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UGC NET Paper 2: Sanskrit 24th Sep 2020 Shift 1 (Previous Year Paper)

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Question 1

'उपाध्यायाद् अधीते' इत्यत्र अपादानसञ्ज्ञाविधायकः पाणिनेर्नियमः कः?

  1. AOption (a)

    जनिकर्तुः प्रकृतिः

  2. BOption (b)

    भुवः प्रभवः

  3. COption (c)

    पराजेरसोढः

  4. DOption (d)

    आख्यातोपयोगे

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Correct answer

Answer: (d)D.

आख्यातोपयोगे

Why this answer is correct

स्पष्टीकरण -

  • 'आख्यातोपयोगे' इस सूत्र का विग्रह 'आख्याता उपयोगे' होता है, जिसमें - आख्याता का अर्थ वक्ता‚ उपदेष्टा‚ शिक्षक या अध्यापक होता है और 'उपयोग' का अर्थ, ब्रह्मचर्य आदि नियमों का पालन करते हुए विद्याध्ययन करना होता है।
  • इस सूत्र के अनुसार नियमपूर्वक जिससे अध्ययन होता है, उसके अपादान की अपेक्षा होती है।

उदाहरण -

  • छात्रः शिक्षकात् पठति।
  • उपाध्यायाद् अधीते।

 

अतः स्पष्ट है कि 'आख्यातोपयोगे' यह 'अपादान' संज्ञा का विधान करता है।

 Additional Informationअन्य पर्याय-

  1. जनिकर्तुः प्रवृतिः- इस सूत्र के अनुसार जन्(उत्पन्न होना) इस धातु को उसके कर्ता के कारण के अपादान की अपेक्षा होती है।
  • उदा. कामात् क्रोधः जायते।
  1. भुवः प्रभवश्च- इस सूत्र के अनुसार भु(होना) इस धातु को उसके कर्ता के उद्गम स्थान के अपादान की अपेक्षा होती है।
  • उदा. गंगा हिमालयात् प्रभवति।
  1. पराजेरसोढः- इस सूत्र के अनुसार जिससे हारते है उसके अपादान की अपेक्षा होती है।
  • उदा. अध्ययनात् पराजयते।

Question 2

'सुडनपुंसकस्य' इति पाणिनिसूत्रेण का सञ्ज्ञा विधीयते?

  1. AOption (a)

    संहिता सञ्ज्ञा

  2. BOption (b)

    उपधा सञ्ज्ञा 

  3. COption (c)

    विभाषा सञ्ज्ञा 

  4. DOption (d)

    सर्वनामस्थान सञ्ज्ञा 

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Correct answer

Answer: (d)D.

सर्वनामस्थान सञ्ज्ञा 

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प्रश्ननुवाद- पाणिनि के सूत्र ‘सुडनपुंसकस्य’ के द्वारा कौन सी संज्ञा की जाती है?

स्पष्टीकारण-  पाणिनि के सूत्र ‘सुडनपुंसकस्य’ के द्वारा सर्वनामस्थान सञ्ज्ञा संज्ञा की जाती है।

पाणिनि ने अपने ग्रंथ अष्टाध्यायी में 6 प्रकार के सूत्र बताए है- संज्ञा, परिभाषा, विधि, नियम, अतिदेश तथा अधिकार।

सुडनपुंसकस्य- नपुंसकलिंग से भिन्न ‘सुट्’ (सु, औ, जस्, अम्, औट्- इन पाँच प्रत्ययों की) प्रत्ययों की सर्वनामस्थान संज्ञा होती है।

पाणिनि के सूत्र ‘शि सर्वनामस्थानम्’ के द्वारा भी सर्वनामस्थान सञ्ज्ञा संज्ञा की जाती है। इसका अर्थ है- ‘शि’ की सर्वनामस्थान संज्ञा होती है।

Additional Information

अन्य विकल्पों का स्पष्टीकारण-

**संहिता संज्ञा- ‘**पर: सन्निकर्ष: संहिता’  अर्थात् वर्णोंं की अतिशय समीपता को ‘संहिता’ कहते है।

**उपधा सञ्ज्ञा- ‘**अलोन्त्यात्पूर्व उपधा’  अर्थात् अल् प्रत्यहार से पूर्ववर्ण की ‘उपधा’ संज्ञा होती है। 

**विभाषा सञ्ज्ञा- ‘**न वेति विभाषा’ अर्थात् निषेध और विकल्पों को ‘विभाषा’ कहते है।

Question 3

'ऐधेताम्' इति प्रयोगे कानि धातु-लकार-पुरुष-वचनानि?

  1. AOption (a)

    'एध्' धातुः, लङ्लकारः, प्रथमपुरुषः, द्विवचनम्

  2. BOption (b)

    'एध्' धातुः, लोट्लकारः, प्रथमपुरुषः, एकवचनम्

  3. COption (c)

    'एध्' धातुः, लोट्लकारः, प्रथमपुरुषः, द्विवचनम्

  4. DOption (d)

    'एध्' धातुः, लोट्लकारः, मध्यमपुरुषः, द्विवचनम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

'एध्' धातुः, लङ्लकारः, प्रथमपुरुषः, द्विवचनम्

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद - 'ऐधेताम्' इस प्रयोग में काैन-सी धातु-लकार-पुरुष-वचन हैं?

स्पष्टीकरण - ‘ऐधेताम्’ इस रूप का प्रयोग एध् धातु के लङ्लकार, प्रथमपुरुष-द्विचवन में होता है।

  • एध् धातु का अर्थ होता है - बढ़ना। (यह आत्मनेपद धातु है।)

अतः यहाँ एध् धातु, लङ्लकार, प्रथमपुरुष-द्विवचन उचित विकल्प है।

Hint

एध् (बढ़ना) धातुरूप का लङ्लकार में प्रयोग निम्नलिखित है-

 

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमपुरुषऐधतऐधेताम्ऐधन्त
मध्यमपुरुषऐधथाःऐधेथाम्ऐधध्वम्
उत्तमपुरुषऐधेऐधावहिऐधामहि

Question 4

'द्वित्राः' इत्यत्र कः समासः?

  1. AOption (a)

    अव्ययीभावः

  2. BOption (b)

    तत्पुरुषः

  3. COption (c)

    बहुव्रीहिः

  4. DOption (d)

    द्वन्द्वः

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Correct answer

Answer: (c)C.

बहुव्रीहिः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'द्वित्राः' इस शब्द में कौन सा समास है?

'द्वित्राः' इस सामासिक पद का अर्थ - दो अथवा तीन।

'द्वित्राः' का पदविग्रह - द्वौ वा त्रयो वा द्वित्राः।

स्पष्टीकरण : 

  • इस समास में उभयपद प्रधानता है, अर्थात् दोनोंं पदोंं को महत्व जाता है। किंतु यह द्वंद्व समास का उदाहरण न होते हुए बहुव्रीहि समास का उदाहरण है।  इसका कारण है, कि दो अथवा तीन इस विग्रहवाक्य से अर्थबोध नहीं होता है।
  • बहुव्रीहि समास का लक्षण इस प्रकार है - 
  • प्रायेण अन्यपदार्थप्रधानः बहुव्रीहिसमासः।
  • इस लक्षण के अनुसार प्राधान्य से अन्यपदार्थ को जब महत्व होता है, तब बहुव्रीहि समास होता है।
  • 'द्वित्राः' इस उदाहरण में उभयपदप्रधानता से भी अन्यपदप्रधानता अधिक मात्रा में होने के कारण 'बहुव्रीहिः' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 5

अश्वघोषकृतं रचनाद्वयं किमस्ति?

  1. AOption (a)

    हर्षचरितम्, बुद्धचरितम्

  2. BOption (b)

    बुद्धचरितम्, सौन्दरनन्दम्

  3. COption (c)

    विक्रमाङ्कदेवचरितम्, दशकुमारचरितम्

  4. DOption (d)

    उत्तररामचरितम्, महावीरचरितम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

बुद्धचरितम्, सौन्दरनन्दम्

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : अश्वघोष की दो रचनाएँँ क्या है?

अश्वघोष की रचनाएँँ :

अश्वघोष के नाम से प्रख्यात अनेक ग्रन्थ हैं, परंतु प्रामाणिक रूप से अश्वघोष की साहित्यिक कृतियाँ केवल चार हैं :

  1. बुद्धचरितम्
  2. सौन्दरानंदकाव्यम्
  3. गंडीस्तोत्रगाथा
  4. शारिपुत्रप्रकरणम्

 

अतः स्पष्ट है, 'बुद्धचरितम्, सौन्दरनन्दम्'  यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 6

महाभारताश्रितं रचनाद्वयं किमस्ति?

  1. AOption (a)

    उत्तररामचरितम्, महावीरचरितम्

  2. BOption (b)

    प्रतिज्ञायौगन्धरायणम्, रत्नावली

  3. COption (c)

    अभिज्ञानशाकुन्तलम्, वेणीसंहारम्

  4. DOption (d)

    बुद्धचरितम्, स्वप्नवासवदत्तम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

अभिज्ञानशाकुन्तलम्, वेणीसंहारम्

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : महाभारताश्रित दो रचनाएँँ कौन सी है?

अभिज्ञानशाकुंतलम् :

अभिज्ञानशाकुन्तलम् यह महाकवि कालिदास की सर्वश्रेष्ठ रचना है। इसमें राजा दुष्यन्त तथा शकुन्तला के प्रणय, विवाह, विरह, प्रत्याख्यान तथा पुनर्मिलन की एक सुन्दर कहानी है। महाभारत के आदिपर्व में दुष्यंत - शकुंतला का आख्यान आता है।

वेणीसंहारम् :

वेणीसंहारम् भट्टनारायण द्वारा रचित प्रसिद्ध संस्कृत नाटक है। दुःशासन, द्रौपदी के खुले हुए केश पकड़ के बलपूर्वक घसीटता हुआ द्युतसभा में लाता है, तभी द्रौपदी प्रतिज्ञा करती है कि जबतक दुःशासन के रक्त से अपने बालों को भिगोएगी नहीं तब तक अपने बाल ऐसे ही बिखरे हुए रखेगी। भट्टनारायण रचित इस नाटक के अन्त में भीम दुःशासन का वध करके उसका रक्त द्रौपदी के खुले केश में लगाते हैं और चोटी का गुंफन करते हैं। इसी प्रसंग के आधार भट्ट नारायण ने इस नाटक का शीर्षक 'वेणीसंहार' रखा है। इसमें महाभारत की सम्पूर्ण युद्धकथा को समाविष्ट किया गया है।

अतः स्पष्ट है, *'*अभिज्ञानशाकुन्तलम्, वेणीसंहारम्' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 7

'नैषधीयचरिते' कति सर्गाः सन्ति?

  1. AOption (a)

    एकोनविंशतिः

  2. BOption (b)

    विंशतिः

  3. COption (c)

    एकविंशतिः

  4. DOption (d)

    द्वाविंशतिः

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Correct answer

Answer: (d)D.

द्वाविंशतिः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'नैषधीयचरित में कितने सर्ग है?

नैषधीयचरित के सर्ग :

नैषधीयचरित, श्रीहर्ष द्वारा रचित संस्कृत महाकाव्य है। यह बृहत्त्रयी नाम से प्रसिद्ध तीन महाकव्यों में से एक है। महाभारत का नलोपाख्यान इस महाकाव्य का मूल आधार है।

नैषधीयचरित के सर्गोंं की रचना इस प्रकार है - 

  • इस ग्रंथ के दो भाग हैं- पूर्व और उत्तर।
  • दोनों में ११-११ सर्ग हैं (कुल २२ सर्ग)। इस ग्रन्थ के अन्त में यह निर्दिष्ट नहीं है कि 'ग्रंथ समाप्त हुआ' - इस कारण संशय होता है कि यह ग्रंथ अपूर्ण है।

 

अतः स्पष्ट है, 'द्वाविंशतिः' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 8

रणेषु तस्य प्रहिताः प्रचेतसा सरोषहुंकारपराङ्मुखीकृताः।

प्रहर्तुरेवोरगराजरज्जवो जवेन कण्ठं सभयाः प्रपेदिरे।।

शिशुपालवधस्य श्लोकेऽस्मिन् कस्य दिक्पालस्य वर्णनं कृतम्?

  1. AOption (a)

    रावणस्य

  2. BOption (b)

    वरुणस्य

  3. COption (c)

    यमस्य

  4. DOption (d)

    इन्द्रस्य

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Correct answer

Answer: (b)B.

वरुणस्य

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : शिशुपालवध के प्रस्तुत श्लोक में कौन से दिक्पाल का वर्णन है?

श्लोक का हिंदी अर्थ - 

  • युद्ध में वरुण के द्वारा प्रयुक्त नागपाश उस रावण के क्रोधपूर्वक की गई हुंकार से लौटाए हुए भयभीत होकर वेग से प्रहार करनेवाले के ही (वरुण के ही) गले में जा लगे।

स्पष्टीकरण : 

  • इस श्लोक में प्रयुक्त प्रचेतस् इस शब्द से 'वरुण' इस दिक्पाल का बोध होता है।

अतः स्पष्ट है, 'वरुणस्य' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 9

अथवा कृतवाग्द्वारे वंशेऽस्मिन्पूर्वसूरिभिः। मणौ वज्रसमुत्कीर्णे सूत्रस्येवास्ति मे गतिः।।

पद्येऽस्मिन् 'मे' इति पदं केन सम्बद्धम्?

  1. AOption (a)

    माघेन

  2. BOption (b)

    भारविणा

  3. COption (c)

    कालिदासेन

  4. DOption (d)

    श्रीहर्षेण

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Correct answer

Answer: (c)C.

कालिदासेन

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर :  पद्य में 'मेरी' यह शब्द किस से संबंधित है?

पद्य का हिंदी अर्थ : 

  • अथवा पहले पंडितों के वाग् द्वारा (वचन रूपी दरवाजा) किए हुए इस रघुवंश में मेरी गति हीरे से छेदन की हुई मणि में डोरी की समान है।

स्पष्टीकरण : 

  • प्रस्तुत श्लोक महाकाव्य रघुवंश के प्रथम सर्ग में आता है। रघुवंश महाकवि कालिदास की कृति है। रघुवंश की रचना करते हुए कालिदास अपनी गति हीरे से छेदन की हुई मणि में डोरी की समान है, ऐसा भाव व्यक्त करता है।

अतः स्पष्ट है, 'कालिदासेन' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 10

अधोलिखितेषु ग्रन्थेषु अम्बिकादत्तव्यासस्य रचना वर्तते-

  1. AOption (a)

    प्रतिज्ञायौगन्धरायणम्

  2. BOption (b)

    प्रतिमानाटकम्

  3. COption (c)

    शिवराजविजयम्

  4. DOption (d)

    मृच्छकटिकम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

शिवराजविजयम्

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प्रश्न का हिंदी अनुवाद : अधोलिखित ग्रंथोंं से अम्बिकादत्तव्यास की रचना कौन सी है?

अम्बिकादत्तव्यास की रचनाएँँ :

इन्होंने हिंदी और संस्कृत दोनों भाषाओं में समान अधिकार के साथ रचनाएं की हैं। इनके द्वारा प्रणीत ग्रथों की संख्या 75 है। अम्बिकादत्त व्यासजी ने छत्रपति शिवाजी के जीवन पर 'शिवराजविजयम्' नामक गद्यकाव्य की रचना की है, जो कादंबरी की शैली में रचित है। इनका 'सामवतम्' नामक नाटक 19 वीं शती का श्रेष्ठ नाटक माना जाता है। अम्बिकादत्त व्यास की प्रमुख रचनाएँँ इस प्रकार है - 

  • गणेशशतकम्
  • शिवविवाह (खण्डकाव्य)
  • सहस्रनामरामायणम् - इसमें एक हजार श्लोक हैं।
  • पुष्पवर्षा (काव्य)
  • उपदेशलता (काव्य)
  • साहित्यनलिनी,
  • रत्नाष्टकम् (कथा) - यह हास्यरस से पूर्ण कथासंग्रह है।
  • कथाकुसुमम् (कथासंग्रह)
  • शिवराजविजय (उपन्यास)
  • समस्यापूर्तयः, काव्यकादम्बिनी
  • सामवतम् -- यह नाटक पटना में लिखा गया। इसकी प्रेरणा महाराज लक्ष्मीश्वरसिंह से प्राप्त हुई थी। यह स्कन्दपुराण की कथा पर आधारित है तथा इसमें छह अंक हैं।
  • ललिता नाटिका
  • मर्तिपूजा
  • गुप्ताशुद्धिदर्शनम्
  • क्षेत्र-कौशलम्
  • प्रस्तारदीपिका
  • सांख्यसागरसुधा।

अतः स्पष्ट है, **'शिवराजविजयम्' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 11

सदूषणापि निर्दोषा सखरापि सुकोमला।

नमस्तस्मै कृता येन रम्या रामायणी कथा।।

कस्माद् ग्रन्थादुद्धृतोऽयं श्लोकः?

  1. AOption (a)

    रामायणात्

  2. BOption (b)

    उत्तररामचरितात्

  3. COption (c)

    रघुवंशात्

  4. DOption (d)

    नलचम्पोः

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Correct answer

Answer: (d)D.

नलचम्पोः

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : प्रस्तुत श्लोक किस ग्रंथ से उद्धृत है?

श्लोक का हिंदी अर्थ - 

  • दूषण से युक्त होने पर भी जो निर्दोष है, खर युक्त होने पर भी जो सुकोमल है, ऐसी रमणीया रामायणी कथा जिन्होंने लोक में प्रस्तुत किया है, उन महामुनि वाल्मीकि जी को नमस्कार है।

स्पष्टीकरण : 

  • प्रस्तुत श्लोक त्रिविक्रमभट्ट रचित नलचम्पू में आता है। यह श्लोक विरोधाभासालंकार से युक्त होने से अत्यंत वैशिष्ट्यपूर्ण है।

 

अतः स्पष्ट है, 'नलचम्पोः' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 12

दशरूपकानुसारं फलार्थिभिः प्रारब्धस्य कार्यस्य कति अवस्थाः भवन्ति?

  1. AOption (a)

    पञ्च

  2. BOption (b)

    षट्

  3. COption (c)

    सप्त

  4. DOption (d)

    अष्ट

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Correct answer

Answer: (a)A.

पञ्च

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : दशरूपक के अनुसार फलार्थी ने आरंभ किये कार्य की कितनी अवस्थाएँँ होती है?

दशरूपक के अनुसार कार्यावस्थाएँँ :

अवस्था पञ्चकार्यस्य प्रारब्धस्य फलार्थिभिः।

आरम्भयत्नप्राप्त्याशानियताप्तिफलागमाः।।

  • अर्थ -  फलार्थी ने आरंभ किये कार्य की पाँँच अवस्थाएँँ होती है - 
  • आरम्भ
  • यत्न
  • प्राप्त्याशा
  • नियताप्ति
  • फलागम

अतः स्पष्ट है, 'पञ्च' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 13

बर्नेल-महोदयानुसारं ब्राह्मीलिपेरक्षराणामुत्पत्तिः सञ्जाता-

  1. AOption (a)

    हिमिअरेटिक-अक्षरेभ्यः

  2. BOption (b)

    अरमइक-अक्षरेभ्यः

  3. COption (c)

    सिलोन-अक्षरेभ्यः

  4. DOption (d)

    मिसर-अक्षरेभ्यः

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Correct answer

Answer: (b)B.

अरमइक-अक्षरेभ्यः

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प्रश्नानुवाद- बर्नेल महोदय के अनुसार ब्राह्मीलिपि की उत्पत्ति हुई है-

स्पष्टीकरण- बर्नेल महोदय के अनुसार अरमइक अक्षरों से ब्राह्मीलिपि की उत्पत्ति हुई है। 

ब्राह्मी लिपि को वर्तमान समय में हमारे समक्ष प्रकट करने का श्रेय पश्चात्य विद्वान् जेम्स प्रिंसेप (1837 ई) को जाता है। उन्होंने ही सर्वप्रथम सांची के स्तूप पर अंकित ब्राह्मी लिपि अक्षरों में दानं शब्द को पढ़ा तथा इसी शब्द के आधार पर जेम्स प्रिंसेप ने ब्राह्मी लिपि की वर्णमाला तैयार की। ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में दो मत है- स्वदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त तथा विदेशी उत्पत्ति सिद्धान्त। विदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त के अंतर्गत ब्राह्मी को भारत से बाहर यूनानी तथा सेमेटिक स्रोत से उत्पन्न माना जाता है। 

सेमेटिक उत्पत्ति का सिद्धान्त- सन् 1806 ई. में सर विलियम जोन्स ने ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया उन्होंने ब्राह्मी लिपि को सेमेटिक मूल से विकसित लिपि माना, किन्तु सेमेटिक मूल को लेकर विद्वानों में तीन मत हैं- 

  1. उत्तरी सेमेटिक मूल- इस विचार के पोषक ब्यूलर है। उनका मानना है कि भारतीय व्यापार के माध्यम से उत्तरी सेमेटिक अर्थात् पश्चिमी एशियाई क्षेत्र के सम्पर्क में आए। वहीं से लेखन कला की प्रेरणा प्राप्त करके भारतीयों ने लिपि लिपि का निर्माण किया।
  2. दक्षिणी सेमेटिक मूल- इस विचार के पोषक टेलर आदि है। दक्षिणी सेमेटिक लेखन पद्धतियों में अरबी लेखन-पद्धति आती हैं।
  3. फिनीशियन मूल- इस विचार के पोषक वेबर है। बर्नेल भी इसी मत के पोषक हैं। ​बर्नेल का मत है कि फिनिशियन से अरमाइक लिपि तथा इससे ब्राह्मी लिपि का जन्म हुआ ह��। ​​फिनिशिया की सभ्यता द्वारा अविष्कृत वर्णमाला थी जिसमें हर वर्ण एक व्यंजन की ध्वनी बनता था। क्योंकि फिनिशिया लोग समुद्री सौदागर थे इसलिए उन्होंने इस अक्षरमाला को दूर-दूर तक फैला दिया और उनकी देखा-देखी और सभ्यताएँ भी अपनी भाषाओँ के लिए इसमें फेर-बदल करके इसका प्रयोग करने लगीं। अशोक कालीन ब्रह्मी लिपि का फिनिशियन लिपि से साम्य प्रतीत होता है।​

Question 14

कस्य मतानुसारं फिनिशिअन-लिपेः 22 अक्षरेभ्यः ब्राह्मीलिपेः 22 अक्षरणामुत्पत्तिरभवत्-

  1. AOption (a)

    बूलरमहोदयस्य

  2. BOption (b)

    आइजकटेलरमहोदयस्य

  3. COption (c)

    लेनोर्मंट-महोदयस्य

  4. DOption (d)

    बर्नेल-महोदयस्य

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Correct answer

Answer: (a)A.

बूलरमहोदयस्य

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- किसके मत के अनुसार फिनिशियन लिपि के 22 अक्षरों से ब्राह्मी लिपि के 22 अक्षरों की उत्पत्ति हुई है?

स्पष्टीकरण- बूलर के अनुसार फिनिशियन लिपि के 22 अक्षरों से ब्राह्मी लिपि के 22 अक्षरों की उत्पत्ति हुई है।

ब्राह्मी लिपि- ब्राह्मी लिपि भारत की एक प्राचीन लिपि है जिससे कई एशियाई लिपियों का विकास हुआ है। प्राचीन ब्राह्मी लिपि के उत्कृष्ट उदाहरण सम्राट अशोक द्वारा ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में बनवाये गये शिलालेखों के रूप में अनेक स्थानों पर मिलते हैं। नये अनुसंधानों के आधार 6 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के लेख भी मिले है। ब्राह्मी भी खरोष्ठी की तरह ही पूरे एशिया में फैली हुई थी। इस लिपि को वर्तमान समय में हमारे समक्ष प्रकट करने का श्रेय पश्चात्य विद्वान् जेम्स प्रिंसेप (1837 ई) को जाता है। इस लिपि के उत्पत्ति के अनेक सिद्धांतों में एक सेमेटिक सिद्धांत भी है। इसी सिद्धांत के अंतर्गत फिनीशियन सिद्धांत है। फिनीशिया एक प्राचीन सभ्यता है जो मध्य-पूर्व के उर्वर अर्धचंद्र के पश्चिमी भाग में भूमध्य सागर के तट के साथ-साथ 1050 BC के समय विकसित हुई।

​​पाश्चात्य विद्वान प्रो. बूलर जैसे प्रसिद्ध पुरालिपिविद की मान्यता रही कि ब्राह्मी लिपि का निर्माण फिनीशियन लिपि के आधार पर हुआ। इसके लिए उन्होंने एरण (मध्य प्रदेश) के एक सिक्के का प्रमाण भी दिया था। एरण से तांबे के कुछ सिक्के मिले हैं, जिनमें से एक पर 'धमपालस' शब्द के अक्षर दाईं ओर से बाईं ओर को लिखे हुए मिलते हैं। चूंकि, सेमेटिक लिपियां भी दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी जाती थीं, इसलिए बूलर ने इस अकेले सिक्के के आधार पर यह कल्पना कर ली कि आरंभ में ब्राह्मी लिपि भी सेमेटिक लिपियों की तरह दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी जाती थी।

Question 15

किं पुराणं महाभारतस्य परिशिष्टम्?

  1. AOption (a)

    वायुपुराणम्

  2. BOption (b)

    पद्मपुराणम्

  3. COption (c)

    मत्सपुराणम्

  4. DOption (d)

    हरिवंशपुराणम्

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Correct answer

Answer: (d)D.

हरिवंशपुराणम्

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प्रश्नानुवाद- कौन सा पुराण महाभारत का परिशिष्ट है?

स्पष्टीकरण- हरिवंशपुराण महाभारत का परिशिष्ट है।

महर्षि कृष्णद्वैपायण वेदव्यास को पुराणों एवं महाभारत का रचयिता माना जाता है। इतिहास (महाभारत) तथा पुराण को संयुक्त रूप से नारद ने ‘पंचम वेद’ कहा है- ‘इतिहास-पुराणं पञ्चमं वेदानां वेदम्’ । वैदिक साहित्य के अतिरिक्त महाभारत में भी कहा गया है- ‘इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत्’। अर्थात् वेद के अर्थ का पल्लवन इतिहास और पुराण के द्वारा करना चाहिए। महाभारत में आदि पर्व से लेकर स्वर्गारोहण पर्व तक कुल 18 पर्व हैं। किन्तु इन पर्वों के अतिरिक्त एक परिशिष्ट पर्व या खिल पर्व भी है जिसे हरिवंश पर्व या हरिवंश पुराण कहा जाता है।

 

हरिवंशपुराण या हरिवंशपर्व- यह परिशिष्ट रूप में भी महाभारत का अभिन्न अंग है। धवन्यालोक में आनन्दवर्धन ने कहा है कि महाभारत की समाप्ति हरिवंश पर्व पर होती है। इसकी कथा वैशम्पायन ने जनमेजय को सुनाया था। इसमें 16374 श्लोक है। धार्मिक दृष्टि से पुत्र प्राप्ति के लिए इस ग्रंथ का श्रवण श्रेयस्कर बताया जाता है। इसमें यादवों की कथा विस्तारपूर्वक दी गई गई है। इसके तीन खण्ड है-

  1. हरिवंशपर्व- इसमें श्रीकृष्ण के वृष्णि आदि पूर्वजों का वर्णन है।
  2. विष्णुपर्व- यह सबसे बड़ा खण्ड है। इसमें श्रीकृष्ण के लीलाओं का वर्णन है। इसके अतिरिक्त, कृष्ण के पुत्र तथा पौत्र के विवाहों का वर्णन है।
  3. भविष्यपर्व- इसमें विष्णु के अवतारों का वर्णन, शिव और विष्णु की उपासना का समन्वय एवं शिव के दो उपासकों की कृष्ण द्वारा पराजय की कथा है। इसके अतिरिक्त, महाभारत और हरिवंश के माहात्म्य का निरूपण है।

Question 16

मनुमते वेदप्रदानादाचार्यं परिचक्षते-

  1. AOption (a)

    गुरुम्

  2. BOption (b)

    उपाध्यायम्

  3. COption (c)

    पितरम्

  4. DOption (d)

    गुरुतरम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

पितरम्

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प्रश्नानुवाद- मनु के मत में वेद (की शिक्षा) प्रदान करने वाले आचार्य को कहा जाता है-

स्पष्टीकरण- मनु के मत में वेद (की शिक्षा) प्रदान करने वाले आचार्य को पिता कहा जाता है।

प्राचीन भारत में मानव जीवन की व्यवस्था के लिए ‘कल्प’ नामक वेदांग के अंतर्गत धर्मसूत्र भी लिखे गये है। धर्मशास्त्र में प्राचीनतम ग्रंथ मनुस्मृति है। इसके रचनाकर मनु है। मनु को मानव-जाति का जनक कहा गया है। मनुसंहिता या मनुस्मृति मूलतः मनु के द्वारा ऋषियों दिया गया उपदेश है। मनुस्मृति में वेदों के सारभूत धर्म के स्वरूप का वर्णन ही मुख्य विषय है। इसमें 12 अध्ययाय है। मनुस्मृति के दूसरे अध्याय में मनु ने इस प्रश्न का उत्तर देतें है कि आचार्य को पिता क्यूँ कहते हैं-

वेदप्रदानादाचार्यं पितरं परिचक्षते। न ह अस्मिन् यूज्यते कर्म किञ्चिदा मौञ्जिबन्धनात् ।।

 

उपनयन संस्कार कराने से आचार्य को पिता कहते है, क्योंकि जब तक उपनयन नहीं होता तब तक श्रौत अथवा स्मार्त किसी भी कर्म को करने की योग्यता बालक में नहीं आ पाती।

 

अन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण-

  1. गुरु- निषेदकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि। सम्भावयति चान्नेन स विप्रो गुरुरुच्यते।। 

जो शास्त्रानुसार गर्भधानादि संस्कारों को करता है और अन्नादि के द्वारा बढाता है,उसे ब्राह्मण को ‘गुरु’ कहते है। 2. उपाध्याय- एकदेशं तु वेदस्य वेदांगन्यपि  वा पुनः। यो अध्यापयति वृत्त्यर्थमुपाध्यायः स उच्यते।। 

जो ब्राह्मण वेद के एकदेश को तथा वेदांगों को जीविका के लिए पढ़ता है, उसे ‘उपाध्याय’ कहते है।

Question 17

'ब्राह्मीलिपेराविष्कारका भारतीया आसन्' इति को मन्यते?

  1. AOption (a)

    जार्जब्यूलर-महोदयः

  2. BOption (b)

    बर्नेल-महोदयः

  3. COption (c)

    वेबर-महोदयः

  4. DOption (d)

    एडवर्डथामस-महोदयः

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Correct answer

Answer: (d)D.

एडवर्डथामस-महोदयः

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¯प्रश्नानुवाद- ब्राह्मी लिपि के लिपि ‘आविष्कारकर्ता भारतीय हैं’ ऐसा कौन मानता है?

स्पष्टीकरण- ब्राह्मी लिपि के लिपि ‘आविष्कारकर्ता भारतीय हैं’ ऐसा एडवर्ड थामस मानता है।

ब्राह्मी लिपि भारत की प्राचीनतम ज्ञात लिपियों में से एक है। ब्राह्मी लिपि को वर्तमान समय में हमारे समक्ष प्रकट करने का श्रेय पश्चात्य विद्वान् जेम्स प्रिंसेप (1837 ई) को जाता है। ब्राह्मी लिपि के भारतीय उत्पत्ति-मूलक सिद्धांतो को मुख्य रूप से दो ��ागों में विभक्त किया जाता है- 

  1. आर्य उत्पत्ति का सिद्धान्त- कुछ विद्वान जैसे कनिघम ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति आर्य स्रोत से मानते है जिनका मूल स्थान उत्तर भारत माना जाता है। इनकी प्रमुख भाषा संस्कृत थी।
  2. द्रविड़ उत्पत्ति का सिद्धान्त- कुछ विद्वान जैसे लासेन ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति द्रविड़ स्रोत से मानते है जिनका मूल स्थान उत्तर भारत माना जाता है। इनकी प्रमुख भाषा तमिल थी।

पाश्चात्य विद्वान विद्वान भी लासेन के मत का अनुसरण किया है। इस मत के मूल विचार को इस विचारधारा से प्रभावित  किया है कि आर्य भारत के बाहर से आए थे। उनसे पहले द्रविड़ यहाँ के मूल निवासी थे। वे सांस्कृतिक दृष्टि से अपेक्षाकृत अधिक परिपक्व थे। आर्यों ने द्रविड़ों से लेखन कला ग्रहण की। 

अतिरिक्त जानकारी

  • अशोक ने अपने लेखों की लिपि को 'धम्मलिपि' का नाम दिया है। उसके लेखों में कहीं भी इस लिपि के लिए 'ब्राह्मी' नाम नहीं मिलता। लेकिन बौद्धों, जैनों तथा ब्राह्मण-धर्म के ग्रंथों के अनेक उल्लेखों से ज्ञात होता है कि इस लिपि का नाम 'ब्राह्मी' लिपि ही रहा होगा।
  • बौद्ध ग्रंथ 'ललितविस्तर' में 64 लिपियों के नाम दिए गए हैं। इनमें पहला नाम 'ब्राह्मी' है और दूसरा 'खरोष्ठी'।
  • जैनों के 'पण्णवणासूत्र' तथा 'समवायांगसूत्र' में 16 लिपियों के नाम दिए गए हैं, जिनमें से पहला नाम 'बंभी' (ब्राह्मी) का है। भगवतीसूत्र' में सर्वप्रथम 'बंभी' (ब्राह्मी) लिपि को नमस्कार करके (नमो बंभीए लिविए) सूत्र का आरंभ किया गया है।

Question 18

'कर्षको वृत्तिक्षीणः प्रज्ञाशौचयुक्तः' इति कौटिलीयमते कस्य वैशिष्ट्यमस्ति?

  1. AOption (a)

    वैदेहकस्य

  2. BOption (b)

    तापसस्य

  3. COption (c)

    गृहपतिकस्य

  4. DOption (d)

    ब्रह्मचारिणः

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Correct answer

Answer: (c)C.

गृहपतिकस्य

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प्रश्नानुवाद- ‘कृषक, गरीब, बुद्धिमान, पवित्र हृदय वाला’ ये कौटिल्य के अनुसार किसके विशेषण है?

स्पष्टीकरण- कृषक, गरीब, बुद्धिमान, पवित्र हृदय वाला’ ये कौटिल्य के अनुसार गृहपतिक के विशेषण है।

कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र के प्रथम अधिकरण ‘विनयाधिकरण’ में गुप्तचरों की नियुक्ति के विषय में बताया है। उनके अनुसार गुप्तचर दो प्रकार के होते हैं- भ्रमणशील और स्थायी। भ्रमणशील गुप्तचर चार प्रकार के होतें हैं- सत्री (राजा के सम्बन्धी), तीक्ष्ण (शूर), रसद (आलसी) तथा भिक्षुकी। स्थायी गुप्तचर पाँच प्रकार के होते हैं-

  1. कापटिक- परमर्मज्ञ: प्रगल्भश्च छात्र: अर्थात् दूसरे के मर्म को जानने वाला, प्रगल्भ तथा विद्यार्थी की वेशभूषा में रहने वाला गुप्तचर कापटिक कहलाता है।
  2. उदास्थित- प्रव्रज्याप्रत्यवसित: प्रज्ञाशौचयुक्तः उदास्थित: अर्थात् बुद्धिमान, सदाचारी, सन्यासी के वेश में रहने वाले गुप्तचर उदास्थित कहलाता है।
  3. गृहपतिक- कर्षको वृत्तिक्षीणः प्रज्ञाशौचयुक्तः अर्थात् गरीब, बुद्धिमान, पवित्र हृदय वाला, कृषक के वेश में रहने वाला गुप्तचर गृहपतिक कहलाता है।
  4. वैदहक- वाणिज्यको वृत्तिक्षीणः प्रज्ञाशौचयुक्तः अर्थात् बुद्धिमान, पवित्र हृदय वाला, व्यापारी के वेश में रहने वाला गुप्तचर वैदहक कहलाता है।
  5. तापस- मुंडो जटिलो वा वृत्तिकाम:  अर्थात् जीविका के लिए सिर मुड़ाए या जटा धारण किए हुए, राजा का कार्य करने वाला गुप्तचर तापस कहलाता है।

Question 19

मनुमते कः द्विजः सान्वयः शूद्रत्वं प्राप्नोति अधोलिखितेषु?

  1. AOption (a)

    वेदं परैत्यज्य अन्यत्र श्रमं कुर्वन्

  2. BOption (b)

    प्रातरुत्थाय स्नानमकुर्वन्

  3. COption (c)

    ब्राह्मणग्रन्थान् वेदं स्वीकुर्वन्

  4. DOption (d)

    एकेश्वरवादं निन्दयन्

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Correct answer

Answer: (a)A.

वेदं परैत्यज्य अन्यत्र श्रमं कुर्वन्

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प्रश्नानुवाद- मनु के मत में निम्न में से कौन सा द्विज कुटुम्ब सहित शुद्रत्वं को प्राप्त करता है?

