्तुत श्लोक में ऋषि कण्व पतिगृह को जाने वाली शकुंतला को पतिगृह में किस प्रकार व्यवहार करें इस विषय में उसे उपदेश देते है कि तू गुरुजनों की सेवा करना, अपनी सपत्नीयों के साथ सखियों जैसा व्यवहार करना, तिरस्कृत होने पर भी क्रोधवश अपने पति के प्रतिकूल व्यवहार मत करना, अपने आश्रितों के साथ उदार व्यवहार करना, समृद्धियुक्त होने पर अभिमान करना इस प्रकार आचरण करने वाली स्त्रियां ही गृहलक्ष्मी के पद को प्राप्त करती है तथा इसके विपरीत आचरण करने वाली कुल के लिए अभिशाप होती हैं।
  • यह श्लोक अभिज्ञानशाकुन्तलम् के चतुर्थांक श्लोकचतुष्टय का श्लोक है, जो अन्तंत महत्वपूर्ण श्लोक है।
  • उपर्युक्त पंक्ति वामाः कुलस्याधयः इसी श्लोक से उद्धृत है जिसका अर्थ कुल के लिए अभिशाप है।
  • परन्तु उपर्युक्त प्रश्न के अनुसार आधयः पद का अर्थ मानसिकपीड़ा / दुःख देने वाली/ अभिशाप से है।

 

अतः उपर्युक्त पदांश में आधयः पद का अर्थ मानसिक पीड़ा है।

Key Points

  • उपर्युक्त श्लोक शार्दूलविक्रीडित छन्द में है।
49

शुकनासोपदेश विहित है-

  1. ((a))

    तारापीड के लिए   

  2. ((b))

    चन्द्रापीड के लिए  

  3. ((c))

    महाश्वेता के लिए 

  4. ((d))

    शुक्रदेव के लिए  

Show Answer
Answer: ((b))

चन्द्रापीड के लिए  

स्पष्टीकरण - शुकनासोपदेश चन्द्रापीड के लिए कही गयी है। जिसमें प्रधानमन्त्री शुकनास तारापीड राजा के पुत्र चन्द्रापीड को उपदेश देते हैं।

यह वृतान्त महाकवि बाणभट्ट द्वारा विरचित कादम्बरी गद्य काव्य के अन्तर्गत शुकनासोपदेश में आता है।

  • इस ग्रन्थ में शुकनास तारापीड राजा का मुख्यमन्त्री है। वह राजा तारापीड के पुत्र चन्द्रापीड को उपदेश देता है। इसलिए इसे शुकनासोपदेश कहा जाता है।
  • शुकनास राजा के पुत्र को युवावस्था, यौवन, सम्प्रभुता और लक्ष्मी इनके दुष्प्रभाव के विषय में बताता है कि इनमें से एक भी व्यक्ति का सर्वनाश करने के लिए पर्याप्त है, अगर चारों ओर एक साथ हो तो, क्या ही कहा जा सकता है।
  • जैसा कि शुकनासोपदेश में उल्लिखित पंक्ति है - समुपस्थितयौवराज्याभिषेकञ्च तं कदाचिद्दर्शनार्थमागतमारुढविनयमपि विनीततरमिच्छन् कर्तुं शुकनासः सविस्तमुवाच। अर्थात् एक बार दर्शन के लिए आये हुए, निकट भविष्य में युवराज के लिए अभिषिक्त होने वाले, पहले से ही विनीत चन्द्रापीड को और अधिक विनीत बनाने की इच्छा वाले प्रधानमन्त्री शुकनास ने विस्तारपूर्वक कहा।

 

इस तरह स्पष्ट है कि शुकनासोपदेश चन्द्रापीड के लिए कही गयी है।

50

'नृ' शब्द के प्रथमा विभक्ति में रूप होते हैं  -

  1. ((a))

    नरः - नरौ - नराः   

  2. ((b))

    नृ - नरौ - नरः   

  3. ((c))

    ना - नरौ - नराः  

  4. ((d))

    ना - नरौ - नरः  

Show Answer
Answer: ((d))

ना - नरौ - नरः  

स्पष्टीकरण -

  • नृ (मनुष्य) शब्दरूप (ऋकारान्त पुल्लिंग) के प्रथमा विभक्ति - तीनों वचनों में ना - नरौ - नरः रूप बनते हैं।
  • अतः ना - नरौ - नरः सही उत्तर होगा।
  • अन्य तीनों विकल्पों में कोई न कोई वचन अशुद्ध है।

Additional Information

नृ शब्दरूप (ऋकारान्त पुल्लिंग) का प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमानानरौनरः
द्वितीयानरम्नरौनृन्
तृतीयान्रानृभ्याम्नृभिः
चतुर्थीन्रेनृभ्याम्नृभ्यः
पञ्चमीनुःनृभ्याम्नृभ्यः
षष्ठीनुःन्रोःनृणाम्
सप्तमीनरिन्रोःनृषु
सम्बोधनहे नःहे नरौहे नरः
51

"कवीनां कविषु वा कालिदासः श्रेष्ठः" किस सूत्र से बनता है ?

  1. ((a))

    आयुक्त कुशलाभ्यां चासेवायाम्

  2. ((b))

    यतश्च निर्धारणम्

  3. ((c))

    षष्ठी चानादरे

  4. ((d))

    यस्य भावेन भावलक्षणम्

Show Answer
Answer: ((b))

यतश्च निर्धारणम्

स्पष्टीकरण - "कवीनां कविषु वा कालिदासः श्रेष्ठः" यतश्च निर्धारणम् सूत्र से बनता है।

'यतश्च निर्धारणम्' इस सूत्र के अनुसार जाति, गुण, क्रिया आदि संज्ञाओं के द्वारा समुदाय में से किसी एक के श्रेष्ठत्व का निर्धारण होने पर षष्ठी या सप्तमी विभक्ति होती है।

उदाहरण -

  • नृणां ब्राह्मणः श्रेष्ठः। अथवा नृषु ब्राह्मणः श्रेष्ठः।
  • गवां कृष्णा बहुक्षीरा। अथवा गोषु कृष्णा बहुक्षीरा।
  • कवीनां कालिदासः श्रेष्ठः। अथवा कविषु कालिदासः श्रेष्ठः। अर्थात् (कवियों में कालिदास श्रेष्ठ हैं।)
  • पर्वतानां हिमालयः उत्तुन्गतमः। अथवा पर्वतेषु हिमालयः उत्तुङ्गतमः।
  • छात्रेषु रामः पटुतमः अथवा छात्राणां रामः पटुतमः

 

अतः स्पष्ट है कि "कवीनां कविषु वा कालिदासः श्रेष्ठः" यतश्च निर्धारणम् सूत्र से बनता है।

52

कामदेव का पर्याय है-

  1. ((a))

    रतिपति 

  2. ((b))

    हलायुध

  3. ((c))

    माधव 

  4. ((d))

    अज 

Show Answer
Answer: ((a))

रतिपति 

सही उत्तर 'रतिपति' है।  

Key Points

  • कामदेव के पर्यायवाची- मन्मथ, मनोज, काम, मार, कंदर्प, अनंग, मनसिज, रतिनाथ, मीनकेतू, रतिपति, मदन

अन्य विकल्प-

  • हलायुध के पर्यायवाची- बलदेव, राम, बलराम, रोहिणेय, संकर्षण, मूसली, बलभद्र।
  • कृष्ण के पर्यायवाची- राधापति, घनश्याम, मुरारी, माधव, गिरिधर, केशव, गोपाल, गिरधारी, मुरलीधर, कन्हैया, मोहन
  • ब्रह्मा के पर्यायवाची- अज, विधि, विधाता, प्रजापति, निर्माता, धाता, चतुरानन, प्रजाधिप
53

"निगृह्यमाणा बटवः पदे पदे यजूंषि सामानि च यस्य शङ्कितः" यह पंक्ति किस कवि की कीर्ति को अभिव्यक्त करती हैं ?

  1. ((a))

    बाणभट्ट की

  2. ((b))

    भारवि की

  3. ((c))

    भर्तुहरि की

  4. ((d))

    भवभूति की

Show Answer
Answer: ((a))

बाणभट्ट की

कवि बाणभट्ट-

  • बाणभट्ट सातवीं शताब्दी के संस्कृत गद्य लेखक और कवि थे। वह राजा हर्षवर्धन के आस्थान कवि थे।
  • उनके दो प्रमुख ग्रंथ हैं- हर्षचरितम् तथा कादम्बरी। हर्षचरितम् राजा हर्षवर्धन का जीवन-चरित्र था और कादंबरी दुनिया का पहला उपन्यास था।
  • बाणभट्ट जी ने इन दोनों गद्य काव्य के अलावा मुकुटतडितक, चंडी शतक पार्वती परिणय जैसे अन्य रचनाएं भी बाणभट्ट के द्वारा ही रचित की गई है।

 

अत: निगृह्यमाणा बटवः पदे पदे यजूंषि सामानि च यस्य शङ्कितः" यह पंक्ति बाणभट्ट की कीर्ति को अभिव्यक्त करती हैं।

54

'शिवोऽर्च्यः' का सन्धि विच्छेद होगा-

  1. ((a))

    शिवस् + अर्च्यः

  2. ((b))

    शिवः + अर्च्यः

  3. ((c))

    शिव + अर्च्यः

  4. ((d))

    शिवस् + र्च्यः

Show Answer
Answer: ((a))

शिवस् + अर्च्यः

स्पष्टीकरण - शिवोऽर्च्यः का सन्धि विच्छेद होगा - शिवस् + अर्च्यः। (इसमें विभिन्न सूत्रों द्वारा शिवोऽर्च्यः यह रूप सिद्ध हुआ है। यह प्रक्रिया निम्नलिखित रूप से है।)

शब्द - शिवोऽर्च्यः (शिव पूज्य है।)

सन्धि विच्छेद - शिवस् + अर्च्यः।

  • शिवस् + अर्च्यः (ससजुषो रुः सूत्र से स् को रु आदेश होता है।)
  • शिवरु + अर्च्यः (उपदेशेऽजनुनासिक इत् सूत्र से रु के उ का लोप हो जाता है।)
  • शिव र् + अर्च्यः (अतो रोरप्लुतादप्लुते सूत्र से रेफ को उकार आदेश हुआ।)
  • शिव उ + अर्च्यः (आद् गुणः सूत्र से शिव में व के अकार और उ में गुण सन्धि हो जाती है।)
  • शिवो + अर्च्यः (एङ पदान्तादति सूत्र से ओ के बाद अ का ऽ चिन्ह आदेश होगा।) जिससे शिवोऽर्च्यः शब्द बनेगा।

 

अतः स्पष्ट है कि शिवोऽर्च्यः का सन्धिविच्छेद शिवस् + अर्च्यः होगा।

55

"चिन्ताजडं दर्शनम्" यहां चिन्तातुर स्वरूप किसका है ?

  1. ((a))

    काश्यप का

  2. ((b))

    गौतम का

  3. ((c))

    विश्वामित्र का

  4. ((d))

    शारद्वत का

Show Answer
Answer: ((a))

काश्यप का

अभिज्ञानशाकुन्तलम्-

  • अभिज्ञान शाकुन्तलम् महाकवि कालिदास का विश्वविख्यात नाटक है।
  • इसमें राजा दुष्यन्त तथा शकुन्तला के प्रणय, विवाह, विरह, प्रत्याख्यान तथा पुनर्मिलन की एक सुन्दर कहानी है।
  • पौराणिक कथा में दुष्यन्त को आकाशवाणी द्वारा बोध होता है पर इस नाटक में कवि ने मुद्रिका द्वारा इसका बोध कराया है।

श्लोक-

यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया

कण्ठः स्तम्भित-वाष्पवृत्तिकलुषश् चिन्ताजडं दर्शनम्।

वैक्लव्यं मम तावदीदृशमपि स्नेहादरण्यौकसः

पीड्यन्ते गृहिण: कथं न तनया-विश्लेषदु:खैर् नवैः।।

श्लोक का अर्थ- शकुन्तला की विदाई के समय भगवान कण्व ऋषि कहते हैं- 'आज शकुन्तला चली जायेगी, इस कारण हृदय उत्कण्ठित हो गया है, गले में रुँधे हुए अश्रुवेग से डबडबायी हुई मेरी आँखें चिन्ता से स्तब्ध हो रही है।' 'यदि स्नेहवश मुझ (वीतराग) वनवासी को ऐसी विकलता है तो भला गृहस्थजन पुत्री के नूतन वियोगजन्य शोकों से कैसे नहीं पीड़ित होते होंगे।

अत: यह स्पष्ट होता है की, "चिन्ताजडं दर्शनम्" यह  चिन्तातुर स्वरूप कण्व अर्थात काश्यप का है।

56

"द्वैतवने वनेचरः" यहाँ प्रयुक्त वनेचर में समास है

  1. ((a))

    द्वन्द्व

  2. ((b))

    अलुक् सप्तमी तत्पुरुष

  3. ((c))

    बहुब्रीहि

  4. ((d))

    कर्मधारय

Show Answer
Answer: ((b))

अलुक् सप्तमी तत्पुरुष

स्पष्टीकरण - यहाँ वनेचर पद में अलुक् सप्तमी तत्पुरुष समास है।

शब्द - द्वैतवने वनेचरः (द्वैत वन में निवास करने वाल वन चर) - यह शब्द किरातार्जुनीयम् महाकाव्य के श्लोक में उद्धृत है।

अलुक् समास -

  • यह तत्पुरुष समास का ही भेद है। समास में प्रायः प्रथम शब्द की विभक्ति का लोप हो जाता है।
  • किन्तु कुछ ऐसे समास है, जिनमें विभक्ति के प्रत्यय का लोप नहीं होता है, उसे अलुक् समास कहते हैं।
  • अलुक् समास में केवल ऐसे ही उदाहरण हैं, जो साहित्य में ग्रन्थकारों के ग्रन्थों में मिलते हैं, इसमें नवीन शब्दों का निर्माण नहीं किया जा सकता।
  • अलुक् समास के कुछ उदाहरण-
  • जनुषान्धः (जन्मान्ध)
  • पश्यतो हरः (चोर)
  • आत्मनेपदम्
  • परस्मैपदम्
  • अन्तेवासी (शिष्य)
  • वनेचरः (वन में निवास करने/रहने वाला)
  • खेचरः (सिद्ध, देव, पक्षी, आकाश में चलने वाला)
  • सरसिजम् (कमल) आदि।

अतः स्पष्ट है कि वनेचरः में अलुक् ततत्पुरुष समास है।

Additional Information

समसनं समासः अर्थात् संक्षिप्त होने को समास कहते हैं। समास एक संज्ञा है। दो या दो से अधिक शब्दों का जब समास होकर एक पद बनता है, तो उसे समास कहते हैं। समास में दो पद होते हैं - 1. पूर्व पद, 2. उत्तर पद

समास के मुख्यतः 4 भेद है। 

  1. अव्ययीभाव
  2. तत्पुरुष
  3. बहुव्रीहि
  4. द्वन्द्व

(1) अव्ययीभाव समास - ‘पूर्वपदार्थप्रधानोSव्ययीभावः’ अर्थात् जिस पद में पूर्व पद की प्रधानता हो या पद का आरम्भ किसी अव्यय पद से हो रहा हो, वहाँ अव्ययीभाव समास होता है। उदाहरण - 

  • रूपस्य योग्यम् - अनुरूपम्
  • रामस्य पश्चात् - अनुरामम्

(2) तत्पुरुष समास - ‘उत्तरपदप्रधानो तत्पुरुषः’ अर्थात जिस पद में उत्तर पद प्रधान होता है, वहाँ तत्पुरुष समास होता है।  उदाहरण - 

  • सुखम् आपन्नः - सुखापन्नः
  • कूपं पतितः - कूपपतितः

तत्पुरुष समास के मुख्यतः दो भेद होते हैं - 

  1. व्यधिकरण तत्पुरुष समास
  2. समानाधिकरण तत्पुरुष
  3. व्यधिकरण तत्पुरुष समास के सात (7) भेद होते हैं, जो निम्नलिखित हैं - 

द्वितीया तत्पुरुष - जहाँ श्रित, अतीत, पतित, गत, अत्यस्त, प्राप्त और आपन्न इन शब्दों का संयोग होता है, वहाँ द्वितीया तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण -

  • शोकं पतितः - शोकपतितः

तृतीया तत्पुरुष - जहाँ तृतीयान्त शब्द के साथ पूर्व, सदृश, सम शब्द आता है, तो वहाँ तृतीया तत्पुरुष समास होता है।  उदाहरण - 

  • पित्रा समः - पितृसमः

चतुर्थी तत्पुरुष - जहाँ पूर्व पद चतुर्थी विभक्ति में होता है अथवा बलि, हित, सुख, रक्षित इन शब्दों को संयोग होता है,  वहाँ चतुर्थी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण -

  • ब्राह्मणाय हितम् - ब्राह्मणहितम्

पञ्चमी तत्पुरुष - जहाँ भय, भी���, भीति इन शब्दों का संयोग होता है, वहाँ पञ्चमी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • व्याघ्राद् भीतिः - व्याघ्रभीतिः

षष्ठी तत्पुरुष - जब पूर्व पद षष्ठी विभक्ति में होता है, तो वहाँ षष्ठी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • देवानां भाषा - देवभाषा

सप्तमी तत्पुरुष - जब पूर्व पद सप्तमी विभक्ति में रहता है अथवा शौण्ड (चतुर), धूर्त, कितव (शठ), प्रवीण, कुशल, पण्डित इन शब्दों का संयोग होता है, तो वहाँ सप्तमी तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • सभायां पण्डितः - सभापण्डितः

