प्रश्नानुवाद- रस सम्प्रदाय के दो आचार्य कौन से हैं?
स्पष्टीकरण- रस सम्प्रदाय के दो आचार्य- भरत और अभिनवगुप्त हैं।
भरतमुनि और रससम्प्रदाय-
भारतीय काव्यशास्त्र में रस सिद्धान्त सबसे प्राचीन है। रस सम्प्रदाय के प्रवर्तक भरतमुनि को माना जाता है। उन्होंने ही रस का सबसे पहले निरूपण अपने ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ में किया था। इसलिए उन्हें रस निरूपण का प्रथम व्याख्याता और उनके ग्रंथ नाट्यशास्त्र को रस निरूपण का प्रथम ग्रंथ माना जाता है। उन्होंने अपने छठे अध्याय में रस एवं सातवे अध्याय में विभाव, अनुभाव और संचारीभाव तथा स्थायीभाव की व्याख्या की है। भरत मुनि के अनुसार रस का सूत्र इस प्रकार है - ‘विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्तिः’
अर्थात् विभाव, अनुभाव और व्यभिचारि भावों (स्थायी भाव) से रस की निष्पत्ति होती है। ‘निष्पत्ति’ शब्द का प्रथम प्रयोग भरत मुनि ने रस सूत्र में किया है। भरतमुनि ने रस को आस्वाद प्रदान करने वाला तत्त्व मानते है-आस्वाद्यत्वात्। भरतमुनि के अनुसार जिस प्रकार नाना प्रकार के व्यंजनों और औषधियों एवं द्रव्य, पदार्थों से भोज्य रस की निष्पत्ति होती है उसी प्रकार नाना प्रकार के भावों के संयोग से स्थायीभाव भी नाट्यरस को प्राप्त हो जाता है।
अभिनवगुप्त-
कश्मीर के बहुत बड़े काव्यशास्त्र के आचार्य तथा तंत्रवेत्ता थे। शिवाद्वैत दर्शन (प्रत्यभिज्ञा), तंत्र, स्तोत्र तथा काव्यशास्त्र- विषयक ग्रंथों की रचना से अपने व्यापक ज्ञान का इन्होंने परिचय दिया है। दर्शन-क्षेत्र में ‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञा- विमर्शिनी’ उत्पलदेव के ग्रंथ और वृत्ति पर टीका है जो दिया बृहत् और लघु दो संस्करणों में है। तंत्र के क्षेत्र में इनका ‘तंत्रालोक’ बहुत प्रसिद्ध है, इसका संक्षिप्त रूप ‘तंत्रालोकसार’ भी इन्होंने लिखा था। मालिनीविजयवार्तिक तथा परात्रिंशिकाविवरण इनके अन्य तंत्र-ग्रंथ हैं। काव्यशास्त्रीयग्रंथों में दो की प्रसिद्धि और महत्ता अत्यधिक है- ध्वन्यालोक की लोचन टीका तथा नाट्यशास्त्र की अभिनवभारती। यह नाट्यशास्त्र पर एकमात्र उपलब्ध टीका है किन्तु अनेक स्थानों पर इसका पाठ त्रुटि है। इनकी 'सर्वथा रसनात्मक वीतविघ्न प्रतीतिग्राह्यो भाव एवं रसः' यह रस की व्याख्या अति प्रसिद्ध है। इनको रससम्प्रदाय का एक महत्वपूर्ण आचार्य माना जाता है।

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अन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण-
(B) वामन- काव्य के छह प्रधान तत्त्वों में तीसरा स्थान रीति का है, जिसके प्रवर्तक वामन हैं। वामन ने अपने ‘काव्यांकारसूत्र’ में ‘रीतिरात्मा कावस्य’ कहकर रीति प्रस्थान का प्रवर्तन किया है। रीति का अर्थ उनके अनुसार पदों की विशेष- युक्त रचना या संघटना है और यह ‘विशेष’ गुणों के रूप में होता है- विशिष्टा पदरचना रीतिः, विशेषो गुणात्मा । तदनुसार शब्द और अर्थ में विराजमान गुणों से सम्पन्न पदों की रचना को रीति कहते हैं। वामन गुणों को काव्यसौन्दर्य का उत्पादक नित्य धर्म मानते हैं। इसलिए गुणाश्रित रीति उनकी दृष्टि में काव्य की आत्मा है वामन ने भरत से 10 गुणों की परंपरा पायी थी, दण्डी के काव्यदर्श में वैदर्भमार्ग के लिए भी इन गुणों का निर्देश किया गया है, किन्तु वामन ने इन गुणों ( श्लेष, प्रसाद, समता, माधुर्य, सुकुमारता, अर्थव्यक्ति, उदारता, ओजस्, कान्ति और समाधि) को शब्दगुण और अर्थगुण के रूप में पृथक पृथक स्वीकार करके 20 गुणों की व्यवस्था की है। वैदर्भी रीति में गुण रहते हैं (समग्रगुणोपेता वैदर्भी), पांचाली में माधुर्य और सुकुमारता ये दो गुण (माधुर्यसौकुमार्योपापन्ना पाञ्चाली) तथा गौडीया में भी दो गुण ओजस् तथा कान्ति की सत्ता रहती है। इन रीतियों में ‘ पाञ्चाली’ वामन ने बढ़ायी है।
(C) क्षेमेन्द्र- क्षेमेन्द्र ने अपनी ‘औचित्यविचारचर्चा’ में कहा है कि जिस प्रकार शरीर को अलंकारों के उचित प्रयोग से ही सुंदर बनाया जाता है तथा अनुचित प्रयोग हास्य अस्पद बना देता है, उसी प्रकार काव्य में भी गुण, अलंकार, रस आदि का उचित निवेश ही काव्य का प्राण है। इन काव्योपदानों के प्रयोग में अनौचित्य होने से काव्य हास्य का पात्र हो जायेगा। क्षेमेन्द्र की मूल उक्ति है- औचित्यं रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् ।। अर्थात्, औचित्य ही रससिद्ध काव्य का प्राण है।
क्षेमेन्द्र ने औचित्य के अन्तर्गत अनेक विषयों को रखकर उन्हें पाँच वर्गों में विभक्त किया है। कुल २७ विषय हैं जहाँ औचित्य का ध्यान रखना चाहिए-
- पद, वाक्य तथा प्रबन्ध का औचित्य मीमांसा- दर्शन का विषय है।
- गुण, अलंकार और रस- विषयक औचित्य के लिए काव्यशास्त्र प्रमाण है।
- क्रिया, कारक, लिङ्ग आदि आठ विषयों का औचित्य व्याकरण की परिधि में है।
- देश, कुल और व्रत ये तीन विषय लौकिक हैं जिनका औचित्य लौकव्यवहार पर आश्रित है।
- शेष १० विषय हैं- तत्त्व, सत्त्व, अभिप्राय आदि इनका सम्बन्ध स्वयं कवि से है,इनके औचित्य का उत्तरदायित्व कवि पर ही है।
औचित्य को काव्य का प्रधान तत्त्व कहने की प्रेरणा अपने पूर्वाचार्यों से ही क्षेमेन्द्र को मिली थी।