स्पष्टीकरण- मनु के मत में वह द्विज जो वेदाध्ययन छोड़कर अन्यत्र श्रम करता है, वह कुटुम्ब सहित शुद्रत्वं को प्राप्त कर लेता है।

प्राचीन भारत में मानव जीवन की व्यवस्था के लिए ‘कल्प’ नामक वेदांग के अंतर्गत धर्मसूत्र भी लिखे गये है। धर्मशास्त्र में प्राचीनतम ग्रंथ मनुस्मृति है। इसके रचनाकर मनु है। मनु को मानव-जाति का जनक कहा गया है। मनुसंहिता या मनुस्मृति मूलतः मनु के द्वारा ऋषियों दिया गया उपदेश है। मनुस्मृति में वेदों के सारभूत धर्म के स्वरूप का वर्णन ही मुख्य विषय है। इसमें 12 अध्ययाय है। महर्षि मनु मनुस्मृति में सभी वर्णों के क्रमों का उल्लेख किया है। इसी क्रम में मनुस्मृति के दूसरे अध्याय में द्विजों के लिए वेद की महत्ता का प्रतिपादन निम्न प्रकार से करते हैं-

यो अनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् । स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः ।। 

जो द्विज वेद को न पढ़कर अन्यत्र शास्त्रों में परिश्रम करता है वह जीवित रहते ही सकुटुम्ब शीघ्र शूद्रत्व को प्राप्त हो जाता है। उनके अनुसार द्विज तप करता हुआ सदा वेद का ही अभ्यास करता रहे, क्योंकि इस लौक में वेद का अभ्यास ही ब्राह्मण का सबसे बड़ा तप कहा गया है- वेदमेव सदाभ्यस्येत्तपस्पप्स्यन्द्विजोत्तमः। वेदाभ्यासो  हि विप्रस्य तपः परमिहोच्यते।**।

Question 20

अधोऽङ्कितेषु ब्राह्मीलिपेरुद्भवसिद्धान्तेषु कतमो विदेशी-सिद्धान्तो नास्ति?

  1. AOption (a)

    फोनिशियन-उद्भवसिद्धान्तः

  2. BOption (b)

    द्रविड-उद्भवसिद्धान्तः

  3. COption (c)

    दक्षिणी-सामीलिपि-उद्भवसिद्धान्तः

  4. DOption (d)

    उत्तरी-सामीलिपि-उद्भवसिद्धान्तः

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Correct answer

Answer: (b)B.

द्रविड-उद्भवसिद्धान्तः

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प्रश्नानुवाद- निम्नलिखित में कौन ब्राह्मी लिपि के उद्भव सिद्धांत में विदेशी सिद्धांत नहीं है?

स्पष्टीकरण- ब्राह्मी लिपि के उद्भव सिद्धांत में द्रविड़ सिद्धांत भरतीय है।

ब्राह्मी लिपि भारत की प्राचीनतम ज्ञात लिपियों में से एक है। सबसे प्राचीन लेख ‘एरण’ से प्राप्त सिक्का है, जो 350 ई. पू. का है। इसके पश्चात् अशोक के शिलालेख और स्तम्भ-लेख आदि हैं। इनका समय 250 ई. पू. है। ये कालसी, दिल्ली, जौगढ़, गिरना�� आदि जगहों से प्राप्त हुए हैं। तत्पश्चात् ईसा पूर्व ब्राह्मी लिपि में ये ग्रंथ अभिलेख मिलते हैं।ब्राह्मी लिपि को वर्तमान समय में हमारे समक्ष प्रकट करने का श्रेय पश्चात्य विद्वान् जेम्स प्रिंसेप (1837 ई) को जाता है। उन्होंने ही सर्वप्रथम सांची के स्तूप पर अंकित ब्राह्मी लिपि अक्षरों में दानं शब्द को पढ़ा तथा इसी शब्द के आधार पर जेम्स प्रिंसेप ने ब्राह्मी लिपि की वर्णमाला तैयार की। बाद में, पाश्चात्य विद्वान प्रो. ब्यूलर ने विशेष अध्ययन के बाद इस लिपि की वैज्ञानिक तालिका प्रस्तुत कर बताया कि ब्राह्मी लिपि में (41) अक्षर हैं और (9) स्वर ,(32) व्यंजन हैं। ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में दो मत है-

(क) विदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त- विदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त के अंतर्गत विद्वानों के निम्न मत है-

  1. यूनानी उत्पत्ति का सिद्धान्त- कुछ यूरोपीय विद्वानों का विचार है कि ब्राह्मी की उत्पत्ति यूनानी वर्णों से हुई है। मूलर, सेनार्ट, प्रिंसेप और विल्सन ने अपने तर्कों के माध्यम से ब्राह्मी लिपि को पाश्चात्य लिपि स्वीकार करने पर तर्क दिया है।
  2. सेमेटिक उत्पत्ति का सिद्धान्त- सन् 1806 ई. में सर विलियम जोन्स ने ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया उन्होंने ब्राह्मी लिपि को सेमेटिक मूल से विकसित लिपि माना, किन्तु सेमेटिक मूल को लेकर विद्वानों के विचारों में असमानताएं हैं।

​

  1. उत्तरी सेमेटिक मूल- इस मत को सर्वप्रथम व्यक्त करने का श्रेय मुख्यतः डाँ. बूलर को जाता है।
  2. दक्षिण सेमेटिक मूल- टेलर, डीक और कैनन महोदय ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति दक्षिण सेमेटिकमूल से मानते हैं।
  3. फेनेशियन मूल की उत्पत्ति- ब्राह्मी लिपि तथा फेनेशियन वर्णों में साम्यता द्रष्टव्य है जैसे ट, थ, ठ, झ, क और ग वर्णों की समानता है।

​

स्वदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त- इस मत को मानने वाले विद्वान ब्राह्मी को ब्रह्मा से जोड़कर भारतीय सिद्ध करने का प्रयास करते है। ऐसे विद्वान इस लिपि की उत्प्पति निम्न दो भारतीय स्रोतों से मानते है। 

 

  1. आर्य उत्पत्ति का सिद्धान्त- कुछ विद्वान जैसे कनिघम ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति आर्य स्रोत से मानते है जिनका मूल स्थान उत्तर भारत माना जाता है। इनकी प्रमुख भाषा संस्कृत थी।
  2. द्रविड़ उत्पत्ति का सिद्धान्त- कुछ विद्वान जैसे कनिघम ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति द्रविड़ स्रोत से मानते है जिनका मूल स्थान उत्तर भारत माना जाता है। इनकी प्रमुख भाषा तमिल थी।

Question 21

"हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेकऽआसीत्।

सदाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।।"

अस्मिन् मन्त्रे को ऋषिः कश्छन्दः?

(A) हिरण्यगर्भऋषिः

(B) जगती छन्दः

(C) प्रजापतिऋषिः

(D) त्रिष्टुप् छन्दः

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (C)

  2. BOption (b)

    (A) एवम् (D)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (B) एवम् (C)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A) एवम् (D)

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प्रश्नानुवाद- इस मंत्र में ऋषि कौन है तथा कौन सा छंद है?

स्पष्टीकरण- इस मंत्र में हिरण्यगर्भ ऋषि तथा त्रिष्टुप् छंद है।

ऋग्वेद में लगभग 12 दार्शनिक सूक्त हैं जिनमें प्रथम बार ‘सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई, इसका अधिष्ठाता देव कौन है, वह कौन सी सामग्री थी जिससे स्वर्ग लोक और पृथ्वी लोक को बनाया गया’ इन सब दार्शनिक प्रश्नों पर प्रकाश डाला गया है। सृष्टि की उत्पत्ति विषयक समस्या का समाधान करने वाले सर्वाधिक तीन महत्वपूर्ण सूक्तों में पूरुष सूक्त (10.10) के पश्चात् हिरण्यगर्भ सूक्त का स्थान है। इसमें सृष्टि की उत्पत्ति हिरण्यगर्भ से बतलाई गई है। इस सूक्त के अनुसार सृष्टि से पूर्व सर्वत्र जल ही जल था। उन जलों में बृहद् अण्डाकार तत्त्व उत्पन्न हुआ जो हिरण्यगर्भ कहलाया।

हिरण्यगर्भ सूक्त ऋग्वेद के 10 वें मण्डल का 121 वाँ सूक्त है। इस सूक्त का ऋषि प्रजापति पुत्र हिरण्यगर्भ माना गया है। इस सूक्त में हिरण्यगर्भ अथवा ‘क’ नामक प्रजापति की स्तुति की गई है। हिरण्यगर्भ सूक्त के कुल 10 मंत्रो में त्रिष्टुप् छन्द का प्रयोग किया गया है।इसके प्रत्येक मंत्र के (10 वें मंत्र को छोड़कर) चतुर्थ पाद में ‘ कस्मै देवाय हविषा विधेम’ आया है। इसका प्रथम मंत्र निम्नलिखित-

मंत्र- हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेको आसीत्। स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।।

अनुवाद- हिरण्यगर्भ सबसे पहले उत्पन्न हुआ। उत्पन्न होते ही उत्पन्न हुए ब्रह्माण्ड का अकेला स्वामी हो गया।  वह पृथ्वी और इस द्युलोक  को धारण करता है। किस (अन्य) देवता की हवि द्वारा हम पूजा करें? अर्थात् किसी की भी नहीं। 

व्याख्या- प्रस्तुत मंत्र में बताया गया है कि उन आदिम जलों से जो सृष्टि के पूर्व सर्वत्र विद्यमान थे, हिरण्यगर्भ की उत्पत्ति हुई। उसी हिरण्यगर्भ से समस्त ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ। वस्तुतः जब हिरण्यगर्भ दो भागों में विभक्त हुआ तब एक भाग से स्वर्ग लोक बना और दूसरे भाग से पृथिवी लोक बना। इस प्रकार वह हिरण्यगर्भ ही एकमात्र सबका अधिष्ठाता देव बन गया। उसी से अपनी महिमा से स्वर्गलोक और पृथिवी लोक को धारण किया। ऐसे महान् देवता के अतिरिक्त अन्य किस देवता की हवि द्वारा पूजा की जा सकती है अर्थात् किसी की भी नहीं।

Question 22

अधुना-प्राप्तेषु सामवेदस्य ब्राह्मणेषु द्वौ ब्राह्मणौ कौ स्तः?

(A) चरक-ब्राह्मणम्

(B) गालव-ब्राह्मणम्

(C) संहितोपनिषद्-ब्राह्मणम्

(D) वंशब्राह्मणम्

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (C)

  2. BOption (b)

    (A) एवम् (D)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (B) एवम् (C)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(C) एवम् (D)

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प्रश्नानुवाद- सम्प्रति सामवेद के कौन से दो ब्राह्मण है?

स्पष्टीकरण- संहितोपनिषद् ब्राह्मण तथा वंश ब्राह्मण सम्प्रति सामवेद दो ब्राह्मण है।

ब्राह्मण- शतपथ ब्राह्मण के अनुसार ब्राह्मण शब्द की व्युत्पत्ति ब्रह्मन् शब्द से अण् (अ) प्रत्यय करने पर हुई, जिसका अर्थ है, मंत्र, यज्ञ और पवित्रज्ञान या रहस्यात्मक विद्या। अर्थात् जिन ग्रंथों में वेदमन्त्रों की व्याख्या, यज्ञों की व्याख्या व विवरण और वैदिक रहस्यों का वर्णन किया जाता है, उन्हें ब्राह्मण ग्रंथ कहते हैं। भटभास्कर के अनुसार- ‘ब्राह्मणं नाम कर्मणस्तन्मन्त्राणां’ अर्थात् कर्मकाण्ड और मंत्रों की व्याख्या वाले ग्रंथों को ब्राह्मण कहते है। प्रत्येक वेद के अपने-अपने ब्राह्मण ग्रन्थ होते है।

मीमांसा दर्शन के भाष्यकार शबरस्वामी के अनुसार ब्राह्मणों के हेतु, निर्वचन, निंदा, प्रशंसा, संशय, विधि, परक्रिया, पुराकल्प, व्यवधारण-कल्पना तथा उपमान दस विषय है - हेतुनिर्वचनं निन्दा प्रशंसा संशयो विधिः। परक्रिया पुराकल्पो व्यवधारण-कल्पना। उपमानं दशैते तु विधयो ब्रह्मनस्य वै।

सामवेदीय ब्राह्मण- अन्य वेदों के ब्राह्मणों की अपेक्षा सामवेद के ब्राह्मणों की संख्या अधिक है। सामवेद के 8 ब्राह्मण उपलब्ध हैं। सायण ने इनका उल्लेख इस प्रकार किया है।-

 अष्टौ हि ब्राह्मणग्रंथाः प्रौढं ब्राह्मणमादिमम्। षड् विंशाख्यं द्वितीयं स्यात् ततः सामविधीर्भवेत।                                                              

आर्षेयं देवताध्यायो भवेदुपनिषत् ततः। संहितोपनिषद् वंशो ग्रंथा अष्टावितीरिताः।।  

  1. तांड्य ब्राह्मण (प्रौढ, पंचविंश)
  2. षड् विंश ब्राह्मण
  3. सामविधान ब्राह्मण
  4. आर्षेय ब्राह्मण
  5. देवताध्याय ब्राह्मण
  6. उपनिषद् ब्राह्मण ( मंत्रब्राह्मण, छान्दोग्यब्राह्मण)
  7. संहितोपनिषद् ब्राह्मण
  8. वंशब्राह्मण

 

संहितोपनिषद् ब्राह्मण- इस ब्राह्मण में पाँच खण्ड हैं। प्रत्येक खण्ड सूत्रों में विभक्त हैं। साम-गान के विविध रूपों का वर्णन है।

वंश ब्राह्मण- इस ब्राह्मण में तीन खण्ड हैं। इसमें सामवेद के ऋषियों की सूची वर्णन है।

Question 23

वेदभाष्यकारेषु कौ याज्ञिकौ भाष्यकारौ स्तः?

(A) स्वामी दयानन्दः सरस्वती

(B) सायणः

(C) उवटः

(D) आत्मानन्दः

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (C)

  2. BOption (b)

    (A) एवम् (D)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (B) एवम् (C)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(B) एवम् (C)

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प्रश्ननुवाद- वेद के भाष्यकारों में कौन याज्ञिक भाष्यकार हैं?

स्पष्टीकरण- सामान्यतः वैदिक साहित्य के व्याख्याकर्ता ही वैदिक भाष्यकारों कहलातें हैं- 

(क) वैज्ञानिक भाष्यकार- जो भाष्यकार निरुक्त तथा व्याकरण के आधार पर वेद मंत्रो की व्याख्या करते है, वे वैज्ञानिक भाष्यकार कहे जातें हैं। इनकी दो श्रेणियाँ है- 

  1. ​​प्राचीन भाष्यकार-  इस कोटि के भाष्यकारों में आचार्य यास्क (600 ई० पू०) का नाम आता है। इन्होंने अपने ग्रंथ निरुक्त में प्रायः 600 ऋचाओं की पूर्ण या आंशिक व्याख्या की है।
  2. अर्वाचीन भाष्यकार- इस कोटि के भाष्यकारों में स्वामी दयानन्द (1824-1883 ई०) का नाम आता है। स्वामी दयानन्द ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन संहिता का तथा ऋग्वेद के 7 मण्डलों (80 सूक्त तक) का संस्कृत और हिन्दी में भाष्य किया है। इन्होंने निरुक्त तथा व्याकरण के आधार पर वेद मंत्रो की व्याख्या की।

 

​​(ख) याज्ञिक भाष्यकार- जो भाष्यकार वेद मंत्रो की यज्ञपरक व्याख्या करते है, वे याज्ञिक भाष्यकार कहे जातें हैं। इस कोटि के भाष्यकारों में सर्वप्रमुख सायण (1315-1378 ई०) है। ये आन्ध्र प्रान्त के विजयनगर राज्य के निवासी थे।इनका चारों वेदों में भाष्य प्राप्त होता है। इनके भाष्यों का नाम ‘वेदार्थप्रकाश’ है। इनके द्वारा रचित 25 ग्रंथो में से तैत्तरीय संहिता, ऋग्वेद संहिता, सामवेद संहिता, शुक्ल यजुर्वेद संहिता तथा अथर्वेद संहिता पर भाष्य उपलब्ध है। उव्वट (1000 ई०) की भी इसी कोटि के आचार्य है। इन्होंने मुख्यतः यजुर्वेद की माध्यनन्दिन संहिता पर भाष्य किया है जो निर्णयसागर प्रेस, बम्बई से प्रकाशित है। 

(ग) आध्यात्मिक भाष्यकार- इस कोटि में आत्मानन्द (1300 ई०) आते है। इनका ऋग्वेद के ‘अस्यवामीय’ सूक्त पर अध्यात्म परक भाष्य है। इन्होंने अपने भाष्य में स्वयं कहा है स्कन्दस्वामी आदि का भाष्य यज्ञपरक है तथा निरुक्त अधिदेवतपरक है किन्तु इनका भाष्य अध्यात्म पर आधारित है। इस भाष्य का मूल विष्णुधर्मोत्तर है। ​

Question 24

अधुना तैत्तिरीय-नाम्ना प्रसिद्धौ कौ ग्रन्थौ स्तः?

(A) ब्राह्मणम्

(B) व्याकरणम्

(C) उपनिषत्

(D) छ्न्दः

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (C)

  2. BOption (b)

    (A) एवम् (D)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (B) एवम् (C)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(A) एवम् (C)

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प्रश्नानुवाद- सम्प्रति तैत्तरीय नाम से प्रसिद्ध कौन से दो ग्रन्थ है?

स्पष्टीकरण- सम्प्रति तैत्तरीय नाम से प्रसिद्ध ब्राह्मण तथा उपनिषद है।

‘इज्यते अनेन इति यजुः’ अर्थात् जिन मंत्रों से यज्ञ किया जाता है, यजुष् कहलाते हैं। यजुष् से सम्बंधित वेद यजुर्वेद है। यजुर्वेद दो संप्रदायों में विभक्त है- आदित्य सम्प्रदाय तथा ब्रह्म सम्प्रदाय। आद��त्य सम्प्रदाय को ही शुक्लयजुर्वेद भी कहा जाता है और ब्रह्मसम्प्रदाय को कृष्णयजुर्वेद कहा जाता है। कृष्णयजुर्वेद की 4 शाखायें हैं- तैत्तिरीय, मैत्रायणी काठक\कठ तथा कपिष्ठल।इनमे से तैत्तिरीय शाखा सर्वांगपूर्ण है, क्योंकि इस शाखा के संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद तथा वेदांगादि अधुना प्राप्त होते है।

तैत्तिरीय ब्राह्मण- कृष्णयजुर्वेदीय शाखा का एकमात्र यही ब्राह्मण संप्रति पूरा उपलब्ध है। तैत्तिरीय ब्राह्मण के रचयिता वैशम्पायन के शिष्य आचार्य तित्तिर हैं। तित्तिर ने तैत्तिरीय संहिता और तैत्तिरीय ब्राह्मण की रचना की। यह इसकी प्राचीनता का द्योतक है। यह विशालकाय है । यह तीन काण्डों और अष्टकों में विभक्त है। प्रथम और द्वितीयकाण्ड में 8-8 अध्याय या प्रपाठक है तृतीय काण्ड में १२ अध्याय हैं। इनके उपखंडों को ‘अनुवाक्’ कहते हैं। इनकी संख्या ३५३ है। 

  1. काण्ड- अग्न्य आधान, गवामयन, वाजपेय, सोम, नक्षत्रेष्टि और राजसूय याग।
  2. काण्ड- अग्निहोत्र, उपहोम,सौत्रामणी, बृहस्पति सव, वैश्य सव आदि ।
  3. काण्ड- नक्षत्रेष्टियाँ  और पुरुषमेध।

​

तैत्तिरीय उपनिषद्- तैत्तिरीय आरण्यक के ही तीन प्रपाठकों को तैत्तिरीय उपनिषद् कहा जाता है। इसमें तीन प्रपाठकों के स्थान पर तीन वल्ली हैं।

शिक्षावल्ली- इसमें शिक्षाशास्त्र, संहिता के अनेक रूप, भूः भुवः स्वः तीन व्याह्रतियाँ, आत्मा का निवास, ओम्- ब्रह्म की व्याख्या, सत्य तप और स्वाध्याय का महत्त्व, दीक्षान्त उपदेश का वर्णन है।

ब्रह्माणनन्दवल्ली- इसमें अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्दमय इन पाँच कोशों का वर्णन है। 

भृगुवल्ली- इसमें पञ्चकोशों का वर्णन,अन्न का स्वरूप तथा अन्न का विराट रूप वर्णन है।

Question 25

'को अद्धा वेद क इह ए वोचत् कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः।'

अस्यमन्त्रांशस्य को ऋषिः का च देवता?

(A) परमेष्ठी नाम प्रजापतिर्ऋषिः

(B) नारायणः ऋषिः

(C) विसृष्टिः देवता

(D) परमात्मा देवता

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (C)

  2. BOption (b)

    (A) एवम् (D)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (B) एवम् (C)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A) एवम् (D)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- इस मंत्रांश के ऋषि तथा देवता कौन हैं?

स्पष्टीकरण- इस मंत्रांश के ऋषि परमेष्ठी नाम प्रजापति तथा परमात्मा देवता हैं। 

ऋग्वेद में लगभग 12 दार्शनिक सूक्त हैं जिनमें प्रथम बार ‘सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई, इसका अधिष्ठाता देव कौन है, वह कौन सी सामग्री थी जिससे स्वर्ग लोक और पृथ्वी लोक को बनाया गया’ इन सब दार्शनिक प्रश्नों पर प्रकाश डाला गया है। सृष्टि की उत्पत्ति विषयक समस्या का समाधान करने वाले सर्वाधिक तीन महत्वपूर्ण सूक्तों है- पूरुष सूक्त (10.10), हिरण्यगर्भ सूक्त (10.121) तथा नासदीय सूक्त (10.129) हैं। नासदीय सूक्त ऋग्वेदीय ऋषियों की अलौकिक दार्शनिक चिन्तनधारा का मौलिक परिचायक है। इस सूक्त के अनुसार सृष्टि के आरम्भ में न तो असत् था और न ही सत् था, न दिन था न रात थी। सृष्टि का अभिव्यंजक कोई भी चिन्ह उस समय नहीं था। इस सूक्त से वैदिक विचारधारा में एक ऐसे दार्शनिक तत्ववाद का सूत्रपात हो जाता है,जिसका विकसित स्वरूप उपनिषदों में प्रस्तुत होता है। ‘नासत्’ से आरम्भ होने के कारण इस को ‘नासदीय’ कहते है। इस सूक्त का अन्य नाम ‘भाववृत्त सूक्त’ भी है

नासदीय सूक्त ऋग्वेद के 10 वें मण्डल का 129 वां सूक्त है। इसके ऋषि प्रजापति परमेष्ठि है, देवता के रूप में भाववृत्त अर्थात् सृष्टि- स्थिति- प्रलय के अधिष्ठाता परमात्मा है। इस सूक्त में कुल सात मंत्र है जो त्रिष्टुप् छंद में है। इसके ऋषि परमेष्ठि प्रजापति तथा देवता परमात्मा हैं। ‘को अद्धा वेद का इह प्र वोचत्’ यह इसी सूक्त के छठे मंत्र का अंश है। सम्पूर्ण छठा मंत्र निम्नलिखित है-

मंत्र- को आद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः। अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आबभूव ।।

अनुवाद-  कौन यथार्थ रूप से जानता है और कौन इस लोक में सृष्टि के उत्पन्न होने के विवरण को बता सकता है कि यह विविध प्रकार की सृष्टि किस उपादान कारण से और किस निमित्त कारण से सब ओर से उत्पन्न हुयी। देवता भी इस विविध प्रकार की सृष्टि उत्पन्न होने से बाद के हैं अतः ये देवगण भी अपने से पहले की बात के विषय में नहीं बता सकते इसलिए कौन मनुष्य जानता है जिस कारण यह सारा संसार उत्पन्न हुआ।

व्याख्या- प्रस्तुत मंत्र में सृष्टि के रहस्य को अत्यन्त गूढ बताया गया है। यद्यपि पूर्व के मंत्रों में सृष्टि सम्बन्धी कुछ निष्कर्ष प्रस्तुत किए गए है। तथापि यहाँ ऋषि सच्चे तत्त्वचिंतक के रूप में शुद्ध हृदय से यह स्वीकार करता है कि यथार्थ रूप में यह कौन जान सकता है कि किस उपादान और किस निमित्तकारण से जगत् की सृष्टि हुई। जिन देवों को अब तक महत्त्व दिया जाता रहा था, उनके बारे में भी यह कह दिया गया है कि वे भी इस बात को नहीं जानते, क्योंकि वे भी सृष्टि एक अंग मात्र है और फलतः सृष्टि प्रारम्भ होने के बाद के है, फिर वे अपने से पूर्ववर्ती सृष्टि को कैसे जान सकते है। इस प्रकार यहाँ आकार वैदिक- विचारधारा में दार्शनिक तत्त्ववाद का सूत्रपाद होने पर देवों का पूर्वपरंपरागत महत्व गिर गया, क्योंकि सृष्टि के अन्य मनुष्य आदि अंशों के समान एक अंश मात्र होने के कारण दार्शनिक दृष्टि से वे कोई अधिक महत्वपूर्ण प्रतीत नहीं होते थे।

Question 26

अधोऽङ्कितेषु कयोर्द्वयोः समुचितः सम्बन्धोऽस्ति?

(A) सम्यग्दर्शनज्ञानचरित्राणि मोक्षमार्गः

(B) धम्मपदम्

(C) त्रिरत्नानि

(D) योगदर्शनम्

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    ((B) एवम् (D)

  2. BOption (b)

    (A) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (A) एवम् (B)

  4. DOption (d)

    (A) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A) एवम् (C)

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प्रश्नानुवाद- निम्नलिखित में से किन दोनों का समुचित सम्बंध है?

स्पष्टीकरण- जैनदर्शन में तीन मोक्ष प्राप्ति के मार्ग है- सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र- सम्यग्दर्शनज्ञानचरित्राणि मोक्षमार्गः। इन्हें ही जैन दर्शन के त्रिरत्न कहते हैं। 

  1. सम्यक् दर्शन-  सत्य के प्रति श्रद्धा की भावना रखना सम्यक् दर्शन कहा जाता है। दूसरे शब्दों में इसका अर्थ बौद्धिक विश्वास है। कुछ लोगों में यह जन्मजात हो जाता है। अन्य इसे अभ्यास तथा विद्या द्वारा सीखते हैं।
  2. सम्यक् ज्ञान- जैन दर्शन में मुख्य दो तत्व माने गये हैं- जीव (आत्मा सदृश) तथा अजीव। जिस ज्ञान के द्वारा जीव और अजीव के मूल तत्वों का पूर्ण ज्ञान होता है। जीव और अजीव के अंतर को न समझने के फलस्वरूप बंधन का प्रादुर्भाव होता है, जिसे रोकने के लिए ज्ञान आवश्यक है।
  3. सम्यक् चरित्र- हितकर कार्यों का आचरण और अहितकर कार्यों का वर्जन ही सम्यक् चरित्र कहलाता है। मोक्ष के लिए तीर्थंकरों के प्रति श्रद्धा तथा सत्य का ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, अपितु आचरण का संयम भी आवश्यक है।

अतिरिक्त जानकारी सम्यक् चरित्र के पालन के लिए निम्नलिखित आचरण आवश्यक है-

  1. पंच समिति (सावधानी)- इर्या, भाषा, एषणा, आदान-निक्षेपण, उत्सर्ग।
  2. तीन गुप्ति (संयम)- कायगुप्ति, वागगुप्ति, मनो गुप्ति।
  3. दस धर्म- सत्य, क्षमा, शौच, तप, संयम, त्याग, विरक्ति, मार्दव, सरलता, ब्रह्मचर्य।
  4. पंच महाव्रत- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह।

Question 27

अधोऽङ्कितेषु कयोर्द्वयोः समुचितः सम्बन्धोऽस्ति?

(A) षोडशपदार्थाः सन्ति

(B) सप्तपदार्थाः सन्ति

(C) न्यायदर्शनम्

(D) जैमिनिः

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (D)

  2. BOption (b)

    (C) एवम् (D)

  3. COption (c)

    (A) एवम् (C)

  4. DOption (d)

    (B) एवम् (C)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(A) एवम् (C)

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प्रश्नानुवाद- निम्नलिखित में से किन दोनो का समुचित सम्बंध है?

स्पष्टीकरण- न्याय दर्शन के छह भारतीय आस्तिक अथवा वैदिक दर्शनों में एक है। इसके प्रवर्तक ऋषि अक्षपाद गौतम हैं जिनका न्यायसूत्र इस दर्शन का सबसे प्राचीन एवं प्रसिद्ध ग्रन्थ है। देवराज ने 'न्याय' को परिभाषित करते हुए कहा है- नीयते विवक्षितार्थः अनेन इति न्यायः अर्थात् जिस साधन के द्वारा हम अपने विवक्षित (ज्ञेय) तत्त्व के पास पहुँच जाते हैं, उसे जान पाते हैं, वही साधन न्याय है। न्यायसूत्रभाष्यकर्ता वात्स्यायन ने अनुसार प्रमाणों के द्वारा अर्थ (सिद्धान्त) का परीक्षण ही न्याय है- प्रमाणैर्थपरीक्षणं न्यायः। इस दर्शन को  तर्कशास्त्र, प्रमाणशास्त्र, हेतुविद्या, वादविद्या तथा अन्वीक्षिकी भी कहा जाता है। कालांतर में इस दर्शन की नई शाखा प्रचलित हुई जिसका नाम ‘नव्य न्याय’ पड़ा। इसके प्रवर्तक मिथिला निवासी गंगेश उपाध्याय है। इसंके ग्रन्थ का नाम ‘तत्वचिंतामणि’ है। इस दर्शन में चार प्रमाण मानें गयें हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द। इस दर्शन में 16 पदार्थ मानें गयें हैं- प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रहस्थान।

अन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण-

(B) सप्तपदार्थाः सन्ति- वैशेषिकदर्शन का प्रकरण ग्रंथ अन्नम्भट्ट विरचित तर्कसंग्रह है। इसमे सात पदार्थों का निरूपण किया गया है- द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाभावाः सप्तपदार्थाः। 

(D) जैमिनिः- ये मीमांसा दर्शन के प्रवर्तक है। इनके ग्रन्थ का नाम ‘मीमांसासूत्र’ है।

Question 28

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यानुसारं ब्रह्मणोऽस्तित्वप्रसिद्धिः कस्माद् ज्ञायते?

(A) बृहतेर्धातोरनुगमात्

(B) पञ्चप्रयाजेभ्यः

(C) प्रकृतियागाद्

(D) सर्वस्यात्मत्वाद्

अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (B) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (A) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(A) एवम् (D)

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प्रश्ननुवाद- ब्रह्मसूत्रशांकरभाष्य के अनुसार ब्रह्म की प्रसिद्धि कैसे जाना जाता है?

स्पष्टीकरण- ब्रह्मसूत्रशांकरभाष्य के अनुसार ब्रह्म की प्रसिद्धि ‘बृहतेधोतोरर्थानुगमात्’ अर्थात् ‘बृह’ धातु के अर्थ से तथा ‘सर्वस्यात्मत्वाद्’ अर्थात् सभी में वा सबकी आत्मा होने से जाना जाता है।

ब्रह्मसूत्र- यह वेदांत दर्शन का प्रवर्तक ग्रन्थ है। इसके रचयिता बादरायण व्यास माना जाते हैं। यह ग्रंथ गीता तथा उपनिषद के साथ प्रस्थानत्रयी में परिगणित होता है। यह चार अधिकरणों में विभक्त हैं- समन्वय, अविरोध, साधन तथा फल। आद्यशंकराचार्य ब्रह्मसूत्र के पर लिखित भाष्य का नाम ‘शारीरक भाष्य’ है। आद्यशंकराचार्य ब्रह्मसूत्र के प्रथम सूत्र ‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’ के ब्रह्म की प्रसिद्धि के कारणों की चर्चा करते हैं। 

ब्रह्म की प्रसिद्धि के प्रकरण में आद्यशंकराचार्य कहते हैं- यदि ब्रह्म प्रसिद्ध है तो उसकी जिज्ञासा नहीं होनी चाहिए, और यदि अप्रसिद्ध है तो फिर उसकी जिज्ञासा हो ही नहीं सकती है- तत्पुनर्बह्म  प्रसिद्धम् अप्रसिद्धं वा स्यात् । यदि प्रसिद्धं न जिज्ञासितव्यम्। अथा अप्रसिद्धं नैव शक्यं जिज्ञासितुमिति।  इस शंका का समाधान करते हुए वे कहते हैं- नित्य, बुद्ध, शुद्ध, मुक्तस्वभाव, सर्वज्ञ तथा शक्तिमान ब्रह्म प्रसिद्ध है- अस्तितावद् ब्रह्म नित्यशुद्धबुद्ध मुक्त्तस्वभावं, सर्वज्ञं, सर्वशक्तिसमन्वितम्। इसकी प्रसिद्धि के दो हेतु है-

  1. ब्रह्मशब्द की व्युत्पत्ति- ब्रह्म शब्द की व्युत्पत्ति ‘बृह’ धातु से मानी जाती है। इस धातु के अर्थ से ब्रह्मा के नित्यशुद्धत्त्वादि अर्थों की प्रतीति होती है- ब्रह्मशबदस्य हि व्युत्पाद्यामानस्य नित्यशुद्धत्वादयो अर्थाः प्रतीयन्ते, बृहतेधोतोरर्थानुगमात्।
  2. सभी में आत्मा की उपस्थिति- सभी में आत्मा के होने होने से ब्रह्म का अस्तित्त्व प्रसिद्ध है- सर्वस्यात्मात्वाच्च ब्रह्मास्तित्त्वप्रसिद्धिः। सबको आत्मा का ज्ञान होता है और आत्मा ही ब्रह्म है।

Question 29

न्यायसिद्धान्तमुक्तावलीदिशा व्याप्तेर्लक्षणमस्ति-

(A) साध्यवदन्यस्मिन्नसम्बन्ध उदाहृतः

(B) व्याप्यस्य पक्षवृत्तित्वधीः

(C) हेतुमन्निष्ठविरहाप्रतियोगिना साध्येन हेतोरैकाधिकरण्यम्

(D) सिषाधयिषाविरहविशिष्टसिद्ध्यभावः

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (C)

  2. BOption (b)

    (B) एवम् (D)

  3. COption (c)

    (A) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (C) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(A) एवम् (C)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- न्यायसिद्धान्तमुक्तावली के अनुसार व्याप्ति का लक्षण है-

स्पष्टीकरण- न्यायसिद्धान्तमुक्तावली न्यायशास्त्र का अन्यतम ग्रंथ है। यह वस्तुतः टीका ग्रंथ है। इसके मूल ग्रंथ को कारिकावली या भाषा परिच्छेद भी कहते हैं। मूल ग्रंथ तथा टीका दोनों के रचयिता श्री विश्वनाथपंचानन हैं। इस ग्रंथ में अनुमानखण्ड में व्याप्ति (साहचर्य नियम) के दो लक्षण विद्यमान है-

  1. व्याप्ति साध्यवदन्यस्मिन्नसम्बन्ध उदाहृतः अर्थात् साध्य (जो धूमादि हेतु के द्वारा अनुमेय वह्नि आदि) से युक्त भिन्न स्थान पर ‘हेतु’ (धूमादि) का सम्बन्ध न होना ही व्याप्ति है। अर्थात् जहां ‘साध्य’ और ‘साधन’ का सम्बन्ध निश्चित हो वहीं पर व्याप्ति होती है।
  2. हेतुमन्निष्ठविरहाप्रतियोगिना साध्येन हेतोरैकाधिकरण्यम् अर्थात् ‘हेतु’ के अधिकरण में रहने वाले अभाव के ‘अप्रतियोगी’ ‘साध्य’ के ‘हेतु’ का एक ही अधिकरण में रहना  व्याप्ति है।

​अन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण-

(B) व्याप्यस्य  पक्षवृत्तित्वधिः- यह ‘परामर्श’ का लक्षण है। व्याप्ति से युक्त ‘व्याप्य’ (धूमादि) का ‘पक्ष’ (पर्वत) आदि में रहने की जो स्थिति है, ऐसे ज्ञान को परामर्श कहते हैं।

(D) सिषाधयिषाविरहविशिष्टसिद्ध्यभावः- यह ‘पक्ष’ का लक्षण है। ‘साध्य’ सिद्ध (अनुमान) करने की इच्छा से शून्य सिद्धि जहां नहीं है वह पक्ष  है। 

Question 30

कौटिलीय-अर्थशास्त्रस्य विनयाधिकरणे प्रकरणानां समुचितः क्रमोऽस्ति-

(A) इन्द्रियजयः

(B) वृद्धसंयोगः

(C) मन्त्रिपुरोहितोत्पत्तिः

(D) अमात्योत्पत्तिः

(E) विद्यासमुद्देशः

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A), (C), (D), (E), (B)

  2. BOption (b)

    (B), (A), (C), (D), (E)

  3. COption (c)

    (C), (D), (B), (A), (E)

  4. DOption (d)

    (E), (B), (A), (D), (C)

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (d)D.