नञ् तत्पुरुष - जब पूर्व पद न शब्द हो, तथा उत्तर पद कोई संज्ञा या विशेषण हो तो, वहाँ नञ् तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण - 

  • न कृतम् - अकृतम्
  1. समानाधिकरण तत्पुरुष समास के दो भेद होते हैं - 
  • कर्मधारय तत्पुरुष समास
  • द्विगु तत्पुरुष समास

(1) कर्मधारय तत्पुरुष समास - ऐसा तत्पुरुष समास जहाँ विशेषण-विशेष्य और उपमान-उपमेय का सम्बन्ध होता है, वह कर्मधारय समास होता है। उदाहरण- 

  • पीतम् उत्पलम् - पीतोत्पलम्
  • घन इव श्यामः - घनश्यामः

(2) द्विगु तत्पुरुष समास - जहाँ प्रथम पद संख्यावाची होता है, वहाँ द्विगु समास होता है। यह तत्पुरुष समास का ही भेद है। उदाहरण - 

  • त्रयानां  भुवनानां समाहारः - त्रिभुवनम्
  • चतुर्णां भुजानां समाहारः - चतुर्भुजम्

(3) बहुव्रीहि समास - ‘अन्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिः’ जहाँ दो या दो से अधिक समस्त शब्द किसी अन्य पद को इंगित करते हैं, वहाँ बहुव्रीहि समास होता है। उदाहरण - 

  • महान् आत्मा यस्य सः (बुद्धः) - महात्मा
  • दश आननानि यस्य सः (रावणः) - दशाननः

बहुव्रीहि समास के दो भेद हैं-

  1. समानाधिकरण बहुव्रीहि- (जहाँ दोनों शब्द प्रथमान्त होते हैं। जैसे - पीतम् अम्बरम् यस्य सः)
  2. व्यधिकरण बहुव्रीहि - (जहाँ दोनों शब्द प्रथमान्त नहीं होते हैं। एक प्रथमान्त होता है और दूसरा शब्द षष्ठी या सप्तमी विभक्ति में होता है। जैसे - चन्द्र शेखरे यस्य सः)

(4) द्वन्द्व समास - ‘उभयपदार्थप्रधानो द्वन्द्वः’ जहाँ दोनों पद (पूर्व पद एवं उत्तर पद) प्रधान होते हैं, वहाँ द्वन्द्व समास होता है। उदाहरण -

  • रामश्च लक्ष्मणश्च भरतश्च - रामलक्ष्मणभरताः
  • पाणी च पादौ च - पाणिपादम्
57

"शोकज्वालावलीढ़म्" इसमें अलङ्कार है

  1. ((a))

    रूपक

  2. ((b))

    अतिशयोक्ति

  3. ((c))

    अप्रस्तुत प्रशंसा

  4. ((d))

    निदर्शना

Show Answer
Answer: ((a))

रूपक

रूपक अलङ्कार-

रूपक का लक्षण- तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः। -

व्याख्या- अतिशय समानता के कारण जहाँ उपमेय को उपमान का रूप दे दिया जाए अथवा उपमेय पर उपमान का आरोप कर दिया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है।

उदाहरण-

  • अनलङ्कृतशरीरोऽपि चन्द्रमुख आनन्दयति मम हृदयम्।

इस वाक्य में प्रयुक्त 'चन्द्रमुख' शब्द में मुख पर चन्द्रमा का आरोप होने से रूपक अलंकार है। 

  • जात ! पश्यामि ते मुखपुण्डरीकम्।

यहाँ 'मुखपुण्डरीक' शब्द में मुख पर पुण्डरीक (कमल) का आरोप होने से रूपक अलंकार है।

इसीप्रकार "शोकज्वालावलीढ़म्" में रूपक अलङ्कार है।

Additional Informationशिवराजविजयम्-

  • पंडित अम्बिकादत्त व्यासजी ने छत्रपति शिवाजी के जीवन पर 'शिवराजविजयम्' नामक गद्यकाव्य की रचना की है, जो 'कादम्बरी' की शैली में रचित है।
  • पंडित जितेन्द्रियाचार्य द्वारा संशोधित 'शिवराजविजयम्' की, 6 आवृत्तियां प्रकाशित हो चुकी हैं।
  • यह कथन व्यास जी के शिवराजविजय के प्रथम नि:श्वास में है।
58

शिवराजविजय में निःश्वासों की संख्या है-

  1. ((a))

    3

  2. ((b))

    4

  3. ((c))

    7

  4. ((d))

    12

Show Answer
Answer: ((d))

12

स्पष्टीकरण - शिवराजविजय में निःश्वासों की संख्या 12 है। इस ग्रन्थ में 3 विराम है, जिसके प्रत्येक विराम में 4-4 निःश्वास हैं। इस तरह कुल 12 निःश्वास है। यह ग्रन्थ राष्ट्रभक्ति भावना से ओत-प्रोत संस्कृत उपन्यास है। इस ग्रन्थ के रचयिता अम्बिकादत्त व्यास है।

  • ​इस ग्रन्थ में शिवाजी महाराज की विजय का वर्णन है।
  • इस ग्रन्थ में तीन विराम है। प्रत्येक विराम में चार निःश्वास हैं। इस तरह कुल 12 निःश्वास हैं।
  • यह संस्कृत का प्रसिद्ध उपन्यास है। इस ग्रन्थ में वीर रस की प्रधानता है।
  • इसका कथानक इस प्रकार है – दक्षिण देश में (यवन) शासकों के अत्याचारों से तगं आकर शिवाजी (शिवराज) स्वतन्त्रता के  लिए संघर्ष आरम्भ करते हैं और उन्हें इस कार्वय में सफलता भी मिलती है। उनकी विजय से घबराकर बीजापुर का शासक उन्हें मारने के लिए अफजल खान को भेजता है। वे उसे भी मौत के घाट उतार देते हैं। कवि ने शिवाजी के मुख से सम्पूर्ण राष्ट्र की मुक्ति की उद्घोषणा करवायी है – ‘कार्यं हि साधयेयं देहं वा पातयेयम्।'
  • कवि ने प्रस्तुत उपन्यास में ऐतिहासिक पात्रों के अतिरिक्त अन्य अनेक पात्रों की परिकल्पना की है।
  • शिवराज विजय तत्कालीन स्वाधीनता संग्राम के लिए एक प्रेरणादायी मार्गदर्शक काव्य सिद्ध हुआ है।

 

अतः स्पष्ट है कि शिवराजविजय ग्रन्थ में निःश्वासों की संख्या 12 है। जो एक प्रसिद्ध संस्कृत उपन्यास है।

59

कौन सा विशेषण सूर्य का नहीं है ?

  1. ((a))

    गुरुसेवन पटुः

  2. ((b))

    शोकः विमोकः कोकलोकस्य

  3. ((c))

    कुण्डलमाखण्डल दिशः

  4. ((d))

    अवलम्बोरोलम्बकदम्बस्य

Show Answer
Answer: ((a))

गुरुसेवन पटुः

शिवराजविजयम्-

  • पंडित अम्बिकादत्त व्यासजी ने छत्रपति शिवाजी के जीवन पर 'शिवराजविजयम्' नामक गद्यकाव्य की रचना की है, जो 'कादम्बरी' की शैली में रचित है।
  • पंडित जितेन्द्रियाचार्य द्वारा संशोधित 'शिवराजविजयम्' की, 6 आवृत्तियां प्रकाशित हो चुकी हैं।
  • यह कथन व्यास जी के शिवराजविजय के प्रथम नि:श्वास में है।
  • प्रस्तुत विकल्पों में से शोकः विमोकः कोकलोकस्य, कुण्डलमाखण्डल दिशः, अवलम्बोरोलम्बकदम्बस्य यह तीन विशेषण सूर्य के लिये कहे गये है।
  • केवल गुरुसेवन पटुः अर्थात गुरुसेवा में कुशल यह विशेषण ब्रम्हचारी गुरु के शिष्य का है।

 

अत: यह स्पष्ट होता है की, गुरुसेवन पटुः यह सूर्य का विशेषण नही है।

60

"प्रयाग भारत का प्रमुख धार्मिक नगर है।" इस वाक्य का शुद्ध अनुवाद है-

  1. ((a))

    प्रयागः भारतस्य प्रमुखः धार्मिक नगरः अस्ति।

  2. ((b))

    प्रयागः भारते प्रमुखः धार्मिक नगरं सन्ति।

  3. ((c))

    प्रयागः भारतस्य प्रमुखं धार्मिकनगरं सन्ति।

  4. ((d))

    प्रयागः भारतस्य प्रमुखं धार्मिकनगरम् अस्ति।

Show Answer
Answer: ((d))

प्रयागः भारतस्य प्रमुखं धार्मिकनगरम् अस्ति।

स्पष्टीकरण - "प्रयाग भारत का प्रमुख धार्मिक नगर है।" इस वाक्य का शुद्ध अनुवाद होगा - प्रयागः भारतस्य प्रमुखं धार्मिकनगरम् अस्ति

यहाँ नगरम् होगा, क्योंकि नगर नपुंसकलिंग शब्द है। इसलिए धार्मिकनगरम् होगा।

प्रयाग (प्रयागः) भारत का (भारतस्य) प्रमुख (प्रमुखं) धार्मिक नगर (धार्मिकनगरम्) है। (अस्ति)

यहाँ प्रमुख और धार्मिक ये दोनों ही पद में नपुंसकलिंग हुआ है, क्योंकि ये नगरम् पद के विशेषण है और विशेषण-विशेष्य में समान विभक्ति, लिंग और वचन होता है।

अतः स्पष्ट है कि यहाँ शुद्ध अनुवाद होगा - प्रयागः भारतस्य प्रमुखं धार्मिकनगरम् अस्ति।

Additional Information

अन्य विकल्प -

  • प्रयागः भारतस्य प्रमुखः धार्मिक नगरः अस्ति। - ये रेखांकित तीनों शब्द अशुद्ध है।
  • प्रयागः भारते प्रमुखः धार्मिकनगरं सन्ति। - ये रेखांकित तीनों शब्द अशुद्ध है।
  • प्रयागः भारतस्य प्रमुखं धार्मिकनगरं सन्ति। - यहाँ क्रियापद सन्ति अशुद्ध है। क्योंकि केवल एक नगर की चर्चा हो रही है।
61

किरातार्जुनीय के प्रथम सर्ग में प्रयुक्त छन्द हैं

  1. ((a))

    अनुष्टुप् आर्या शिखरिणी

  2. ((b))

    वंशस्थ, पुष्पिताग्रा, मालिनी

  3. ((c))

    वंशस्थ (केवल)

  4. ((d))

    मन्द्राक्रान्ता वंशस्थ, मालिनी

Show Answer
Answer: ((b))

वंशस्थ, पुष्पिताग्रा, मालिनी

किरातार्जुनीयम्-

  • किरातार्जुनीयम् (अर्थ : किरात और अर्जुन की कथा) महाकवि भारवि द्वारा सातवीं शती ई. में रचित महाकाव्य है जिसे संस्कृत साहित्य के 'बृहत्त्रयी' में स्थान प्राप्त है।
  • महाभारत में वर्णित किरात वेशधारी शिव के साथ अर्जुन के युद्ध की लघुकथा को आधार बनाकर कवि ने राजनीति, धर्मनीति, कूटनीति, समाजनीति, युद्धनीति, जनजीवन आदि का मनोरम वर्णन किया है।
  • यह काव्य विभिन्न रसों से ओतप्रोत रचना है किन्तु वीर रस प्रधान है।
  • संस्कृत के छः प्रसिद्ध महाकाव्य हैं – किरातार्जनुयीयम्‌ (भारवि), शिशुपालवधम्‌ (माघ) और नैषधीयचरितम्‌ (श्रीहर्ष)– बृहत्त्रयी कहलाते हैं।

Important Pointsकिरातार्जुनीयम् प्रथम सर्ग:-

किरातार्जुनीयम्‌ के पहले सर्ग में द्रौपदी और दूसरे में भीम द्वारा युधिष्ठिर को दुर्योधन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा के लिए उकसाने और युधिष्ठिर द्वारा उसे अनीतिपूर्ण बताकर अस्वीकार कर देने के क्रम में भारवि ने राजनीति के दो छोरों के बीच के द्वंद्व पर बहुत सार्थक विमर्श प्रस्तुत किया है।

महाकवि भारवि द्वारा विरचित किरातार्जुनीयम् महाकाव्य के प्रथम सर्ग में कुल ४६ श्लोक हैं। उनमे से पहले ४४ श्लोकोंं में वंशस्थ छन्द  है, ४५ वे श्लोक में पुष्पिताग्रा छन्द  है और ४६ वे श्लोक में मालिनी यह छन्द  है।

  • वंशस्थ छन्द

वंशस्थ छन्द का लक्षण- जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ।

स्पष्टीकरण- जिस छन्द के प्रत्येक चरण में क्रम से जगण, तगण और रगण हो, उसे वंशस्थ कहते है।

  • पुष्पिताग्रा छन्द

लक्षण- अयुजि नयुगरेफतो यकारो युजि च नजौ जरगाश्च पुष्पिताग्रा।

स्पष्टीकरण- प्रथम और तृतीय चरण में क्रमशः दो नगण, एक रगण तथा यगण होते है। द्वितीय और चतुर्थ चरण में क्रमशः एक नगण, दो जगण, एक रगण तथा अन्त में एक गुरु वर्ण होता है।

  • मालिनी छन्द

लक्षण- ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकै:।

स्पष्टीकरण- मालिनी छन्द एक सम वर्ण वृत छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में "न न म य य" अर्थात दो 'नगण' एक 'मगण' और दो 'यगण' के क्रम से 15 वर्ण होते हैं। आठवें और सातवें वर्णों पर यति होती है।

 

अत: यह स्पष्ट होता है की, किरातार्जुनीय के प्रथम सर्ग में वंशस्थ, पुष्पिताग्रा, मालिनी यह छन्द प्रयुक्त हैं।

62

"शमेन सिद्धिं मुनयो न भूभृतः" किरातार्जुनीय में यह वाक्य कहा गया है-

  1. ((a))

    युधिष्ठिर द्वारा

  2. ((b))

    द्रौपदी द्वारा

  3. ((c))

    वनेचर द्वारा

  4. ((d))

    सुयोधन द्वारा

Show Answer
Answer: ((b))

द्रौपदी द्वारा

स्पष्टीकरण - "शमेन सिद्धिं मुनयो न भूभृतः" किरातार्जुनीय में यह वाक्य द्रौपदी द्वारा कहा गया है। जो राजा युधिष्ठिर को कहती है।

प्रस्तुत पंक्ति किरातार्जुनीयम् महाकाव्य के श्लोक में उद्धृत है। जिसके रचयिता महाकवि भारवि है।

श्लोक -

विहाय शान्तिं नृप धाम तत्पुनः प्रसीद संधेहि वधाय विद्विषां ।

व्रजन्ति शत्रूनवधूय निःस्पृहाः शमेन सिद्धिं मुनयो न भूभृतः।।

अर्थ - हे राजन! शान्ति को त्याग कर आप (अपने) उस तेज को शत्रुओं के विनाश के लिए पुनः प्राप्त करें तथा प्रसन्न हों। निःस्पृह मुनि लोग (ही) शत्रुओं (कामादि मनोविकारों) को तिरस्कृत करके शान्ति के द्वारा सिद्धि की प्राप्ति करते हैं, आप जैसे राजा लोग नहीं।

अतः श्लोक से स्पष्ट है कि यहाँ द्रौपदी द्वारा उपरोक्त पंक्ति कही गयी।

63

किरातार्जुनीय में "सपत्नेन" पद किस अर्थ में प्रयुक्त हुआ है ?

