निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर पाँच प्रश्न दिए गए हैं। गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़ें तथा प्रत्येक प्रश्न के चार विकल्पों में से सही विकल्प चुनें।
पानी की समस्या आज भारत के कई हिस्सों में विकराल रूप धारण कर चुकी है और इस बात को लेकर कई चर्चाएँ भी हो रही हैं। इस समस्या से जूझने के कई प्रस्ताव भी सामने आए हैं और उनमें से एक है नदियों को जोड़ना। लेकिन यह काम बहुत महँगा और बृहद स्तर का है, साथ ही पर्यावरण की दृष्टि से काफ़ी ख़तरनाक साबित हो सकता है, जिसके विरुद्ध काफी प्रतिक्रियाएँ भी हुई हैं। कहावत है बूँद बूँद से सागर भरता है, यदि इस कहावत को अक्षरशः सत्य माना जाए तो छोटे-छोटे प्रयास एक दिन काफी बड़े समाधान में परिवर्तित हो सकते हैं। इसी तरह से पानी को बचाने के कुछ प्रयासों में एक उत्तम व नायाब तरीका है आकाश से बारिश के रूप में गिरे हुए पानी को बर्बाद होने से बचाना और उसका संरक्षण करना। शायद ज़मीनी नदियों को जोड़ने की अपेक्षा आकाश में बह रही गंगा को जोड़ना ज़्यादा आसान है।
यदि पानी का संरक्षण एक दिन शहरी नागरिकों के लिए अहम मुद्दा बनता है तो निश्चित ही इसमें तमिलनाडु का नाम सबसे आगे होगा। लंबे समय से तमिलनाडु में ठेकेदारों और भवन निर्माताओं के लिए नए मकानों की छत पर वर्षा के जल संरक्षण के लिए इंतज़ाम करना आवश्यक है पर पिछले कुछ सालों से गंभीर सूखे से जूझने के बाद तमिलनाडु सरकार इस मामले में और भी प्रयत्नशील हो गई है और उसने एक आदेश जारी किया है जिसके तहत तीन महीनों के अंदर सारे शहरी मकानों और भवनों की छतों पर वर्षा जल संरक्षण संयंत्रों (वजस) का लगाना अनिवार्य हो गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि सारे सरकारी भवनों को इसका पालन करना पड़ा। पूरे राज्य में इस बात को व्यापक रूप से प्रचारित किया गया। नौकरशाहों को वर्षा जल संरक्षण संयंत्रो को प्राथमिकता देने के लिए कहा गया। यह चेतावनी भी दी गई कि यदि नियत तिथि तक इस आदेश का पालन नहीं किया जाता तो सरकार द्वारा उन्हें दी गई सेवाएँ समाप्त कर दी जाएँगी, साथ ही दंड स्वरूप नौकरशाहों के पैसे से ही इन संयंत्रो को चालू करवाया जाएगा। इन सबके चलते सबकुछ तेज़ी से होने लगा।
वर्षा जल को बचाने के कई पुराने व सस्ते किंतु निष्क्रिय तरीके हैं। पहले भारत के गाँवों में तालाब हुआ करते थे। राजीव गांधी ग्राम पेयजल योजना सराहनीय थी लेकिन जैसे शहरों में गाय के थन और दूध का संपर्क टूट गया वैसे ही इस योजना ने तालाबों और जलापूर्ति के बीच का संपर्क तोड़ दिया। इस योजना के कारण लोग पंचायत और विकास अफ़सर अपनी-अपनी व्यक्तिगत स्तर की पानी के प्रबंधन संबंधी ज़िम्मेदारियों से विमुख होने लगे। लोगों का विश्वास था कि जैसे प्लास्टिक के पैकेट में दूध मिलता है वैसे ही ट्यूबवेल पानी की आपूर्ति करेंगे। इस कारण तालाबों को अनदेखा किया गया और उनके ऊपर मिट्टी और रेत जमा होती गई।
पानी की समस्याओं का निवारण करने के लिए केवल कुछ अनुकरणीय उदाहरणों की और कुछ सामान व जानकारी की ज़रूरत है। ऐसे कई उदाहरण हैं जिनसे कि आम आदमी को थोड़ा पैसा और थोड़ा प्रयास लगा कर इस काम को करने की प्रेरणा मिलती है। इन कामों के लिए किसी भी सहायता या निगरानी की ज़रूरत नहीं है और न ही नदियों को जोड़ने जैसी बृहद परियोजनाओं की। इन बड़ी परियोजनाओं को करने में समय लगता है. पैसा लगता है, और साथ में भारी पर्यावरणीय राजनीतिक और तकनीकी क्षतियाँ हो सकती हैं, और सबसे बुरी चीज़ जो होती है वो यह कि लोग अपने आप काम करना छोड़कर सरकार से उम्मीद लगाए रखते हैं। इन सब कामों में ठेकेदारों के मिले होने की वजह से भ्रष्टाचार फैलता है। पहले ही कई दूरदराज़ के गाँवों में पानी की बोतल को दूध से भी महँगा बेचा जाता है। नई पीढ़ी को ये भी मालूम नहीं कि पानी हमारे लिए प्रकृति की एक अमूल्य किंतु निःशुल्क भेंट है।