(E), (B), (A), (D), (C)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- कौटिलीय अर्थशास्त्र के विनयाधिकरण में प्रकरणों का समुचित क्रम है- 

स्पष्टीकरण- कौटिलीय अर्थशास्त्र के विनयाधिकरण में प्रकरणों का समुचित क्रम है- विद्यासमुद्देशः, वृद्धसंयोगः, इन्द्रियजयः, अमात्योत्पत्तिः, विद्यासमुद्देशः।

  • कौटिलीय अर्थशास्त्र मूल रूप राजशास्त्र का एक ग्रन्थ है। इसकी रचना 300 ई० पू० हुई। इसका विभाजन 15 अधिकरणों में हुआ है।
  • पुनः, ये अधिकरण 150 अध्यायों तथा 180 प्रकरणों में विभाजित हैं। सामान्यत: यह गद्य शैली का ग्रन्थ है, किन्तु इसमें 350 श्लोक भी प्राप्त होतें है। अर्थशास्त्र का निर्वचन करते हए स्वयं कौटिल्य ने कहा है- “मनुष्याणां वृत्तिः अर्थः, मनुष्यवती भूमिरित्यर्थः, तस्याः पृथिव्याः लाभपालनोपायः शास्त्रम् अर्थशास्त्रम् इति’’ अर्थात् ‘अर्थ’ शब्द मानवान की गतिविधि या मानव युक्त पृथ्वी (राज्य) का बोधक है।
  • उसे प्राप्त करने और पालन करने के उपाय के रूप में जो नियम हैं, वही अर्थशास्त्र है। य
  • ही बात कौटिल्य ने अर्थशास्त्र के प्रथम वाक्य में भी कही है- पृथिव्या लाभे पालने च यावन्त्य् अर्थ.शास्त्राणि पूर्व.आचार्यैः प्रस्थापितानि प्रायशस् तानि संहृत्यैकमिदम् अर्थ इदम् अर्थशास्त्रं कृतम् ।
  • यह ग्रन्थ 1901 ई० के पूर्व लुप्त माना जाता था, किन्तु उस वर्ष विद्वान शामशास्त्री के द्वारा इसके प्रकाशन से भारतीय ज्ञान परम्परा का उद्धार हो गया।
  • इसके 15 अधिकरण निम्न है- विनयाधिकरण, अध्यक्षप्रचार, धर्मस्थीयाधिकरण, कंटकशोधन, वृत्ताधिकरण, योन्यधिकरण, षाड्गुण्य, व्यसनाधिकरण, अभियास्यत्कर्माधिकरण, संग्रामाधिकरण, संघवृत्ताधिकरण, आबलीयसाधिकरण, दुर्गलम्भोपायाधिकरण, औपनिषदिकाधिकरण और तंत्रयुक्त्यधिकरण।
  • इसके प्रथम अधिकरण में 18 प्रकरण हैं जो निम्न हैं- विद्यासमुद्देश:, वृद्धसंयोग:, इन्द्रियजय:, अमात्योत्पत्ति:, मन्त्रिपुरोहितोत्पत्ति:, उपधाभिः शौचाशौचज्ञानममात्यानाम्, गूढपुरुषोतपत्ति:, गूढपुरुषप्रणिधि:, स्वविषये कृत्याकृत्यपक्षरक्षणम्, परविषये कृत्या- कृत्यपक्षोपग्रह:, मंत्राधिकार:, दूतप्रणिधि:, राजपुत्ररक्षणम्, अवरुद्धवृत्तम्, अवरुद्धे च वृत्तिः, राजप्रणिधिः, निशान्तप्रणिधिः, आत्मरक्षितकम्।

Question 31

कथनद्वयमधोलिखितम् एकम् (A) इति अभिकथनम् अपरञ्च (R) इति कारणम्।

अभिकथनम् (A)- पारोवर्मंवित्सु तु खलु वेदितृषु भुयोविद्यः प्रशस्यो भवति।

कारणम् (R)- यथा तेन गहनरूपेण वारम्वारं स्वाध्यायेन बहुपरिश्रमेण वेदाभ्यासः कृतोऽस्ति।

उपर्युक्ताभिकथन- कारणमाश्रित्य समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) तथा (R) उभावपि सत्यं किन्तु (R) इति उचितं कारणं नास्ति (A) इत्यस्य

  2. BOption (b)

    (A) तथा (R) उभावपि सत्यं। (R) इति उचितकारणमस्ति (A) इत्यस्य।

  3. COption (c)

    (A) सत्यं, परन्तु (R) इति असत्यम्

  4. DOption (d)

    (A) तथा (R) उभावपि असत्यम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A) तथा (R) उभावपि सत्यं। (R) इति उचितकारणमस्ति (A) इत्यस्य।

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प्रश्नानुवाद- अभिकथन (A)- परम्परा से ज्ञान प्राप्त करने वाले लोगों में तो अधिक विद्या वाला ही श्रेष्ठ माना जाता है।

कारण (R)- जैसे उनके द्वारा गहन रूप से बार-बार अधिक परिश्रम से स्वाध्याय के द्वारा वेदाभ्यास किया गया है। 

स्पष्टीकरण- अभिकथन- परम्परा से ज्ञान प्राप्त करने वाले लोगों में तो अधिक विद्या वाला ही श्रेष्ठ माना जाता है। यह कथन सत्य है।

कारण- जैसे उनके द्वारा गहन रूप से बार-बार अधिक परिश्रम से स्वाध्याय के द्वारा वेदाभ्यास किया गया है। यह कथन सत्य है। 

  • यह प्रसंग यास्क कृत निरुक्त ग्रन्थ के प्रथम अध्याय में वर्णित है।
  • निरुक्त षड वेदांगो में परिगणित एक व्युत्पत्ति शास्त्र है। इसे वेद पुरुष का श्रोत माना गाया है।
  • इसके अनुसार आचार्य-परम्परा से शास्त्र का श्रवण करने वाले विद्वानों में अधिक विद्यावान् श्रेष्ठ माना जाता है। ऐसा विद्वान अस्पष्टार्थक मंत्रों का भी सरलता से अर्थ करता है।
  • उसके लिए किसी भी मंत्र का अर्थ करने में कोई कठिनाई नहीं होती है। जैसे- चक्षुष्मान् सम-विषम सब प्रकार के मार्गों को आराम से तय कर लेता है किन्तु अन्धा मनुष्य साफ-सुथरी सड़क पर भी ठोकर खाकर गिर पड़ता है। चूँकि विद्यावानों के द्वारा गहन रूप से बार-बार अधिक परिश्रम से स्वाध्याय के द्वारा वेदाभ्यास किया जाता है। इसीलिए वे मंत्रार्थ करने में सहज होते है।

 

इस प्रकार प्रस्तुत अभिकथन तथा कारण सत्य है तथा अभिकथन का कारण भी समीचीन है। अत: विकल्प 2 सही है।

Question 32

बालगंगाधर-तिलकेन मृगशिरा-काले ऋग्वेदस्य आधिकांश-मन्त्राणां रचना स्वीकृतास्ति। अधोलिखितेषु मृगशिरा-कालः वर्तते?

  1. AOption (a)

    6000-4000 वि.पू.

  2. BOption (b)

    4000-2500 वि.पू.

  3. COption (c)

    2500-1400 वि.पू.

  4. DOption (d)

    1400-500 वि.पू.

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Correct answer

Answer: (b)B.

4000-2500 वि.पू.

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद - बालगंगाधर तिलक के द्वारा मृगशिरा-काल में ऋग्वेद के अधिकांश-मन्त्रों की रचना को स्वीकार किया है। अधोलिखित में से  मृगशिरा-काल है ?

स्पष्टीकरण - 

विभिन्न विद्वानों द्वारा वेदों का रचना काल भिन्न-भिन्न स्वीकार किया गया है।

बाल गंगाधर तिलक महोदय के मतानुसार वैदिक काल विषयक सिद्धान्त भी ज्योतिष शास्त्र का अनुसरण करता है। इन्होंने यह स्वीकार किया है कि ऋग्वैदिक मन्त्रों का रचनाकाल 4000 ई.पू. से आरम्भ होकर 6000 ई.पू. तक हो सकता है। तिलक महोदय के द्वारा वैदिक काल को चार भागों में विभक्त किया गया है।

 

  1. अदिति काल - 6000 ई.पूर्व से 4000 ई. पूर्व पर्यन्त।
  2. मृगशिर काल - 4000 ई.पूर्व से 2500 ई. पूर्व पर्यन्त।
  3. कृतिका काल - 2500 ई.पूर्व से 1400 ई. पूर्व पर्यन्त।
  4. अन्तिम काल - 1400 ई.पूर्व से 500 ई. पूर्व पर्यन्त।

 

इस तरह स्पष्ट है कि बाल गंगाधर तिलक के अनुसार मृगशिर काल 4000 ई.पूर्व से लेकर 2500 ई.पूर्व तक है।

Question 33

वेदानामपौरुषेयत्वमधोऽङ्कितेषु कुत्र वर्णितम्?

  1. AOption (a)

    बौद्धदर्शने

  2. BOption (b)

    मीमांसादर्शने

  3. COption (c)

    योगदर्शने

  4. DOption (d)

    साख्यंदर्शने

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Correct answer

Answer: (b)B.

मीमांसादर्शने

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प्रश्नानुवाद- वेदों का अपौरुषेय कहाँ वर्णित हैं। 

स्पष्टीकरण- वेदों का अपौरुषेय मीमांसा दर्शन में वर्णित है। 

मीमांसा दर्शन- मीमांसा दर्शन भारतीय षड् आस्तिको दर्शनों में से एक है। इस दर्शन के प्रवर्तक जैमिनि है।

  • जैमिनि द्वारा रचित मीमांसासूत्र इस दर्शन का सर्वप्रमुख ग्रन्थ है।
  • यह पूर्णतः वेदवादी दर्शन है। यह वैदिक कर्मकांड की व्याख्या करता है।
  • मीमांसा दर्शन में दो प्रमुख मत हैं- प्रभाकर मत तथा भाट्ट मत।
  • प्रभाकर मत के अनुयायी पाँच प्रमाणों को मानते हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति।
  • भाट्ट मत के अनुयायी छह प्रमाणों को मानते हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति, अनुपलब्धि।

Important Points

मीमांसा दर्शन में वेदोंका पौरुषेयत्व - 

  • मीमांसा दर्शन में शब्द प्रमाण का प्रमुख स्थान है।
  • इस दर्शन में शब्द के दो प्रकार माने गए है- पौरुषेय तथा अपौरुषेय।
  • आप्त पुरुषों के वचन को पौरुषेय कहा जाता है। वैदिक वाक्यों को अपौरुषेय माना जाता है। दूसरे शब्दों में, अपौरुषेय वाक्य ही वेद है- अपौरुषेयं वाक्यं वेद:।
  • इस दर्शन के अनुसार इन वैदिक वाक्यों का कोई कर्ता नहीं है।
  • ईश्वर ने न तो वेद का निर्माण किया है न ही जगत् का।
  • यह दर्शन वेद को नित्य तथा स्वतः प्रमाण मानता है।

​अतः उचित पर्याय 'मीमांसादर्शने' होता है।

Question 34

योगदर्शनानुसारेण अधोऽङ्कितेषु कस्य ग्रहणं क्रियायोगेऽस्ति?

  1. AOption (a)

    शौचस्य

  2. BOption (b)

    प्राणायामस्य

  3. COption (c)

    ध्यानस्य

  4. DOption (d)

    स्वाध्यायस्य

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Correct answer

Answer: (d)D.

स्वाध्यायस्य

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प्रश्नानुवाद- निम्नलिखित में से योग दर्शन के अनुसार क्रियायोग में किसका ग्रहण होता है?

स्पष्टीकरण- योग दर्शन के अनुसार क्रियायोग में तप:, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान का ग्रहण होता है। 

योगदर्शन- योग दर्शन छह आस्तिक दर्शनों में से एक है। इसके प्रणेता पतञ्जलि मुनि हैं। पतञ्जलि मुनि कृत ‘योगसूत्र’ इस दर्शन का आद्य ग्रन्थ है। योगसूत्रों की सर्वोत्तम व्याख्या व्यास मुनि द्वारा लिखित व्यासभाष्य में प्राप्त होती है। महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र को चार भागों में विभक्त किया है, जिन्हे पाद कहा जाता है। ये पाद निम्नलिखित है- समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद तथा कैवल्यपाद। क्रियायोग का वर्णन योगसूत्र के साधनपाद के पहले सूत्र में है ।

सूत्र- तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग:।

सूत्रार्थ- तप:, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान क्रियायोग कहलाता है। 

तप-  तप का अर्थ है सभी प्रकार के द्वन्द्वों को सहजता से सहन करना। द्वन्द्व का अर्थ है विपरीत परिस्थितियों जैसे – सर्दी- गर्मी, भूख- प्यास, लाभ – हानि, जय- पराजय, सुख- दुःख व मान- अपमान आदि । 

स्वाध्याय- क्रियायोग में स्वाध्याय का अर्थ है गायत्री आदि वैदिक मंत्रों का अर्थ सहित जप करना । वे जो भी मोक्ष प्रदान करवाने वाले ग्रन्थ जैसे वेद, उपनिषद आदि हैं उनका अध्ययन करना ही स्वाध्याय कहलाता है । स्वाध्याय से ही साधक कृत्य तथा अकृत्य का पता चलता है। 

ईश्वरप्रणिधान- ईश्वर प्रणिधान का अर्थ है अपने सभी अच्छे व बुरे कर्मों का समर्पण ईश्वर में कर देना तथा उसके बदले किसी भी प्रकार के फल की आशा न करना ही ईश्वर प्रणिधान कहलाता है ।

Question 35

तर्कसङ्ग्रहानुसारं वाक्यार्थज्ञाने 'अग्निना सिञ्चेद्' इति वाक्यं कथं न प्रमाणम्?

  1. AOption (a)

    योग्यताविरहात्

  2. BOption (b)

    सान्निध्याभावात्

  3. COption (c)

    आकाङ्क्षाविरहात्

  4. DOption (d)

    पदानामविलम्बेनोच्चारणाभावात्

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Correct answer

Answer: (a)A.

योग्यताविरहात्

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प्रश्नानुवाद- तर्कसंग्रह के अनुसार वाक्यार्थ ज्ञान में ‘आग से सींचा जाए’ वाक्य प्रमाण क्यूँ नहीं है?

स्पष्टीकरण- तर्कसंग्रह के अनुसार वाक्यार्थ ज्ञान में ‘आग से सींचा जाए’ वाक्य योग्यता के अभाव के करण प्रमाण नहीं है। 

तर्कसंग्रह अन्नमभट्ट द्वारा रचित वैशेषिक दर्शन का प्रकरण ग्रन्थ है । isके अनुसार शक्त पदों के समूह को वाक्य कहते हैं। आकांक्षा- योग्यता-सन्निधिश्च वाक्यार्थज्ञानहेतुः अर्थात् आकांक्षा, योग्यता तथा सन्निधि वाक्यार्थ ज्ञान के तीन हेतु है। 

  1. आकांक्षा- ‘पदस्य पदान्तरव्यतिरेकप्रयुक्तान्वय अननुभावकत्वं आकांक्षा' अर्थात् एक पद का दूसरे पद के अभाव से जहाँ पर शाब्दबोध की जनकता नहीं होती हैं उसे आकांक्षा कहते है। आकांक्षादिरहितं वाक्यमप्रमाणम्। यथा - गौरश्वः पुरुषो हस्तीति न प्रमाणमाकांक्षाविरहात्।  आकांक्षा आदि से रहित वाक्य को प्रमाण नहीं माना जाता है।  जैसे - गौ, घोडा, पुरुष, हाथी ये पदसमूह तो हैं किन्तु इनमें परस्पर आकांक्षा नहीं हैं। अतः ये प्रमाण नहीं है। वाक्यार्थ बोध के लिए वाक्य में प्रयुक्त सभी पद साकांक्ष होने चाहिए।
  2. योग्यता- 'अर्थाबाधो योग्यता'  अर्थात् अर्थ के बाध के अभाव को योग्यता कहते है। वाक्यार्थ बोध के लिए वाक्य में प्रयुक्त सभी पदों में उसके अर्थ अभिव्यक्त करने की योग्यता होनी चाहिए। जैसे- ‘अग्निना सिञ्चति’  अर्थात् से सींचता है, इस वाक्य में प्रयुक्त अग्नि पद में सिंचन की योग्यता का आभाव है। अत: यहाँ अर्थ का बाध हो रहा है।
  3. सन्निधि- 'पदनामविलम्बेनोचारारणं सन्निधिः'। यथा - प्रहरे प्रहरे असहोचारितानि गामानयेत्यादीपदन्यप्रमाणं  सन्निध्याभावात्। पदों के विलम्ब के बिना ही उच्चारण को सन्निधि कहते है। जैसे- अलग-अलग समय में एक साथ उच्चारण न किये जाने वाले पद भी प्रमाण नहीं होते क्योंकि उनमें सानिध्य नहीं होता है। जैसे - एक पहर गाम दूसरे पहर आनय का उच्चारण होने पर वह शब्द प्रमाण नहीं माना जाता है।

Question 36

अर्थसङ्ग्रहदिशा विधिः कतिविधः?

  1. AOption (a)

    षड्विधः

  2. BOption (b)

    पञ्चविधः

  3. COption (c)

    चर्तुविधः

  4. DOption (d)

    त्रिविधः

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Correct answer

Answer: (c)C.

चर्तुविधः

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प्रश्नानुवाद- अर्थसंग्रह के अनुसार विधि के कितने प्रकार हैं?

स्पष्टीकरण- अर्थसंग्रह के अनुसार विधि के चार प्रकार हैं। 

अर्थसंग्रह के अनुसार अपौरुषेय वाक्यों को वेद कहते हैं। ये पाँच प्रकार के हैं- विधि, मंत्र, नामधेय, निषेध तथा अर्थवाद।

इस ग्रन्थ में विधि के विविध विभाजन है किन्तु यह मुख्य रूप से चार प्रकार की है।

  1. उत्पत्ति विधि- ‘कर्मस्वरूपमात्रबोधको विधिरूत्पत्तिविधि:’ अर्थात् यागादि कर्म के स्वरूप मात्र के बोधक विधि को उत्पत्ति विधि कहते है। जैसे- अग्निहोत्रं जुहोति। अर्थात् अग्निहोत्र से यज्ञ करता है।
  2. विनियोग विधि- ‘अंगप्रधानसम्बंधबोधकोविधिर्विनियोगविधि:’ द्रव्य देवता आदि रूप अंगो का प्रधान होमादि के साथ सम्बन्धबोधक विधि को विनियोग विधि कहते है। जैसे- दध्ना जुहोति। अर्थात् दधि से यज्ञ करता है।
  3. प्रयोग विधि- ‘प्रयोगप्राशुभावबोधकोविधि: प्रयोगविधि:’ अर्थात् जिस विधि वाक्य से प्रयोग को शीघ्र करने का बोध होता है, उसे प्रयोग विधि कहते है। जैसे- दध्ना जुहोति। अर्थात् दधि से यज्ञ करता है।
  4. अधिकार विधि- ‘कर्मजन्यफलस्वाम्यबोधकोविधि: अधिकारविधि:’ अर्थात् यागादि कर्मजन्य स्वर्गादि फल के स्वामित्व अर्थात् अधिकारी बोधक विधि को अधिकार विधि कहते है। जैसे- स्वर्गकामो यजेत्। अर्थात् स्वर्ग की  इच्छा करने वाले यज्ञ करें।

Question 37

तर्कभाषानुसारं अयुतसिद्धयोः कः सम्बन्धः?

  1. AOption (a)

    संयोगः

  2. BOption (b)

    समवायः

  3. COption (c)

    विषय-विषयिभावः

  4. DOption (d)

    आधाराधेयभावः

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Correct answer

Answer: (b)B.

समवायः

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प्रश्नानुवाद- तर्कभाषा के अनुसार अयुतसिद्धों का कौन सा सम्बंध है ?

स्पष्टीकरण- तर्कभाषा के अनुसार अयुतसिद्धों का समवाय सम्बंध है। 

केशवमिश्र प्रणीत तर्कभाषा न्याय दर्शन का प्रकरण ग्रन्थ है। न्याय दर्शन षड भारतीय आस्तिक दर्शनों में से एक है । इस दर्शन के प्रवर्तक गौतम है। इनके ग्रंथ का नाम न्याय सूत्र है। इसमें 16 पदार्थों तथा 4 प्रमाणों की चर्चा की गयी है। 

तर्कभाषाकार ने समवाय सम्बन्ध की व्याख्या में 'अयुतसिद्ध' पद का प्रयोग किया-

तावेवायुतसिद्धौ द्वौ विज्ञातव्यौ ययोर्द्वयोः। अनशयदेकमपराश्रितमेवावतिष्ठते।।       

अर्थात्, उन दोनों पदार्थों को अयुतसिद्ध जानना चाहिए, जिन दोनों पदार्थों में से एक नष्ट न होता हुआ, दूसरे पदार्थ पर आश्रित होकर ही रहता है। 

अयुतसिद्ध पदार्थों के पाँच उदाहरण प्रस्तुत हैं -

  1. अवयव एवं अवयवी- तन्तु और पट परस्पर अवयव-अवयवी है। तन्तु के नष्ट होने पर पट भी नष्ट हो जाएगा। अत: ये अयुतसिद्ध है।
  2. गुण एवं गुणी- पटरूप और पट परस्पर गुण-गुणी है। पटरूप के नष्ट होने पर पट भी नष्ट हो जाएगा। अत: ये अयुतसिद्ध है।
  3. क्रियावान् एवं क्रिया - बालक तथा उसके द्वारा सम्पादित चलन क्रिया परस्पर क्रिया-क्रियावान् है। बालक के नष्ट होने पर चलन क्रिया भी नष्ट हो जाएगी। अत: ये अयुतसिद्ध है।
  4. जाति एवं व्यक्ति- मनुष्यत्व और मनुष्य परस्पर जाति-व्यक्ति है। मनुष्यत्व के नष्ट होने पर मनुष्य भी नष्ट हो जाएगा। अत: ये अयुतसिद्ध है।
  5. विशेष एवं नित्यद्रव्य- नित्यद्रव्य के नष्ट होने पर विशेष भी नष्ट हो जाएगा। अत: ये अयुतसिद्ध है।

Question 38

सांख्यकारिकानुसारं 'प्रत्ययसर्गः' इत्यस्य कोऽर्थः?

  1. AOption (a)

    प्रत्ययो बुद्धिः, तस्य सर्गः कार्यम्

  2. BOption (b)

    प्रत्ययो मनः, तस्य सर्गः कार्यम्

  3. COption (c)

    प्रत्ययः संसारः, तस्य सर्गः उत्पत्तिः

  4. DOption (d)

    प्रत्ययोऽहङ्कारः, तस्य सर्गः कार्यम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

प्रत्ययो बुद्धिः, तस्य सर्गः कार्यम्

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प्रश्नानुवाद- सांख्यकारिका के अनुसार ‘प्रत्यय सर्ग’ का क्या अर्थ है?

स्पष्टीकरण- सांख्यकारिका के अनुसार ‘प्रत्यय सर्ग’ का अर्थ बुद्धि का कार्य है।

सांख्यदर्शन- सांख्यदर्शन भारतीय आस्तिकदर्शनों में सबसे प्राचीन दर्शन माना गया है। महर्षि कपिल इसके प्रवर्तक आचार्य है। इस दर्शन का प्रमुख ग्रंथ महर्षि कपिल प्रणीत सांख्यसूत्र है। इस दर्शन में 25 तत्त्व और तीन प्रमाण स्वीकार किए गए हैं, किन्तु 2 ही मूल तत्त्व पुरुष और प्रकृति माने गए हैं। अतः इसे द्वैतवादी दर्शन भी कहा जाता है। इस दर्शन का मुख्य सिद्धान्त सत्कार्यवाद है। सांख्यदर्शन का प्रमुख प्रकरण ग्रंथ ईश्वर कृष्ण द्वारा रचित संख्याकारिका है। इसमें 70 कारिकाएँ हैं, जिसके कारण इससे ‘कनक सत्तरी’ और ‘सुवर्णसप्तति’ भी कहा जाता है। 

सांख्यकारिका के अनुसार प्रत्ययसर्ग का निम्नलिखित वर्णन किया गया है।

कारिका- एष प्रत्ययसर्गो विपर्ययाशक्तितुष्टिसिद्धयाख्यः।   

            गुणवैषम्यविमर्दात् तस्य च भेदास्तु पञ्चाशत्।।

व्याख्या- विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि, सिद्धि, नामक यह बौद्धिक सर्ग है। गुणों की विषमता के कारण एक दूसरे के अभिभव से उसके पचास भेद होते है। सांख्य की दृष्टि से सृष्टि दो प्रकार की होती है- भौतिक एवं बौद्धिक। घट, पट, वृक्ष, नदी, पर्वत आदि ‘भौतिक सृष्टि’ के अन्तर्गत आते हैं। धर्म-अधर्म आदि भाव, सूक्ष्मशरीर एवं स्थूलशरीर ‘बौद्धिकसृष्टि’ में माने जाते है, क्योंकि बुद्धि ही प्रमुख रूप से इनकी उत्पत्ति एवं स्थिति का कारण है। इनमें बौद्धिकसृष्टि के अन्तर्गत परिगणित सभी तत्त्वों को विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि एवं सिद्धि नामक चार भागों में विभाजित करके उसे प्रत्ययसर्ग (बुद्धि की सृष्टि) कहा है। सत्त्व, रजस् एवं तमस् तीन गुणों में की विषमस्थिति एवं दूसरे को दबाने के स्वभाव के कारण चार प्रकार के इस प्रत्ययसर्ग के कुल मिला कर पचास भेद माने गए है। चार प्रकार के प्रत्ययसर्ग का उल्लेख निम्नवत् है-

  1. विपर्यय- महर्षि पतंजलि ने ‘ज्ञान से भिन्नरूप में प्रतिष्ठित मिथ्या ज्ञान को विपर्यय कहा है’ विपर्ययोमिथ्याज्ञानमतद् रूपप्रतिष्ठम् (यो. सू. 1/8 )। इस प्रकार, यहाँ विपर्यय से अभिप्राय अथवा अज्ञान से लिया गया है। जो ज्ञान से भिन्न, किन्तु उसी के समान एक भावात्मक तत्त्व है। यह वस्तुतः बुद्धि का धर्म है, जो तमोगुण के प्रभाव का परिणाम है। आचार्य गौड़पाद ने संशयात्मक ज्ञान को ही विपर्यय माना है।
  2. अशक्ति- मन,बुद्धि एवं अहंकार त्रिविध अन्तःकारण एवं 10 इंद्रियाँ रूप बाह्यकारणों में से किसी एक अथवा अनेक की विकलता के कारण उत्पन्न आसामर्थ्य से उसके द्वारा अपने विषय को ग्रहण न कर पाना ही ‘अशक्ति’ है।
  3. तुष्टि- प्रकृति एवं पुरुष की भिन्नता को जानने के बाद भी अयथार्थ उपदेश से संतुष्ट होकर श्रवण, मनन आदि के द्वारा विवेकज्ञान के लिए प्रयत्न न करना ही तुष्टि है। यह नौ प्रकार की मानी गई है। भाष्यकारों ने धर्म, वैराग्य एवं ऐश्वर्य बुद्धि के भावों को तुष्टि के अन्तर्गत माना है।
  4. सिद्धि- जयमंगलाकर ने ज्ञानप्राप्ति को ही सिद्धि माना है ( सिद्धि र्ज्ञानप्राप्तिः)। दुःख की निवृत्ति ही ज्ञान का मुख्य उद्देश्य है। अतः सिद्धि की प्राप्ति दुःखनिवृत्ति का कारण है। इससे पूर्व बताए गए विपर्यय, अशक्ति और तुष्टिरूप प्रत्ययसर्ग सिद्धि में बाधक है।

Question 39

रससम्प्रदायस्य आचार्यो स्तः?

(A) भरतमुनिः

(B) वामनः

(C) क्षेमेन्द्रः

(D) अभिनवगुप्तः

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (A) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (A) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (B) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(A) एवम् (D)

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प्रश्नानुवाद- रस सम्प्रदाय के दो आचार्य कौन से हैं?

स्पष्टीकरण- रस सम्प्रदाय के दो आचार्य- भरत और अभिनवगुप्त हैं।

भरतमुनि और रससम्प्रदाय- 

भारतीय काव्यशास्त्र में रस सिद्धान्त सबसे प्राचीन है। रस सम्प्रदाय के प्रवर्तक भरतमुनि को माना जाता है। उन्होंने ही रस का सबसे पहले निरूपण अपने ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ में किया था। इसलिए उन्हें रस निरूपण का प्रथम व्याख्याता और उनके ग्रंथ नाट्यशास्त्र को रस निरूपण का प्रथम ग्रंथ माना जाता है। उन्होंने अपने छठे अध्याय में रस एवं सातवे अध्याय में विभाव, अनुभाव और संचारीभाव तथा स्थायीभाव की व्याख्या की है। भरत मुनि के अनुसार रस का सूत्र इस प्रकार है - ‘विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्तिः’

अर्थात् विभाव, अनुभाव और व्यभिचारि भावों (स्थायी भाव) से रस की निष्पत्ति होती है। ‘निष्पत्ति’ शब्द का प्रथम  प्रयोग भरत मुनि ने रस सूत्र में किया है। भरतमुनि ने रस को आस्वाद प्रदान करने वाला तत्त्व मानते है-आस्वाद्यत्वात्। भरतमुनि के अनुसार जिस प्रकार नाना प्रकार के व्यंजनों और औषधियों एवं द्रव्य, पदार्थों से भोज्य रस की निष्पत्ति होती है उसी प्रकार नाना प्रकार के भावों के संयोग से स्थायीभाव भी नाट्यरस को प्राप्त हो जाता है।

अभिनवगुप्त- 

कश्मीर के बहुत बड़े काव्यशास्त्र के आचार्य तथा तंत्रवेत्ता थे। शिवाद्वैत दर्शन (प्रत्यभिज्ञा), तंत्र, स्तोत्र तथा काव्यशास्त्र- विषयक ग्रंथों की रचना से अपने व्यापक ज्ञान का इन्होंने परिचय दिया है। दर्शन-क्षेत्र में ‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञा- विमर्शिनी’ उत्पलदेव के ग्रंथ और वृत्ति पर टीका है जो दिया बृहत् और लघु दो संस्करणों में है। तंत्र के क्षेत्र में इनका ‘तंत्रालोक’ बहुत प्रसिद्ध है, इसका संक्षिप्त रूप ‘तंत्रालोकसार’ भी इन्होंने लिखा था। मालिनीविजयवार्तिक तथा परात्रिंशिकाविवरण इनके अन्य तंत्र-ग्रंथ हैं। काव्यशास्त्रीयग्रंथों में दो की प्रसिद्धि और महत्ता अत्यधिक है- ध्वन्यालोक की लोचन टीका तथा नाट्यशास्त्र की अभिनवभारती। यह नाट्यशास्त्र पर एकमात्र उपलब्ध टीका है किन्तु अनेक स्थानों पर इसका पाठ त्रुटि है। इनकी 'सर्वथा रसनात्मक वीतविघ्न प्रतीतिग्राह्यो भाव एवं रसः' यह रस की व्याख्या अति प्रसिद्ध है। इनको रससम्प्रदाय का एक महत्वपूर्ण आचार्य माना जाता है।

Additional Information

अन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण- 

(B) वामन- काव्य के छह प्रधान तत्त्वों में तीसरा स्थान रीति का है, जिसके प्रवर्तक वामन हैं। वामन ने अपने ‘काव्यांकारसूत्र’ में ‘रीतिरात्मा कावस्य’ कहकर रीति प्रस्थान का प्रवर्तन किया है। रीति का अर्थ उनके अनुसार पदों की विशेष- युक्त रचना या संघटना है और यह ‘विशेष’ गुणों के रूप में होता है- विशिष्टा पदरचना रीतिः, विशेषो गुणात्मा । तदनुसार शब्द और अर्थ में विराजमान गुणों से सम्पन्न पदों की रचना को रीति कहते हैं। वामन गुणों को काव्यसौन्दर्य का उत्पादक नित्य धर्म मानते हैं। इसलिए गुणाश्रित रीति उनकी दृष्टि में काव्य की आत्मा है वामन ने भरत से 10 गुणों की परंपरा पायी थी, दण्डी के काव्यदर्श में वैदर्भमार्ग के लिए भी इन गुणों का निर्देश किया गया है, किन्तु वामन ने इन गुणों ( श्लेष, प्रसाद, समता, माधुर्य, सुकुमारता, अर्थव्यक्ति, उदारता, ओजस्, कान्ति और समाधि) को शब्दगुण और अर्थगुण के रूप में पृथक पृथक स्वीकार करके 20 गुणों की व्यवस्था की है। वैदर्भी रीति में गुण रहते हैं (समग्रगुणोपेता वैदर्भी), पांचाली में माधुर्य और सुकुमारता ये दो गुण (माधुर्यसौकुमार्योपापन्ना पाञ्चाली) तथा गौडीया में भी दो गुण ओजस् तथा कान्ति की सत्ता रहती है। इन रीतियों में ‘ पाञ्चाली’ वामन ने बढ़ायी है।

(C) क्षेमेन्द्र- क्षेमेन्द्र ने अपनी ‘औचित्यविचारचर्चा’ में कहा है कि जिस प्रकार शरीर को अलंकारों के उचित प्रयोग से ही सुंदर बनाया जाता है तथा अनुचित प्रयोग हास्य अस्पद बना देता है, उसी प्रकार काव्य में भी गुण, अलंकार, रस आदि का उचित निवेश ही काव्य का प्राण है। इन काव्योपदानों के प्रयोग में अनौचित्य होने से काव्य हास्य का पात्र हो जायेगा। क्षेमेन्द्र की मूल उक्ति है- औचित्यं रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् ।। अर्थात्, औचित्य ही रससिद्ध काव्य का प्राण है। 

क्षेमेन्द्र ने औचित्य के अन्तर्गत अनेक विषयों को रखकर उन्हें पाँच वर्गों में विभक्त किया है। कुल २७ विषय हैं जहाँ औचित्य का ध्यान रखना चाहिए-

  1. पद, वाक्य तथा प्रबन्ध का औचित्य मीमांसा- दर्शन का विषय है।
  2. गुण, अलंकार और रस- विषयक औचित्य के लिए काव्यशास्त्र प्रमाण है।
  3. क्रिया, कारक, लिङ्ग आदि आठ विषयों का औचित्य व्याकरण की परिधि में है।
  4. देश, कुल और व्रत ये तीन विषय लौकिक हैं जिनका औचित्य लौकव्यवहार पर आश्रित है।
  5. शेष १० विषय हैं- तत्त्व, सत्त्व, अभिप्राय आदि इनका सम्बन्ध स्वयं कवि से है,इनके औचित्य का उत्तरदायित्व कवि पर ही है।

औचित्य को काव्य का प्रधान तत्त्व कहने की प्रेरणा अपने पूर्वाचार्यों से ही क्षेमेन्द्र को मिली थी।

Question 40

मनुमतेरनधीयानो विप्रो कीदृशो भवति?

(A) काष्ठमयो हस्ती

(B) शक्तिमयो सिंहः

(C) चर्ममयो मृगः

(D) गतिमयोऽश्वः

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (B) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (A)

  4. DOption (d)

    (D) एवम् (B)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(C) एवम् (A)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : मनु के मत से पढा न हुआ विप्र कैसे होता है?

स्पष्टीकरण : 

मनुस्मृति में अनपढ़ विप्र के बारे में यह श्लोक आता है - 

यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः।

यश्च विप्रोऽनधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति ।।

अर्थ -

  • ‘जो विद्या नहीं पढ़ा है वह जैसा काठ का हाथी, चमड़े का मृग होता है, वैसा अविद्वान् मनुष्य जगत् में नाम मात्र मनुष्य कहलाता है।’

 

अतः स्पष्ट है, काष्ठमयो हस्ती  तथा चर्ममयो मृगः यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 41

अधोनिर्दिष्टयुग्मानां समीचीनां तालिकां चिनुत-

(A)गोपथ-ब्राह्मणम्(I)कृष्णयर्जुर्वेदः
(B)बृहदारण्यकम्(II)सामवेदः
(C)आर्षेय-ब्राह्मणम्(III)अथर्ववेदः
(D)तैत्तिरीय-ब्राह्मणम्(IV)शुक्लयजुर्वेदः

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत:

  1. AOption (a)

    (A)- (III), (B)- (IV), (C)- (II), D- (I)

  2. BOption (b)

    (A)- (IV), B- (I), (C)- (III), (D)- (II)

  3. COption (c)

    (A)- (II), (B)- (III), (C)- (IV), (D)- (I)

  4. DOption (d)

    (A)- (I), (B)- (II), (C)- (III), (D)- (IV)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(A)- (III), (B)- (IV), (C)- (II), D- (I)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : योग्य तालिका का चयन कीजिए।

संहिता और ब्राह्मणग्रंथ :

संहिताब्राह्मणग्रंथ
ऋग्वेद- ऐतरेयब्राह्मण-(शैशिरीयशाकलशाखा) - कौषीतकी (शांखायन) ब्राह्मण (बाष्कल शाखा)
यजुर्वेद- शुक्ल यजुर्वेद : - शतपथब्राह्मण - (माध्यन्दिनीय वाजसनेयि शाखा) - शतपथब्राह्मण - (काण्व वाजसनेयि शाखा) - कृष्णयजुर्वेद : - तैत्तिरीयब्राह्मण - मैत्रायणीब्राह्मण - कठब्राह्मण - कपिष्ठलब्राह्मण
सामवेद- प्रौढ(पंचविंश) ब्राह्मण - षडविंश ब्राह्मण - आर्षेय ब्राह्मण - मन्त्र (या छान्दिग्य) ब्राह्मण - जैमिनीय (या तावलकर) ब्राह्मण
अथर्ववेद- गोपथब्राह्मण (पिप्पलाद शाखा)

शतपथब्राह्मण का एक खंड बृहदारण्यक नाम से जाना जाता है।

अतः स्पष्ट है, (A)- (III), (B)- (IV), (C)- (II), D- (I) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 42

अधोऽङ्कितानां केन सह कस्य सम्बन्धः?