  1. ((a))

    शत्रु के द्वारा

  2. ((b))

    सौत के द्वारा

  3. ((c))

    सखा के द्वारा

  4. ((d))

    पालक के द्वारा

Show Answer
Answer: ((a))

शत्रु के द्वारा

किरातार्जुनीयम्-

  • किरातार्जुनीयम् (अर्थ : किरात और अर्जुन की कथा) महाकवि भारवि द्वारा सातवीं शती ई. में रचित महाकाव्य है जिसे संस्कृत साहित्य के 'बृहत्त्रयी' में स्थान प्राप्त है।
  • महाभारत में वर्णित किरात वेशधारी शिव के साथ अर्जुन के युद्ध की लघुकथा को आधार बनाकर कवि ने राजनीति, धर्मनीति, कूटनीति, समाजनीति, युद्धनीति, जनजीवन आदि का मनोरम वर्णन किया है।
  • यह काव्य विभिन्न रसों से ओतप्रोत रचना है किन्तु वीर रस प्रधान है।
  • संस्कृत के छः प्रसिद्ध महाकाव्य हैं – किरातार्जनुयीयम्‌ (भारवि), शिशुपालवधम्‌ (माघ) और नैषधीयचरितम्‌ (श्रीहर्ष)– बृहत्त्रयी कहलाते हैं।

Important Points

श्लोक-  

कृतप्रणामस्य महीं महीभुजे जितां सपत्नेन निवेदयिष्यतः ।

न विव्यथे तस्य मनो न हि प्रियं प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः ॥2॥ 

 

श्लोक का अर्थ- (युधिष्ठिर को) प्रणाम कर चुकने पर शत्रु (दुर्योधन) के द्वारा जीती गई पृथ्वी (राज्य) के विषय (सम्बन्ध ) में राजा (युधिष्ठिर) से कहते हुए (निवेदन करते हुए) उस (गुप्तचर) का मन व्यथित (दुःखित, विचलित) नहीं हुआ। (यह युक्त ही था) क्योंकि 'हित (भलाई) चाहने वाले असत्य प्रिय (मधुर) वचन बोलना (कहना) नहीं चाहते (मिथ्या मधुर वचन बोलने की इच्छा नहीं करते )।

अत: उपर्युक्त स्पष्टीकरण से स्पष्ट होता है की, किरातार्जुनीय में "सपत्नेन" पद 'शत्रु के द्वारा' इस अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।

64

"राज्यविषविकारतन्द्राप्रदा राज्यलक्ष्मीः" सूक्ति उद्धृत है-

  1. ((a))

    उत्तररामचरित से

  2. ((b))

    नीतिशतक से

  3. ((c))

    वैराग्यशतक से

  4. ((d))

    शुकनासोपदेश से

Show Answer
Answer: ((d))

शुकनासोपदेश से

स्पष्टीकरण - राज्यविषविकारतन्द्राप्रदा राज्यलक्ष्मीः - यह सूक्ति शुकनासोपदेश ग्रन्थ में उद्धृत है।

  • महाकवि बाणभट्ट द्वारा विरचित कादम्बरी काव्य के अन्तर्गत शुकनासोपदेश ग्रन्थ आता है।
  • इस ग्रन्थ में शुकनास राजा का मन्त्री है। वह राजा तारापीड के पुत्र चन्द्रापीड को उपदेश देता है। इसलिए इसे शुकनासोपदेश कहा जाता है।
  • शुकनासोपदेश में उल्लिखित पंक्ति है - अहंकारदाहज्वरमूर्च्छान्धकारिता विह्वला हि राजप्रकृतिः। अलीकाभिमानोन्मादकारीणि धनानि, राज्यविषविकारतन्द्राप्रदा राजलक्ष्मीः। अर्थात् जिस प्रकार दाह ज्वर की मूर्च्छा से मनुष्य संज्ञाहीन हो जाते हैं, उसी प्रकार अहंकार से राजाओं की प्रकृति में भ्रान्ति उत्पन्न हो जाती है। धन तो झूठे अभिमान उन्मत्तता के जनक ही होते हैं। जिस प्रकार विष का नशा मनुष्यों में सुस्ती पैदा कर देता है, उसी प्रकार राज्य लक्ष्मी भी राज्य के मद से राजाओं में प्रमाद उत्पन्न करा देती है

 

इस तरह स्पष्ट है कि उपरोक्त सूक्ति शुकनासोपदेश ग्रन्थ में उद्धृत है।

65

कालिदास ने "वक्रः पन्था" किस के लिए प्रयुक्त किया है?

  1. ((a))

    विदिशा नगर के 

  2. ((b))

    दशार्ण देश के 

  3. ((c))

    उज्जयिनी नगर के 

  4. ((d))

    अलकापुरी के लिए

Show Answer
Answer: ((c))

उज्जयिनी नगर के 

स्पष्टीकरण

  • प्रकृत विशेषण कनिष्ठिकाधिष्ठित कवि कालिदास के प्रसिद्ध खण्डकाव्य मेघदूत के पूर्वमेघ से उद्धृत है।
  • यह काव्य पूर्वमेघ और उत्तरमेघ नामक दो भागों में विभाजित है।
  • जिसके अन्तर्गत अपनी प्रियतमा विरह से संतप्त यक्ष द्वारा संवाहक रूप में भेजे गये मेघ की यात्रा तथा यक्ष द्वारा दिये गये सन्देश का वर्णन है।

Important Points

श्लोक

वक्रः पन्था यदपि भवतः प्रस्थितस्योत्तराशां

सौधोत्सङ्गप्रणयविमुखो मा स्म भूरिज्जयिन्याः।

विद्युद्दमस्फुरितचकितैस्तत्र पौराङ्गानां

लोलापाङ्गैर्यदि न रमसे लोचनैर्वञ्चितो सि।।

  • अर्थ - प्रकृत श्लोक में यक्ष मेघ को उज्जयिनी नगरी से परिचय करने के लिए कहते हुए कि उत्तर दिशा में प्रस्थान किये जाने वाले आपका मार्ग घुमावदार अवश्य होगा तथापि उज्जयिनी की अट्टालिकाओं के परिचय से विमुख मत होना। वहाँ विद्युत् की चमक से चकित चञ्चल कटाक्षों वाली पौर सुन्दरियों के से यदि रमण नहीं करोगे, तो तुम वञ्चित हो जाओगे।

 

उपर्युक्त श्लोक से यह स्पष्ट है कि वक्रः पन्था उज्जयिनी नगरी के लिए प्रयुक्त हुआ है।

66

"सम्पत्सु महतां चित्तं भवत्युत्पलकोमलम्" यह सूक्ति कहाँ से ली गयी है ?

  1. ((a))

    किरातार्जुनीय

  2. ((b))

    अभिज्ञान शाकुन्तल

  3. ((c))

    शिशुपाल वध

  4. ((d))

    नीतिशतक

Show Answer
Answer: ((d))

नीतिशतक

स्पष्टीकरण - "सम्पत्सु महतां चित्तं भवत्युत्पलकोमलम्" यह सूक्ति नीति शतक ग्रन्थ में उद्धृत है। जिसके रचयिता भर्तृहरि है।

श्लोक-

समपत्सु महतां चित्तं भवत्युत्पल कोमलं

आपत्सु च महाशैलशिला संघात कर्कशं।।

अर्थ - महापुरुषों का मन समृद्धि की अवस्थाओं में कमल के समान कोमल होता है और विपत्ति में पर्वत की शिलाओं के समूह के समान कठोर हो जाता है। अर्थात् समृद्धि के समय मनुष्य को नम्रता और व्यवहार में कोमलता रखना चाहिये, जब कि विपत्तियों में दृढ़ता और धैर्य का सहारा लेना चाहिए।

अतः स्पष्ट है कि उपरोक्त सूक्ति नीति शतक में उद्धृत है।

67

"कोऽन्यो हुतवहात् प्रभवति दग्धुम्" यह वाक्य अभिज्ञान शाकुन्तल में कहा है

  1. ((a))

    अनसूया

  2. ((b))

    प्रियंवदा

  3. ((c))

    कण्वशिष्यः

  4. ((d))

    दुर्वासा

Show Answer
Answer: ((a))

अनसूया

स्पष्टीकरण

  • उक्ति - "कोऽन्यो हुतवहात् प्रभवति दग्धुम्"
  • अर्थ - अग्नि के अतिरिक्त और कौन जला सकता है।

Important Points

  • उपर्युक्त उक्ति कवि कुलगुरु कालिदास द्वारा रचित सर्वोत्कृष्ट नाटक अभिज्ञानशाकुन्तलम् के चतुर्थ अंक से उद्धृत है।
  • अभिज्ञानशाकुन्तलम् में सात अंक हैं। जिनमें भी चतुर्थांक अति महत्वपूर्ण अंक माना जाता है।
  • प्रकृत उक्ति भी इस नाटक के चतुर्थांक में दुर्वासा द्वारा शकुन्तला को शाप देने के पश्चात् अनुसूया  द्वारा कथित है।
  • अनुसूया कहती है कि - कोऽन्यो हुतवहात् प्रभवति दग्धुम् अर्थात् अग्नि के अतिरिक्त और कौन जला सकता है।

 

अतः उपर्युक्त वाक्य अभिज्ञानशाकुन्तलम् में अनुसूया ने कहा है।

68

"तेन पाठः पठ्यते" प्रयोग है-

  1. ((a))

    भाव वाच्य का

  2. ((b))

    कर्तृ वाच्य का

  3. ((c))

    कर्म वाच्य का

  4. ((d))

    इनमें से कोई नहीं

Show Answer
Answer: ((c))

कर्म वाच्य का

वाच्य - किसी वाक्य के वाच्य से ज्ञात होता है कि वाक्य में कर्ता, कर्म या भाव प्रधान है। संस्कृत में तीन वाच्य होते हैं-

१. कर्तृवाच्य २. कर्मवाच्य ३. भाववाच्य

वाच्यविशेषउदाहरण
कर्तृवाच्यप्रधान- कर्ता कर्ता- प्रथमा में कर्म- द्वितीया में क्रियापद- कर्तानुसार (धातु + प.प./आ.प.)अहं विद्यालयं गच्छामि।
कर्मवाच्यप्रधान- कर्म कर्ता- तृतीया में कर्म- प्रथमा में क्रियापद- कर्मानुसार, (धातु + य + आ.प.)तेन पाठः पठ्यते।
भाववाच्यप्रधान- भाव कर्ता- तृतीया में कर्म- नहीं होता क्रियापद- कर्मानुसार, (धातु + य + आ.प.), नित्य प्र.पु. ए.वबालकेन क्रीडयते।

 

प्रस्तुत वाक्य 'तेन पाठः पठ्यते।' में कर्ता तृतीया, कर्म प्रथमा और क्रियापद आत्मनेपदी है। इसलिए यह शुद्ध कर्मवाच्य वाक्य है।

69

"अष्टाशीतिः" शब्द का हिन्दी भाषा में शब्द बनता है

  1. ((a))

    अट्ठाइस

  2. ((b))

    अट्ठासी

  3. ((c))

    अडसठ

  4. ((d))

    अट्ठानवे

Show Answer
Answer: ((b))

अट्ठासी

स्पष्टीकरण - अष्टाशीतिः शब्द को हिन्दी भाषा में अट्ठासी लिखा जाता है।

संख्या पद - 88, हिन्दी में - अट्ठासी। संस्कृत में अष्टाशीतिः

अष्टाशीतिः अर्थात् अष्ट + अशीतिः (8 + 80 = 88)

अतः स्पष्ट है कि यहाँ अष्टाशीतिः शब्द को हिन्दी भाषा में अट्ठासी लिखा जाता है।

Additional Information

अन्य विकल्प-

  • अट्ठाइस - 28 (अष्टाविंशतिः)
  • अडसठ - 68 (अष्टषष्टिः)
  • अट्ठानवे - 98 (अष्टनवति)
70

'युष्मद्' शब्द के चतुर्थी विभक्ति, एकवचन का रूप है-

  1. ((a))

    तुभ्यम्

  2. ((b))

    त्वाम्

  3. ((c))

    त्वया

  4. ((d))

    त्वयि

Show Answer
Answer: ((a))

तुभ्यम्

‘युष्मद्’ का अर्थ ‘तुम’ होता है। इसका चतुर्थी विभक्ति, एकवचन में 'तुभ्यम्' रूप बनता है।

Hint

‘युष्मद्’ इस मध्यम पुरुष सर्वनाम शब्द का प्रयोग निम्नलिखित है - 

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमात्वम्युवाम्यूयम्
द्वितीयात्वाम्युवाम्युष्मान्
तृतीयात्वयायुवाभ्याम्युष्माभिः
चर्तुथीतुभ्यम्युवाभ्याम्युष्मभ्यम्
पञ्चमीत्वत्युवाभ्याम्युष्मत्
षष्ठीतवयुवयोःयुष्माकम्
सप्तमीत्वयियुवयोःयुष्मासु
71

'सर्व' शब्द का स्त्रीलिङ्ग, सप्तमी, एकवचन में रूप बनता है-

  1. ((a))

    सर्वस्मिन्

  2. ((b))

    सर्वस्याम्

  3. ((c))

    सर्वासु

  4. ((d))

    सर्वे

Show Answer
Answer: ((b))

सर्वस्याम्

स्पष्टीकरण - सर्व सर्वनाम शब्दरूप का स्त्रीलिङ्ग सप्तमी विभक्ति-एकवचन में सर्वस्याम् रूप बनता है।

अतः यहाँ सर्वस्याम् उचित विकल्प है।

Additional Information

सर्व (सभी) सर्वनाम शब्दरूप का स्त्रीलिंग में प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमासर्वासर्वेसर्वाः
द्वितीयासर्वेसर्वेसर्वाः
तृतीयासर्वयासर्वाभ्याम्सर्वाभिः
चतुर्थीसर्वस्यैसर्वाभ्याम्सर्वाभ्यः
पंचमीसर्वस्याःसर्वाभ्याम्सर्वाभ्यः
षष्ठीसर्वस्याःसर्वयोःसर्वासाम्
सप्तमीसर्वस्याम्सर्वयोःसर्वासु

 

अन्य विकल्प 

  • सर्वस्मिन् रूप सर्व सर्वनाम शब्द के पुल्लिंग शब्दरूप के सप्तमी विभक्ति-एकवचन का रूप है।
72

अम्बिकादत्तव्यास के पिता का नाम था

  1. ((a))

    देवदत्त

  2. ((b))

    राजाराम

  3. ((c))

    दुर्गादत्त

  4. ((d))

    प्रयागदत्त

Show Answer
Answer: ((c))

दुर्गादत्त

स्पष्टीकरण

  • आधुनिक संस्कृत-साहित्यकारों में अम्बिकादत्त व्यास अग्रगण्य कवि हैं।
  • जिनका शिवराजविजयम् नामक अत्यंत प्रसिद्ध और ऐतिहासिक संस्कृत उपन्यास है।
  • यह देशभक्ति से ओतप्रोत ग्रंथ है। जिसमें वीर रस की प्रधानता है।
  • इस उपन्यास में शिवाजी महाराज की विजय का वर्णन है।
  • अम्बिका दत्त के परिचय के विषय में इनका जन्म राजस्थान के जयपुर में हुआ।
  • इनके पिताजी का नाम दुर्गादत्त है, जो स्वयं महाकवि सम्मान से अलङ्कृत थे।

 

अतः स्पष्ट है कि इनके पिताजी का नाम दुर्गादत्त था।

73

"विद्युत्वन्तं ललितवनिताः" यह पंक्ति सम्बद्ध है-

  1. ((a))

    चम्पू काव्य से

  2. ((b))

    गीति काव्य से

  3. ((c))

    मुक्तक काव्य से

  4. ((d))

    महाकाव्य से

Show Answer
Answer: ((b))

गीति काव्य से

स्पष्टीकरण

  • प्रकृत श्लोकांश संस्कृत साहित्य के सर्वप्रसिद्ध कवि कालिदास के गीतिकाव्य मेघदूत से उद्धृत है।
  • यह काव्य पूर्वमेघ और उत्तरमेघ नामक दो भागों में वि���ाजित है।
  • जिसके अन्तर्गत अपनी प्रियतमा विरह से संतप्त यक्ष द्वारा संवाहक रूप में भेजे गये मेघ की यात्रा तथा यक्ष द्वारा दिये गये सन्देश का वर्णन है।
  • यह सम्पूर्ण ग्रंथ मन्दाक्रान्ता छन्द में है।

Important Points

उपर्युक्त श्लोकांश का श्लोक इस प्रकार है - 

विद्युत्वन्तं ललितवनिताः सेन्द्रचापं सचित्राः

सङ्गीताय प्रहतमुरजाः स्निग्धगम्भीरघोषम्।

अन्तस्तोयं मणिमयभुवस्तुङ्गमभ्रंलिहाग्राः

प्रासादास्त्वां तुलयितुमलं यत्र तैस्तैर्विशेषैः।।

अर्थ - अलका के महल अपने इन-इन गुणों से तुम्हारी होड़ करेंगे। तुम्हारे पास बिजली है, तो उनमें छबीली स्त्रियाँ हैं। तुम्हारे पास रंगीला इन्द्रधनुष है तो उनमें चित्र लिखे हैं। तुम्हारे पास मधुर गम्भीर गर्जन है, तो उनमें संगीत के लिए मृदंग ठनकते हैं। तुम्हारे भीतर जल भरा हैं, तो उनमें मणियों से बने चमकीले फर्श हैं। तुम आकाश में ऊँचे उठे हो तो वे गगनचुम्बी हैं।

अतः उपरोक्त श्लोकांश गीतिकाव्य मेघदूत से सम्बन्धित है।

74

"तन्वी श्यामा शिखरीदशना पक्वविम्बाधरोष्ठी" इसमें विशेषण प्रयुक्त हुए -

  1. ((a))

    शकुन्तला के 

  2. ((b))

    यक्षिणी के 

  3. ((c))

    कादम्बरी के 

  4. ((d))

    सीता के लिए

Show Answer
Answer: ((b))

यक्षिणी के 

स्पष्टीकरण

  • प्रस्तुत श्लोकांश संस्कृत साहित्य के काव्य सम्राट कवि कालिदास के गीतिकाव्य मेघदूत से उद्धृत है।
  • यह गीतिकाव्य अत्यंत प्रसिद्ध काव्य है ।
  • जिसके अन्तर्गत यह सम्पूर्ण काव्य पूर्वमेघ तथा उत्तरमेघ से दो भागों में विभक्त है।
  • यह सम्पूर्ण गीतिकाव्य मन्दाक्रान्ता छन्द में है।

Important Points

उपर्युक्त श्लोकांश का सम्पूर्ण श्लोक अर्थ सहित इस प्रकार है - 

तन्वी श्यामा शिखरीदशना पक्वबिम्बाधरोष्ठी

मध्येक्षामा चकितहरिणीप्रेक्षणा निम्नानाभिः।

श्रोणिभारादलसगमना स्तोकनम्रा स्तनाभ्यां

या तत्र स्याद्युवतिविषये सृष्टिराद्येव धातुः।।

  • अर्थ - प्रस्तुत श्लोक में यक्ष मेघ को अनेक विशेषताओं के द्वारा यक्षिणी परिचय देते हुए कहता है कि वहाँ जो पतली, साँवली, नुकीले दाँतों वाली, पके बिम्बफल के समान होंठों वाली, चित हरिणी के समान चितवन युक्त, गहरी नाभि वाली, नितम्बों के भार के कारण मध्यम गतिशीला, स्तनों के भार से थोड़ी झुकी हुई सी युवतियों के मध्य ब्रह्मा की पहली कृति के समान हो।

 

अतः उपर्युक्त श्लोकांश में सभी विशेषण यक्ष द्वारा यक्षिणी के लिए कहा गये हैं।

75

"त्वं जीवितं त्वमसि मे ह्रदयम्" यह उक्ति है-

  1. ((a))

    जानकी

  2. ((b))

    मेनका

  3. ((c))

    वासन्ती

  4. ((d))

    प्रियम्वदा

Show Answer
Answer: ((c))

वासन्ती

स्पष्टीकरण

  • प्रकृत उक्ति कवि भवभूति द्वारा रचित नाटक उत्तररामचरित से है।
  • यह नाटक सात अङ्कों में निबद्ध है।
  • यह सम्पूर्ण नाटक करूणरस प्रधान काव्य है।
  • प्रकृत उक्ति इस काव्य के तृतीयाङ्क से उद्धृत है।

Important Points

प्रकृत श्लोक इस प्रकार है - 

त्वं जीवितं, त्वमसि मे हृदयं, द्वितीयं

त्वं कौमुदी नयनयोरमृतं त्वमङ्गे।

इत्यादिभिः प्रियशतैरनुध्य मुग्धां 

तामेव शान्तमथवा किमतः परेण।

अर्थ -  प्रकृत श्लोक वासन्ती द्वारा कहा गया है, जिसमें वह राम के द्वारा सीता के प्रति कहे गये वचनों को कहने के लिए मना करती हुए कहती है कि तुम ही मेरा जीवन हो, तुम ही मेरा दूसरा हृदय हो, तुम मेरे नेत्रों की चाँदनी हो, तुम मेरे शरीर पर अमृत हो इत्यादि सैकड़ों वचनों के द्वारा भोली भाली सीता को अनुनय करके उन्हीं को या बस आप शान्त रहें। (क्याेंकि अब इसके) आगे कहने से क्या लाभ..।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि उपरोक्त उक्ति उत्तररामचरित के तृतीयाङ्क में वासन्ती द्वारा कही गयी है।

76

व्याकरण में कर्म का मुख्य लक्षण क्या कहा गया है ?

