निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर पाँच प्रश्न दिए गए हैं। गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़ें तथा प्रत्येक प्रश्न के चार विकल्पों में से सही विकल्प चुनें।
भारत में अब शीघ्र ही जूट की सड़कें बनाई जाएँगी। इस तकनीक को आई आई टी खड़गपुर के दो वैज्ञानिकों ने विकसित किया है। उनके अनुसार इनसे बनने वाली सड़कें मज़बूत होंगी, भारत के मौसम के अनुकूल होंगी और समय के साथ उनका क्षय नहीं होगा क्योंकि जूट केवल धूप में ख़राब होता है, अन्यथा नहीं। यह सड़कें प्रकृति और पर्यावरण के लिए सबसे अनुकूल मानी गई हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार यह तकनीक दलदली भूमि, बलुई मिट्टी, ज़्यादा नमी वाली मिट्टी और बाढ़ प्रभावित इलाकों में बहुत सफल होगी, जहाँ आमतौर पर तारकोल वाली सड़कें सफल नहीं हो पाती।
जूट से सड़क बनाने की तकनीक खड़गपुर आईआईटी के मोहम्मद अज़ीज़ और रामस्वामी ने विकसित की है। इस तकनीक की अनुशंसा इंडियन रोड़ कांग्रेस फॉर स्टैंडर्डाइजेशन ने पहले ही कर दी थी। हालाँकि सबसे पहले जूट टेक्सटाइल तकनीक की अवधारणा 1920 में स्कीटलैंड में पैदा हुई, लेकिन चूँकि स्कॉटलैंड में अधिक जूट पैदा नहीं होता था, इसलिए तकनीक सड़क पर उतर नहीं सकी। 1934 में कोलकाता शहर में जूट का इस्तेमाल कुछ सड़कों पर पहली बार किया गया था। लेकिन जूट से सड़क बनाने की तकनीक पर 1980 से गंभीर अनुसंधान शुरू हुआ और लगभग 25 वर्षों में यह तकनीक तैयार हुई है।
सड़क बनाने के लिए जूट की लगभग आधा इंच मोटाई की लंबी-लंबी जमावट फैक्ट्री में तैयार की जाएगी जिसे 'जूट मैट' कहा जा सकता है, फैक्ट्री में जूट मैट' के थान तैयार किए जाएँगे। इसके बाद मिट्टी की सड़क तैयार की जाएगी। उस पर जूट मैट बिछा दिया जाएगा। फिर मिट्टी की मोटी परत परईंटों की जमावट की जाएगी और उसके ऊपर तारकोल की पतली परत डाल दी जाएगी। इस तरह जूट की सड़क तैयार हो जाएगी। रामास्वामी के अनुसार यह सड़क जितनी पुरानी होगी वह उतनी ही मज़बूत होती जाएगी। इसकी वजह है कि जूट पानी या नमी में कभी नहीं सड़ता। जूट सिर्फ तेज़ धूप या गर्मी में सड़ता और टूटता है। इस विधि से सड़क बनाने पर जूट सीधा धूप और गर्मी के संपर्क में नहीं आएगा, अतः इसके ख़राब होने की संभावना बिलकुल नहीं है। वैज्ञानिकों का दावा है कि जूट से बनाई गई सड़क की देखरेख या रखरखाव की भी ज़रूरत नहीं है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि आज जूट उत्पादक किसान और उद्योग बदहाली में है। ऐसे में यह तकनीक सफल होती है, तो जूट उद्योग के दिन बदल जाएँगे और पर्यावरण के क्षेत्र में भी हम प्रकृति की ओर एक नया कदम बढ़ाएँगे।