(A)पुरुषः(I)विकृतिः
(B)वाक्(II)प्रकृतिर्विकृतिः
(C)शब्दः(III)प्रकृतिः
(D)मूलप्रकृतिः(IV)न प्रकृतिर्न विकृतिः

 अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत:

  1. AOption (a)

    (A)- (IV), (B)- (III), (C)- (I), (D)- (II)

  2. BOption (b)

    (A)- (IV), (B)- (II), (C)- (I), (D)- (III)

  3. COption (c)

    (A)- (IV), (B)- (I), (C)- (II), (D)- (III)

  4. DOption (d)

    (A)- (III), (B)- (I), (C)- (IV), (D)- (II)

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

(A)- (IV), (B)- (I), (C)- (II), (D)- (III)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किसका किस के साथ संबंध है? सही विकल्प चुनिये:

सांख्यकारिका से संदर्भ : 

  • मूलप्रकृतिविकृतिर्महदाद्या: प्रकृतिविकृतय:सप्त। षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृति:पुरुष:।। (सांख्यकारिका, ३)

स्पष्टीकरण : 

  • मूलप्रकृति किसी की भी विकृति नहीं होती।
  • महत्, अहंकार और पाँच तन्मात्रा (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) आदि सात तत्व प्रकृति और विकृति दोनोंं होतेंं हैं।
  • सोलह विकार केवल विकृति होतेंं हैं। इनमेंं निम्नलिखित तत्व आते हैंं - 
  • मन
  • पंच ज्ञानेंद्रिय - चक्षु, घ्राण, रसना, श्रोत्र, त्वक्
  • पंच कर्मेंद्रिय - वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ
  • पंच महाभूत - आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी
  • पुरुष प्रकृति भी नहीं होता और विकृति भी नहीं होता।

 

​अतः स्पष्ट है, (A)- (IV), (B)- (I), (C)- (II), (D)- (III) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 43

प्रथमां सूचीं द्वितीयया सह मेलयतु-

प्रथमा सूचीद्वितीया सूची
(A)वाव्रज्यते(I)नामधातुक्रियापदम्
(B)अजिज्ञपत्(ll)यङ्लुगन्तक्रियापदम्
(C)स्वति(lll)यङन्तक्रियापदम्
(D)बोभवीति(lV)ण्यन्तक्रियापदम्

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A)- (III), (B)- (IV), (C)- (I), (D)- (II)

  2. BOption (b)

    (A)- (II), (B)- (III), (C)- (IV), (D)- (I)

  3. COption (c)

    (A)- (I), (B)- (II), (C)- (III), (D)- (IV)

  4. DOption (d)

    (A)- (IV), (B)- (III), (C)- (II), (D)- (I)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(A)- (III), (B)- (IV), (C)- (I), (D)- (II)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : प्रथम सूची का द्वितीय सूची के साथ मिलन कीजिए-

स्पष्टीकरण : 

  1. सूत्र : दीर्घोऽकितः
  • क्रियापद का प्रकार : यङन्तक्रियापदम्
  • सूत्र स्पष्टीकरण - इस सूत्र से अभ्यास के अन्तिम 'अ' का दीर्घ हो जाता है।
  • उदाहरण : वाव्रज्यते (बोहोत टेढा चलना)
  • प्रक्रिया = व्रज् → व व्रज् → वा व्रज् → वाव्रज्यते
  • विशेष टिपण्णी - यङ्प्रत्यय के सारे रूप आत्मनेपद के होते है।
  1. सूत्र : यङो वा
  • क्रियापद का प्रकार : यङ्लुगन्तक्रियापदम्
  • सूत्र स्पष्टीकरण - इस सूत्र से हलादि पित् सार्वधातुक प्रत्यय होने पर सार्वधातुक का विकल्प से इडागम होता है। जैसे भू → बोभू + ति = बोभोति/ भू → बोभू + ईट् + ति = बोभवीति
  • उदाहरण : बोभवीति​
  1. सूत्र : उपमानादाचारे
  • क्रियापद का प्रकार : नामधातुक्रियापदम्
  • सूत्र स्पष्टीकरण - उपमावाचक कर्म संज्ञक सुबन्त से आचार अर्थ में क्यच् प्रत्यय होता है जैसे - पुत्रीयति छात्रम् = शिष्य को पुत्र समान मानता है, कृष्णति = कृष्ण के समान आचरण करता है, स्वति = अपने सदृश मानता है।
  • उदाहरण : स्वति
  1. सूत्र : मितां ह्रस्वः 
  • क्रियापद का प्रकार : ण्यन्तक्रियापदम्
  • सूत्र स्पष्टीकरण - इस सूत्र से मित संज्ञक धातु को उपधा में णिच् प्रत्यय के परे ह्रस्व आदेश होता है।
  • उदाहरण : अजिज्ञपत्​

 

इसप्रकार (A)- (III), (B)- (IV), (C)- (I), (D)- (II) यह विकल्प समुचित है।

Question 44

अधोस्तनयुग्मानां समीचीनां तालिकां चिनुत-

(A)दण्डी(I)सौन्दरनन्दम्
(B)बिल्हणः(II)हर्षचरितम्
(C)अश्वघोषः(III)दशकुमारचरितम्
(D)वाणभट्टः(IV)विक्रमाङ्कदेवचरितम्

एषु समीचीनमुत्तरं चिनुत:

  1. AOption (a)

    (A)- (II), (B)- (I), (C)- (IV), (D)- (III)

  2. BOption (b)

    (A)- (III), (B)- (IV), (C)- (I), (D)- (II)

  3. COption (c)

    (A)- (I), (B)- (II), (C)- (III), (D)- (IV)

  4. DOption (d)

    (A)- (IV), (B)- (III), (C)- (II), (D)- (I)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A)- (III), (B)- (IV), (C)- (I), (D)- (II)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : समीचीन तालिका का चयन कीजिए।   

सौन्दरानन्दम् :

यह अश्वघोष का दूसरा महाकाव्य है जिसमें 18 सर्ग है। इस महाकाव्य में राजा नंद और सुन्दरी की कथा का वर्णन है।नन्द गौतम बुद्ध का सौतेला भाई था।वह अत्यंत सुन्दर और विलासी प्रकृति का था।वह अपनी पत्नी सुंदरी पर अत्यंत आसक्त था। इसलिए गौतम बुध्द ने नंद को सांसारिक विषयों से अलग कर बौद्ध धर्म की दीक्षा दी। 

हर्षचरितम् :

हर्षचरित संस्कृत में बाणभट्ट द्वारा रचित एक ग्रन्थ है। इसमें भारतीय सम्राट हर्षवर्धन का जीवनचरित वर्णित है। ऐतिहासिक कथानक से सम्बन्धित यह संस्कृत का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है।इस समय उपलब्ध हर्षचरित आठ उच्छ्वासों में विभाजित है। जिसमें से पहले ढाई उच्छ्वास बाण की आत्मकथा रूप में हैं। तदुपरान्त स्थाणीश्वर (आधुनिक थानेश्वर) के पुष्यभूति वंश, जिनमें हर्ष के पिता प्रभाकरवर्धन का जन्म हुआ था, का वर्णन है।

दशकुमारचरितम् :

दशकुमारचरित, दंडी (षष्ठ या सप्तम शताब्दी ई.) द्वारा प्र���ीत संस्कृत गद्यकाव्य है। इसमें दश कुमारों का चरित वर्णित होने के कारण इसका नाम "दशकुमारचरित" है। दशकुमारचरित के हस्तलिखित तथा प्रकाशित संस्करणों में प्राय: तीन भाग हैं-

  • आरंभिक अथवा भूमिका भाग, जिसमें पाँच उच्छ्वास हैं, पूर्वपीठिका के नाम से प्रसिद्ध हैं;
  • मध्यम भाग, जिसमें आठ उच्छ्वास हैं, दशकुमारचरित के नाम से जाना जाता है।
  • अंतिम अथवा परिशिष्ट भाग, जो उत्तरपीठिका के नाम से प्रसिद्ध है।

विक्रमांकदेवचरितम् :

बिल्हण कल्याणी के चालुक्य वंशीय शासक विक्रमादित्य षष्ठ (1070-1126) की राजसभा में एक कश्मीरी राजकवि और विद्वान थे। उनकी सुप्रसिद्ध रचना 'विक्रमांकदेवचरित' है। बिल्हण ने 'विक्रमांकदेवचरित' में अपने आश्रयदाता सम्राट का जीवन चरित अत्यंत सरस ढंग से प्रस्तुत किया है। उनका विवरण पूर्णत: इतिहास संगत है। 'विक्रमांकदेवचरित' की भाषा प्राञ्जल तथा स्पष्ट है एवं शैली वैदर्भी है। उच्च कोटि की विलक्षण कल्पना शक्ति बिल्हण में थी तथा उसी के अनुरूप उन्होंनें वर्णन प्रस्तुत किया है। विक्रमादित्य षष्ठ के राजकवि बिल्हण ने अपने 'विक्रमांकदेवचरित' में कल्याणी की प्रशंसा के गीत गाए हैं और उसे संसार की सर्वश्रेष्ठ नगरी बताया है। कुलोत्तुंग प्रथम के द्वारा विक्रमादित्य षष्ठ को पराजय का सामना करना पड़ा था, इसका उल्लेख भी बिल्हण के 'विक्रमांकदेवचरित' से मिलता है।

अतः स्पष्ट है, (A)- (III), (B)- (IV), (C)- (I), (D)- (II) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 45

महाभारतीय पर्वणां समुचितः क्रमोऽस्ति-

(A) अनुशासनपर्व

(B) अश्वमेधपर्व

(C) शान्तिपर्व

(D) मौसलपर्व

(E) आश्रमवासीपर्व

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A), (D), (B), (C), (E)

  2. BOption (b)

    (B), (C), (A), (D), (E)

  3. COption (c)

    (C), (A), (B), (E), (D)

  4. DOption (d)

    (D), (B), (C), (A), (E)

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

(C), (A), (B), (E), (D)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- महाभारत के पर्वों का समुचित क्रम है-

स्पष्टीकरण- महाभारत के पर्वों का समुचित क्रम है- शांतिपर्व, अनुशासनपर्व, अश्वमेधपर्व, आश्रमवासिकपर्व, मौसलपर्व।

  • लौकिक संस्कृत साहित्य में महत्व की दृष्टि से रामायण के बाद महाभारत का स्थान आता है। ये दोनों ग्रन्थ सम्मिलित रूप से आर्ष काव्य कहे जाते हैं।
  • महाभारत विश्व साहित्य का सबसे बड़ा ग्रन्थ है। इसमें एक लाख श्लोक है, अतः यह ‘शतसाहस्रीसंहिता’ के नाम से जाना जता है। इसके लेखक वेद व्यास माने जाते हैं।
  • इसका विकास तीन चरणों में हुआ- जय (8800 श्लोक), भारत (24000 श्लोक) तथा महाभारत (100000 श्लोक)। महाभारत में कौरवों-पाण्डवों के भीषण युद्ध का वर्णन मिलता है।
  • महाभारत में ही ‘में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। इसमें शांत रस है।
  • महाभारत को 18 पर्वों में विभक्त किया गया है, जिनका वर्णनप्रकार निम्नलिखित है- आदिपर्व, सभापर्व, वनपर्व, विराटपर्व, उद्योगपर्व, भीष्मपर्व, द्रोणपर्व, कर्णपर्व, शल्यपर्व, सौप्तिकपर्व, स्त्रीपर्व, शांतिपर्व, अनुशासनपर्व, आश्वमेधिकपर्व, आश्रमवासिकपर्व, मौसलपर्व, महाप्रस्थानिकपर्व, स्वर्गारोहणपर्व।
  • सभी पर्वों में सबसे बड़ा शान्ति पर्व तथा सबसे छोटा महाप्रस्थानिकपर्व है। इन पर्वों के अतिरिक्त महाभारत का एक खिल पर्व भी है, जो हरिवंश  पर्व के नाम से जाना जाता है। इसमें कृष्ण की लीलाओं का वर्णन है।

अधोलिखितं गद्य - खण्डं पठित्वा प्रश्नानां समीचीनम् उत्तरं चिनुत-

इयं संवर्धनवारिधारा तृष्णा विषवल्लीनाम्, व्याधगीतिरिन्द्रियमृगाणाम्, परामर्शधूमलेखा सच्चरितचित्राणाम्, तिमिरोद्गतिः शास्त्रदृष्टीनाम् पुरःपताका सर्वाविनयानाम्, उत्पत्तिनिम्नगा क्रोधवेगग्राहाणाम्, आपानभूमिर्विषयमधूनाम्, सङ्गीतशाला भ्रूविकारनाट्यनाम्, आवासदरी दोषाशीविषाणाम्, उत्सारणवेत्रलता सत्पुरुषव्यवहाराणाम्, प्रस्तावना कपटनाटकस्य, कदलिका कामकारिणः, वध्यशाला साधुभावस्य, राहुजिह्वा धर्मेन्दुमण्डलस्य, लतेव विटपकानध्यारोहति। गङ्गेव वसुजनन्यपि तरङ्गबुद्बुद्चञ्चला, पातालगुहेव तमोबहुला, हिडिम्बेव भीमसाहसैकहार्य हृदया, प्रावृडिवाचिरद्युतिकारिणी, दुष्टपिशाचीव दर्शितानेकपुरुषोच्छ्राया स्वल्पसत्त्वमुन्मत्तीकरोति।

Question 46

Based on Passage: View directions & passage

उपरिलिखित-परिच्छेदमनुसृत्य अधोलिखितेषु "वल्लिनां संवर्धने कस्यापेक्षा भवति?" इति प्रश्नस्य समीचीनमुत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    अग्नेः

  2. BOption (b)

    वायोः

  3. COption (c)

    जलस्य

  4. DOption (d)

    काष्ठस्य

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Correct answer

Answer: (c)C.

जलस्य

Why this answer is correct

प्रश्न अनुवाद - ऊपर परिच्छेद में निम्नलिखित लताओं को बढ़ाने वाली कैसी चाह होती है" इस प्रश्न का सही उत्तर चुनिये ?

स्पष्टीकरण - 

  • उक्त गद्य शुकनासोपदेश से उद्धृत है।
  • गद्य में उल्लेखित है - इयं संवर्धनवारिधारा तृष्णा विषवल्लीनाम्
  • अर्थात् यह लक्ष्मी धन की चाह रूपी विष लताओं को बढ़ाने वाली जल की धारा है।

Important Points

  • गद्य से स्पष्ट है कि लताओं को बढ़ाने वाली चाह जल की धारा के समान होती है।
  • जिस प्रकार जल की धारा से लगातार सींचने पर लता खूब बढ़ती है। उसी प्रकार यह लक्ष्मी धन की चाह रूपी लताओं को पोषित करती है।

 

अत: 'जलस्य' विकल्प सही है।

Additional Information

गद्यांश अनुवाद -

यह लक्ष्मी धन की चाह रूपी विष लताओं को बढ़ाने वाली जल की धारा है। इन्द्रियों रूपी हरिणों के लिये बहेलियों का गीत है। सच्चरित्र रूपी चित्रों को आवृत करने वाली धूमपंक्ति है। शस्त्र रूपी नेत्रों के लिये तिमिर रोग की उत्पत्ति है। समस्त दुराचारों की अग्रपताका है। क्रोध के आवेग रूपी मगरों को उत्पन्न करने वाली नदी है। विषय रूपी मद्य की पानभूमि है। भ्रूसंचालन रूपी अभिनय की रङ्गशाला है। दोष रूपी सर्पों के रहने की गुफा है। सज्जनों के आचरणों को दूर करने वाली बेंत की छडी है। छलरूपी नाटक की भूमिका है। कामदेव रूपी हाथी का कदली वन है। सुजनता की वद्यशाला है। धर्मरूपी चन्द्रमण्डल के लिये राहु की जिह्य है। लता की भांति वसुओं की माता भी लहरों और बुलबुलों के समान चपला है। अंधकारयुक्त पाताल की गुफा के समान अज्ञान को उत्पन्न करने वाली है। भीम के साहस मात्र से आकृष्ट ह्यदय वाली हिडिम्बा के समान है। क्षणिक विद्युत को उत्पन्न करने वाली वर्षा के समान यह लक्ष्मी शीघ्र ही समाप्त हो जाने वाली चमक को उत्पन्न करती है। क्रूर पिशाचिनी के समान अनेक पुरुषों की उन्नति दिखाकर अल्प बुद्धि वाले व्यक्ति को उन्मत्त बना देती है।

Question 47

Based on Passage: View directions & passage

उपरिलिखित-परिच्छेदमनुसृत्य अधोलिखितेषु-"तिमिरोद्गतिः शास्त्रदृष्टीनाम्" इति गद्यांशानुसारं तिमिरोद्गतिः कुत्र भवति?

  1. AOption (a)

    कर्णे

  2. BOption (b)

    हस्ते

  3. COption (c)

    शिरसि

  4. DOption (d)

    नेत्रे

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (d)D.

नेत्रे

Why this answer is correct

प्रश्न अनुवाद - ऊपर परिच्छेद में निम्नलिखित "तिमिरोद्गतिः शास्त्रदृष्टीनाम्" इस गद्यांश में 'तिमिरोद्गतिः' कहां होता है ?

स्पष्टीकरण - 

  • उक्त गद्य शुकनासोपदेश से उद्धृत है।
  • गद्य में उल्लेखित है - तिमिरोद्गतिः शास्त्रदृष्टीनाम्
  • अर्थात् शास्त्र रूपी नेत्रों के लिये तिमिर रोग की उत्पत्ति है।

Important Points

  • गद्य से स्पष्ट है कि तिमिर रोग (मोतियाबिन्द) नेत्रों में होता है।

 

अत: 'नेत्रे' विकल्प सही है।

Question 48

Based on Passage: View directions & passage

उपरिलिखित-परिच्छेदमनुसृत्य अधोलिखितेषु- "पुरःपताका सर्वाविनयानाम् " इति गद्यांशे पुरःपताका उच्यते-

  1. AOption (a)

    सरस्वती

  2. BOption (b)

    चण्डी

  3. COption (c)

    लक्ष्मीः

  4. DOption (d)

    कालिका

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (c)C.

लक्ष्मीः

Why this answer is correct

प्रश्न अनुवाद - ऊपर परिच्छेद में निम्नलिखित "पुरःपताका सर्वाविनयानाम्" इस गद्यांश में 'पुरःपताका' कहा जाता है ?

स्पष्टीकरण - 

  • उक्त गद्य शुकनासोपदेश से उद्धृत है।
  • गद्य में उल्लेखित है - पुरःपताका सर्वाविनयानाम्
  • अर्थात् (यह लक्ष्मी) समस्त दुराचारों की अग्रपताका है।

Important Points

  • गद्य से स्पष्ट है कि अग्रपताका लक्ष्मी को कहा गया है।
  • लक्ष्मी ही समस्त दुराचारों की अग्रपताका है।

 

अत: 'लक्ष्मीः' विकल्प सही है।

Question 49

Based on Passage: View directions & passage

उपरिलिखित-परिच्छेदमनुसृत्य अधोलिखितेषु- "कदलिका कामकारिणः-" इत्यत्र करिणः तुलना केन सह कृता?

  1. AOption (a)

    शुकनासेन

  2. BOption (b)

    जलेन

  3. COption (c)

    क्रोधेन

  4. DOption (d)

    कामेन

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Correct answer

Answer: (d)D.

कामेन

Why this answer is correct

प्रश्न अनुवाद - ऊपर परिच्छेद में निम्नलिखित "कदलिका कामकारिणः" इस गद्यांश में 'करिणः' की तुलना किसके साथ की गयी है ?

स्पष्टीकरण - 

  • उक्त गद्य शुकनासोपदेश से उद्धृत है।
  • गद्य में उल्लेखित है - कदलिका कामकारिणः
  • अर्थात् कामदेव रूपी हाथी का कदली (केले) का वन है।

Important Points

  • गद्य से स्पष्ट है कि 'करिणः' की तुलना यहां पर कामदेव से की गयी है।
  • जैसे हाथी कदली वन में स्वेच्छापूर्वक विहार करता है। वैसे ही लक्ष्मी के रहने पर काम का विहार मनमाना हो जाता है।

 

अत: 'कामेन' विकल्प सही है।

Question 50

Based on Passage: View directions & passage

उपरिलिखित-परिच्छेदमनुसृत्य अधोलिखितेषु 'हिडिम्बेव भीमसाहसैकहार्यहृदया' इत्यंशे कोऽलङ्कारः?

  1. AOption (a)

    विरोधाभासः

  2. BOption (b)

    विभावना

  3. COption (c)

    श्लिष्टोपमा

  4. DOption (d)

    विशेषोक्तिः

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Correct answer

Answer: (c)C.

श्लिष्टोपमा

Why this answer is correct

प्रश्न अनुवाद - ऊपर परिच्छेद में निम्नलिखित 'हिडिम्बेव भीमसाहसैकहार्यहृदया' इस अंश में कौन सा अलंकार है ?

स्पष्टीकरण -

  • इस अंश में श्लिष्टोपमा अलंकार है।
  • 'हिडिम्बेव भीमसाहसैकहार्यहृदया' अर्थात् वह लक्ष्मी घटोत्कच जननी हिडिम्बा के समान ���ै। जैसे भीमसेन के साहस ने हिडिम्बा राक्षसी के मन का अपहरण किया था। उसी प्रकार केवल भयङ्कर साहस ही इसके मन का अपहरण कर सकता है।

Important Points

श्लिष्टोपमा अलंकार -

  • जहां दो अर्थो की संभावना के साथ उपमा हो।
  • उदाहरण - 'हिडिम्बेव भीमसाहसैकहार्यहृदया'
  • वह लक्ष्मी घटोत्कच जननी हिडिम्बा के समान है। परन्तु भीमसेन के साहस ने हिडिम्बा राक्षसी के मन का अपहरण किया था।
  • उक्त अंश में दो अर्थो की संभावना के साथ उपमा हो रही है।

इसीलिये यहां पर 'श्लिष्टोपमा' अलंकार है। 

Additional Informationअन्य विकल्प -

1.विरोधाभासः -

  • 'विरोधः सोऽविरोधेऽपि विरुद्धत्वेन यद्वचः'
  • अर्थात् वास्तव में विरोध न होने पर भी विरुद्ध रूप से जो वर्णन करना यह विरोधाभास होता है।

2.विभावना -

  • 'विभावना विना हेतुं कार्योत्त्पतिर्यदुच्यते'
  • अर्थात् बिना कारण के भी जहाँ कार्य की उत्पत्ति का वर्णन हो।

3.विशेषोक्तिः -

  • 'सतिहेतौ फलाभावे विशेषोक्तिः तथा द्विधा'
  • अर्थात् सम्पूर्ण कारण के रहते हुए भी कार्य के अभाव का वर्णन।
  • विशेषोक्ति दो प्रकार के होते है - 1.उक्‍तनिमित्‍ता 2.अनुक्‍तनिमित्‍ता

Question 51

1846 तमे ख्रिस्ताब्दे अधोलिखितेषु कतमेन पाश्चात्य-विदुषा 'वैदिक साहित्यम् इतिहासञ्च' (Vedic literature and History) इति ग्रन्थः रचितः?

  1. AOption (a)

    मैक्समूलर-इत्यनेन

  2. BOption (b)

    रूडाल्फ़्-राॅथ-इत्यनेन

  3. COption (c)

    विलियम-जोन्स-इत्यनेन

  4. DOption (d)

    मोनियर-विलियम-इत्यनेन

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Correct answer

Answer: (b)B.

रूडाल्फ़्-राॅथ-इत्यनेन

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद - 1846 ई० में निम्नलिखित में से किस पाश्चात्य विद्वान द्वारा ‘वैदिक साहित्य और इतिहास” नामक ग्रन्थ रचा गया?

स्पष्टीकरण - पाश्चात्य विद्वान रूडोल्फ रॉथ के द्वारा सन 1846 ई० ‘वैदिक साहित्य और इतिहास’ नामक ग्रन्थ रचा गया। 

रूडोल्फ रॉथ (1821-95 ई०) - जर्मन विद्वान रूडोल्फ रॉथ ने वैदिक भाषाशास्त्र के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सन् 1852 ई० में इन्होंने निरुक्त का आलोचनात्मक संस्करण प्रकाशित किया। इनका सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य है - सात खण्डों में संस्कृत महाकोश का सम्पादन। इस कोश में वैदिक तथा लौकिक दोनों प्रकार के शब्द समाहित थे। इन्होंने स्वयं ही वैदिक शब्दों की समीक्षा की तथा लौकिक शब्दों की समीक्षा में अ���्य विद्वान ओटो बोथलिंक्ग् की सहायता ली।

वैदिक साहित्य और इतिहास - यह ग्रन्थ जर्मन भाषा में लिखा गया था। रूडोल्फ रॉथ ने इस ग्रंथ को लिखकर समीक्षात्मक वैदिक अनुशीलन का आरंभ किया। इसके तीन खण्डों में क्रमश: संहिता, प्रातिशाख्य तथा ऋग्वेद में इतिहास-तत्व का विवेचन है।

Additional Information

अन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण- 

1. मैक्समूलर (1823-1900 ई०) - पाश्चात्य विद्वानों में जर्मन विद्वान फ्रेड्रिक मैक्समूलर ने वेदाध्ययन के क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण कार्य किया है।उन्होंने वेदाध्ययन में भाषाशास्त्र के साथ साथ सायणभाष्य को भी आधार माना है। इनके विविध कार्यों में तीन अमर कृतियां हैं -

  • सायणभाष्य के साथ ऋग्वेद का 6 खण्डो में सर्वप्रथम प्रकाशन।
  • पचास भागों में पवित्र प्राच्य गंथमाला (Sacred Books of the East) के अंतर्गत प्राच्य धर्मों के समस्त मौलिक साहित्य के अंग्रेजी अनुवाद का सम्पादन प्रकाशन।
  • भारत से हम क्या सीखें (India: What it can teach us)

इनके अतिरिक्त इन्होंने वेदों का काल निर्धारण जैसे महत्वपूर्ण कार्य भी किया है। 

2. विलियम जोन्स (1746-1794 ई०) - अंग्रेज प्राच्यविद्याविशारद सर विलियम जोन्स ने यूरोप में संस्कृत विद्या के पठन-पाठन का सर्वप्रथम द्वारा खोला था। इन्होंनें संस्कृत के अध्ययन हेतु सन 1784 में ‘रोयल एशियाटिक सोसायटी ओफ बंगाल’ की स्थापना की। इनके सौजन्य से ही ‘तुलनात्मक भाषाविज्ञान’ की नींव पड़ी। इन्होंने प्रथम बार अभिज्ञानशाकुन्तलम् का अंग्रेज़ी अनुवाद किया। इनके अनुवाद को आधार बनाकर इस ग्रंथ का अन्य यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद हुआ। 

3. मोनीयर विलियम्स (1819-1899 ई०) - अंग्रेज विद्वान सर मोनीयर विलियम्स ने पाश्चात्य जगत् में संस्कृत के प्रचार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन्होंनें अभिज्ञानशाकुन्तलम् तथा विक्रमोर्वशीयम् का अंग्रेज़ी अनुवाद किया। इन्होंने अभिज्ञानशाकुन्तलम् के अंग्रेजी अनुवाद का यूरोप की जनता में निशुल्क वितरण करवाया। इसके अतिरिक्त, इन्होंने अंग्रेजी-संस्कृत शब्दकोश का निर्माण किया जो अद्यावधि सभी कोशों में प्रमाणिक माना जाता है।

Question 52

अधोलिखितेषु कतमेन पाश्चात्यविदुषा 'ए वैदिक काॅन्कार्डेन्स्' (A Vedic Concordance) इति नामको ग्रन्थो रचितः?

  1. AOption (a)

    रूडाल्फ-राॅथ-इत्यनेन

  2. BOption (b)

    कीथ-इत्यनेन

  3. COption (c)

    विल्सन-इत्यनेन

  4. DOption (d)

    ब्लूम-फील्ड-इत्यनेन

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Correct answer

Answer: (d)D.

ब्लूम-फील्ड-इत्यनेन

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद - निम्नलिखित में से किस पाश्चात्य विद्वान द्वारा ‘ए वैदिक कंकॉर्डेन्स’ नामक ग्रन्थ रचा गया?

स्पष्टीकरण - पाश्चात्य विद्वान ब्लूमफील्ड के  द्वारा ‘ए वैदिक कंकॉर्डेन्स’ नामक ग्रन्थ रचा गया।

मोरिस ब्लूमफील्ड (1855-1928 ई०) - ये अमरीकी दार्शनिक तथा भाषाविद् थे किन्तु संस्कृत अध्ययन के क्षेत्र में इन्होंने ने अपना अमूल्य योगदान दिया। इनकी अन्य रचनाएं निम्नलिखित है - 

  1. अथर्वेद के मंत्रों का आंग्ल अनुवाद।
  2. वेदों का धर्म (भारत का प्राचीन धर्म)
  3. ऋग्वैदिक पुनरावृत्ति
  4. अथर्ववेद और गोपथ ब्राह्मण

ए वैदिक कंकॉर्डेन्स - यह ब्लूमफील्ड की सबसे प्रसिद्ध रचना है। इस अर्थ है - वैदिक पादानुक्रम कोश। यह वेदों के प्रमुख उद्धरणों को जानने का स्रोत है। उनके इस 'पादानुक्रम कोष' में वैदिक साहित्य के किसी मंत्र या गद्यात्मक भाग के जितने पाद हैं, उनकी अक्षरक्रम से सन्दर्भसूची है। उदाहरणस्वरूप, ऋग्वेद का पहला मन्त्र 'अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधातमम्।ब्लूमफील्ड के कोष में इसका पहला चरण 'अग्निम् ईडे पुरोहितम्' इस रूप में 'अ' अक्षर के अंतर्गत, दूसरा चरण 'यज्ञस्य देवम् ऋत्विजम्' 'य' अक्षर के अंतर्गत और तीसरा चरण 'होतारं रत्नधातमम्' 'ह' अक्षर के अंतर्गत उचित स्थान पर संदर्भ सहित दिये गये हैं।

Additional Information

अन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण - 

क. रूडोल्फ रॉथ (1821-95 ई०)  - जर्मन विद्वान रूडोल्फ रॉथ ने वैदिक भाषाशास्त्र के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनकी प्रथम कृति है- ‘वैदिक साहित्य और इतिहास’। इसके तीन खण्डों में क्रमश: संहिता, प्रातिशाख्य तथा ऋग्वेद में इतिहास-तत्व का विवेचन है। इन्होंने निरुक्त का आलोचनात्मक संस्करण भी प्रकाशित किया। इनका सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य है - सात खण्डों में संस्कृत महाकोश का सम्पादन।इस कोश में वैदिक तथा लौकिक दोनों पद समाहित है। इनकी अन्य कृति है - वैदिक साहित्य और इतिहास। रूडोल्फ रॉथ ने इस ग्रंथ को लिखकर समीक्षात्मक वैदिक अनुशीलन का आरंभ किया।इसके तीन खण्डों में क्रमश: संहिता, प्रातिशाख्य तथा ऋग्वेद में इतिहास-तत्व का विवेचन है। 

ख. कीथ (1879 -1944 ई०) - पाश्चात्य प्रमाणिक विद्वानों में आर्थर बेरिडोल कीथ सबसे अग्रिणी है। यतोहि  उनके द्वारा आंग्लभाषा में रचित ‘संस्कृत साहित्य का इतिहास’ नामक ग्रंथ बहुधा प्रमाण रूप में स्वीकृत है।इनके द्वारा प्रणीत अन्य ग्रंथ इस प्रकार है-  

  1. ऋग्वेद के ऐतरेय एवं कौषीतकी ब्राह्मण का दस खण्डों में अनुवाद
  2. शांखायन आरण्यक का अंग्रेजी अनुवाद
  3. कृष्णयजुर्वेद का दो भागों में अंग्रेजी अनुवाद
  4. वैदिक इंडेक्स (मेक्डोनल के सहयोग से),
  5. रिलीजन एण्ड फिलॉसाफी आफ् वेद एण्ड उपनिषदस्

​ग. विल्सन (1785-1830 ई०) -  पाश्चात्य विद्वानों में होरेस हेमन विल्सन ने वेदों के अध्ययन में भाषाशास्त्र नहीं अपितु परम्परागत अनुशीलन को आधार बनाया। ये सायण के प्रबल समर्थक थे। इन्होंने सायणभाष्य के आधार पर सम्पूर्ण ऋग्वेद का प्रथम अंग्रेजी अनुवाद किया। यह गद्यानुवाद 6 खण्डों में प्रकाशित हुआ। इसके अतिरिक्त इन्होंने मेघदूत का भी अनुवाद किया।

Question 53

इन्द्र-सूक्ते (2.12.4) चतुर्थे मन्त्रे प्राप्तस्य 'दासं वर्णम्' इत्यस्य सायण - भाष्यानुसारम् अधोलिखितेषु कतमः अर्थोऽस्ति?

  1. AOption (a)

    कृष्णवर्णम्

  2. BOption (b)

    दुष्टवर्णम्

  3. COption (c)

    शूद्रादिकम्

  4. DOption (d)

    अन्त्यवर्णम्

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Correct answer

Answer: (c)C.

शूद्रादिकम्

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प्रश्नानुवाद - इन्द्र सूक्त (2.12.4) के चतुर्थ मंत्र में प्राप्त ‘दास वर्ण’ का सायण भाष्यानुसार निम्नलिखित में से कौन सा अर्थ है? 

स्पष्टीकरण - इन्द्र सूक्त (2.12.4) के चतुर्थ मंत्र में प्राप्त ‘दास वर्ण’ का सायण भाष्यानुसार अर्थ शूद्रादि वर्ण है।

ऋग्वेद में इन्द्र सर्वाधिक प्रमुख देवता है। सम्पूर्ण ऋग्वेद में प्रायः 250 सूक्तों में इनकी प्रशंसा की गयी है। इसके अतिरिक्त, 50 सूक्तों में अन्य देवताओं के साथ इनकी स्तुति की गई। वैदिक ग्रन्थों में इन्द्र के मानवीय स्वरूप का वर्णन प्राप्त होता है। इनका प्रधान अस्त्र वज्र है, जिसके कारण ये वज्रबाहु कहे जाते है।

यास्काचार्य ने इन्द्र शब्द की निम्न निरुक्तियाँ दी हैं -

  1. इन्द्रः इरां दृणातीति वा। अर्थात् इस इरा अन्न का विदारण करने वाले।
  2. इन्द्रन् शत्रुणां दारयिता वा। अर्थात् शत्रु का विदारण करने वाला।
  3. इन्द्रन् शत्रुणां द्रावयिता वा। अर्थात् शत्रुओं को भगाने वाला।

इन्द्रसूक्त (2.12) -

वेदऋग्वेद
मण्डलदुसरा
देवताइन्द्र
ऋषिगृत्समद
छन्दत्रिष्टुप् (44 वर्ण)
मंत्र संख्या15
स्वरधैवत

चतुर्थ मंत्र-

येनेमा विश्वा च्यवना कृतानि, यो दासं वर्णमधरं गुहाकः।

श्वघ्वनीव यो जिगीवाँल्लक्षमाददर्य: पुष्टानि स जनास इन्द्रः।।

मन्त्रार्थ- जिसने सारे नश्वर पदार्थ को स्थिर किया है, जिसने शुद्रादि दासवर्ण को गुफाओं में स्थापित किया है, जिसने लक्ष्य जीतकर व्याध की तरह शत्रु के सारे धन का आहरण किया है, हे लोगों! वही इन्द्र है। 

Additional Informationइस सूक्त में प्रयुक्त पदों का सायण सम्मत अर्थ निम्नलिखित है - 

  • येन - इन्द्रेण (इन्द्र के द्वारा)
  • इमा - इमानि (यें)
  • विश्वा च्यवना - नश्वराणि भुवनानि (नश्वर संसार)
  • दासं वर्णं - शूद्रादिकम् (शुद्रादि वर्ण)
  • अधरं - निकृष्टम् असुरम् (निकृष्ट असुर)
  • गुहा - गुहायां गूढ़स्थाने नरके (गुफा में/ गुप्तस्थान में/ नरक में)
  • अकः - अकार्षीत् (किया)
  • लक्षम् - लक्ष्य
  • जीगिवान् - जितवान् (जीता)
  • अर्यः - अरे: शत्रो: (शत्रु का)
  • पुष्टानि - समृद्धानि (समृद्ध)
  • आदत् - आदत्ते (आहरण करना)
  • श्वघ्वनीव - श्वभिर्मृगान् हन्तीति श्वघ्वनी व्याघ्र (शिकारी के समान)

Question 54

'दोषावस्तः' इति पदस्य सायणानुसारम् अधोलिखितेषु कतम अर्थः विद्यते?

  1. AOption (a)

    गुणदोषौ

  2. BOption (b)

    उदयास्तौ

  3. COption (c)

    रात्रावहनी

  4. DOption (d)

    सूर्याचन्द्रमसौ

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Correct answer

Answer: (c)C.

रात्रावहनी

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प्रश्नानुवाद- सायण के अनुसार ‘दोषावस्त’ पद का निम्नलिखित में कौन सा अर्थ है। 

स्पष्टीकरण- अग्नि सूक्त (1.1.) के सातवे मन्त्र में प्राप्त 'दोषावस्त' शब्द का सायण के अनुसार अर्थ 'रात्रावहनी' अर्थात् रात्रि और दिन है।

सप्तम मन्त्र- उप त्वाग्ने दिवेदिवे दोषावस्तः धिया वयम्। नमो भरन्त एमसि। 

मन्त्रार्थ- हे रात्रि अथवा अन्धकार को (अज्ञान रुपी अन्धकार को ज्ञान रूपी प्रकाश से ), आच्छादित करने वाले अग्नि, हम बुद्धि से नमस्कार करते हुए प्रतिदिन तेरे पास आते हैं।

इस मन्त्र में प्रयुक्त पदों का सायण सम्मत अर्थ निम्नलिखित है - 

  • उप- समीप
  • त्वा- युष्मद् शब्द के द्वितीया एकवचन के रूप त्वाम् का वैकल्पिक है
  • अग्ने- सम्बोधन पद
  • दिवेदिवे- प्रतिदिन
  • धिया-  प्रज्ञया ,प्रार्थना ,स्तुति
  • भरन्तः - स्तुति पहुँचाते हुए या करते हुए।
  • आ इमसि - आते है

अग्नि सूक्त (1.1.)