  1. ((a))

    तथायुक्तं चानीप्सितम्।

  2. ((b))

    अकथितञ्च।

  3. ((c))

    कर्तुरीप्सिततमं कर्म।

  4. ((d))

    ह्रक्रोरन्यतरस्याम्।

Show Answer
Answer: ((c))

कर्तुरीप्सिततमं कर्म।

कर्म - वाक्य में कर्ता के सबसे अभीष्ट होता है उसे कर्म कहते है।

कर्म का लक्षण - कर्त्ता क्रिया के द्वारा जिसको सबसे अधिक चाहता है, उसकी 'कर्तुरीप्सिततमं कर्म' इस सूत्र से कर्म संज्ञा होती है तथा कर्म में द्वितीया विभक्ति आती है।

उदाहरण - 'अनुजः कथां लिखति।' इस वाक्य में 'कथां' इस वाक्य का कर्म है और 'लिखति' क्रिया है। दोनों में व्यवधानरहित सम्बन्ध है, अर्थात कर्ता 'अनुजः' क्रिया 'लिखति' के द्वारा कर्म 'कथां' को प्राप्त कर रहा है, सम्बंधित हो रहा है।

अतः इस वाक्य में 'कर्तुरीप्सिततमं कर्म' से इस सूत्र से कर्म का मुख्य लक्षण स्पष्ट होता है।

77

निम्नलिखित में से 89 का संस्कृत में शुद्ध शब्द होगा

  1. ((a))

    नवाशीतिः

  2. ((b))

    एकोननवतिः

  3. ((c))

    ऊननवतिः

  4. ((d))

    उपर्युक्त तीनों

Show Answer
Answer: ((d))

उपर्युक्त तीनों

स्पष्टीकरण -

  • 89 के लिए संस्कृत में इन तीनों शब्दों का उपयोग किया जाता है।
  • 89 - नवाशीतिः (9 + 80 = 89),
  • एकोननवतिः (एकोननवति का अर्थ होता है, 90 से एक कम - 90 - 1 = 89)
  • ऊननवतिः ( ऊन का अर्थ होता है एक कम - 90 - 1 = 89)

  

अतः यहाँ उपर्युक्त तीनों सही उत्तर है।

78

'ग्रीष्म + ऋतु' इत्यत्र संधिरूपंं अस्ति-

  1. ((a))

    ग्रीष्मर्तुः

  2. ((b))

    ग्रीष्मर्तः

  3. ((c))

    ग्रीष्मरतौ

  4. ((d))

    ग्रीष्मऋतौ

Show Answer
Answer: ((a))

ग्रीष्मर्तुः

प्रश्नानुवाद - 'ग्रीष्म + ऋतु' यहाँ संधि रूप है-

स्पष्टीकरण - ग्रीष्म + ऋतु में सन्धि करने पर ग्रीष्मर्तुः शब्द बनेगा। यहाँ गुण सन्धि हुयी है।

सन्धिविच्छेद - ग्रीष्म + ऋतु

शब्द - ग्रीष्मर्तुः।

सूत्र - आद् गुणः।

नियम - जब प्रथम पद के अन्त में अ या आ आवे और उसके बाद उ या ऊ आता है तो, वहाँ दोनों के स्थान पर ओ आदेश होता है।

  • अ, आ + इ, ई = ए
  • अ, आ + उ, ऊ = ओ
  • अ, आ + ऋ, ऋृ = अर्
  • अ, आ + लृ = अल्

उदाहरण-

  • हित + उपदेशः - हितोपदेशः (यहाँ प्रथम पद के अन्त में अ + बाद में उ आया है, जहाँ दोनों के स्थान पर ओ आदेश हो गया।)
  • यहीं नियम ग्रीष्म + ऋतु शब्द में लगा है। (जहाँ प्रथम पद के अन्त में अ + बाद में ऋ स्वर है, जिससे अर् आदेश होकर ग्रीष्मर्तुः शब्द बना।)
  • ग्रीष्म् + अर् + तुः - ग्रीष्मर् + तुः - ग्रीष्मर्तुः।

 

अतः स्पष्ट है कि ग्रीष्म + ऋतु में सन्धि करने पर ग्रीष्मर्तुः शब्द बनेगा।

79

लता शब्दरूप में 'लते' इस शब्द की आवृत्ति हुई है-

  1. ((a))

    तीन बार

  2. ((b))

    चार बार

  3. ((c))

    पाँच बार

  4. ((d))

    छः बार

Show Answer
Answer: ((b))

चार बार

स्पष्टीकरण - लता शब्दरूप में 'लते' शब्द की आवृत्ति तीन बार हुई है।

लता आकारान्त स्त्रीलिंग शब्दरूप है। इस शब्द के प्रथमा और द्वितीया विभक्ति के द्विवचन एवं सम्बोधन के एकवचन, द्विवचन में लते रूप बनता है। इस तरह कुल चार बार लते शब्द की आवृत्ति होती है।

अतः स्पष्ट है कि लता शब्दरूप में 'लते' शब्द की आवृत्ति चार बार हुई है।

Additional Information

लता आकारान्त स्त्रीलिंग शब्दरूप का प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमालतालतेलताः
द्वितीयालताम्लतेलताः
तृतीयालतयालताभ्याम्लताभिः
चतुर्थीलतायैलताभ्याम्लताभ्यः
पञ्चमीलतायाःलताभ्याम्लताभ्यः
षष्ठीलतायाःलतयोःलतानाम्
सप्तमीलतायाम्लतयोःलतासु
सम्बोधनहे लते!हे लते!हे लताः!
80

लभेरन् पद का धातु, लकार, पुरुष, वचन का सही विकल्प चुनिए-

  1. ((a))

    लभ् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन

  2. ((b))

    लभ् धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन

  3. ((c))

    लभ् धातु, लोट लकार, प्रथम पुरुष एकवचन

  4. ((d))

    लभ् धातु, लङ् लकार, मध्यम पुरुष द्विवचन

Show Answer
Answer: ((b))

लभ् धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन

स्पष्टीकरण -

  • शब्द - लभेरन् (लभ् धातु) (लभ् - पाना)
  • लभेरन् पद में लभ् धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष और बहु वचन है। अतः लभ् धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन सही उत्तर होगा।

Additional Information

लभ् (पाना) धातुरूप का प्रयोग विधिलिङ् लकार में निम्नलिखित है-

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमपुरुषलभेतलभेयाताम्लभेरन्
मध्यम पुरुषलभेथाःलभेयाथाम्लभेध्वम्
उत्तम पुरुषलभेयलभेवहिलभेमहि

दिए गए अन्य विकल्पों में ये रूप बनेंगे -

  • लभ् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन - लभन्ते
  • लभ् धातु, लोट लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन - लभताम्
  • लभ् धातु, लङ् लकार, मध्यम पुरुष, द्विवचन - अलभेथाम्
81

किरातार्जुनीय के प्रथम सर्ग में पद्यों की संख्या है

  1. ((a))

    45

  2. ((b))

    44

  3. ((c))

    46

  4. ((d))

    101

Show Answer
Answer: ((c))

46

स्पष्टीकरण

  • भारवेरर्थगौरवम् उक्ति से अलङ्कृत कवि भारवि द्वारा रचित एकमात्र महाकाव्य किरातार्जुनीयम् है।
  • यह महाकाव्य 18 सर्गों में निबद्ध है।
  • जिसमें प्रत्येक सर्ग का अन्त लक्ष्मी पद से हुआ है।
  • इस ग्रंथ का प्रथम सर्ग में पद्यों की संख्या 46 है।
  • जिनके अन्तर्गत पहले 44 पद्य वंशस्थ छन्द में, 45वां पद्य पुष्पिताग्रा छन्द में और 46वां पद्य मालिनी छन्द में है।

 

अतः उपर्युक्त जानकारी से यह स्पष्ट है कि किरातार्जुनीयम् के प्रथम सर्ग में पद्यों की संख्या 46 हैं।

82

"बाणस्तु पञ्चाननः" यह सूक्ति किसने कही है ?

  1. ((a))

    चन्द्रदेव ने

  2. ((b))

    मल्लिनाथ ने

  3. ((c))

    जयदेव ने

  4. ((d))

    माघ ने

Show Answer
Answer: ((a))

चन्द्रदेव ने

स्पष्टीकरण

  • संस्कृत साहित्य-सागर में गद्यकाव्य में कवि बाण का अत्यंत उत्कृष्ट स्थान है।
  • कवि बाण की गद्य रचना कादम्बरी कवि की वह गद्य काव्य रचना है जिसके कारण वह संस्कृत साहित्य में प्रसिद्ध हुए।
  • जिसने बाण को अनेक कवियों द्वारा उक्त सूक्ति सम्मान से अलङ्कृत किया।

Important Points

उन्हीं सूक्ति सम्मान में एक प्रशस्ति पद्य कवि चन्द्रदेव द्वारा शार्ङ्गधरपद्धति में कहा गया है। जो इस प्रकार है - 

श्लेषे केचन शब्द गुम्फविषये केचिद्रसे चापरे-

लङ्कारे कतिचित् सदर्थविषये चान्ये कथावर्णने।

आः सर्वत्र गम्भीर धीर कविता विन्ध्यावटी चातुरी

संचारी कविकुम्भिकुभाभिदुरो बाणस्तु पञ्चानननः।।

  • अर्थ  - कुछ श्लेष के प्रयोग में सिद्धहस्त हैं, कुछ शब्दों के गुम्फन में, कुछ रस और अलङ्कार में, कुछ स��न्दर अर्थ के विषय में तथा कुछ कथा वर्णन में निपुण है, परन्तु बाण तो सब स्थानों पर गंभीर कविता रूपी विन्ध्याटवी में निपुणतापूर्वक विचरण करने वाला तथा कविरूपी हाथियों के कपोलों को भेदने वाला सिंहराज है।

 

अतः उपर्युक्त जानकारी से स्पष्ट है कि उपरोक्त सूक्ति चन्द्रदेव द्वारा कही गयी है।

83

"क्रियासु युक्तैर्नृप" यहाँ नृप पद से सम्बोधित किया गया है-

  1. ((a))

    भीमसेन को

  2. ((b))

    युधिष्ठिर को

  3. ((c))

    अर्जुन को

  4. ((d))

    भीष्म को

Show Answer
Answer: ((b))

युधिष्ठिर को

स्पष्टीकरण - "क्रियासु युक्तैर्नृप" यहाँ नृप पद से युधिष्ठिर को सम्बोधित किया गया है। यह पंक्ति किरातार्जुनीयम् महाकाव्य की है।

किरातार्जुनीयम् महाकाव्य के रचयिता महाकवि भारवि है। यहाँ क्रियासु युक्तैर्नृप 'युधिष्ठिर' के लिये प्रयुक्त है। जैसै कि श्लोक में कहा गया है-

श्लोक- 

क्रियासु युक्तैर्नृप चारचक्षुषो न वञ्चनीयाः प्रभवोऽनुजीविभिः।

अतोऽर्हसि क्षन्तुमसाधु साधु वा हितं मनोहारि चे दुर्लभ वचः॥

अर्थकोई कार्य पूरा करने के लिए नियुक्त किये गए सेवकों का यह परम कर्त्तव्य है कि वे दूतों की आँखों से ही देखने वाले अपने स्वामी को (झूठी और प्रिय बातें बता कर) न ठगें। इसलिए मैं जो कुछ भी अप्रिय अथवा प्रिय बातें कहूँ, उन्हें आप क्षमा करेंगे, क्योंकि सुनने में मधुर तथा परिणाम में कल्याण देने वाली वाणी दुर्लभ होती है।

गुप्तचर राजा के नेत्र होते हैं। जिस प्रकार नेत्र के द्वारा देखा हुआ प्रमाण होता है, उसी प्रकार गुप्तचर का वचन भी राजा के लिये प्रमाण होता है।

अतः स्पष्ट है कि "क्रियासु युक्तैर्नृप" यहाँ नृप पद से युधिष्ठिर को सम्बोधित किया गया है।

84

शास्त्रजल के प्रक्षालन से निर्मल बुद्धि भी कालुष्य को प्राप्त होती है-

  1. ((a))

    यौवनारम्भ में

  2. ((b))

    वृद्धावस्था में

  3. ((c))

    शैशवावस्था में

  4. ((d))

    विद्यारम्भ में

Show Answer
Answer: ((a))

यौवनारम्भ में

स्पष्टीकरण - शास्त्रजल के प्रक्षालन से निर्मल बुद्धि भी यौवनावस्था में कालुष्य को प्राप्त होती है। यह पंक्ति शुकनासोपदेश में उल्लिखित है।

  • महाकवि बाणभट्ट द्वारा विरचित कादम्बरी काव्य के अन्तर्गत शुकनासोपदेश ग्रन्थ आता है।
  • इस ग्रन्थ में शुकनास राजा तारापीड का मन्त्री है। वह राजा तारापीड के पुत्र चन्द्रापीड को उपदेश देता है। इसलिए इसे शुकनासोपदेश कहा जाता है।

शुकनासोपदेश में उल्लिखित पंक्ति है -

  • पंक्ति - यौवनारम्भे च प्रायः शास्त्रजलप्रक्षालननिर्मलापि कालुष्यमुपयाति बुद्धिः। अनुज्झितधवलतापि सरागैव भवति यूनां दृष्टिः।
  • अर्थ - शास्त्रों के मनन से उत्पन्न ज्ञानरूपी जल से धुल जाने के कारण युवकों की विशुद्ध बुद्धि भी जवानी चढ़ने पर बहुधा दूषित हो जाती है। सफेदी के नहीं छोड़ने पर भी युवकों की दृष्टि लालिमा से पूर्ण रहती है। अर्थात् नौजवानों की पवित्र दृष्टि भी वासना के मद से मतवाली हो जाती है।

 

अतः स्पष्ट है कि शास्त्रजल के प्रक्षालन से निर्मल बुद्धि भी यौवनावस्था में कालुष्य को प्राप्त होती है। यह पंक्ति शुकनासोपदेश में उद्धृत है।

85

उत्तररामचरित के तृतीयाङ्क में नाट्यसन्धि है

  1. ((a))

    मुख

  2. ((b))

    प्रतिमुख

  3. ((c))

    विमर्श

  4. ((d))

    गर्भ

Show Answer
Answer: ((d))

गर्भ

स्पष्टीकरण

  • प्रकृत उक्ति कवि भवभूति द्वारा रचित नाटक उत्तररामचरित से है।
  • यह नाटक सात अङ्कों में निबद्ध है।
  • यह सम्पूर्ण नाटक करूणरस प्रधान काव्य है।
  • प्रकृत उक्ति इस काव्य के तृतीयाङ्क से उद्धृत है।
  • इस नाटक का तृतीयाङ्क गर्भाङ्क है, जिसमें गर्भ नामक सन्धि है।
  • गर्भ सन्धि के अन्तर्गत पूर्व सन्धियों में दृष्ट तथा नष्ट बीज का बार-बार अन्वेषण होता है
  • जहाँ तृतीयाङ्क में राम का वियोग तथा सीता का अदृश्य स्थिति में होना एक बार पुनः उनके मिलन को पुष्ट करता है।

 

अतः उपर्युक्त जानकारी के अनुसार तृतीयाङ्क में गर्भ नामक नाट्य सन्धि है।

86

"सवर्णलिङ्गी विदितः समाययौ" यहाँ "वर्णलिङ्गी" शब्द का अर्थ है-

  1. ((a))

    नानावर्ण शबल

  2. ((b))

    ब्राह्मण

  3. ((c))

    ब्रह्मचारी

  4. ((d))

    दूत

Show Answer
Answer: ((c))

ब्रह्मचारी

स्पष्टीकरण -

  • भारवेरर्थगौरवम् उक्ति से अलङ्कृत कवि भारवि द्वारा रचित एकमात्र ग्रंथ किरातार्जुनीयम् है।
  • यह महाकाव्य 18 सर्गों में निबद्ध है।
  • जिसमें प्रत्येक सर्ग का अन्त लक्ष्मी पद से हुआ है।
  • इस ग्रंथ का प्रथम सर्ग में पद्यों की संख्या 46 है।
  • जिनके अन्तर्गत 44पद्य वंशस्थ छन्द तथा 45 वां पद्य पुष्पिताग्रा और 46 वां पद्य मालिनी छन्द में है।
  • उपर्युक्त श्लोकांश प्रथम सर्ग का मंगलाचरण श्लोक है।

<br>

Important Points

जो इस प्रकार है -

श्रिय कुरुणामधिपस्य पालनीं प्रजासु वृत्तिं यमयुक्त वेदितुम् ।

सः वर्णलिङ्गी विदित समाययौ युधिष्ठिरं द्वैतवने वनेचरः ।।

अर्थ - कुरुदेश के राजा की राजलक्ष्मी की राज व्यवस्था का पालन करने वाली प्रजा नीति को जानने के लिए युधिष्ठिर ने जिस गुप्तचर को नियुक्त किया था, वह वेषधारी ब्रह्मचारी किरात दुर्योधन के सम्पूर्ण वृतान्त को जानकर युधिष्ठिर के पास पुनः लौट आया।

उपर्युक्त श्लोक में वर्णलिङ्गी से अभिप्राय ब्रह्मचारी से है।

अतः इस प्रकार उपर्युक्त श्लोक से स्पष्ट है कि वर्णलिङ्गी शब्द का अर्थ ब्रह्मचारी से है।

87

"सखि आवां तावदुत्कण्ठां विनोदमिष्यावः" आयी हुई यह उक्ति किसने कही है ?

