“कश्चित् कान्ता विरह गुरुणा" इत्यादि श्लोक में मङ्गलाचरण का प्रकार है-
- ((a))
आशीर्वादात्मक
- ((b))
नमस्क्रियात्मक
- ((c))
क्रियात्मक
- ((d))
वस्तुनिर्देशात्मक
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वस्तुनिर्देशात्मक
कालिदास संस्कृत भाषा के महान कवि और नाटककार थे। उन्होंने भारत की पौराणिक कथाओं को आधार बनाकर रचनाएं की, जिसमें भारतीय जीवन और दर्शन के विविध रूप और मूल तत्त्व निरूपित हैं। कालिदास अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण राष्ट्र की समग्र राष्ट्रीय चेतना को स्वर देने वाले कवि माने जाते हैं संस्कृत साहित्य में ही नहीं अपितु समग्र साहित्यिक संसार में उन्हें कविकुलश्रेष्ठ तथा कविशिरोमणि माना जाता है।
महाकवि कालिदास विरचित 'मेघदूतम्' नामक दूतकाव्य में वस्तुनिर्देशात्मक मङ्गलाचरण से आरम्भ किया गया है -
श्लोक -
कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात्प्रमत:
शापेनास्तग्ड:मितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तु:।
यक्षश्चक्रे जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु
स्निग्धच्छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु।।
श्लोकार्थ - अपने काम में असावधानहोने के कारण यक्षपति द्वारा अपनी पत्नी से वर्ष भर के विरह के शाप प्राप्त किया कोई यक्ष था। शाप के कारण उसकी महिमा आदि शक्तिया समाप्त हो गई थी, उसने घने छायादार पेड़ से युक्त और जहाँ सीता जी के स्नान के द्वारा पवित्र हुए जल-कुंड भरे रामगिरि के आश्रमों में अपना निवास बनाया।
अतः स्पष्ट है कि “कश्चित् कान्ता विरह गुरुणा" इत्यादि श्लोक में वस्तुनिर्देशात्मक मङ्गलाचरण है।

Additional Information
मङ्गलाचरण - मङ्गल का अर्थ होता है अभिलषित वस्तु की सिद्धि अर्थात् चाहे गये कार्य का होना या चाहे गये वस्तु की प्राप्ति। मनुष्य आनन्द की प्राप्ति के लिए ही सभी कार्य करता है। शब्दकल्पद्रुम के अनुसार मङ्गति हितार्थं सर्पति मङ्गति दूरदृष्टमनेनास्माद्वेति। जिसका अर्थ होता है - अभिप्रेतार्थसिद्धि अर्थात् इच्छित कार्य का होना अथवा इच्छित वस्तु की प्राप्ति। संस्कृत साहित्य का सृजन अथवा पठन,पाठन मङ्गल कार्य ही है।अतः संस्कृत काव्य( साहित्य) ग्रंथ लेखन कार्य शुभ कार्य है जिसकी निर्विघ्न समाप्ति के लिए इसके आदि(प्रारम्भ) एवं अंत में मङ्गलाचरण किया जाता है। इस मङ्गलाचरण कि आवश्यकता संस्कृत साहित्य में स्वीकार किया गया है, साहित्यदर्पणकार आचर्य विश्वनाथ आदि महाकाव्य का लक्षण करते हुए ही कहते हैं कि - 'आदौ नमस्क्रियाशीर्वा वस्तुनिर्देश एव वा॥' अर्थात् महाकाव्य के आरम्भ में नमस्कारात्मक, आशीर्वादात्मक या वस्तुनिर्देशात्मक कोई एक मङ्गलाचरण होना चहिए। इससे स्पष्ट होता है कि मङ्गलाचरण तीन प्रकार के होते होम -
नमस्कारात्मक - नमः प्रणाम आदि शब्दों का प्रयोग जिस मंगलाचरण में हो, उसको नमस्कारात्मक मङ्गलाचरण कहते हैं। जिसमें नमस्कार करने की बात की जाये वह नमस्करात्मक मंगलाचरण होता है। नमः, नमस्ते नमस्कार या नमामि आदि आये।
यथा - महाभारत का मंगलाचरण इसके सबसे प्रसिद्ध श्लोकों में है। इसमें महाभारतकार ने ‘नारायण, नर और नरोत्तम, सरस्वती देवी, और स्वयं (व्यास) को’ नमस्कार किया है।
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्।।
मंगलाचरण का श्लोक देखने पर ऐसा जान पड़ता है कि यहाँ नारायण शब्द का अर्थ है भगवान श्री कृष्ण और नरोत्तम का अर्थ है नर अर्जुन। महाभारत में प्रायः सर्वत्र इन्हीं दोनों का नर-नारायण के अवतार के रूप में उल्लेख हुआ है। मंगलाचरण में ग्रन्थ के इन दोनों प्रधान पात्र तथा भगवान के मूर्ति-युगल को प्रणाम करना मंगलाचरण को नमस्कारात्मक बनाता है।
आशीर्वादात्मक - जहाँ 'जय' या 'जयति' शब्द का प्रयोग होता हैं आशीर्वादात्मक मंगला- चरण समझना चाहिए। जहाँ किसी के लिए शुभ होने की या मंगल होने की कामना की जाये वहाँ आशीर्वादात्मक मंगलाचरण होता है।
यथा -
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्धर्मो यशो बलम्।।
वस्तुनिर्देशात्मक - जहाँ विषय का वर्णन करते हुये शुभ शब्दों का प्रयोग करके काव्य की रचना की जाती है। जहां विषयवस्तु को बताते हुये
उसी के द्वारा मंगलाचरण हो वहाँ वस्तुनिर्देशात्मक मंगलाचरण होता है।
यथा -
कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा ���्वाधिकारात्प्रमत:
शापेनास्तग्ड:मितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तु:।
यक्षश्चक्रे जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु
स्निग्धच्छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु।।