महर्षि यास्क सम्मत 'अग्नि' शब्द का निर्वचन यहाँ पर प्रस्तुत है-  

  1. अंग नयति सन्नममानः। (काष्ठादि अन्य पदार्थों से मिलने पर उन्हें अपना अंग बना लेते हैं)।
  2. अग्रणीः भवति। (सभी कर्मों में अग्रणी होता है)।
  3. अग्रं यज्ञेषु प्रणीयते। (यज्ञों में आगे अर्थात पूर्व दिशा में स्थित आह्गनीय प्रदेश में ले जाया जाता है)।
  4. देवसेनामग्रे स्वयं नयतीत्यग्रणीः। (देवसेना को स्वयं आगे ले जाता है)।
  5. अक्नोपनो भवति इति स्थौलाष्ठीवि। (शुष्क करने वाला)।

Additional Information

ऋग्वेद - ऋग्वेद में इन्द्र सर्वाधिक प्रमुख देवता का स्थान प्राप्त है। सम्पूर्ण ऋग्वेद में प्रायः 250 सूक्तों में इनकी प्रशंसा की गयी है। इसके अनन्तर, अग्नि देवता का स्थान आता है। प्रायः 200 सूक्तों में इनकी प्रशंसा की गयी है। अग्नि, यज्ञ के समय, देवताओं को बुलाते हैं, उन्हें बिठाते है तथा यज्ञ के हविष को देवताओं को ग्रहण करने के लिए प्रार्थना करते हैं। अग्नि देवता की महत्ता इस बात से सिद्ध होती है कि ऋग्वेद का प्रथम सूक्त अग्नि देवता को ही समर्पित है।

Question 55

वैशेषिकदर्शनानुसारमधोऽङ्कितेषु समुचितमुत्तरं चिनुत

  1. AOption (a)

    प्रत्यक्षानुमानोपमानानि त्रीणि प्रमाणानि

  2. BOption (b)

    प्रत्यक्षानुमाने द्वे प्रमाणे

  3. COption (c)

    प्रत्यक्षानुमानागमैतिह्यानि चत्वारि प्रमाणानि

  4. DOption (d)

    प्रत्यक्षानुमानशब्दाः त्रीणि प्रमाणानि

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Correct answer

Answer: (b)B.

प्रत्यक्षानुमाने द्वे प्रमाणे

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प्रश्नानुवाद- वैशेषिक दर्शन के अनुसार निम्नलिखित में से समुचित उत्तर चुनें।

स्पष्टीकरण- वैशेषिक दर्शन के अनुसार दो प्रमाण हैं- प्रत्यक्ष तथा अनुमान।

वैशेषिक दर्शन, भारतीय आस्तिक दर्शनों में से एक है।

  • इसके मूल प्रवर्तक ऋषि कणाद हैं। इनका वास्तविक नाम उलूक था। अतः इस दर्शन को ‘औलूक्य दर्शन’ के नामों से भी जाना जाता है।
  • वैशेषिक का अर्थ है– ‘विशेषं पदार्थमधिकृत्य कृतं शास्त्रं वैशेषिकम् अर्थात् 'विशेष' नामक पदार्थ को मूल मानकर प्रवृत्त होने के कारण इस शास्त्र का नाम वैशेषिक है।
  • इस दर्शन का आधार ग्रन्थ कणाद प्रणीत वैशेषिकसूत्र है।
  • इसमें दस अध्याय हैं। प्रत्येक अध्याय में दो-दो आह्निक और 370 सूत्र हैं। यह साथ पदार्थों को मानता हैं- द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय तथा अभाव।
  • अन्नमभट्ट प्रणीत ‘तर्कसंगह’ इस दर्शन का प्रकरण ग्रन्थ है।

 टिप्स 

अन्य दर्शनों द्वारा स्वीकृत प्रमाण निम्नलिखित है- 

  1. सांख्य- प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द,
  2. योग- प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द,
  3. न्याय- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द,
  4. मीमांसा (भाट्ट)- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति, आभाव
  5. मीमांसा (प्रभाकर)- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति
  6. वेदान्त- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति, आभाव

Question 56

आकृतिमूलकवर्गीकरणमाश्रित्य अधस्तनासु का भाषा योगात्मकभाषासु नास्ति?

  1. AOption (a)

    अरबी

  2. BOption (b)

    संस्कृतम्

  3. COption (c)

    चीनी

  4. DOption (d)

    तुर्की

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Correct answer

Answer: (c)C.

चीनी

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प्रश्नानुवाद- निम्नलिखित में से आकृतिमूलक वर्गीकरण के आधार पर कौन योगात्मक भाषाओं में नहीं है?

स्पष्टीकरण- आकृतिमूलक वर्गीकरण के आधार पर चीनी भाषा योगात्मक भाषाओं में नहीं है।

संसार में तीन हजार से ज़्यादा भाषाएं हैं, जिनका स्वरूप, वर्ण, लिपि, शैली, एक दूसरे से सर्वथा भिन्न है। अतः भाषा वैज्ञानिकों ने इनका वर्गीकरण किया जाता है। यह वर्गीकरण दो प्रकार का है- आकृतिमूलक वर्गीकरण तथा पारिवारिकमूलक वर्गीकरण। 

आकृतिमूलक वर्गीकरण- इसे रूपात्मक वर्गीकरण भी कहते है। इस वर्गीकरण में प्रकृति (अर्थतत्व) - प्रत्ययों (रूपतत्व) के संयोग को आधार बनाया गया है। इस वर्गीकरण के अनुसार भाषा मुख्यतया दो प्रकार की होती है- योगात्मिका और अयोगात्मिका।

  1. योगात्मिका भाषा- जिन भाषाओं में प्रकृति-प्रत्यय का संयोग होता है, वे योगात्मिका कहलातीं है। यहाँ भाषा मूल रूप से विकृत रूप में होती है। ये पुनः प्रकृति-प्रत्यय के संयोग की घनिष्ठता के कारण अश्लिष्ट (जैसे- तुर्की), अश्लिष्ट (जैसे- संस्कृत, अरबी) तथा प्रअश्लिष्ट (जैसे- चेरोकी) वर्गों में विभाजित होते हैं।
  2. अयोगात्मिका भाषा- जिन भाषाओं में प्रकृति-प्रत्यय का संयोग नहीं होता है, वे अयोगात्मिका कहलातीं है। यहाँ भाषा अपने मूल रूप में होती हैं। ये पुनः स्थान, सुर तथा निपात के आधार पर विभाजित होते हैं। जैसे- चीनी भाषा, यह भाषा एकाक्षरी भाषा कहलाती है। इस भाषा में स्थान तथा सुर का विशेष महत्व है। ​

​​आकृतिमूलक वर्गीकरण को निम्न चार्ट से समझ सकते हैं- 

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Question 57

भाषावैज्ञानिकैः भाषाः कतिधा वर्गीकृताः?

  1. AOption (a)

    चतुर्धा

  2. BOption (b)

    त्रिधा

  3. COption (c)

    द्विधा

  4. DOption (d)

    पञ्चधा

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Correct answer

Answer: (c)C.

द्विधा

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प्रश्नानुवाद- भाषा वैज्ञानिकों ने भाषाओं को कितने प्रकार से वर्गीकृत किया है?

स्पष्टीकरण- भाषा वैज्ञानिकों ने भाषाओं को दो प्रकार से वर्गीकृत किया है।

संसार में तीन हजार से ज़्यादा भाषाएं हैं, जिनका स्वरूप, वर्ण, लिपि, शैली, एक दूसरे से सर्वथा भिन्न है। अतः भाषा वैज्ञानिकों के द्वारा इनका वर्गीकरण किया जाता है। यह वर्गीकरण दो प्रकार का है- 

  1. आकृतिमूलक वर्गीकरण- इसे रूपात्मक वर्गीकरण भी कहते है। इस वर्गीकरण में प्रकृति (अर्थतत्व) - प्रत्ययों (रूपतत्व) के संयोग को आधार बनाया गया है। इस वर्गीकरण के अनुसार भाषा मुख्यतया दो प्रकार की होती है- योगात्मिका और अयोगात्मिका। जिन भाषाओं में प्रकृति-प्रत्यय का संयोग होता है, वे योगात्मिका कहलातीं है, जैसे- संस्कृत। जिन भाषाओं में प्रकृति-प्रत्यय का संयोग नहीं होता है, वे अयोगात्मिका कहलातीं है, जैसे- चीनी।
  2. पारिवारिकमूलक वर्गीकरण- इसे ऐतिहासिक वर्गीकरण भी कहते है। इस वर्गीकरण का आधार हैं- स्थानिक समीपता, व्याकरण साम्य, शब्द साम्य तथा ध्वनि साम्य। इन आधारों पर संसार की समस्त भाषाओं को 18 भाषा परिवारों में विभाजित किया गया है, जैसे भारोपीय, द्रविड़ आदि।

Question 58

योगसूत्रानुसारेण लिखत अधोऽङ्कितेषु कयो द्वयोः समुचितः सम्बन्धोऽस्ति?

(A) अनुमानप्रमाणम्

(B) यमाः

(C) चित्तभूमिः

(D) चित्तवृत्तिः

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (C)

  2. BOption (b)

    (A) एवम् (D)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (B) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A) एवम् (D)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- निम्नलिखित में से किन दोनो का समुचित सम्बंध है?

स्पष्टीकरण- योग दर्शन के छह भारतीय आस्तिक अथवा वैदिक दर्शनों में एक है। इसके प्रवर्तक पतंजलि मुनि हैं जिनका योगसूत्र इस दर्शन का सबसे प्राचीन एवं प्रसिद्ध ग्रन्थ है।  योग सूत्र पर व्यास कृत भाष्य उपलब्ध होता है। वाचस्पति मिश्र की योग सूत्रों पर एक प्रसिद्ध टीका है- ‘तत्ववैशारदी’। योग दर्शन का सांख्य दर्शन के साथ निकटता का सम्बन्ध है। योग दर्शन में सांख्य के कुल 25 तत्वों के साथ ईश्वर को भी स्वीकार किया गया है। अतः इस दर्शन को सेश्वर सांख्य कहते है।

इसमें चार पाद हैं- समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद तथा कैवल्यपाद। योगसूत्र के प्रथम पाद में पतंजलि ने चित्तवृत्तियों तथा चित्तभूमियों का वर्णन किया है। पतंजलि ने योग का लक्षण किया हैं- योग चित्तवृत्तियों का निरोध है। पुनः चित्तवृत्तियों के विषय में लिखते है- पञ्चचित्तवृत्तियाँ प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः अर्थात् प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति ये चित्त की पाँच वृत्तियाँ होती हैं। चित्तवृत्तियों में प्रथम प्रमाण है। इनकी संख्या तीन है- प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम (शब्द)। अतः चित्तवृत्ति के अन्तर्गत अनुमान प्रमाण समाहित है। 

अन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण-

(B) यम- अष्टांग योग में प्रथम यम है -यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोsष्टावङ्गानि। यम से तात्पर्य सामाजिक नैतिकता से है। इनकी संख्या पाँच है- अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरग्रहाः अर्थात् अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह। इन्हें ही जैन दर्शन में पंच महाव्रत कहा गया है। 

(C) चित्तभूमि- चित्तभूमि का तात्पर्य मानसिक अवस्थाओं से है। योगसूत्र में चित्त की पाँच भूमियों का उल्लेख प्राप्त होता है- क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र, निरुद्ध।

Question 59

हर्षस्य कृती इमे स्तः-

(A) रत्नावली

(B) नैषधीयचरितम्

(C) कर्पूरमञ्जरी

(D) प्रियदर्शिका

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (D)

  2. BOption (b)

    (B) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (B) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(A) एवम् (D)

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प्रश्नानुवाद- हर्ष की दो रचानाएँ है-

स्पष्टीकरण- हर्ष की दो रचानाएँ है- रत्नावली और प्रियदर्शिका। 

राजा हर्षवर्धन का काल (606-648 A.D.) सर्वमान्य है। इनके पिता प्रभाकरवर्धन थें, जिन्हें बाण ने हून-हरिण-केसरी कहा है। हर्ष का निवास स्थान स्थानेश्वर (थानेश्वर) माना जाता है। इनके उपाधि राजा, कविंद्र तथा कविता का हर्ष है।

हर्षवर्धन ने तीन नाटकों की रचना की है- प्रियदर्शिका, रत्नावली, नागानंद।

  1. प्रियदर्शिका - यह चार आंको की नाटिका है। इसमें वत्सराज उदयन तथा आरण्यिका (प्रियदर्शिका) की प्रणय कथा वर्णित है।
  2. रत्नावली - यह चार आंको की नाटिका है। इसमें वत्सराज उदयन तथा रत्नावली (सागरिका) की प्रणय कथा वर्णित है।
  3. नागानंद - यह पाँच आंको का एक नाटक है। इसमें विद्याधर राजकुमार जीमूतवाहन के द्वारा अपनी बलि देकर शंखचूड नामक सर्प की रक्षा गुरुड़ से करने का वर्णन है।

​

अन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण- 

(B) नैषधीयचरितम्- यह 22 सर्गों का महाकाव्य है। इसमें नल-दमयंती की परिणय कथा वर्णित है। इसका कथानक महाभारत के वन पर्व में वर्णित नलोपाख्यान से गृहीत है। इसके रचनाकार श्रीहर्ष है। श्रीहर्ष का काल 1140 से 1200 ई० माना जाता है। इनकी माता का नाम मामल्लदेवी तथा पिता का नाम श्रीहीर था। इनका निवास स्थान कन्नौज था। नैषधीयचरितम् एक उत्कृष्ट रचना है, अतः इसे विद्वानों की औषधि मानी गयी है- नैषधं विद्वदौषधम्।

(C) कर्पूरमंजरी- यह संस्कृत के प्रसिद्ध नाटककार एवं काव्यमीमांसक राजशेखर द्वारा रचित प्राकृत का नाटक (सट्टक) है। प्राकृत भाषा की विशुद्ध साहित्यिक रचनाओं में इस कृति का विशिष्ट स्थान है। कर्पूरमंजरी (1.6) में कहा गया है- नाटिका में बहुत सी बातों में मिलती-जुलती नाट्यरचना को सट्टक कहते हैं। इसमें नाटिका की भाँति चार अंक है। इसमें राजा चंद्रपाल ने कुंतलराजपुत्री कर्पूरमंजरी से विवाह करके चक्रवर्तीपद प्राप्त किया, ऐसा वर्णन है। इसमें ऐंद्रजालिक भैरवानंद के इंद्रजाल का वर्णन भी प्राप्त होता है।

Question 60

पाश्चात्यविचारकस्य अरस्तूमहोदयस्य काव्यशास्त्रीयौ ग्रन्थौ स्तः?

(A) पेरिइप्सुस (On the sublime)

(B) भाषणशास्त्रम् (Rhetoric)

(C) सौन्दर्यशास्त्रम् (Aesthetica)

(D) काव्यशास्त्रम् (Poetics)

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (B) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (B) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (C) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(B) एवम् (D)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : पाश्चात्य विचारक अरस्तू महोदय के काव्यशास्त्रीय दो ग्रंथ कौन सेंं हैंं?

अरस्तू महोदय का परिचय :

पाश्चात्य काव्यशास्त्र (वेस्टर्न पोएटिक्स) के उद्भव के साक्ष्य ईसा के आठ शताब्दी पूर्व से मिलने लगते हैं। इन में अरस्तू (Aristotle) एक प्रमुख दार्शनिक हैंं।

  • अरस्तू  (384 ईपू – 322 ईपू) यूनानी दार्शनिक थे। वे प्लेटो के शिष्य व सिकंदर के गुरु थे।
  • उनका जन्म स्टेगेरिया नामक नगर में हुआ था।
  • अरस्तू ने भौतिकी, आध्यात्म, कविता, नाटक, संगीत, तर्कशास्त्र, राजनीति शास्त्र, नीतिशास्त्र, जीव विज्ञान सहित कई विषयों पर रचना की।
  • आगे चलकर प्लेटो के शिष्य अरस्तू ने कलाओं को अनुकरणात्मक मानते हुए भी उनके महत्त्व को स्वीकार किया।

अरस्तू का विरेचन सिद्धांत

अरस्तू की प्लेटो के विचारों से भिन्न दृष्टि थी। प्लेटो के विचार जहाँ नैतिक और सामाजिक हैं, वहीं अरस्तू की दृष्टि सौंदर्यवादी है। उन्होंने विरेचन-सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इस सिद्धांत के अनुसार यह प्रतिपादन किया जा सकता है - 

  • गम्भीर कार्यों की सफल और प्रभावशाली अनुकृति वर्णन के रूप में न होकर कार्यों के रूप में होती है जिसमें करुणा और भय उत्पन्न करने वाली घटनाएँ होती हैं जो इन भावों के विरेचन द्वारा एक राहत और आनंद प्रदान करती हैं।
  • अरस्तू के विचार से भय और करुणा के दो भाव हमारे भीतर घनीभूत होते रहते हैं। इस प्रकार की त्रास आदि को देखने पर कुशल अभिनय द्वारा ये भाव संतुलित और समंजित हो जाते हैं और इस प्रकार हमारे मन को राहत और आनंद की अनुभूति होती है।
  • कविता या नाटक के पात्रों के बीच इन उत्तेजित वासनाओं और उसके दुष्परिणामों का हमारे शरीर और जीवन से सीधा संबंध न होने के कारण ये वासनाएँ परिष्कृत संवेदनाओं का रूप ग्रहण करती हैं।
  • यही भावों का विरेचन है और कविता का यही वास्तविक प्रभाव और कार्य होता है।
  • अरस्तू ने कहा कि काव्य कल्पना पर आधारित होती है। वह वास्तविकता का चित्रण नहीं होता बल्कि उसका आधार सम्भावना है।
  • काव्य वास्तव में अनुकरण है किंतु यही उसकी विशिष्टता है। लेकिन कवि वस्तुओं की पुनर्रचना करता है, नकल नहीं। अनुकरण के कारण ही काव्य आनंददायक होता है।
  • उससे शिक्षा प्राप्त हो सकती है किंतु उसका उद्देश्य शिक्षा प्रदान करना नहीं है। इस प्रकार अरस्तू ने प्लेटो के काव्य संबंधी विचारों एवं आरोपों का निराकरण किया। अरस्तू के भाषणशास्त्र (Rhetoric) और काव्यशास्त्र (Poetics) यह प्रमुख ग्रंथ हैंं।

भाषणशास्त्र (Rhetoric) :

व्याख्यान शास्त्र (rhetoric) उस कला को कहते हैं जिसमें लेखकों और वक्ताओं की जानकारी प्रदान करने, भावनाएँ व्यक्त करने और श्रोताओं को भिन्न उद्देश्यों के लिए प्रेरित करने की क्षमता और उसे सुधारने की विधियों का अध्ययन किया जाता है। प्राचीन यूनानी दार्शनिक अरस्तु ने व्याख्यान में श्रोताओं को प्रभावित करने के तीन तत्व बताएँ थे, जिन्हें यूनानी भाषा में  निम्नलिखित संज्ञाएँँ हैंं - 

  • लोगोस' (λόγος, logos, तर्क),
  • 'पेथोस' (πάθος, pathos, भावनाएँ)
  • 'ईथोस' (ἦθος, ethos, मूल्य व विश्वास)

**काव्यशास्त्र (Poetics) :**इसमें अरस्तू ने काव्य के अर्थ में ग्रीक काव्य और नाटक दोनों को शामिल किया है। उन्होंने काव्य में प्रगीत काव्य और महाकाव्य दोनों को शामिल किया है। नाटकों में उन्होंने कॉमेडी, ट्रेजेडी और सटायर का उल्लेख किया है। ये इस अर्थ में समान हैं कि ये सभी अनुकरण हैं लेकिन अरस्तु के अनुसार ये तीन तरह से एक दूसरे से भिन्न हैं-

  • संगीतात्मक लय, छंद, गीतात्मकता आदि में इनमें अंतर है।
  • चरित्रों की अच्छाई में इनमें अंतर है।
  • कथानक के प्रस्तुतिकरण के ढंग में इनमें अंतर है। कहानी कही गई है या अभिनय किया गया है।

 

अतः स्पष्ट है, भाषणशास्त्रम् (Rhetoric) तथा काव्यशास्त्रम् (Poetics) यह इस प्रश���न का सही उत्तर है।

Question 61

काव्यप्रकाशानुसारं काव्यप्रयोजनं किमभीप्सितं भवति?

(A) शक्तिः

(B) यशः

(C) व्यवहारः

(D) निपुणता

अत्रः समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (B) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (A) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(B) एवम् (C)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : काव्यप्रकाश के अनुसार काव्यप्रयोजनों से क्या ईप्सित होता है?

काव्यप्रकाश ग्रंथ :

संस्कृत साहित्य में काव्यप्रकाश एक सर्वश्रेष्ठ लाक्षणिक ग्रंथ के रूप में प्रसिद्ध है। काव्यप्रकाश के रचयिता आचार्य मम्मट हैं। आचार्य मम्मट कृत यह काव्यप्रकाश कुल 10 उल्लासों में विभक्त है। काव्यप्रकाश के दस उल्लासों में काव्य की परिभाषा, काव्य के प्रयोजन, काव्यभेद तथा अलंकार आदि विभिन्न विषयों की सुन्दर रूप से चर्चा की गयी है। 

काव्यप्रयोजन :

काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।

सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे ।। (काव्यप्रकाश १.२)                             

  • वृत्ति : कालिदासादीनामिव यशः‚ श्रीहर्षादेर्धावकादीनामिव धनम्‚ राजादिगतोचिताचारपरिज्ञानम्‚ आदित्यादेर्मयूरादीनामिवानर्थनिवारणम्‚ सकलप्रयोजनमौलिभूतं समनन्तरमेव रसास्वादनसमुद्भूतम्‚ विगलितवेद्यान्तरमानन्दम्‚ प्रभुसम्मितशब्दप्रधानवेदादिशास्त्रेभ्यः‚ सुहृत्सम्मितार्थतात्पर्यवत्पुराणादीतिहासेभ्यश्च शब्दर्थयोर्गुणभावेन रसाङ्गभूतव्यापारप्रवणतया विलक्षणं यत्काव्यं लोकोत्तरवर्णनानिपुणकविकर्म तत् कान्तेव सरसतापादनेनाभिमुखीकृत्य रामादिवद्वर्तितव्यं न रावणादिवदित्युपदेशं च यथायोगं कवेः सहृदयस्य च करोतीति सर्वथा तत्र यतनीयम्।

काव्यप्रयोजनोंं का स्पष्टीकरण :

  • 'कालिदासादीनामिव यशः' अर्थात् कालिदास आदि ऐसे बहुत से कवि हैं जिन्होंने काव्य लिखकर बहुत यश प्राप्त किया है। आचार्य मम्मट के अनुसार काव्य का यह प्रथम प्रयोजन है।
  • 'श्रीहर्षादेर्धावकादीनामिव धनम्' अर्थात् आचार्य मम्मट कहते हैं कि इतिहास में श्रीहर्ष, धावककवि आदि जैसे बहुत से कवि हुए हैं जो राजदरबार में रहकर काव्य लिखकर धन की प्राप्ति करते थे। इस प्रकार यह काव्य का दूसरा प्रयोजन हुआ।
  • आचार्य मम्मट ने काव्य का तीसरा प्रयोजन बताया, व्यवहार ज्ञान। मम्मट ने इसका उदाहरण दिया है- राजादिगतोचिताचारपरिज्ञानम्। अर्थात् काव्य से हमें राजा - रानी आदि के साथ कैसा व्यवहार करना है इत्यादि बातों का पता चल जाता है।
  • मम्मट ने काव्य का एक प्रयोजन - शिवेतरक्षति अर्थात् अनिष्ट का नाश भी बताया है। काव्य लिखने से अनिष्ट (अमंगल) दूर हो जाते हैं। यदि आप इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो बहुत से ऐंसे उदाहरण मिल जाएंगे जिन्होंने अपना अमंगल दूर करने के लिए काव्य लिखा। आचार्य मम्मट ने इसका उदाहरण दिया है- आदित्यादेर्मयूरादीनामिवानर्थनिवारणम्। अर्थात् एक बार की बात है। बाणभट्ट की पत्नी के श्राप से मयूरभट्ट नामक कवि को कुष्ठ रोग हो गया था। तब मयूर कवि ने कुष्ठ रोग के निवारण के लिए सूर्य भगवान की उपासना की और उनकी स्तुति में- सूर्यशतक नामक काव्य ग्रंथ लिखा। इस प्रकार मयूर कवि ने काव्य लिखकर अपना अनिष्ट निवारण किया अर्थात् रोग दूर किया।
  • सद्यः परनिवृतिः काव्य के सभी प्रयोजनों में सबसे मुख्य प्रयोजन है। आचार्य मम्मट के अनुसार काव्य का यही मुख्य प्रयोजन है। सद्यः परनिवृतिः अर्थात काव्य लिखने से तुरंत आनन्द की अनुभूति होने लगती है। इसीको मम्मट ने सद्यः परनिवृत्ति कहा है और यही काव्य के सबसे मुख्य प्रयोजन है इस बात को आचार्य मम्मट स्वयं कहते हैं- सकलप्रयोजनमौलिभूतं समनन्तरमेव रसास्वादनसमुद्भूतं विगलितवेद्यान्तरमानन्दम्। अर्थात् काव्य के सभी प्रयोजनों में यही सबसे श्रेष्ठ व मुख्य प्रयोजन है।

 

अतः स्पष्ट है,  यशः तथा व्यवहारः यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 62

आलोकविशाला मे सहसा तिमिरप्रवेशविच्छिन्ना।

उन्मीलितापि दृष्टिर्निमीलितेवान्धकारेण।।

श्लोकेऽस्मिन् कः छन्दः कश्चालङ्कारः?

(A) रूपकम्

(B) आर्या

(C) वसन्ततिलका

(D) उत्प्रेक्षा

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (B) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (B) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (C) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(B) एवम् (D)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : इस श्लोक में कौन सा छंद और अलंकार है?

श्लोक : 

आलोकविशाला मे सहसा तिमिरप्रवेशविच्छिन्ना।

उन्मीलितापि दृष्टिर्निमीलितेवान्धकारेण।। (मृच्छकटिकम् १.३२)

अर्थ :

  • सच में कितना घनघोर अंधःकार फैला हुआ है। तीव्र शक्तिवाली मेरी दृष्टि घोर अंधःकार में प्रवेश करते ही शक्तिहीन हुई है। आँँखे विस्तृत करके भी वे अंधःकार से मानो निमीलित हो गयेंं हैंं।

छंद :

  • प्रस्तुत श्लोक का छंद आर्या है। आर्या संस्कृत पद्य का एक मात्रिक छन्द है। जिस छन्द के प्रथम और तृतीय चरण में बारह-बारह मात्राएँ, द्वितीय चरण में अठारह मात्राएँ और चतुर्थ चरण में पन्द्रह मात्राएँँ हों, वह आर्या छन्द कहलाता है।

अन्य उदाहरण : 

नियतिकृतनियम सहिताः प्रादुः षन्त्येष यदा कदेतयः।

नहि विजहति धीराः स्वं धैर्य कृतबुद्धयः सन्त।।

अलंकार : 

  • प्रस्तुत श्लोक में उत्प्रेक्षा अलंकार है। जब उपमेय में गुण-धर्म की समानता के कारण उपमान की संभावना कर ली जाए, तो उसे उत्प्रेक्षा अलंकार कहते हैं। 'उन्मीलितापि दृष्टिर्निमीलितेवान्धकारेण' इस वाक्य में आँखे बंद करना इस धर्म के समानता के कारण दृष्टि इस उपमेय में अंधःकार इस उपमान की संभावना की है।

 

अतः स्पष्ट है, आर्या  तथा उत्प्रेक्षा यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 63

महाभारतस्य वनपर्वणि के उपाख्याने स्तः?

(A) शकुन्तलोपाख्यानम्

(B) मत्स्योपाख्यानम्

(C) शिशुपालोपाख्यानम्

(D) रामोपाख्यानम्

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (C) एवम् (D)

  3. COption (c)

    (B) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (D) एवम् (A)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(B) एवम् (D)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : महाभारत के वनपर्व के दो उपाख्यान कौन से हैंं?

महाभारत के उपाख्यान से संबंधित पर्व इस प्रकार हैंं - 

उपाख्यानपर्व
शकुन्तलोपाख्यानम्आदिपर्व
मत्स्योपाख्यानम्वनपर्व
शिशुपालोपाख्यानम्सभापर्व
रामोपाख्यानम्वनपर्व

 

अतः स्पष्ट है,  मत्स्योपाख्यानम् तथा रामोपाख्यानम् यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 64

याज्ञवल्क्यस्मृतौ व्यवहाराध्यायस्य प्रकरणे स्तः?

(A) राजधर्मप्रकरणम्

(B) विवाहप्रकरणम्

(C) लेख्यप्रकरणम्

(D) दिव्यप्रकरणम्

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (B) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (D) एवम् (A)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(C) एवम् (D)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : याज्ञवल्क्यस्मृति के व्यवहाराध्याय के कौन से दो प्रकरण हैंं?

याज्ञवल्क्यस्मृति : 

याज्ञवल्क्य स्मृति में १००३ श्लोक हैं। इसपर विरचित मिताक्षरा टीका हिंदू धर्मशास्त्र के विषय में भारतीय न्यायालयों में प्रमाण मानी जाती रही है। याज्ञवल्क्य स्मृति और कौटिलीय अर्थशास्त्र में विशेष साम्य पाया जाता है। इसी स्मृति में सर्वप्रथम स्त्रियोंं के संपत्ती के अधिकार का विधान किया गया है।

याज्ञवल्क्यस्मृति की रचना :

याज्ञवल्क्य स्मृति में तीन कांड (अध्याय) हैं-

  • आचारकाण्ड -
  • इसमें तेरह प्रकरण हैं।
  • उपोद्घात-प्रकरणं, ब्रह्मचारिप्रकरणं, विवाह-प्रकरणं, वर्णजातिविवेक-प्रकरणं, गृहस्थ-प्रकरणम्, स्नातवह-प्रकरणम्, भक्ष्याभक्ष्य-प्रकरणम्, द्रव्यशुद्धि प्रकरणम्, दान-प्रकरणम्, श्राद्ध्-प्रकरणम्, गणपति कल्पप्रकरणम्, ग्रहशान्ति-प्रकरणम्, राजधर्म-प्रकरणम्
  • व्यवहारकाण्ड -
  • इसमें पच्चीस प्रकरण हैं।
  • व्यवहाराध्याये साधाराव्यवहारमातृका, ऋणादानो-पनिधि-साक्षी-लेख्य-दिव्य-दायविभाग-सीमाविवाद-स्वामिपालविवाद-अस्वामिविक्रय-दत्ताप्रदानिक क्रीतानुशया-अभ्युपेत्याशुश्रूषा-संविदव्यतिक्रम्-वेतनादानद्यूत समाह्वय -वाक् पारुष्य-दण्डपारुष्य-साहसविक्रीयासम्प्रदानसम्भूय समुत्थान-स्तेय-स्त्रीसंग्रहण-प्रकरण
  • प्रायश्चितकाण्ड -
  • इसमें छह प्रकरण हैं।
  • शौचप्रकरणम्, आपद्धर्मप्रकरणम्, वानप्रस्थप्रकरणम्, यति-धर्मप्रकरणम्, प्रायश्चित्त-प्रकरणम्, प्रकीर्ण-प्रयश्चित्तानि

 

अतः स्पष्ट है, लेख्यप्रकरणम् तथा दिव्यप्रकरणम् यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 65

अधोनिर्दिष्टयुग्मानां समीचीनां तालिकां चिनुत-

(A)अग्नि-सूक्तः(I)अङिरस-बृहस्पतिः
(B)रुद्रसूक्तः(II)मधुच्छन्दाः-ऋषिः
(C)पर्जन्यसूक्तः(III)गृत्समद-ऋषिः
(D)ज्ञानसूक्तः(IV)भौमोऽत्रि-ऋषिः

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत:

  1. AOption (a)

    (A)- (II), (B)- (III), (C)- (IV), (D)- (I)

  2. BOption (b)

    (A)- (I), (B)- (II), (C)- (III), (D)-(IV)

  3. COption (c)

    (A)- (II), (B)- (I), (C)- (IV), D- (III)

  4. DOption (d)

    (A)- (III), (B)- (IV), (C)- (I), (D)- (II)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(A)- (II), (B)- (III), (C)- (IV), (D)- (I)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : योग्य तालिका का चयन कीजिए।

प्रस्तुत तालिका में सूक्त और ऋषि का संबंध दिखाया है। वैदिक शब्द का अर्थ समझने के लिये ऋषि का ज्ञान होना आवश्यक है।

वैदिक शब्दोंं का अर्थबोध :

वैदिक शब्दों का अर्थबोध होने के लिए ऋषि, देवता, विनियोग और छंद का ज्ञान होना आवश्यक है। ऐसा कहा जाता है, 

ऋषिच्छन्दो दैवतानि ब्राह्मणार्थं स्वराद्यपि

अविदित्वा प्रयुञ्जानो मन्त्रकण्टक उच्यते।

अविदित्वा ऋषिं छन्दो दैवतं योगमेव च

योऽध्यापयेज्जपेद् वापि पापीयाञ्जायते तु स:।। (बृहद्देवता ८.१३६)

  • अर्थ - जो व्यक्ति मन्त्रों के ऋषि, छन्द, देवता और अर्थानुसारी विनियोग को बिना जाने वेदमन्त्रों का अध्यापन अथवा जप करता है, वह पापी होता है।

ऋषि :

साक्षात्कृतधर्माणः ऋषयो बभूवुः ते अवरेभ्यः।

असाक्षात्कृतधर्मेभ्य उपदेशेन मन्त्रान् संप्रादुः।।   (निरुक्तम् १.२०)

  • ऋषि’ शब्द की व्युत्पत्ति ऋष् धातु से इन्, कित् प्रत्यय के योग से होती है। इसका अर्थ है- एक अन्तः स्फूर्ति से रचना करता है, ऐसा कवि या मुनि, मन्त्रद्रष्टा, पुण्यात्मा मुनि, संन्यासी, विरक्त योगी। ऋषि मंत्रोंं के कर्ता नहीं, किंतु द्रष्टा है। उपदेश से वह लोगोंं तक वेदार्थ पहुँँचाते है।

योग्य तालिका इस प्रकार है - 

(A)अग्नि-सूक्तः(II)मधुच्छन्दाः-ऋषिः
(B)रुद्रसूक्तः(III)गृत्समद-ऋषिः
(C)पर्जन्यसूक्तः(IV)भौमोऽत्रि-ऋषिः
(D)ज्ञानसूक्तः(I)अङिरस-बृहस्पतिः

 

अतः स्पष्ट है, (A)- (II), (B)- (III), (C)- (IV), (D)- (I) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 66

अधोऽङ्कितेषु केन अभिलेखेन सह कस्य सम्बन्धः?