  1. ((a))

    अनसूया ने

  2. ((b))

    प्रियंवदा ने

  3. ((c))

    गौतमी ने

  4. ((d))

    शकुन्तला ने

Show Answer
Answer: ((b))

प्रियंवदा ने

स्���ष्टीकरण - सखि आवां तावदुत्कण्ठां विनोदमिष्यावः - यह उक्ति प्रियंवदा द्वारा कही गयी है।

Important Points

उक्ति - "सखि आवां तावदुत्कण्ठां विनोदमिष्यावः"

अर्थ - सखि। हम दोनों अपने दुःख को किसी प्रकार से दूर कर लेंगे।

  • उपर्युक्त उक्ति कवि कुलगुरु कालिदास द्वारा रचित सर्वोत्कृष्ट नाटक अभिज्ञानशाकुन्तलम् के चतुर्थ अंक से उद्धृत है।
  • अभिज्ञानशाकुन्तलम् में सात अंक हैं। जिनमें भी चतुर्थांक अति महत्वपूर्ण अंक माना जाता है।
  • प्रकृत उक्ति भी इस नाटक के चतुर्थांक से है, जो प्रियंवदा द्वारा उक्त है।

 

अतः उपर्युक्त उक्ति प्रियंवदा द्वारा उक्त है।

88

'यद्यपि' पद का सन्धि विच्छेद है-

  1. ((a))

    यदि + अपि

  2. ((b))

    यदी + अपि

  3. ((c))

    यद् + अपि

  4. ((d))

    यद्य + पि

Show Answer
Answer: ((a))

यदि + अपि

शब्द- यद्यपि

सन्धि विच्छेद- यदि + अपि

नियम- इ + अ = य (यण सन्धि)

सूत्र- इको यणचि। 

सूत्र स्पष्टीकरण- 'इको यणचि' सूत्र के अनुसार इक् (इ, उ, ऋ और लृ) से परे कोई भी असमान स्वर आए तो क्रमशः य्, र्, ल्, व् हो जाता है।

नियम -

  1. इ/ई + स्वर = य् + स्वर
  2. उ/ऊ + स्वर = व् + स्वर
  3. ऋ/ॠ + स्वर = र् + स्वर
  4. लृ + स्वर = ल् + स्वर

उदाहरण - 

  • यद्यपि = यदि + अपि
  • अन्वय = अनु + अयः
  • पित्रादेश = पितृ + आदेश

इससे यह स्पष्ट होता है कि 'यदि + अपि' में 'इ' और 'अ' यण सन्धि होकर 'इ' का 'य्' होता है और वह पूर्व 'द्', 'अ' के साथ एकरूप होता है।

Additional Information

सन्धि - दो वर्णों के संयोग से होने वाले परिवर्तन को सन्धि कहते हैं। जैसे-

  • विद्या + आलय = विद्यालय।
  • रमा + ईश = रमेश
  • न + एकः = नैकः
  • सम्यक् + ज्ञानम् = सम्यग्ज्ञानम्

सन्धि के प्रकार -

सन्धिपरिभाषाउदाहरण
स्वरसन्धिस्वर वर्ण  का संयोग स्वर वर्ण से होने पर जो विकार उत्पन्न होता है।विद्या + आलय = विद्यालय महा + औषधि =  महौषधि
व्यंजनसन्धिव्यंजन वर्ण का संयोग व्यंजन या स्वर वर्ण से होने पर जो विकार उत्पन्न होता है।उत् + लास = उल्लास तत् + लय = तल्लयः
विसर्गसन्धिविसर्ग का संयोग स्वर या व्यंजन वर्ण से होने पर जो विकार उत्पन्न होता है।दुः + आत्मा = दुरात्मा मनः + रथः = मनोरथः
89

'भानु' शब्दस्य प्रथमा विभक्तौ बहुवचने रूपं भवति-

  1. ((a))

    भान्वः

  2. ((b))

    भानुवः

  3. ((c))

    भानवः

  4. ((d))

    भानूनि

Show Answer
Answer: ((c))

भानवः

प्रश्नानुवाद - भानु शब्द का प्रथमा विभक्ति में बहुवचन में रूप होता है-

स्पष्टीकरण - भानु (सूर्य) शब्द उकारान्त पुल्लिंग शब्द है। जिसकी प्रथमा विभक्ति बहुवचन में भानवः रूप बनता है।

अतः यहाँ भानवः उचित विकल्प है।

Additional Information

भानु (सूर्य) उकारान्त पुल्लिंग शब्दरूप का प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवच���द्विवचनबहुवचन
प्रथमाभानुःभानूभानवः
द्वितीयाभानुम्भानूभानून्
तृतीयाभानुनाभानुभ्याम्भानुभिः
चतुर्थीभानवेभानुभ्याम्भानुभ्यः
पञ्चमीभानोःभानुभ्याम्भानुभ्यः
षष्ठीभानोःभान्वोःभानूनाम्
सप्तमीभानौभान्वोःभानुषु
सम्बोधनहे भानो!हे भानू!हे भानवः!
90

"तत्पुरुषः" सूत्र है

  1. ((a))

    अधिकारसूत्र

  2. ((b))

    संज्ञासूत्र

  3. ((c))

    समास सूत्र

  4. ((d))

    निपात सूत्र

Show Answer
Answer: ((a))

अधिकारसूत्र

स्पष्टीकरण -

  • तत्पुरुषः - यह एक अधिकार सूत्र है। जो यह बताता है कि इस सूत्र से लेकर तत्पुरुष समास का प्रकरण समाप्त होने तक इस सूत्र का अधिकार है। अर्थात् वहाँ तत्पुरुष समास होगा।

 

अतः यहाँ अधिकार सूत्र सही उत्तर है।

Additional Information

पाणिनि द्वारा रचित अष्टाध्यायी ग्रन्थ में 6 प्रकार के सूत्रों की गणना की गई है। जो निम्नलिखित है।  

सूत्रों के ���्रकारअर्थ
1. संज्ञा सूत्रजिस सूत्र से किसी चीज का कोई एक विशिष्ट नाम रखा जाता है, उस सूत्र को संज्ञा सूत्र कहते हैं।
2. परिभाषा सूत्रअष्टाध्यायी के सूत्रों के उपयोग से हम जो भी प्रक्रिया करते हैं, उस प्रक्रिया में बहुत बार संभ्रम की परिस्थिति निर्माण हो जाती है। तो ऐसी संभ्रम की परिस्थिति में परिभाषा सूत्र हमारा मार्गदर्शन करता है।
3. विधि सूत्रकर्तव्य का उपदेश करने वाला सूत्र विधि सूत्र होता है। अर्थात् जो सूत्र कोई कार्य करने को कहता है, जैसे कि – किसी वर्ण को हटाना, वह विधि सूत्र कहलाता है।
4. नियम सूत्रकिसी एक सूत्र की व्याप्ति यदि बहुत सारी जगह पर होती हो, और उसे किसी सूत्र से रोक कर संकुचित (सीमित) किया जाए तो उस सूत्र को नियम सूत्र कहते हैं।
5. अतिदेश सूत्रजो जैसा नहीं है उसे वैसा बनाने के का काम अतिदेश सूत्र करते हैं।
6. अधिकार सूत्रअधिकार सूत्र को खुद का कोई महत्त्वपूर्ण अर्थ नहीं होता है, तथापि किसी अनुवृत्ति की तरह काम करके आगामी सूत्रों का मार्गदर्शन करता है। अधिकार सूत्र की व्याप्ति आगामी सम्पूर्ण अध्याय अथवा पाद तक हो सकती है।
91

विद्वानों के समाज में अपण्डितों का आभूषण है-

  1. ((a))

    मौन

  2. ((b))

    वाचालता

  3. ((c))

    अज्ञताज्ञापन

  4. ((d))

    स्वातन्त्र्य

Show Answer
Answer: ((a))

मौन

स्पष्टीकरण - विद्वानों के समाज में मूर्खों/अपण्डितों का आभूषण मौन है। इससे सम्बन्धित श्लोक नीति शतक में उद्धृत है। जिसके रचयिता भर्तृहरि है। इस ग्रन्थ के अनुसार मूर्खों का आभूषण मौन है। जैसा कि श्लोक में कहा गया है-

श्लोक-

स्वायत्तमेकान्तगुणं विधात्रा विनिर्मितं छादनमज्ञतायाः।      

विशेषतः सर्वविदां समाजे विभूषणं मौनमपण्डितानाम्॥

अर्थ - अपनी मूर्खता को छिपाने के लिए भगवान ने मूर्खों को मौन धारण करने का एक अद्भुत सुरक्षा कवच दिया है, जो उनके अधीन भी है। विद्वानों से भरी सभा में मौन रहना मूर्खों के लिये आभूषण से कम नहीं है। 

श्लोक से स्पष्ट है कि नीतिशतक के अनुसार मूर्खों का आभूषण मौन है।

अतः स्पष्ट है कि विद्वानों के समाज में अपण्डितों का आभूषण मौन है।

92

अधोलिखित में से कण्व ने नहीं कहा है-

  1. ((a))

    भर्तुर्बहुमता भव

  2. ((b))

    शुश्रूषस्व गुरुन्

  3. ((c))

    भूयिष्ठं भव दक्षिणा परिजने

  4. ((d))

    अवेहि तनयां ब्रह्मन्नग्नि गर्भा शमीमिव

Show Answer
Answer: ((d))

अवेहि तनयां ब्रह्मन्नग्नि गर्भा शमीमिव

स्पष्टीकरण

  • उपर्युक्त उक्ति कवि कुलगुरु कालिदास द्वारा रचित सर्वोत्कृष्ट नाटक अभिज्ञानशाकुन्तलम् के चतुर्थ अंक से उद्धृत है।
  • अभिज्ञानशाकुन्तलम् में सात अंक हैं। जिनमें भी चतुर्थांक अति महत्वपूर्ण अंक माना जाता है।
  • जहाँ चतुर्थांक में शकुन्तला की विदाई का वर्णन है।
  • वहीं उपर्युक्त विकल्पों में से अवेहि तनयां ब्रह्मन्नग्नि गर्भा शमीमिव उक्ति कण्व द्वारा नहीं कही गयी है, अपितु यह एक आकाश वाणी है जिसे प्रियंवदा अनुसूया को बताती है।

Important Points

जो इस प्रकार है - 

दुष्यन्तेहितं तेजो दधानां भूतये भुवः।

अवेहि तनया ब्रह्माग्निगर्भां शमीमिव।।

अर्थ -  हे ब्रह्मन्। दुष्यन्त द्वारा स्थापित तेज को पृथ्वी के कल्याण के लिए धारण करने वाली अपनी पुत्री को छिपी हुई अग्नि से युक्त शमीवृक्ष के समान समझें।

अतः स्पष्ट है कि अवेहि तनया ब्रह्माग्निगर्भां शमीमिव यह उक्ति कण्व द्वारा नहीं कही गयी है।

93

निम्नलिखित में से शुद्ध है-

  1. ((a))

    कुमुदनी

  2. ((b))

    कुमुदिनी

  3. ((c))

    कुमूदनी

  4. ((d))

    कूमुदिनी

Show Answer
Answer: ((b))

कुमुदिनी

स्पष्टीकरण

  • कुमुदनी एक प्रकार का पुष्प है रात में खिलता है और सुबह मुरझा जाता है।
  • जिसका वर्णन अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक के चतुर्थ वर्णन में भी मिलता है।

जहाँ यह श्लोक इस प्रकार है - 

अन्तर्हिते शशिनि सैव कुमुद्वती मे दृष्टिं न नन्दयति संस्मरणयीशोभा।

इष्टप्रवासजनितान्यबलाजनस्य दुःखानि नूनमतिमात्रसुदुःसहानि।।

अर्थ - अर्थात् चन्द्रमा के के अस्त होने पर वही कुमुदिनी स्मरणीय शोभायुक्त होने से मेरी दृष्टि को अब आह्लादित नहीं कर रही है। क्योंकि स्त्रियों को अपने इष्ट व्यक्ति के प्रवास से उत्पन्न दुख अत्यंत कष्टकारी होता है।

अतः उपर्युक्त श्लोक के आधार पर कुमुदिनी पद शुद्ध है।

94

शुद्धं वाक्यं वर्तते-

  1. ((a))

    वृकान् बिभेति

  2. ((b))

    वृकेन बिभेति

  3. ((c))

    वृकात् भेन्ति

  4. ((d))

    वृकात् बिभेति

Show Answer
Answer: ((d))

वृकात् बिभेति

प्रश्नानुवाद - शुद्ध वाक्य है-

स्पष्टीकरण - दिये गये विकल्पों में वृकात् बिभेति शुद्ध वाक्य है। जिसका अर्थ होता है - भेड़िये से डरता है

यहाँ भय के अर्थ में वृक शब्द में पञ्चमी विभक्ति लगी है।

'भीत्रार्थानां भयहेतुः' इस सूत्र के अनुसार भय और रक्षा के अर्थवाली धातुओं के साथ भय के कारण में पञ्चमी लगती है।

इसी नियमानुसार यहाँ भेड़िया भय का कारण है, जिसमें पंचमी विभक्ति लगी।

अतः स्पष्ट है कि यहाँ वृकात् बिभेति शुद्ध वाक्य है।

95

"न हि प्रियं प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः" यह वचन कथित है-

  1. ((a))

    वनेचर के द्वारा

  2. ((b))

    युधिष्ठिर के द्वारा

  3. ((c))

    दुर्योधन के द्वारा

  4. ((d))

    किरात के द्वारा

Show Answer
Answer: ((a))

वनेचर के द्वारा

स्पष्टीकरण - "न हि प्रियं प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः" यह वचन वनेचर के द्वारा कहा गया। जिसका नाम किरात है।

प्रस्तुत पंक्ति किरातार्जुनीयम् महाकाव्य के श्लोक की पंक्ति है। इसके रचयिता महाकवि भारवि है।

श्लोक -

कृतप्रणामस्य महीं महीभुजे जितां सपत्नेन निवेदयिष्यतः ।

न विव्यथे तस्य मनो न हि प्रियं प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः।।

अर्थ - उस समय के लिए उचित प्रणाम करने के अनन्तर शत्रुओं (कौरवों) द्वारा अपहृत पृथ्वीमण्डल (राज्य) की यथातथ्य बातें राजा युधिष्ठिर से निवेदन करते हुए उस वनेचर किरात के मन को तनिक भी व्यथा नहीं हुई। (ऐसा क्यों न होता) क्योंकि किसी के कल्याण की अभिलाषा करने वाले लोग (सत्य बात को छिपा कर केवल उसे प्रसन्न करने के लिए) झूठ-मूठ की प्यारी बातें (बना कर) कहने की इच्छा नहीं करते हैं।

इस तरह श्लोक से स्पष्ट है कि उपरोक्त कथन वनेचर द्वारा कहा गया।

96

"जीर्णमङ्गे सुभाषितम्" यहाँ सुभाषित किसके अङ्ग में अङ्गस्थ हुआ ?

  1. ((a))

    विशाखदत्त के

  2. ((b))

    कालिदास के

  3. ((c))

    भर्तृहरि के

  4. ((d))

    भास के

Show Answer
Answer: ((c))

भर्तृहरि के

स्पष्टीकरण  - 

  • उपर्युक्त श्लोकांश भर्तृहरि द्वारा रचित प्रसिद्ध नीतिग्रंथ नीतिशतक से उद्धृत है।
  • जिसके अन्तर्गत नीति उपदेश के द्वारा मानव जीवन को मार्गदर्शित किया गया है।

 

Important Points

प्रकृत श्लोकांश भी इस ग्रंथ के श्लोक संख्या 2 से है। जो इस प्रकार है - 

बोद्धारोमत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः।

अबोधोपहताश्चान्ये जीर्णमङ्गे सुभाषितम्।।

अर्थ - प्रकृत श्लोक में कवि भर्तृहरि ने सुभाषितों को न समझने योग्य जनों के प्रति खेद प्रकट करते हुए कहा है कि विद्वज्जन अपने ज्ञान के कारण द्वेष से युक्त हैं, ऐश्वर्य से युक्त लोग जो सुभाषितों का आदर करते हैं, वे अपने अहंकार से युक्त हैं तथा जो साधारण लोग हैं, वे सुभाषितों को समझने योग्य नहीं है, इसलिए ये सदुक्तियाँ मेरे अंग में स्थित होकर ही जीर्ण हो रही है। 

अतः उपर्युक्त श्लोक के अनुसार उपरोक्त श्लोकांश भर्तृहरि के अङ्ग में अङ्गस्थ हुआ।

97

"कटे आस्ते" में कटे पद कैसा आधार है ?

