निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर पाँच प्रश्न दिए गए हैं। गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़ें तथा प्रत्येक प्रश्न के चार विकल्पों में से सही विकल्प चुनें
एक वक्त था, जब विश्वविद्यालयों में ज्यादातर राजनीतिक नियुक्तियां होती थीं और दूसरे पदों पर नियुक्तियों में भी काफी पैसा चलता था। ऐसे में कमजोर वर्गों के लोगों का शैक्षिक पदों में समावेश बेहद मुश्किल था, क्योंकि उनके पास इतने आर्थिक संसाधन नहीं थे, कि वे नियुक्ति के सपने देख सकें। जाहिर है कि इन पदों पर कमजोर वर्गों का प्रतिनिधित्व भी तकरीबन शून्य ही हुआ करता था। अर्हता के मानक और व्यवस्था की नकारात्मक दृष्टि के कारण करोड़ों की आबादी वाले ये समुदाय एक फीसदी भी समावेश पाने से वंचित थे। किसी को पता भी नहीं चलता था, और बगैर किसी शैक्षिक मूल्यांकन के चोर दरवाजे से विश्वविद्यालय रूपी मंदिर में उच्च पदों पर नियुक्तियां होती थीं। नतीजा यह होता था कि कमजोर वर्गों के छात्र व छात्राएं काफी हतोत्साहित रहते थे और उच्च शिक्षा के प्रति काफी उदासीन भी। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। आज बाकायदा पदों के विज्ञापन छपते हैं। सर्च कमेटियां बैठती हैं। रिसर्च एडमिनिस्ट्रेटिव अनुभव और बौद्धिक विकास की संकल्पना को साकार करते सत्यनिष्ठ आचार्यों की उपलब्धियों से विश्वविद्यालयों के उच्चतम पद की गरिमा में वृद्धि की संभावनाएं बढ़ रही हैं। अब राजनीतिक प्रतिबद्धता से मुक्त, अपने अकादमिक दायित्वों, विद्या- विकास के प्रति निष्ठा और सामूहिकता की भावना जैसे गुणों को नियुक्ति के वक्त तरजीह दी जाती है।
उल्लेखनीय है कि शिक्षा, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र की समृद्धि राष्ट्र की सामाजिक समृद्धि की रीढ़ होती है। उन आचार्यों को प्रमुखता दी जा रही है, जिनके पास अपेक्षित उच्च स्तरीय उपाधियां हों, जिन्होंने उच्च स्तरीय रिसर्च किया हो, जिनकी कला-विज्ञान या मीडिया विषयक पुस्तकें विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल हों, जिनके अनुवाद देशी- विदेशी भाषाओं में हों और जिनके रचना कर्म को लेकर देश के अनेक विश्वविद्यालयों में दर्जनों एम. फिल., पीएच. डी. के रूप में शोध कार्य हो चुके हों।
हमें सभी वर्गों के लोगों को समान दृष्टि से देखना चाहिए ताकि सभी को एक साथ उन्नति के मार्ग पर लेकर जाया जा सके| देश का विकास तभी संभव है यदि सभी लोगों का विकास हो सके। अगर कोई एक भी छूट गया तब सब वापिस पहले से ही शुरू करना पड़ सकता है।