(Aहर्षः(I)सारनाथ-बौद्धप्रतिमालेखः
(B)पुलकेशिनद्वितीयः(II)इलाहाबाद-स्तम्भलेखाः
(C)समुद्रगुप्तः(III)बांसखेडा- ताम्रपट्टाभिलेखः
(D)कनिष्कः(IV)ऐहोलशिलालेखः

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A)- (I), (B)- (III), (C)- (II), (D)- (IV)

  2. BOption (b)

    (A)- (II), (B)- (III), (C)- (I), (D)- (IV)

  3. COption (c)

    (A)- (IV), (B)- (I), (C)- (III), (D)- (II)

  4. DOption (d)

    (A)- (III), (B)- (IV), (C)- (II), (D)- (I)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(A)- (III), (B)- (IV), (C)- (II), (D)- (I)

Why this answer is correct

अभिलेखन संकल्पना-

  • किसी विशेष महत्व अथवा प्रयोजन के लेख को अभिलेख कहा जाता है।
  • यह सामान्य व्यावहारिक लेखों से भिन्न होता है। प्रस्तर, धातु अथवा किसी अन्य कठोर और स्थायी पदार्थ पर विज्ञप्ति, प्रचार, स्मृति आदि के लिए उत्कीर्ण लेखों की गणना प्राय: अभिलेख के अंतर्गत होती है।
  • कागज, कपड़े, पत्ते आदि कोमल पदार्थों पर मसि अथवा अन्य किसी रंग से अंकित लेख हस्तलेख के अंतर्गत आते हैं।
  • कड़े पत्तों (ताडपत्रादि) पर लौहशलाका से खचित लेख अभिलेख तथा हस्तलेख के बीचे में रखे जा सकते हैं।
  • मिट्टी की तख्तियों तथा बर्तनों और दीवारों पर उत्खचित लेख अभिलेख की सीमा में आते हैं।
  • सामान्यत: किसी अभिलेख की मुख्य पहचान उसका महत्व और उसके माध्यम का स्थायित्व है।

Important Pointsहर्षः- बांसखेडा- ताम्रपट्टाभिलेखः

  • बाँसखेड़ा उत्तर प्रदेश में शाहजहाँपुर से लगभग 25 मील (लगभग 40 कि.मी.) की दूरी पर स्थित है।
  • इस स्थल से महाराज हर्षवर्धन (606-647 ई.) का ताम्रदानपट्ट लेख सन 1894 में प्राप्त हुआ था। इसका समय 628 ई. है।
  • यहाँ से प्राप्त अभिलेख में हर्ष द्वारा अहिछत्र भुक्ति के अंगदीया विषय के 'मर्कटसागर' नामक गाँव को सभी करों से मुक्त करके, दो ब्राह्मणों- बालचन्द्र और भट्टस्वामी को दान देने का उल्लेख है। इस अभिलेख में हर्ष की वंशावली भी दी गयी है, यद्यपि उसके मूलपुरुष पुष्यभूति का इसमें उल्लेख नहीं है।
  • बांसखेड़ा अभिलेख की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें स्वयं हर्ष के हस्ताक्षर हैं। यह हस्ताक्षर संभवत: मूल हस्ताक्षर की अनुलिपि हैं, जिसे ताम्रपट्ट पर उतार लिया गया है।
  • अभिलेख के अंत में यह हस्तलेख सुंदर अक्षरों में इस प्रकार है- 'स्वहस्तो मम महाराजाधिराज श्री हर्षस्य'
  • यह अभिलेख 'वर्धमानकोटि' नामक स्थान से प्रचलित किया गया था।
  • उसमें हर्ष के पूर्वज राजाओं के आराध्य देवों और व्यक्तिगत विश्वासों का भी संकेत है।
  • हर्ष के पिता प्रभाकरवर्धन को इसमें वर्णाश्रम व्यवस्था को स्थिर करने वाला कहा गया है।

पुलकेशिनद्वितीयः- ऐहोलशिलालेखः

  • एहोल के एक जैन मंदिर की दीवारों में वातापी के चालुक्य शासकों का प्रारंभिक इतिहास एवं इस वंश के महान शासक पुलकेशिन द्वितीय (610-643 ई.) की विभिन्न विजयों की सूची उत्कीर्ण की गई है।
  • यह एक प्रशस्ति रूप है, जिसे ‘ऐहोल प्रशस्ति‘ या ‘ऐहोल अभिलेख‘ कहा जाता है।
  • यह अभिलेख संस्कृत भाषा मे ७वी सदी मे रवि कीर्ति ने लिखा।
  • इसमें पुल्केशन द्वितिया वा हर्ष वर्धन के मध्य हुए युद्ध का वर्णन मिलता है। जिसमे हर्ष पराजय हुआ।

समुद्रगुप्तः- इलाहाबाद-स्तम्भलेखाः

  • सम्राट समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिसेन द्वारा रचित लेख था। इस लेख को समुद्रगुप्त द्वारा 370 ई में कौशाम्बी से लाये गए अशोक स्तंभ पर खुदवाया गया था।
  • इसमें उन राज्यों का वर्णन है जिन्होंने समुद्रगुप्त से युद्ध किया और हार गये तथा उसके अधीन हो गये।
  • प्रयागराज के अभिलेखों से पता चलता है कि समुद्रगुप्त ने अपनी विजय यात्रा का प्रारम्भ उत्तर भारत के आर्यावर्त के 9 शासकों को परास्त करने के साथ किया जिसमें नागसेन, अच्युत, गणपति आदि थे।
  • इन विजयों के द्वारा समुद्र गुप्त ने मध्य प्रदेश या गंगा यमुना दोआब पर अपनी सत्ता स्थापित की।
  • उसने इन 9 शासकों का पूर्ण उन्मूलन किया क्योंकि केंद्रीय प्रदेश के स्पर्धी राज्यों को बिना पूर्णतः परास्त और उन्मूलन किया उसके लिए आगे बढ़ना संभव नहीं था।
  • “अनेक भ्रष्टराज्योत्सन्न-राजवंश प्रतिष्ठापनोद्भूत- निखिल भुवन विचरण-शान्त यशसः॥”

कनिष्कः- सारनाथ-बौद्धप्रतिमालेखः

  • कनिष्क के सारनाथ बौद्ध प्रतिमा की अभिलेख तिथि 81 ई. सन् है।
  • यह अभिलेख बौद्ध धर्म की तत्कालीन अवस्था से जुड़े तथ्यों पर प्रकाश डालता है।
  • इस बौद्ध प्रतिमा अभिलेख को मथुरा से लाकर कनिष्क के राज्यारोहण (78) ई सन् के तीसरे वर्ष सारनाथ में स्थापित किया गया।
  • कनिष्क के राज्यारोहण से शक संवत् आरंभ होते हैं। कनिष्क ने पुरुषपुर (पेशावर) को अपनी राजधानी बनाया, इसके राज्य की दूसरी राजधानी मथुरा थी।

 

अत: यह स्पष्ट है की, (A)- (III), (B)- (IV), (C)- (II), (D)- (I) यह पर्याय उचित है।

Question 67

अधोलिखितानां कालक्रमानुसारं समुचितं क्रमं चिनुत-

(A) उव्वट-भाष्यम्

(B) दयानन्द-भाष्यम्

(C) स्कन्दस्वामी-भाष्यम्

(D) सायण-भाष्यम्

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A), (D), (C), (B)

  2. BOption (b)

    (D), (B), (C), (A)

  3. COption (c)

    (C), (A), (D), (B)

  4. DOption (d)

    (B), (C), (A), (D)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(C), (A), (D), (B)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- निम्नलिखितों का कालक्रम के अनुसार समुचित क्रम है-

स्पष्टीकरण- उपरि लिखितों का कालक्रम के अनुसार समुचित क्रम है- स्कन्दस्वामी-भाष्य, उव्वट-भाष्य, सायण-भाष्य, दयानन्द-भाष्यम। वेद मन्त्रों की व्याख्या भाष्य कहलाती है।

  1. स्कन्दस्वामी- ये चरो वेदों में प्रथम ऋग्वेद के प्रथम भाष्यकार है। इनका काल 683 ई० माना जाता है। ये याज्ञिक भाष्यकारों की कोटि में आतें हैं। इन्होंने प्रत्येक मंत्र के आरंभ में ऋषि, देवता आदि का उल्लेख किया है। इनका भाष्य सरल है। इसमें व्याकरण सम्बन्धी अंश भी प्राप्त होतें हैं।
  2. उव्वट- उव्वट की भी याज्ञिक कोटि के आचार्य हैं। इन्होंने मुख्यतः यजुर्वेद की माध्यनन्दिन संहिता पर भाष्य किया है। इनका काल 11 वी शताब्दी माना जाता है। इनके पिता का नाम वज्रट था। इनका जन्मस्थान आनन्दपुर कहा गया है।
  3. सायण- याज्ञिक कोटि के भाष्यकारों में सर्वप्रमुख सायण (1315-1378 ई०) है। ये आन्ध्र प्रान्त के विजयनगर राज्य के निवासी थे। इनका चारों वेदों में भाष्य प्राप्त होता है। इनके भाष्यों का नाम ‘वेदार्थप्रकाश’ है। इनके द्वारा रचित 25 ग्रंथो में से तैत्तरीय संहिता, ऋग्वेद संहिता, सामवेद संहिता, शुक्ल यजुर्वेद संहिता तथा अथर्वेद संहिता पर भाष्य उपलब्ध है।
  4. स्वामी दयानन्द- अर्वाचीन वेद भाष्यकारों में (1824-1883 ई०) स्वामी दयानन्द सर्वप्रमुख है। इन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन संहिता का तथा ऋग्वेद के 7 मण्डलों (80 सूक्त तक) का संस्कृत और हिन्दी में भाष्य किया है। इन्होंने निरुक्त तथा व्याकरण के आधार पर वेद मंत्रो की व्याख्या की। अतः ये वैज्ञानिक भाष्यकार की कोटि में आते हैं।

Hint

  • स्कन्दस्वामी - 683 ई०
  • उव्वट - 11 वी शताब्दी
  • सायण - (1315-1378 ई०)
  • स्वामी दयानन्द - (1824-1883 ई०)

Question 68

सर्वप्राचीनरचनायाः प्राथम्येन कालक्रमानुसारमुचितमुत्तरं चिनुत-

(A) हर्षचरितम् 

(B) नैषधीयचरितम् 

(C) रघुवंशम्

(D) नलचम्पूः

अत्र समुचितं क्रमं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A), (C), (B), (D)

  2. BOption (b)

    (C), (A), (D), (B)

  3. COption (c)

    (B), (A), (D), (C)

  4. DOption (d)

    (D), (B), (C), (A)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(C), (A), (D), (B)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- सबसे प्राचीन रचना की प्राथमिकता से कालक्रम के अनुसार समुचित उत्तर चुनें-

स्पष्टीकरण- पूर्ववर्ती रचनाओं का कालक्रम के अनुसार समुचित क्रम है- रघुवंश, हर्षचरित, नलचम्पू, नैषधीयचरित।

(क) कालिदास- कालिदास भारत के श्रेष्ठतम कवियों में से एक है। उनका नाम संस्कृत महाकवियों और श्रेष्ठ नाटककारों में लिया जाता है। इनका अनुमानित काल प्रथम शताब्दी ई॰ माना जाता है। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित है- 

  1. रूपक- अभिज्ञानशाकुन्तल, विक्रमोर्वशीय और मालविकाग्निमित्रम्
  2. महाकाव्य- रघुवंश और कुमारसंभव
  3. खण्डकाव्य: मेघदूत और ऋतुसंहार

(ख) बाणभट्ट- महाकवि बाणभट्ट ने गद्यरचना के क्षेत्र में वही स्थान प्राप्त किया है जो कि कालिदास ने संस्कृत महाकाव्य तथा नाटक के क्षेत्र में प्राप्त किया है। वह राजा हर्षवर्धन के दरबारी कवि थे। अतः इनका काल सातवीं शताब्दी ई॰ का पूर्वार्द्ध माना जाता है। उनके दो प्रमुख  गद्य ग्रंथ हैं- हर्षचरित तथा कादम्बरी। कादम्बरी का इतिवृत्त काल्पनिक है, अतः यह कथा कोटि का गद्य काव्य है। हर्षचरित में राजा हर्षवर्धन का जीवन कथा वर्णित है। अतः यह आख्यायिका कोटि का गद्य काव्य है।

**(ग) **त्रिविक्रमभट्ट- ये संस्कृत के सबसे प्रसिद्ध चम्पू कवि है। ये सिंहादित्य नाम से भी प्रसिद्ध हैं। चम्पू श्रव्य काव्य का एक भेद है, अर्थात गद्य-पद्य के मिश्रित् काव्य को चम्पू कहते हैं। इनका काल दसवी शताब्दी ई॰ का पूर्वार्द्ध माना जाता है। त्रिविक्रमभट्ट के दो चंपू काव्य हैं- नलचम्पू तथा मदालसाचम्पू। नलचम्पू में नल-दमयन्ती की कथा वर्णित है।मदालसाचम्पू में कुवलयाश्व-मदालसा की प्रणय कथा वर्णित है। 

(घ) श्रीहर्ष- इनका काल बारहवी शताब्दी ई॰ का पूर्वार्द्ध माना जाता है। इनकी प्रसिद्ध रचना का नाम नैषधीयचरित है। यह 22 सर्गों वाला महाकाव्य है। इसकी गणना सम्मिलित रूप से ‘किरातार्जुनीय’ तथा ‘शिशुपालवध’ के साथ ‘बृहत्त्रयी’ में होती है। इसमें किरात वेषधारी शिव तथा अर्जुन के युद्ध की कथा वर्णित है। इनका अन्य ग्रन्थ 'खण्डनखण्डखाद्य’ अद्वैत वेदान्त की प्रौढ़ रचना मानी जाती है।

Question 69

कथनद्वयम् अधोलिखितम्- तत्र एकम् अभिकथनम् (A) अपरञ्च तस्य कारणम् (R) इति। 

अभिकथनम् (A)- उत्पत्तिपरिपूताया किमस्याः पावनान्तरैः।

कारणम् (R)- तीर्थोदकं च वह्निश्च नान्यतः शुद्धिमर्हतः।।

उपर्युक्त अभिकथन- कारणमाश्रित्य समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) तथा (R) उभावपि असत्यं

  2. BOption (b)

    (A) तथा (R) उभयं सत्यमस्ति यतः (A) इत्यस्य (R) समुचितं कारणमस्ति

  3. COption (c)

    (A) तथा (R) उभावपि सत्यं, परं (A) इत्यस्य (R) समुचितं कारणं नास्ति

  4. DOption (d)

    (A) इति सत्यम् परं (R) इति असत्यम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A) तथा (R) उभयं सत्यमस्ति यतः (A) इत्यस्य (R) समुचितं कारणमस्ति

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- अभिकथन (A)- जन्म से ही पवित्र इनके लिए अन्य पवित्र करने वाले उपायों से क्या प्रयोजन।

कारण (R)- तीर्थ का जल और अग्नि स्वतः शुद्ध है। 

स्पष्टीकरण- अभिकथन- जन्म से ही पवित्र इनके लिए अन्य पवित्र करने वाले उपायों से क्या प्रयोजन। यह कथन सत्य है।

कारण- तीर्थ का जल और अग्नि स्वतः शुद्ध है। यह कथन सत्य है। 

  • यह प्रसंग उत्तररामचरित’ नामक नाटक के ‘प्रथम- अङ्क’ का है।
  • इसके लेखक ‘भवभूति’ हैं।
  • इसमें नायक राम और नायिका सीता हैं तथा अंगिररस करूण है। इसमें 7 अङ्क हैं।
  • प्रथम अंक में जब लक्ष्मण सीता को चित्र-दर्शन करवातें तो राम पूछतें है की “कहाँ तक पहुँचें?” तब लक्ष्मण कहते है कि सीता की अग्नि परीक्षा तक। राम कहते हैं, “ लक्ष्मण शान्त हो जाओ।” वह सीता के बारें में कहते हैं कि जन्म से ही पवित्र सीता के लिए अन्य पवित्र करने वाले उपायों से क्या प्रयोजन। अर्थात् पवित्र वस्तु जैसे तीर्थ का जल और अग्नि स्वतः पवित्र है। इन्हें शुद्धि के लिए अन���य वस्तुओं की अपेक्षा नहीं है।

 

इस प्रकार प्रस्तुत अभिकथन तथा कारण सत्य है तथा अभिकथन का कारण भी समीचीन है। अत: विकल्प 2 सही है।

Question 70

कथनद्वयमधोलिखितम्। एकम् (A) इति अभिकथनम् अपरञ्च (R) इति कारणम्। 

अभिकथनम् (A) - मन्त्रिभिस्त्रिभिश्चतुर्भिर्पा सह मन्त्रयेत।

कारणम् (R)- एकेना��्थकृच्छ्रेषु निश्चयं नाधिगच्छेत्। द्वाभ्यां मन्त्रयमाणो द्वाभ्यां संहताभ्यामवगृह्यते, विगृहीताभ्यां विनाश्यते। ततः परेषु कृच्छ्रेणार्धनिश्चयो गम्यते।

उपर्युक्तअभिकथन - कारणमाश्रित्य समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) तथा (R) उभावपि असत्यम्

  2. BOption (b)

    (A) तथा (R) उभावपि सत्यं (R) इति उचितं कारणमस्ति (A) इत्यस्य

  3. COption (c)

    (A) तथा (R) उभावपि सत्यं किन्तु (R) इति उचितं कारणं नास्ति (A) इत्यस्य

  4. DOption (d)

    (A)सत्यम्, (R) असत्यम्

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A) तथा (R) उभावपि सत्यं (R) इति उचितं कारणमस्ति (A) इत्यस्य

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प्रश्नानुवाद- अभिकथन (A)- (राजा को) तीन या चार मंत्रियों के साथ मंत्रणा करनी चाहिए।

कारण (R)- एक ही मंत्री से सलाह करता हुआ राजा किसी कठिनतम कार्य के आ जाने पर उचित निर्णय नहीं कर पाता। (यदि) दो मंत्रियो के साथ सलाह करता है तो सम्भव है कि वे दोनों राजा को वश में कर लें। अथवा वे आपस में ही लड़ सकतें है। यदि चार से अधिक मंत्री हो जाए तो निर्णय करना मुश्किल हो जाएगा। 

स्पष्टीकरण- अभिकथन- (राजा को) तीन या चार मंत्रियों के साथ मंत्रणा करनी चाहिए। यह कथन सत्य है।

कारण- एक ही मंत्री से सलाह करता हुआ राजा किसी कठिनतम कार्य के आ जाने पर उचित निर्णय नहीं कर पाता। (यदि) दो मंत्रियो के साथ सलाह करता है तो सम्भव है कि वे दोनों राजा को वश में कर लें। अथवा वे आपस में ही लड़ सकतें है। यदि चार से अधिक मंत्री हो जाए तो निर्णय करना मुश्किल हो जाएगा। यह कथन सत्य है। 

  • यह प्रसंग कौटिलीय अर्थशास्त्र के विनयाधिकरण के मन्त्राधिकार से है। इस प्रकरण में इस विषय पर विचार किया जा रहा है कि राजा को कितने मन्त्रियों के साथ मन्त्रणा करनी चाहिए।
  • इससे पूर्व के आचार्यों ने अपने मत दिए है कि  राजा को एक या दो मन्त्रियों के साथ मन्त्रणा करनी चाहिए। इसका खण्डन करते हुए कौटिल्य कहते है कि राजा को तीन या चार मंत्रियों के साथ मंत्रणा करनी चाहिए। ​एक ही मंत्री से सलाह करता हुआ राजा किसी कठिनतम कार्य के आ जाने पर उचित निर्णय नहीं कर पाता और मन्त्री प्रतिद्वंदी के रूप में मनमानी करने लगता है।
  • यदि दो मंत्रियो के साथ सलाह करता है तो सम्भव है कि वे दोनों राजा को वश में कर लें। अथवा वे आपस में ही लड़ सकतें है। ऐसें में सारी मन्त्रणा व्यर्थ हो जाएगी। यदि चार से अधिक मंत्री हो जाए तो निर्णय करना मुश्किल हो जाएगा। इस दशा में मन्त्र की सुरक्षा में भी सन्देह हो जाता है।

 

इस प्रकार प्रस्तुत अभिकथन तथा कारण सत्य है तथा अभिकथन का कारण भी समीचीन है। अतः विकल्प 2 सही है।

Question 71

'कविक्रतुः' अधोलिखितेषु कस्य विशेषणं विद्यते?

  1. AOption (a)

    इन्द्रस्य

  2. BOption (b)

    बृहस्पतेः

  3. COption (c)

    अग्नेः

  4. DOption (d)

    शुक्रस्य

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Correct answer

Answer: (c)C.

अग्नेः

Why this answer is correct

**प्रश्नानुवाद- ‘**कविक्रतु’ निम्नलिखित में से किसका विशेषण है?

स्पष्टीकरण- ‘कविक्रतु’ निम्नलिखित में से अग्नि का विशेषण है। 

यह पद अग्नि सूक्त (1.1.) के पाँचवे मन्त्र में प्राप्त होता है जिसका अर्थ है क्रान्तद्रष्टा। ऋग्वेद में इन्द्र सर्वाधिक प्रमुख देवता का स्थान प्राप्त है। सम्पूर्ण ऋग्वेद में प्रायः 250 सूक्तों में इनकी प्रशंसा की गयी है। इसके अनन्तर, अग्नि देवता का स्थान आता है। प्रायः 200 सूक्तों में इनकी प्रशंसा की गयी है। अग्नि, यज्ञ के समय, देवताओं को बुलाते हैं, उन्हें बिठाते है तथा यज्ञ के हविष को देवताओं को ग्रहण करने के लिए प्रार्थना करते हैं। अग्नि देवता की महत्ता इस बात से सिद्ध होती है कि ऋग्वेद का प्रथम सूक्त अग्नि देवता को ही समर्पित है।

महर्षि यास्क सम्मत 'अग्नि' शब्द का निर्वचन यहाँ पर प्रस्तुत है-

  • अंग नयति सन्नममानः। (काष्ठादि अन्य पदार्थों से मिलने पर उन्हें अपना अंग बना लेते हैं)।
  • अग्रणीः भवति। (सभी कर्मों में अग्रणी होता है)।
  • अग्रं यज्ञेषु प्रणीयते।  (यज्ञों में आगे अर्थात पूर्व दिशा में स्थित आह्गनीय प्रदेश में ले जाया जाता है)।
  • देवसेनामग्रे स्वयं नयतीत्यग्रणीः। (देवसेना को स्वयं आगे ले जाता है)।
  • अक्नोपनो भवति इति स्थौलाष्ठीवि। (शुष्क करने वाला)।

 

महर्षि यास्क ने 'अग्नि' शब्द का तीन पक्षों में अर्थ किया है-

  • आधिभौतिक पक्ष - पार्थिव अग्नि
  • आधिदैविक पक्ष - अग्नि देवता
  • आध्यात्मिक पक्ष - शरीर को उष्म रखने वाला प्राणतत्त्व

 

Additional Information​अग्निदेवता को ऋग्वैदिक मन्त्रों में होता, पुरोहित, हव्यवाह, सहस्राक्ष, दमूनस, घृतपृष्ठ, घृतप्रतीक, घृतलोम, मन्द्रजिह्व, आङ्गिरस, धूमकेतु, सप्तरश्मि, उर्ज़ोनपात, गृहपति, विश्वपति, शोचिषकेश आदि अभिधानों से अभिहित किया गया है। यह अपने चमकीले रथ पर चमकते रहते है। उनका रथ द्युतिमान, प्रकाशमान, स्वर्णिम तथा मञ्जुल है। इस रथ को दो या दो से अधिक घृतपृष्ठ, भूरे, हरे, मनोज्ञ, मनोजवा, विश्वरूप एवं वायुप्रेरित अश्व खींचते हैं। अरणियों के संघर्ष से इनका जन्म हुआ है। अतः अरणियाँ इनके माता -पिता है। इनमें ऊध्वं अरणि पुरुष है तथा अधो अरणि स्त्री है। समिधाओं से उत्पन्न होने वाले अग्नि, उत्पन्न होते ही अपने माता-पिता का भक्षण कर जाते हैं। अग्नि को 'सहसः पुत्रः' भी कहा गया है। अन्य देवताओं की अपेक्षा अग्नि का मानवजीवन के साथ बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध है।

Question 72

अधस्तनेषु मात्रिकापश्रुतेरुदाहरणे स्तः-

(A) पित्सति-पतति-पातयति

(B) गेएन-गिंग-गेगांगेन

(C) गतः-गमनम्-जगाम

(D) कत्ल्-कतिल-मकतूल

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (A) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (B) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (C) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A) एवम् (C)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- निम्नलिखित में से मात्रिक अपश्रुति के दो उदाहरण है- 

स्पष्टीकरण- भाषाविज्ञान में ध्वनि परिवर्तन कई प्रकार के होते हैं, जिनमें आगम, लोप, अभिश्रुति, अपश्रुति आदि आते हैं। अपश्रुति का अर्थ है- स्वर परिवर्तन। यह प्रवृत्ति भारोपीय, सेमेटिक, और हेमेटिक भाषाओं में पायी जाती है। अपश्रुति के दो भेद होते हैं- गुणीय अपश्रुति तथा मात्रिक अपश्रुति। 

  1. गुणीय अपश्रुति- इसे ध्वनि परिवर्तन भी कहते हैं। इसमें गुण की दृष्टि से स्वर मात्र में परिवर्तन हो जाता है। इससे अर्थ में भेद हो जाता है। जैसे- अग्रस्वरों के स्थान पर पश्च स्वर य अन्य स्वर- परिवर्तन। यथा- अंग्रेजी में एकवचन से बहुवचन बनाने में स्वर भेद- Man-Men, Goose- Geese, Foot- Feet। धातुरूप में Sing- Sang- Sung। जर्मन में गेएन, गिंग, गेगांगेन आदि। रूसी भाषा में- दार (दान), दरीत्य् (उपहार में देना); त्येच (बहना), तियेनिये (प्रवाह, धारा)। अरबी में- क्त्ल् (मारना), कातिल (मारनेवाला), मकतूल (मरनेवाला), किताल (युद्ध), कत्ताल (बहुतों को मरनेवाला)। संस्कृत में सूत- सौति (सूतपुत्र), दशरथ- दशरथि (दशरथ का पुत्र)।
  2. मात्रिक अपश्रुति- मात्रिक अपश्रुति में ह्रस्व-दीर्घ आदि मात्राओं में परिवर्तन होता है। स्वर की प्रकृति वही रहती है, उसे दीर्घ, गुण, वृद्धि आदि हो जाता है। इसका कारण उदात्त स्वर का होना या न होना माना जाता है। धातु आदि पर उदात्त स्वर होने पर गुण या वृद्धि होगी। उदात्त स्वर न होने पर वहाँ पर गुण या वृद्धि नहीं होगी, अपितु कुछ स्थानों पर संप्रसारण (य्- इ, व्-उ, र्-ऋ) हो जाता है। धातुओं की मूल आधार श्रेणी ‘गुण’ वाली स्थिति को मानते हैं। इसके आधार पर ३ श्रेणीयाँ मानी जाती हैं-

निर्बल श्रेणी (गुण-वृद्धि नहीं,संप्रसारण होगा), सबल श्रेणी (गुण होगा), दीर्घीकृत श्रेणी (वृद्धि होगी)। मात्रिक अपश्रुति के उदाहरण- संस्कृत- गतः,गमनम्, जगाम- पित्सति, पतति, पातयति आदि।

Question 73

के वर्णाः स्वयंप्रकाशन्ते?

(A) मूलस्वराः

(B) अन्तस्थाः

(C) संयुक्तस्वराः

(D) ऊष्मवर्णाः

अत्र समीचिनं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (B) एवम् (D)

  3. COption (c)

    (A) एवम् (C)

  4. DOption (d)

    (C) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (c)C.

(A) एवम् (C)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- कौन से वर्ण स्वयं प्रकाशित होने वाले हैं?

स्पष्टीकरण- मूलस्वर तथा संयुक्तस्वर स्वयं प्रकाशित होने वाले वर्ण हैं।

वर्ण- वर्ण्यन्ते व्यक्तं ध्वन्यन्ते इति वर्णा: अर्थात् व्यक्त ध्वनियों को ही वर्ण कहते हैं।वर्ण: नाम अर्थभेदक:  अर्थात् वर्ण अर्थ भेदक है। पट, घट, नट आदि में जो पटादि अर्थ भेद है, वह वर्णों के द्वारा ही सम्भव होता है। 

संस्कृत वर्णमाला के सर्वप्रथम दो भेद हैं- 

  1. स्वर- स्वेन राजन्ते प्रकाशन्ते इति स्वरा:  अर्थात् स्वयं प्रकाशित वर्णों को स्वर कहते हैं। स्वर्यते शब्द्यते व्यजनमेभिरिति वा स्वरा: जिन वर्णों के द्वारा व्यजन वर्णों का उच्चारण होता है, वे स्वर कहे जातें हैं। पाणिनीयशिक्षा के अनुसार ये 22 हैं- अ, आ, आ३, इ, ई, ई३, उ, ऊ, ऊ३, ऋ, ऋ, ऋ३, ऌ, ऌ३, ए, ए३, ओ, ओ३, ऐ, ऐ३, औ, औ३।
  2. व्यजन- अन्वग् भवतीति व्यंजनम्  अर्थात् स्वरों का अनुगमन करने वाले वर्ण व्यंजन कहे जाते हैं। व्यज्यन्ते स्वरसाहाय्येन उच्चार्यन्ते इति व्यंजनानि अर्थात् स्वरों की सहायता से उच्चारित या अभिव्यक्त होने वाले व्यंजन कहे जाते हैं। जैसे क, ख, ग, घ आदि।

​

​स्वरों के मुख्यत: दो भेद हैं - 

  1. मूलस्वर- वे स्वर जो अन्य स्वरों के संयोग से उत्तपन्न नहीं हुए हैं, मूलस्वर कहलातें हैं। जैसे अ, इ, उ, ऋ, ऌ इत्यादि।
  2. संयुक्तस्वर- वे स्वर जो दो मूल स्वरों के संयोग से उत्तपन्न हुए हैं, संयुक्तस्वर कहलातें हैं। जैसे ए, ओ, ऐ, औ, आ, ई इत्यादि।

 

व्यंजन मुख्यत: तीन प्रकार के होतें हैं।

  1. स्पर्श- कादयो मावसाना: स्पर्शा: अर्थात् क से आरम्भ होकर म पर्यन्त सारे व्यंजन स्पर्श कहे जाते हैं।
  2. अन्त: स्थ- यणोन्तस्थानाम् अर्थात् यण् प्रत्याहार में परिगणित वर्ण अन्त: स्थ कहलातें हैं। जैसे य, व, र, ल।
  3. ऊष्म- शलोष्मानाम् शल् प्रत्याहार में परिगणित वर्ण ऊष्म कहे जाते हैं। जैसे श, ष, स, ह।

 

अतिरिक्त जानकारी

कतिपय आचार्यों ने अयोगवाह को भी वर्णों का भेद स्वीकार किया है। अयोगवाह से तात्पर्य अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय से है। चूँकि ये स्वयं अर्थभेदक नहीं हैं इसलिए इनके वर्णत्व पर मतभेद है।

Question 74

वाक्यपदीये भर्तृहरिणा कतमौ शब्दार्थयोः सम्बन्धौ स्वीकृतौ?

(A) संयोगः

(B) कार्यकारणभावः

(C) समवायः

(D) योग्यता

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (B) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (B) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(B) एवम् (D)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- वाक्यपदीय में भर्तृहरि के द्वारा शब्द और अर्थ के बीच कौन से दो सम्बन्ध मानें है?

स्पष्टीकरण- वाक्यपदीय में भर्तृहरि के द्वारा शब्द और अर्थ के बीच दो सम्बन्ध मानें हैं- कार्यकारणभाव सम्बन्ध और योग्यता सम्बन्ध। 

वाक्यपदीयम् व्याकरणशास्त्र का दार्शनिक ग्रंथ है। इसकी रचना भर्तृहरि ने की थी। इसमे तीन काण्ड हैं- ब्रह्मकाण्ड, वाक्यकाण्ड, पद (प्रकीर्ण) काण्ड। भर्तृहरि ब्रह्मकांड में उनसे पूर्व के आचार्यों का शब्दार्थ सम्बन्ध विषयक मत प्रस्तुत किए है- नित्या शब्दार्थसम्बन्ध: अर्थात् शब्द और अर्थ के सम्बन्ध नित्य है। 

भर्तृहरि ने दो प्रकार के शब्द बताए हैं- 

  1. अन्वाख्येय- ये शब्द प्रतिपादक शब्दों के विपरीत है। इनमें तथाकथित पदार्थ या शब्दार्थ को ध्वनित करने वाली शब्द कि कोटि होती है।
  2. प्रतिपादक- यह वह शब्दकोटि है, जो किन्हीं रूढ़ अर्थों को वहन करके या बिना किए भी अन्यान्य द्रव्यों की सांकेतिका होती है।

​​

भर्तृहरि ने दो प्रकार के अर्थ बताए हैं- 

  1. अपोद्धार (कल्पित)- इन अर्थों को व्याकरण द्वारा प्रकृति-प्रत्यय की विभाग की कल्पना से गृहीत किया जाता है।
  2. स्थितलक्षण (अकल्पित)- जिसके पद वाक्य का स्वरूप निश्चित हो।

​

​भर्तृहरि ने निम्न कारिका के माध्यम से दो प्रकार के शब्दार्थ सम्बन्ध बताए हैं- कार्यकारणभाव सम्बन्ध और योग्यता सम्बन्ध। 

​कार्यकारणभावेन योग्यभावेन च स्थिताः। धर्मे ये प्रत्यये चाङगं  सम्बन्धाः साध्वसाधुषु।। 

  1. कार्यकारणभाव- जिसके कार्य-कारण खोजा जा सके।
  2. योग्यभाव- जिसमें सहज योग्यता अंतर्निहित हो।

 

ये सम्बन्ध भी द्विविध रहते है- धर्म के अंग बनकर या प्रत्यय के अंग बनकर। ये शब्द साधु और असाधु शब्दों में समान रूप से स्थित रहते है।

Question 75

'तनु विस्तारे' धातोः विधिलिङ प्रथमपुरुषैकवचने रूपद्वयं भवति-

(A) तन्यात्

(B) तनुयात्

(C) तनिषीष्ट

(D) तन्वीत

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (A) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (A) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (B) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(B) एवम् (D)

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प्रश्नानुवाद- ‘तनु विस्तारे’ धातु’ का विधिलिङ प्रथमपुरुष एकवचन के दो रूप होते है-

**स्पष्टीकरण- ‘**तनु विस्तारे’ धातु’ का विधिलिङ प्रथमपुरुष एकवचन के दो रूप होते है- तनुयात् तथा तन्वीत।

‘तनु विस्तारे’ धातु यह धातु ‘तनादिगण’ की प्रमुख धातु है, यह सेट् धातु है तथा उभयपदी है। 

इसके विधिलिङ्ग के रूप निम्न हैं-

            परस्मैपद 

तनुयात्    तनुयाताम्    तनुयुः  

तनुयाः     तनुयातम्    तनुयात 

तनुयाम्    तनुयाव      तनुयाम

 

              आत्मनेपद 

तन्वीत    तन्वीयाताम्    तन्वीरन् 

तन्वीथाः  तन्वीयाथाम्   तन्वीध्वम् 

तन्वीय    तन्वीवहि       तन्वीमहि

Question 76

'चत्वारि श्रृङ्गा स्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्तहस्तासो अस्य' इत्यत्र 'द्वे-शीर्षे' इत्यनेन महाभाष्ये पतञ्जलिना किं गृहीतम्?

(A) नित्यशब्दः

(B) शिरःस्थानम्

(C) कार्यशब्दः

(D) कण्ठस्थानम्

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत:

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (C)

  2. BOption (b)

    (A) एवम् (B)

  3. COption (c)

    (A) एवम्(D)

  4. DOption (d)

    (B) एवम् (D)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(A) एवम् (C)

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प्रश्ननुवाद-  ‘इस वृषभ के चार सींगे, तीन पैर, सात हाँथ और दो सिर हैं’ इससे महाभाष्य में पतंजलि ने क्या ग्रहण किया है?

स्पष्टीकरण- महाभाष्यकार ने व्याकरण के 5 मुख्य प्रयोजन बताए हैं- ‘रहोहागमलघ्वसन्देहाः प्रयोजनम्’ अर्थात् रक्षा, ऊह, आगम, लघु और असन्देह। इसके अतिरिक्त 13 गौण प्रयोजन बताएँ हैं- तेसुरा, दुष्ट: शब्द:, यदधीतम्, यस्तु प्रयुङ्क्ते, अविद्वांस:, विभक्तिं कुर्वन्ति, यो वा इमाम्, चत्वारि, उत त्वः, सक्तुमिव, सारस्वतीम्, दशम्यां पुत्रस्य तथा सुदेवो असि वरुणेति। 

गौण प्रयोजनों में अष्टम प्रयोजन ‘चत्वारि’ को स्पष्ट करने के क्रम में महाभाष्यकार ने ऋग्वेद के अग्निसूक्त के एक मंत्र की सहायता लिया है-

मंत्र-  चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य।  त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्याँ आ विवेश ॥

मंत्रार्थ- एक महान् कान्तिमान बैल, जिसके चार सींग हैं, तीन पैर हैं, दो सिर हैं, सात हाथ हैं, और जो तीन प्रकार से बद्ध है, वह उच्च स्वर में चिल्लाता है और मरणधर्मियों में सब ओर से प्रवेश करता है। 

 इस मंत्र का आश्रय लेकर महाभाष्यकार ‘पतंजलि’ ने व्याकरणशास्त्र  रूपी वृषभ का विवेचन किया है, जो निम्नलिखित है-

  1. चार सींगे-  इससे पद जातियों का संकेत मिलता है,  जो कि नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात रूपी हैं।
  2. तीन पैर-  इससे कल का संकेत मिलता है, जो कि कालवाची भूत, भविष्य, वर्तमान रूपी है।
  3. दो सिर- इससे दो प्रकार के शब्द का संकेत मिलता है- नित्यशब्द और कार्यशब्द।
  4. सात हाँथ-  इस सात विभक्त्यों का संकेत मिलता है।

Question 77

अधस्तनेषु केन सह कस्य सम्बन्धः?