  1. ((a))

    वै��यिक

  2. ((b))

    अभिव्यापक

  3. ((c))

    औपश्लेषिक

  4. ((d))

    अव्यापक

Show Answer
Answer: ((c))

औपश्लेषिक

‘आधारोऽधिकरणम्’ सूत्र से अधिकरण कारक होता है,और 'सप्तम्यधिकरणे च' इस सूत्र से अधिकरण कारक में सप्तमी विभक्ति होती है। इस सूत्र के अनुसार कर्ता और क्रियापद के संबध को अधिकरण कहते हैं। अधिकरण साक्षात क्रिया का आधार नही होता परन्तु कर्ता या कर्म के द्वारा क्रिया का आधार होता है। संस्कृत व्याकरण में पाणिनि आदि मुनियों ने आधार तीन प्रकार के बताये हैं -

  • औपश्लेषिक आधार:- जहाँ किञ्चित् क्षण के लिए संयोग हो। जैसे-
  • वयं कक्षायां तिष्ठामः। ( हम कक्षा में बैठते हैं।)
  • अभिव्यापक आधार:- जहाँ हमेशा का संयोग हो। जैसे:-
  • सर्वस्मिन् आत्मा अस्ति। (सबमें आत्मा रहती है।)
  • वैषयिक आधार:- किसी विषय विशेष का उल्लेख होने पर। जैसे:-
  • मम गणिते रुचिः अस्ति। (मेरी गणित में रुचि है।)

वाक्य 'कटे आस्ते' का अर्थ होता है 'चटाई पर बैठता है।' जो कुछ समय के लिए होने के कारण यहाँ 'औपश्लेषिक आधार' बनता है।

Hint

 सप्तमी विभक्ति के प्रयोग के नियम या सूत्र-

नियम या सूत्रउदाहरण
औपश्लेषिक आधारकटे आस्ते।
वैषयिक आधारमोक्षे इच्छास्ति।
यतश्च निर्धारणगोषु  कृष्णाबहुक्षीरा।
अभिव्यापक आधारतिलेषु तैलम।
यस्यचभावेन भाव लक्षणमगोषु दुह्यमानसु गत।
साध्वसाधुप्रयोगे चकृष्ण: मातरि साधु:।
निमित्तात्कर्मयोगेचर्मणिद्वीपिनं हन्ति।
98

निम्नाङ्कित विकल्पों में से "सर्वे गुणाः __________ आश्रयन्ते" में रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए शुद्ध शब्द है-

  1. ((a))

    निधानम्

  2. ((b))

    सौन्दर्यम्

  3. ((c))

    काञ्चनम्

  4. ((d))

    पतनम्

Show Answer
Answer: ((c))

काञ्चनम्

स्पष्टीकरण - उपरोक्त सूक्ति में काञ्चनम् पद आयेगा।

जिससे पूर्ण पंक्ति होगी - सर्वे गुणाः काञ्चनम् आश्रयन्ते। अर्थात् सभी गुण सोने/धन में आश्रित होते हैं।

यह पंक्ति नीति शतक में उल्लिखित है। इस ग्रन्थ के रचनाकार भर्तृहरि है। इस श्लोक में धन की महत्ता बतायी गयी है।

श्लोक -

यस्यास्ति वित्तं सः नरः कुलीनः, सः पण्डितः सः श्रुतवान् गुणज्ञः।

सः एव वक्ता सः च दर्शनीयः, सर्वे गुणाः ��ाञ्चनम् आश्रयन्ते।।

अर्थ जिस व्यक्ति के पास धन है, वह व्यक्ति उच्च कुल वाला है, वह ज्ञानी है, गुणवान है और वह ही वक्ता है। केवल वही देखने योग्य है, क्योंकि सभी गुणों का आश्रय स्वर्ण (धन) में है अर्थात् सभी गुणों का निवास धन में ही है।

श्लोक के अर्थ से स्पष्ट है, अतः यहाँ रिक्तस्थान में काञ्चनम् पद आयेगा।

99

अस्मद् शब्दस्य षष्ठी विभक्तौ एकवचने रूपं भवति-

  1. ((a))

    तव

  2. ((b))

    मम

  3. ((c))

    नः

  4. ((d))

    इनमें से कोई नहीं

Show Answer
Answer: ((b))

मम

प्रश्नानुवाद - अस्मद् शब्द का षष्ठी विभक्ति में एकवचन में रूप होता है-

स्पष्टीकरण - अस्मद् सर्वनाम शब्द का षष्ठी विभक्ति एकवचन में मम रूप बनता है। जिसका अर्थ होता है - मेरा।

अतः स्पष्ट है कि यहाँ मम उचित विकल्प है।

Additional Information

अस्मद् सर्वनाम शब्दरूप का प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमाअहम्आवाम्वयम्
द्वितीयामाम्, माआवाम्अस्मान्, नः
तृतीयामयाआवाभ्याम्अस्माभिः
चतुर्थीमह्यम्, मेआवाभ्याम्अस्मभ्यम्, नः
पंचमीमत्आवाभ्याम्अस्मत्
षष्ठीमम, मेआवयोः, नौअस्माकम्, नः
सप्तमीमयिआवयोःअस्मासु
100

जब विद्वानों के पास बैठकर कुछ ज्ञान हुआ तो ज्ञात हुआ कि-

  1. ((a))

    मैं पण्डित हूँ

  2. ((b))

    मैं मदान्ध हूँ

  3. ((c))

    मैं सर्वज्ञ हूँ

  4. ((d))

    मैं मूर्ख हूँ

Show Answer
Answer: ((d))

मैं मूर्ख हूँ

संस्कृत में भर्तृहरि कृत नीतिशतक में उल्लिखित है - 

यदा किञ्चिज्ञोहं द्विप इव मदान्धः समभवम्।

तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः।।

यदा किञ्चित् किञ्चित् बुधजनसकाशादवगतम्।

तदा मूर्खोऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः।।

श्लोकार्थ - "जब मैं बहुत थोड़ा जानता था तब मदोन्मत्त हाथी की भांति घमण्ड से अन्धा हो गया था और अपने मन में यह समझता था कि ‘‘मैं सब कुछ जानता हूं’’, परन्तु जब बुद्धिमानों की संगति से कुछ-कुछ ज्ञान हुआ, तब पता चला कि ‘‘मैं तो मूर्ख हूँ’’, उस समय मेरा अभिमान ज्वर की भांति उतर गया।"

अतः 'जब विद्वानों के पास बैठकर कुछ ज्ञान हुआ तो ज्ञात हुआ कि मैं मूर्ख हूँ' यह उचित पर्याय है।

101

देने के अर्थ में परस्‍मैपदी दा धातु का प्रथमपुरूष बहुवचन में रूप होगा-

  1. ((a))

    ददाति

  2. ((b))

    ददन्ति

  3. ((c))

    ददति

  4. ((d))

    दन्ति

Show Answer
Answer: ((c))

ददति

स्पष्टीकरण - दा (देना) धातु के अर्थ में परस्मैपद लट्लकार में प्रथमपुरुष-बहुवचन में ददति रूप बनता है।

अतः यहाँ ददति उचित विकल्प होगा।

Additional Informationदा (देना) धातु का लट्लकार में प्रयोग निम्नलिखित है-

पुरूषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमपुरूषददातिदत्तःददति
मध्यमपुरूषददासिदत्थःदत्थ
उत्तमपुरूषददामिदद्वःदद्मः
102

अभिज्ञान शाकुन्‍तल के चतुर्थ अङ्क में किस अर्थोपक्षेपक का प्रयोग किया गया है ?

  1. ((a))

    विष्‍कम्‍भक का

  2. ((b))

    प्रवेशक का

  3. ((c))

    अङ्क का

  4. ((d))

    अङ्कावतार का

Show Answer
Answer: ((a))

विष्‍कम्‍भक का

स्पष्टीकरण

  • कवि कुलगुरु कालिदास द्वारा रचित अभिज्ञानशाकुन्तलम्  संस्कृत साहित्य का सर्वोत्कृष्ट नाटक है।
  • अभिज्ञानशाकुन्तलम् में सात अंक हैं। जिनमें भी चतुर्थांक अति महत्वपूर्ण अंक माना जाता है।
  • चूंकि यह काव्य नाटक विधा का ग्रंथ है जो काव्यशास्त्रीय दृष्टि से भी अत्यंत दर्शनीय है।
  • अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक के चतुर्थांक में विष्कम्भक अर्थोपक्षेक का प्रयोग किया गया है।
  • विष्कम्भक अर्थोपक्षेपक नाटक के भूत और भावी घटनाओं का सूचक होता है। इसमें एक या दो मध्यम श्रेणी के पात्र होते हैं। जिनकी भाषा संस्कृत या शौरसेनी प्राकृत होती है।
  • विष्कम्भक का प्रयोग नाटक के दो अङ्कों के बीच में किया जाता है।

 

अतः अभिज्ञानशाकुन्तल के चतुर्थांक में विष्कम्भक नामक अर्थोपक्षेपक का प्रयोग किया गया है।

Key Points

  • अर्थोपक्षेक एक काव्यशास्त्रीय तत्व है, जिसका प्रयोग नाटक में किया जाता है।
  • अर्थोपक्षेपक का प्रयोग नाटक में उन प्रसंगों के लिए किया जाता है, जो मंच पर दिखाने योग्य नहीं है, जिनकी सूचना अर्थोपक्षेपक के माध्यम से दी जाती है। ये पाँच प्रकार के होते हैं - 
  • विष्कम्भक - यह भूत और भविष्य की घटना का सूचक होता है, जिसे एक या दो मध्यम या अधम पात्रों के द्वारा मंच पर प्रस्तुत किया जाता है।
  • प्रवेशक - यह भी विष्कम्भक के समान ही होता है, जो केवल अधम पात्रों के द्वारा ही प्रयोग किया जाता है।
  • चूलिका - इसका प्रयोग पर्दे के पीछे पात्र द्वारा कृत वस्तु की सूचना के लिए किया जाता है।
  • अङ्कावतार - इसके अन्तर्गत पूर्व अंक में जो पात्र होते हैं, उनके द्वारा अगले अंक की सूचना देना ही अङ्कावतार है।
  • अङ्कमुख - जहाँ एक अंक में ही सभी अंकों की सूचना दी जाये, वह अङ्कमुख है।
103

''सहयुक्‍तेऽप्रधाने'' इस सूत्र का उदाहरण है

  1. ((a))

    सुग्रीव∶ राम∶ सह लक्ष्‍मणश्‍च

  2. ((b))

    सहोदरो गच्‍छति नगरम्

  3. ((c))

    रामेण सह गतवती सीता

  4. ((d))

    मम सह त्‍वं गच्‍छसि

Show Answer
Answer: ((c))

रामेण सह गतवती सीता

'सहयुक्तेऽप्रधाने' सूत्र के बारे में काशिका में 'सहार्थेन युक्ते अप्रधाने तृतीया विभक्तिर् भवति।' और सिद्धान्तकौमुदी में 'सहार्थेन युक्ते अप्रधाने तृतीया स्यात्।' लिखा है। जिसके अनुसार सह तथा सह के अर्थ में प्रयुक्त होने वाले सार्धम् आदि के योग में अप्रधान कर्त्ता  में तृतीया विभक्ति होती है। 

उदाहरण- पुत्रेण सह आगतः पिता। यहाँ आगतः क्रिया का कर्त्ता पिता है और क्रिया से संबन्ध न होने के कारण पुत्र अप्रधान कर्त्ता है उसमें प्रस्तुत सूत्र से तृतीया विभक्ति हुआ है।

विकल्पों में 'रामेण सह गतवती सीता' इस वाक्य में 'सहयुक्‍तेऽप्रधाने' इस सूत्र का प्रयोग करके तृतीया विभक्ति की योजना हुई है।

अतः स्पष्ट होता है कि 'सहयुक्तेऽप्रधाने' सूत्र का उदाहरण **'**रामेण सह गतवती सीता' यह वाक्य है।

104

''दम्‍भोलि घटितेयं रसना या दारूणदानवोदन्‍तो-दीरणै∶ च दीर्य्यते'' यह पंक्ति उद्धृत है-

  1. ((a))

    दशकुमारचरित से

  2. ((b))

    कादम्‍बरी से

  3. ((c))

    उत्तररामचरित से

  4. ((d))

    शिवराजविजय से

Show Answer
Answer: ((d))

शिवराजविजय से

स्पष्टीकरण

  • आधुनिक संस्कृत - साहित्यकारों में अम्बिकादत्त व्यास अग्रगण्य कवि हैं।
  • जिनका शिवराजविजयम् नामक अत्यंत प्रसिद्ध और ऐतिहासिक संस्कृत उपन्यास है।
  • यह देशभक्ति से ओतप्रोत ग्रंथ है। इसमें वीर रस की प्रधानता है।
  • प्रस्तुतत पंक्ति संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध उपन्यास शिवराजविजयम् से है।

Important Points

पंक्ति  - 'दम्‍भोलि घटितेयं रसना या दारूणदानवोदन्‍तो-दीरणै∶ च दीर्य्यते।

अर्थ - प्रस्तुत पंक्ति में ब्रह्माचारी के गुरु द्वारा कहा जाता है कि वज्र के समान मेरी यह रसना (जिह्वा) जो कठोर दानवों (यवनों) के वृत्तान्तों से विदीर्ण नहीं हो जाती है।

अतः उपर्युक्त पंक्ति अम्बिकादत्त व्यास द्वारा रचित उपन्यास शिवराजविजयम् के प्रथम निःश्वास से उद्धृत है।

105

निम्‍नलिखित में से शुद्ध वाक्‍य है-

  1. ((a))

    पुत्रः मातरं स्‍मरति

  2. ((b))

    पुत्रः मात्रं स्‍मरति

  3. ((c))

    पुत्रः मातारं स्‍मरति

  4. ((d))

    पुत्रः मातुः स्‍मरति

Show Answer
Answer: ((d))

पुत्रः मातुः स्‍मरति

स्पष्टीकरण - दिये गये विकल्पों में पुत्रः मातुः स्मरति शुद्ध वाक्‍य है। स्मरण करने के अर्थ में षष्ठी विभक्ति होती है।

पुत्रः मातुः स्मरति (पुत्र माता का स्मरण करता है।)

माता ऋकारान्त स्त्रीलिंग शब्द है, जिसका षष्ठी विभक्ति एकवचन में मातुः रूप बनता है।

'अधीगर्थदयेशां कर्मणि' इस सूत्र के अनुसार अधि + इ (स्मरण करना), दय् (दया करना), ईश् (समर्थ होना) तथा इन धातुओं की अर्थवाची धातुओं के कर्म में षष्ठी होती है।

पुत्रः मातुः स्मरति। (यहाँ स्मरण करने के योग में माता पद में षष्ठी लगी।)

अतः स्पष्ट है कि यहाँ पुत्रः मातुः स्मरति शुद्ध वाक्‍य है। (अन्य विकल्पों में कोई न कोई अशुद्धता है।)

106

किरातार्जुनीय के आधार पर ''चारचक्षु'' कहा जाता है-

  1. ((a))

    सूर्य को

  2. ((b))

    राजा को

  3. ((c))

    शिक्षक को

  4. ((d))

    उपर्युक्‍त सभी

Show Answer
Answer: ((b))

राजा को

स्पष्टीकरण -

  • किरातार्जुनीय महाकाव्य के रचयिता महाकवि भारवि है। इस ग्रन्थ में 18 सर्ग है।
  • चारचक्षु शब्द - राजा के लिए कहा गया है।

 

किरातार्जुनीय महाकाव्य का श्लोक -

क्रियासु युक्तैर्नृप चारचक्षुषो न वञ्चनीयाः प्रभवोऽनुजीविभिः ।

अतोऽर्हसि क्षन्तुमसाधु साधु वा हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः ।।

  • अर्थ - कोई कार्य पूरा करने के लिए नियुक्त किये गए (राज) सेवकों का यह परम कर्त्तव्य है कि वे दूतों की आँखों से ही देखने वाले अपने स्वामी को (झूठी तथा प्रिय बातें बता कर) न ठगे। इसलिए मैं जो कुछ भी अप्रिय अथवा प्रिय बातें निवेदन करूँ उन्हें आप क्षमा करेंगे, क्योंकि सुनने में मधुर तथा परिणाम में कल्याण देने वाली वाणी दुर्लभ होती है।
  • श्लोक से स्पष्ट है कि चारचक्षुष शब्द राजा के विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुआ है।
  • चारचक्षुषः - दूतों की आँखों से ही देखने वाले (यह शब्द राजा के लिए प्रयुक्त हुआ है।)
<br>

अतः यहाँ राजा सही विकल्प है।

107

चतुः + कपालः सन्धि करने पर शब्‍द बनेगा-

  1. ((a))

    चतुः कपालः

  2. ((b))

    चतुर्कपालः

  3. ((c))

    चतुष्‍कपालः

  4. ((d))

    चतुस्‍कपालः

Show Answer
Answer: ((c))

चतुष्‍कपालः

स्पष्टीकरण - चतुः + कपालः की सन्धि करने पर चतुष्कपालः शब्‍द बनता है।

  • सन्धिविच्छेद - चतुः + कपालः
  • शब्द - चतुष्कपालः

सूत्र - इदुदुपधस्य चाप्रत्ययस्य

नियम - उपधा (अन्तिम वर्ण से पूर्ववर्ण) में इ या उ हो तो और बाद में कवर्ग या पवर्ग हो तो इ या उ के विसर्ग को ष् आदेश होता है।