(A)वाक्यपदीयम्(I)हरदत्तः
(B)पदमञ्जरी(ll)भर्तृहरिः
(C)अष्टाध्याय्याः मिताक्षरावृत्तिः(lll)नागेशभट्टः
(D)स्फोटवादः नाम ग्रन्थः(lV)अन्नभट्टः

 अधस्तनेषु समीचीनां तालिकां चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A)- (I), (B)- (III), (C)- (II), (D)- (IV)

  2. BOption (b)

    (A)- (II), (B)- (I), (C)- (IV), (D)- (III)

  3. COption (c)

    (A)- (III), (B)- (II), (C)- (I), (D)- (IV)

  4. DOption (d)

    (A)- (IV), (B)- (II), (C)- (III), (D)- (I)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A)- (II), (B)- (I), (C)- (IV), (D)- (III)

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प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किसका किस के साथ संबंध है? नीचे दिये गये विकल्पों का सही चयन कीजिए-

वाक्यपदीय : संस्कृत व्याकरण का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसे त्रिकाण्डी भी कहते हैं। इसके रचयिता नीतिशतक के रचयिता भर्तृहरि हैं। वाक्यपदीय में भर्तृहरि ने भाषा (वाच्) की प्रकृति और उसका बाह्य जगत से सम्बन्ध पर अपने विचार व्यक्त किये हैं। यह ग्रंथ तीन भागों में विभक्त है जिन्हें "कांड" कहते हैं। यह समस्त ग्रंथ पद्य में लिखा गया है। प्रथम "ब्रह्मकांड" है जिसमें 157 कारिकाएँ हैं, दूसरा "वाक्यकांड है जिसमें 493 कारिकाएँ हैं और तीसरा "पदकांड" के नाम से प्रसिद्ध है।

  • इसका प्रथम काण्ड ब्रह्मकाण्ड है जिसमें शब्द की प्रकृति की व्याख्या की गयी है। इसमें शब्द को ब्रह्म माना गया है और ब्रह्म की प्राप्ति के लिये शब्द को प्रमुख साधन बताया गया है।
  • दूसरे काण्ड में वाक्य के विषय में भर्तृहरि ने विभिन्न मत रखे हैं।
  • तीसरे काण्ड में अन्य दार्शनिक रीतियों के विषयों, जैसे - जाति, द्रव्य, काल आदि की चर्चा की गयी है।

**पदमंजरी :**पदमंजरी काशिकावृत्ति का भाष्य है। इसके रचयिता हरदत्त हैं, जिन्होंने आपदस्तम्ब के धर्मसूत्र का भी भाष्य लिखा है। यह ग्यारहवीं शताब्दी की रचना है। 

मिताक्षरा :

पाणिनीय अष्टाध्यायी पर अन्नम्भट्ट ने 'पाणिनीय मिताक्षरा' वृत्ति प्रदीपोद्योतन से पूर्व लिखी थी। यह प्रमुख वृत्तियोंं में से एक मानी जाती है। 

स्फोटवाद :

स्फोट का सिद्धान्त भर्तृहरि ने प्रतिपादित किया है। भर्तृहरि द्वारा विरचित वाक्यपदीय नामक व्याकरण ग्रंथ में तीन कांड हैं। वाक्यपद संबंधी व्याकरण दर्शन के सिद्धांतों का कारिकाओं में गूढ़ विबेचन है। व्याकरण दर्शन के प्राचीनतम और प्रामाणिक ग्रंथों में इसकी गणना है। शब्दब्रह्म, स्फोटब्रह्म और स्फोटवाद का इसमें प्रतिपादन है। इसे 'हरिकारिका' भी कहते हैं। वर्णों द्बारा जो स���फुटित या प्रकट हो उसको स्फोट कहते है, वह वर्णातिरिक्त है। जैसे ' कमल' कहने से अर्थ की जो प्रतीति होती है वह 'क', 'म' और 'ल' इन वर्णों के द्बारा नहीं, इनके उच्चारण से उत्पन्न स्फोट द्बारा होती है। वह स्फोट नित्य है।

अतः स्पष्ट है, (A)- (II), (B)- (I), (C)- (IV), (D)- (III) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 78

अधोऽङ्कितानां योगदर्शनव्यासभाष्यानुसारं समुचितं क्रमं चिनुत्-

(A) क्षिप्तम्

(B) विक्षिप्तम्

(C) निरुद्धम्

(D) एकाग्रम्

(E) मूढम्

अधोऽङ्कितेषु समुचितं क्रमं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A), (E), (D), (B), (C)

  2. BOption (b)

    (A), (E), (B), (D), (C)

  3. COption (c)

    (E), (A), (D), (B), (C)

  4. DOption (d)

    (B), (D), (A), (C), (E)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(A), (E), (B), (D), (C)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- निम्नलिखितों का योग दर्शन के भाष्य के अनुसार समुचित क्रम चुनें- 

स्पष्टीकरण- उपरि लिखितों का योग दर्शन के भाष्य के अनुसार समुचित क्रम- क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र, निरुद्ध। 

भारतीय आस्तिक दर्शनों में सांख्य के बाद दूसरा नाम योगदर्शन का आता है। इसके प्रतिपादक या प्रवर्तक महर्षि पतंजलि हैं। इस दर्शन का प्रमुख ग्रंथ योगसूत्र है, जो महर्षि पतंजलि द्वारा रचित है। योगदर्शन में चार पाद हैं- समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद, कैवल्यपाद। इसमें कुल 195 सूत्र हैं। इसमें ईश्वर सहित 26 तत्त्वों की चर्चा की गई है। अतः यह सेश्वर सांख्य कहलाता है। योग दर्शन में चित्त विषयक निरूपण प्राप्त होता है। चित्त में प्रकृति के तीनों गुण सत्व, रज और तम विद्यमान हैं। सबके चित्त एक समान नहीं हैं। इन तीनों की विभिन्न स्थितियों के कारण चित्त भी विभिन्न स्थितियों वाला हो जाता है। योगदर्शन में चित्त की स्थितियों को मूढ़, क्षिप्त, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध इन पाँच स्थितियों में विभाजित किया गया है, जिन्हें चित्त की अवस्थायें या चित्तभूमि के नाम से भी जाना जाता है। इनका निरूपण निम्नलिखित हैं-

  1. क्षिप्त- क्षिप्तावस्था पूर्णतया रजोगुणी अवस्था है। इस अवस्था वाला चित्त चंचल बना रहता है। वह निरन्तर विषयों की ओर भागता रहता है। यह रजोगुण की प्रधानता के कारण होता है। यतोहि रजोगुण का धर्म है क्रियाशीलता इसलिए रजोगुण से युक्त चित्त भी निरन्तर क्रियाशील बना रहता है। वह किसी भी विषय पर स्थिर नहीं हो पाता, एक विषय प्राप्त होने पर वह तुरन्त दूसरे विषय की ओर दौड़ने लगता है। इसी कारण चित्त में दुःख की उत्पत्ति होती है।
  2. मूढ़- मूढावस्था पूर्णतया तमोगुणी अवस्था है। तमोगुण का धर्म होता है स्थिति, तमोगुण की प्रधानता होने के कारण चित्त की इस अवस्था में चित्त में अज्ञान बना रहता है। बुद्धि में जड़ता होती है, विषयों के यथार्थ ज्ञान का अभाव होता है। इसी कारण विषयों के प्रति इस अवस्था में मोह उत्पन्न होता है तथा ऐसे चित्त से युक्त जीवात्मा संसार में फंसा रहता है।
  3. विक्षिप्त- चित्त की यह अवस्था भी पूर्णतया रजोगुणी होती है। किन्तु कभी कभी इस अवस्था में सत्वगुण का प्रभाव भी उत्पन्न हो जाता है। इस अवस्था में जब चित्त में रजोगुण प्रधान होता तो वह बहिर्मुख होकर विषयों की ओर भागता रहता है और जब कभी सत्वगुण बढ़ जाता है तो चित्त में वैराग्य का भाव उत्पन्न हो जाता है और  कुछ समय के लिए चित्त अन्तर्मुखी हो जाता है। किन्तु बार- बार गुणों की अवस्था परिवर्तित होने के कारण चित्त की इस अवस्था में भी स्थिरता का अभाव होता है। इसीलिए इस अवस्था को विक्षिप्तावस्था कहा जाता है। यह अवस्था मूढावस्था तथा क्षिप्तावस्था से कुछ श्रेष्ठ कही जाती है।
  4. एकाग्र- चित्त की एकाग्र अवस्था पूर्णतया सत्वगुणी होती है। रजस् व तमस् दोनों न्यून हो जाते हैं। अब रजोगुण केवल सात्विकवृत्ति को क्रियाशील बनाये रखने का कार्य करता है तथा तमोगुण उस सात्विक वृत्ति को स्थिर बनाये रखने का कार्य करता है। जिससे विषयों का यथार्थ ज्ञान चित्त में उत्पन्न होने लगता है। साथ ही वैराग्य भाव दृढ़ होने लगता है तथा चित्त में सुख की उत्पत्ति होती है। ध्यान की यही अवस्था है। इसी अवस्था को सम्प्रज्ञात योग (सम्प्रज्ञात समाधि) भी कहा जाता है।
  5. निरुद्ध- चित्त की यह अवस्था त्रिगुणातीत अवस्था है। निरन्तर अभ्यास से सभी विषयों का ज्ञान प्राप्त करने पर समस्त वृत्तियाँ समाप्त हो जाती हैं। इस अवस्था में चित्त शान्त हो जाता है। विवेकख्याति वृत्ति भी परवैराग्य द्वारा हटाने के बाद निर्बीज या असम्प्रज्ञात समाधि की स्थिति है। सर्ववृत्तिनिरोध होने के कारण द्रष्टा की स्वरूपस्थिति इस अवस्था के पश्चात आ जाती है।

Question 79

कालक्रमानुसारमधोलिखित ग्रन्थानां समुचितं क्रमं चिनुत-

(A) शब्दकौस्तुभम्

(B) काशिकावृत्तिः

(C) महाभाष्यम्

(D) वैय्याकरणभूषणसारः

(E) शब्देन्दुशेखरः

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (C), (A), (B), (E), (D)

  2. BOption (b)

    (D), (B), (A), (E), (C)

  3. COption (c)

    (B), (A), (C), (D), (E)

  4. DOption (d)

    (C), (B), (A), (D), (E)

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (d)D.

(C), (B), (A), (D), (E)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद-  निम्नलिखितों ग्रन्थों का कालक्रम के अनुसार समुचित क्रम चुनें-

स्पष्टीकरण- उपर दिए गये ग्रन्थों का कालक्रम के अनुसार समुचित क्रम है- महाभाष्य, काशिकावृत्ति, शब्दकौस्तुभ, वैय्याकरणभूषणसार, शब्देन्दुशेखर।

  1. महाभाष्य- संस्कृत वैयाकरणाचार्यों में कालक्रम की दृष्टि से त्रिमुनियों में पाणिनि तथा कात्यायन के बाद महाभाष्यकार प्रणेता पतञ्जलि का वर्णन प्राप्त होता है। महाभाष्य में स्वयं के लिए पतञ्जलि ने 'गोनर्दीय' और 'गोणिकापुत्र' प्रयोग किया है। जिससे ज्ञात होता है कि ये गोनर्द (गोंडा-उत्तरप्रदेश) के निवासी थे तथा इनकी माता का नाम 'गोणिका' था। पतञ्जलि का काल 185 ई० पू० माना जाता है। महाभाष्य ग्रन्थ का विभाजन 84 आन्हिकों में हुआ है।
  2. काशिकावृत्ति- इस ग्रन्थ के सम्मिलित रचनाकार वामन तथा जयादित्य हैं। इसमें पाणिनिकृत अष्टाध्यायी के सूत्रों की वृत्ति लिखी गयी है। इसमें आठ अध्याय हैं, प्रथम पाँच वामन तथा शेष तीन जयादित्य कृत हैं। इनका काल 7 वीं शताब्दी माना जाता है।
  3. शब्दकौस्तुभ- इसके लेखक भट्टोजिदीक्षित हैं। यह ग्रंथ पाणिनीय अष्टाध्यायी के ऊपर लिखा गया है। पाणिनीय व्याकरण परम्परा में त्रिमुनि परम्परा काल (600 ई०पू०-100 ई० पू०) तथा इनपर व्याख्या और टीकाकाल (100 ई०-1000 ई०) के बाद प्रक्रिया काल का प्रारंभ होता है। इस परम्परा में धर्मकीर्ति, विमालसरस्वती, रामचन्द्र के बाद भट्टोजिदीक्षित का नाम आता है। इनका काल 1530 ई०-1620 ई० के बीच एककण्ठ से स्वीकार किया जाता है। इनके अन्य ग्रन्थ हैं- वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी, प्रौढ़मनोरमा (वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी पर स्वयं के द्वारा कृत टीका) तथा वैयाकरणसिद्धान्तकारिका (भूषणकारिका)।
  4. वैयाकरणभूषणसार- इस ग्रंथ के लेखक कौण्डभट्ट हैं। इसका काल 1660 ई० माना जाता है। यह ग्रन्थ व्याकरण दर्शन से सम्बंधित है।
  5. शब्देन्दुशेखर- इसके रचयिता नागेशभट्ट हैं। इनका काल 1730 ई० से 1820 ई० है। इनके अन्य ग्रंथ निम्नलिखित है- बृहच्छब्देन्दुशेखर, परिभाषेन्दुशेखर, मञ्जूषा, लघुमञ्जूषा, परमलघुमञ्जूषा, स्फोटवाद, महाभाष्य-प्रत्याख्यान-संग्रह, पतंजलिकृत महाभाष्य पर उद्योत टीका आदि।

Question 80

पूर्ववर्तिनः आचार्यस्य प्राथम्येन कालक्रमानुसारमुचितमुत्तरं निर्दिशतः-

(A) विश्वनाथः

(B) दण्डी

(C) धनञ्जयः

(D) कुन्तकः

अत्र समुचितं क्रमं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A), (B), (C), (D)

  2. BOption (b)

    (B), (C), (D), (A)

  3. COption (c)

    (C), (B), (A), (D)

  4. DOption (d)

    (B), (A), (C), (D)

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

(B), (C), (D), (A)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद- पूर्ववर्ती आचार्यों की प्राथमिकता से कालक्रम के अनुसार समुचित उत्तर निर्दिष्ट करें-

स्पष्टीकरण- पूर्ववर्ती आचार्यों का कालक्रम के अनुसार समुचित क्रम है- दण्डी, धनञ्जय, कुन्तक, विश्वनाथ। 

  1. दण्डी- ये अलंकारवादी आचार्य है। विद्वान इनका काल 550 और 650 ई॰ के मध्य मानते हैं। इनके काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ का नाम ‘काव्यदर्श’ है। इनकी अन्य काव्यमयी रचनाएँ है- दशकुमारचरित तथा अवन्तीसुन्दरी कथा।
  2. धनञ्जय- ये रसवादी आचार्य है। साथ ही ये व्यंजना के विरोधी आचार्य भी हैं। विष्णु-पुत्र धनञ्जय इसके रचनाकार हैं जो मुंजराज (974-995 ई॰) के सभासद थे। इनके ग्रन्थ का नाम ‘दशरूपक’ है। यह वस्तुतः नाट्यशास्त्र का प्रकरण ग्रन्थ है। इसका विभाजन चार प्रकाशों में हुआ है। इस ग्रन्थ पर धनिक की ‘अवलोक’ नामक टीका भी प्राप्त होती है।
  3. कुन्तक- ये वक्रोक्ति मत के प्रवर्तक हैं। कुन्तक ने अपने ग्रंथ ‘वक्रोक्तिजीवित’ में ध्वन्यालोक का मंगलाचरण उद्धृत किया है। अत: ये निश्चित रूप से आनन्दवर्धन के बाद के ही होंगें। अतः विद्वानों ने इनका काल 1000 ई॰ माना जाता है। वक्रोक्तिजीवित का विभाजन चार उन्मेषों में हुआ है।
  4. विश्वनाथ- ये रसवादी आचार्य है। इन्होंने अपने ‘साहित्यदर्पण’ ग्रंथ में कुंतक का खण्डन किया है। अत: ये निश्चित रूप से कुंतक के बाद के ही होंगें। विद्वानों ने इनका काल 15 वी सदी माना ���ै। इनके ग्रन्थ का विभाजन 10 परिच्छेदों में विभक्त है।

अधोलिखितं गद्य - खण्डं पठित्वा प्रश्नानां समीचीनम् उत्तरं चिनुत-

उपर उपलो मेघो भवति। उपरमन्तेऽस्मिन्नभ्राणि। उपरता आप इति वा। तेषामेषा भवति- 'देवानां माने प्रथमा अतिष्ठन्कृन्तत्रादेषामुपरा उदायन्। त्रयस्तपन्ति पृथिवीमनूपा द्वा बृबूकं वहतः पुरीषम्।।' - देवानां निर्माणे प्रथमा अतिष्ठन् माध्यमिका देवगणाः। प्रथम इति मुख्यनाम प्रथमो भवति। कृन्तत्रमन्तरिक्षं विकर्तनं मेघानां विकर्त्तनेन मेघानामुदकं जायते। त्रयस्तपन्ति पृथिवीमनूपाः। पर्जन्योः वायुरादित्यः शीतोष्णवर्षैरोषधीः पाचयन्त्यनूपा अनुवपन्ति लोकान्स्वनेन स्वेन कर्म्मणा। अयमपीतरोऽनूप एतस्मादेवानूप्यत उदकेनापि वान्वाविति स्याद्यथा प्रागिति तस्यानूप इति स्याद्यथा प्राचीनमिति। द्वा बृबूकं वहतः पुरीषम्। वाय्वादित्या उदकं बृबूकमित्युदकनाम....।

Question 81

Based on Passage: View directions & passage

उपरिलिखित-परिच्छेदमनुसृत्य अधोलिखितेषु 'उपर' इति पदस्य अर्थं चिनुत-

  1. AOption (a)

    नभः

  2. BOption (b)

    मेघः

  3. COption (c)

    जलम्

  4. DOption (d)

    अश्वः

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Correct answer

Answer: (b)B.

मेघः

Why this answer is correct

प्रश्न अनुवाद - ऊपर परिच्छेद में निम्नलिखित 'उपर' इस पद का अर्थ चुनिये ?

स्पष्टीकरण -

  • उक्त गद्यांश निरुक्त के द्वितीया अध्याय से उद्धृत है।
  • गद्यांश में उल्लेखित है - उपर उपलो मेघो भवति। उपरमन्तेऽस्मिन्नभ्राणि। उपरता आप इति वा।
  • अर्थात् उपर या उपल मेघ को कहते है। जिसमें बादल खेलते है या जिसमें जल प्रसन्न होता है।

Important Points

  • गद्यांश से स्पष्ट है कि उपर या उपल मेघ के ही नाम है।
  • निरुक्त के द्वितीया अध्याय के षष्ठ पाद में मेघ के तीस नाम बतलाये गये है। षष्ठम् पाद में कहा भी गया है - मेघनामानि उत्तराणि त्रिंशत्।
  • इसीलिये स्पष्ट है कि 'उपर' का अर्थ 'मेघ' है।

 

अत: 'मेघ:' विकल्प सही है। 

Additional Information

गद्यांश अनुवाद -

उपर या उपल मेघ को कहते है। जिसमें बादल खेलते है। या जिसमें जल प्रसन्न होता है। उसकी यह ऋचा है। "देवताओं के बनने के समय सबसे पहले बन गये, इनके छेद से जल निकल आये। तीन मिलकर अपने - अपने नियम से पृथ्वी को गर्म करते है, और दो तो प्रसन्न करने वाला जल लाते है।" देवताओं के निर्माण के समय मध्यस्थान वाले देवता पहले बने। इन मेघों को कटने से जल उत्पन्न होता है। तीन अनूप मिलकर पृथ्वी को गर्म करते है। वर्षा से, वायु शीत से और आदित्य गर्मी से पौधों को पकाते है। ये अनूप है, क्योकिं संसार को अपने - अपने कर्म से अनुगृहीत करते है। यह दूसरा अनूप भी इसी से बना है, क्योकिं पानी से अनुगृहीत रहता है। अथवा जल से घिरा हो। उसी से प्राचीन शब्द की तरह अनुप हो गया। दो प्रसन्न करने वाले बृबूक लाते है - वायु और सूर्य जल को।

Question 82

Based on Passage: View directions & passage

उपरिलिखित-परिच्छेदमनुसृत्य अधोलिखितेषु 'कृन्तत्रम्' इति पदस्य अर्थं चिनुत-

  1. AOption (a)

    अन्तरिक्षम्

  2. BOption (b)

    विकर्तनम्

  3. COption (c)

    उदकम्

  4. DOption (d)

    मेघः

View answer & explanation

Correct answer

Answer: (b)B.

विकर्तनम्

Why this answer is correct

प्रश्न अनुवाद - ऊपर परिच्छेद में निम्नलिखित 'कृन्तत्रम्' इस पद का अर्थ चुनिये ?

स्पष्टीकरण -

  • उक्त गद्यांश निरुक्त के द्वितीया अध्याय से उद्धृत है।
  • गद्यांश में उल्लेखित है - कृन्तत्रमन्तरिक्षं विकर्तनं मेघानां विकर्त्तनेन मेघानामुदकं जायते।
  • अर्थात् आकाश का छेदन करके मेघों को काटता है और मेघों को काटकर जल उत्पन्न करता है।

Important Points

  • गद्यांश से स्पष्ट है कि यहां पर 'कृन्तत्रम्' पद का अर्थ 'विकर्तनं' है।
  • 'विकर्तनं' का अर्थ यहां पर काटने अर्थ में है।

 

इसीलिये यहां पर 'विकर्तनम्' विकल्प सही है।

Question 83

Based on Passage: View directions & passage

उपरिलिखित-परिच्छेदमनुसृत्य अधोलिखितेषु 'त्रयस्तन्ति' इत्यस्य वाक्यस्य अभिप्रायः कः?

  1. AOption (a)

    त्रयोतापाः पृथिवीं तपन्ति

  2. BOption (b)

    मनुष्याणां पापानि पृथिवीं तपन्ति

  3. COption (c)

    पर्जन्यो-वायुरदित्याः पृथिवीं तपन्ति

  4. DOption (d)

    सूर्यरश्मयः वडवानश्च पृथिवीं तपन्ति

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Correct answer

Answer: (c)C.

पर्जन्यो-वायुरदित्याः पृथिवीं तपन्ति

Why this answer is correct

प्रश्न अनुवाद - ऊपर परिच्छेद में निम्नलिखित 'त्रयस्तन्ति' इस वाक्य का अभिप्राय कौन सा है ?

स्पष्टीकरण - 

  • उक्त गद्यांश निरुक्त के द्वितीया अध्याय से उद्धृत है।
  • गद्यांश में उल्लेखित है - त्रयस्तपन्ति पृथिवीमनूपाः। पर्जन्योः वायुरादित्यः शीतोष्णवर्षैरोषधीः पाचयन्त्यनूपा
  • अर्थात् तीन अनूप मिलकर पृथ्वी को गर्म करते है। वर्षा से, वायु शीत से और आदित्य गर्मी से पौधों को पकाते है। ये अनूप है।

Important Points

  • गद्यांश से स्पष्ट है कि 'त्रयस्तन्ति पृथिवीमनूपाः' अर्थात् तीन अनूप मिलकर पृथ्वी को गर्म करते है।
  • अनूप अभिप्राय - वर्षा, वायु और आदित्य

 

अत: "पर्जन्यो-वायुरदित्याः पृथिवीं तपन्ति" विकल्प सही है।

Question 84

Based on Passage: View directions & passage

उपरिलिखित-परिच्छेदमनुसृत्य अधोलिखितेषु 'अनूपाः' इति पदं केषां विशेषणमस्ति?

  1. AOption (a)

    रवि-पृथिवी-जलानाम्

  2. BOption (b)

    अपस्तेजसादित्यानाम्

  3. COption (c)

    पृथिवी-जल-वायूनाम्

  4. DOption (d)

    वायुरादित्यपर्जन्यानाम्

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Correct answer

Answer: (d)D.

वायुरादित्यपर्जन्यानाम्

Why this answer is correct

प्रश्न अनुवाद - ऊपर परिच्छेद में निम्नलिखित 'अनूपाः' इस पद में किसका विशेषण है ?

स्पष्टीकरण - 

  • उक्त गद्यांश निरुक्त के द्वितीया अध्याय से उद्धृत है।
  • गद्यांश में उल्लेखित है - त्रयस्तपन्ति पृथिवीमनूपाः। पर्जन्योः वायुरादित्यः शीतोष्णवर्षैरोषधीः पाचयन्त्यनूपा
  • अर्थात् तीन अनूप मिलकर पृथ्वी को गर्म करते है। वर्षा से, वायु शीत से और आदित्य गर्मी से पौधों को पकाते है। ये अनूप है।

Important Points

  • गद्यांश से स्पष्ट है कि यहां पर "पर्जन्योः वायुरादित्यः" अनूपाः का विशेषण है।

 

इसीलिये "वायुरादित्यपर्जन्यानाम्" विकल्प सही है।

Question 85

Based on Passage: View directions & passage

उपरिलिखित-परिच्छेदमनुसृत्य अधोलिखितेषु 'बृबूकम्' इति पदस्यार्थं चिनुत-

  1. AOption (a)

    मेघः

  2. BOption (b)

    उदकम्

  3. COption (c)

    वायुः

  4. DOption (d)

    आदित्यः

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Correct answer

Answer: (b)B.

उदकम्

Why this answer is correct

प्रश्न अनुवाद - ऊपर परिच्छेद में निम्नलिखित 'बृबूकम्' इस पद का अर्थ चुनिये ?

स्पष्टीकरण - 

  • 'बृबूकम्' का अर्थ है - जल
  • गद्यांश से उल्लेखित है - बृबूकमित्युदकनाम

Important Points

  • गद्य में 'बृबूकम्' का पर्याय 'उदकम्' है।
  • 'बृबूकम्' और 'उदकम्' दोनों पद जल के पर्याय शब्द है।

इसीलिये 'उदकम्' विकल्प सही है।

Additional Informationअन्य विकल्प -

  1. मेघः - बादल
  2. वायुः - हवा
  3. आदित्यः - सूर्य

Question 86

अधस्तनेषु पतञ्जलिप्रतिपादितेषु व्याकरण-प्रयोजनेषु नास्ति

  1. AOption (a)

    रक्षार्थं

  2. BOption (b)

    ऊहः

  3. COption (c)

    आगमः

  4. DOption (d)

    सन्देहार्थं

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Correct answer

Answer: (d)D.

सन्देहार्थं

Why this answer is correct

प्रश्ननुवाद- निम्नलिखित में पतंजलि द्वारा प्रतिपादित व्याकरण के प्रयोजनों में से कौन नहीं है?

स्पष्टीकरण- महाभाष्यकार पतंजलि ने व्याकरण के 5 मुख्य प्रयोजन बताए हैं- ‘रहोहागमलघ्वसन्देहाः प्रयोजनम्’ अर्थात् रक्षा, ऊह, आगम, लघु और असन्देह।

  1. रक्षा- वेदों की रक्षा के लिए व्याकरण पढ़ना चाहिए। लोप, आगम, और वर्णविकार आदि को जानने वाला ही वेदों की रक्षा कर सकता है- रक्षार्थं वेदानामध्येयं व्याकरणम्। लोपगमवर्णविकारज्ञो हि सम्यक् वेदान् परिपालयिष्यति।
  2. ऊह- वेद मंत्र सभी लिंग और सभी विभक्तियों में नहीं है। अतः यज्ञकाल में उन मंत्रो में अपेक्षित रूप से लिंग और विभक्ति का व्यवहार करना चाहिए।
  3. आगम- व्याकरण का अध्ययन के लिए स्वयं श्रुति कहती है- ब्राह्मनेण निष्कारणो धर्म: षडंगो वेदोध्येयो ज्ञेयश्च अर्थात् ब्राह्मणों को वेद तथा वेदांग निष्कारण अध्ययन करना चाहिए।
  4. लघु- संस्कृत भाषा के प्रत्येक शुद्ध शब्द के अध्ययन में जीवन व्यतीत हो जाएगा। अतः लघुता के लिए व्याकरण पढ़ना चाहिए।
  5. असंदेह- वैदिक शब्दों के विषय में उत्पन्न संदेह का निराकरण करने के लिए व्याकरण पढ़ना चाहिए।

 

अत: यह स्पष्ट होता है की, प्रस्तुत पर्यायोंं में से सन्देहार्थं यह पतंजलि द्वारा प्रतिपादित व्याकरण के प्रयोजनों में से नहीं है।

Question 87

'बृहच्छब्देन्दुशेखरः' इति ग्रन्थस्य कर्ता?

  1. AOption (a)

    कैयट्टः

  2. BOption (b)

    नागेशभट्टः

  3. COption (c)

    चिन्तामणिः

  4. DOption (d)

    वामनः

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Correct answer

Answer: (b)B.

नागेशभट्टः

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : 'बृहच्छब्देन्दुशेखरः' इस ग्रंथ का कर्ता कौन है?

नागेशभट्ट :

संस्कृत के नव्य वैयाकरणों में सर्वश्रेष्ठ है। ये भट्टोजि दीक्षित के पौत्र थे। इनके पिता का नाम शिव भट्ट और माता का नाम सतीदेवी था। पाणिनीय परम्‍परा में वरदराज के बाद इन्‍हीं का नाम लिया जाता है। इनकी रचनाएँँ इस प्रकार है - 

  • रसमञ्जरी टीका - भानुदत्त की "रसमंजरी" पर टीका।
  • लघुशब्देन्दुशेखर - भट्टोजि दीक्षित कृत प्रौढमनोरमा की व्‍याख्‍या।
  • बृहच्छब्देन्दुशेखर - भट्टोजि दीक्षित कृत प्रौढमनोरमा की विस्तृत व्‍याख्‍या।
  • परिभाषेन्दुशेखर - पाणिनीयव्‍याकरण का व्‍याख्‍या ग्रंथ।
  • मञ्जूषा - व्‍याकरण का दार्शनिक ग्रंथ।
  • लघुमञ्जूषा - व्‍याकरण का दार्शनिक ग्रंथ।
  • परमलघुमञ्जूषा - व्‍याकरण का दार्शनिक ग्रंथ।
  • स्फोटवाद - स्‍फोटवाद का विवेचन ग्रंथ।
  • महाभाष्य-प्रत्याख्यान-संग्रह - महाभाष्य का विवेचन ग्रंथ।
  • उद्योत - पतंजलिकृत महाभाष्य पर  टीकाग्रंथ।
  • वैयाकरण-सिद्धांत-मंजूषा - व्याकरणदर्शनग्रन्थ।

 

अतः स्पष्ट है, 'नागेशभट्टः' यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 88

अधोङ्कितेषु वाल्मीकिरामायणं कयोः काव्ययोः उपजीव्यम्?

(A) नैषधीयचरितम्

(B) सेतुबन्धः

(C) भट्टिकाव्यम्

(D) किरातार्जुनीयम्

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत:

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (B) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (D) एवम् (A)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(B) एवम् (C)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : नीचे दिये हुए कौन से दो काव्योंं का उपजीव्य ग्रंथ वाल्मीकिरामायण है?

स्पष्टीकरण : 

काव्य और उनके उपजीव्य ग्रंथ इस प्रकार हैंं - 

काव्यउपजीव्य ग्रंथ
नैषधीयचरितम्महाभारत (नलोपाख्यान)
सेतुबन्धःवाल्मीकिरामायण
भट्टिकाव्यम्वाल्मीकिरामायण
किरातार्जुनीयम्महाभारत (वनपर्व)

 

अतः स्पष्ट है, सेतुबन्धः तथा भट्टिकाव्यम् यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 89

अधोऽङ्कितानां केन सह कस्य सम्बन्धः?

(A)एतान्याकाशादीनां सात्विकांशेभ्यो व्यस्तेभ्यः पृथक् पृथक् क्रमेणेत्पद्यन्ते(I)मनबुद्धिचित्ताहंकाराः
(B)एते पुनराकाशादिगतसात्विकांशोभ्यो मिलितेभ्य उत्पद्यन्ते(II)विज्ञानमयकोशः
(C)एतानि पुनराकाशादीनां रजोंऽशोभ्यो व्यस्तेभ्यः पृथक् पृथक् क्रमेणोत्पद्यन्ते(III)ज्ञानेन्द्रियाणि
(D)बुद्धिर्ज्ञानेन्द्रियैः सहिता भवति(IV)कर्मेनान्द्रियाणि

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A)- (III), (B)- (I), (C)- (IV), (D)- (II)

  2. BOption (b)

    (A)- (IV), (B)- (III), (C)- (II), (D)- (I)

  3. COption (c)

    (A)- (I), (B)- (II), (C)- (III), (D)- (IV)

  4. DOption (d)

    (A)- (III), (B)- (II), (C)- (I), D- (IV)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(A)- (III), (B)- (I), (C)- (IV), (D)- (II)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : किसका किस के साथ संबंध है? समुचित विकल्प चुनिये-

सूक्ष्म शरीर निर्मिति प्रक्रिया :

  • आकाश आदि पाँच सूक्ष्मभूतों के सात्विक अंश व्यष्टियों से पृथक्-पृथक् श्रोत्र- त्वक्-नेत्र (आक्षि) - रसना घ्राण, ये पाँच ज्ञानेन्द्रिय क्रम से उत्पन्न होते हैं। इन पञ्चसूक्ष्मभूतों के सूक्ष्मांश से मिलकर अन्त: करण उत्पन्न होता है। निश्चयात्मिका अन्तःकरण वृत्ति ही बुद्धि कहलाती है और संकल्पविकल्पात्मिका अन्तः करण वृत्ति मन कहलाती है। अन्तः करण वृत्ति भेद चित्त और अहंकार में इन बुद्धि और मन का अन्तर्भाव है। चित्र स्मरणात्मिका अन्तःकरण वृत्ति है। और अहंकार अभिमानात्मिका अन्तःकरण वृत्ति है। चित्त का बुद्धि में अन्तर्भाव होता है और अहंकार का मन में।
  • आकाश आदि पाँच भूतों के रजो अंश व्यष्टियों से क्रम पूर्वक वाक्-पाणि-पाद-पायु - उपस्थ नामक पाँच कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न होती है। आकाश आदि पञ्चभूतों के रजो अंश से मिलकर पञ्च प्राण उत्पन्न होते हैं। और पञ्च प्राण हैं प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान। नाग, कूर्म, कुकर, देवदत्त और धनञ्जय पाँच प्राण हैं, ये भी कुछ कहते हैं। ऊर्ध्वगमनशील नासिका अग्रवर्ती वायु प्राण है, अधोगमनशील पायु आदि स्थायी वायु अपान है, सर्वनाड़ी गमनशील अखिलशरीरस्थ वायु व्यान हैं, ऊर्ध्वं उत्क्रमणशील कण्ठस्थित वायुः उदान है, शरीर मध्यगत अन्य रस आदि का समीकरण कर वायु समान है।
  • सूक्ष्मशरीर का नाम  लिङ्ग शरीर भी है। लिङ्ग शरीर के सत्रह (17) अवयव हैं- पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, बुद्धि, मन, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच वायु।
  • इनमें पुन: ज्ञानेन्द्रियाँ पञ्चक सहित बुद्धि विज्ञानमयकोश कहलाते हैं। यह विज्ञानमयकोश ही लोक-लोकान्तर और देह-देहान्तर में चलता है और कर्तृत्व- भाक्तृत्व - सुखित्व - दुःखित्व अभिमानयुक्त होता है। विज्ञानमय कोश ही जीवपद वाच्य है। विज्ञानमय-प्राणमय-मनोमय ये तीन कोश मिलकर ही सूक्ष्म शरीर होते हैं।

 

सुमिलित तालिका इस प्रकार है - 

(A)एतान्याकाशादीनां सात्विकांशेभ्यो व्यस्तेभ्यः पृथक् पृथक् क्रमेणेत्पद्यन्ते(III)ज्ञानेन्द्रियाणि
(B)एते पुनराकाशादिगतसात्विकांशोभ्यो मिलितेभ्य उत्पद्यन्ते(I)मनबुद्धिचित्ताहंकाराः
(C)एतानि पुनराकाशादीनां रजोंऽशोभ्यो व्यस्तेभ्यः पृथक् पृथक् क्रमेणोत्पद्यन्ते(IV)कर्मेनान्द्रियाणि
(D)बुद्धिर्ज्ञानेन्द्रियैः सहिता भवति(II)विज्ञानमयकोशः

 

अतः स्पष्ट है, (A)- (III), (B)- (I), (C)- (IV), (D)- (II) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 90

महाभारतस्य टीकाकाराणां कया टिकया सह सम्बन्धः?

(A)विमलबोधः(I)ज्ञानदीपिका
(B)देवबोधः(II)लक्षाभरषटीका
(C)नारायणः(III)विषमश्लोकी
(D)वादिराजः(IV)निगूढार्थ-पदबोधिनी

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A)- (III), (B)- (I), (C)- (IV), (D)- (II)

  2. BOption (b)

    (A)- (I), (B)- (III), (C)- (II), (D)- (IV)

  3. COption (c)

    (A)- (II), (B)- (I), (C)- (III), (D)- (IV)

  4. DOption (d)

    (A)- (IV), (B)- (II), (C)- (I), (D)- (III)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(A)- (III), (B)- (I), (C)- (IV), (D)- (II)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : महाभारत के टीकाकारोंं का किस टीका के साथ संबंध है?