उदाहरण -

  • निः + क्रान्तः - निष्क्रान्तः (यहाँ अन्तिम वर्ण विसर्ग से पूर्व इ है, बाद में कवर्ग है तो, इ के विसर्ग को ष् आदेश हुआ।
  • इसी नियमानुसार चतुः + कपालः की सन्धि करने पर चतुष्कपालः सिद्ध हुआ। जहाँ उ के बाद वाले विसर्ग को क परे होने से ष् आदेश हुआ।

 

अतः स्पष्ट है कि चतुः + कपालः की सन्धि करने पर चतुष्कपालः शब्‍द बनता है।

108

''प्रतीहारानुपकरण संभार संग्रहार्थमादिदेश'' यहाँ उपकरण पद की व्‍युत्‍पत्ति है-

  1. ((a))

    उप + कृ + घञ्

  2. ((b))

    उप + कृ + ल्‍युट्

  3. ((c))

    उप + कृ + ण्‍वुल

  4. ((d))

    उप + कृ + तृच्

Show Answer
Answer: ((b))

उप + कृ + ल्‍युट्

स्पष्टीकरण

  • प्रकृत गद्यांश गद्यसम्राट कवि बाणभट्ट द्वारा रचित कादम्बरी नामक कथांश शुकनासोपदेश से उद्धृत है।
  • यह गद्यांश भाग शुकनासोपदेश के आदि गद्यांश से है।
  • जिसके अन्तर्गत शुकनास द्वारा राजा तारापीड के पुत्र  चन्द्रापीड  युवराज अभिषेक के लिए सेवकों को सामग्री एकत्रित करने का आदेश दिया गया है।
  • उपर्युक्त उपकरण शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है -

Important Points

  • शब्द  - उपकरण
  • व्युत्पत्ति -  उप + कृ + ल्युट्

सूत्रल्युट् च। 

अर्थ -  नपुंसकलिङ्ग विशिष्ट भाव अर्थ में धातु के साथ ल्युट् प्रत्यय होता है। जहाँ यु शेष बचता है। फिर-

सूत्र -  युवोरनाकौ।

अर्थ - इस सूत्र द्वारा यु और वु के स्थान पर क्रमशः अन और अक आदेश होगा। 

इस प्रकार उपर्युक्त शब्द उपकरण पद की व्युत्पत्ति उप उपसर्ग + कृ धातु + ल्युट् प्रत्यय लगकर हुई है। 

जिसके अन्तर्गत ल्युट् प्रत्यय में ल् और ट् की इत्संज्ञा हुई है।

जिसमें यु बचा, जिसको युवोरनाकौ सूत्र से अन आदेश हुआ।

इस प्रकार उपर्युक्त सूत्र के माध्यम से उपकरण पद की व्युत्पत्ति उप + कृ + ल्युट् प्रत्यय से हुई है।

109

''जटाभिस्‍तापसः'' किस सूत्र से बनेगा ?

  1. ((a))

    हेतौ

  2. ((b))

    इत्‍थंभूतलक्षणे

  3. ((c))

    अपवर्गे तृतीया

  4. ((d))

    येनाङ्गविकारः

Show Answer
Answer: ((b))

इत्‍थंभूतलक्षणे

स्पष्टीकरण - ''जटाभिस्‍तापसः'' इत्थंभूतलक्षणे सूत्र से सिद्ध होता है।

जटाभिस्‍तापसः (जटाओं से तपस्वी ज्ञात होता है।)

'इत्थंभूतलक्षणे' इस सूत्र के अनुसार जिस चिन्ह से किसी व्यक्ति या वस्तु का ज्ञान होता है। उस लक्षणबोधक शब्द में तृतीया होती है।

इस सूत्र के अनुसार यहाँ जटा शब्द में तृतीया है, क्योंकि जटा शब्द लक्षणबोधक है।

अतः स्पष्ट है कि ''जटाभिस्‍तापसः'' इत्थंभूतलक्षणे सूत्र से सिद्ध होता है।

Additional Information

अन्य विकल्प -

  • हेतौ - इस सूत्र के अनुसार कारण (हेतु) बोधक शब्दों में तृतीया विभक्ति होती है। उदाहरण - सः अध्ययनेन वसति। (वह पढ़ने के लिए रहता है।)
  • अपवर्गे तृतीया - इस सूत्र के अनुसार अपवर्ग या फल प्राप्ति में काल-सातत्यवाची तथा मार्ग-सातत्यवाची शब्दों में तृतीया होती है। अर्थात् जितने समय में या मार्ग चलते-चलते कार्य सिद्ध होता है, उसमें तृतीया होती है। उदाहरण - मासेनाधीतोऽनुवाकः (एक महीने में अनुवाक पढ़ लिया।)
  • येनाङ्गविकारः - जिस विकृत अङ्ग के कारण अङ्गी अर्थात् शरीर का विकार दिखाई दे। उस विकृत अङ्ग में तृतीया विभक्ति का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण - नेत्रेण काणः
110

''कृष्‍णसर्प∶'' पद का समास विग्रह है

  1. ((a))

    कृष्‍णस्‍य सर्प∶

  2. ((b))

    कृष्‍णाय सर्प∶

  3. ((c))

    कृष्‍ण: सर्प∶

  4. ((d))

    इनमें से कोई नहीं

Show Answer
Answer: ((c))

कृष्‍ण: सर्प∶

स्पष्टीकरण -

  • पद - कृष्णसर्पः
  • अर्थः - काला साँप
  • समास-विग्रहः - कृष्णः सर्पः

सूत्र- विशेषणं विशेष्येण बहुलम्।

  • नियम - जहाँ प्रथम पद, उत्तर पद की विशेषता बताता हो, वहाँ कर्मधारय तत्पुरुष समास होता है।

उदाहरण - 

  • श्वेतम् कमलम् - श्वेतकमलम् (सफेद कमल)
  • कृष्णः पटः - कृष्णपटः (काला कपड़ा)
  • नियमानुसार यहाँ प्रथम पद, उत्तर पद (सर्पः) की विशेषता बता रहा है। अतः यहाँ कृष्णः सर्पः सही उत्तर है।

Additional Information

समास अर्थात् संक्षिप्तीकरण। दो या दो से अधिक शब्दों का जब समास होकर एक पद बनता है, तो उसे समास कहते हैं। समास में दो पद होते हैं - 1. पूर्व पद, 2. उत्तर पद

समास के मुख्यतः 4 भेद है। 

  1. अव्ययीभाव
  2. तत्पुरुष
  3. बहुव्रीहि
  4. द्वन्द्व

(1) अव्ययीभाव समास - ‘पूर्वपदार्थप्रधानोSव्ययीभावः’ अर्थात् जिस पद में पूर्व पद की प्रधानता हो या पद का आरम्भ किसी अव्यय पद से हो रहा हो, वहाँ अव्ययीभाव समास होता है।

उदाहरण -

  • ग्रामस्य समीपम् - उपग्रामम्
  • रामस्य पश्चात् - अनुरामम्

(2) तत्पुरुष समास - ‘उत्तरपदप्रधानो तत्पुरुषः’ अर्थात जिस पद में उत्तर पद प्रधान होता है, वहाँ तत्पुरुष समास होता है। 

उदाहरण - 

  • शिवस्य आलयः - शिवालयः

तत्पुरुष समास के मुख्यतः दो भेद होते हैं - 

  • व्यधिकरण तत्पुरुष समास
  • समानिधकरण तत्पुरुष
  1. व्यधिकरण तत्पुरुष समास के सात (7) भेद होते हैं, जो निम्नलिखित हैं - 
  2. द्वितीया तत्पुरुष
  3. तृतीया तत्पुरुष
  4. चतुर्थी तत्पुरुष
  5. पञ्चमी तत्पुरुष
  6. षष्ठी तत्पुरुष
  7. सप्तमी तत्पुरुष
  8. नञ् तत्पुरुष
  9. समानिधकरण तत्पुरुष समास के दो भेद होते हैं - 
  • कर्मधारय तत्पुरुष
  • द्विगु तत्पुरुष समास

(3) कर्मधारय समास - ऐसा तत्पुरुष समास जहाँ विशेषण-विशेष्य और उपमान-उपमेय का सम्बन्ध होता है, वह कर्मधारय समास होता है।   

उदाहरण- 

  • पीतोत्पलम् - पीतम् उत्पलम्
  • चन्द्रमुखम् - चन्द्र इव मुखम्

(4) द्विगु समास - जहाँ प्रथम पद संख्यावाची होता है, वहाँ द्विगु समास होता है। यह तत्पुरुष समास का ही भेद है।

उदाहरण - 

  • सप्तानां लोकानां समाहारः - सप्तलोकम्
  • चतुर्णां भुजानां समाहारः - चतुर्भुजम्

(5) बहुव्रीहि समास - ‘अन्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिः’ जहाँ दो या दो से अधिक समस्त शब्द किसी अन्य पद को इंगित करते हैं, वहाँ बहुव्रीहि समास होता है।

उदाहरण - 

  • पीतम् अम्बरम् यस्य सः (कृष्णः / विष्णुः) - पीताम्बरम्
  • चन्द्र शेखरे यस्य सः (शिवः) - चन्द्रशेखरः

(6) द्वन्द्व समास - ‘उभयपदार्थप्रधानो द्वन्द्वः’ जहाँ दोनों पद (पूर्व पद एवं उत्तर पद) प्रधान होते हैं, वहाँ द्वन्द्व समास होता है।

उदाहरण - 

  • आहारश्च निद्रा च भयं च - आहारनिद्राभयम्
  • पाणी च पादौ च - पाणिपादम्
111

''सदानुकूलेषु हि कुर्वते रति नृपेष्‍वमात्‍येषु च सर्व सम्‍पद∶'' यह सूक्ति उद्धृत है-

  1. ((a))

    किरातार्जुनीय से

  2. ((b))

    नैषधीयचरित से

  3. ((c))

    नीतिशतक से

  4. ((d))

    उत्तररामचरित से

Show Answer
Answer: ((a))

किरातार्जुनीय से

स्पष्टीकरण - ''सदानुकूलेषु हि कुर्वते रति नृपेष्‍वमात्‍येषु च सर्व सम्‍पद∶'' यह सूक्ति किरातार्जुनीयम् महाकाव्य में उल्लिखित है। जिसके रचयिता महाकवि भारवि है।

श्लोक -

स किंसखा साधु न शास्ति योऽधिपं हितान्न यः संशृणुते स किंप्रभुः।

सदानुकूलेषु हि कुर्वते रतिं नृपेष्वमात्येषु च सर्वसम्पदः।।

श्लोकार्थ - जो मित्र अथवा मन्त्री राजा को उचित बातों की सलाह नहीं देता, वह अधम मित्र अथवा अधम मन्त्री है। इसी प्रकार जो राजा अपने हितैषी मित्र अथवा मन्त्री की हित की बात नहीं सुनता, वह राजा होने योग्य नहीं है, क्योंकि राजा और मन्त्री के परस्पर सर्वदा अनुकूल रहने पर ही उनमें सब प्रकार की समृद्धियाँ अनुरक्त होती हैं

इस तरह स्पष्ट है कि उपरोक्त पंक्ति किरातार्जुनीयम् काव्य में उल्लिखित है।

112

''रिक्‍तः सर्वो भवति हि लघुः पूर्णता गौरवाय'' इस कथन में गम्‍भीरता सूचक शब्‍द है-

  1. ((a))

    सर्वो

  2. ((b))

    पूर्णता

  3. ((c))

    गौरवाय

  4. ((d))

    रिक्‍तः

Show Answer
Answer: ((c))

गौरवाय

स्पष्टीकरण

  • प्रकृत श्लोकांश संस्कृत साहित्य के सर्वप्रसिद्ध कवि कालिदास के गीतिकाव्य मेघदूत से उद्धृत है।
  • यह काव्य पूर्वमेघ और उत्तरमेघ नामक दो भागों में विभाजित है।
  • जिसके अन्तर्गत अपनी प्रियतमा विरह से संतप्त यक्ष द्वारा संवाहक रूप में भेजे गये मेघ की यात्रा तथा यक्ष द्वारा दिये गये सन्देश का वर्णन है।
  • यह सम्पूर्ण ग्रंथ मन्दाक्रान्ता छन्द में है।

Important Points

 यह श्लोक इस प्रकार है - 

तस्यास्तिर्क्तैवनगजमदैर्वासितं वान्तवृष्टि-

जम्बूकुञ्जप्रतिहतरयं तोयमादाय गच्छेः।

अन्तःसारं घन। तुलयितुं नानिलः शक्ष्यति त्वां

रिक्तः सर्वो भवति हि लघुः पूर्णता गौरवाय।।

अर्थ - प्रस्तुत श्लोक में यक्ष को मेघ को कहता है कि जब तुम बारिश कर चुके होंगे, तब तुम कटु गन्ध वाले वनैले हाथियों के मद से सुगन्धित और जामुन के वृक्षों के कुञ्ज से रुके हुए वेग वाले उस नर्मदा नदी के जल को लेकर जाना। हे मेघ अन्दर से सार वाली हवा तुमको हिला नहीं सकेगी क्योंकि सभी रिक्त पदार्थ हल्के होते हैं और पूर्णता भारी होती है अर्थात् गौरव के लिये होती है। 

अतः उपर्युक्त श्लोकांश में गम्भीरता सूचक पद गौरवाय पद है।

113

निम्‍न में से सप्‍तमी विभक्ति नहीं है-

  1. ((a))

    ग्रामे

  2. ((b))

    नगरे

  3. ((c))

    वने

  4. ((d))

    लते

Show Answer
Answer: ((d))

लते

स्पष्टीकरण - दिये गये विकल्पों में लते शब्द में सप्तमी विभक्ति नहीं है। लते शब्द लता आकारान्त स्त्रीलिंग शब्दरूप है।

लते रूप प्रथमा और द्वितीया विभक्ति के द्विवचन का रूप है।

ग्रामे, नगरे, वने - ये तीनों विकल्प सप्तमी विभक्ति-एकवचन के उदाहरण हैं।

अतः स्पष्ट है कि दिये गये विकल्पों में लते शब्द में सप्तमी विभक्ति नहीं है।

Additional Information

लता आकारान्त स्त्रीलिंग शब्दरूप का प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमालतालतेलताः
द्वितीयालताम्लतेलताः
तृतीयालतयालताभ्याम्लताभिः
चतुर्थीलतायैलताभ्याम्लताभ्यः
पञ्चमीलतायाःलताभ्याम्लताभ्यः
षष्ठीलतायाःलतयोःलतानाम्
सप्तमीलतायाम्लतयोःलतासु
सम्बोधनहे लते!हे लते!हे लताः!
114

''सा तपस्विनी निर्वृता भवतु'' इस पंक्ति में सा किसके लिए प्रयुक्‍त है ?

  1. ((a))

    शकुन्‍तला के लिए

  2. ((b))

    गौतमी के लिए

  3. ((c))

    अनसूया के लिए

  4. ((d))

    प्रियंवदा के लिए

Show Answer
Answer: ((a))

शकुन्‍तला के लिए

स्पष्टीकरण - सा तपस्विनी निर्वृता भवतु - इस पंक्ति में सा पद शकुन्तला के लिए प्रयुक्त हुआ है।

Important Points

  • उपर्युक्त उक्ति कवि कुलगुरु कालिदास द्वारा रचित सर्वोत्कृष्ट नाटक अभिज्ञानशाकुन्तलम् के चतुर्थ अंक से उद्धृत है।
  • अभिज्ञानशाकुन्तलम् में सात अंक हैं। जिनमें भी चतुर्थांक अति महत्वपूर्ण अंक माना जाता है।
  • प्रकृत उक्ति भी इस नाटक के चतुर्थांक में शकुन्तला के पतिगृह जाने को लेकर परस्पर सखियों के संवाद के अन्तर्गत उपर्युक्त उक्ति प्रियंवदा द्वारा शकुन्तला के लिए कथित है।
  • उक्ति - सखि, आवां तावदुत्कण्ठां विनोदयिष्यावः। सा तपस्विनी निर्वृता भवतु
  • अर्थ - सखि हम दोनों तो अपने दुःख किसी प्रकार से दूर कर लेंगी। वह बेचारी सुखी हो।

 

अतः उपर्युक्त उक्ति प्रियंवदा द्वारा शकुन्तला के लिए कही गयी है।

115

''वाराङ्गनेव नृपनीतिरनेकरूपा'' यह सूक्ति है-

  1. ((a))

    किरातार्जुनीय की

  2. ((b))

    मेघदूत की

  3. ((c))

    नीतिशतक की

  4. ((d))

    शुकनासोपदेश की

Show Answer
Answer: ((c))

नीतिशतक की

स्पष्टीकरण - ''वाराङ्गनेव नृपनीतिरनेकरूपा'' यह सूक्ति नीति शतक ग्रन्थ में उल्लिखित है।

यह श्लोक नीति शतक नामक ग्रन्थ से लिया गया है। इसके प्रणेता भर्तृहरि है। उनके द्वारा लिखे गये ये तीन ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं - नीति शतक, शृंगार शतक और वैराग्य शतक।

श्लोकः -

सत्यानृता च परुषा प्रियवादिनी च,

हिंस्त्रा दयालुरपि चार्थपरा वदान्या।

नित्यव्यया प्रचुरनित्यधनागमा च,

वाराङ्गनेव नृपनीतिरनेकरूपा।

श्लोक का अर्थ - कहीं सत्य और कहीं मिथ्या, कहीं कटु (कठोर) भाषा और कहीं प्रिय भाषा, कहीं हिंसा और कहीं दयालुता, कहीं लोभ और कहीं दान, कहीं व्यय करने वाली और कहीं धन सञ्चय करने वाली राजनीति भी एक व्यभिचारिणी स्त्री की तरह अनेक प्रकार के रूप धारण कर लेती है।

इस तरह स्पष्ट है कि उपरोक्त सूक्ति नीति शतक ग्रन्थ में उल्लिखित है।

116

अभिज्ञान शाकुन्‍तल के चतुर्थ अङ्क के प्रारम्‍भ में आश्रम में कौनसा अतिथि प्रवेश करता है जिसकी उपेक्षा परिलक्षित होती है ?