महाभारत की टीकाएँँ :

  1. ज्ञानदीपिका : लेखक - परमहंस परिव्राजकाचार्य देवबोध या देवस्वामी। यह महाभारत की सर्व प्रथम उपलब्ध टीका आदि, सभा, भीष्म तथा उद्योग पर्व पर प्रकाशित हो चुकी है। समय ई. 12 वीं शती के पूर्व /
  2. विषमश्लोकी : (या दुर्घटार्थ-प्रकाशिनी या दुर्बोदपदभंजिनी) लेखक - विमलबोध (ई.12 वीं शती) यह टीका अठारहों पर्वो पर उपलब्ध है। इसके कुछ अंश प्रकाशित हुए हैं।
  3. भारतार्थ-प्रकाश : लेखक - नारायण सर्वज्ञ। ई.12 वीं शती में इसकी रचना हुई है। इन्होंने मन्वर्थवृत्ति निबंध नामक मनुस्मृति की टीका भी लिखी है। इनकी विराट तथा उद्योग पर्व की टीका प्रकाशित है।
  4. भारतोपायप्रकाश : लेखक - चतुर्भुज मिश्र। ई.14 वीं शती में इसकी रचना हुई है। विराट पर्व की टीका प्रकाशित है।
  5. प्रक्रियामंजरी : लेखक - आनन्दपूर्ण (विद्यासागर)। ई.15 वीं शती में इसकी रचना हुई है। आदि, सभा, भीष्म, शान्ति, तथा अनुशासन इन पांच पर्वो की टीका उपलब्ध है। ये गोवानरेश कदंबवंशी कामदेव के आश्रित थे। इन्होंने महाभारत के प्राचीन टीकाकारों में अर्जुन, जगद्धर, जर्नादन, मुनि, लक्ष्मण (टीका विषमोद्धारिणी जो सभा तथा विराट पर्व पर उपलब्ध है) विद्यानिधि भट्ट तथा सृष्टिधर इनके नामों का निर्देश किया है।
  6. भारतार्थदीपिका (भारतसंग्रही दीपिका) : लेखक - अर्जुन मिश्र। बंगाल निवासी। ई.14 वीं शती में इसकी रचना हुई है। विराट तथा उद्योगपर्व की टीका प्रकाशित हुई हैं। इन्होंने प्राचीन टीकाकारों में देवबोध, विमलबोध, शाण्डिल्य तथा सूर्यनारायण का उल्लेख किया है।
  7. निगूढार्था पद्बोधिनी : लेखक - नारायण। ई.14 वीं शती में इसकी रचना हुई है।
  8. लक्षाभरण (लक्षालंकार) : लेखक - वादिराज। ई. 16 वीं शती में इसकी रचना हुई है। वे माध्वसंप्रदायी थे। विराट तथा उद्योग पर्व की टीका प्रकाशित है।
  9. भारतभावदीप : लेखक - नीलकण्ठ चतुर्धर (चौधरी)। कोपरगाव (ज़िला अहमदनगर, महाराष्ट्र) के निवासी। समय ई.17 वीं शती। काशी में लिखी गयी यह टीका संपूर्ण 18 पर्वो पर है। महाभारत की यह अंतिम एवं सर्वोकृष्ट टीका मानी जाती है। नीलकण्ठ के मन्त्ररामायण एवं मंत्रभागवत में रामायण तथा भागवत की कथा से संबंधित मंत्र ऋग्वेद से क्रमबद्ध संगृहीत हैं। इन टीकाओं के अतिरिक्त वैशम्पायन कृत शान्तिपर्व के मोक्षधर्म पर टीका उपलब्ध है।

 

अतः स्पष्ट है, (A)- (III), (B)- (I), (C)- (IV), (D)- (II) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 91

कालक्रमानुसारम् अधोलिखितवैयाकरणानां समुचितं क्रमं चिनुत-

(A) वरदराजः, भट्टोजिदीक्षितः, पतञ्जलिः, भर्तृहरिः

(B) भट्टोजिदीक्षितः, वरदराजः, पतञ्जलिः, भर्तृहरिः

(C) पतञ्जलिः, भट्टोजिदीक्षितः, भर्तृहरिः, वरदराजः 

(D) पतञ्जलिः, भर्तृहरिः, भट्टोजिदीक्षितः, वरदराजः 

अत्र समुचितं उत्तरं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A)

  2. BOption (b)

    (B)

  3. COption (c)

    (C)

  4. DOption (d)

    (D)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(D)

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद-  निम्नलिखितों आचार्यों का कालक्रम के अनुसार समुचित क्रम चुनें-

स्पष्टीकरण-  उपर दिए गए आचार्यों का कालक्रम के अनुसार समुचित क्रम है- पतञ्जलि, भर्तृहरि, भट्टोजिदीक्षित, वरदराज।

  1. पतञ्जलि- संस्कृत वैयाकरणाचार्यों में कालक्रम की दृष्टि से त्रिमुनियों में पाणिनि तथा कात्यायन के बाद महाभाष्यकार प्रणेता पतञ्जलि का वर्णन प्राप्त होता है। महाभाष्य में स्वयं के लिए पतञ्जलि ने  'गोनर्दीय' और 'गोणिकापुत्र' प्रयोग किया है। जिससे ज्ञात होता है कि ये गोनर्द (गोंडा-उत्तरप्रदेश) के निवासी थे तथा इनकी माता का नाम 'गोणिका' था। पतञ्जलि का काल 185 ई० पू० माना जाता है। महाभाष्य ग्रन्थ का विभाजन 84 आन्हिकों में हुआ है।
  2. भर्तृहरि- व्याकरण की त्रिमुनि परम्परा में पतञ्जलि के बाद कालक्रमानुसार वाक्यपदीयकार भर्तृहरि का समय और क्रम आता है। विद्वानों द्वारा पुष्ट प्रमाणों के आधार पर इनका काल 450-550 ई० माना गया है। इन्होंने पतञ्जलि के  महाभाष्य पर सर्वप्रथम 'दीपिका' टीका लिखी। अत: ये निश्चित ही पतञ्जलि के बाद के हैं।
  3. भट्टोजिदीक्षित- पाणिनीय व्याकरण परम्परा में त्रिमुनि परम्परा काल (600 ई०पू०-100 ई०पू०) तथा इनपर व्याख्या और टीकाकाल (100 ई०-1000 ई०) के बाद प्रक्रिया काल का प्रारंभ होता है। इस परम्परा में धर्मकीर्ति, विमालसरस्वती, रामचन्द्र के बाद भट्टोजिदीक्षित का नाम आता है। इनका काल 1530 ई०-1620 ई० के बीच एककण्ठ से स्वीकार किया जाता है। इनके ग्रन्थ हैं- वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी, प्रौढ़मनोरमा (वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी पर स्वयं के द्वारा कृत टीका), शब्दकौस्तुभ (पाणिनि पर टीका) तथा वैयाकरणसिद्धान्तकारिका (भूषणकारिका)।
  4. वरदराज- ये भट्टोजिदीक्षित के शिष्यों में एक थे। इनका काल 1600ई०-1630 ई० माना जाता है। वरदराज ने सिद्धान्तकौमुदी के तीन संक्षिप्त संस्करण निर्मित किये जो प्रक्रिया-पद्धति के प्रवेशद्वार माने जाते हैं- सारसिद्धान्तकौमुदी, मध्यसिद्धान्तकौमुदी, तथा लघुसिद्धान्तकौमुदी। ये ग्रंथ क्रमशः बड़े होते गए हैं। इनमें लघुकौमुदी पाणिनीय व्याकरण की आरम्भिक शिक्षा के लिए सर्वप्रचलित ग्रंथ।

Hint

  • पतञ्जलि -  185 ई० पू०
  • भर्तृहरि - 450-550 ई०
  • भट्टोजिदीक्षित - 1530 ई०-1620 ई०
  • वरदराज - 1600ई०-1630 ई०

Question 92

अभिकथनम् (A)- तिब्बतीभाषा योगात्मिका भाषा।

कारणम् (R)- प्रकृतिप्रत्यययोः संयोगात्

उपर्युक्त अभिकथनं (A) तथा कारणं (R) चाश्रित्य समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    अभिकथनम् (A) कारणम् (R) उभयं असत्यम्

  2. BOption (b)

    अभिकथनम् (A) कारणम् (R) उभयं सत्यम्

  3. COption (c)

    अभिकथनम् (A) सत्यम् तथा कारणम् (R) असत्यम्

  4. DOption (d)

    अभिकथनम् (A) असत्यम् तथा कारणम् (R) सत्यम्

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Correct answer

Answer: (d)D.

अभिकथनम् (A) असत्यम् तथा कारणम् (R) सत्यम्

Why this answer is correct

प्रश्नानुवाद - अभिकथन (A) - तिब्बती भाषा योगात्मिका भाषा है।

कारण (R) - प्रकृति-प्रत्ययों का संयोग होने से।

स्पष्टीकरण -

अभिकथन - तिब्बती भाषा योगात्मिका भाषा है। - यह कथन असंगत/असत्य है।

कारण - प्रकृति-प्रत्ययों का संयोग होने से। (यह कथन संगत है, क्योंकि जिस भाषा में प्रकृति-प्रत्ययों का संयोग होता है, वह योगात्मिका भाषा होती है। परन्तु तिब्बती भाषा अयोगात्मिका भाषा है।

भाषाओं के रूपतत्व के वर्गीकरण के अनुसार भाषा मुख्यतया दो प्रकार की होती है। 1. अयोगात्मिका 2. योगात्मिका।

  1. अयोगात्मिका भाषा - जिस भाषा में वाक्यों का विघटन करने पर पदों के मध्य प्रकृति-प्रत्ययादि, विभक्ति का आश्रय नहीं होता है, उसे अयोगात्मिका भाषा कहते हैं। यहाँ भाषा मूल रूप में ही होती है। शब्द के आरम्भ, मध्य या अन्त में प्रत्ययादि के योग से शब्दों में कोई विकार नहीं होता है। जैसे - चीनी, तिब्बती भाषा। इन भाषाओं में वाक्यों में आये पदों की सत्ता स्वतन्त्र होती है। इस भाषा में प्रत्येक पद स्वतन्त्र होता है। किन्तु किसी भी शब्द में योग नहीं होता है।
  • अयोगात्मिका भाषाओं में चीनी भाषा - स्थान और स्वर प्रधान है। सुडानी भाषा स्थान प्रधान है। बर्मी और तिब्बती भाषा निपात प्रधान होती है।
  1. योगात्मिका भाषा - जिस भाषा में शब्द की नाम प्रकृति और धातु प्रकृति का योग सम्पर्क प्रत्यय और विभक्ति द्वारा होता है। वह भाषा योगात्मिका/समवायिनी भाषा होती है। ऐसी भाषा में अर्थ तत्व और सम्बन्ध तत्व के साथ योग होता है और योग से शब्द की नाम प्रकृति और धातु प्रकृति का रूपान्तर होता है। संस्कृत भाषा योगात्मिका भाषा है। संस्कृत भाषा में हस्तेन पुस्तकं गृह्णाति इस वाक्य में हस्तेन पद में हस्त मूल शब्द में टा प्रत्यय का योग होने से हस्तेन सिद्ध हुआ। हस्तेन यह पद हस्त इस मूल शब्द का विकृत रूप है। इस संसार में योगात्मिका भाषा की बहुलता देखी जाती है। जैसे - ग्रीक, लातिन, तुर्की, आरबी भाषा योगात्मिका भाषा है।

इस तरह स्पष्ट है कि जिस भाषा के मूल शब्दों मेंं प्रत्यय इत्यादि लगने पर उसका मूल रूप परिवर्तित हो जाता है। वह योगात्मिका भाषा होती है।

अतः स्पष्ट है कि यहाँ अभिकथन असत्य है, जबकि कारण सत्य है। क्योंकि योगात्मिका भाषा में प्रकृति-प्रत्यय होते हैं।

Question 93

"अहिंसा सत्यं शौचमनसूयाऽऽनृशंस्यं क्षमा च" इति कौटिलीयमते केषां धर्मः?

(A) सर्वेषामाश्रमाणाम्

(B) सर्वेषां वर्णाणाम्

(C) सर्वेषां प्राणिनाम्

(D) सर्वेषां सम्प्रदायानाम्

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) एवम् (B)

  2. BOption (b)

    (B) एवम् (C)

  3. COption (c)

    (C) एवम् (D)

  4. DOption (d)

    (D) एवम् (A)

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Correct answer

Answer: (a)A.

(A) एवम् (B)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : "अहिंसा सत्यं शौचमनसूयाऽऽनृशंस्यं क्षमा च" यह कौटिलीय मत के अनुसार किनका धर्म है?

कौटिलीय अर्थशास्त्र :

कौटिलीय अर्थशास्त्र प्राचीन भारतीय राजनीति का प्रसिद्ध ग्रंथ है, जिसके रचनाकार विख्यात अर्थशास्त्रज्ञ आचार्य चाणक्य हैंं। इस ग्रंथ का स्वरूप इस प्रकार है - 

  • कौटिलीय अर्थशास्त्र की शैली उपदेशात्मक और सलाहात्मक है।
  • इसमें न केवल धर्म, अर्थ और काम का प्रणयन और पालन के बारे में कहा है, पर अधर्म, अनर्थ तथा अवाञ्छनीय के शमन का भी विधान किया है।
  • आचार्य चाणक्य ने चंद्रगुप्त के प्रशासकीय उपयोग के लिए इस ग्रंथ की रचना की थी।
  • कौटिलीय अर्थशास्त्र में १५ अधिकरण, १५० अध्याय, १८० उपविभाग तथा ६००० श्लोक हैंं।
  • प्राचीन अर्थशास्त्रज्ञोंं का भी नामनिर्देश इस ग्रंथ में आता है।  1.3.13​

कौटिलीय मत के अनुसार सामान्य धर्म :

कौटिल्य ने सभी वर्ण और आश्रम के धर्म इस प्रकार कहेंं हैंं - 

  • ब्राह्मण - वर्ण 
  • अध्ययन, अध्यापन, यज्ञ करना और करवाना, दान देना और लेना
  • क्षत्रिय - वर्ण
  • अध्ययन, यज्ञ करवाना, दान देना, शस्त्र द्वारा जीविका अर्जित करना, राज्य के समस्त लोगों/प्राणियों की रक्षा करना
  • वैश्य - वर्ण
  • अध्ययन, यज्ञ करवाना, दान देना, कृषि एवं पशुपालन, व्यापार
  • शूद्र - वर्ण
  • द्विजाति सुश्रुषा (ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य से सीखना), वार्त्ता, कारूकुशीलवकर्म (प्रदर्शन/अप्रदर्शन कला से संबंधित कार्य)
  • ब्रह्मचर्याश्रम
  • अध्ययन, यज्ञ-होम आदि कार्य, भिक्षा द्वारा जीवनयापन, योग्य शिक्षक या उनके पुत्र/ शिष्य द्वारा प्रशिक्षण (ब्रह्मचारी जीवन पूर्ण होने तक)
  • गृहस्थाश्रम
  • कर्त्तव्यानुसार उपार्जन एवं जीवन यापन करना, समान वर्ण परंतु असमान गोत्र में विवाह करना, संतान उत्पत्ति, देव-देवताओं एवं पूर्वजों की पूजा करना एवं उनका आदर करना, भगवान, पूर्वज एवं आश्रितों को भोजन देने के बाद ही भोजन ग्रहण करना
  • वानप्रस्थाश्रम 
  • ब्रह्मचर्यम् (अनासक्ति), भूमि पर सोना, शिखा रखना एवं चर्म धारण करना, यज्ञ-होम आदि करना, देवी देवताओं एवं पूर्वजों का आदर करना, कंद-मूल-फल आदि खाना
  • संन्यासाश्रम
  • संयतइन्द्रियत्त्वम् (इंद्रियों पर नियंत्रण), अनारम्भ (निष्क्रिय जीवन), निष्किञ्चनत्त्वम् (सांसारिक वस्तुओं से मुक्ति), सङ्गत्यागः (सङ्गत्याग), भैक्षव्रतम् (मांग कर भोजन करना), अरण्यवास (जंगल में रहना), शौचम् (बाह्य-अभ्यंतर स्वच्छता)

सारे वर्ण और आश्रम के लिये कौटिल्य ने सामान्य धर्म बताए हैं, वे हैं -

  • अहिंसा
  • सत्य
  • शौच (बाह्य-अभ्यंतर स्वच्छता)
  • अनसूया (ईर्ष्या से मुक्ति)
  • अनृशंस्यम् (करुणा) और
  • क्षमा

 

अतः स्पष्ट है, सर्वेषामाश्रमाणाम्  तथा सर्वेषां वर्णाणाम्  यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 94

अधोस्तनयुग्मानां समीचीनां तालिकां चिनुत-

(A)शमप्रधानेषु तपोधनेषु गूढं हि दाहात्मकमस्ति तेजः।(I)नलचम्पूः
(B)आनीय झटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः।(II)नैषधीयचरितम्
(C)अक्षमालापवृत्तिज्ञा कुशासनपरिग्रहा ब्राह्मीव दौर्जनी संसद्वन्दनीया समेखला।(III)रत्नावली
(D)अदृष्टमप्यर्थमदृष्टवैभवात्करोति सुप्तिर्जन दर्शनातिथ��म्।(IV)अभिज्ञानशाकुन्तलम्

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A)- (II), (B)- (I), (C)- (III), (D)- (IV)

  2. BOption (b)

    (A)- (I), (B)- (II), (C)- (IV), (D)- (III)

  3. COption (c)

    (A)- (III), (B)- (II), (C)- (IV), (D)- (I)

  4. DOption (d)

    (A)- (IV), (B)- (III), (C)- (II), (D)- (I)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(A)- (IV), (B)- (III), (C)- (II), (D)- (I)

Why this answer is correct

प्रश्न का हिंदी भाषांतर : समीचीन तालिका का चयन कीजिए।

स्पष्टीकरण : 

शमप्रधानेषु तपोधनेषु गूढं हि दाहात्मकमस्ति तेजः।

स्पर्शानुकूला इव सूर्यकान्ता- स्तदन्यतेजोऽभिभवाद् वमन्ति।। (अभिज्ञानशाकुन्तलम्)

  • अर्थ : तपस्वी सांसारिक प्रपंचो से मुक्त एवं अनासक्त रहते है, उनका चित्त शांत रहता है। तथापि वे गुप्त तेज से युक्त होते है। इस कारण वे किसी के द्वारा तिरस्कृत होने पर इस गुप्त तेज को प्रकट करते है। बिल्कुल उसी प्रकार जिस प्रकार सूर्यकांत मणि स्वयं तेज से युक्त होने के बावजूद सूर्य के तेज से प्रदीप्त होता है, उसी प्रकार तपस्वी अपने तिरस्कार का बदला के लिए के अपनी संत प्रवृत्ति का परित्याग करके अपने तेज को प्रकट करके अपने अपमान का बदला लेते हैं।

द्वीपादन्स्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात्।

आनीय झटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः।। (रत्नावली)

  • अर्थ : पक्ष में होने पर भाग्य दूसरे द्वीप से भी, समुद्र के मध्य से भी, दिशाओंं के अंत भाग से भी, अभीष्ट को शीघ्र ला कर मिला ही देता ही है।

अक्षमालापवृत्तिज्ञा कुशासनपरिग्रहा।

ब्राह्मीव दौर्जनी संसद्वन्दनीया समेखला।। (नलचम्पू)

मनोरथेन स्वपतीकृतं नलं निशि क्व सा ना स्वपती स्म पश्यति।

अदृष्टमप्यर्थमदृष्टवैभवात्करोति सुप्तिर्जन दर्शनातिथिम्*।।* (नैषधीयचरितम्)

  • अर्थ : निद्रा से मुंदे दोनों नेत्रों और बाहरी इन्द्रियों कि निष्क्रियता के कारण निष्क्रिय मन से भी छिपाकर भी कभी न देखा हुआ वह पृथ्वीपति, जो इसी कारण दमयन्ती के लिए एक बड़ा रहस्य था, उसे निद्रा ने दिखा दिया।

 

अतः स्पष्ट है, (A)- (IV), (B)- (III), (C)- (I), (D)- (II) यह इस प्रश्न का सही उत्तर है।

Question 95

अधोलिखितानां कालक्रमानुसारं समुचितं क्रमं चिनुत-

(A) गोपथब्राह्मणम्

(B) अथर्ववेदः

(C) ऐतेरेय-ब्राह्मणम् 

(D) ऋग्वेदः

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A), (B), (C), (D)

  2. BOption (b)

    (B), (C), (D), (A)

  3. COption (c)

    (C), (A), (B), (D)

  4. DOption (d)

    (D), (B), (C), (A)

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Correct answer

Answer: (d)D.

(D), (B), (C), (A)

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प्रश्नानुवाद- निम्नलिखितों का कालक्रम के अनुसार समुचित क्रम है-

स्पष्टीकरण- उपरि लिखितों का कालक्रम के अनुसार समुचित क्रम है- ऋग्वेद, अथर्वेद, ऐतरेय ब्राह्मण, गोपथ ब्राह्मण।

वैदिक वाङ्मय को चार भागों में विभाजित गया है- संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्। यह विभाजन वस्तुतः कालक्रम के अनुसार ही है। संहिताओं का क्रम इस प्रकार है- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद। इसी क्रम के अनुसार अन्य वेद भाग भी हैं। अर्थात् ब्राह्मण आदि में भी वेदों के अनुसार क्रम आएगा, जैसे- ऋग्वेद का ऐतरेय ब्राह्मण, यजुर्वेद का शतपथ ब्राह्मण आदि, सामवेद का पंचविंश आदि तथा अथर्ववेद का गोपथ ब्राह्मण।

  1. ऋग्वेद- चारों वेदों में ऋग्वेद सबसे प्राचीन माना गया है। ऋक् या ऋच् का अर्थ है स्तुतिपरक मंत्र- ‘ऋच्यते स्तूयते अनया इति ऋक्’। जिन मंत्रों के द्वारा देवों की स्तुति की जाती है, उन्हें ऋक् कहते हैं। ऋग्वेद में विभिन्न देवों की स्तुति वाले मंत्र हैं। इसका विभाजन दश मण्डलों में हुआ है। इसमें 1028 सूक्त तथा 10580 मन्त्र हैं। इसकी पाँच शाखाएँ हैं- शाकल, बाष्कल, आश्वलायन, शांखायन, माण्डूकायन।
  2. अथर्ववेद- यह चारों वेदों में सबसे अर्वाचीन माना गया है। योग साधना, चित्तवृत्तिनिरोध, ब्रह्म की प्राप्ति आदि इसके विषय हैं। इसके कई अपर नाम हैं- ब्रह्मवेद, भैषज्यवेद, महीवेद, अंगिरसवेद, क्षात्रवेद। इसका विभाजन 20 काण्डों में हुआ है। इसमें 730 सूक्त तथा 5987 मन्त्र हैं। इसकी 9 शाखाएँ है- पैप्लाद, तौद, मौद, शौनकीय, जाजल, जलद, ब्रह्मवेद, देवदर्श, चारणवेद।
  3. ऐतरेय ब्राह्मण- इसके रचयिता महिदास ऐतरेय हैं। इसमें 40 अध्याय 8 पंचिकाएँ तथा 285 खण्ड हैं। इस ब्राह्मण में होता विषयक मीमांसा की गयी है।
  4. गोपथ ब्राह्मण- यह ब्राह्मण पेप्लाद शाखा से सम्बंधित है। इसमें याग मीमांसा, ब्रह्म की श्रेष्ठता, ब्रह्मचारी के कर्तव्य, ज्योतिष आदि का वर्णन है।

Question 96

अत्र कथनद्वयम्-

तत्र एकम् अभिकथनम् (A), अपरञ्च तस्य कारणम् (R) इति।

अभिकथनम् (A)- न्यायदर्शनरीत्या आत्मत्वसामान्यवान् आत्मा इति।

कारणम् (R)- बुद्धि-सुख-दुःख-इच्छा-द्वेष-प्रयत्नगुणलिङ्गकत्वात्।

उपर्युक्त अभिकथनं कारणाञ्चाश्रित्य समुचितं विकल्पं चिनुत-

  1. AOption (a)

    (A) तथा उभयं (R) सत्यमस्ति (A) इत्यस्य (R) इति उचितं कारणम्

  2. BOption (b)

    (A) तथा (R) उभावपि असमीचीनौ

  3. COption (c)

    (A) तथा (R) उभावपि समीचीनौ, परं (A) इत्यस्य (R) इति समुचितं कारणम् नास्ति

  4. DOption (d)

    (A) इति असमीचीनं, परं (R) इति समीचीनम्

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Correct answer

Answer: (a)A.

(A) तथा उभयं (R) सत्यमस्ति (A) इत्यस्य (R) इति उचितं कारणम्

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प्रश्नानुवाद- अभिकथन (A)- न्याय दर्शन के अनुसार, वह जो आत्मत्व जाति से युक्त है, आत्मा है।

कारण (R)- उस आत्मा में बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष तथा प्रयत्न गुण होने के कारण से ।

स्पष्टीकरण- अभिकथन- न्याय दर्शन के अनुसार, वह जो आत्मत्व जाति से युक्त है, आत्मा है। यह कथन सत्य है।

कारण- उस आत्मा में बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष तथा प्रयत्न आदि गुण होने के कारण से। यह कथन सत्य है। 

  • यह प्रसंग न्याय दर्शन के प्रकरण ग्रंथ केशवमिश्र प्रणीत तर्कभाषा से है। इसमें आत्मा को 12 प्रमेयों में सबसे पहले पढ़ा गया है।
  • केशवमिश्र के अनुसार ‘तत्रात्मसामान्यवानात्मा’ अर्थात् उन प्रमेयों में आत्मत्व जाति जिसमें है वह आत्मा है। यह मानस प्रत्यक्ष का विषय है।
  • उसकी प्रत्यक्षगम्यता पर मतभेद होने पर उसे बुद्धि आदि गुणलिंगक बताते हुए अनुमानगम्य बताते है और उससे अर्थात् अनुमान से आत्मा की सिद्धि करते है। चूँकि उस आत्मा में बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष तथा प्रयत्न आदि गुण रहते है इसलिए, इन गुणों के आत्मा की सिद्धि होती है।

 

इस प्रकार प्रस्तुत अभिकथन तथा कारण सत्य है तथा अभिकथन का कारण भी समीचीन है। अत: विकल्प 1 सही है।

Question 97

अधोऽङ्कितेषु कोऽर्थापत्तिप्रमाणं स्वीकरोति?

  1. AOption (a)

    चार्वाकदर्शनम्

  2. BOption (b)

    जैनदर्शनम्

  3. COption (c)

    योगदर्शनम्

  4. DOption (d)

    मीमांसादर्शनम्

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Correct answer

Answer: (d)D.

मीमांसादर्शनम्

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प्रश्नानुवाद- निम्नलिखित में से कौन अर्थापत्ति प्रमाण स्वीकार करता है?

स्पष्टीकरण- मीमांसा दर्शन अर्थापत्ति प्रमाण स्वीकार करता है।

मीमांसा दर्शन- मीमांसा दर्शन भारतीय षड् आस्तिको दर्शनों में से एक है। इस दर्शन के प्रवर्तक जैमिनि है।

  • जैमिनि द्वारा रचित मीमांसासूत्र इस दर्शन का सर्वप्रमुख ग्रन्थ है।
  • यह पूर्णतः वेदवादी दर्शन है। यह वैदिक कर्मकांड की व्याख्या करता है।
  • मीमांसा दर्शन में दो प्रमुख मत हैं- प्रभाकर मत तथा भाट्ट मत।
  • प्रभाकर मत के अनुयायी पाँच प्रमाणों को मानते हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति।
  • भाट्ट मत के अनुयायी छह प्रमाणों को मानते हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति, आभाव।

Important Points

अर्थापत्ति प्रमाण- मीमांसा दर्शन में अर्थापत्ति को पाँचवें प्रमाण के रूप में माना गया है। यह दो शब्द ‘अर्थ’ और ‘आपत्ति’, से मिलकर बना है, जिनका अर्थ क्रमश: ‘विषय’ और ‘कल्पना’ है। अतः अर्थापत्ति का अर्थ है- ‘किसी विषय की कल्पना करना’।

  • जब ऐसी कोई घटना देखने में आती है जिसको समझने में में कुछ विरोध प्रतीत होता है तो उस विरोध की व्याख्या के लिए कोई आवश्यक कल्पना की जाती है।
  • उदाहरणार्थ, पीनो देवदत्तः दिवा न भुंक्ते (मोटा देवदत्त दिन में नहीं खाता है।)। यहाँ देवदत्त के उपवास और मोटापे विरोध प्रतीत होता है।
  • इस विरोध की व्याख्या के लिए यह कल्पना की जाती है वह अवश्य ही रात में खाता होगा।
  • अतः इस अदृष्ट विषय की कल्पना में अर्थापत्ति प्रमाण साधनभूत बनता है।

टिप्स

अन्य दर्शनों द्वारा स्वीकृत प्रमाण निम्नलिखित हैं- 

  1. सांख्य- प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द,
  2. योग- प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द,
  3. न्याय- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द,
  4. वैशेषिक- प्रत्यक्ष, अनुमान
  5. वेदान्त- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति, आभाव

Question 98

शांखायनारण्यकः अधोनिर्दिष्टेषु केन सह सम्बद्धोऽस्ति?

  1. AOption (a)

    सामवेदेन सह

  2. BOption (b)

    यजुर्वेदेन सह

  3. COption (c)

    अथर्ववेदेन सह

  4. DOption (d)

    ऋग्वेदेन सह

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Correct answer

Answer: (d)D.

ऋग्वेदेन सह

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प्रश्नानुवाद - शांखायन आरण्यक निम्नलिखत में से किस वेद से सम्बंधित है।

स्पष्टीकरण - शांखायन आरण्यक ऋग्वेद से सम्बंधित है।

वेदों के मंत्रो के व्याख्या के क्रम में आरण्यक ग्रंथो का विकास ब्राह्मण ग्रथों के पश्चात हुआ। आरयण्क शब्द 'आरण्य' से बना है जिसका अर्थ है वन। 'अरण्ये भवम् आरण्यम्' - अर्थात् वन में होने वाला । सायण के अनुसार- 'आरण्याध्ययनादेतदारण्यकमितीर्यते' अर्थात् 'वन में निर्जन शान्त स्थान में अध्ययन के योग्य' होने से इन वैदिक ग्रन्थों को 'आरण्यक' कहा गया। 

वन में निवास करने वाले वानप्रस्थ आश्रम के लोगों के लिए ये उपादेय ग्रन्थ हैं। आरण्यकों का प्रतिपाद्य यज्ञों में निहित आध्यात्मिक विषयों का विवेचन है, इनका लक्ष्य चिंन्तन है, कर्ममार्ग से ज्ञानमार्ग को प्राप्त करने के ये सुदृढ़ सोपान हैं। आरण्यक गद्यात्मक हैं किन्तु कहीं कहीं इनमें पद्य भी मिलते हैं।

Important Points 

शांखायन आरण्यकः - यह ऋग्वेदीय आरण्यक है। इसे 'कौषीतकि आरण्यक' भी कहते है। इसमें 15 अध्याय हैं। अध्याय 3 से 6 तक को 'कौषीतकि उपनिषद्' कहते है। अध्याय 7 से 8 तक 'सहिंता उपनिषद्' कहलाता है। शांखायन आरण्यक का अध्यायानुसार विषय-वस्तु निम्नलिखित है-

  • अध्याय 1 से 2 - इनमें ऐतरेय आरण्यक के तुल्य महाव्रत का वर्णन है।
  • अध्याय 3 से 6 - कौषीतिकी उपनिषद् कहलाता है, इसका विवरण उपनिषद् प्रकरण में है।
  • अध्याय 7 से 8 - संहिता उपनिषद् कहलाता है, इसका विवरण भी उपनिषद् प्रकरण में है।
  • अध्याय 9 - इसमें प्राण की श्रेष्ठा का वर्णन है।
  • अध्याय 10 - इसमें आध्यात्मिक अग्निहोत्र का सांगोपांग वर्णन है।
  • अध्याय 11 - इसमें मृत्यु के निराकरण के लिए एक विशेष याग का विधान है।
  • अध्याय 12 - इसमें समृद्धि के लिए बेल के फल से एक मणि बनाने का वर्णन है।
  • अध्याय 13 - इसमें श्रवण-मनन आदि के लिए शरीर-शुद्धि, तपस्या, श्रद्धा और दम आदि की आवश्यकता का वर्णन किया गया है।
  • अध्याय 14 - इसमें 'अहं ब्रह्मास्मि 'और वेदों के अर्थज्ञान का महत्व बताया गया है।
  • अध्याय 15 - इसमें आचार्यों की वंश-परंपरा दी गई है।

अतिरिक्त जानकारी 

सभी वेदों के आरण्यक निम्नलिखित है-           

वेदआरण्यक
ऋग्वेदऐतरेय, शांखायन
शुक्ल यजुर्वेदबृहदारण्यक
कृष्ण यजुर्वेदतैत्तरीय
सामवेदतवलकार (जैमिनीयोपनिषद्)
अथर्वेदकोई नहीं

Question 99

वैशेषिकदर्शनानुसारं निम्नाङ्कितानां समुचितः क्रमोऽस्ति?

(A) अभावः

(B) विशेषः

(C) कर्म

(D) सामान्यम्

(E) समवायः

अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत:

  1. AOption (a)

    (D), (B), (C), (A), (E)

  2. BOption (b)

    (C), (D), (B), (E), (A)

  3. COption (c)

    (A), (C), (D), (B), (E)

  4. DOption (d)

    (A), (B), (C), (D), (E)

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Correct answer

Answer: (b)B.

(C), (D), (B), (E), (A)

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प्रश्नानुवाद-  वैशेषिक दर्शन के अनुसार निम्नलिखितों का समुचित क्रम है?

स्पष्टीकरण- वैशेषिक दर्शन के अनुसार समुचित क्रम है- कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, अभाव।

वैशेषिक दर्शन भारतीय आस्तिक दर्शनों में से एक है। इसके प्रवर्तक महर्षि कणाद हैं। इस दर्शन को औलूक्य दर्शन भी कहा जाता है। वैशेषिकदर्शन दो प्रमाण स्वीकार करता है- प्रत्यक्ष तथा अनुमान। वैशेषिक दर्शन का प्रकरण ग्रंथ अन्नम्भट्ट विरचित तर्कसंग्रह है। इसमे सात पदार्थों का निरूपण किया गया है- द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाभावाः सप्तपदार्थाः। इनका निरूपण निम्नवत् है- 

  1. द्रव्य-  द्रव्य जिसमें ‘द्रव्यत्व जाति’ हो वही द्रव्य है। कार्य के समवायिकरण को द्रव्य कहते हैं। द्रव्य गुणों का आश्रय है। पृथ्वी, जल, तेजस, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा तथा मनस् ये नौ द्रव्य कहलाते हैं। इनमें से प्रथम चार द्रव्यों के नित्य और अनित्य, दो भेद हैं। नित्यरूप को ‘परमाणु’ तथा अनित्य रूप को कार्य कहते हैं। चारों भूतों के उस हिस्से को ‘परमाणु’ कहते हैं जिसका पुन: भाग न किया जा सके, अतएव यह नित्य है। पृथ्वीपरमाणु के अतिरिक्त अन्य परमाणुओं के गुण भी नित्य है।
  2. गुण- गुण कार्य का असमवायीकरण गुण है। रूप, रस, गंध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, शब्द, ज्ञान, सुख, दु:ख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म अधर्म तथा संस्कार ये चौबीस गुण के भेद हैं। गुण द्रव्यों में ही रहते हैं।
  3. कर्म- कर्म क्रिया को कहते हैं। ऊपर फेंकना, नीचे फेंकना, सिकुड़ना, फैलाना तथा (अन्य प्रकार के) गमन, जैसे भ्रमण, स्पंदन, रेचन, आदि, ये पाँच "कर्म" के भेद हैं। कर्म द्रव्य ही में रहता है।
  4. सामान्य- जो पदार्थ एक होकर अनेकों पदार्थों में रहता है वह सामान्य है। यह नित्य है और द्रव्य, गुण तथा कर्म में रहता है। अधिक स्थान में रहनेवाला सामान्य ‘परसामान्य’ या ‘सत्तासामान्य’ कहा जाता है। सत्तासामान्य द्रव्य, गुण तथा कर्म इन तीनों में रहता है। प्रत्येक वस्तु में रहनेवाला तथा अव्यापक जो सामान्य हो, वह ‘अपर सामान्य’ या ‘सामान्य विशेष’ कहा जाता है।
  5. विशेष- विशेष द्रव्यों के अंतिम विभाग में रहनेवाला तथा नित्य द्रव्यों में रहनेवाला विशेष कहलाता है। नित्य द्रव्यों में परस्पर भेद करनेवाला एकमात्र यही पदार्थ है। यह अनंत है।
  6. समवाय- समवाय एक प्रकार का संबंध है, जो अवयव और अवयवी, गुण और गुणी, क्रिया और क्रियावान् जाति और व्यक्ति तथा विशेष और नित्य द्रव्य के बीच रता है। वह एक है और नित्य भी है।
  7. अभाव- किसी वस्तु का न होना, उस वस्तु का अभाव कहा जाता है। इसके चार भेद हैं - ‘प्राग् अभाव’ कार्य उत्पन्न होन के पहले कारण में उस कर्य का न रहना, ‘प्रध्वंस अभाव’ कार्य के नाश होने पर उस कार्य का न रहना, ‘अत्यंत अभाव’ तीनों कालों में जिसका सर्वथा अभाव हो, जैसे वंध्या का पुत्र तथा ‘अन्योन्य अभाव’ परस्पर अभाव, जैसे घट में पट का न होना तथा पट में घट का न होना।

Question 100

सम्पूर्णम्-इन्द्र-सूक्तम् अधोलिखितेषु कतमेन छन्दसा ग्रथितमस्ति?

  1. AOption (a)

    जगती-छन्दसा

  2. BOption (b)

    अनुष्टुप्-छन्दसा

  3. COption (c)

    त्रिष्टुप्-छन्दसा

  4. DOption (d)

    गायत्री-छन्दसा

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Correct answer

Answer: (c)C.

त्रिष्टुप्-छन्दसा

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प्रश्नानुवाद - सम्पूर्ण इन्द्रसूक्त निम्नलिखित में से किस छन्द में ग्रथित है।

स्पष्टीकरण - सम्पूर्ण इन्द्रसूक्त त्रिष्टुप् छन्द में ग्रथित है।

छन्द - संस्कृत शास्त्रों में छन्द शास्त्र का प्रमुख स्थान है। इनके महत्व के कारण इन्हें षड् वेदांगो में परिगणित किया जाता है। ‘छन्द: पादौ तु वेदस्य’ अर्थात् छन्दों को वेदपुरुष का पैर कहा जाता है। यतोहि छन्दों से ही वेदों का ज्ञान गतिमन होता है। यास्क के अनुसार छन्दस् (छन्द) का निर्वाचन दिया है 'छन्दांसि छादनात्' अर्थात् छन्द भावों को आच्छादित करके उसे समष्टिरूप प्रदान करता है। जिसके कारण छन्द गेय और सुपाठ्य हो जाते है। कात्यायन के अनुसार - यदक्षरपरिमाणं  तच्छन्दः। जिसमें वर्णों या अक्षरों की संख्या निर्धारित होती है ,उसे छन्द कहते हैं। इस वेदांग का प्रतिनिधि ग्रन्थ ‘छन्द सूत्र’ है , जिसके आचार्य पिङ्गल मुनि है। जिसमे वैदिक छन्दो के लक्षण दिए गए है। छन्द वैदिक तथा लौकिक दोनों प्रकार के होते है।

त्रिष्टुप् छन्द - इसमें 11 अक्षर वाले 4 पाद होते हैं। 4 या 5 अक्षर के बाद यति होती है। दो पाद के बाद पूर्वार्ध और शेष दो पाद के बाद उत्तरार्ध पूर्ण होता है। ऋग्वेद में यह अधिक मन्त्रों में प्रयुक्त हुआ है। इसमें प्रथम विराम 4 या 5 पर,  दूसरा 7 पर और तीसरा 11 वे अक्षर पर होता है। 

अतिरिक्त जानकारी

प्रमुख सात वैदिक छंन्दों की वर्ण संख्या निम्नवत् है - 

छंदवर्ण
गायत्री24
उष्णिक्28
अनुष्टुप्32
बृहती36
पंक्ति40
त्रिष्टुप्44
जगती48

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