  1. ((a))

    दुष्‍यन्‍त

  2. ((b))

    कण्‍व

  3. ((c))

    दुर्वासा

  4. ((d))

    विश्‍वामित्र

Show Answer
Answer: ((c))

दुर्वासा

स्पष्टीकरण - अभिज्ञान शाकुन्‍तल के चतुर्थ अङ्क के प्रारम्‍भ में कण्व मुनि के आश्रम में महर्षि दुर्वासा प्रवेश करते हैं। जिनकी उपेक्षा शकुन्तला द्वारा हो जाती है। जो दुष्यन्त के ध्यान में मग्न होती है।

  • अभिज्ञान शाकुन्तलम् नाटक में 7 अंक हैं। इस नाटक में दुष्यन्त और शकुन्तला के परिणय की कहानी है। इस नाटक के रचयिता महाकवि कालिदास है।
  • अभिज्ञान शाकुन्‍तल के चतुर्थ अङ्क के प्रारम्‍भ में कण्व मुनि के आश्रम में महर्षि दुर्वासा प्रवेश करते हैं। अपना अनादर होने के कारण महर्षि दुर्वासा शकुन्तला को शाप देते हुए कहते हैं कि -

श्लोक -

'आः अतिथिपरिभाविनि!'

विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा तपोधनं न वेत्थि मामुपस्थितम्।

स्मरिष्यति त्वां न स बोधितोऽपि सन् कथां प्रमत्तः प्रथमं कृतामिव।।

  • अर्थ - ओह! ओ अतिथि का अपमान करने वाली! जिसके ध्यान में इतनी मग्न होकर तू मुझ जैसे तपस्वी के आने की भी सुध नहीं ले रही है, वह (दुष्यन्त) बहुत स्मरण दिलाने पर भी तुझे उसी प्रकार भूल जाएगा, जैसे पागल मनुष्य अपनी पिछली सारी बातें भूल जाया करता है।
  • श्लोक की पंक्ति से स्पष्ट है कि शकुन्तला दुष्यन्त के विषय में सोच रही है, जिस कारण वह महर्षि दुर्वासा का अतिथि सत्कार नहीं कर पाती, जिस कारण दुर्वासा उसे शाप देते हैं। इस तरह स्पष्ट है कि यह पंक्ति दुर्वासा द्वारा कही गयी।

 

अतः स्पष्ट है कि अभिज्ञान शाकुन्‍तल के चतुर्थ अङ्क के प्रारम्‍भ में कण्व मुनि के आश्रम में महर्षि दुर्वासा की उपेक्षा की जाती है।

117

''वसूति वाञ्छन्‍न वशी न मन्‍‍‍‍युना'' यहांँ पर प्रयुक्‍त वसूति पद का अर्थ है-

  1. ((a))

    धन

  2. ((b))

    अष्‍टावसु

  3. ((c))

    नाग

  4. ((d))

    अग्नि

Show Answer
Answer: ((a))

धन

स्पष्टीकरण

  • भारवेरर्थगौरवम् उक्ति से अलङ्कृत कवि भारवि द्वारा रचित एकमात्र ग्रंथ किरातार्जुनीयम् है।
  • यह महाकाव्य 18 सर्गों में निबद्ध है।
  • जिसमें प्रत्येक सर्ग का अन्त लक्ष्मी पद से हुआ है।
  • इस ग्रंथ का प्रथम सर्ग में पद्यों की संख्या 46 है।
  • जिनके अन्तर्गत 44पद्य वंशस्थ छन्द ���था 45 वां पद्य पुष्पिताग्रा और 46 वां पद्य मालिनी छन्द में है।
  • उपर्युक्त श्लोकांश भी इसी ग्रंथ के प्रथम सर्ग से है।

Important Points

श्लोक

वसूनि वाञ्छन्न वशी न मन्युना स्वधर्म इत्येव निवृत्तकारणः।

गुरुपदिष्टेन रिपौ सुते पि वा निहन्ति दण्डेन स धर्मविप्लवः।।

अर्थ - वह दुर्योधन जितेन्द्रिय होकर धन की इच्छा न करते हुए क्रोध आदि छः रिपुओं से रहित होकर अपने धर्म को समझते हुए गुरु के द्वारा उपदिष्ट दण्ड के द्वारा शत्रु में या मित्र में स्थित धर्म के उल्लंघन का समाधान करता है।

अतः उपर्युक्त श्लोक से यह स्पष्ट है कि उपर्युक्त श्लोकांश में प्रयुक्त वसूनि पद का अर्थ धन है।

118

'तद्' शब्‍द का पुल्लिङ्ग द्वितीया बहुवचन का रूप होगा-

  1. ((a))

    तौ

  2. ((b))

    तम्

  3. ((c))

    तेषाम्

  4. ((d))

    तान्

Show Answer
Answer: ((d))

तान्

स्पष्टीकरण - तद्/तत् सर्वनाम शब्‍दरूप का पुल्लिङ्ग द्वितीया विभक्ति बहुवचन में तान् रूप बनता है।

अतः यहाँ तान् उचित विकल्प है।

Additional Information

तत् सर्वनाम शब्दरूप का प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमासःतौते
द्वितीयातम्तौतान्
तृतीयातेनताभ्याम्तैः
चतुर्थीतस्मैताभ्याम्तेभ्यः
पंचमीतस्मात्ताभ्याम्तेभ्यः
षष्ठीतस्यतयोःतेषाम्
सप्तमीतस्मिन्तयोःतेषु
119

''अतिगहनं तमो यौवनप्रभवम्'' सूक्ति किससे सम्‍बद्ध है ?

  1. ((a))

    शुकनासोपदेश

  2. ((b))

    नलचम्‍पू

  3. ((c))

    वासवदत्ता

  4. ((d))

    दशकुमारचरित

Show Answer
Answer: ((a))

शुकनासोपदेश

स्पष्टीकरण - ''अतिगहनं तमो यौवनप्रभवम्'' यह सूक्ति शुकनासोपदेश से सम्बद्ध है।

  • महाकवि बाणभट्ट द्वारा विरचित कादम्बरी काव्य के अन्तर्गत शुकनासोपदेश ग्रन्थ आता है।
  • इस ग्रन्थ में शुकनास राजा का मन्त्री है। वह राजा तारापीड के पुत्र चन्द्रापीड को उपदेश देता है। इसलिए इसे शुकनासोपदेश कहा जाता है।
  • शुकनासोपदेश में उल्लिखित पंक्ति है - तात! चन्द्रापीड! विदितवेदितव्यस्य अधीतसर्वशास्त्रस्य ते नाल्पमप्युपदेष्टव्यमस्ति। केवलञ्च निसर्गत एव अभानुभेद्यरत्नालोकच्छेद्यमप्रदीपप्रभापनेयमतिगहनं तमो यौवनप्रभवम्। अर्थात् हे वत्स! चन्द्रापीड! ज्ञातव्य विषयों के ज्ञाता, सभी शास्त्रों में निष्णात तुमको कुछ भी कहना शेष नहीं है। फिर भी बात यह है कि युवावस्था की घनीभूत अन्धकार सहस्र रश्मि के आलोक, मणियों की कान्ति और दीपक के प्रकाशपुञ्ज से भी दूर नहीं किया जा सकता है।

 

इस तरह स्पष्ट है कि उपरोक्त सूक्ति शुकनासोपदेश ग्रन्थ में उद्धृत है।

120

''वश्‍यवाणी चक्रवर्ती'' इस उपाधि से समलङ्कृत है-

  1. ((a))

    बाणभट्ट

  2. ((b))

    भूषणभट्ट

  3. ((c))

    चित्रभानु

  4. ((d))

    अम्बिकादत्त व्‍यास

Show Answer
Answer: ((a))

बाणभट्ट

स्पष्टीकरण

  • कवि बाणभट्ट संस्कृत साहित्य में गद्य कवियों में सर्वोत्कृष्ट कवि माने जाते हैं।
  • इनके द्वारा सबसे प्रसिद्ध गद्य ग्रंथ कादम्बरी है, जो संस्कृत कवियों के मध्य अपने वैशिष्ट्य से इतना प्रसिद्ध हुआ कि अनेक कवियों द्वारा कवि बाणभट्ट को अनेक प्रशस्तियों से विभूषित किया गया।
  • कादम्बरी ग्रन्थ का ही एक अंश शुकनासोपदेश अपने नीति उपदेश के कारण बहुत प्रसिद्ध है। जो युवाओं को नीतियुक्त विचारों को प्रदान करने हेतु उपयुक्त है।
  • जिसमें "बाणोच्छिष्टं जगत्सर्वम्", "गद्यं कवीनां निकषां वदन्ति", “बाणस्तु पञ्चाननः” इत्यादि अनेक प्रशस्तियां बाण के लिए कवियों द्वारा कही गयी है।
  • उन अनेक प्रशस्तियों में से राजा हर्षवर्धन द्वारा भी कवि बाणभट्ट के लिए वश्यवाणी चक्रवर्ती नामक उपाधि से विभूषित किया गया ।
  • वस्तुतः कवि बाणभट्ट राजा हर्षवर्धन के सम्मानित कवि थे।

 

अतः यह स्पष्ट है कि उपर्युक्त वश्यवाणी चक्रवर्ती उपाधि बाणभट्ट के लिए है, जो हर्षवर्धन द्वारा दी गयी।

121

अदस्‌ शब्द का नपुंसकलिङ्ग में रूप होगा -

  1. ((a))

    अदः अमू अमूनि

  2. ((b))

    असौ अमू अमूनि

  3. ((c))

    असौ अमू अमी

  4. ((d))

    असौ अमू अमूः

Show Answer
Answer: ((a))

अदः अमू अमूनि

स्पष्टीकरण - अदस् (वह) सर्वनाम शब्दरूप है।

अदस् (वह) सर्वनाम शब्दरूप नपुंसकलिंग के प्रथमा और द्वितीय विभक्ति के तीनों वचनों में अदः अमू अमूनि रूप बनते हैं।

तृतीया विभक्ति से सप्तमी विभक्ति तक के रूप पुल्लिंग और नपुंसकलिंग में समान चलते हैं।

अतः यहाँ अदः अमू अमूनि उचित विकल्प है।

Additional Information

अदस् (वह) सर्वनाम शब्दरूप का नपुंसकलिंग में प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमाअदःअमूअमूनि
द्वितीयाअदःअमूअमूनि
तृतीयाअमुनाअमूभ्याम्अमीभिः
चतुर्थीअमुष्मैअमूभ्याम्अमीभ्यः
पंचमीअमुष्मात्अमूभ्याम्अमीभ्यः
षष्ठीअमुष्यअमुयोःअमीषाम्
सप्तमीअमुष्मिन्अमुयोःअमीषु

 

अन्य विकल्प -

  • असौ अमू अमूनि - ये तीनों रूप तीनों लिंगों में प्रथमा एवं द्वितीया विभक्ति के अलग-अलग वचन में बनते हैं।
  • असौ अमू अमी - ये तीनों रूप प्रथमा विभक्ति के तीनों वचनों में बनते हैं। (पुल्लिंग में)
  • असौ अमू अमूः - ये तीनों रूप प्रथमा विभक्ति के तीनों वचनों में बनते हैं। (स्त्रीलिंग में)
122

''आ∶ अतिथि परिभाविनि'' के कथनकार है-

  1. ((a))

    काश्‍यप

  2. ((b))

    दुर्वासा

  3. ((c))

    गौतम

  4. ((d))

    विश्‍वामित्र

Show Answer
Answer: ((b))

दुर्वासा

स्पष्टीकरण - 'आः अतिथिपरिभाविनि!' यह कथन महर्षि दुर्वासा के द्वारा शकुन्तला को कहा गया।

  • प्रस्तुत पंक्ति अभिज्ञान शाकुन्तलम् नाटक की है। इस नाटक में दुष्यन्त और शकुन्तला के परिणय की कहानी है। इस नाटक के रचयिता महाकवि कालिदास है।
  • प्रस्तुत श्लोक में महर्षि दुर्वासा ऋषि शकुन्तला को शाप देते हुए कहते हैं कि -

श्लोक -

'आः अतिथिपरिभाविनि!'

विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा तपोधनं न वेत्थि मामुपस्थितम्।

स्मरिष्यति त्वां न स बोधितोऽपि सन् कथां प्रमत्तः प्रथमं कृतामिव।।

  • अर्थ - ओह! ओ अतिथि का अपमान करने वाली! जिसके ध्यान में इतनी मग्न होकर तू मुझ जैसे तपस्वी के आने की भी सुध नहीं ले रही है, वह (दुष्यन्त) बहुत स्मरण दिलाने पर भी तुझे उसी प्रकार भूल जाएगा, जैसे पागल मनुष्य अपनी पिछली सारी बातें भूल जाया करता है।
  • श्लोक की पंक्ति से स्पष्ट है कि शकुन्तला दुष्यन्त के विषय में सोच रही है, जिस कारण वह महर्षि दुर्वासा का अतिथि सत्कार नहीं कर पाती, जिस कारण दुर्वासा उसे शाप देते हैं। इस तरह स्पष्ट है कि यह पंक्ति दुर्वासा द्वारा कही गयी।

 

अतः स्पष्ट है कि यह पंक्ति महर्षि दुर्वासा के द्वारा कही गयी है।

123

''चक्षुषे'' पद में विभक्ति है-

  1. ((a))

    सप्‍तमी

  2. ((b))

    पञ्चमी

  3. ((c))

    चतुर्थी

  4. ((d))

    इनमें से कोई नहीं

Show Answer
Answer: ((c))

चतुर्थी

स्पष्टीकरण - ''चक्षुषे'' पद में चतुर्थी विभक्ति है। यह रूप चक्षुस् सकारान्त नपुंसकलिंग शब्द के चतुर्थी विभक्ति-एकवचन में बनता है। 

अतः स्पष्ट है कि 'चक्षुषे'' पद में चतुर्थी विभक्ति है।

Additional Information

चक्षुस् (आँख) सकारान्त नपुंसकलिंग शब्दरूप का प्रयोग निम्नलिखित है-

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमाचक्षुःचक्षुषीचक्षूंषि
द्वितीयाचक्षुःचक्षुषीचक्षूंषि
तृतीयाचक्षुषाचक्षुर्भ्याम्चक्षुर्भिः
चतुर्थीचक्षुषेचक्षुर्भ्याम्चक्षुर्भ्यः
पंचमीचक्षुषःचक्षुर्भ्याम्चक्षुर्भ्यः
षष्ठीचक्षुषःचक्षुषोःचक्षुषाम्
सप्तमीचक्षुषिचक्षुषोःचक्षुष्षु
सम्बोधनहे चक्षुःहे चक्षुषीहे चक्षूंषि
124

घ्‍नन्ति में धातु है-

  1. ((a))

    हन्

  2. ((b))

    जनि

  3. ((c))

    तुद्

  4. ((d))

    तृ

Show Answer
Answer: ((a))

हन्

स्पष्टीकरण - घ्नन्ति में हन् धातु है। हन् (मारना) धातु के लट्लकार के प्रथमपुरुष-बहुवचन में घ्नन्ति रूप बनता है।

अतः यहाँ हन् उचित विकल्प है।

Additional Information

हन् (मारना) धातु का लट्लकार में प्रयोग निम्नलिखित है -

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमपुरुषहन्तिहतःघ्नन्ति
मध्यमपुरुषहंसिहथःहथ
उत्तमपुरुषहन्मिहन्वःहन्मः
125

किरातार्जुनीय में सुयोधन (दुर्योधन) के लिए प्रयुक्त पद है -

  1. ((a))

    शुभ्र

  2. ((b))

    द्विप

  3. ((c))

    जिह्म

  4. ((d))

    भूति

Show Answer
Answer: ((c))

जिह्म

स्पष्टीकरण - किरातार्जुनीयम् महाकाव्य में दुर्योधन के लिए जिह्म पद आया है। जिसका अर्थ होता है - दुष्ट

किरातार्जुनीयम् महाकाव्य के रचनाकार महाकवि भारवि है। जैसा कि श्लोक में उद्धृत है-

श्लोक-

तथाऽपि जिह्मः स भवज्जिगीषया तनोति शुभ्रं गुणसम्पदा यशः ।

समुन्नयन्भूतिमनार्यसंगमाद्वरं विरोधोऽपि समं महात्मभिः।। 

अर्थ - आप से सशंकित होकर भी वह कुटिल प्रकृति वाला दुर्योधन आप को पराजित करने की अभिलाषा से दान-दाक्षिण्यादि सद्गुणों से अपने निर्मल यश का (उत्तरोत्तर) विस्तार कर रहा है क्योंकि नीच लोगों के सम्पर्क से वैभव प्राप्त करने की अपेक्षा सज्जनो से विरोध प्राप्त करना भी अच्छा ही होता है।

इस तरह स्पष्ट है कि किरातार्जुनीयम् महाकाव्य में दुर्योधन के लिए जिह्म पद आया है।

Attempt this paper under real exam conditions

Timed interface, section switching, instant scoring, and question-by-question analytics — free.

Start Timed Attempt